॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

महर्षिवाल्मीकिप्रणीत

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

सचित्र, हिंदी-अनुवादसहित

[प्रथम खण्ड]

(बालकाण्डसे किष्किन्धाकाण्डतक)

 

 

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

 

 

 

 

गीताप्रेस, गोरखपुर

 


॥ श्रीहरि:॥

नम्र निवेदन

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।

रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:॥

रामं रामानुजं सीतां भरतं भरतानुजम्।

सुग्रीवं वायुसूनुं च प्रणमामि पुन: पुन:॥

वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।

वेद: प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना॥

वेद जिस परमतत्त्वका वर्णन करते हैं, वही श्रीमन्नारायण-तत्त्व श्रीमद्रामायणमें श्रीरामरूपसे निरूपित है। वेदवेद्य परमपुरुषोत्तमके दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण होनेपर साक्षात् वेद ही श्रीवाल्मीकिके मुखसे श्रीरामायणरूपमें प्रकट हुए, ऐसी आस्तिकोंकी चिरकालसे मान्यता है। इसलिये श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणकी वेदतुल्य ही प्रतिष्ठा है। यों भी महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं, अत: विश्वके समस्त कवियोंके गुरु हैं। उनका ‘आदिकाव्य’ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण भूतलका प्रथम काव्य है। वह सभीके लिये पूज्य वस्तु है। भारतके लिये तो वह परम गौरवकी वस्तु है और देशकी सच्ची बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि है। इस नाते भी वह सबके लिये संग्रह, पठन, मनन एवं श्रवण करनेकी वस्तु है। इसका एक-एक अक्षर महापातकका नाश करनेवाला है—

एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।

यह समस्त काव्योंका बीज है—

‘काव्यबीजं सनातनम्।’

(बृहद्धर्म० १। ३०। ४७)

श्रीव्यासदेवादि सभी कवियोंने इसीका अध्ययन कर पुराण, महाभारतादिका निर्माण किया।1 ‘बृहद्धर्मपुराण’ में यह बात विस्तारसे प्रतिपादित है। श्रीव्यासजीने अनेक पुराणोंमें रामायणका माहात्म्य गाया है। स्कन्दपुराणका रामायणमाहात्म्य तो इस ग्रन्थके आरम्भमें दिया ही है, कई छिट-पुट माहात्म्य अलग भी हैं। यह भी प्रसिद्ध है कि व्यासजीने युधिष्ठिरके अनुरोधसे एक व्याख्या वाल्मीकिरामायणपर लिखी थी और उसकी एक हस्तलिखित प्रति अब भी प्राप्य है।2 इसका नाम ‘रामायणतात्पर्यदीपिका’ है। इसका उल्लेख दीवानबहादुर रामशास्त्रीने अपनी पुस्तक ‘स्टडीज इन रामायण’ के द्वितीय खण्डमें किया है। यह पुस्तक १९४४ ई०में बड़ौदासे प्रकाशित है। द्रोणपर्वके १४३। ६६-६७ श्लोकोंमें महर्षि वाल्मीकिके युद्धकाण्डके ८१। २८ को नामोल्लेखपूर्वक श्लोकका हवाला दिया गया है।3 ‘अग्निपुराण’के ५ से १३ तकके अध्यायोंमें ‘वाल्मीकि’के नामोल्लेखपूर्वक रामायणसारका वर्णन है। गरुडपुराण, पूर्वखण्डके १४३ वें अध्यायमें भी ठीक इन्हीं श्लोकोंमें रामायणसार कथन है। इसी प्रकार हरिवंश (विष्णुपर्व ९३। ६—३३) में भी यदुवंशियोंद्वारा वाल्मीकिरामायणके नाटक खेलनेका उल्लेख है—

रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।

श्रीव्यासदेवजीने वाल्मीकिकी जीवनी भी बड़ी श्रद्धासे ‘स्कन्दपुराण’ वैष्णवखण्ड, वैशाखमाहात्म्य १७ से २० अध्यायोंतक (‘कल्याण’ सं० स्कन्दपुराणाङ्क पृ० ३७४ से ३८१ तक), आवन्त्यखण्ड अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्यके २४ वें अध्यायमें (‘कल्याण’ संक्षिप्त स्कन्दपुराणाङ्क पृ० ७०८-९), प्रभासखण्डके २७८ वें अध्यायमें (सं० स्कन्दपुराणाङ्क पृ० १०२५—२७) तथा अध्यात्मरामायणके अयोध्याकाण्डमें (६। ६४—९२) वर्णन किया है। मत्स्यपुराण १२। ६१ में वे इन्हें ‘भार्गवसत्तम’से स्मरण करते हैं4 और भागवत ६। १८। ५ में ‘महायोगी’से।

इसी प्रकार कविकुलतिलक कालिदासने रघुवंशमें आदिकविको दो बार स्मरण किया है। एक तो—‘कवि: कुशेध्माहरणाय यात:। निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थ: श्लोक-त्वमापद्यत यस्य शोक:5॥’ (१४। ७०) इस श्लोकमें, दूसरे २। ४ के ‘पूर्वसूरिभि:’ में। भवभूतिको करुणरसका आचार्य माना गया है, किंतु हम देखते हैं कि उन्हें इसकी शिक्षा आदिकविसे ही मिली है। वे भी उत्तररामचरितके दूसरे अङ्कमें ‘वाल्मीकिपार्श्वादिह पर्यटामि’ ‘मुनयस्तमेव हि पुराणब्रह्मवादिनं प्राचेतसमृषिं..... उपासते’ आदिसे उन्हींका स्मरण करते हैं। ‘सुभाषितपद्धति’ के निर्माता शार्ङ्गधर उनके इस ऋणको स्पष्ट व्यक्त करते हुए लिखते हैं—

कवीन्द्रं नौमि वाल्मीकिं यस्य रामायणीकथाम्।

चन्द्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव साधव:॥

इसी तरह महाकवि भास, आचार्य शङ्कर, रामानुजादि सभी सम्प्रदायाचार्य, राजा भोज आदि परवर्ती विद्वानोंसे लेकर हिंदीसाहित्यके प्राण गोस्वामी तुलसीदासजीतकने ‘बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।’ ‘जान आदिकबि नाम प्रतापू’, ‘बालमीकि भए ब्रह्म समाना’ (रामचरितमानस), ‘जहाँ बालमीकि भये ब्याधतें मुनिंदु साधु’ ‘मरा मरा’ ‘जपें सिख सुनि रिषि सातकी’ (कवितावली, उत्तरकाण्ड १३८ से १४०), ‘कहत मुनीस महेस महातम उलटे सीधे नामको’ ‘महिमा उलटे नामकी मुनि कियो किरातो।’ (विनयपत्रिका १५१), ‘उलटा जपत कोलते भए ऋषिराव’ (बरवैरामा० ५४), ‘राम बिहाइ मरा जपते बिगरी सुधरी कबि कोकिलहू की’ (कवि० ७। ८८) इत्यादि पदोंसे इनका बार-बार श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है; कृतज्ञता ज्ञापन की है।

प्राचीन संस्कृत टीकाएँ

वाल्मीकिरामायणपर अगणित प्राचीन टीकाएँ हैं, यथा—१ कतक टीका (इसका नागोजीभट्ट तथा गोविन्द-राजादिने बहुत उल्लेख किया है), २—नागोजीभट्टकी तिलक या रामाभिरामी व्याख्या, ३—गोविन्दराजकी भूषण टीका, ४—शिवसहायकी रामायण-शिरोमणि व्याख्या, (ये पूर्वोक्त तीनों टीकाएँ गुजराती प्रिंटिङ्ग प्रेस बम्बईसे एकमें ही छपी हैं।) ५—माहेश्वरतीर्थकी तीर्थव्याख्या या तत्त्वदीप, ६—कन्दाल रामानुजकी रामानुजीयव्याख्या; (ये टीकाएँ वेंकटेश्वर प्रेस बम्बईसे छपी हैं।) ७—वरदराजकृत विवेकतिलक, ८—त्र्यम्बकराज मखानीकी धर्माकूत व्याख्या (यह खण्डश: मद्रास एवं श्रीरङ्गम्से छपी है) और ९—रामानन्दतीर्थकी रामायणकूट-व्याख्या। इसके अतिरिक्त चतुरर्थदीपिका, मायणविरोधपरिहार, रामायणसेतु, तात्पर्यतरणि, शृङ्गारसुधाकर रामायणसप्तबिम्ब, मनोरमा आदि अनेक टीकाएँ हैं। ‘रीडिंग्स इन रामायण’ के अनुसार इतनी टीकाएँ और हैं—अहोबलकी ‘वाल्मीकि-हृदय’ (तनिश्लोकी) व्याख्या, उनके शिष्यकी विरोधभञ्जिनी टीका, माधवाचार्यकी रामायणतात्पर्यनिर्णय-व्याख्या, श्रीअप्पय दीक्षितेन्द्रकी भी इसी नामकी एक अन्य व्याख्या (जिसमें उन्होंने रामायणको शिवपरक सिद्ध किया है), प्रवालमुकुन्दसूरिकी रामायणभूषण व्याख्या एवं श्रीरामभद्राश्रमकी सुबोधिनी टीका। डाक्टर एम० कृष्णमाचारीने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर’ में कई ऐसी टीकाओंका उल्लेख किया है, जिनके लेखकोंका पता नहीं है। उदाहरणार्थ—अमृतकतक, रामायणसारदीपिका, गुरुबाला चित्तरञ्जिनी, विद्वन्मनोरञ्जिनी आदि। उन्होंने वरदराजाचार्यके रामायणसारसंग्रह, देवरामभट्टकी विषयपदार्थव्याख्या, नृसिंह शास्त्रीकी कल्पवल्लिका, वेंकटाचार्यकी रामायणार्थप्रकाशिका, वेंकटाचार्यके रामायण-कथाविमर्श आदि व्याख्याग्रन्थोंका भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त कई टीकाएँ ‘मध्वविलास’ वाली प्रतिमें संग्रहीत हैं। ये सब तो ज्ञात संस्कृत व्याख्याएँ हैं। अज्ञात संस्कृत व्याख्याओं, हिन्दीके अनेकानेक द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैतादि मतावलम्बियों, आर्यसमाजकी व्याख्याओं, बंगला, मराठी, गुजराती आदि विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं तथा फ्रेंरच, अंग्रेजी आदि अन्य विदेशी भाषाओंमें किये गये अनुवाद, टीका-टिप्पणियोंकी तो यहाँ कोई बात ही नहीं छेड़नी है; क्योंकि उनका अन्त ही नहीं होना है।

रामायणके काव्यगुण, अन्य विशेषताएँ

कुछ लोगोंने तो यहाँतक कहा है कि रामायणके लक्षणोंके आधारपर ही दण्डी आदिने काव्योंकी परिभाषा बतलायी। त्र्यम्बकराज मखानीने सुन्दरकाण्डकी व्याख्यामें प्राय: सभी श्लोकोंको अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्डनामकी सार्थकता दिखलायी है। वास्तवमें बात भी ऐसी ही है। सुन्दरका ५वाँ सर्ग तो नितान्त सुन्दर है ही। श्रीमखानीने सभीके उदाहरण भी दिये हैं। यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिकविने किसी प्राचीन काव्यको बिना ही देखे, किसी ग्रन्थसे बिना ही सहारा लिये सर्वोत्तम काव्यका निर्माण किया। इनका प्राकृतिक चित्रण तो सुन्दर है ही, संवाद सर्वाधिक सुन्दर है। हनुमान्‌जीकी वार्तालापकुशलता सर्वत्र देखते बनती है। श्रीरामकी प्रतिपादनशैली, दशरथजीकी संभाषणपद्धति, (अयोध्याकाण्ड २रा सर्ग) किमधिकं कहीं-कहीं रावणका भी कथन (लंकाकाण्ड १६वाँ सर्ग) बहुत सुन्दर है। इन्होंने ज्योतिषशास्त्रको भी परम प्रमाण माना है। त्रिजटाके स्वप्न, श्रीरामका यात्राकालिक मुहूर्तविचार, विभीषणद्वारा लंकाके अपशकुनोंका प्रतिपादन (लंकाकाण्ड १०वाँ सर्ग) आदि ज्योतिर्विज्ञानके ज्ञापक तथा समर्थक हैं। श्रीराम जब अयोध्यासे चलते हैं तो नौ ग्रह एकत्र हो जाते हैं6—इससे लंकायुद्ध होता है। दशरथजी श्रीरामसे ज्योतिषियोंद्वारा अपने अनिष्ट फलादेशकी बात बतलाते हैं। (अयोध्या० ४। १८)7। युद्धकाण्ड १०२। ३२—३४ के श्लोकोंमें रावणमरणके समयकी ग्रहस्थिति भी ध्येय है। युद्धकाण्ड ९१वें सर्गमें आयुर्वेदविज्ञानकी बातें हैं। युद्ध १८ वें सर्ग तथा ६३। २ से २५ श्लोकतक राजनीतिकी अत्यन्त सारभूत अद्भुत बातें हैं। युद्धकाण्ड ७३। २४—२८ में तन्त्रशास्त्रकी भी प्रक्रियाएँ हैं। इसमें रावण तथा मेघनादको भारी तान्त्रिक दिखलाया गया है। मेघनादकी सब विजय तन्त्रमूलक है। जब वह जीवित कृष्णछागकी बलि देता है, तब तप्तकाञ्चनके तुल्य अग्निकी दक्षिणावर्त शिखाएँ उसे विजय सूचित करती हैं—‘प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसन्निभ:।’ (६। ७३। २३)। रावण भी भारी तान्त्रिक है। उसकी ध्वजापर (तान्त्रिकका चिह्न) नरशिरकपाल—मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था। (६। १००। १४)। किंतु उसके पराभव आदिद्वारा ऋषि वाममार्गके इन बलि-मांस-सुरादि क्रियाओंकी असमीचीनता प्रदर्शित करते हैं (गोस्वामी तुलसीदासजीने भी ‘तजि श्रुति पंथ बाम मग चलहीं,’ (अयोध्या० १६८। ७-८), ‘कौल कामबस कृपन बिमूढा’ (लंका०) आदिसे इसी बातका समर्थन किया है)। इस तरह हमें महर्षिकी दृष्टिमें ज्यौतिष, तन्त्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रोंकी प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। वस्तुत: यही परम आस्तिककी दृष्टि होती है। धर्मशास्त्रके लिये तो यह ग्रन्थ परम प्रमाण है ही, अन्य ऐतिहासिक कथाएँ भी बहुत हैं, अर्थशास्त्रकी भी पर्याप्त सामग्री है। व्यवहार तथा आचारकी भी बातें हैं, कुशलमार्गका भी प्रदर्शन है।

 

 

पवित्र दार्शनिकता

महर्षि वाल्मीकिकी अद्भुत कविता एवं अन्यान्य महत्तामें उनकी तपस्या ही हेतु है। इसमें वाल्मीकिरामायण ही साक्षी है। ‘तप:स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्’ से इस काव्यका ‘तप’ शब्दसे ही आरम्भ होता है और प्रथम अर्धालीमें ही दो बार ‘तप’ शब्द आया और ‘तपस्वी’ शब्दद्वारा महर्षिने एक प्रकारसे अपनी जीवनी भी लिख दी। तपद्वारा ही ब्रह्माजीका उन्होंने साक्षात् किया, रामायणकी दिव्यकाव्यताका आशीर्वाद लिया और रामचरित्रका दर्शन किया। बादमें विश्वामित्रके विचित्र तपका वर्णन, गङ्गाजीके आगमनमें भगीरथकी अद्भुत तपस्या, चूली ऋषिकी तपस्या, भृगुकी तपस्या आदिका भी वर्णन है। इनके मतसे स्वर्गादि सभी सुखभोगोंका हेतु तप है। किमधिकं; रावणादिके राज्य, सुख, शक्ति, आयु आदिका मूल भी तप है। श्रीराम तो शुद्ध तपस्वी हैं। वे तपस्वियोंके आश्रममें प्रवेश करते हैं। वहाँ वे वैखानस, बालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप (केवल चन्द्र-किरण पान करनेवाले), पत्राहारी, उन्मज्जक (सदा कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले), पञ्चाग्निसेवी, वायुभक्षी, जलभक्षी, स्थण्डिलशायी, आकाशनिलयी एवं ऊर्ध्ववासी (पर्वत, शिखर-वृक्ष, मचान आदिपर रहनेवाले) तपस्वियोंको देखते हैं। ये सभी जपमें लीन थे। (अरण्यकाण्ड ६ठा सर्ग) इनका जप सम्भवत: ‘श्रीराम’ मन्त्र रहा हो, क्योंकि इनमेंसे अधिकांश श्रीरामको देखते ही योगाग्निमें शरीर छोड़ देते हैं। वस्तुत: काव्यविधिसे कान्तासम्मित मधुर वाणीमें वाल्मीकिका यही दार्शनिक उपदेश है। उनका मूल तत्त्व इस प्रकार पवित्रतापूर्वक रहकर तपोऽनुष्ठान करते हुए ईश्वरकी आराधना करना एवं अधर्मसे सदा दूर रहना ही है।

श्रीरामकी परब्रह्मता

कुछ लोग रामायणमें नरचरित्र मानते हैं और श्रीरामके ईश्वरताप्रतिपादक (देखिये, बालकाण्ड १५ से १८ सर्ग, पुन: ७६। १७, १९, अयोध्या० १। ७, अरण्य० ३। ३७, सुन्दर० २५। २७, ३१; ५१। ३८, युद्ध० ५९। ११०; ९५। २५; पूरा १११ तथा ११७ वाँ सर्ग ११९। १८, ११९। ३२ में सुस्पष्ट ‘ब्रह्म’ शब्द उत्तरका० ८। २६, ५१। १२—२२; १०४। ४ आदि। बङ्ग तथा पश्चिमी शाखामें भी ये सब श्लोक हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक हैं।) हजारों वचनोंको प्रक्षिप्त मानते हैं। किंतु ध्यानसे पढ़नेपर श्रीरामकी ईश्वरता सर्वत्र दीखती है। गम्भीर चिन्तनके बाद तो प्रत्येक श्लोक ही श्रीरामकी अचिन्त्य शक्तिमत्ता, लोकोत्तर धर्मप्रियता, आश्रितवत्सलता एवं ईश्वरताका प्रतिपादक दीखता है। विभीषणशरणागतिके समय यद्यपि कोई भी ऐश्वर्य प्रदर्शक वचन नहीं आया, पर श्रीरामके अप्रतिम मार्दव, कपोतके आतिथ्यसत्कारके उदाहरण देने, परमर्षि कण्डुकी गाथा पढ़ने एवं अपने शरणमें आये समस्त प्राणियोंको8 समस्त प्राणियोंसे अभयदान देनेके स्वाभाविक नियमको घोषित करनेके बाद प्रतिवादी सुग्रीवको विवश होकर कहना ही पड़ा कि ‘धर्मज्ञ! लोकनाथोंके शिरोमणि! आपके इस कथनमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि आप महान् शक्तिशाली एवं सत्पथपर आरूढ़ हैं—

किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे।

यत् त्वमार्यं प्रभाषेथा: सत्त्ववान् सत्पथे स्थित:॥

(६। १८। ३६)

इसी प्रकार हनुमान् जी ने सीताजीके सामने और रावणके सामने जो श्रीरामके गुण कहे हैं, उनमें उन्हें ईश्वर तो नहीं बतलाया, किंतु ‘श्रीराममें यह सामर्थ्य है कि वे एक ही क्षणमें समस्त स्थावर-जंगमात्मक विश्वको संहृत कर दूसरे ही क्षण पुन: इस संसारका ज्यों-का-त्यों निर्माण कर सकते हैं’ इस कथनमें क्या ईश्वरताका भाव स्पष्ट नहीं हो जाता? कितनी स्पष्टता है—

सत्यं राक्षसराजेन्द्र शृणुष्व वचनं मम।

रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषत:॥

सर्वाल्ँलोकान् सुसंहृत्य सभूतान् सचराचरान्।

पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशा:॥

(वाल्मी० सुन्दरकाण्ड ५१। ३८-३९)

सच्ची बात तो यह है कि तपस्वी वाल्मीकि ‘राम’ के ही जापक थे। (उनके ‘मरा-मरा’ जपनेकी कथाको भी बहुतोंने निर्मूल माना है, किंतु यह कथा अध्यात्मरामायण अयोध्याकाण्ड, आनन्दरामायण राज्यकाण्ड १४ तथा स्कन्दपुराणमें भी कई बार आती है, तुलसीदास आदिने भी लिखा है) इसीसे उन्हें तथा अन्योंको सारी सिद्धियाँ मिली थीं, अत: इसमें ‘श्रीमन्नारायण’ को ही काव्यरूपमें गाया है। अन्यथा तत्कालीन कन्द-मूल-फलाशी वनवासी सर्वथा निरपेक्ष तपस्वीको किसी राजाके चरित्र-वर्णनसे कोई लाभ न था। ‘योगवासिष्ठ’ में भी, जो उनकी दूसरी विशाल रचना है, उन्होंने गुप्तरूपसे श्रीरामका विस्तृत चरित्र गाया है। किंतु प्रथम अध्यायमें तथा अन्यत्र भी यत्र-तत्र उनके नारायणत्व स्पष्ट प्रतिपादन कर ही दिया है। वस्तुत: प्रेमकी मधुरता उसकी गूढ़तामें ही है। देवताओंके सम्बन्धमें तो यह प्रसिद्धि भी है कि वे ‘परोक्षप्रिय’ होते हैं—‘परोक्षप्रिया इव हि देवा:, प्रत्यक्षद्विष:’ (ऐतरेय० १। ३। १४; बृहदा० ४। २। २) अत: महर्षिकी यह वर्णनप्रणाली गूढ़ प्रेमकी ही है, किंतु साधकके लिये वह सर्वत्र स्पष्ट ही है, तिरोहित नहीं है। इसपर प्राय: सैकड़ों संस्कृत व्याख्याएँ भी इसीके साक्षी हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि

वाल्मीकिका वर्णन आधुनिक ऐतिहासिक शैलीसे नहीं है, इसलिये लोग उसे इतिहासरूपमें स्वीकार नहीं करते। किंतु वाल्मीकिका संसार हजार, दो हजार वर्षोंका न था। फिर भला अरबों वर्षोंका इतिहास क्या आजके विकासके चश्मेसे पढ़ा जा सकता है? ऐसी दशामें केवल उपयोगी व्यक्तियोंका इतिहास ही लाभदायक है। इसीलिये अपने यहाँ इतिहासकी परिभाषा ही दूसरी की गयी है—

धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् ।

पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥

(विष्णुधर्म० ३। १५। १)

और विस्तृत एवं दीर्घकालिक विश्वका इतिहास तो रामायण-महाभारतकी भाँति ही हो सकता है और धर्म, अर्थ, लोक-व्यवहार, परलोक-सुखकी दृष्टिसे वही लाभकर भी सिद्ध हो सकता है।

भौगोलिक विवरण

रामायणके भूगोलपर भी बहुत अनुसंधान हुआ है। ‘कल्याण’का रामायणाङ्क, कनिङ्घमकी ‘ऐन्शेन्ट डिक्शनरी’, श्रीदेके ‘जागरफिकल डिक्शनरी’में इसपर बहुत अनुसंधान है। कई लोगोंने स्वतन्त्र लेख भी लिखे हैं। लंदनके ‘एशियाटिक सोसाइटी जर्नल’ में एक महत्त्वपूर्ण लेख छपा था। ‘वेद धरातल’ (पं गिरीशचन्द्र) में भी कुछ अच्छी सामग्री है। केवल ‘लंका’ पर ही कई प्रबन्ध हैं। ‘सर्वेश्वर’ के एक लेखमें ‘मालदीप’ को लंका सिद्ध किया है। कुछ लोग इसे ध्वस्त, मज्जित या दुर्ज्ञेय भी मानते हैं। वाल्मी० १। २२ की कौशाम्बी प्रयागसे १४ मील दक्षिण-पश्चिम कोसम गाँव है। धर्मारण्य आजकी गया है। ‘महोदय’ नगर कुशनाभकी कन्याओंके कुब्ज होनेसे आगे चलकर कान्यकुब्ज,9 पुन: कन्नौज हुआ, गिरिव्रज ‘राजगिर’ (बिहार) है। १। २४ के मलद-करूष आरा जिलेके उत्तरी भाग हैं। केकयदेश कुछ लोग ‘गजनी’ को और कुछ झेलम एवं कीकनाको कहते हैं। बालकाण्ड २। ३-४ में आयी तमसा नदीपर वाल्मीकिजीका आश्रम था। यह उस तमसासे सर्वथा भिन्न है, जिसका उल्लेख गङ्गाके उत्तर तथा अयोध्याके दक्षिणमें मिलता है। वाल्मीकि-आश्रमका उल्लेख २। ५६। १६ में भी आया है। पश्चिमोत्तरशाखीय रामायणके २। ११४ में भी इस आश्रमका उल्लेख है। बी० एच० वडेरने ‘कल्याण’ रामायणाङ्कके ४९६ पृष्ठपर इसे प्रयागसे २० मील दक्षिण लिखा है। सम्मेलनपत्रिका ४३। २ के १३३ पृष्ठपर वाल्मीकि-आश्रम प्रयाग-झाँसीरोड और राजापुर-मानिकपुर रोडके सङ्गमपर स्थित बतलाया गया है। गोस्वामी तुलसीदासजीके मतसे इनका आश्रम ‘वारिपुर दिगपुर बीच (विलसतिभूमि)’ था। मूल गोसाईंचरितकार ‘दिगवारिपुरा बीच सीतामढ़ी’ को वाल्मीकि-आश्रम मानते हैं। कुछ लोग कानपुरके बिठूरको भी वाल्मीकाश्रम मानते हैं।10 २। ५६। १६ की टीकामें कतक, तीर्थ, गोविन्दराज, शिरोमणिकार आदि इनका समाधान करते हुए लिखते हैं कि ऋषि प्राय: घूमते रहते थे। श्रीरामके वनवासके समय वे चित्रकूटके समीप तथा राज्यारोहणकालमें गङ्गातटपर (बिठूर) रहते थे। वाल्मी० ७। ६६। १ तथा ७। ७१। १४ से भी वाल्मीकाश्रम बिठूरमें ही सिद्ध होता है। अन्य विवरण प्राय: प्रस्तुत ग्रन्थकी टिप्पणियोंमें ही दिये गये हैं।

रामायणमें राजनीति, मनोविज्ञान

वाल्मीकिकी राजनीति बहुत उच्च कोटिकी है। उसके सामने सभी राजनीतिक विचार तुच्छ प्रतीत होते हैं। हनुमान्‌जी तो नीतिकी मूर्ति ही प्रतीत होते हैं। विभीषणके आनेपर श्रीराम सबसे सम्मति माँगते हैं। सुग्रीव कहते हैं कि यह शत्रुका ही भाई है, पता नहीं क्यों अब अकस्मात् हमारी सेनामें प्रवेश पाना चाहता है। सम्भव है, अवसर पाकर उल्लू जैसे कौओंका वध कर देता है, वैसे यह हमें भी मार डाले। प्रकृतिसे राक्षस है, इसका क्या विश्वास? साथ ही नीति यह है कि मित्रकी भेजी हुई, मोल ली हुई तथा जंगली जातियोंकी भी सहायता ग्राह्य है, पर शत्रुकी सहायता तो सदा शंकनीय है। अङ्गदने भी प्राय: ऐसी ही बात कही। जाम्बवन्तने कहा कि हमें भी इसको अदेशकालमें आया देख बड़ी शंका हो रही है। शरभने कहा कि इसपर गुप्तचर छोड़ा जाय। अश्विपुत्र मैन्दने कहा कि इससे प्रश्न-प्रतिप्रश्न किये जायँ, जिसके उत्तरसे भाव जान लिये जायँगे।

पर हनुमान् जी ने इनका ऐसा खण्डन किया, जो आज भी अभूतपूर्व है। वे बोले—‘प्रभो! आपके समक्ष बृहस्पतिका भाषण भी तुच्छ है। पर आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं विवाद, तर्क, स्पर्धा आदिके कारण नहीं, कार्यकी गुरुताके कारण कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

‘आपके मन्त्रियोंमेंसे कुछने विभीषणके पीछे गुप्तचर लगानेकी राय दी है, पर गुप्तचर तो दूर रहनेवाले तथा ‘अदृष्ट अज्ञातवृत्त’ व्यक्तिके पीछे लगाया जाता है, यह तो प्रत्यक्ष ही सामने है, अपना नाम-काम भी स्वयं ही कह रहा है, यहाँ गुप्तचरका क्या उपयोग? कुछ लोगोंने कहा है कि ‘यह अदेशकालमें आया है’, किंतु मुझे तो लगता है कि यही इसके आनेका देशकाल है। आपके द्वारा वालीको मारा गया और सुग्रीवको अभिषिक्त सुनकर आपके परम शत्रु तथा वालीके मित्र रावणके संहारके लिये ही आया है। इससे प्रश्न करनेकी बात भी दोषयुक्त दीखती है, क्योंकि उससे इसके मैत्रीभावमें बाधा पहुँचेगी और यह मित्रदूषित करनेका कार्य हो जायगा। यों तो आप कुछ भी बात करते समय इसके स्वरभेद, आकार, मुखविक्रिया आदिसे इसकी मन:स्थिति भाँप ही लेंगे। सुतरां मैंने अपनी तुच्छ बुद्धिके अनुसार यह कुछ निवेदन किया, प्रमाण तो स्वयं आप ही हैं।’ इसी तरह उनका लंकाप्रवेशके बाद १३वें सर्गका विमर्श, सीतासे बात करनेके पहले, ‘किस भाषामें किस प्रकार बात करूँ’ इत्यादि परामर्श, पुन: सीतासे बातें कर वापस चलनेके समय दूतादिके कर्तव्य एवं लङ्काके बलाबलकी जानकारीके लिये किया गया ऊहापोह, सुग्रीवको भोगलिप्त देखकर दिया गया परामर्श तथा रावणको जो उपदेश किया है, उसमें इनकी अपूर्व नीतिमत्ता, रामभक्ति, विचारप्रवणता, साधुता तथा अप्रतिम बुद्धिमत्ता प्रकट होती है। इन्हीं सब कारणोंसे उन्हें—‘बुद्धिमतां वरिष्ठम्’ कहा गया है। स्वयं श्रीराम भी बार-बार इनके भाषणचातुर्य, बुद्धिकौशलपर चकित होते हैं (किष्किन्धा० ४। २५—३५; युद्धकाण्ड १। १—१४)। श्रीरामकी नीतिमत्ता, साधुता, सद्गुणसम्पन्नता तो सर्वोपरि है ही। श्रीलक्ष्मण भी कम नहीं हैं। वे मारीचको पहले ही राक्षस बतलाकर सावधान करते हैं। सीतासे बार-बार कहते हैं कि ‘श्रीरामपर कोई संकट नहीं है, आपपर ही संकट आया दीखता है। यह सब राक्षसोंकी माया है’ इत्यादि। इसी प्रकार विभीषण आदिकी बातें भी स्थान-स्थानपर देखते बनती हैं।

उपसंहार

इन सभी गुणोंके आकर होनेसे ही यह काव्य सर्वाधिक लोकप्रिय, अजर, अमर, दिव्य तथा कल्याणकर11 है। संतोंके शब्दोंमें यह ‘रामायण श्रीरामतनु’ है। इसका पठन, मनन, अनुष्ठान साक्षात् प्रभु श्रीरामका संनिधान प्राप्त करना है।12 हनुमान्‌जीकी प्रसन्नताके लिये इस श्रीरामचरितके गानसे बढ़कर दूसरा उपाय नहीं। (इसमें हनुमच्चरित्र भी निरुपम, उज्ज्वल तथा दिव्य है।) इसलिये अनादिकालसे इसके श्रवण-पठन-अनुष्ठानादिकी परम्परा है। रामलीलाका भी पहले यही आधार रहा। हम पहले यदुवंशियोंद्वारा हरिवंशमें वर्णित रामायणनाटक खेलनेका उल्लेख कर चुके हैं। वहाँ इसका बड़ा रोचक वर्णन है। जब सुपुरमें इन्हें सफलता मिली तो वज्रनाभके वज्रपुरमें भी बुलाया गया। वहाँ इन्होंने लोमपादद्वारा शृङ्ग ऋषिका आनयन, पुन: दशरथ-यज्ञ, गङ्गावतरण, रम्भाभिसार आदि नाटक खेले।

 

रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।

लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम्॥

शान्तामप्यानयामास गणिकाभि: सहानघ।

(२। ९३। ८)

लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम्।

(२। ९३। २५)

यहाँ प्रद्युम्न, गद एवं साम्ब नान्दी बाजा बजा रहे थे। (नगाड़ोंकी ध्वनिको ही यहाँ नान्दी कहा गया है।) शूर नामके यादव ही ‘रावण’ का नाटक खेल रहे थे। (श्लोक २८) प्रद्युम्न नलकूबर बने और साम्ब विदूषक। इससे सिद्ध है कि भगवान् श्रीकृष्णके समयसे ही सफल रामलीला-कार्य आरम्भ था। यों तो ‘खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥’ से रामकथाकी तरह रामलीला आदिकी भी अनादिता सिद्ध है, तथापि इतिहासके विद्वानोंकी उत्सुकताके लिये इस घटनाका उल्लेख कर दिया गया। इसके बाद तो हनुमन्नाटक, प्रसन्नराघवनाटक, अनर्घराघवनाटक, महानाटक, बालरामायणनाटक आदि अगणित रामलीलानाटक ग्रन्थ ही लिख डाले गये। इन सभी नाटकग्रन्थोंका एकमात्र आधार यह वाल्मीकिरामायण ही रहा। इतना ही नहीं—इस वाल्मीकीय रामायण एवं रामकथाका प्रचार-विस्तार जावा, बाली आदि द्वीपोंतक हुआ। भारतमें इसके चार पाठ प्रचलित हैं। पश्चिमोत्तर शाखा (लाहौरका १९३१ का संस्करण), बंगशाखीय (Gorresio’s edition—गोरेशियोंका संस्करण), दाक्षिणात्य संस्करण, (गुजराती प्रिंटिङ्ग प्रेस बम्बईका तीन टीकावाला संस्करण तथा मध्वविलास बुकडिपो, कुम्भकोणम्का संस्करण) एवं उत्तर भारतका संस्करण (काश्मीरी संस्करण)। इनमें दाक्षिणात्य तथा औदीच्य संस्करण तो सर्वथा एक ही है। इनमें कहीं नाममात्रका भी अन्तर नहीं है। पश्चिम-पूर्ववालोंमें अध्यायोंका अन्तर है। पर उनपर कोई संस्कृत टीका नहीं मिलती। बंगशाखीयपर केवल एक लोकनाथरचित मनोरमा टीका मिलती है। इसलिये दाक्षिणात्य संस्करण (औदीच्य भी वही है ही) का ही सर्वत्र प्रचार तथा प्रामाण्य है। गीताप्रेससे भी जनताकी बहुत दिनोंसे इसकी माँग थी। अत: इसी दाक्षिणात्य पाठका टिप्पणियों तथा चित्रोंसहित शुद्ध, सटीक एवं सस्ता संस्करण जनताकी सेवाके लिये प्रकाशित किया गया है। इसीके साथ एक सस्ता केवल मूलपाठका संस्करण भी प्रकाशित किया गया है। केवल हिंदी जाननेवालोंके लिये अलगसे केवल हिंदीका ही एक सस्ता संस्करण प्रकाशित किया गया है। आशा है, सज्जनगण इनसे यथायोग्य लाभ उठायेंगे।

—जानकीनाथ शमार्

 

 


श्रीहरि:

विषय-सूची

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणकी पाठविधि

  1. प्रथमोऽध्याय:
  2. द्वितीयोऽध्याय:
  3. तृतीयोऽध्याय:
  4. चतुर्थोऽध्याय:
  5. पञ्चमोऽध्याय:

बालकाण्डम्

  1. प्रथम: सर्ग:
  2. द्वितीय: सर्ग:
  3. तृतीय: सर्ग:
  4. चतुर्थ: सर्ग:
  5. पञ्चम: सर्ग:
  6. षष्ठ: सर्ग:
  7. सप्तम: सर्ग:
  8. अष्टम: सर्ग:
  9. नवम: सर्ग:
  10. दशम: सर्ग:
  11. एकादश: सर्ग:
  12. द्वादश: सर्ग:
  13. त्रयोदश: सर्ग:
  14. चतुर्दश: सर्ग:
  15. पञ्चदश: सर्ग:
  16. षोडश: सर्ग:
  17. सप्तदश: सर्ग:
  18. अष्टादश: सर्ग:
  19. एकोनविंश: सर्ग:
  20. विंश: सर्ग:
  21. एकविंश: सर्ग:
  22. द्वाविंश: सर्ग:
  23. त्रयोविंश: सर्ग:
  24. चतुर्विंश: सर्ग:
  25. पञ्चविंश: सर्ग:
  26. षड्विंश: सर्ग:
  27. सप्तविंश: सर्ग:
  28. अष्टाविंश: सर्ग:
  29. एकोनत्रिंश: सर्ग:
  30. त्रिंश: सर्ग:
  31. एकत्रिंश: सर्ग:
  32. द्वात्रिंश: सर्ग:
  33. त्रयस्त्रिंश: सर्ग:
  34. चतुस्त्रिंश: सर्ग:
  35. पञ्चत्रिंश: सर्ग:
  36. षट्त्रिंश: सर्ग:
  37. सप्तत्रिंश: सर्ग:
  38. अष्टात्रिंश: सर्ग:
  39. एकोनचत्वारिंश: सर्ग:
  40. चत्वारिंश: सर्ग:
  41. एकचत्वारिंश: सर्ग:
  42. द्विचत्वारिंश: सर्ग:
  43. त्रिचत्वारिंश: सर्ग:
  44. चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:
  45. पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:
  46. षट्चत्वारिंश: सर्ग:
  47. सप्तचत्वारिंश: सर्ग:
  48. अष्टचत्वारिंश: सर्ग:
  49. एकोनपञ्चाश: सर्ग:
  50. पञ्चाश: सर्ग:
  51. एकपञ्चाश: सर्ग:
  52. द्विपञ्चाश: सर्ग:
  53. त्रिपञ्चाश: सर्ग:
  54. चतु:पञ्चाश: सर्ग:
  55. पञ्चपञ्चाश: सर्ग:
  56. षट्पञ्चाश: सर्ग:
  57. सप्तपञ्चाश: सर्ग:
  58. अष्टपञ्चाश: सर्ग:
  59. एकोनषष्टितम: सर्ग:
  60. षष्टितम: सर्ग:
  61. एकषष्टितम: सर्ग:
  62. द्विषष्टितम: सर्ग:
  63. त्रिषष्टितम: सर्ग:
  64. चतु:षष्टितम: सर्ग:
  65. पञ्चषष्टितम: सर्ग:
  66. षट्षष्टितम: सर्ग:
  67. सप्तषष्टितम: सर्ग:
  68. अष्टषष्टितम: सर्ग:
  69. एकोनसप्ततितम: सर्ग:
  70. सप्ततितम: सर्ग:
  71. एकसप्ततितम: सर्ग:
  72. द्विसप्ततितम: सर्ग:
  73. त्रिसप्ततितम: सर्ग:
  74. चतु:सप्ततितम: सर्ग:
  75. पञ्चसप्ततितम: सर्ग:
  76. षट्सप्ततितम: सर्ग:
  77. सप्तसप्ततितम: सर्ग:

अयोध्याकाण्डम्

  1. प्रथम: सर्ग:
  2. द्वितीय: सर्ग:
  3. तृतीय: सर्ग:
  4. चतुर्थ: सर्ग:
  5. पञ्चम: सर्ग:
  6. षष्ठ: सर्ग:
  7. सप्तम: सर्ग:
  8. अष्टम: सर्ग:
  9. नवम: सर्ग:
  10. दशम: सर्ग:
  11. एकादश: सर्ग:
  12. द्वादश: सर्ग:
  13. त्रयोदश: सर्ग:
  14. चतुर्दश: सर्ग:
  15. पञ्चदश: सर्ग:
  16. षोडश: सर्ग:
  17. सप्तदश: सर्ग:
  18. अष्टादश: सर्ग:
  19. एकोनविंश: सर्ग:
  20. विंश: सर्ग:
  21. एकविंश: सर्ग:
  22. द्वाविंश: सर्ग:
  23. त्रयोविंश: सर्ग:
  24. चतुर्विंश: सर्ग:
  25. पञ्चविंश: सर्ग:
  26. षड्विंश: सर्ग:
  27. सप्तविंश: सर्ग:
  28. अष्टाविंश: सर्ग:
  29. एकोनत्रिंश: सर्ग:
  30. त्रिंश: सर्ग:
  31. एकत्रिंश: सर्ग:
  32. द्वात्रिंश: सर्ग:
  33. त्रयस्त्रिंश: सर्ग:
  34. चतुस्त्रिंश: सर्ग:
  35. पञ्चत्रिंश: सर्ग:
  36. षट्त्रिंश: सर्ग:
  37. सप्तत्रिंश: सर्ग:
  38. अष्टात्रिंश: सर्ग:
  39. एकोनचत्वारिंश: सर्ग:
  40. चत्वारिंश: सर्ग:
  41. एकचत्वारिंश: सर्ग:
  42. द्विचत्वारिंश: सर्ग:
  43. त्रिचत्वारिंश: सर्ग:
  44. चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:
  45. पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:
  46. षट्चत्वार‌िंश: सर्ग:
  47. सप्तचत्वारिंश: सर्ग:
  48. अष्टचत्वारिंश: सर्ग:
  49. एकोनपञ्चाश: सर्ग:
  50. पञ्चाश: सर्ग:
  51. एकपञ्चाश: सर्ग:
  52. द्विपञ्चाश: सर्ग:
  53. त्रिपञ्चाश: सर्ग:
  54. चतु:पञ्चाश: सर्ग:
  55. पञ्चपञ्चाश: सर्ग:
  56. षट्पञ्चाश: सर्ग:
  57. सप्तपञ्चाश: सर्ग:
  58. अष्टपञ्चाश: सर्ग:
  59. एकोनषष्टितम: सर्ग:
  60. षष्टितम: सर्ग:
  61. एकषष्टितम: सर्ग:
  62. द्विषष्टितम: सर्ग:
  63. त्रिषष्टितम: सर्ग:
  64. चतु:षष्टितम: सर्ग:
  65. पञ्चषष्टितम: सर्ग:
  66. षट्षष्टितम: सर्ग:
  67. सप्तषष्टितम: सर्ग:
  68. अष्टषष्टितम: सर्ग:
  69. एकोनसप्ततितम: सर्ग:
  70. सप्ततितम: सर्ग:
  71. एकसप्ततितम: सर्ग:
  72. द्विसप्ततितम: सर्ग:
  73. त्रिसप्ततितम: सर्ग:
  74. चतु:सप्ततितम: सर्ग:
  75. पञ्चसप्ततितम: सर्ग:
  76. षट्सप्ततितम: सर्ग:
  77. सप्तसप्ततितम: सर्ग:
  78. अष्टसप्ततितम: सर्ग:
  79. एकोनाशीतितम: सर्ग:
  80. अशीतितम: सर्ग:
  81. एकाशीतितम: सर्ग:
  82. द्वॺशीतितम: सर्ग:
  83. त्र्यशीतितम: सर्ग:
  84. चतुरशीतितम: सर्ग:
  85. पञ्चाशीतितम: सर्ग:
  86. षडशीतितम: सर्ग:
  87. सप्ताशीतितम: सर्ग:
  88. अष्टाशीतितम: सर्ग:
  89. एकोननवतितम: सर्ग:
  90. नवतितम: सर्ग:
  91. एकनवतितम: सर्ग:
  92. द्विनवतितम: सर्ग:
  93. त्रिनवतितम: सर्ग:
  94. चतुर्नवतितम: सर्ग:
  95. पञ्चनवतितम: सर्ग:
  96. षण्णवतितम: सर्ग:
  97. सप्तनवतितम: सर्ग:
  98. अष्टनवतितम: सर्ग:
  99. नवनवतितम: सर्ग:
  100. शततम: सर्ग:
  101. एकाधिकशततम: सर्ग:
  102. द्वॺधिकशततम: सर्ग:
  103. त्र्यधिकशततम: सर्ग:
  104. चतुरधिकशततम: सर्ग:
  105. पञ्चाधिकशततम: सर्ग:
  106. षडधिकशततम: सर्ग:
  107. सप्ताधिकशततम: सर्ग:
  108. अष्टाधिकशततम: सर्ग:
  109. नवाधिकशततम: सर्ग:
  110. दशाधिकशततम: सर्ग:
  111. एकादशाधिकशततम: सर्ग:
  112. द्वादशाधिकशततम: सर्ग:
  113. त्रयोदशाधिकशततम: सर्ग:
  114. चतुर्दशाधिकशततम: सर्ग:
  115. पञ्चदशाधिकशततम: सर्ग:
  116. षोडशाधिकशततम: सर्ग:
  117. सप्तदशाधिकशततम: सर्ग:
  118. अष्टादशाधिकशततम: सर्ग:
  119. एकोनविंशत्यधिकशततम: सर्ग:

अरण्यकाण्डम्

  1. प्रथम: सर्ग:
  2. द्वितीय: सर्ग:
  3. तृतीय: सर्ग:
  4. चतुर्थ: सर्ग:
  5. पञ्चम: सर्ग:
  6. षष्ठ: सर्ग:
  7. सप्तम: सर्ग:
  8. अष्टम: सर्ग:
  9. नवम: सर्ग:
  10. दशम: सर्ग:
  11. एकादश: सर्ग:
  12. द्वादश: सर्ग:
  13. त्रयोदश: सर्ग:
  14. चतुर्दश: सर्ग:
  15. पञ्चदश: सर्ग:
  16. षोडश: सर्ग:
  17. सप्तदश: सर्ग:
  18. अष्टादश: सर्ग:
  19. एकोनविंश: सर्ग:
  20. विंश: सर्ग:
  21. एकविंश: सर्ग:
  22. द्वाविंश: सर्ग:
  23. त्रयोविंश: सर्ग:
  24. चतुर्विंश: सर्ग:
  25. पञ्चविंश: सर्ग:
  26. षड्विंश: सर्ग:
  27. सप्तविंश: सर्ग:
  28. अष्टाविंश: सर्ग:
  29. एकोनत्रिंश: सर्ग:
  30. त्रिंश: सर्ग:
  31. एकत्रिंश: सर्ग:
  32. द्वात्रिंश: सर्ग:
  33. त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:
  34. चतुस्त्र‌िंश: सर्ग:
  35. पञ्चत्रिंश: सर्ग:
  36. षट्त्रिंश: सर्ग:
  37. सप्तत्रिंश: सर्ग:
  38. अष्टात्रिंश: सर्ग:
  39. एकोनचत्वारिंश: सर्ग:
  40. चत्वारिंश: सर्ग:
  41. एकचत्वारिंश: सर्ग:
  42. द्विचत्वारिंश: सर्ग:
  43. त्रिचत्वारिंश: सर्ग:
  44. चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:
  45. पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:
  46. षट्चत्वारिंश: सर्ग:
  47. सप्तचत्वारिंश: सर्ग:
  48. अष्टचत्वारिंश: सर्ग:
  49. एकोनपञ्चाश: सर्ग:
  50. पञ्चाश: सर्ग:
  51. एकपञ्चाश: सर्ग:
  52. द्विपञ्चाश: सर्ग:
  53. त्रिपञ्चाश: सर्ग:
  54. चतुष्पञ्चाश: सर्ग:
  55. पञ्चपञ्चाश: सर्ग:
  56. षट्पञ्चाश: सर्ग:
  57. सप्तपञ्चाश: सर्ग:
  58. अष्टपञ्चाश: सर्ग:
  59. एकोनषष्टितम: सर्ग:
  60. षष्टितम: सर्ग:
  61. एकषष्टितम: सर्ग:
  62. द्विषष्टितम: सर्ग:
  63. त्रिषष्टितम: सर्ग:
  64. चतु:षष्टितम: सर्ग:
  65. पञ्चषष्टितम: सर्ग:
  66. षट्षष्टितम: सर्ग:
  67. सप्तषष्टितम: सर्ग:
  68. अष्टषष्टितम: सर्ग:
  69. एकोनसप्ततितम: सर्ग:
  70. सप्ततितम: सर्ग:
  71. एकसप्ततितम: सर्ग:
  72. द्विसप्ततितम: सर्ग:
  73. त्रिसप्ततितम: सर्ग:
  74. चतु:सप्ततितम: सर्ग:
  75. पञ्चसप्ततितम: सर्ग:

किष्किन्धाकाण्डम्

  1. प्रथम: सर्ग:
  2. द्वितीय: सर्ग:
  3. तृतीय: सर्ग:
  4. चतुर्थ: सर्ग:
  5. पञ्चम: सर्ग:
  6. षष्ठ: सर्ग:
  7. सप्तम: सर्ग:
  8. अष्टम: सर्ग:
  9. नवम: सर्ग:
  10. दशम: सर्ग:
  11. एकादश: सर्ग:
  12. द्वादश: सर्ग:
  13. त्रयोदश: सर्ग:
  14. चतुर्दश: सर्ग:
  15. पञ्चदश: सर्ग:
  16. षोडश: सर्ग:
  17. सप्तदश: सर्ग:
  18. अष्टादश: सर्ग:
  19. एकोनविंश: सर्ग:
  20. विंश: सर्ग:
  21. एकविंश: सर्ग:
  22. द्वाविंश: सर्ग:
  23. त्रयोविंश: सर्ग:
  24. चतुर्विंश: सर्ग:
  25. पञ्चविंश: सर्ग:
  26. षड्विंश: सर्ग:
  27. सप्तविंश: सर्ग:
  28. अष्टाविंश: सर्ग:
  29. एकोनत्रिंश: सर्ग:
  30. त्रिंश: सर्ग:
  31. एकत्रिंश: सर्ग:
  32. द्वात्रिंश: सर्ग:
  33. त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:
  34. चतुस्त्रिंश: सर्ग:
  35. पञ्चत्रिंश: सर्ग:
  36. षट्त्रिंश: सर्ग:
  37. सप्तत्रिंश: सर्ग:
  38. अष्टात्रिंश: सर्ग:
  39. एकोनचत्वारिंश: सर्ग:
  40. चत्वारिंश: सर्ग:
  41. एकचत्वारिंश: सर्ग:
  42. द्विचत्वारिंश: सर्ग:
  43. त्रिचत्वारिंश: सर्ग:
  44. चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:
  45. पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:
  46. षट्चत्वारिंश: सर्ग:
  47. सप्तचत्वारिंश: सर्ग:
  48. अष्टचत्वारिंश: सर्ग:
  49. एकोनपञ्चाश: सर्ग:
  50. पञ्चाश: सर्ग:
  51. एकपञ्चाश: सर्ग:
  52. द्विपञ्चाश: सर्ग:
  53. त्रिपञ्चाश: सर्ग:
  54. चतु:पञ्चाश: सर्ग:
  55. पञ्चपञ्चाश: सर्ग:
  56. षट्पञ्चाश: सर्ग:
  57. सप्तपञ्चाश: सर्ग:
  58. अष्टपञ्चाश: सर्ग:
  59. एकोनषष्टितम: सर्ग:
  60. षष्टितम: सर्ग:
  61. एकषष्टितम: सर्ग:
  62. द्विषष्टितम: सर्ग:
  63. त्रिषष्टितम: सर्ग:
  64. चतु:षष्टितम: सर्ग:
  65. पञ्चषष्टितम: सर्ग:
  66. षट्षष्टितम: सर्ग:
  67. सप्तषष्टितम: सर्ग:

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणकी पाठविधि

वाल्मीकीय रामायणकी अनेक प्रकारकी पारायण- विधियाँ हैं। श्रीरामसेवाग्रन्थ, अनुष्ठानप्रकाश, स्कान्दोक्त रामायण-माहात्म्य, बृहद्धर्मपुराण तथा शाङ्कर, रामानुज, मध्व, रामानन्द आदि विभिन्न सम्प्रदायोंकी अलग-अलग विधियाँ हैं, यद्यपि उनका अन्तर साधारण है। इसी प्रकार इसके सकाम और निष्काम अनुष्ठानोंके भी भेद हैं। सबपर विस्तृत विचार यहाँ सम्भव नहीं। वाल्मीकीयके परम प्रसिद्ध नवाह्न-पारायणकी ही विधि यहाँ लिखी जा रही है।

चैत्र, माघ तथा कार्तिक शुक्ल पञ्चमीसे त्रयोदशीतक इसके नवाह्न-पारायणकी विधि है13। किसी पुण्यक्षेत्र, पवित्र तीर्थ, मन्दिरमें या अपने घरपर ही भगवान् विष्णु तथा तुलसीके संनिधानमें वाल्मीकिरामायणका पाठ करना चाहिये। एतदर्थ यथासम्भव कथा-स्थानकी भूमिको संशोधन, मार्जन, लेपनादि संस्कारोंसे संस्कृतकर कदली-स्तम्भ तथा ध्वजा-पताका-वितानादिसे मण्डित कर देना चाहिये। मण्डपका मान १६ हाथ लंबा-चौड़ा हो और उसके बीचमें सर्वतोभद्रसे युक्त एक वेदी हो। अन्य वेदियाँ, कुण्ड तथा स्थण्डिल आदि भी हों। मण्डपके दक्षिण-पश्चिम भागमें वक्ता (व्यास) एवं श्रोताका आसन हो। व्यासासनके आगे पुस्तकका आसन होना चाहिये। श्रोताओंका आसन विस्तृत हो। व्यासका आसन श्रोतासे तथा पुस्तकका आसन वक्तासे भी ऊँचा होना चाहिये14। फिर प्रायश्चित्त तथा नित्यकृत्य करके भगवान् श्रीरामकी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। अथवा पुस्तकपर ही सपरिकर-सपरिच्छद श्रीसीतारामजीका अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्र, भगवती सीताजी, लक्ष्मणजी, भरतजी, शत्रुघ्नजी, श्रीहनुमान्जी आदिका आवाहन करना चाहिये। तत्पश्चात् समस्त उपकरणोंसे अलंकृत, पञ्चपल्लवादिसे युक्त कलश स्थापितकर स्वस्त्ययनपूर्वक गणपतिपूजन, बटुक, क्षेत्रपाल, योगिनी, मातृका, नवग्रह, तुलसी, लोकपाल, दिक्पाल आदिका पूजन तथा नान्दीश्राद्ध करके सपरिकर-सपरिच्छद भगवान् रामकी पूजा करे।

तदनन्तर काल-तिथि-गोत्र-नाम आदि बोलकर—

ॐ भूर्भुव: स्वरोम्। ममोपात्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीसीतारामप्रीत्यर्थं श्रीसीतालक्ष्मणभरतशत्रुघ्न-हनुमत्समेतश्रीरामचन्द्र-प्रसादसिद्ध्यर्थं च श्रीरामचन्द्रप्रसादेन सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थं श्रीराम- चन्द्रपूजनमहं करिष्ये। श्रीवाल्मीकीयरामायणस्य पारायणं च करिष्ये, तदङ्गभूतं कलशस्थापनं स्वस्त्ययनपाठं गणपतिपूजनं वटुकक्षेत्रपालयोगिनीमातृकानवग्रहतुलसीलोकपालदिक्पालादि-पूजनं चाहं करिष्ये।

—इस प्रकार संकल्प करनेके बाद पूजन करे।

ॐ अच्युताय नम:, ॐ अनन्ताय नम:, ॐ गोविन्दाय नम:, ॐ नारायणाय नम:, ॐ मधुसूदनाय नम:, ॐ हृषीकेशाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ त्रिविक्रमाय नम:, ॐ दामोदराय नम:, ॐ मुकुन्दाय नम:, ॐ वामनाय नम:, ॐ पद्मनाभाय नम:, ॐ केशवाय नम:, ॐ विष्णवे नम:, ॐ श्रीधराय नम:, ॐ श्रीसीतारामाभ्यां नम:।

इस प्रकार नमस्कार करके निम्न प्रकारसे पूजा करे—

श्रीसीतालक्ष्मणभरतशत्रुघ्नहनुमत्समेतं श्रीरामचन्द्रं ध्यायामि—भगवान् रामका ध्यान करे।

,, आवाहयामि—आवाहन करे।

श्रीसीतालक्ष्मणभरतशत्रुघ्नहनुमत्समेताय श्रीरामचन्द्राय नम:—रत्नसिंहासनं समर्पयामि—सिंहासन अर्पण करे।

,, पाद्यं समर्पयामि—पाद्य दे।

,, अर्घ्यं समर्पयामि—अर्घ्य दे।

,, स्नानीयं समर्पयामि—स्नान करावे।

,, आचमनीयं समर्पयामि—आचमन करावे।

,, वस्त्रं समर्पयामि—वस्त्र अर्पण करे।

,, यज्ञोपवीताभरणं समर्पयामि—यज्ञोपवीत-आभूषण दे।

,, गन्धान् समर्पयामि—चन्दन-कुङ्कुम लगावे।

,, अक्षतान् समर्पयामि—चावल चढ़ावे।

,, पुष्पाणि समर्पयामि—पुष्पमाला दे।

,, धूपमाघ्रापयामि—धूप दे।

,, दीपं दर्शयामि—दीपक दिखावे।

,, नैवेद्यं फलानि च समर्पयामि—नैवेद्य और फल अर्पण करे।

,, ताम्बूलं समर्पयामि—पान दे।

,, कर्पूरनीराजनं समर्पयामि—आरती करे।

,, छत्रचामरादि समर्पयामि—छत्र-चँवरादि अर्पण करे।

,, पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि—पुष्पाञ्जलि अर्पण करे।

,, प्रदक्षिणानमस्कारान् समर्पयामि—प्रदक्षिणा और नमस्कार करे।

तत्पश्चात् निम्न प्रकारसे पञ्चोपचारसे श्रीरामायण-ग्रन्थकी पूजा करे—

ॐ सदा श्रवणमात्रेण पापिनां सद्गतिप्रदे।

शुभे रामकथे तुभ्यं गन्धमद्य समर्पये॥

—इति गन्धं समर्पयामि।

ॐ बालादिसप्तकाण्डेन सर्वलोकसुखप्रद।

रामायण महोदार पुष्पं तेऽद्य समर्पये॥

—इति पुष्पाणि पुष्पमालां च समर्पयामि।

ॐ यस्यैकश्लोकपाठस्य फलं सर्वफलाधिकम्।

तस्मै रामायणायाद्य दशाङ्गं धूपमर्पये॥

—इति धूपमाघ्रापयामि।

ॐ यस्य लोके प्रणेतारो वाल्मीक्यादिमहर्षय:।

तस्मै रामचरित्राय घृतदीपं समर्पये॥

—इति दीपं दर्शयामि।

ॐ श्रूयते ब्रह्मणो लोके शतकोटिप्रविस्तरम्।

रूपं रामायणस्यास्य तस्मै नैवेद्यमर्पये॥

—इति नैवेद्यं समर्पयामि।

पूजा करनेके बाद कर्पूरकी आरती करके चार बार प्रदक्षिणा कर पुष्पाञ्जलि अर्पण करे। फिर साष्टाङ्ग प्रणाम कर इस प्रकार नमस्कार करे—

वाल्मीकिगिरिसम्भूता रामसागरगामिनी।

पुनाति भुवनं पुण्या रामायणमहानदी॥

श्लोकसारसमाकीर्णं सर्गकल्लोलसंकुलम्।

काण्डग्राहमहामीनं वन्दे रामायणार्णवम्॥

फिर देवता, ब्राह्मणादिकी पूजा कर पाठका संकल्प करके ऋष्यादिन्यास करे। अनुष्ठानप्रकाशके अनुसार कामनाभेदसे यदि पूरी रामायणका पाठ न हो सके तो अलग-अलग काण्डोंके अनुष्ठानकी भी विधि है। जैसे पुत्रकी कामनावाला बालकाण्ड पढ़े, लक्ष्मीकी इच्छावाला अयोध्याकाण्ड पढ़े। इसी प्रकार नष्टराज्यकी प्राप्तिकी इच्छावालोंको किष्किन्धाकाण्डका, सभी कामनाओंकी इच्छावालोंको सुन्दरकाण्डका और शत्रुनाशकी कामनावालोंको लङ्काकाण्डका पाठ करना चाहिये। ‘बृहद्धर्मपुराण’ के अनुसार इनका अन्य भी सकाम उपयोग है। वह तथा उसके न्यासादिका प्रकार आगे लिखा जायगा।

ॐ अस्य श्रीवाल्मीकिरामायणमहामन्त्रस्य भगवान् वाल्मीकिऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:। श्रीराम: परमात्मा देवता। अभयं सर्वभूतेभ्य इति बीजम्। अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिति शक्ति:। एतदस्त्रबलं दिव्यमिति कीलकम्। भगवान्नारायणो देव इति तत्त्वम्। धर्मात्मा सत्यसंधश्चेत्यस्त्रम्। पुरुषार्थचतुष्टयसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोग:।

ॐ श्रीं रां आपदामपहर्तारमित्यङ्गुष्ठाभ्यां नम:।

ॐ हृं रीं दातारमिति तर्जनीभ्यां नम:।

ॐ रों रूं सर्वसम्पदामिति मध्यमाभ्यां नम:।

ॐ श्रीं रैं लोकाभिराममित्यनामिकाभ्यां नम:।

ॐ श्रीं रौं श्रीराममिति कनिष्ठिकाभ्यां नम:।

ॐ रौं र: भूयो भूयो नमाम्यहमिति करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

इन्हीं मन्त्रोंसे इसी प्रकार हृदयादि15 न्यास करे। फिर—

ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विन:।

सिद्धिं दिशन्तु मे सर्वे देवा: सर्षिगणास्त्विह॥

—इति दिग्बन्ध:।

यों कहकर चारों ओर हाथ घुमाकर अन्तमें फिर इस प्रकार ध्यान करे—

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पश्चात् सुमित्रासुत:।

शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वाय्वादिकोणेषु च।

सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्।

मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम्॥

‘आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।

लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥’

यह सम्पुटका मन्त्र है। इससे सम्पुटित पाठ करनेसे समस्त मन:कामनाओंकी सिद्धि होती है।

फिर16 निम्न प्रकारसे मङ्गलाचरण करके पाठ आरम्भ करना चाहिये—

गणपतिका ध्यान

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

वागीशाद्या: सुमनस: सर्वार्थानामुपक्रमे।

यं नत्वा कृतकृत्या: स्युस्तं नमामि गजाननम्॥

गुरुकी वन्दना

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:॥

सरस्वतीका स्मरण

दोर्भिर्युक्ता चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना

हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण।

भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमानासमाना

सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना॥

वाल्मीकिजीकी वन्दना

कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्।

आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥

य: पिबन् सततं रामचरितामृतसागरम्।

अतृप्तस्तं मुनिं वन्दे प्राचेतसमकल्मषम्॥

हनुमान्‌जीको नमस्कार

गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।

रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥

अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।

कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥

उल्लङ्‌घ्य सिन्धो: सलिलं सलीलं

य: शोकवह्निं जनकात्मजाया:।

आदाय तेनैव ददाह लङ्कां

नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥

आञ्जनेयमतिपाटलाननं

काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम् ।

पारिजाततरुमूलवासिनं

भावयामि पवमाननन्दनम्॥

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं

तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।

बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं

मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं

जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं

श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥

श्रीरामके ध्यानका क्रम

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे

मध्येपुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम्।

अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्य: परं

व्याख्यान्तं भरतादिभि: परिवृतं रामं भजे श्यामलम्॥

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पश्चात् सुमित्रासुत:

शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वाय्वादिकोणेषु च।

सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्

मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम्॥

श्रीरामपरिकरको नमस्कार

रामं रामानुजं सीतां भरतं भरतानुजम्।

सुग्रीवं वायुसूनुं च प्रणमामि पुन: पुन:॥

नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै।

नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्रार्कमरुद्गणेभ्य:॥

रामायणको नमस्कार

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।

एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥

वाल्मीकिगिरिसम्भूता रामाम्भोनिधिसंगता।

श्रीमद्रामायणी गङ्गा पुनाति भुवनत्रयम्॥

वाल्मीकेर्मुनिसिंहस्य कवितावनचारिण:।

शृण्वन् रामकथानादं को न याति परां गतिम्॥

पाठ आरम्भ करनेके बाद अध्यायके बीचमें रुकना नहीं चाहिये। रुक जानेपर फिर उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये। मध्यम स्वरसे, स्पष्ट उच्चारण करते हुए श्रद्धा तथा प्रेमसे पाठ करना चाहिये। गीत गाकर, सिर हिलाकर, जल्दबाजीसे तथा बिना अर्थ समझे पाठ करना ठीक नहीं है। संध्या-समय निम्नलिखित स्थलोंपर प्रतिदिन विश्राम करते जाना चाहिये।

प्रथम दिन

अयोध्याकाण्डके

६ ठे

सर्गकी

समाप्तिपर

प्रथम

विश्राम

द्वितीय दिन

अयोध्याकाण्डके

८० वें

सर्गकी

समाप्तिपर

द्वितीय

विश्राम

तृतीय दिन

अरण्यकाण्डके

२० वें

सर्गकी

समाप्तिपर

तृतीय

विश्राम

चतुर्थ दिन

किष्किन्धाकाण्डके

४६ वें

सर्गकी

समाप्तिपर

चतुर्थ

विश्राम

पञ्चम दिन

सुन्दरकाण्डके

४७ वें

सर्गकी

समाप्तिपर

पञ्चम

विश्राम

षष्ठ दिन

युद्धकाण्डके

५० वें

सर्गकी

समाप्तिपर

षष्ठ

विश्राम

सप्तम दिन

युद्धकाण्डके

९९ वें

सर्गकी

समाप्तिपर

सप्तम

विश्राम

अष्टम दिन

उत्तरकाण्ड

३६ वें

सर्गकी

समाप्तिपर

अष्टम

विश्राम

नवम दिन

उत्तरकाण्ड

अन्तिम सर्गके बाद पुन: युद्ध - काण्डका अन्तिम सर्ग पढ़कर विश्राम करना चाहिये।17

इसके अन्य भी विश्रामस्थल हैं। एक पारायण-क्रम ऐसा भी है, जिसमें उत्तरकाण्डका पाठ नहीं किया जाता। उसके विश्रामस्थल क्रमश: इस प्रकार हैं—

प्रथम

दिवस

बालकाण्डके

७७ वें

सर्गकी समाप्तिपर

द्वितीय

दिवस

अयोध्याकाण्डके

६० वें

सर्गकी समाप्तिपर

तृतीय

दिवस

अयोध्याकाण्डके

११९ वें

सर्गकी समाप्तिपर

चतुर्थ

दिवस

अरण्यकाण्डके

६८ वें

सर्गकी समाप्तिपर

पञ्चम

दिवस

किष्किन्धाकाण्डके

४९ वें

सर्गकी समाप्तिपर

षष्ठ

दिवस

सुन्दरकाण्डके

५६ वें

सर्गकी समाप्तिपर

सप्तम

दिवस

युद्धकाण्डके

५० वें

सर्गकी समाप्तिपर

अष्टम

दिवस

युद्धकाण्डके

१११ वें

सर्गकी समाप्तिपर

नवम

दिवस

युद्धकाण्डके

१३१ वें

सर्गकी समाप्तिपर

प्रतिदिन कथा-समाप्तिके समय निम्नाङ्कित श्लोकोंके द्वारा मङ्गलाशासन करके पारायण पूरा करे।

स्वस्ति प्रजाभ्य: परिपालयन्तां न्याय्येन मार्गेण महीं महीशा:।

गोब्राह्मणेभ्य: शुभमस्तु नित्यं लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु॥

काले वर्षतु पर्जन्य: पृथिवी सस्यशालिनी।

देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणा: सन्तु निर्भया:॥

अपुत्रा: पुत्रिण: सन्तु पुत्रिण: सन्तु पौत्रिण:।

अधना: सधना: सन्तु जीवन्तु शरदां शतम्॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।

एकैकमक्षरं प्रोक्तं महापातकनाशनम्॥

शृण्वन् रामायणं भक्त्या य: पादं पदमेव वा।

स याति ब्रह्मण: स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।

रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:॥

यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते।

वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा।

अमृतं प्रार्थयानस्य तत्ते भवतु मङ्गलम्॥

मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने।

चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम्॥

अमृतोत्पादने दैत्यान् घ्नतो वज्रधरस्य यत्।

अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

त्रीन् विक्रमान् प्रक्रमतो विष्णोरमिततेजस:।

यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम्॥

ऋषय: सागरा द्वीपा वेदा लोका दिशश्च ते।

मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु तव सर्वदा॥

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।

करोमि यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पये तत्॥

अलग-अलग काण्डोंके सकाम18 पाठका ऋष्यादिन्यास इस प्रकार है—

बालकाण्डका विनियोग

ॐ अस्य श्रीबालकाण्डमहामन्त्रस्य ऋष्यशृङ्ग ऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:। दाशरथि: परमात्मा देवता। रां बीजम्। नम: शक्ति:। रामायेति कीलकम्। श्रीरामप्रीत्यर्थे बालकाण्डपारायणे विनियोग:।

ऋष्यादिन्यास

ॐ ऋष्यशृङ्गऋषये नम: शिरसि। ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। ॐ दाशरथिपरमात्मदेवतायै नम: हृदि। ॐ रां बीजाय नम: गुह्ये। ॐ नम: शक्तये नम: पादयो:। ॐ रामाय कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ सुप्रसन्नाय अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ शान्तमनसे तर्जनीभ्यां नम:। ॐ सत्यसन्धाय मध्यमाभ्यां नम:। ॐ जितेन्द्रियाय अनामिकाभ्यां नम:। ॐ धर्मज्ञाय नयसारज्ञाय कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ राज्ञे दाशरथये जयिने करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

इन्हीं मन्त्रोंसे पूर्वोक्त प्रकारसे हृदयादि न्यास कर निम्न प्रकारसे ध्यान करे—

श्रीराममाश्रितजनामरभूरुहेश मानन्दशुद्धमखिलामरवन्दिताङ्घ्रिम् ।

सीताङ्गनासुमिलितं सततं सुमित्रा पुत्रान्वितं धृतधनु:शरमादिदेवम्॥

ॐ सुप्रसन्न: शान्तमना: सत्यसंधो जितेन्द्रिय:।

धर्मज्ञो नयसारज्ञो राजा दाशरथिर्जयी॥

इस मन्त्रसे श्रीरामकी पूजा करे और इसीसे अथवा श्रीराममन्त्रसे सम्पुटित कर बालकाण्डका पाठ करे। इससे ग्रहशान्ति, ईति-भीति-शान्ति तथा पुत्रप्राप्ति सम्भव है।

अयोध्याकाण्डका विनियोग तथा ऋष्यादिन्यास

ॐ अस्य श्रीअयोध्याकाण्डमहामन्त्रस्य भगवान् वसिष्ठ ऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:। भरतो दाशरथि: परमात्मा देवता। भं बीजम्। नम: शक्ति:। भरतायेति कीलकम्। मम भरतप्रसादसिद्ध्यर्थमयोध्याकाण्डपारायणे विनियोग:। ॐ वसिष्ठऋषये नम: शिरसि। ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। ॐ दाशरथिभरतपरमात्मदेवतायै नम: हृदि। ॐ भं बीजाय नम: गुह्ये। ॐ नम: शक्तये नम: पादयो:। ॐ भरताय कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ भरताय नमस्तस्मै—अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ सारज्ञाय तर्जनीभ्यां नम:। ॐ महात्मने मध्यमाभ्यां नम:। ॐ तापसाय अनामिकाभ्यां नम:। ॐ अतिशान्ताय कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ शत्रुघ्नसहिताय च करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

फिर इसी प्रकार हृदयादिका भी न्यास करके निम्नलिखित श्लोकानुसार ध्यान करना चाहिये—

श्रीरामपादद्वयपादुकान्तसंसक्तचित्तं कमलायताक्षम्।

श्यामं प्रसन्नवदनं कमलावदातशत्रुघ्नयुक्तमनिशं भरतं नमामि॥

भरताय नमस्तस्मै सारज्ञाय महात्मने।

तापसायातिशान्ताय शत्रुघ्नसहिताय च॥

इस मन्त्रसे पञ्चोपचारद्वारा भरतजीकी पूजा करे। चाहे तो इसी मन्त्रसे लक्ष्मी-प्राप्तिकी इच्छासे अयोध्याकाण्डका सम्पुटित पाठ करे।

अरण्यकाण्डका विनियोग एवं ऋष्यादिन्यास

ॐ अस्य श्रीमदरण्यकाण्डमहामन्त्रस्य भगवानृषि:। अनुष्टुप् छन्द:। श्रीरामो दाशरथि: परमात्मा महेन्द्रो देवता। ईं बीजम्। नम: शक्ति:। इन्द्रायेति कीलकम्। इन्द्रप्रसादसिद्ध्यर्थे अरण्यकाण्डपारायणे जपे विनियोग:। ॐ भगवदृषये नम: शिरसि। ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। ॐ दाशरथिश्रीराम- परमात्ममहेन्द्रदेवतायै नम: हृदि। ॐ ईं बीजाय नम: गुह्ये। ॐ नम: शक्तये नम: पादयो:। ॐ इन्द्राय कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ सहस्रनयनाय अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ देवाय तर्जनीभ्यां नम:। ॐ सर्वदेवनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नम:। ॐ दिव्यवज्रधराय अनामिकाभ्यां नम:। ॐ महेन्द्राय कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ शचीपतये करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

इन्हीं मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके इस श्लोकसे ध्यान करना चाहिये।

शचीपतिं सर्वसुरेशवन्द्यं सर्वार्तिहर्तारमचिन्त्यशक्तिम्।

श्रीरामसेवानिरतं महान्तं वन्दे महेन्द्रं धृतवज्रमीड्यम्॥

फिर—

सहस्रनयनं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्।

दिव्यवज्रधरं वन्दे महेन्द्रं च शचीपतिम्॥

इस मन्त्रसे इन्द्रकी पूजा करे और नष्ट द्रव्य-प्राप्ति आदिकी कामनासे इसीसे सम्पुटित कर पाठ करे।

किष्किन्धाकाण्डका ऋष्यादिन्यास

ॐ अस्य श्रीकिष्किन्धाकाण्डमहामन्त्रस्य भगवान् ऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:। सुग्रीवो देवता। सुं बीजम्। नम: शक्ति:। सुग्रीवेति कीलकम्। मम सुग्रीवप्रसादसिद्ध्यर्थे किष्किन्धाकाण्डपारायणे विनियोग:। ॐ भगवदृषये नम: शिरसि। ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। ॐ सुग्रीवदेवतायै नम: हृदये। ॐ सुं बीजाय नम: गुह्ये। ॐ नम: शक्तये नम: पादयो:। ॐ सुग्रीवाय कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ सुग्रीवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ सूर्यतनयाय तर्जनीभ्यां नम:। ॐ सर्ववानरपुङ्गवाय मध्यमाभ्यां नम:। ॐ बलवते अनामिकाभ्यां नम:। ॐ राघवसखाय कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ वशी राज्यं प्रयच्छतु इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

इन्हीं मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके इस प्रकार ध्यान करे—

सुग्रीवमर्कतनयं कपिवर्यवन्द्य मारोपिताच्युतपदाम्बुजमादरेण ।

पाणिप्रहारकुशलं बलपौरुषाढ्य माशास्यदास्यनिपुणं हृदि भावयामि॥

फिर ‘सुं सुग्रीवाय नम:’ तथा—

सुग्रीव: सूर्यतनय: सर्ववानरपुङ्गव:।

बलवान् राघवसखा वशी राज्यं प्रयच्छतु॥

इस मन्त्रसे सुग्रीवकी पूजाकर—चाहे तो इसी श्लोकसे किष्किन्धाकाण्डका सम्पुटित पाठ करे।

सुन्दरकाण्डका विनियोग एवं ऋष्यादिन्यास

ॐ अस्य श्रीमत्सुन्दरकाण्डमहामन्त्रस्य भगवान् हनुमान् ऋषि:। अनुष्टुप् छन्द:। श्रीजगन्माता सीता देवता। श्रीं बीजम्। स्वाहा शक्ति:। सीतायै कीलकम्। सीताप्रसादसिद्ध्यर्थं सुन्दरकाण्डपारायणे विनियोग:। ॐ भगवद्धनुमदृषये नम: शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। श्रीजगन्मातृसीतादेवतायै नम: हृदि। श्रीं बीजाय नम: गुह्ये। स्वाहाशक्तये नम: पादयो:। सीतायै कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ सीतायै अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ विदेहराजसुतायै तर्जनीभ्यां नम:। ॐ रामसुन्दर्यै मध्यमाभ्यां नम:। ॐ हनुमता समाश्रितायै अनामिकाभ्यां नम:। ॐ भूमिसुतायै कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ शरणं भजे करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

फिर इन्हीं मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके इस प्रकार ध्यान करे—

सीतामुदारचरितां विधिसाम्बविष्णुवन्द्यां त्रिलोकजननीं शतकल्पवल्लीम्।

हेमैरनेकमणिरञ्जितकोटिभागै र्भूषाचयैरनुदिनं सहितां नमामि॥

सुन्दरकाण्डके पाठकी विशेष विधि है कि प्रतिदिन एकोत्तरवृत्तिसे क्रमश: एक-एक सर्ग पाठ बढ़ाते हुए ग्यारहवें दिन पाठ समाप्त कर दे। १२ वें दिन अवशिष्ट दो सर्गके साथ आरम्भके १० सर्ग पढ़े जायँ, १३ वें दिन ११ से २३ तक इस तरह तीन आवृत्तिके पाठसे समस्त कार्यकी सिद्धि होती है। दूसरा क्रम है—प्रतिदिन ५ अध्याय पाठका। इसमें भी पूर्वकी भाँति १४ वें दिन अन्तके ३ तथा प्रारम्भके दो सर्गका पाठ करे। सम्पुट पाठका मन्त्र है—‘‘श्रीसीतायै नम:।’19

लङ्काकाण्डका विनियोग एवं ऋष्यादिन्यास

ॐ अस्य श्रीयुद्धकाण्डमहामन्त्रस्य विभीषण ऋषि:। अनुष्टुप्छन्द:। विधाता देवता। बं बीजम्। नम: शक्ति:। विधातेति कीलकम्। श्रीधातृप्रसादसिद्ध्यर्थे युद्धकाण्डपारायणे विनियोग:। ॐ विभीषणऋषये नम: शिरसि। ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नम: मुखे। ॐ विधातृदेवतायै नम: हृदि। ॐ बं बीजाय नम: गुह्ये। ॐ नम: शक्तये नम: पादयो:। ॐ विधातेति कीलकाय नम: सर्वाङ्गे।

करन्यास

ॐ विधात्रे नम: अङ्गुष्ठाभ्यां नम:। ॐ महादेवाय तर्जनीभ्यां नम:। ॐ भक्तानामभयप्रदाय मध्यमाभ्यां नम:। ॐ सर्वदेवप्रीतिकराय अनामिकाभ्यां नम:। ॐ भगवत्प्रियाय कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ ईश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।

फिर इन्हीं मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

देवं विधातारमनन्तवीर्यं भक्ताभयं श्रीपरमादिदेवम्।

सर्वामरप्रीतिकरं प्रशान्तं वन्दे सदा भूतपतिं सुभूतिम्॥

फिर—

विधातारं महादेवं भक्तानामभयप्रदम्।

सर्वदेवप्रीतिकरं भगवत्प्रियमीश्वरम्॥

इस मन्त्रसे पञ्चोपचारद्वारा पूजाकर चाहे तो इसी मन्त्रसे सम्पुटित पाठ करे। इससे शत्रुपर विजय प्राप्त होती है एवं अप्रतिष्ठा नष्ट होती है।

पुनर्वसुसे प्रारम्भ कर आर्द्रातक २७ दिनोंमें भी पूर्ण रामायण-पाठकी विधि है। ४० दिनोंका भी एक पारायण होता है। नवरात्रमें भी इसके नवाह्नपाठका नियम है।

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणमाहात्म्यम्

प्रथमोऽध्याय:

कलियुगकी स्थिति, कलिकालके मनुष्योंके उद्धारका उपाय, रामायणपाठ, उसकी महिमा, उसके श्रवणके लिये उत्तम काल आदिका वर्णन

श्रीराम: शरणं समस्तजगतां

रामं विना का गती।

रामेण प्रतिहन्यते कलिमलं

रामाय कार्यं नम:।

रामात् त्रस्यति कालभीमभुजगो

रामस्य सर्वं वशे।

रामे भक्तिरखण्डिता भवतु मे

राम त्वमेवाश्रय:20॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजी समस्त संसारको शरण देनेवाले हैं। श्रीरामके बिना दूसरी कौन-सी गति है। श्रीराम कलियुगके समस्त दोषोंको नष्ट कर देते हैं; अत: श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार करना चाहिये। श्रीरामसे कालरूपी भयंकर सर्प भी डरता है। जगत्का सब कुछ भगवान् श्रीरामके वशमें है। श्रीराममें मेरी अखण्ड भक्ति बनी रहे। हे राम! आप ही मेरे आधार हैं॥ १॥

चित्रकूटालयं राममिन्दिरानन्दमन्दिरम्।

वन्दे च परमानन्दं भक्तानामभयप्रदम्॥ २॥

चित्रकूटमें निवास करनेवाले, भगवती लक्ष्मी (सीता) के आनन्दनिकेतन और भक्तोंको अभय देनेवाले परमानन्दस्वरूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥

ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या यस्यांशा लोकसाधका:।

नमामि देवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे॥ ३॥

सम्पूर्ण जगत्के अभीष्ट मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले (अथवा सृष्टि, पालन एवं संहारके द्वारा जगत्की व्यावहारिक सत्ताको सिद्ध करनेवाले), ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि देवता जिनके अभिन्न अंशमात्र हैं, उन परम विशुद्ध सच्चिदानन्दमय परमात्मदेव श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ तथा उन्हींके भजन-चिन्तनमें मन लगाता हूँ॥

ऋषय ऊचु:

भगवन् सर्वमाख्यातं यत् पृष्टं विदुषा त्वया।

संसारपाशबद्धानां दु:खानि सुबहूनि च॥ ४॥

ऋषियोंने कहा—भगवन्! आप विद्वान् हैं, ज्ञानी हैं। हमने जो कुछ पूछा था, वह सब आपने हमें भलीभाँति बताया है। संसार-बन्धनमें बँधे हुए जीवोंके दु:ख बहुत हैं॥ ४॥

एतत्संसारपाशस्यच्छेदक: कतम: स्मृत:।

कलौ वेदोक्तमार्गाश्च नश्यन्तीति त्वयोदिता:॥ ५॥

इस संसारबन्धनका उच्छेद करनेवाला कौन है ? आपने कहा है कि कलियुगमें वेदोक्त मार्ग नष्ट हो जायँगे॥ ५॥

अधर्मनिरतानां च यातनाश्च प्रकीर्तिता:।

घोरे कलियुगे प्राप्ते वेदमार्गबहिष्कृते॥ ६॥

पाखण्डत्वं प्रसिद्धं वै सर्वैश्च परिकीर्तितम्।

अधर्मपरायण पुरुषोंको प्राप्त होनेवाली यातनाओंका भी आपने वर्णन किया है। घोर कलियुग आनेपर जब वेदोक्त मार्ग लुप्त हो जायँगे, उस समय पाखण्ड फैल जायगा—यह बात प्रसिद्ध है। प्राय: सभी लोगोंने ऐसी बात कही है॥ ६ /

कामार्त्ता हृस्वदेहाश्च लुब्धा अन्योन्यतत्परा:॥ ७॥

कलौ सर्वे भविष्यन्ति स्वल्पायुर्बहुपुत्रका:।

कलियुगके सभी लोग कामवेदनासे पीडि़त, नाटे शरीरके और लोभी होंगे तथा धर्म और ईश्वरका आश्रय छोड़कर आपसमें एक-दूसरेपर ही निर्भर रहनेवाले होंगे। प्राय: सब लोग थोड़ी आयु और अधिक संतानवाले होंगे21॥ ७ /

स्त्रिय: स्वपोषणपरा वेश्याचरणतत्परा:॥ ८॥

पतिवाक्यमनादृत्य सदान्यगृहतत्परा:।

दु:शीलेषु करिष्यन्ति पुरुषेषु सदा स्पृहाम्॥ ९॥

उस युगकी स्त्रियाँ अपने ही शरीरके पोषणमें तत्पर और वेश्याओंके समान आचरणमें प्रवृत्त होंगी। वे अपने पतिकी आज्ञाका अनादर करके सदा दूसरोंके घर जाया-आया करेंगी। दुराचारी पुरुषोंसे मिलनेकी सदैव अभिलाषा करेंगी॥ ८-९॥

असद्वार्त्ता भविष्यन्ति पुरुषेषु कुलांगना:।

परुषानृतभाषिण्यो देहसंस्कारवर्जिता:॥ १०॥

उत्तम कुलकी स्त्रियाँ भी परपुरुषोंके निकट ओछी बातें करनेवाली होंगी, कठोर और असत्य बोलेंगी तथा शरीरको शुद्ध और सुसंस्कृत बनाये रखनेके सद्गुणोंसे वञ्चित होंगी॥ १०॥

वाचालाश्च भविष्यन्ति कलौ प्रायेण योषित:।

भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसम्बन्धयन्त्रिता:॥ ११॥

कलियुगमें अधिकांश स्त्रियाँ वाचाल (व्यर्थ बकवास करनेवाली) होंगी। भिक्षासे जीवन-निर्वाह करनेवाले संन्यासी भी मित्र आदिके स्नेह-सम्बन्धमें बँधे रहनेवाले होंगे॥ ११॥

अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान् बध्नन्ति लोलुपा:।

उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिर:कण्डूयनं स्त्रिय:॥ १२॥

कुर्वन्त्यो गृहभर्तृणामाज्ञां भेत्स्यन्त्यतन्द्रिता:।

वे भोजनके लिये चिन्तित होनेके कारण लोभवश शिष्योंका संग्रह करेंगे। स्त्रियाँ दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती हुई गृहपतिकी आज्ञाका जान-बूझकर उल्लङ्घन करेंगी॥ १२ /

पाखण्डालापनिरता: पाखण्डजनसंगिन:॥ १३॥

यदा द्विजा भविष्यन्ति तदा वृद्धिं गत: कलि:।

जब ब्राह्मण पाखण्डी लोगोंके साथ रहकर पाखण्डपूर्ण बातें करने लगें, तब जानना चाहिये कि कलियुग खूब बढ़ गया॥ १३ /

घोरे कलियुगे ब्रह्मन् जनानां पापकर्मिणाम्॥ १४॥

मन:शुद्धिविहीनानां निष्कृतिश्च कथं भवेत्।

ब्रह्मन्! इस प्रकार घोर कलियुग आनेपर सदा पाप-परायण रहनेके कारण जिनका अन्त:करण शुद्ध नहीं हो सकेगा, उन लोगोंकी मुक्ति कैसे होगी?॥ १४ /

यथा तुष्यति देवेशो देवदेवो जगद्गुरु:॥ १५॥

ततो वदस्व सर्वज्ञ सूत धर्मभृतां वर।

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ सूतजी! देवाधिदेव देवेश्वर जगद्गुरु भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार संतुष्ट हों, वह उपाय हमें बताइये॥ १५ /

वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदशेषत:॥ १६॥

कस्य नो जायते तुष्टि: सूत त्वद्वचनामृतात्॥ १७॥

मुनिश्रेष्ठ सूतजी! इन सारी बातोंपर आप पूर्णरूपसे प्रकाश डालिये। आपके वचनामृतका पान करनेसे किसको संतोष नहीं होता है॥ १६-१७॥

सूत उवाच

शृणुध्वमृषय: सर्वे यदिष्टं वो वदाम्यहम्।

गीतं सनत्कुमाराय नारदेन महात्मना॥ १८॥

रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम्।

सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम्॥ १९॥

सूतजीने कहा—मुनिवरो! आप सब लोग सुनिये। आपको जो सुनना अभीष्ट है, वह मैं बताता हूँ। महात्मा नारदजीने सनत्कुमारको जिस रामायण नामक महाकाव्यका गान सुनाया था, वह समस्त पापोंका नाश और दुष्ट ग्रहोंकी बाधाका निवारण करनेवाला है। वह सम्पूर्ण वेदार्थोंकी सम्मतिके अनुकूल है॥ १८-१९॥

दु:स्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।

रामचन्द्रकथोपेतं सर्वकल्याणसिद्धिदम्॥ २०॥

उससे समस्त दु:स्वप्नोंका नाश हो जाता है। वह धन्यवादके योग्य तथा भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। उसमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी लीला-कथाका वर्णन है। वह काव्य अपने पाठक और श्रोताओंके लिये समस्त कल्याणमयी सिद्धियोंको देनेवाला है॥ २०॥

धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम्।

अपूर्वं पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिता:॥ २१॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका साधक है, महान् फल देनेवाला है। यह अपूर्व काव्य पुण्यमय फल प्रदान करनेकी शक्ति रखता है। आपलोग एकाग्रचित्त होकर इसे श्रवण करें॥ २१॥

महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकै:।

श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं हि काव्यं शुद्धिमवाप्नुयात्॥ २२॥

रामायणेन वर्तन्ते सुतरां ये जगद्धिता:।

त एव कृतकृत्याश्च सर्वशास्त्रार्थकोविदा:॥ २३॥

महान् पातकों अथवा सम्पूर्ण उपपातकोंसे युक्त मनुष्य भी उस ऋषिप्रणीत दिव्य काव्यका श्रवण करनेसे शुद्धि (अथवा सिद्धि) प्राप्त कर लेता है। सम्पूर्ण जगत्के हित-साधनमें लगे रहनेवाले जो मनुष्य सदा रामायणके अनुसार बर्ताव करते हैं, वे ही सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मको समझनेवाले और कृतार्थ हैं॥ २२-२३॥

धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं च द्विजोत्तमा:।

श्रोतव्यं च सदा भक्त्या रामायणपरामृतम्॥ २४॥

विप्रवरो! रामायण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन तथा परम अमृतरूप है; अत: सदा भक्तिभावसे उसका श्रवण करना चाहिये॥ २४॥

पुरार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै।

रामायणे महाप्रीतिस्तस्य वै भवति ध्रुवम्॥ २५॥

जिस मनुष्यके पूर्वजन्मोपार्जित सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उसीका रामायणके प्रति अधिक प्रेम होता है। यह निश्चित बात है॥ २५॥

रामायणे वर्तमाने पापपाशेन यन्त्रित:।

अनादृत्य असद्गाथासक्तबुद्धि: प्रवर्तते॥ २६॥

जो पापके बन्धनमें जकड़ा हुआ है, वह रामायणकी कथा आरम्भ होनेपर उसकी अवहेलना करके दूसरी-दूसरी निम्नकोटिकी बातोंमें फँस जाता है। उन असद्गाथाओंमें अपनी बुद्धिके आसक्त होनेके कारण वह तदनुरूप ही बर्ताव करने लगता है॥ २६॥

रामायणं नाम परं तु काव्यं

सुपुण्यदं वै शृणुत द्विजेन्द्रा:।

यस्मिन् श्रुते जन्मजरादिनाशो

भवत्यदोष: स नरोऽच्युत: स्यात्॥ २७॥

इसलिये द्विजेन्द्रगण! आपलोग रामायण नामक परम पुण्यदायक उत्तम काव्यका श्रवण करें; जिसके सुननेसे जन्म, जरा और मृत्युके भयका नाश हो जाता है तथा श्रवण करनेवाला मनुष्य पाप-दोषसे रहित हो अच्युतस्वरूप हो जाता है॥ २७॥

वरं वरेण्यं वरदं तु काव्यं

संतारयत्याशु च सर्वलोकम्।

संकल्पितार्थप्रदमादिकाव्यं

श्रुत्वा च रामस्य पदं प्रयाति॥ २८॥

रामायण काव्य अत्यन्त उत्तम, वरणीय और मनोवाञ्छित वर देनेवाला है। वह उसका पाठ और श्रवण करनेवाले समस्त जगत्को शीघ्र ही संसार-सागरसे पार कर देता है। उस आदिकाव्यको सुनकर मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीके परमपदको प्राप्त कर लेता है॥ २८॥

ब्रह्मेशविष्ण्वाख्यशरीरभेदै-

र्विश्वं सृजत्यत्ति च पाति यश्च।

तमादिदेवं परमं वरेण्य-

माधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम्॥ २९॥

जो ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु नामक भिन्न-भिन्न रूप धारण करके विश्वकी सृष्टि, संहार और पालन करते हैं, उन आदिदेव परमोत्कृष्ट परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको अपने हृदय-मन्दिरमें स्थापित करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है॥ २९॥

यो नामजात्यादिविकल्पहीन:

परावराणां परम: पर: स्यात्।

वेदान्तवेद्य: स्वरुचा प्रकाश:

स वीक्ष्यते सर्वपुराणवेदै:॥ ३०॥

जो नाम तथा जाति आदि विकल्पोंसे रहित, कार्य-कारणसे परे, सर्वोत्कृष्ट, वेदान्त शास्त्रके द्वारा जाननेयोग्य एवं अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला परमात्मा है, उसका समस्त वेदों और पुराणोंके द्वारा साक्षात्कार होता है (इस रामायणके अनुशीलनसे भी उसीकी प्राप्ति होती है।)॥ ३०॥

ऊर्जे माघे सिते पक्षे चैत्रे च द्विजसत्तमा:।

नवाह्ना खलु श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्॥ ३१॥

विप्रवरो! कार्तिक, माघ और चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें नौ दिनोंमें रामायणकी अमृतमयी कथाका श्रवण करना चाहिये॥

इत्येवं शृणुयाद् यस्तु श्रीरामचरितं शुभम्।

सर्वान् कामानवाप्नोति परत्रामुत्र चोत्तमान्॥ ३२॥

जो इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके मंगलमय चरित्रका श्रवण करता है, वह इस लोक और परलोकमें भी अपनी समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥

त्रिसप्तकुलसंयुक्त: सर्वपापविवर्जित:।

प्रयाति रामभवनं यत्र गत्वा न शोचते॥ ३३॥

वह सब पापोंसे मुक्त हो अपनी इक्कीस पीढि़योंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके उस परमधाममें चला जाता है, जहाँ जाकर मनुष्यको कभी शोक नहीं करना पड़ता है॥

चैत्रे माघे कार्तिके च सिते पक्षे च वाचयेत्।

नवाहस्सु महापुण्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नत:॥ ३४॥

चैत्र, माघ और कार्तिकके शुक्लपक्षमें परम पुण्यमय रामायण-कथाका नवाह-पारायण करना चाहिये तथा नौ दिनोंतक इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये॥ ३४॥

रामायणमादिकाव्यं स्वर्गमोक्षप्रदायकम्।

तस्माद् घोरे कलियुगे सर्वधर्मबहिष्कृते॥ ३५॥

नवभिर्दिनै: श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्।

रामायण आदिकाव्य है। यह स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है, अत: सम्पूर्ण धर्मोंसे रहित घोर कलियुग आनेपर नौ दिनोंमें रामायणकी अमृतमयी कथाको श्रवण करना चाहिये॥ ३५ /

रामनामपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विजा:॥ ३६॥

त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्बाधते हि तान्।

ब्राह्मणो! जो लोग भयंकर कलिकालमें श्रीराम-नामका आश्रय लेते हैं, वे ही कृतार्थ होते हैं। कलियुग उन्हें बाधा नहीं पहुँचाता॥ ३६ /

कथा रामायणस्यापि नित्यं भवति यद्गृहे॥ ३७॥

तद् गृहं तीर्थरूपं हि दुष्टानां पापनाशनम्।

जिस घरमें प्रतिदिन रामायणकी कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है। वहाँ जानेसे दुष्टोंके पापोंका नाश होता है॥ ३७ /

तावत्पापानि देहेऽस्मिन् निवसन्ति तपोधना:॥ ३८॥

यावन्न श्रूयते सम्यक् श्रीमद्रामायणं नरै:।

तपोधनो! इस शरीरमें तभीतक पाप रहते हैं, जबतक मनुष्य श्रीरामायणकथाका भलीभाँति श्रवण नहीं करता॥

दुर्लभैव कथा लोके श्रीमद्रामायणोद्भवा॥ ३९॥

कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते।

संसारमें श्रीरामायणकी कथा परम दुर्लभ ही है। जब करोड़ों जन्मोंके पुण्योंका उदय होता है, तभी उसकी प्राप्ति होती है॥ ३९ /

ऊर्जे माघे सिते पक्षे चैत्रे च द्विजसत्तमा:॥ ४०॥

यस्य श्रवणमात्रेण सौदासोऽपि विमोचित:।

श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कार्तिक, माघ और चैत्रके शुक्ल पक्षमें रामायणके श्रवणमात्रसे (राक्षसभावापन्न) सौदास भी शापमुक्त हो गये थे॥ ४० /

गौतमशापत: प्राप्त: सौदासो राक्षसीं तनुम्॥ ४१॥

रामायणप्रभावेण विमुक्तिं प्राप्तवान् पुन:।

सौदासने महर्षि गौतमके शापसे राक्षस-शरीर प्राप्त किया था। वे रामायणके प्रभावसे ही पुन: उस शापसे छुटकारा पा सके थे ॥ ४१ /

यस्त्वेतच्छृणुयाद् भक्त्या रामभक्तिपरायण:॥ ४२॥

स मुच्यते महापापै: पुरुष: पातकादिभि:॥ ४३॥

जो पुरुष श्रीरामचन्द्रजीकी भक्तिका आश्रय ले प्रेमपूर्वक इस कथाका श्रवण करता है, वह बड़े-बड़े पापों तथा पातक आदिसे मुक्त हो जाता है॥ ४२-४३॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये
कल्पानुकीर्तनं नाम प्रथमोऽध्याय:॥ १॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमार-संवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यविषयक
कल्पका अनुकीर्तन नामक प्रथम अध्याय पूरा हुआ॥ १॥

 

द्वितीयोऽध्याय:

नारद-सनत्कुमार-संवाद, सुदास या सोमदत्त नामक ब्राह्मणको राक्षसत्वकी प्राप्ति तथा रामायण-कथा-श्रवणद्वारा उससे उद्धार

ऋषय ऊचु:

कथं सनत्कुमाराय देवर्षिर्नारदो मुनि:।

प्रोक्तवान् सकलान् धर्मान् कथं तौ मिलितावुभौ॥ १॥

कस्मिन् क्षेत्रे स्थितौ तात तावुभौ ब्रह्मवादिनौ।

यदुक्तं नारदेनास्मै तत् त्वं ब्रूहि महामुने॥ २॥

ऋषियोंने पूछा—महामुने! देवर्षि नारदमुनिने सनत्कुमारजीसे रामायणसम्बन्धी सम्पूर्ण धर्मोंका किस प्रकार वर्णन किया था? उन दोनों ब्रह्मवादी महात्माओंका किस क्षेत्रमें मिलन हुआ था? तात! वे दोनों कहाँ ठहरे थे? नारदजीने उनसे जो कुछ कहा था, वह सब आप हमलोगोंको बताइये॥

सूत उवाच

सनकाद्या महात्मानो ब्रह्मणस्तनया: स्मृता:।

निर्ममा निरहंकारा: सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतस:॥ ३॥

सूतजीने कहा—मुनिवरो! सनकादि महात्मा भगवान् ब्रह्माजीके पुत्र माने गये हैं। उनमें ममता और अहंकारका तो नाम भी नहीं है। वे सब-के-सब ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) हैं॥ ३॥

तेषां नामानि वक्ष्यामि सनकश्च सनन्दन:।

सनत्कुमारश्च तथा सनातन इति स्मृत:॥ ४॥

मैं आपलोगोंसे उनके नाम बताता हूँ, सुनिये। सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन—ये चारों सनकादि माने गये हैं॥ ४॥

विष्णुभक्ता महात्मानो ब्रह्मध्यानपरायणा:।

सहस्रसूर्यसंकाशा: सत्यवन्तो मुमुक्षव:॥ ५ ॥

वे भगवान् विष्णुके भक्त और महात्मा हैं। सदा ब्रह्मके चिन्तनमें लगे रहते हैं। बड़े सत्यवादी हैं। सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी एवं मोक्षके अभिलाषी हैं॥ ५॥

एकदा ब्रह्मण: पुत्रा: सनकाद्या महौजस:।

मेरुशृंगे समाजग्मुर्वीक्षितुं ब्रह्मण: सभाम्॥ ६ ॥

एक दिन वे महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र सनकादि ब्रह्माजीकी सभा देखनेके लिये मेरु पर्वतके शिखरपर गये॥ ६॥

तत्र गंगां महापुण्यां विष्णुपादोद्भवां नदीम्।

निरीक्ष्य स्नातुमुद्युक्ता: सीताख्यां प्रथितौजस:॥ ७ ॥

वहाँ भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई परम पुण्यमयी गंगानदी, जिन्हें सीता भी कहते हैं, बह रही थीं। उनका दर्शन करके वे तेजस्वी महात्मा उनके जलमें स्नान करनेको उद्यत हुए॥ ७॥

एतस्मिन्नन्तरे विप्रा देवर्षिर्नारदो मुनि:।

आजगामोच्चरन् नाम हरेर्नारायणादिकम्॥ ८ ॥

ब्राह्मणो! इतनेमें ही देवर्षि नारदमुनि भगवान्के नारायण आदि नामोंका उच्चारण करते हुए वहाँ आ पहुँचे॥ ८॥

नारायणाच्युतानन्त वासुदेव जनार्दन।

यज्ञेश यज्ञपुरुष राम विष्णो नमोऽस्तु ते॥ ९ ॥

इत्युच्चरन् हरेर्नाम पावयन्नखिलं जगत्।

आजगाम स्तुवन् गंगां मुनिर्लोकैकपावनीम्॥ १०॥

वे ‘नारायण! अच्युत! अनन्त! वासुदेव! जनार्दन! यज्ञेश! यज्ञपुरुष! राम! विष्णो! आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार भगवन्नामका उच्चारण करके सम्पूर्ण जगत्को पवित्र बनाते और एकमात्र लोकपावनी गंगाकी स्तुति करते हुए वहाँ आये॥ ९-१०॥

अथायान्तं समुद्वीक्ष्य सनकाद्या महौजस:।

यथार्हमर्हणं चक्रुर्ववन्दे सोऽपि तान् मुनीन्॥ ११॥

उन्हें आते देख महातेजस्वी सनकादि मुनियोंने उनकी यथोचित पूजा की तथा नारदजीने भी उन मुनियोंको मस्तक झुकाया॥ ११॥

अथ तत्र सभामध्ये नारायणपरायणम्।

सनत्कुमार: प्रोवाच नारदं मुनिपुंगवम्॥ १२॥

तदनन्तर वहाँ मुनियोंकी सभामें सनत्कुमारजीने भगवान् नारायणके परम भक्त मुनिवर नारदसे इस प्रकार कहा॥ १२॥

सनत्कुमार उवाच

सर्वज्ञोऽसि महाप्राज्ञ मुनीशानां च नारद।

हरिभक्तिपरो यस्मात्त्वत्तो नास्त्यपरोऽधिक:॥ १३॥

सनत्कुमार बोले—महाप्राज्ञ नारदजी! आप समस्त मुनीश्वरोंमें सर्वज्ञ हैं। सदा श्रीहरिकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, अत: आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है॥ १३॥

येनेदमखिलं जातं जगत् स्थावरजंगमम्।

गंगा पादोद्भवा यस्य कथं स ज्ञायते हरि:॥ १४॥

अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते तत्त्वतो वक्तुमर्हसि।

इसलिये मैं पूछता हूँ, जिनसे समस्त चराचर जगत्की उत्पत्ति हुई है तथा ये गंगाजी जिनके चरणोंसे प्रकट हुई हैं, उन श्रीहरिके स्वरूपका ज्ञान कैसे होता है? यदि आपकी हमलोगोंपर कृपा हो तो हमारे इस प्रश्नका यथार्थरूपसे विवेचन कीजिये॥ १४ /

नारद उवाच

नम: पराय देवाय परात्परतराय च॥ १५॥

परात्परनिवासाय सगुणायागुणाय च।

नारदजीने कहा—जो परसे भी परतर हैं, उन परमदेव श्रीरामको नमस्कार है। जिनका निवास-स्थान (परमधाम) उत्कृष्टसे भी उत्कृष्ट है तथा जो सगुण और निर्गुणरूप हैं, उन श्रीरामको मेरा नमस्कार है॥

ज्ञानाज्ञानस्वरूपाय धर्माधर्मस्वरूपिणे॥ १६॥

विद्याविद्यास्वरूपाय स्वस्वरूपाय ते नम:।

ज्ञान-अज्ञान, धर्म-अधर्म तथा विद्या और अविद्या—ये सब जिनके अपने ही स्वरूप हैं तथा जो सबके आत्मरूप हैं, उन आप परमेश्वरको नमस्कार है॥ १६ /

यो दैत्यहन्ता नरकान्तकश्च

भुजाग्रमात्रेण च धर्मगोप्ता॥ १७॥

भूभारसंघातविनोदकामं

नमामि देवं रघुवंशदीपम्।

जो दैत्योंका विनाश और नरकका अन्त करनेवाले हैं, जो अपने हाथके संकेतमात्रसे अथवा अपनी भुजाओंके बलसे धर्मकी रक्षा करते हैं, पृथ्वीके भारका विनाश जिनका मनोरञ्जनमात्र है और जो उस मनोरञ्जनकी सदा अभिलाषा रखते हैं, उन रघुकुलदीप श्रीरामदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥ १७ /

आविर्भूतश्चतुर्द्धा य: कपिभि: परिवारित:॥ १८॥

हतवान् राक्षसानीकं रामं दाशरथिं भजे।

जो एक होकर भी चार स्वरूपोंमें अवतीर्ण होते हैं, जिन्होंने वानरोंको साथ लेकर राक्षससेनाका संहार किया है, उन दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ॥ १८ /

एवमादीन्यनेकानि चरितानि महात्मन:॥ १९॥

तेषां नामानि संख्यातुं शक्यन्ते नाब्दकोटिभि:।

भगवान् श्रीरामके ऐसे-ऐसे अनेक चरित्र हैं, जिनके नाम करोड़ों वर्षोंमें भी नहीं गिनाये जा सकते हैं॥ १९ /

महिमानं तु यन्नाम्न: पारं गन्तुं न शक्यते॥ २०॥

मनुभिश्च मुनीन्द्रैश्च कथं तं क्षुल्लको भजेत्।

जिनके नामकी महिमाका मनु और मुनीश्वर भी पार नहीं पा सकते, वहाँ मेरे-जैसे क्षुद्र जीवकी पहुँच कैसे हो सकती है॥ २० /

यन्नाम्न: स्मरणेनापि महापातकिनोऽपि ये॥ २१॥

पावनत्वं प्रपद्यन्ते कथं स्तोष्यामि क्षुल्लधी:।

जिनके नामके स्मरणमात्रसे बड़े-बड़े पातकी भी पावन बन जाते हैं, उन परमात्माका स्तवन मेरे-जैसा तुच्छ बुद्धिवाला प्राणी कैसे कर सकता है॥ २१ /

रामायणपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विजा:॥ २२॥

त एव कृतकृत्याश्च तेषां नित्यं नमोऽस्तु ते।

जो द्विज घोर कलियुगमें रामायण-कथाका आश्रय लेते हैं, वे ही कृतकृत्य हैं। उनके लिये तुम्हें सदा नमस्कार करना चाहिये॥ २२ /

ऊर्जे मासि सिते पक्षे चैत्रे माघे तथैव च॥ २३॥

नवाह्ना किल श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्।

सनत्कुमारजी! भगवान्‌की महिमाको जाननेके लिये कार्तिक, माघ और चैत्रके शुक्ल पक्षमें रामायणकी अमृतमयी कथाका नवाह श्रवण करना चाहिये॥ २३ /

गौतमशापत: प्राप्त: सुदासो राक्षसीं तनुम्॥ २४॥

रामायणप्रभावेण विमुक्तिं प्राप्तवानसौ।

ब्राह्मण सुदास गौतमके शापसे राक्षस-शरीरको प्राप्त हो गये थे; परंतु रामायणके प्रभावसे ही उन्हें उस शापसे छुटकारा मिला था॥ २४ /

सनत्कुमार उवाच

रामायणं केन प्रोक्तं सर्वधर्मफलप्रदम्॥ २५॥

प्राप्त: कथं गौतमेन सौदासो मुनिसत्तम।

रामायणप्रभावेण कथं भूयो विमोक्षित:॥ २६॥

सनत्कुमारने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! सम्पूर्ण धर्मोंका फल देनेवाली रामायणकथाका किसने वर्णन किया है? सौदासको गौतमद्वारा कैसे शाप प्राप्त हुआ? फिर वे रामायणके प्रभावसे किस प्रकार शापमुक्त हुए थे॥

अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते तत्त्वतो वक्तुमर्हसि।

सर्वमेतदशेषेण मुने नो वक्तुमर्हसि॥ २७॥

शृण्वतां वदतां चैव कथा पापविनाशिनी।

मुने! यदि आपका हमलोगोंपर अनुग्रह हो तो सब कुछ ठीक-ठीक बताइये। इन सारी बातोंसे हमें अवगत कराइये; क्योंकि भगवान्‌की कथा वक्ता और श्रोता दोनोंके पापोंका नाश करनेवाली है॥ २७ /

नारद उवाच

शृणु रामायणं विप्र यद् वाल्मीकिमुखोद्गतम्॥ २८॥

नवाह्ना खलु श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्।

नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! रामायणका प्रादुर्भाव महर्षि वाल्मीकिके मुखसे हुआ है। तुम उसीको श्रवण करो। रामायणकी अमृतमयी कथाका श्रवण नौ दिनोंमें करना चाहिये॥ २८ /

आस्ते कृतयुगे विप्रो धर्मकर्मविशारद:॥ २९॥

सोमदत्त इति ख्यातो नाम्ना धर्मपरायण:।

सत्ययुगमें एक ब्राह्मण थे, जिन्हें धर्म-कर्मका विशेष ज्ञान था। उनका नाम था सोमदत्त। वे सदा धर्मके पालनमें ही तत्पर रहते थे॥ २९ /

विप्रस्तु गौतमाख्येन मुनिना ब्रह्मवादिना॥ ३०॥

श्रावित: सर्वधर्मांश्च गंगातीरे मनोरमे।

पुराणशास्त्रकथनैस्तेनासौ बोधितोऽपि च॥ ३१॥

श्रुतवान् सर्वधर्मान् वै तेनोक्तानखिलानपि।

(वे ब्राह्मण सौदास नामसे भी विख्यात थे।) ब्राह्मणने ब्रह्मवादी गौतम मुनिसे गंगाजीके मनोरम तटपर सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश सुना था। गौतमने पुराणों और शास्त्रोंकी कथाओंद्वारा उन्हें तत्त्वका ज्ञान कराया था। सौदासने गौतमसे उनके बताये हुए सम्पूर्ण धर्मोंका श्रवण किया था॥ ३०-३१ /

कदाचित् परमेशस्य परिचर्यापरोऽभवत्॥ ३२॥

उपस्थितायापि तस्मै प्रणामं न चकार स:।

एक दिनकी बात है, सौदास परमेश्वर शिवकी आराधनामें लगे हुए थे। उसी समय वहाँ उनके गुरु गौतमजी आ पहुँचे; परंतु सौदासने अपने निकट आये हुए गुरुको भी उठकर प्रणाम नहीं किया॥ ३२ /

स तु शान्तो महाबुद्धिर्गौतमस्तेजसां निधि:॥ ३३॥

शास्त्रोदितानि कर्माणि करोति स मुदं ययौ।

परम बुद्धिमान् गौतम तेजकी निधि थे, वे शिष्यके बर्तावसे रुष्ट न होकर शान्त ही बने रहे। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरा शिष्य सौदास शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है॥ ३३ /

यस्त्वर्चितो महादेव: शिव: सर्वजगद्गुरु:॥ ३४॥

गुर्ववज्ञाकृतं पापं राक्षसत्वे नियुक्तवान्।

उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयेषु च कोविद:॥ ३५॥

किंतु सौदासने जिनकी आराधना की थी, वे सम्पूर्ण जगत्के गुरु महादेव शिव गुरुकी अवहेलनासे होनेवाले पापको न सह सके। उन्होंने सौदासको राक्षसकी योनिमें जानेका शाप दे दिया। तब विनयकलाकोविद ब्राह्मणने हाथ जोड़कर गौतमसे कहा॥ ३४-३५॥

विप्र उवाच

भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वदर्शिन् सुरेश्वर।

क्षमस्व भगवन् सर्वमपराध: कृतो मया॥ ३६॥

ब्राह्मण बोले—सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता! सर्वदर्शी! सुरेश्वर! भगवन्! मैंने जो अपराध किया है, वह सब आप क्षमा कीजिये॥ ३६॥

गौतम उवाच

ऊर्जे मासे सिते पक्षे रामायणकथामृतम्।

नवाह्ना चैव श्रोतव्यं भक्तिभावेन सादरम्॥ ३७॥

नात्यन्तिकं भवेदेतद् द्वादशाब्दं भविष्यति।

गौतमने कहा—वत्स! कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें तुम रामायणकी अमृतमयी कथाको भक्तिभावसे आदरपूर्वक श्रवण करो। इस कथाको नौ दिनोंमें सुनना चाहिये। ऐसा करनेसे यह शाप अधिक दिनोंतक नहीं रहेगा। केवल बारह वर्षोंतक ही रह सकेगा॥ ३७ /

विप्र उवाच

केन रामायणं प्रोक्तं चरितानि तु कस्य वै॥ ३८॥

एतत् सर्वं महाप्राज्ञ संक्षेपाद् वक्तुमर्हसि।

मनसा प्रीतिमापन्नो ववन्दे चरणौ गुरो:॥ ३९॥

ब्राह्मणने पूछा—रामायणकी कथा किसने कही है? तथा उसमें किसके चरित्रोंका वर्णन किया गया है? महामते! यह सब संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें। यों कहकर मन-ही-मन प्रसन्न हो सौदासने गुरुके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ३८-३९॥

गौतम उवाच

शृणु रामायणं विप्र वाल्मीकिमुनिना कृतम्।

येन रामावतारेण राक्षसा रावणादय:॥ ४०॥

हतास्तु देवकार्यं हि चरितं तस्य तच्छृणु।

कार्त्तिके च सिते पक्षे कथा रामायणस्य तु॥ ४१॥

नवमेऽहनि श्रोतव्या सर्वपापप्रणाशिनी।

गौतमने कहा—ब्रह्मन्! सुनो। रामायण-काव्यका निर्माण वाल्मीकि मुनिने किया है। जिन भगवान् श्रीरामने अवतार ग्रहण करके रावण आदि राक्षसोंका संहार किया और देवताओंका कार्य सँवारा था, उन्हींके चरित्रका रामायण-काव्यमें वर्णन है। तुम उसीका श्रवण करो। कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें नवें दिन अर्थात् प्रतिपदासे नवमीतक रामायणकी कथा सुननी चाहिये। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाली है॥ ४०-४१ /

इत्युक्त्वा चार्थसम्पन्नो गौतम: स्वाश्रमं ययौ॥ ४२॥

विप्रोऽपि दु:खमापन्नो राक्षसीं तनुमाश्रित:।

ऐसा कहकर पूर्णकाम गौतम ऋषि अपने आश्रमको चले गये। इधर सोमदत्त या सुदास नामक ब्राह्मणने दु:खमग्न होकर राक्षस-शरीरका आश्रय लिया॥ ४२ /

क्षुत्पीडित: पिपासार्त्तो नित्यं क्रोधपरायण:॥ ४३॥

कृष्णक्षपाद्युतिर्भीमो बभ्राम विजने वने।

वे सदा भूख-प्याससे पीडि़त तथा क्रोधके वशीभूत रहते थे। उनके शरीरका रंग कृष्ण पक्षकी रातके समान काला था। वे भयानक राक्षस होकर निर्जन वनमें भ्रमण करने लगे॥ ४३ /

मृगांश्च विविधांस्तत्र मनुष्यांश्च सरीसृपान्॥ ४४॥

विहगान् प्लवगांश्चैव प्रसभात्तानभक्षयत्।

वहाँ वे नाना प्रकारके पशुओं, मनुष्यों, साँप-बिच्छू आदि जन्तुओं, पक्षियों और वानरोंको बलपूर्वक पकड़कर खा जाते थे॥ ४४ /

अस्थिभिर्बहुभिर्विप्रा: पीतरक्तकलेवरै:॥ ४५॥

रक्तादप्रेतकैश्चैव तेनासीद् भूर्भयंकरी।

ब्रह्मर्षियो! उस राक्षसके द्वारा यह पृथ्वी बहुत-सी हड्डियों तथा लाल-पीले शरीरवाले रक्तपायी प्रेतोंसे परिपूर्ण हो अत्यन्त भयंकर दिखायी देने लगी॥ ४५ /

ऋतुत्रये स पृथिवीं शतयोजनविस्तराम्॥ ४६॥

कृत्वातिदु:खितां पश्चाद्वनान्तरमगात् पुन:।

छ: महीनेमें ही सौ योजन विस्तृत भूभागको अत्यन्त दु:खित करके वह राक्षस पुन: दूसरे किसी वनमें चला गया॥ ४६ /

तत्रापि कृतवान् नित्यं नरमांसाशनं तदा॥ ४७॥

जगाम नर्मदातीरे सर्वलोकभयंकर:।

वहाँ भी वह प्रतिदिन नरमांसका भोजन करता रहा। सम्पूर्ण लोकोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला वह राक्षस घूमता-घामता नर्मदाजीके तटपर जा पहुँचा॥ ४७ /

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्त: कश्चिद् विप्रोऽतिधार्मिक:॥ ४८॥

कलिंगदेशसम्भूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृत:।

इसी समय कोई अत्यन्त धर्मात्मा ब्राह्मण उधर आ निकला। उसका जन्म कलिंगदेशमें हुआ था। लोगोंमें वह गर्ग नामसे विख्यात था॥ ४८ /

वहन् गंगाजलं स्कन्धे स्तुवन् विश्वेश्वरं प्रभुम्॥ ४९॥

गायन् नामानि रामस्य समायातोऽतिहर्षित:।

कंधेपर गंगाजल लिये भगवान् विश्वनाथकी स्तुति तथा श्रीरामके नामोंका गान करता हुआ वह ब्राह्मण बड़े हर्ष और उत्साहमें भरकर उस पुण्य प्रदेशमें आया था॥

तमायान्तं मुनिं दृष्ट्वा सुदासो नाम राक्षस:॥ ५०॥

प्राप्तो न: पारणेत्युक्त्वा भुजावुद्यम्य तं ययौ।

तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थित:॥ ५१॥

अशक्तस्तं द्विजं हन्तुमिदमूचे स राक्षस:।

गर्ग मुनिको आते देख राक्षस सुदास बोल उठा, ‘हमें भोजन प्राप्त हो गया।’ ऐसा कहकर अपनी दोनों भुजाओंको ऊपर उठाये हुए वह मुनिकी ओर चला; परंतु उनके द्वारा उच्चारित होनेवाले भगवन्नामोंको सुनकर वह दूर ही खड़ा रहा। उन ब्रह्मर्षिको मारनेमें असमर्थ होकर राक्षस उनसे इस प्रकार बोला॥ ५०-५१ /

राक्षस उवाच

अहो भद्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने॥ ५२॥

नामस्मरणमात्रेण राक्षसा अपि दूरगा:।

मया प्रभक्षिता: पूर्वं विप्रा: कोटिसहस्रश:॥ ५३॥

राक्षसने कहा—यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! भद्र! महाभाग! आप महात्माको नमस्कार है। आप जो भगवन्नामोंका स्मरण कर रहे हैं, इतनेसे ही राक्षस भी दूर भाग जाते हैं। मैंने पहले कोटि सहस्र ब्राह्मणोंका भक्षण किया है॥ ५२-५३॥

नामप्रावरणं विप्र रक्षति त्वां महाभयात्।

नामस्मरणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम्॥ ५४॥

परां शान्तिं समापन्ना महिमा कोऽच्युतस्य हि।

ब्रह्मन्! आपके पास जो नामरूपी कवच है, वही राक्षसोंके महान् भयसे आपकी रक्षा करता है। आपके द्वारा किये गये नामस्मरणमात्रसे हम राक्षसोंको भी परम शान्ति प्राप्त हो गयी। यह भगवान् अच्युतकी कैसी महिमा है॥ ५४ /

सर्वथा त्वं महाभाग रागादिरहितो द्विज॥ ५५॥

रामकथाप्रभावेण पाह्यस्मात् पातकाधमात्।

महाभाग ब्राह्मण! आप श्रीरामकथाके प्रभावसे सर्वथा राग आदि दोषोंसे रहित हो गये हैं। अत: आप मुझे इस अधम पातकसे बचाइये॥ ५५ /

गुर्ववज्ञा मया पूर्वं कृता च मुनिसत्तम॥ ५६॥

कृतश्चानुग्रह: पश्चाद् गुरुणोक्तमिदं वच:।

मुनिश्रेष्ठ! मैंने पूर्वकालमें अपने गुरुकी अवहेलना की थी। फिर गुरुजीने मुझपर अनुग्रह किया और यह बात कही॥ ५६ /

वाल्मीकिमुनिना पूर्वं कथा रामायणस्य च॥ ५७॥

ऊर्जे मासे सिते पक्षे श्रोतव्या च प्रयत्नत:।

‘पूर्वकालमें वाल्मीकि मुनिने जो रामायणकी कथा कही है, उसका कार्तिकमासके शुक्ल पक्षमें प्रयत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये’॥ ५७ /

गुरुणापि पुन: प्रोक्तं रम्यं तु शुभदं वच:॥ ५८॥

नवाह्ना खलु श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्।

इतना कहकर गुरुदेवने पुन: यह सुन्दर एवं शुभदायक वचन कहा—‘रामायणकी अमृतमयी कथा नौ दिनमें सुननी चाहिये’॥ ५८ /

तस्माद् ब्रह्मन् महाभाग सर्वशास्त्रार्थकोविद॥ ५९॥

कथाश्रवणमात्रेण पाह्यस्मात् पापकर्मण:।

अत: सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले महाभाग ब्राह्मण! आप मुझे रामायणकथा सुनाकर इस पापकर्मसे मेरी रक्षा कीजिये॥ ५९ /

नारद उवाच

ततो रामायणं ख्यातं राममाहात्म्यमुत्तमम्॥ ६०॥

निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तम:।

ततो विप्र: कृपाविष्टो रामनामपरायण:॥ ६१॥

सुदासराक्षसं नाम चेदं वाक्यमथाब्रवीत्।

नारदजी कहते हैं—उस समय वहाँ राक्षसके मुखसे रामायणका परिचय तथा श्रीरामके उत्तम माहात्म्यका वर्णन सुनकर द्विजश्रेष्ठ गर्ग आश्चर्यचकित हो उठे। श्रीरामका नाम ही उनके जीवनका अवलम्ब था। वे ब्राह्मणदेवता उस राक्षसके प्रति दयासे द्रवित हो गये और सुदाससे इस प्रकार बोले॥ ६०-६१ /

विप्र उवाच

राक्षसेन्द्र महाभाग मतिस्ते विमलाभवत्॥ ६२॥

अस्मिन्नूर्जे सिते पक्षे रामायणकथां शृणु।

शृणु त्वं राममाहात्म्यं रामभक्तिपरायण॥ ६३॥

ब्राह्मणने कहा—महाभाग! राक्षसराज! तुम्हारी बुद्धि निर्मल हो गयी है। इस समय कार्तिकमासका शुक्ल पक्ष चल रहा है। इसमें रामायणकी कथा सुनो। रामभक्तिपरायण राक्षस! तुम श्रीरामचन्द्रजीके माहात्म्यको श्रवण करो॥ ६२-६३॥

रामध्यानपराणां च क: समर्थ: प्रबाधितुम्।

रामभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरि: शिव:॥ ६४॥

तत्र देवाश्च सिद्धाश्च रामायणपरा नरा:।

श्रीरामचन्द्रजीके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको बाधा पहुँचानेमें कौन समर्थ हो सकता है। जहाँ श्रीरामका भक्त है, वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव विराजमान हैं। वहीं देवता, सिद्ध तथा रामायणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य हैं॥ ६४ /

तस्मादूर्जे सिते पक्षे रामायणकथां शृणु॥ ६५॥

नवाह्ना खलु श्रोतव्यं सावधान: सदा भव।

अत: इस कार्तिकमासके शुक्ल पक्षमें तुम रामायणकी कथा सुनो। नौ दिनोंतक इस कथाको सुननेका विधान है। अत: तुम सदा सावधान रहो॥ ६५ /

इत्युक्त्वा कथयामास रामायणकथां मुनि:॥ ६६॥

कथाश्रवणमात्रेण राक्षसत्वमपाकृतम्।

विसृज्य राक्षसं भावमभवद् देवतोपम:॥ ६७॥

कोटिसूर्यप्रतीकाशो नारायणसमप्रभ:।

शङ्खचक्रगदापाणिर्हरे: सद्म जगाम स:॥ ६८॥

स्तुवन् तं ब्राह्मणं सम्यग् जगाम हरिमन्दिरम्॥ ६९॥

ऐसा कहकर गर्ग मुनिने उसे रामायणकी कथा सुनायी। कथा सुनते ही उसका राक्षसत्व दूर हो गया। राक्षस-भावका परित्याग करके वह देवताओंके समान सुन्दर, करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी और भगवान् नारायणके समान कान्तिमान् हो गया। अपनी चार भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म लिये वह श्रीहरिके वैकुण्ठधाममें चला गया। ब्राह्मण गर्ग मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करता हुआ वह भगवान्के उत्तम धाममें जा पहुँचा॥ ६६—६९॥

नारद उवाच

तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा रामायणकथामृतम्।

स तस्य महिमा तत्र ऊर्जे मासि च कीर्त्यते॥ ७०॥

नारदजी कहते हैं—विप्रवरो! अत: आपलोग भी रामायणकी अमृतमयी कथा सुनिये। इसके श्रवणकी सदा ही महिमा है, किंतु कार्तिकमासमें विशेष बतायी गयी है॥ ७०॥

यन्नामस्मरणादेव महापातककोटिभि:।

विमुक्त: सर्वपापेभ्यो नरो याति परां गतिम्॥ ७१॥

रामायणके नामका स्मरण करनेसे ही मनुष्य करोड़ों महापातकों तथा समस्त पापोंसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होता है॥ ७१॥

रामायणेति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा।

तदैव पापनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ७२॥

मनुष्य ‘रामायण’ इस नामका जब एक बार भी उच्चारण करता है, तभी वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है॥ ७२॥

ये पठन्ति सदाऽऽख्यानं भक्त्या शृण्वन्ति ये नरा:।

गंगास्नानाच्छतगुणं तेषां संजायते फलम्॥ ७३॥

जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे रामायण-कथाको पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें गंगास्नानकी अपेक्षा सौगुना पुण्यफल प्राप्त होता है॥ ७३॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये राक्षसमोक्षणं नाम द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमारसंवादके अन्तर्गत वाल्मीकीय रामायणमाहात्म्यके
प्रसंगमें राक्षसका उद्धार नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥

 

तृतीयोऽध्याय:

माघमासमें रामायण-श्रवणका फल—राजा सुमति और सत्यवतीके पूर्व-जन्मका इतिहास

सनत्कुमार उवाच

अहो विप्र इदं प्रोक्तमितिहासं च नारद।

रामायणस्य माहात्म्यं त्वं पुनर्वद विस्तरात्॥ १॥

सनत्कुमारने कहा—ब्रह्मर्षि नारदजी! आपने यह अद्भुत इतिहास सुनाया है। अब रामायणके माहात्म्यका पुन: विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥

अन्यमासस्य माहात्म्यं कथयस्व प्रसादत:।

कस्य नो जायते तुष्टिर्मुने त्वद्वचनामृतात्॥ २॥

(आपने कार्तिक मासमें रामायणके श्रवणकी महिमा बतायी।) अब कृपापूर्वक दूसरे मासका माहात्म्य बताइये। मुने! आपके वचनामृतसे किसको संतोष नहीं होगा!॥

नारद उवाच

सर्वे यूयं महाभागा: कृतार्था नात्र संशय:।

यत: प्रभावं रामस्य भक्तित: श्रोतुमुद्यता:॥ ३॥

नारदजीने कहा—महात्माओ! आप सब लोग निश्चय ही बड़े भाग्यशाली और कृतकृत्य हैं, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि आप भक्तिभावसे भगवान् श्रीरामकी महिमा सुननेके लिये उद्यत हुए हैं॥ ३॥

माहात्म्यश्रवणं यस्य राघवस्य कृतात्मनाम्।

दुर्लभं प्राहुरत्यन्तं मुनयो ब्रह्मवादिन:॥ ४॥

ब्रह्मवादी मुनियोंने भगवान् श्रीरामके माहात्म्यका श्रवण पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये परम दुर्लभ बताया है॥

शृणुध्वमृषयश्चित्रमितिहासं पुरातनम्।

सर्वपापप्रशमनं सर्वरोगविनाशनम्॥ ५॥

महर्षियो! अब आपलोग एक विचित्र पुरातन इतिहास सुनिये, जो समस्त पापोंका निवारण और सम्पूर्ण रोगोंका विनाश करनेवाला है॥ ५॥

आसीत् पुरा द्वापरे च सुमतिर्नाम भूपति:।

सोमवंशोद्भव: श्रीमान् सप्तद्वीपैकनायक:॥ ६॥

पूर्वकालकी बात है, द्वापरमें सुमति नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनका जन्म चन्द्रवंशमें हुआ था। वे श्रीसम्पन्न और सातों द्वीपोंके एकमात्र सम्राट् थे॥

धर्मात्मा सत्यसम्पन्न: सर्वसम्पद्विभूषित:।

सदा रामकथासेवी रामपूजापरायण:॥ ७॥

उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता था। वे सत्यवादी तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सुशोभित थे। सदा श्रीरामकथाके सेवन और श्रीरामकी ही समाराधनामें संलग्न रहते थे॥ ७॥

रामपूजापराणां च शुश्रूषुरनहंकृति:।

पूज्येषु पूजानिरत: समदर्शी गुणान्वित:॥ ८॥

श्रीरामकी पूजा-अर्चामें लगे रहनेवाले भक्तोंकी वे सदा सेवा करते थे। उनमें अहंकारका नाम भी नहीं था। वे पूज्य पुरुषोंके पूजनमें तत्पर रहनेवाले, समदर्शी तथा सद्गुणसम्पन्न थे॥ ८॥

सर्वभूतहित: शान्त: कृतज्ञ: कीर्त्तिमान् नृप:।

तस्य भार्या महाभागा सर्वलक्षणसंयुता॥ ९॥

राजा सुमति समस्त प्राणियोंके हितैषी, शान्त, कृतज्ञ और यशस्वी थे। उनकी परम सौभाग्यशालिनी पत्नी भी समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित थी॥ ९॥

पतिव्रता पतिप्राणा नाम्ना सत्यवती श्रुता।

तावुभौ दम्पती नित्यं रामायणपरायणौ॥ १०॥

उसका नाम सत्यवती था। वह पतिव्रता थी। पतिमें ही उसके प्राण बसते थे। वे दोनों पति-पत्नी सदा रामायणके ही पढ़ने और सुननेमें संलग्न रहते थे॥ १०॥

अन्नदानरतौ नित्यं जलदानपरायणौ।

तडागारामवाप्यादीनसंख्यातान् वितेनतु:॥ ११॥

सदा अन्नका दान करते और प्रतिदिन जलदानमें प्रवृत्त रहते थे। उन्होंने असंख्य पोखरों, बगीचों और बावडि़योंका निर्माण कराया था॥ ११॥

सोऽपि राजा महाभागो रामायणपरायण:।

वाचयेच्छृणुयाद् वापि भक्तिभावेन भावित:॥ १२॥

महाभाग राजा सुमति भी सदा रामायणके ही अनुशीलनमें लगे रहते थे। वे भक्तिभावसे भावित हो रामायणको ही बाँचते अथवा सुनते थे॥ १२॥

एवं रामपरं नित्यं राजानं धर्मकोविदम्।

तस्य प्रियां सत्यवतीं देवा अपि सदास्तुवन्॥ १३॥

इस प्रकार वे धर्मज्ञ नरेश सदा श्रीरामकी आराधनामें ही तत्पर रहते थे। उनकी प्यारी पत्नी सत्यवती भी ऐसी ही थी। देवता भी उन दोनों दम्पतिकी सदा भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे॥ १३॥

विश्रुतौ त्रिषु लोकेषु दम्पती तौ हि धार्मिकौ।

आययौ बहुभि: शिष्यैर्द्रष्टुकामो विभाण्डक:॥ १४॥

एक दिन उन त्रिभुवनविख्यात धर्मात्मा राजा-रानीको देखनेके लिये विभाण्डक मुनि अपने बहुत-से शिष्योंके साथ वहाँ आये॥ १४॥

विभाण्डकं मुनिं दृष्ट्वा सुखमाप्तो जनेश्वर:।

प्रत्युद्ययौ सपत्नीक: पूजाभिर्बहुविस्तरम्॥ १५॥

मुनिवर विभाण्डकको आया देख राजा सुमतिको बड़ा सुख मिला। वे पूजाकी विस्तृत सामग्री साथ ले पत्नीसहित उनकी अगवानीके लिये गये॥ १५॥

कृतातिथ्यक्रियं शान्तं कृतासनपरिग्रहम्।

निजासनगतो भूप: प्राञ्जलिर्मुनिमब्रवीत्॥ १६॥

जब मुनिका अतिथि-सत्कार सम्पन्न हो गया और वे शान्तभावसे आसनपर विराजमान हो गये, उस समय अपने आसनपर बैठे हुए भूपालने मुनिसे हाथ जोड़कर कहा॥ १६॥

राजोवाच

भगवन् कृतकृत्योऽद्य त्वदभ्यागमनेन भो:।

सतामागमनं सन्त: प्रशंसन्ति सुखावहम्॥ १७॥

राजा बोले—भगवन्! आज आपके शुभागमनसे मैं कृतार्थ हो गया; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष संतोंके आगमनको सुखदायक बताकर उसकी प्रशंसा करते हैं॥ १७॥

यत्र स्यान्महतां प्रेम तत्र स्यु: सर्वसम्पद:।

तेज: कीर्तिर्धनं पुत्र इति प्राहुर्विपश्चित:॥ १८॥

जहाँ महापुरुषोंका प्रेम होता है, वहाँ सारी सम्पत्तियाँ अपने-आप उपस्थित हो जाती हैं। वहाँ तेज, कीर्ति, धन और पुत्र—सभी वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं—ऐसा विद्वान् पुरुषोंका कथन है॥ १८॥

तत्र वृद्धिं गमिष्यन्ति श्रेयांस्यनुदिनं मुने।

यत्र सन्त: प्रकुर्वन्ति महतीं करुणां प्रभो॥ १९॥

मुने! प्रभो! जहाँ संत-महात्मा बड़ी भारी कृपा करते हैं, वहाँ प्रतिदिन कल्याणमय साधनोंकी वृद्धि होती है॥ १९॥

यो मूर्ध्नि धारयेद् ब्रह्मन् विप्रपादतलोदकम्।

स स्नातो सर्वतीर्थेषु पुण्यवान् नात्र संशय:॥ २०॥

ब्रह्मन्! जो अपने मस्तकपर ब्राह्मणोंका चरणोदक धारण करता है, उस पुण्यात्मा पुरुषने सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥

मम पुत्राश्च दाराश्च सम्पदश्च समर्पिता:।

समाज्ञापय शान्तात्मन् वयं किं करवाणि ते॥ २१॥

शान्तस्वरूप महर्षे! मेरे पुत्र, पत्नी तथा सारी सम्पत्ति आपके चरणोंमें समर्पित है। आज्ञा दीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?॥ २१॥

इत्थं वदन्तं भूपं तं स निरीक्ष्य मुनीश्वर:।

स्पृशन् करेण राजानं प्रत्युवाचातिहर्षित:॥ २२॥

ऐसी बातें कहते हुए राजा सुमतिकी ओर देखकर मुनीश्वर विभाण्डक बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने हाथसे राजाका स्पर्श करते हुए कहा॥ २२॥

ऋषिरुवाच

राजन् यदुक्तं भवता तत्सर्वं त्वत्कुलोचितम्।

विनयावनता: सर्वे परं श्रेयो भजन्ति हि॥ २३॥

ऋषि बोले—राजन्! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब तुम्हारे कुलके अनुरूप है। जो इस प्रकार विनयसे झुक जाते हैं, वे सब लोग परम कल्याणके भागी होते हैं॥ २३॥

प्रीतोऽस्मि तव भूपाल सन्मार्गपरिवर्तिन:।

स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग यत्पृच्छामि तदुच्यताम्॥ २४॥

भूपाल! तुम सन्मार्गपर चलनेवाले हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ, उसे बताओ॥ २४॥

हरिसंतोषकान्यासन् पुराणानि बहून्यपि।

माघे मासि चोद्यतोऽसि रामायणपरायण:॥ २५॥

तव भार्यापि साध्वीयं नित्यं रामपरायणा।

किमर्थमेतद् वृत्तान्तं यथावद् वक्तुमर्हसि॥ २६॥

यद्यपि भगवान् श्रीहरिको संतुष्ट करनेवाले बहुत-से पुराण भी थे, जिनका तुम पाठ कर सकते थे, तथापि इस माघमासमें सब प्रकारसे प्रयत्नशील होकर तुम जो रामायणके ही पारायणमें लगे हुए हो तथा तुम्हारी यह साध्वी पत्नी भी सदा जो श्रीरामकी ही आराधनामें रत रहती है, इसका क्या कारण है? यह वृत्तान्त यथावत्-रूपसे मुझे बताओ॥ २५-२६॥

राजोवाच

शृणुष्व भगवन् सर्वं यत्पृच्छसि वदामि तत्।

आश्चर्यं यद्धि लोकानामावयोश्चरितं मुने॥ २७॥

राजाने कहा—भगवन्! सुनिये, आप जो कुछ पूछते हैं, वह सब मैं बता रहा हूँ। मुने! हम दोनोंका चरित्र सम्पूर्ण जगत्के लिये आश्चर्यजनक है॥ २७॥

अहमासं पुरा शूद्रो मालतिर्नाम सत्तम।

कुमार्गनिरतो नित्यं सर्वलोकाहिते रत:॥ २८॥

साधुशिरोमणे! पूर्वजन्ममें मैं मालति नामक शूद्र था। सदा कुमार्गपर ही चलता और सब लोगोंके अहित-साधनमें ही संलग्न रहता था॥ २८॥

पिशुनो धर्मविद्वेषी देवद्रव्यापहारक:।

महापातकिसंसर्गी देवद्रव्योपजीवक:॥ २९॥

दूसरोंकी चुगली खानेवाला, धर्मद्रोही, देवतासम्बन्धी द्रव्यका अपहरण करनेवाला तथा महापातकियोंके संसर्गमें रहनेवाला था। मैं देव-सम्पत्तिसे ही जीविका चलाता था।

गोघ्नश्च ब्रह्महा चौरो नित्यं प्राणिवधे रत:।

नित्यं निष्ठुरवक्ता च पापी वेश्यापरायण:॥ ३०॥

गोहत्या, ब्राह्मणहत्या और चोरी करना—यही अपना धंधा था। मैं सदा दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें ही लगा रहता था। प्रतिदिन दूसरोंसे कठोर बातें बोलता, पाप करता और वेश्याओंमें आसक्त रहता था॥ ३०॥

किञ्चित् काले स्थितो ह्येवमनादृत्य महद्वच:।

सर्वबन्धुपरित्यक्तो दु:खी वनमुपागमम्॥ ३१॥

इस प्रकार कुछ कालतक घरमें रहा, फिर बड़े लोगोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेके कारण मेरे सभी भाई-बन्धुओंने मुझे त्याग दिया और मैं दु:खी होकर वनमें चला आया॥ ३१॥

मृगमांसाशनं नित्यं तथा मार्गविरोधकृत्।

एकाकी दु:खबहुलो न्यवसं निर्जने वने॥ ३२॥

वहाँ प्रतिदिन मृगोंका मांस खाकर रहता था और काँटे आदि बिछाकर लोगोंके आने-जानेका मार्ग अवरुद्ध कर देता था। इस तरह अकेला बहुत दु:ख भोगता हुआ मैं उस निर्जन वनमें रहने लगा॥ ३२॥

एकदा क्षुत्परिश्रान्तो निद्राघूर्ण: पिपासित:।

वसिष्ठस्याश्रमं दैवादपश्यं निर्जने वने॥ ३३॥

एक दिनकी बात है, मैं भूखा-प्यासा, थका-माँदा, निद्रासे झूमता हुआ एक निर्जन वनमें आया। वहाँ दैवयोगसे वसिष्ठजीके आश्रमपर मेरी दृष्टि पड़ी॥ ३३॥

हंसकारण्डवाकीर्णं तत्समीपे महत्सर:।

पर्यन्ते वनपुष्पौघैश्छादितं तन्मुनीश्वर॥ ३४॥

उस आश्रमके निकट एक विशाल सरोवर था, जिसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी छा रहे थे। मुनीश्वर! वह सरोवर चारों ओरसे वन्य पुष्प-समूहोंद्वारा आच्छादित था॥ ३४॥

अपिबं तत्र पानीयं तत्तटे विगतश्रम:।

उन्मूल्य वृक्षमूलानि मया क्षुच्च निवारिता॥ ३५॥

वहाँ जाकर मैंने पानी पिया और उसके तटपर बैठकर अपनी थकावट दूर की। फिर कुछ वृक्षोंकी जड़ें उखाड़कर उनके द्वारा अपनी भूख बुझायी॥ ३५॥

वसिष्ठस्याश्रमे तत्र निवासं कृतवानहम्।

शीर्णस्फटिकसंधानं तत्र चाहमकारिषम्॥ ३६॥

वसिष्ठके उस आश्रमके पास ही मैं निवास करने लगा। टूटी-फूटी स्फटिक-शिलाओंको जोड़कर मैंने वहाँ दीवार खड़ी की॥ ३६॥

पर्णैस्तृणैश्च काष्ठैश्च गृहं सम्यक् प्रकल्पितम्।

तत्राहं व्याधसत्त्वस्थो हत्वा बहुविधान् मृगान्॥ ३७॥

आजीविकां च कुर्वाणो वत्सराणां च विंशतिम्।

फिर पत्तों, तिनकों और काष्ठोंद्वारा एक सुन्दर घर बना लिया। उसी घरमें रहकर मैं व्याधोंकी वृत्तिका आश्रय ले नाना प्रकारके मृगोंको मारकर उन्हींके द्वारा बीस वर्षोंतक अपनी जीविका चलाता रहा॥ ३७ /

अथेयमागता साध्वी विन्ध्यदेशसमुद्भवा॥ ३८॥

निषादकुलसम्भूता नाम्ना कालीति विश्रुता।

बन्धुवर्गै: परित्यक्ता दु:खिता जीर्णविग्रहा॥ ३९॥

तदनन्तर मेरी ये साध्वी पत्नी वहाँ मेरे पास आयीं। पूर्वजन्ममें इनका नाम काली था। काली निषादकुलकी कन्या थी और विन्ध्यप्रदेशमें उत्पन्न हुई थी। उसके भाई-बन्धुओंने उसे त्याग दिया था। वह दु:खसे पीडि़त थी। उसका शरीर वृद्ध हो चला था॥ ३८-३९॥

ब्रह्मन् क्षुत्तृट्परिश्रान्ता शोचन्ती भौक्तिकीं क्रियाम्।

दैवयोगात् समायाता भ्रमन्ती विजने वने॥ ४०॥

ब्रह्मन्! वह भूख-प्याससे शिथिल हो गयी थी और इस सोचमें पड़ी थी कि भोजनका कार्य कैसे चलेगा? दैवयोगसे घूमती-घामती वह उसी निर्जन वनमें आ पहुँची, जिसमें मैं रहता था॥ ४०॥

मासे ग्रीष्मे च तापार्त्ता ह्यन्तस्तापप्रपीडिता।

इमां दु:खवतीं दृष्ट्वा जाता मे विपुला घृणा॥ ४१॥

गर्मीका महीना था। बाहर इसे धूप सता रही थी और भीतर मानसिक संताप अत्यन्त पीड़ा दे रहा था। इस दु:खिनी नारीको देखकर मेरे मनमें बड़ी दया आयी॥ ४१॥

मया दत्तं जलं चास्यै मांसं वनफलं तथा।

गतश्रमा तु सा पृष्टा मया ब्रह्मन् यथातथम्॥ ४२॥

मैंने इसे पीनेके लिये जल तथा खानेके लिये मांस और जंगली फल दिये। ब्रह्मन्! काली जब विश्राम कर चुकी, तब मैंने उससे उसका यथावत् वृत्तान्त पूछा॥ ४२॥

न्यवेदयत् स्वकर्माणि तानि शृणु महामुने।

इयं काली तु नाम्ना वै निषादकुलसम्भवा॥ ४३॥

महामुने! मेरे पूछनेपर उसने जो अपने जन्म-कर्म निवेदन किये थे, उन्हें बताता हूँ। सुनिये—उसका नाम काली था और वह निषादकुलकी कन्या थी॥ ४३॥

दाम्भिकस्य सुता विद्वन् न्यवसद् विन्ध्यपर्वते।

परस्वहारिणी नित्यं सदा पैशुन्यवादिनी॥ ४४॥

विद्वन्! उसके पिताका नाम दाम्भिक (या दाविक) था। वह उसीकी पुत्री थी और विन्ध्यपर्वतपर निवास करती थी। सदा दूसरोंका धन चुराना और चुगली खाना ही उसका काम था॥ ४४॥

बन्धुवर्गै: परित्यक्ता यतो हतवती पतिम्।

कान्तारे विजने ब्रह्मन् मत्समीपमुपागता॥ ४५॥

एक दिन उसने अपने पतिकी हत्या कर डाली, इसीलिये भाई-बन्धुओंने उसे घरसे निकाल दिया। ब्रह्मन्! इस तरह परित्यक्ता काली उस दुर्गम एवं निर्जन वनमें मेरे पास आयी थी॥ ४५॥

इत्येवं स्वकृतं कर्म सर्वं मह्यं न्यवेदयत्।

वसिष्ठस्याश्रमे पुण्ये अहं चेयं च वै मुने॥ ४६॥

दम्पतीभावमाश्रित्य स्थितौ मांसाशिनौ तदा।

उसने अपनी सारी करतूतें मुझे इसी रूपमें बतायी थीं। मुने! तब वसिष्ठजीके उस पवित्र आश्रमके निकट मैं और काली—दोनों पति-पत्नीका सम्बन्ध स्वीकार करके रहने और मांसाहारसे ही जीवन-निर्वाह करने लगे॥ ४६ /

उद्यमार्थे गतौ चैव वसिष्ठस्याश्रमं तदा॥ ४७॥

दृष्ट्वा चैव समाजं च देवर्षीणां च सत्तम।

रामायणपरा विप्रा माघे दृष्टा दिने दिने॥ ४८॥

एक दिन हम दोनों जीविकाके निमित्त कुछ उद्यम करनेके लिये वहाँ वसिष्ठजीके आश्रमपर गये। महात्मन्! वहाँ देवर्षियोंका समाज जुटा हुआ था। वही देखकर हमलोग उधर गये थे। वहाँ माघमासमें प्रतिदिन ब्राह्मणलोग रामायणका पाठ करते दिखायी देते थे॥ ४७-४८॥

निराहारौ च विक्रान्तौ क्षुत्पिपासाप्रपीडितौ।

अनिच्छया गतौ तत्र वसिष्ठस्याश्रमं प्रति॥ ४९॥

रामायणकथां श्रोतुं नवाह्ना चैव भक्तित:।

तत्काल एव पञ्चत्वमावयोरभवन्मुने॥ ५०॥

उस समय हमलोग निराहार थे और पुरुषार्थ करनेमें समर्थ होकर भी भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे। अत: बिना इच्छाके ही वसिष्ठजीके आश्रमपर चले गये थे। फिर लगातार नौ दिनोंतक भक्ति-पूर्वक रामायणकी कथा सुननेके लिये हम दोनों वहाँ जाते रहे। मुने! उसी समय हम दोनोंकी मृत्यु हो गयी॥ ४९-५०॥

कर्मणा तेन तुष्टात्मा भगवान् मधुसूदन:।

स्वदूतान् प्रेषयामास मदाहरणकारणात्॥ ५१॥

हमारे उस कर्मसे भगवान् मधुसूदनका मन प्रसन्न हो गया था, अत: उन्होंने हमें ले आनेके लिये दूत भेजे॥ ५१॥

आरोप्य मां विमाने तु जग्मुस्ते च परं पदम्।

आवां समीपमापन्नौ देवदेवस्य चक्रिण:॥ ५२॥

वे दूत हम दोनोंको विमानमें बिठाकर भगवान्के परम पद (उत्तम धाम) में ले गये। हम दोनों देवाधिदेव चक्रपाणिके निकट जा पहुँचे22॥ ५२॥

भुक्तवन्तौ महाभोगान् यावत्कालं शृणुष्व मे।

युगकोटिसहस्राणि युगकोटिशतानि च॥ ५३॥

उषित्वा रामभवने ब्रह्मलोकमुपागतौ।

तावत्कालं च तत्रापि स्थित्वैन्द्रपदमागतौ॥ ५४॥

वहाँ हमने जितने समयतक बड़े-बड़े भोग भोगे थे, वह बता रहे हैं। सुनिये—कोटि सहस्र और कोटि शत युगोंतक श्रीरामधाममें निवास करके हमलोग ब्रह्मलोकमें आये। वहाँ भी उतने ही समयतक रहकर हम इन्द्रलोकमें आ गये॥ ५३-५४॥

तत्रापि तावत्कालं च भुक्त्वा भोगाननुत्तमान्।

तत: पृथ्वीं वयं प्राप्ता: क्रमेण मुनिसत्तम॥ ५५॥

मुनिश्रेष्ठ! इन्द्रलोकमें भी उतने ही कालतक परम उत्तम भोग भोगनेके पश्चात् हम क्रमश: इस पृथ्वीपर आये हैं॥ ५५॥

अत्रापि सम्पदतुला रामायणप्रसादत:।

अनिच्छया कृतेनापि प्राप्तमेवंविधं मुने॥ ५६॥

यहाँ भी रामायणके प्रसादसे हमें अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई है। मुने! अनिच्छासे रामायणका श्रवण करनेपर भी हमें ऐसा फल प्राप्त हुआ है॥ ५६॥

नवाह्ना किल श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्।

भक्तिभावेन धर्मात्मन् जन्ममृत्युजरापहम्॥ ५७॥

धर्मात्मन्! यदि नौ दिनोंतक भक्ति-भावसे रामायणकी अमृतमयी कथा सुनी जाय तो वह जन्म, जरा और मृत्युका नाश करनेवाली होती है॥ ५७॥

अवशेनापि यत्कर्म कृतं तु सुमहत्फलम्।

ददाति शृणु विप्रेन्द्र रामायणप्रसादत:॥ ५८॥

विप्रवर! सुनिये, विवश होकर भी जो कर्म किया जाता है, वह रामायणके प्रसादसे परम महान् फल प्रदान करता है॥ ५८॥

नारद उवाच

एतत्सर्वं निशम्यासौ विभाण्डको मुनीश्वर:।

अभिनन्द्य महीपालं प्रययौ स्वतपोवनम्॥ ५९॥

नारदजी कहते हैं—यह सब सुनकर मुनीश्वर विभाण्डक राजा सुमतिका अभिनन्दन करके अपने तपोवनको चले गये॥ ५९॥

तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा देवदेवस्य चक्रिण:।

रामायणकथा चैव कामधेनूपमा स्मृता॥ ६०॥

विप्रवरो! अत: आपलोग देवाधिदेव चक्रपाणि भगवान् श्रीहरिकी कथा सुनिये। रामायणकथा कामधेनुके समान अभीष्ट फल देनेवाली बतायी गयी है॥ ६०॥

माघे मासे सिते पक्षे रामायणं प्रयत्नत:।

नवाह्ना किल श्रोतव्यं सर्वधर्मफलप्रदम्॥ ६१॥

माघमासके शुक्ल पक्षमें प्रयत्नपूर्वक रामायणकी नवाह्नकथा सुननी चाहिये। वह सम्पूर्ण धर्मोंका फल प्रदान करनेवाली है॥ ६१॥

य इदं पुण्यमाख्यानं सर्वपापप्रणाशनम्।

वाचयेच्छृणुयाद् वापि रामभक्तश्च जायते॥ ६२॥

यह पवित्र आख्यान समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। जो इसे बाँचता अथवा सुनता है, वह भगवान् श्रीरामका भक्त होता है॥ ६२॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये
माघफलानुकीर्तनं नाम तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारदसनत्कुमारसंवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यके प्रसंगमें
माघमासमें रामायणकथाश्रवणके फलका वर्णन नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥

 

चतुर्थोऽध्याय:

चैत्रमासमें रामायणके पठन और श्रवणका माहात्म्य, कलिक नामक व्याध और उत्तङ्क मुनिकी कथा

नारद उवाच

अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिता:।

सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदु:खनिबर्हणम्॥ १॥

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम्।

समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम्॥ २॥

दु:स्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।

रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नत:॥ ३॥

नारदजी कहते हैं—महर्षियो! अब मैं रामायणके पाठ और श्रवणके लिये उपयोगी दूसरे मासका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। रामायणका माहात्म्य समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यजनक तथा सम्पूर्ण दु:खोंका निवारण करनेवाला है। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्री—इन सबको समस्त मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाला है। उससे सब प्रकारके व्रतोंका फल भी प्राप्त होता है। वह दु:स्वप्नका नाशक, धनकी प्राप्ति करानेवाला तथा भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है। अत: उसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये॥ १—३॥

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।

पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम्॥ ४॥

इसी विषयमें विज्ञ पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वह इतिहास अपने पाठकों और श्रोताओंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४॥

आसीत् पुरा कलियुगे कलिको नाम लुब्धक:।

परदारपरद्रव्यहरणे सततं रत:॥ ५॥

प्राचीन कलियुगमें एक कलिक नामवाला व्याध रहता था। वह सदा परायी स्त्री और पराये धनके अपहरणमें ही लगा रहता था॥ ५॥

परनिन्दापरो नित्यं जन्तुपीडाकरस्तथा।

हतवान् ब्राह्मणान् गाव: शतशोऽथ सहस्रश:॥ ६॥

दूसरोंकी निन्दा करना उसका नित्यका काम था। वह सदा सभी जन्तुओंको पीड़ा दिया करता था। उसने कितने ही ब्राह्मणों तथा सैकड़ों, हजारों गौओंकी हत्या कर डाली थी॥ ६॥

देवस्वहरणे नित्यं परस्वहरणे तथा।

तेन पापान्यनेकानि कृतानि सुमहान्ति च॥ ७॥

पराये धनका तो वह नित्य अपहरण करता ही था, देवताके धनको भी हड़प लेता था। उसने अपने जीवनमें अनेक बड़े-बड़े पाप किये थे॥ ७॥

न तेषां शक्यते वक्तुं संख्या वत्सरकोटिभि:।

स कदाचिन्महापापो जन्तूनामन्तकोपम:॥ ८॥

सौवीरनगरं प्राप्त: सर्वैश्वर्यसमन्वितम्।

योषिद्भिर्भूषिताभिश्च सरोभिर्विमलोदकै:॥ ९॥

अलंकृतं विपणिभिर्ययौ देवपुरोपमम्।

उसके पापोंकी गणना करोड़ों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती थी। एक समय वह महापापी व्याध, जो जीव-जन्तुओंके लिये यमराजके समान भयंकर था, सौवीरनगरमें गया। वह नगर सब प्रकारके वैभवसे सम्पन्न, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित युवतियोंद्वारा सुशोभित, स्वच्छ जलवाले सरोवरोंसे अलंकृत तथा भाँति-भाँतिकी दूकानोंसे सुसज्जित था। देवनगरके समान उसकी शोभा हो रही थी। व्याध उस नगरमें गया॥ ८-९ /

तस्योपवनमध्यस्थं रम्यं केशवमन्दिरम्॥ १०॥

छादितं हेमकलशैर्दृष्ट्वा व्याधो मुदं ययौ।

हराम्यत्र सुवर्णानि बहूनीति विनिश्चित:॥ ११॥

सौवीरनगरके उपवनमें भगवान् केशवका बड़ा सुन्दर मन्दिर था, जो सोनेके अनेकानेक कलशोंसे ढका हुआ था। उसे देखकर व्याधको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने यह निश्चय कर लिया कि मैं यहाँसे बहुत-सा सुवर्ण चुराकर ले चलूँगा॥ १०-११॥

जगाम रामभवनं कीनाशश्चौर्यलोलुप:।

तत्रापश्यद् द्विजवरं शान्तं तत्त्वार्थकोविदम्॥ १२॥

परिचर्यापरं विष्णोरुत्तङ्कं तपसां निधिम्।

एकाकिनं दयालुं च नि:स्पृहं ध्यानलोलुपम्॥ १३॥

ऐसा निश्चय करके वह चोरीपर लट्टू रहनेवाला व्याध श्रीरामके मन्दिरमें गया। वहाँ उसने शान्त, तत्त्वार्थवेत्ता और भगवान्‌की आराधनामें तत्पर उत्तङ्क मुनिका दर्शन किया, जो तपस्याकी निधि थे। वे अकेले ही रहते थे। उनके हृदयमें सबके प्रति दया भरी थी। वे सब ओरसे नि:स्पृह थे। उनके मनमें केवल भगवान्के ध्यानका ही लोभ बना रहता था॥ १२-१३॥

दृष्ट्वासौ लुब्धको मेने तं चौर्यस्यान्तरायिणम्।

देवस्य द्रव्यजातं तु समादाय महानिशि॥ १४॥

उन्हें वहाँ उपस्थित देख व्याधने उनको चोरीमें विघ्न डालनेवाला समझा। तदनन्तर जब आधी रात हुई, तब वह देवतासम्बन्धी द्रव्यसमूह लेकर चला॥ १४॥

उत्तङ्कं हन्तुमारेभे उद्यतासिर्मदोद्धत:।

पादेनाक्रम्य तद्वक्षो गलं संगृह्य पाणिना॥ १५॥

उस मदोन्मत्त व्याधने उत्तङ्क मुनिकी छातीको अपने एक पैरसे दबाकर हाथसे उनका गला पकड़ लिया और तलवार उठाकर उन्हें मार डालनेका उपक्रम किया॥ १५॥

हन्तुं कृतमतिं व्याधं उत्तङ्को प्रेक्ष्य चाब्रवीत्।

उत्तङ्कने देखा व्याध मुझे मार डालना चाहता है तो वे उससे इस प्रकार बोले॥ १५॥

उत्तङ्क उवाच

भो भो: साधो वृथा मां त्वं हनिष्यसि निरागसम्॥ १६॥

उत्तङ्कने कहा—ओ भले मानुष! तुम व्यर्थ ही मुझे मारना चाहते हो। मैं तो सर्वथा निरपराध हूँ॥ १६॥

मया किमपराद्धं ते तद् वद त्वं च लुब्धक।

कृतापराधिनो लोके हिंसां कुर्वन्ति यत्नत:॥ १७॥

न हिंसन्ति वृथा सौम्य सज्जना अप्यपापिनम्।

लुब्धक! बताओ तो सही, मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? संसारमें लोग अपराधीकी ही प्रयत्नपूर्वक हिंसा करते हैं। सौम्य! सज्जन निरपराधकी व्यर्थ हिंसा नहीं करते हैं॥ १७ /

विरोधिष्वपि मूर्खेषु निरीक्ष्यावस्थितान् गुणान्॥ १८॥

विरोधं नाधिगच्छन्ति सज्जना: शान्तचेतस:।

शान्तचित्त साधु पुरुष अपने विरोधी तथा मूर्ख मनुष्योंमें भी सद्गुणोंकी स्थिति देखकर उनके साथ विरोध नहीं रखते हैं॥ १८ /

बहुधा वाच्यमानोऽपि यो नर: क्षमयान्वित:॥ १९॥

तमुत्तमं नरं प्राहुर्विष्णो: प्रियतरं तथा॥ २०॥

जो मनुष्य बारम्बार दूसरोंकी गाली सुनकर भी क्षमाशील बना रहता है, वह उत्तम कहलाता है। उसे भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रियजन बताया गया है॥

सुजनो न याति वैरं परहितनिरतो विनाशकालेऽपि।

छेदेऽपि चन्दनतरु: सुरभीकरोति मुखं कुठारस्य॥ २१॥

दूसरोंके हित-साधनमें लगे रहनेवाले साधुजन किसीके द्वारा अपने विनाशका समय उपस्थित होनेपर भी उसके साथ वैर नहीं करते। चन्दनका वृक्ष अपनेको काटनेपर भी कुठारकी धारको सुवासित ही करता है॥

अहो विधिर्वै बलवान् बाधते बहुधा जनान्।

सर्वसंगविहीनोऽपि बाध्यते तु दुरात्मना॥ २२॥

अहो! विधाता बड़ा बलवान् है। वह लोगोंको नाना प्रकारसे कष्ट देता रहता है। जो सब प्रकारके संगसे रहित है, उसे भी दुरात्मा मनुष्य सताया करते हैं॥

अहो निष्कारणं लोके बाधन्ते दुर्जना जनान्।

धीवरा: पिशुना व्याधा लोकेऽकारणवैरिण:॥ २३॥

अहो! दुष्टजन इस संसारमें बहुत-से जीवोंको बिना किसी अपराधके ही पीड़ा देते हैं। मल्लाह मछलियोंके, चुगलखोर सज्जनोंके और व्याध मृगोंके इस जगत्में अकारण वैरी होते हैं॥ २३॥

अहो बलवती माया मोहयत्यखिलं जगत्।

पुत्रमित्रकलत्राद्यै: सर्वदु:खेन योज्यते॥ २४॥

अहो! माया बड़ी प्रबल है। यह सम्पूर्ण जगत्को मोहमें डाल देती है तथा स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके द्वारा सबको सब प्रकारके दु:खोंसे संयुक्त कर देती है॥

परद्रव्यापहारेण कलत्रं पोषितं च यत्।

अन्ते तत् सर्वमुत्सृज्य एक एव प्रयाति वै॥ २५॥

मनुष्य पराये धनका अपहरण करके जो अपनी स्त्री आदिका पोषण करता है, वह किस कामका; क्योंकि अन्तमें उन सबको छोड़कर वह अकेला ही परलोककी राह लेता है॥ २५॥

मम माता मम पिता मम भार्या ममात्मजा:।

ममेदमिति जन्तूनां ममता बाधते वृथा॥ २६॥

‘मेरी माता, मेरे पिता, मेरी पत्नी, मेरे पुत्र तथा मेरा यह घरबार’—इस प्रकार ममता व्यर्थ ही प्राणियोंको कष्ट देती रहती है॥ २६॥

यावदर्पयति द्रव्यं तावद् भवति बान्धव:।

अर्जितं तु धनं सर्वे भुञ्जन्ते बान्धवा: सदा॥ २७॥

दु:खमेकतमो मूढस्तत्पापफलमश्नुते।

मनुष्य जबतक कमाकर धन देता है, तभीतक लोग उसके भाई-बन्धु बने रहते हैं और उसके कमाये हुए धनको सारे बन्धु-बान्धव सदा भोगते रहते हैं; किंतु मूर्ख मनुष्य अपने किये हुए पापके फलरूप दु:खको अकेला ही भोगता है॥ २७ /

इति ब्रुवाणं तमृषिं विमृश्य भयविह्वल:॥ २८॥

कलिक: प्राञ्जलि: प्राह क्षमस्वेति पुन: पुन:।

उत्तङ्क मुनि जब इस प्रकार कह रहे थे, तब उनकी बातोंपर विचार करके कलिक नामक व्याध भयसे व्याकुल हो उठा और हाथ जोड़कर बारम्बार कहने लगा—‘प्रभो! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये’॥

तत्संगस्य प्रभावेण हरिसंनिधिमात्रत:॥ २९॥

गतपापो लुब्धकश्च सानुतापोऽभवद् ध्रुवम्।

उन महात्माके संगके प्रभावसे तथा भगवान्‌का सांनिध्य मिल जानेसे उस लुब्धकके सारे पाप नष्ट हो गये तथा उसके मनमें निश्चय ही बड़ा पश्चात्ताप होने लगा॥

मया कृतानि पापानि महान्ति सुबहूनि च॥ ३०॥

तानि सर्वाणि नष्टानि विप्रेन्द्र तव दर्शनात्।

वह बोला—‘विप्रवर! मैंने जीवनमें बहुत-से बड़े-बड़े पाप किये हैं; किंतु वे सब आपके दर्शनमात्रसे नष्ट हो गये॥ ३० /

अहं वै पापधीर्नित्यं महापापं समाचरम्॥ ३१॥

कथं मे निष्कृतिर्भूयात् कं यामि शरणं विभो।

‘प्रभो! मेरी बुद्धि सदा पापमें ही डूबी रहती थी। मैंने निरन्तर बड़े-बड़े पापोंका ही आचरण किया है। उनसे मेरा उद्धार किस प्रकार होगा? मैं किसकी शरणमें जाऊँ॥ ३१ /

पूर्वजन्मार्जितै: पापैर्लुब्धकत्वमवाप्तवान्॥ ३२॥

अत्रापि पापजालानि कृत्वा कां गतिमाप्नुयाम्।

‘पूर्वजन्मके किये हुए पापोंके फलसे मुझे व्याध होना पड़ा है, यहाँ भी मैंने पापोंके ही जाल बटोरे हैं। ये पाप करके मैं किस गतिको प्राप्त होऊँगा?’॥ ३२ /

इति वाक्यं समाकर्ण्य कलिकस्य महात्मन:॥ ३३॥

उत्तङ्को नाम विप्रर्षिरिदं वाक्यमथाब्रवीत्।

महामना कलिककी यह बात सुनकर ब्रह्मर्षि उत्तङ्क इस प्रकार बोले॥ ३३ /

उत्तङ्क उवाच

साधु साधु महाप्राज्ञ मतिस्ते विमलोज्ज्वला॥ ३४॥

यस्मात् संसारदु:खानां नाशोपायमभीप्ससि।

उत्तङ्कने कहा—महामते व्याध! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि बड़ी निर्मल और उज्ज्वल है; क्योंकि तुम संसारसम्बन्धी दु:खोंके नाशका उपाय जानना चाहते हो॥ ३४ /

चैत्रे मासि सिते पक्षे कथा रामायणस्य च॥ ३५॥

नवाह्ना किल श्रोतव्या भक्तिभावेन सादरम्।

यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ३६॥

चैत्रमासके शुक्लपक्षमें तुम्हें भक्तिभावसे आदरपूर्वक रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ३५-३६॥

तस्मिन् क्षणेऽसौ कलिको लुब्धको वीतकल्मष:।

रामायणकथां श्रुत्वा सद्य: पञ्चत्वमागत:॥ ३७॥

उस समय कलिक व्याधके सारे पाप नष्ट हो गये। वह रामायणकी कथा सुनकर तत्काल मृत्युको प्राप्त हो गया॥ ३७॥

उत्तङ्क: पतितं वीक्ष्य लुब्धकं तं दयापर:।

एतद् दृष्ट्वा विस्मितश्च अस्तौषीत् कमलापतिम्॥ ३८॥

व्याधको धरतीपर पड़ा हुआ देख दयालु उत्तङ्क मुनि बड़े विस्मित हुए। फिर उन्होंने भगवान् कमलापतिका स्तवन किया॥ ३८॥

कथां रामायणस्यापि श्रुत्वा च वीतकल्मष:।

दिव्यं विमानमारुह्य मुनिमेतदथाब्रवीत्॥ ३९॥

रामायणकी कथा सुनकर निष्पाप हुआ व्याध दिव्य विमानपर आरूढ़ हो उत्तङ्क मुनिसे इस प्रकार बोला॥ ३९॥

विमुक्तस्त्वत्प्रसादेन महापातकसंकटात्।

तस्मान्नतोऽस्मि ते विद्वन् यत् कृतं तत् क्षमस्व मे॥ ४०॥

‘विद्वन्! आपके प्रसादसे मैं महापातकोंके संकटसे मुक्त हो गया। अत: मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। मैंने जो किया है, मेरे उस अपराधको आप क्षमा कीजिये’॥ ४०॥

सूत उवाच

इत्युक्त्वा देवकुसुमैर्मुनिश्रेष्ठमवाकिरत्।

प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा नमस्कारं चकार ह॥ ४१॥

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर कलिकने मुनिश्रेष्ठ उत्तङ्कपर देवकुसुमोंकी वर्षा की और तीन बार उनकी परिक्रमा करके उन्हें बारम्बार नमस्कार किया॥ ४१॥

ततो विमानमारुह्य सर्वकामसमन्वितम्।

अप्सरोगणसंकीर्णं प्रपेदे हरिमन्दिरम्॥ ४२॥

तत्पश्चात् अप्सराओंसे भरे हुए सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न विमानपर आरूढ़ हो वह श्रीहरिके परम धाममें जा पहुँचा॥ ४२॥

तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा: कथां रामायणस्य च।

चैत्रे मासि सिते पक्षे श्रोतव्यं च प्रयत्नत:॥ ४३॥

नवाह्ना किल रामस्य रामायणकथामृतम्।

अत: विप्रवरो! आप सब लोग रामायणकी कथा सुनें। चैत्रमासके शुक्लपक्षमें प्रयत्नपूर्वक रामायणकी अमृतमयी कथाका नवाह-पारायण अवश्य सुनना चाहिये॥ ४३ /

तस्मादृतुषु सर्वेषु हितकृद्धरिपूजक:॥ ४४॥

ईप्सितं मनसा यद्यत् तदाप्नोति न संशय:।

इसलिये रामायण सभी ऋतुओंमें हितकारक है। इसके द्वारा भगवान्‌की पूजा करनेवाला पुरुष मनसे जो-जो चाहता है, उसे नि:संदेह प्राप्त कर लेता है॥ ४४॥

सनत्कुमार यत् पृष्टं तत् सर्वं गदितं मया॥ ४५॥

रामायणस्य माहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ ४६॥

सनत्कुमार! तुमने जो रामायणका माहात्म्य पूछा था, वह सब मैंने बता दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?॥ ४५-४५॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये
चैत्रमासफलानुकीर्तनं नाम चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारद-सनत्कुमारसंवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यके प्रसंगमें
चैत्रमासमें रामायण सुननेके फलका वर्णन नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ॥ ४॥

 

पञ्चमोऽध्याय:

रामायणके नवाह श्रवणकी विधि, महिमा तथा फलका वर्णन

सूत उवाच

रामायणस्य माहात्म्यं श्रुत्वा प्रीतो मुनीश्वर:।

सनत्कुमार: पप्रच्छ नारदं मुनिसत्तमम्॥ १॥

सूतजी कहते हैं—रामायणका यह माहात्म्य सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे पुन: जिज्ञासा की॥ १॥

सनत्कुमार उवाच

रामायणस्य माहात्म्यं कथितं वै मुनीश्वर।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि विधिं रामायणस्य च॥ २॥

सनत्कुमार बोले—मुनीश्वर! आपने रामायणका माहात्म्य कहा। अब मैं उसकी विधि सुनना चाहता हूँ॥

एतच्चापि महाभाग मुने तत्त्वार्थकोविद।

कृपया परयाविष्टो यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ३॥

महाभाग मुने! आप तत्त्वार्थ-ज्ञानमें कुशल हैं; अत: अत्यन्त कृपापूर्वक इस विषयको यथार्थरूपसे बतायें॥

नारद उवाच

रामायणविधिं चैव शृणुध्वं सुसमाहिता:।

सर्वलोकेषु विख्यातं स्वर्गमोक्षविवर्धनम्॥ ४॥

नारदजीने कहा—महर्षियो! तुमलोग एकाग्रचित्त होकर रामायणकी वह विधि सुनो, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है। वह स्वर्ग तथा मोक्ष-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाली है॥ ४॥

विधानं तस्य वक्ष्यामि शृणुध्वं गदतो मम।

रामायणकथां कुर्वन् भक्तिभावेन भावित:॥ ५॥

मैं रामायणकथा-श्रवणका विधान बता रहा हूँ; तुम सब लोग उसे सुनो। रामायणकथाका अनुष्ठान करनेवाले वक्ता एवं श्रोताको भक्तिभावसे भावित होकर उस विधानका पालन करना चाहिये॥ ५॥

येन चीर्णेन पापानां कोटिकोटि: प्रणश्यति।

चैत्रे माघे कार्त्तिके च पञ्चम्यामथवाऽऽरभेत्॥ ६॥

उस विधिका पालन करनेसे करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं। चैत्र, माघ तथा कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको कथा आरम्भ करनी चाहिये॥ ६॥

संकल्पं तु तत: कुर्यात् स्वस्तिवाचनपूर्वकम्।

अहोभिर्नवभि: श्राव्यं रामायणकथामृतम्॥ ७॥

पहले स्वस्तिवाचन करके फिर यह संकल्प करे कि ‘हम नौ दिनोंतक रामायणकी अमृतमयी कथा सुनेंगे’॥

अद्य प्रभृत्यहं राम शृणोमि त्वत्कथामृतम्।

प्रत्यहं पूर्णतामेतु तव राम प्रसादत:॥ ८॥

फिर भगवान्से प्रार्थना करे—‘श्रीराम! आजसे प्रतिदिन मैं आपकी अमृतमयी कथा सुनूँगा। यह आपके कृपाप्रसादसे परिपूर्ण हो’॥ ८॥

प्रत्यहं दन्तशुद्धिं च अपामार्गस्य शाखया।

कृत्वा स्नायीत विधिवद् रामभक्तिपरायण:॥ ९॥

नित्यप्रति अपामार्गकी शाखासे दन्तशुद्धि करके रामभक्तिमें तत्पर हो विधिपूर्वक स्नान करे॥ ९॥

स्वयं च बन्धुभि: सार्द्धं शृणुयात् प्रयतेन्द्रिय:।

स्नानं कृत्वा यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम्॥ १०॥

शुक्लाम्बरधर: शुद्धो गृहमागत्य वाग्यत:।

प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरेन्नारायणं प्रभुम्॥ ११॥

अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं कथा सुने। पहले अपने कुलाचारके अनुसार दन्तधावनपूर्वक स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करे और शुद्ध हो घर आकर मौनभावसे दोनों पैर धोनेके पश्चात् आचमन करके भगवान् नारायणका स्मरण करे॥ १०-११॥

नित्यं देवार्चनं कृत्वा पश्चात् संकल्पपूर्वकम्।

रामायणपुस्तकं च अर्चयेद् भक्तिभावत:॥ १२॥

फिर प्रतिदिन देवपूजन करके संकल्पपूर्वक भक्तिभावसे रामायणग्रन्थकी पूजा करे॥ १२॥

आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्पादिभिर्व्रती।

ॐ नमो नारायणायेति पूजयेद् भक्तितत्पर:॥ १३॥

व्रती पुरुष आवाहन, आसन, गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रसे भक्तिपरायण होकर पूजन करे॥ १३॥

एकवारं द्विवारं वा त्रिवारं वापि शक्तित:।

होमं कुर्यात् प्रयत्नेन सर्वपापनिवृत्तये॥ १४॥

सम्पूर्ण पापोंकी निवृत्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार एक, दो या तीन बार प्रयत्नपूर्वक होम करे॥

एवं य: प्रयत: कुर्याद् रामायणविधिं तथा।

स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५॥

इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह भगवान विष्णुके धाममें जाता है; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता॥ १५॥

रामायणव्रतधरो धर्मकारी च सत्तम:।

चाण्डालं पतितं वापि वस्त्रान्नेनापि नार्चयेत्॥ १६॥

जो रामायणसम्बन्धी व्रतको धारण करनेवाला तथा धर्मात्मा है, वह श्रेष्ठ पुरुष चाण्डाल अथवा पतित मनुष्यका वस्त्र और अन्नसे भी सत्कार न करे॥ १६॥

नास्तिकान् भिन्नमर्यादान् निन्दकान् पिशुनानपि।

रामायणव्रतपरो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ १७॥

जो नास्तिक, धर्ममर्यादाको तोड़नेवाले, परनिन्दक और चुगलखोर हैं, उनका रामायणव्रतधारी पुरुष वाणीमात्रसे भी आदर न करे॥ १७॥

कुण्डाशिनं गायकं च तथा देवलकाशनम्।

भिषजं काव्यकर्तारं देवद्विजविरोधिनम्॥ १८॥

परान्नलोलुपं चैव परस्त्रीनिरतं तथा।

रामायणव्रतपरो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ १९॥

जो पतिके जीवित रहते ही परपुरुषके समागमसे माताद्वारा उत्पन्न किया जाता है, उस जारज पुत्रको ‘कुण्ड’ कहते हैं। ऐसे कुण्डके यहाँ जो भोजन करता है, जो गीत गाकर जीविका चलाता है, देवतापर चढ़ी हुई वस्तुका उपभोग करेवाले मनुष्यका अन्न खाता है, वैद्य है, लोगोंकी मिथ्या प्रशंसामें कविता लिखता है, देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करता है, पराये अन्नका लोभी है और पर-स्त्रीमें आसक्त रहता है, ऐसे मनुष्यका भी रामायणव्रती पुरुष वाणीमात्रसे भी आदर न करे॥ १८-१९॥

इत्येवमादिभि: शुद्धो वशी सर्वहिते रत:।

रामायणपरो भूत्वा परां सिद्धिं गमिष्यति॥ २०॥

इस प्रकार दोषोंसे दूर एवं शुद्ध होकर जितेन्द्रिय एवं सबके हितमें तत्पर रहते हुए जो रामायणका आश्रय लेता है, वह परमसिद्धिको प्राप्त होता है॥ २०॥

नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु:।

नास्ति विष्णुसमो देवो नास्ति रामायणात् परम्॥ २१॥

गंगाके समान तीर्थ, माताके तुल्य गुरु, भगवान् विष्णुके सदृश देवता तथा रामायणसे बढ़कर कोई उत्तम वस्तु नहीं है॥ २१॥

नास्ति वेदसमं शास्त्रं नास्ति शान्तिसमं सुखम्।

नास्ति शान्तिपरं ज्योतिर्नास्ति रामायणात् परम्॥ २२॥

वेदके समान शास्त्र, शान्तिके समान सुख, शान्तिसे बढ़कर ज्योति तथा रामायणसे उत्कृष्ट कोई काव्य नहीं है॥

नास्ति क्षमासमं सारं नास्ति कीर्तिसमं धनम्।

नास्ति ज्ञानसमो लाभो नास्ति रामायणात् परम्॥ २३॥

क्षमाके सदृश बल, कीर्तिके समान धन, ज्ञानके सदृश लाभ तथा रामायणसे बढ़कर कोई उत्तम ग्रन्थ नहीं है॥ २३॥

तदन्ते वेदविदुषे गां दद्याच्च सदक्षिणाम्।

रामायणं पुस्तकं च वस्त्रालंकरणादिकम्॥ २४॥

रामायणकथाके अन्तमें वेदज्ञ वाचकको दक्षिणासहित गौका दान करे। उन्हें रामायणकी पुस्तक तथा वस्त्र और आभूषण आदि दे॥ २४॥

रामायणपुस्तकं यो वाचकाय प्रयच्छति।

स याति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति॥ २५॥

जो वाचकको रामायणकी पुस्तक देता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है; जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता॥ २५॥

नवाहजफलं कर्तु: शृणु धर्मविदां वर।

पञ्चम्यां तु समारभ्य रामायणकथामृतम्॥ २६॥

कथाश्रवणमात्रेण सर्वपापै: प्रमुच्यते।

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमार! रामायणकी नवाह कथा सुननेसे यजमानको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। पञ्चमी तिथिको रामायणकी अमृतमयी कथाको आरम्भ करके उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २६/

यदि द्वयं कृतं तस्य पुण्डरीकफलं लभेत्॥ २७॥

व्रतधारी तु श्रवणं य: कुर्यात् स जितेन्द्रिय:।

अश्वमेधस्य यज्ञस्य द्विगुणं फलमश्नुते॥ २८॥

चतु:कृत्व: श्रुतं येन कथितं मुनिसत्तमा:।

स लभेत् परमं पुण्यमग्निष्टोमाष्टसम्भवम्॥ २९॥

यदि दो बार यह कथा श्रवण की गयी तो श्रोताको पुण्डरीकयज्ञका फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष व्रतधारणपूर्वक रामायण-कथाको श्रवण करता है, वह दो अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है। मुनिवरो! जिसने चार बार इस कथाका श्रवण किया है, वह आठ अग्निष्टोमके परम पुण्यफलका भागी होता है॥ २७—२९॥

पञ्चकृत्वो व्रतमिदं कृतं येन महात्मना।

अत्यग्निष्टोमजं पुण्यं द्विगुणं प्राप्नुयान्नर:॥ ३०॥

जिस महामनस्वी पुरुषने पाँच बार रामायणकथा- श्रवणका व्रत पूरा कर लिया है, वह अत्यग्निष्टोमयज्ञके द्विगुण पुण्य-फलका भागी होता है॥ ३०॥

एवं व्रतं च षड्वारं कुर्याद् यस्तु समाहित:।

अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत्॥ ३१॥

जो एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार छ: बार रामायणकथाके व्रतका अनुष्ठान पूरा कर लेता है, वह अग्निष्टोमयज्ञके आठगुने फलका भागी होता है॥ ३१॥

नारी वा पुरुष: कुर्यादष्टकृत्वो मुनीश्वरा:।

नरमेधस्य यज्ञस्य फलं पञ्चगुणं लभेत्॥ ३२॥

मुनीश्वरो! स्त्री हो या पुरुष, जो आठ बार रामायणकथाको सुन लेता है, वह नरमेधयज्ञका पाँचगुना फल पाता है॥ ३२॥

नरो वाप्यथ नारी वा नववारं समाचरेत्।

गोमेधसवजं पुण्यं स लभेत् त्रिगुणं नर:॥ ३३॥

जो स्त्री या पुरुष नौ बार इस व्रतका आचरण करता है, उसे तीन गोमेध-यज्ञका पुण्यफल प्राप्त होता है॥

रामायणं तु य: कुर्याच्छान्तात्मा प्रयतेन्द्रिय:।

स याति परमानन्दं यत्र गत्वा न शोचति॥ ३४॥

जो पुरुष शान्तचित्त और जितेन्द्रिय होकर रामायणयज्ञका अनुष्ठान करता है, वह उस परमानन्दमय धाममें जाता है, जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता॥ ३४॥

रामायणपरो नित्यं गंगास्नानपरायण:।

धर्ममार्गप्रवक्तारो मुक्ता एवं न संशय:॥ ३५॥

जो प्रतिदिन रामायणका पाठ अथवा श्रवण करता है, गंगा नहाता है और धर्ममार्गका उपदेश देता है; ऐसे लोग संसारसागरसे मुक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है॥

यतीनां ब्रह्मचारिणां प्रवीराणां च सत्तमा:।

नवाह्ना किल श्रोतव्या कथा रामायणस्य च॥ ३६॥

महात्माओ! यतियों, ब्रह्मचारियों तथा प्रवीरोंको भी रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये॥ ३६॥

श्रुत्वा नरो रामकथामतिदीप्तोऽतिभक्तित:।

ब्रह्मण: पदमासाद्य तत्रैव परिमोदते॥ ३७॥

रामकथाको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य महान् तेजसे उद्दीप्त हो उठता है और ब्रह्मलोकमें जाकर वहीं आनन्दका अनुभव करता है॥ ३७॥

तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा रामायणकथामृतम्।

श्रोतृणां च परं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम्॥ ३८॥

इसलिये विप्रेन्द्रगण! आपलोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनिये। श्रोताओंके लिये यह सर्वोत्तम श्रवणीय वस्तु है और पवित्रोंमें भी परम उत्तम है॥ ३८॥

दु:स्वप्ननाशनं धन्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नत:।

नरोऽत्र श्रद्धया युक्त: श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च॥ ३९॥

पठते मुच्यते सद्यो ह्युपपातककोटिभि:।

सतामेव प्रयोक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतमं तु यत्॥ ४०॥

दु:स्वप्नको नष्ट करनेवाली यह कथा धन्य है। इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर इसका एक श्लोक या आधा श्लोक भी पढ़ता है, वह तत्काल ही करोड़ों उपपातकोंसे छुटकारा पा जाता है। यह गुह्यसे भी गुह्यतम वस्तु है, इसे सत्पुरुषोंको ही सुनाना चाहिये॥

वाचयेद् रामभवने पुण्यक्षेत्रे च संसदि।

ब्रह्मद्वेषरतानां च दम्भाचाररतात्मनाम्॥ ४१॥

लोकवञ्चकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम्।

भगवान् श्रीरामके मन्दिरमें अथवा किसी पुण्यक्षेत्रमें, सत्पुरुषोंकी सभामें रामायणकथाका प्रवचन करना चाहिये। जो ब्रह्मद्रोही, पाखण्डपूर्ण आचारमें तत्पर तथा लोगोंको ठगनेवाली वृत्तिसे युक्त हैं, उन्हें यह परम उत्तम कथा नहीं सुनानी चाहिये॥ ४१/

त्यक्तकामादिदोषाणां रामभक्तिरतात्मनाम्॥ ४२॥

गुरुभक्तिरतानां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम्।

जो काम आदि दोषोंका त्याग कर चुके हैं, जिनका मन रामभक्तिमें अनुरक्त रहता है तथा जो गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर हैं, उन्हींके समक्ष यह मोक्षकी साधनभूत कथा बाँचनी चाहिये॥ ४२/

सर्वदेवमयो राम: स्मृतश्चार्त्तिप्रणाशन:॥ ४३॥

सद्भक्तवत्सलो देवो भक्त्या तुष्यति नान्यथा।

श्रीराम सर्वदेवमय माने गये हैं। वे आर्त प्राणियोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं तथा श्रेष्ठ भक्तोंपर सदा ही स्नेह रखते हैं। वे भगवान् भक्तिसे ही संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपायसे नहीं॥ ४३/

अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते वा स्मृतेऽपि वा॥ ४४॥

विमुक्तपातक: सोऽपि परमं पदमश्नुते।

मनुष्य विवश होकर भी उनके नामका कीर्तन अथवा स्मरण कर लेनेपर समस्त पातकोंसे मुक्त हो परमपदका भागी होता है॥ ४४/

संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदन: ॥ ४५॥

स्मर्तृणां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमा:।

महात्माओ! भगवान् मधुसूदन संसाररूपी भयंकर एवं दुर्गम वनको भस्म करनेके लिये दावानलके समान हैं। वे अपना स्मरण करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंका शीघ्र ही नाश कर देते हैं॥ ४५/

तदर्थकमिदं पुण्यं काव्यं श्राव्यमनुत्तमम्॥ ४६॥

श्रवणात् पठनाद् वापि सर्वपापविनाशकृत्।

इस पवित्र काव्यके प्रतिपाद्य विषय वे ही हैं, अत: यह परम उत्तम काव्य सदा ही श्रवण करनेयोग्य है। इसका श्रवण अथवा पाठ करनेसे यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४६/

यस्य रामरसे प्रीतिर्वर्तते भक्तिसंयुता॥ ४७॥

स एव कृतकृत्यश्च सर्वशास्त्रार्थकोविद:।

जिसकी श्रीराम-रसमें प्रीति एवं भक्ति है, वही सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें निपुण और कृतकृत्य है॥

तदर्जितं तप: पुण्यं तत्सत्यं सफलं द्विजा:॥ ४८॥

यदर्थश्रवणे प्रीतिरन्यथा न हि वर्तते।

ब्राह्मणो! उसकी उपार्जित की हुई तपस्या पवित्र, सत्य और सफल है; क्योंकि राम-रसमें प्रीति हुए बिना रामायणके अर्थ-श्रवणमें प्रेम नहीं होता है॥ ४८/

रामायणपरा ये तु रामनामपरायणा:॥ ४९॥

त एव कृतकृत्याश्च घोरे कलियुगे द्विजा:।

जो द्विज इस भयंकर कलिकालमें रामायण तथा श्रीरामनामका सहारा लेते हैं, वे ही कृतकृत्य हैं॥ ४९/

नवाह्ना किल श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्॥ ५०॥

ते कृतज्ञा महात्मानस्तेभ्यो नित्यं नमो नम:।

रामायणकी इस अमृतमयी कथाका नवाह श्रवण करना चाहिये। जो महात्मा ऐसा करते हैं, वे कृतज्ञ हैं। उन्हें प्रतिदिन मेरा बारम्बार नमस्कार है॥ ५०/

रामनामैव नामैव नामैव मम जीवनम्॥ ५१॥

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।

श्रीरामका नाम—केवल श्रीराम-नाम ही मेरा जीवन है। कलियुगमें और किसी उपायसे जीवोंकी सद्गति नहीं होती, नहीं होती, नहीं होती॥ ५१/

सूत उवाच

एवं सनत्कुमारस्तु नारदेन महात्मना॥ ५२॥

सम्यक् प्रबोधित: सद्य: परां निर्वृतिमाप ह।

सूतजी कहते हैं—महात्मा नारदजीके द्वारा इस प्रकार ज्ञानोपदेश पाकर सनत्कुमारजीको तत्काल ही परमानन्दकी प्राप्ति हो गयी॥ ५२/

तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा रामायणकथामृतम्॥ ५३॥

नवाह्ना किल श्रोतव्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते।

अत: विप्रवरो! तुम सब लोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनो। रामायणको नौ दिनोंमें ही सुनना चाहिये। ऐसा करनेवाला समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३/

श्रुत्वा चैतन्महाकाव्यं वाचकं यस्तु पूजयेत्॥ ५४॥

तस्य विष्णु: प्रसन्न: स्यात् श्रिया सह द्विजोत्तमा:।

द्विजोत्तमो! इस महान् काव्यको सुनकर जो वाचककी पूजा करता है, उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं॥ ५४/

वाचके प्रीतिमापन्ने ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा:॥ ५५॥

प्रीता भवन्ति विप्रेन्द्रा नात्र कार्या विचारणा।

विप्रेन्द्रगण! वाचकके प्रसन्न होनेपर ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी प्रसन्न हो जाते हैं। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ५५/

रामायणवाचकाय गावो वासांसि काञ्चनम्॥ ५६॥

रामायणपुस्तकं च दद्याद् वित्तानुसारत:।

रामायणके वाचकको अपने वैभवके अनुसार गौ, वस्त्र, सुवर्ण तथा रामायणकी पुस्तक आदि वस्तुएँ देनी चाहिये॥ ५६/

तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुध्वं सुसमाहिता:॥ ५७॥

न बाधन्ते ग्रहास्तस्य भूतवेतालकादय:।

तस्यैव सर्वश्रेयांसि वर्द्धन्ते चरिते श्रुते॥ ५८॥

उस दानका पुण्यफल बता रहा हूँ, आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनें। उस दाताको ग्रह तथा भूत-वेताल आदि कभी बाधा नहीं पहुँचाते। श्रीरामचरित्रका श्रवण करनेपर श्रोताके सम्पूर्ण श्रेयकी वृद्धि होती है॥

न चाग्निर्बाधते तस्य न चौरादिभयं तथा।

एतज्जन्मार्जितै: पापै: सद्य एव विमुच्यते॥ ५९॥

सप्तवंशसमेतस्तु देहान्ते मोक्षमाप्नुयात्।

उसे न तो अग्निकी बाधा प्राप्त होती है और न चोर आदिका भय ही। वह इस जन्ममें उपार्जित किये हुए समस्त पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। वह इस शरीरका अन्त होनेपर अपनी सात पीढि़योंके साथ मोक्षका भागी होता है॥ ५९/

इत्येतद्व: समाख्यातं नारदेन प्रभाषितम्॥ ६०॥

सनत्कुमारमुनये पृच्छते भक्तित: पुरा।

पूर्वकालमें सनत्कुमार मुनिके भक्तिपूर्वक पूछनेपर नारदजीने उनसे जो कुछ कहा था, वह सब मैंने आपलोगोंको बता दिया॥ ६०/

रामायणमादिकाव्यं सर्ववेदार्थसम्मतम्॥ ६१॥

सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदु:खनिबर्हणम्।

समस्तपुण्यफलदं सर्वयज्ञफलप्रदम्॥ ६२॥

रामायण आदिकाव्य है। यह सम्पूर्ण वेदार्थोंकी सम्मतिके अनुकूल है। इसके द्वारा समस्त पापोंका निवारण हो जाता है। यह पुण्यमय काव्य सम्पूर्ण दु:खोंका विनाशक तथा समस्त पुण्यों और यज्ञोंका फल देनेवाला है॥ ६१-६२॥

ये पठन्त्यत्र विबुधा: श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च।

न तेषां पापबन्धस्तु कदाचिदपि जायते॥ ६३॥

जो विद्वान् इसके एक या आधे श्लोकका भी पाठ करते हैं, उन्हें कभी पापोंका बन्धन नहीं प्राप्त होता॥ ६३॥

रामार्पितमिदं पुण्यं काव्यं तु सर्वकामदम्।

भक्त्या शृण्वन्ति विदन्ति तेषां पुण्यफलं शृणु॥ ६४॥

श्रीरामको समर्पित किया हुआ यह पुण्यकाव्य सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। जो लोग भक्तिपूर्वक इसे सुनते और समझते हैं, उनको प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो॥ ६४॥

शतजन्मार्जितै: पापै: सद्य एव विमोचिता:।

सहस्रकुलसंयुक्तै: प्रयान्ति परमं पदम्॥ ६५॥

वे लोग सौ जन्मोंमें उपार्जित किये हुए पापोंसे तत्काल मुक्त हो अपनी हजारों पीढि़योंके साथ परमपदको प्राप्त होते हैं॥ ६५॥

किं तीर्थैर्गोप्रदानैर्वा किं तपोभि: किमध्वरै:।

अहन्यहनि रामस्य कीर्तनं परिशृण्वताम्॥ ६६॥

जो प्रतिदिन श्रीरामका कीर्तन सुनते हैं, उनके लिये तीर्थ-सेवन, गोदान, तपस्या तथा यज्ञोंकी क्या आवश्यकता है॥ ६६॥

चैत्रे माघे कार्तिके च रामायणकथामृतम्।

नवैरहोभि: श्रोतव्यं रामायणकथामृतम्॥ ६७॥

चैत्र, माघ तथा कार्तिकमें रामायणकी अमृतमयी कथाका नवाह-पारायण सुनना चाहिये॥ ६७॥

रामप्रसादजनकं रामभक्तिविवर्धनम्।

सर्वपापक्षयकरं सर्वसम्पद्विवर्द्धनम्॥ ६८॥

रामायण श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नता प्राप्त करानेवाला, श्रीरामभक्तिको बढ़ानेवाला, समस्त पापोंका विनाशक तथा सभी सम्पत्तियोंकी वृद्धि करनेवाला है॥ ६८॥

यस्त्वेतच्छृणुयाद् वापि पठेद् वा सुसमाहित:।

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ६९॥

जो एकाग्रचित्त होकर रामायणको सुनता अथवा पढ़ता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है॥ ६९॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे नारदसनत्कुमारसंवादे रामायणमाहात्म्ये
फलानुकीर्तनं नाम पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें श्रीनारद-सनत्कुमार-संवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यके
प्रसंगमें फलका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥

 

 



 

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

बालकाण्डम्

प्रथम: सर्ग:

नारदजीका वाल्मीकि मुनिको संक्षेपसे श्रीरामचरित्र सुनाना

ॐ तप:स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।

नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥ १॥

तपस्वी वाल्मीकिजीने तपस्या और स्वाध्यायमें लगे हुए विद्वानोंमें श्रेष्ठ मुनिवर नारदजीसे पूछा—॥ १॥

को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान्।

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रत:॥ २॥

‘[मुने!] इस समय इस संसारमें गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, उपकार माननेवाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है?॥ २॥

चारित्रेण च को युक्त: सर्वभूतेषु को हित:।

विद्वान् क: क: समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शन:॥ ३॥

‘सदाचारसे युक्त, समस्त प्राणियोंका हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन (सुन्दर) पुरुष कौन है?॥ ३॥

आत्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान् कोऽनसूयक:।

कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे॥ ४॥

‘मनपर अधिकार रखनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला, कान्तिमान् और किसीकी भी निन्दा नहीं करनेवाला कौन है? तथा संग्राममें कुपित होनेपर किससे देवता भी डरते हैं?॥ ४॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे।

महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम्॥ ५॥

‘महर्षे! मैं यह सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मुझे बड़ी उत्सुकता है और आप ऐसे पुरुषको जाननेमें समर्थ हैं’॥ ५॥

श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वच:।

श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत्॥ ६॥

महर्षि वाल्मीकिके इस वचनको सुनकर तीनों लोकोंका ज्ञान रखनेवाले नारदजीने उन्हें सम्बोधित करके कहा, अच्छा सुनिये और फिर प्रसन्नतापूर्वक बोले—॥ ६॥

बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणा:।

मुने वक्ष्याम्यहं बुद‍्ध्वा तैर्युक्त: श्रूयतां नर:॥ ७॥

‘मुने! आपने जिन बहुत-से दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, उनसे युक्त पुरुषको मैं विचार करके कहता हूँ, आप सुनें॥ ७॥

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनै: श्रुत:।

नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥ ८॥

‘इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगोंमें राम-नामसे विख्यात हैं, वे ही मनको वशमें रखनेवाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं॥ ८॥

बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हण:।

विपुलांसो महाबाहु: कम्बुग्रीवो महाहनु:॥ ९॥

‘वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रुसंहारक हैं। उनके कंधे मोटे और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। ग्रीवा शङ्खके समान और ठोढ़ी मांसल (पुष्ट) है॥

महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दम:।

आजानुबाहु: सुशिरा: सुललाट: सुविक्रम:॥ १०॥

‘उनकी छाती चौड़ी तथा धनुष बड़ा है, गलेके नीचेकी हड्डी (हँसली) मांससे छिपी हुई है। वे शत्रुओंका दमन करनेवाले हैं। भुजाएँ घुटनेतक लम्बी हैं, मस्तक सुन्दर है, ललाट भव्य और चाल मनोहर है॥ १०॥

सम: समविभक्तांग: स्निग्धवर्ण: प्रतापवान्।

पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षण:॥ ११॥

‘उनका शरीर [अधिक ऊँचा या नाटा न होकर] मध्यम और सुडौल है, देहका रंग चिकना है। वे बड़े प्रतापी हैं। उनका वक्ष:स्थल भरा हुआ है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे शोभायमान और शुभलक्षणोंसे सम्पन्न हैं॥ ११॥

धर्मज्ञ: सत्यसंधश्च प्रजानां च हिते रत:।

यशस्वी ज्ञानसम्पन्न: शुचिर्वश्य: समाधिमान्॥ १२॥

‘धर्मके ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजाके हित-साधनमें लगे रहनेवाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और मनको एकाग्र रखनेवाले हैं॥ १२॥

प्रजापतिसम: श्रीमान् धाता रिपुनिषूदन:।

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥ १३॥

‘प्रजापतिके समान पालक, श्रीसम्पन्न, वैरिविध्वंसक और जीवों तथा धर्मके रक्षक हैं॥ १३॥

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।

वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठित:॥ १४॥

‘स्वधर्म और स्वजनोंके पालक, वेद-वेदांगोंके तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेदमें प्रवीण हैं॥ १४॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ: स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।

सर्वलोकप्रिय: साधुरदीनात्मा विचक्षण:॥ १५॥

‘वे अखिल शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, स्मरणशक्तिसे युक्त और प्रतिभासम्पन्न हैं। अच्छे विचार और उदार हृदयवाले वे श्रीरामचन्द्रजी बातचीत करनेमें चतुर तथा समस्त लोकोंके प्रिय हैं॥ १५॥

सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।

आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥ १६॥

‘जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलती हैं, उसी प्रकार सदा रामसे साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सबमें समान भाव रखनेवाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है॥ १६॥

स च सर्वगुणोपेत: कौसल्यानन्दवर्धन:।

समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव॥ १७॥

‘सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त वे श्रीरामचन्द्रजी अपनी माता कौसल्याके आनन्द बढ़ानेवाले हैं, गम्भीरतामें समुद्र और धैर्यमें हिमालयके समान हैं॥ १७॥

विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शन:।

कालाग्निसदृश: क्रोधे क्षमया पृथिवीसम:॥ १८॥

धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापर:।

‘वे विष्णुभगवान्के समान बलवान् हैं। उनका दर्शन चन्द्रमाके समान मनोहर प्रतीत होता है। वे क्रोधमें कालाग्निके समान और क्षमामें पृथिवीके सदृश हैं, त्यागमें कुबेर और सत्यमें द्वितीय धर्मराजके समान हैं॥ १८/

तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम्॥ १९॥

ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथ: सुतम्।

प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया॥ २०॥

यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत् प्रीत्या महीपति:।

‘इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त और सत्यपराक्रमवाले सद्गुणशाली अपने प्रियतम ज्येष्ठ पुत्रको, जो प्रजाके हितमें संलग्न रहनेवाले थे, प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे राजा दशरथने प्रेमवश युवराजपदपर अभिषिक्त करना चाहा॥ १९-२०/

तस्याभिषेकसम्भारान् दृष्ट्वा भार्याथ कैकयी॥ २१॥

पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत।

विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम्॥ २२॥

‘तदनन्तर रामके राज्याभिषेककी तैयारियाँ देखकर रानी कैकेयीने, जिसे पहले ही वर दिया जा चुका था, राजासे यह वर माँगा कि रामका निर्वासन (वनवास) और भरतका राज्याभिषेक हो॥ २१-२२॥

स सत्यवचनाद् राजा धर्मपाशेन संयत:।

विवासयामास सुतं रामं दशरथ: प्रियम्॥ २३॥

‘राजा दशरथने सत्य वचनके कारण धर्म-बन्धनमें बँधकर प्यारे पुत्र रामको वनवास दे दिया॥ २३॥

स जगाम वनं वीर: प्रतिज्ञामनुपालयन्।

पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्या: प्रियकारणात्॥ २४॥

‘कैकेयीका प्रिय करनेके लिये पिताकी आज्ञाके अनुसार उनकी प्रतिज्ञाका पालन करते हुए वीर रामचन्द्र वनको चले॥ २४॥

तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह।

स्नेहाद् विनयसम्पन्न: सुमित्रानन्दवर्धन:॥ २५॥

भ्रातरं दयितो भ्रातु: सौभ्रात्रमनुदर्शयन्।

‘तब सुमित्राके आनन्द बढ़ानेवाले विनयशील लक्ष्मणजीने भी, जो अपने बड़े भाई रामको बहुत ही प्रिय थे, अपने सुबन्धुत्वका परिचय देते हुए स्नेहवश वनको जानेवाले बन्धुवर रामका अनुसरण किया॥ २५/

रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता॥ २६॥

जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता।

सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधू:॥ २७॥

सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा।

पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च॥ २८॥

‘और जनकके कुलमें उत्पन्न सीता भी, जो अवतीर्ण हुई देवमायाकी भाँति सुन्दरी, समस्त शुभलक्षणोंसे विभूषित, स्त्रियोंमें उत्तम, रामके प्राणोंके समान प्रियतमा पत्नी तथा सदा ही पतिका हित चाहनेवाली थी, रामचन्द्रजीके पीछे चली; जैसे चन्द्रमाके पीछे रोहिणी चलती है। उस समय पिता दशरथ [ने अपना सारथि भेजकर] और पुरवासी मनुष्योंने [स्वयं साथ जाकर] दूरतक उनका अनुसरण किया॥ २६—२८॥

शृंगवेरपुरे सूतं गंगाकूले व्यसर्जयत्।

गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम्॥ २९॥

‘फिर शृंगवेरपुरमें गंगा-तटपर अपने प्रिय निषादराज गुहके पास पहुँचकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने सारथिको [अयोध्याके लिये] विदा कर दिया॥ २९॥

गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया।

ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदका:॥ ३०॥

चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात्।

रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रय:॥ ३१॥

देवगन्धर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम्।

‘निषादराज गुह, लक्ष्मण और सीताके साथ राम—ये चारों एक वनसे दूसरे वनमें गये। मार्गमें बहुत जलोंवाली अनेकों नदियोंको पार करके [भरद्वाजके आश्रमपर पहुँचे और गुहको वहीं छोड़] भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे चित्रकूटपर्वतपर गये। वहाँ वे तीनों देवता और गन्धर्वोंके समान वनमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हुए एक रमणीय पर्णकुटी बनाकर उसमें सानन्द रहने लगे॥ ३०-३१/

चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा॥ ३२॥

राजा दशरथ: स्वर्गं जगाम विलपन् सुतम्।

‘रामके चित्रकूट चले जानेपर पुत्रशोकसे पीडित राजा दशरथ उस समय पुत्रके लिये [उसका नाम ले-लेकर] विलाप करते हुए स्वर्गगामी हुए॥ ३२/

गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजै:॥ ३३॥

नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद् राज्यं महाबल:।

स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादक:॥ ३४॥

‘उनके स्वर्गगमनके पश्चात् वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणोंद्वारा राज्यसंचालनके लिये नियुक्त किये जानेपर भी महाबलशाली वीर भरतने राज्यकी कामना न करके पूज्य रामको प्रसन्न करनेके लिये वनको ही प्रस्थान किया॥ ३३-३४॥

गत्वा तु स महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।

अयाचद् भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृत:॥ ३५॥

त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत्।

‘वहाँ पहुँचकर सद्भावनायुक्त भरतजीने अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी महात्मा रामसे याचना की और यों कहा—धर्मज्ञ! आप ही राजा हों’॥ ३५/

रामोऽपि परमोदार: सुमुख: सुमहायशा:॥ ३६॥

न चैच्छत् पितुरादेशाद् राज्यं रामो महाबल:।

पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुन: पुन:॥ ३७॥

निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रज:।

‘परंतु महान् यशस्वी परम उदार प्रसन्नमुख महाबली रामने भी पिताके आदेशका पालन करते हुए राज्यकी अभिलाषा न की और उन भरताग्रजने राज्यके लिये न्यास (चिह्न) रूपमें अपनी खड़ाऊँ भरतको देकर उन्हें बार-बार आग्रह करके लौटा दिया॥ ३६-३७/

स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन्॥ ३८॥

नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं रामागमनकांक्षया।

‘अपनी अपूर्ण इच्छाको लेकर ही भरतने रामके चरणोंका स्पर्श किया और रामके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए वे नन्दिग्राममें राज्य करने लगे॥ ३८/

गते तु भरते श्रीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रिय:॥ ३९॥

रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च।

तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान् प्रविवेश ह॥ ४०॥

‘भरतके लौट जानेपर सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय श्रीमान् रामने वहाँपर पुन: नागरिक जनोंका आना-जाना देखकर [उनसे बचनेके लिये] एकाग्रभावसे दण्डकारण्यमें प्रवेश किया॥ ३९-४०॥

प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचन:।

विराधं राक्षसं हत्वा शरभंगं ददर्श ह॥ ४१॥

सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा।

‘उस महान् वनमें पहुँचनेपर कमललोचन रामने विराध नामक राक्षसको मारकर शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य मुनि तथा अगस्त्यके भ्राताका दर्शन किया॥ ४१/

अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम्॥ ४२॥

खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ।

‘फिर अगस्त्य मुनिके कहनेसे उन्होंने ऐन्द्र धनुष, एक खड्ग और दो तूणीर, जिनमें बाण कभी नहीं घटते थे, प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किये॥ ४२/

वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरै: सह॥ ४३॥

ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधायासुररक्षसाम्।

‘एक दिन वनमें वनचरोंके साथ रहनेवाले श्रीरामके पास असुर तथा राक्षसोंके वधके लिये निवेदन करनेको वहाँके सभी ऋषि आये॥ ४३/

स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तदा वने॥ ४४॥

प्रतिज्ञातश्च रामेण वध: संयति रक्षसाम्।

ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥ ४५॥

‘उस समय वनमें श्रीरामने दण्डकारण्यवासी अग्निके समान तेजस्वी उन ऋषियोंको राक्षसोंके मारनेका वचन दिया और संग्राममें उनके वधकी प्रतिज्ञा की॥

तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी।

विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी॥ ४६॥

‘वहाँ ही रहते हुए श्रीरामने इच्छानुसार रूप बनानेवाली जनस्थाननिवासिनी शूर्पणखा नामकी राक्षसीको [लक्ष्मणके द्वारा उसकी नाक कटाकर] कुरूप कर दिया॥ ४६॥

तत: शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान् सर्वराक्षसान्।

खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम्॥ ४७॥

निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान्।

‘तब शूर्पणखाके कहनेसे चढ़ाई करनेवाले सभी राक्षसोंको और खर, दूषण, त्रिशिरा तथा उनके पृष्ठपोषक असुरोंको रामने युद्धमें मार डाला॥ ४७/

वने तस्मिन् निवसता जनस्थाननिवासिनाम्॥ ४८॥

रक्षसां निहतान्यासन् सहस्राणि चतुर्दश।

‘उस वनमें निवास करते हुए उन्होंने जनस्थानवासी चौदह हजार राक्षसोंका वध किया॥ ४८/

ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावण: क्रोधमूर्च्छित:॥ ४९॥

सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम्।

‘तदनन्तर अपने कुटुम्बका वध सुनकर रावण नामका राक्षस क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और उसने मारीच राक्षससे सहायता माँगी॥ ४९/

वार्यमाण: सुबहुशो मारीचेन स रावण:॥ ५०॥

न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते।

अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावण: कालचोदित:॥ ५१॥

जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा।

‘यद्यपि मारीचने यह कहकर कि ‘रावण! उस बलवान् रामके साथ तुम्हारा विरोध ठीक नहीं है’ रावणको अनेकों बार मना किया; परंतु कालकी प्रेरणासे रावणने मारीचके वाक्योंको टाल दिया और उसके साथ ही रामके आश्रमपर गया॥ ५०-५१/

तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ॥ ५२॥

जहार भार्यां रामस्य गृध्रं हत्वा जटायुषम्।

‘मायावी मारीचके द्वारा उसने दोनों राजकुमारोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और स्वयं रामकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया, [जाते समय मार्गमें विघ्न डालनेके कारण] उसने जटायु नामक गृध्रका वध किया॥ ५२/

गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम्॥ ५३॥

राघव: शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रिय:।

‘तत्पश्चात् जटायुको आहत देखकर और (उसीके मुखसे) सीताका हरण सुनकर रामचन्द्रजी शोकसे पीडि़त होकर विलाप करने लगे, उस समय उनकी सभी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं॥ ५३/

ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम्॥ ५४॥

मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं संददर्श ह।

कबन्धं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम्॥ ५५॥

तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च स:।

‘फिर उसी शोकमें पड़े हुए उन्होंने जटायु गृध्रका अग्निसंस्कार किया और वनमें सीताको ढूँढ़ते हुए कबन्ध नामक राक्षसको देखा, जो शरीरसे विकृत तथा भयंकर दीखनेवाला था। महाबाहु रामने उसे मारकर उसका भी दाह किया, अत: वह स्वर्गको चला गया॥

स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम्॥ ५६॥

श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव।

‘जाते समय उसने रामसे धर्मचारिणी शबरीका पता बतलाया और कहा—‘रघुनन्दन! आप धर्मपरायणा संन्यासिनी शबरीके आश्रमपर जाइये’॥ ५६/

सोऽभ्यगच्छन्महातेजा: शबरीं शत्रुसूदन:॥ ५७॥

शबर्या पूजित: सम्यग् रामो दशरथात्मज:।

‘शत्रुहन्ता महान् तेजस्वी दशरथकुमार राम शबरीके यहाँ गये, उसने इनका भलीभाँति पूजन किया॥ ५७/

पम्पातीरे हनुमता संगतो वानरेण ह॥ ५८॥

हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागत:।

‘फिर वे पम्पासरके तटपर हनुमान् नामक वानरसे मिले और उन्हींके कहनेसे सुग्रीवसे भी मेल किया॥

सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबल:॥ ५९॥

आदितस्तद् यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषत:।

‘तदनन्तर महाबलवान् रामने आदिसे ही लेकर जो कुछ हुआ था वह और विशेषत: सीताका वृत्तान्त सुग्रीवसे कह सुनाया॥ ५९/

सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानर:॥ ६०॥

चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्।

‘वानर सुग्रीवने रामकी सारी बातें सुनकर उनके साथ प्रेमपूर्वक अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की॥

ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति॥ ६१॥

रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद् दु:खितेन च।

‘उसके बाद वानरराज सुग्रीवने स्नेहवश वालीके साथ वैर होनेकी सारी बातें रामसे दु:खी होकर बतलायीं॥

प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति॥ ६२॥

वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानर:।

सुग्रीव: शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे॥ ६३॥

‘उस समय रामने वालीको मारनेकी प्रतिज्ञा की, तब वानर सुग्रीवने वहाँ वालीके बलका वर्णन किया; क्योंकि सुग्रीवको रामके बलके विषयमें बराबर शंका बनी रहती थी॥ ६२-६३॥

राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभे: कायमुत्तमम्।

दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसंनिभम्॥ ६४॥

‘रामकी प्रतीतिके लिये उन्होंने दुन्दुभि दैत्यका महान् पर्वतके समान विशाल शरीर दिखलाया॥ ६४॥

उत्स्मयित्वा महाबाहु: प्रेक्ष्य चास्थि महाबल:।

पादांगुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम्॥ ६५॥

‘महाबली महाबाहु श्रीरामने तनिक मुसकराकर उस अस्थिसमूहको देखा और पैरके अँगूठेसे उसे दस योजन दूर फेंक दिया॥ ६५॥

बिभेद च पुनस्तालान् सप्तैकेन महेषुणा।

गिरिं रसातलं चैव जनयन् प्रत्ययं तदा॥ ६६॥

‘फिर एक ही महान् बाणसे उन्होंने अपना विश्वास दिलाते हुए सात तालवृक्षोंको और पर्वत तथा रसातलको बींध डाला॥ ६६॥

तत: प्रीतमनास्तेन विश्वस्त: स महाकपि:।

किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा॥ ६७॥

‘तदनन्तर रामके इस कार्यसे महाकपि सुग्रीव मन-ही-मन प्रसन्न हुए और उन्हें रामपर विश्वास हो गया। फिर वे उनके साथ किष्किन्धा गुहामें गये॥ ६७॥

ततोऽगर्जद्धरिवर: सुग्रीवो हेमपिंगल:।

तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वर:॥ ६८॥

अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागत:।

निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघव:॥ ६९॥

‘वहाँपर सुवर्णके समान पिंगलवर्णवाले वीरवर सुग्रीवने गर्जना की, उस महानादको सुनकर वानरराज वाली अपनी पत्नी ताराको आश्वासन देकर तत्काल घरसे बाहर निकला और सुग्रीवसे भिड़ गया। वहाँ रामने वालीको एक ही बाणसे मार गिराया॥ ६८-६९॥

तत: सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे।

सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघव: प्रत्यपादयत्॥ ७०॥

‘सुग्रीवके कथनानुसार उस संग्राममें वालीको मारकर उसके राज्यपर रामने सुग्रीवको ही बिठा दिया॥

स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभ:।

दिश: प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम्॥ ७१॥

‘तब उन वानरराजने भी सभी वानरोंको बुलाकर जानकीका पता लगानेके लिये उन्हें चारों दिशाओंमें भेजा॥

ततो गृध्रस्य वचनात् सम्पातेर्हनुमान् बली।

शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम्॥ ७२॥

‘तत्पश्चात् सम्पाति नामक गृध्रके कहनेसे बलवान् हनुमान्जी सौ योजन विस्तारवाले क्षार समुद्रको कूदकर लाँघ गये॥ ७२॥

तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम्।

ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम्॥ ७३॥

‘वहाँ रावणपालित लङ्कापुरीमें पहुँचकर उन्होंने अशोकवाटिकामें सीताको चिन्तामग्न देखा॥ ७३॥

निवेदयित्वाभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च।

समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम्॥ ७४॥

‘तब उन विदेहनन्दिनीको अपनी पहचान देकर रामका संदेश सुनाया और उन्हें सान्त्वना देकर उन्होंने वाटिकाका द्वार तोड़ डाला॥ ७४॥

पञ्च सेनाग्रगान् हत्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि।

शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत्॥ ७५॥

‘फिर पाँच सेनापतियों और सात मन्त्रिकुमारोंकी हत्या कर वीर अक्षकुमारका भी कचूमर निकाला, इसके बाद वे [जान-बूझकर] पकड़े गये॥ ७५॥

अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद् वरात्।

मर्षयन् राक्षसान् वीरो यन्त्रिणस्तान् यदृच्छया॥ ७६॥

‘ब्रह्माजीके वरदानसे अपनेको ब्रह्मपाशसे छूटा हुआ जानकर भी वीर हनुमान् जी ने अपनेको बाँधनेवाले उन राक्षसोंका अपराध स्वेच्छानुसार सह लिया॥ ७६॥

ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम्।

रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपि:॥ ७७॥

‘तत्पश्चात् मिथिलेशकुमारी सीताके [स्थानके] अतिरिक्त समस्त लङ्काको जलाकर वे महाकपि हनुमान्जी रामको प्रिय संदेश सुनानेके लिये लंकासे लौट आये॥ ७७॥

सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम्।

न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वत:॥ ७८॥

‘अपरिमित बुद्धिशाली हनुमान् जी ने वहाँ जा महात्मा रामकी प्रदक्षिणा करके यों सत्य निवेदन किया—‘मैंने सीताजीका दर्शन किया है’॥ ७८॥

तत: सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधे:।

समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसंनिभै:॥ ७९॥

‘इसके अनन्तर सुग्रीवके साथ भगवान् रामने महासागरके तटपर जाकर सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंसे समुद्रको क्षुब्ध किया॥ ७९॥

दर्शयामास चात्मानं समुद्र: सरितां पति:।

समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत्॥ ८०॥

‘तब नदीपति समुद्रने अपनेको प्रकट कर दिया, फिर समुद्रके ही कहनेसे रामने नलसे पुल निर्माण कराया॥

तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे।

राम: सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत्॥ ८१॥

‘उसी पुलसे लङ्कापुरीमें जाकर रावणको मारा, फिर सीताके मिलनेपर रामको बड़ी लज्जा हुई॥ ८१॥

तामुवाच ततो राम: परुषं जनसंसदि।

अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती॥ ८२॥

‘तब भरी सभामें सीताके प्रति वे मर्मभेदी वचन कहने लगे। उनकी इस बातको न सह सकनेके कारण साध्वी सीता अग्निमें प्रवेश कर गयी॥ ८२॥

ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम्।

कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ८३॥

सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मन:।

‘इसके बाद अग्निके कहनेसे उन्होंने सीताको निष्कलङ्क माना। महात्मा रामचन्द्रजीके इस महान् कर्मसे देवता और ऋषियोंसहित चराचर त्रिभुवन संतुष्ट हो गया॥ ८३/

बभौ राम: सम्प्रहृष्ट: पूजित: सर्वदैवतै:॥ ८४॥

अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम्।

कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वर: प्रमुमोद ह॥ ८५॥

‘फिर सभी देवताओंसे पूजित होकर राम बहुत ही प्रसन्न हुए और राक्षसराज विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त करके कृतार्थ हो गये। उस समय निश्चिन्त होनेके कारण उनके आनन्दका ठिकाना न रहा॥ ८४-८५॥

देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान्।

अयोध्यां प्रस्थितो राम: पुष्पकेण सुहृद्वृत:॥ ८६॥

‘यह सब हो जानेपर राम देवताओंसे वर पाकर और मरे हुए वानरोंको जीवन दिलाकर अपने सभी साथियोंके साथ पुष्पकविमानपर चढ़कर अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए॥ ८६॥

भरद्वाजाश्रमं गत्वा राम: सत्यपराक्रम:।

भरतस्यान्तिके रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत्॥ ८७॥

‘भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर सबको आराम देनेवाले सत्यपराक्रमी रामने भरतके पास हनुमान्को भेजा॥ ८७॥

पुनराख्यायिकां जल्पन् सुग्रीवसहितस्तदा।

पुष्पकं तत् समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा॥ ८८॥

‘फिर सुग्रीवके साथ कथा-वार्ता कहते हुए पुष्पकारूढ़ हो वे नन्दिग्रामको गये॥ ८८॥

नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभि: सहितोऽनघ:।

राम: सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान्॥ ८९॥

‘निष्पाप रामचन्द्रजीने नन्दिग्राममें अपनी जटा कटाकर भाइयोंके साथ, सीताको पानेके अनन्तर, पुन: अपना राज्य प्राप्त किया है॥ ८९॥

प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्ट: पुष्ट: सुधार्मिक:।

निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जित:॥ ९०॥

‘अब रामके राज्यमें लोग प्रसन्न, सुखी, संतुष्ट, पुष्ट, धार्मिक तथा रोग-व्याधिसे मुक्त रहेंगे, उन्हें दुर्भिक्षका भय न होगा॥ ९०॥

न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति पुरुषा: क्वचित्।

नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रता:॥ ९१॥

‘कोई कहीं भी अपने पुत्रकी मृत्यु नहीं देखेंगे, स्त्रियाँ विधवा न होंगी, सदा ही पतिव्रता होंगी॥ ९१॥

न चाग्निजं भयं किंचिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तव:।

न वातजं भयं किंचिन्नापि ज्वरकृतं तथा॥ ९२॥

‘आग लगनेका किंचित् भी भय न होगा, कोई प्राणी जलमें नहीं डूबेंगे, वात और ज्वरका भय थोड़ा भी नहीं रहेगा॥ ९२॥

न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा।

नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च॥ ९३॥

नित्यं प्रमुदिता: सर्वे यथा कृतयुगे तथा।

‘क्षुधा तथा चोरीका डर भी जाता रहेगा, सभी नगर और राष्ट्र धन-धान्यसम्पन्न होंगे। सत्ययुगकी भाँति सभी लोग सदा प्रसन्न रहेंगे॥ ९३/

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकै:॥ ९४॥

गवां कोट्ययुतं दत्त्वा विद्वद्भ्यो विधिपूर्वकम्।

असंख्येयं धनं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा:॥ ९५॥

राजवंशान् शतगुणान् स्थापयिष्यति राघव:।

चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति॥ ९६॥

‘महायशस्वी राम बहुत-से सुवर्णोंकी दक्षिणावाले सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे, उनमें विधिपूर्वक विद्वानोंको दस हजार करोड़ (एक खरब) गौ और ब्राह्मणोंको अपरिमित धन देंगे तथा सौगुने राजवंशोंकी स्थापना करेंगे। संसारमें चारों वर्णोंको वे अपने-अपने धर्ममें नियुक्त रखेंगे॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।

रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति॥ ९७॥

‘फिर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करनेके अनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने परमधामको पधारेंगे॥ ९७॥

इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।

य: पठेद् रामचरितं सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ९८॥

‘वेदोंके समान पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय इस रामचरितको जो पढ़ेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा॥

एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नर:।

सपुत्रपौत्र: सगण: प्रेत्य स्वर्गे महीयते॥ ९९॥

‘आयु बढ़ानेवाली इस रामायण-कथाको पढ़नेवाला मनुष्य मृत्युके अनन्तर पुत्र, पौत्र तथा अन्य परिजनवर्गके साथ ही स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥ ९९॥

पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात्

स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्।

वणिग्जन: पण्यफलत्वमीया-

ज्जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात्॥ १००॥

‘इसे ब्राह्मण पढ़े तो विद्वान् हो, क्षत्रिय पढ़ता हो तो पृथ्वीका राज्य प्राप्त करे, वैश्यको व्यापारमें लाभ हो और शूद्र भी प्रतिष्ठा प्राप्त करे’॥ १००॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे प्रथम: सर्ग:॥ १॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १॥

 

द्वितीय: सर्ग:

रामायणकाव्यका उपक्रम—तमसाके तटपर क्रौञ्चवधसे संतप्त हुए महर्षि वाल्मीकिके शोकका श्लोक-रूपमें प्रकट होना तथा ब्रह्माजीका उन्हें रामचरित्रमय काव्यके निर्माणका आदेश देना

नारदस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारद:।

पूजयामास धर्मात्मा सहशिष्यो महामुनिम्॥ १॥

देवर्षि नारदजीके उपर्युक्त वचन सुनकर वाणीविशारद धर्मात्मा ऋषि वाल्मीकिजीने अपने शिष्योंसहित उन महामुनिका पूजन किया॥ १॥

यथावत् पूजितस्तेन देवर्षिर्नारदस्तथा।

आपृच्छ्येवाभ्यनुज्ञात: स जगाम विहायसम्॥ २॥

वाल्मीकिजीसे यथावत् सम्मानित हो देवर्षि नारदजीने जानेके लिये उनसे आज्ञा माँगी और उनसे अनुमति मिल जानेपर वे आकाशमार्गसे चले गये॥ २॥

स मुहूर्तं गते तस्मिन् देवलोकं मुनिस्तदा।

जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरत:॥ ३॥

उनके देवलोक पधारनेके दो ही घड़ी बाद वाल्मीकिजी तमसा नदीके तटपर गये, जो गंगाजीसे अधिक दूर नहीं था॥ ३॥

स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा।

शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम्॥ ४॥

तमसाके तटपर पहुँचकर वहाँके घाटको कीचड़से रहित देख मुनिने अपने पास खड़े हुए शिष्यसे कहा—॥ ४॥

अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।

रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा॥ ५॥

‘भरद्वाज! देखो, यहाँका घाट बड़ा सुन्दर है। इसमें कीचड़का नाम नहीं है। यहाँका जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुषका मन होता है॥ ५॥

न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम।

इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम्॥ ६॥

‘तात! यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल दो। मैं तमसाके इसी उत्तम तीर्थमें स्नान करूँगा’॥ ६॥

एवमुक्तो भरद्वाजो वाल्मीकेन महात्मना।

प्रायच्छत मुनेस्तस्य वल्कलं नियतो गुरो:॥ ७॥

महात्मा वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर नियम-परायण शिष्य भरद्वाजने अपने गुरु मुनिवर वाल्मीकिको वल्कलवस्त्र दिया॥ ७॥

स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रिय:।

विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम्॥ ८॥

शिष्यके हाथसे वल्कल लेकर वे जितेन्द्रिय मुनि वहाँके विशाल वनकी शोभा देखते हुए सब ओर विचरने लगे॥ ८॥

तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम्।

ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनि:स्वनम्॥ ९॥

उनके पास ही क्रौञ्च पक्षियोंका एक जोड़ा, जो कभी एक-दूसरेसे अलग नहीं होता था, विचर रहा था। वे दोनों पक्षी बड़ी मधुर बोली बोलते थे। भगवान् वाल्मीकिने पक्षियोंके उस जोड़ेको वहाँ देखा॥ ९॥

तस्मात् तु मिथुनादेकं पुमांसं पापनिश्चय:।

जघान वैरनिलयो निषादस्तस्य पश्यत:॥ १०॥

उसी समय पापपूर्ण विचार रखनेवाले एक निषादने, जो समस्त जन्तुओंका अकारण वैरी था, वहाँ आकर पक्षियोंके उस जोड़ेमेंसे एक—नर पक्षीको मुनिके देखते-देखते बाणसे मार डाला॥ १०॥

तं शोणितपरीतांगं चेष्टमानं महीतले।

भार्या तु निहतं दृष्ट्वा रुराव करुणां गिरम्॥ ११॥

वह पक्षी खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और पंख फड़फड़ाता हुआ तड़पने लगा। अपने पतिकी हत्या हुई देख उसकी भार्या क्रौञ्ची करुणाजनक स्वरमें चीत्कार कर उठी॥ ११॥

वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा।

ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्त्रिणा सहितेन वै॥ १२॥

उत्तम पंखोंसे युक्त वह पक्षी सदा अपनी भार्याके साथ-साथ विचरता था। उसके मस्तकका रंग ताँबेके समान लाल था और वह कामसे मतवाला हो गया था। ऐसे पतिसे वियुक्त होकर क्रौञ्ची बड़े दु:खसे रो रही थी॥ १२॥

तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम्।

ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समपद्यत॥ १३॥

निषादने जिसे मार गिराया था, उस नर पक्षीकी वह दुर्दशा देख उन धर्मात्मा ऋषिको बड़ी दया आयी॥ १३॥

तत: करुणवेदित्वादधर्मोऽयमिति द्विज:।

निशाम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १४॥

स्वभावत: करुणाका अनुभव करनेवाले ब्रह्मर्षिने ‘यह अधर्म हुआ है’ ऐसा निश्चय करके रोती हुई क्रौञ्चीकी ओर देखते हुए निषादसे इस प्रकार कहा—॥ १४॥

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।

यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥ १५॥

‘निषाद! तुझे नित्य-निरन्तर—कभी भी शान्ति न मिले; क्योंकि तूने इस क्रौञ्चके जोड़ेमेंसे एककी, जो कामसे मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराधके ही हत्या कर डाली’॥ १५॥

तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षत:।

शोकार्तेनास्य शकुने: किमिदं व्याहृतं मया॥ १६॥

ऐसा कहकर जब उन्होंने इसपर विचार किया, तब उनके मनमें यह चिन्ता हुई कि ‘अहो! इस पक्षीके शोकसे पीडि़त होकर मैंने यह क्या कह डाला’॥ १६॥

चिन्तयन् स महाप्राज्ञश्चकार मतिमान्मतिम्।

शिष्यं चैवाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुंगव:॥ १७॥

यही सोचते हुए महाज्ञानी और परम बुद्धिमान् मुनिवर वाल्मीकि एक निश्चयपर पहुँच गये और अपने शिष्यसे इस प्रकार बोले—॥ १७॥

पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वित: ।

शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा॥ १८॥

‘तात! शोकसे पीडि़त हुए मेरे मुखसे जो वाक्य निकल पड़ा है, यह चार चरणोंमें आबद्ध है। इसके प्रत्येक चरणमें बराबर-बराबर (यानी आठ-आठ) अक्षर हैं तथा इसे वीणाके लयपर गाया भी जा सकता है; अत: मेरा यह वचन श्लोकरूप (अर्थात् श्लोक नामक छन्दमें आबद्ध काव्यरूप या यश:स्वरूप) होना चाहिये, अन्यथा नहीं’॥

शिष्यस्तु तस्य ब्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम्।

प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनि:॥ १९॥

मुनिकी यह उत्तम बात सुनकर उनके शिष्य भरद्वाजको बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने उनका समर्थन करते हुए कहा—‘हाँ, आपका यह वाक्य श्लोकरूप ही होना चाहिये।’ शिष्यके इस कथनसे मुनिको विशेष संतोष हुआ॥ १९॥

सोऽभिषेकं तत: कृत्वा तीर्थे तस्मिन् यथाविधि।

तमेव चिन्तयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनि:॥ २०॥

तत्पश्चात् उन्होंने उत्तम तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान किया और उसी विषयका विचार करते हुए वे आश्रमकी ओर लौट पड़े॥ २०॥

भरद्वाजस्तत: शिष्यो विनीत: श्रुतवान् गुरो:।

कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतोऽनुजगाम ह॥ २१॥

फिर उनका विनीत एवं शास्त्रज्ञ शिष्य भरद्वाज भी वह जलसे भरा हुआ कलश लेकर गुरुजीके पीछे-पीछे चला॥ २१॥

स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित्।

उपविष्ट: कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थित:॥ २२॥

शिष्यके साथ आश्रममें पहुँचकर धर्मज्ञ ऋषि वाल्मीकिजी आसनपर बैठे और दूसरी-दूसरी बातें करने लगे; परंतु उनका ध्यान उस श्लोककी ओर ही लगा था॥ २२॥

आजगाम ततो ब्रह्मा लोककर्ता स्वयं प्रभु:।

चतुर्मुखो महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम्॥ २३॥

इतनेहीमें अखिल विश्वकी सृष्टि करनेवाले, सर्वसमर्थ, महातेजस्वी चतुर्मुख ब्रह्माजी मुनिवर वाल्मीकिसे मिलनेके लिये स्वयं उनके आश्रमपर आये॥ २३॥

वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यत:।

प्राञ्जलि: प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मित:॥ २४॥

उन्हें देखते ही महर्षि वाल्मीकि सहसा उठकर खड़े हो गये। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर अत्यन्त विस्मित हो हाथ जोड़े चुपचाप कुछ कालतक खड़े ही रह गये, कुछ बोल न सके॥ २४॥

पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनै:।

प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम्॥ २५॥

तत्पश्चात् उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आसन और स्तुति आदिके द्वारा भगवान् ब्रह्माजीका पूजन किया और उनके चरणोंमें विधिवत् प्रणाम करके उनसे कुशल-समाचार पूछा॥ २५॥

अथोपविश्य भगवानासने परमार्चिते।

वाल्मीकये च ऋषये संदिदेशासनं तत:॥ २६॥

भगवान् ब्रह्माने एक परम उत्तम आसनपर विराजमान होकर वाल्मीकि मुनिको भी आसन-ग्रहण करनेकी आज्ञा दी॥ २६॥

ब्रह्मणा समनुज्ञात: सोऽप्युपाविशदासने।

उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे॥ २७॥

तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थित:।

पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना॥ २८॥

यत् तादृशं चारुरवं क्रौञ्चं हन्यादकारणात्।

ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर वे भी आसनपर बैठे। उस समय साक्षात् लोकपितामह ब्रह्मा सामने बैठे हुए थे तो भी वाल्मीकिका मन उस क्रौञ्च पक्षीवाली घटनाकी ओर ही लगा रहा। वे उसीके विषयमें सोचने लगे—‘ओह! जिसकी बुद्धि वैरभावको ग्रहण करनेमें ही लगी रहती है, उस पापात्मा व्याधने बिना किसी अपराधके ही वैसे मनोहर कलरव करनेवाले क्रौञ्च पक्षीके प्राण ले लिये’॥ २७-२८/

शोचन्नेव पुन: क्रौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ॥ २९॥

पुनरन्तर्गतमना भूत्वा शोकपरायण:।

यही सोचते-सोचते उन्होंने क्रौञ्चीके आर्तनादको सुनकर निषादको लक्ष्य करके जो श्लोक कहा था, उसीको फिर ब्रह्माजीके सामने दुहराया। उसे दुहराते ही फिर उनके मनमें अपने दिये हुए शापके अनौचित्यका ध्यान आया। तब वे शोक और चिन्तामें डूब गये॥

तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम्॥ ३०॥

श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा।

मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती॥ ३१॥

ब्रह्माजी उनकी मन:स्थितिको समझकर हँसने लगे और मुनिवर वाल्मीकिसे इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मन्! तुम्हारे मुँहसे निकला हुआ यह छन्दोबद्ध वाक्य श्लोकरूप ही होगा। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे संकल्प अथवा प्रेरणासे ही तुम्हारे मुँहसे ऐसी वाणी निकली है॥ ३०-३१॥

रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम।

धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमत:॥ ३२॥

वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम्।

‘मुनिश्रेष्ठ! तुम श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करो। परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम संसारमें सबसे बड़े धर्मात्मा और धीर पुरुष हैं। तुमने नारदजीके मुँहसे जैसा सुना है, उसीके अनुसार उनके चरित्रका चित्रण करो॥ ३२/

रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमत:॥ ३३॥

रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वश:।

वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रह:॥ ३४॥

तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति।

‘बुद्धिमान् श्रीरामका जो गुप्त या प्रकट वृत्तान्त है तथा लक्ष्मण, सीता और राक्षसोंके जो सम्पूर्ण गुप्त या प्रकट चरित्र हैं, वे सब अज्ञात होनेपर भी तुम्हें ज्ञात हो जायँगे॥ ३३-३४/

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति॥ ३५॥

कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम्।

‘इस काव्यमें अंकित तुम्हारी कोई भी बात झूठी नहीं होगी; इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी परम पवित्र एवं मनोरम कथाको श्लोकबद्ध करके लिखो॥ ३५/

यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महीतले॥ ३६॥

तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति।

‘इस पृथ्वीपर जबतक नदियों और पर्वतोंकी सत्ता रहेगी, तबतक संसारमें रामायणकथाका प्रचार होता रहेगा॥ ३६/

यावद् रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति॥ ३७॥

तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मल्लोकेषु निवत्स्यसि।

‘जबतक तुम्हारी बनायी हुई श्रीरामकथाका लोकमें प्रचार रहेगा, तबतक तुम इच्छानुसार ऊपर-नीचे तथा मेरे लोकोंमें निवास करोगे’॥ ३७/

इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत।

तत: सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ॥ ३८॥

ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके वहीं अन्तर्धान होनेसे शिष्योंसहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा विस्मय हुआ॥ ३८॥

तस्य शिष्यास्तत: सर्वे जगु: श्लोकमिमं पुन:।

मुहुर्मुहु: प्रीयमाणा: प्राहुश्च भृशविस्मिता:॥ ३९॥

तदनन्तर उनके सभी शिष्य अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार इस श्लोकका गान करने लगे तथा परम विस्मित हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे—॥ ३९॥

समाक्षरैश्चतुर्भिर्य: पादैर्गीतो महर्षिणा।

सोऽनुव्याहरणाद् भूय: शोक: श्लोकत्वमागत:॥ ४०॥

‘हमारे गुरुदेव महर्षिने क्रौञ्च पक्षीके दु:खसे दु:खी होकर जिस समान अक्षरोंवाले चार चरणोंसे युक्त वाक्यका गान किया था, वह था तो उनके हृदयका शोक; किंतु उनकी वाणीद्वारा उच्चारित होकर श्लोकरूप* हो गया’॥ ४०॥

तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मन:।

कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशै: करवाण्यहम्॥ ४१॥

इधर शुद्ध अन्त:करणवाले महर्षि वाल्मीकिके मनमें यह विचार हुआ कि मैं ऐसे ही श्लोकोंमें सम्पूर्ण रामायणकाव्यकी रचना करूँ॥ ४१॥

उदारवृत्तार्थपदैर्मनोरमै-

स्तदास्य रामस्य चकार कीर्तिमान्।

समाक्षरै: श्लोकशतैर्यशस्विनो

यशस्करं काव्यमुदारदर्शन:॥ ४२॥

यह सोचकर उदार दृष्टिवाले उन यशस्वी महर्षिने भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रको लेकर हजारों श्लोकोंसे युक्त महाकाव्यकी रचना की, जो उनके यशको बढ़ानेवाला है। इसमें श्रीरामके उदार चरित्रोंका प्रतिपादन करनेवाले मनोहर पदोंका प्रयोग किया गया है॥ ४२॥

तदुपगतसमाससंधियोगं

सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् ।

रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं

दशशिरसश्च वधं निशामयध्वम्॥ ४३॥

महर्षि वाल्मीकिके बनाये हुए इस काव्यमें तत्पुरुष आदि समासों, दीर्घ-गुण आदि संधियों और प्रकृति-प्रत्ययके सम्बन्धका यथायोग्य निर्वाह हुआ है। इसकी रचनामें समता (पतत्-प्रकर्ष आदि दोषोंका अभाव) है, पदोंमें माधुर्य है और अर्थमें प्रसाद-गुणकी अधिकता है। भावुकजनो! इस प्रकार शास्त्रीय पद्धतिके अनुकूल बने हुए इस रघुवर-चरित्र और रावण-वधके प्रसंगको ध्यान देकर सुनो॥ ४३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥ २॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥

 

 

 

 

 

तृतीय: सर्ग:

वाल्मीकि मुनिद्वारा रामायणकाव्यमें निबद्ध विषयोंका संक्षेपसे उल्लेख

श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम्।

व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमत:॥ १॥

नारदजीके मुखसे धर्म, अर्थ एवं कामरूपी फलसे युक्त, हितकर (मोक्षदायक) तथा प्रकट और गुप्त—सम्पूर्ण रामचरित्रको, जो रामायण महाकाव्यकी प्रधान कथावस्तु था, सुनकर महर्षि वाल्मीकिजी बुद्धिमान् श्रीरामके उस जीवनवृत्तका पुन: भलीभाँति साक्षात्कार करनेके लिये प्रयत्न करने लगे॥ १॥

उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनि: स्थित्वा कृताञ्जलि:।

प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम्॥ २॥

वे पूर्वाग्र कुशोंके आसनपर बैठ गये और विधिवत् आचमन करके हाथ जोड़े हुए स्थिर भावसे स्थित हो योगधर्म (समाधि) के द्वारा श्रीराम आदिके चरित्रोंका अनुसंधान करने लगे॥ २॥

रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च।

सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वत:॥ ३॥

हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम्।

तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् सम्प्रपश्यति॥ ४॥

श्रीराम-लक्ष्मण-सीता तथा राज्य और रानियोंसहित राजा दशरथसे सम्बन्ध रखनेवाली जितनी बातें थीं—हँसना, बोलना, चलना और राज्यपालन आदि जितनी चेष्टाएँ हुईं—उन सबका महर्षिने अपने योगधर्मके बलसे भलीभाँति साक्षात्कार किया॥ ३-४॥

स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने।

सत्यसंधेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत॥ ५॥

सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें विचरते समय जो-जो लीलाएँ की थीं, वे सब उनकी दृष्टिमें आ गयीं॥ ५॥

तत: पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थित:।

पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा॥ ६॥

योगका आश्रय लेकर उन धर्मात्मा महर्षिने पूर्वकालमें जो-जो घटनाएँ घटित हुई थीं, उन सबको वहाँ हाथपर रखे हुए आँवलेकी तरह प्रत्यक्ष देखा॥ ६॥

तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामति:।

अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यत:॥ ७॥

सबके मनको प्रिय लगनेवाले भगवान् श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रोंका योगधर्म (समाधि) के द्वारा यथार्थरूपसे निरीक्षण करके महाबुद्धिमान् महर्षि वाल्मीकिने उन सबको महाकाव्यका रूप देनेकी चेष्टा की॥ ७॥

कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम्।

समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम्॥ ८॥

स यथा कथितं पूर्वं नारदेन महात्मना।

रघुवंशस्य चरितं चकार भगवान् मुनि:॥ ९॥

महात्मा नारदजीने पहले जैसा वर्णन किया था, उसीके क्रमसे भगवान् वाल्मीकि मुनिने रघुवंशविभूषण श्रीरामके चरित्रविषयक रामायण काव्यका निर्माण किया। जैसे समुद्र सब रत्नोंकी निधि है, उसी प्रकार यह महाकाव्य गुण, अलङ्कार एवं ध्वनि आदि रत्नोंका भण्डार है। इतना ही नहीं, यह सम्पूर्ण श्रुतियोंके सारभूत अर्थका प्रतिपादक होनेके कारण सबके कानोंको प्रिय लगनेवाला तथा सभीके चित्तको आकृष्ट करनेवाला है। यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूपी गुणों (फलों) से युक्त तथा इनका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन एवं दान करनेवाला है॥ ८-९॥

जन्म रामस्य सुमहद्वीर्यं सर्वानुकूलताम्।

लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम्॥ १०॥

श्रीरामके जन्म, उनके महान् पराक्रम, उनकी सर्वानुकूलता, लोकप्रियता, क्षमा, सौम्यभाव तथा सत्यशीलताका इस महाकाव्यमें महर्षिने वर्णन किया॥

नाना चित्रा: कथाश्चान्या विश्वामित्रसहायने।

जानक्याश्च विवाहं च धनुषश्च विभेदनम्॥ ११॥

विश्वामित्रजीके साथ श्रीराम-लक्ष्मणके जानेपर जो उनके द्वारा नाना प्रकारकी विचित्र लीलाएँ तथा अद्भुत बातें घटित हुईं, उन सबका इसमें महर्षिने वर्णन किया। श्रीरामद्वारा मिथिलामें धनुषके तोड़े जाने तथा जनकनन्दिनी सीता और उर्मिला आदिके विवाहका भी इसमें चित्रण किया॥ ११॥

रामरामविवादं च गुणान् दाशरथेस्तथा।

तथाभिषेकं रामस्य कैकेय्या दुष्टभावताम्॥ १२॥

विघातं चाभिषेकस्य रामस्य च विवासनम्।

राज्ञ: शोकं विलापं च परलोकस्य चाश्रयम्॥ १३॥

प्रकृतीनां विषादं च प्रकृतीनां विसर्जनम्।

निषादाधिपसंवादं सूतोपावर्तनं तथा॥ १४॥

श्रीराम-परशुराम-संवाद, दशरथनन्दन श्रीरामके गुण, उनके अभिषेक, कैकेयीकी दुष्टता, श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न, उनके वनवास, राजा दशरथके शोक-विलाप और परलोक-गमन, प्रजाओंके विषाद, साथ जानेवाली प्रजाओंको मार्गमें छोड़ने, निषादराज गुहके साथ बात करने तथा सूत सुमन्तको अयोध्या लौटाने आदिका भी इसमें उल्लेख किया॥

गंगायाश्चापि संतारं भरद्वाजस्य दर्शनम्।

भरद्वाजाभ्यनुज्ञानाच्चित्रकूटस्य दर्शनम्॥ १५॥

वास्तुकर्म निवेशं च भरतागमनं तथा।

प्रसादनं च रामस्य पितुश्च सलिलक्रियाम्॥ १६॥

पादुकाग्र्याभिषेकं च नन्दिग्रामनिवासनम्।

दण्डकारण्यगमनं विराधस्य वधं तथा॥ १७॥

दर्शनं शरभंगस्य सुतीक्ष्णेन समागमम्।

अनसूयासमाख्यां च अंगरागस्य चार्पणम्॥ १८॥

दर्शनं चाप्यगस्त्यस्य धनुषो ग्रहणं तथा।

शूर्पणख्याश्च संवादं विरूपकरणं तथा॥ १९॥

वधं खरत्रिशिरसोरुत्थानं रावणस्य च।

मारीचस्य वधं चैव वैदेह्या हरणं तथा॥ २०॥

राघवस्य विलापं च गृध्रराजनिबर्हणम्।

कबन्धदर्शनं चैव पम्पायाश्चापि दर्शनम्॥ २१॥

शबरीदर्शनं चैव फलमूलाशनं तथा।

प्रलापं चैव पम्पायां हनूमद्दर्शनं तथा॥ २२॥

ऋष्यमूकस्य गमनं सुग्रीवेण समागमम्।

प्रत्ययोत्पादनं सख्यं वालिसुग्रीवविग्रहम्॥ २३॥

वालिप्रमथनं चैव सुग्रीवप्रतिपादनम्।

ताराविलापं समयं वर्षरात्रनिवासनम्॥ २४॥

कोपं राघवसिंहस्य बलानामुपसंग्रहम्।

दिश: प्रस्थापनं चैव पृथिव्याश्च निवेदनम्॥ २५॥

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम्।

प्रायोपवेशनं चैव सम्पातेश्चापि दर्शनम्॥ २६॥

पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम्।

समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम्॥ २७॥

राक्षसीतर्जनं चैव च्छायाग्राहस्य दर्शनम्।

सिंहिकायाश्च निधनं लङ्कामलयदर्शनम्॥ २८॥

रात्रौ लङ्काप्रवेशं च एकस्यापि विचिन्तनम्।

आपानभूमिगमनमवरोधस्य दर्शनम्॥ २९॥

दर्शनं रावणस्यापि पुष्पकस्य च दर्शनम्।

अशोकवनिकायानं सीतायाश्चापि दर्शनम्॥ ३०॥

अभिज्ञानप्रदानं च सीतायाश्चापि भाषणम्।

राक्षसीतर्जनं चैव त्रिजटास्वप्नदर्शनम्॥ ३१॥

मणिप्रदानं सीताया वृक्षभंगं तथैव च।

राक्षसीविद्रवं चैव किंकराणां निबर्हणम्॥ ३२॥

ग्रहणं वायुसूनोश्च लङ्कादाहाभिगर्जनम्।

प्रतिप्लवनमेवाथ मधूनां हरणं तथा॥ ३३॥

राघवाश्वासनं चैव मणिनिर्यातनं तथा।

संगमं च समुद्रेण नलसेतोश्च बन्धनम्॥ ३४॥

प्रतारं च समुद्रस्य रात्रौ लङ्कावरोधनम्।

विभीषणेन संसर्गं वधोपायनिवेदनम्॥ ३५॥

कुम्भकर्णस्य निधनं मेघनादनिबर्हणम्।

रावणस्य विनाशं च सीतावाप्तिमरे: पुरे॥ ३६॥

विभीषणाभिषेकं च पुष्पकस्य च दर्शनम्।

अयोध्यायाश्च गमनं भरद्वाजसमागमम्॥ ३७॥

प्रेषणं वायुपुत्रस्य भरतेन समागमम्।

रामाभिषेकाभ्युदयं सर्वसैन्यविसर्जनम्।

स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम्॥ ३८॥

अनागतं च यत् किंचिद् रामस्य वसुधातले।

तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषि:॥ ३९॥

श्रीराम आदिका गंगाके पार जाना, भरद्वाज मुनिका दर्शन करना, भरद्वाज मुनिकी आज्ञा लेकर चित्रकूट जाना और वहाँकी नैसर्गिक शोभाका अवलोकन करना, चित्रकूटमें कुटिया बनाना, उसमें निवास करना, वहाँ भरतका श्रीरामसे मिलनेके लिये आना, उन्हें अयोध्या लौट चलनेके लिये प्रसन्न करना (मनाना), श्रीरामद्वारा पिताको जलाञ्जलि दान, भरतद्वारा अयोध्याके राजसिंहासनपर श्रीरामचन्द्रजीकी श्रेष्ठ पादुकाओंका अभिषेक एवं स्थापन, नन्दिग्राममें भरतका निवास, श्रीरामका दण्डकारण्यमें गमन, उनके द्वारा विराधका वध, शरभंगमुनिका दर्शन, सुतीक्ष्णके साथ समागम, अनसूयाके साथ सीतादेवीकी कुछ कालतक स्थिति, उनके द्वारा सीताको अंगराग-समर्पण, श्रीराम आदिके द्वारा अगस्त्यका दर्शन, उनके दिये हुए वैष्णव धनुषका ग्रहण, शूर्पणखाका संवाद, श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा उसका विरूपकरण (उसकी नाक और कानका छेदन), श्रीरामद्वारा खर-दूषण और त्रिशिराका वध, शूर्पणखाके उत्तेजित करनेसे रावणका श्रीरामसे बदला लेनेके लिये उठना, श्रीरामद्वारा मारीचका वध, रावणद्वारा विदेहनन्दिनी सीताका हरण, सीताके लिये श्रीरघुनाथजीका विलाप, रावणद्वारा गृध्रराज जटायुका वध, श्रीराम और लक्ष्मणकी कबन्धसे भेंट, उनके द्वारा पम्पासरोवरका अवलोकन, श्रीरामका शबरीसे मिलना और उसके दिये हुए फल-मूलको ग्रहण करना, श्रीरामका सीताके लिये प्रलाप, पम्पासरोवरके निकट हनुमान्‌जीसे भेंट, श्रीराम और लक्ष्मणका हनुमान्‌जीके साथ ऋष्यमूक पर्वतपर जाना, वहाँ सुग्रीवके साथ भेंट करना, उन्हें अपने बलका विश्वास दिलाना और उनसे मित्रता स्थापित करना, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामद्वारा वालीका विनाश, सुग्रीवको राज्य-समर्पण, अपने पति वालीके लिये ताराका विलाप, शरत्कालमें सीताकी खोज करानेके लिये सुग्रीवकी प्रतिज्ञा, श्रीरामका बरसातके दिनोंमें माल्यवान् पर्वतके प्रस्रवण नामक शिखरपर निवास, रघुकुलसिंह श्रीरामका सुग्रीवके प्रति क्रोध-प्रदर्शन, सुग्रीवद्वारा सीताकी खोजके लिये वानरसेनाका संग्रह, सुग्रीवका सम्पूर्ण दिशाओंमें वानरोंको भेजना और उन्हें पृथ्वीके द्वीप-समुद्र आदि विभागोंका परिचय देना, श्रीरामका सीताके विश्वासके लिये हनुमान्‌जीको अपनी अँगूठी देना, वानरोंको ऋक्ष-बिल (स्वयंप्रभा-गुफा) का दर्शन, उनका प्रायोपवेशन (प्राणत्यागके लिये अनशन), सम्पातीसे उनकी भेंट और बातचीत, समुद्रलङ्घनके लिये हनुमान्‌जीका महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना, समुद्रको लाँघना, समुद्रके कहनेसे ऊपर उठे हुए मैनाकका दर्शन करना, इनको राक्षसीका डाँटना, हनुमान्द्वारा छायाग्राहिणी सिंहिकाका दर्शन एवं निधन, लङ्काके आधारभूत पर्वत (त्रिकूट) का दर्शन, रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश, अकेला होनेके कारण अपने कर्तव्यका विचार करना, रावणके मद्यपान-स्थानमें जाना, उसके अन्त:पुरकी स्त्रियोंको देखना, हनुमान्‌जीका रावणको देखना, पुष्पकविमानका निरीक्षण करना, अशोकवाटिकामें जाना और सीताजीके दर्शन करना, पहचानके लिये सीताजीको अँगूठी देना और उनसे बातचीत करना, राक्षसियोंद्वारा सीताको डाँट-फटकार, त्रिजटाको श्रीरामके लिये शुभसूचक स्वप्नका दर्शन, सीताका हनुमान्‌जीको चूड़ामणि प्रदान करना, हनुमान्‌जीका अशोकवाटिकाके वृक्षोंको तोड़ना, राक्षसियोंका भागना, रावणके सेवकोंका हनुमान्‌जीके द्वारा संहार, वायुनन्दन हनुमान्‌का बन्दी होकर रावणकी सभामें जाना, उनके द्वारा गर्जन और लङ्काका दाह, फिर लौटती बार समुद्रको लाँघना, वानरोंका मधुवनमें आकर मधुपान करना, हनुमान्‌जीका श्रीरामचन्द्रजीको आश्वासन देना और सीताजीकी दी हुई चूड़ामणि समर्पित करना, सेनासहित सुग्रीवके साथ श्रीरामकी लङ्कायात्राके समय समुद्रसे भेंट, नलका समुद्रपर सेतु बाँधना, उसी सेतुके द्वारा वानरसेनाका समुद्रके पार जाना, रातको वानरोंका लङ्कापर चारों ओरसे घेरा डालना, विभीषणके साथ श्रीरामका मैत्री-सम्बन्ध होना, विभीषणका श्रीरामको रावणके वधका उपाय बताना, कुम्भकर्णका निधन, मेघनादका वध, रावणका विनाश, सीताकी प्राप्ति, शत्रुनगरी लङ्कामें विभीषणका अभिषेक, श्रीरामद्वारा पुष्पकविमानका अवलोकन, उसके द्वारा दल-बलसहित उनका अयोध्याके लिये प्रस्थान, श्रीरामका भरद्वाजमुनिसे मिलना, वायुपुत्र हनुमान्को दूत बनाकर भरतके पास भेजना तथा अयोध्यामें आकर भरतसे मिलना, श्रीरामके राज्याभिषेकका उत्सव, फिर श्रीरामका सारी वानरसेनाको विदा करना, अपने राष्ट्रकी प्रजाको प्रसन्न रखना तथा उनकी प्रसन्नताके लिये ही विदेहनन्दिनी सीताको वनमें त्याग देना इत्यादि वृत्तान्तोंको एवं इस पृथ्वीपर श्रीरामका जो कुछ भविष्य चरित्र था, उसको भी भगवान् वाल्मीकि मुनिने अपने उत्कृष्ट महाकाव्यमें अंकित किया॥ १५—३९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे तृतीय: सर्ग:॥ ३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३॥

 

चतुर्थ: सर्ग:

महर्षि वाल्मीकिका चौबीस हजार श्लोकोंसे युक्त रामायणकाव्यका निर्माण करके उसे लव-कुशको पढ़ाना, मुनिमण्डलीमें रामायणगान करके लव और कुशका प्रशंसित होना तथा अयोध्यामें श्रीरामद्वारा सम्मानित हो उन दोनोंका रामदरबारमें रामायणगान सुनाना

प्राप्तराजस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषि:।

चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीने जब वनसे लौटकर राज्यका शासन अपने हाथमें ले लिया, उसके बाद भगवान् वाल्मीकि मुनिने उनके सम्पूर्ण चरित्रके आधारपर विचित्र पद और अर्थसे युक्त रामायणकाव्यका निर्माण किया॥ १॥

चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषि:।

तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्॥ २॥

इसमें महर्षिने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग तथा उत्तरसहित सात काण्डोंका प्रतिपादन किया है॥ २॥

कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञ: सभविष्यं सहोत्तरम्।

चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभु:॥ ३॥

भविष्य तथा उत्तरकाण्डसहित समस्त रामायण पूर्ण कर लेनेके पश्चात् सामर्थ्यशाली, महाज्ञानी महर्षिने सोचा कि कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो इस महाकाव्यको पढ़कर जनसमुदायमें सुना सके॥ ३॥

तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मन:।

अगृह्णीतां तत: पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ॥ ४॥

शुद्ध अन्त:करणवाले उन महर्षिके इस प्रकार विचार करते ही मुनिवेषमें रहनेवाले राजकुमार कुश और लवने आकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ४॥

कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ।

भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ॥ ५॥

स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ।

वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभु:॥ ६॥

काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्।

पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रत:॥ ७॥

राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्मके ज्ञाता और यशस्वी थे। उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनिके आश्रमपर ही रहते थे। उनकी धारणाशक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदोंमें पारंगत हो चुके थे। भगवान् वाल्मीकिने उनकी ओर देखा और उन्हें सुयोग्य समझकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिने वेदार्थका विस्तारके साथ ज्ञान करानेके लिये उन्हें सीताके चरित्रसे युक्त सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्यका, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्यवध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया॥ ५—७॥

पाठ्ये गेये च मधुरं प्रमाणैस्त्रिभिरन्वितम्।

जातिभि: सप्तभिर्युक्तं तन्त्रीलयसमन्वितम्॥ ८॥

रसै: शृंगारकरुणहास्य रौद्रभयानकै:।

वीरादिभी रसैर्युक्तं काव्यमेतदगायताम्॥ ९॥

वह महाकाव्य पढ़ने और गानेमें भी मधुर, द्रुत, मध्य और विलम्बित—इन तीनों गतियोंसे अन्वित, षड्ज आदि सातों स्वरोंसे युक्त, वीणा बजाकर स्वर और तालके साथ गाने योग्य तथा शृंगार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक तथा वीर आदि सभी रसोंसे अनुप्राणित है। दोनों भाई कुश और लव उस महाकाव्यको पढ़कर उसका गान करने लगे॥ ८-९॥

तौ तु गान्धर्वतत्त्वज्ञौ स्थानमूर्च्छनकोविदौ।

भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ गन्धर्वाविव रूपिणौ॥ १०॥

वे दोनों भाई गान्धर्व विद्या (संगीत-शास्त्र) के तत्त्वज्ञ, स्थान23 और मूर्च्छनाके24 जानकार, मधुर स्वरसे सम्पन्न तथा गन्धर्वोंके समान मनोहर रूपवाले थे॥ १०॥

रूपलक्षणसम्पन्नौ मधुरस्वरभाषिणौ।

बिम्बादिवोत्थितौ बिम्बौ रामदेहात् तथापरौ॥ ११॥

सुन्दर रूप और शुभ लक्षण उनकी सहज सम्पत्ति थे। वे दोनों भाई बड़े मधुर स्वरसे वार्तालाप करते थे। जैसे बिम्बसे प्रतिबिम्ब प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्रीरामके शरीरसे उत्पन्न हुए वे दोनों राजकुमार दूसरे युगल श्रीराम ही प्रतीत होते थे॥ ११॥

तौ राजपुत्रौ कार्त्स्न्येन धर्म्यमाख्यानमुत्तमम्।

वाचोविधेयं तत्सर्वं कृत्वा काव्यमनिन्दितौ॥ १२॥

ऋषीणां च द्विजातीनां साधूनां च समागमे।

यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतु: सुसमाहितौ॥ १३॥

वे दोनों राजपुत्र सब लोगोंकी प्रशंसाके पात्र थे, उन्होंने उस धर्मानुकूल उत्तम उपाख्यानमय सम्पूर्ण काव्यको जिह्वाग्र कर लिया था और जब कभी ऋषियों, ब्राह्मणों तथा साधुओंका समागम होता था, उस समय उनके बीचमें बैठकर वे दोनों तत्त्वज्ञ बालक एकाग्रचित्त हो रामायणका गान किया करते थे॥ १२-१३॥

महात्मानौ महाभागौ सर्वलक्षणलक्षितौ।

तौ कदाचित् समेतानामृषीणां भावितात्मनाम्॥ १४॥

मध्ये सभं समीपस्थाविदं काव्यमगायताम्।

तच्छ्रुत्वा मुनय: सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणा:॥ १५॥

साधु साध्विति तावूचु: परं विस्मयमागता:।

ते प्रीतमनस: सर्वे मुनयो धर्मवत्सला:॥ १६॥

एक दिनकी बात है, बहुत-से शुद्ध अन्त:करणवाले महर्षियोंकी मण्डली एकत्र हुई थी। उसमें महान् सौभाग्यशाली तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित महामनस्वी कुश और लव भी उपस्थित थे। उन्होंने बीच सभामें उन महात्माओंके समीप बैठकर उस रामायणकाव्यका गान किया। उसे सुनकर सभी मुनियोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे अत्यन्त विस्मय-विमुग्ध होकर उन्हें साधुवाद देने लगे। मुनि धर्मवत्सल तो होते ही हैं; वह धार्मिक उपाख्यान सुनकर उन सबके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १४—१६॥

प्रशशंसु: प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ।

अहो गीतस्य माधुर्यं श्लोकानां च विशेषत:॥ १७॥

वे रामायण-कथाके गायक कुमार कुश और लवकी, जो प्रशंसाके ही योग्य थे, इस प्रकार प्रशंसा करने लगे—‘अहो! इन बालकोंके गीतमें कितना माधुर्य है। श्लोकोंकी मधुरता तो और भी अद्भुत है॥ १७॥

चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम्।

प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम्॥ १८॥

सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा।

‘यद्यपि इस काव्यमें वर्णित घटना बहुत दिनों पहले हो चुकी है तो भी इन दोनों बालकोंने इस सभामें प्रवेश करके एक साथ ऐसे सुन्दर भावसे स्वरसम्पन्न, रागयुक्त मधुरगान किया है कि वे पहलेकी घटनाएँ भी प्रत्यक्ष-सी दिखायी देने लगी हैं—मानो अभी-अभी आँखोंके सामने घटित हो रही हों’॥ १८/

एवं प्रशस्यमानौ तौ तप: श्लाघ्यैर्महर्षिभि:॥ १९॥

संरक्ततरमत्यर्थं मधुरं तावगायताम्।

इस प्रकार उत्तम तपस्यासे युक्त महर्षिगण उन दोनों कुमारोंकी प्रशंसा करते और वे उनसे प्रशंसित होकर अत्यन्त मधुर रागसे रामायणका गान करते थे॥

प्रीत: कश्चिन्मुनिस्ताभ्यां संस्थित: कलशं ददौ॥ २०॥

प्रसन्नो वल्कलं कश्चिद् ददौ ताभ्यां महायशा:।

अन्य: कृष्णाजिनमदाद् यज्ञसूत्रं तथापर:॥ २१॥

उनके गानसे संतुष्ट हुए किसी मुनिने उठकर उन्हें पुरस्कारके रूपमें एक कलश प्रदान किया। किसी दूसरे महायशस्वी महर्षिने प्रसन्न होकर उन दोनोंको वल्कल वस्त्र दिया। किसीने काला मृगचर्म भेंट किया तो किसीने यज्ञोपवीत॥ २०-२१॥

कश्चित् कमण्डलुं प्रादान्मौञ्जीमन्यो महामुनि:।

बृसीमन्यस्तदा प्रादात् कौपीनमपरो मुनि:॥ २२॥

ताभ्यां ददौ तदा हृष्ट: कुठारमपरो मुनि:।

काषायमपरो वस्त्रं चीरमन्यो ददौ मुनि:॥ २३॥

एकने कमण्डलु दिया तो दूसरे महामुनिने मुञ्जकी मेखला भेंट की। तीसरेने आसन और चौथेने कौपीन प्रदान किया। किसी अन्य मुनिने हर्षमें भरकर उन दोनों बालकोंके लिये कुठार अर्पित किया। किसीने गेरुआ वस्त्र दिया तो किसी मुनिने चीर भेंट किया॥ २२—२३॥

जटाबन्धनमन्यस्तु काष्ठरज्जुं मुदान्वित:।

यज्ञभाण्डमृषि: कश्चित् काष्ठभारं तथापर:॥ २४॥

औदुम्बरीं बृसीमन्य: स्वस्ति केचित् तदावदन्।

आयुष्यमपरे प्राहुर्मुदा तत्र महर्षय:॥ २५॥

ददुश्चैवं वरान् सर्वे मुनय: सत्यवादिन:।

किसी दूसरेने आनन्दमग्न होकर जटा बाँधनेके लिये रस्सी दी तो किसीने समिधा बाँधकर लानेके लिये डोरी प्रदान की। एक ऋषिने यज्ञपात्र दिया तो दूसरेने काष्ठभार समर्पित किया। किसीने गूलरकी लकड़ीका बना हुआ पीढ़ा अर्पित किया। कुछ लोग उस समय आशीर्वाद देने लगे—‘बच्चो! तुम दोनोंका कल्याण हो।’ दूसरे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक बोल उठे—‘तुम्हारी आयु बढ़े।’ इस प्रकार सभी सत्यवादी मुनियोंने उन दोनोंको नाना प्रकारके वर दिये॥ २४-२५/

आश्चर्यमिदमाख्यानं मुनिना सम्प्रकीर्तितम्॥ २६॥

परं कवीनामाधारं समाप्तं च यथाक्रमम्।

महर्षि वाल्मीकिद्वारा वर्णित यह आश्चर्यमय काव्य परवर्ती कवियोंके लिये श्रेष्ठ आधारशिला है। श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रोंका क्रमश: वर्णन करते हुए इसकी समाप्ति की गयी है॥ २६/

अभिगीतमिदं गीतं सर्वगीतिषु कोविदौ॥ २७॥

आयुष्यं पुष्टिजननं सर्वश्रुतिमनोहरम्।

सम्पूर्ण गीतोंके विशेषज्ञ राजकुमारो! यह काव्य आयु एवं पुष्टि प्रदान करनेवाला तथा सबके कान और मनको मोहनेवाला मधुर संगीत है। तुम दोनोंने बड़े सुन्दर ढंगसे इसका गान किया है॥ २७/

प्रशस्यमानौ सर्वत्र कदाचित् तत्र गायकौ॥ २८॥

रथ्यासु राजमार्गेषु ददर्श भरताग्रज:।

स्ववेश्म चानीय ततो भ्रातरौ स कुशीलवौ॥ २९॥

पूजयामास पूजार्हौ राम: शत्रुनिबर्हण:।

आसीन: काञ्चने दिव्ये स च सिंहासने प्रभु:॥ ३०॥

उपोपविष्टै: सचिवैर्भ्रातृभिश्च समन्वित:।

दृष्ट्वा तु रूपसम्पन्नौ विनीतौ भ्रातरावुभौ॥ ३१॥

उवाच लक्ष्मणं राम: शत्रुघ्नं भरतं तथा।

श्रूयतामेतदाख्यानमनयोर्देववर्चसो: ॥ ३२॥

विचित्रार्थपदं सम्यग्गायकौ समचोदयत्।

एक समय सर्वत्र प्रशंसित होनेवाले राजकुमार कुश और लव अयोध्याकी गलियों और सड़कोंपर रामायणके श्लोकोंका गान करते हुए विचर रहे थे। इसी समय उनके ऊपर भरतके बड़े भाई श्रीरामकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने उन समादरयोग्य बन्धुओंको अपने घर बुलाकर उनका यथोचित सम्मान किया। तदनन्तर शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीराम सुवर्णमय दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए। उनके मन्त्री और भाई भी उनके पास ही बैठे थे। उन सबके साथ सुन्दर रूपवाले उन दोनों विनयशील भाइयोंकी ओर देखकर श्रीरामचन्द्रजीने भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे कहा—‘ये देवताके समान तेजस्वी दोनों कुमार विचित्र अर्थ और पदोंसे युक्त मधुर काव्य बड़े सुन्दर ढंगसे गाकर सुनाते हैं। तुम सब लोग इसे सुनो।’ यों कहकर उन्होंने उन दोनों भाइयोंको गानेकी आज्ञा दी॥

तौ चापि मधुरं रक्तं स्वचित्तायतनि:स्वनम्॥ ३३॥

तन्त्रीलयवदत्यर्थं विश्रुतार्थमगायताम्।

ह्लादयत् सर्वगात्राणि मनांसि हृदयानि च।

श्रोत्राश्रयसुखं गेयं तद् बभौ जनसंसदि॥ ३४॥

आज्ञा पाकर वे दोनों भाई वीणाके लयके साथ अपने मनके अनुकूल तार (उच्च) एवं मधुर स्वरमें राग अलापते हुए रामायणकाव्यका गान करने लगे। उनका उच्चारण इतना स्पष्ट था कि सुनते ही अर्थका बोध हो जाता था। उनका गान सुनकर श्रोताओंके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया तथा उन सबके मन और आत्मामें आनन्दकी तरंगें उठने लगीं। उस जनसभामें होनेवाला वह गान सबकी श्रवणेन्द्रियोंको अत्यन्त सुखद प्रतीत होता था॥ ३३-३४॥

इमौ मुनी पार्थिवलक्षणान्वितौ

कुशीलवौ चैव महातपस्विनौ।

ममापि तद् भूतिकरं प्रचक्षते

महानुभावं चरितं निबोधत॥ ३५॥

उस समय श्रीरामने अपने भाइयोंका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा—‘ये दोनों कुमार मुनि होकर भी राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। संगीतमें कुशल होनेके साथ ही महान् तपस्वी हैं। ये जिस चरित्रका—प्रबन्धकाव्यका गान करते हैं, वह शब्दार्थालङ्कार, उत्तम गुण एवं सुन्दर रीति आदिसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त प्रभावशाली है। मेरे लिये भी अभ्युदयकारक है; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका कथन है। अत: तुम सब लोग ध्यान देकर इसे सुनो’॥ ३५॥

ततस्तु तौ रामवच:प्रचोदिता-

वगायतां मार्गविधानसम्पदा।

स चापि राम: परिषद्गत: शनै-

र्बुभूषयासक्तमना बभूव॥ ३६॥

तदनन्तर श्रीरामकी आज्ञासे प्रेरित हो वे दोनों भाई मार्गविधानकी25 रीतिसे रामायणका गान करने लगे। सभामें बैठे हुए भगवान् श्रीराम भी धीरे-धीरे उनका गान सुननेमें तन्मय हो गये॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्थ: सर्ग:॥ ४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४॥

 


पञ्चम: सर्ग:

राजा दशरथद्वारा सुरक्षित अयोध्यापुरीका वर्णन

सर्वा पूर्वमियं येषामासीत् कृत्स्ना वसुंधरा।

प्रजापतिमुपादाय नृपाणां जयशालिनाम्॥ १॥

येषां स सगरो नाम सागरो येन खानित:।

षष्टिपुत्रसहस्राणि यं यान्तं पर्यवारयन्॥ २॥

इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम्।

महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम्॥ ३॥

यह सारी पृथ्वी पूर्वकालमें प्रजापति मनुसे लेकर अबतक जिस वंशके विजयशाली नरेशोंके अधिकारमें रही है, जिन्होंने समुद्रको खुदवाया था और जिन्हें यात्राकालमें साठ हजार पुत्र घेरकर चलते थे, वे महाप्रतापी राजा सगर जिनके कुलमें उत्पन्न हुए, इन्हीं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओंकी कुलपरम्परामें रामायणनामसे प्रसिद्ध इस महान् ऐतिहासिक काव्यकी अवतारणा हुई है॥ १—३॥

तदिदं वर्तयिष्याव: सर्वं निखिलमादित:।

धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता॥ ४॥

हम दोनों आदिसे अन्ततक इस सारे काव्यका पूर्णरूपसे गान करेंगे। इसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है; अत: आपलोग दोषदृष्टिका परित्याग करके इसका श्रवण करें॥ ४॥

कोशलो नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान्।

निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्॥ ५॥

कोशल नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा जनपद है, जो सरयू नदीके किनारे बसा हुआ है। वह प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, सुखी और समृद्धिशाली है॥ ५॥

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता।

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्॥ ६॥

उसी जनपदमें अयोध्या नामकी एक नगरी है, जो समस्त लोकोंमें विख्यात है। उस पुरीको स्वयं महाराज मनुने बनवाया और बसाया था॥ ६॥

आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी।

श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा॥ ७॥

वह शोभाशालिनी महापुरी बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। वहाँ बाहरके जनपदोंमें जानेका जो विशाल राजमार्ग था, वह उभयपार्श्वमें विविध वृक्षावलियोंसे विभूषित होनेके कारण सुस्पष्टतया अन्य मार्गोंसे विभक्त जान पड़ता था॥ ७॥

राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता।

मुक्तपुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यश:॥ ८॥

सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ महान् राजमार्ग उस पुरीकी शोभा बढ़ा रहा था। उसपर खिले हुए फूल बिखेरे जाते थे तथा प्रतिदिन उसपर जलका छिड़काव होता था॥ ८॥

तां तु राजा दशरथो महाराष्ट्रविवर्धन:।

पुरीमावासयामास दिवि देवपतिर्यथा॥ ९॥

जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रने अमरावतीपुरी बसायी थी, उसी प्रकार धर्म और न्यायके बलसे अपने महान् राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने अयोध्यापुरीको पहलेकी अपेक्षा विशेषरूपसे बसाया था॥ ९॥

कपाटतोरणवतीं सुविभक्तान्तरापणाम्।

सर्वयन्त्रायुधवतीमुषितां सर्वशिल्पिभि:॥ १०॥

वह पुरी बड़े-बड़े फाटकों और किवाड़ोंसे सुशोभित थी। उसके भीतर पृथक्-पृथक् बाजारें थीं। वहाँ सब प्रकारके यन्त्र और अस्त्र-शस्त्र संचित थे। उस पुरीमें सभी कलाओंके शिल्पी निवास करते थे॥ १०॥

सूतमागधसम्बाधां श्रीमतीमतुलप्रभाम्।

उच्चाट्टालध्वजवतीं शतघ्नीशतसंकुलाम्॥ ११॥

स्तुति-पाठ करनेवाले सूत और वंशावलीका बखान करनेवाले मागध वहाँ भरे हुए थे। वह पुरी सुन्दर शोभासे सम्पन्न थी। उसकी सुषमाकी कहीं तुलना नहीं थी। वहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ थीं, जिनके ऊपर ध्वज फहराते थे। सैकड़ों शतघ्नियों (तोपों) से वह पुरी व्याप्त थी॥ ११॥

वधूनाटकसंघैश्च संयुक्तां सर्वत: पुरीम्।

उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्॥ १२॥

उस पुरीमें ऐसी बहुत-सी नाटक-मण्डलियाँ थीं, जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। उस नगरीमें चारों ओर उद्यान तथा आमोंके बगीचे थे। लम्बाई और चौड़ाईकी दृष्टिसे वह पुरी बहुत विशाल थी तथा साखूके वन उसे सब ओरसे घेरे हुए थे॥ १२॥

दुर्गगम्भीरपरिखां दुर्गामन्यैर्दुरासदाम्।

वाजिवारणसम्पूर्णां गोभिरुष्ट्रै: खरैस्तथा॥ १३॥

उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या जिसे लाँघना अत्यन्त कठिन था। वह नगरी दूसरोंके लिये सर्वथा दुर्गम एवं दुर्जय थी। घोड़े, हाथी, गाय-बैल, ऊँट तथा गदहे आदि उपयोगी पशुओंसे वह पुरी भरी-पूरी थी॥ १३॥

सामन्तराजसंघैश्च बलिकर्मभिरावृताम्।

नानादेशनिवासैश्च वणिग्भिरुपशोभिताम्॥ १४॥

कर देनेवाले सामन्त नरेशोंके समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे। विभिन्न देशोंके निवासी वैश्य उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे॥ १४॥

प्रासादै रत्नविकृतै: पर्वतैरिव शोभिताम्।

कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥ १५॥

वहाँके महलोंका निर्माण नाना प्रकारके रत्नोंसे हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्तगृहों अथवा स्त्रियोंके क्रीड़ाभवनों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीके समान जान पड़ती थी॥ १५॥

चित्रामष्टापदाकारां वरनारीगणायुताम्।

सर्वरत्नसमाकीर्णां विमानगृहशोभिताम्॥ १६॥

उसकी शोभा विचित्र थी। उसके महलोंपर सोनेका पानी चढ़ाया गया था (अथवा वह पुरी द्यूतफलकके26 आकारमें बसायी गयी थी)। श्रेष्ठ एवं सुन्दरी नारियोंके समूह उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। वह सब प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी तथा सतमहले प्रासादोंसे सुशोभित थी॥

गृहगाढामविच्छिद्रां समभूमौ निवेशिताम्।

शालितण्डुलसम्पूर्णामिक्षुकाण्डरसोदकाम् ॥ १७॥

पुरवासियोंके घरोंसे उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमिपर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धानके चावलोंसे भरपूर थी। वहाँका जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईखका रस हो॥

दुन्दुभीभिर्मृदंगैश्च वीणाभि: पणवैस्तथा।

नादितां भृशमत्यर्थं पृथिव्यां तामनुत्तमाम्॥ १८॥

भूमण्डलकी वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे अत्यन्त गूँजती रहती थी॥ १८॥

विमानमिव सिद्धानां तपसाधिगतं दिवि।

सुनिवेशितवेश्मान्तां नरोत्तमसमावृताम्॥ १९॥

देवलोकमें तपस्यासे प्राप्त हुए सिद्धोंके विमानकी भाँति उस पुरीका भूमण्डलमें सर्वोत्तम स्थान था। वहाँके सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंगसे बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरीमें निवास करते थे॥ १९॥

ये च बाणैर्न विध्यन्ति विविक्तमपरापरम्।

शब्दवेध्यं च विततं लघुहस्ता विशारदा:॥ २०॥

सिंहव्याघ्रवराहाणां मत्तानां नदतां वने।

हन्तारो निशितै: शस्त्रैर्बलाद् बाहुबलैरपि॥ २१॥

तादृशानां सहस्रैस्तामभिपूर्णां महारथै:।

पुरीमावासयामास राजा दशरथस्तदा॥ २२॥

जो अपने समूहसे बिछुड़कर असहाय हो गया हो, जिसके आगे-पीछे कोई न हो (अर्थात् जो पिता और पुत्र दोनोंसे हीन हो) तथा जो शब्दवेधी बाणद्वारा बेधने योग्य हों अथवा युद्धसे हारकर भागे जा रहे हों, ऐसे पुरुषोंपर जो लोग बाणोंका प्रहार नहीं करते, जिनके सधे-सधाये हाथ शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करनेमें समर्थ हैं, अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगमें कुशलता प्राप्त कर चुके हैं तथा जो वनमें गर्जते हुए मतवाले सिंहों, व्याघ्रों और सूअरोंको तीखे शस्त्रोंसे एवं भुजाओंके बलसे भी बलपूर्वक मार डालनेमें समर्थ हैं, ऐसे सहस्रों महारथी वीरोंसे अयोध्यापुरी भरी-पूरी थी। उसे महाराज दशरथने बसाया और पाला था॥ २०—२२॥

तामग्निमद्भिर्गुणवद्भिरावृतां

द्विजोत्तमैर्वेदषडंगपारगै: ।

सहस्रदै: सत्यरतैर्महात्मभि-

र्महर्षिकल्पैऋर्षिभिश्च केवलै:॥ २३॥

अग्निहोत्री, शम-दम आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न तथा छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण उस पुरीको सदा घेरे रहते थे। वे सहस्रोंका दान करनेवाले और सत्यमें तत्पर रहनेवाले थे। ऐसे महर्षिकल्प महात्माओं तथा ऋषियोंसे अयोध्यापुरी सुशोभित थी तथा राजा दशरथ उसकी रक्षा करते थे॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चम: सर्ग:॥ ५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५॥

 

षष्ठ: सर्ग:

राजा दशरथके शासनकालमें अयोध्या और वहाँके नागरिकोंकी उत्तम स्थितिका वर्णन

तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रह:।

दीर्घदर्शी महातेजा: पौरजानपदप्रिय:॥ १॥

इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी।

महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुत:॥ २॥

बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रिय:।

धनैश्च संचयैश्चान्यै: शक्रवैश्रवणोपम:॥ ३॥

यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता।

तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता॥ ४॥

उस अयोध्यापुरीमें रहकर राजा दशरथ प्रजावर्गका पालन करते थे। वे वेदोंके विद्वान् तथा सभी उपयोगी वस्तुओंका संग्रह करनेवाले थे। दूरदर्शी और महान् तेजस्वी थे। नगर और जनपदकी प्रजा उनसे बहुत प्रेम रखती थी। वे इक्ष्वाकुकुलके अतिरथी27 वीर थे। यज्ञ करनेवाले, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय थे। महर्षियोंके समान दिव्य गुणसम्पन्न राजर्षि थे। उनकी तीनों लोकोंमें ख्याति थी। वे बलवान्, शत्रुहीन, मित्रोंसे युक्त एवं इन्द्रियविजयी थे। धन और अन्य वस्तुओंके संचयकी दृष्टिसे इन्द्र और कुबेरके समान जान पड़ते थे। जैसे महातेजस्वी प्रजापति मनु सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते थे, उसी प्रकार महाराज दशरथ भी करते थे॥ १—४॥

तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता।

पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती॥ ५॥

धर्म, अर्थ और कामका सम्पादन करनेवाले कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए वे सत्यप्रतिज्ञ नरेश उस श्रेष्ठ अयोध्यापुरीका उसी तरह पालन करते थे, जैसे इन्द्र अमरावतीपुरीका॥ ५॥

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुता:।

नरास्तुष्टा धनै: स्वै: स्वैरलुब्धा: सत्यवादिन:॥ ६॥

उस उत्तम नगरमें निवास करनेवाले सभी मनुष्य प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत, निर्लोभ, सत्यवादी तथा अपने-अपने धनसे संतुष्ट रहनेवाले थे॥ ६॥

नाल्पसंनिचय: कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे।

कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान्॥ ७॥

उस श्रेष्ठ पुरीमें कोई भी ऐसा कुटुम्बी नहीं था, जिसके पास उत्कृष्ट वस्तुओंका संग्रह अधिक मात्रामें न हो, जिसके धर्म, अर्थ और काममय पुरुषार्थ सिद्ध न हो गये हों तथा जिसके पास गाय-बैल, घोड़े, धन-धान्य आदिका अभाव हो॥ ७॥

कामी वा न कदर्यो वा नृशंस: पुरुष: क्वचित्।

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिक:॥ ८॥

अयोध्यामें कहीं भी कोई कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख और नास्तिक मनुष्य देखनेको भी नहीं मिलता था॥ ८॥

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीला: सुसंयता:।

मुदिता: शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामला:॥ ९॥

वहाँके सभी स्त्री-पुरुष धर्मशील, संयमी, सदा प्रसन्न रहनेवाले तथा शील और सदाचारकी दृष्टिसे महर्षियोंकी भाँति निर्मल थे॥ ९॥

नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान्।

नामृष्टो न नलिप्तांगो नासुगन्धश्च विद्यते॥ १०॥

वहाँ कोई भी कुण्डल, मुकुट और पुष्पहारसे शून्य नहीं था। किसीके पास भोग-सामग्रीकी कमी नहीं थी। कोई भी ऐसा नहीं था, जो नहा-धोकर साफ-सुथरा न हो, जिसके अंगोंमें चन्दनका लेप न हुआ हो तथा जो सुगन्धसे वञ्चित हो॥ १०॥

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनंगदनिष्कधृक्।

नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान्॥ ११॥

अपवित्र अन्न भोजन करनेवाला, दान न देनेवाला तथा मनको काबूमें न रखनेवाला मनुष्य तो वहाँ कोई दिखायी ही नहीं देता था। कोई भी ऐसा पुरुष देखनेमें नहीं आता था, जो बाजूबन्द, निष्क (स्वर्णपदक या मोहर) तथा हाथका आभूषण (कड़ा आदि) धारण न किये हो॥ ११॥

नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्कर:।

कश्चिदासीदयोध्यायां न चावृत्तो न संकर:॥ १२॥

अयोध्यामें कोई भी ऐसा नहीं था, जो अग्निहोत्र और यज्ञ न करता हो; जो क्षुद्र, चोर, सदाचारशून्य अथवा वर्णसंकर हो॥ १२॥

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रिया:।

दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे॥ १३॥

वहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मण सदा अपने कर्मोंमें लगे रहते, इन्द्रियोंको वशमें रखते, दान और स्वाध्याय करते तथा प्रतिग्रहसे बचे रहते थे॥ १३॥

नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुत:।

नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित्॥ १४॥

वहाँ कहीं एक भी ऐसा द्विज नहीं था, जो नास्तिक, असत्यवादी, अनेक शास्त्रोंके ज्ञानसे रहित, दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला, साधनमें असमर्थ और विद्याहीन हो॥

नाषडंगविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रद:।

न दीन: क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन॥ १५॥

उस पुरीमें वेदके छहों अंगोंको न जाननेवाला, व्रतहीन, सहस्रोंसे कम दान देनेवाला, दीन, विक्षिप्त-चित्त अथवा दु:खी भी कोई नहीं था॥ १५॥

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान्।

द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान्॥ १६॥

अयोध्यामें कोई भी स्त्री या पुरुष ऐसा नहीं देखा जा सकता था, जो श्रीहीन, रूपरहित तथा राजभक्तिसे शून्य हो॥ १६॥

वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजका:।

कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुता:॥ १७॥

ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके लोग देवता और अतिथियोंके पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूरवीर और पराक्रमी थे॥ १७॥

दीर्घायुषो नरा: सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिता:।

सहिता: पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभि: पुरोत्तमे॥ १८॥

उस श्रेष्ठ नगरमें निवास करनेवाले सब मनुष्य दीर्घायु तथा धर्म और सत्यका आश्रय लेनेवाले थे। वे सदा स्त्री-पुत्र और पौत्र आदि परिवारके साथ सुखसे रहते थे॥ १८॥

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्या: क्षत्रमनुव्रता:।

शूद्रा: स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिण:॥ १९॥

क्षत्रिय ब्राह्मणोंका मुँह जोहते थे, वैश्य क्षत्रियोंकी आज्ञाका पालन करते थे और शूद्र अपने कर्तव्यका पालन करते हुए उपर्युक्त तीनों वर्णोंकी सेवामें संलग्न रहते थे॥ १९॥

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता।

यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता॥ २०॥

इक्ष्वाकुकुलके स्वामी राजा दशरथ अयोध्यापुरीकी रक्षा उसी प्रकार करते थे, जैसे बुद्धिमान् महाराज मनुने पूर्वकालमें उसकी रक्षा की थी॥ २०॥

योधानामग्निकल्पानां पेशलानाममर्षिणाम्।

सम्पूर्णा कृतविद्यानां गुहा केसरिणामिव॥ २१॥

शौर्यकी अधिकताके कारण अग्निके समान दुर्धर्ष, कुटिलतासे रहित, अपमानको सहन करनेमें असमर्थ तथा अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता योद्धाओंके समुदायसे वह पुरी उसी तरह भरी-पूरी रहती थी, जैसे पर्वतोंकी गुफा सिंहोंके समूहसे परिपूर्ण होती है॥ २१॥

काम्बोजविषये जातैर्बाह्लीकैश्च हयोत्तमै:।

वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णा हरिहयोत्तमै:॥ २२॥

काम्बोज और बाह्लीक देशमें उत्पन्न हुए उत्तम घोड़ोंसे, वनायु देशके अश्वोंसे तथा सिन्धुनदके निकट पैदा होनेवाले दरियाई घोड़ोंसे, जो इन्द्रके अश्व उच्चै:श्रवाके समान श्रेष्ठ थे, अयोध्यापुरी भरी रहती थी॥ २२॥

विन्ध्यपर्वतजैर्मत्तै: पूर्णा हैमवतैरपि।

मदान्वितैरतिबलैर्मातंगै: पर्वतोपमै:॥ २३॥

विन्ध्य और हिमालय पर्वतोंमें उत्पन्न होनेवाले अत्यन्त बलशाली पर्वताकार मदमत्त गजराजोंसे भी वह नगरी परिपूर्ण रहती थी॥ २३॥

ऐरावतकुलीनैश्च महापद्मकुलैस्तथा।

अञ्जनादपि निष्क्रान्तैर्वामनादपि च द्विपै:॥ २४॥

ऐरावतकुलमें उत्पन्न, महापद्मके वंशमें पैदा हुए तथा अञ्जन और वामन नामक दिग्गजोंसे भी प्रकट हुए हाथी उस पुरीकी पूर्णतामें सहायक हो रहे थे॥ २४॥

भद्रैर्मन्द्रैर्मृगैश्चैव भद्रमन्द्रमृगैस्तथा।

भद्रमन्द्रैर्भद्रमृगैर्मृगमन्द्रैश्च सा पुरी॥ २५॥

नित्यमत्तै: सदा पूर्णा नागैरचलसंनिभै:।

सा योजने द्वे च भूय: सत्यनामा प्रकाशते।

यस्यां दशरथो राजा वसञ्जगदपालयत्॥ २६॥

हिमालय पर्वतपर उत्पन्न भद्रजातिके, विन्ध्यपर्वतपर उत्पन्न हुए मन्द्रजातिके तथा सह्यपर्वतपर पैदा हुए मृग जातिके हाथी भी वहाँ मौजूद थे। भद्र, मन्द्र और मृग—इन तीनोंके मेलसे उत्पन्न हुए संकरजातिके, भद्र और मन्द्र—इन दो जातियोंके मेलसे पैदा हुए संकर जातिके, भद्र और मृग जातिके संयोगसे उत्पन्न संकरजातिके तथा मृग और मन्द्र—इन दो जातियोंके सम्मिश्रणसे पैदा हुए पर्वताकार गजराज भी, जो सदा मदोन्मत्त रहते थे, उस पुरीमें भरे हुए थे। (तीन योजनके विस्तारवाली अयोध्यामें) दो योजनकी भूमि तो ऐसी थी, जहाँ पहुँचकर किसीके लिये भी युद्ध करना असम्भव था, इसलिये वह पुरी ‘अयोध्या’ इस सत्य एवं सार्थक नामसे प्रकाशित होती थी; जिसमें रहते हुए राजा दशरथ इस जगत्का (अपने राज्यका) पालन करते थे॥ २५-२६॥

तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान्।

शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमा:॥ २७॥

जैसे चन्द्रमा नक्षत्रलोकका शासन करते हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी महाराज दशरथ अयोध्यापुरीका शासन करते थे। उन्होंने अपने समस्त शत्रुओंको नष्ट कर दिया था॥ २७॥

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलां

गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम्।

पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां

शशास वै शक्रसमो महीपति:॥ २८॥

जिसका अयोध्या नाम सत्य एवं सार्थक था, जिसके दरवाजे और अर्गला सुदृढ़ थे, जो विचित्र गृहोंसे सदा सुशोभित होती थी, सहस्रों मनुष्योंसे भरी हुई उस कल्याणमयी पुरीका इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा दशरथ न्यायपूर्वक शासन करते थे॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्ठ: सर्ग:॥ ६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥

 


सप्तम: सर्ग:

राजमन्त्रियोंके गुण और नीतिका वर्णन

तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाको: सुमहात्मन:।

मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रता:॥ १॥

अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विन:।

शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यश:॥ २॥

इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथके मन्त्रिजनोचित गुणोंसे सम्पन्न आठ मन्त्री थे, जो मन्त्रके तत्त्वको जाननेवाले और बाहरी चेष्टा देखकर ही मनके भावको समझ लेनेवाले थे। वे सदा ही राजाके प्रिय एवं हितमें लगे रहते थे। इसीलिये उनका यश बहुत फैला हुआ था। वे सभी शुद्ध आचार-विचारसे युक्त थे और राजकीय कार्योंमें निरन्तर संलग्न रहते थे॥ १-२॥

धृष्टिर्जयन्तो विजय: सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धन:।

अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्॥ ३॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र, जो अर्थशास्त्रके ज्ञाता थे॥ ३॥

ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ।

वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥ ४॥

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालि: काश्यपोऽप्यथ गौतम:।

मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विज:॥ ५॥

ऋषियोंमें श्रेष्ठतम वसिष्ठ और वामदेव—ये दो महर्षि राजाके माननीय ऋत्विज् (पुरोहित) थे। इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और विप्रवर कात्यायन भी महाराजके मन्त्री थे॥ ४-५॥

एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वका:।

विद्याविनीता हृमन्त: कुशला नियतेन्द्रिया:॥ ६॥

श्रीमन्तश्च महात्मान: शस्त्रज्ञा दृढविक्रमा:।

कीर्तिमन्त: प्रणिहिता यथावचनकारिण:॥ ७॥

तेज:क्षमायश:प्राप्ता: स्मितपूर्वाभिभाषिण:।

क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वच:॥ ८॥

इन ब्रह्मर्षियोंके साथ राजाके पूर्वपरम्परागत ऋत्विज् भी सदा मन्त्रीका कार्य करते थे। वे सब-के-सब विद्वान् होनेके कारण विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, श्रीसम्पन्न, महात्मा, शस्त्रविद्याके ज्ञाता, सुदृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, समस्त राजकार्योंमें सावधान, राजाकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेवाले, तेजस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान् तथा मुसकराकर बात करनेवाले थे। वे कभी काम, क्रोध या स्वार्थके वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलते थे॥ ६—८॥

तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा।

क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥ ९॥

अपने या शत्रुपक्षके राजाओंकी कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती थी। दूसरे राजा क्या करते हैं, क्या कर चुके हैं और क्या करना चाहते हैं—ये सभी बातें गुप्तचरोंद्वारा उन्हें मालूम रहती थीं॥ ९॥

कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिता:।

प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयु: सुतेष्वपि॥ १०॥

वे सभी व्यवहारकुशल थे। उनके सौहार्दकी अनेक अवसरोंपर परीक्षा ली जा चुकी थी। वे मौका पड़नेपर अपने पुत्रको भी उचित दण्ड देनेमें भी नहीं हिचकते थे॥ १०॥

कोशसंग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे।

अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥ ११॥

कोषके संचय तथा चतुरंगिणी सेनाके संग्रहमें सदा लगे रहते थे। शत्रुने भी यदि अपराध न किया हो तो वे उसकी हिंसा नहीं करते थे॥ ११॥

वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिता:।

शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥ १२॥

उन सबमें सदा शौर्य एवं उत्साह भरा रहता था। वे राजनीतिके अनुसार कार्य करते तथा अपने राज्यके भीतर रहनेवाले सत्पुरुषोंकी सदा रक्षा करते थे॥ १२॥

ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्।

सुतीक्ष्णदण्डा: सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥ १३॥

ब्राह्मणों और क्षत्रियोंको कष्ट न पहुँचाकर न्यायोचित धनसे राजाका खजाना भरते थे। वे अपराधी पुरुषके बलाबलको देखकर उसके प्रति तीक्ष्ण अथवा मृदु दण्डका प्रयोग करते थे॥ १३॥

शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां सम्प्रजानताम्।

नासीत्पुरे वा राष्ट्रे वा मृषावादी नर: क्वचित्॥ १४॥

क्वचिन्न दुष्टस्तत्रासीत् परदाररतिर्नर:।

प्रशान्तं सर्वमेवासीद् राष्ट्रं पुरवरं च तत्॥ १५॥

उन सबके भाव शुद्ध और विचार एक थे। उनकी जानकारीमें अयोध्यापुरी अथवा कोसलराज्यके भीतर कहीं एक भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो मिथ्यावादी, दुष्ट और परस्त्रीलम्पट हो। सम्पूर्ण राष्ट्र और नगरमें पूर्ण शान्ति छायी रहती थी॥ १४-१५॥

सुवासस: सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रता:।

हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥ १६॥

उन मन्त्रियोंके वस्त्र और वेष स्वच्छ एवं सुन्दर होते थे। वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा राजाके हितैषी थे। नीतिरूपी नेत्रोंसे देखते हुए सदा सजग रहते थे॥

गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमै:।

विदेशेष्वपि विज्ञाता: सर्वतो बुद्धिनिश्चया:॥ १७॥

अपने गुणोंके कारण वे सभी मन्त्री गुरुतुल्य समादरणीय राजाके अनुग्रहपात्र थे। अपने पराक्रमोंके कारण उनकी सर्वत्र ख्याति थी। विदेशोंमें भी सब लोग उन्हें जानते थे। वे सभी बातोंमें बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचते थे॥ १७॥

अभितो गुणवन्तश्च न चासन् गुणवर्जिता:।

संधिविग्रहतत्त्वज्ञा: प्रकृत्या सम्पदान्विता:॥ १८॥

समस्त देशों और कालोंमें वे गुणवान् ही सिद्ध होते थे, गुणहीन नहीं। संधि और विग्रहके उपयोग और अवसरका उन्हें अच्छी तरह ज्ञान था। वे स्वभावसे ही सम्पत्तिशाली (दैवी सम्पत्तिसे युक्त) थे॥ १८॥

मन्त्रसंवरणे शक्ता: शक्ता: सूक्ष्मासु बुद्धिषु।

नीतिशास्त्रविशेषज्ञा: सततं प्रियवादिन:॥ १९॥

उनमें राजकीय मन्त्रणाको गुप्त रखनेकी पूर्ण शक्ति थी। वे सूक्ष्मविषयका विचार करनेमें कुशल थे। नीतिशास्त्रमें उनकी विशेष जानकारी थी तथा वे सदा ही प्रिय लगनेवाली बात बोलते थे॥ १९॥

ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघ:।

उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद् वसुन्धराम्॥ २०॥

ऐसे गुणवान् मन्त्रियोंके साथ रहकर निष्पाप राजा दशरथ उस भूमण्डलका शासन करते थे॥ २०॥

अवेक्ष्यमाणश्चारेण प्रजा धर्मेण रक्षयन्।

प्रजानां पालनं कुर्वन्नधर्मं परिवर्जयन्॥ २१॥

वे गुप्तचरोंके द्वारा अपने और शत्रु-राज्यके वृत्तान्तोंपर दृष्टि रखते थे, प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते थे तथा प्रजापालन करते हुए अधर्मसे दूर ही रहते थे॥ २१॥

विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु वदान्य: सत्यसंगर:।

स तत्र पुरुषव्याघ्र: शशास पृथिवीमिमाम्॥ २२॥

उनकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि थी। वे उदार और सत्यप्रतिज्ञ थे। पुरुषसिंह राजा दशरथ अयोध्यामें ही रहकर इस पृथ्वीका शासन करते थे॥ २२॥

नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मन:।

मित्रवान्नतसामन्त: प्रतापहतकण्टक:।

स शशास जगद् राजा दिवि देवपतिर्यथा॥ २३॥

उन्हें कभी अपनेसे बड़ा अथवा अपने समान भी कोई शत्रु नहीं मिला। उनके मित्रोंकी संख्या बहुत थी। सभी सामन्त उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उनके प्रतापसे राज्यके सारे कण्टक (शत्रु एवं चोर आदि) नष्ट हो गये थे। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ अयोध्यामें रहकर सम्पूर्ण जगत्का शासन करते थे॥ २३॥

तैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रहिते निविष्टै-

र्वृतोऽनुरक्तै: कुशलै: समर्थै:।

स पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्त-

स्तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्क:॥ २४॥

उनके मन्त्री मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा राज्यके हित-साधनमें संलग्न रहते थे। वे राजाके प्रति अनुरक्त, कार्यकुशल और शक्तिशाली थे। जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणोंके साथ उदित होकर प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ उन तेजस्वी मन्त्रियोंसे घिरे रहकर बड़ी शोभा पाते थे॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तम: सर्ग:॥ ७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥


अष्टम: सर्ग:

राजाका पुत्रके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेका प्रस्ताव और मन्त्रियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा उनका अनुमोदन

तस्य चैवंप्रभावस्य धर्मज्ञस्य महात्मन:।

सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद् वंशकर: सुत:॥ १॥

सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले महात्मा राजा दशरथ ऐसे प्रभावशाली होते हुए भी पुत्रके लिये सदा चिन्तित रहते थे। उनके वंशको चलानेवाला कोई पुत्र नहीं था॥ १॥

चिन्तयानस्य तस्यैवं बुद्धिरासीन्महात्मन:।

सुतार्थं वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम्॥ २॥

उसके लिये चिन्ता करते-करते एक दिन उन महामनस्वी नरेशके मनमें यह विचार हुआ कि मैं पुत्रप्राप्तिके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान क्यों न करूँ?॥

स निश्चितां मतिं कृत्वा यष्टव्यमिति बुद्धिमान्।

मन्त्रिभि: सह धर्मात्मा सर्वैरपि कृतात्मभि:॥ ३॥

ततोऽब्रवीन्महातेजा: सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तम।

शीघ्रमानय मे सर्वान् गुरूंस्तान् सपुरोहितान्॥ ४॥

अपने समस्त शुद्ध बुद्धिवाले मन्त्रियोंके साथ परामर्शपूर्वक यज्ञ करनेका ही निश्चित विचार करके उन महातेजस्वी, बुद्धिमान् एवं धर्मात्मा राजाने सुमन्त्रसे कहा—‘मन्त्रिवर! तुम मेरे समस्त गुरुजनों एवं पुरोहितोंको यहाँ शीघ्र बुला ले आओ’॥ ३-४॥

तत: सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रम:।

समानयत् स तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान्॥ ५॥

तब शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले सुमन्त्र तुरंत जाकर उन समस्त वेदविद्याके पारंगत मुनियोंको वहाँ बुला लाये॥ ५॥

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम्।

पुरोहितं वसिष्ठं च ये चाप्यन्ये द्विजोत्तमा:॥ ६॥

तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा।

इदं धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥ ७॥

सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, कुलपुरोहित वसिष्ठ तथा और भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, उन सबकी पूजा करके धर्मात्मा राजा दशरथने धर्म और अर्थसे युक्त यह मधुर वचन कहा—॥ ६-७॥

मम लालप्यमानस्य सुतार्थं नास्ति वै सुखम्।

तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम॥ ८॥

‘महर्षियो! मैं सदा पुत्रके लिये विलाप करता रहता हूँ। उसके बिना इस राज्य आदिसे मुझे सुख नहीं मिलता; अत: मैंने यह निश्चय किया है कि मैं पुत्र-प्राप्तिके लिये अश्वमेधद्वारा भगवान्‌का यजन करूँ॥ ८॥

तदहं यष्टुमिच्छामि शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।

कथं प्राप्स्याम्यहं कामं बुद्धिरत्रविचिन्त्यताम्॥ ९॥

‘मेरी इच्छा है कि शास्त्रोक्त विधिसे इस यज्ञका अनुष्ठान करूँ; अत: किस प्रकार मुझे मेरी मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होगी? इसका विचार आपलोग यहाँ करें’॥ ९॥

तत: साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणा: प्रत्यपूजयन्।

वसिष्ठप्रमुखा: सर्वे पार्थिवस्य मुखेरितम्॥ १०॥

राजाके ऐसा कहनेपर वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनके मुखसे कहे गये पूर्वोक्त वचनकी प्रशंसा की॥ १०॥

ऊचुश्च परमप्रीता: सर्वे दशरथं वच:।

सम्भारा: सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्॥ ११॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रानभिप्रेतांश्च पार्थिव॥ १२॥

यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता।

फिर वे सभी अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा दशरथसे बोले—‘महाराज! यज्ञ-सामग्रीका संग्रह किया जाय। भूमण्डलमें भ्रमणके लिये यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय। तुम यज्ञद्वारा सर्वथा अपनी इच्छाके अनुरूप पुत्र प्राप्त कर लोगे; क्योंकि पुत्रके लिये तुम्हारे हृदयमें ऐसी धार्मिक बुद्धिका उदय हुआ है’॥ ११-१२/

ततस्तुष्टोऽभवद् राजा श्रुत्वैतद् द्विजभाषितम्॥ १३॥

अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षव्याकुललोचन:।

सम्भारा: सम्भ्रियन्तां मे गुरूणां वचनादिह॥ १४॥

समर्थाधिष्ठितश्चाश्व: सोपाध्यायो विमुच्यताम्।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्॥ १५॥

शान्तयश्चापि वर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि।

शक्य: प्राप्तुमयं यज्ञ: सर्वेणापि महीक्षिता॥ १६॥

नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे।

छिद्रं हि मृगयन्ते स्म विद्वांसो ब्रह्मराक्षसा:॥ १७॥

ब्राह्मणोंका यह कथन सुनकर राजा बहुत संतुष्ट हुए। हर्षसे उनके नेत्र चञ्चल हो उठे। वे अपने मन्त्रियोंसे बोले—‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार यज्ञकी सामग्री यहाँ एकत्र की जाय। शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें उपाध्यायसहित अश्वको छोड़ा जाय। सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो। शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमश: शान्तिकर्मका विस्तार किया जाय (जिससे विघ्नोंका निवारण हो)। यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं; परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि विद्वान् ब्रह्मराक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं॥ १३—१७॥

विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्य: कर्ता विनश्यति।

तद्यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते॥ १८॥

तथा विधानं क्रियतां समर्था: साधनेष्विति।

‘विधिहीन यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है; अत: मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पन्न हो सके, वैसा उपाय किया जाय। तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो’॥

तथेति चाब्रुवन् सर्वे मन्त्रिण: प्रतिपूजिता:॥ १९॥

पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथापूर्वं निशम्य ते।

राजाके द्वारा सम्मानित हुए समस्त मन्त्री पूर्ववत् उनके वचनोंको सुनकर बोले—‘बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा’॥ १९/

तथा द्विजास्ते धर्मज्ञा वर्धयन्तो नृपोत्तमम्॥ २०॥

अनुज्ञातास्तत: सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम्।

इसी प्रकार वे सभी धर्मज्ञ ब्राह्मण भी नृपश्रेष्ठ दशरथको बधाई देते हुए उनकी आज्ञा लेकर जैसे आये थे, वैसे ही फिर लौट गये॥ २०/

विसर्जयित्वा तान् विप्रान् सचिवानिदमब्रवीत्॥ २१॥

ऋत्विग्भिरुपसंदिष्टो यथावत् क्रतुराप्यताम्।

उन ब्राह्मणोंको विदा करके राजाने मन्त्रियोंसे कहा—‘पुरोहितोंके उपदेशके अनुसार इस यज्ञको विधिवत् पूर्ण करना चाहिये’॥ २१/

इत्युक्त्वा नृपशार्दूल: सचिवान् समुपस्थितान्॥ २२॥

विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामति:।

वहाँ उपस्थित हुए मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ दशरथ उन्हें विदा करके अपने महलमें चले गये॥ २२/

तत: स गत्वा ता: पत्नीर्नरेन्द्रो हृदयंगमा:॥ २३॥

उवाच दीक्षां विशत यक्ष्येऽहं सुतकारणात्।

वहाँ जाकर नरेशने अपनी प्यारी पत्नियोंसे कहा—‘देवियो! दीक्षा ग्रहण करो। मैं पुत्रके लिये यज्ञ करूँगा’॥ २३/

तासां तेनातिकान्तेन वचनेन सुवर्चसाम्।

मुखपद्मान्यशोभन्त पद्मानीव हिमात्यये॥ २४॥

उस मनोहर वचनसे उन सुन्दर कान्तिवाली रानियोंके मुखकमल वसन्तऋतुमें विकसित होनेवाले पङ्कजोंके समान खिल उठे और अत्यन्त शोभा पाने लगे॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टम: सर्ग:॥ ८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८॥

 

नवम: सर्ग:

सुमन्त्रका राजाको ऋष्यशृंग मुनिको बुलानेकी सलाह देते हुए उनके अंगदेशमें जाने और शान्तासे विवाह करनेका प्रसंग सुनाना

एतच्छ्रुत्वा रह: सूतो राजानमिदमब्रवीत्।

श्रूयतां तत् पुरावृत्तं पुराणे च मया श्रुतम्॥ १॥

पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञ करनेकी बात सुनकर सुमन्त्रने राजासे एकान्तमें कहा—‘महाराज! एक पुराना इतिहास सुनिये। मैंने पुराणमें भी इसका वर्णन सुना है॥

ऋत्विग्भिरुपदिष्टोऽयं पुरावृत्तो मया श्रुत:।

सनत्कुमारो भगवान् पूर्वं कथितवान् कथाम्॥ २॥

ऋषीणां संनिधौ राजंस्तव पुत्रागमं प्रति।

‘ऋत्विजोंने पुत्र-प्राप्तिके लिये इस अश्वमेधरूप उपायका उपदेश किया है; परंतु मैंने इतिहासके रूपमें कुछ विशेष बात सुनी है। राजन्! पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने ऋषियोंके निकट एक कथा सुनायी थी। वह आपकी पुत्रप्राप्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली है॥ २/

काश्यपस्य च पुत्रोऽस्ति विभाण्डक इति श्रुत:॥ ३॥

ऋष्यशृंग इति ख्यातस्तस्य पुत्रो भविष्यति।

स वने नित्यसंवृद्धो मुनिर्वनचर: सदा॥ ४॥

‘उन्होंने कहा था, मुनिवरो! महर्षि काश्यपके विभाण्डक नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हैं। उनके भी एक पुत्र होगा, जिसकी लोगोंमें ऋष्यशृंग नामसे प्रसिद्धि होगी। वे ऋष्यशृंग मुनि सदा वनमें ही रहेंगे और वनमें ही सदा लालन-पालन पाकर वे बड़े होंगे॥ ३-४॥

नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात्।

द्वैविध्यं ब्रह्मचर्यस्य भविष्यति महात्मन:॥ ५॥

लोकेषु प्रथितं राजन् विप्रैश्च कथितं सदा।

‘सदा पिताके ही साथ रहनेके कारण विप्रवर ऋष्यशृंग दूसरे किसीको नहीं जानेंगे। राजन्! लोकमें ब्रह्मचर्यके दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणोंने सदा उन दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया है। एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकालमें पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य। उन महात्माके द्वारा उक्त दोनों प्रकारके ब्रह्मचर्योंका पालन होगा॥ ५/

तस्यैवं वर्तमानस्य काल: समभिवर्तत॥ ६॥

अग्निं शुश्रूषमाणस्य पितरं च यशस्विनम्।

‘‘इस प्रकार रहते हुए मुनिका समय अग्नि तथा यशस्वी पिताकी सेवामें ही व्यतीत होगा॥ ६/

एतस्मिन्नेव काले तु रोमपाद: प्रतापवान्॥ ७॥

अंगेषु प्रथितो राजा भविष्यति महाबल:।

तस्य व्यतिक्रमाद् राज्ञो भविष्यति सुदारुणा॥ ८॥

अनावृष्टि: सुघोरा वै सर्वलोकभयावहा।

‘‘उसी समय अंगदेशमें रोमपाद नामक एक बड़े प्रतापी और बलवान् राजा होंगे; उनके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जानेके कारण उस देशमें घोर अनावृष्टि हो जायगी, जो सब लोगोंको अत्यन्त भयभीत कर देगी॥

अनावृष्ट्यां तु वृत्तायां राजा दु:खसमन्वित:॥ ९॥

ब्राह्मणाञ्छ्रुतसंवृद्धान् समानीय प्रवक्ष्यति।

भवन्त: श्रुतकर्माणो लोकचारित्रवेदिन:॥ १०॥

समादिशन्तु नियमं प्रायश्चित्तं यथा भवेत्।

‘‘वर्षा बंद हो जानेसे राजा रोमपादको भी बहुत दु:ख होगा। वे शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंको बुलाकर कहेंगे—‘विप्रवरो! आपलोग वेद-शास्त्रके अनुसार कर्म करनेवाले तथा लोगोंके आचार-विचारको जाननेवाले हैं; अत: कृपा करके मुझे ऐसा कोई नियम बताइये, जिससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जाय’॥ ९-१०/

इत्युक्तास्ते ततो राज्ञा सर्वे ब्राह्मणसत्तमा:॥ ११॥

वक्ष्यन्ति ते महीपालं ब्राह्मणा वेदपारगा:।

‘‘राजाके ऐसा कहनेपर वे वेदोंके पारंगत विद्वान्—सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें इस प्रकार सलाह देंगे—॥

विभाण्डकसुतं राजन् सर्वोपायैरिहानय॥ १२॥

आनाय्य तु महीपाल ऋष्यशृंगं सुसत्कृतम्।

विभाण्डकसुतं राजन् ब्राह्मणं वेदपारगम्।

प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहित:॥ १३॥

‘राजन्! विभाण्डकके पुत्र ऋष्यशृंग वेदोंके पारगामी विद्वान् हैं। भूपाल! आप सभी उपायोंसे उन्हें यहाँ ले आइये। बुलाकर उनका भलीभाँति सत्कार कीजिये। फिर एकाग्रचित्त हो वैदिक विधिके अनुसार उनके साथ अपनी कन्या शान्ताका विवाह कर दीजिये’॥ १२-१३॥

तेषां तु वचनं श्रुत्वा राजा चिन्तां प्रपत्स्यते।

केनोपायेन वै शक्यमिहानेतुं स वीर्यवान्॥ १४॥

उनकी बात सुनकर राजा इस चिन्तामें पड़ जायँगे कि किस उपायसे उन शक्तिशाली महर्षिको यहाँ लाया जा सकता है॥ १४॥

ततो राजा विनिश्चित्य सह मन्त्रिभिरात्मवान्।

पुरोहितममात्यांश्च प्रेषयिष्यति सत्कृतान्॥ १५॥

‘‘फिर वे मनस्वी नरेश मन्त्रियोंके साथ निश्चय करके अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको सत्कारपूर्वक वहाँ भेजेंगे॥ १५॥

ते तु राज्ञो वच: श्रुत्वा व्यथिता विनतानना:।

न गच्छेम ऋषेर्भीता अनुनेष्यन्ति तं नृपम्॥ १६॥

‘‘राजाकी बात सुनकर वे मन्त्री और पुरोहित मुँह लटकाकर दु:खी हो यों कहने लगेंगे कि ‘हम महर्षिसे डरते हैं, इसलिये वहाँ नहीं जायँगे।’ यों कहकर वे राजासे बड़ी अनुनय-विनय करेंगे॥ १६॥

वक्ष्यन्ति चिन्तयित्वा ते तस्योपायांश्च तान् क्षमान्।

आनेष्यामो वयं विप्रं न च दोषो भविष्यति॥ १७॥

‘इसके बाद सोच-विचारकर वे राजाको योग्य उपाय बतायेंगे और कहेंगे कि ‘हम उन ब्राह्मणकुमारको किसी उपायसे यहाँ ले आयेंगे। ऐसा करनेसे कोई दोष नहीं घटित होगा’॥ १७॥

एवमंगाधिपेनैव गणिकाभिऋर्षे: सुत:।

आनीतोऽवर्षयद् देव: शान्ता चास्मै प्रदीयते॥ १८॥

‘‘इस प्रकार वेश्याओंकी सहायतासे अंगराज मुनिकुमार ऋष्यशृंगको अपने यहाँ बुलायेंगे। उनके आते ही इन्द्रदेव उस राज्यमें वर्षा करेंगे। फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देंगे॥ १८॥

ऋष्यशृंगस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति।

सनत्कुमारकथितमेतावद् व्याहृतं मया॥ १९॥

‘‘इस तरह ऋष्यशृंग आपके जामाता हुए। वे ही आपके लिये पुत्रोंको सुलभ करानेवाले यज्ञकर्मका सम्पादन करेंगे। यह सनत्कुमारजीकी कही हुई बात मैंने आपसे निवेदन की है’’॥ १९॥

अथ हृष्टो दशरथ: सुमन्त्रं प्रत्यभाषत।

यथर्ष्यशृंगस्त्वानीतो येनोपायेन सोच्यताम्॥ २०॥

यह सुनकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुमन्त्रसे कहा—‘मुनिकुमार ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया गया, वह स्पष्टरूपसे बताओ’॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे नवम: सर्ग:॥ ९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९॥

 

दशम: सर्ग:

अंगदेशमें ऋष्यशृंगके आने तथा शान्ताके साथ विवाह होनेके प्रसंगका कुछ विस्तारके साथ वर्णन

सुमन्त्रश्चोदितो राज्ञा प्रोवाचेदं वचस्तदा।

यथर्ष्यशृंगस्त्वानीतो येनोपायेन मन्त्रिभि:।

तन्मे निगदितं सर्वं शृणु मे मन्त्रिभि: सह॥ १॥

राजाकी आज्ञा पाकर उस समय सुमन्त्रने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—‘‘राजन्! रोमपादके मन्त्रियोंने ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया था, वह सब मैं बता रहा हूँ। आप मन्त्रियोंसहित मेरी बात सुनिये॥ १॥

रोमपादमुवाचेदं सहामात्य: पुरोहित:।

उपायो निरपायोऽयमस्माभिरभिचिन्तित:॥ २॥

‘‘उस समय अमात्योंसहित पुरोहितने राजा रोमपादसे कहा—‘महाराज! हमलोगोंने एक उपाय सोचा है, जिसे काममें लानेसे किसी भी विघ्न-बाधाके आनेकी सम्भावना नहीं है॥ २॥

ऋष्यशृंगो वनचरस्तप:स्वाध्यायसंयुत:।

अनभिज्ञस्तु नारीणां विषयाणां सुखस्य च॥ ३॥

‘‘ऋष्यशृंग मुनि सदा वनमें ही रहकर तपस्या और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। वे स्त्रियोंको पहचानतेतक नहीं हैं और विषयोंके सुखसे भी सर्वथा अनभिज्ञ हैं॥

इन्द्रियार्थैरभिमतैर्नरचित्तप्रमाथिभि: ।

पुरमानाययिष्याम: क्षिप्रं चाध्यवसीयताम्॥ ४॥

‘‘हम मनुष्योंके चित्तको मथ डालनेवाले मनोवाञ्छित विषयोंका प्रलोभन देकर उन्हें अपने नगरमें ले आयेंगे; अत: इसके लिये शीघ्र प्रयत्न किया जाय॥ ४॥

गणिकास्तत्र गच्छन्तु रूपवत्य: स्वलंकृता:।

प्रलोभ्य विविधोपायैरानेष्यन्तीह सत्कृता:॥ ५॥

‘‘यदि सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्याएँ वहाँ जायँ तो वे भाँति-भाँतिके उपायोंसे उन्हें लुभाकर इस नगरमें ले आयेंगी; अत: इन्हें सत्कारपूर्वक भेजना चाहिये’॥ ५॥

श्रुत्वा तथेति राजा च प्रत्युवाच पुरोहितम्।

पुरोहितो मन्त्रिणश्च तदा चक्रुश्च ते तथा॥ ६॥

‘‘यह सुनकर राजाने पुरोहितको उत्तर दिया, ‘बहुत अच्छा, आपलोग ऐसा ही करें।’ आज्ञा पाकर पुरोहित और मन्त्रियोंने उस समय वैसी ही व्यवस्था की॥ ६॥

वारमुख्यास्तु तच्छ्रुत्वा वनं प्रविविशुर्महत्।

आश्रमस्याविदूरेऽस्मिन् यत्नं कुर्वन्ति दर्शने॥ ७॥

‘‘तब नगरकी मुख्य-मुख्य वेश्याएँ राजाका आदेश सुनकर उस महान् वनमें गयीं और मुनिके आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर ठहरकर उनके दर्शनका उद्योग करने लगीं॥ ७॥

ऋषे: पुत्रस्य धीरस्य नित्यमाश्रमवासिन:।

पितु: स नित्यसंतुष्टो नातिचक्राम चाश्रमात्॥ ८॥

‘‘मुनिकुमार ऋष्यशृंग बड़े ही धीर स्वभावके थे। सदा आश्रममें ही रहा करते थे। उन्हें सर्वदा अपने पिताके पास रहनेमें ही अधिक सुख मिलता था। अत: वे कभी आश्रमके बाहर नहीं निकलते थे॥ ८॥

न तेन जन्मप्रभृति दृष्टपूर्वं तपस्विना।

स्त्री वा पुमान् वा यच्चान्यत् सत्त्वं नगरराष्ट्रजम्॥ ९॥

‘‘उन तपस्वी ऋषिकुमारने जन्मसे लेकर उस समयतक पहले कभी न तो कोई स्त्री देखी थी और न पिताके सिवा दूसरे किसी पुरुषका ही दर्शन किया था। नगर या राष्ट्रके गाँवोंमें उत्पन्न हुए दूसरे-दूसरे प्राणियोंको भी वे नहीं देख पाये थे॥ ९॥

तत: कदाचित् तं देशमाजगाम यदृच्छया।

विभाण्डकसुतस्तत्र ताश्चापश्यद् वरांगना:॥ १०॥

‘‘तदनन्तर एक दिन विभाण्डककुमार ऋष्यशृंग अकस्मात् घूमते-फिरते उस स्थानपर चले आये, जहाँ वे वेश्याएँ ठहरी हुई थीं। वहाँ उन्होंने उन सुन्दरी वनिताओंको देखा॥ १०॥

ताश्चित्रवेषा: प्रमदा गायन्त्यो मधुरस्वरम्।

ऋषिपुत्रमुपागम्य सर्वा वचनमब्रुवन्॥ ११॥

‘‘उन प्रमदाओंका वेष बड़ा ही सुन्दर और अद्भुत था। वे मीठे स्वरमें गा रही थीं। ऋषिकुमारको आया देख सभी उनके पास चली आयीं और इस प्रकार पूछने लगीं—॥ ११॥

कस्त्वं किं वर्तसे ब्रह्मन् ज्ञातुमिच्छामहे वयम्।

एकस्त्वं विजने दूरे वने चरसि शंस न:॥ १२॥

‘‘ब्रह्मन्! आप कौन हैं? क्या करते हैं? तथा इस निर्जन वनमें आश्रमसे इतनी दूर आकर अकेले क्यों विचर रहे हैं? यह हमें बताइये। हमलोग इस बातको जानना चाहती हैं’॥ १२॥

अदृष्टरूपास्तास्तेन काम्यरूपा वने स्त्रिय:।

हार्दात्तस्य मतिर्जाता आख्यातुं पितरं स्वकम्॥ १३॥

‘‘ऋष्यशृंगने वनमें कभी स्त्रियोंका रूप नहीं देखा था और वे स्त्रियाँ तो अत्यन्त कमनीय रूपसे सुशोभित थीं; अत: उन्हें देखकर उनके मनमें स्नेह उत्पन्न हो गया। इसलिये उन्होंने उनसे अपने पिताका परिचय देनेका विचार किया॥ १३॥

पिता विभाण्डकोऽस्माकं तस्याहं सुत औरस:।

ऋष्यशृंग इति ख्यातं नाम कर्म च मे भुवि॥ १४॥

‘‘वे बोले—‘मेरे पिताका नाम विभाण्डक मुनि है। मैं उनका औरस पुत्र हूँ। मेरा ऋष्यशृंग नाम और तपस्या आदि कर्म इस भूमण्डलमें प्रसिद्ध है॥ १४॥

इहाश्रमपदोऽस्माकं समीपे शुभदर्शना:।

करिष्ये वोऽत्र पूजां वै सर्वेषां विधिपूर्वकम्॥ १५॥

‘‘यहाँ पास ही मेरा आश्रम है। आपलोग देखनेमें परम सुन्दर हैं। (अथवा आपका दर्शन मेरे लिये शुभकारक है।) आप मेरे आश्रमपर चलें। वहाँ मैं आप सब लोगोंकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा’॥ १५॥

ऋषिपुत्रवच: श्रुत्वा सर्वासां मतिरास वै।

तदाश्रमपदं द्रष्टुं जग्मु: सर्वास्ततोऽङ्गना:॥ १६॥

‘‘ऋषिकुमारकी यह बात सुनकर सब उनसे सहमत हो गयीं। फिर वे सब सुन्दरी स्त्रियाँ उनका आश्रम देखनेके लिये वहाँ गयीं॥ १६॥

गतानां तु तत: पूजामृषिपुत्रश्चकार ह।

इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं मूलं फलं च न:॥ १७॥

‘‘वहाँ जानेपर ऋषिकुमारने ‘यह अर्घ्य है, यह पाद्य है तथा यह भोजनके लिये फल-मूल प्रस्तुत है’ ऐसा कहते हुए उन सबका विधिवत् पूजन किया॥ १७॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां सर्वा एव समुत्सुका:।

ऋषेर्भीताश्च शीघ्रं तु गमनाय मतिं दधु:॥ १८॥

‘‘ऋषिकी पूजा स्वीकार करके वे सभी वहाँसे चली जानेको उत्सुक हुईं। उन्हें विभाण्डक मुनिका भय लग रहा था, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही वहाँसे चली जानेका विचार किया॥ १८॥

अस्माकमपि मुख्यानि फलानीमानि हे द्विज।

गृहाण विप्र भद्रं ते भक्षयस्व च मा चिरम्॥ १९॥

‘‘वे बोलीं—‘ब्रह्मन्! हमारे पास भी ये उत्तम-उत्तम फल हैं। विप्रवर! इन्हें ग्रहण कीजिये। आपका कल्याण हो। इन फलोंको शीघ्र ही खा लीजिये, विलम्ब न कीजिये’॥ १९॥

ततस्तास्तं समालिङ्ग्य सर्वा हर्षसमन्विता:।

मोदकान् प्रददुस्तस्मै भक्ष्यांश्च विविधाञ्छुभान्॥ २०॥

‘‘ऐसा कहकर उन सबने हर्षमें भरकर ऋषिका आलिंगन किया और उन्हें खानेयोग्य भाँति-भाँतिके उत्तम पदार्थ तथा बहुत-सी मिठाइयाँ दीं॥ २०॥

तानि चास्वाद्य तेजस्वी फलानीति स्म मन्यते।

अनास्वादितपूर्वाणि वने नित्यनिवासिनाम्॥ २१॥

‘‘उनका रसास्वादन करके उन तेजस्वी ऋषिने समझा कि ये भी फल हैं; क्योंकि उस दिनके पहले उन्होंने कभी वैसे पदार्थ नहीं खाये थे। भला, सदा वनमें रहनेवालोंके लिये वैसी वस्तुओंके स्वाद लेनेका अवसर ही कहाँ है॥ २१॥

आपृच्छ्य च तदा विप्रं व्रतचर्यां निवेद्य च।

गच्छन्ति स्मापदेशात्ता भीतास्तस्य पितु: स्त्रिय:॥ २२॥

‘‘तत्पश्चात् उनके पिता विभाण्डक मुनिके डरसे डरी हुई वे स्त्रियाँ व्रत और अनुष्ठानकी बात बता उन ब्राह्मणकुमारसे पूछकर उसी बहाने वहाँसे चली गयी॥ २२॥

गतासु तासु सर्वासु काश्यपस्यात्मजो द्विज:।

अस्वस्थहृदयश्चासीद् दु:खाच्च परिवर्तते॥ २३॥

‘‘उन सबके चले जानेपर काश्यपकुमार ब्राह्मण ऋष्यशृंग मन-ही-मन व्याकुल हो उठे और बड़े दु:खसे इधर-उधर टहलने लगे॥ २३॥

ततोऽपरेद्युस्तं देशमाजगाम स वीर्यवान्।

विभाण्डकसुत: श्रीमान् मनसाचिन्तयन्मुहु:॥ २४॥

मनोज्ञा यत्र ता दृष्टा वारमुख्या: स्वलंकृता:।

‘‘तदनन्तर दूसरे दिन फिर मनसे उन्हींका बारम्बार चिन्तन करते हुए शक्तिशाली विभाण्डककुमार श्रीमान् ऋष्यशृंग उसी स्थानपर गये, जहाँ पहले दिन उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे सजी हुई उन मनोहर रूपवाली वेश्याओंको देखा था॥ २४/

दृष्ट्वैव च ततो विप्रमायान्तं हृष्टमानसा:॥ २५॥

उपसृत्य तत: सर्वास्तास्तमूचुरिदं वच:।

एह्याश्रमपदं सौम्य अस्माकमिति चाब्रुवन्॥ २६॥

‘‘ब्राह्मण ऋष्यशृंगको आते देख तुरंत ही उन वेश्याओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-की-सब उनके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहने लगीं—‘सौम्य! आओ, आज हमारे आश्रमपर चलो॥ २५-२६॥

चित्राण्यत्र बहूनि स्युर्मूलानि च फलानि च।

तत्राप्येष विशेषेण विधिर्हि भविता ध्रुवम्॥ २७॥

यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके फल-मूल बहुत मिलते हैं तथापि वहाँ भी निश्चय ही इन सबका विशेषरूपसे प्रबन्ध हो सकता है’॥ २७॥

श्रुत्वा तु वचनं तासां सर्वासां हृदयंगमम्।

गमनाय मतिं चक्रे तं च निन्युस्तथा स्त्रिय:॥ २८॥

‘‘उन सबके मनोहर वचन सुनकर ऋष्यशृंग उनके साथ जानेको तैयार हो गये और वे स्त्रियाँ उन्हें अंगदेशमें ले गयीं॥ २८॥

तत्र चानीयमाने तु विप्रे तस्मिन् महात्मनि।

ववर्ष सहसा देवो जगत् प्रह्लादयंस्तदा॥ २९॥

‘‘उन महात्मा ब्राह्मणके अंगदेशमें आते ही इन्द्रने सम्पूर्ण जगत्को प्रसन्न करते हुए सहसा पानी बरसाना आरम्भ कर दिया॥ २९॥

वर्षेणैवागतं विप्रं तापसं स नराधिप:।

प्रत्युद्गम्य मुनिं प्रह्व: शिरसा च महीं गत:॥ ३०॥

‘‘वर्षासे ही राजाको अनुमान हो गया कि वे तपस्वी ब्राह्मणकुमार आ गये। फिर बड़ी विनयके साथ राजाने उनकी अगवानी की और पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया॥

अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायत: सुसमाहित:।

वव्रे प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत्॥ ३१॥

‘‘फिर एकाग्रचित्त होकर उन्होंने ऋषिको अर्घ्य निवेदन किया तथा उन विप्रशिरोमणिसे वरदान माँगा, ‘भगवन्! आप और आपके पिताजीका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो।’ ऐसा उन्होंने इसलिये किया कि कहीं कपटपूर्वक यहाँतक लाये जानेका रहस्य जान लेनेपर विप्रवर ऋष्यशृंग अथवा विभाण्डक मुनिके मनमें मेरे प्रति क्रोध न हो॥ ३१॥

अन्त:पुरं प्रवेश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि।

शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप स:॥ ३२॥

‘‘तत्पश्चात् ऋष्यशृंगको अन्त:पुरमें ले जाकर उन्होंने शान्तचित्तसे अपनी कन्या शान्ताका उनके साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया। ऐसा करके राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३२॥

एवं स न्यवसत् तत्र सर्वकामै: सुपूजित:।

ऋष्यशृंगो महातेजा: शान्तया सह भार्यया॥ ३३॥

‘‘इस प्रकार महातेजस्वी ऋष्यशृंग राजासे पूजित हो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोग प्राप्त कर अपनी धर्मपत्नी शान्ताके साथ वहाँ रहने लगे’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे दशम: सर्ग:॥ १०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥

 

एकादश: सर्ग:

सुमन्त्रके कहनेसे राजा दशरथका सपरिवार अंगराजके यहाँ जाकर वहाँसे शान्ता और ऋष्यशृंगको अपने घर ले आना

भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम्।

यथा स देवप्रवर: कथयामास बुद्धिमान्॥ १॥

तदनन्तर सुमन्त्रने फिर कहा—‘‘राजेन्द्र! आप पुन: मुझसे अपने हितकी वह बात सुनिये, जिसे देवताओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंको सुनाया था॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिक:।

नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रव:॥ २॥

‘‘उन्होंने कहा था—इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक परम धार्मिक सत्यप्रतिज्ञ राजा होंगे॥ २॥

अंगराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति।

कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति॥ ३॥

पुत्रस्त्वंगस्य राज्ञस्तु रोमपाद इति श्रुत:।

तं स राजा दशरथो गमिष्यति महायशा:॥ ४॥

अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शान्ताभर्ता मम क्रतुम्।

आहरेत त्वयाऽऽज्ञप्त: संतानार्थं कुलस्य च॥ ५॥

‘‘उनकी अंगराजके साथ मित्रता होगी। दशरथके एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जिसका नाम होगा ‘शान्ता’28। अंगदेशके राजकुमारका नाम होगा ‘रोमपाद’। महायशस्वी राजा दशरथ उनके पास जायँगे और कहेंगे—‘धर्मात्मन्! मैं संतानहीन हूँ। यदि आप आज्ञा दें तो शान्ताके पति ऋष्यशृंग मुनि चलकर मेरा यज्ञ करा दें। इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति होगी और मेरे वंशकी रक्षा हो जायगी’॥ ३—५॥

श्रुत्वा राज्ञोऽथ तद् वाक्यं मनसा स विचिन्त्य च।

प्रदास्यते पुत्रवन्तं शान्ताभर्तारमात्मवान्॥ ६॥

‘‘राजाकी यह बात सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करके मनस्वी राजा रोमपाद शान्ताके पुत्रवान् पतिको उनके साथ भेज देंगे॥ ६॥

प्रतिगृह्य च तं विप्रं स राजा विगतज्वर:।

आहरिष्यति तं यज्ञं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ ७॥

‘‘ब्राह्मण ऋष्यशृंगको पाकर राजा दशरथकी सारी चिन्ता दूर हो जायगी और वे प्रसन्नचित्त होकर उस यज्ञका अनुष्ठान करेंगे॥ ७॥

तं च राजा दशरथो यशस्काम: कृताञ्जलि:।

ऋष्यशृंगं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित्॥ ८॥

यज्ञार्थं प्रसवार्थं च स्वर्गार्थं च नरेश्वर:।

लभते च स तं कामं द्विजमुख्याद् विशाम्पति:॥ ९॥

‘‘यशकी इच्छा रखनेवाले धर्मज्ञ राजा दशरथ हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंगका यज्ञ, पुत्र और स्वर्गके लिये वरण करेंगे तथा वे प्रजापालक नरेश उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षिसे अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेंगे॥ ८-९॥

पुत्राश्चास्य भविष्यन्ति चत्वारोऽमितविक्रमा:।

वंशप्रतिष्ठानकरा: सर्वभूतेषु विश्रुता:॥ १०॥

‘‘राजाके चार पुत्र होंगे, जो अप्रमेय पराक्रमी, वंशकी मर्यादा बढ़ानेवाले और सर्वत्र विख्यात होंगे॥

एवं स देवप्रवर: पूर्वं कथितवान् कथाम्।

सनत्कुमारो भगवान् पुरा देवयुगे प्रभु:॥ ११॥

‘‘महाराज! पहले सत्ययुगमें शक्तिशाली देवप्रवर भगवान् सनत्कुमारजीने ऋषियोंके समक्ष ऐसी कथा कही थी॥ ११॥

स त्वं पुरुषशार्दूल समानय सुसत्कृतम्।

स्वयमेव महाराज गत्वा सबलवाहन:॥ १२॥

‘‘पुरुषसिंह महाराज! इसलिये आप स्वयं ही सेना और सवारियोंके साथ अंगदेशमें जाकर मुनिकुमार ऋष्यशृंगको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइये’’॥ १२॥

सुमन्त्रस्य वच: श्रुत्वा हृष्टो दशरथोऽभवत्।

अनुमान्य वसिष्ठं च सूतवाक्यं निशाम्य च॥ १३॥

सान्त:पुर: सहामात्य: प्रययौ यत्र स द्विज:।

सुमन्त्रका वचन सुनकर राजा दशरथको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुनिवर वसिष्ठजीको भी सुमन्त्रकी बातें सुनायीं और उनकी आज्ञा लेकर रनिवासकी रानियों तथा मन्त्रियोंके साथ अंगदेशके लिये प्रस्थान किया, जहाँ विप्रवर ऋष्यशृंग निवास करते थे॥ १३/

वनानि सरितश्चैव व्यतिक्रम्य शनै: शनै:॥ १४॥

अभिचक्राम तं देशं यत्र वै मुनिपुंगव:।

मार्गमें अनेकानेक वनों और नदियोंको पार करके वे धीरे-धीरे उस देशमें जा पहुँचे, जहाँ मुनिवर ऋष्यशृंग विराजमान थे॥ १४/

आसाद्य तं द्विजश्रेष्ठं रोमपादसमीपगम्॥ १५॥

ऋषिपुत्रं ददर्शाथो दीप्यमानमिवानलम्।

वहाँ पहुँचनेपर उन्हें द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग रोमपादके पास ही बैठे दिखायी दिये। वे ऋषिकुमार प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे॥ १५/

ततो राजा यथायोग्यं पूजां चक्रे विशेषत:॥ १६॥

सखित्वात् तस्य वै राज्ञ: प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

रोमपादेन चाख्यातमृषिपुत्राय धीमते॥ १७॥

सख्यं सम्बन्धकं चैव तदा तं प्रत्यपूजयत्।

तदनन्तर राजा रोमपादने मित्रताके नाते अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे महाराज दशरथका शास्त्रोक्त विधिके अनुसार विशेषरूपसे पूजन किया और बुद्धिमान् ऋषिकुमार ऋष्यशृंगको राजा दशरथके साथ अपनी मित्रताकी बात बतायी। उसपर उन्होंने भी राजाका सम्मान किया॥

एवं सुसत्कृतस्तेन सहोषित्वा नरर्षभ:॥ १८॥

सप्ताष्टदिवसान् राजा राजानमिदमब्रवीत्।

शान्ता तव सुता राजन् सह भर्त्रा विशाम्पते॥ १९॥

मदीयं नगरं यातु कार्यं हि महदुद्यतम्।

इस प्रकार भलीभाँति आदर-सत्कार पाकर नरश्रेष्ठ राजा दशरथ रोमपादके साथ वहाँ सात-आठ दिनोंतक रहे। इसके बाद वे अंगराजसे बोले—‘प्रजापालक नरेश! तुम्हारी पुत्री शान्ता अपने पतिके साथ मेरे नगरमें पदार्पण करे; क्योंकि वहाँ एक महान् आवश्यक कार्य उपस्थित हुआ है’॥ १८-१९/

तथेति राजा संश्रुत्य गमनं तस्य धीमत:॥ २०॥

उवाच वचनं विप्रं गच्छ त्वं सह भार्यया।

ऋषिपुत्र: प्रतिश्रुत्य तथेत्याह नृपं तदा॥ २१॥

राजा रोमपादने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन बुद्धिमान् महर्षिका जाना स्वीकार कर लिया और ऋष्यशृंगसे कहा— ‘विप्रवर! आप शान्ताके साथ महाराज दशरथके यहाँ जाइये।’ राजाकी आज्ञा पाकर उन ऋषिपुत्रने ‘तथास्तु’ कहकर राजा दशरथको अपने चलनेकी स्वीकृति दे दी॥ २०-२१॥

स नृपेणाभ्यनुज्ञात: प्रययौ सह भार्यया।

तावन्योन्याञ्जलिं कृत्वा स्नेहात्संश्लिष्य चोरसा॥ २२॥

ननन्दतुर्दशरथो रोमपादश्च वीर्यवान्।

तत: सुहृदमापृच्छ्य प्रस्थितो रघुनन्दन:॥ २३॥

राजा रोमपादकी अनुमति ले ऋष्यशृंगने पत्नीके साथ वहाँसे प्रस्थान किया। उस समय शक्तिशाली राजा रोमपाद और दशरथने एक-दूसरेको हाथ जोड़कर स्नेहपूर्वक छातीसे लगाया तथा अभिनन्दन किया। फिर मित्रसे विदा ले रघुकुलनन्दन दशरथ वहाँसे प्रस्थित हुए॥ २२-२३॥

पौरेषु प्रेषयामास दूतान् वै शीघ्रगामिन:।

क्रियतां नगरं सर्वं क्षिप्रमेव स्वलंकृतम्॥ २४॥

धूपितं सिक्तसम्मृष्टं पताकाभिरलंकृतम्।

उन्होंने पुरवासियोंके पास अपने शीघ्रगामी दूत भेजे और कहलाया कि ‘समस्त नगरको शीघ्र ही सुसज्जित किया जाय। सर्वत्र धूपकी सुगन्ध फैले। नगरकी सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर पानीका छिड़काव कर दिया जाय तथा सारा नगर ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हो’॥ २४/

तत: प्रहृष्टा: पौरास्ते श्रुत्वा राजानमागतम्॥ २५॥

तथा चक्रुश्च तत् सर्वं राज्ञा यत् प्रेषितं तदा।

राजाका आगमन सुनकर पुरवासी बड़े प्रसन्न हुए। महाराजने उनके लिये जो संदेश भेजा था, उसका उन्होंने उस समय पूर्णरूपसे पालन किया॥ २५/

तत: स्वलंकृतं राजा नगरं प्रविवेश ह॥ २६॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्हृदै: पुरस्कृत्वा द्विजर्षभम्।

तदनन्तर राजा दशरथने शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ विप्रवर ऋष्यशृंगको आगे करके अपने सजे-सजाये नगरमें प्रवेश किया॥ २६॥

तत: प्रमुदिता: सर्वे दृष्ट्वा वै नागरा द्विजम्॥ २७॥

प्रवेश्यमानं सत्कृत्य नरेन्द्रेणेन्द्रकर्मणा।

यथा दिवि सुरेन्द्रेण सहस्राक्षेण काश्यपम्॥ २८॥

उन द्विजकुमारका दर्शन करके सभी नगरनिवासी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने इन्द्रके समान पराक्रमी नरेन्द्र दशरथके साथ पुरीमें प्रवेश करते हुए ऋष्यशृंगका उसी प्रकार सत्कार किया, जैसे देवताओंने स्वर्गमें सहस्राक्ष इन्द्रके साथ प्रवेश करते हुए कश्यपनन्दन वामनजीका समादर किया था॥ २७-२८॥

अन्त:पुरं प्रवेश्यैनं पूजां कृत्वा च शास्त्रत:।

कृतकृत्यं तदात्मानं मेने तस्योपवाहनात्॥ २९॥

ऋषिको अन्त:पुरमें ले जाकर राजाने शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया और उनके निकट आ जानेसे अपनेको कृतकृत्य माना॥ २९॥

अन्त:पुराणि सर्वाणि शान्तां दृष्ट्वा तथागताम्।

सह भर्त्रा विशालाक्षीं प्रीत्यानन्दमुपागमन्॥ ३०॥

विशाललोचना शान्ताको इस प्रकार अपने पतिके साथ उपस्थित देख अन्त:पुरकी सभी रानियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमग्न हो गयीं॥ ३०॥

पूज्यमाना तु ताभि: सा राज्ञा चैव विशेषत:।

उवास तत्र सुखिता कञ्चित् कालं सहद्विजा॥ ३१॥

शान्ता भी उन रानियोंसे तथा विशेषत: महाराज दशरथके द्वारा आदर-सत्कार पाकर वहाँ कुछ कालतक अपने पति विप्रवर ऋष्यशृंगके साथ बड़े सुखसे रही॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकादश: सर्ग:॥ ११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥

 

द्वादश: सर्ग:

राजाका ऋषियोंसे यज्ञ करानेके लिये प्रस्ताव, ऋषियोंका राजाको और राजाका मन्त्रियोंको यज्ञकी आवश्यक तैयारी करनेके लिये आदेश देना

तत: काले बहुतिथे कस्म‌िंश्चित् सुमनोहरे।

वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत्॥ १॥

तदनन्तर बहुत समय बीत जानेके पश्चात् कोई परम मनोहर—दोषरहित समय प्राप्त हुआ। उस समय वसन्त ऋतुका आरम्भ हुआ था। राजा दशरथने उसी शुभ समयमें यज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया॥ १॥

तत: प्रणम्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम्।

यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य च॥ २॥

तत्पश्चात् उन्होंने देवोपम कान्तिवाले विप्रवर ऋष्यशृंगको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पुत्र-प्राप्तिके निमित्त यज्ञ करानेके उद्देश्यसे उनका वरण किया॥ २॥

तथेति च स राजानमुवाच वसुधाधिपम्।

सम्भारा: सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्॥ ३॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

ऋष्यशृंगने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन पृथ्वीपति नरेशसे कहा—‘राजन! यज्ञकी सामग्री एकत्र कराइये। भूमण्डलमें भ्रमणके लिये आपका यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय और सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय’॥ ३/

ततोऽब्रवीन्नृपो वाक्यं ब्राह्मणान् वेदपारगान्॥ ४॥

सुमन्त्रावाहय क्षिप्रमृत्विजो ब्रह्मवादिन:।

सुयज्ञं वामदेवं च जाबालिमथ काश्यपम्॥ ५॥

पुरोहितं वसिष्ठं च ये चान्ये द्विजसत्तमा:।

तब राजाने कहा—‘सुमन्त्र! तुम शीघ्र ही वेदविद्याके पारंगत ब्राह्मणों तथा ब्रह्मवादी ऋत्विजोंको बुला ले आओ। सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, पुरोहित वसिष्ठ तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उन सबको बुलाओ’॥

तत: सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा त्वरितविक्रम:॥ ६॥

समानयत् स तान् सर्वान् समस्तान् वेदपारगान्।

तब शीघ्रगामी सुमन्त्र तुरंत जाकर वेदविद्याके पारगामी उन समस्त ब्राह्मणोंको बुला लाये॥ ६/

तान् पूजयित्वा धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा॥ ७॥

धर्मार्थसहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्।

धर्मात्मा राजा दशरथने उन सबका पूजन किया और उनसे धर्म तथा अर्थसे युक्त मधुर वचन कहा॥ ७/

मम तातप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वै सुखम्॥ ८॥

पुत्रार्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम।

‘महर्षियो! मैं पुत्रके लिये निरन्तर संतप्त रहता हूँ। उसके बिना इस राज्य आदिसे भी मुझे सुख नहीं मिलता है। अत: मैंने यह विचार किया है कि पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करूँ॥ ८/

तदहं यष्टुमिच्छामि हयमेधेन कर्मणा॥ ९॥

ऋषिपुत्रप्रभावेण कामान् प्राप्स्यामि चाप्यहम्।

‘इसी संकल्पके अनुसार मैं अश्वमेध यज्ञका आरम्भ करना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि ऋषिपुत्र ऋष्यशृंगके प्रभावसे मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लूँगा’॥ ९/

तत: साध्विति तद्वाक्यं ब्राह्मणा: प्रत्यपूजयन्॥ १०॥

वसिष्ठप्रमुखा: सर्वे पार्थिवस्य मुखाच्च्युतम्।

राजा दशरथके मुखसे निकले हुए इस वचनकी वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोंने ‘साधु-साधु’ कहकर बड़ी सराहना की॥ १०/

ऋष्यशृंगपुरोगाश्च प्रत्यूचुर्नृपतिं तदा॥ ११॥

सम्भारा: सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्॥ १२॥

इसके बाद ऋष्यशृंग आदि सब महर्षियोंने उस समय राजा दशरथसे पुन: यह बात कही—‘महाराज! यज्ञसामग्रीका संग्रह किया जाय, यज्ञसम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय तथा सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण किया जाय॥ ११-१२॥

सर्वथा प्राप्स्यसे पुत्रांश्चतुरोऽमितविक्रमान्।

यस्य ते धार्मिकी बुद्धिरियं पुत्रार्थमागता॥ १३॥

‘तुम यज्ञद्वारा सर्वथा चार अमित पराक्रमी पुत्र प्राप्त करोगे; क्योंकि पुत्रके लिये तुम्हारे मनमें ऐसे धार्मिक विचारका उदय हुआ है’॥ १३॥

तत: प्रीतोऽभवद् राजा श्रुत्वा तु द्विजभाषितम्।

अमात्यानब्रवीद् राजा हर्षेणेदं शुभाक्षरम्॥ १४॥

ब्राह्मणोंकी यह बात सुनकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बड़े हर्षके साथ अपने मन्त्रियोंसे यह शुभ अक्षरोंवाली बात कही॥ १४॥

गुरूणां वचनाच्छीघ्रं सम्भारा: सम्भ्रियन्तु मे।

समर्थाधिष्ठितश्चाश्व: सोपाध्यायो विमुच्यताम्॥ १५॥

‘गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार तुमलोग शीघ्र ही मेरे लिये यज्ञकी सामग्री जुटा दो। शक्तिशाली वीरोंके संरक्षणमें यज्ञिय अश्व छोड़ा जाय और उसके साथ प्रधान ऋत्विज् भी रहें॥ १५॥

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

शान्तयश्चाभिवर्धन्तां यथाकल्पं यथाविधि॥ १६॥

‘सरयूके उत्तर तटपर यज्ञभूमिका निर्माण हो, शास्त्रोक्त विधिके अनुसार क्रमश: शान्तिकर्म—पुण्याहवाचन आदिका विस्तारपूर्वक अनुष्ठान किया जाय, जिससे विघ्नोंका निवारण हो॥ १६॥

शक्य: कर्तुमयं यज्ञ: सर्वेणापि महीक्षिता।

नापराधो भवेत् कष्टो यद्यस्मिन् क्रतुसत्तमे॥ १७॥

‘यदि इस श्रेष्ठ यज्ञमें कष्टप्रद अपराध बन जानेका भय न हो तो सभी राजा इसका सम्पादन कर सकते हैं॥ १७॥

छिद्रं हि मृगयन्त्येते विद्वांसो ब्रह्मराक्षसा:।

विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्य: कर्ता विनश्यति॥ १८॥

‘परंतु ऐसा होना कठिन है; क्योंकि ये विद्वान् ब्रह्म-राक्षस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये छिद्र ढूँढ़ा करते हैं। विधिहीन यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला यजमान तत्काल नष्ट हो जाता है॥ १८॥

तद् यथा विधिपूर्वं मे क्रतुरेष समाप्यते।

तथा विधानं क्रियतां समर्था: करणेष्विह॥ १९॥

‘अत: मेरा यह यज्ञ जिस तरह विधिपूर्वक सम्पूर्ण हो सके वैसा उपाय किया जाय। तुम सब लोग ऐसे साधन प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो’॥ १९॥

तथेति च तत: सर्वे मन्त्रिण: प्रत्यपूजयन्।

पार्थिवेन्द्रस्य तद् वाक्यं यथाज्ञप्तमकुर्वत॥ २०॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सभी मन्त्रियोंने राजराजेश्वर दशरथके उस कथनका आदर किया और उनकी आज्ञाके अनुसार सारी व्यवस्था की॥ २०॥

ततो द्विजास्ते धर्मज्ञमस्तुवन् पार्थिवर्षभम्।

अनुज्ञातास्तत: सर्वे पुनर्जग्मुर्यथागतम्॥ २१॥

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंने भी धर्मज्ञ नृपश्रेष्ठ दशरथकी प्रशंसा की और उनकी आज्ञा पाकर सब जैसे आये थे, वैसे ही फिर चले गये॥ २१॥

गतेषु तेषु विप्रेषु मन्त्रिणस्तान् नराधिप:।

विसर्जयित्वा स्वं वेश्म प्रविवेश महामति:॥ २२॥

उन ब्राह्मणोंके चले जानेपर मन्त्रियोंको भी विदा करके वे महाबुद्धिमान् नरेश अपने महलमें गये॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वादश: सर्ग:॥ १२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥

 

त्रयोदश: सर्ग:

राजाका वसिष्ठजीसे यज्ञकी तैयारीके लिये अनुरोध, वसिष्ठजीद्वारा इसके लिये सेवकोंकी नियुक्ति और सुमन्त्रको राजाओंको बुलानेके लिये आदेश, समागत राजाओंका सत्कार तथा पत्नियोंसहित राजा दशरथका यज्ञकी दीक्षा लेना

पुन: प्राप्ते वसन्ते तु पूर्ण: संवत्सरोऽभवत्।

प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान्॥ १॥

वर्तमान वसन्त ऋतुके बीतनेपर जब पुन: दूसरा वसन्त आया, तबतक एक वर्षका समय पूरा हो गया। उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतानके लिये अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा लेनेके निमित्त वसिष्ठजीके समीप गये॥

अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायत: प्रतिपूज्य च।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम्॥ २॥

वसिष्ठजीको प्रणाम करके राजाने न्यायत: उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनिसे यह विनययुक्त बात कही॥ २॥

यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव।

यथा न विघ्ना: क्रियन्ते यज्ञांगेषु विधीयताम्॥ ३॥

‘ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधिके अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञके अंगभूत अश्व-संचारण आदिमें ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये॥ ३॥

भवान् स्निग्ध: सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान्।

वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यत:॥ ४॥

‘आपका मुझपर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद्—अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं। यह जो यज्ञका भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं’॥ ४॥

तथेति च स राजानमब्रवीद् द्विजसत्तम:।

करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम्॥ ५॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजासे इस प्रकार बोले—‘नरेश्वर! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा’॥ ५॥

ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान्।

स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान्॥ ६॥

कर्मान्तिकान् शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि।

गणकान् शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान्॥ ७॥

तथा शुचीन् शास्त्रविद: पुरुषान् सुबहुश्रुतान्।

यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात्॥ ८॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होनेतक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा—‘तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो॥

इष्टका बहुसाहस्री शीघ्रमानीयतामिति।

उपकार्या: क्रियन्तां च राज्ञो बहुगुणान्विता:॥ ९॥

‘शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायँ। राजाओंके ठहरनेके लिये उनके योग्य अन्न-पान आदि अनेक उपकरणोंसे युक्त बहुत-से महल बनाये जायँ॥ ९॥

ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्या: शतश: शुभा:।

भक्ष्यान्नपानैर्बहुभि: समुपेता: सुनिष्ठिता:॥ १०॥

‘ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये। वे सभी गृह बहुत-से भोजनीय अन्न-पान आदि उपकरणोंसे युक्त तथा आँधी-पानी आदिके निवारणमें समर्थ हों॥ १०॥

तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तरा:।

आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक्॥ ११॥

‘इसी तरह पुरवासियोंके लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये। दूरसे आये हुए भूपालोंके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायँ॥ ११॥

वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि च।

भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम्॥ १२॥

‘घोड़े और हाथियोंके लिये भी शालाएँ बनायी जायँ। साधारण लोगोंके सोनेके लिये भी घरोंकी व्यवस्था हो। विदेशी सैनिकोंके लिये भी बड़ी-बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये॥ १२॥

आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिता:।

तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम्॥ १३॥

दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया।

‘जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने-पीनेकी प्रचुर सामग्री संचित रहे। उनमें सभी मनोवांछित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियोंको भी बहुत सुन्दर अन्न भोजनके लिये देना चाहिये। वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं॥ १३/

सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृता:॥ १४॥

न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि।

‘ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्णके लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें। काम और क्रोधके वशीभूत होकर भी किसीका अनादर नहीं करना चाहिये॥

यज्ञकर्मसु ये व्यग्रा: पुरुषा: शिल्पिनस्तथा॥ १५॥

तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम्।

‘जो शिल्पी मनुष्य यज्ञकर्मकी आवश्यक तैयारीमें लगे हों, उनका तो बड़े-छोटेका खयाल रखकर विशेषरूपसे समादर करना चाहिये॥ १५/

ये स्यु: सम्पूजिता: सर्वे वसुभिर्भोजनेन च॥ १६॥

यथा सर्वं सुविहितं न किंचित् परिहीयते।

तथा भवन्त: कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा॥ १७॥

‘जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदिके द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं। उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंगसे सम्पन्न होता है। उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अत: तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो’॥

तत: सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन्।

यथेष्टं तत् सुविहितं न किंचित् परिहीयते॥ १८॥

यथोक्तं तत् करिष्यामो न किंचित् परिहास्यते।

तब वे सब लोग वसिष्ठजीसे मिलकर बोले—‘आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही करनेके लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी। कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा। आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे। उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे’॥ १८/

तत: सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ १९॥

निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये च धार्मिका:।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव सहस्रश:॥ २०॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने सुमन्त्रको बुलाकर कहा—‘इस पृथ्वीपर जो-जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रित करो॥ २०॥

समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान्।

मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम्॥ २१॥

तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम्।

पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा तत: पूर्वं ब्रवीमि ते॥ २२॥

‘सब देशोंके अच्छे लोगोंको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ। मिथिलाके स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं। उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर-सत्कारके साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ॥ २१-२२॥

तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम्।

सद्वृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व ह॥ २३॥

‘इसी प्रकार काशीके राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं। वे सदाचारी तथा देवताओंके तुल्य तेजस्वी हैं; अत: उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ॥ २३॥

तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम्।

श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥ २४॥

‘केकयदेशके बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथके श्वशुर हैं; अत: उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ॥ २४॥

अंगेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम्।

वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥ २५॥

‘अंगदेशके स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराजके मित्र हैं, अत: उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक ले आओ॥ २५॥

तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम्।

मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम्॥ २६॥

प्राप्तिज्ञं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम्।

‘कोशलराज भानुमान्को भी सत्कारपूर्वक ले आओ। मगधदेशके राजा प्राप्तिज्ञको, जो शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ॥ २६/

राज्ञ: शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान्।

प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्च पार्थिवान्॥ २७॥

‘महाराजकी आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेशके श्रेष्ठ नरेशोंको तथा सिन्धु-सौवीर एवं सुराष्ट्र देशके भूपालोंको यहाँ आनेके लिये निमन्त्रण दो॥ २७॥

दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व ह।

सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजान: पृथिवीतले॥ २८॥

तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान्।

एतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया॥ २९॥

‘दक्षिण भारतके समस्त नरेशोंको भी आमन्त्रित करो। इस भूतलपर और भी जो-जो नरेश महाराजके प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे-सम्बन्धियोंसहित यथासम्भव शीघ्र बुला लो। महाराजकी आज्ञासे बड़भागी दूतोंद्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो’॥ २८-२९॥

वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा।

व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान्॥ ३०॥

वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषोंको राजाओंकी बुलाहटके लिये जानेका आदेश दे दिया॥ ३०॥

स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात्।

सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामति:॥ ३१॥

परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञासे खास-खास राजाओंको बुलानेके लिये स्वयं ही गये॥ ३१॥

ते च कर्मान्तिका: सर्वे वसिष्ठाय महर्षये।

सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम्॥ ३२॥

यज्ञकर्मकी व्यवस्थाके लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समयतक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी॥ ३२॥

तत: प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत्।

अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा॥ ३३॥

अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशय:।

यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले—‘भद्र पुरुषो! किसीको जो कुछ देना हो; उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाताको नष्ट कर देता है— इसमें संशय नहीं है’॥ ३३/

तत: कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षित:॥ ३४॥

बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य ह।

तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद राजा लोग महाराज दशरथके लिये बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर अयोध्यामें आये॥ ३४/

ततो वसिष्ठ: सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत्॥ ३५॥

उपयाता नरव्याघ्र राजानस्तव शासनात्।

मयापि सत्कृता: सर्वे यथार्हं राजसत्तम॥ ३६॥

इससे वसिष्ठजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने राजासे कहा—‘पुरुषसिंह! तुम्हारी आज्ञासे राजालोग यहाँ आ गये। नृपश्रेष्ठ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है॥ ३५-३६॥

यज्ञियं च कृतं सर्वं पुरुषै: सुसमाहितै:।

निर्यातु च भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात्॥ ३७॥

‘हमारे कार्यकर्ताओंने पूर्णत: सावधान रहकर यज्ञके लिये सारी तैयारी की है। अब तुम भी यज्ञ करनेके लिये यज्ञमण्डपके समीप चलो॥ ३७॥

सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्तत:।

द्रष्टुमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम्॥ ३८॥

‘राजेन्द्र! यज्ञमण्डपमें सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं। आप स्वयं चलकर देखें। यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मनके संकल्पसे ही बन गया हो’॥ ३८॥

तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृंगस्य चोभयो:।

दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपति:॥ ३९॥

मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग दोनोंके आदेशसे शुभ नक्षत्रवाले दिनको राजा दशरथ यज्ञके लिये राजभवनसे निकले॥ ३९॥

ततो वसिष्ठप्रमुखा: सर्व एव द्विजोत्तमा:।

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा॥ ४०॥

यज्ञवाटं गता: सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि।

श्रीमांश्च सह पत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत्॥ ४१॥

तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजोंने यज्ञमण्डपमें जाकर ऋष्यशृंगको आगे करके शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञकर्मका आरम्भ किया। पत्नियोंसहित श्रीमान् अवधनरेशने यज्ञकी दीक्षा ली॥ ४०-४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोदश: सर्ग:॥ १३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥

 


चतुर्दश: सर्ग:

महाराज दशरथके द्वारा अश्वमेध यज्ञका सांगोपांग अनुष्ठान

अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे।

सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत॥ १॥

इधर वर्ष पूरा होनेपर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डलमें भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदीके उत्तर तटपर राजाका यज्ञ आरम्भ हुआ॥ १॥

ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्द्विजर्षभा:।

अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मन:॥ २॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऋष्यशृंगको आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्म करने लगे॥ २॥

कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगा:।

यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रत:॥ ३॥

यज्ञ करानेवाले सभी ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् थे; अत: वे न्याय तथा विधिके अनुसार सब कर्मोंका उचित रीतिसे सम्पादन करते थे और शास्त्रके अनुसार किस क्रमसे किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्ममें प्रवृत्त होते थे॥ ३॥

प्रवर्ग्यं शास्त्रत: कृत्वा तथैवोपसदं द्विजा:।

चक्रुश्च विधिवत् सर्वमधिकं कर्म शास्त्रत:॥ ४॥

ब्राह्मणोंने प्रवर्ग्य (अश्वमेधके अंगभूत कर्मविशेष) का शास्त्र (विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टिविशेषका भी शास्त्रके अनुसार ही अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेशसे अधिक जो अतिदेशत: प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया॥ ४॥

अभिपूज्य तदा हृष्टा: सर्वे चक्रुर्यथाविधि।

प्रात:सवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुंगवा:॥ ५॥

तदनन्तर तत्तत् कर्मोंके अंगभूत देवताओंका पूजन करके हर्षमें भरे हुए उन सभी मुनिवरोंने विधिपूर्वक प्रात:सवन आदि (अर्थात् प्रात:सवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन) कर्म किये॥ ५॥

ऐन्द्रश्च विधिवद् दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघ:।

माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम्॥ ६॥

इन्द्रदेवताको विधिपूर्वक हविष्यका भाग अर्पित किया गया। पापनिवर्तक राजा सोम (सोमलता)29 का रस निकाला गया। फिर क्रमश: माध्यन्दिनसवनका कार्य प्रारम्भ हुआ॥ ६॥

तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मन:।

चक्रुस्ते शास्त्रतो दृष्ट्वा यथा ब्राह्मणपुंगवा:॥ ७॥

तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने शास्त्रसे देख-भालकर मनस्वी राजा दशरथके तृतीय सवनकर्मका भी विधिवत् सम्पादन किया॥ ७॥

आह्वयाञ्चक्रिरे तत्र शक्रादीन् विबुधोत्तमान्।

ऋष्यशृंगादयो मन्त्रै: शिक्षाक्षरसमन्वितै:॥ ८॥

ऋष्यशृंग आदि महर्षियोंने वहाँ अभ्यासकालमें सीखे गये अक्षरोंसे युक्त—स्वर और वर्णसे सम्पन्न मन्त्रोंद्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंका आवाहन किया॥ ८॥

गीतिभिर्मधुरै: स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हत:।

होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम्॥ ९॥

मधुर एवं मनोरम सामगानके लयमें गाये हुए आह्वान-मन्त्रोंद्वारा देवताओंका आवाहन करके होताओंने उन्हें उनके योग्य हविष्यके भाग समर्पित किये॥ ९॥

न चाहुतमभूत् तत्र स्खलितं वा न किंचन।

दृश्यते ब्रह्मवत् सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे॥ १०॥

उस यज्ञमें कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी। कहीं कोई भूल नहीं हुई—अनजानमें भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था। महर्षियोंने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये॥ १०॥

न तेष्वह:सु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते।

नाविद्वान् ब्राह्मण: कश्चिन्नाशतानुचरस्तथा॥ ११॥

यज्ञके दिनोंमें कोई भी ऋत्विज् थका-माँदा या भूखा- प्यासा नहीं दिखायी देता था। उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों॥ ११॥

ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते।

तापसा भुञ्जते चापि श्रमणाश्चैव भुञ्जते॥ १२॥

उस यज्ञमें प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे (क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे) तथा शूद्रोंको भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और श्रमण भी भोजन करते थे॥ १२॥

वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तथैव च।

अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते॥ १३॥

बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहनेपर भी किसीका मन नहीं भरता था॥ १३॥

दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च।

इति संचोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकश:॥ १४॥

‘अन्न दो, नाना प्रकारके वस्त्र दो’ अधिकारियोंकी ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे॥ १४॥

अन्नकूटाश्च दृश्यन्ते बहव: पर्वतोपमा:।

दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत् तदा॥ १५॥

वहाँ प्रतिदिन विधिवत् पके हुए अन्नके बहुत-से पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते थे॥ १५॥

नानादेशादनुप्राप्ता: पुरुषा: स्त्रीगणास्तथा।

अन्नपानै: सुविहितास्तस्मिन् यज्ञे महात्मन:॥ १६॥

महामनस्वी राजा दशरथके उस यज्ञमें नाना देशोंसे आये हुए स्त्री-पुरुष अन्न-पानद्वारा भलीभाँति तृप्त किये गये थे॥ १६॥

अन्नं हि विधिवत्स्वादु प्रशंसन्ति द्विजर्षभा:।

अहो तृप्ता: स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघव:॥ १७॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘भोजन विधिवत् बनाया गया है। बहुत स्वादिष्ट है’—ऐसा कहकर अन्नकी प्रशंसा करते थे। भोजन करके उठे हुए लोगोंके मुखसे राजा सदा यही सुनते थे कि ‘हमलोग खूब तृप्त हुए। आपका कल्याण हो’॥ १७॥

स्वलंकृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान् पर्यवेषयन्।

उपासन्ते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डला:॥ १८॥

वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे और उन लोगोंकी जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे॥ १८॥

कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान् बहूनपि।

प्राहु: सुवाग्मिनो धीरा: परस्परजिगीषया॥ १९॥

एक सवन समाप्त करके दूसरे सवनके आरम्भ होनेसे पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता धीर ब्राह्मण एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे॥ १९॥

दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजा:।

सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिता:॥ २०॥

उस यज्ञमें नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्रके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करते थे॥ २०॥

नाषडंगविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुत:।

सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशलो द्विज:॥ २१॥

राजाके उस यज्ञमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगोंका ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद-विवादमें कुशल न हो॥ २१॥

प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन् षड् बैल्वा: खादिरास्तथा।

तावन्तो बिल्वसहिता: पर्णिनश्च तथा परे॥ २२॥

जब यूप खड़ा करनेका समय आया, तब बेलकी लकड़ीके छ: यूप गाड़े गये। उतने ही खैरके यूप खड़े किये गये तथा पलाशके भी उतने ही यूप थे, जो बिल्वनिर्मित यूपोंके साथ खड़े किये गये थे॥ २२॥

श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा।

द्वावेव तत्र विहितौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ॥ २३॥

बहेड़ेके वृक्षका एक यूप अश्वमेध यज्ञके लिये विहित है। देवदारुके बने हुए यूपका भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छ:। देवदारुके दो ही यूप विहित हैं। दोनों बाँहें फैला देनेपर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूरपर वे दोनों स्थापित किये गये थे॥ २३॥

कारिता: सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदै:।

शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालंकृता भवन्॥ २४॥

यज्ञकुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंने ही इन सब यूपोंका निर्माण कराया था। उस यज्ञकी शोभा बढ़ानेके लिये उन सबमें सोना जड़ा गया था॥ २४॥

एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नय:।

वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृता:॥ २५॥

पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस-इक्कीस अरत्नि30 (पाँच सौ चार अंगुल) ऊँचे बनाये गये थे। उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ोंसे अलंकृत किया गया था॥ २५॥

विन्यस्ता विधिवत् सर्वे शिल्पिभि: सुकृता दृढा:।

अष्टास्रय: सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विता:॥ २६॥

कारीगरोंद्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे। वे सब-के-सब आठ कोणोंसे सुशोभित थे। उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी॥ २६॥

आच्छादितास्ते वासोभि: पुष्पैर्गन्धैश्च पूजिता:।

सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि॥ २७॥

उन्हें वस्त्रोंसे ढक दिया गया था और पुष्प-चन्दनसे उनकी पूजा की गयी थी। जैसे आकाशमें तेजस्वी सप्तर्षियोंकी शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डपमें वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे॥ २७॥

इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणत:।

चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलै: शिल्पकर्मणि॥ २८॥

सूत्रग्रन्थोंमें बताये अनुसार ठीक मापसे ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटोंके द्वारा यज्ञसम्बन्धी शिल्पिकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंने अग्निका चयन किया था॥ २८॥

स चित्यो राजसिंहस्य संचित: कुशलैर्द्विजै:।

गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मक:॥ २९॥

राजसिंह महाराज दशरथके यज्ञमें चयनद्वारा सम्पादित अग्निकी कर्मकाण्डकुशल ब्राह्मणोंद्वारा शास्त्रविधिके अनुसार स्थापना की गयी। उस अग्निकी आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़की-सी प्रतीत होती थी। सोनेकी ईंटोंसे पंखका निर्माण होनेसे उस गरुड़के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे। प्रकृत-अवस्थामें चित्य-अग्निके छ: प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञमें उसका प्रस्तार तीनगुना हो जाता है। इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारोंसे युक्त थी॥ २९॥

नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्।

उरगा: पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिता:॥ ३०॥

वहाँ पूर्वोक्त यूपोंमें शास्त्रविहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओंके उद्देश्यसे बाँधे गये थे॥ ३०॥

शामित्रे तु हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये।

ऋषिभि: सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा॥ ३१॥

शामित्र कर्ममें यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियोंने उन सबको शास्त्रविधिके अनुसार पूर्वोक्त यूपोंमें बाँध दिया॥ ३१॥

पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा।

अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह॥ ३२॥

उस समय उन यूपोंमें तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथका वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था॥ ३२॥

कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्तत:।

कृपाणैर्विशशारैनं त्रिभि: परमया मुदा॥ ३३॥

रानी कौसल्याने वहाँ प्रोक्षण आदिके द्वारा सब ओरसे उस अश्वका संस्कार करके बड़ी प्रसन्नताके साथ तीन तलवारोंसे उसका स्पर्श किया॥ ३३॥

पतत्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा।

अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया॥ ३४॥

तदनन्तर कौसल्या देवीने सुस्थिर चित्तसे धर्मपालनकी इच्छा रखकर उस अश्वके निकट एक रात निवास किया॥ ३४॥

होताध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन्।

महिष्या परिवृत्त्यार्थं वावातामपरां तथा॥ ३५॥

तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाताने राजाकी (क्षत्रियजातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्यजातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्रजातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’—इन सबके हाथसे उस अश्वका स्पर्श कराया31॥ ३५॥

पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रिय:।

ऋत्विक्परमसम्पन्न: श्रपयामास शास्त्रत:॥ ३६॥

इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधिपूर्वक अश्वकन्दके गूदेको निकालकर शास्त्रोक्त रीतिसे पकाया॥ ३६॥

धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिप:।

यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मन:॥ ३७॥

तत्पश्चात् उस गूदेकी आहुति दी गयी। राजा दशरथने अपने पापको दूर करनेके लिये ठीक समयपर आकर विधिपूर्वक उसके धूएँकी गन्धको सूँघा॥ ३७॥

हयस्य यानि चांगानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणा:।

अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ता: षोडशर्त्विज:॥ ३८॥

उस अश्वमेध यज्ञके अंगभूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्निमें विधिवत् आहुति देने लगे॥ ३८॥

प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हवि:।

अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते॥ ३९॥

अश्वमेधके अतिरिक्त अन्य यज्ञोंमें जो हवि दी जाती है, वह पाकरकी शाखाओंमें रखकर दी जाती है; परंतु अश्वमेध यज्ञका हविष्य बेंतकी चटाईमें रखकर देनेका नियम है॥ ३९॥

त्र्यहोऽश्वमेध: संख्यात: कल्पसूत्रेण ब्राह्मणै:।

चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम्॥ ४०॥

उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरात्रं तथोत्तरम्।

कारितास्तत्र बहवो विहिता: शास्त्रदर्शनात्॥ ४१॥

कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थोंके द्वारा अश्वमेधके तीन सवनीय दिन बताये गये हैं। उनमेंसे प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम (‘अग्निष्टोम’) कहा गया है। द्वितीय दिवस साध्य सवनको ‘उक्थ्य’ नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवनका अनुष्ठान होता है, उसे ‘अतिरात्र’ कहते हैं। उसमें शास्त्रीय दृष्टिसे विहित बहुत-से दूसरे-दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये॥ ४०-४१॥

ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ।

अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतु:॥ ४२॥

ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित्, छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम—ये सब-के-सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेधके उत्तर कालमें सम्पादित हुए॥ ४२॥

प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धन:।

अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्॥ ४३॥

अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने यज्ञ पूर्ण होनेपर होताको दक्षिणारूपमें अयोध्यासे पूर्व दिशाका सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्युको पश्चिम दिशा तथा ब्रह्माको दक्षिण दिशाका राज्य दे दिया॥ ४३॥

उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणैषा विनिर्मिता।

अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा॥ ४४॥

इसी तरह उद्गाताको उत्तर दिशाकी सारी भूमि दे दी। पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माजीने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऐसी ही दक्षिणाका विधान किया गया है32॥ ४४॥

क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायत: पुरुषर्षभ:।

ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरां तां कुलवर्धन:॥ ४५॥

इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने ऋत्विजोंको सारी पृथ्वी दान कर दी॥ ४५॥

एवं दत्त्वा प्रहृष्टोऽभूच्छ्रीमानिक्ष्वाकुनन्दन:।

ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकिल्बिषम्॥ ४६॥

यों दान देकर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथके हर्षकी सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेशसे इस प्रकार बोले—॥ ४६॥

भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।

न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ता: स्म पालने॥ ४७॥

‘महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। हममें इसके पालनकी शक्ति नहीं है; अत: भूमिसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है॥ ४७॥

रता: स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप।

निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति॥ ४८॥

‘भूमिपाल! हम तो सदा वेदोंके स्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं (इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता); अत: आप हमें यहाँ इस भूमिका कुछ निष्क्रय (मूल्य) ही दे दें॥ ४८॥

मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम्।

तत् प्रयच्छ नृपश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम्॥ ४९॥

‘नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणारूपसे दे दीजिये। इस धरतीसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है’॥ ४९॥

एवमुक्तो नरपतिर्ब्ह्मणैर्वेदपारगै:।

गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृप:॥ ५०॥

दशकोटिं सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम्।

वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान कीं। दस करोड़ स्वर्णमुद्रा तथा उससे चौगुनी रजतमुद्रा अर्पित की॥

ऋत्विजस्तु तत: सर्वे प्रददु: सहिता वसु॥ ५१॥

ऋष्यशृंगाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते।

तब उस समस्त ऋत्विजोंने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यशृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठको सौंप दिया॥ ५१/

ततस्ते न्यायत: कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमा:॥ ५२॥

सुप्रीतमनस: सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम्।

तदनन्तर उन दोनों महर्षियोंके सहयोगसे उस धनका न्यायपूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और बोले—महाराज! इस दक्षिणासे हम-लोग बहुत संतुष्ट हैं’॥ ५२/

तत: प्रसर्पकेभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहित:॥ ५३॥

जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा।

इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथने अभ्यागत ब्राह्मणोंको एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्णकी मुद्राएँ बाँटीं॥ ५३/

दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम्॥ ५४॥

कस्मैचिद् याचमानाय ददौ राघवनन्दन:।

[सारा धन दे देनेके बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब] एक दरिद्र ब्राह्मणने आकर राजासे धनकी याचना की। उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेशने उसे अपने हाथका उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया॥ ५४/

तत: प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सल:॥ ५५॥

प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रिय:।

तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उनपर स्नेह रखनेवाले नरेशने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्षसे विह्वल हो रही थीं॥ ५५/

तस्याशिषोऽथ विविधा ब्राह्मणै: समुदाहृता:॥ ५६॥

उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च।

पृथ्वीपर पड़े हुए उन उदार नरवीरको ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके आशीर्वाद दिये॥ ५६/

तत: प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्॥ ५७॥

पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभै:।

तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञका पुण्यफल पाकर राजा दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वह यज्ञ उनके सब पापोंका नाश करनेवाला तथा उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाला था। साधारण राजाओंके लिये उस यज्ञको आदिसे अन्ततक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था॥

ततोऽब्रवीदृष्यशृंगं राजा दशरथस्तदा॥ ५८॥

कुलस्य वर्धनं तत् तु कर्तुमर्हसि सुव्रत।

यज्ञ समाप्त होनेपर राजा दशरथने ऋष्यशृंगसे कहा—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! अब जो कर्म मेरी कुलपरम्पराको बढ़ानेवाला हो, उसका सम्पादन आपको करना चाहिये’॥ ५८/

तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तम:।

भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहा:॥ ५९॥

तब द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग ‘तथास्तु’ कहकर राजासे बोले—‘राजन्! आपके चार पुत्र होंगे, जो इस कुलके भारको वहन करनेमें समर्थ होंगे’॥ ५९॥

स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य

प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्र:।

जगाम हर्षं परमं महात्मा

तमृष्यशृंगं पुनरप्युवाच॥ ६०॥

उनका यह मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले महामना महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षको प्राप्त हुए तथा उन्होंने ऋष्यशृंगको पुन: पुत्रप्राप्ति करानेवाले कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये प्रेरित किया॥ ६०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दश: सर्ग:॥ १४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥

 

पञ्चदश: सर्ग:

ऋष्यशृंगद्वारा राजा दशरथके पुत्रेष्टि यज्ञका आरम्भ, देवताओंकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीका रावणके वधका उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णुका देवताओंको आश्वासन देना

मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम्।

लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत्॥ १॥

महात्मा ऋष्यशृंग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देरतक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्यका निश्चय किया। फिर ध्यानसे विरत हो वे राजासे इस प्रकार बोले—॥ १॥

इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात्।

अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रै: सिद्धां विधानत:॥ २॥

‘महाराज! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’॥ २॥

तत: प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात्।

जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा॥ ३॥

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौतविधिके अनुसार अग्निमें आहुति डाली॥ ३॥

ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:।

भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि॥ ४॥

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधिके अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए॥ ४॥

ता: समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवता:।

अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं तत:॥ ५॥

उस यज्ञ-सभामें क्रमश: एकत्र होकर (दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले—॥ ५॥

भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षस:।

सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुम:॥ ६॥

‘भगवन्! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें॥ ६॥

त्वया तस्मै वरो दत्त: प्रीतेन भगवंस्तदा।

मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे॥ ७॥

‘प्रभो! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है। तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं॥ ७॥

उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मति:।

शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति॥ ८॥

‘उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकोंदम कर रखा है। वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है। देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है॥ ८॥

ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा।

अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहित:॥ ९॥

‘आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है॥ ९॥

नैनं सूर्य: प्रतपति पार्श्वे वाति न मारुत:।

चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते॥ १०॥

‘सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते। वायु उसके पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरंगें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध-सा हो जाता है—उसमें कम्पन नहीं होता॥ १०॥

तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात्।

वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि॥ ११॥

‘वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है। उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अत: भगवन्! उसके वधके लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये’॥ ११॥

एवमुक्त: सुरै: सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत्।

हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मन:॥ १२॥

तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम्।

अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया॥ १३॥

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले—‘देवताओ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया। उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने भी ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली॥ १२-१३॥

नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा।

तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्युर्नान्योऽस्य विद्यते॥ १४॥

‘मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होनेका वरदान नहीं माँगा। इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा। मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्युका कारण नहीं है’॥ १४॥

एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम्।

देवा महर्षय: सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा॥ १५॥

ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए॥ १५॥

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युति:।

शङ्खचक्रगदापाणि: पीतवासा जगत्पति:॥ १६॥

वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा।

तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमान: सुरोत्तमै:॥ १७॥

ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहित:।

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्णके बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये॥ १६-१७/

तमब्रुवन् सुरा: सर्वे समभिष्टूय संनता:॥ १८॥

त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया।

तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तुति करके कहा—‘सर्वव्यापी परमेश्वर! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं॥ १८/

राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो॥ १९॥

धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजस:।

अस्य भार्यासु तिसृषु हृश्रीकीर्त्युपमासु च॥ २०॥

विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्।

तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम्॥ २१॥

अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम्।

‘प्रभो! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं। उनके तीन रानियाँ हैं जो हृ, श्री और कीर्ति—इन तीन देवियोंके समान हैं। विष्णुदेव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये। इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको, जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये॥ १९—२१/

स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान्॥ २२॥

राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योद्रेकेण बाधते।

‘वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है॥ २२/

ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ २३॥

क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिता:।

‘उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है॥ २३/

वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभि: सह॥ २४॥

सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गता:।

‘इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं॥ २४/

त्वं गति: परमा देव सर्वेषां न: परंतप॥ २५॥

वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मन: कुरु।

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अत: इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये’॥ २५/

एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगव:॥ २६॥

पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृत:।

अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान्॥ २७॥

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोक-वन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा—॥ २६-२७॥

भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम्।

सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम्॥ २८॥

हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम्।

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च॥ २९॥

वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम्।

‘देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयको त्याग दो। मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा। देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा’॥ २८-२९/

एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान्॥ ३०॥

मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मन:।

देवताओंको ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णुने मनुष्यलोकमें पहले अपनी जन्मभूमिके सम्बन्धमें विचार किया॥ ३०/

तत: पद्मपलाशाक्ष: कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्॥ ३१॥

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्।

इसके बाद कमलनयन श्रीहरिने अपनेको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके राजा दशरथको पिता बनानेका निश्चय किया॥ ३१/

ततो देवर्षिगन्धर्वा: सरुद्रा: साप्सरोगणा:।

स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३२॥

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया॥ ३२॥

तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं

प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम्।

विरावणं साधुतपस्विकण्टकं

तपस्विनामुद्धर तं भयावहम्॥ ३३॥

वे कहने लगे—‘प्रभो! रावण बड़ा उद्दण्ड है। उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमण्ड बहुत बढ़ा-चढ़ा है। वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है। तीनों लोकोंको रुलाता है, साधुओं और तपस्वी जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अत: तापसोंको भय देनेवाले उस भयानक राक्षसकी आप जड़ उखाड़ डालिये॥ ३३॥

तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं

विरावणं रावणमुग्रपौरुषम्।

स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं

सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम्॥ ३४॥

‘उपेन्द्र! सारे जगत्को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है’॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदश: सर्ग:॥ १५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥

 

षोडश: सर्ग:

देवताओंका श्रीहरिसे रावणवधके लिये मनुष्यरूपमें अवतीर्ण होनेको कहना, राजाके पुत्रेष्टि यज्ञमें अग्निकुण्डसे प्राजापत्य पुरुषका प्रकट होकर खीरअर्पण करना और उसे खाकर रानियोंका गर्भवती होना

ततो नारायणो विष्णुर्नियुक्त: सुरसत्तमै:।

जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ देवताओंद्वारा इस प्रकार रावणवधके लिये नियुक्त होनेपर सर्वव्यापी नारायणने रावणवधके उपायको जानते हुए भी देवताओंसे यह मधुर वचन कहा—॥ १॥

उपाय: को वधे तस्य राक्षसाधिपते: सुरा:।

यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम्॥ २॥

‘देवगण! राक्षसराज रावणके वधके लिये कौन-सा उपाय है, जिसका आश्रय लेकर मैं महर्षियोंके लिये कण्टकरूप उस निशाचरका वध करूँ?’॥ २॥

एवमुक्ता: सुरा: सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम्।

मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे॥ ३॥

उनके इस तरह पूछनेपर सब देवता उन अविनाशी भगवान् विष्णुसे बोले—‘प्रभो! आप मनुष्यका रूप धारण करके युद्धमें रावणको मार डालिये॥ ३॥

स हि तेपे तपस्तीव्रं दीर्घकालमरिंदम:।

येन तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा लोककृल्लोकपूर्वज:॥ ४॥

‘उस शत्रुदमन निशाचरने दीर्घकालतक तीव्र तपस्या की थी, जिससे सब लोगोंके पूर्वज लोकस्रष्टा ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हो गये॥ ४॥

संतुष्ट: प्रददौ तस्मै राक्षसाय वरं प्रभु:।

नानाविधेभ्यो भूतेभ्यो भयं नान्यत्र मानुषात्॥ ५॥

‘उसपर संतुष्ट हुए भगवान् ब्रह्माने उस राक्षसको यह वर दिया कि तुम्हें नाना प्रकारके प्राणियोंमेंसे मनुष्यके सिवा और किसीसे भय नहीं है॥ ५॥

अवज्ञाता: पुरा तेन वरदाने हि मानवा:।

एवं पितामहात् तस्माद् वरदानेन गर्वित:॥ ६॥

‘पूर्वकालमें वरदान लेते समय उस राक्षसने मनुष्योंको दुर्बल समझकर उनकी अवहेलना कर दी थी। इस प्रकार पितामहसे मिले हुए वरदानके कारण उसका घमण्ड बढ़ गया है॥ ६॥

उत्सादयति लोकांस्त्रीन् स्त्रियश्चाप्युपकर्षति।

तस्मात् तस्य वधो दृष्टो मानुषेभ्य: परंतप॥ ७॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! वह तीनों लोकोंको पीड़ा देता और स्त्रियोंका भी अपहरण कर लेता है; अत: उसका वध मनुष्यके हाथसे ही निश्चित हुआ है’॥ ७॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान्।

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्॥ ८॥

समस्त जीवात्माओंको वशमें रखनेवाले भगवान् विष्णुने देवताओंकी यह बात सुनकर अवतारकालमें राजा दशरथको ही पिता बनानेकी इच्छा की॥ ८॥

स चाप्यपुत्रो नृपतिस्तस्मिन् काले महाद्युति:।

अयजत् पुत्रियामिष्टिं पुत्रेप्सुररिसूदन:॥ ९॥

उसी समय वे शत्रुसूदन महातेजस्वी नरेश पुत्रहीन होनेके कारण पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे पुत्रेष्टियज्ञ कर रहे थे॥ ९॥

स कृत्वा निश्चयं विष्णुरामन्त्र्य च पितामहम्।

अन्तर्धानं गतो देवै: पूज्यमानो महर्षिभि:॥ १०॥

उन्हें पिता बनानेका निश्चय करके भगवान् विष्णु पितामहकी अनुमति ले देवताओं और महर्षियोंसे पूजित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये॥ १०॥

ततो वै यजमानस्य पावकादतुलप्रभम्।

प्रादुर्भूतं महद् भूतं महावीर्यं महाबलम्॥ ११॥

तत्पश्चात् पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए राजा दशरथके यज्ञमें अग्निकुण्डसे एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ। उसके शरीरमें इतना प्रकाश था, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसका बल-पराक्रम महान् था॥ ११॥

कृष्णं रक्ताम्बरधरं रक्तास्यं दुन्दुभिस्वनम्।

स्निग्धहर्यक्षतनुजश्मश्रुप्रवरमूर्धजम् ॥ १२॥

उसकी अंगकान्ति काले रंगकी थी। उसने अपने शरीरपर लाल वस्त्र धारण कर रखा था। उसका मुख भी लाल ही था। उसकी वाणीसे दुन्दुभिके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी। उसके रोम, दाढ़ी-मूँछ और बड़े-बड़े केश चिकने और सिंहके समान थे॥ १२॥

शुभलक्षणसम्पन्नं दिव्याभरणभूषितम्।

शैलशृंगसमुत्सेधं दृप्तशार्दूलविक्रमम्॥ १३॥

वह शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शैलशिखरके समान ऊँचा तथा गर्वीले सिंहके समान चलनेवाला था॥ १३॥

दिवाकरसमाकारं दीप्तानलशिखोपमम्।

तप्तजाम्बूनदमयीं राजतान्तपरिच्छदाम्॥ १४॥

दिव्यपायससम्पूर्णां पात्रीं पत्नीमिव प्रियाम्।

प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्यां स्वयं मायामयीमिव॥ १५॥

उसकी आकृति सूर्यके समान तेजोमयी थी। वह प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान देदीप्यमान हो रहा था। उसके हाथमें तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णकी बनी हुई परात थी, जो चाँदीके ढक्कनसे ढँकी हुई थी। वह (परात) थाली बहुत बड़ी थी और दिव्य खीरसे भरी हुई थी। उसे उस पुरुषने स्वयं अपनी दोनों भुजाओंपर इस तरह उठा रखा था, मानो कोई रसिक अपनी प्रियतमा पत्नीको अङ्कमें लिये हुए हो। वह अद्भुत परात मायामयी-सी जान पड़ती थी॥ १४-१५॥

समवेक्ष्याब्रवीद् वाक्यमिदं दशरथं नृपम्।

प्राजापत्यं नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृप॥ १६॥

उसने राजा दशरथकी ओर देखकर कहा—‘नरेश्वर! मुझे प्रजापतिलोकका पुरुष जानो। मैं प्रजापतिकी ही आज्ञासे यहाँ आया हूँ’॥ १६॥

तत: परं तदा राजा प्रत्युवाच कृताञ्जलि:।

भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किमहं करवाणि ते॥ १७॥

तब राजा दशरथने हाथ जोड़कर उससे कहा— ‘भगवन्! आपका स्वागत है। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ १७॥

अथो पुनरिदं वाक्यं प्राजापत्यो नरोऽब्रवीत्।

राजन्नर्चयता देवानद्य प्राप्तमिदं त्वया॥ १८॥

फिर उस प्राजापत्य पुरुषने पुन: यह बात कही—‘राजन्! तुम देवताओंकी आराधना करते हो; इसीलिये तुम्हें आज यह वस्तु प्राप्त हुई है॥ १८॥

इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम्।

प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्यवर्धनम्॥ १९॥

‘नृपश्रेष्ठ! यह देवताओंकी बनायी हुई खीर है, जो संतानकी प्राप्ति करानेवाली है। तुम इसे ग्रहण करो। यह धन और आरोग्यकी भी वृद्धि करनेवाली है॥ १९॥

भार्याणामनुरूपाणामश्नीतेति प्रयच्छ वै।

तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान् यदर्थं यजसे नृप॥ २०॥

‘राजन्! यह खीर अपनी योग्य पत्नियोंको दो और कहो—‘तुमलोग इसे खाओ।’ ऐसा करनेपर उनके गर्भसे आपको अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होगी, जिनके लिये तुम यह यज्ञ कर रहे हो’॥ २०॥

तथेति नृपति: प्रीत: शिरसा प्रतिगृह्य ताम्।

पात्रीं देवान्नसम्पूर्णां देवदत्तां हिरण्मयीम्॥ २१॥

अभिवाद्य च तद्भूतमद्भुतं प्रियदर्शनम्।

मुदा परमया युक्तश्चकाराभिप्रदक्षिणम्॥ २२॥

राजाने प्रसन्नतापूर्वक ‘बहुत अच्छा’ कहकर उस दिव्य पुरुषकी दी हुई देवान्नसे परिपूर्ण सोनेकी थालीको लेकर उसे अपने मस्तकपर धारण किया। फिर उस अद्भुत एवं प्रियदर्शन पुरुषको प्रणाम करके बड़े आनन्दके साथ उसकी परिक्रमा की॥ २१-२२॥

ततो दशरथ: प्राप्य पायसं देवनिर्मितम्।

बभूव परमप्रीत: प्राप्य वित्तमिवाधन:॥ २३॥

ततस्तदद्भुतप्रख्यं भूतं परमभास्वरम्।

संवर्तयित्वा तत् कर्म तत्रैवान्तरधीयत॥ २४॥

इस प्रकार देवताओंकी बनायी हुई उस खीरको पाकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए, मानो निर्धनको धन मिल गया हो। इसके बाद वह परम तेजस्वी अद्भुत पुरुष अपना वह काम पूरा करके वहीं अन्तर्धान हो गया॥ २३-२४॥

हर्षरश्मिभिरुद्द्योतं तस्यान्त:पुरमाबभौ।

शारदस्याभिरामस्य चन्द्रस्येव नभोंऽशुभि:॥ २५॥

उस समय राजाके अन्त:पुरकी स्त्रियाँ हर्षोल्लाससे बढ़ी हुई कान्तिमयी किरणोंसे प्रकाशित हो ठीक उसी तरह शोभा पाने लगीं, जैसे शरत्कालके नयनाभिराम चन्द्रमाकी रम्य रश्मियोंसे उद्भासित होनेवाला आकाश सुशोभित होता है॥ २५॥

सोऽन्त:पुरं प्रविश्यैव कौसल्यामिदमब्रवीत्।

पायसं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रीयं त्विदमात्मन:॥ २६॥

राजा दशरथ वह खीर लेकर अन्त:पुरमें गये और कौसल्यासे बोले—‘देवि! यह अपने लिये पुत्रकी प्राप्ति करानेवाली खीर ग्रहण करो’॥ २६॥

कौसल्यायै नरपति: पायसार्धं ददौ तदा।

अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिप:॥ २७॥

ऐसा कहकर नरेशने उस समय उस खीरका आधा भाग महारानी कौसल्याको दे दिया। फिर बचे हुए आधेका आधा भाग रानी सुमित्राको अर्पण किया॥ २७॥

कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात्।

प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम्॥ २८॥

अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामति:।

एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक्॥ २९॥

उन दोनोंको देनेके बाद जितनी खीर बच रही, उसका आधा भाग तो उन्होंने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे कैकेयीको दे दिया। तत्पश्चात् उस खीरका जो अवशिष्ट आधा भाग था, उस अमृतोपम भागको महाबुद्धिमान् नरेशने कुछ सोच-विचारकर पुन: सुमित्राको ही अर्पित कर दिया। इस प्रकार राजाने अपनी सभी रानियोंको अलग-अलग खीर बाँट दी॥ २८-२९॥

ताश्चैवं पायसं प्राप्य नरेन्द्रस्योत्तमस्त्रिय:।

सम्मानं मेनिरे सर्वा: प्रहर्षोदितचेतस:॥ ३०॥

महाराजकी उन सभी साध्वी रानियोंने उनके हाथसे वह खीर पाकर अपना सम्मान समझा। उनके चित्तमें अत्यन्त हर्षोल्लास छा गया॥ ३०॥

ततस्तु ता: प्राश्य तमुत्तमस्त्रियो

महीपतेरुत्तमपायसं पृथक्।

हुताशनादित्यसमानतेजसो-

ऽचिरेण गर्भान् प्रतिपेदिरे तदा॥ ३१॥

उस उत्तम खीरको खाकर महाराजकी उन तीनों साध्वी महारानियोंने शीघ्र ही पृथक्-पृथक् गर्भ धारण किया। उनके वे गर्भ अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी थे॥ ३१॥

ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ता: स्त्रिय:

प्ररूढगर्भा: प्रतिलब्धमानस:।

बभूव हृष्टस्त्रिदिवे यथा हरि:

सुरेन्द्रसिद्धर्षिगणाभिपूजित: ॥ ३२॥

तदनन्तर अपनी उन रानियोंको गर्भवती देख राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने समझा, मेरा मनोरथ सफल हो गया। जैसे स्वर्गमें इन्द्र, सिद्ध तथा ऋषियोंसे पूजित हो श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार भूतलमें देवेन्द्र, सिद्ध तथा महर्षियोंसे सम्मानित हो राजा दशरथ संतुष्ट हुए थे॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षोडश: सर्ग:॥ १६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६॥

 

सप्तदश: सर्ग:

ब्रह्माजीकी प्रेरणासे देवता आदिके द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियोंकी उत्पत्ति

पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मन:।

उवाच देवता: सर्वा: स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥ १॥

जब भगवान् विष्णु महामनस्वी राजा दशरथके पुत्रभावको प्राप्त हो गये, तब भगवान् ब्रह्माजीने सम्पूर्ण देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिण:।

विष्णो: सहायान् बलिन: सृजध्वं कामरूपिण:॥ २॥

मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।

नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान्॥ ३॥

असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान्।

सर्वास्त्रगुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव ॥ ४॥

‘देवगण! भगवान् विष्णु सत्यप्रतिज्ञ, वीर और हम सब लोगोंके हितैषी हैं। तुमलोग उनके सहायकरूपसे ऐसे पुत्रोंकी सृष्टि करो, जो बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, माया जाननेवाले, शूरवीर, वायुके समान वेगशाली, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, विष्णुतुल्य पराक्रमी, किसीसे परास्त न होनेवाले, तरह-तरहके उपायोंके जानकार, दिव्य शरीरधारी तथा अमृतभोजी देवताओंके समान सब प्रकारकी अस्त्रविद्याके गुणोंसे सम्पन्न हों॥

अप्सरस्सु च मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु च।

यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्याधरीषु च॥ ५॥

किन्नरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च।

सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान्॥ ६॥

‘प्रधान-प्रधान अप्सराओं, गन्धर्वोंकी स्त्रियों, यक्ष और नागोंकी कन्याओं, रीछोंकी स्त्रियों, विद्याधरियों, किन्नरियों तथा वानरियोंके गर्भसे वानररूपमें अपने ही तुल्य पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करो॥ ५-६॥

पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवानृक्षपुंगव:।

जृम्भमाणस्य सहसा मम वक्त्रादजायत॥ ७॥

‘मैंने पहलेसे ही ऋक्षराज जाम्बवान्की सृष्टि कर रखी है। एक बार मैं जँभाई ले रहा था, उसी समय वह सहसा मेरे मुँहसे प्रकट हो गया’॥ ७॥

ते तथोक्ता भगवता तत् प्रतिश्रुत्य शासनम्।

जनयामासुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिण:॥ ८॥

भगवान् ब्रह्माके ऐसा कहनेपर देवताओंने उनकी आज्ञा स्वीकार की और वानररूपमें अनेकानेक पुत्र उत्पन्न किये॥ ८॥

ऋषयश्च महात्मान: सिद्धविद्याधरोरगा:।

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिण:॥ ९॥

महात्मा, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर, नाग और चारणोंने भी वनमें विचरनेवाले वानर-भालुओंके रूपमें वीर पुत्रोंको जन्म दिया॥ ९॥

वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम्।

सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतां वर:॥ १०॥

देवराज इन्द्रने वानरराज वालीको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया, जो महेन्द्र पर्वतके समान विशालकाय और बलिष्ठ था। तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यने सुग्रीवको जन्म दिया॥ १०॥

बृहस्पतिस्त्वजनयत् तारं नाम महाकपिम्।

सर्ववानरमुख्यानां बुद्धिमन्तमनुत्तमम्॥ ११॥

बृहस्पतिने तार नामक महाकाय वानरको उत्पन्न किया, जो समस्त वानर सरदारोंमें परम बुद्धिमान् और श्रेष्ठ था॥

धनदस्य सुत: श्रीमान् वानरो गन्धमादन:।

विश्वकर्मा त्वजनयन्नलं नाम महाकपिम्॥ १२॥

तेजस्वी वानर गन्धमादन कुबेरका पुत्र था। विश्वकर्माने नल नामक महान् वानरको जन्म दिया॥ १२॥

पावकस्य सुत: श्रीमान् नीलोऽग्निसदृशप्रभ:।

तेजसा यशसा वीर्यादत्यरिच्यत वीर्यवान्॥ १३॥

अग्निके समान तेजस्वी श्रीमान् नील साक्षात् अग्निदेवका ही पुत्र था। वह पराक्रमी वानर तेज, यश और बल-वीर्यमें सबसे बढ़कर था॥ १३॥

रूपद्रविणसम्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ।

मैन्दं च द्विविदं चैव जनयामासतु: स्वयम्॥ १४॥

रूप-वैभवसे सम्पन्न, सुन्दर रूपवाले दोनों अश्विनीकुमारोंने स्वयं ही मैन्द और द्विविदको जन्म दिया था॥ १४॥

वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम्।

शरभं जनयामास पर्जन्यस्तु महाबल:॥ १५॥

वरुणने सुषेण नामक वानरको उत्पन्न किया और महाबली पर्जन्यने शरभको जन्म दिया॥ १५॥

मारुतस्यौरस: श्रीमान् हनूमान् नाम वानर:।

वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे॥ १६॥

हनुमान् नामवाले ऐश्वर्यशाली वानर वायुदेवताके औरस पुत्र थे। उनका शरीर वज्रके समान सुदृढ़ था। वे तेज चलनेमें गरुड़के समान थे॥ १६॥

सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि।

ते सृष्टा बहुसाहस्रा दशग्रीववधोद्यता:॥ १७॥

सभी श्रेष्ठ वानरोंमें वे सबसे अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। इस प्रकार कई हजार वानरोंकी उत्पत्ति हुई। वे सभी रावणका वध करनेके लिये उद्यत रहते थे॥ १७॥

अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ता: कामरूपिण:।

ते गजाचलसंकाशा वपुष्मन्तो महाबला:॥ १८॥

उनके बलकी कोई सीमा नहीं थी। वे वीर, पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। गजराजों और पर्वतोंके समान महाकाय तथा महाबली थे॥ १८॥

ऋक्षवानरगोपुच्छा: क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे।

यस्य देवस्य यद्रूपं वेषो यश्च पराक्रम:॥ १९॥

अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् पृथक्।

गोलांगूलेषु चोत्पन्ना: किंचिदुन्नतविक्रमा:॥ २०॥

रीछ, वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) जातिके वीर शीघ्र ही उत्पन्न हो गये। जिस देवताका जैसा रूप, वेष और पराक्रम था, उससे उसीके समान पृथक्-पृथक् पुत्र उत्पन्न हुआ। लंगूरोंमें जो देवता उत्पन्न हुए, वे देवावस्थाकी अपेक्षा भी कुछ अधिक पराक्रमी थे॥ १९-२०॥

ऋक्षीषु च तथा जाता वानरा: किन्नरीषु च।

देवा महर्षिगन्धर्वास्तार्क्ष्ययक्षा यशस्विन:॥ २१॥

नागा: किंपुरुषाश्चैव सिद्धविद्याधरोरगा:।

बहवो जनयामासुर्हृष्टास्तत्र सहस्रश:॥ २२॥

कुछ वानर रीछ जातिकी माताओंसे तथा कुछ किन्नरियोंसे उत्पन्न हुए। देवता, महर्षि, गन्धर्व, गरुड़, यशस्वी यक्ष, नाग, किम्पुरुष, सिद्ध, विद्याधर तथा सर्प जातिके बहुसंख्यक व्यक्तियोंने अत्यन्त हर्षमें भरकर सहस्रों पुत्र उत्पन्न किये॥ २१-२२॥

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिण:।

वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिण:॥ २३॥

देवताओंका गुण गानेवाले वनवासी चारणोंने बहुत-से वीर, विशालकाय वानरपुत्र उत्पन्न किये। वे सब जंगली फल-मूल खानेवाले थे॥ २३॥

अप्सरस्सु च मुख्यासु तथा विद्याधरीषु च।

नागकन्यासु च तदा गन्धर्वीणां तनूषु च।

कामरूपबलोपेता यथाकामविचारिण:॥ २४॥

मुख्य-मुख्य अप्सराओं, विद्याधरियों, नागकन्याओं तथा गन्धर्व-पत्नियोंके गर्भसे भी इच्छानुसार रूप और बलसे युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करनेमें समर्थ वानरपुत्र उत्पन्न हुए॥ २४॥

सिंहशार्दूलसदृशा दर्पेण च बलेन च।

शिलाप्रहरणा: सर्वे सर्वे पर्वतयोधिन:॥ २५॥

वे दर्प और बलमें सिंह और व्याघ्रोंके समान थे। पत्थरकी चट्टानोंसे प्रहार करते और पर्वत उठाकर लड़ते थे॥ २५॥

नखदंष्ट्रायुधा: सर्वे सर्वे सर्वास्त्रकोविदा:।

विचालयेयु: शैलेन्द्रान् भेदयेयु: स्थिरान् द्रुमान्॥ २६॥

वे सभी नख और दाँतोंसे भी शस्त्रोंका काम लेते थे। उन सबको सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान था। वे पर्वतोंको भी हिला सकते थे और स्थिरभावसे खड़े हुए वृक्षोंको भी तोड़ डालनेकी शक्ति रखते थे॥ २६॥

क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्रं सरितां पतिम्।

दारयेयु: क्षितिं पद्भ्यामाप्लवेयुर्महार्णवान्॥ २७॥

अपने वेगसे सरिताओंके स्वामी समुद्रको भी क्षुब्ध कर सकते थे। उनमें पैरोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर डालनेकी शक्ति थी। वे महासागरोंको भी लाँघ सकते थे॥ २७॥

नभस्तलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान्।

गृह्णीयुरपि मातंगान् मत्तान् प्रव्रजतो वने॥ २८॥

वे चाहें तो आकाशमें घुस जायँ, बादलोंको हाथोंसे पकड़ लें तथा वनमें वेगसे चलते हुए मतवाले गजराजोंको भी बन्दी बना लें॥ २८॥

नर्दमानांश्च नादेन पातयेयुर्विहंगमान्।

ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम्॥ २९॥

शतं शतसहस्राणि यूथपानां महात्मनाम्।

ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपा:॥ ३०॥

घोर शब्द करते हुए आकाशमें उड़नेवाले पक्षियोंको भी वे अपने सिंहनादसे गिरा सकते थे। ऐसे बलशाली और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महाकाय वानर यूथपति करोड़ोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे। वे वानरोंके प्रधान यूथोंके भी यूथपति थे॥ २९-३०॥

बभूवुर्यूथपश्रेष्ठान् वीरांश्चाजनयन् हरीन्।

अन्ये ऋक्षवत: प्रस्थानुपतस्थु: सहस्रश:॥ ३१॥

उन यूथपतियोंने भी ऐसे वीर वानरोंको उत्पन्न किया था, जो यूथपोंसे भी श्रेष्ठ थे। वे और ही प्रकारके वानर थे—इन प्राकृत वानरोंसे विलक्षण थे। उनमेंसे सहस्रों वानर-यूथपति ऋक्षवान् पर्वतके शिखरोंपर निवास करने लगे॥ ३१॥

अन्ये नानाविधान् शैलान् काननानि च भेजिरे।

सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम्॥ ३२॥

भ्रातरावुपतस्थुस्ते सर्वे च हरियूथपा:।

नलं नीलं हनूमन्तमन्यांश्च हरियूथपान्॥ ३३॥

ते तार्क्ष्यबलसम्पन्ना: सर्वे युद्धविशारदा:।

विचरन्तोऽर्दयन् सर्वान् सिंहव्याघ्रमहोरगान्॥ ३४॥

दूसरोंने नाना प्रकारके पर्वतों और जंगलोंका आश्रय लिया। इन्द्रकुमार वाली और सूर्यनन्दन सुग्रीव ये दोनों भाई थे। समस्त वानरयूथपति उन दोनों भाइयोंकी सेवामें उपस्थित रहते थे। इसी प्रकार वे नल-नील, हनुमान् तथा अन्य वानर सरदारोंका आश्रय लेते थे। वे सभी गरुड़के समान बलशाली तथा युद्धकी कलामें निपुण थे। वे वनमें विचरते समय सिंह, व्याघ्र और बड़े-बड़े नाग आदि समस्त वनजन्तुओंको रौंद डालते थे॥

महाबलो महाबाहुर्वाली विपुलविक्रम:।

जुगोप भुजवीर्येण ऋक्षगोपुच्छवानरान्॥ ३५॥

महाबाहु वाली महान् बलसे सम्पन्न तथा विशेष पराक्रमी थे। उन्होंने अपने बाहुबलसे रीछों, लंगूरों तथा अन्य वानरोंकी रक्षा की थी॥ ३५॥

तैरियं पृथिवी शूरै: सपर्वतवनार्णवा।

कीर्णा विविधसंस्थानैर्नानाव्यञ्जनलक्षणै:॥ ३६॥

उन सबके शरीर और पार्थक्यसूचक लक्षण नाना प्रकारके थे। वे शूरवीर वानर पर्वत, वन और समुद्रोंसहित समस्त भूमण्डलमें फैल गये॥ ३६॥

तैर्मेघवृन्दाचलकूटसंनिभै-

र्महाबलैर्वानरयूथपाधिपै: ।

बभूव भूर्भीमशरीररूपै:

समावृता रामसहायहेतो:॥ ३७॥

वे वानरयूथपति मेघसमूह तथा पर्वतशिखरके समान विशालकाय थे। उनका बल महान् था। उनके शरीर और रूप भयंकर थे। भगवान् श्रीरामकी सहायताके लिये प्रकट हुए उन वानर वीरोंसे यह सारी पृथ्वी भर गयी थी॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तदश: सर्ग:॥ १७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७॥

 

अष्टादश: सर्ग:

राजाओं तथा ऋष्यशृंगको विदा करके राजा दशरथका रानियोंसहित पुरीमें आगमन, श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नके जन्म, संस्कार, शील-स्वभाव एवं सद्गुण, राजाके दरबारमें विश्वामित्रका आगमन और उनका सत्कार

निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मन:।

प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥ १॥

महामना राजा दशरथका यज्ञ समाप्त होनेपर देवतालोग अपना-अपना भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये॥ १॥

समाप्तदीक्षानियम: पत्नीगणसमन्वित:।

प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहन:॥ २॥

दीक्षाका नियम समाप्त होनेपर राजा अपनी पत्नियोंको साथ ले सेवक, सैनिक और सवारियोंसहित पुरीमें प्रविष्ट हुए॥ २॥

यथार्हं पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वरा:।

मुदिता: प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम्॥ ३॥

भिन्न-भिन्न देशोंके राजा भी (जो उनके यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये थे) महाराज दशरथद्वारा यथावत् सम्मानित हो मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंगको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने देशको चले गये॥ ३॥

श्रीमतां गच्छतां तेषां स्वगृहाणि पुरात् तत:।

बलानि राज्ञां शुभ्राणि प्रहृष्टानि चकाशिरे॥ ४॥

अयोध्यापुरीसे अपने घरको जाते हुए उन श्रीमान् नरेशोंके शुभ्र सैनिक अत्यन्त हर्षमग्न होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ४॥

गतेषु पृथिवीशेषु राजा दशरथ: पुन:।

प्रविवेश पुरीं श्रीमान् पुरस्कृत्य द्विजोत्तमान्॥ ५॥

उन राजाओंके विदा हो जानेपर श्रीमान् महाराज दशरथने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे करके अपनी पुरीमें प्रवेश किया॥ ५॥

शान्तया प्रययौ सार्धमृष्यशृंग: सुपूजित:।

अनुगम्यमानो राज्ञा च सानुयात्रेण धीमता॥ ६॥

राजाद्वारा अत्यन्त सम्मानित हो ऋष्यशृंग मुनि भी शान्ताके साथ अपने स्थानको चले गये। उस समय सेवकोंसहित बुद्धिमान् महाराज दशरथ कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे उन्हें पहुँचाने गये थे॥ ६॥

एवं विसृज्य तान् सर्वान् राजा सम्पूर्णमानस:।

उवास सुखितस्तत्र पुत्रोत्पत्तिं विचिन्तयन्॥ ७॥

इस प्रकार उन सब अतिथियोंको विदा करके सफलमनोरथ हुए राजा दशरथ पुत्रोत्पत्तिकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बड़े सुखसे रहने लगे॥ ७॥

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययु:।

ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥ ८ ॥

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥ ९ ॥

प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।

कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्॥ १०॥

यज्ञ-समाप्तिके पश्चात् जब छ: ऋतुएँ बीत गयीं, तब बारहवें मासमें चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्नमें कौसल्यादेवीने दिव्य लक्षणोंसे युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीरामको जन्म दिया। उस समय (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र—ये) पाँच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थानमें विद्यमान थे तथा लग्नमें चन्द्रमाके साथ बृहस्पति विराजमान थे॥

विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम्।

लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम्॥ ११॥

वे विष्णुस्वरूप हविष्य या खीरके आधे भागसे प्रकट हुए थे। कौसल्याके महाभाग पुत्र श्रीराम इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले थे। उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लालिमा थी। उनके ओठ लाल, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और स्वर दुन्दुभिके शब्दके समान गम्भीर था॥ ११॥

कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।

यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना॥ १२॥

उस अमिततेजस्वी पुत्रसे महारानी कौसल्याकी बड़ी शोभा हुई, ठीक उसी तरह, जैसे सुरश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्रसे देवमाता अदिति सुशोभित हुई थीं॥ १२॥

भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रम:।

साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भाग: सर्वै: समुदितो गुणै:॥ १३॥

तदनन्तर कैकेयीसे सत्यपराक्रमी भरतका जन्म हुआ, जो साक्षात् भगवान् विष्णुके (स्वरूपभूत पायस—खीरके) चतुर्थांशसे भी न्यून भागसे प्रकट हुए थे। ये समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे॥ १३॥

अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राजनयत् सुतौ।

वीरौ सर्वास्त्रकुशलौ विष्णोरर्धसमन्वितौ॥ १४॥

इसके बाद रानी सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न—इन दो पुत्रोंको जन्म दिया। ये दोनों वीर साक्षात् भगवान् विष्णुके अर्धभागसे सम्पन्न और सब प्रकारके अस्त्रोंकी विद्यामें कुशल थे॥ १४॥

पुष्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधी:।

सार्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेऽभ्युदिते रवौ॥ १५॥

भरत सदा प्रसन्नचित्त रहते थे। उनका जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्नमें हुआ था। सुमित्राके दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्कलग्नमें उत्पन्न हुए थे। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थानमें विराजमान थे॥ १५॥

राज्ञ: पुत्रा महात्मानश्चत्वारो जज्ञिरे पृथक्।

गुणवन्तोऽनुरूपाश्च रुच्या प्रोष्ठपदोपमा:॥ १६॥

राजा दशरथके ये चारों महामनस्वी पुत्र पृथक्-पृथक् गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे। ये भाद्रपदा नामक चार तारोंके समान कान्तिमान् थे33॥ १६॥

जगु: कलं च गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणा:।

देवदुन्दुभयो नेदु: पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत्॥ १७॥

इनके जन्मके समय गन्धर्वोंने मधुर गीत गाये। अप्सराओंने नृत्य किया। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं तथा आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ १७॥

उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां जनाकुल:।

रथ्याश्च जनसम्बाधा नटनर्तकसंकुला:॥ १८॥

अयोध्यामें बहुत बड़ा उत्सव हुआ। मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई। गलियाँ और सड़कें लोगोंसे खचाखच भरी थीं। बहुत-से नट और नर्तक वहाँ अपनी कलाएँ दिखा रहे थे॥ १८॥

गायनैश्च विराविण्यो वादनैश्च तथापरै:।

विरेजुर्विपुलास्तत्र सर्वरत्नसमन्विता:॥ १९॥

वहाँ सब ओर गाने-बजानेवाले तथा दूसरे लोगोंके शब्द गूँज रहे थे। दीन-दु:खियोंके लिये लुटाये गये सब प्रकारके रत्न वहाँ बिखरे पड़े थे॥ १९॥

प्रदेयांश्च ददौ राजा सूतमागधवन्दिनाम्।

ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गोधनानि सहस्रश:॥ २०॥

राजा दशरथने सूत, मागध और वन्दीजनोंको देनेयोग्य पुरस्कार दिये तथा ब्राह्मणोंको धन एवं सहस्रों गोधन प्रदान किये॥ २०॥

अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तथाकरोत्।

ज्येष्ठं रामं महात्मानं भरतं कैकयीसुतम्॥ २१॥

सौमित्रिं लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा।

वसिष्ठ: परमप्रीतो नामानि कुरुते तदा॥ २२॥

ग्यारह दिन बीतनेपर महाराजने बालकोंका नामकरण-संस्कार किया34। उस समय महर्षि वसिष्ठने प्रसन्नताके साथ सबके नाम रखे। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्रका नाम ‘राम’ रखा। श्रीराम महात्मा (परमात्मा) थे। कैकेयीकुमारका नाम भरत तथा सुमित्राके एक पुत्रका नाम लक्ष्मण और दूसरेका शत्रुघ्न निश्चित किया॥ २१-२२॥

ब्राह्मणान् भोजयामास पौरजानपदानपि।

अददद् ब्राह्मणानां च रत्नौघममलं बहु॥ २३॥

राजाने ब्राह्मणों, पुरवासियों तथा जनपदवासियोंको भी भोजन कराया। ब्राह्मणोंको बहुत-से उज्ज्वल रत्नसमूह दान किये॥ २३॥

तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत्।

तेषां केतुरिव ज्येष्ठो रामो रतिकर: पितु:॥ २४॥

महर्षि वसिष्ठने समय-समयपर राजासे उन बालकोंके जातकर्म आदि सभी संस्कार करवाये थे। उन सबमें श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ होनेके साथ ही अपने कुलकी कीर्ति-ध्वजाको फहरानेवाली पताकाके समान थे। वे अपने पिताकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले थे॥ २४॥

बभूव भूयो भूतानां स्वयम्भूरिव सम्मत:।

सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे लोकहिते रता:॥ २५॥

सभी भूतोंके लिये वे स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान विशेष प्रिय थे। राजाके सभी पुत्र वेदोंके विद्वान् और शूरवीर थे। सब-के-सब लोकहितकारी कार्योंमें संलग्न रहते थे॥ २५॥

सर्वे ज्ञानोपसम्पन्ना: सर्वे समुदिता गुणै:।

तेषामपि महातेजा राम: सत्यपराक्रम:॥ २६॥

इष्ट: सर्वस्य लोकस्य शशाङ्क इव निर्मल:।

गजस्कन्धेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु सम्मत:॥ २७॥

धनुर्वेदे च निरत: पितु: शुश्रूषणे रत:।

सभी ज्ञानवान् और समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे। उनमें भी सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक तेजस्वी और सब लोगोंके विशेष प्रिय थे। वे निष्कलङ्क चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे। उन्होंने हाथीके कंधे और घोड़ेकी पीठपर बैठने तथा रथ हाँकनेकी कलामें भी सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। वे सदा धनुर्वेदका अभ्यास करते और पिताजीकी सेवामें लगे रहते थे॥

बाल्यात् प्रभृति सुस्निग्धो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धन:॥ २८॥

रामस्य लोकरामस्य भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यश:।

सर्वप्रियकरस्तस्य रामस्यापि शरीरत:॥ २९॥

लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मण बाल्यावस्थासे ही श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अत्यन्त अनुराग रखते थे। वे अपने बड़े भाई लोकाभिराम श्रीरामका सदा ही प्रिय करते थे और शरीरसे भी उनकी सेवामें ही जुटे रहते थे॥

लक्ष्मणो लक्ष्मिसम्पन्नो बहि:प्राण इवापर:।

न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तम:॥ ३०॥

मृष्टमन्नमुपानीतमश्नाति न हि तं विना।

शोभासम्पन्न लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीके लिये बाहर विचरनेवाले दूसरे प्राणके समान थे। पुरुषोत्तम श्रीरामको उनके बिना नींद भी नहीं आती थी। यदि उनके पास उत्तम भोजन लाया जाता तो श्रीरामचन्द्रजी उसमेंसे लक्ष्मणको दिये बिना नहीं खाते थे॥ ३०/

यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघव:॥ ३१॥

अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनु: परिपालयन्।

भरतस्यापि शत्रुघ्नो लक्ष्मणावरजो हि स:॥ ३२॥

प्राणै: प्रियतरो नित्यं तस्य चासीत् तथा प्रिय:।

जब श्रीरामचन्द्रजी घोड़ेपर चढ़कर शिकार खेलनेके लिये जाते, उस समय लक्ष्मण धनुष लेकर उनके शरीरकी रक्षा करते हुए पीछे-पीछे जाते थे। इसी प्रकार लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न भरतजीको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थे और वे भी भरतजीको सदा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते थे॥ ३१-३२/

स चतुर्भिर्महाभागै: पुत्रैर्दशरथ: प्रियै:॥ ३३॥

बभूव परमप्रीतो देवैरिव पितामह:।

इन चार महान् भाग्यशाली प्रिय पुत्रोंसे राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती थी, ठीक वैसे ही जैसे चार देवताओं (दिक्पालों) से ब्रह्माजीको प्रसन्नता होती है॥ ३३/

ते यदा ज्ञानसम्पन्ना: सर्वे समुदिता गुणै:॥ ३४॥

हृमन्त: कीर्तिमन्तश्च सर्वज्ञा दीर्घदर्शिन:।

तेषामेवंप्रभावाणां सर्वेषां दीप्ततेजसाम्॥ ३५॥

पिता दशरथो हृष्टो ब्रह्मा लोकाधिपो यथा।

वे सब बालक जब समझदार हुए, तब समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो गये। वे सभी लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे। ऐसे प्रभावशाली और अत्यन्त तेजस्वी उन सभी पुत्रोंकी प्राप्तिसे राजा दशरथ लोकेश्वर ब्रह्माकी भाँति बहुत प्रसन्न थे॥ ३४-३५/

ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रता:॥ ३६॥

पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिता:।

वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदोंके स्वाध्याय, पिताकी सेवा तथा धनुर्वेदके अभ्यासमें दत्त-चित्त रहते थे॥ ३६/

अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां प्रति॥ ३७॥

चिन्तयामास धर्मात्मा सोपाध्याय: सबान्धव:।

तस्य चिन्तयमानस्य मन्त्रिमध्ये महात्मन:॥ ३८॥

अभ्यागच्छन्महातेजा विश्वामित्रो महामुनि:।

एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ पुरोहित तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ बैठकर पुत्रोंके विवाहके विषयमें विचार कर रहे थे। मन्त्रियोंके बीचमें विचार करते हुए उन महामना नरेशके यहाँ महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे॥ ३७-३८/

स राज्ञो दर्शनाकांक्षी द्वाराध्यक्षानुवाच ह॥ ३९॥

शीघ्रमाख्यात मां प्राप्तं कौशिकं गाधिन: सुतम्।

वे राजासे मिलना चाहते थे। उन्होंने द्वारपालोंसे कहा—‘तुमलोग शीघ्र जाकर महाराजको यह सूचना दो कि कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र आये हैं’॥ ३९/

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य राज्ञो वेश्म प्रदुद्रुवु:॥ ४०॥

सम्भ्रान्तमनस: सर्वे तेन वाक्येन चोदिता:।

उनकी यह बात सुनकर वे द्वारपाल दौड़े हुए राजाके दरबारमें गये। वे सब विश्वामित्रके उस वाक्यसे प्रेरित होकर मन-ही-मन घबराये हुए थे॥ ४०/

ते गत्वा राजभवनं विश्वामित्रमृषिं तदा॥ ४१॥

प्राप्तमावेदयामासुर्नृपायेक्ष्वाकवे तदा।

राजाके दरबारमें पहुँचकर उन्होंने इक्ष्वाकुकुल-नन्दन अवधनरेशसे कहा—‘महाराज! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं’॥ ४१/

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सपुरोधा: समाहित:॥ ४२॥

प्रत्युज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणमिव वासव:।

उनकी वह बात सुनकर राजा सावधान हो गये। उन्होंने पुरोहितको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ उनकी अगवानी की, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका स्वागत कर रहे हों॥ ४२/

स दृष्ट्वा ज्वलितं दीप्त्या तापसं संशितव्रतम्॥ ४३॥

प्रहृष्टवदनो राजा ततोऽर्घ्यमुपहारयत्।

विश्वामित्रजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे। वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनका दर्शन करके राजाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उन्होंने महर्षिको अर्घ्य निवेदन किया॥ ४३/

स राज्ञ: प्रतिगृह्यार्घ्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा॥ ४४॥

कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम्।

राजाका वह अर्घ्य शास्त्रीय विधिके अनुसार स्वीकार करके महर्षिने उनसे कुशल-मंगल पूछा॥ ४४/

पुरे कोशे जनपदे बान्धवेषु सुहृत्सु च॥ ४५॥

कुशलं कौशिको राज्ञ: पर्यपृच्छत् सुधार्मिक:।

धर्मात्मा विश्वामित्रने क्रमश: राजाके नगर, खजाना, राज्य, बन्धु-बान्धव तथा मित्रवर्ग आदिके विषयमें कुशलप्रश्न किया—॥ ४५/

अपि ते संनता: सर्वे सामन्तरिपवो जिता:॥ ४६॥

दैवं च मानुषं चैव कर्म ते साध्वनुष्ठितम्।

राजन् आपके राज्यकी सीमाके निकट रहनेवाले शत्रु राजा आपके समक्ष नतमस्तक तो हैं? आपने उनपर विजय तो प्राप्त की है न? आपके यज्ञयाग आदि देवकर्म और अतिथि-सत्कार आदि मनुष्यकर्म तो अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं न?’॥ ४६/

वसिष्ठं च समागम्य कुशलं मुनिपुंगव:॥ ४७॥

ऋषींश्च तान् यथान्यायं महाभाग उवाच ह।

इसके बाद महाभाग मुनिवर विश्वामित्रने वसिष्ठजी तथा अन्यान्य ऋषियोंसे मिलकर उन सबका यथावत् कुशल-समाचार पूछा॥ ४७/

ते सर्वे हृष्टमनसस्तस्य राज्ञो निवेशनम्॥ ४८॥

विविशु: पूजितास्तेन निषेदुश्च यथार्हत:।

फिर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर राजाके दरबारमें गये और उनके द्वारा पूजित हो यथायोग्य आसनोंपर बैठे॥

अथ हृष्टमना राजा विश्वामित्रं महामुनिम्॥ ४९॥

उवाच परमोदारो हृष्टस्तमभिपूजयन्।

तदनन्तर प्रसन्नचित्त परम उदार राजा दशरथने पुलकित होकर महामुनि विश्वामित्रकी प्रशंसा करते हुए कहा—॥ ४९/

यथामृतस्य सम्प्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके॥ ५०॥

यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै।

प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदय:॥ ५१॥

तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने।

कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षित:॥ ५२॥

‘महामुने! जैसे किसी मरणधर्मा मनुष्यको अमृतकी प्राप्ति हो जाय, निर्जल प्रदेशमें पानी बरस जाय, किसी संतानहीनको अपने अनुरूप पत्नीके गर्भसे पुत्र प्राप्त हो जाय, खोयी हुई निधि मिल जाय तथा किसी महान् उत्सवसे हर्षका उदय हो, उसी प्रकार आपका यहाँ शुभागमन हुआ है। ऐसा मैं मानता हूँ। आपका स्वागत है। आपके मनमें कौन-सी उत्तम कामना है, जिसको मैं हर्षके साथ पूर्ण करूँ? ५०—५२॥

पात्रभूतोऽसि मे ब्रह्मन् दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद।

अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्॥ ५३॥

‘ब्रह्मन्! आप मुझसे सब प्रकारकी सेवा लेने योग्य उत्तम पात्र हैं। मानद! मेरा अहोभाग्य है, जो आपने यहाँतक पधारनेका कष्ट उठाया। आज मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया॥ ५३॥

यस्माद् विप्रेन्द्रमद्राक्षं सुप्रभाता निशा मम।

पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभ:॥ ५४॥

ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्त: पूज्योऽसि बहुधा मया।

तदद्भुतमभूद् विप्र पवित्रं परमं मम॥ ५५॥

‘मेरी बीती हुई रात सुन्दर प्रभात दे गयी, जिससे मैंने आज आप ब्राह्मणशिरोमणिका दर्शन किया। पूर्वकालमें आप राजर्षि शब्दसे उपलक्षित होते थे, फिर तपस्यासे अपनी अद्भुत प्रभाको प्रकाशित करके आपने ब्रह्मर्षिका पद पाया; अत: आप राजर्षि और ब्रह्मर्षि दोनों ही रूपोंमें मेरे पूजनीय हैं। आपका जो यहाँ मेरे समक्ष शुभागमन हुआ है, यह परम पवित्र और अद्भुत है॥

शुभक्षेत्रगतश्चाहं तव संदर्शनात् प्रभो।

ब्रूहि यत् प्रार्थितं तुभ्यं कार्यमागमनं प्रति॥ ५६॥

‘‘प्रभो! आपके दर्शनसे आज मेरा घर तीर्थ हो गया। मैं अपने-आपको पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा करके आया हुआ मानता हूँ। बताइये, आप क्या चाहते हैं? आपके शुभागमनका शुभ उद्देश्य क्या है?॥ ५६॥

इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये।

कार्यस्य न विमर्शं च गन्तुमर्हसि सुव्रत॥ ५७॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर आपके अभीष्ट मनोरथको जान लूँ और अपने अभ्युदयके लिये उसकी पूर्ति करूँ। ‘कार्य सिद्ध होगा या नहीं’ ऐसे संशयको अपने मनमें स्थान न दीजिये॥ ५७॥

कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम।

मम चायमनुप्राप्तो महानभ्युदयो द्विज।

तवागमनज: कृत्स्नो धर्मश्चानुत्तमो द्विज॥ ५८॥

‘आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगा; क्योंकि सम्माननीय अतिथि होनेके नाते आप मुझ गृहस्थके लिये देवता हैं। ब्रह्मन्! आज आपके आगमनसे मुझे सम्पूर्ण धर्मोंका उत्तम फल प्राप्त हो गया। यह मेरे महान् अभ्युदयका अवसर आया है’॥ ५८॥

इति हृदयसुखं निशम्य वाक्यं

श्रुतिसुखमात्मवता विनीतमुक्तम्।

प्रथितगुणयशा गुणैर्विशिष्ट:

परमऋषि: परमं जगाम हर्षम्॥ ५९॥

मनस्वी नरेशके कहे हुए ये विनययुक्त वचन, जो हृदय और कानोंको सुख देनेवाले थे, सुनकर विख्यात गुण और यशवाले, शम-दम आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए॥ ५९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टादश: सर्ग:॥ १८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८॥

 

एकोनविंश: सर्ग:

विश्वामित्रके मुखसे श्रीरामको साथ ले जानेकी माँग सुनकरराजा दशरथका दु:खित एवं मूर्च्छित होना

तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम्।

हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥ १॥

नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथका यह अद्भुत विस्तारसे युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले॥ १॥

सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यत:।

महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिन:॥ २॥

राजसिंह! ये बातें आपके ही योग्य हैं। इस पृथ्वीपर दूसरेके मुखसे ऐसे उदार वचन निकलनेकी सम्भावना नहीं है। क्यों न हो, आप महान् कुलमें उत्पन्न हैं और वसिष्ठ-जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं॥ २॥

यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम्।

कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रव:॥ ३॥

‘अच्छा, अब जो बात मेरे हृदयमें है, उसे सुनिये। नृपश्रेष्ठ! सुनकर उस कार्यको अवश्य पूर्ण करनेका निश्चय कीजिये। आपने मेरा कार्य सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाइये॥ ३॥

अहं नियममातिष्ठे सिद्ध्यर्थं पुरुषर्षभ।

तस्य विघ्नकरौ द्वौ तु राक्षसौ कामरूपिणौ॥ ४॥

‘पुरुषप्रवर! मैं सिद्धिके लिये एक नियमका अनुष्ठान करता हूँ। उसमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं॥ ४॥

व्रते तु बहुशश्चीर्णे समाप्त्यां राक्षसाविमौ।

मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ॥ ५॥

‘मेरे इस नियमका अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है। अब उसकी समाप्तिके समय वे दो राक्षस आ धमके हैं। उनके नाम हैं मारीच और सुबाहु। वे दोनों बलवान् और सुशिक्षित हैं॥ ५॥

तौ मांसरुधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम्।

अवधूते तथाभूते तस्मिन् नियमनिश्चये॥ ६॥

कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद् देशादपाक्रमे।

‘उन्होंने मेरी यज्ञवेदीपर रक्त और मांसकी वर्षा कर दी है। इस प्रकार उस समाप्तप्राय नियममें विघ्न पड़ जानेके कारण मेरा परिश्रम व्यर्थ गया और मैं उत्साहहीन होकर उस स्थानसे चला आया॥ ६/

न च मे क्रोधमुत्स्रष्टुं बुद्धिर्भवति पार्थिव॥ ७॥

‘पृथ्वीनाथ! उनके ऊपर अपने क्रोधका प्रयोग करूँ— उन्हें शाप दे दूँ, ऐसा विचार मेरे मनमें नहीं आता है॥

तथाभूता हि सा चर्या न शापस्तत्र मुच्यते।

स्वपुत्रं राजशार्दूल रामं सत्यपराक्रमम्॥ ८॥

काकपक्षधरं वीरं ज्येष्ठं मे दातुमर्हसि।

‘क्योंकि वह नियम ही ऐसा है, जिसको आरम्भ कर देनेपर किसीको शाप नहीं दिया जाता; अत: नृपश्रेष्ठ! आप अपने काकपच्छधारी, सत्यपराक्रमी, शूरवीर ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको मुझे दे दें॥ ८/

शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा॥ ९ ॥

राक्षसा ये विकर्तारस्तेषामपि विनाशने।

श्रेयश्चास्मै प्रदास्यामि बहुरूपं न संशय:॥ १०॥

‘ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेजसे उन विघ्नकारी राक्षसोंका नाश करनेमें समर्थ हैं। मैं इन्हें अनेक प्रकारका श्रेय प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है॥

त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमिष्यति।

न च तौ राममासाद्य शक्तो स्थातुं कथंचन॥ ११॥

‘उस श्रेयको पाकर ये तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे। श्रीरामके सामने आकर वे दोनों राक्षस किसी तरह ठहर नहीं सकते॥ ११॥

न च तौ राघवादन्यो हन्तुमुत्सहते पुमान्।

वीर्योत्सिक्तौ हि तौ पापौ कालपाशवशं गतौ॥ १२॥

रामस्य राजशार्दूल न पर्याप्तौ महात्मन:।

‘इन रघुनन्दनके सिवा दूसरा कोई पुरुष उन राक्षसोंको मारनेका साहस नहीं कर सकता। नृपश्रेष्ठ! अपने बलका घमण्ड रखनेवाले वे दोनों पापी निशाचर कालपाशके अधीन हो गये हैं; अत: महात्मा श्रीरामके सामने नहीं टिक सकते॥ १२/

न च पुत्रगतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव॥ १३॥

अहं ते प्रतिजानामि हतौ तौ विद्धि राक्षसौ।

‘भूपाल! आप पुत्रविषयक स्नेहको सामने न लाइये। मैं आपसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि उन दोनों राक्षसोंको इनके हाथसे मरा हुआ ही समझिये॥ १३/

अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥ १४॥

वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिता:।

‘सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम क्या हैं—यह मैं जानता हूँ। महातेजस्वी वसिष्ठजी तथा ये अन्य तपस्वी भी जानते हैं॥ १४/

यदि ते धर्मलाभं तु यशश्च परमं भुवि॥ १५॥

स्थिरमिच्छसि राजेन्द्र रामं मे दातुमर्हसि।

‘राजेन्द्र! यदि आप इस भूमण्डलमें धर्म-लाभ और उत्तम यशको स्थिर रखना चाहते हों तो श्रीरामको मुझे दे दीजिये॥ १५/

यद्यभ्यनुज्ञां काकुत्स्थ ददते तव मन्त्रिण:॥ १६॥

वसिष्ठप्रमुखा: सर्वे ततो रामं विसर्जय।

‘ककुत्स्थनन्दन! यदि वसिष्ठ आदि आपके सभी मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीरामको मेरे साथ विदा कर दीजिये॥ १६/

अभिप्रेतमसंसक्तमात्मजं दातुमर्हसि॥ १७॥

दशरात्रं हि यज्ञस्य रामं राजीवलोचनम्।

‘मुझे रामको ले जाना अभीष्ट है। ये भी बड़े होनेके कारण अब आसक्तिरहित हो गये हैं; अत: आप यज्ञके अवशिष्ट दस दिनोंके लिये अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामको मुझे दे दीजिये॥ १७/

नात्येति कालो यज्ञस्य यथायं मम राघव॥ १८॥

तथा कुरुष्व भद्रं ते मा च शोके मन: कृथा:।

‘रघुनन्दन! आप ऐसा कीजिये जिससे मेरे यज्ञका समय व्यतीत न हो जाय। आपका कल्याण हो। आप अपने मनको शोक और चिन्तामें न डालिये’॥ १८/

इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्मार्थसहितं वच:॥ १९॥

विरराम महातेजा विश्वामित्रो महामति:।

यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी, परमबुद्धिमान् विश्वामित्रजी चुप हो गये॥

स तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्रवच: शुभम्॥ २०॥

शोकेन महताविष्टश्चचाल च मुमोह च।

विश्वामित्रका यह शुभ वचन सुनकर महाराज दशरथको पुत्र-वियोगकी आशङ्कासे महान् दु:ख हुआ। वे उससे पीडि़त हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये॥ २०/

लब्धसंज्ञस्तदोत्थाय व्यषीदत भयान्वित:॥ २१॥

इति हृदयमनोविदारणं

मुनिवचनं तदतीव शुश्रुवान्।

नरपतिरभवन्महान् महात्मा

व्यथितमना: प्रचचाल चासनात्॥ २२॥

थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे भयभीत हो विषाद करने लगे। विश्वामित्र मुनिका वचन राजाके हृदय और मनको विदीर्ण करनेवाला था। उसे सुनकर उनके मनमें बड़ी व्यथा हुई। वे महामनस्वी महाराज अपने आसनसे विचलित हो मूर्च्छित हो गये॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनविंश: सर्ग:॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥




विंश: सर्ग:

राजा दशरथका विश्वामित्रको अपना पुत्र देनेसे इनकार करना और विश्वामित्रका कुपित होना

तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम्।

मुहूर्तमिव नि:संज्ञ: संज्ञावानिदमब्रवीत्॥ १॥

विश्वामित्रजीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ीके लिये संज्ञाशून्य-से हो गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले—॥ १॥

ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।

न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:॥ २॥

‘महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्षका भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसोंके साथ युद्ध करनेकी योग्यता नहीं देखता॥ २॥

इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वर:।

अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरै:॥ ३॥

‘यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेनाके साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरोंके साथ युद्ध करूँगा॥ ३॥

इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्या मेऽस्त्रविशारदा:।

योग्या रक्षोगणैर्योद्धुं न रामं नेतुमर्हसि॥ ४॥

‘ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्रविद्यामें कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसोंके साथ जूझनेकी योग्यता रखते हैं; अत: इन्हें ही ले जाइये; रामको ले जाना उचित नहीं होगा॥ ४॥

अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि।

यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्ये निशाचरै:॥ ५॥

‘मैं स्वयं ही हाथमें धनुष ले युद्धके मुहानेपर रहकर आपके यज्ञकी रक्षा करूँगा और जबतक इस शरीरमें प्राण रहेंगे तबतक निशाचरोंके साथ लड़ता रहूँगा॥ ५॥

निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता।

अहं तत्र गमिष्यामि न रामं नेतुमर्हसि॥ ६॥

‘मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आपका नियमानुष्ठान बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण होगा; अत: मैं ही वहाँ आपके साथ चलूँगा। आप रामको न ले जाइये॥ ६॥

बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम्।

न चास्त्रबलसंयुक्तो न च युद्धविशारद:॥ ७॥

‘मेरा राम अभी बालक है। इसने अभीतक युद्धकी विद्या ही नहीं सीखी है। यह दूसरेके बलाबलको नहीं जानता है। न तो यह अस्त्र-बलसे सम्पन्न है और न युद्धकी कलामें निपुण ही॥ ७॥

न चासौ रक्षसां योग्य: कूटयुद्धा हि राक्षसा:।

विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे॥ ८॥

जीवितुं मुनिशार्दूलं न रामं नेतुमर्हसि।

यदि वा राघवं ब्रह्मन् नेतुमिच्छसि सुव्रत॥ ९॥

चतुरंगसमायुक्तं मया सह च तं नय।

‘अत: यह राक्षसोंसे युद्ध करने योग्य नहीं है; क्योंकि राक्षस मायासे—छल-कपटसे युद्ध करते हैं। इसके सिवा रामसे वियोग हो जानेपर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता; मुनिश्रेष्ठ! इसलिये आप मेरे रामको न ले जाइये। अथवा ब्रह्मन्! यदि आपकी इच्छा रामको ही ले जानेकी हो तो चतुरङ्गिणी सेनाके साथ मैं भी चलता हूँ। मेरे साथ इसे ले चलिये॥ ८-९/

षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक॥ १०॥

कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि।

‘कुशिकनन्दन! मेरी अवस्था साठ हजार वर्षकी हो गयी। इस बुढ़ापेमें बड़ी कठिनाईसे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हुई है, अत: आप रामको न ले जाइये॥ १०/

चतुर्णामात्मजानां हि प्रीति: परमिका मम॥ ११॥

ज्येष्ठे धर्मप्रधाने च न रामं नेतुमर्हसि।

‘धर्मप्रधान राम मेरे चारों पुत्रोंमें ज्येष्ठ है; इसलिये उसपर मेरा प्रेम सबसे अधिक है; अत: आप रामको न ले जाइये॥ ११/

किंवीर्या राक्षसास्ते च कस्य पुत्राश्च के च ते॥ १२॥

कथं प्रमाणा: के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव।

कथं च प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम्॥ १३॥

‘वे राक्षस कैसे पराक्रमी हैं, किसके पुत्र हैं और कौन हैं? उनका डीलडौल कैसा है? मुनीश्वर! उनकी रक्षा कौन करते हैं? राम उन राक्षसोंका सामना कैसे कर सकता है? ॥ १२-१३॥

मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम्।

सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे॥ १४॥

स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसा:।

‘ब्रह्मन्! मेरे सैनिकोंको या स्वयं मुझे ही उन मायायोधी राक्षसोंका प्रतीकार कैसे करना चाहिये? भगवन्! ये सारी बातें आप मुझे बताइये। उन दुष्टोंके साथ युद्धमें मुझे कैसे खड़ा होना चाहिये? क्योंकि राक्षस बड़े बलाभिमानी होते हैं’॥ १४/

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥ १५॥

पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षस:।

स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम्॥ १६॥

महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृत:।

श्रूयते च महाराज रावणो राक्षसाधिप:॥ १७॥

साक्षाद्वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुने:।

राजा दशरथकी इस बातको सुनकर विश्वामित्रजी बोले—‘महाराज! रावण नामसे प्रसिद्ध एक राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्यके कुलमें उत्पन्न हुआ है। उसे ब्रह्माजीसे मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है; जिससे महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकोंके निवासियोंको अत्यन्त कष्ट दे रहा है। सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनिका औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेरका भाई है॥

यदा न खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबल:॥ १८॥

तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ च महाबलौ।

मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यत:॥ १९॥

‘वह महाबली निशाचर इच्छा रहते हुए भी स्वयं आकर यज्ञमें विघ्न नहीं डालता (अपने लिये इसे तुच्छ कार्य समझता है); इसलिये उसीकी प्रेरणासे दो महान् बलवान् राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञोंमें विघ्न डाला करते हैं’॥ १८-१९॥

इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा।

नहि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मन:॥ २०॥

विश्वामित्र मुनिके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ उनसे इस प्रकार बोले—‘मुनिवर! मैं उस दुरात्मा रावणके सामने युद्धमें नहीं ठहर सकता॥ २०॥

स त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके।

मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरु:॥ २१॥

‘धर्मज्ञ महर्षे! आप मेरे पुत्रपर तथा मुझ मन्दभागी दशरथपर भी कृपा कीजिये; क्योंकि आप मेरे देवता तथा गुरु हैं॥ २१॥

देवदानवगन्धर्वा यक्षा: पतगपन्नगा:।

न शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि॥ २२॥

‘युद्धमें रावणका वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं सह सकते; फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है॥ २२॥

स तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावण:।

तेन चाहं न शक्तोऽस्मि संयोद्धुं तस्य वा बलै:॥ २३॥

सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजै:।

‘मुनिश्रेष्ठ! रावण समरांगणमें बलवानोंके बलका अपहरण कर लेता है, अत: मैं अपनी सेना और पुत्रोंके साथ रहकर भी उससे तथा उसके सैनिकोंसे युद्ध करनेमें असमर्थ हूँ॥ २३/

कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम्॥ २४॥

बालं मे तनयं ब्रह्मन् नैव दास्यामि पुत्रकम्।

‘ब्रह्मन्! यह मेरा देवोपम पुत्र युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ है। इसकी अवस्था भी अभी बहुत थोड़ी है; इसलिये मैं इसे किसी तरह नहीं दूँगा॥ २४/

अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयो:॥ २५॥

यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम्।

मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ॥ २६॥

‘मारीच और सुबाहु सुप्रसिद्ध दैत्य सुन्द और उपसुन्दके पुत्र हैं। वे दोनों युद्धमें यमराजके समान हैं। यदि वे ही आपके यज्ञमें विघ्न डालनेवाले हैं तो मैं उनका सामना करनेके लिये अपने पुत्रको नहीं दूँगा; क्योंकि वे दोनों प्रबल पराक्रमी और युद्धविषयक उत्तम शिक्षासे सम्पन्न हैं॥ २५-२६॥

तयोरन्यतरं योद्धुं यास्यामि ससुहृद्गण:।

अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सहबान्धव:॥ २७॥

‘मैं उन दोनोंमेंसे किसी एकके साथ युद्ध करनेके लिये अपने सुहृदोंके साथ चलूँगा; अन्यथा—यदि आप मुझे न ले जाना चाहें तो मैं भाई-बन्धुओंसहित आपसे अनुनय-विनय करूँगा कि आप रामको छोड़ दें’॥ २७॥

इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं

कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्यु:।

सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्त:

समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्नि:॥ २८॥

राजा दशरथके ऐसे वचन सुनकर विप्रवर कुशिकनन्दन विश्वामित्रके मनमें महान् क्रोधका आवेश हो आया, जैसे यज्ञशालामें अग्निको भलीभाँति आहुति देकर घीकी धारासे अभिषिक्त कर दिया जाय और वह प्रज्वलित हो उठे, उसी तरह अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी क्रोधसे जल उठे॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥

 

एकविंश: सर्ग:

विश्वामित्रके रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठका राजा दशरथको समझाना

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलाक्षरम्।

समन्यु: कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम्॥ १॥

राजा दशरथकी बातके एक-एक अक्षरमें पुत्रके प्रति स्नेह भरा हुआ था, उसे सुनकर महर्षि विश्वामित्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

पूर्वमर्थं प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञां हातुमिच्छसि।

राघवाणामयुक्तोऽयं कुलस्यास्य विपर्यय:॥ २॥

‘राजन्! पहले मेरी माँगी हुई वस्तुके देनेकी प्रतिज्ञा करके अब तुम उसे तोड़ना चाहते हो। प्रतिज्ञाका यह त्याग रघुवंशियोंके योग्य तो नहीं है। यह बर्ताव तो इस कुलके विनाशका सूचक है॥ २॥

यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम्।

मिथ्याप्रतिज्ञ: काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृत:॥ ३॥

‘नरेश्वर! यदि तुम्हें ऐसा ही उचित प्रतीत होता है तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। ककुत्स्थकुलके रत्न! अब तुम अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके हितैषी सुहृदोंसे घिरे रहकर सुखी रहो’॥ ३॥

तस्य रोषपरीतस्य विश्वामित्रस्य धीमत:।

चचाल वसुधा कृत्स्ना देवानां च भयं महत्॥ ४॥

बुद्धिमान् विश्वामित्रके कुपित होते ही सारी पृथ्वी काँप उठी और देवताओंके मनमें महान् भय समा गया॥ ४॥

त्रस्तरूपं तु विज्ञाय जगत् सर्वं महानृषि:।

नृपतिं सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ ५॥

उनके रोषसे सारे संसारको त्रस्त हुआ जान उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धीरचित्त महर्षि वसिष्ठने राजासे इस प्रकार कहा—॥ ५॥

इक्ष्वाकूणां कुले जात: साक्षाद् धर्म इवापर:।

धृतिमान् सुव्रत: श्रीमान् न धर्मं हातुमर्हसि॥ ६॥

‘महाराज! आप इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके कुलमें साक्षात् दूसरे धर्मके समान उत्पन्न हुए हैं। धैर्यवान्, उत्तम व्रतके पालक तथा श्रीसम्पन्न हैं। आपको अपने धर्मका परित्याग नहीं करना चाहिये॥ ६॥

त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मात्मा इति राघव:।

स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व नाधर्मं वोढुमर्हसि॥ ७॥

‘‘रघुकुलभूषण दशरथ बड़े धर्मात्मा हैं’ यह बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। अत: आप अपने धर्मका ही पालन कीजिये; अधर्मका भार सिरपर न उठाइये॥ ७॥

प्रतिश्रुत्य करिष्येति उक्तं वाक्यमकुर्वत:।

इष्टापूर्तवधो भूयात् तस्माद् रामं विसर्जय॥ ८॥

‘मैं अमुक कार्य करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जो उस वचनका पालन नहीं करता, उसके यज्ञ-यागादि इष्ट तथा बावली-तालाब बनवाने आदि पूर्त कर्मोंके पुण्यका नाश हो जाता है, अत: आप श्रीरामको विश्वामित्रजीके साथ भेज दीजिये॥ ८॥

कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसा:।

गुप्तं कुशिकपुत्रेण ज्वलनेनामृतं यथा॥ ९॥

‘ये अस्त्रविद्या जानते हों या न जानते हों, राक्षस इनका सामना नहीं कर सकते। जैसे प्रज्वलित अग्निद्वारा सुरक्षित अमृतपर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार कुशिकनन्दन विश्वामित्रसे सुरक्षित हुए श्रीरामका वे राक्षस कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते॥ ९॥

एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वर:।

एष विद्याधिको लोके तपसश्च परायणम्॥ १०॥

‘ये श्रीराम तथा महर्षि विश्वामित्र साक्षात् धर्मकी मूर्ति हैं। ये बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। विद्याके द्वारा ही ये संसारमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। तपस्याके तो ये विशाल भण्डार ही हैं॥ १०॥

एषोऽस्त्रान् विविधान् वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे।

नैनमन्य: पुमान् वेत्ति न च वेत्स्यन्ति केचन॥ ११॥

‘चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें जो नाना प्रकारके अस्त्र हैं, उन सबको ये जानते हैं। इन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष न तो अच्छी तरह जानता है और न कोई जानेंगे ही॥ ११॥

न देवा नर्षय: केचिन्नामरा न च राक्षसा:।

गन्धर्वयक्षप्रवरा: सकिन्नरमहोरगा:॥ १२॥

‘देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा बड़े-बड़े नाग भी इनके प्रभावको नहीं जानते हैं॥ १२॥

सर्वास्त्राणि कृशाश्वस्य पुत्रा: परमधार्मिका:।

कौशिकाय पुरा दत्ता यदा राज्यं प्रशासति॥ १३॥

‘प्राय: सभी अस्त्र प्रजापति कृशाश्वके परम धर्मात्मा पुत्र हैं। उन्हें प्रजापतिने पूर्वकालमें कुशिकनन्दन विश्वामित्रको जब कि वे राज्यशासन करते थे, समर्पित कर दिया था॥ १३॥

तेऽपि पुत्रा: कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतासुता:।

नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहा:॥ १४॥

‘कृशाश्वके वे पुत्र प्रजापति दक्षकी दो पुत्रियोंकी संतानें हैं। उनके अनेक रूप हैं। वे सब-के-सब महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले हैं॥ १४॥

जया च सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे।

ते सूतेऽस्त्राणि शस्त्राणि शतं परमभास्वरम्॥ १५॥

‘प्रजापति दक्षकी दो सुन्दरी कन्याएँ हैं, उनके नाम हैं जया और सुप्रभा। उन दोनोंने एक सौ परम प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रोंको उत्पन्न किया है॥ १५॥

पञ्चाशतं सुताँल्लेभे जया लब्धवरा वरान्।

वधायासुरसैन्यानामप्रमेयानरूपिण: ॥ १६॥

‘उनमेंसे जयाने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया है, जो अपरिमित शक्तिशाली और रूपरहित हैं। वे सब-के-सब असुरोंकी सेनाओंका वध करनेके लिये प्रकट हुए हैं॥ १६॥

सुप्रभाजनयच्चापि पुत्रान् पञ्चाशतं पुन:।

संहारान् नाम दुर्धर्षान् दुराक्रामान् बलीयस:॥ १७॥

‘फिर सुप्रभाने भी संहार नामक पचास पुत्रोंको जन्म दिया, जो अत्यन्त दुर्जय हैं। उनपर आक्रमण करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है तथा वे सब-के-सब अत्यन्त बलिष्ठ हैं॥ १७॥

तानि चास्त्राणि वेत्त्येष यथावत् कुशिकात्मज:।

अपूर्वाणां च जनने शक्तो भूयश्च धर्मवित्॥ १८॥

‘ये धर्मज्ञ कुशिकनन्दन उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको अच्छी तरह जानते हैं। जो अस्त्र अबतक उपलब्ध नहीं हुए हैं, उनको भी उत्पन्न करनेकी इनमें पूर्ण शक्ति है॥ १८॥

तेनास्य मुनिमुख्यस्य धर्मज्ञस्य महात्मन:।

न किञ्चिदस्त्यविदितं भूतं भव्यं च राघव॥ १९॥

‘रघुनन्दन! इसलिये इन मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ महात्मा विश्वामित्रजीसे भूत या भविष्यकी कोई बात छिपी नहीं है॥ १९॥

एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो महायशा:।

न रामगमने राजन् संशयं गन्तुमर्हसि॥ २०॥

‘राजन्! ये महातेजस्वी, महायशस्वी विश्वामित्र ऐसे प्रभावशाली हैं। अत: इनके साथ रामको भेजनेमें आप किसी प्रकारका संदेह न करें॥ २०॥

तेषां निग्रहणे शक्त: स्वयं च कुशिकात्मज:।

तव पुत्रहितार्थाय त्वामुपेत्याभियाचते॥ २१॥

‘महर्षि कौशिक स्वयं भी उन राक्षसोंका संहार करनेमें समर्थ हैं; किंतु ये आपके पुत्रका कल्याण करना चाहते हैं, इसीलिये यहाँ आकर आपसे याचना कर रहे हैं’॥ २१॥

इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो

रघुवृषभश्च मुमोद पार्थिवाग्र्य:।

गमनमभिरुरोच राघवस्य

प्रथितयशा: कुशिकात्मजाय बुद्ध्या॥ २२॥

महर्षि वसिष्ठके इस वचनसे विख्यात यशवाले रघुकुलशिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथका मन प्रसन्न हो गया। वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धिसे विचार करनेपर विश्वामित्रजीकी प्रसन्नताके लिये उनके साथ श्रीरामका जाना उन्हें रुचिके अनुकूल प्रतीत होने लगा॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकविंश: सर्ग:॥ २१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१॥

 

 


द्वाविंश: सर्ग:

राजा दशरथका स्वस्तिवाचनपूर्वक राम-लक्ष्मणको मुनिके साथ भेजना, मार्गमें उन्हें विश्वामित्रसे बला और अतिबला नामक विद्याकी प्राप्ति

तथा वसिष्ठे ब्रुवति राजा दशरथ: स्वयम्।

प्रहृष्टवदनो राममाजुहाव सलक्ष्मणम्॥ १॥

कृतस्वस्त्ययनं मात्रा पित्रा दशरथेन च।

पुरोधसा वसिष्ठेन मंगलैरभिमन्त्रितम्॥ २॥

वसिष्ठके ऐसा कहनेपर राजा दशरथका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मणसहित श्रीरामको अपने पास बुलाया। फिर माता कौसल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठने स्वस्तिवाचन करनेके पश्चात् उनका यात्रासम्बन्धी मंगलकार्य सम्पन्न किया—श्रीरामको मंगलसूचक मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया गया॥ १-२॥

स पुत्रं मूर्ध्न्युपाघ्राय राजा दशरथस्तदा।

ददौ कुशिकपुत्राय सुप्रीतेनान्तरात्मना॥ ३॥

तदनन्तर राजा दशरथने पुत्रका मस्तक सूँघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे उसको विश्वामित्रको सौंप दिया॥ ३॥

ततो वायु: सुखस्पर्शो नीरजस्को ववौ तदा।

विश्वामित्रगतं रामं दृष्ट्वा राजीवलोचनम्॥ ४॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनि:स्वनै:।

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोष: प्रयाते तु महात्मनि॥ ५॥

उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीरामको विश्वामित्रजीके साथ जाते देख देवताओंने आकाशसे वहाँ फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं। महात्मा श्रीरामकी यात्राके समय शङ्खों और नगाड़ोंकी ध्वनि होने लगी॥

विश्वामित्रो ययावग्रे ततो रामो महायशा:।

काकपक्षधरो धन्वी तं च सौमित्रिरन्वगात्॥ ६॥

आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जा रहे थे॥ ६॥

कलापिनौ धनुष्पाणी शोभयानौ दिशो दश।

विश्वामित्रं महात्मानं त्रिशीर्षाविव पन्नगौ॥ ७॥

उन दोनों भाइयोंने पीठपर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथोंमें धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओंको सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्रके पीछे तीन-तीन फनवाले दो सर्पोंके समान चल रहे थे। एक ओर कंधेपर धनुष, दूसरी ओर पीठपर तूणीर और बीचमें मस्तक—इन्हीं तीनोंकी तीन फनसे उपमा दी गयी है॥ ७॥

अनुजग्मतुरक्षुद्रौ पितामहमिवाश्विनौ।

अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयन्तावनिन्दितौ॥ ८॥

उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभाका प्रसार करते हुए विश्वामित्रजीके पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजीके पीछे दोनों अश्विनीकुमार चलते हैं॥ ८॥

तदा कुशिकपुत्रं तु धनुष्पाणी स्वलंकृतौ।

बद्धगोधांगुलित्राणौ खड्गवन्तौ महाद्युती॥ ९ ॥

कुमारौ चारुवपुषौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयेतामनिन्दितौ॥ १०॥

स्थाणुं देवमिवाचिन्त्यं कुमाराविव पावकी।

वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणोंसे अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथोंमें धनुष थे। उन्होंने अपने हाथोंकी अंगुलियोंमें गोहटीके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेशमें तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्तिसे उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिकपुत्र विश्वामित्रका अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलनेवाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाखकी भाँति शोभा पाते थे॥

अध्यर्धयोजनं गत्वा सरय्वा दक्षिणे तटे॥ ११॥

रामेति मधुरां वाणीं विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।

गृहाण वत्स सलिलं मा भूत् कालस्य पर्यय:॥ १२॥

अयोध्यासे डेढ़ योजन दूर जाकर सरयूके दक्षिण तटपर विश्वामित्रने मधुर वाणीमें रामको सम्बोधित किया और कहा—‘वत्स राम! अब सरयूके जलसे आचमन करो। इस आवश्यक कार्यमें विलम्ब न हो॥

मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा।

न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्यय:॥ १३॥

‘बला और अतिबला नामसे प्रसिद्ध इस मन्त्र- समुदायको ग्रहण करो। इसके प्रभावसे तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूपमें किसी प्रकारका विकार या उलट-फेर नहीं होने पायेगा॥ १३॥

न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैऋर्ता:।

न बाह्वो: सदृशो वीर्ये पृथिव्यामस्ति कश्चन॥ १४॥

‘सोते समय अथवा असावधानीकी अवस्थामें भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतलपर बाहुबलमें तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा॥ १४॥

त्रिषु लोकेषु वा राम न भवेत् सदृशस्तव।

बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥ १५॥

‘तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबलाका अभ्यास करनेसे तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायगा॥ १५॥

न सौभाग्ये न दाक्षिण्ये न ज्ञाने बुद्धिनिश्चये।

नोत्तरे प्रतिवक्तव्ये समो लोके तवानघ॥ १६॥

‘अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चयमें तथा किसीके प्रश्नका उत्तर देनेमें भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा॥ १६॥

एतद्विद्याद्वये लब्धे न भवेत् सदृशस्तव।

बला चातिबला चैव सर्वज्ञानस्य मातरौ॥ १७॥

‘इन दोनों विद्याओंके प्राप्त हो जानेपर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकारके ज्ञानकी जननी हैं॥ १७॥

क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्येते नरोत्तम।

बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥ १८॥

गृहाण सर्वलोकस्य गुप्तये रघुनन्दन।

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तात रघुनन्दन! बला और अतिबलाका अभ्यास कर लेनेपर तुम्हें भूख-प्यासका भी कष्ट नहीं होगा; अत: रघुकुलको आनन्दित करनेवाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये इन दोनों विद्याओंको ग्रहण करो॥ १८/

विद्याद्वयमधीयाने यशश्चाथ भवेद् भुवि।

पितामहसुते ह्येते विद्ये तेज:समन्विते॥ १९॥

‘इन दोनों विद्याओंका अध्ययन कर लेनेपर इस भूतलपर तुम्हारे यशका विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजीकी तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं॥ १९॥

प्रदातुं तव काकुत्स्थ सदृशस्त्वं हि पार्थिव।

कामं बहुगुणा: सर्वे त्वय्येते नात्र संशय:॥ २०॥

तपसा सम्भृते चैते बहुरूपे भविष्यत:।

‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनोंको तुम्हें देनेका विचार किया है। राजकुमार! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्याको प्राप्त करने योग्य बहुत-से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबलसे इनका अर्जन किया है। अत: मेरी तपस्यासे परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी—अनेक प्रकारके फल प्रदान करेंगी’॥ २०/

ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा प्रहृष्टवदन: शुचि:॥ २१॥

प्रतिजग्राह ते विद्ये महर्षेर्भावितात्मन:।

तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्त:करणवाले महर्षिसे वे दोनों विद्याएँ ग्रहण कीं॥ २१/

विद्यासमुदितो राम: शुशुभे भीमविक्रम:॥ २२॥

सहस्ररश्मिर्भगवान्शरदीव दिवाकर:।

विद्यासे सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणोंसे युक्त शरत्कालीन भगवान् सूर्यके समान शोभा पाने लगे॥ २२/

गुरुकार्याणि सर्वाणि नियुज्य कुशिकात्मजे।

ऊषुस्तां रजनीं तत्र सरय्वां ससुखं त्रय:॥ २३॥

तत्पश्चात् श्रीरामने विश्वामित्रजीकी सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्षका अनुभव किया। फिर वे तीनों वहाँ सरयूके तटपर रातमें सुखपूर्वक रहे॥ २३॥

दशरथनृपसूनुसत्तमाभ्यां

तृणशयनेऽनुचिते तदोषिताभ्याम्।

कुशिकसुतवचोऽनुलालिताभ्यां

सुखमिव सा विबभौ विभावरी च॥ २४॥

राजा दशरथके वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृणकी शय्यापर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणीद्वारा उन दोनोंके प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे। इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी-सी प्रतीत हुई॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वाविंश: सर्ग:॥ २२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥

 

त्रयोविंश: सर्ग:

विश्वामित्रसहित श्रीराम और लक्ष्मणका सरयू-गंगासंगमके समीप पुण्य आश्रममें रातको ठहरना

प्रभातायां तु शर्वर्यां विश्वामित्रो महामुनि:।

अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे॥ १॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्रने तिनकों और पत्तोंके बिछौनेपर सोये हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारोंसे कहा—॥ १॥

कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।

उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥ २॥

‘नरश्रेष्ठ राम! तुम्हारे-जैसे पुत्रको पाकर महारानी कौसल्या सुपुत्रजननी कही जाती हैं। यह देखो, प्रात:कालकी संध्याका समय हो रहा है; उठो और प्रतिदिन किये जानेवाले देवसम्बन्धी कार्योंको पूर्ण करो’॥ २॥

तस्यर्षे: परमोदारं वच: श्रुत्वा नरोत्तमौ।

स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतु: परमं जपम्॥ ३॥

महर्षिका यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने स्नान करके देवताओंका तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्रीका जप करने लगे॥ ३॥

कृताह्निकौ महावीर्यौ विश्वामित्रं तपोधनम्।

अभिवाद्यातिसंहृष्टौ गमनायाभितस्थतु:॥ ४॥

नित्यकर्म समाप्त करके महापराक्रमी श्रीराम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हो तपोधन विश्वामित्रको प्रणाम करके वहाँसे आगे जानेको उद्यत हो गये॥ ४॥

तौ प्रयान्तौ महावीर्यौ दिव्यां त्रिपथगां नदीम्।

ददृशाते ततस्तत्र सरय्वा: संगमे शुभे॥ ५॥

जाते-जाते उन महाबली राजकुमारोंने गंगा और सरयूके शुभ संगमपर पहुँचकर वहाँ दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजीका दर्शन किया॥ ५॥

तत्राश्रमपदं पुण्यमृषीणां भावितात्मनाम्।

बहुवर्षसहस्राणि तप्यतां परमं तप:॥ ६॥

संगमके पास ही शुद्ध अन्त:करणवाले महर्षियोंका एक पवित्र आश्रम था, जहाँ वे कई हजार वर्षोंसे तीव्र तपस्या करते थे॥ ६॥

तं दृष्ट्वा परमप्रीतौ राघवौ पुण्यमाश्रमम्।

ऊचतुस्तं महात्मानं विश्वामित्रमिदं वच:॥ ७॥

उस पवित्र आश्रमको देखकर रघुकुलरत्न श्रीराम और लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने महात्मा विश्वामित्रसे यह बात कही—॥ ७॥

कस्यायमाश्रम: पुण्य: को न्वस्मिन् वसते पुमान्।

भगवञ्छ्रोतुमिच्छाव: परं कौतूहलं हि नौ॥ ८॥

‘भगवन्! यह किसका पवित्र आश्रम है? और इसमें कौन पुरुष निवास करता है? यह हम दोनों सुनना चाहते हैं। इसके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है’॥ ८॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुंगव:।

अब्रवीच्छ्रूयतां राम यस्यायं पूर्व आश्रम:॥ ९॥

उन दोनोंका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र हँसते हुए बोले—‘राम! यह आश्रम पहले जिसके अधिकारमें रहा है, उसका परिचय देता हूँ, सुनो॥ ९॥

कन्दर्पो मूर्तिमानासीत् काम इत्युच्यते बुधै:।

तपस्यन्तमिह स्थाणुं नियमेन समाहितम्॥ १०॥

‘विद्वान् पुरुष जिसे काम कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकालमें मूर्तिमान् था—शरीर धारण करके विचरता था। उन दिनों भगवान् स्थाणु (शिव) इसी आश्रममें चित्तको एकाग्र करके नियमपूर्वक तपस्या करते थे॥ १०॥

कृतोद्वाहं तु देवेशं गच्छन्तं समरुद्गणम्।

धर्षयामास दुर्मेधा हुंकृतश्च महात्मना॥ ११॥

‘एक दिन समाधिसे उठकर देवेश्वर शिव मरुद्गणोंके साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय दुर्बुद्धि कामने उनपर आक्रमण किया। यह देख महात्मा शिवने हुङ्कार करके उसे रोका॥ ११॥

अवध्यातश्च रुद्रेण चक्षुषा रघुनन्दन।

व्यशीर्यन्त शरीरात् स्वात् सर्वगात्राणि दुर्मते॥ १२॥

‘रघुनन्दन! भगवान् रुद्रने रोषभरी दृष्टिसे अवहेलना-पूर्वक उसकी ओर देखा; फिर तो उस दुर्बुद्धिके सारे अंग उसके शरीरसे जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये॥ १२॥

तत्र गात्रं हतं तस्य निर्दग्धस्य महात्मन:।

अशरीर: कृत: काम: क्रोधाद् देवेश्वरेण ह॥ १३॥

‘वहाँ दग्ध हुए महामना कन्दर्पका शरीर नष्ट हो गया। देवेश्वर रुद्रने अपने क्रोधसे कामको अंगहीन कर दिया॥ १३॥

अनंग इति विख्यातस्तदाप्रभृति राघव।

स चांगविषय: श्रीमान् यत्रांगं स मुमोच ह॥ १४॥

‘राम! तभीसे वह ‘अनंग’ नामसे विख्यात हुआ। शोभाशाली कन्दर्पने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वह प्रदेश अंगदेशके नामसे विख्यात हुआ॥ १४॥

तस्यायमाश्रम: पुण्यस्तस्येमे मुनय: पुरा।

शिष्या धर्मपरा वीर तेषां पापं न विद्यते॥ १५॥

‘यह उन्हीं महादेवजीका पुण्य आश्रम है। वीर! ये मुनिलोग पूर्वकालमें उन्हीं स्थाणुके धर्मपरायण शिष्य थे। इनका सारा पाप नष्ट हो गया है॥ १५॥

इहाद्य रजनीं राम वसेम शुभदर्शन।

पुण्ययो: सरितोर्मध्ये श्वस्तरिष्यामहे वयम्॥ १६॥

‘शुभदर्शन राम! आजकी रातमें हमलोग यहीं इन पुण्यसलिला सरिताओंके बीचमें निवास करें। कल सबेरे इन्हें पार करेंगे॥ १६॥

अभिगच्छामहे सर्वे शुचय: पुण्यमाश्रमम्।

इह वास: परोऽस्माकं सुखं वत्स्यामहे निशाम्॥ १७॥

स्नाताश्च कृतजप्याश्च हुतहव्या नरोत्तम।

‘हम सब लोग पवित्र होकर इस पुण्य आश्रममें चलें। यहाँ रहना हमारे लिये बहुत उत्तम होगा। नरश्रेष्ठ! यहाँ स्नान करके जप और हवन करनेके बाद हम रातमें बड़े सुखसे रहेंगे’॥ १७॥

तेषां संवदतां तत्र तपोदीर्घेण चक्षुषा॥ १८॥

विज्ञाय परमप्रीता मुनयो हर्षमागमन्।

वे लोग वहाँ इस प्रकार आपसमें बातचीत कर ही रहे थे कि उस आश्रममें निवास करनेवाले मुनि तपस्याद्वारा प्राप्त हुई दूर दृष्टिसे उनका आगमन जानकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उनके हृदयमें हर्षजनित उल्लास छा गया॥ १८॥

अर्घ्यं पाद्यं तथाऽऽतिथ्यं निवेद्य कुशिकात्मजे॥ १९॥

रामलक्ष्मणयो: पश्चादकुर्वन्नतिथिक्रियाम्।

उन्होंने विश्वामित्रजीको अर्घ्य, पाद्य और अतिथि- सत्कारकी सामग्री अर्पित करनेके बाद श्रीराम और लक्ष्मणका भी आतिथ्य किया॥ १९॥

सत्कारं समनुप्राप्य कथाभिरभिरञ्जयन्॥ २०॥

यथार्हमजपन् संध्यामृषयस्ते समाहिता:।

यथोचित सत्कार करके उन मुनियोंने इन अतिथियोंका भाँति-भाँतिकी कथा-वार्ताओंद्वारा मनोरञ्जन किया। फिर उन महर्षियोंने एकाग्रचित्त होकर यथावत् संध्यावन्दन एवं जप किया॥ २०॥

तत्र वासिभिरानीता मुनिभि: सुव्रतै: सह॥ २१॥

न्यवसन् सुसुखं तत्र कामाश्रमपदे तथा।

तदनन्तर वहाँ रहनेवाले मुनियोंने अन्य उत्तम व्रतधारी मुनियोंके साथ विश्वामित्र आदिको शयनके लिये उपयुक्त स्थानमें पहुँचा दिया। सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले उस पुण्य आश्रममें उन विश्वामित्र आदिने बड़े सुखसे निवास किया॥ २१॥

कथाभिरभिरामाभिरभिरामौ नृपात्मजौ।

रमयामास धर्मात्मा कौशिको मुनिपुंगव:॥ २२॥

धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने उन मनोहर राजकुमारोंका सुन्दर कथाओंद्वारा मनोरञ्जन किया॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग:॥ २३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३॥

 

चतुर्विंश: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणका गंगापार होते समय विश्वामित्रजीसे जलमें उठती हुई तुमुलध्वनिके विषयमें प्रश्न करना, विश्वामित्रजीका उन्हें इसका कारण बताना तथा मलद, करूष एवं ताटका वनका परिचय देते हुए इन्हें ताटकावधके लिये आज्ञा प्रदान करना

तत: प्रभाते विमले कृताह्निकमरिन्दमौ।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य नद्यास्तीरमुपागतौ॥ १॥

तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें नित्यकर्मसे निवृत्त हुए विश्वामित्रजीको आगे करके शत्रुदमन वीर श्रीराम और लक्ष्मण गंगानदीके तटपर आये॥ १॥

ते च सर्वे महात्मानो मुनय: संशितव्रता:।

उपस्थाप्य शुभां नावं विश्वामित्रमथाब्रुवन्॥ २॥

उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन पुण्याश्रमनिवासी महात्मा मुनियोंने एक सुन्दर नाव मँगवाकर विश्वामित्रजीसे कहा—॥ २॥

आरोहतु भवान् नावं राजपुत्रपुरस्कृत:।

अरिंष्ट गच्छ पन्थानं मा भूत् कालस्य पर्यय:॥ ३॥

‘महर्षे! आप इन राजकुमारोंको आगे करके इस नावपर बैठ जाइये और मार्गको निर्विघ्नतापूर्वक तै कीजिये, जिससे विलम्ब न हो’॥ ३॥

विश्वामित्रस्तथेत्युक्त्वा तानृषीन् प्रतिपूज्य च।

ततार सहितस्ताभ्यां सरितं सागरंगमाम्॥ ४॥

विश्वामित्रजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन महर्षियोंकी सराहना की और वे श्रीराम तथा लक्ष्मणके साथ समुद्र- गामिनी गंगानदीको पार करने लगे॥ ४॥

तत्र शुश्राव वै शब्दं तोयसंरम्भवर्धितम्।

मध्यमागम्य तोयस्य तस्य शब्दस्य निश्चयम्॥ ५॥

ज्ञातुकामो महातेजा: सह राम: कनीयसा।

गंगाकी बीच धारामें आनेपर छोटे भाईसहित महातेजस्वी श्रीरामको दो जलोंके टकरानेकी बड़ी भारी आवाज सुनायी देने लगी। ‘यह कैसी आवाज है? क्यों तथा कहाँसे आ रही है?’ इस बातको निश्चितरूपसे जाननेकी इच्छा उनके भीतर जाग उठी॥ ५/

अथ राम: सरिन्मध्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम्॥ ६॥

वारिणो भिद्यमानस्य किमयं तुमुलो ध्वनि:।

तब श्रीरामने नदीके मध्यभागमें मुनिवर विश्वामित्रसे पूछा—‘जलके परस्पर मिलनेसे यहाँ ऐसी तुमुलध्वनि क्यों हो रही है?’॥ ६/

राघवस्य वच: श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम्॥ ७॥

कथयामास धर्मात्मा तस्य शब्दस्य निश्चयम्।

श्रीरामचन्द्रजीके वचनमें इस रहस्यको जाननेकी उत्कण्ठा भरी हुई थी। उसे सुनकर धर्मात्मा विश्वामित्रने उस महान् शब्द (तुमुलध्वनि) का सुनिश्चित कारण बताते हुए कहा—॥ ७/

कैलासपर्वते राम मनसा निर्मितं परम्॥ ८॥

ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सर:।

‘नरश्रेष्ठ राम! कैलासपर्वतपर एक सुन्दर सरोवर है। उसे ब्रह्माजीने अपने मानसिक संकल्पसे प्रकट किया था। मनके द्वारा प्रकट होनेसे ही वह उत्तम सरोवर ‘मानस’ कहलाता है॥ ८/

तस्मात् सुस्राव सरस: सायोध्यामुपगूहते॥ ९॥

सर:प्रवृत्ता सरयू: पुण्या ब्रह्मसरश्च्युता।

‘उस सरोवरसे एक नदी निकली है, जो अयोध्यापुरीसे सटकर बहती है। ब्रह्मसरसे निकलनेके कारण वह पवित्र नदी सरयूके नामसे विख्यात है॥ ९/

तस्यायमतुल: शब्दो जाह्नवीमभिवर्तते॥ १०॥

वारिसंक्षोभजो राम प्रणामं नियत: कुरु।

‘उसीका जल गंगाजीमें मिल रहा है। दो नदियोंके जलोंके संघर्षसे ही यह भारी आवाज हो रही है; जिसकी कहीं तुलना नहीं है। राम! तुम अपने मनको संयममें रखकर इस संगमके जलको प्रणाम करो’॥ १०/

ताभ्यां तु तावुभौ कृत्वा प्रणाममतिधार्मिकौ॥ ११॥

तीरं दक्षिणमासाद्य जग्मतुर्लघुविक्रमौ।

यह सुनकर उन दोनों अत्यन्त धर्मात्मा भाइयोंने उन दोनों नदियोंको प्रणाम किया और गंगाके दक्षिण किनारेपर उतरकर वे दोनों बन्धु जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए चलने लगे॥ ११/

स वनं घोरसंकाशं दृष्ट्वा नरवरात्मज:॥ १२॥

अविप्रहतमैक्ष्वाक: पप्रच्छ मुनिपुंगवम्।

उस समय इक्ष्वाकुनन्दन राजकुमार श्रीरामने अपने सामने एक भयङ्कर वन देखा, जिसमें मनुष्योंके आने-जानेका कोई चिह्न नहीं था। उसे देखकर उन्होंने मुनिवर विश्वामित्रसे पूछा—॥ १२॥

अहो वनमिदं दुर्गं झिल्लिकागणसंयुतम्॥ १३॥

भैरवै: श्वापदै: कीर्णं शकुन्तैर्दारुणारवै:।

नानाप्रकारै: शकुनैर्वाश्यद्भिर्भैरवस्वनै:॥ १४॥

‘गुरुदेव! यह वन तो बड़ा ही अद्भुत एवं दुर्गम है। यहाँ चारों ओर झिल्लियोंकी झनकार सुनायी देती है। भयानक हिंसक जन्तु भरे हुए हैं। भयङ्कर बोली बोलनेवाले पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। नाना प्रकारके विहंगम भीषण स्वरमें चहचहा रहे हैं॥ १३-१४॥

सिंहव्याघ्रवराहैश्च वारणैश्चापि शोभितम्।

धवाश्वकर्णककुभैर्बिल्वतिन्दुकपाटलै: ॥ १५॥

संकीर्णं बदरीभिश्च किं न्विदं दारुणं वनम्।

‘सिंह, व्याघ्र, सूअर और हाथी भी इस जंगलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। धव (धौरा), अश्वकर्ण (एक प्रकारके शालवृक्ष), ककुभ (अर्जुन), बेल, तिन्दुक (तेन्दू), पाटल (पाड़र) तथा बेरके वृक्षोंसे भरा हुआ यह भयङ्कर वन क्या है?—इसका क्या नाम है?’॥ १५/

तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनि:॥ १६॥

श्रूयतां वत्स काकुत्स्थ यस्यैतद् दारुणं वनम्।

तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्रने उनसे कहा—‘वत्स! ककुत्स्थनन्दन! यह भयङ्कर वन जिसके अधिकारमें रहा है, उसका परिचय सुनो॥ १६/

एतौ जनपदौ स्फीतौ पूर्वमास्तां नरोत्तम॥ १७॥

मलदाश्च करूषाश्च देवनिर्माणनिर्मितौ।

‘नरश्रेष्ठ! पूर्वकालमें यहाँ दो समृद्धिशाली जनपद थे—मलद और करूष। ये दोनों देश देवताओंके प्रयत्नसे निर्मित हुए थे॥ १७/

पुरा वृत्रवधे राम मलेन समभिप्लुतम्॥ १८॥

क्षुधा चैव सहस्राक्षं ब्रह्महत्या समाविशत्।

‘राम! पहलेकी बात है, वृत्रासुरका वध करनेके पश्चात् देवराज इन्द्र मलसे लिप्त हो गये। क्षुधाने भी उन्हें धर दबाया और उनके भीतर ब्रह्महत्या प्रविष्ट हो गयी॥

तमिन्द्रं मलिनं देवा ऋषयश्च तपोधना:॥ १९॥

कलशै: स्नापयामासुर्मलं चास्य प्रमोचयन्।

‘तब देवताओं तथा तपोधन ऋषियोंने मलिन इन्द्रको यहाँ गंगाजलसे भरे हुए कलशोंद्वारा नहलाया तथा उनके मल (और कारूष—क्षुधा) को छुड़ा दिया॥

इह भूम्यां मलं दत्त्वा देवा: कारूषमेव च॥ २०॥

शरीरजं महेन्द्रस्य ततो हर्षं प्रपेदिरे।

इस भूभागमें देवराज इन्द्रके शरीरसे उत्पन्न हुए मल और कारूषको देकर देवतालोग बड़े प्रसन्न हुए॥

निर्मलो निष्करूषश्च शुद्ध इन्द्रो यथाभवत्॥ २१॥

ततो देशस्य सुप्रीतो वरं प्रादादनुत्तमम्।

इमौ जनपदौ स्फीतौ ख्यातिं लोके गमिष्यत:॥ २२॥

मलदाश्च करूषाश्च ममांगमलधारिणौ।

‘इन्द्र पूर्ववत् निर्मल, निष्करूष (क्षुधाहीन) एवं शुद्ध हो गये। तब उन्होंने प्रसन्न होकर इस देशको यह उत्तम वर प्रदान किया—‘ये दो जनपद लोकमें मलद और करूष नामसे विख्यात होंगे। मेरे अंगजनित मलको धारण करनेवाले ये दोनों देश बड़े समृद्धिशाली होंगे’॥

साधु साध्विति तं देवा: पाकशासनमब्रुवन्॥ २३॥

देशस्य पूजां तां दृष्ट्वा कृतां शक्रेण धीमता।

‘बुद्धिमान् इन्द्रके द्वारा की गयी उस देशकी वह पूजा देखकर देवताओंने पाकशासनको बारम्बार साधुवाद दिया॥ २३/

एतौ जनपदौ स्फीतौ दीर्घकालमरिंदम॥ २४॥

मलदाश्च करूषाश्च मुदिता धनधान्यत:।

‘शत्रुदमन! मलद और करूष—ये दोनों जनपद दीर्घकालतक समृद्धिशाली, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा सुखी रहे हैं॥ २४/

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षिणी कामरूपिणी॥ २५॥

बलं नागसहस्रस्य धारयन्ती तदा ह्यभूत्।

‘कुछ कालके अनन्तर यहाँ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक यक्षिणी आयी, जो अपने शरीरमें एक हजार हाथियोंका बल धारण करती है॥ २५/

ताटका नाम भद्रं ते भार्या सुन्दस्य धीमत:॥ २६॥

मारीचो राक्षस: पुत्रो यस्या: शक्रपराक्रम:।

वृत्तबाहुर्महाशीर्षो विपुलास्यतनुर्महान्॥ २७॥

‘उसका नाम ताटका है। वह बुद्धिमान् सुन्द नामक दैत्यकी पत्नी है। तुम्हारा कल्याण हो। मारीच नामक राक्षस, जो इन्द्रके समान पराक्रमी है, उस ताटकाका ही पुत्र है। उसकी भुजाएँ गोल, मस्तक बहुत बड़ा, मुँह फैला हुआ और शरीर विशाल है॥ २६-२७॥

राक्षसो भैरवाकारो नित्यं त्रासयते प्रजा:।

इमौ जनपदौ नित्यं विनाशयति राघव॥ २८॥

मलदांश्च करूषांश्च ताटका दुष्टचारिणी।

‘वह भयानक आकारवाला राक्षस यहाँकी प्रजाको सदा ही त्रास पहुँचाता रहता है। रघुनन्दन! वह दुराचारिणी ताटका भी सदा मलद और करूष—इन दोनों जनपदोंका विनाश करती रहती है॥ २८/

सेयं पन्थानमावृत्य वसत्यत्यर्धयोजने॥ २९॥

अत एव च गन्तव्यं ताटकाया वनं यत:।

स्वबाहुबलमाश्रित्य जहीमां दुष्टचारिणीम्॥ ३०॥

‘वह यक्षिणी डेढ़ योजन (छ: कोस) तकके मार्गको घेरकर इस वनमें रहती है; अत: हमलोगोंको जिस ओर ताटका-वन है, उधर ही चलना चाहिये। तुम अपने बाहुबलका सहारा लेकर इस दुराचारिणीको मार डालो॥ २९-३०॥

मन्नियोगादिमं देशं कुरु निष्कण्टकं पुन:।

नहि कश्चिदिमं देशं शक्तो ह्यागन्तुमीदृशम्॥ ३१॥

‘मेरी आज्ञासे इस देशको पुन: निष्कण्टक बना दो। यह देश ऐसा रमणीय है तो भी इस समय कोई यहाँ आ नहीं सकता है॥ ३१॥

यक्षिण्या घोरया राम उत्सादितमसह्यया।

एतत्ते सर्वमाख्यातं यथैतद् दारुणं वनम्।

यक्ष्या चोत्सादितं सर्वमद्यापि न निवर्तते॥ ३२॥

‘राम! उस असह्य एवं भयानक यक्षिणीने इस देशको उजाड़ कर डाला है। यह वन ऐसा भयङ्कर क्यों है, यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। उस यक्षिणीने ही इस सारे देशको उजाड़ दिया है और वह आज भी अपने उस क्रूर कर्मसे निवृत्त नहीं हुई है’॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्विंश: सर्ग:॥ २४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४॥

 

पञ्चविंश: सर्ग:

श्रीरामके पूछनेपर विश्वामित्रजीका उनसे ताटकाकी उत्पत्ति, विवाह एवं शापआदिका प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका-वधके लिये प्रेरित करना

अथ तस्याप्रमेयस्य मुनेर्वचनमुत्तमम्।

श्रुत्वा पुरुषशार्दूल: प्रत्युवाच शुभां गिरम्॥ १॥

अपरिमित प्रभावशाली विश्वामित्र मुनिका यह उत्तम वचन सुनकर पुरुषसिंह श्रीरामने यह शुभ बात कही—॥ १॥

अल्पवीर्या यदा यक्षी श्रूयते मुनिपुंगव।

कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥ २॥

‘मुनिश्रेष्ठ! जब वह यक्षिणी एक अबला सुनी जाती है, तब तो उसकी शक्ति थोड़ी ही होनी चाहिये; फिर वह एक हजार हाथियोंका बल कैसे धारण करती है?’॥ २॥

इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा राघवस्यामितौजस:।

हर्षयन् श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिंदमम्॥ ३॥

विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं शृणु येन बलोत्कटा।

वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम्॥ ४॥

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथके कहे हुए इस वचनको सुनकर विश्वामित्रजी अपनी मधुर वाणीद्वारा लक्ष्मणसहित शत्रुदमन श्रीरामको हर्ष प्रदान करते हुए बोले—‘रघुनन्दन! जिस कारणसे ताटका अधिक बलशालिनी हो गयी है, वह बताता हूँ, सुनो। उसमें वरदानजनित बलका उदय हुआ है; अत: वह अबला होकर भी बल धारण करती है (सबला हो गयी है)॥ ३-४॥

पूर्वमासीन्महायक्ष: सुकेतुर्नाम वीर्यवान्।

अनपत्य: शुभाचार: स च तेपे महत्तप:॥ ५॥

‘पूर्वकालकी बात है, सुकेतु नामसे प्रसिद्ध एक महान् यक्ष थे। वे बड़े पराक्रमी और सदाचारी थे; परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी; इसलिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की॥ ५॥

पितामहस्तु सुप्रीतस्तस्य यक्षपतेस्तदा।

कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामत:॥ ६॥

‘श्रीराम! यक्षराज सुकेतुकी उस तपस्यासे ब्रह्माजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुकेतुको एक कन्यारत्न प्रदान किया, जिसका नाम ताटका था॥ ६॥

ददौ नागसहस्रस्य बलं चास्या: पितामह:।

न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशा:॥ ७॥

ब्रह्माजीने ही उस कन्याको एक हजार हाथियोंके समान बल दे दिया; परंतु उन महायशस्वी पितामहने उस यक्षको पुत्र नहीं ही दिया (उसके संकल्पके अनुसार पुत्र प्राप्त हो जानेपर उसके द्वारा जनताका अत्यधिक उत्पीड़न होता, यही सोचकर ब्रह्माजीने पुत्र नहीं दिया)॥ ७॥

तां तु बालां विवर्धन्तीं रूपयौवनशालिनीम्।

जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम्॥ ८॥

‘धीरे-धीरे वह यक्ष-बालिका बढ़ने लगी और बढ़कर रूप-यौवनसे सुशोभित होने लगी। उस अवस्थामें सुकेतुने अपनी उस यशस्विनी कन्याको जम्भपुत्र सुन्दके हाथमें उसकी पत्नीके रूपमें दे दिया॥ ८॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षी पुत्रं व्यजायत।

मारीचं नाम दुर्धर्षं य: शापाद् राक्षसोऽभवत्॥ ९॥

‘कुछ कालके बाद उस यक्षी ताटकाने मारीच नामसे प्रसिद्ध एक दुर्जय पुत्रको जन्म दिया, जो अगस्त्य मुनिके शापसे राक्षस हो गया॥ ९॥

सुन्दे तु निहते राम अगस्त्यमृषिसत्तमम्।

ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति॥ १०॥

‘श्रीराम! अगस्त्यने ही शाप देकर ताटकापति सुन्दको भी मार डाला। उसके मारे जानेपर ताटका पुत्रसहित जाकर मुनिवर अगस्त्यको भी मौतके घाट उतार देनेकी इच्छा करने लगी॥ १०॥

भक्षार्थं जातसंरम्भा गर्जन्ती साभ्यधावत।

आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषि:॥ ११॥

राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार स:।

‘वह कुपित हो मुनिको खा जानेके लिये गर्जना करती हुई दौड़ी। उसे आती देख भगवान् अगस्त्य मुनिने मारीचसे कहा—‘तू देवयोनि-रूपका परित्याग करके राक्षसभावको प्राप्त हो जा’॥ ११/

अगस्त्य: परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान्॥ १२॥

पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।

इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥ १३॥

‘फिर अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए ऋषिने ताटकाको भी शाप दे दिया—‘तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूपको त्यागकर तेरा भयङ्कर रूप हो जाय’॥ १२-१३॥

सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोधमूर्च्छिता।

देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम्॥ १४॥

‘इस प्रकार शाप मिलनेके कारण ताटकाका अमर्ष और भी बढ़ गया। वह क्रोधसे मूर्च्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्यजी जहाँ रहते थे, उस सुन्दर देशको उजाड़ने लगी॥ १४॥

एनां राघव दुर्वृत्तां यक्षीं परमदारुणाम्।

गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्॥ १५॥

‘रघुनन्दन! तुम गौओं और ब्राह्मणोंका हित करनेके लिये दुष्ट पराक्रमवाली इस परम भयङ्कर दुराचारिणी यक्षीका वध कर डालो॥ १५॥

नह्येनां शापसंसृष्टां कश्चिदुत्सहते पुमान्।

निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन॥ १६॥

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर! इस शापग्रस्त ताटकाको मारनेके लिये तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष समर्थ नहीं है॥ १६॥

नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम।

चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना॥ १७॥

‘नरश्रेष्ठ! तुम स्त्री-हत्याका विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना। एक राजपुत्रको चारों वर्णोंके हितके लिये स्त्रीहत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये॥ १७॥

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात्।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा॥ १८॥

‘प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये। यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये॥ १८॥

राज्यभारनियुक्तानामेष धर्म: सनातन:।

अधर्म्यां जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते॥ १९॥

‘जिनके ऊपर राज्यके पालनका भार है, उनका तो यह सनातन धर्म है। ककुत्स्थकुलनन्दन! ताटका महापापिनी है। उसमें धर्मका लेशमात्र भी नहीं है; अत: उसे मार डालो॥ १९॥

श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप।

पृथिवीं हन्तुमिच्छन्तीं मन्थरामभ्यसूदयत्॥ २०॥

‘नरेश्वर! सुना जाता है कि पूर्वकालमें विरोचनकी पुत्री मन्थरा सारी पृथ्वीका नाश कर डालना चाहती थी। उसके इस विचारको जानकर इन्द्रने उसका वध कर डाला॥ २०॥

विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता।

अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता॥ २१॥

‘श्रीराम! प्राचीन कालमें शुक्राचार्यकी माता तथा भृगुकी पतिव्रता पत्नी त्रिभुवनको इन्द्रसे शून्य कर देना चाहती थीं। यह जानकर भगवान् विष्णुने उनको मार डाला॥

एतैश्चान्यैश्च बहुभी राजपुत्रैर्महात्मभि:।

अधर्मसहिता नार्यो हता: पुरुषसत्तमै:।

तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप॥ २२॥

‘इन्होंने तथा अन्य बहुत-से महामनस्वी पुरुषप्रवर राजकुमारोंने पापचारिणी स्त्रियोंका वध किया है। नरेश्वर! अत: तुम भी मेरी आज्ञासे दया अथवा घृणाको त्यागकर इस राक्षसीको मार डालो’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चविंश: सर्ग:॥ २५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥

 

षड्विंश: सर्ग:

श्रीरामद्वारा ताटकाका वध

मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मज:।

राघव: प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रत:॥ १॥

मुनिके ये उत्साहभरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजकुमार श्रीरामने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—॥ १॥

पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात्।

वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया॥ २॥

अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना।

पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्वच:॥ ३॥

‘भगवन्! अयोध्यामें मेरे पिता महामना महाराज दशरथने अन्य गुरुजनोंके बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘बेटा! तुम पिताके कहनेसे पिताके वचनोंका गौरव रखनेके लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्रकी आज्ञाका नि:शङ्क होकर पालन करना। कभी भी उनकी बातकी अवहेलना न करना’॥

सोऽहं पितुर्वच: श्रुत्वा शासनाद् ब्रह्मवादिन:।

करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम्॥ ४॥

‘अत: मैं पिताजीके उस उपदेशको सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्माकी आज्ञासे ताटकावधसम्बन्धी कार्यको उत्तम मानकर करूँगा—इसमें संदेह नहीं है॥ ४॥

गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च।

तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यत:॥ ५॥

‘गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देशका हित करनेके लिये मैं आप-जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्माके आदेशका पालन करनेको सब प्रकारसे तैयार हूँ’॥ ५॥

एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बद‍्ध्वा मुष्टिमरिंदम:।

ज्याघोषमकरोत् तीव्रं दिश: शब्देन नादयन्॥ ६॥

ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीरामने धनुषके मध्यभागमें मुट्ठी बाँधकर उसे जोरसे पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चापर तीव्र टङ्कार दी। उसकी आवाजसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं॥ ६॥

तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिन:।

ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता॥ ७॥

उस शब्दसे ताटकावनमें रहनेवाले समस्त प्राणी थर्रा उठे। ताटका भी उस टङ्कार-घोषसे पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोधमें भर गयी॥ ७॥

तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता।

श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यत्र शब्दो विनि:सृत:॥ ८॥

उस शब्दको सुनकर वह राक्षसी क्रोधसे अचेत-सी हो गयी थी। उसे सुनते ही वह जहाँसे आवाज आयी थी, उसी दिशाकी ओर रोषपूर्वक दौड़ी॥ ८॥

तां दृष्ट्वा राघव: क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम्।

प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत॥ ९॥

उसके शरीरकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी। क्रोधमें भरी हुई उस विकराल राक्षसीकी ओर दृष्टिपात करके श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ ९॥

पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपु:।

भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च॥ १०॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, इस यक्षिणीका शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है! इसके दर्शनमात्रसे भीरु पुरुषोंके हृदय विदीर्ण हो सकते हैं॥ १०॥

एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम्।

विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम्॥ ११॥

‘मायाबलसे सम्पन्न होनेके कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है। देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटनेको विवश किये देता हूँ॥ ११॥

न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।

वीर्यं चास्या गतिं चैव हन्यामिति हि मे मति:॥ १२॥

‘यह अपने स्त्रीस्वभावके कारण रक्षित है; अत: मुझे इसे मारनेमें उत्साह नहीं है। मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमनशक्तिको नष्ट कर दूँ (अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ)’॥ १२॥

एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता।

उद्यम्य बाहुं गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत॥ १३॥

श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोधसे अचेत हुई ताटका वहाँ आ पहुँची और एक बाँह उठाकर गर्जना करती हुई उन्हींकी ओर झपटी॥ १३॥

विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिर्हुंकारेणाभिभर्त्स्य ताम्।

स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत॥ १४॥

यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्रने अपने हुंकारके द्वारा उसे डाँटकर कहा—‘रघुकुलके इन दोनों राजकुमारोंका कल्याण हो। इनकी विजय हो’॥ १४॥

उद्धुन्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ।

रजोमेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत्॥ १५॥

तब ताटकाने उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया। वहाँ धूलका विशाल बादल-सा छा गया। उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मणको दो घड़ीतक मोहमें डाल दिया॥ १५॥

ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ।

अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघव:॥ १६॥

तत्पश्चात् मायाका आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयोंपर पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा करने लगी। यह देख रघुनाथजी उसपर कुपित हो उठे॥ १६॥

शिलावर्षं महत् तस्या: शरवर्षेण राघव:।

प्रतिवार्योपधावन्त्या: करौ चिच्छेद पत्रिभि:॥ १७॥

रघुवीरने अपनी बाणवर्षाके द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टिको रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरीके दोनों हाथ तीखे सायकोंसे काट डाले॥ १७॥

ततश्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम्।

सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद्धृतकर्णाग्रनासिकाम्॥ १८॥

दोनों भुजाएँ कट जानेसे थकी हुई ताटका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगी। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने क्रोधमें भरकर उसके नाक-कान काट लिये॥ १८॥

कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकश:।

अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया॥ १९॥

परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली यक्षिणी थी; अत: अनेक प्रकारके रूप बनाकर अपनी मायासे श्रीराम और लक्ष्मणको मोहमें डालती हुई अदृश्य हो गयी॥ १९॥

अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा।

ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्तत:॥ २०॥

दृष्ट्वा गाधिसुत: श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्।

अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी॥ २१॥

यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया।

वध्यतां तावदेवैषा पुरा संध्या प्रवर्तते॥ २२॥

रक्षांसि संध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि।

अब वह पत्थरोंकी भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाशमें विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मणपर चारों ओरसे प्रस्तरोंकी वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्रने इस प्रकार कहा—‘श्रीराम! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञोंमें विघ्न डाला करती है। यह अपनी मायासे पुन: प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्याके समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’॥ २०—२२/

इत्युक्त: स तु तां यक्षीमश्मवृष्ट्याभिवर्षिणीम्॥ २३॥

दर्शयन् शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकै:।

विश्वामित्रजीके ऐसा कहनेपर श्रीरामने शब्दवेधी बाण चलानेकी शक्तिका परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरोंकी वर्षा करनेवाली उस यक्षिणीको सब ओरसे अवरुद्ध कर दिया॥ २३/

सा रुद्धा बाणजालेन मायाबलसमन्विता॥ २४॥

अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्ष्मणं च विनेदुषी।

तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव॥ २५॥

शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च।

उनके बाण-समूहसे घिर जानेपर मायाबलसे युक्त वह यक्षिणी जोर-जोरसे गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मणके ऊपर टूट पड़ी। उसे चलाये हुए इन्द्रके वज्रकी भाँति वेगसे आती देख श्रीरामने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली। तब ताटका पृथ्वीपर गिरी और मर गयी॥ २४-२५/

तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा॥ २६॥

साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन्।

उस भयङ्कर राक्षसीको मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओंने श्रीरामको साधुवाद देते हुए उनकी सराहना की॥ २६/

उवाच परमप्रीत: सहस्राक्ष: पुरन्दर:॥ २७॥

सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन्।

उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओंने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजीसे कहा—॥ २७/

मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्रा: सर्वे मरुद्गणा:॥ २८॥

तोषिता: कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे।

‘मुने! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो। आपने इस कार्यसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको संतुष्ट किया है। अब रघुकुलतिलक श्रीरामपर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये॥ २८/

प्रजापते: कृशाश्वस्य पुत्रान् सत्यपराक्रमान्॥ २९॥

तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय।

‘ब्रह्मन्! प्रजापति कृशाश्वके अस्त्र-रूपधारी पुत्रोंको, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबलसे सम्पन्न हैं, श्रीरामको समर्पित कीजिये॥ २९/

पात्रभूतश्च ते ब्रह्मंस्तवानुगमने रत:॥ ३०॥

कर्तव्यं सुमहत् कर्म सुराणां राजसूनुना।

‘विप्रवर! ये आपके अस्त्रदानके सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में तत्पर रहते हैं। राजकुमार श्रीरामके द्वारा देवताओंका महान् कार्य सम्पन्न होनेवाला है’॥ ३०/

एवमुक्त्वा सुरा: सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम्॥ ३१॥

विश्वामित्रं पूजयन्तस्तत: संध्या प्रवर्तते।

ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्गसे चले गये। तत्पश्चात् संध्या हो गयी॥ ३१/

ततो मुनिवर: प्रीतस्ताटकावधतोषित:॥ ३२॥

मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत्।

तदनन्तर ताटकावधसे संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्रने श्रीरामचन्द्रजीका मस्तक सूँघकर उनसे यह बात कही—॥ ३२/

इहाद्य रजनीं राम वसाम शुभदर्शन॥ ३३॥

श्व: प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम।

‘शुभदर्शन राम! आजकी रातमें हमलोग यहीं निवास करें। कल सबेरे अपने आश्रमपर चलेंगे’॥ ३३/

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मज:॥ ३४॥

उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम्।

विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने ताटकावनमें रहकर वह रात्रि बड़े सुखसे व्यतीत की॥ ३४/

मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।

रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम्॥ ३५॥

उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभासे सम्पन्न हो गया और चैत्ररथवनकी भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा॥ ३५॥

निहत्य तां यक्षसुतां स राम:

प्रशस्यमान: सुरसिद्धसंघै:।

उवास तस्मिन् मुनिना सहैव

प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमान:॥ ३६॥

यक्षकन्या ताटकाका वध करके श्रीरामचन्द्रजी देवताओं तथा सिद्धसमूहोंकी प्रशंसाके पात्र बन गये। उन्होंने प्रात:कालकी प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजीके साथ ताटकावनमें निवास किया॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षड्विंश: सर्ग:॥ २६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥

 

सप्तविंश: सर्ग:

विश्वामित्रद्वारा श्रीरामको दिव्यास्त्र-दान

अथ तां रजनीमुष्य विश्वामित्रो महायशा:।

प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुरस्वरम्॥ १॥

ताटकावनमें वह रात बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र हँसते हुए मीठे स्वरमें श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ १॥

परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते राजपुत्र महायश:।

प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वश:॥ २॥

‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। ताटकावधके कारण मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ; अत: बड़ी प्रसन्नताके साथ तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र दे रहा हूँ॥

देवासुरगणान् वापि सगन्धर्वोरगान् भुवि।

यैरमित्रान् प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि॥ ३॥

‘इनके प्रभावसे तुम अपने शत्रुओंको—चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व अथवा नाग ही क्यों न हों, रणभूमिमें बलपूर्वक अपने अधीन करके उनपर विजय पा जाओगे॥ ३॥

तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वश:।

दण्डचक्रं महद् दिव्यं तव दास्यामि राघव॥ ४॥

धर्मचक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च।

विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च॥ ५॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हें वे सभी दिव्यास्त्र दे रहा हूँ। वीर! मैं तुमको दिव्य एवं महान् दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अत्यन्त भयंकर ऐन्द्रचक्र दूँगा॥ ४-५॥

वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा।

अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ऐषीकमपि राघव॥ ६॥

ददामि ते महाबाहो ब्राह्ममस्त्रमनुत्तमम्।

‘नरश्रेष्ठ राघव! इन्द्रका वज्रास्त्र, शिवका श्रेष्ठ त्रिशूल तथा ब्रह्माजीका ब्रह्मशिर नामक अस्त्र भी दूँगा। महाबाहो! साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करता हूँ॥ ६/

गदे द्वे चैव काकुत्स्थ मोदकीशिखरी शुभे॥ ७॥

प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज।

धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च॥ ८॥

वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम्।

‘ककुत्स्थकुलभूषण! इनके सिवा दो अत्यन्त उज्ज्वल और सुन्दर गदाएँ, जिनके नाम मोदकी और शिखरी हैं, मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। पुरुषसिंह राजकुमार राम! धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी बड़े उत्तम अस्त्र हैं। इन्हें भी आज तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ ७-८/

अशनी द्वे प्रयच्छामि शुष्कार्द्रे रघुनन्दन॥ ९॥

ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा।

‘रघुनन्दन! सूखी और गीली दो प्रकारकी अशनि तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र भी तुम्हें दे रहा हूँ॥ ९/

आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामत:॥ १०॥

वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ।

‘अग्निका प्रिय आग्नेय-अस्त्र, जो शिखरास्त्रके नामसे भी प्रसिद्ध है, तुम्हें अर्पण करता हूँ। अनघ! अस्त्रोंमें प्रधान जो वायव्यास्त्र है, वह भी तुम्हें दे रहा हूँ॥ १०/

अस्त्रं हयशिरो नाम क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च॥ ११॥

शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राघव।

‘ककुत्स्थकुलभूषण राघव! हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्च-अस्त्र तथा दो शक्तियोंको भी तुम्हें देता हूँ॥

कङ्कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम्॥ १२॥

वधार्थं रक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वश:।

‘कङ्काल, घोर मूसल, कपाल तथा किङ्किणी आदि सब अस्त्र, जो राक्षसोंके वधमें उपयोगी होते हैं, तुम्हें दे रहा हूँ॥ १२/

वैद्याधरं महास्त्रं च नन्दनं नाम नामत:॥ १३॥

असिरत्नं महाबाहो ददामि नृवरात्मज।

‘महाबाहु राजकुमार! नन्दन नामसे प्रसिद्ध विद्याधरोंका महान् अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १३/

गान्धर्वमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामत:॥ १४॥

प्रस्वापनं प्रशमनं दद्मि सौम्यं च राघव।

‘रघुनन्दन! गन्धर्वोंका प्रिय सम्मोहन नामक अस्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य-अस्त्र भी देता हूँ॥ १४/

वर्षणं शोषणं चैव संतापनविलापने॥ १५॥

मादनं चैव दुर्धर्षं कन्दर्पदयितं तथा।

गान्धर्वमस्त्रं दयितं मानवं नाम नामत:॥ १६॥

पैशाचमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामत:।

प्रतीच्छ नरशार्दूल राजपुत्र महायश:॥ १७॥

‘महायशस्वी पुरुषसिंह राजकुमार! वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन तथा कामदेवका प्रिय दुर्जय अस्त्र मादन, गन्धर्वोंका प्रिय मानवास्त्र तथा पिशाचोंका प्रिय मोहनास्त्र भी मुझसे ग्रहण करो॥ १५—१७॥

तामसं नरशार्दूल सौमनं च महाबलम्।

संवर्तं चैव दुर्धर्षं मौसलं च नृपात्मज॥ १८॥

सत्यमस्त्रं महाबाहो तथा मायामयं परम्।

सौरं तेज:प्रभं नाम परतेजोऽपकर्षणम्॥ १९॥

‘नरश्रेष्ठ राजपुत्र महाबाहु राम! तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय उत्तम अस्त्र भी तुम्हें अर्पण करता हूँ। सूर्यदेवताका तेज:प्रभ नामक अस्त्र, जो शत्रुके तेजका नाश करनेवाला है, तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १८-१९॥

सोमास्त्रं शिशिरं नाम त्वाष्ट्रमस्त्रं सुदारुणम्।

दारुणं च भगस्यापि शीतेषुमथ मानवम्॥ २०॥

‘सोम देवताका शिशिर नामक अस्त्र, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का अत्यन्त दारुण अस्त्र, भगदेवताका भी भयंकर अस्त्र तथा मनुका शीतेषु नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूँ॥ २०॥

एतान् राम महाबाहो कामरूपान् महाबलान्।

गृहाण परमोदारान् क्षिप्रमेव नृपात्मज॥ २१॥

‘महाबाहु राजकुमार श्रीराम! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् बलसे सम्पन्न तथा परम उदार हैं। तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो’॥ २१॥

स्थितस्तु प्राङ्मुखो भूत्वा शुचिर्मुनिवरस्तदा।

ददौ रामाय सुप्रीतो मन्त्रग्राममनुत्तमम्॥ २२॥

ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजी उस समय स्नान आदिसे शुद्ध हो पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको उन सभी उत्तम अस्त्रोंका उपदेश दिया॥ २२॥

सर्वसंग्रहणं येषां दैवतैरपि दुर्लभम्।

तान्यस्त्राणि तदा विप्रो राघवाय न्यवेदयत्॥ २३॥

जिन अस्त्रोंका पूर्णरूपसे संग्रह करना देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, उन सबको विप्रवर विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको समर्पित कर दिया॥ २३॥

जपतस्तु मुनेस्तस्य विश्वामित्रस्य धीमत:।

उपतस्थुर्महार्हाणि सर्वाण्यस्त्राणि राघवम्॥ २४॥

ऊचुश्च मुदिता रामं सर्वे प्राञ्जलयस्तदा।

इमे च परमोदार किंकरास्तव राघव॥ २५॥

यद्यदिच्छसि भद्रं ते तत्सर्वं करवाम वै।

बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने ज्यों ही जप आरम्भ किया त्यों ही वे सभी परम पूज्य दिव्यास्त्र स्वत: आकर श्रीरघुनाथजीके पास उपस्थित हो गये और अत्यन्त हर्षमें भरकर उस समय श्रीरामचन्द्रजीसे हाथ जोड़कर कहने लगे—‘परम उदार रघुनन्दन! आपका कल्याण हो। हम सब आपके किङ्कर हैं। आप हमसे जो-जो सेवा लेना चाहेंगे, वह सब हम करनेको तैयार रहेंगे’॥ २४-२५॥

ततो राम: प्रसन्नात्मा तैरित्युक्तो महाबलै:॥ २६॥

प्रतिगृह्य च काकुत्स्थ: समालभ्य च पाणिना।

मानसा मे भविष्यध्वमिति तान्यभ्यचोदयत्॥ २७॥

उन महान् प्रभावशाली अस्त्रोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें ग्रहण करनेके पश्चात् हाथसे उनका स्पर्श करके बोले—‘आप सब मेरे मनमें निवास करें’॥ २६-२७॥

तत: प्रीतमना रामो विश्वामित्रं महामुनिम्।

अभिवाद्य महातेजा गमनायोपचक्रमे॥ २८॥

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीरामने प्रसन्नचित्त होकर महामुनि विश्वामित्रको प्रणाम किया और आगेकी यात्रा आरम्भ की॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तविंश: सर्ग:॥ २७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥

 

अष्टाविंश: सर्ग:

विश्वामित्रका श्रीरामको अस्त्रोंकी संहारविधि बताना तथा उन्हें अन्यान्य अस्त्रोंका उपदेश करना, श्रीरामका एक आश्रम एवं यज्ञस्थानके विषयमें मुनिसे प्रश्न

प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदन: शुचि:।

गच्छन्नेव च काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ १॥

उन अस्त्रोंको ग्रहण करके परम पवित्र श्रीरामका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा था। वे चलते-चलते ही विश्वामित्रसे बोले—॥ १॥

गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्ष: सुरैरपि।

अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारान् मुनिपुंगव॥ २॥

‘भगवन्! आपकी कृपासे इन अस्त्रोंको ग्रहण करके मैं देवताओंके लिये भी दुर्जय हो गया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अस्त्रोंकी संहारविधि जानना चाहता हूँ’॥ २॥

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रो महातपा:।

संहारान् व्याजहाराथ धृतिमान् सुव्रत: शुचि:॥ ३॥

ककुत्स्थकुलतिलक श्रीरामके ऐसा कहनेपर महातपस्वी, धैर्यवान्, उत्तम व्रतधारी और पवित्र विश्वामित्र मुनिने उन्हें अस्त्रोंकी संहारविधिका उपदेश दिया॥ ३॥

सत्यवन्तं सत्यकीर्तिं धृष्टं रभसमेव च।

प्रतिहारतरं नाम पराङ्मुखमवाङ्मुखम्॥ ४॥

लक्ष्यालक्ष्याविमौ चैव दृढनाभसुनाभकौ।

दशाक्षशतवक्त्रौ च दशशीर्षशतोदरौ॥ ५॥

पद्मनाभमहानाभौ दुन्दुनाभस्वनाभकौ।

ज्योतिषं शकुनं चैव नैरास्यविमलावुभौ॥ ६॥

यौगंधरविनिद्रौ च दैत्यप्रमथनौ तथा।

शुचिबाहुर्महाबाहुर्निष्कलिर्विरुचस्तथा ।

सार्चिमाली धृतिर्माली वृत्तिमान् रुचिरस्तथा॥ ७॥

पित्र्य: सौमनसश्चैव विधूतमकरावुभौ।

परवीरं रतिं चैव धनधान्यौ च राघव॥ ८॥

कामरूपं कामरुचिं मोहमावरणं तथा।

जृम्भकं सर्पनाथं च पन्थानवरुणौ तथा॥ ९ ॥

कृशाश्वतनयान् राम भास्वरान् कामरूपिण:।

प्रतीच्छ मम भद्रं ते पात्रभूतोऽसि राघव॥ १०॥

तदनन्तर वे बोले—‘रघुकुलनन्दन राम! तुम्हारा कल्याण हो! तुम अस्त्रविद्याके सुयोग्य पात्र हो; अत: निम्नाङ्कित अस्त्रोंको भी ग्रहण करो—सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्राङ्मुख, अवाङ्मुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर और विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिर्माली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण—ये सभी प्रजापति कृशाश्वके पुत्र हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा परम तेजस्वी हैं। तुम इन्हें ग्रहण करो’॥ ४—१०॥

बाढमित्येव काकुत्स्थ: प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

दिव्यभास्वरदेहाश्च मूर्तिमन्त: सुखप्रदा:॥ ११॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न मनसे उन अस्त्रोंको ग्रहण किया। उन मूर्तिमान् अस्त्रोंके शरीर दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहे थे। वे अस्त्र जगत्को सुख देनेवाले थे॥ ११॥

केचिदंगारसदृशा: केचिद् धूमोपमास्तथा।

चन्द्रार्कसदृशा: केचित् प्रह्वाञ्जलिपुटास्तथा॥ १२॥

उनमेंसे कितने ही अंगारोंके समान तेजस्वी थे। कितने ही धूमके समान काले प्रतीत होते थे तथा कुछ अस्त्र सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान थे। वे सब-के-सब हाथ जोड़कर श्रीरामके समक्ष खड़े हुए॥ १२॥

रामं प्राञ्जलयो भूत्वाब्रुवन् मधुरभाषिण:।

इमे स्म नरशार्दूल शाधि किं करवाम ते॥ १३॥

उन्होंने अञ्जलि बाँधे मधुर वाणीमें श्रीरामसे इस प्रकार कहा—‘पुरुषसिंह! हमलोग आपके दास हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’॥ १३॥

गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दन:।

मानसा: कार्यकालेषु साहाय्यं मे करिष्यथ॥ १४॥

तब रघुकुलनन्दन रामने उनसे कहा—‘इस समय तो आपलोग अपने अभीष्ट स्थानको जायँ; परंतु आवश्यकताके समय मेरे मनमें स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें’॥ १४॥

अथ ते राममामन्त्र्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।

एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम्॥ १५॥

तत्पश्चात् वे श्रीरामकी परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये॥ १५॥

स च तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम्।

गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥ १६॥

किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरत:।

वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥

इस प्रकार उन अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके श्रीरघुनाथजीने चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्रसे मधुर वाणीमें पूछा—‘भगवन्! सामनेवाले पर्वतके पास ही जो यह मेघोंकी घटाके समान सघन वृक्षोंसे भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है? उसके विषयमें जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है॥ १६-१७॥

दर्शनीयं मृगाकीर्णं मनोहरमतीव च।

नानाप्रकारै: शकुनैर्वल्गुभाषैरलंकृतम्॥ १८॥

‘यह दर्शनीय स्थान मृगोंके झुंडसे भरा हुआ होनेके कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। नाना प्रकारके पक्षी अपनी मधुर शब्दावलीसे इस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं॥ १८॥

नि:सृता:स्मो मुनिश्रेष्ठ कान्ताराद् रोमहर्षणात्।

अनया त्ववगच्छामि देशस्य सुखवत्तया॥ १९॥

‘मुनिश्रेष्ठ! इस प्रदेशकी इस सुखमयी स्थितिसे यह जान पड़ता है कि अब हमलोग उस रोमाञ्चकारी दुर्गम ताटकावनसे बाहर निकल आये हैं॥ १९॥

सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम्।

सम्प्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिण:॥ २०॥

तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने।

भगवंस्तस्य को देश: सा यत्र तव याज्ञिकी॥ २१॥

रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसा:।

एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥ २२॥

‘भगवन्! मुझे सब कुछ बताइये। यह किसका आश्रम है? भगवन्! महामुने! जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुरात्मा राक्षस आपके यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आया करते हैं और जहाँ मुझे यज्ञकी रक्षा तथा राक्षसोंके वधका कार्य करना है, उस आपके आश्रमका कौन-सा देश है? ब्रह्मन्! मुनिश्रेष्ठ प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहता हूँ’॥ २०—२२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टाविंश: सर्ग:॥ २८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २८॥

 

एकोनत्रिंश: सर्ग:

विश्वामित्रजीका श्रीरामसे सिद्धाश्रमका पूर्ववृत्तान्त बताना और उन दोनों भाइयोंके साथ अपने आश्रमपर पहुँचकर पूजित होना

अथ तस्याप्रमेयस्य वचनं परिपृच्छत:।

विश्वामित्रो महातेजा व्याख्यातुमुपचक्रमे॥ १॥

अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीरामका वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्रने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया—॥ १॥

इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृत:।

वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च॥ २॥

तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहातपा:।

एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मन:॥ ३॥

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकालमें यहाँ देववन्दित भगवान् विष्णुने बहुत वर्षों एवं सौ युगोंतक तपस्याके लिये निवास किया था। उन्होंने यहाँ बहुत बड़ी तपस्या की थी। यह स्थान महात्मा वामनका—वामन अवतार धारण करनेको उद्यत हुए श्रीविष्णुका अवतार ग्रहणसे पूर्व आश्रम था॥ २-३॥

सिद्धाश्रम इति ख्यात: सिद्धो ह्यत्र महातपा:।

एतस्मिन्नेव काले तु राजा वैरोचनिर्बलि:॥ ४॥

निर्जित्य दैवतगणान् सेन्द्रान् सहमरुद्गणान्।

कारयामास तद्राज्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुत:॥ ५॥

‘इसकी सिद्धाश्रमके नामसे प्रसिद्धि थी; क्योंकि यहाँ महातपस्वी विष्णुको सिद्धि प्राप्त हुई थी। जब वे तपस्या करते थे, उसी समय विरोचनकुमार राजा बलिने इन्द्र और मरुद्गणोंसहित समस्त देवताओंको पराजित करके उनका राज्य अपने अधिकारमें कर लिया था। वे तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये थे॥ ४-५॥

यज्ञं चकार सुमहानसुरेन्द्रो महाबल:।

बलेस्तु यजमानस्य देवा: साग्निपुरोगमा:।

समागम्य स्वयं चैव विष्णुमूचुरिहाश्रमे॥ ६॥

‘उन महाबली महान् असुरराजने एक यज्ञका आयोजन किया। उधर बलि यज्ञमें लगे हुए थे, इधर अग्नि आदि देवता स्वयं इस आश्रममें पधारकर भगवान् विष्णुसे बोले—॥

बलिर्वैरोचनिर्विष्णो यजते यज्ञमुत्तमम्।

असमाप्तव्रते तस्मिन् स्वकार्यमभिपद्यताम्॥ ७॥

‘‘सर्वव्यापी परमेश्वर! विरोचनकुमार बलि एक उत्तम यज्ञका अनुष्ठान कर रहे हैं। उनका वह यज्ञ-सम्बन्धी नियम पूर्ण होनेसे पहले ही हमें अपना कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये॥ ७॥

ये चैनमभिवर्तन्ते याचितार इतस्तत:।

यच्च यत्र यथावच्च सर्वं तेभ्य: प्रयच्छति॥ ८॥

‘‘इस समय जो भी याचक इधर-उधरसे आकर उनके यहाँ याचनाके लिये उपस्थित होते हैं, वे गो, भूमि और सुवर्ण आदि सम्पत्तियोंमेंसे जिस वस्तुको भी लेना चाहते हैं, उनको वे सारी वस्तुएँ राजा बलि यथावत्-रूपसे अर्पित करते हैं॥ ८॥

स त्वं सुरहितार्थाय मायायोगमुपाश्रित:।

वामनत्वं गतो विष्णो कुरु कल्याणमुत्तमम्॥ ९॥

‘‘अत: विष्णो! आप देवताओंके हितके लिये अपनी योगमायाका आश्रय ले वामनरूप धारण करके उस यज्ञमें जाइये और हमारा उत्तम कल्याण-साधन कीजिये’॥ ९॥

एतस्मिन्नन्तरे राम कश्यपोऽग्निसमप्रभ:।

अदित्या सहितो राम दीप्यमान इवौजसा॥ १०॥

देवीसहायो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।

व्रतं समाप्य वरदं तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ११॥

‘श्रीराम! इसी समय अग्निके समान तेजस्वी महर्षि कश्यप धर्मपत्नी अदितिके साथ अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ आये। वे एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक चालू रहनेवाले महान् व्रतको अदितिदेवीके साथ ही समाप्त करके आये थे। उन्होंने वरदायक भगवान् मधुसूदनकी इस प्रकार स्तुति की—॥ १०—११॥

तपोमयं तपोराशिं तपोमूर्तिं तपात्मकम्।

तपसा त्वां सुतप्तेन पश्यामि पुरुषोत्तमम्॥ १२॥

‘‘भगवन्! आप तपोमय हैं। तपस्याकी राशि हैं। तप आपका स्वरूप है। आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं भलीभाँति तपस्या करके उसके प्रभावसे आप पुरुषोत्तमका दर्शन कर रहा हूँ॥ १२॥

शरीरे तव पश्यामि जगत् सर्वमिदं प्रभो।

त्वमनादिरनिर्देश्यस्त्वामहं शरणं गत:॥ १३॥

‘‘प्रभो! मैं इस सारे जगत्को आपके शरीरमें स्थित देखता हूँ। आप अनादि हैं। देश, काल और वस्तुकी सीमासे परे होनेके कारण आपका इदमित्थंरूपसे निर्देश नहीं किया जा सकता। मैं आपकी शरणमें आया हूँ’॥ १३॥

तमुवाच हरि: प्रीत: कश्यपं गतकल्मषम्।

वरं वरय भद्रं ते वरार्होऽसि मतो मम॥ १४॥

‘कश्यपजीके सारे पाप धुल गये थे। भगवान् श्रीहरिने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा—‘महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी इच्छाके अनुसार कोई वर माँगो; क्योंकि तुम मेरे विचारसे वर पानेके योग्य हो’॥ १४॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मारीच: कश्यपोऽब्रवीत्।

अदित्या देवतानां च मम चैवानुयाचितम्॥ १५॥

वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत।

पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ॥ १६॥

‘भगवान्‌का यह वचन सुनकर मरीचिनन्दन कश्यपने कहा—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वरदायक परमेश्वर! सम्पूर्ण देवताओंकी, अदितिकी तथा मेरी भी आपसे एक ही बातके लिये बारम्बार याचना है। आप अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझे वह एक ही वर प्रदान करें। भगवन्! निष्पाप नारायणदेव! आप मेरे और अदितिके पुत्र हो जायँ॥ १५-१६॥

भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदन।

शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १७॥

‘‘असुरसूदन! आप इन्द्रके छोटे भाई हों और शोकसे पीडि़त हुए इन देवताओंकी सहायता करें॥ १७॥

अयं सिद्धाश्रमो नाम प्रसादात् ते भविष्यति।

सिद्धे कर्मणि देवेश उत्तिष्ठ भगवन्नित:॥ १८॥

‘‘देवेश्वर! भगवन्! आपकी कृपासे यह स्थान सिद्धाश्रमके नामसे विख्यात होगा। अब आपका तपरूप कार्य सिद्ध हो गया है; अत: यहाँसे उठिये’॥ १८॥

अथ विष्णुर्महातेजा अदित्यां समजायत।

वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत्॥ १९॥

‘तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् विष्णु अदितिदेवीके गर्भसे प्रकट हुए और वामनरूप धारण करके विरोचनकुमार बलिके पास गये॥ १९॥

त्रीन् पदानथ भिक्षित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम्।

आक्रम्य लोकाँल्लोकार्थी सर्वलोकहिते रत:॥ २०॥

महेन्द्राय पुन: प्रादान्नियम्य बलिमोजसा।

त्रैलोक्यं स महातेजाश्चक्रे शक्रवशं पुन:॥ २१॥

‘सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् विष्णु बलिके अधिकारसे त्रिलोकीका राज्य ले लेना चाहते थे; अत: उन्होंने तीन पग भूमिके लिये याचना करके उनसे भूमिदान ग्रहण किया और तीनों लोकोंको आक्रान्त करके उन्हें पुन: देवराज इन्द्रको लौटा दिया। महातेजस्वी श्रीहरिने अपनी शक्तिसे बलिका निग्रह करके त्रिलोकीको पुन: इन्द्रके अधीन कर दिया॥ २०-२१॥

तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रम: श्रमनाशन:।

मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते॥ २२॥

‘उन्हीं भगवान्ने पूर्वकालमें यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकारके श्रम (दु:ख-शोक) का नाश करनेवाला है। उन्हीं भगवान् वामनमें भक्ति होनेके कारण मैं भी इस स्थानको अपने उपयोगमें लाता हूँ॥ २२॥

एनमाश्रममायान्ति राक्षसा विघ्नकारिण:।

अत्र ते पुरुषव्याघ्र हन्तव्या दुष्टचारिण:॥ २३॥

‘इसी आश्रमपर मेरे यज्ञमें विघ्न डालनेवाले राक्षस आते हैं। पुरुषसिंह! यहीं तुम्हें उन दुराचारियोंका वध करना है॥ २३॥

अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम्।

तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम॥ २४॥

‘श्रीराम! अब हमलोग उस परम उत्तम सिद्धाश्रममें पहुँच रहे हैं। तात! वह आश्रम जैसे मेरा है, वैसे ही तुम्हारा भी है’॥ २४॥

इत्युक्त्वा परमप्रीतो गृह्य रामं सलक्ष्मणम्।

प्रविशन्नाश्रमपदं व्यरोचत महामुनि:।

शशीव गतनीहार: पुनर्वसुसमन्वित:॥ २५॥

ऐसा कहकर महामुनिने बड़े प्रेमसे श्रीराम और लक्ष्मणके हाथ पकड़ लिये और उन दोनोंके साथ आश्रममें प्रवेश किया। उस समय पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रोंके बीचमें स्थित तुषाररहित चन्द्रमाकी भाँति उनकी शोभा हुई॥ २५॥

तं दृष्ट्वा मुनय: सर्वे सिद्धाश्रमनिवासिन:।

उत्पत्योत्पत्य सहसा विश्वामित्रमपूजयन्॥ २६॥

यथार्हं चक्रिरे पूजां विश्वामित्राय धीमते।

तथैव राजपुत्राभ्यामकुर्वन्नतिथिक्रियाम्॥ २७॥

विश्वामित्रजीको आया देख सिद्धाश्रममें रहनेवाले सभी तपस्वी उछलते-कूदते हुए सहसा उनके पास आये और सबने मिलकर उन बुद्धिमान् विश्वामित्रजीकी यथोचित पूजा की। इसी प्रकार उन्होंने उन दोनों राजकुमारोंका भी अतिथि- सत्कार किया॥ २६-२७॥

मुहूर्तमथ विश्रान्तौ राजपुत्रावरिंदमौ।

प्राञ्जली मुनिशार्दूलमूचतू रघुनन्दनौ॥ २८॥

दो घड़ीतक विश्राम करनेके बाद रघुकुलको आनन्द देनेवाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्रसे बोले—॥ २८॥

अद्यैव दीक्षां प्रविश भद्रं ते मुनिपुंगव।

सिद्धाश्रमोऽयं सिद्ध: स्यात् सत्यमस्तु वचस्तव॥ २९॥

‘मुनिश्रेष्ठ! आप आज ही यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें। आपका कल्याण हो। यह सिद्धाश्रम वास्तवमें यथानाम तथागुण सिद्ध हो और राक्षसोंके वधके विषयमें आपकी कही हुई बात सच्ची हो’॥ २९॥

एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महानृषि:।

प्रविवेश तदा दीक्षां नियतो नियतेन्द्रिय:॥ ३०॥

कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ।

प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां संध्यामुपास्य च॥ ३१॥

प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च।

हुताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम्॥ ३२॥

उनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र जितेन्द्रियभावसे नियमपूर्वक यज्ञकी दीक्षामें प्रविष्ट हुए। वे दोनों राजकुमार भी सावधानीके साथ रात व्यतीत करके सबेरे उठे और स्नान आदिसे शुद्ध हो प्रात:कालकी संध्योपासना तथा नियमपूर्वक सर्वश्रेष्ठ गायत्रीमन्त्रका जप करने लगे। जप पूरा होनेपर उन्होंने अग्निहोत्र करके बैठे हुए विश्वामित्रजीके चरणोंमें वन्दना की॥ ३०—३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनत्रिंश: सर्ग:॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९॥

 

त्रिंश: सर्ग:

श्रीरामद्वारा विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा तथा राक्षसोंका संहार

अथ तौ देशकालज्ञौ राजपुत्रावरिंदमौ।

देशे काले च वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वच:॥ १॥

तदनन्तर देश और कालको जाननेवाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और कालके अनुसार बोलने योग्य वचनके मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनिसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

भगवञ्छ्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ।

संरक्षणीयौ तौ ब्रूहि नातिवर्तेत तत्क्षणम्॥ २॥

‘भगवन्! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरोंका आक्रमण होता है? जब कि हमें उन दोनोंको यज्ञभूमिमें आनेसे रोकना है। कहीं ऐसा न हो, असावधानीमें ही वह समय हाथसे निकल जाय; अत: उसे बता दीजिये’॥ २॥

एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया।

सर्वे ते मुनय: प्रीता: प्रशशंसुर्नृपात्मजौ॥ ३॥

ऐसी बात कहकर युद्धकी इच्छासे उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारोंकी ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ३॥

अद्यप्रभृति षड्रात्रं रक्षतां राघवौ युवाम्।

दीक्षां गतो ह्येष मुनिर्मौनित्वं च गमिष्यति॥ ४॥

वे बोले—‘ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं; अत: अब मौन रहेंगे। आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आजसे छ: रातोंतक इनके यज्ञकी रक्षा करते रहें’॥ ४॥

तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ।

अनिद्रं षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम्॥ ५॥

मुनियोंका यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छ: दिन और छ: राततक उस तपोवनकी रक्षा करते रहे; इस बीचमें उन्होंने नींद भी नहीं ली॥ ५॥

उपासांचक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ।

ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिंदमौ॥ ६॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्रके पास खड़े हो उनकी (और उनके यज्ञकी) रक्षामें लगे रहे॥ ६॥

अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि तदागते।

सौमित्रिमब्रवीद् रामो यत्तो भव समाहित:॥ ७॥

इस प्रकार कुछ काल बीत जानेपर जब छठा दिन आया, तब श्रीरामने सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! तुम अपने चित्तको एकाग्र करके सावधान हो जाओ’॥ ७॥

रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया।

प्रजज्वाल ततो वेदि: सोपाध्यायपुरोहिता॥ ८॥

युद्धकी इच्छासे शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय (ब्रह्मा), पुरोहित (उपद्रष्टा) तथा अन्यान्य ऋत्विजोंसे घिरी हुई यज्ञकी वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी (वेदीका यह जलना राक्षसोंके आगमनका सूचक उत्पात था)॥ ८॥

सदर्भचमसस्रुक्का ससमित्कुसुमोच्चया।

विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्त्विजा॥ ९॥

इसके बाद कुश, चमस, स्रुक्, समिधा और फूलोंके ढेरसे सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजोंसहित जो यज्ञकी वेदी थी, उसपर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई (अग्निका यह प्रज्वलन यज्ञके उद्देश्यसे हुआ था)॥ ९॥

मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते।

आकाशे च महान् शब्द: प्रादुरासीद् भयानक:॥ १०॥

फिर तो शास्त्रीय विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक उस यज्ञका कार्य आरम्भ हुआ। इसी समय आकाशमें बड़े जोरका शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था॥ १०॥

आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते।

तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्॥ ११॥

मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा।

आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन्॥ १२॥

जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटा सारे आकाशको घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डपकी ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसोंने वहाँ आकर रक्तकी धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया॥ ११-१२॥

तां तेन रुधिरौघेण वेदीं वीक्ष्य समुक्षिताम्।

सहसाभिद्रुतो रामस्तानपश्यत् ततो दिवि॥ १३॥

तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचन:।

लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत्॥ १४॥

रक्तके उस प्रवाहसे यज्ञ-वेदीके आस-पासकी भूमिको भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालनेपर उन्होंने उन राक्षसोंको आकाशमें स्थित देखा। मारीच और सुबाहुको सहसा आते देख कमलनयन श्रीरामने लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा—॥ १३-१४॥

पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान्।

मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान्॥ १५॥

करिष्यामि न संदेहो नोत्सहे हन्तुमीदृशान्।

‘लक्ष्मण! वह देखो, मांसभक्षण करनेवाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे। मैं मानवास्त्रसे इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायुके वेगसे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मेरे इस कथनमें तनिक भी संदेह नहीं है। ऐसे कायरोंको मैं मारना नहीं चाहता’॥ १५/

इत्युक्त्वा वचनं रामश्चापे संधाय वेगवान्॥ १६॥

मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम्।

चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघव:॥ १७॥

ऐसा कहकर वेगशाली श्रीरामने अपने धनुषपर परम उदार मानवास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था। श्रीरामने बड़े रोषमें भरकर मारीचकी छातीमें उस बाणका प्रहार किया॥ १६-१७॥

स तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहत:।

सम्पूर्णं योजनशतं क्षिप्त: सागरसम्प्लवे॥ १८॥

उस उत्तम मानवास्त्रका गहरा आघात लगनेसे मारीच पूरे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके जलमें जा गिरा॥ १८॥

विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषुबलपीडितम्।

निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १९॥

शीतेषु नामक मानवास्त्रसे पीडि़त हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है। यह देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ १९॥

पश्य लक्ष्मण शीतेषुं मानवं मनुसंहितम्।

मोहयित्वा नयत्येनं न च प्राणैर्वियुज्यते॥ २०॥

‘लक्ष्मण! देखो, मनुके द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षसको मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है॥ २०॥

इमानपि वधिष्यामि निर्घृणान् दुष्टचारिण:।

राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्॥ २१॥

‘अब यज्ञमें विघ्न डालनेवाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मी एवं रक्तभोजी राक्षसोंको भी मार गिराता हूँ’॥ २१॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं चाशु लाघवं दर्शयन्निव।

विगृह्य सुमहच्चास्त्रमाग्नेयं रघुनन्दन:॥ २२॥

सुबाहूरसि चिक्षेप स विद्ध: प्रापतद् भुवि।

शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशा:।

राघव: परमोदारो मुनीनां मुदमावहन्॥ २३॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर रघुनन्दन श्रीरामने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्रका संधान करके उसे सुबाहुकी छातीपर चलाया । उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीरने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरोंका भी संहार कर डाला और मुनियोंको परम आनन्द प्रदान किया॥ २३॥

स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दन:।

ऋषिभि: पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा॥ २४॥

इस प्रकार रघुकुलनन्दन श्रीराम यज्ञमें विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसोंका वध करके वहाँ ऋषियोंद्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्र असुरोंपर विजय पाकर महर्षियोंद्वारा पूजित हुए थे॥ २४॥

अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनि:।

निरीतिका दिशो दृष्ट्वा काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥ २५॥

यज्ञ समाप्त होनेपर महामुनि विश्वामित्रने सम्पूर्ण दिशाओंको विघ्न-बाधाओंसे रहित देख श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ २५॥

कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया।

सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं वीर महायश:।

स हि रामं प्रशस्यैवं ताभ्यां संध्यामुपागमत्॥ २६॥

‘महाबाहो! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया। तुमने गुरुकी आज्ञाका पूर्णरूपसे पालन किया। महायशस्वी वीर! तुमने इस सिद्धाश्रमका नाम सार्थक कर दिया।’ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी प्रशंसा करके मुनिने उन दोनों भाइयोंके साथ संध्योपासना की॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिंश: सर्ग:॥ ३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३०॥

 

एकत्रिंश: सर्ग:

श्रीराम, लक्ष्मण तथा ऋषियोंसहित विश्वामित्रका मिथिलाको प्रस्थान तथा मार्गमें संध्याके समय शोणभद्रतटपर विश्राम

अथ तां रजनीं तत्र कृतार्थौ रामलक्ष्मणौ।

ऊषतुर्मुदितौ वीरौ प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १॥

तदनन्तर (विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करके) कृतकृत्य हुए श्रीराम और लक्ष्मणने उस यज्ञशालामें ही वह रात बितायी। उस समय वे दोनों वीर बड़े प्रसन्न थे। उनका हृदय हर्षोल्लाससे परिपूर्ण था॥ १॥

प्रभातायां तु शर्वर्यां कृतपौर्वाह्णिकक्रियौ।

विश्वामित्रमृषींश्चान्यान् सहितावभिजग्मतु:॥ २॥

रात बीतनेपर जब प्रात:काल आया, तब वे दोनों भाई पूर्वाह्णकालके नित्य-नियमसे निवृत्त हो विश्वामित्र मुनि तथा अन्य ऋषियोंके पास साथ-साथ गये॥ २॥

अभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं ज्वलन्तमिव पावकम्।

ऊचतु: परमोदारं वाक्यं मधुरभाषिणौ॥ ३॥

वहाँ जाकर उन्होंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ! विश्वामित्रको प्रणाम किया और मधुर भाषामें यह परम उदार वचन कहा—॥ ३॥

इमौ स्म मुनिशार्दूल किंकरौ समुपागतौ।

आज्ञापय मुनिश्रेष्ठ शासनं करवाव किम्॥ ४॥

‘मुनिप्रवर! हम दोनों किङ्कर आपकी सेवामें उपस्थित हैं। मुनिश्रेष्ठ! आज्ञा दीजिये, हम क्या सेवा करें?’॥ ४॥

एवमुक्ते तयोर्वाक्ये सर्व एव महर्षय:।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य रामं वचनमब्रुवन्॥ ५॥

उन दोनोंके ऐसा कहनेपर वे सभी महर्षि विश्वामित्रको आगे करके श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ५॥

मैथिलस्य नरश्रेष्ठ जनकस्य भविष्यति।

यज्ञ: परमधर्मिष्ठस्तत्र यास्यामहे वयम्॥ ६॥

‘नरश्रेष्ठ! मिथिलाके राजा जनकका परम धर्ममय यज्ञ प्रारम्भ होनेवाला है। उसमें हम सब लोग जायँगे॥ ६॥

त्वं चैव नरशार्दूल सहास्माभिर्गमिष्यसि।

अद्भुतं च धनूरत्नं तत्र त्वं द्रष्टुमर्हसि॥ ७॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हें भी हमारे साथ वहाँ चलना है। वहाँ एक बड़ा ही अद्भुत धनुषरत्न है। तुम्हें उसे देखना चाहिये॥ ७॥

तद्धि पूर्वं नरश्रेष्ठ दत्तं सदसि दैवतै:।

अप्रमेयबलं घोरं मखे परमभास्वरम्॥ ८॥

‘पुरुषप्रवर! पहले कभी यज्ञमें पधारे हुए देवताओंने जनकके किसी पूर्वपुरुषको वह धनुष दिया था। वह कितना प्रबल और भारी है, इसका कोई माप-तोल नहीं है। वह बहुत ही प्रकाशमान एवं भयंकर है॥ ८॥

नास्य देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसा:।

कर्तुमारोपणं शक्ता न कथंचन मानुषा:॥ ९॥

‘मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी किसी तरह उसकी प्रत्यञ्चा नहीं चढ़ा पाते॥ ९॥

धनुषस्तस्य वीर्यं हि जिज्ञासन्तो महीक्षित:।

न शेकुरारोपयितुं राजपुत्रा महाबला:॥ १०॥

‘उस धनुषकी शक्तिका पता लगानेके लिये कितने ही महाबली राजा और राजकुमार आये; किंतु कोई भी उसे चढ़ा न सके॥ १०॥

तद्धनुर्नरशार्दूल मैथिलस्य महात्मन:।

तत्र द्रक्ष्यसि काकुत्स्थ यज्ञं च परमाद्भुतम्॥ ११॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन पुरुषसिंह राम! वहाँ चलनेसे तुम महामना मिथिलानरेशके उस धनुषको तथा उनके परम अद्भुत यज्ञको भी देख सकोगे॥ ११॥

तद्धि यज्ञफलं तेन मैथिलेनोत्तमं धनु:।

याचितं नरशार्दूल सुनाभं सर्वदैवतै:॥ १२॥

‘नरश्रेष्ठ! मिथिलानरेशने अपने यज्ञके फलरूपमें उस उत्तम धनुषको माँगा था; अत: सम्पूर्ण देवताओं तथा भगवान् शङ्करने उन्हें वह धनुष प्रदान किया था। उस धनुषका मध्यभाग जिसे मुट्ठीसे पकड़ा जाता है, बहुत ही सुन्दर है॥ १२॥

आयागभूतं नृपतेस्तस्य वेश्मनि राघव।

अर्चितं विविधैर्गन्धैर्धूपैश्चागुरुगन्धिभि:॥ १३॥

‘रघुनन्दन! राजा जनकके महलमें वह धनुष पूजनीय देवताकी भाँति प्रतिष्ठित है और नाना प्रकारके गन्ध, धूप तथा अगुरु आदि सुगन्धित पदार्थोंसे उसकी पूजा होती है’॥ १३॥

एवमुक्त्वा मुनिवर: प्रस्थानमकरोत् तदा।

सर्षिसङ्घ: सकाकुत्स्थ आमन्त्र्य वनदेवता:॥ १४॥

ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजीने वन-देवताओंसे आज्ञा ली और ऋषिमण्डली तथा राम-लक्ष्मणके साथ वहाँसे प्रस्थान किया॥ १४॥

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि सिद्ध: सिद्धाश्रमादहम्।

उत्तरे जाह्नवीतीरे हिमवन्तं शिलोच्चयम्॥ १५॥

चलते समय उन्होंने वनदेवताओंसे कहा—‘मैं अपना यज्ञकार्य सिद्ध करके इस सिद्धाश्रमसे जा रहा हूँ। गंगाके उत्तर तटपर होता हुआ हिमालयपर्वतकी उपत्यकामें जाऊँगा। आपलोगोंका कल्याण हो’॥ १५॥

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूल: कौशिक: स तपोधन:।

उत्तरां दिशमुद्दिश्य प्रस्थातुमुपचक्रमे॥ १६॥

ऐसा कहकर तपस्याके धनी मुनिश्रेष्ठ कौशिकने उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान आरम्भ किया॥ १६॥

तं व्रजन्तं मुनिवरमन्वगादनुसारिणाम्।

शकटीशतमात्रं तु प्रयाणे ब्रह्मवादिनाम्॥ १७॥

उस समय—प्रस्थानके समय यात्रा करते हुए मुनिवर विश्वामित्रके पीछे उनके साथ जानेवाले ब्रह्मवादी महर्षियोंकी सौ गाडि़याँ चलीं॥ १७॥

मृगपक्षिगणाश्चैव सिद्धाश्रमनिवासिन:।

अनुजग्मुर्महात्मानं विश्वामित्रं तपोधनम्॥ १८॥

सिद्धाश्रममें निवास करनेवाले मृग और पक्षी भी तपोधन विश्वामित्रके पीछे-पीछे जाने लगे॥ १८॥

निवर्तयामास तत: सर्षिसङ्घ: स पक्षिण:।

ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे॥ १९॥

वासं चक्रुर्मुनिगणा: शोणाकूले समाहिता:।

तेऽस्तं गते दिनकरे स्नात्वा हुतहुताशना:॥ २०॥

कुछ दूर जानेपर ऋषिमण्डलीसहित विश्वामित्रने उन पशु-पक्षियोंको लौटा दिया। फिर दूरतकका मार्ग तै कर लेनेके बाद जब सूर्य अस्ताचलको जाने लगे, तब उन ऋषियोंने पूर्ण सावधान रहकर शोणभद्रके तटपर पड़ाव डाला। जब सूर्यदेव अस्त हो गये, तब स्नान करके उन सबने अग्निहोत्रका कार्य पूर्ण किया॥

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य निषेदुरमितौजस:।

रामोऽपि सहसौमित्रिर्मुनींस्तानभिपूज्य च॥ २१॥

अग्रतो निषसादाथ विश्वामित्रस्य धीमत:।

इसके बाद वे सभी अमिततेजस्वी ऋषि मुनिवर विश्वामित्रको आगे करके बैठे; फिर लक्ष्मणसहित श्रीराम भी उन ऋषियोंका आदर करते हुए बुद्धिमान् विश्वामित्रजीके सामने बैठ गये॥ २१/

अथ रामो महातेजा विश्वामित्रं तपोधनम्॥ २२॥

पप्रच्छ मुनिशार्दूलं कौतूहलसमन्वितम्।

तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामने तपस्याके धनी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे कौतूहलपूर्वक पूछा—॥ २२/

भगवन् को न्वयं देश: समृद्धवनशोभित:॥ २३॥

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते वक्तुमर्हसि तत्त्वत:।

भगवन्! यह हरे-भरे समृद्धिशाली वनसे सुशोभित देश कौन-सा है? मैं इसका परिचय सुनना चाहता हूँ। आपका कल्याण हो। आप मुझे ठीक-ठीक इसका रहस्य बताइये’॥ २३/

नोदितो रामवाक्येन कथयामास सुव्रत:।

तस्य देशस्य निखिलमृषिमध्ये महातपा:॥ २४॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रश्नसे प्रेरित होकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी विश्वामित्रने ऋषिमण्डलीके बीच उस देशका पूर्णरूपसे परिचय देना प्रारम्भ किया॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग:॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥

 

द्वात्रिंश: सर्ग:

ब्रह्मपुत्र कुशके चार पुत्रोंका वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेशको वसुकी भूमि बताना, कुशनाभकी सौ कन्याओंका वायुके कोपसे ‘कुब्जा’ होना

ब्रह्मयोनिर्महानासीत् कुशो नाम महातपा:।

अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञ: सज्जनप्रतिपूजक:॥ १॥

(विश्वामित्रजी कहते हैं—) श्रीराम! पूर्वकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाईके ही पूर्ण होता था। वे धर्मके ज्ञाता, सत्पुरुषोंका आदर करनेवाले और महान् थे॥ १॥

स महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुमहाबलान्।

वैदर्भ्यां जनयामास चतुर: सदृशान् सुतान्॥ २॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न विदर्भदेशकी राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भसे उन महात्मा नरेशने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हींके समान थे॥ २॥

कुशाम्बं कुशनाभं च असूर्तरजसं35 वसुम्।

दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया॥ ३॥

तानुवाच कुश: पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिन:।

क्रियतां पालनं पुत्रा धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम्॥ ४॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस36 तथा वसु। ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुशने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्मके पालनकी इच्छासे अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रोंसे कहा—‘पुत्रो! प्रजाका पालन करो, इससे तुम्हें धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’॥ ३-४॥

कुशस्य वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसत्तमा:।

निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा॥ ५॥

अपने पिता महाराज कुशकी यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारोंने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया॥ ५॥

कुशाम्बस्तु महातेजा: कौशाम्बीमकरोत् पुरीम्।

कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम्॥ ६॥

महातेजस्वी कुशाम्बने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभने ‘महोदय’ नामक नगरका निर्माण कराया॥ ६॥

असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामति:।

चक्रे पुरवरं राजा वसुनाम गिरिव्रजम्॥ ७॥

परम बुद्धिमान् असूर्तरजसने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसुने ‘गिरिव्रज’ नगरकी स्थापना की॥ ७॥

एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मन:।

एते शैलवरा: पञ्च प्रकाशन्ते समन्तत:॥ ८॥

महात्मा वसुकी यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं२॥ ८॥

सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ।

पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते॥ ९॥

यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिमकी ओरसे बहती हुई मगध देशमें आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नामसे विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचमें मालाकी भाँति सुशोभित हो रही है॥ ९॥

सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मन:।

पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी॥ १०॥

श्रीराम! इस प्रकार ‘मागधी’ नामसे प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसुसे सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिमसे आकर पूर्वोत्तर दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटोंपर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अत: यह सदा सस्य-मालाओंसे अलंकृत (हरी-भरी खेतीसे सुशोभित) रहती है॥ १०॥

कुशनाभस्तु राजर्षि: कन्याशतमनुत्तमम्।

जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन॥ ११॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभने घृताची अप्सराके गर्भसे परम उत्तम सौ कन्याओंको जन्म दिया॥ ११॥

तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्य: स्वलंकृता:।

उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतहृदा:॥ १२॥

गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यस्तु राघव।

आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिता:॥ १३॥

वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्यसे सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्थाने आकर उनके सौन्दर्यको और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यान-भूमिमें आकर वर्षाऋतुमें प्रकाशित होनेवाली विद्युन्मालाओंकी भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोदमें मग्न हो गयीं॥ १२-१३॥

अथ ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि।

उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे॥ १४॥

उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतलपर उनके रूप-सौन्दर्यकी कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यानमें आकर वे बादलोंके ओटमें कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओंके समान शोभा पा रही थीं॥ १४॥

ता: सर्वा गुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुता:।

दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत्॥ १५॥

उस समय उत्तम गुणोंसे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे सुशोभित उन सब राजकन्याओंको देखकर सर्वस्वरूप वायु देवताने उनसे इस प्रकार कहा—॥

अहं व: कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ।

मानुषस्त्यज्यतां भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ॥ १६॥

‘सुन्दरियो! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसीके रूपमें प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्यभावका त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओंकी भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो॥

चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषत:।

अक्षयं यौवनं प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ॥ १७॥

‘विशेषत: मानव-शरीरमें जवानी कभी स्थिर नहीं रहती—प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जानेपर तुमलोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’॥ १७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मण:।

अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत्॥ १८॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले वायुदेवका यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं—॥ १८॥

अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम।

प्रभावज्ञाश्च ते सर्वा: किमर्थमवमन्यसे॥ १९॥

‘सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायुके रूपमें समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं (अत: सबके मनकी बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मनमें आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभावको भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशामें यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं?॥ १९॥

कुशनाभसुता देव समस्ता: सुरसत्तम।

स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तु तपो वयम्॥ २०॥

‘देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभकी कन्याएँ हैं। देवता होनेपर भी आपको शाप देकर वायुपदसे भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तपको सुरक्षित रखती हैं॥ २०॥

मा भूत् स कालो दुर्मेध: पितरं सत्यवादिनम्।

अवमन्य स्वधर्मेण स्वयंवरमुपास्महे॥ २१॥

‘दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिताकी अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें॥ २१॥

पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं च स:।

यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति॥ २२॥

‘हमलोगोंपर हमारे पिताजीका प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथमें दे देंगे, वही हमारा पति होगा’॥ २२॥

तासां तु वचनं श्रुत्वा हरि: परमकोपन:।

प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभु:॥ २३॥

अरत्निमात्राकृतयो भग्नगात्रा भयार्दिता:।

उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभुने उनके भीतर प्रविष्टहो सब अंगोंको मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जानेके कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथके बराबर हो गयी। वे भयसे व्याकुल हो उठीं॥ २३/

ता: कन्या वायुना भग्ना विविशुर्नृपतेर्गृहम्।

प्रविश्य च सुसम्भ्रान्ता: सलज्जा: सास्रलोचना:॥ २४॥

वायुदेवके द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओंने राजभवनमें प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं॥ २४॥

स च ता दयिता भग्ना: कन्या: परमशोभना:।

दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत्॥ २५॥

अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंको कुब्जताके कारण अत्यन्त दयनीय दशामें पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले—॥ २५॥

किमिदं कथ्यतां पुत्र्य: को धर्ममवमन्यते।

कुब्जा: केन कृता: सर्वाश्चेष्टन्त्यो नाभिभाषथ।

एवं राजा विनि:श्वस्य समाधिं संदधे तत:॥ २६॥

‘पुत्रियो! यह क्या हुआ? बताओ। कौन प्राणी धर्मकी अवहेलना करता है? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो।’ यों कहकर राजाने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुननेके लिये वे सावधान होकर बैठ गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥

 

त्रयस्त्रिंश: सर्ग:

राजा कुशनाभद्वारा कन्याओंके धैर्य एवं क्षमाशीलताकी प्रशंसा, ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभकी कन्याओंका विवाह

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमत:।

शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत॥ १॥

बुद्धिमान् महाराज कुशनाभका वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओंने पिताके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १॥

वायु: सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति।

अशुभं मार्गमास्थाय न धर्मं प्रत्यवेक्षते॥ २॥

राजन्! सर्वत्र संचार करनेवाले वायुदेव अशुभ मार्गका अवलम्बन करके हमपर बलात्कार करना चाहते थे। धर्मपर उनकी दृष्टि नहीं थी॥ २॥

पितृमत्य: स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे न वयं स्थिता:।

पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव॥ ३॥

हमने उनसे कहा—‘देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजीके पास जाकर हमारा वरण कीजिये। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी’॥ ३॥

तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता।

एवं ब्रुवन्त्य: सर्वा: स्म वायुनाभिहता भृशम्॥ ४॥

परंतु उनका मन तो पापसे बँधा हुआ था। उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी—बिना अपराधके ही हमें पीडा दी॥ ४॥

तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिक:।

प्रत्युवाच महातेजा: कन्याशतमनुत्तमम्॥ ५॥

उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजाने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ५॥

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्य: कर्तव्यं सुमहत् कृतम्।

ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम॥ ६॥

‘पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है—कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है॥ ६॥

अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा।

दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषत:॥ ७॥

यादृशी व: क्षमा पुत्र्य: सर्वासामविशेषत:।

‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगोंमें समानरूपसे जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषत: देवताओंके लिये भी दुष्कर ही है॥ ७/

क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिका:॥ ८॥

क्षमा यश: क्षमा धर्म: क्षमायां विष्ठितं जगत्।

‘पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमापर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’॥ ८/

विसृज्य कन्या: काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रम:॥ ९ ॥

मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभि:।

देशे काले च कर्तव्यं सदृशे प्रतिपादनम्॥ १०॥

ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभने कन्याओंसे ऐसा कहकर उन्हें अन्त:पुरमें जानेकी आज्ञा दे दी और मन्त्रणाके तत्त्वको जाननेवाले उन नरेशने स्वयं मन्त्रियोंके साथ बैठकर कन्याओंके विवाहके विषयमें विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देशमें किस समय और किस सुयोग्य वरके साथ उनका विवाह किया जाय?’॥ ९-१०॥

एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युति:।

ऊर्ध्वरेता: शुभाचारो ब्राह्मं तप उपागमत्॥ ११॥

उन्हीं दिनों चूली नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तपका अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्यामें संलग्न थे)॥ ११॥

तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते।

सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा॥ १२॥

श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनिकी उपासना (अनुग्रहकी इच्छासे सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा। वह ऊर्मिलाकी पुत्री थी॥ १२॥

सा च तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा।

उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरु:॥ १३॥

वह प्रतिदिन मुनिको प्रणाम करके उनकी सेवामें लगी रहती थी तथा धर्ममें स्थित रहकर समय-समयपर सेवाके लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए॥ १३॥

स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन।

परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम्॥ १४॥

रघुनन्दन! शुभ समय आनेपर चूलीने उस गन्धर्वकन्यासे कहा—‘शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’॥ १४॥

परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम्।

उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम्॥ १५॥

मुनिको संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई। वह बोलनेकी कला जानती थी; उसने वाणीके मर्मज्ञ मुनिसे मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा—॥ १५॥

लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्म्या ब्रह्मभूतो महातपा:।

ब्राह्मेण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम्॥ १६॥

‘महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं। मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ॥ १६॥

अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चास्मि न कस्यचित्।

ब्राह्मेणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम्॥ १७॥

‘मुने! आपका भला हो। मेरे कोई पति नहीं है। मैं न तो किसीकी पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी। आपकी सेवामें आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तप:शक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें’॥ १७॥

तस्या: प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम्।

ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिन: सुतम्॥ १८॥

उस गन्धर्वकन्याकी सेवासे संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूलीने उसे परम उत्तम ब्राह्म तपसे सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ॥ १८॥

स राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा।

काम्पिल्यां परया लक्ष्म्या देवराजो यथा दिवम्॥ १९॥

(कुशनाभके यहाँ जब कन्याओंके विवाहका विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हो ‘काम्पिल्या’ नामक नगरीमें उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्गकी अमरावतीपुरीमें देवराज इन्द्र॥ १९॥

स बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभ: सुधार्मिक:।

ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा॥ २०॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तके साथ अपनी सौ कन्याओंको ब्याह देनेका निश्चय किया॥ २०॥

तमाहूय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपति:।

ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना॥ २१॥

महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तको बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्तसे उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं॥ २१॥

यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन।

ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा॥ २२॥

रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्तने क्रमश: उन सभी कन्याओंका पाणिग्रहण किया॥ २२॥

स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वरा:।

युक्तं परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा॥ २३॥

विवाहकालमें उन कन्याओंके हाथोंका ब्रह्मदत्तके हाथसे स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोषसे रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभासे सम्पन्न प्रतीत होने लगीं॥ २३॥

स दृष्ट्वा वायुना मुक्ता: कुशनाभो महीपति:।

बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुन: पुन:॥ २४॥

वातरोगके रूपमें आये हुए वायुदेवने उन कन्याओंको छोड़ दिया—यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्षका अनुभव करने लगे॥ २४॥

कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम्।

सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा॥ २५॥

भूपाल राजा ब्रह्मदत्तका विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर महाराज कुशनाभने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितोंसहित आदरपूर्वक विदा किया॥ २५॥

सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम्।

यथान्यायं च गन्धर्वी स्नुषास्ता: प्रत्यनन्दत।

स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च ता: कन्या: कुशनाभं प्रशस्य च॥ २६॥

गन्धर्वी सोमदाने अपने पुत्रको तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्धको देखकर अपनी उन पुत्रवधुओंका यथोचितरूपसे अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओंको हृदयसे लगाया और महाराज कुशनाभकी सराहना करके वहाँसे प्रस्थान किया॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंश: सर्ग:॥ ३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

 


चतुस्त्रिंश: सर्ग:

गाधिकी उत्पत्ति, कौशिकीकी प्रशंसा, विश्वामित्रजीका कथा बंद करके आधी रातका वर्णन करते हुए सबको सोनेकी आज्ञा देकर शयन करना

कृतोद्वाहे गते तस्मिन् ब्रह्मदत्ते च राघव।

अपुत्र: पुत्रलाभाय पौत्रीमिष्टिमकल्पयत्॥ १॥

रघुनन्दन! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभने श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि यज्ञका अनुष्ठान किया॥ १॥

इष्ट्यां तु वर्तमानायां कुशनाभं महीपतिम्।

उवाच परमोदार: कुशो ब्रह्मसुतस्तदा॥ २॥

उस यज्ञके होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुशने भूपाल कुशनाभसे कहा—॥ २॥

पुत्रस्ते सदृश: पुत्र भविष्यति सुधार्मिक:।

गाधिं प्राप्स्यसि तेन त्वं कीर्तिं लोके च शाश्वतीम्॥ ३॥

‘बेटा! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा। तुम ‘गाधि’ नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसारमें अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी’॥ ३॥

एवमुक्त्वा कुशो राम कुशनाभं महीपतिम्।

जगामाकाशमाविश्य ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ४॥

श्रीराम! पृथ्वीपति कुशनाभसे ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाशमें प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोकको चले गये॥ ४॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य कुशनाभस्य धीमत:।

जज्ञे परमधर्मिष्ठो गाधिरित्येव नामत:॥ ५॥

कुछ कालके पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभके यहाँ परम धर्मात्मा ‘गाधि’ नामक पुत्रका जन्म हुआ॥ ५॥

स पिता मम काकुत्स्थ गाधि: परमधार्मिक:।

कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनन्दन॥ ६॥

ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे। मैं कुशके कुलमें उत्पन्न होनेके कारण ‘कौशिक’ कहलाता हूँ॥ ६॥

पूर्वजा भगिनी चापि मम राघव सुव्रता।

नाम्ना सत्यवती नाम ऋचीके प्रतिपादिता॥ ७॥

राघव! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी। उसका नाम सत्यवती था। वह ऋचीक मुनिको ब्याही गयी थी॥ ७॥

सशरीरा गता स्वर्गं भर्तारमनुवर्तिनी।

कौशिकी परमोदारा प्रवृत्ता च महानदी॥ ८॥

अपने पतिका अनुसरण करनेवाली सत्यवती शरीरसहित स्वर्गलोकको चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकीके रूपमें भी प्रकट होकर इस भूतलपर प्रवाहित होती है॥ ८॥

दिव्या पुण्योदका रम्या हिमवन्तमुपाश्रिता।

लोकस्य हितकार्यार्थं प्रवृत्ता भगिनी मम॥ ९॥

मेरी वह बहिन जगत्के हितके लिये हिमालयका आश्रय लेकर नदीरूपमें प्रवाहित हुई। वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है॥ ९॥

ततोऽहं हिमवत्पार्श्वे वसामि नियत: सुखम्।

भगिन्यां स्नेहसंयुक्त: कौशिक्यां रघुनन्दन॥ १०॥

रघुनन्दन! मेरा अपनी बहिन कौशिकीके प्रति बहुत स्नेह है; अत: मैं हिमालयके निकट उसीके तटपर नियमपूर्वक बड़े सुखसे निवास करता हूँ॥ १०॥

सा तु सत्यवती पुण्या सत्ये धर्मे प्रतिष्ठिता।

पतिव्रता महाभागा कौशिकी सरितां वरा॥ ११॥

पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्ममें प्रतिष्ठित है। वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकीके रूपमें विद्यमान है॥ ११॥

अहं हि नियमाद् राम हित्वा तां समुपागत:।

सिद्धाश्रममनुप्राप्त: सिद्धोऽस्मि तव तेजसा॥ १२॥

श्रीराम! मैं यज्ञसम्बन्धी नियमकी सिद्धिके लिये ही अपनी बहिनका सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम (बक्सर) में आया था। अब तुम्हारे तेजसे मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है॥ १२॥

एषा राम ममोत्पत्ति: स्वस्य वंशस्य कीर्तिता।

देशस्य हि महाबाहो यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ १३॥

महाबाहु श्रीराम! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें शोणभद्रतटवर्ती देशका परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुलकी उत्पत्ति बतायी है॥

गतोऽर्धरात्र: काकुत्स्थ कथा: कथयतो मम।

निद्रामभ्येहि भद्रं ते मा भूद् विघ्नोऽध्वनीह न:॥ १४॥

काकुत्स्थ! मेरे कथा कहते-कहते आधी रात बीत गयी। अब थोड़ी देर नींद ले लो। तुम्हारा कल्याण हो। मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरणके कारण हमारी यात्रामें विघ्न न पड़े॥ १४॥

निष्पन्दास्तरव: सर्वे निलीना मृगपक्षिण:।

नैशेन तमसा व्याप्ता दिशश्च रघुनन्दन॥ १५॥

सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं—इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है। पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थानमें छिपकर बसेरे लेते हैं। रघुनन्दन! रात्रिके अन्धकारसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं॥ १५॥

शनैर्विसृज्यते संध्या नभो नेत्रैरिवावृतम्।

नक्षत्रतारागहनं ज्योतिर्भिरवभासते॥ १६॥

धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी। नक्षत्रों तथा ताराओंसे भरा हुआ आकाश (सहस्राक्ष इन्द्रकी भाँति) सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रोंसे व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है॥ १६॥

उत्तिष्ठते च शीतांशु: शशी लोकतमोनुद:।

ह्लादयन् प्राणिनां लोके मनांसि प्रभया स्वया॥ १७॥

सम्पूर्ण लोकका अन्धकार दूर करनेवाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभासे जगत्के प्राणियोंके मनको आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं37॥ १७॥

नैशानि सर्वभूतानि प्रचरन्ति ततस्तत:।

यक्षराक्षससङ्घाश्च रौद्राश्च पिशिताशना:॥ १८॥

रातमें विचरनेवाले समस्त प्राणी—यक्ष-राक्षसोंके समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं॥

एवमुक्त्वा महातेजा विरराम महामुनि:।

साधुसाध्विति ते सर्वे मुनयो ह्यभ्यपूजयन्॥ १९॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। उस समय सभी मुनियोंने साधुवाद देकर विश्वामित्रजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की—॥ १९॥

कुशिकानामयं वंशो महान् धर्मपर: सदा।

ब्रह्मोपमा महात्मान: कुशवंश्या नरोत्तमा:॥ २०॥

‘कुशपुत्रोंका यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है। कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजीके समान तेजस्वी हुए हैं॥ २०॥

विशेषेण भवानेव विश्वामित्र महायश:।

कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलोद्योतकरी तव॥ २१॥

‘महायशस्वी विश्वामित्रजी! अपने वंशमें सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुलकी कीर्तिको प्रकाशित करनेवाली है’॥

मुदितैर्मुनिशार्दूलै: प्रशस्त: कुशिकात्मज:।

निद्रामुपागमच्छ्रीमानस्तंगत इवांशुमान्॥ २२॥

इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरोंद्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिक मुनि अस्त हुए सूर्यकी भाँति नींद लेने लगे॥ २२॥

रामोऽपि सहसौमित्रि: किंचिदागतविस्मय:।

प्रशस्य मुनिशार्दूलं निद्रां समुपसेवते॥ २३॥

वह कथा सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको भी कुछ विस्मय हो आया। वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रकी सराहना करके नींद लेने लगे॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुस्त्रिंश: सर्ग:॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥

 

पञ्चत्रिंश: सर्ग:

शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदिका गंगाजीके तटपर पहुँचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा श्रीरामके पूछनेपर विश्वामित्रजीका उन्हें गंगाजीकी उत्पत्तिकी कथा सुनाना

उपास्य रात्रिशेषं तु शोणाकूले महर्षिभि:।

निशायां सुप्रभातायां विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥ १॥

महर्षियोंसहित विश्वामित्रने रात्रिके शेषभागमें शोणभद्रके तटपर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

सुप्रभाता निशा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते गमनायाभिरोचय॥ २॥

‘श्रीराम! रात बीत गयी। सबेरा हो गया। तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलनेकी तैयारी करो’॥ २॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतपूर्वाह्णिकक्रिय:।

गमनं रोचयामास वाक्यं चेदमुवाच ह॥ ३॥

मुनिकी बात सुनकर पूर्वाह्णकालका नित्यनियम पूर्ण करके श्रीराम चलनेको तैयार हो गये और इस प्रकार बोले—॥ ३॥

अयं शोण: शुभजलोऽगाध: पुलिनमण्डित:।

कतरेण पथा ब्रह्मन् संतरिष्यामहे वयम्॥ ४॥

‘ब्रह्मन्! शुभ जलसे परिपूर्ण तथा अपने तटोंसे सुशोभित होनेवाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है। हमलोग किस मार्गसे चलकर इसे पार करेंगें?’॥ ४॥

एवमुक्तस्तु रामेण विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्।

एष पन्था मयोद्दिष्टो येन यान्ति महर्षय:॥ ५॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर विश्वामित्र बोले—‘जिस मार्गसे महर्षिगण शोणभद्रको पार करते हैं, उसका मैंने पहलेसे ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है’॥ ५॥

एवमुक्ता महर्षयो विश्वामित्रेण धीमता।

पश्यन्तस्ते प्रयाता वै वनानि विविधानि च॥ ६॥

बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर वे महर्षि नाना प्रकारके वनोंकी शोभा देखते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६॥

ते गत्वा दूरमध्वानं गतेऽर्धदिवसे तदा।

जाह्नवीं सरितां श्रेष्ठां ददृशुर्मुनिसेविताम्॥ ७॥

बहुत दूरका मार्ग तै कर लेनेपर दोपहर होते-होते उन सब लोगोंने मुनिजनसेवित, सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर पहुँचकर उनका दर्शन किया॥ ७॥

तां दृष्ट्वा पुण्यसलिलां हंससारससेविताम्।

बभूवुर्मुनय: सर्वे मुदिता: सहराघवा:॥ ८॥

हंसों तथा सारसोंसे सेवित पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके श्रीरामचन्द्रजीके साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए॥ ८॥

तस्यास्तीरे तदा सर्वे चक्रुर्वासपरिग्रहम्।

तत: स्नात्वा यथान्यायं संतर्प्य पितृदेवता:॥ ९॥

हुत्वा चैवाग्निहोत्राणि प्राश्य चामृतवद्धवि:।

विविशुर्जाह्नवीतीरे शुभा मुदितमानसा:॥ १०॥

विश्वामित्रं महात्मानं परिवार्य समन्तत:।

उस समय सबने गंगाजीके तटपर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृतके समान मीठे हविष्यका भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्रको चारों ओरसे घेरकर गंगाजीके तटपर बैठ गये॥ ९-१०/

विष्ठिताश्च यथान्यायं राघवौ च यथार्हत:।

सम्प्रहृष्टमना रामो विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ ११॥

जब वे सब मुनि स्थिरभावसे विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थानपर बैठ गये, तब श्रीरामने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्रजीसे पूछा—॥ ११॥

भगवन् श्रोतुमिच्छामि गंगां त्रिपथगां नदीम्।

त्रैलोक्यं कथमाक्रम्य गता नदनदीपतिम्॥ १२॥

‘भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गोंसे प्रवाहित होनेवाली नदी ये गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकोंमें घूमकर नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रमें जा मिली हैं?’॥ १२॥

चोदितो रामवाक्येन विश्वामित्रो महामुनि:।

वृद्धिं जन्म च गंगाया वक्तुमेवोपचक्रमे॥ १३॥

श्रीरामके इस प्रश्नद्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्रने गंगाजीकी उत्पत्ति और वृद्धिकी कथा कहना आरम्भ किया—॥ १३॥

शैलेन्द्रो हिमवान् राम धातूनामाकरो महान्।

तस्य कन्याद्वयं राम रूपेणाप्रतिमं भुवि॥ १४॥

‘श्रीराम! हिमवान् नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतोंका राजा तथा सब प्रकारके धातुओंका बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान्की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं है॥ १४॥

या मेरुदुहिता राम तयोर्माता सुमध्यमा।

नाम्ना मेना मनोज्ञा वै पत्नी हिमवत: प्रिया॥ १५॥

‘मेरु पर्वतकी मनोहारिणी पुत्री मेना हिमवान्की प्यारी पत्नी है। सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेना ही उन दोनों कन्याओंकी जननी हैं॥ १५॥

तस्यां गंगेयमभवज्ज्येष्ठा हिमवत: सुता।

उमा नाम द्वितीयाभूत् कन्या तस्यैव राघव॥ १६॥

‘रघुनन्दन! मेनाके गर्भसे जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगाजी हैं। ये हिमवान्की ज्येष्ठ पुत्री हैं। हिमवान्की ही दूसरी कन्या, जो मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुईं, उमा नामसे प्रसिद्ध हैं॥ १६॥

अथ ज्येष्ठां सुरा: सर्वे देवकार्यचिकीर्षया।

शैलेन्द्रं वरयामासुर्गंगां त्रिपथगां नदीम्॥ १७॥

कुछ कालके पश्चात् सब देवताओंने देवकार्यकी सिद्धिके लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजीको, जो आगे चलकर स्वर्गसे त्रिपथगा नदीके रूपमें अवतीर्ण हुईं, गिरिराज हिमालयसे माँगा॥ १७॥

ददौ धर्मेण हिमवांस्तनयां लोकपावनीम्।

स्वच्छन्दपथगां गंगां त्रैलोक्यहितकाम्यया॥ १८॥

‘हिमवान्ने त्रिभुवनका हित करनेकी इच्छासे स्वच्छन्द पथपर विचरनेवाली अपनी लोकपावनी पुत्री गंगाको धर्मपूर्वक उन्हें दे दिया॥ १८॥

प्रतिगृह्य त्रिलोकार्थं त्रिलोकहितकांक्षिण:।

गंगामादाय तेऽगच्छन् कृतार्थेनान्तरात्मना॥ १९॥

‘तीनों लोकोंके हितकी इच्छावाले देवता त्रिभुवनकी भलाईके लिये ही गंगाजीको लेकर मन-ही-मन कृतार्थताका अनुभव करते हुए चले गये॥ १९॥

या चान्या शैलदुहिता कन्याऽऽसीद्रघुनन्दन।

उग्रं सुव्रतमास्थाय तपस्तेपे तपोधना॥ २०॥

‘रघुनन्दन! गिरिराजकी जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। उन्होंने तपोमय धनका संचय किया॥ २०॥

उग्रेण तपसा युक्तां ददौ शैलवर: सुताम्।

रुद्रायाप्रतिरूपाय उमां लोकनमस्कृताम्॥ २१॥

‘गिरिराजने उग्र तपस्यामें संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्रको ब्याह दी॥ २१॥

एते ते शैलराजस्य सुते लोकनमस्कृते।

गंगा च सरितां श्रेष्ठा उमादेवी च राघव॥ २२॥

‘रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा तथा भगवती उमा—ये दोनों गिरिराज हिमालयकी कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है॥ २२॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा त्रिपथगामिनी।

खं गता प्रथमं तात गतिं गतिमतां वर॥ २३॥

सैषा सुरनदी रम्या शैलेन्द्रतनया तदा।

सुरलोकं समारूढा विपापा जलवाहिनी॥ २४॥

‘गतिशीलोंमें श्रेष्ठ तात श्रीराम! गंगाजीकी उत्पत्तिके विषयमें ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं। ये त्रिपथगामिनी कैसे हुईं? यह भी सुन लो। पहले तो ये आकाशमार्गमें गयी थीं। तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदीके रूपमें देवलोकमें आरूढ़ हुई थीं। फिर जलरूपमें प्रवाहित हो लोगोंके पाप दूर करती हुई रसातलमें पहुँची थीं’॥ २३-२४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग:॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

 

षट्त्रिंश: सर्ग:

देवताओंका शिव-पार्वतीको सुरतक्रीडासे निवृत्त करना तथाउमादेवीका देवताओं और पृथ्वीको शाप देना

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन्नुभौ राघवलक्ष्मणौ।

प्रतिनन्द्य कथां वीरावूचतुर्मुनिपुंगवम्॥ १॥

विश्वामित्रजीकी बात समाप्त होनेपर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों वीरोंने उनकी कही हुई कथाका अभिनन्दन करके मुनिवर विश्वामित्रसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

धर्मयुक्तमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया।

दुहितु: शैलराजस्य ज्येष्ठाया वक्तुमर्हसि।

विस्तरं विस्तरज्ञोऽसि दिव्यमानुषसम्भवम्॥ २॥

‘ब्रह्मन्! आपने यह बड़ी उत्तम धर्मयुक्त कथा सुनायी। अब आप गिरिराज हिमवान्की ज्येष्ठ पुत्री गंगाके दिव्यलोक तथा मनुष्यलोकसे सम्बन्ध होनेका वृत्तान्त विस्तारके साथ सुनाइये; क्योंकि आप विस्तृत वृत्तान्तके ज्ञाता हैं॥ २॥

त्रीन् पथो हेतुना केन प्लावयेल्लोकपावनी।

कथं गंगा त्रिपथगा विश्रुता सरिदुत्तमा॥ ३॥

‘लोकको पवित्र करनेवाली गंगा किस कारणसे तीन मार्गोंमें प्रवाहित होती हैं? सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाकी ‘त्रिपथगा’ नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई?॥ ३॥

त्रिषु लोकेषु धर्मज्ञ कर्मभि: कै: समन्विता।

तथा ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रस्तपोधन:॥ ४॥

निखिलेन कथां सर्वामृषिमध्ये न्यवेदयत्।

‘धर्मज्ञ महर्षे! तीनों लोकोंमें वे अपनी तीन धाराओंके द्वारा कौन-कौन-से कार्य करती हैं?’ श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर तपोधन विश्वामित्रने मुनिमण्डलीके बीच गंगाजीसे सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें पूर्णरूपसे कह सुनायीं—॥ ४॥

पुरा राम कृतोद्वाह: शितिकण्ठो महातपा:॥ ५॥

दृष्ट्वा च भगवान् देवीं मैथुनायोपचक्रमे।

‘श्रीराम! पूर्वकालमें महातपस्वी भगवान् नीलकण्ठने उमादेवीके साथ विवाह करके उनको नववधूके रूपमें अपने निकट आयी देख उनके साथ रति-क्रीडा आरम्भ की॥ ५॥

तस्य संक्रीडमानस्य महादेवस्य धीमत:।

शितिकण्ठस्य देवस्य दिव्यं वर्षशतं गतम्॥ ६॥

‘परम बुद्धिमान् महान् देवता भगवान् नीलकण्ठके उमादेवीके साथ क्रीडा-विहार करते सौ दिव्य वर्ष बीत गये॥ ६॥

न चापि तनयो राम तस्यामासीत् परंतप।

सर्वे देवा: समुद्युक्ता: पितामहपुरोगमा:॥ ७॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम! इतने वर्षोंतक विहारके बाद भी महादेवजीके उमादेवीके गर्भसे कोई पुत्र नहीं हुआ। यह देख ब्रह्मा आदि सभी देवता उन्हें रोकनेका उद्योग करने लगे॥ ७॥

यदिहोत्पद्यते भूतं कस्तत् प्रतिसहिष्यति।

अभिगम्य सुरा: सर्वे प्रणिपत्येदमब्रुवन्॥ ८॥

‘उन्होंने सोचा—इतने दीर्घकालके पश्चात् यदि रुद्रके तेजसे उमादेवीके गर्भसे कोई महान् प्राणी प्रकट हो भी जाय तो कौन उसके तेजको सहन करेगा? यह विचारकर सब देवता भगवान् शिवके पास जा उन्हें प्रणाम करके यों बोले—॥ ८॥

देवदेव महादेव लोकस्यास्य हिते रत।

सुराणां प्रणिपातेन प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ ९॥

‘इस लोकके हितमें तत्पर रहनेवाले देवदेव महादेव! देवता आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। इससे प्रसन्न होकर आप इन देवताओंपर कृपा करें॥ ९॥

न लोका धारयिष्यन्ति तव तेज: सुरोत्तम।

ब्राह्मेण तपसा युक्तो देव्या सह तपश्चर॥ १०॥

‘सुरश्रेष्ठ! ये लोक आपके तेजको नहीं धारण कर सकेंगे; अत: आप क्रीडासे निवृत्त हो वेदबोधित तपस्यासे युक्त होकर उमादेवीके साथ तप कीजिये॥ १०॥

त्रैलोक्यहितकामार्थं तेजस्तेजसि धारय।

रक्ष सर्वानिमाँल्लोकान् नालोकं कर्तुमर्हसि॥ ११॥

‘तीनों लोकोंके हितकी कामनासे अपने तेज (वीर्य) को तेज:स्वरूप अपने-आपमें ही धारण कीजिये। इन सब लोकोंकी रक्षा कीजिये। लोकोंका विनाश न कर डालिये’॥ ११॥

देवतानां वच: श्रुत्वा सर्वलोकमहेश्वर:।

बाढमित्यब्रवीत् सर्वान् पुनश्चेदमुवाच ह॥ १२॥

‘देवताओंकी यह बात सुनकर सर्वलोकमहेश्वर शिवने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया; फिर उनसे इस प्रकार कहा—॥ १२॥

धारयिष्याम्यहं तेजस्तेजसैव सहोमया।

त्रिदशा: पृथिवी चैव निर्वाणमधिगच्छतु॥ १३॥

‘देवताओ! उमासहित मैं अर्थात् हम दोनों अपने तेजसे ही तेजको धारण कर लेंगे। पृथ्वी आदि सभी लोकोंके निवासी शान्ति लाभ करें॥ १३॥

यदिदं क्षुभितं स्थानान्मम तेजो ह्यनुत्तमम्।

धारयिष्यति कस्तन्मे ब्रुवन्तु सुरसत्तमा:॥ १४॥

‘किंतु सुरश्रेष्ठगण! यदि मेरा यह सर्वोत्तम तेज (वीर्य) क्षुब्ध होकर अपने स्थानसे स्खलित हो जाय तो उसे कौन धारण करेगा?—यह मुझे बताओ’॥ १४॥

एवमुक्तास्ततो देवा: प्रत्यूचुर्वृषभध्वजम्।

यत्तेज: क्षुभितं ह्यद्य तद्धरा धारयिष्यति॥ १५॥

उनके ऐसा कहनेपर देवताओंने वृषभध्वज भगवान् शिवसे कहा—‘भगवन्! आज आपका जो तेज क्षुब्ध होकर गिरेगा, उसे यह पृथ्वीदेवी धारण करेगी’॥ १५॥

एवमुक्त: सुरपति: प्रमुमोच महाबल:।

तेजसा पृथिवी येन व्याप्ता सगिरिकानना॥ १६॥

‘देवताओंका यह कथन सुनकर महाबली देवेश्वर शिवने अपना तेज छोड़ा, जिससे पर्वत और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी॥ १६॥

ततो देवा: पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम्।

आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वित:॥ १७॥

‘तब देवताओंने अग्निदेवसे कहा—‘अग्ने! तुम वायुके सहयोगसे भगवान् शिवके इस महान् तेजको अपने भीतर रख लो’॥ १७॥

तदग्निना पुनर्व्याप्तं संजातं श्वेतपर्वतम्।

दिव्यं शरवणं चैव पावकादित्यसंनिभम्॥ १८॥

‘अग्निसे व्याप्त होनेपर वह तेज श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। साथ ही वहाँ दिव्य सरकंडोंका वन भी प्रकट हुआ, जो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था॥ १८॥

यत्र जातो महातेजा: कार्तिकेयोऽग्निसम्भव:।

अथोमां च शिवं चैव देवा: सर्षिगणास्तथा॥ १९॥

पूजयामासुरत्यर्थं सुप्रीतमनसस्तदा।

‘उसी वनमें अग्निजनित महातेजस्वी कार्तिकेयका प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देवी उमा और भगवान् शिवका बड़े भक्तिभावसे पूजन किया॥ १९/

अथ शैलसुता राम त्रिदशानिदमब्रवीत्॥ २०॥

समन्युरशपत् सर्वान् क्रोधसंरक्तलोचना।

‘श्रीराम! इसके बाद गिरिराजनन्दिनी उमाके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने समस्त देवताओंको रोषपूर्वक शाप दे दिया। वे बोलीं—॥ २०/

यस्मान्निवारिता चाहं संगता पुत्रकाम्यया॥ २१॥

अपत्यं स्वेषु दारेषु नोत्पादयितुमर्हथ।

अद्यप्रभृति युष्माकमप्रजा: सन्तु पत्नय:॥ २२॥

‘देवताओ! मैंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे पतिके साथ समागम किया था, परंतु तुमने मुझे रोक दिया। अत: अब तुमलोग भी अपनी पत्नियोंसे संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रह जाओगे। आजसे तुम्हारी पत्नियाँ संतानोत्पादन नहीं कर सकेंगी—संतानहीन हो जायँगी’॥ २१-२२॥

एवमुक्त्वा सुरान् सर्वान् शशाप पृथिवीमपि।

अवने नैकरूपा त्वं बहुभार्या भविष्यसि॥ २३॥

‘सब देवताओंसे ऐसा कहकर उमादेवीने पृथिवीको भी शाप दिया—‘भूमे! तेरा एक रूप नहीं रह जायगा। तू बहुतोंकी भार्या होगी॥ २३॥

न च पुत्रकृतां प्रीतिं मत्क्रोधकलुषीकृता।

प्राप्स्यसि त्वं सुदुर्मेधो मम पुत्रमनिच्छती॥ २४॥

‘खोटी बुद्धिवाली पृथ्वी! तू चाहती थी कि मेरे पुत्र न हो। अत: मेरे क्रोधसे कलुषित होकर तू भी पुत्रजनित सुख या प्रसन्नताका अनुभव न कर सकेगी’॥ २४॥

तान् सर्वान् पीडितान् दृष्ट्वा सुरान् सुरपतिस्तदा।

गमनायोपचक्राम दिशं वरुणपालिताम्॥ २५॥

‘उन सब देवताओंको उमादेवीके शापसे पीडित देख देवेश्वर भगवान् शिवने उस समय पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थान कर दिया॥ २५॥

स गत्वा तप आतिष्ठत् पार्श्वे तस्योत्तरे गिरे:।

हिमवत्प्रभवे शृंगे सह देव्या महेश्वर:॥ २६॥

‘वहाँसे जाकर हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें उसीके एक शिखरपर उमादेवीके साथ भगवान् महेश्वर तप करने लगे॥ २६॥

एष ते विस्तरो राम शैलपुत्र्या निवेदित:।

गंगाया: प्रभवं चैव शृणु मे सहलक्ष्मण॥ २७॥

‘लक्ष्मणसहित श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गिरिराज हिमवान्की छोटी पुत्री उमादेवीका विस्तृत वृत्तान्त बताया है। अब मुझसे गंगाके प्रादुर्भावकी कथा सुनो’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्त्रिंश: सर्ग:॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥

 

सप्तत्रिंश: सर्ग:

गंगासे कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसंग

तप्यमाने तदा देवे सेन्द्रा: साग्निपुरोगमा:।

सेनापतिमभीप्सन्त: पितामहमुपागमन्॥ १॥

जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्निआदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापतिकी इच्छा लेकर ब्रह्माजीके पास आये॥ १॥

ततोऽब्रुवन् सुरा: सर्वे भगवन्तं पितामहम्।

प्रणिपत्य सुराराम सेन्द्रा: साग्निपुरोगमा:॥ २॥

देवताओंको आराम देनेवाले श्रीराम! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओंने भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ २॥

येन सेनापतिर्देव दत्तो भगवता पुरा।

स तप: परमास्थाय तप्यते स्म सहोमया॥ ३॥

‘प्रभो! पूर्वकालमें जिन भगवान् महेश्वरने हमें (बीजरूपसे) सेनापति प्रदान किया था, वे उमादेवीके साथ उत्तम तपका आश्रय लेकर तपस्या करते हैं॥ ३॥

यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया।

संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि न: परमा गति:॥ ४॥

‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’॥ ४॥

देवतानां वच: श्रुत्वा सर्वलोकपितामह:।

सान्त्वयन् मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत्॥ ५॥

देवताओंकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ ५॥

शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजा: स्वासु पत्निषु।

तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव न संशय:॥ ६॥

‘देवताओ! गिरिराजकुमारी पार्वतीने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियोंके गर्भसे अब कोई संतान नहीं होगी। उमादेवीकी वाणी अमोघ है; अत: वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है॥

इयमाकाशगंगा च यस्यां पुत्रं हुताशन:।

जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमम्॥ ७॥

‘ये हैं उमाकी बड़ी बहिन आकाशगंगा, जिनके गर्भमें शङ्करजीके उस तेजको स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्रको जन्म देंगे, जो देवताओंके शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ सेनापति होगा॥ ७॥

ज्येष्ठा शैलेन्द्रदुहिता मानयिष्यति तं सुतम्।

उमायास्तद्बहुमतं भविष्यति न संशय:॥ ८॥

‘ये गंगा गिरिराजकी ज्येष्ठ पुत्री हैं, अत: अपनी छोटी बहिनके उस पुत्रको अपने ही पुत्रके समान मानेंगी। उमाको भी यह बहुत प्रिय लगेगा। इसमें संशय नहीं है’॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनन्दन।

प्रणिपत्य सुरा: सर्वे पितामहमपूजयन्॥ ९॥

रघुनन्दन! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके उनका पूजन किया॥ ९॥

ते गत्वा परमं राम कैलासं धातुमण्डितम्।

अग्निं नियोजयामासु: पुत्रार्थं सर्वदेवता:॥ १०॥

श्रीराम! विविध धातुओंसे अलंकृत उत्तम कैलास पर्वतपर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओंने अग्निदेवको पुत्र उत्पन्न करनेके कार्यमें नियुक्त किया॥ १०॥

देवकार्यमिदं देव समाधत्स्व हुताशन।

शैलपुत्र्यां महातेजो गंगायां तेज उत्सृज॥ ११॥

वे बोले—‘देव! हुताशन! यह देवताओंका कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्रके उस महान् तेजको अब आप गंगाजीमें स्थापित कर दीजिये’॥ ११॥

देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावक:।

गर्भं धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियम्॥ १२॥

तब देवताओंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्निदेव गंगाजीके निकट आये और बोले—‘देवि! आप इस गर्भको धारण करें। यह देवताओंका प्रिय कार्य है’॥ १२॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत्।

स तस्या महिमां दृष्ट्वा समन्तादवशीर्यत॥ १३॥

अग्निदेवकी यह बात सुनकर गंगादेवीने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनकी यह महिमा—यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेवने उस रुद्र-तेजको उनके सब ओर बिखेर दिया॥ १३॥

समन्ततस्तदा देवीमभ्यषिञ्चत पावक:।

सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गंगाया रघुनन्दन॥ १४॥

रघुनन्दन! अग्निदेवने जब गंगादेवीको सब ओरसे उस रुद्र-तेजद्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजीके सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये॥ १४॥

तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्।

अशक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम्॥ १५॥

दह्यमानाग्निना तेन सम्प्रव्यथितचेतना।

तब गंगाने समस्त देवताओंके अग्रगामी अग्निदेवसे इस प्रकार कहा—‘देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेजको धारण करनेमें मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँचसे जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है’॥ १५/

अथाब्रवीदिदं गंगां सर्वदेवहुताशन:॥ १६॥

इह हैमवते पार्श्वे गर्भोऽयं संनिवेश्यताम्।

तब सम्पूर्ण देवताओंके हविष्यको भोग लगानेवाले अग्निदेवने गंगादेवीसे कहा—‘देवि! हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें इस गर्भको स्थापित कर दीजिये’॥ १६/

श्रुत्वा त्वग्निवचो गंगा तं गर्भमतिभास्वरम्॥ १७॥

उत्ससर्ज महातेजा: स्रोतोभ्यो हि तदानघ।

निष्पाप रघुनन्दन! अग्निकी यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगाने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भको अपने स्रोतोंसे निकालकर यथोचित स्थानमें रख दिया॥

यदस्या निर्गतं तस्मात् तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥ १८॥

काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्।

ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत॥ १९॥

गंगाके गर्भसे जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरिसे प्रकट हुई हैं; अत: उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंगका हुआ)। पृथ्वीपर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँकी भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पासका स्थान अनुपम प्रभासे प्रकाशित होनेवाला रजत हो गया। उस तेजकी तीक्ष्णतासे ही दूरवर्ती भूभागकी वस्तुएँ ताँबे और लोहेके रूपमें परिणत हो गयीं॥ १८-१९॥

मलं तस्याभवत् तत्र त्रपु सीसकमेव च।

तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत॥ २०॥

उस तेजस्वी गर्भका जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ। इस प्रकार पृथ्वीपर पड़कर वह तेज नाना प्रकारके धातुओंके रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुआ॥ २०॥

निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम्।

सर्वं पर्वतसंनद्धं सौवर्णमभवद् वनम्॥ २१॥

पृथ्वीपर उस गर्भके रखे जाते ही उसके तेजसे व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा॥ २१॥

जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव।

सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम्।

तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति काञ्चनम्॥ २२॥

पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभीसे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णका नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्णका तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भके सम्पर्कसे वहाँका तृण, वृक्ष, लता और गुल्म—सब कुछ सोनेका हो गया॥ २२॥

तं कुमारं ततो जातं सेन्द्रा: सह मरुद्गणा:।

क्षीरसम्भावनार्थाय कृत्तिका: समयोजयन्॥ २३॥

तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंने वहाँ उत्पन्न हुए कुमारको दूध पिलानेके लिये छहों कृत्तिकाओंको नियुक्त किया॥ २३॥

ता: क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमम्।

ददु: पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिता:॥ २४॥

तब उन कृत्तिकाओंने ‘यह हम सबका पुत्र हो’ ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बातका निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालकको अपना दूध प्रदान किया॥ २४॥

ततस्तु देवता: सर्वा: कार्तिकेय इति ब्रुवन्।

पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति न संशय:॥ २५॥

उस समय सब देवता बोले—‘यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुमलोगोंका त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा—इसमें संशय नहीं है’॥ २५॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे।

स्नापयन् परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम्॥ २६॥

देवताओंका यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वतीसे स्कन्दित (स्खलित) तथा गंगाद्वारा गर्भस्राव होनेपर प्रकट हुए अग्निके समान उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाले उस बालकको कृत्तिकाओंने नहलाया॥

स्कन्द इत्यब्रुवन् देवा: स्कन्नं गर्भपरिस्रवे।

कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम्॥ २७॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्रावकालमें स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओंने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा॥ २७॥

प्रादुर्भूतं तत: क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमम्।

षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पय:॥ २८॥

तदनन्तर कृत्तिकाओंके स्तनोंमें परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्दने अपने छ: मुख प्रकट करके उन छहोंका एक साथ ही स्तनपान किया॥ २८॥

गृहीत्वा क्षीरमेकाह्ना सुकुमारवपुस्तदा।

अजयत् स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान् विभु:॥ २९॥

एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीरवाले शक्तिशाली कुमारने अपने पराक्रमसे दैत्योंकी सारी सेनाओंपर विजय प्राप्त की॥ २९॥

सुरसेनागणपतिमभ्यषिञ्चन्महाद्युतिम् ।

ततस्तममरा: सर्वे समेत्याग्निपुरोगमा:॥ ३०॥

तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओंने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्दका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक किया॥ ३०॥

एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया।

कुमारसम्भवश्चैव धन्य: पुण्यस्तथैव च॥ ३१॥

श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगाजीके चरित्रको विस्तारपूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेयके जन्मका भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोताको धन्य एवं पुण्यात्मा बनानेवाला है॥ ३१॥

भक्तश्च य: कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानव:।

आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत्॥ ३२॥

काकुत्स्थ! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य कार्तिकेयमें भक्तिभाव रखता है, वह इस लोकमें दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न हो मृत्युके पश्चात् स्कन्दके लोकमें जाता है॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तत्रिंश: सर्ग:॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥

 

अष्टात्रिंश: सर्ग:

राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा यज्ञकी तैयारी

तां कथां कौशिको रामे निवेद्य मधुराक्षराम्।

पुनरेवापरं वाक्यं काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥ १॥

विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा—॥ १॥

अयोध्याधिपतिर्वीर पूर्वमासीन्नराधिप:।

सगरो नाम धर्मात्मा प्रजाकाम: स चाप्रज:॥ २॥

‘वीर! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अत: वे पुत्र-प्राप्तिके लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥ २॥

वैदर्भदुहिता राम केशिनी नाम नामत:।

ज्येष्ठा सगरपत्नी सा धर्मिष्ठा सत्यवादिनी॥ ३॥

‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥ ३॥

अरिष्टनेमेर्दुहिता सुपर्णभगिनी तु सा।

द्वितीया सगरस्यासीत् पत्नी सुमतिसंज्ञिता॥ ४॥

‘सगरकी दूसरी पत्नीका नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यपकी पुत्री तथा गरुडकी बहिन थी॥ ४॥

ताभ्यां सह महाराज: पत्नीभ्यां तप्तवांस्तप:।

हिमवन्तं समासाद्य भृगुप्रस्रवणे गिरौ॥ ५॥

‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे॥ ५॥

अथ वर्षशते पूर्णे तपसाऽऽराधितो मुनि:।

सगराय वरं प्रादाद् भृगु: सत्यवतां वर:॥ ६॥

‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया॥ ६॥

अपत्यलाभ: सुमहान् भविष्यति तवानघ।

कीर्तिं चाप्रतिमां लोके प्राप्स्यसे पुरुषर्षभ॥ ७॥

‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी। पुरुषप्रवर! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥ ७॥

एका जनयिता तात पुत्रं वंशकरं तव।

षष्टिं पुत्रसहस्राणि अपरा जनयिष्यति॥ ८॥

‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥ ८॥

भाषमाणं महात्मानं राजपुत्र्यौ प्रसाद्य तम्।

ऊचतु: परमप्रीते कृताञ्जलिपुटे तदा॥ ९॥

‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा—॥ ९॥

एक: कस्या: सुतो ब्रह्मन् का बहूञ्जनयिष्यति।

श्रोतुमिच्छावहे ब्रह्मन् सत्यमस्तु वचस्तव॥ १०॥

‘ब्रह्मन्! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं। आपकी वाणी सत्य हो’॥ १०॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा भृगु: परमधार्मिक:।

उवाच परमां वाणीं स्वच्छन्दोऽत्र विधीयताम्॥ ११॥

एको वंशकरो वास्तु बहवो वा महाबला:।

कीर्तिमन्तो महोत्साहा: का वा कं वरमिच्छति॥ १२॥

‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा—‘देवियो! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान् बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र? इन दो वरोंमेंसे किस वरको कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है?’॥ ११-१२॥

मुनेस्तु वचनं श्रुत्वा केशिनी रघुनन्दन।

पुत्रं वंशकरं राम जग्राह नृपसंनिधौ॥ १३॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने राजा सगरके समीप वंश चलानेवाले एक ही पुत्रका वर ग्रहण किया॥ १३॥

षष्टिं पुत्रसहस्राणि सुपर्णभगिनी तदा।

महोत्साहान् कीर्तिमतो जग्राह सुमति: सुतान्॥ १४॥

‘तब गरुड़की बहिन सुमतिने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रोंको जन्म देनेका वरप्राप्त किया॥ १४॥

प्रदक्षिणमृषिं कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य तम्।

जगाम स्वपुरं राजा सभार्यो रघुनन्दन॥ १५॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर रानियोंसहित राजा सगरने महर्षिकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपने नगरको प्रस्थान किया॥ १५॥

अथ काले गते तस्य ज्येष्ठा पुत्रं व्यजायत।

असमञ्ज इति ख्यातं केशिनी सगरात्मजम्॥ १६॥

‘कुछ काल व्यतीत होनेपर बड़ी रानी केशिनीने सगरके औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया॥ १६॥

सुमतिस्तु नरव्याघ्र गर्भतुम्बं व्यजायत।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि तुम्बभेदाद् विनि:सृता:॥ १७॥

‘पुरुषसिंह! (छोटी रानी) सुमतिने तूँबीके आकारका एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया। उसको फोड़नेसे साठ हजार बालक निकले॥ १७॥

घृतपूर्णेषु कुम्भेषु धात्र्यस्तान् समवर्धयन्।

कालेन महता सर्वे यौवनं प्रतिपेदिरे॥ १८॥

‘उन्हें घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं। धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्थाको प्राप्त हुए॥

अथ दीर्घेण कालेन रूपयौवनशालिन:।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि सगरस्याभवंस्तदा॥ १९॥

‘इस तरह दीर्घकालके पश्चात् राजा सगरके रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये॥ १९॥

स च ज्येष्ठो नरश्रेष्ठ सगरस्यात्मसम्भव:।

बालान् गृहीत्वा तु जले सरय्वा रघुनन्दन॥ २०॥

प्रक्षिप्य प्राहसन्नित्यं मज्जतस्तान् निरीक्ष्य वै।

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! सगरका ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगरके बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता॥ २०/

एवं पापसमाचार: सज्जनप्रतिबाधक:॥ २१॥

पौराणामहिते युक्त: पित्रा निर्वासित: पुरात्।

‘इस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषोंको पीडा देने और नगर-निवासियोंका अहित करने लगा, तब पिताने उसे नगरसे बाहर निकाल दिया॥ २१/

तस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम असमञ्जस्य वीर्यवान्॥ २२॥

सम्मत: सर्वलोकस्य सर्वस्यापि प्रियंवद:।

‘असमञ्जके पुत्रका नाम था अंशुमान्। वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगोंको प्रिय था॥ २२/

तत: कालेन महता मति: समभिजायत॥ २३॥

सगरस्य नरश्रेष्ठ यजेयमिति निश्चिता।

‘नरश्रेष्ठ! कुछ कालके अनन्तर महाराज सगरके मनमें यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’॥ २३/

स कृत्वा निश्चयं राजा सोपाध्यायगणस्तदा।

यज्ञकर्मणि वेदज्ञो यष्टुं समुपचक्रमे॥ २४॥

‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपाध्यायोंके साथ यज्ञ करनेकी तैयारीमें लग गये’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥

 

एकोनचत्वारिंश: सर्ग:

इन्द्रके द्वारा राजा सगरके यज्ञसम्बन्धी अश्वका अपहरण, सगरपुत्रोंद्वारा सारी पृथ्वीका भेदन तथा देवताओंका ब्रह्माजीको यह सब समाचार बताना

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा कथान्ते रघुनन्दन:।

उवाच परमप्रीतो मुनिं दीप्तमिवानलम्॥ १॥

विश्वामित्रजीकी कही हुई कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कथाके अन्तमें अग्नितुल्य तेजस्वी विश्वामित्र मुनिसे कहा—॥ १॥

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते विस्तरेण कथामिमाम्।

पूर्वजो मे कथं ब्रह्मन् यज्ञं वै समुपाहरत्॥ २॥

‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। मैं इस कथाको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। मेरे पूर्वज महाराज सगरने किस प्रकार यज्ञ किया था?’॥ २॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वित:।

विश्वामित्रस्तु काकुत्स्थमुवाच प्रहसन्निव॥ ३॥

उनकी वह बात सुनकर विश्वामित्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ। वे यह सोचकर कि मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसीके लिये ये प्रश्न कर रहे हैं, जोर-जोरसे हँस पड़े। हँसते हुए-से ही उन्होंने श्रीरामसे कहा—॥

श्रूयतां विस्तरो राम सगरस्य महात्मन:।

शंकरश्वशुरो नाम्ना हिमवानिति विश्रुत:॥ ४॥

विन्ध्यपर्वतमासाद्य निरीक्षेते परस्परम्।

तयोर्मध्ये समभवद् यज्ञ: स पुरुषोत्तम॥ ५॥

‘राम! तुम महात्मा सगरके यज्ञका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनो। पुरुषोत्तम! शङ्करजीके श्वशुर हिमवान् नामसे विख्यात पर्वत विन्ध्याचलतक पहुँचकर तथा विन्ध्यपर्वत हिमवान्तक पहुँचकर दोनों एक-दूसरेको देखते हैं (इन दोनोंके बीचमें दूसरा कोई ऐसा ऊँचा पर्वत नहीं है, जो दोनोंके पारस्परिक दर्शनमें बाधा उपस्थित कर सके)। इन्हीं दोनों पर्वतोंके बीच आर्यावर्तकी पुण्यभूमिमें उस यज्ञका अनुष्ठान हुआ था॥ ४-५॥

स हि देशो नरव्याघ्र प्रशस्तो यज्ञकर्मणि।

तस्याश्वचर्यां काकुत्स्थ दृढधन्वा महारथ:॥ ६॥

अंशुमानकरोत् तात सगरस्य मते स्थित:।

‘पुरुषसिंह! वही देश यज्ञ करनेके लिये उत्तम माना गया है। तात ककुत्स्थनन्दन! राजा सगरकी आज्ञासे यज्ञिय अश्वकी रक्षाका भार सुदृढ़ धनुर्धर महारथी अंशुमान्ने स्वीकार किया था॥ ६/

तस्य पर्वणि तं यज्ञं यजमानस्य वासव:॥ ७॥

राक्षसीं तनुमास्थाय यज्ञियाश्वमपाहरत्।

‘परंतु पर्वके दिन यज्ञमें लगे हुए राजा सगरके यज्ञसम्बन्धी घोड़ेको इन्द्रने राक्षसका रूप धारण करके चुरा लिया॥ ७/

ह्र‌ियमाणे तु काकुत्स्थ तस्मिन्नश्वे महात्मन:॥ ८ ॥

उपाध्यायगणा: सर्वे यजमानमथाब्रुवन्।

अयं पर्वणि वेगेन यज्ञियाश्वोऽपनीयते॥ ९ ॥

हर्तारं जहि काकुत्स्थ हयश्चैवोपनीयताम्।

यज्ञच्छिद्रं भवत्येतत् सर्वेषामशिवाय न:॥ १०॥

तत् तथा क्रियतां राजन् यज्ञोऽच्छिद्र: कृतो भवेत्।

‘काकुत्स्थ! महामना सगरके उस अश्वका अपहरण होते समय समस्त ऋत्विजोंने यजमान सगरसे कहा—‘ककुत्स्थनन्दन! आज पर्वके दिन कोई इस यज्ञसम्बन्धी अश्वको चुराकर बड़े वेगसे लिये जा रहा है। आप चोरको मारिये और घोड़ा वापस लाइये, नहीं तो यज्ञमें विघ्न पड़ जायगा और वह हम सब लोगोंके लिये अमंगलका कारण होगा। राजन्! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण हो’॥

सोपाध्यायवच: श्रुत्वा तस्मिन् सदसि पार्थिव:॥ ११॥

षष्टिं पुत्रसहस्राणि वाक्यमेतदुवाच ह।

गतिं पुत्रा न पश्यामि रक्षसां पुरुषर्षभा:॥ १२॥

मन्त्रपूतैर्महाभागैरास्थितो हि महाक्रतु:।

‘उस यज्ञ-सभामें बैठे हुए राजा सगरने उपाध्यायोंकी बात सुनकर अपने साठ हजार पुत्रोंसे कहा—‘पुरुषप्रवर पुत्रो! यह महान् यज्ञ वेदमन्त्रोंसे पवित्र अन्त:करणवाले महाभाग महात्माओंद्वारा सम्पादित हो रहा है; अत: यहाँ राक्षसोंकी पहुँच हो, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (अत: यह अश्व चुरानेवाला कोई देवकोटिका पुरुष होगा)॥

तद् गच्छथ विचिन्वध्वं पुत्रका भद्रमस्तु व:॥ १३॥

समुद्रमालिनीं सर्वां पृथिवीमनुगच्छथ।

एकैकं योजनं पुत्रा विस्तारमभिगच्छत॥ १४॥

यावत् तुरगसंदर्शस्तावत् खनत मेदिनीम्।

तमेव हयहर्तारं मार्गमाणा ममाज्ञया॥ १५॥

‘अत: पुत्रो! तुमलोग जाओ, घोड़ेकी खोज करो। तुम्हारा कल्याण हो। समुद्रसे घिरी हुई इस सारी पृथ्वीको छान डालो। एक-एक योजन विस्तृत भूमिको बाँटकर उसका चप्पा-चप्पा देख डालो। जबतक घोड़ेका पता न लग जाय, तबतक मेरी आज्ञासे इस पृथ्वीको खोदते रहो। इस खोदनेका एक ही लक्ष्य है—उस अश्वके चोरको ढूँढ़ निकालना॥ १३—१५॥

दीक्षित: पौत्रसहित: सोपाध्यायगणस्त्वहम्।

इह स्थास्यामि भद्रं वो यावत् तुरगदर्शनम्॥ १६॥

‘मैं यज्ञकी दीक्षा ले चुका हूँ, अत: स्वयं उसे ढूँढ़नेके लिये नहीं जा सकता; इसलिये जबतक उस अश्वका दर्शन न हो, तबतक मैं उपाध्यायों और पौत्र अंशुमान्के साथ यहीं रहूँगा’॥ १६॥

ते सर्वे हृष्टमनसो राजपुत्रा महाबला:।

जग्मुर्महीतलं राम पितुर्वचनयन्त्रिता:॥ १७॥

‘श्रीराम! पिताके आदेशरूपी बन्धनसे बँधकर वे सभी महाबली राजकुमार मन-ही-मन हर्षका अनुभव करते हुए भूतलपर विचरने लगे॥ १७॥

गत्वा तु पृथिवीं सर्वामदृष्ट्वा तं महाबला:।

योजनायामविस्तारमेकैको धरणीतलम्।

बिभिदु: पुरुषव्याघ्रा वज्रस्पर्शसमैर्भुजै:॥ १८॥

‘सारी पृथ्वीका चक्कर लगानेके बाद भी उस अश्वको न देखकर उन महाबली पुरुषसिंह राजपुत्रोंने प्रत्येकके हिस्सेमें एक-एक योजन भूमिका बँटवारा करके अपनी भुजाओंद्वारा उसे खोदना आरम्भ किया। उनकी उन भुजाओंका स्पर्श वज्रके स्पर्शकी भाँति दुस्सह था॥ १८॥

शूलैरशनिकल्पैश्च हलैश्चापि सुदारुणै:।

भिद्यमाना वसुमती ननाद रघुनन्दन॥ १९॥

‘रघुनन्दन! उस समय वज्रतुल्य शूलों और अत्यन्त दारुण हलोंद्वारा सब ओरसे विदीर्ण की जाती हुई वसुधा आर्तनाद करने लगी॥ १९॥

नागानां वध्यमानानामसुराणां च राघव।

राक्षसानां दुराधर्षं सत्त्वानां निनदोऽभवत्॥ २०॥

‘रघुवीर! उन राजकुमारोंद्वारा मारे जाते हुए नागों, असुरों, राक्षसों तथा दूसरे-दूसरे प्राणियोंका भयंकर आर्तनाद गूँजने लगा॥ २०॥

योजनानां सहस्राणि षष्टिं तु रघुनन्दन।

बिभिदुर्धरणीं राम रसातलमनुत्तमम्॥ २१॥

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम! उन्होंने साठ हजार योजनकी भूमि खोद डाली। मानो वे सर्वोत्तम रसातलका अनुसंधान कर रहे हों॥ २१॥

एवं पर्वतसम्बाधं जम्बूद्वीपं नृपात्मजा:।

खनन्तो नृपशार्दूल सर्वत: परिचक्रमु:॥ २२॥

‘नृपश्रेष्ठ राम! इस प्रकार पर्वतोंसे युक्त जम्बूद्वीपकी भूमि खोदते हुए वे राजकुमार सब ओर चक्कर लगाने लगे॥

ततो देवा: सगन्धर्वा: सासुरा: सहपन्नगा:।

सम्भ्रान्तमनस: सर्वे पितामहमुपागमन्॥ २३॥

‘इसी समय गन्धर्वों, असुरों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन घबरा उठे और ब्रह्माजीके पास गये॥ २३॥

ते प्रसाद्य महात्मानं विषण्णवदनास्तदा।

ऊचु: परमसंत्रस्ता: पितामहमिदं वच:॥ २४॥

‘उनके मुखपर विषाद छा रहा था। वे भयसे अत्यन्त संत्रस्त हो गये थे। उन्होंने महात्मा ब्रह्माजीको प्रसन्न करके इस प्रकार कहा—॥ २४॥

भगवन् पृथिवी सर्वा खन्यते सगरात्मजै:।

बहवश्च महात्मानो वध्यन्ते जलचारिण:॥ २५॥

‘भगवन्! सगरके पुत्र इस सारी पृथ्वीको खोदे डालते हैं और बहुत-से महात्माओं तथा जलचारी जीवोंका वध कर रहे हैं॥ २५॥

अयं यज्ञहरोऽस्माकमनेनाश्वोऽपनीयते।

इति ते सर्वभूतानि हिंसन्ति सगरात्मजा:॥ २६॥

‘यह हमारे यज्ञमें विघ्न डालनेवाला है। यह हमारा अश्व चुराकर ले जाता है’ ऐसा कहकर वे सगरके पुत्र समस्त प्राणियोंकी हिंसा कर रहे हैं’॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग:॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥

 

चत्वारिंश: सर्ग:

सगरपुत्रोंके भावी विनाशकी सूचना देकर ब्रह्माजीका देवताओंको शान्त करना, सगरके पुत्रोंका पृथ्वीको खोदते हुए कपिलजीके पास पहुँचना और उनके रोषसे जलकर भस्म होना

देवतानां वच: श्रुत्वा भगवान् वै पितामह:।

प्रत्युवाच सुसंत्रस्तान् कृतान्तबलमोहितान्॥ १॥

देवताओंकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने कितने ही प्राणियोंका अन्त करनेवाले सगरपुत्रोंके बलसे मोहित एवं भयभीत हुए उन देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमत:।

महिषी माधवस्यैषा स एव भगवान् प्रभु:॥ २॥

कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम्।

तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजा:॥ ३॥

‘देवगण! यह सारी पृथ्वी जिन भगवान् वासुदेवकी वस्तु है तथा जिन भगवान् लक्ष्मीपतिकी यह रानी है, वे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि कपिल मुनिका रूप धारण करके निरन्तर इस पृथ्वीको धारण करते हैं। उनकी कोपाग्निसे ये सारे राजकुमार जलकर भस्म हो जायँगे॥ २-३॥

पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातन:।

सगरस्य च पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम्॥ ४॥

‘पृथ्वीका यह भेदन सनातन है—प्रत्येक कल्पमें अवश्यम्भावी है। (श्रुतियों और स्मृतियोंमें आये हुए सागर आदि शब्दोंसे यह बात सुस्पष्ट ज्ञात होती है।) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषोंने सगरके पुत्रोंका भावी विनाश भी देखा ही है; अत: इस विषयमें शोक करना अनुचित है’॥

पितामहवच: श्रुत्वा त्रयस्त्र‌िंशदरिंदमा:।

देवा: परमसंहृष्टा: पुनर्जग्मुर्यथागतम्॥ ५॥

ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तैंतीस देवता बड़े हर्षमें भरकर जैसे आये थे, उसी तरह पुन: लौट गये॥ ५॥

सगरस्य च पुत्राणां प्रादुरासीन्महास्वन:।

पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनि:स्वन:॥ ६॥

सगरपुत्रोंके हाथसे जब पृथ्वी खोदी जा रही थी, उस समय उससे वज्रपातके समान बड़ा भयंकर शब्द होता था॥

ततो भित्त्वा महीं सर्वां कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।

सहिता: सागरा: सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन्॥ ७॥

इस तरह सारी पृथ्वी खोदकर तथा उसकी परिक्रमा करके वे सभी सगरपुत्र पिताके पास खाली हाथ लौट आये और बोले—॥ ७॥

परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिता:।

देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगा:॥ ८॥

न च पश्यामहेऽश्वं ते अश्वहर्तारमेव च।

किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम्॥ ९॥

‘पिताजी! हमने सारी पृथ्वी छान डाली। देवता, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग आदि बड़े-बड़े बलवान् प्राणियोंको मार डाला। फिर भी हमें न तो कहीं घोड़ा दिखायी दिया और न घोड़ेका चुरानेवाला ही। आपका भला हो। अब हम क्या करें? इस विषयमें आप ही कोई उपाय सोचिये’॥ ८-९॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तम:।

समन्युरब्रवीद् वाक्यं सगरो रघुनन्दन॥ १०॥

‘रघुनन्दन! पुत्रोंका यह वचन सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ सगरने उनसे कुपित होकर कहा—॥ १०॥

भूय: खनत भद्रं वो विभेद्य वसुधातलम्।

अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तत॥ ११॥

‘जाओ, फिरसे सारी पृथ्वी खोदो और इसे विदीर्ण करके घोड़ेके चोरका पता लगाओ। चोरतक पहुँचकर काम पूरा होनेपर ही लौटना’॥ ११॥

पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मन:।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन्॥ १२॥

अपने महात्मा पिता सगरकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके वे साठ हजार राजकुमार रसातलकी ओर बढ़े (और रोषमें भरकर पृथ्वी खोदने लगे)॥ १२॥

खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशु: पर्वतोपमम्।

दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम्॥ १३॥

उस खुदाईके समय ही उन्हें एक पर्वताकार दिग्गज दिखायी दिया, जिसका नाम विरूपाक्ष है। वह इस भूतलको धारण किये हुए था॥ १३॥

सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनन्दन।

धारयामास शिरसा विरूपाक्षो महागज:॥ १४॥

रघुनन्दन! महान् गजराज विरूपाक्षने पर्वत और वनोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण कर रखा था॥ १४॥

यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागज:।

खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत्॥ १५॥

काकुत्स्थ! वह महान् दिग्गज जिस समय थककर विश्रामके लिये अपने मस्तकको इधर-उधर हटाता था, उस समय भूकम्प होने लगता था॥ १५॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम्।

मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम्॥ १६॥

श्रीराम! पूर्व दिशाकी रक्षा करनेवाले विशाल गजराज विरूपाक्षकी परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हुए वे सगरपुत्र रसातलका भेदन करके आगे बढ़ गये॥ १६॥

तत: पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदु: पुन:।

दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम्॥ १७॥

पूर्व दिशाका भेदन करनेके पश्चात् वे पुन: दक्षिण दिशाकी भूमिको खोदने लगे। दक्षिण दिशामें भी उन्हें एक महान् दिग्गज दिखायी दिया॥ १७॥

महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम्।

शिरसा धारयन्तं गां विस्मयं जग्मुरुत्तमम्॥ १८॥

उसका नाम था महापद्म। महान् पर्वतके समान ऊँचा वह विशालकाय गजराज अपने मस्तकपर पृथ्वीको धारण करता था। उसे देखकर उन राजकुमारोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ १८॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मन:।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम्॥ १९॥

महात्मा सगरके वे साठ हजार पुत्र उस दिग्गजकी परिक्रमा करके पश्चिम दिशाकी भूमिका भेदन करने लगे॥ १९॥

पश्चिमायामपि दिशि महान्तमचलोपमम्।

दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबला:॥ २०॥

पश्चिम दिशामें भी उन महाबली सगरपुत्रोंने महान् पर्वताकार दिग्गज सौमनसका दर्शन किया॥ २०॥

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम्।

खनन्त: समुपाक्रान्ता दिशं सोमवतीं तदा॥ २१॥

उसकी भी परिक्रमा करके उसका कुशल-समाचार पूछकर वे सभी राजकुमार भूमि खोदते हुए उत्तर दिशामें जा पहुँचे॥ २१॥

उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम्।

भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम्॥ २२॥

रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशामें उन्हें हिमके समान श्वेतभद्र नामक दिग्गज दिखायी दिया, जो अपने कल्याणमय शरीरसे इस पृथ्वीको धारण किये हुए था॥ २२॥

समालभ्य तत: सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम्॥ २३॥

उसका कुशल-समाचार पूछकर राजा सगरके वे सभी साठ हजार पुत्र उसकी परिक्रमा करनेके पश्चात् भूमि खोदनेके काममें जुट गये॥ २३॥

तत: प्रागुत्तरां गत्वा सागरा: प्रथितां दिशम्।

रोषादभ्यखनन् सर्वे पृथिवीं सगरात्मजा:॥ २४॥

तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशामें जाकर उन सगरकुमारोंने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वीको खोदना आरम्भ किया॥ २४॥

ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबला:।

ददृशु: कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्॥ २५॥

इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारोंने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिलको देखा॥ २५॥

हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरत:।

प्रहर्षमतुलं प्राप्ता: सर्वे ते रघुनन्दन॥ २६॥

राजा सगरके यज्ञका वह घोड़ा भी भगवान् कपिलके पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ २६॥

ते तं यज्ञहनं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणा:।

खनित्रलांगलधरा नानावृक्षशिलाधरा:॥ २७॥

भगवान् कपिलको अपने यज्ञमें विघ्न डालनेवाला जानकर उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथोंमें खंती, हल और नाना प्रकारके वृक्ष एवं पत्थरोंके टुकड़े ले रखे थे॥ २७॥

अभ्यधावन्त संक्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन्।

अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञियं हृतवानसि॥ २८॥

दुर्मेधस्त्वं हि सम्प्राप्तान् विद्धि न: सगरात्मजान्।

वे अत्यन्त रोषमें भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञके घोड़ेको यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगरके पुत्र हैं’॥ २८॥

श्रुत्वा तद् वचनं तेषां कपिलो रघुनन्दन॥ २९॥

रोषेण महताविष्टो हुङ्कारमकरोत् तदा।

रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिलको बड़ा रोष हुआ और उस रोषके आवेशमें ही उनके मुँहसे एक हुंकार निकल पड़ा॥ २९/

ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्मना।

भस्मराशीकृता: सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजा:॥ ३०॥

श्रीराम! उस हुंकारके साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने उन सभी सगरपुत्रोंको जलाकर राखका ढेर कर दिया॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥

 

एकचत्वारिंश: सर्ग:

सगरकी आज्ञासे अंशुमान्का रसातलमें जाकर घोड़ेको ले आना और अपने चाचाओंके निधनका समाचार सुनाना

पुत्रांश्चिरगतान् ज्ञात्वा सगरो रघुनन्दन।

नप्तारमब्रवीद् राजा दीप्यमानं स्वतेजसा॥ १॥

रघुनन्दन! ‘पुत्रोंको गये बहुत दिन हो गये’—ऐसा जानकर राजा सगरने अपने पौत्र अंशुमान्से, जो अपने तेजसे देदीप्यमान हो रहा था, इस प्रकार कहा—॥ १॥

शूरश्च कृतविद्यश्च पूर्वैस्तुल्योऽसि तेजसा।

पितृणां गतिमन्विच्छ येन चाश्वोऽपवाहित:॥ २॥

‘वत्स! तुम शूरवीर, विद्वान् तथा अपने पूर्वजोंके तुल्य तेजस्वी हो। तुम भी अपने चाचाओंके पथका अनुसरण करो और उस चोरका पता लगाओ, जिसने मेरे यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका अपहरण कर लिया है॥ २॥

अन्तर्भौमानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।

तेषां तु प्रतिघातार्थं सासिं गृह्णीष्व कार्मुकम्॥ ३॥

‘देखो, पृथ्वीके भीतर बड़े-बड़े बलवान् जीव रहते हैं; अत: उनसे टक्कर लेनेके लिये तुम तलवार और धनुष भी लेते जाओ॥ ३॥

अभिवाद्याभिवाद्यांस्त्वं हत्वा विघ्नकरानपि।

सिद्धार्थ: संनिवर्तस्व मम यज्ञस्य पारग:॥ ४॥

‘जो वन्दनीय पुरुष हों, उन्हें प्रणाम करना और जो तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेवाले हों, उनको मार डालना। ऐसा करते हुए सफलमनोरथ होकर लौटो और मेरे इस यज्ञको पूर्ण कराओ’॥ ४॥

एवमुक्तोंऽशुमान् सम्यक् सगरेण महात्मना।

धनुरादाय खड्गं च जगाम लघुविक्रम:॥ ५॥

महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम कर दिखानेवाला वीरवर अंशुमान् धनुष और तलवार लेकर चल दिया॥ ५॥

स खातं पितृभिर्मार्गमन्तर्भौमं महात्मभि:।

प्रापद्यत नरश्रेष्ठ तेन राज्ञाभिचोदित:॥ ६॥

नरश्रेष्ठ! उसके महामनस्वी चाचाओंने पृथ्वीके भीतर जो मार्ग बना दिया था, उसीपर वह राजा सगरसे प्रेरित होकर गया॥ ६॥

देवदानवरक्षोभि: पिशाचपतगोरगै:।

पूज्यमानं महातेजा दिशागजमपश्यत॥ ७॥

वहाँ उस महातेजस्वी वीरने एक दिग्गजको देखा, जिसकी देवता, दानव, राक्षस, पिशाच, पक्षी और नाग—सभी पूजा कर रहे थे॥ ७॥

स तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चैव निरामयम्।

पितृन् स परिपप्रच्छ वाजिहर्तारमेव च॥ ८॥

उसकी परिक्रमा करके कुशल-मंगल पूछकर अंशुमान्ने उस दिग्गजसे अपने चाचाओंका समाचार तथा अश्व चुरानेवालेका पता पूछा॥ ८॥

दिशागजस्तु तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाच महामति:।

आसमञ्ज कृतार्थस्त्वं सहाश्व: शीघ्रमेष्यसि॥ ९॥

उसका प्रश्न सुनकर परम बुद्धिमान् दिग्गजने इस प्रकार उत्तर दिया—‘असमंज-कुमार! तुम अपना कार्य सिद्ध करके घोड़ेसहित शीघ्र लौट आओगे’॥ ९॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वानेव दिशागजान्।

यथाक्रमं यथान्यायं प्रष्टुं समुपचक्रमे॥ १०॥

उसकी यह बात सुनकर अंशुमान्ने क्रमश: सभी दिग्गजोंसे न्यायानुसार उक्त प्रश्न पूछना आरम्भ किया॥ १०॥

तैश्च सर्वैर्दिशापालैर्वाक्यज्ञैर्वाक्यकोविदै:।

पूजित: सहयश्चैवागन्तासीत्यभिचोदित:॥ ११॥

वाक्यके मर्मको समझने तथा बोलनेमें कुशल उन समस्त दिग्गजोंने अंशुमान्का सत्कार किया और यह शुभ कामना प्रकट की कि तुम घोड़ेसहित लौट आओगे॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा जगाम लघुविक्रम:।

भस्मराशीकृता यत्र पितरस्तस्य सागरा:॥ १२॥

उनका यह आशीर्वाद सुनकर अंशुमान् शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ उसके चाचा सगरपुत्र राखके ढेर हुए पड़े थे॥ १२॥

स दु:खवशमापन्नस्त्वसमञ्जसुतस्तदा।

चुक्रोश परमार्तस्तु वधात् तेषां सुदु:खित:॥ १३॥

उनके वधसे असमंजपुत्र अंशुमान्को बड़ा दु:ख हुआ। वह शोकके वशीभूत हो अत्यन्त आर्तभावसे फूट-फूटकर रोने लगा॥ १३॥

यज्ञियं च हयं तत्र चरन्तमविदूरत:।

ददर्श पुरुषव्याघ्रो दु:खशोकसमन्वित:॥ १४॥

दु:ख-शोकमें डूबे हुए पुरुषसिंह अंशुमान्ने अपने यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको भी वहाँ पास ही चरते देखा॥ १४॥

स तेषां राजपुत्राणां कर्तुकामो जलक्रियाम्।

स जलार्थी महातेजा न चापश्यज्जलाशयम्॥ १५॥

महातेजस्वी अंशुमान्ने उन राजकुमारोंको जलाञ्जलि देनेके लिये जलकी इच्छा की; किंतु वहाँ कहीं भी कोई जलाशय नहीं दिखायी दिया॥ १५॥

विसार्य निपुणां दृष्टिं ततोऽपश्यत् खगाधिपम्।

पितृणां मातुलं राम सुपर्णमनिलोपमम्॥ १६॥

श्रीराम! तब उसने दूरतककी वस्तुओंको देखनेमें समर्थ अपनी दृष्टिको फैलाकर देखा। उस समय उसे वायुके समान वेगशाली पक्षिराज गरुड़ दिखायी दिये, जो उसके चाचाओं (सगरपुत्रों) के मामा थे॥ १६॥

स चैनमब्रवीद् वाक्यं वैनतेयो महाबल:।

मा शुच: पुरुषव्याघ्र वधोऽयं लोकसम्मत:॥ १७॥

महाबली विनतानन्दन गरुड़ने अंशुमान्से कहा—‘पुरुषसिंह! शोक न करो। इन राजकुमारोंका वध सम्पूर्ण जगत्के मंगलके लिये हुआ है॥ १७॥

कपिलेनाप्रमेयेण दग्धा हीमे महाबला:।

सलिलं नार्हसि प्राज्ञ दातुमेषां हि लौकिकम्॥ १८॥

‘विद्वन्! अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने इन महाबली राजकुमारोंको दग्ध किया है। इनके लिये तुम्हें लौकिक जलकी अञ्जलि देना उचित नहीं है॥ १८॥

गंगा हिमवतो ज्येष्ठा दुहिता पुरुषर्षभ।

तस्यां कुरु महाबाहो पितृणां सलिलक्रियाम्॥ १९॥

‘नरश्रेष्ठ! महाबाहो! हिमवान्की जो ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी हैं, उन्हींके जलसे अपने इन चाचाओंका तर्पण करो॥ १९॥

भस्मराशीकृतानेतान् प्लावयेल्लोकपावनी।

तया क्लिन्नमिदं भस्म गंगया लोककान्तया।

षष्टिं पुत्रसहस्राणि स्वर्गलोकं गमिष्यति॥ २०॥

‘जिस समय लोकपावनी गंगा राखके ढेर होकर गिरे हुए उन साठ हजार राजकुमारोंको अपने जलसे आप्लावित करेंगी, उसी समय उन सबको स्वर्गलोकमें पहुँचा देंगी। लोककमनीया गंगाके जलसे भीगी हुई यह भस्मराशि इन सबको स्वर्गलोकमें भेज देगी॥ २०॥

निर्गच्छाश्वं महाभाग संगृह्य पुरुषर्षभ।

यज्ञं पैतामहं वीर निर्वर्तयितुमर्हसि॥ २१॥

‘महाभाग! पुरुषप्रवर! वीर! अब तुम घोड़ा लेकर जाओ और अपने पितामहका यज्ञ पूर्ण करो’॥ २१॥

सुपर्णवचनं श्रुत्वा सोंऽशुमानतिवीर्यवान्।

त्वरितं हयमादाय पुनरायान्महातपा:॥ २२॥

गरुड़की यह बात सुनकर अत्यन्त पराक्रमी महातपस्वी अंशुमान् घोड़ा लेकर तुरंत लौट आया॥

ततो राजानमासाद्य दीक्षितं रघुनन्दन।

न्यवेदयद् यथावृत्तं सुपर्णवचनं तथा॥ २३॥

रघुनन्दन! यज्ञमें दीक्षित हुए राजाके पास आकर उसने सारा समाचार निवेदन किया और गरुड़की बतायी हुई बात भी कह सुनायी॥ २३॥

तच्छ्रुत्वा घोरसंकाशं वाक्यमंशुमतो नृप:।

यज्ञं निर्वर्तयामास यथाकल्पं यथाविधि॥ २४॥

अंशुमान्के मुखसे यह भयंकर समाचार सुनकर राजा सगरने कल्पोक्त नियमके अनुसार अपना यज्ञ विधिवत् पूर्ण किया॥ २४॥

स्वपुरं त्वगमच्छ्रीमानिष्टयज्ञो महीपति:।

गंगायाश्चागमे राजा निश्चयं नाध्यगच्छत॥ २५॥

यज्ञ समाप्त करके पृथ्वीपति महाराज सगर अपनी राजधानीको लौट आये। वहाँ आनेपर उन्होंने गंगाजीको ले आनेके विषयमें बहुत विचार किया; किंतु वे किसी निश्चयपर न पहुँच सके॥ २५॥

अगत्वा निश्चयं राजा कालेन महता महान्।

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राज्यं कृत्वा दिवं गत:॥ २६॥

दीर्घकालतक विचार करनेपर भी उन्हें कोई निश्चित उपाय नहीं सूझा और तीस हजार वर्षोंतक राज्य करके वे स्वर्गलोकको चले गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥

 


द्विचत्वारिंश: सर्ग:

अंशुमान् और भगीरथकी तपस्या, ब्रह्माजीका भगीरथको अभीष्ट वर देकर गंगाजीको धारण करनेके लिये भगवान् शङ्करको राजी करनेके निमित्त प्रयत्न करनेकी सलाह देना

कालधर्मं गते राम सगरे प्रकृतीजना:।

राजानं रोचयामासुरंशुमन्तं सुधार्मिकम्॥ १॥

श्रीराम! सगरकी मृत्यु हो जानेपर प्रजाजनोंने परम धर्मात्मा अंशुमान्को राजा बनानेकी रुचि प्रकट की॥ १॥

स राजा सुमहानासीदंशुमान् रघुनन्दन।

तस्य पुत्रो महानासीद् दिलीप इति विश्रुत:॥ २॥

रघुनन्दन! अंशुमान् बड़े प्रतापी राजा हुए। उनके पुत्रका नाम दिलीप था। वह भी एक महान् पुरुष था॥ २॥

तस्मै राज्यं समादिश्य दिलीपे रघुनन्दन।

हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे सुदारुणम्॥ ३॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर! अंशुमान् दिलीपको राज्य देकर हिमालयके रमणीय शिखरपर चले गये और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ ३॥

द्वात्रिंशच्छतसाहस्रं वर्षाणि सुमहायशा:।

तपोवनगतो राजा स्वर्गं लेभे तपोधन:॥ ४॥

महान् यशस्वी राजा अंशुमान्ने उस तपोवनमें जाकर बत्तीस हजार वर्षोंतक तप किया। तपस्याके धनसे सम्पन्न हुए उस नरेशने वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया॥ ४॥

दिलीपस्तु महातेजा: श्रुत्वा पैतामहं वधम्।

दु:खोपहतया बुद्ध्या निश्चयं नाध्यगच्छत॥ ५॥

अपने पितामहोंके वधका वृत्तान्त सुनकर महातेजस्वी दिलीप भी बहुत दु:खी रहते थे। अपनी बुद्धिसे बहुत सोचने-विचारनेके बाद भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ ५॥

कथं गंगावतरणं कथं तेषां जलक्रिया।

तारयेयं कथं चैतानिति चिन्तापरोऽभवत्॥ ६॥

वे सदा इसी चिन्तामें डूबे रहते थे कि किस प्रकार पृथ्वीपर गंगाजीका उतरना सम्भव होगा? कैसे गंगाजलद्वारा उन्हें जलाञ्जलि दी जायेगी और किस प्रकार मैं अपने उन पितरोंका उद्धार कर सकूँगा॥ ६॥

तस्य चिन्तयतो नित्यं धर्मेण विदितात्मन:।

पुत्रो भगीरथो नाम जज्ञे परमधार्मिक:॥ ७॥

प्रतिदिन इन्हीं सब चिन्ताओंमें पड़े हुए राजा दिलीपको, जो अपने धर्माचरणसे बहुत विख्यात थे, भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ॥ ७॥

दिलीपस्तु महातेजा यज्ञैर्बहुभिरिष्टवान्।

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥ ८॥

महातेजस्वी दिलीपने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान तथा तीस हजार वर्षोंतक राज्य किया॥ ८॥

अगत्वा निश्चयं राजा तेषामुद्धरणं प्रति।

व्याधिना नरशार्दूल कालधर्ममुपेयिवान्॥ ९॥

पुरुषसिंह! उन पितरोंके उद्धारके विषयमें किसी निश्चयको न पहुँचकर राजा दिलीप रोगसे पीडि़त हो मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ९॥

इन्द्रलोकं गतो राजा स्वार्जितेनैव कर्मणा।

राज्ये भगीरथं पुत्रमभिषिच्य नरर्षभ:॥ १०॥

पुत्र भगीरथको राज्यपर अभिषिक्त करके नरश्रेष्ठ राजा दिलीप अपने किये हुए पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोकमें गये॥ १०॥

भगीरथस्तु राजर्षिर्धार्मिको रघुनन्दन।

अनपत्यो महाराज: प्रजाकाम: स च प्रजा:॥ ११॥

मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं गंगावतरणे रत:।

तपो दीर्घं समातिष्ठद् गोकर्णे रघुनन्दन॥ १२॥

रघुनन्दन! धर्मात्मा राजर्षि महाराज भगीरथके कोई संतान नहीं थी। वे संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखते थे तो भी प्रजा और राज्यकी रक्षाका भार मन्त्रियोंपर रखकर गंगाजीको पृथ्वीपर उतारनेके प्रयत्नमें लग गये और गोकर्णतीर्थमें बड़ी भारी तपस्या करने लगे॥ ११-१२॥

ऊर्ध्वबाहु: पञ्चतपा मासाहारो जितेन्द्रिय:।

तस्य वर्षसहस्राणि घोरे तपसि तिष्ठत:॥ १३॥

अतीतानि महाबाहो तस्य राज्ञो महात्मन:।

महाबाहो! वे अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर पञ्चाग्निका सेवन करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक-एक महीनेपर आहार ग्रहण करते थे। इस प्रकार घोर तपस्यामें लगे हुए महात्मा राजा भगीरथके एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये॥ १३/

सुप्रीतो भगवान् ब्रह्मा प्रजानां प्रभुरीश्वर:॥ १४॥

तत: सुरगणै: सार्धमुपागम्य पितामह:।

भगीरथं महात्मानं तप्यमानमथाब्रवीत्॥ १५॥

इससे प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए। पितामह ब्रह्माने देवताओंके साथ वहाँ आकर तपस्यामें लगे हुए महात्मा भगीरथसे इस प्रकार कहा—॥ १४-१५॥

भगीरथ महाराज प्रीतस्तेऽहं जनाधिप।

तपसा च सुतप्तेन वरं वरय सुव्रत॥ १६॥

‘महाराज भगीरथ! तुम्हारी इस उत्तम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले नरेश्वर! तुम कोई वर माँगो’॥ १६॥

तमुवाच महातेजा: सर्वलोकपितामहम्।

भगीरथो महाबाहु: कृताञ्जलिपुट: स्थित:॥ १७॥

तब महातेजस्वी महाबाहु भगीरथ हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये और उन सर्वलोकपितामह ब्रह्मासे इस प्रकार बोले—॥ १७॥

यदि मे भगवान् प्रीतो यद्यस्ति तपस:फलम्।

सगरस्यात्मजा: सर्वे मत्त: सलिलमाप्नुयु:॥ १८॥

‘भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि इस तपस्याका कोई उत्तम फल है तो सगरके सभी पुत्रोंको मेरे हाथसे गंगाजीका जल प्राप्त हो॥ १८॥

गंगाया: सलिलक्लिन्ने भस्मन्येषां महात्मनाम्।

स्वर्गं गच्छेयुरत्यन्तं सर्वे च प्रपितामहा:॥ १९॥

‘इन महात्माओंकी भस्मराशिके गंगाजीके जलसे भीग जानेपर मेरे उन सभी प्रपितामहोंको अक्षय स्वर्गलोक मिले॥ १९॥

देव याचे ह संतत्यै नावसीदेत् कुलं च न:।

इक्ष्वाकूणां कुले देव एष मेऽस्तु वर: पर:॥ २०॥

‘देव! मैं संततिके लिये भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। हमारे कुलकी परम्परा कभी नष्ट न हो। भगवन्! मेरे द्वारा माँगा हुआ उत्तम वर सम्पूर्ण इक्ष्वाकुवंशके लिये लागू होना चाहिये’॥ २०॥

उक्तवाक्यं तु राजानं सर्वलोकपितामह:।

प्रत्युवाच शुभां वाणीं मधुरां मधुराक्षराम्॥ २१॥

राजा भगीरथके ऐसा कहनेपर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजीने मधुर अक्षरोंवाली परम कल्याणमयी मीठी वाणीमें कहा—॥ २१॥

मनोरथो महानेष भगीरथ महारथ।

एवं भवतु भद्रं ते इक्ष्वाकुकुलवर्धन॥ २२॥

‘इक्ष्वाकुवंशकी वृद्धि करनेवाले महारथी भगीरथ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारा यह महान् मनोरथ इसी रूपमें पूर्ण हो॥ २२॥

इयं हैमवती ज्येष्ठा गंगा हिमवत: सुता।

तां वै धारयितुं राजन् हरस्तत्र नियुज्यताम्॥ २३॥

‘राजन्! ये हैं हिमालयकी ज्येष्ठ पुत्री हैमवती गंगाजी। इनको धारण करनेके लिये भगवान् शङ्करको तैयार करो॥ २३॥

गंगाया: पतनं राजन् पृथिवी न सहिष्यते।

तां वै धारयितुं राजन् नान्यं पश्यामि शूलिन:॥ २४॥

‘महाराज! गंगाजीके गिरनेका वेग यह पृथ्वी नहीं सह सकेगी। मैं त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करके सिवा और किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इन्हें धारण कर सके’॥ २४॥

तमेवमुक्त्वा राजानं गंगां चाभाष्य लोककृत्।

जगाम त्रिदिवं देवै: सर्वै: सह मरुद्गणै:॥ २५॥

राजासे ऐसा कहकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने भगवती गंगासे भी भगीरथपर अनुग्रह करनेके लिये कहा। इसके बाद वे सम्पूर्ण देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥

 

 


त्रिचत्वारिंश: सर्ग:

भगीरथकी तपस्यासे संतुष्ट हुए भगवान् शङ्करका गंगाको अपने सिरपर धारण करके बिन्दुसरोवरमें छोड़ना और उनका सात धाराओंमें विभक्त हो भगीरथके साथ जाकर उनके पितरोंका उद्धार करना

देवदेवे गते तस्मिन् सोऽङ्गुष्ठाग्रनिपीडिताम्।

कृत्वा वसुमतीं राम वत्सरं समुपासत॥ १॥

श्रीराम! देवाधिदेव ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा भगीरथ पृथ्वीपर केवल अँगूठेके अग्रभागको टिकाये हुए खड़े हो एक वर्षतक भगवान् शङ्करकी उपासनामें लगे रहे॥ १॥

अथ संवत्सरे पूर्णे सर्वलोकनमस्कृत:।

उमापति: पशुपती राजानमिदमब्रवीत्॥ २॥

वर्ष पूरा होनेपर सर्वलोकवन्दित उमावल्लभ भगवान् पशुपतिने प्रकट होकर राजासे इस प्रकार कहा—॥ २॥

प्रीतस्तेऽहं नरश्रेष्ठ करिष्यामि तव प्रियम्।

शिरसा धारयिष्यामि शैलराजसुतामहम्॥ ३॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। मैं गिरिराजकुमारी गंगादेवीको अपने मस्तकपर धारण करूँगा’॥ ३॥

ततो हैमवती ज्येष्ठा सर्वलोकनमस्कृता।

तदा सातिमहद्रूपं कृत्वा वेगं च दु:सहम्॥ ४॥

आकाशादपतद् राम शिवे शिवशिरस्युत।

श्रीराम! शङ्करजीकी स्वीकृति मिल जानेपर हिमालयकी ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी, जिनके चरणोंमें सारा संसार मस्तक झुकाता है, बहुत बड़ा रूप धारण करके अपने वेगको दुस्सह बनाकर आकाशसे भगवान् शङ्करके शोभायमान मस्तकपर गिरीं॥ ४/

अचिन्तयच्च सा देवी गंगा परमदुर्धरा॥ ५॥

विशाम्यहं हि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्।

उस समय परम दुर्धर गंगादेवीने यह सोचा था कि मैं अपने प्रखर प्रवाहके साथ शङ्करजीको लिये-दिये पातालमें घुस जाऊँगी॥ ५/

तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धस्तु भगवान् हर:॥ ६॥

तिरोभावयितुं बुद्धिं चक्रे त्रिनयनस्तदा।

उनके इस अहंकारको जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् हर कुपित हो उठे और उन्होंने उस समय गंगाको अदृश्य कर देनेका विचार किया॥ ६/

सा तस्मिन् पतिता पुण्या पुण्ये रुद्रस्य मूर्धनि॥ ७॥

हिमवत्प्रतिमे राम जटामण्डलगह्वरे।

सा कथंचिन्महीं गन्तुं नाशक्नोद् यत्नमास्थिता॥ ८॥

पुण्यस्वरूपा गंगा भगवान् रुद्रके पवित्र मस्तकपर गिरीं। उनका वह मस्तक जटामण्डलरूपी गुफासे सुशोभित हिमालयके समान जान पड़ता था। उसपर गिरकर विशेष प्रयत्न करनेपर भी किसी तरह वे पृथ्वीपर न जा सकीं॥ ७-८॥

नैव सा निर्गमं लेभे जटामण्डलमन्तत:।

तत्रैवाबभ्रमद् देवी संवत्सरगणान् बहून्॥ ९॥

भगवान् शिवके जटा-जालमें उलझकर किनारे आकर भी गंगादेवी वहाँसे निकलनेका मार्ग न पा सकीं और बहुत वर्षोंतक उस जटाजूटमें ही भटकती रहीं॥ ९॥

तामपश्यत् पुनस्तत्र तप: परममास्थित:।

स तेन तोषितश्चासीदत्यन्तं रघुनन्दन॥ १०॥

रघुनन्दन! भगीरथने देखा, गंगाजी भगवान् शङ्करके जटामण्डलमें अदृश्य हो गयी हैं; तब वे पुन: वहाँ भारी तपस्यामें लग गये। उस तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शिवको बहुत संतुष्ट कर लिया॥ १०॥

विससर्ज ततो गंगां हरो बिन्दुसर: प्रति।

तस्यां विसृज्यमानायां सप्त स्रोतांसि जज्ञिरे॥ ११॥

तब महादेवजीने गंगाजीको बिन्दुसरोवरमें ले जाकर छोड़ दिया। वहाँ छूटते ही उनकी सात धाराएँ हो गयीं॥ ११॥

ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च तथैव च।

तिस्र: प्राचीं दिशं जग्मुर्गङ्गा: शिवजला: शुभा:॥ १२॥

ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—ये कल्याणमय जलसे सुशोभित गंगाकी तीन मंगलमयी धाराएँ पूर्व दिशाकी ओर चली गयीं॥ १२॥

सुचक्षुश्चैव सीता च सिन्धुश्चैव महानदी।

तिस्रश्चैता दिशं जग्मु: प्रतीचीं तु दिशं शुभा:॥ १३॥

सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु—ये तीन शुभ धाराएँ पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुईं॥ १३॥

सप्तमी चान्वगात् तासां भगीरथरथं तदा।

भगीरथोऽपि राजर्षिर्दिव्यं स्यन्दनमास्थित:॥ १४॥

प्रायादग्रे महातेजा गंगा तं चाप्यनुव्रजत्।

गगनाच्छंकरशिरस्ततो धरणिमागता॥ १५॥

उनकी अपेक्षा जो सातवीं धारा थी, वह महाराज भगीरथके रथके पीछे-पीछे चलने लगी। महातेजस्वी राजर्षि भगीरथ भी दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चले और गंगा उन्हींके पथका अनुसरण करने लगीं। इस प्रकार वे आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर और वहाँसे इस पृथ्वीपर आयी थीं॥ १४-१५॥

असर्पत जलं तत्र तीव्रशब्दपुरस्कृतम्।

मत्स्यकच्छपसङ्घैश्च श‌िंशुमारगणैस्तथा॥ १६॥

पतद्भि: पतितैश्चैव व्यरोचत वसुंधरा।

गंगाजीकी वह जलराशि महान् कलकल नादके साथ तीव्र गतिसे प्रवाहित हुई। मत्स्य, कच्छप और शिंशुमार (सूँस) झुंड-के-झुंड उसमें गिरने लगे। उन गिरे हुए जलजन्तुओंसे वसुन्धराकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १६/

ततो देवर्षिगन्धर्वा यक्षसिद्धगणास्तथा॥ १७॥

व्यलोकयन्त ते तत्र गगनाद् गां गतां तदा।

विमानैर्नगराकारैर्हयैर्गजवरैस्तदा ॥ १८॥

तदनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगरके समान आकारवाले विमानों, घोड़ों तथा गजराजोंपर बैठकर आकाशसे पृथ्वीपर गयी हुई गंगाजीकी शोभा निहारने लगे॥ १७-१८॥

पारिप्लवगताश्चापि देवतास्तत्र विष्ठिता:।

तदद्भुतमिमं लोके गंगावतरमुत्तमम्॥ १९॥

दिदृक्षवो देवगणा: समीयुरमितौजस:।

देवतालोग आश्चर्यचकित होकर वहाँ खड़े थे। जगत्में गंगावतरणके इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्यको देखनेकी इच्छासे अमित तेजस्वी देवताओंका समूह वहाँ जुटा हुआ था॥ १९/

सम्पतद्भि: सुरगणैस्तेषां चाभरणौजसा॥ २०॥

शतादित्यमिवाभाति गगनं गततोयदम्।

तीव्र गतिसे आते हुए देवताओं तथा उनके दिव्य आभूषणोंके प्रकाशसे वहाँका मेघरहित निर्मल आकाश इस तरह प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों॥ २०/

श‌िंशुमारोरगगणैर्मीनैरपि च चञ्चलै:॥ २१॥

विद्युद्भिरिव विक्षिप्तैराकाशमभवत् तदा।

शिंशुमार, सर्प तथा चञ्चल मत्स्यसमूहोंके उछलनेसे गंगाजीके जलसे ऊपरका आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो वहाँ चञ्चल चपलाओंका प्रकाश सब ओर व्याप्त हो रहा हो॥ २१/

पाण्डुरै: सलिलोत्पीडै: कीर्यमाणै: सहस्रधा॥ २२॥

शारदाभ्रैरिवाकीर्णं गगनं हंससम्प्लवै:।

वायु आदिसे सहस्रों टुकड़ोंमें बँटे हुए फेन आकाशमें सब ओर फैल रहे थे। मानो शरद्-ऋतुके श्वेत बादल अथवा हंस उड़ रहे हों॥ २२/

क्वचिद् द्रुततरं याति कुटिलं क्वचिदायतम्॥ २३॥

विनतं क्वचिदुद्भूतं क्वचिद् याति शनै: शनै:।

सलिलेनैव सलिलं क्वचिदभ्याहतं पुन:॥ २४॥

गंगाजीकी वह धारा कहीं तेज, कहीं टेढ़ी और कहीं चौड़ी होकर बहती थी। कहीं बिलकुल नीचेकी ओर गिरती और कहीं ऊँचेकी ओर उठी हुई थी। कहीं समतल भूमिपर वह धीरे-धीरे बहती थी और कहीं-कहीं अपने ही जलसे उसके जलमें बारम्बार टक्करें लगती रहती थीं॥ २३-२४॥

मुहुरूर्ध्वपथं गत्वा पपात वसुधां पुन:।

तच्छंकरशिरोभ्रष्टं भ्रष्टं भूमितले पुन:॥ २५॥

व्यरोचत तदा तोयं निर्मलं गतकल्मषम्।

गंगाका वह जल बार-बार ऊँचे मार्गपर उठता और पुन: नीची भूमिपर गिरता था। आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर तथा वहाँसे फिर पृथ्वीपर गिरा हुआ वह निर्मल एवं पवित्र गंगाजल उस समय बड़ी शोभा पा रहा था॥

तत्रर्षिगणगन्धर्वा वसुधातलवासिन:॥ २६॥

भवांगपतितं तोयं पवित्रमिति पस्पृशु:।

उस समय भूतलनिवासी ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि भगवान् शङ्करके मस्तकसे गिरा हुआ यह जल बहुत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे॥ २६/

शापात् प्रपतिता ये च गगनाद् वसुधातलम्॥ २७॥

कृत्वा तत्राभिषेकं ते बभूवुर्गतकल्मषा:।

धूतपापा: पुनस्तेन तोयेनाथ शुभान्विता:॥ २८॥

पुनराकाशमाविश्य स्वाँल्लोकान् प्रतिपेदिरे।

जो शापभ्रष्ट होकर आकाशसे पृथ्वीपर आ गये थे, वे गंगाके जलमें स्नान करके निष्पाप हो गये तथा उस जलसे पाप धुल जानेके कारण पुन: शुभ पुण्यसे संयुक्त हो आकाशमें पहुँचकर अपने लोकोंको पा गये॥

मुमुदे मुदितो लोकस्तेन तोयेन भास्वता॥ २९॥

कृताभिषेको गंगायां बभूव गतकल्मष:।

उस प्रकाशमान जलके सम्पर्कसे आनन्दित हुए सम्पूर्ण जगत्को सदाके लिये बड़ी प्रसन्नता हुई। सब लोग गंगामें स्नान करके पापहीन हो गये॥ २९/

भगीरथो हि राजर्षिर्दिव्यं स्यन्दनमास्थित:॥ ३०॥

प्रायादग्रे महाराजस्तं गंगा पृष्ठतोऽन्वगात्।

(हम पहले बता आये हैं कि) राजर्षि महाराज भगीरथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चल रहे थे और गंगाजी उनके पीछे-पीछे जा रही थीं॥ ३०॥

देवा: सर्षिगणा: सर्वे दैत्यदानवराक्षसा:॥ ३१॥

गन्धर्वयक्षप्रवरा: सकिंनरमहोरगा:।

सर्पाश्चाप्सरसो राम भगीरथरथानुगा:॥ ३२॥

गंगामन्वगमन् प्रीता: सर्वे जलचराश्च ये।

श्रीराम! उस समय समस्त देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्षप्रवर, किन्नर, बड़े-बड़े नाग, सर्प तथा अप्सरा—ये सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा भगीरथके रथके पीछे गंगाजीके साथ-साथ चल रहे थे। सब प्रकारके जलजन्तु भी गंगाजीकी उस जलराशिके साथ सानन्द जा रहे थे॥ ३१-३२/

यतो भगीरथो राजा ततो गंगा यशस्विनी॥ ३३॥

जगाम सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी।

जिस ओर राजा भगीरथ जाते, उसी ओर समस्त पापोंका नाश करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ यशस्विनी गंगा भी जाती थीं॥ ३३/

ततो हि यजमानस्य जह्नोरद्भुतकर्मण:॥ ३४॥

गंगा सम्प्लावयामास यज्ञवाटं महात्मन:।

उस समय मार्गमें अद्भुत पराक्रमी महामना राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगाजी अपने जल-प्रवाहसे उनके यज्ञमण्डपको बहा ले गयीं॥ ३४/

तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धो जह्नुश्च राघव॥ ३५॥

अपिबत् तु जलं सर्वं गंगाया: परमाद्भुतम्।

रघुनन्दन! राजा जह्नु इसे गंगाजीका गर्व समझकर कुपित हो उठे; फिर तो उन्होंने गंगाजीके उस समस्त जलको पी लिया। यह संसारके लिये बड़ी अद्भुत बात हुई॥ ३५/

ततो देवा: सगन्धर्वा ऋषयश्च सुविस्मिता:॥ ३६॥

पूजयन्ति महात्मानं जह्नुं पुरुषसत्तमम्।

तब देवता, गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त विस्मित होकर पुरुषप्रवर महात्मा जह्नुकी स्तुति करने लगे॥ ३६/

गंगां चापि नयन्ति स्म दुहितृत्वे महात्मन:॥ ३७॥

ततस्तुष्टो महातेजा: श्रोत्राभ्यामसृजत् प्रभु:।

तस्माज्जह्नुसुता गंगा प्रोच्यते जाह्नवीति च॥ ३८॥

उन्होंने गंगाजीको उन महात्मा नरेशकी कन्या बना दिया। (अर्थात् उन्हें यह विश्वास दिलाया कि गंगाजीको प्रकट करके आप इनके पिता कहलायेंगे।) इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी जह्नु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानोंके छिद्रोंद्वारा गंगाजीको पुन: प्रकट कर दिया, इसलिये गंगा जह्नुकी पुत्री एवं जाह्नवी कहलाती हैं॥ ३७-३८॥

जगाम च पुनर्गङ्गा भगीरथरथानुगा।

सागरं चापि सम्प्राप्ता सा सरित्प्रवरा तदा॥ ३९॥

रसातलमुपागच्छत् सिद्ध्यर्थं तस्य कर्मण:।

वहाँसे गंगा फिर भगीरथके रथका अनुसरण करती हुई चलीं। उस समय सरिताओंमें श्रेष्ठ जाह्नवी समुद्रतक जा पहुँचीं और राजा भगीरथके पितरोंके उद्धाररूपी कार्यकी सिद्धिके लिये रसातलमें गयीं॥ ३९/

भगीरथोऽपि राजर्षिर्गङ्गामादाय यत्नत:॥ ४०॥

पितामहान् भस्मकृतानपश्यद् गतचेतन:।

राजर्षि भगीरथ भी यत्नपूर्वक गंगाजीको साथ ले वहाँ गये। उन्होंने शापसे भस्म हुए अपने पितामहोंको अचेत-सा होकर देखा॥ ४०/

अथ तद्भस्मनां राश‌िं गंगासलिलमुत्तमम्।

प्लावयत् पूतपाप्मान: स्वर्गं प्राप्ता रघूत्तम॥ ४१॥

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर! तदनन्तर गंगाके उस उत्तम जलने सगर-पुत्रोंकी उस भस्मराशिको आप्लावित कर दिया और वे सभी राजकुमार निष्पाप होकर स्वर्गमें पहुँच गये॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥

 

चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:

ब्रह्माजीका भगीरथकी प्रशंसा करते हुए उन्हें गंगाजलसे पितरोंके तर्पणकी आज्ञा देना और राजाका वह सब करके अपने नगरको जाना, गंगावतरणके उपाख्यानकी महिमा

स गत्वा सागरं राजा गंगयानुगतस्तदा।

प्रविवेश तलं भूमेर्यत्र ते भस्मसात्कृता:॥ १॥

भस्मन्यथाप्लुते राम गंगाया: सलिलेन वै।

सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा राजानमिदमब्रवीत्॥ २॥

श्रीराम! इस प्रकार गंगाजीको साथ लिये राजा भगीरथने समुद्रतक जाकर रसातलमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, प्रवेश किया। वह भस्मराशि जब गंगाजीके जलसे आप्लावित हो गयी, तब सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माने वहाँ पधारकर राजासे इस प्रकार कहा—॥ १-२॥

तारिता नरशार्दूल दिवं याताश्च देववत्।

षष्टि: पुत्रसहस्राणि सगरस्य महात्मन:॥ ३॥

‘नरश्रेष्ठ! महात्मा राजा सगरके साठ हजार पुत्रोंका तुमने उद्धार कर दिया। अब वे देवताओंकी भाँति स्वर्गलोकमें जा पहुँचे॥ ३॥

सागरस्य जलं लोके यावत्स्थास्यति पार्थिव।

सगरस्यात्मजा: सर्वे दिवि स्थास्यन्ति देववत्॥ ४॥

‘भूपाल! इस संसारमें जबतक सागरका जल मौजूद रहेगा; तबतक सगरके सभी पुत्र देवताओंकी भाँति स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहेंगे॥ ४॥

इयं च दुहिता ज्येष्ठा तव गंगा भविष्यति।

त्वत्कृतेन च नाम्नाथ लोके स्थास्यति विश्रुता॥ ५॥

‘ये गंगा तुम्हारी भी ज्येष्ठ पुत्री होकर रहेंगी और तुम्हारे नामपर रखे हुए भागीरथी नामसे इस जगत्में विख्यात होंगी॥ ५॥

गंगा त्रिपथगा नाम दिव्या भागीरथीति च।

त्रीन् पथो भावयन्तीति तस्मात् त्रिपथगा स्मृता॥ ६॥

‘त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी—इन तीनों नामोंसे गंगाकी प्रसिद्धि होगी। ये आकाश, पृथ्वी और पाताल तीनों पथोंको पवित्र करती हुई गमन करती हैं, इसलिये त्रिपथगा मानी गयी हैं॥ ६॥

पितामहानां सर्वेषां त्वमत्र मनुजाधिप।

कुरुष्व सलिलं राजन् प्रतिज्ञामपवर्जय॥ ७॥

‘नरेश्वर! महाराज! अब तुम गंगाजीके जलसे यहाँ अपने सभी पितामहोंका तर्पण करो और इस प्रकार अपनी तथा अपने पूर्वजोंद्वारा की हुई प्रतिज्ञाको पूर्ण कर लो॥ ७॥

पूर्वकेण हि ते राजंस्तेनातियशसा तदा।

धर्मिणां प्रवरेणाथ नैष प्राप्तो मनोरथ:॥ ८॥

‘राजन्! तुम्हारे पूर्वज धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी राजा सगर भी गंगाको यहाँ लाना चाहते थे; किंतु उनका यह मनोरथ नहीं पूर्ण हुआ॥ ८॥

तथैवांशुमता वत्स लोकेऽप्रतिमतेजसा।

गंगां प्रार्थयता नेतुं प्रतिज्ञा नापवर्जिता॥ ९ ॥

राजर्षिणा गुणवता महर्षिसमतेजसा।

मत्तुल्यतपसा चैव क्षत्रधर्मस्थितेन च॥ १०॥

‘वत्स! इसी प्रकार लोकमें अप्रतिम प्रभावशाली, उत्तम गुणविशिष्ट, महर्षितुल्य तेजस्वी, मेरे समान तपस्वी तथा क्षत्रिय-धर्मपरायण राजर्षि अंशुमान्ने भी गंगाको यहाँ लानेकी इच्छा की; परंतु वे इस पृथ्वीपर उन्हें लानेकी प्रतिज्ञा पूरी न कर सके॥ ९-१०॥

दिलीपेन महाभाग तव पित्रातितेजसा।

पुनर्न शकिता नेतुं गंगां प्रार्थयतानघ॥ ११॥

‘निष्पाप महाभाग! तुम्हारे अत्यन्त तेजस्वी पिता दिलीप भी गंगाको यहाँ लानेकी इच्छा करके भी इस कार्यमें सफल न हो सके॥ ११॥

सा त्वया समतिक्रान्ता प्रतिज्ञा पुरुषर्षभ।

प्राप्तोऽसि परमं लोके यश: परमसम्मतम्॥ १२॥

‘पुरुषप्रवर! तुमने गंगाको भूतलपर लानेकी वह प्रतिज्ञा पूर्ण कर ली। इससे संसारमें तुम्हें परम उत्तम एवं महान् यशकी प्राप्ति हुई है॥ १२॥

तच्च गंगावतरणं त्वया कृतमरिंदम।

अनेन च भवान् प्राप्तो धर्मस्यायतनं महत्॥ १३॥

शत्रुदमन! तुमने जो गंगाजीको पृथ्वीपर उतारनेका कार्य पूरा किया है, इससे उस महान् ब्रह्मलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया है, जो धर्मका आश्रय है॥

प्लावयस्व त्वमात्मानं नरोत्तम सदोचिते।

सलिले पुरुषश्रेष्ठ शुचि: पुण्यफलो भव॥ १४॥

‘नरश्रेष्ठ! पुरुषप्रवर! गंगाजीका जल सदा ही स्नानके योग्य है। तुम स्वयं भी इसमें स्नान करो और पवित्र होकर पुण्यका फल प्राप्त करो॥ १४॥

पितामहानां सर्वेषां कुरुष्व सलिलक्रियाम्।

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि स्वं लोकं गम्यतां नृप॥ १५॥

‘नरेश्वर! तुम अपने सभी पितामहोंका तर्पण करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने लोकको जाऊँगा। तुम भी अपनी राजधानीको लौट जाओ’॥ १५॥

इत्येवमुक्त्वा देवेश: सर्वलोकपितामह:।

यथागतं तथागच्छद् देवलोकं महायशा:॥ १६॥

ऐसा कहकर सर्वलोकपितामह महायशस्वी देवेश्वर ब्रह्माजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोकको लौट गये॥ १६॥

भगीरथस्तु राजर्षि: कृत्वा सलिलमुत्तमम्।

यथाक्रमं यथान्यायं सागराणां महायशा:॥ १७॥

कृतोदक: शुची राजा स्वपुरं प्रविवेश ह।

समृद्धार्थो नरश्रेष्ठ स्वराज्यं प्रशशास ह॥ १८॥

नरश्रेष्ठ! महायशस्वी राजर्षि राजा भगीरथ भी गंगाजीके उत्तम जलसे क्रमश: सभी सगर-पुत्रोंका विधिवत् तर्पण करके पवित्र हो अपने नगरको चले गये। इस प्रकार सफलमनोरथ होकर वे अपने राज्यका शासन करने लगे॥ १७-१८॥

प्रमुमोद च लोकस्तं नृपमासाद्य राघव।

नष्टशोक: समृद्धार्थो बभूव विगतज्वर:॥ १९॥

रघुनन्दन! अपने राजाको पुन: सामने पाकर प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई। सबका शोक जाता रहा। सबके मनोरथ पूर्ण हुए और चिन्ता दूर हो गयी॥ १९॥

एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया।

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते संध्याकालोऽतिवर्तते॥ २०॥

श्रीराम! यह गंगाजीकी कथा मैंने तुम्हें विस्तारके साथ कह सुनायी। तुम्हारा कल्याण हो। अब जाओ, मंगलमय संध्यावन्दन आदिका सम्पादन करो। देखो, संध्याकाल बीता जा रहा है॥ २०॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं स्वर्ग्यमथापि च।

य: श्रावयति विप्रेषु क्षत्रियेष्वितरेषु च॥ २१॥

प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रीयन्ते दैवतानि च।

इदमाख्यानमायुष्यं गंगावतरणं शुभम्॥ २२॥

यह गंगावतरणका मंगलमय उपाख्यान आयु बढ़ानेवाला है। धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा दूसरे वर्णके लोगोंको भी यह कथा सुनाता है, उसके ऊपर देवता और पितर प्रसन्न होते हैं॥ २१-२२॥

य: शृणोति च काकुत्स्थ सर्वान् कामानवाप्नुयात्।

सर्वे पापा: प्रणश्यन्ति आयु: कीर्तिश्च वर्धते॥ २३॥

ककुत्स्थकुलभूषण! जो इसका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और आयुकी वृद्धि एवं कीर्तिका विस्तार होता है॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

 

पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:

देवताओं और दैत्योंद्वारा क्षीर-समुद्र-मन्थन, भगवान् रुद्रद्वारा हालाहल विषका पान, भगवान् विष्णुके सहयोगसे मन्दराचलका पातालसे उद्धार और उसके द्वारा मन्थन, धन्वन्तरि, अप्सरा, वारुणी, उच्चै:श्रवा, कौस्तुभ तथा अमृतकी उत्पत्ति और देवासुर-संग्राममें दैत्योंका संहार

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा राघव: सहलक्ष्मण:।

विस्मयं परमं गत्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ १॥

विश्वामित्रजीकी बातें सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे मुनिसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया।

गंगावतरणं पुण्यं सागरस्यापि पूरणम्॥ २॥

‘ब्रह्मन्! आपने गंगाजीके स्वर्गसे उतरने और समुद्रके भरनेकी यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी॥ २॥

क्षणभूतेव नौ रात्रि: संवृत्तेयं परंतप।

इमां चिन्तयतो: सर्वां निखिलेन कथां तव॥ ३॥

‘काम-क्रोधादि शत्रुओंको संताप देनेवाले महर्षे! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथापर पूर्णरूपसे विचार करते हुए हम दोनों भाइयोंकी यह रात्रि एक क्षणके समान बीत गयी है॥ ३॥

तस्य सा शर्वरी सर्वा मम सौमित्रिणा सह।

जगाम चिन्तयानस्य विश्वामित्र कथां शुभाम्॥ ४॥

‘विश्वामित्रजी! लक्ष्मणके साथ इस शुभ कथापर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है’॥ ४॥

तत: प्रभाते विमले विश्वामित्रं तपोधनम्।

उवाच राघवो वाक्यं कृताह्निकमरिंदम:॥ ५॥

तत्पश्चात् निर्मल प्रभातकाल उपस्थित होनेपर तपोधन विश्वामित्रजी जब नित्यकर्मसे निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्रजीने उनके पास जाकर कहा—॥ ५॥

गता भगवती रात्रि: श्रोतव्यं परमं श्रुतम्।

तराम सरितां श्रेष्ठां पुण्यां त्रिपथगां नदीम्॥ ६॥

‘मुने! यह पूजनीया रात्रि चली गयी। सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली। अब हमलोग सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गंगाजीके उस पार चलें॥ ६॥

नौरेषा हि सुखास्तीर्णा ऋषीणां पुण्यकर्मणाम्।

भगवन्तमिह प्राप्तं ज्ञात्वा त्वरितमागता॥ ७॥

‘सदा पुण्यकर्ममें तत्पर रहनेवाले ऋषियोंकी यह नाव उपस्थित है। इसपर सुखद आसन बिछा है। आप परमपूज्य महर्षिको यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियोंकी भेजी हुई यह नाव बड़ी तीव्र गतिसे यहाँ आयी है’॥ ७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मन:।

संतारं कारयामास सर्षिसङ्घस्य कौशिक:॥ ८॥

महात्मा रघुनन्दनका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने पहले ऋषियोंसहित श्रीराम-लक्ष्मणको पार कराया॥ ८॥

उत्तरं तीरमासाद्य सम्पूज्यर्षिगणं तत:।

गंगाकूले निविष्टास्ते विशालां ददृशु: पुरीम्॥ ९॥

तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तटपर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहनेवाले ऋषियोंका सत्कार किया। फिर सब लोग गंगाजीके किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरीकी शोभा देखने लगे॥ ९॥

ततो मुनिवरस्तूर्णं जगाम सहराघव:।

विशालां नगरीं रम्यां दिव्यां स्वर्गोपमां तदा॥ १०॥

तदनन्तर श्रीराम-लक्ष्मणको साथ ले मुनिवर विश्वामित्र तुरंत उस दिव्य एवं रमणीय नगरी विशालाकी ओर चल दिये, जो अपनी सुन्दर शोभासे स्वर्गके समान जान पड़ती थी॥ १०॥

अथ रामो महाप्राज्ञो विश्वामित्रं महामुनिम्।

पप्रच्छ प्राञ्जलिर्भूत्वा विशालामुत्तमां पुरीम्॥ ११॥

उस समय परम बुद्धिमान् श्रीरामने हाथ जोड़कर उस उत्तम विशाला पुरीके विषयमें महामुनि विश्वामित्रसे पूछा—॥ ११॥

कतमो राजवंशोऽयं विशालायां महामुने।

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते परं कौतूहलं हि मे॥ १२॥

‘महामुने! आपका कल्याण हो। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि विशालामें कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है? इसके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा है’॥ १२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामस्य मुनिपुंगव:।

आख्यातुं तत्समारेभे विशालाया: पुरातनम्॥ १३॥

श्रीरामका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने विशाला पुरीके प्राचीन इतिहासका वर्णन आरम्भ किया—॥ १३॥

श्रूयतां राम शक्रस्य कथां कथयत: श्रुताम्।

अस्मिन् देशे हि यद् वृत्तं शृणु तत्त्वेन राघव॥ १४॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मैंने इन्द्रके मुखसे विशाला- पुरीके वैभवका प्रतिपादन करनेवाली जो कथा सुनी है, उसे बता रहा हूँ, सुनो। इस देशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे यथार्थरूपसे श्रवण करो॥ १४॥

पूर्वं कृतयुगे राम दिते: पुत्रा महाबला:।

अदितेश्च महाभागा वीर्यवन्त: सुधार्मिका:॥ १५॥

‘श्रीराम! पहले सत्ययुगमें दितिके पुत्र दैत्य बड़े बलवान् थे और अदितिके परम धर्मात्मा पुत्र महाभाग देवता भी बड़े शक्तिशाली थे॥ १५॥

ततस्तेषां नरव्याघ्र बुद्धिरासीन्महात्मनाम्।

अमरा विजराश्चैव कथं स्यामो निरामया:॥ १६॥

‘पुरुषसिंह! उन महामना दैत्यों और देवताओंके मनमें यह विचार हुआ कि हम कैसे अजर-अमर और नीरोग हों?॥ १६॥

तेषां चिन्तयतां तत्र बुद्धिरासीद् विपश्चिताम्।

क्षीरोदमथनं कृत्वा रसं प्राप्स्याम तत्र वै॥ १७॥

‘इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन विचारशील देवताओं और दैत्योंकी बुद्धिमें यह बात आयी कि हमलोग यदि क्षीरसागरका मन्थन करें तो उसमें निश्चय ही अमृतमय रस प्राप्त कर लेंगे॥ १७॥

ततो निश्चित्य मथनं योक्त्रं कृत्वा च वासुकिम्।

मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुरमितौजस:॥ १८॥

‘समुद्रमन्थनका निश्चय करके उन अमिततेजस्वी देवताओं और दैत्योंने वासुकि नागको रस्सी और मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीर-सागरको मथना आरम्भ किया॥ १८॥

अथ वर्षसहस्रेण योक्त्रसर्पशिरांसि च।

वमन्तोऽतिविषं तत्र ददंशुर्दशनै: शिला:॥ १९॥

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर रस्सी बने हुए सर्पके बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए वहाँ मन्दराचलकी शिलाओंको अपने दाँतोंसे डँसने लगे॥ १९॥

उत्पपाताग्निसंकाशं हालाहलमहाविषम्।

तेन दग्धं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥ २०॥

‘अत: उस समय वहाँ अग्निके समान दाहक हालाहल नामक महाभयंकर विष ऊपरको उठा। उसने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्को दग्ध करना आरम्भ किया॥ २०॥

अथ देवा महादेवं शङ्करं शरणार्थिन:।

जग्मु: पशुपतिं रुद्रं त्राहि त्राहीति तुष्टुवु:॥ २१॥

‘यह देख देवतालोग शरणार्थी होकर सबका कल्याण करनेवाले महान् देवता पशुपति रुद्रकी शरणमें गये और त्राहि-त्राहिकी पुकार लगाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ २१॥

एवमुक्तस्ततो देवैर्देवदेवेश्वर: प्रभु:।

प्रादुरासीत् ततोऽत्रैव शङ्खचक्रधरो हरि:॥ २२॥

‘देवताओंके इस प्रकार पुकारनेपर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए। फिर वहीं शङ्ख-चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये॥ २२॥

उवाचैनं स्मितं कृत्वा रुद्रं शूलधरं हरि:।

दैवतैर्मथ्यमाने तु यत्पूर्वं समुपस्थितम्॥ २३॥

तत् त्वदीयं सुरश्रेष्ठ सुराणामग्रतो हि यत्।

अग्रपूजामिह स्थित्वा गृहाणेदं विषं प्रभो॥ २४॥

‘श्रीहरिने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्रसे मुसकराकर कहा—‘सुरश्रेष्ठ! देवताओंके समुद्रमन्थन करनेपर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओंमें अग्रगण्य हैं। प्रभो! अग्रपूजाके रूपमें प्राप्त हुए इस विषको आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें’॥ २३-२४॥

इत्युक्त्वा च सुरश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत।

देवतानां भयं दृष्ट्वा श्रुत्वा वाक्यं तु शार्ङ्गिण:॥ २५॥

हालाहलं विषं घोरं संजग्राहामृतोपमम्।

देवान् विसृज्य देवेशो जगाम भगवान् हर:॥ २६॥

‘ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओंका भय देखकर और भगवान् विष्णुकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्रने उस घोर हालाहल विषको अमृतके समान मानकर अपने कण्ठमें धारण कर लिया तथा देवताओंको विदा करके वे अपने स्थानको चले गये॥ २५-२६॥

ततो देवासुरा: सर्वे ममन्थू रघुनन्दन।

प्रविवेशाथ पातालं मन्थान: पर्वतोत्तम:॥ २७॥

‘रघुनन्दन! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीरसागरका मन्थन करने लगे। उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पातालमें घुस गया॥ २७॥

ततो देवा: सगन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्।

त्वं गति: सर्वभूतानां विशेषेण दिवौकसाम्॥ २८॥

पालयास्मान् महाबाहो गिरिमुद्धर्तुमर्हसि।

‘तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे—‘महाबाहो! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति हैं। विशेषत: देवताओंके अवलम्बन तो आप ही हैं। आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वतको उठावें’॥ २८॥

इति श्रुत्वा हृषीकेश: कामठं रूपमास्थित:॥ २९॥

पर्वतं पृष्ठत: कृत्वा शिश्ये तत्रोदधौ हरि:।

‘यह सुनकर भगवान् हृषीकेशने कच्छपका रूप धारण कर लिया और उस पर्वतको अपनी पीठपर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्रके भीतर सो गये॥ २९॥

पर्वताग्रं तु लोकात्मा हस्तेनाक्रम्य केशव:॥ ३०॥

देवानां मध्यत: स्थित्वा ममन्थ पुरुषोत्तम:।

‘फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वतशिखरको हाथसे पकड़कर देवताओंके बीचमें खड़े हो स्वयं भी समुद्रका मन्थन करने लगे॥ ३०॥

अथ वर्षसहस्रेण आयुर्वेदमय: पुमान्॥ ३१॥

उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु:।

पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चस:॥ ३२॥

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागरसे एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथमें दण्ड और दूसरेमें कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्यके बाद सागरसे सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं॥ ३१-३२॥

अप्सु निर्मथनादेव रसात् तस्माद् वरस्त्रिय:।

उत्पेतुर्मनुजश्रेष्ठ तस्मादप्सरसोऽभवन्॥ ३३॥

‘नरश्रेष्ठ! मन्थन करनेसे ही अप् (जल) में उसके रससे वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं॥ ३३॥

षष्टि: कोट्योऽभवंस्तासामप्सराणां सुवर्चसाम्।

असंख्येयास्तु काकुत्स्थ यास्तासां परिचारिका:॥ ३४॥

‘काकुत्स्थ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओंकी संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। वे सब असंख्य थीं॥ ३४॥

न ता: स्म प्रतिगृह्णन्ति सर्वे ते देवदानवा:।

अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणा: स्मृता:॥ ३५॥

‘उन अप्सराओंको समस्त देवता और दानव कोई भी अपनी ‘पत्नी’ रूपसे ग्रहण न कर सके, इसलिये वे साधारणा (सामान्या) मानी गयीं॥ ३५॥

वरुणस्य तत: कन्या वारुणी रघुनन्दन।

उत्पपात महाभागा मार्गमाणा परिग्रहम्॥ ३६॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर वरुणकी कन्या वारुणी, जो सुराकी अभिमानिनी देवी थी, प्रकट हुई और अपनेको स्वीकार करनेवाले पुरुषकी खोज करने लगी॥ ३६॥

दिते: पुत्रा न तां राम जगृहुर्वरुणात्मजाम्।

अदितेस्तु सुता वीर जगृहुस्तामनिन्दिताम्॥ ३७॥

‘वीर श्रीराम! दैत्योंने उस वरुणकन्या सुराको नहीं ग्रहण किया, परंतु अदितिके पुत्रोंने इस अनिन्द्य सुन्दरीको ग्रहण कर लिया॥ ३७॥

असुरास्तेन दैतेया: सुरास्तेनादिते: सुता:।

हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन् वारुणीग्रहणात् सुरा:॥ ३८॥

‘सुरासे रहित होनेके कारण ही दैत्य ‘असुर’ कहलाये और सुरा-सेवनके कारण ही अदितिके पुत्रोंकी ‘सुर’ संज्ञा हुई। वारुणीको ग्रहण करनेसे देवतालोग हर्षसे उत्फुल्ल एवं आनन्दमग्न हो गये॥ ३८॥

उच्चै:श्रवा हयश्रेष्ठो मणिरत्नं च कौस्तुभम्।

उदतिष्ठन्नरश्रेष्ठ तथैवामृतमुत्तमम्॥ ३९॥

‘नरश्रेष्ठ! तदनन्तर घोड़ोंमें उत्तम उच्चै:श्रवा, मणिरत्न कौस्तुभ तथा परम उत्तम अमृतका प्राकट्य हुआ॥ ३९॥

अथ तस्य कृते राम महानासीत् कुलक्षय:।

अदितेस्तु तत: पुत्रा दितिपुत्रानयोधयन्॥ ४०॥

‘श्रीराम! उस अमृतके लिये देवताओं और असुरोंके कुलका महान् संहार हुआ। अदितिके पुत्र दितिके पुत्रोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ४०॥

एकतामगमन् सर्वे असुरा राक्षसै: सह।

युद्धमासीन्महाघोरं वीर त्रैलोक्यमोहनम्॥ ४१॥

समस्त असुर राक्षसोंके साथ मिलकर एक हो गये। वीर! देवताओंके साथ उनका महाघोर संग्राम होने लगा, जो तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला था॥ ४१॥

यदा क्षयं गतं सर्वं तदा विष्णुर्महाबल:।

अमृतं सोऽहरत् तूर्णं मायामास्थाय मोहिनीम्॥ ४२॥

‘जब देवताओं और असुरोंका वह सारा समूह क्षीण हो चला, तब महाबली भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही अमृतका अपहरण कर लिया॥ ४२॥

ये गताभिमुखं विष्णुमक्षरं पुरुषोत्तमम्।

सम्पिष्टास्ते तदा युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ४३॥

‘जो दैत्य बलपूर्वक अमृत छीन लानेके लिये अविनाशी पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुके सामने गये, उन्हें प्रभावशाली भगवान् विष्णुने उस समय युद्धमें पीस डाला॥ ४३॥

अदितेरात्मजा वीरा दिते: पुत्रान् निजघ्निरे।

अस्मिन् घोरे महायुद्धे दैतेयादित्ययोर्भृशम्॥ ४४॥

‘देवताओं और दैत्योंके उस घोर महायुद्धमें अदितिके वीर पुत्रोंने दितिके पुत्रोंका विशेष संहार किया॥ ४४॥

निहत्य दितिपुत्रांस्तु राज्यं प्राप्य पुरंदर:।

शशास मुदितो लोकान् सर्षिसङ्घान् सचारणान्॥ ४५॥

‘दैत्योंका वध करनेके पश्चात् त्रिलोकीका राज्य पाकर देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और ऋषियों तथा चारणोंसहित समस्त लोकोंका शासन करने लगे’॥ ४५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥

 

षट्चत्वारिंश: सर्ग:

पुत्रवधसे दु:खी दितिका कश्यपजीसे इन्द्रहन्ता पुत्रकी प्राप्तिके उद्देश्यसे तपके लिये आज्ञा लेकर कुशप्लवमें तप करना, इन्द्रद्वारा उनकी परिचर्या तथा उन्हें अपवित्र अवस्थामें पाकर इन्द्रका उनके गर्भके सात टुकड़े कर डालना

हतेषु तेषु पुत्रेषु दिति: परमदु:खिता।

मारीचं कश्यपं नाम भर्तारमिदमब्रवीत्॥ १॥

अपने उन पुत्रोंके मारे जानेपर दितिको बड़ा दु:ख हुआ। वे अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपके पास जाकर बोलीं—॥ १॥

हतपुत्रास्मि भगवंस्तव पुत्रैर्महाबलै:।

शक्रहन्तारमिच्छामि पुत्रं दीर्घतपोर्जितम्॥ २॥

‘भगवन्! आपके महाबली पुत्र देवताओंने मेरे पुत्रोंको मार डाला; अत: मैं दीर्घकालकी तपस्यासे उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ हो॥ २॥

साहं तपश्चरिष्यामि गर्भं मे दातुमर्हसि।

ईश्वरं शक्रहन्तारं त्वमनुज्ञातुमर्हसि॥ ३॥

‘मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भमें ऐसा पुत्र प्रदान करें, जो सब कुछ करनेमें समर्थ तथा इन्द्रका वध करनेवाला हो’॥ ३॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा मारीच: कश्यपस्तदा।

प्रत्युवाच महातेजा दितिं परमदु:खिताम्॥ ४॥

उसकी यह बात सुनकर महातेजस्वी मरीचिनन्दन कश्यपने उस परम दु:खिनी दितिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ४॥

एवं भवतु भद्रं ते शुचिर्भव तपोधने।

जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शक्रहन्तारमाहवे॥ ५॥

‘तपोधने! ऐसा ही हो। तुम शौचाचारका पालन करो। तुम्हारा भला हो। तुम ऐसे पुत्रको जन्म दोगी, जो युद्धमें इन्द्रको मार सके॥ ५॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु शुचिर्यदि भविष्यसि।

पुत्रं त्रैलोक्यहन्तारं मत्तस्त्वं जनयिष्यसि॥ ६॥

‘यदि पूरे एक सहस्र वर्षतक पवित्रतापूर्वक रह सकोगी तो तुम मुझसे त्रिलोकीनाथ इन्द्रका वध करनेमें समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी’॥ ६॥

एवमुक्त्वा महातेजा: पाणिना सम्ममार्ज ताम्।

तामालभ्य तत: स्वस्ति इत्युक्त्वा तपसे ययौ॥ ७॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी कश्यपने दितिके शरीरपर हाथ फेरा। फिर उनका स्पर्श करके कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो।’ ऐसा कहकर वे तपस्याके लिये चले गये॥ ७॥

गते तस्मिन् नरश्रेष्ठ दिति: परमहर्षिता।

कुशप्लवं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥ ८॥

नरश्रेष्ठ! उनके चले जानेपर दिति अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरकर कुशप्लव नामक तपोवनमें आयीं और अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगीं॥ ८॥

तपस्तस्यां हि कुर्वत्यां परिचर्यां चकार ह।

सहस्राक्षो नरश्रेष्ठ परया गुणसम्पदा॥ ९॥

पुरुषप्रवर श्रीराम! दितिके तपस्या करते समय सहस्रलोचन इन्द्र विनय आदि उत्तम गुणसम्पत्तिसे युक्त हो उनकी सेवा-टहल करने लगे॥ ९॥

अग्निं कुशान् काष्ठमप: फलं मूलं तथैव च।

न्यवेदयत् सहस्राक्षो यच्चान्यदपि कांक्षितम्॥ १०॥

सहस्राक्ष इन्द्र अपनी मौसी दितिके लिये अग्नि, कुशा, काष्ठ, जल, फल, मूल तथा अन्यान्य अभिलषित वस्तुओंको ला-लाकर देते थे॥ १०॥

गात्रसंवाहनैश्चैव श्रमापनयनैस्तथा।

शक्र: सर्वेषु कालेषु दितिं परिचचार ह॥ ११॥

इन्द्र मौसीकी शारीरिक सेवाएँ करते, उनके पैर दबाकर उनकी थकावट मिटाते तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक सेवाओंद्वारा वे हर समय दितिकी परिचर्या करते थे॥ ११॥

पूर्णे वर्षसहस्रे सा दशोने रघुनन्दन।

दिति: परमसंहृष्टा सहस्राक्षमथाब्रवीत्॥ १२॥

रघुनन्दन! जब सहस्र वर्ष पूर्ण होनेमें कुल दस वर्ष बाकी रह गये, तब एक दिन दितिने अत्यन्त हर्षमें भरकर सहस्रलोचन इन्द्रसे कहा—॥ १२॥

तपश्चरन्त्या वर्षाणि दश वीर्यवतां वर।

अवशिष्टानि भद्रं ते भ्रातरं द्रक्ष्यसे तत:॥ १३॥

‘बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! अब मेरी तपस्याके केवल दस वर्ष और शेष रह गये हैं। तुम्हारा भला हो। दस वर्ष बाद तुम अपने होनेवाले भाईको देख सकोगे॥ १३॥

यमहं त्वत्कृते पुत्र तमाधास्ये जयोत्सुकम्।

त्रैलोक्यविजयं पुत्र सह भोक्ष्यसि विज्वर॥ १४॥

‘बेटा! मैंने तुम्हारे विनाशके लिये जिस पुत्रकी याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतनेके लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूँगी—तुम्हारे प्रति उसे वैर-भावसे रहित तथा भ्रातृ-स्नेहसे युक्त बना दूँगी। फिर तुम उसके साथ रहकर उसीके द्वारा की हुई त्रिभुवन-विजयका सुख निश्चिन्त होकर भोगना॥ १४॥

याचितेन सुरश्रेष्ठ पित्रा तव महात्मना।

वरो वर्षसहस्रान्ते मम दत्त: सुतं प्रति॥ १५॥

‘सुरश्रेष्ठ! मेरे प्रार्थना करनेपर तुम्हारे महात्मा पिताने एक हजार वर्षके बाद पुत्र होनेका मुझे वर दिया है’॥ १५॥

इत्युक्त्वा च दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे।

निद्रयापहृता देवी पादौ कृत्वाथ शीर्षत:॥ १६॥

ऐसा कहकर दिति नींदसे अचेत हो गयीं। उस समय सूर्यदेव आकाशके मध्य भागमें आ गये थे—दोपहरका समय हो गया था। देवी दिति आसनपर बैठी-बैठी झपकी लेने लगीं। सिर झुक गया और केश पैरोंसे जा लगे। इस प्रकार निद्रावस्थामें उन्होंने पैरोंको सिरसे लगा लिया॥ १६॥

दृष्ट्वा तामशुचिं शक्र: पादयो: कृतमूर्धजाम्।

शिर:स्थाने कृतौ पादौ जहास च मुमोद च॥ १७॥

उन्होंने अपने केशोंको पैरोंपर डाल रखा था। सिरको टिकानेके लिये दोनों पैरोंको ही आधार बना लिया था। यह देख दितिको अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए॥ १७॥

तस्या: शरीरविवरं प्रविवेश पुरंदर:।

गर्भं च सप्तधा राम चिच्छेद परमात्मवान्॥ १८॥

श्रीराम! फिर तो सतत सावधान रहनेवाले इन्द्र माता दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भके उन्होंने सात टुकड़े कर डाले॥ १८॥

भिद्यमानस्ततो गर्भो वज्रेण शतपर्वणा।

रुरोद सुस्वरं राम ततो दितिरबुध्यत॥ १९॥

श्रीराम! उनके द्वारा सौ पर्वोंवाले वज्रसे विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर-जोरसे रोने लगा। इससे दितिकी निद्रा टूट गयी—वे जागकर उठ बैठीं॥ १९॥

मा रुदो मा रुदश्चेति गर्भं शक्रोऽभ्यभाषत।

बिभेद च महातेजा रुदन्तमपि वासव:॥ २०॥

तब इन्द्रने उस रोते हुए गर्भसे कहा—‘भाई! मत रो, मत रो’ परंतु महातेजस्वी इन्द्रने रोते रहनेपर भी उस गर्भके टुकड़े कर ही डाले॥ २०॥

न हन्तव्यं न हन्तव्यमित्येव दितिरब्रवीत्।

निष्पपात तत: शक्रो मातुर्वचनगौरवात्॥ २१॥

उस समय दितिने कहा—‘इन्द्र! बच्चेको न मारो, न मारो।’ माताके वचनका गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदरसे निकल आये॥ २१॥

प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत।

अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयो: कृतमूर्धजा॥ २२॥

तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्तारमाहवे।

अभिन्दं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ २३॥

फिर वज्रसहित इन्द्रने हाथ जोड़कर दितिसे कहा—‘देवि! तुम्हारे सिरके बाल पैरोंसे लगे थे। इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्थामें सोयी थीं। यही छिद्र पाकर मैंने इस ‘इन्द्रहन्ता’ बालकके सात टुकड़े कर डाले हैं। इसलिये माँ! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो’॥ २२-२३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥

 

सप्तचत्वारिंश: सर्ग:

दितिका अपने पुत्रोंको मरुद्गण बनाकर देवलोकमें रखनेके लिये इन्द्रसे अनुरोध, इन्द्रद्वारा उसकी स्वीकृति, दितिके तपोवनमें ही इक्ष्वाकु-पुत्र विशालद्वारा विशाला नगरीका निर्माण तथा वहाँके तत्कालीन राजा सुमतिद्वारा विश्वामित्र मुनिका सत्कार

सप्तधा तु कृते गर्भे दिति: परमदु:खिता।

सहस्राक्षं दुराधर्षं वाक्यं सानुनयाब्रवीत्॥ १॥

इन्द्रद्वारा अपने गर्भके सात टुकड़े कर दिये जानेपर देवी दितिको बड़ा दु:ख हुआ। वे दुर्द्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्रसे अनुनयपूर्वक बोलीं—॥ १॥

ममापराधाद् गर्भोऽयं सप्तधा शकलीकृत:।

नापराधो हि देवेश तवात्र बलसूदन॥ २॥

‘देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराधसे इस गर्भके सात टुकड़े हुए हैं। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है॥ २॥

प्रियं त्वत्कृतमिच्छामि मम गर्भविपर्यये।

मरुतां सप्त सप्तानां स्थानपाला भवन्तु ते॥ ३॥

‘इस गर्भको नष्ट करनेके निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय—जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भके वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणोंके स्थानोंका पालन करनेवाले हो जायँ॥ ३॥

वातस्कन्धा इमे सप्त चरन्तु दिवि पुत्रक।

मारुता इति विख्याता दिव्यरूपा ममात्मजा:॥ ४॥

‘बेटा! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र ‘मारुत’ नामसे प्रसिद्ध होकर आकाशमें जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध38 हैं, उनमें विचरें॥ ४॥

ब्रह्मलोकं चरत्वेक इन्द्रलोकं तथापर:।

दिव्यवायुरिति ख्यातस्तृतीयोऽपि महायशा:॥ ५॥

‘(ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सात-सातके गण हैं। इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये। इनमेंसे) जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोकमें विचरे, दूसरा इन्द्रलोकमें विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायुके नामसे विख्यात हो अन्तरिक्षमें बहा करे॥ ५॥

चत्वारस्तु सुरश्रेष्ठ दिशो वै तव शासनात्।

संचरिष्यन्ति भद्रं ते कालेन हि ममात्मजा:॥ ६॥

त्वत्कृतेनैव नाम्ना वै मारुता इति विश्रुता:।

‘सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। मेरे शेष चार पुत्रोंके गण तुम्हारी आज्ञासे समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओंमें संचार करेंगे। तुम्हारे ही रखे हुए नामसे (तुमने जो ‘मा रुद:’ कहकर उन्हें रोनेसे मना किया था, उसी ‘मा रुद:’—इस वाक्यसे) वे सब-के-सब मारुत कहलायेंगे। मारुत नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी’॥ ६/

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा सहस्राक्ष: पुरंदर:॥ ७॥

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यमितीदं बलसूदन:।

दितिका वह वचन सुनकर बल दैत्यको मारनेवाले सहस्राक्ष इन्द्रने हाथ जोड़कर यह बात कही—॥ ७/

सर्वमेतद् यथोक्तं ते भविष्यति न संशय:॥ ८॥

विचरिष्यन्ति भद्रं ते देवरूपास्तवात्मजा:।

‘मा! तुम्हारा कल्याण हो। तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है। तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे’॥ ८/

एवं तौ निश्चयं कृत्वा मातापुत्रौ तपोवने॥ ९॥

जग्मतुस्त्रिदिवं राम कृतार्थाविति न: श्रुतम्।

श्रीराम! उस तपोवनमें ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता-पुत्र—दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोकको चले गये—ऐसा हमने सुन रखा है॥ ९/

एष देश: स काकुत्स्थ महेन्द्राध्युषित: पुरा॥ १०॥

दितिं यत्र तप:सिद्धामेवं परिचचार स:।

काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकालमें रहकर देवराज इन्द्रने तप:सिद्ध दितिकी परिचर्या की थी॥ १०/

इक्ष्वाकोस्तु नरव्याघ्र पुत्र: परमधार्मिक:॥ ११॥

अलम्बुषायामुत्पन्नो विशाल इति विश्रुत:।

तेन चासीदिह स्थाने विशालेति पुरी कृता॥ १२॥

पुरुषसिंह! पूर्वकालमें महाराज इक्ष्वाकुके एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नामसे प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म अलम्बुषाके गर्भसे हुआ था। उन्होंने इस स्थानपर विशाला नामकी पुरी बसायी थी॥ ११-१२॥

विशालस्य सुतो राम हेमचन्द्रो महाबल:।

सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तर:॥ १३॥

श्रीराम! विशालके पुत्रका नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे। हेमचन्द्रके पुत्र सुचन्द्र नामसे विख्यात हुए॥ १३॥

सुचन्द्रतनयो राम धूम्राश्व इति विश्रुत:।

धूम्राश्वतनयश्चापि सृञ्जय: समपद्यत॥ १४॥

श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्रके पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्वके पुत्र सृंजय हुए॥ १४॥

सृञ्जयस्य सुत: श्रीमान् सहदेव: प्रतापवान्।

कुशाश्व: सहदेवस्य पुत्र: परमधार्मिक:॥ १५॥

सृंजयके प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए। सहदेवके परम धर्मात्मा पुत्रका नाम कुशाश्व था॥ १५॥

कुशाश्वस्य महातेजा: सोमदत्त: प्रतापवान्।

सोमदत्तस्य पुत्रस्तु काकुत्स्थ इति विश्रुत:॥ १६॥

कुशाश्वके महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्तके पुत्र काकुत्स्थ नामसे विख्यात हुए॥ १६॥

तस्य पुत्रो महातेजा: सम्प्रत्येष पुरीमिमाम्।

आवसत् परमप्रख्य: सुमतिर्नाम दुर्जय:॥ १७॥

काकुत्स्थके महातेजस्वी पुत्र सुमति नामसे प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं। वे ही इस समय इस पुरीमें निवास करते हैं॥ १७॥

इक्ष्वाकोस्तु प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपा:।

दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्त: सुधार्मिका:॥ १८॥

महाराज इक्ष्वाकुके प्रसादसे विशालाके सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं॥ १८॥

इहाद्य रजनीमेकां सुखं स्वप्स्यामहे वयम्।

श्व: प्रभाते नरश्रेष्ठ जनकं द्रष्टुमर्हसि॥ १९॥

नरश्रेष्ठ! आज एक रात हमलोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रात:काल यहाँसे चलकर तुम मिथिलामें राजा जनकका दर्शन करोगे॥ १९॥

सुमतिस्तु महातेजा विश्वामित्रमुपागतम्।

श्रुत्वा नरवरश्रेष्ठ: प्रत्यागच्छन्महायशा:॥ २०॥

नरेशोंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजीको पुरीके समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानीके लिये स्वयं आये॥ २०॥

पूजां च परमां कृत्वा सोपाध्याय: सबान्धव:।

प्राञ्जलि: कुशलं पृष्ट्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ २१॥

अपने पुरोहित और बन्धु-बान्धवोंके साथ राजाने विश्वामित्रजीकी उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल-समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा—॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे विषयं मुने।

सम्प्राप्तो दर्शनं चैव नास्ति धन्यतरो मम॥ २२॥

‘मुने! मैं धन्य हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्यमें पधारकर मुझे दर्शन दिया। इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥

 

 


अष्टचत्वारिंश: सर्ग:

राजा सुमतिसे सत्कृत हो एक रात विशालामें रहकर मुनियोंसहित श्रीरामका मिथिलापुरीमें पहुँचना और वहाँ सूने आश्रमके विषयमें पूछनेपर विश्वामित्रजीका उनसे अहल्याको शाप प्राप्त होनेकी कथा सुनाना

पृष्ट्वा तु कुशलं तत्र परस्परसमागमे।

कथान्ते सुमतिर्वाक्यं व्याजहार महामुनिम्॥ १॥

वहाँ परस्पर समागमके समय एक-दूसरेका कुशल-मंगल पूछकर बातचीतके अन्तमें राजा सुमतिने महामुनि विश्वामित्रसे कहा—॥ १॥

इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ।

गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ॥ २॥

‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। ये दोनों कुमार देवताओंके तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं। इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंहकी गतिके समान है। ये दोनों वीर सिंह और साँड़के समान प्रतीत होते हैं॥ २॥

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणधनुर्धरौ।

अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ॥ ३॥

इनके बड़े-बड़े नेत्र विकसित कमलदलके समान शोभा पाते हैं। ये दोनों तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं। अपने सुन्दर रूपके द्वारा दोनों अश्विनीकुमारोंको लज्जित करते हैं तथा युवावस्थाके निकट आ पहुँचे हैं॥

यदृच्छयैव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।

कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने॥ ४॥

‘इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो दो देवकुमार दैवेच्छावश देवलोकसे पृथ्वीपर आ गये हों। मुने! ये दोनों किसके पुत्र हैं और कैसे, किसलिये यहाँ पैदल ही आये हैं?॥ ४॥

भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्।

परस्परेण सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितै:॥ ५॥

‘जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये दोनों कुमार इस देशको सुशोभित कर रहे हैं। शरीरकी ऊँचाई, मनोभावसूचक संकेत तथा चेष्टा (बोलचाल) में ये दोनों एक-दूसरेके समान हैं॥ ५॥

किमर्थं च नरश्रेष्ठौ सम्प्राप्तौ दुर्गमे पथि।

वरायुधधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥ ६॥

‘श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले ये दोनों नरश्रेष्ठ वीर इस दुर्गम मार्गमें किसलिये आये हैं? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’॥ ६॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा यथावृत्तं न्यवेदयत्।

सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं यथा।

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा राजा परमविस्मित:॥ ७॥

सुमतिका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने उन्हें सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे निवेदन किया। सिद्धाश्रममें निवास और राक्षसोंके वधका प्रसंग भी यथावत् रूपसे कह सुनाया। विश्वामित्रजीकी बात सुनकर राजा सुमतिको बड़ा विस्मय हुआ॥ ७॥

अतिथी परमं प्राप्तौ पुत्रौ दशरथस्य तौ।

पूजयामास विधिवत् सत्कारार्हौ महाबलौ॥ ८॥

उन्होंने परम आदरणीय अतिथिके रूपमें आये हुए उन दोनों महाबली दशरथ-पुत्रोंका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ८॥

तत: परमसत्कारं सुमते: प्राप्य राघवौ।

उष्य तत्र निशामेकां जग्मतुर्मिथिलां तत:॥ ९॥

सुमतिसे उत्तम आदर-सत्कार पाकर वे दोनों रघुवंशी कुमार वहाँ एक रात रहे और सबेरे उठकर मिथिलाकी ओर चल दिये॥ ९॥

तां दृष्ट्वा मुनय: सर्वे जनकस्य पुरीं शुभाम्।

साधु साध्विति शंसन्तो मिथिलां समपूजयन्॥ १०॥

मिथिलामें पहुँचकर जनकपुरीकी सुन्दर शोभा देख सभी महर्षि साधु-साधु कहकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ १०॥

मिथिलोपवने तत्र आश्रमं दृश्य राघव:।

पुराणं निर्जनं रम्यं पप्रच्छ मुनिपुंगवम्॥ ११॥

मिथिलाके उपवनमें एक पुराना आश्रम था, जो अत्यन्त रमणीय होकर भी सूनसान दिखायी देता था। उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिवर विश्वामित्रजीसे पूछा—॥ ११॥

इदमाश्रमसंकाशं किं न्विदं मुनिवर्जितम्।

श्रोतुमिच्छामि भगवन् कस्यायं पूर्व आश्रम:॥ १२॥

‘भगवन्! यह कैसा स्थान है, जो देखनेमें तो आश्रम-जैसा है; किंतु एक भी मुनि यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पहले यह आश्रम किसका था?’॥ १२॥

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं वाक्यं वाक्यविशारद:।

प्रत्युवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनि:॥ १३॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह प्रश्न सुनकर प्रवचनकुशल महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्रने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३॥

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वेन राघव।

यस्यैतदाश्रमपदं शप्तं कोपान्महात्मन:॥ १४॥

‘रघुनन्दन! पूर्वकालमें यह जिस महात्माका आश्रम था और जिन्होंने क्रोधपूर्वक इसे शाप दे दिया था, उनका तथा उनके इस आश्रमका सब वृत्तान्त तुमसे कहता हूँ। तुम यथार्थरूपसे इसको सुनो॥ १४॥

गौतमस्य नरश्रेष्ठ पूर्वमासीन्महात्मन:।

आश्रमो दिव्यसंकाश: सुरैरपि सुपूजित:॥ १५॥

‘नरश्रेष्ठ! पूर्वकालमें यह स्थान महात्मा गौतमका आश्रम था। उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य जान पड़ता था। देवता भी इसकी पूजा एवं प्रशंसा किया करते थे॥ १५॥

स चात्र तप आतिष्ठदहल्यासहित: पुरा।

वर्षपूगान्यनेकानि राजपुत्र महायश:॥ १६॥

‘महायशस्वी राजपुत्र! पूर्वकालमें महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्याके साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे। उन्होंने बहुत वर्षोंतक यहाँ तप किया था॥ १६॥

तस्यान्तरं विदित्वा च सहस्राक्ष: शचीपति:।

मुनिवेषधरो भूत्वा अहल्यामिदमब्रवीत्॥ १७॥

‘एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रमपर नहीं थे, उपयुक्त अवसर समझकर शचीपति इन्द्र गौतम मुनिका वेष धारण किये वहाँ आये और अहल्यासे इस प्रकार बोले—॥ १७॥

ऋतुकालं प्रतीक्षन्ते नार्थिन: सुसमाहिते।

संगमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे॥ १८॥

‘‘सदा सावधान रहनेवाली सुन्दरी! रतिकी इच्छा रखनेवाले प्रार्थी पुरुष ऋतुकालकी प्रतीक्षा नहीं करते हैं। सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी! मैं (इन्द्र) तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ’॥ १८॥

मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।

मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥ १९॥

‘रघुनन्दन! महर्षि गौतमका वेष धारण करके आये हुए इन्द्रको पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारीने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहलवश उनके साथ समागमका निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया॥

अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।

कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमित: प्रभो॥ २०॥

आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात्।

‘रतिके पश्चात् उसने देवराज इन्द्रसे संतुष्टचित्त होकर कहा—‘सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागमसे कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँसे चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतमके कोपसे आप अपनी और मेरी भी सब प्रकारसे रक्षा कीजिये’॥ २०/

इन्द्रस्तु प्रहसन् वाक्यमहल्यामिदमब्रवीत्॥ २१॥

सुश्रोणि परितुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथागतम्।

‘तब इन्द्रने अहल्यासे हँसते हुए कहा—‘सुन्दरी! मैं भी संतुष्ट हो गया। अब जैसे आया था, उसी तरह चला जाऊँगा’॥ २१/

एवं संगम्य तु तदा निश्चक्रामोटजात् तत:॥ २२॥

स सम्भ्रमात् त्वरन् राम शङ्कितो गौतमं प्रति।

‘श्रीराम! इस प्रकार अहल्यासे समागम करके इन्द्र जब उस कुटीसे बाहर निकले, तब गौतमके आ जानेकी आशङ्कासे बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक भागनेका प्रयत्न करने लगे॥ २२/

गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम्॥ २३॥

देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम्।

तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम्॥ २४॥

गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुंगवम्।

‘इतनेहीमें उन्होंने देखा, देवताओं और दानवोंके लिये भी दुर्धर्ष, तपोबलसम्पन्न महामुनि गौतम हाथमें समिधा लिये आश्रममें प्रवेश कर रहे हैं। उनका शरीर तीर्थके जलसे भीगा हुआ है और वे प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे हैं॥ २३-२४/

दृष्ट्वा सुरपतिस्त्रस्तो विषण्णवदनोऽभवत्॥ २५॥

अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षं मुनिवेषधरं मुनि:।

दुर्वृत्तं वृत्तसम्पन्नो रोषाद् वचनमब्रवीत्॥ २६॥

‘उनपर दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र भयसे थर्रा उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया। दुराचारी इन्द्रको मुनिका वेष धारण किये देख सदाचारसम्पन्न मुनिवर गौतमजीने रोषमें भरकर कहा—॥ २५-२६॥

मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।

अकर्तव्यमिदं यस्माद् विफलस्त्वं भविष्यसि॥ २७॥

‘‘दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करनेयोग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल (अण्डकोषोंसे रहित) हो जायगा’॥ २७॥

गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना।

पेततुर्वृषणौ भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात्॥ २८॥

‘रोषमें भरे हुए महात्मा गौतमके ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्रके दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २८॥

तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्।

इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि॥ २९॥

वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।

अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि॥ ३०॥

यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मज:।

आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि॥ ३१॥

तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।

मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि॥ ३२॥

इन्द्रको इस प्रकार शाप देकर गौतमने अपनी पत्नीको भी शाप दिया—‘दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षोंतक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राखमें पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियोंसे अदृश्य रहकर इस आश्रममें निवास करेगी। जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वनमें पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करनेसे तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी’॥ २९—३२॥

एवमुक्त्वा महातेजा गौतमो दुष्टचारिणीम्।

इममाश्रममुत्सृज्य सिद्धचारणसेविते।

हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे महातपा:॥ ३३॥

‘अपनी दुराचारिणी पत्नीसे ऐसा कहकर महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम इस आश्रमको छोड़कर चले गये और सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हिमालयके रमणीय शिखरपर रहकर तपस्या करने लगे’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

 

एकोनपञ्चाश: सर्ग:

पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़ेके अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार

अफलस्तु तत: शक्रो देवानग्निपुरोगमान्।

अब्रवीत् त्रस्तनयन: सिद्धगन्धर्वचारणान्॥ १॥

तदनन्तर इन्द्र अण्डकोषसे रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रोंमें त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणोंसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

कुर्वता तपसो विघ्नं गौतमस्य महात्मन:।

क्रोधमुत्पाद्य हि मया सुरकार्यमिदं कृतम्॥ २॥

‘देवताओ! महात्मा गौतमकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओंका कार्य ही सिद्ध किया है॥ २॥

अफलोऽस्मि कृतस्तेन क्रोधात् सा च निराकृता।

शापमोक्षेण महता तपोऽस्यापहृतं मया॥ ३॥

‘मुनिने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोषसे रहित कर दिया और अपनी पत्नीका भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्याका अपहरण हुआ है॥

तन्मां सुरवरा: सर्वे सर्षिसङ्घा: सचारणा:।

सुरकार्यकरं यूयं सफलं कर्तुमर्हथ॥ ४॥

‘(यदि मैं उनकी तपस्यामें विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओंका राज्य ही छीन लेते। अत: ऐसा करके) मैंने देवताओंका ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोषसे युक्त करनेका प्रयत्न करो’॥ ४॥

शतक्रतोर्वच: श्रुत्वा देवा: साग्निपुरोगमा:।

पितृदेवानुपेत्याहु: सर्वे सह मरुद्गणै:॥ ५॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर मरुद्गणोंसहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओंके पास जाकर बोले—॥ ५॥

अयं मेष: सवृषण: शक्रो ह्यवृषण: कृत:।

मेषस्य वृषणौ गृह्य शक्रायाशु प्रयच्छत॥ ६॥

‘पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोषसे युक्त है और इन्द्र अण्डकोषरहित कर दिये गये हैं। अत: इस भेड़ेके दोनों अण्डकोषोंको लेकर आप शीघ्र ही इन्द्रको अर्पित कर दें॥ ६॥

अफलस्तु कृतो मेष: परां तुष्टिं प्रदास्यति।

भवतां हर्षणार्थं च ये च दास्यन्ति मानवा:।

अक्षयं हि फलं तेषां यूयं दास्यथ पुष्कलम्॥ ७॥

‘अण्डकोषसे रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थानमें आपलोगोंको परम संतोष प्रदान करेगा। अत: जो मनुष्य आपलोगोंकी प्रसन्नताके लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आपलोग उस दानका उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे’॥ ७॥

अग्नेस्तु वचनं श्रुत्वा पितृदेवा: समागता:।

उत्पाट्य मेषवृषणौ सहस्राक्षे न्यवेशयन्॥ ८॥

अग्निकी यह बात सुनकर पितृदेवताओंने एकत्र हो भेड़ेके अण्डकोषोंको उखाड़कर इन्द्रके शरीरमें उचित स्थानपर जोड़ दिया॥ ८॥

तदाप्रभृति काकुत्स्थ पितृदेवा: समागता:।

अफलान् भुञ्जते मेषान् फलैस्तेषामयोजयन्॥ ९॥

ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभीसे वहाँ आये हुए समस्त पितृ-देवता अण्डकोषरहित भेड़ोंको ही उपयोगमें लाते हैं और दाताओंको उनके दानजनित फलोंके भागी बनाते हैं॥ ९॥

इन्द्रस्तु मेषवृषणस्तदाप्रभृति राघव।

गौतमस्य प्रभावेण तपसा च महात्मन:॥ १०॥

रघुनन्दन! उसी समयसे महात्मा गौतमके तपस्याजनित प्रभावसे इन्द्रको भेड़ोंके अण्डकोष धारण करने पड़े॥ १०॥

तदागच्छ महातेज आश्रमं पुण्यकर्मण:।

तारयैनां महाभागामहल्यां देवरूपिणीम्॥ ११॥

महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतमके इस आश्रमपर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्याका उद्धार करो॥ ११॥

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा राघव: सहलक्ष्मण:।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य आश्रमं प्रविवेश ह॥ १२॥

विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन महर्षिको आगे करके उस आश्रममें प्रवेश किया॥ १२॥

ददर्श च महाभागां तपसा द्योतितप्रभाम्।

लोकैरपि समागम्य दुर्निरीक्ष्यां सुरासुरै:॥ १३॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा—महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्यासे देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोकके मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे॥ १३॥

प्रयत्नान्निर्मितां धात्रा दिव्यां मायामयीमिव।

धूमेनाभिपरीतांगीं दीप्तामग्निशिखामिव॥ १४॥

सतुषारावृतां साभ्रां पूर्णचन्द्रप्रभामिव।

मध्येऽम्भसो दुराधर्षां दीप्तां सूर्यप्रभामिव॥ १५॥

उनका स्वरूप दिव्य था। विधाताने बड़े प्रयत्नसे उनके अंगोंका निर्माण किया था। वे मायामयी-सी प्रतीत होती थीं। धूमसे घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलोंसे ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जलके भीतर उद्भासित होनेवाली सूर्यकी दुर्धर्ष प्रभाके समान दृष्टिगोचर होती थीं॥ १४-१५॥

सा हि गौतमवाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह।

त्रयाणामपि लोकानां यावद् रामस्य दर्शनम्।

शापस्यान्तमुपागम्य तेषां दर्शनमागता॥ १६॥

गौतमके शापवश श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन होनेसे पहले तीनों लोकोंके किसी भी प्राणीके लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीरामका दर्शन मिल जानेसे जब उनके शापका अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं॥

राघवौ तु तदा तस्या: पादौ जगृहतुर्मुदा।

स्मरन्ती गौतमवच: प्रतिजग्राह सा हि तौ॥ १७॥

पाद्यमर्घ्यं तथाऽऽतिथ्यं चकार सुसमाहिता।

प्रतिजग्राह काकुत्स्थो विधिदृष्टेन कर्मणा॥ १८॥

उस समय श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ अहल्याके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षि गौतमके वचनोंका स्मरण करके अहल्याने बड़ी सावधानीके साथ उन दोनों भाइयोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार अहल्याका वह आतिथ्य ग्रहण किया॥ १७-१८॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनि:स्वनै:।

गन्धर्वाप्सरसां चैव महानासीत् समुत्सव:॥ १९॥

उस समय देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा॥ १९॥

साधु साध्विति देवास्तामहल्यां समपूजयन्।

तपोबलविशुद्धांगीं गौतमस्य वशानुगाम्॥ २०॥

महर्षि गौतमके अधीन रहनेवाली अहल्या अपनी तप:शक्तिसे विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुईं—यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ २०॥

गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहित: सुखी।

रामं सम्पूज्य विधिवत् तपस्तेपे महातपा:॥ २१॥

महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्याको अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीरामकी विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की॥ २१॥

रामोऽपि परमां पूजां गौतमस्य महामुने:।

सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलां तत:॥ २२॥

महामुनि गौतमकी ओरसे विधिपूर्वक उत्तम पूजा—आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजीके साथ मिथिलापुरीको चले गये॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनपञ्चाश: सर्ग:॥ ४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥

 

पञ्चाश: सर्ग:

श्रीराम आदिका मिथिला-गमन, राजा जनकद्वारा विश्वामित्रका सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मणके विषयमें जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना

तत: प्रागुत्तरां गत्वा राम: सौमित्रिणा सह।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥ १॥

तदनन्तर लक्ष्मणसहित श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके महर्षि गौतमके आश्रमसे ईशानकोणकी ओर चले और मिथिलानरेशके यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे॥ १॥

रामस्तु मुनिशार्दूलमुवाच सहलक्ष्मण:।

साध्वी यज्ञसमृद्धिर्हि जनकस्य महात्मन:॥ २॥

बहूनीह सहस्राणि नानादेशनिवासिनाम्।

ब्राह्मणानां महाभाग वेदाध्ययनशालिनाम्॥ ३॥

वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे कहा—‘महाभाग! महात्मा जनकके यज्ञका समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँ नाना देशोंके निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदोंके स्वाध्यायसे शोभा पा रहे हैं॥ २-३॥

ऋषिवाटाश्च दृश्यन्ते शकटीशतसंकुला:।

देशो विधीयतां ब्रह्मन् यत्र वत्स्यामहे वयम्॥ ४॥

‘ऋषियोंके बाड़े सैकड़ों छकड़ोंसे भरे दिखायी दे रहे हैं। ब्रह्मन्! अब ऐसा कोई स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हमलोग भी ठहरें’॥ ४॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनि:।

निवासमकरोद् देशे विविक्ते सलिलान्विते॥ ५॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्रने एकान्त स्थानमें डेरा डाला, जहाँ पानीका सुभीता था॥ ५॥

विश्वामित्रमनुप्राप्तं श्रुत्वा नृपवरस्तदा।

शतानन्दं पुरस्कृत्य पुरोहितमनिन्दित:॥ ६॥

अनिन्द्य (उत्तम) आचार-विचारवाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनकने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्दको आगे करके [अर्घ्य लिये विनीतभावसे उनका स्वागत करनेको चल दिये]॥

ऋत्विजोऽपि महात्मानस्त्वर्घ्यमादाय सत्वरम्।

प्रत्युज्जगाम सहसा विनयेन समन्वित:॥ ७॥

विश्वामित्राय धर्मेण ददौ धर्मपुरस्कृतम्।

उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज् भी शीघ्रतापूर्वक चले। राजाने विनीतभावसे सहसा आगे बढ़कर महर्षिकी अगवानी की तथा धर्मशास्त्रके अनुसार विश्वामित्रको धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया॥ ७/

प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकस्य महात्मन:॥ ८॥

पप्रच्छ कुशलं राज्ञो यज्ञस्य च निरामयम्।

महात्मा राजा जनककी वह पूजा ग्रहण करके मुनिने उनका कुशल-समाचार पूछा तथा उनके यज्ञकी निर्बाध स्थितिके विषयमें जिज्ञासा की॥ ८/

स तांश्चाथ मुनीन् पृष्ट्वा सोपाध्यायपुरोधस:॥ ९॥

यथार्हमृषिभि: सर्वै: समागच्छत् प्रहृष्टवत्।

राजाके साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल-मंगल पूछकर विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ उन सभी महर्षियोंसे यथायोग्य मिले॥ ९/

अथ राजा मुनिश्रेष्ठं कृताञ्जलिरभाषत॥ १०॥

आसने भगवानास्तां सहैभिर्मुनिपुंगवै:।

इसके बाद राजा जनकने मुनिवर विश्वामित्रसे हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! आप इन मुनीश्वरोंके साथ आसनपर विराजमान होइये’॥ १०/

जनकस्य वच: श्रुत्वा निषसाद महामुनि:॥ ११॥

पुरोधा ऋत्विजश्चैव राजा च सहमन्त्रिभि:।

आसनेषु यथान्यायमुपविष्टा: समन्तत:॥ १२॥

यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसनपर बैठ गये। फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियोंसहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनोंपर विराजमान हो गये॥

दृष्ट्वा स नृपतिस्तत्र विश्वामित्रमथाब्रवीत्।

अद्य यज्ञसमृद्धिर्मे सफला दैवतै: कृता॥ १३॥

तत्पश्चात् राजा जनकने विश्वामित्रजीकी ओर देखकर कहा—‘भगवन्! आज देवताओंने मेरे यज्ञकी आयोजना सफल कर दी॥ १३॥

अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवद्दर्शनान्मया।

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव:॥ १४॥

यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभि: सह।

‘आज पूज्य चरणोंके दर्शनसे मैंने यज्ञका फल पा लिया। ब्रह्मन्! आप मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने इतने महर्षियोंके साथ मेरे यज्ञमण्डपमें पदार्पण किया, इससे मैं धन्य हो गया। यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है॥ १४/

द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिण:॥ १५॥

ततो भागार्थिनो देवान् द्रष्टुमर्हसि कौशिक।

‘ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजोंका कहना है कि ‘मेरी यज्ञदीक्षाके बारह दिन ही शेष रह गये हैं। अत: कुशिकनन्दन! बारह दिनोंके बाद यहाँ भाग ग्रहण करनेके लिये आये हुए देवताओंका दर्शन कीजियेगा’॥

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलं प्रहृष्टवदनस्तदा॥ १६॥

पुनस्तं परिपप्रच्छ प्राञ्जलि: प्रयतो नृप:।

मुनिवर विश्वामित्रसे ऐसा कहकर उस समय प्रसन्नमुख हुए जितेन्द्रिय राजा जनकने पुन: उनसे हाथ जोड़कर पूछा—॥ १६/

इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ॥ १७॥

गजतुल्यगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ।

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ।

अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ॥ १८॥

यदृच्छयेव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ।

कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने॥ १९॥

वरायुधधरौ वीरौ कस्य पुत्रौ महामुने।

भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्॥ २०॥

परस्परस्य सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितै:।

काकपक्षधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥ २१॥

‘महामुने! आपका कल्याण हो। देवताके समान पराक्रमी और सुन्दर आयुध धारण करनेवाले ये दोनों वीर राजकुमार जो हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, सिंह और साँड़के समान जान पड़ते हैं, प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभित हैं, तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं, अपने मनोहर रूपसे अश्विनीकुमारोंको भी लज्जित कर रहे हैं, जिन्होंने अभी-अभी यौवनावस्थामें प्रवेश किया है तथा जो स्वेच्छानुसार देवलोकसे उतरकर पृथ्वीपर आये हुए दो देवताओंके समान जान पड़ते हैं, किसके पुत्र हैं? और यहाँ कैसे, किसलिये अथवा किस उद्देश्यसे पैदल ही पधारे हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये अपनी उपस्थितिसे इस देशको विभूषित कर रहे हैं। ये दोनों एक-दूसरेसे बहुत मिलते-जुलते हैं। इनके शरीरकी ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ प्राय: एक-सी हैं। मैं इन दोनों काकपक्षधारी वीरोंका परिचय एवं वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’॥ १७—२१॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा जनकस्य महात्मन:।

न्यवेदयदमेयात्मा पुत्रौ दशरथस्य तौ॥ २२॥

महात्मा जनकका यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबलसे सम्पन्न विश्वामित्रजीने कहा—‘राजन्! ये दोनों महाराज दशरथके पुत्र हैं’॥ २२॥

सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा।

तत्रागमनमव्यग्रं विशालायाश्च दर्शनम्॥ २३॥

अहल्यादर्शनं चैव गौतमेन समागमम्।

महाधनुषि जिज्ञासां कर्तुमागमनं तथा॥ २४॥

इसके बाद उन्होंने उन दोनोंके सिद्धाश्रममें निवास, राक्षसोंके वध, बिना किसी घबराहटके मिथिलातक आगमन, विशालापुरीके दर्शन, अहल्याके साक्षात्कार तथा महर्षि गौतमके साथ समागम आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। फिर अन्तमें यह भी बताया कि ‘ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुषके सम्बन्धमें कुछ जाननेकी इच्छासे यहाँतक आये हैं’॥ २३-२४॥

एतत् सर्वं महातेजा जनकाय महात्मने।

निवेद्य विररामाथ विश्वामित्रो महामुनि:॥ २५॥

महात्मा राजा जनकसे ये सब बातें निवेदन करके महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चाश: सर्ग:॥ ५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥

 

एकपञ्चाश: सर्ग:

शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमत:।

हृष्टरोमा महातेजा: शतानन्दो महातपा:॥ १॥

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीकी वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजीके शरीरमें रोमाञ्च हो आया॥ १॥

गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभ:।

रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागत:॥ २॥

वे गौतमके ज्येष्ठ पुत्र थे। तपस्यासे उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी। वे श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनमात्रसे ही बड़े विस्मित हुए॥ २॥

एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ।

सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥ ३॥

उन दोनों राजकुमारोंको सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीसे पूछा—॥ ३॥

अपि ते मुनिशार्दूल मम माता यशस्विनी।

दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता॥ ४॥

‘मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनोंसे तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीरामको उनका दर्शन कराया?॥ ४॥

अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी।

वन्यैरुपाहरत् पूजां पूजार्हे सर्वदेहिनाम्॥ ५॥

‘क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वनमें होनेवाले फल-फूल आदिसे समस्त देहधारियोंके लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजीका पूजन (आदर-सत्कार) किया था?॥ ५॥

अपि रामाय कथितं यद् वृत्तं तत् पुरातनम्।

मम मातुर्महातेजो देवेन दुरनुष्ठितम्॥ ६॥

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीरामसे वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माताके प्रति देवराज इन्द्रद्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचारद्वारा घटित हुआ था?॥

अपि कौशिक भद्रं ते गुरुणा मम संगता।

मम माता मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादित:॥ ७॥

‘मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो। क्या श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन आदिके प्रभावसे मेरी माता शापमुक्त हो पिताजीसे जा मिलीं?॥ ७॥

अपि मे गुरुणा राम: पूजित: कुशिकात्मज।

इहागतो महातेजा: पूजां प्राप्य महात्मन:॥ ८॥

‘कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिताने श्रीरामका पूजन किया था? क्या उन महात्माकी पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं?॥ ८॥

अपि शान्तेन मनसा गुरुर्मे कुशिकात्मज।

इहागतेन रामेण पूजितेनाभिवादित:॥ ९॥

‘विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता-पिताद्वारा सम्मानित हुए श्रीरामने मेरे पूज्य पिताका शान्त चित्तसे अभिवादन किया था?’॥ ९॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रो महामुनि:।

प्रत्युवाच शतानन्दं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १०॥

शतानन्दका यह प्रश्न सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्रने बातचीत करनेमें कुशल शतानन्दको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १०॥

नातिक्रान्तं मुनिश्रेष्ठ यत्कर्तव्यं कृतं मया।

संगता मुनिना पत्नी भार्गवेणेव रेणुका॥ ११॥

‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतमसे उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्निसे रेणुका मिली है’॥ ११॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमत:।

शतानन्दो महातेजा रामं वचनमब्रवीत्॥ १२॥

बुद्धिमान् विश्वामित्रकी यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्दने श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात कही—॥ १२॥

स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव।

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य महर्षिमपराजितम्॥ १३॥

‘नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्रको आगे करके यहाँतक पधारनेका कष्ट उठाया॥ १३॥

अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभ:।

विश्वामित्रो महातेजा वेद्म्येनं परमां गतिम्॥ १४॥

‘महर्षि विश्वामित्रके कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्यासे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत्के परम आश्रय (हितैषी) हैं॥ १४॥

नास्ति धन्यतरो राम त्वत्तोऽन्यो भुवि कश्चन।

गोप्ता कुशिकपुत्रस्ते येन तप्तं महत्तप:॥ १५॥

‘श्रीराम! इस पृथ्वीपर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है॥

श्रूयतां चाभिधास्यामि कौशिकस्य महात्मन:।

यथाबलं यथातत्त्वं तन्मे निगदत: शृणु॥ १६॥

‘मैं महात्मा कौशिकके बल और स्वरूपका यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये॥ १६॥

राजाऽऽसीदेष धर्मात्मा दीर्घकालमरिंदम:।

धर्मज्ञ: कृतविद्यश्च प्रजानां च हिते रत:॥ १७॥

‘ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे। इन्होंने शत्रुओंके दमनपूर्वक दीर्घकालतक राज्य किया था। ये धर्मज्ञ और विद्वान् होनेके साथ ही प्रजावर्गके हितसाधनमें तत्पर रहते थे॥ १७॥

प्रजापतिसुतस्त्वासीत् कुशो नाम महीपति:।

कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभ: सुधार्मिक:॥ १८॥

‘प्राचीनकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे प्रजापतिके पुत्र थे। कुशके बलवान् पुत्रका नाम कुशनाभ हुआ। वह बड़ा ही धर्मात्मा था॥ १८॥

कुशनाभसुतस्त्वासीद् गाधिरित्येव विश्रुत:।

गाधे: पुत्रो महातेजा विश्वामित्रो महामुनि:॥ १९॥

‘कुशनाभके पुत्र गाधि नामसे विख्यात थे। उन्हीं गाधिके महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं॥ १९॥

विश्वामित्रो महातेजा: पालयामास मेदिनीम्।

बहुवर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥ २०॥

‘महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन तथा राज्यका शासन किया॥ २०॥

कदाचित् तु महातेजा योजयित्वा वरूथिनीम्।

अक्षौहिणीपरिवृत: परिचक्राम मेदिनीम्॥ २१॥

‘एक समयकी बात है महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे॥ २१॥

नगराणि च राष्ट्राणि सरितश्च महागिरीन्।

आश्रमान् क्रमशो राजा विचरन्नाजगाम ह॥ २२॥

वसिष्ठस्याश्रमपदं नानापुष्पलताद्रुमम्।

नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम्॥ २३॥

‘वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों और आश्रमोंमें क्रमश: विचरते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे, जो नाना प्रकारके फूलों, लताओं और वृक्षोंसे शोभा पा रहा था। नाना प्रकारके मृग (वन्यपशु) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रममें निवास करते थे॥ २२-२३॥

देवदानवगन्धर्वै: किंनरैरुपशोभितम्।

प्रशान्तहरिणाकीर्णं द्विजसङ्घनिषेवितम्॥ २४॥

ब्रह्मर्षिगणसंकीर्णं देवर्षिगणसेवितम्।

‘देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढ़ाते थे। शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे। बहुत-से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंके समुदाय उसका सेवन करते थे॥ २४/

तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभि: ॥ २५॥

सततं संकुलं श्रीमद्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभि:।

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा॥ २६॥

फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियै: ।

ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणै:॥ २७॥

अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम्।

वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम्।

ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबल:॥ २८॥

‘तपस्यासे सिद्ध हुए अग्निके समान तेजस्वी महात्मा तथा ब्रह्माके समान महामहिम महात्मा सदा उस आश्रममें भरे रहते थे। उनमेंसे कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर। कितने ही महात्मा फल-मूल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे। राग आदि दोषोंको जीतकर मन और इन्द्रियोंपर काबू रखनेवाले बहुत-से ऋषि जप-होममें लगे रहते थे। वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मा सब ओरसे उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे। इन सब विशेषताओंके कारण महर्षि वसिष्ठका वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाबली विश्वामित्रने उसका दर्शन किया’॥ २५—२८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाश: सर्ग:॥ ५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥

 

द्विपञ्चाश: सर्ग:

महर्षि वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रका सत्कार और कामधेनुको अभीष्ट वस्तुओंकी सृष्टि करनेका आदेश

तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबल:।

प्रणतो विनयाद् वीरो वसिष्ठं जपतां वरम्॥ १॥

‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठका दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ १॥

स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।

आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह॥ २॥

‘तब महात्मा वसिष्ठने कहा—‘राजन्! तुम्हारा स्वागत है।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया॥ २॥

उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते।

यथान्यायं मुनिवर: फलमूलमुपाहरत्॥ ३॥

‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसनपर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठने उन्हें विधिपूर्वक फल-मूलका उपहार अर्पित किया॥ ३॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तम:।

तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत॥ ४॥

विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा।

सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम्॥ ५॥

‘वसिष्ठजीसे वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्रने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदिका कुशल-समाचार पूछा। फिर वसिष्ठजीने उन नृपश्रेष्ठसे सबके सकुशल होनेकी बात बतायी॥ ४-५॥

सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपा:।

पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मण: सुत:॥ ६॥

‘फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा—॥ ६॥

कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन्।

प्रजा: पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक॥ ७॥

‘राजन्! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजाको प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीतिसे प्रजावर्गका पालन करते हो?॥ ७॥

कच्चित्ते सम्भृता भृत्या: कच्चित् तिष्ठन्ति शासने।

कच्चित्ते विजिता: सर्वे रिपवो रिपुसूदन॥ ८॥

‘शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्योंका अच्छी तरह भरण-पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओंपर विजय पा ली है?॥

कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु च परंतप।

कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ॥ ९॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्र-पौत्र आदि सब सकुशल हैं?’॥ ९॥

सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत्।

विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम्॥ १०॥

‘तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने विनयशील महर्षि वसिष्ठको उत्तर दिया—‘हाँ भगवन्! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है?’॥ १०॥

कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ता: कथास्तदा।

मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम्॥ ११॥

‘तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे। उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया॥ ११॥

ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन।

विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव॥ १२॥

‘रघुनन्दन! बातचीत करनेके पश्चात् भगवान् वसिष्ठने विश्वामित्रसे हँसते हुए-से इस प्रकार कहा—॥ १२॥

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल।

तव चैवाप्रमेयस्य यथार्हं सम्प्रतीच्छ मे॥ १३॥

‘महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है। मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेनाका यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ। तुम मेरे इस अनुरोधको स्वीकार करो॥ १३॥

सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम्।

राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठ: पूजनीय: प्रयत्नत:॥ १४॥

‘राजन्! तुम अतिथियोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है। अत: मेरे द्वारा किये गये इस सत्कारको तुम ग्रहण करो’॥ १४॥

एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामति:।

कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया॥ १५॥

‘वसिष्ठके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्रने कहा—‘मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनोंसे ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया॥ १५॥

फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे।

पाद्येनाचमनीयेन भगवद्दर्शनेन च॥ १६॥

‘भगवन्! आपके आश्रमपर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओंसे मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ है। सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसीसे मेरी पूजा हो गयी॥ १६॥

सर्वथा च महाप्राज्ञ पूजार्हेण सुपूजित:।

नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥ १७॥

‘महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया। आपको नमस्कार है। अब मैं यहाँसे जाऊँगा। आप मैत्रीपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखिये’॥ १७॥

एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठं पुनरेव हि।

न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुन: पुनरुदारधी:॥ १८॥

ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्रसे उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठने निमन्त्रण स्वीकार करनेके लिये बारम्बार आग्रह किया॥ १८॥

बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच ह।

यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुंगव॥ १९॥

तब गाधिनन्दन विश्वामित्रने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—‘बहुत अच्छा। मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है। मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं। आपकी जैसी रुचि हो—आपको जो प्रिय लगे, वही हो’॥ १९॥

एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वर:।

आजुहाव तत: प्रीत: कल्माषीं धूतकल्मषाम्॥ २०॥

‘राजाके ऐसा कहनेपर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनुको बुलाया, जिसके पाप (अथवा मैल) धुल गये थे(वह कामधेनु थी)॥ २०॥

एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम।

सबलस्यास्य राजर्षे: कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम्।

भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे॥ २१॥

‘(उसे बुलाकर ऋषिने कहा—) शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षिका महाराजाओंके योग्य उत्तम भोजन आदिके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करनेका निश्चय किया है। तुम मेरे इस मनोरथको सफल करो॥ २१॥

यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम्।

तत् सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम॥ २२॥

‘षड्रस भोजनोंमेंसे जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो। दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहनेसे इन अतिथियोंके लिये अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करो॥ २२॥

रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम्।

अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर॥ २३॥

‘शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य (चटनी आदि) और चोष्य (चूसनेकी वस्तु) से युक्त भाँति-भाँतिके अन्नोंकी ढेरी लगा दो। सभी आवश्यक वस्तुओंकी सृष्टि कर दो। शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे’॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग:॥ ५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

 

त्रिपञ्चाश: सर्ग:

कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न-पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना और उनका देनेसे अस्वीकार करना

एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन।

विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा॥ १॥

‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर चितकबरे रंगकी उस कामधेनुने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥ १॥

इक्षून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्।

पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि॥ २॥

‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥ २॥

उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशय: पर्वतोपमा:।

मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च॥ ३॥

‘गरम-गरम भातके पर्वतके सदृश ढेर लग गये। मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥ ३॥

नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च।

भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रश:॥ ४॥

‘भाँति-भाँतिके सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकारके भोजनोंसे भरी हुई चाँदीकी सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥ ४॥

सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम्।

विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम्॥ ५॥

‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठने विश्वामित्रजीकी सारी सेनाके लोगोंको भलीभाँति तृप्त किया। उस सेनामें बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥ ५॥

विश्वामित्रो हि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत्।

सान्त:पुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहित:॥ ६॥

‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्त:पुरकी रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितोंके साथ बहुत ही हृष्ट-पुष्ट हो गये॥ ६॥

सामात्यो मन्त्रिसहित: सभृत्य: पूजितस्तदा।

युक्त: परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥ ७॥

‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोले—

पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजार्हेण सुसत्कृत:।

श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद॥ ८॥

‘ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। बातचीत करनेमें कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥ ८॥

गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम।

रत्नं हि भगवन्नेतद् रत्नहारी च पार्थिव:॥ ९॥

तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज।

‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेनेका अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन्! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मत: मेरी ही वस्तु है’॥ ९/

एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगव:॥ १०॥

विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम्।

‘विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजाको उत्तर देते हुए बोले—॥ १०/

नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम्॥ ११॥

राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा।

न परित्यागमर्हेयं मत्सकाशादरिंदम॥ १२॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदीके ढेर लेकर भी बदलेमें इस शबला गौको नहीं दूँगा। यह मेरे पाससे अलग होने योग्य नहीं है॥ १२॥

शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा।

अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च॥ १३॥

‘जैसे मनस्वी पुरुषकी अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखनेवाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसीपर निर्भर है॥ १३॥

आयत्तमग्निहोत्रं च बलिर्होमस्तथैव च।

स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा॥ १४॥

‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँतिकी विद्याएँ इस कामधेनुके ही अधीन हैं॥ १४॥

आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशय:।

सर्वस्वमेतत् सत्येन मम तुष्टिकरी तथा॥ १५॥

कारणैर्बहुभी राजन् न दास्ये शबलां तव।

‘राजर्षे! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है। मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकारसे संतुष्ट करनेवाली है। राजन्! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’॥ १५/

वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा॥ १६॥

संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारद:।

‘वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६/

हैरण्यकक्षग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान्॥ १७॥

ददामि कुञ्जराणां ते सहस्राणि चतुर्दश।

‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसनेवाले रस्से, गलेके आभूषण और अंकुश भी सोनेके बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥ १७/

हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम्॥ १८॥

ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान्।

हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम्।

सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत॥ १९॥

नानावर्णविभक्तानां वय:स्थानां तथैव च।

ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम॥ २०॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभाके लिये सोनेके घुँघुरू लगे होंगे और हर एक रथमें चार-चार सफेद रंगके घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देशमें उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवामें अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकारके रंगवाली नयी अवस्थाकी एक करोड़ गौएँ भी दूँगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥ १८—२०॥

यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम।

तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम॥ २१॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’॥ २१॥

एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता।

न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर भगवान् वसिष्ठ बोले—‘राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूँगा॥ २२॥

एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम्।

एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम्॥ २३॥

‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥ २३॥

दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणा:।

एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा॥ २४॥

‘राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँतिके पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसीपर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥ २४॥

अतोमूला: क्रिया: सर्वा मम राजन् न संशय:।

बहुना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम्॥ २५॥

‘नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मोंका मूल यही है, इसमें संशय नहीं है। बहुत व्यर्थ बात करनेसे क्या लाभ। मैं इस कामधेनुको कदापि नहीं दूँगा’॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाश: सर्ग:॥ ५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

 

चतु:पञ्चाश: सर्ग:

विश्वामित्रका वसिष्ठजीकी गौको बलपूर्वक ले जाना, गौका दु:खी होकर वसिष्ठजीसे इसका कारण पूछना और उनकी आज्ञासे शक, यवन, पह्लव आदि वीरोंकी सृष्टि करके उनके द्वारा विश्वामित्रजीकी सेनाका संहार करना

कामधेनुं वसिष्ठोऽपि यदा न त्यजते मुनि:।

तदास्य शबलां राम विश्वामित्रोऽन्वकर्षत॥ १॥

‘श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देनेके लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंगकी धेनुको बलपूर्वक घसीट ले चले॥ १॥

नीयमाना तु शबला राम राज्ञा महात्मना।

दु:खिता चिन्तयामास रुदन्ती शोककर्शिता॥ २॥

‘रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्रके द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन-ही-मन रो पड़ी और अत्यन्त दु:खित हो विचार करने लगी—॥ २॥

परित्यक्ता वसिष्ठेन किमहं सुमहात्मना।

याहं राजभृतैर्दीना ह्र‌ियेय भृशदु:खिता॥ ३॥

‘अहो! क्या महात्मा वसिष्ठने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजाके सिपाही मुझ दीन और अत्यन्त दु:खिया गौको इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं?॥ ३॥

किं मयापकृतं तस्य महर्षेर्भावितात्मन:।

यन्मामनागसं दृष्ट्वा भक्तां त्यजति धार्मिक:॥ ४॥

‘पवित्र अन्त:करणवाले उन महर्षिका मैंने क्या अपराध किया है कि वे धर्मात्मा मुनि मुझे निरपराध और अपना भक्त जानकर भी त्याग रहे हैं?’॥ ४॥

इति संचिन्तयित्वा तु नि:श्वस्य च पुन: पुन:।

जगाम वेगेन तदा वसिष्ठं परमौजसम्॥ ५॥

निर्धूय तांस्तदा भृत्यान् शतश: शत्रुसूदन।

‘शत्रुसूदन! यह सोचकर वह गौ बारम्बार लंबी साँस लेने लगी और राजाके उन सैकड़ों सेवकोंको झटककर उस समय महातेजस्वी वसिष्ठ मुनिके पास बड़े वेगसे जा पहुँची॥ ५॥

जगामानिलवेगेन पादमूलं महात्मन:॥ ६॥

शबला सा रुदन्ती च क्रोशन्ती चेदमब्रवीत्।

वसिष्ठस्याग्रत: स्थित्वा रुदन्ती मेघनि:स्वना॥ ७॥

‘वह शबला गौ वायुके समान वेगसे उन महात्माके चरणोंके समीप गयी और उनके सामने खड़ी हो मेघके समान गम्भीर स्वरसे रोती-चीत्कार करती हुई उनसे इस प्रकार बोली—॥ ६-७॥

भगवन् किं परित्यक्ता त्वयाहं ब्रह्मण: सुत।

यस्माद् राजभटा मां हि नयन्ते त्वत्सकाशत:॥ ८॥

‘भगवन्! ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ये राजाके सैनिक मुझे आपके पाससे दूर लिये जा रहे हैं?’॥ ८॥

एवमुक्तस्तु ब्रह्मर्षिरिदं वचनमब्रवीत्।

शोकसंतप्तहृदयां स्वसारमिव दु:खिताम्॥ ९॥

‘उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ शोकसे संतप्त हृदयवाली दु:खिया बहिनके समान उस गौसे इस प्रकार बोले—॥ ९॥

न त्वां त्यजामि शबले नापि मेऽपकृतं त्वया।

एष त्वां नयते राजा बलान्मत्तो महाबल:॥ १०॥

‘शबले! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। ये महाबली राजा अपने बलसे मतवाले होकर तुमको मुझसे छीनकर ले जा रहे हैं॥ १०॥

नहि तुल्यं बलं मह्यं राजा त्वद्य विशेषत:।

बली राजा क्षत्रियश्च पृथिव्या: पतिरेव च॥ ११॥

‘मेरा बल इनके समान नहीं है। विशेषत: आजकल ये राजाके पदपर प्रतिष्ठित हैं। राजा, क्षत्रिय तथा इस पृथ्वीके पालक होनेके कारण ये बलवान् हैं॥ ११॥

इयमक्षौहिणी पूर्णा गजवाजिरथाकुला।

हस्तिध्वजसमाकीर्णा तेनासौ बलवत्तर:॥ १२॥

‘इनके पास हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई यह अक्षौहिणी सेना है, जिसमें हाथियोंके हौदोंपर लगे हुए ध्वज सब ओर फहरा रहे हैं। इस सेनाके कारण भी ये मुझसे प्रबल हैं’॥ १२॥

एवमुक्ता वसिष्ठेन प्रत्युवाच विनीतवत्।

वचनं वचनज्ञा सा ब्रह्मर्षिमतुलप्रभम्॥ १३॥

‘वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाली उस कामधेनुने उन अनुपम तेजस्वी ब्रह्मर्षिसे यह विनययुक्त बात कही—॥ १३॥

न बलं क्षत्रियस्याहुर्ब्राह्मणा बलवत्तरा:।

ब्रह्मन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षात्राच्च बलवत्तरम्॥ १४॥

‘‘ब्रह्मन्! क्षत्रियका बल कोई बल नहीं है। ब्राह्मण ही क्षत्रिय आदिसे अधिक बलवान् होते हैं। ब्राह्मणका बल दिव्य है। वह क्षत्रिय-बलसे अधिक प्रबल होता है॥

अप्रमेयं बलं तुभ्यं न त्वया बलवत्तर:।

विश्वामित्रो महावीर्यस्तेजस्तव दुरासदम्॥ १५॥

‘‘आपका बल अप्रमेय है। महापराक्रमी विश्वामित्र आपसे अधिक बलवान् नहीं हैं। आपका तेज दुर्धर्ष है॥ १५॥

नियुङ्क्ष्व मां महातेजस्त्वं ब्रह्मबलसम्भृताम्।

तस्य दर्पं बलं यत्नं नाशयामि दुरात्मन:॥ १६॥

‘‘महातेजस्वी महर्षे! मैं आपके ब्रह्मबलसे परिपुष्ट हुई हूँ। अत: आप केवल मुझे आज्ञा दे दीजिये। मैं इस दुरात्मा राजाके बल, प्रयत्न और अभिमानको अभी चूर्ण किये देती हूँ’॥ १६॥

इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशा:।

सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम्॥ १७॥

‘श्रीराम! कामधेनुके ऐसा कहनेपर महायशस्वी वसिष्ठने कहा—‘इस शत्रु-सेनाको नष्ट करनेवाले सैनिकोंकी सृष्टि करो’॥ १७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभि: सासृजत् तदा।

तस्या हुंभारवोत्सृष्टा: पह्लवा: शतशो नृप॥ १८॥

‘राजकुमार! उनका वह आदेश सुनकर उस गौने उस समय वैसा ही किया। उसके हुंकार करते ही सैकड़ों पह्लव जातिके वीर पैदा हो गये॥ १८॥

नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यत:।

स राजा परमक्रुद्ध: क्रोधविस्फारितेक्षण:॥ १९॥

‘वे सब विश्वामित्रके देखते-देखते उनकी सारी सेनाका नाश करने लगे। इससे राजा विश्वामित्रको बड़ा क्रोध हुआ। वे रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे॥ १९॥

पह्लवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि।

विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पह्लवान् शतशस्तदा॥ २०॥

भूय एवासृजद् घोरान् शकान् यवनमिश्रितान्।

तैरासीत् संवृता भूमि: शकैर्यवनमिश्रितै:॥ २१॥

‘उन्होंने छोटे-बड़े कई तरहके अस्त्रोंका प्रयोग करके उन पह्लवोंका संहार कर डाला। विश्वामित्रद्वारा उन सैकड़ों पह्लवोंको पीडि़त एवं नष्ट हुआ देख उस समय उस शबला गौने पुन: यवनमिश्रित शक जातिके भयंकर वीरोंको उत्पन्न किया। उन यवनमिश्रित शकोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी भर गयी॥ २०-२१॥

प्रभावद्भिर्महावीर्यैर्हेमकिंजल्कसंनिभै: ।

तीक्ष्णासिपट्टिशधरैर्हेमवर्णाम्बरावृतै: ॥ २२॥

निर्दग्धं तद्बलं सर्वं प्रदीप्तैरिव पावकै:।

ततोऽस्त्राणि महातेजा विश्वामित्रो मुमोच ह।

तैस्ते यवनकाम्बोजा बर्बराश्चाकुलीकृता:॥ २३॥

‘वे वीर महापराक्रमी और तेजस्वी थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्ण तथा केसरके समान थी। वे सुनहरे वस्त्रोंसे अपने शरीरको ढँके हुए थे। उन्होंने हाथोंमें तीखे खड्ग और पट्टिश ले रखे थे। प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित होनेवाले उन वीरोंने विश्वामित्रकी सारी सेनाको भस्म करना आरम्भ किया। तब महातेजस्वी विश्वामित्रने उनपर बहुत-से अस्त्र छोड़े। उन अस्त्रोंकी चोट खाकर वे यवन, काम्बोज और बर्बर जातिके योद्धा व्याकुल हो उठे’॥ २२-२३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतु:पञ्चाश: सर्ग:॥ ५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥

 

पञ्चपञ्चाश: सर्ग:

अपने सौ पुत्रों और सारी सेनाके नष्ट हो जानेपर विश्वामित्रका तपस्या करके महादेवजीसे दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठके आश्रमपर प्रयोग करना एवं वसिष्ठजीका ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना

ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान्।

वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगत:॥ १॥

‘विश्वामित्रके अस्त्रोंसे घायल होकर उन्हें व्याकुल हुआ देख वसिष्ठजीने फिर आज्ञा दी—‘कामधेनो! अब योगबलसे दूसरे सैनिकोंकी सृष्टि करो’॥ १॥

तस्या हुंकारतो जाता: काम्बोजा रविसंनिभा:।

ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बरा: शस्त्रपाणय:॥ २॥

‘तब उस गौने फिर हुंकार किया। उसके हुंकारसे सूर्यके समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए। थनसे शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए॥ २॥

योनिदेशाच्च यवना: शकृद्देशाच्छका: स्मृता:।

रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीता: सकिरातका:॥ ३॥

‘योनिदेशसे यवन और शकृद्देश (गोबरके स्थान) से शक उत्पन्न हुए। रोमकूपोंसे म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए॥ ३॥

तैस्तन्निषूदितं सर्वं विश्वामित्रस्य तत्क्षणात्।

सपदातिगजं साश्वं सरथं रघुनन्दन॥ ४॥

‘रघुनन्दन! उन सब वीरोंने पैदल, हाथी, घोड़े और रथसहित विश्वामित्रकी सारी सेनाका तत्काल संहार कर डाला॥ ४॥

दृष्ट्वा निषूदितं सैन्यं वसिष्ठेन महात्मना।

विश्वामित्रसुतानां तु शतं नानाविधायुधम्॥ ५॥

अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धं वसिष्ठं जपतां वरम्।

हुंकारेणैव तान् सर्वान् निर्ददाह महानृषि:॥ ६॥

‘महात्मा वसिष्ठद्वारा अपनी सेनाका संहार हुआ देख विश्वामित्रके सौ पुत्र अत्यन्त क्रोधमें भर गये और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठमुनिपर टूट पड़े। तब उन महर्षिने हुंकारमात्रसे उन सबको जलाकर भस्म कर डाला॥ ५-६॥

ते साश्वरथपादाता वसिष्ठेन महात्मना।

भस्मीकृता मुहूर्तेन विश्वामित्रसुतास्तथा॥ ७॥

‘महात्मा वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रके वे सभी पुत्र दो ही घड़ीमें घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसहित जलाकर भस्म कर डाले गये॥ ७॥

दृष्ट्वा विनाशितान् सर्वान् बलं च सुमहायशा:।

सव्रीडं चिन्तयाविष्टो विश्वामित्रोऽभवत् तदा॥ ८॥

‘अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेनाका विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ८॥

समुद्र इव निर्वेगो भग्नद्रंष्ट्र इवोरग:।

उपरक्त इवादित्य: सद्यो निष्प्रभतां गत:॥ ९॥

‘समुद्रके समान उनका सारा वेग शान्त हो गया। जिसके दाँत तोड़ लिये गये हों उस सर्पके समान तथा राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति वे तत्काल ही निस्तेज हो गये॥

हतपुत्रबलो दीनो लूनपक्ष इव द्विज:।

हतसर्वबलोत्साहो निर्वेदं समपद्यत॥ १०॥

‘पुत्र और सेना दोनोंके मारे जानेसे वे पंख कटे हुए पक्षीके समान दीन हो गये। उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया। वे मन-ही-मन बहुत खिन्न हो उठे॥ १०॥

स पुत्रमेकं राज्याय पालयेति नियुज्य च।

पृथिवीं क्षत्रधर्मेण वनमेवाभ्यपद्यत॥ ११॥

‘उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजाके पदपर अभिषिक्त करके राज्यकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय-धर्मके अनुसार पृथ्वीके पालनकी आज्ञा देकर वे वनमें चले गये॥ ११॥

स गत्वा हिमवत्पार्श्वे किंनरोरगसेवितम्।

महादेवप्रसादार्थं तपस्तेपे महातपा:॥ १२॥

‘हिमालयके पार्श्वभागमें, जो किन्नरों और नागोंसे सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये महान् तपस्याका आश्रय ले वे तपमें ही संलग्न हो गये॥ १२॥

केनचित् त्वथ कालेन देवेशो वृषभध्वज:।

दर्शयामास वरदो विश्वामित्रं महामुनिम्॥ १३॥

‘कुछ कालके पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने महामुनि विश्वामित्रको दर्शन दिया और कहा—॥ १३॥

किमर्थं तप्यसे राजन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम्।

वरदोऽस्मि वरो यस्ते कांक्षित: सोऽभिधीयताम्॥ १४॥

‘‘राजन्! किसलिये तप करते हो? बताओ क्या कहना चाहते हो? मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो’॥ १४॥

एवमुक्तस्तु देवेन विश्वामित्रो महातपा:।

प्रणिपत्य महादेवं विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्॥ १५॥

‘महादेवजीके ऐसा कहनेपर महातपस्वी विश्वामित्रने उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ १५॥

यदि तुष्टो महादेव धनुर्वेदो ममानघ।

सांगोपांगोपनिषद: सरहस्य: प्रदीयताम्॥ १६॥

‘‘निष्पाप महादेव! यदि आप संतुष्ट हों तो अंग, उपांग, उपनिषद् और रहस्योंसहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये॥

यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु।

गन्धर्वयक्षरक्ष:सु प्रतिभान्तु ममानघ॥ १७॥

तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम्।

‘‘अनघ! देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वों, यक्षों तथा राक्षसोंके पास जो-जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपासे मेरे हृदयमें स्फुरित हो जायँ। देवदेव! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये’॥ १७॥

एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा॥ १८॥

प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबल:।

दर्पेण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा॥ १९॥

‘तब ‘एवमस्तु’ कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहाँसे चले गये। देवेश्वर महादेवसे वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्रको बड़ा घमंड हो गया। वे अभिमानमें भर गये॥ १८-१९॥

विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि।

हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥ २०॥

‘जैसे पूर्णिमाको समुद्र बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वे पराक्रमद्वारा अपनेको बहुत बढ़ा-चढ़ा मानने लगे। श्रीराम! उन्होंने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको उस समय मरा हुआ ही समझा॥ २०॥

ततो गत्वाऽऽश्रमपदं मुमोचास्त्राणि पार्थिव:।

यैस्तत् तपोवनं नाम निर्दग्धं चास्त्रतेजसा॥ २१॥

फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र वसिष्ठके आश्रमपर जाकर भाँति-भाँतिके अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे। जिनके तेजसे वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा॥ २१॥

उदीर्यमाणमस्त्रं तद् विश्वामित्रस्य धीमत:।

दृष्ट्वा विप्रद्रुता भीता मुनय: शतशो दिश:॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्रके उस बढ़ते हुए अस्त्र-तेजको देखकर वहाँ रहनेवाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले॥ २२॥

वसिष्ठस्य च ये शिष्या ये च वै मृगपक्षिण:।

विद्रवन्ति भयाद् भीता नानादिग्भ्य: सहस्रश:॥ २३॥

‘वसिष्ठजीके जो शिष्य थे, जो वहाँके पशु और पक्षी थे, वे सहस्रों प्राणी भयभीत हो नाना दिशाओंकी ओर भाग गये॥ २३॥

वसिष्ठस्याश्रमपदं शून्यमासीन्महात्मन:।

मुहूर्तमिव नि:शब्दमासीदीरिणसंनिभम्॥ २४॥

‘महात्मा वसिष्ठका वह आश्रम सूना हो गया। दो ही घड़ीमें ऊसर भूमिके समान उस स्थानपर सन्नाटा छा गया॥ २४॥

वदतो वै वसिष्ठस्य मा भैरिति मुहुर्मुहु:।

नाशयाम्यद्य गाधेयं नीहारमिव भास्कर:॥ २५॥

‘वसिष्ठजी बार-बार कहने लगे—‘डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्रको नष्ट किये देता हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासेको मिटा देता है’॥ २५॥

एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो जपतां वर:।

विश्वामित्रं तदा वाक्यं सरोषमिदमब्रवीत्॥ २६॥

‘जपनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठ ऐसा कहकर उस समय विश्वामित्रजीसे रोषपूर्वक बोले—

आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि।

दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि॥ २७॥

‘‘अरे! तूने चिरकालसे पाले-पोसे तथा हरे-भरे किये हुए इस आश्रमको नष्ट कर दिया—उजाड़ डाला, इसलिये तू दुराचारी और विवेकशून्य है और इस पापके कारण तू कुशलसे नहीं रह सकता’॥ २७॥

इत्युक्त्वा परमक्रुद्धो दण्डमुद्यम्य सत्वर:।

विधूम इव कालाग्निर्यमदण्डमिवापरम्॥ २८॥

‘ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूमरहित कालाग्निके समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्डके समान भयंकर डंडा हाथमें उठाकर तुरंत उनका सामना करनेके लिये तैयार हो गये’॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चपञ्चाश: सर्ग:॥ ५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥

 


षट्पञ्चाश: सर्ग:

विश्वामित्रद्वारा वसिष्ठजीपर नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग और वसिष्ठद्वारा ब्रह्मदण्डसे ही उनका शमन एवं विश्वामित्रका ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिके लिये तप करनेका निश्चय

एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबल:।

आग्नेयमस्त्रमुद्दिश्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्॥ १॥

वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर महाबली विश्वामित्र आग्नेयास्त्र लेकर बोले—‘अरे खड़ा रह, खड़ा रह’॥ १॥

ब्रह्मदण्डं समुद्यम्य कालदण्डमिवापरम्।

वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्॥ २॥

उस समय द्वितीय कालदण्डके समान ब्रह्मदण्डको उठाकर भगवान् वसिष्ठने क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा— २॥

क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय।

नाशयाम्यद्य ते दर्पं शस्त्रस्य तव गाधिज॥ ३॥

‘क्षत्रियाधम! ले, यह मैं खड़ा हूँ। तेरे पास जो बल हो, उसे दिखा। गाधिपुत्र! आज तेरे अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानका घमंड मैं अभी धूलमें मिला दूँगा॥ ३॥

क्व च ते क्षत्रियबलं क्व च ब्रह्मबलं महत्।

पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन॥ ४॥

‘क्षत्रियकुलकलङ्क! कहाँ तेरा क्षात्रबल और कहाँ महान् ब्रह्मबल। मेरे दिव्य ब्रह्मबलको देख ले’॥ ४॥

तस्यास्त्रं गाधिपुत्रस्य घोरमाग्नेयमुत्तमम्।

ब्रह्मदण्डेन तच्छान्तमग्नेर्वेग इवाम्भसा॥ ५॥

गाधिपुत्र विश्वामित्रका वह उत्तम एवं भयंकर आग्नेयास्त्र वसिष्ठजीके ब्रह्मदण्डसे उसी प्रकार शान्त हो गया, जैसे पानी पड़नेसे जलती हुई आगका वेग॥ ५॥

वारुणं चैव रौद्रं च ऐन्द्रं पाशुपतं तथा।

ऐषीकं चापि चिक्षेप कुपितो गाधिनन्दन:॥ ६॥

तब गाधिपुत्र विश्वामित्रने कुपित होकर वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत और ऐषीक नामक अस्त्रोंका प्रयोग किया॥

मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा।

जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने॥ ७ ॥

शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम्।

ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव च॥ ८॥

पिनाकमस्त्रं दयितं शुष्कार्द्रे अशनी तथा।

दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च॥ ९ ॥

धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव च।

वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा॥ १०॥

शक्तिद्वयं च चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा।

वैद्याधरं महास्त्रं च कालास्त्रमथ दारुणम्॥ ११॥

त्रिशूलमस्त्रं घोरं च कापालमथ कङ्कणम्।

एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन॥ १२॥

रघुनन्दन! उसके पश्चात् क्रमश: मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, विदारण, सुदुर्जय वज्रास्त्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वारुणपाश, परमप्रिय पिनाकास्त्र, सूखी-गीली दो प्रकारकी अशनि, दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र, क्रौञ्चास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मन्थनास्त्र, हयशिरा, दो प्रकारकी शक्ति, कङ्काल, मूसल, महान् वैद्याधरास्त्र, दारुण कालास्त्र, भयंकर त्रिशूलास्त्र, कापालास्त्र और कङ्कणास्त्र—ये सभी अस्त्र उन्होंने वसिष्ठजीके ऊपर चलाये॥ ७—१२॥

वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत्।

तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मण: सुत:॥ १३॥

जपनेवालोंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठपर इतने अस्त्रोंका प्रहार वह एक अद्भुत-सी घटना थी, परंतु ब्रह्माके पुत्र वसिष्ठजीने उन सभी अस्त्रोंको केवल अपने डंडेसे ही नष्ट कर दिया॥ १३॥

तेषु शान्तेषु ब्रह्मास्त्रं क्षिप्तवान् गाधिनन्दन:।

तदस्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा देवा: साग्निपुरोगमा:॥ १४॥

देवर्षयश्च सम्भ्रान्ता गन्धर्वा: समहोरगा:।

त्रैलोक्यमासीत् संत्रस्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते॥ १५॥

उन सब अस्त्रोंके शान्त हो जानेपर गाधिनन्दन विश्वामित्रने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया। ब्रह्मास्त्रको उद्यत देख अग्नि आदि देवता, देवर्षि, गन्धर्व और बड़े-बड़े नाग भी दहल गये। ब्रह्मास्त्रके ऊपर उठते ही तीनों लोकोंके प्राणी थर्रा उठे॥ १४-१५॥

तदप्यस्त्रं महाघोरं ब्राह्मं ब्राह्मेण तेजसा।

वसिष्ठो ग्रसते सर्वं ब्रह्मदण्डेन राघव॥ १६॥

राघव! वसिष्ठजीने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे उस महाभयंकर ब्रह्मास्त्रको भी ब्रह्मदण्डके द्वारा ही शान्त कर दिया॥ १६॥

ब्रह्मास्त्रं ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मन:।

त्रैलोक्यमोहनं रौद्रं रूपमासीत् सुदारुणम्॥ १७॥

उस ब्रह्मास्त्रको शान्त करते समय महात्मा वसिष्ठका वह रौद्ररूप तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला और अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था॥ १७॥

रोमकूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मन:।

मरीच्य इव निष्पेतुरग्नेर्धूमाकुलार्चिष:॥ १८॥

महात्मा वसिष्ठके समस्त रोमकूपोंमेंसे किरणोंकी भाँति धूमयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं॥ १८॥

प्राज्वलद् ब्रह्मदण्डश्च वसिष्ठस्य करोद्यत:।

विधूम इव कालाग्नेर्यमदण्ड इवापर:॥ १९॥

वसिष्ठजीके हाथमें उठा हुआ द्वितीय यमदण्डके समान वह ब्रह्मदण्ड धूमरहित कालाग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था॥ १९॥

ततोऽस्तुवन् मुनिगणा वसिष्ठं जपतां वरम्।

अमोघं ते बलं ब्रह्मंस्तेजो धारय तेजसा॥ २०॥

उस समय समस्त मुनिगण मन्त्र जपनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिकी स्तुति करते हुए बोले—‘ब्रह्मन्! आपका बल अमोघ है। आप अपने तेजको अपनी ही शक्तिसे समेट लीजिये॥ २०॥

निगृहीतस्त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महाबल:।

अमोघं ते बलं श्रेष्ठ लोका: सन्तु गतव्यथा:॥ २१॥

‘महाबली विश्वामित्र आपसे पराजित हो गये। मुनिश्रेष्ठ! आपका बल अमोघ है। अब आप शान्त हो जाइये, जिससे लोगोंकी व्यथा दूर हो’॥ २१॥

एवमुक्तो महातेजा: शमं चक्रे महाबल:।

विश्वामित्रो विनिकृतो विनि:श्वस्येदमब्रवीत्॥ २२॥

महर्षियोंके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी महाबली वसिष्ठजी शान्त हो गये और पराजित विश्वामित्र लम्बी साँस खींचकर यों बोले—॥ २२॥

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्।

एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि मे॥ २३॥

‘क्षत्रियके बलको धिक्कार है। ब्रह्मतेजसे प्राप्त होनेवाला बल ही वास्तवमें बल है; क्योंकि आज एक ब्रह्मदण्डने मेरे सभी अस्त्र नष्ट कर दिये॥ २३॥

तदेतत् प्रसमीक्ष्याहं प्रसन्नेन्द्रियमानस:।

तपो महत् समास्थास्ये यद् वै ब्रह्मत्वकारणम्॥ २४॥

‘इस घटनाको प्रत्यक्ष देखकर अब मैं अपने मन और इन्द्रियोंको निर्मल करके उस महान् तपका अनुष्ठान करूँगा, जो मेरे लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिका कारण होगा’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥

 

सप्तपञ्चाश: सर्ग:

विश्वामित्रकी तपस्या, राजा त्रिशंकुका अपना यज्ञ करानेके लिये पहले वसिष्ठजीसे प्रार्थना करना और उनके इन्कार कर देनेपर उन्हींके पुत्रोंकी शरणमें जाना

तत: संतप्तहृदय: स्मरन्निग्रहमात्मन:।

विनि:श्वस्य विनि:श्वस्य कृतवैरो महात्मना॥ १॥

स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव।

तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपा:॥ २॥

श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजयको याद करके मन-ही-मन संतप्त होने लगे। महात्मा वसिष्ठके साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानीके साथ दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे॥ १-२॥

फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तप:।

अथास्य जज्ञिरे पुत्रा: सत्यधर्मपरायणा:॥ ३॥

हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथ:।

वहाँ मन और इन्द्रियोंको वशमें करके वे फल-मूलका आहार करते तथा उत्तम तपस्यामें लगे रहते थे। वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे॥ ३/

पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामह:॥ ४॥

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।

जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज॥ ५॥

अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे।

एक हजार वर्ष पूरे हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजीने तपस्याके धनी विश्वामित्रको दर्शन देकर मधुर वाणीमें कहा—‘कुशिकनन्दन! तुमने तपस्याके द्वारा राजर्षियोंके लोकोंपर विजय पायी है। इस तपस्याके प्रभावसे हम तुम्हें सच्चा राजर्षि समझते हैं’॥ ४-५/

एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतै:॥ ६॥

त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वर:।

यह कहकर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओंके साथ स्वर्गलोक होते हुए ब्रह्मलोकको चले गये॥ ६/

विश्वामित्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ह्र‌िया किंचिदवाङ्मुख:॥ ७॥

दु:खेन महताविष्ट: समन्युरिदमब्रवीत्।

तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदु:॥ ८॥

देवा: सर्षिगणा: सर्वे नास्ति मन्ये तप: फलम्।

उनकी बात सुनकर विश्वामित्रका मुख लज्जासे कुछ झुक गया। वे बड़े दु:खसे व्यथित हो दीनतापूर्वक मन-ही-मन यों कहने लगे—‘अहो! मैंने इतना बड़ा तप किया तो भी ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता मुझे राजर्षि ही समझते हैं। मालूम होता है, इस तपस्याका कोई फल नहीं हुआ’॥ ७-८/

एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपा:॥ ९॥

तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान्।

श्रीराम! मनमें ऐसा सोचकर अपने मनको वशमें रखनेवाले महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र पुन: भारी तपस्यामें लग गये॥ ९/

एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रिय:॥ १०॥

त्रिशङ्कुरिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धन:।

इसी समय इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे। उनका नाम था त्रिशंकु॥ १०/

तस्य बुद्धि: समुत्पन्ना यजेयमिति राघव॥ ११॥

गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम्।

रघुनन्दन! उनके मनमें यह विचार हुआ कि ‘मैं ऐसा कोई यज्ञ करूँ, जिससे अपने इस शरीरके साथ ही देवताओंकी परम गति—स्वर्गलोकको जा पहुँचूँ’॥

वसिष्ठं स समाहूय कथयामास चिन्तितम्॥ १२॥

अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।

तब उन्होंने वसिष्ठजीको बुलाकर अपना यह विचार उन्हें कह सुनाया। महात्मा वसिष्ठने उन्हें बताया कि ‘ऐसा होना असम्भव है’॥ १२/

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम्॥ १३॥

ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृप:।

जब वसिष्ठने उन्हें कोरा उत्तर दे दिया, तब वे राजा उस कर्मकी सिद्धिके लिये दक्षिण दिशामें उन्हींके पुत्रोंके पास चले गये॥ १३/

वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे॥ १४॥

त्रिशङ्कुस्तु महातेजा: शतं परमभास्वरम्।

वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् मनस्विन:॥ १५॥

वसिष्ठजीके वे पुत्र जहाँ दीर्घकालसे तपस्यामें प्रवृत्त होकर तप करते थे, उस स्थानपर पहुँचकर महातेजस्वी त्रिशंकुने देखा कि मनको वशमें रखनेवाले वे सौ परमतेजस्वी वसिष्ठकुमार तपस्यामें संलग्न हैं॥

सोऽभिगम्य महात्मान: सर्वानेव गुरो: सुतान्।

अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्र‌िया किंचिदवाङ्मुख:॥ १६॥

अब्रवीत् स महात्मान: सर्वानेव कृताञ्जलि:।

उन सभी महात्मा गुरुपुत्रोंके पास जाकर उन्होंने क्रमश: उन्हें प्रणाम किया और लज्जासे अपने मुखको कुछ नीचा किये हाथ जोड़कर उन सब महात्माओंसे कहा—॥ १६/

शरणं व: प्रपन्नोऽहं शरण्यान् शरणं गत:॥ १७॥

प्रत्याख्यातो हि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना।

यष्टुकामो महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ॥ १८॥

‘गुरुपुत्रो! आप शरणागतवत्सल हैं। मैं आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ, आपका कल्याण हो। महात्मा वसिष्ठने मेरा यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है। मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ। आपलोग उसके लिये आज्ञा दें॥ १७-१८॥

गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये।

शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्॥ १९॥

ते मां भवन्त: सिद्ध्यर्थं याजयन्तु समाहिता:।

सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम्॥ २०॥

‘मैं समस्त गुरुपुत्रोंको नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। आपलोग तपस्यामें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण हैं। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आपलोग एकाग्रचित्त हो मुझसे मेरी अभीष्टसिद्धिके लिये ऐसा कोई यज्ञ करावें, जिससे मैं इस शरीरके साथ ही देवलोकमें जा सकूँ॥ १९-२०॥

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधना:।

गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन॥ २१॥

‘तपोधनो! महात्मा वसिष्ठके अस्वीकार कर देनेपर अब मैं अपने लिये समस्त गुरुपुत्रोंकी शरणमें जानेके सिवा दूसरी कोई गति नहीं देखता॥ २१॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधा: परमा गति:।

तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम॥ २२॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उनके बाद आप सब लोग ही मेरे परम देवता हैं’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

 

 


अष्टपञ्चाश: सर्ग:

वसिष्ठ ऋषिके पुत्रोंका त्रिशंकुको डाँट बताकर घर लौटनेके लिये आज्ञा देना तथा उन्हें दूसरा पुरोहित बनानेके लिये उद्यत देख शाप-प्रदान और उनके शापसे चाण्डाल हुए त्रिशंकुका विश्वामित्रजीकी शरणमें जाना

ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम्।

ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत्॥ १॥

प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।

तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान्॥ २॥

रघुनन्दन! राजा त्रिशंकुका यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनिके वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले— ‘दुर्बुद्धे! तुम्हारे सत्यवादी गुरुने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखाका आश्रय कैसे लिया?॥ १-२॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधा: परमा गति:।

न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिन:॥ ३॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंके लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उन सत्यवादी महात्माकी बातको कोई अन्यथा नहीं कर सकता॥ ३॥

अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषि:।

तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ता: कथंचन॥ ४॥

‘जिस यज्ञकर्मको उन भगवान् वसिष्ठमुनिने असम्भव बताया है, उसे हमलोग कैसे कर सकते हैं॥ ४॥

बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुन:।

याजने भगवान् शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव॥ ५॥

अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम्।

‘नरश्रेष्ठ! तुम अभी नादान हो, अपने नगरको लौट जाओ। पृथ्वीनाथ! भगवान् वसिष्ठ तीनों लोकोंका यज्ञ करानेमें समर्थ हैं, हमलोग उनका अपमान कैसे कर सकेंगे’॥ ५/

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥ ६॥

स राजा पुनरेवैतानिदं वचनमब्रवीत्।

प्रत्याख्यातो भगवता गुरुपुत्रैस्तथैव हि॥ ७॥

अन्यां गतिं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु तपोधना:।

गुरुपुत्रोंका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशंकुने पुन: उनसे इस प्रकार कहा—‘तपोधनो! भगवान् वसिष्ठने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्रगण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अत: आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसीकी शरणमें जाऊँगा’॥

ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम्॥ ८॥

शेपु: परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि।

इत्युक्त्वा ते महात्मानो विविशु: स्वं स्वमाश्रमम्॥ ९॥

त्रिशंकुका यह घोर अभिसंधिपूर्ण वचन सुनकर महर्षिके पुत्रोंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप दे दिया—‘अरे! जा तू चाण्डाल हो जायगा।’ ऐसा कहकर वे महात्मा अपने-अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये॥ ८-९॥

अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चण्डालतां गत:।

नीलवस्त्रधरो नील: पुरुषो ध्वस्तमूर्धज:॥ १०॥

चित्यमाल्यांगरागश्च आयसाभरणोऽभवत्।

तदनन्तर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गये। उनके शरीरका रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंगमें रुक्षता आ गयी। सिरके बाल छोटे-छोटे हो गये। सारे शरीरमें चिताकी राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगोंमें यथास्थान लोहेके गहने पड़ गये॥ १०/

तं दृष्ट्वा मन्त्रिण: सर्वे त्यज्य चण्डालरूपिणम्॥ ११॥

प्राद्रवन् सहिता राम पौरा येऽस्यानुगामिन:।

एको हि राजा काकुत्स्थ जगाम परमात्मवान्॥ १२॥

दह्यमानो दिवारात्रं विश्वामित्रं तपोधनम्।

श्रीराम! अपने राजाको चाण्डालके रूपमें देखकर सब मन्त्री और पुरवासी जो उनके साथ आये थे, उन्हें छोड़कर भाग गये। ककुत्स्थनन्दन! वे धीरस्वभाव नरेश दिन-रात चिन्ताकी आगमें जलने लगे और अकेले ही तपोधन विश्वामित्रकी शरणमें गये॥ ११-१२/

विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा राजानं विफलीकृतम्॥ १३॥

चण्डालरूपिणं राम मुनि: कारुण्यमागत:।

कारुण्यात् स महातेजा वाक्यं परमधार्मिक:॥ १४॥

इदं जगाद भद्रं ते राजानं घोरदर्शनम्।

किमागमनकार्यं ते राजपुत्र महाबल॥ १५॥

अयोध्याधिपते वीर शापाच्चण्डालतां गत:।

श्रीराम! विश्वामित्रने देखा राजाका जीवन निष्फल हो गया है। उन्हें चाण्डालके रूपमें देखकर उन महातेजस्वी परम धर्मात्मा मुनिके हृदयमें करुणा भर आयी। वे दयासे द्रवित होकर भयंकर दिखायी देनेवाले राजा त्रिशंकुसे इस प्रकार बोले—‘महाबली राजकुमार! तुम्हारा भला हो, यहाँ किस कामसे तुम्हारा आना हुआ है। वीर अयोध्यानरेश! जान पड़ता है तुम शापसे चाण्डालभावको प्राप्त हुए हो’॥ १३—१५/

अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य राजा चण्डालतां गत:॥ १६॥

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्।

विश्वामित्रकी बात सुनकर चाण्डालभावको प्राप्त हुए और वाणीके तात्पर्यको समझनेवाले राजा त्रिशंकुने हाथ जोड़कर वाक्यार्थकोविद विश्वामित्र मुनिसे इस प्रकार कहा—॥ १६/

प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च॥ १७॥

अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्यय:।

‘महर्षे! मुझे गुरु तथा गुरुपुत्रोंने ठुकरा दिया। मैं जिस मनोऽभीष्ट वस्तुको पाना चाहता था, उसे न पाकर इच्छाके विपरीत अनर्थका भागी हो गया॥ १७/

सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन॥ १८॥

मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम्।

‘सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं चाहता था कि इसी शरीरसे स्वर्गको जाऊँ, परंतु यह इच्छा पूर्ण न हो सकी। मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं; किंतु उनका भी कोई फल नहीं मिल रहा है॥ १८/

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन॥ १९॥

कृच्छ्रेष्वपि गत: सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे।

‘सौम्य! मैं क्षत्रियधर्मकी शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि बड़े-से-बड़े सङ्कटमें पड़नेपर भी न तो पहले कभी मैंने मिथ्या भाषण किया है और न भविष्यमें ही कभी करूँगा॥ १९/

यज्ञैर्बहुविधैरिष्टं प्रजा धर्मेण पालिता:॥ २०॥

गुरवश्च महात्मान: शीलवृत्तेन तोषिता:।

धर्मे प्रयतमानस्य यज्ञं चाहर्तुमिच्छत:॥ २१॥

परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुंगव।

दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्॥ २२॥

‘मैंने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, प्रजाजनोंकी धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचारके द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनोंको संतुष्ट रखनेका प्रयास किया। इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अत: मेरा यह प्रयत्न धर्मके लिये ही था। मुनिप्रवर! तो भी मेरे गुरुजन मुझपर संतुष्ट न हो सके। यह देखकर मैं दैवको ही बड़ा मानता हूँ। पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है॥ २०—२२॥

दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गति:।

तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षत:।

कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मण:॥ २३॥

‘दैव सबपर आक्रमण करता है। दैव ही सबकी परमगति है। मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ। दैवने मेरे पुरुषार्थको दबा दिया है। आपका भला हो। आप मुझपर अवश्य कृपा करें॥ २३॥

नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे।

दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि॥ २४॥

‘अब मैं आपके सिवा दूसरे किसीकी शरणमें नहीं जाऊँगा। दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला है भी नहीं। आप ही अपने पुरुषार्थसे मेरे दुर्दैवको पलट सकते हैं’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टपञ्चाश: सर्ग:॥ ५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८॥

 

एकोनषष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रका त्रिशंकुको आश्वासन देकर उनका यज्ञ करानेके लिये ऋषि-मुनियोंको आमन्त्रित करना और उनकी बात न माननेवाले महोदय तथा ऋषिपुत्रोंको शाप देकर नष्ट करना

उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मज:।

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम्॥ १॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] साक्षात् चाण्डालके स्वरूपको प्राप्त हुए राजा त्रिशंकुके पूर्वोक्त वचनको सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजीने दयासे द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा—॥ १॥

इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।

शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीर्नृपपुंगव॥ २॥

‘वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है। मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूँगा॥ २॥

अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मण:।

यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृत:॥ ३॥

‘राजन्! तुम्हारे यज्ञमें सहायता करनेवाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियोंको मैं आमन्त्रित करता हूँ। फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना॥ ३॥

गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते।

अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि॥ ४॥

हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप।

यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागत:॥ ५॥

‘गुरुके शापसे तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे। नरेश्वर! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्रकी शरणमें आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथमें आ गया है’॥ ४-५॥

एवमुक्त्वा महातेजा: पुत्रान् परमधार्मिकान्।

व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात्॥ ६॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्रने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रोंको यज्ञकी सामग्री जुटानेकी आज्ञा दी॥ ६॥

सर्वान् शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह।

सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया॥ ७॥

सशिष्यान् सुहृदश्चैव सर्त्विज: सुबहुश्रुतान्।

तत्पश्चात् समस्त शिष्योंको बुलाकर उनसे यह बात कही—‘तुमलोग मेरी आज्ञासे अनेक विषयोंके ज्ञाता समस्त ऋषि-मुनियोंको, जिनमें वसिष्ठके पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजोंसहित बुला लाओ॥ ७/

यदन्यो वचनं ब्रूयान्मद्वाक्यबलचोदित:॥ ८॥

तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम्।

‘जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञके विषयमें कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुमलोग वह सब पूरा-पूरा मुझसे आकर कहना’॥ ८/

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया॥ ९ ॥

आजग्मुरथ देशेभ्य: सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिन:।

ते च शिष्या: समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ १०॥

ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।

उनकी आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओंमें चले गये। फिर तो सब देशोंसे ब्रह्मवादी मुनि आने लगे। विश्वामित्रके वे शिष्य उन प्रज्वलित तेजवाले महर्षिके पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजीसे कह सुनाया॥

श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातय:॥ ११॥

सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम्।

वे बोले—‘गुरुदेव! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्राय: सम्पूर्ण देशोंमें रहनेवाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं। केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठ-पुत्रोंको छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आनेके लिये प्रस्थान कर चुके हैं॥ ११/

वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥ १२॥

यथाह वचनं सर्वं शृणु त्वं मुनिपुंगव।

‘मुनिश्रेष्ठ! वसिष्ठके जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणीमें जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये॥ १२/

क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषत:॥ १३॥

कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षय:।

ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम्॥ १४॥

कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिता:।

‘वे कहते हैं—जो विशेषत: चण्डाल है और जिसका यज्ञ करानेवाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञमें देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्यका भोजन कैसे कर सकते हैं? अथवा चण्डालका अन्न खाकर विश्वामित्रसे पालित हुए ब्राह्मण स्वर्गमें कैसे जा सकेंगे?’॥ १३-१४/

एतद् वचननैष्ठुर्यमूचु: संरक्तलोचना:॥ १५॥

वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदया:।

‘मुनिप्रवर! महोदयके साथ वसिष्ठके सभी पुत्रोंने क्रोधसे लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं’॥ १५/

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुंगव:॥ १६॥

क्रोधसंरक्तनयन: सरोषमिदमब्रवीत्।

उन सबकी वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्रके दोनों नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६/

यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम्॥ १७॥

भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति न संशय:।

‘मैं उग्र तपस्यामें लगा हूँ और दोष या दुर्भावनासे रहित हूँ तो भी जो मुझपर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है॥ १७/

अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम्॥ १८॥

सप्तजातिशतान्येव मृतपा: सम्भवन्तु ते।

श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निर्घृणा:॥ १९॥

‘आज कालपाशसे बँधकर वे यमलोकमें पहुँचा दिये गये। अब ये सात सौ जन्मोंतक मुर्दोंकी रखवाली करनेवाली, निश्चितरूपसे कुत्तेका मांस खानेवाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डाल-जातिमें जन्म ग्रहण करें॥ १८-१९॥

विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्।

महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत्॥ २०॥

दूषित: सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति।

प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गत:॥ २१॥

दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति।

‘वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकोंमें विचरें। साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीनको भी दूषित किया है, मेरे क्रोधसे दीर्घ-कालतक सब लोगोंमें निन्दित, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर और दयाशून्य निषादयोनिको प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा’॥ २०-२१/

एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपा:।

विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनि:॥ २२॥

ऋषियोंके बीचमें ऐसा कहकर महातपस्वी, महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनषष्टितम: सर्ग:॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

 


षष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रका ऋषियोंसे त्रिशंकुका यज्ञ करानेके लिये अनुरोध, ऋषियोंद्वारा यज्ञका आरम्भ, त्रिशंकुका सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्रद्वारा स्वर्गसे उनके गिराये जानेपर क्षुब्ध हुए विश्वामित्रका नूतन देवसर्गके लिये उद्योग, फिर देवताओंके अनुरोधसे उनका इस कार्यसे विरत होना

तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।

ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥ १॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठके पुत्रोंको अपने तपोबलसे नष्ट हुआ जान महातेजस्वी विश्वामित्रने ऋषियोंके बीचमें इस प्रकार कहा—॥ १॥

अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्कुरिति विश्रुत:।

धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गत:॥ २॥

‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरणमें आये हैं॥ २॥

स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।

यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥ ३॥

तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।

‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीरसे देवलोकपर अधिकार प्राप्त करूँ। अत: आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञका अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीरसे ही देवलोककी प्राप्ति हो सके’॥ ३/

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा सर्व एव महर्षय:॥ ४॥

ऊचु: समेता: सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्।

अयं कुशिकदायादो मुनि: परमकोपन:॥ ५॥

यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशय:।

विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर धर्मको जाननेवाले सभी महर्षियोंने सहसा एकत्र होकर आपसमें धर्मयुक्त परामर्श किया—‘ब्राह्मणो! कुशिकके पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं। ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरहसे पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है॥ ४-५/

अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषत:॥ ६॥

तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञ: सशरीरो यथा दिवि।

गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा॥ ७॥

‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्निके समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञका आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्रके तेजसे ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोकमें जा सकें’॥ ६-७॥

तत: प्रवर्त्यतां यज्ञ: सर्वे समधितिष्ठत।

एवमुक्त्वा महर्षय: संजहृस्ता: क्रियास्तदा॥ ८॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मतिसे यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियोंने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥ ८॥

याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ।

ऋत्विजश्चानुपूर्व्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदा:॥ ९॥

चक्रु: सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि।

महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमश: अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥ ९/

तत: कालेन महता विश्वामित्रो महातपा:॥ १०॥

चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवता:।

नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवता:॥ ११॥

तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्रने अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेनेके लिये वे सब देवता नहीं आये॥ १०-११॥

तत: कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनि:।

स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कुमिदमब्रवीत्॥ १२॥

इससे महामुनि विश्वामित्रको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोषके साथ राजा त्रिशंकुसे इस प्रकार कहा—॥ १२॥

पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर।

एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा॥ १३॥

‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्याका बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्तिसे सशरीर स्वर्गलोकमें पहुँचाता हूँ॥ १३॥

दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर।

स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपस: फलम्॥ १४॥

राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज।

‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीरके साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोकको जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्याका कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभावसे तुम सशरीर स्वर्गलोकको जाओ’॥ १४/

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वर:॥ १५॥

दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा।

श्रीराम! विश्वामित्र मुनिके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियोंके देखते-देखते उस समय अपने शरीरके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये॥ १५/

स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कुं पाकशासन:॥ १६॥

सह सर्वै: सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्।

त्रिशंकुको स्वर्गलोकमें पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओंके साथ पाकशासन इन्द्रने उनसे इस प्रकार कहा—॥ १६/

त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालय:॥ १७॥

गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिरा:।

‘मूर्ख त्रिशंकु! तू फिर यहाँसे लौट जा, तेरे लिये स्वर्गमें स्थान नहीं है। तू गुरुके शापसे नष्ट हो चुका है, अत: नीचे मुँह किये पुन: पृथ्वीपर गिर जा’॥ १७/

एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्कुरपतत् पुन:॥ १८॥

विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्।

इन्द्रके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्रको पुकारकर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुन: स्वर्गसे नीचे गिरे॥ १८/

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिक:॥ १९॥

रोषमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्।

चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकुकी वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनिको बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकुसे बोले— ‘राजन्! वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा’ (उनके ऐसा कहनेपर त्रिशंकु बीचमें ही लटके रह गये)॥ १९/

ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापर:॥ २०॥

सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुन:।

नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छित:॥ २१॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्रने ऋषिमण्डलीके बीच दूसरे प्रजापतिके समान दक्षिणमार्गके लिये नये सप्तर्षियोंकी सृष्टि की तथा क्रोधसे भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रोंका भी निर्माण कर डाला॥ २०-२१॥

दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशा:।

सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृत:॥ २२॥

अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रक:।

दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे॥ २३॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोधसे कलुषित हो दक्षिण दिशामें ऋषिमण्डलीके बीच नूतन नक्षत्रमालाओंकी सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्रकी सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्रके ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओंकी सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३॥

तत: परमसम्भ्रान्ता: सर्षिसङ्घा: सुरासुरा:।

विश्वामित्रं महात्मानमूचु: सानुनयं वच:॥ २४॥

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्रसे विनयपूर्वक बोले—॥ २४॥

अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षत:।

सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन॥ २५॥

‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरुके शापसे अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अत: तपोधन! ये सशरीर स्वर्गमें जानेके कदापि अधिकारी नहीं हैं’॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगव:।

अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिक: सर्वदेवता:॥ २६॥

उन देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिवर कौशिकने सम्पूर्ण देवताओंसे परमोत्कृष्ट वचन कहा—॥ २६॥

सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपते:।

आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे॥ २७॥

‘देवगण! आपका कल्याण हो। मैंने राजा त्रिशंकुको सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अत: उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥ २७॥

स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वत:।

नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥ २८॥

यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वश:।

यत् कृतानि सुरा: सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥ २९॥

‘इन महाराज त्रिशंकुको सदा स्वर्गलोकका सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रोंका निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जबतक संसार रहे, तबतक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातोंका अनुमोदन करें’॥

एवमुक्ता: सुरा: सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्।

एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वश:॥ ३०॥

गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद् बहि:।

नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योति:षु जाज्वलन्॥ ३१॥

अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभ:।

अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्॥ ३२॥

कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा।

उनके ऐसा कहनेपर सब देवता मुनिवर विश्वामित्रसे बोले—‘महर्षे! ऐसा ही हो। ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाशमें वैश्वानरपथसे बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रोंके बीचमें सिर नीचा किये त्रिशंकु भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओंके समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठका स्वर्गीय पुरुषकी भाँति अनुसरण करते रहेंगे’॥

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टुत:॥ ३३॥

ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवता:।

इसके बाद सम्पूर्ण देवताओंने ऋषियोंके बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिकी स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओंका अनुरोध स्वीकार कर लिया॥ ३३/

ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधना:।

जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम॥ ३४॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थानको लौट गये॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितम: सर्ग:॥ ६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६०॥

 


एकषष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रकी पुष्कर तीर्थमें तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीषका ऋचीकके मध्यम पुत्र शुन:शेपको यज्ञ-पशु बनानेके लिये खरीदकर लाना

विश्वामित्रो महातेजा: प्रस्थितान् वीक्ष्य तानृषीन्।

अब्रवीन्नरशार्दूल सर्वांस्तान् वनवासिन:॥ १॥

[शतानन्दजी कहते हैं—] पुरुषसिंह श्रीराम! यज्ञमें आये हुए उन सब वनवासी ऋषियोंको वहाँसे जाते देख महातेजस्वी विश्वामित्रने उनसे कहा—॥ १॥

महाविघ्न: प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम्।

दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तप:॥ २॥

‘महर्षियो! इस दक्षिण दिशामें रहनेसे हमारी तपस्यामें महान् विघ्न आ पड़ा है; अत: अब हम दूसरी दिशामें चले जायँगे और वहीं रहकर तपस्या करेंगे॥ २॥

पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मन:।

सुखं तपश्चरिष्याम: सुखं तद्धि तपोवनम्॥ ३॥

‘विशाल पश्चिम दिशामें जो महात्मा ब्रह्माजीके तीन पुष्कर हैं, उन्हींके पास रहकर हम सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; क्योंकि वह तपोवन बहुत ही सुखद है’॥ ३॥

एवमुक्त्वा महातेजा: पुष्करेषु महामुनि:।

तप उग्रं दुराधर्षं तेपे मूलफलाशन:॥ ४॥

ऐसा कहकर वे महातेजस्वी महामुनि पुष्करमें चले गये और वहाँ फल-मूलका भोजन करके उग्र एवं दुर्जय तपस्या करने लगे॥ ४॥

एतस्मिन्नेव काले तु अयोध्याधिपतिर्महान्।

अम्बरीष इति ख्यातो यष्टुं समुपचक्रमे॥ ५॥

इन्हीं दिनों अयोध्याके महाराज अम्बरीष एक यज्ञकी तैयारी करने लगे॥ ५॥

तस्य वै यजमानस्य पशुमिन्द्रो जहार ह।

प्रणष्टे तु पशौ विप्रो राजानमिदमब्रवीत्॥ ६॥

जब वे यज्ञमें लगे हुए थे, उस समय इन्द्रने उनके यज्ञपशुको चुरा लिया। पशुके खो जानेपर पुरोहितजीने राजासे कहा—॥ ६॥

पशुरभ्याहृतो राजन् प्रणष्टस्तव दुर्नयात्।

अरक्षितारं राजानं घ्नन्ति दोषा नरेश्वर॥ ७॥

‘राजन्! जो पशु यहाँ लाया गया था, वह आपकी दुर्नीतिके कारण खो गया। नरेश्वर! जो राजा यज्ञ-पशुकी रक्षा नहीं करता, उसे अनेक प्रकारके दोष नष्ट कर डालते हैं॥ ७॥

प्रायश्चित्तं महद्ध्येतन्नरं वा पुरुषर्षभ।

आनयस्व पशुं शीघ्रं यावत् कर्म प्रवर्तते॥ ८॥

‘पुरुषप्रवर! जबतक कर्मका आरम्भ होता है, उसके पहले ही खोये हुए पशुकी खोज कराकर उसे शीघ्र यहाँ ले आओ। अथवा उसके प्रतिनिधिरूपसे किसी पुरुष पशुको खरीद लाओ। यही इस पापका महान् प्रायश्चित्त है’॥

उपाध्यायवच: श्रुत्वा स राजा पुरुषर्षभ:।

अन्वियेष महाबुद्धि: पशुं गोभि: सहस्रश:॥ ९॥

पुरोहितकी यह बात सुनकर महाबुद्धिमान् पुरुषश्रेष्ठ राजा अम्बरीषने हजारों गौओंके मूल्यपर खरीदनेके लिये एक पुरुषका अन्वेषण किया॥ ९॥

देशाञ्जनपदांस्तांस्तान् नगराणि वनानि च।

आश्रमाणि च पुण्यानि मार्गमाणो महीपति:॥ १०॥

स पुत्रसहितं तात सभार्यं रघुनन्दन।

भृगुतुंगे समासीनमृचीकं संददर्श ह॥ ११॥

तात रघुनन्दन! विभिन्न देशों, जनपदों, नगरों, वनों तथा पवित्र आश्रमोंमें खोज करते हुए राजा अम्बरीष भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचे और वहाँ उन्होंने पत्नी तथा पुत्रोंके साथ बैठे हुए ऋचीक मुनिका दर्शन किया॥ १०-११॥

तमुवाच महातेजा: प्रणम्याभिप्रसाद्य च।

महर्षिं तपसा दीप्तं राजर्षिरमितप्रभ:॥ १२॥

अमित कान्तिमान् एवं महातेजस्वी राजर्षि अम्बरीषने तपस्यासे उद्दीप्त होनेवाले महर्षि ऋचीकको प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न करके कहा॥ १२॥

पृष्ट्वा सर्वत्र कुशलमृचीकं तमिदं वच:।

गवां शतसहस्रेण विक्रीणीषे सुतं यदि॥ १३॥

पशोरर्थे महाभाग कृतकृत्योऽस्मि भार्गव।

पहले तो उन्होंने ऋचीक मुनिसे उनकी सभी वस्तुओंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा, उसके बाद इस प्रकार कहा—‘महाभाग भृगुनन्दन! यदि आप एक लाख गौएँ लेकर अपने एक पुत्रको पशु बनानेके लिये बेचें तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा॥ १३/

सर्वे परिगता देशा यज्ञियं न लभे पशुम्॥ १४॥

दातुमर्हसि मूल्येन सुतमेकमितो मम।

‘मैं सारे देशोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी यज्ञोपयोगी पशु नहीं पा सका। अत: आप उचित मूल्य लेकर यहाँ मुझे अपने एक पुत्रको दे दीजिये’॥ १४/

एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद् वच:॥ १५॥

नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन।

उनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी ऋचीक बोले—‘नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रको तो किसी तरह नहीं बेचूँगा’॥ १५/

ऋचीकस्य वच: श्रुत्वा तेषां माता महात्मनाम्॥ १६॥

उवाच नरशार्दूलमम्बरीषमिदं वच:।

ऋचीक मुनिकी बात सुनकर उन महात्मा पुत्रोंकी माताने पुरुषसिंह अम्बरीषसे इस प्रकार कहा—॥ १६/

अविक्रेयं सुतं ज्येष्ठं भगवानाह भार्गव:॥ १७॥

ममापि दयितं विद्धि कनिष्ठं शुनकं प्रभो।

तस्मात् कनीयसं पुत्रं न दास्ये तव पार्थिव॥ १८॥

‘प्रभो! भगवान् भार्गव कहते हैं कि ज्येष्ठ पुत्र कदापि बेचनेयोग्य नहीं है; परंतु आपको मालूम होना चाहिये जो सबसे छोटा पुत्र शुनक है, वह मुझे भी बहुत ही प्रिय है। अत: पृथ्वीनाथ! मैं अपना छोटा पुत्र आपको कदापि नहीं दूँगी॥ १७-१८॥

प्रायेण हि नरश्रेष्ठ ज्येष्ठा: पितृषु वल्लभा:।

मातृणां च कनीयांसस्तस्माद् रक्ष्ये कनीयसम्॥ १९॥

‘नरश्रेष्ठ! प्राय: जेठे पुत्र पिताओंको प्रिय होते हैं और छोटे पुत्र माताओंको। अत: मैं अपने कनिष्ठ पुत्रकी अवश्य रक्षा करूँगी’॥ १९॥

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् मुनिपत्न्यां तथैव च।

शुन:शेप: स्वयं राम मध्यमो वाक्यमब्रवीत्॥ २०॥

श्रीराम! मुनि और उनकी पत्नीके ऐसा कहनेपर मझले पुत्र शुन:शेपने स्वयं कहा—॥ २०॥

पिता ज्येष्ठमविक्रेयं माता चाह कनीयसम्।

विक्रेयं मध्यमं मन्ये राजपुत्र नयस्व माम्॥ २१॥

‘राजपुत्र! पिताने ज्येष्ठको और माताने कनिष्ठ पुत्रको बेचनेके लिये अयोग्य बतलाया है। अत: मैं समझता हूँ इन दोनोंकी दृष्टिमें मझला पुत्र ही बेचनेके योग्य है। इसलिये तुम मुझे ही ले चलो’॥ २१॥

अथ राजा महाबाहो वाक्यान्ते ब्रह्मवादिन:।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य कोटिभी रत्नराशिभि:॥ २२॥

गवां शतसहस्रेण शुन:शेपं नरेश्वर:।

गृहीत्वा परमप्रीतो जगाम रघुनन्दन॥ २३॥

महाबाहु रघुनन्दन! ब्रह्मवादी मझले पुत्रके ऐसा कहनेपर राजा अम्बरीष बड़े प्रसन्न हुए और एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रत्नोंके ढेर तथा एक लाख गौओंके बदले शुन:शेपको लेकर वे घरकी ओर चले॥ २२-२३॥

अम्बरीषस्तु राजर्षी रथमारोप्य सत्वर:।

शुन:शेपं महातेजा जगामाशु महायशा:॥ २४॥

महातेजस्वी महायशस्वी राजर्षि अम्बरीष शुन:शेपको रथपर बिठाकर बड़ी उतावलीके साथ तीव्र गतिसे चले॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकषष्टितम: सर्ग:॥ ६१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥

 

द्विषष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रद्वारा शुन:शेपकी रक्षाका सफल प्रयत्न और तपस्या

शुन:शेपं नरश्रेष्ठ गृहीत्वा तु महायशा:।

व्यश्रमत् पुष्करे राजा मध्याह्ने रघुनन्दन॥ १॥

[ शतानन्दजी बोले—] नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! महायशस्वी राजा अम्बरीष शुन:शेपको साथ लेकर दोपहरके समय पुष्कर तीर्थमें आये और वहाँ विश्राम करने लगे॥ १॥

तस्य विश्रममाणस्य शुन:शेपो महायशा:।

पुष्करं ज्येष्ठमागम्य विश्वामित्रं ददर्श ह॥ २॥

तप्यन्तमृषिभि: सार्धं मातुलं परमातुर:।

विषण्णवदनो दीनस्तृष्णया च श्रमेण च॥ ३॥

पपाताङ्के मुने राम वाक्यं चेदमुवाच ह।

श्रीराम! जब वे विश्राम करने लगे, उस समय महायशस्वी शुन:शेप ज्येष्ठ पुष्करमें आकर ऋषियोंके साथ तपस्या करते हुए अपने मामा विश्वामित्रसे मिला। वह अत्यन्त आतुर एवं दीन हो रहा था। उसके मुखपर विषाद छा गया था। वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दीन हो मुनिकी गोदमें गिर पड़ा और इस प्रकार बोला—॥ २-३/

न मेऽस्ति माता न पिता ज्ञातयो बान्धवा: कुत:॥ ४॥

त्रातुमर्हसि मां सौम्य धर्मेण मुनिपुंगव।

‘सौम्य! मुनिपुंगव! न मेरे माता हैं, न पिता, फिर भाई-बन्धु कहाँसे हो सकते हैं। (मैं असहाय हूँ अत:) आप ही धर्मके द्वारा मेरी रक्षा कीजिये॥ ४/

त्राता त्वं हि नरश्रेष्ठ सर्वेषां त्वं हि भावन:॥ ५॥

राजा च कृतकार्य: स्यादहं दीर्घायुरव्यय:।

स्वर्गलोकमुपाश्नीयां तपस्तप्त्वा ह्यनुत्तमम्॥ ६॥

‘नरश्रेष्ठ! आप सबके रक्षक तथा अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति करानेवाले हैं। ये राजा अम्बरीष कृतार्थ हो जायँ और मैं भी विकाररहित दीर्घायु होकर सर्वोत्तम तपस्या करके स्वर्गलोक प्राप्त कर लूँ—ऐसी कृपा कीजिये॥ ५-६॥

स मे नाथो ह्यनाथस्य भव भव्येन चेतसा।

पितेव पुत्रं धर्मात्मंस्त्रातुमर्हसि किल्बिषात्॥ ७॥

‘धर्मात्मन्! आप अपने निर्मलचित्तसे मुझ अनाथके नाथ (असहायके संरक्षक) हो जायँ। जैसे पिता अपने पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप मुझे इस पापमूलक विपत्तिसे बचाइये’॥ ७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपा:।

सान्त्वयित्वा बहुविधं पुत्रानिदमुवाच ह॥ ८॥

शुन:शेपकी वह बात सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र उसे नाना प्रकारसे सान्त्वना दे अपने पुत्रोंसे इस प्रकार बोले—॥ ८॥

यत्कृते पितर: पुत्राञ्जनयन्ति शुभार्थिन:।

परलोकहितार्थाय तस्य कालोऽयमागत:॥ ९॥

‘बच्चो! शुभकी अभिलाषा रखनेवाले पिता जिस पारलौकिक हितके उद्देश्यसे पुत्रोंको जन्म देते हैं, उसकी पूर्तिका यह समय आ गया है॥ ९॥

अयं मुनिसुतो बालो मत्त: शरणमिच्छति।

अस्य जीवितमात्रेण प्रियं कुरुत पुत्रका:॥ १०॥

‘पुत्रो! यह बालक मुनिकुमार मुझसे अपनी रक्षा चाहता है, तुमलोग अपना जीवनमात्र देकर इसका प्रिय करो॥

सर्वे सुकृतकर्माण: सर्वे धर्मपरायणा:।

पशुभूता नरेन्द्रस्य तृप्तिमग्ने: प्रयच्छत॥ ११॥

‘तुम सब-के-सब पुण्यात्मा और धर्मपरायण हो। अत: राजाके यज्ञमें पशु बनकर अग्निदेवको तृप्ति प्रदान करो॥ ११॥

नाथवांश्च शुन:शेपो यज्ञश्चाविघ्नतो भवेत्।

देवतास्तर्पिताश्च स्युर्मम चापि कृतं वच:॥ १२॥

‘इससे शुन:शेप सनाथ होगा, राजाका यज्ञ भी बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण हो जायगा, देवता भी तृप्त होंगे और तुम्हारे द्वारा मेरी आज्ञाका पालन भी हो जायगा’॥ १२॥

मुनेस्तद् वचनं श्रुत्वा मधुच्छन्दादय: सुता:।

साभिमानं नरश्रेष्ठ सलीलमिदमब्रुवन्॥ १३॥

‘नरश्रेष्ठ! विश्वामित्र मुनिका वह वचन सुनकर उनके मधुच्छन्द आदि पुत्र अभिमान और अवहेलनापूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १३॥

कथमात्मसुतान् हित्वा त्रायसेऽन्यसुतं विभो।

अकार्यमिव पश्याम: श्वमांसमिव भोजने॥ १४॥

‘प्रभो! आप अपने बहुत-से पुत्रोंको त्यागकर दूसरेके एक पुत्रकी रक्षा कैसे करते हैं? जैसे पवित्र भोजनमें कुत्तेका मांस पड़ जाय तो वह अग्राह्य हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ अपने पुत्रोंकी रक्षा आवश्यक हो, वहाँ दूसरेके पुत्रकी रक्षाके कार्यको हम अकर्त्तव्यकी कोटिमें ही देखते हैं’॥ १४॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां मुनिपुंगव:।

क्रोधसंरक्तनयनो व्याहर्तुमुपचक्रमे॥ १५॥

उन पुत्रोंका वह कथन सुनकर मुनिवर विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे इस प्रकार कहने लगे—॥ १५॥

नि:साध्वसमिदं प्रोक्तं धर्मादपि विगर्हितम्।

अतिक्रम्य तु मद्वाक्यं दारुणं रोमहर्षणम्॥ १६॥

श्वमांसभोजिन: सर्वे वासिष्ठा इव जातिषु।

पूर्णं वर्षसहस्रं तु पृथिव्यामनुवत्स्यथ॥ १७॥

‘अरे! तुमलोगोंने निर्भय होकर ऐसी बात कही है, जो धर्मसे रहित एवं निन्दित है। मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जो यह दारुण एवं रोमाञ्चकारी बात तुमने मुँहसे निकाली है, इस अपराधके कारण तुम सब लोग भी वसिष्ठके पुत्रोंकी भाँति कुत्तेका मांस खानेवाली मुष्टिक आदि जातियोंमें जन्म लेकर पूरे एक हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर रहोगे’॥ १६-१७॥

कृत्वा शापसमायुक्तान् पुत्रान् मुनिवरस्तदा।

शुन:शेपमुवाचार्तं कृत्वा रक्षां निरामयाम्॥ १८॥

इस प्रकार अपने पुत्रोंको शाप देकर मुनिवर विश्वामित्रने उस समय शोकार्त शुन:शेपकी निर्विघ्न रक्षा करके उससे इस प्रकार कहा—॥ १८॥

पवित्रपाशैराबद्धो रक्तमाल्यानुलेपन:।

वैष्णवं यूपमासाद्य वाग्भिरग्निमुदाहर॥ १९॥

इमे च गाथे द्वे दिव्ये गायेथा मुनिपुत्रक।

अम्बरीषस्य यज्ञेऽस्म‌िंस्तत: सिद्धिमवाप्स्यसि॥ २०॥

‘मुनिकुमार! अम्बरीषके इस यज्ञमें जब तुम्हें कुश आदिके पवित्र पाशोंसे बाँधकर लाल फूलोंकी माला और लाल चन्दन धारण करा दिया जाय, उस समय तुम विष्णुदेवता-सम्बन्धी यूपके पास जाकर वाणीद्वारा अग्निकी (इन्द्र और विष्णुकी) स्तुति करना और इन दो दिव्य गाथाओंका गान करना। इससे तुम मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लोगे’॥ १९-२०॥

शुन:शेपो गृहीत्वा ते द्वे गाथे सुसमाहित:।

त्वरया राजसिंहं तमम्बरीषमुवाच ह॥ २१॥

शुन:शेपने एकाग्रचित्त होकर उन दोनों गाथाओंको ग्रहण किया और राजसिंह अम्बरीषके पास जाकर उनसे शीघ्रतापूर्वक कहा—॥ २१॥

राजसिंह महाबुद्धे शीघ्रं गच्छावहे वयम्।

निवर्तयस्व राजेन्द्र दीक्षां च समुदाहर॥ २२॥

‘राजेन्द्र! परम बुद्धिमान् राजसिंह! अब हम दोनों शीघ्र चलें। आप यज्ञकी दीक्षा लें और यज्ञकार्य सम्पन्न करें’॥ २२॥

तद् वाक्यमृषिपुत्रस्य श्रुत्वा हर्षसमन्वित:।

जगाम नृपति: शीघ्रं यज्ञवाटमतन्द्रित:॥ २३॥

ऋषिकुमारका वह वचन सुनकर राजा अम्बरीष आलस्य छोड़ हर्षसे उत्फुल्ल हो शीघ्रतापूर्वक यज्ञशालामें गये॥ २३॥

सदस्यानुमते राजा पवित्रकृतलक्षणम्।

पशुं रक्ताम्बरं कृत्वा यूपे तं समबन्धयत्॥ २४॥

वहाँ सदस्यकी अनुमति ले राजा अम्बरीषने शुन:शेपको कुशके पवित्र पाशसे बाँधकर उसे पशुके लक्षणसे सम्पन्न कर दिया और यज्ञ-पशुको लाल वस्त्र पहिनाकर यूपमें बाँध दिया॥ २४॥

स बद्धो वाग्भिरग्र्याभिरभितुष्टाव वै सुरौ।

इन्द्रमिन्द्रानुजं चैव यथावन्मुनिपुत्रक:॥ २५॥

बँधे हुए मुनिपुत्र शुन:शेपने उत्तम वाणीद्वारा इन्द्र और उपेन्द्र इन दोनों देवताओंकी यथावत् स्तुति की॥ २५॥

तत: प्रीत: सहस्राक्षो रहस्यस्तुतितोषित:।

दीर्घमायुस्तदा प्रादाच्छुन:शेपाय वासव:॥ २६॥

उस रहस्यभूत स्तुतिसे संतुष्ट होकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। उस समय उन्होंने शुन:शेपको दीर्घायु प्रदान की॥ २६॥

स च राजा नरश्रेष्ठ यज्ञस्य च समाप्तवान्।

फलं बहुगुणं राम सहस्राक्षप्रसादजम्॥ २७॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! राजा अम्बरीषने भी देवराज इन्द्रकी कृपासे उस यज्ञका बहुगुणसम्पन्न उत्तम फल प्राप्त किया॥ २७॥

विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा भूयस्तेपे महातपा:।

पुष्करेषु नरश्रेष्ठ दशवर्षशतानि च॥ २८॥

पुरुषप्रवर! इसके बाद महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्रने भी पुष्कर तीर्थमें पुन: एक हजार वर्षोंतक तीव्र तपस्या की॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विषष्टितम: सर्ग:॥ ६२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥

 

 


त्रिषष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रको ऋषि एवं महर्षिपदकी प्राप्ति, मेनकाद्वारा उनका तपोभंगतथा ब्रह्मर्षिपदकी प्राप्तिके लिये उनकी घोर तपस्या

पूर्णे वर्षसहस्रे तु व्रतस्नातं महामुनिम्।

अभ्यगच्छन् सुरा: सर्वे तप: फलचिकीर्षव:॥ १॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] जब एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब उन्होंने व्रतकी समाप्तिका स्नान किया। स्नान कर लेनेपर महामुनि विश्वामित्रके पास सम्पूर्ण देवता उन्हें तपस्याका फल देनेकी इच्छासे आये॥

अब्रवीत् सुमहातेजा ब्रह्मा सुरुचिरं वच:।

ऋषिस्त्वमसि भद्रं ते स्वार्जितै: कर्मभि: शुभै:॥ २॥

उस समय महातेजस्वी ब्रह्माजीने मधुर वाणीमें कहा— ‘मुने! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने द्वारा उपार्जित शुभकर्मोंके प्रभावसे ऋषि हो गये’॥ २॥

तमेवमुक्त्वा देवेशस्त्रिदिवं पुनरभ्यगात्।

विश्वामित्रो महातेजा भूयस्तेपे महत् तप:॥ ३॥

उनसे ऐसा कहकर देवेश्वर ब्रह्माजी पुन: स्वर्गको चले गये। इधर महातेजस्वी विश्वामित्र पुन: बड़ी भारी तपस्यामें लग गये॥ ३॥

तत: कालेन महता मेनका परमाप्सरा:।

पुष्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे॥ ४॥

नरश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर परम सुन्दरी अप्सरा मेनका पुष्करमें आयी और वहाँ स्नानकी तैयारी करने लगी॥ ४॥

तां ददर्श महातेजा मेनकां कुशिकात्मज:।

रूपेणाप्रतिमां तत्र विद्युतं जलदे यथा॥ ५॥

महातेजस्वी कुशिकनन्दन विश्वामित्रने वहाँ उस मेनकाको देखा। उसके रूप और लावण्यकी कहीं तुलना नहीं थी। जैसे बादलमें बिजली चमकती हो, उसी प्रकार वह पुष्करके जलमें शोभा पा रही थी॥ ५॥

कन्दर्पदर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत्।

अप्सर: स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे॥ ६॥

उसे देखकर विश्वामित्र मुनि कामके अधीन हो गये और उससे इस प्रकार बोले—‘अप्सरा! तेरा स्वागत है, तू मेरे इस आश्रममें निवास कर॥ ६॥

अनुगृह्णीष्व भद्रं ते मदनेन विमोहितम्।

इत्युक्ता सा वरारोहा तत्र वासमथाकरोत्॥ ७॥

‘तेरा भला हो। मैं कामसे मोहित हो रहा हूँ। मुझपर कृपा कर।’ उनके ऐसा कहनेपर सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेनका वहाँ निवास करने लगी॥ ७॥

तपसो हि महाविघ्नो विश्वामित्रमुपागमत्।

तस्यां वसन्त्यां वर्षाणि पञ्च पञ्च च राघव॥ ८॥

विश्वामित्राश्रमे सौम्ये सुखेन व्यतिचक्रमु:।

इस प्रकार तपस्याका बहुत बड़ा विघ्न विश्वामित्रजीके पास स्वयं उपस्थित हो गया। रघुनन्दन! मेनकाको विश्वामित्रजीके उस सौम्य आश्रमपर रहते हुए दस वर्ष बड़े सुखसे बीते॥ ८/

अथ काले गते तस्मिन् विश्वामित्रो महामुनि:॥ ९॥

सव्रीड इव संवृत्तश्चिन्ताशोकपरायण:।

इतना समय बीत जानेपर महामुनि विश्वामित्र लज्जित-से हो गये। चिन्ता और शोकमें डूब गये॥ ९/

बुद्धिर्मुने: समुत्पन्ना सामर्षा रघुनन्दन॥ १०॥

सर्वं सुराणां कर्मैतत् तपोऽपहरणं महत्।

रघुनन्दन! मुनिके मनमें रोषपूर्वक यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘यह सब देवताओंकी करतूत है। उन्होंने हमारी तपस्याका अपहरण करनेके लिये यह महान् प्रयास किया है॥ १०/

अहोरात्रापदेशेन गता: संवत्सरा दश॥ ११॥

काममोहाभिभूतस्य विघ्नोऽयं प्रत्युपस्थित:।

‘मैं कामजनित मोहसे ऐसा आक्रान्त हो गया कि मेरे दस वर्ष एक दिन-रातके समान बीत गये। यह मेरी तपस्यामें बहुत बड़ा विघ्न उपस्थित हो गया’॥ ११/

स नि:श्वसन् मुनिवर: पश्चात्तापेन दु:खित:॥ १२॥

ऐसा विचारकर मुनिवर विश्वामित्र लम्बी साँस खींचते हुए पश्चात्तापसे दु:खित हो गये॥ १२/

भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपन्तीं प्राञ्जलिं स्थिताम्।

मेनकां मधुरैर्वाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मज:॥ १३॥

उत्तरं पर्वतं राम विश्वामित्रो जगाम ह।

उस समय मेनका अप्सरा भयभीत हो थर-थर काँपती हुई हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गयी। उसकी ओर देखकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रने मधुर वचनोंद्वारा उसे विदा कर दिया और स्वयं वे उत्तर पर्वत (हिमवान्) पर चले गये॥ १३/

स कृत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं जेतुकामो महायशा:॥ १४॥

कौशिकीतीरमासाद्य तपस्तेपे दुरासदम्।

वहाँ उन महायशस्वी मुनिने निश्चयात्मक बुद्धिका आश्रय ले कामदेवको जीतनेके लिये कौशिकी-तटपर जाकर दुर्जय तपस्या आरम्भ की॥ १४/

तस्य वर्षसहस्राणि घोरं तप उपासत:॥ १५॥

उत्तरे पर्वते राम देवतानामभूद् भयम्।

श्रीराम! वहाँ उत्तर पर्वतपर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्यामें लगे हुए विश्वामित्रसे देवताओंको बड़ा भय हुआ॥ १५/

आमन्त्रयन् समागम्य सर्वे सर्षिगणा: सुरा:॥ १६॥

महर्षिशब्दं लभतां साध्वयं कुशिकात्मज:।

सब देवता और ऋषि परस्पर मिलकर सलाह करने लगे—‘ये कुशिकनन्दन विश्वामित्र महर्षिकी पदवी प्राप्त करें, यही इनके लिये उत्तम बात होगी’॥ १६/

देवतानां वच: श्रुत्वा सर्वलोकपितामह:॥ १७॥

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।

महर्षे स्वागतं वत्स तपसोग्रेण तोषित:॥ १८॥

महत्त्वमृषिमुख्यत्वं ददामि तव कौशिक।

देवताओंकी बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजी तपोधन विश्वामित्रके पास जा मधुर वाणीमें बोले—‘महर्षे! तुम्हारा स्वागत है। वत्स कौशिक! मैं तुम्हारी उग्र तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ और तुम्हें महत्ता एवं ऋषियोंमें श्रेष्ठता प्रदान करता हूँ’॥ १७-१८/

ब्रह्मणस्तु वच: श्रुत्वा विश्वामित्रस्तपोधन:॥ १९॥

प्राञ्जलि: प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम्।

ब्रह्मर्षिशब्दमतुलं स्वार्जितै: कर्मभि: शुभै:॥ २०॥

यदि मे भगवन्नाह ततोऽहं विजितेन्द्रिय:।

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर तपोधन विश्वामित्र हाथ जोड़ प्रणाम करके उनसे बोले—‘भगवन्! यदि अपने द्वारा उपार्जित शुभकर्मोंके फलसे मुझे आप ब्रह्मर्षिका अनुपम पद प्रदान कर सकें तो मैं अपनेको जितेन्द्रिय समझूँगा’॥ १९-२०/

तमुवाच ततो ब्रह्मा न तावत् त्वं जितेन्द्रिय:॥ २१॥

यतस्व मुनिशार्दूल इत्युक्त्वा त्रिदिवं गत:।

तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—‘मुनिश्रेष्ठ! अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हुए हो। इसके लिये प्रयत्न करो।’ ऐसा कहकर वे स्वर्गलोकको चले गये॥ २१॥

विप्रस्थितेषु देवेषु विश्वामित्रो महामुनि:॥ २२॥

ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बो वायुभक्षस्तपश्चरन्।

देवताओंके चले जानेपर महामुनि विश्वामित्रने पुन: घोर तपस्या आरम्भ की। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी आधारके खड़े होकर केवल वायु पीकर रहते हुए तपमें संलग्न हो गये॥ २२॥

घर्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रय:॥ २३॥

शिशिरे सलिलेशायी रात्र्यहानि तपोधन:।

एवं वर्षसहस्रं हि तपो घोरमुपागमत्॥ २४॥

गर्मीके दिनोंमें पञ्चाग्निका सेवन करते, वर्षाकालमें खुले आकाशके नीचे रहते और जाड़ेके समय रात-दिन पानीमें खड़े रहते थे। इस प्रकार उन तपोधनने एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की॥ २३-२४॥

तस्मिन् संतप्यमाने तु विश्वामित्रे महामुनौ।

संताप: सुमहानासीत् सुराणां वासवस्य च॥ २५॥

महामुनि विश्वामित्रके इस प्रकार तपस्या करते समय देवताओं और इन्द्रके मनमें बड़ा भारी संताप हुआ॥

रम्भामप्सरसं शक्र: सर्वै: सह मरुद्गणै:।

उवाचात्महितं वाक्यमहितं कौशिकस्य च॥ २६॥

समस्त मरुद्गणोंसहित इन्द्रने उस समय रम्भा अप्सरासे ऐसी बात कही, जो अपने लिये हितकर और विश्वामित्रके लिये अहितकर थी॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग:॥ ६३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

 


चतु:षष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रका रम्भाको शाप देकर पुन: घोर तपस्याके लिये दीक्षा लेना

सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत् त्वया।

लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम्॥ १॥

(इन्द्र बोले—) रम्भे! देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है। इसे तुम्हें ही पूरा करना है। तू महर्षि विश्वामित्रको इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोहके वशीभूत हो जायँ॥ १॥

तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता।

व्रीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम्॥ २॥

श्रीराम! बुद्धिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्रसे बोली—॥ २॥

अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनि:।

क्रोधमुत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशय:॥ ३॥

‘सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं। देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोधका प्रयोग करेंगे॥ ३॥

ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि।

एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा॥ ४॥

तामुवाच सहस्राक्षो वेपमानां कृताञ्जलिम्।

मा भैषी रम्भे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम्॥ ५॥

‘अत: देवेश्वर! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है, आप मुझपर कृपा करें।’ श्रीराम! डरी हुई रम्भाके इस प्रकार भयपूर्वक कहनेपर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर-थर काँपती हुई रम्भासे इस प्रकार बोले—‘रम्भे! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले॥ ४-५॥

कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे।

अहं कन्दर्पसहित: स्थास्यामि तव पार्श्वत:॥ ६॥

‘वैशाख मासमें जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवोंसे परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकलीसे सबके हृदयको खींचनेवाले कोकिल और कामदेवके साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा॥ ६॥

त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम्।

तमृषिं कौशिकं भद्रे भेदयस्व तपस्विनम्॥ ७॥

‘भद्रे! तू अपने परम कान्तिमान् रूपको हाव-भाव आदि विविध गुणोंसे सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनिको तपस्यासे विचलित कर दे’॥ ७॥

सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम्।

लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता॥ ८॥

देवराजका यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकानवाली सुन्दरी अप्सराने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्रको लुभाना आरम्भ किया॥ ८॥

कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरत: स्वनम्।

सम्प्रहृष्टेन मनसा स चैनामन्ववैक्षत॥ ९॥

विश्वामित्रने मीठी बोली बोलनेवाले कोकिलकी मधुर काकली सुनी। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी॥ ९॥

अथ तस्य च शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च।

दर्शनेन च रम्भाया मुनि: संदेहमागत:॥ १०॥

कोकिलके कलरव, रम्भाके अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शनसे मुनिके मनमें संदेह हो गया॥ १०॥

सहस्राक्षस्य तत्सर्वं विज्ञाय मुनिपुंगव:।

रम्भां क्रोधसमाविष्ट: शशाप कुशिकात्मज:॥ ११॥

देवराजका वह सारा कुचक्र उनकी समझमें आ गया। फिर तो मुनिवर विश्वामित्रने क्रोधमें भरकर रम्भाको शाप देते हुए कहा—॥ ११॥

यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम्।

दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे॥ १२॥

‘दुर्भगे रम्भे! मैं काम और क्रोधपर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है। अत: इस अपराधके कारण तू दस हजार वर्षोंतक पत्थरकी प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी॥ १२॥

ब्राह्मण: सुमहातेजास्तपोबलसमन्वित:।

उद्धरिष्यति रम्भे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम्॥ १३॥

‘रम्भे! शापका समय पूरा हो जानेके बाद एक महान् तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण (ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ) मेरे क्रोधसे कलुषित तेरा उद्धार करेंगे’॥

एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनि:।

अशक्नुवन् धारयितुं कोपं संतापमात्मन:॥ १४॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे॥ १४॥

तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत्।

वच: श्रुत्वा च कन्दर्पो महर्षे: स च निर्गत:॥ १५॥

मुनिके उस महाशापसे रम्भा तत्काल पत्थरकी प्रतिमा बन गयी। महर्षिका वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँसे खिसक गये॥ १५॥

कोपेन च महातेजास्तपोऽपहरणे कृते।

इन्द्रियैरजितै राम न लेभे शान्तिमात्मन:॥ १६॥

श्रीराम! क्रोधसे तपस्याका क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभीतक काबूमें न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनिके चित्तको शान्ति नहीं मिलती थी॥ १६॥

बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते।

नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन॥ १७॥

तपस्याका अपहरण हो जानेपर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘अबसे न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्थामें मुँहसे कुछ बोलूँगा॥ १७॥

अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि।

अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रिय:॥ १८॥

‘अथवा सौ वर्षोंतक मैं श्वास भी न लूँगा। इन्द्रियोंको जीतकर इस शरीरको सुखा डालूँगा॥ १८॥

तावद् यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम्।

अनुच्छ्वसन्नभुञ्जानस्तिष्ठेयं शाश्वती: समा:॥ १९॥

‘जबतक अपनी तपस्यासे उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तबतक चाहे अनन्त वर्ष बीत जायँ, मैं बिना खाये-पीये खड़ा रहूँगा और साँसतक न लूँगा॥ १९॥

नहि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तय:।

एवं वर्षसहस्रस्य दीक्षां स मुनिपुंगव:।

चकाराप्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुनन्दन॥ २०॥

‘तपस्या करते समय मेरे शरीरके अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे।’ रघुनन्दन! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्रने पुन: एक हजार वर्षोंतक तपस्या करनेके लिये दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसारमें कहीं तुलना नहीं है॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग:॥ ६४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

 

पञ्चषष्टितम: सर्ग:

विश्वामित्रकी घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति तथा राजा जनकका उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवनको लौटना

अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनि:।

पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥ १॥

(शतानन्दजी कहते हैं—)श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञाके अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशाको त्यागकर पूर्व दिशामें चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १॥

मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम्।

चकाराप्रतिमं राम तप: परमदुष्करम्॥ २॥

रघुनन्दन! एक सहस्र वर्षोंतक परम उत्तम मौन- व्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्यामें लगे रहे। उनके उस तपकी कहीं तुलना न थी॥ २॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम्।

विघ्नैर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत्॥ ३॥

एक हजार वर्ष पूर्ण होनेतक वे महामुनि काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीचमें उनपर बहुत-से विघ्नोंका आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥ ३॥

स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम्।

तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रत:॥ ४॥

भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम।

इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत॥ ५॥

श्रीराम! अपने निश्चयपर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तपका अनुष्ठान किया। उनका एक सहस्र वर्षोंका व्रत पूर्ण होनेपर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करनेको उद्यत हुए। रघुकुलभूषण! इसी समय इन्द्रने ब्राह्मणके वेषमें आकर उनसे तैयार अन्नकी याचना की॥ ४-५॥

तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चित:।

नि:शेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपा:॥ ६॥

तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मणको देनेका निश्चय करके दे डाला। उस अन्नमेंसे कुछ भी शेष नहीं बचा। इसलिये वे महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये॥ ६॥

न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थित:।

तथैवासीत् पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह॥ ७॥

फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मणसे कुछ कहा नहीं। अपने मौन-व्रतका यथार्थरूपसे पालन किया। इसके बाद पुन: पहलेकी ही भाँति श्वासोच्छ्वाससे रहित मौन-व्रतका अनुष्ठान आरम्भ किया॥ ७॥

अथ वर्षसहस्रं च नोच्छ्वसन् मुनिपुंगव:।

तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत॥ ८॥

पूरे एक हजार वर्षोंतक उन मुनिश्रेष्ठने साँसतक नहीं ली। इस तरह साँस न लेनेके कारण उनके मस्तकसे धुआँ उठने लगा॥ ८॥

त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत्।

ततो देवर्षिगन्धर्वा: पन्नगोरगराक्षसा:॥ ९ ॥

मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मय:।

कश्मलोपहता: सर्वे पितामहमथाब्रुवन्॥ १०॥

उससे तीनों लोकोंके प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे। उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनिकी तपस्यासे मोहित हो गये। उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे सब-के-सब दु:खसे व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजीसे बोले—॥ ९-१०॥

बहुभि: कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनि:।

लोभित: क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते॥ ११॥

‘देव! अनेक प्रकारके निमित्तोंद्वारा महामुनि विश्वामित्रको लोभ और क्रोध दिलानेकी चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्याके प्रभावसे निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं॥ ११॥

नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत।

न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम्॥ १२॥

विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम्।

व्याकुलाश्च दिश: सर्वा न च किंचित् प्रकाशते॥ १३॥

‘हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता। यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका नाश कर डालेंगे। इस समय सारी दिशाएँ धूमसे आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है॥

सागरा: क्षुभिता: सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वता:।

प्रकम्पते च वसुधा वायुर्वातीह संकुल:॥ १४॥

‘समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है॥ १४॥

ब्रह्मन् न प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जन:।

सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम्॥ १५॥

‘ब्रह्मन्! हमें इस उपद्रवके निवारणका कोई उपाय नहीं समझमें आता है। सब लोग नास्तिककी भाँति कर्मानुष्ठानसे शून्य हो रहे हैं। तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन क्षुब्ध हो गया है। सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं॥ १५॥

भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा।

बुद्धिं न कुरुते यावन्नाशे देव महामुनि:॥ १६॥

तावत् प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युति:।

‘महर्षि विश्वामित्रके तेजसे सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी है। भगवन्! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं। देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत्के विनाशका विचार नहीं करते तबतक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये॥ १६/

कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम्॥ १७॥

देवराज्यं चिकीर्षेत दीयतामस्य यन्मन:।

‘जैसे पूर्वकालमें प्रलयकालिक अग्निने सम्पूर्ण त्रिलोकीको दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे। यदि ये देवताओंका राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय। इनके मनमें जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय’॥

तत: सुरगणा: सर्वे पितामहपुरोगमा:॥ १८॥

विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन्।

तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्रके पास जाकर मधुर वाणीमें बोले—॥ १८/

ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिता:॥ १९॥

ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्राप्तवानसि कौशिक।

‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हुए हैं। कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्यासे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया॥ १९/

दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन् ददामि समरुद्गण:॥ २०॥

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम्।

‘ब्रह्मन्! मरुद्गणोंसहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। सौम्य! तुम मंगलके भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ’॥ २०/

पितामहवच: श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्॥ २१॥

कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनि:।

पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम किया और कहा—॥ २१॥

ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च॥ २२॥

ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम्।

क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि॥ २३॥

ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवता:।

यद्येवं परम: काम: कृतो यान्तु सुरर्षभा:॥ २४॥

‘देवगण! यदि मुझे (आपकी कृपासे) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयुकी भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें। इसके सिवा जो क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) तथा ब्रह्मवेद (ऋक् आदि चारों वेद) के ज्ञाताओंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझसे ऐसा कहें (कि तुम ब्राह्मण हो गये), यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूँगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण हो गया। उस अवस्थामें आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँसे जा सकते हैं’॥ २२—२४॥

तत: प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वर:।

सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत्॥ २५॥

तब देवताओंने मन्त्रजप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिको प्रसन्न किया। इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ‘एवमस्तु’ कहकर विश्वामित्रका ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली॥ २५॥

ब्रह्मर्षिस्त्वं न संदेह: सर्वं सम्पद्यते तव।

इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम्॥ २६॥

‘मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया।’ ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये॥ २६॥

विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम्।

पूजयामास ब्रह्मर्षिं वसिष्ठं जपतां वरम्॥ २७॥

इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजीने भी मन्त्र-जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठका पूजन किया॥ २७॥

कृतकामो महीं सर्वां चचार तपसि स्थित:।

एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना॥ २८॥

इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्यामें लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरने लगे। श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्माने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया॥ २८॥

एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तप:।

एष धर्म: परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम्॥ २९॥

रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं, ये तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्मके साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रमकी परम निधि हैं॥ २९॥

एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तम:।

शतानन्दवच: श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ॥ ३०॥

जनक: प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम्।

ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजीके मुखसे यह कथा सुनकर महाराज जनकने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप विश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर कहा—॥ ३०/

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव॥ ३१॥

यज्ञं काकुत्स्थसहित: प्राप्तवानसि कौशिक।

पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने॥ ३२॥

‘मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणके साथ मेरे यज्ञमें पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर बड़ी कृपा की। महामुने! ब्रह्मन्! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया॥

गुणा बहुविधा: प्राप्तास्तव संदर्शनान्मया।

विस्तरेण च वै ब्रह्मन् कीर्त्यमानं महत्तप:॥ ३३॥

श्रुतं मया महातेजो रामेण च महात्मना।

सदस्यै: प्राप्य च सद: श्रुतास्ते बहवो गुणा:॥ ३४॥

‘आपके दर्शनसे मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकारके गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन्! आज इस सभामें आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्योंके साथ आपके महान् तेज (प्रभाव) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं। ब्रह्मन्! शतानन्दजीने आपके महान् तपका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है॥ ३३-३४॥

अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम्।

अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज॥ ३५॥

‘कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्यासे परे हैं॥ ३५॥

तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो।

कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम्॥ ३६॥

‘प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओंके श्रवणसे मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञका समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं॥ ३६॥

श्व: प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुन:।

स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि॥ ३७॥

‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है। कल प्रात:काल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जानेकी आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७॥

एवमुक्तो मुनिवर: प्रशस्य पुरुषर्षभम्।

विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा॥ ३८॥

राजाके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्वामित्रजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनककी प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया॥ ३८॥

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिप:।

प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्याय: सबान्धव:॥ ३९॥

उस समय मिथिलापति विदेहराज जनकने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंके साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की। फिर वहाँसे वे चल दिये॥ ३९॥

विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा सहराम: सलक्ष्मण:।

स्ववासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभि:॥ ४०॥

तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओंसे पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मणके साथ अपने विश्राम-स्थानपर लौट आये॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चषष्टितम: सर्ग:॥ ६५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥

 

षट्षष्टितम: सर्ग:

राजा जनकका विश्वामित्र और राम-लक्ष्मणका सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुषका परिचय देना और धनुष चढ़ा देनेपर श्रीरामके साथ उनके ब्याहका निश्चय प्रकट करना

तत: प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिप:।

विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम्॥ १॥

तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।

राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह॥ २॥

तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आनेपर धर्मात्मा राजा जनकने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मणसहित महात्मा विश्वामित्रजीको बुलाया और शास्त्रीय विधिके अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंका पूजन करके इस प्रकार कहा—॥ १-२॥

भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ।

भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्॥ ३॥

‘भगवन्! आपका स्वागत है। निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’॥ ३॥

एवमुक्त: स धर्मात्मा जनकेन महात्मना।

प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारद:॥ ४॥

महात्मा जनकके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने उनसे यह बात कही—॥ ४॥

पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ।

द्रष्टुकामौ धनु:श्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति॥ ५॥

‘महाराज! राजा दशरथके ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं॥ ५॥

एतद् दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ।

दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यत:॥ ६॥

‘आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी। फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुषके दर्शनमात्रसे संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानीको लौट जायँगे’॥ ६॥

एवमुक्तस्तु जनक: प्रत्युवाच महामुनिम्।

श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति॥ ७॥

मुनिके ऐसा कहनेपर राजा जनक महामुनि विश्वामित्रसे बोले—‘मुनिवर! इस धनुषका वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्यसे यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ॥ ७॥

देवरात इति ख्यातो निमेर्ज्येष्ठो महीपति:।

न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मन:॥ ८॥

‘भगवन्! निमिके ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरातके नामसे विख्यात थे। उन्हीं महात्माके हाथमें यह धनुष धरोहरके रूपमें दिया गया था॥ ८॥

दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्।

विध्वंस्य त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत्॥ ९ ॥

यस्माद् भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुरा:।

वरांगानि महार्हाणि धनुषा शातयामि व:॥ १०॥

‘कहते हैं, पूर्वकालमें दक्षयज्ञ-विध्वंसके समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्करने खेल-खेलमें ही रोषपूर्वक इस धनुषको उठाकर यज्ञ-विध्वंसके पश्चात् देवताओंसे कहा—‘देवगण! मैं यज्ञमें भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुमलोगोंने नहीं दिया। इसलिये इस धनुषसे मैं तुम सब लोगोंके परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग—मस्तक काट डालूँगा’॥ ९-१०॥

ततो विमनस: सर्वे देवा वै मुनिपुंगव।

प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद् भव:॥ ११॥

‘मुनिश्रेष्ठ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे। अन्तमें उनपर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये॥ ११॥

प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्।

तदेतद् देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मन:॥ १२॥

न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।

‘प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओंको यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्करका धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरातके पास धरोहरके रूपमें रखा गया था॥ १२/

अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:॥ १३॥

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।

भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥ १४॥

‘एक दिन मैं यज्ञके लिये भूमिशोधन करते समय खेतमें हल चला रहा था। उसी समय हलके अग्रभागसे जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होनेके कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वीसे प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमश: बढ़कर सयानी हुई॥ १३-१४॥

वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।

भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्॥ १५॥

वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव।

‘अपनी इस अयोनिजा कन्याके विषयमें मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रमसे इस धनुषको चढ़ा देगा, उसीके साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घरमें रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतलसे प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़नेवाली मेरी पुत्री सीताको कई राजाओंने यहाँ आकर माँगा॥ १५/

तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्॥ १६॥

वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम्।

‘परंतु भगवन्! कन्याका वरण करनेवाले उन सभी राजाओंको मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करनेपर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करनेका अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आजतक किसीको अपनी कन्या नहीं दी॥ १६/

तत: सर्वे नृपतय: समेत्य मुनिपुंगव॥ १७॥

मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा।

‘मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिलामें आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीताको प्राप्त करनेके लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया है॥

तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम्॥ १८॥

न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा।

‘मैंने पराक्रमकी जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओंके सामने यह शिवजीका धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलानेमें भी समर्थ न हो सके॥ १८/

तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने॥ १९॥

प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन।

‘महामुने! उन पराक्रमी नरेशोंकी शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देनेसे इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये॥ १९/

तत: परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव॥ २०॥

अरुन्धन् मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागता:।

‘मुनिप्रवर! मेरे इनकार करनेपर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रमके विषयमें संशयापन्न हो मिथिलाको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये॥ २०/

आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुंगवा:॥ २१॥

रोषेण महताविष्टा: पीडयन् मिथिलां पुरीम्।

‘मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशोंने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरीको सब ओरसे पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया॥ २१/

तत: संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वश:॥ २२॥

साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदु:खित:।

‘मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीचमें युद्धके सारे साधन क्षीण हो गये। इससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ॥ २२/

ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम्॥ २३॥

ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुरा:।

‘तब मैंने तपस्याके द्वारा समस्त देवताओंको प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की॥ २३/

ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययु:॥ २४॥

अवीर्या वीर्यसंदिग्धा: सामात्या: पापकारिण:।

‘फिर तो हमारे सैनिकोंकी मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होनेमें संदेह था, मन्त्रियोंसहित भागकर विभिन्न दिशाओंमें चले गये॥ २४/

तदेतन्मुनिशार्दूल धनु: परमभास्वरम्॥ २५॥

रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत।

‘मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मणको भी दिखाऊँगा॥ २५/

यद्यस्य धनुषो राम: कुर्यादारोपणं मुने।

सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम्॥ २६॥

‘मुने! यदि श्रीराम इस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीताको इन दशरथकुमारके हाथमें दे दूँ’॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितम: सर्ग:॥ ६६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥

 

सप्तषष्टितम: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा धनुर्भंग तथा राजा जनकका विश्वामित्रकी आज्ञासे राजा दशरथको बुलानेके लिये मन्त्रियोंको भेजना

जनकस्य वच: श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनि:।

धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम्॥ १॥

जनककी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले—‘राजन्! आप श्रीरामको अपना धनुष दिखाइये’॥

तत: स राजा जनक: सचिवान् व्यादिदेश ह।

धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम्॥ २॥

तब राजा जनकने मन्त्रियोंको आज्ञा दी—‘चन्दन और मालाओंसे सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ’॥ २॥

जनकेन समादिष्टा: सचिवा: प्राविशन् पुरम्।

तद्धनु: पुरत: कृत्वा निर्जग्मुरमितौजस:॥ ३॥

राजा जनककी आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगरमें गये और उस धनुषको आगे करके पुरीसे बाहर निकले॥ ३॥

नृणां शतानि पञ्चाशद् व्यायतानां महात्मनाम्।

मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहुस्ते कथंचन॥ ४॥

वह धनुष आठ पहियोंवाली लोहेकी बहुत बड़ी संदूकमें रखा गया था। उसे मोटे-ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँतक ला सके॥ ४॥

तामादाय सुमञ्जूषामायसीं यत्र तद्धनु:।

सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिण:॥ ५॥

लोहेकी वह संदूक, जिसमें धनुष रखा गया था, लाकर उन मन्त्रियोंने देवोपम राजा जनकसे कहा—॥

इदं धनुर्वरं राजन् पूजितं सर्वराजभि:।

मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि॥ ६॥

‘राजन्! मिथिलापते! राजेन्द्र! यह समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है। यदि आप इन दोनों राजकुमारोंको दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये’॥ ६॥

तेषां नृपो वच: श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत।

विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥ ७॥

उनकी बात सुनकर राजा जनकने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—॥ ७॥

इदं धनुर्वरं ब्रह्मञ्जनकैरभिपूजितम्।

राजभिश्च महावीर्यैरशक्तै: पूरितं तदा॥ ८॥

‘ब्रह्मन्! यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनकवंशी नरेशोंने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठानेमें समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशोंने भी इसका पूर्वकालमें सम्मान किया है॥ ८॥

नैतत् सुरगणा: सर्वे सासुरा न च राक्षसा:।

गन्धर्वयक्षप्रवरा: सकिन्नरमहोरगा:॥ ९॥

‘इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े-बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं॥ ९॥

क्व गतिर्मानुषाणां च धनुषोऽस्य प्रपूरणे।

आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा॥ १०॥

‘फिर इस धनुषको खींचने, चढ़ाने, इसपर बाण संधान करने, इसकी प्रत्यञ्चापर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर-उधर हिलानेमें मनुष्योंकी कहाँ शक्ति है?॥ १०॥

तदेतद् धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुंगव।

दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयो:॥ ११॥

‘मुनिप्रवर! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है। महाभाग! आप इसे इन दोनों राजकुमारोंको दिखाइये’॥

विश्वामित्र: सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम्।

वत्स राम धनु: पश्य इति राघवमब्रवीत्॥ १२॥

श्रीरामसहित विश्वामित्रने जनकका वह कथन सुनकर रघुनन्दनसे कहा—‘वत्स राम! इस धनुषको देखो’॥ १२॥

महर्षेर्वचनाद् रामो यत्र तिष्ठति तद्धनु:।

मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत्॥ १३॥

महर्षिकी आज्ञासे श्रीरामने जिसमें वह धनुष था उस संदूकको खोलकर उस धनुषको देखा और कहा—॥ १३॥

इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना।

यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा॥ १४॥

‘अच्छा अब मैं इस दिव्य एवं श्रेष्ठ धनुषमें हाथ लगाता हूँ। मैं इसे उठाने और चढ़ानेका भी प्रयत्न करूँगा’॥ १४॥

बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत।

लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुने:॥ १५॥

पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दन:।

आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनु:॥ १६॥

तब राजा और मुनिने एक स्वरसे कहा—‘हाँ, ऐसा ही करो।’ मुनिकी आज्ञासे रघुकुलनन्दन धर्मात्मा श्रीरामने उस धनुषको बीचसे पकड़कर लीलापूर्वक उठा लिया और खेल-सा करते हुए उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। उस समय कई हजार मनुष्योंकी दृष्टि उनपर लगी थी॥ १५-१६॥

आरोपयित्वा मौर्वीं च पूरयामास तद्धनु:।

तद् बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशा:॥ १७॥

प्रत्यञ्चा चढ़ाकर महायशस्वी नरश्रेष्ठ श्रीरामने ज्यों ही उस धनुषको कानतक खींचा त्यों ही वह बीचसे ही टूट गया॥ १७॥

तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनि:स्वन:।

भूमिकम्पश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यत:॥ १८॥

टूटते समय उससे वज्रपातके समान बड़ी भारी आवाज हुई। ऐसा जान पड़ा मानो पर्वत फट पड़ा हो। उस समय महान् भूकम्प आ गया॥ १८॥

निपेतुश्च नरा: सर्वे तेन शब्देन मोहिता:।

वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघवौ॥ १९॥

मुनिवर विश्वामित्र, राजा जनक तथा रघुकुलभूषण दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको छोड़कर शेष जितने लोग वहाँ खड़े थे, वे सब धनुष टूटनेके उस भयंकर शब्दसे मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥ १९॥

प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन् राजा विगतसाध्वस:।

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुंगवम्॥ २०॥

थोड़ी देरमें जब सबको चेत हुआ, तब निर्भय हुए राजा जनकने, जो बोलनेमें कुशल और वाक्यके मर्मको समझनेवाले थे, हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्रसे कहा—॥ २०॥

भगवन् दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मज:।

अत्यद्भुतमचिन्त्यं च अतर्कितमिदं मया॥ २१॥

‘भगवन्! मैंने दशरथनन्दन श्रीरामका पराक्रम आज अपनी आँखों देख लिया। महादेवजीके धनुषको चढ़ाना—यह अत्यन्त अद्भुत, अचिन्त्य और अतर्कित घटना है॥

जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता।

सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम्॥ २२॥

‘मेरी पुत्री सीता दशरथकुमार श्रीरामको पतिरूपमें प्राप्त करके जनकवंशकी कीर्तिका विस्तार करेगी॥ २२॥

मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक।

सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता॥ २३॥

‘कुशिकनन्दन! मैंने सीताको वीर्यशुल्का (पराक्रमरूपी शुल्कसे ही प्राप्त होनेवाली) बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य एवं सफल हो गयी। सीता मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। अपनी यह पुत्री मैं श्रीरामको समर्पित करूँगा॥ २३॥

भवतोऽनुमते ब्रह्मन् शीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिण:।

मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथै:॥ २४॥

राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुरं मम।

प्रदानं वीर्यशुल्काया: कथयन्तु च सर्वश:॥ २५॥

‘ब्रह्मन्! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो। यदि आपकी आज्ञा हो तो मेरे मन्त्री रथपर सवार होकर बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही अयोध्याको जायँ और विनययुक्त वचनोंद्वारा महाराज दशरथको मेरे नगरमें लिवा लायें। साथ ही यहाँका सब समाचार बताकर यह निवेदन करें कि जिसके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया गया था, उस जनककुमारी सीताका विवाह श्रीरामचन्द्रजीके साथ होने जा रहा है॥ २४-२५॥

मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थौ कथयन्तु नृपाय वै।

प्रीतियुक्तं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगा:॥ २६॥

‘ये लोग महाराज दशरथसे यह भी कह दें कि आपके दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा सुरक्षित हो मिथिलामें पहुँच गये हैं। इस प्रकार प्रीतियुक्त हुए राजा दशरथको ये शीघ्रगामी सचिव जल्दी यहाँ बुला लायें’॥ २६॥

कौशिकस्तु तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिण:।

अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान्।

यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं च नृपं तथा॥ २७॥

विश्वामित्रने ‘तथास्तु’ कहकर राजाकी बातका समर्थन किया। तब धर्मात्मा राजा जनकने अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले मन्त्रियोंको समझा-बुझाकर यहाँका ठीक-ठीक समाचार महाराज दशरथको बताने और उन्हें मिथिलापुरीमें ले आनेके लिये भेज दिया॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तषष्टितम: सर्ग:॥ ६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥

 

अष्टषष्टितम: सर्ग:

राजा जनकका संदेश पाकर मन्त्रियोंसहित महाराज दशरथका मिथिला जानेके लिये उद्यत होना

जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहना:।

त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम्॥ १॥

राजा जनककी आज्ञा पाकर उनके दूत अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए। रास्तेमें वाहनोंके थक जानेके कारण तीन रात विश्राम करके चौथे दिन वे अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे॥ १॥

ते राजवचनाद् गत्वा राजवेश्म प्रवेशिता:।

ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम्॥ २॥

राजाकी आज्ञासे उनका राजमहलमें प्रवेश हुआ। वहाँ जाकर उन्होंने देवतुल्य तेजस्वी बूढ़े महाराज दशरथका दर्शन किया॥ २॥

बद्धाञ्जलिपुटा: सर्वे दूता विगतसाध्वसा:।

राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन् मधुराक्षरम्॥ ३॥

मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृत:।

मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा॥ ४॥

कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम्।

जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुर:सरम्॥ ५॥

उन सभी दूतोंने दोनों हाथ जोड़ निर्भय हो राजासे मधुर वाणीमें यह विनययुक्त बात कही—‘महाराज! मिथिलापति राजा जनकने अग्निहोत्रकी अग्निको सामने रखकर स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें सेवकोंसहित आपका तथा आपके उपाध्याय और पुरोहितोंका बारम्बार कुशल-मंगल पूछा है॥ ३—५॥

पृष्ट्वा कुशलमव्यग्रं वैदेहो मिथिलाधिप:।

कौशिकानुमते वाक्यं भवन्तमिदमब्रवीत्॥ ६॥

‘इस प्रकार व्यग्रतारहित कुशल पूछकर मिथिलापति विदेहराजने महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे आपको यह संदेश दिया है॥ ६॥

पूर्वं प्रतिज्ञा विदिता वीर्यशुल्का ममात्मजा।

राजानश्च कृतामर्षा निर्वीर्या विमुखीकृता:॥ ७॥

‘राजन्! आपको मेरी पहले की हुई प्रतिज्ञाका हाल मालूम होगा। मैंने अपनी पुत्रीके विवाहके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया था। उसे सुनकर कितने ही राजा अमर्षमें भरे हुए आये; किंतु यहाँ पराक्रमहीन सिद्ध हुए और विमुख होकर घर लौट गये॥ ७॥

सेयं मम सुता राजन् विश्वामित्रपुरस्कृतै:।

यदृच्छयागतै राजन् निर्जिता तव पुत्रकै:॥ ८॥

‘नरेश्वर! मेरी इस कन्याको विश्वामित्रजीके साथ अकस्मात् घूमते-फिरते आये हुए आपके पुत्र श्रीरामने अपने पराक्रमसे जीत लिया है॥ ८॥

तच्च रत्नं धनुर्दिव्यं मध्ये भग्नं महात्मना।

रामेण हि महाबाहो महत्यां जनसंसदि॥ ९॥

‘महाबाहो! महात्मा श्रीरामने महान् जनसमुदायके मध्य मेरे यहाँ रखे हुए रत्नस्वरूप दिव्य धनुषको बीचसे तोड़ डाला है॥ ९॥

अस्मै देया मया सीता वीर्यशुल्का महात्मने।

प्रतिज्ञां तर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि॥ १०॥

‘अत: मैं इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीको अपनी वीर्यशुल्का कन्या सीता प्रदान करूँगा। ऐसा करके मैं अपनी प्रतिज्ञासे पार होना चाहता हूँ। आप इसके लिये मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें॥ १०॥

सोपाध्यायो महाराज पुरोहितपुरस्कृत:।

शीघ्रमागच्छ भद्रं ते द्रष्टुमर्हसि राघवौ॥ ११॥

‘महाराज! आप अपने गुरु एवं पुरोहितके साथ यहाँ शीघ्र पधारें और अपने दोनों पुत्र रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको देखें। आपका भला हो॥ ११॥

प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि।

पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमुपलप्स्यसे॥ १२॥

‘राजेन्द्र! यहाँ पधारकर आप मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण करें। यहाँ आनेसे आपको अपने दोनों पुत्रोंके विवाहजनित आनन्दकी प्राप्ति होगी॥ १२॥

एवं विदेहाधिपतिर्मधुरं वाक्यमब्रवीत्।

विश्वामित्राभ्यनुज्ञात: शतानन्दमते स्थित:॥ १३॥

‘राजन्! इस तरह विदेहराजने आपके पास यह मधुर संदेश भेजा था। इसके लिये उन्हें विश्वामित्रजीकी आज्ञा और शतानन्दजीकी सम्मति भी प्राप्त हुई थी’॥ १३॥

दूतवाक्यं तु तच्छ्रुत्वा राजा परमहर्षित:।

वसिष्ठं वामदेवं च मन्त्रिणश्चैवमब्रवीत्॥ १४॥

संदेशवाहक मन्त्रियोंका यह वचन सुनकर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य मन्त्रियोंसे कहा—॥ १४॥

गुप्त: कुशिकपुत्रेण कौसल्यानन्दवर्धन:।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विदेहेषु वसत्यसौ॥ १५॥

‘कुशिकनन्दन विश्वामित्रसे सुरक्षित हो कौसल्याका आनन्दवर्धन करनेवाले श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मणके साथ विदेहदेशमें निवास करते हैं॥ १५॥

दृष्टवीर्यस्तु काकुत्स्थो जनकेन महात्मना।

सम्प्रदानं सुतायास्तु राघवे कर्तुमिच्छति॥ १६॥

‘वहाँ महात्मा राजा जनकने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा है। इसलिये वे अपनी पुत्री सीताका विवाह रघुकुलरत्न रामके साथ करना चाहते हैं॥ १६॥

यदि वो रोचते वृत्तं जनकस्य महात्मन:।

पुरीं गच्छामहे शीघ्रं मा भूत् कालस्य पर्यय:॥ १७॥

‘यदि आपलोगोंकी रुचि एवं सम्मति हो तो हमलोग शीघ्र ही महात्मा जनककी मिथिलापुरीको चलें। इसमें विलम्ब न हो’॥ १७॥

मन्त्रिणो बाढमित्याहु: सह सर्वैर्महर्षिभि:।

सुप्रीतश्चाब्रवीद् राजा श्वो यात्रेति च मन्त्रिण:॥ १८॥

यह सुनकर समस्त महर्षियोंसहित मन्त्रियोंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर एक स्वरसे चलनेकी सम्मति दी। राजा बड़े प्रसन्न हुए और मन्त्रियोंसे बोले—‘कल सबेरे ही यात्रा कर देनी चाहिये’॥ १८॥

मन्त्रिणस्तु नरेन्द्रस्य रात्रिं परमसत्कृता:।

ऊषु: प्रमुदिता: सर्वे गुणै: सर्वै: समन्विता:॥ १९॥

महाराज दशरथके सभी मन्त्री समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे। राजाने उनका बड़ा सत्कार किया। अत: बारात चलनेकी बात सुनकर उन्होंने बड़े आनन्दसे वह रात्रि व्यतीत की॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टषष्टितम: सर्ग:॥ ६८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥

 

एकोनसप्ततितम: सर्ग:

दल-बलसहित राजा दशरथकी मिथिला-यात्रा और वहाँ राजा जनकके द्वारा उनका स्वागत-सत्कार

ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्याय: सबान्धव:।

राजा दशरथो हृष्ट: सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दशरथ हर्षमें भरकर सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम्।

व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विता:॥ २॥

‘आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न हो सबसे आगे चलें। उनकी रक्षाके लिये हर तरहकी सुव्यवस्था होनी चाहिये॥ २॥

चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वश:।

ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम्॥ ३॥

‘सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँसे शीघ्र ही कूच कर दे। अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें॥

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यप:।

मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुऋर्षि: कात्यायनस्तथा॥ ४॥

एते द्विजा: प्रयान्त्वग्रे स्यन्दनं योजयस्व मे।

यथा कालात्ययो न स्याद् दूता हि त्वरयन्ति माम्॥ ५॥

‘वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घजीवी मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन—ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलें। मेरा रथ भी तैयार करो। देर नहीं होनी चाहिये। राजा जनकके दूत मुझे जल्दी करनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं’॥ ४-५॥

वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरंगिणी।

राजानमृषिभि: सार्धं व्रजन्तं पृष्ठतोऽन्वयात्॥ ६॥

राजाकी इस आज्ञाके अनुसार चतुरंगिणी सेना तैयार हो गयी और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथके पीछे-पीछे चली॥ ६॥

गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान्।

राजा च जनक: श्रीमान् श्रुत्वा पूजामकल्पयत्॥ ७॥

चार दिनका मार्ग तय करके वे सब लोग विदेह-देशमें जा पहुँचे। उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीमान् राजा जनकने स्वागत-सत्कारकी तैयारी की॥ ७॥

ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम्।

मुदितो जनको राजा प्रहर्षं परमं ययौ॥ ८॥

तत्पश्चात् आनन्दमग्न हुए राजा जनक बूढ़े महाराज दशरथके पास पहुँचे। उनसे मिलकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥

उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम्।

स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव॥ ९॥

राजाओंमें श्रेष्ठ मिथिलानरेशने आनन्दमग्न हुए पुरुषप्रवर राजा दशरथसे कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। मेरे बड़े भाग्य, जो आप यहाँ पधारे॥ ९॥

पुत्रयोरुभयो: प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम्।

दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषि:॥ १०॥

सह सर्वैर्द्विजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतु:।

‘आप यहाँ अपने दोनों पुत्रोंकी प्रीति प्राप्त करेंगे, जो उन्होंने अपने पराक्रमसे जीतकर पायी है। महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने भी हमारे सौभाग्यसे ही यहाँ पदार्पण किया है। ये इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १०/

दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम्॥ ११॥

राघवै: सह सम्बन्धाद् वीर्यश्रेष्ठैर्महाबलै:।

‘सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं। रघुकुलके महापुरुष महान् बलसे सम्पन्न और पराक्रममें सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुलके साथ सम्बन्ध होनेके कारण आज मेरे कुलका सम्मान बढ़ गया॥ ११/

श्व: प्रभाते नरेन्द्र त्वं संवर्तयितुमर्हसि॥ १२॥

यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमै:।

‘नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियोंके साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञकी समाप्तिके बाद आप श्रीरामके विवाहका शुभकार्य सम्पन्न करें’॥ १२/

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिप:॥ १३॥

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठ: प्रत्युवाच महीपतिम्।

ऋषियोंकी मण्डलीमें राजा जनककी यह बात सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथने मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३/

प्रतिग्रहो दातृवश: श्रुतमेतन्मया पुरा॥ १४॥

यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम्।

‘धर्मज्ञ! मैंने पहलेसे यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाताके अधीन होता है। अत: आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे’॥ १४/

तद् धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिन:॥ १५॥

श्रुत्वा विदेहाधिपति: परं विस्मयमागत:।

सत्यवादी राजा दशरथका वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनकको बड़ा विस्मय हुआ॥ १५/

तत: सर्वे मुनिगणा: परस्परसमागमे॥ १६॥

हर्षेण महता युक्तास्तां रात्रिमवसन् सुखम्।

तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुखसे वह रात बितायी॥ १६/

अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ॥ १७॥

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितु: पादावुपस्पृशन्।

इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके लक्ष्मणके साथ पिताजीके पास गये और उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ १७/

राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षित:॥ १८॥

उवास परमप्रीतो जनकेनाभिपूजित:।

राजा दशरथने भी जनकके द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल- रत्न पुत्रोंको सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रातमें बड़े सुखसे वहाँ रहे॥ १८/

जनकोऽपि महातेजा: क्रिया धर्मेण तत्त्ववित्।

यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह॥ १९॥

महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनकने भी धर्मके अनुसार यज्ञकार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओंके लिये मंगलाचारका सम्पादन करके सुखसे वह रात्रि व्यतीत की॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनसप्ततितम: सर्ग:॥ ६९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥

 

सप्ततितम: सर्ग:

राजा जनकका अपने भाई कुशध्वजको सांकाश्या नगरीसे बुलवाना, राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सूर्यवंशका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये सीता तथा ऊर्मिलाको वरण करना

तत: प्रभाते जनक: कृतकर्मा महर्षिभि:।

उवाच वाक्यं वाक्यज्ञ: शतानन्दं पुरोहितम्॥ १॥

तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियोंके सहयोगसे अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजीसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिक:।

कुशध्वज इति ख्यात: पुरीमध्यवसच्छुभाम्॥ २॥

वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमतीं नदीम्।

सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम्॥ ३॥

‘ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदीका जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरीमें निवास करते हैं। उसके चारों ओरके परकोटोंकी रक्षाके लिये शत्रुओंके निवारणमें समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पकविमानके समान विस्तृत तथा पुण्यसे उपलब्ध होनेवाले स्वर्गलोकके सदृश सुन्दर है॥ २-३॥

तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मत:।

प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह॥ ४॥

‘वहाँ रहनेवाले अपने भाईको इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टिमें वे मेरे इस यज्ञके संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता-रामके विवाहसम्बन्धी इस मंगल समारोहका सुख उठावेंगे’॥ ४॥

एवमुक्ते तु वचने शतानन्दस्य संनिधौ।

आगता: केचिदव्यग्रा जनकस्तान् समादिशत्॥ ५॥

राजाके इस प्रकार कहनेपर शतानन्दजीके समीप कुछ धीर स्वभावके पुरुष आये और राजा जनकने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया॥ ५॥

शासनात् तु नरेन्द्रस्य प्रययु: शीघ्रवाजिभि:।

समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा॥ ६॥

राजाकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ दूत तेज चलनेवाले घोड़ोंपर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वजको बुला लानेके लिये चल दिये। मानो इन्द्रकी आज्ञासे उनके दूत भगवान् विष्णुको बुलाने जा रहे हों॥ ६॥

सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम्।

न्यवेदयन् यथावृत्तं जनकस्य च चिन्तितम्॥ ७॥

सांकाश्यामें पहुँचकर उन्होंने कुशध्वजसे भेंट की और मिथिलाका यथार्थ समाचार एवं जनकका अभिप्राय भी निवेदन किया॥ ७॥

तद्वृत्तं नृपति: श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवै:।

आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वज:॥ ८॥

उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतोंके मुखसे मिथिलाका सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनककी आज्ञाके अनुसार मिथिलामें आये॥ ८॥

स ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम्।

सोऽभिवाद्य शतानन्दं जनकं चातिधार्मिकम्॥ ९॥

राजार्हं परमं दिव्यमासनं सोऽध्यरोहत।

वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनकका दर्शन किया। फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनकको प्रणाम करके वे राजाके योग्य परम दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए॥ ९/

उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितद्युती॥ १०॥

प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रिश्रेष्ठं सुदामनम्।

गच्छ मन्त्रिपते शीघ्रमिक्ष्वाकुममितप्रभम्॥ ११॥

आत्मजै: सह दुर्धर्षमानयस्व समन्त्रिणम्।

सिंहासनपर बैठे हुए उन दोनों अमिततेजस्वी वीरबन्धुओंने मन्त्रिप्रवर सुदामनको भेजा और कहा—‘मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमिततेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथके पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियोंसहित उन दुर्जय नरेशको यहाँ बुला लाइये’॥ १०-११/

औपकार्यां स गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम्॥ १२॥

ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत्।

आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथके खेमेमें जाकर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले उन नरेशसे मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् इस प्रकार बोले—॥ १२/

अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिप:॥ १३॥

स त्वां द्रष्टुं व्यवसित: सोपाध्यायपुरोहितम्।

‘वीर अयोध्यानरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहितसहित आपका दर्शन करना चाहते हैं’॥ १३/

मन्त्रिश्रेष्ठवच: श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तथा॥ १४॥

सबन्धुरगमत् तत्र जनको यत्र वर्तते।

मन्त्रिवर सुदामनकी बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु-बान्धवोंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे॥ १४/

राजा च मन्त्रिसहित: सोपाध्याय: सबान्धव:॥ १५॥

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत्।

मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओंसहित राजा दशरथ, जो बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनकसे इस प्रकार बोले—॥ १५/

विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम्॥ १६॥

वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषि:।

‘महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुलके देवता ये महर्षि वसिष्ठजी हैं। हमारे यहाँ सभी कार्योंमें ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ही कर्तव्यका उपदेश करते हैं और इन्हींकी आज्ञाका पालन किया जाता है॥ १६/

विश्वामित्राभ्यनुज्ञात: सह सर्वैर्महर्षिभि:॥ १७॥

एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम्।

‘यदि सम्पूर्ण महर्षियोंसहित विश्वामित्रजीकी आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वसिष्ठ ही पहले मेरी कुल-परम्पराका क्रमश: परिचय देंगे’॥ १७/

तूष्णींभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषि:॥ १८॥

उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसम्।

यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वसिष्ठ मुनि पुरोहितसहित विदेहराजसे इस प्रकार बोले—॥ १८/

अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्यय:॥ १९॥

तस्मान्मरीचि: संजज्ञे मरीचे: कश्यप: सुत:।

विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वत: स्मृत:॥ २०॥

‘ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है—ये स्वयम्भू हैं। नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। उनसे मरीचिकी उत्पत्ति हुई। मरीचिके पुत्र कश्यप हैं, कश्यपसे विवस्वान्का और विवस्वान्से वैवस्वत मनुका जन्म हुआ॥ १९-२०॥

मनु: प्रजापति: पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनो: सुत:।

तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्॥ २१॥

‘मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ। उन इक्ष्वाकुको ही आप अयोध्याके प्रथम राजा समझें॥ २१॥

इक्ष्वाकोस्तु सुत: श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुत:।

कुक्षेरथात्मज: श्रीमान् विकुक्षिरुदपद्यत॥ २२॥

‘इक्ष्वाकुके पुत्रका नाम कुक्षि था। वे बड़े तेजस्वी थे। कुक्षिसे विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ॥ २२॥

विकुक्षेस्तु महातेजा बाण: पुत्र: प्रतापवान्।

बाणस्य तु महातेजा अनरण्य: प्रतापवान्॥ २३॥

‘विकुक्षिके पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए। बाणके पुत्रका नाम अनरण्य था। वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे॥ २३॥

अनरण्यात् पृथुर्जज्ञे त्रिशङ्कुस्तु पृथोरपि।

त्रिशङ्कोरभवत् पुत्रो धुन्धुमारो महायशा:॥ २४॥

‘अनरण्यसे पृथु और पृथुसे त्रिशंकुका जन्म हुआ। त्रिशंकुके पुत्र महायशस्वी धुन्धुमार थे॥ २४॥

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथ:।

युवनाश्वसुतश्चासीन्मान्धाता पृथिवीपति:॥ २५॥

‘धुन्धुमारसे महातेजस्वी महारथी युवनाश्वका जन्म हुआ। युवनाश्वके पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डलके स्वामी थे॥ २५॥

मान्धातुस्तु सुत: श्रीमान् सुसन्धिरुदपद्यत।

सुसन्धेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसन्धि: प्रसेनजित्॥ २६॥

‘मान्धातासे सुसन्धि नामक कान्तिमान् पुत्रका जन्म हुआ। सुसन्धिके भी दो पुत्र हुए—ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्॥ २६॥

यशस्वी ध्रुवसन्धेस्तु भरतो नाम नामत:।

भरतात् तु महातेजा असितो नाम जायत॥ २७॥

‘ध्रुवसन्धिसे भरत नामक यशस्वी पुत्रका जन्म हुआ। भरतसे महातेजस्वी असितकी उत्पत्ति हुई॥ २७॥

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रव:।

हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दव:॥ २८॥

‘राजा असितके साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु—इन तीन राजवंशोंके लोग शत्रुता रखने लगे थे॥ २८॥

तांश्च स प्रतियुध्यन् वै युद्धे राजा प्रवासित:।

हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा॥ २९॥

‘युद्धमें इन तीनों शत्रुओंका सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये। वे अपनी दो रानियोंके साथ हिमालयपर आकर रहने लगे॥ २९॥

असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान्।

द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुति:॥ ३०॥

‘राजा असितके पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी। वे हिमालयपर ही मृत्युको प्राप्त हो गये। उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है॥ ३०॥

एका गर्भविनाशार्थं सपत्न्यै सगरं ददौ।

‘उनमेंसे एक रानीने अपनी सौतका गर्भ नष्ट करनेके लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया॥ ३०॥

तत: शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनि:॥ ३१॥

भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रित:।

तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्॥ ३२॥

ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम्।

तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत्॥ ३३॥

‘उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वतपर भृगुकुलमें उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्यामें लगे हुए थे। हिमालयपर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियोंमेंसे एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दीनामसे प्रसिद्ध थी। विकसित कमलदलके समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पानेकी इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ३१—३३॥

स तामभ्यवदद् विप्र: पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि।

तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्र: सुमहाबल:॥ ३४॥

महावीर्यो महातेजा अचिरात् संजनिष्यति।

गरेण सहित: श्रीमान् मा शुच: कमलेक्षणे॥ ३५॥

‘उस समय ब्रह्मर्षि च्यवनने पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली कालिन्दीसे पुत्र-जन्मके विषयमें कहा— ‘महाभागे! तुम्हारे उदरमें एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनोंमें गर (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अत: कमललोचने! तुम पुत्रके लिये चिन्ता न करो’॥

च्यवनं च नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता।

पत्या विरहिता तस्मात् पुत्रं देवी व्यजायत॥ ३६॥

‘वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवनको नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रमपर लौट आयी। फिर समय आनेपर उसने एक पुत्रको जन्म दिया॥ ३६॥

सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया।

सह तेन गरेणैव संजात: सगरोऽभवत्॥ ३७॥

‘उसकी सौतने उसके गर्भको नष्ट कर देनेके लिये जो गर (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होनेके कारण वह राजकुमार ‘सगर’ नामसे विख्यात हुआ॥ ३७॥

सगरस्यासमञ्जस्तु असमञ्जादथांशुमान्।

दिलीपोंऽशुमत: पुत्रो दिलीपस्य भगीरथ:॥ ३८॥

‘सगरके पुत्र असमंज और असमंजके पुत्र अंशुमान् हुए। अंशुमान्के पुत्र दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए॥ ३८॥

भगीरथात् ककुत्स्थश्च ककुत्स्थाच्च रघुस्तथा।

रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्ध: पुरुषादक:॥ ३९॥

‘भगीरथसे ककुत्स्थ और ककुत्स्थसे रघुका जन्म हुआ। रघुके तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शापसे राक्षस हो गये थे॥ ३९॥

कल्माषपादोऽप्यभवत् तस्माज्जातस्तु शङ्खण:।

सुदर्शन: शङ्खणस्य अग्निवर्ण: सुदर्शनात्॥ ४०॥

‘वे ही कल्माषपाद नामसे भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्रका जन्म हुआ था। शङ्खणके पुत्र सुदर्शन और सुदर्शनके अग्निवर्ण हुए॥ ४०॥

शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरु: सुत:।

मरो: प्रशुश्रुकस्त्वासीदम्बरीष: प्रशुश्रुकात्॥ ४१॥

‘अग्निवर्णके शीघ्रग और शीघ्रगके पुत्र मरु थे। मरुसे प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुकसे अम्बरीषकी उत्पत्ति हुई॥

अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपति:।

नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिज:॥ ४२॥

नाभागस्य बभूवाज अजाद् दशरथोऽभवत्।

अस्माद् दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ ४३॥

‘अम्बरीषके पुत्र राजा नहुष हुए। नहुषके ययाति और ययातिके पुत्र नाभाग थे। नाभागके अज हुए। अजसे दशरथका जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथसे ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं॥ ४२-४३॥

आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम्।

इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम्॥ ४४॥

‘इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए राजाओंका वंश आदिकालसे ही शुद्ध रहा है। ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं॥ ४४॥

रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप।

सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि॥ ४५॥

‘नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये मैं आपकी दो कन्याओंका वरण करता हूँ। ये आपकी कन्याओंके योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अत: आप इन्हें कन्यादान करें’॥ ४५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्ततितम: सर्ग:॥ ७०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥

 

एकसप्ततितम: सर्ग:

राजा जनकका अपने कुलका परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके लिये क्रमश: सीता और ऊर्मिलाको देनेकी प्रतिज्ञा करना

एवं ब्रुवाणं जनक: प्रत्युवाच कृताञ्जलि:।

श्रोतुमर्हसि भद्रं ते कुलं न: परिकीर्तितम्॥ १॥

प्रदाने हि मुनिश्रेष्ठ कुलं निरवशेषत:।

वक्तव्यं कुलजातेन तन्निबोध महामते॥ २॥

महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशका परिचय दे चुके, तब राजा जनकने हाथ जोड़कर उनसे कहा— ‘मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुलका परिचय दे रहे हैं, सुनिये। महामते! कुलीन पुरुषके लिये कन्यादानके समय अपने कुलका पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अत: आप सुननेकी कृपा करें॥ १-२॥

राजाभूत् त्रिषु लोकेषु विश्रुत: स्वेन कर्मणा।

निमि: परमधर्मात्मा सर्वसत्त्ववतां वर:॥ ३॥

‘प्राचीन कालमें निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात थे॥ ३॥

तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रक:।

प्रथमो जनको राजा जनकादप्युदावसु:॥ ४॥

‘उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ। मिथिके पुत्रका नाम जनक हुआ। ये ही हमारे कुलमें पहले जनक हुए हैं (इन्हींके नामपर हमारे वंशका प्रत्येक राजा ‘जनक’ कहलाता है)। जनकसे उदावसुका जन्म हुआ॥ ४॥

उदावसोस्तु धर्मात्मा जातो वै नन्दिवर्धन:।

नन्दिवर्धसुत: शूर: सुकेतुर्नाम नामत:॥ ५॥

‘उदावसुसे धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए। नन्दिवर्धनके शूरवीर पुत्रका नाम सुकेतु हुआ॥ ५॥

सुकेतोरपि धर्मात्मा देवरातो महाबल:।

देवरातस्य राजर्षेर्बृहद्रथ इति स्मृत:॥ ६॥

‘सुकेतुके भी देवरात नामक पुत्र हुआ। देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे। राजर्षि देवरातके बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ॥ ६॥

बृहद्रथस्य शूरोऽभून्महावीर: प्रतापवान्।

महावीरस्य धृतिमान् सुधृति: सत्यविक्रम:॥ ७॥

‘बृहद्रथके पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे। महावीरके सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे॥ ७॥

सुधृतेरपि धर्मात्मा धृष्टकेतु: सुधार्मिक:।

धृष्टकेतोश्च राजर्षेर्हर्यश्व इति विश्रुत:॥ ८॥

‘सुधृतिके भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे। राजर्षि धृष्टकेतुका पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात हुआ॥ ८॥

हर्यश्वस्य मरु: पुत्रो मरो: पुत्र: प्रतीन्धक:।

प्रतीन्धकस्य धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ: सुत:॥ ९॥

‘हर्यश्वके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धकके पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए॥ ९॥

पुत्र: कीर्तिरथस्यापि देवमीढ इति स्मृत:।

देवमीढस्य विबुधो विबुधस्य महीध्रक:॥ १०॥

‘कीर्तिरथके पुत्र देवमीढ नामसे विख्यात हुए। देवमीढके विबुध और विबुधके पुत्र महीध्रक हुए॥ १०॥

महीध्रकसुतो राजा कीर्तिरातो महाबल:।

कीर्तिरातस्य राजर्षेर्महारोमा व्यजायत॥ ११॥

‘महीध्रकके पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए। राजर्षि कीर्तिरातके महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥

महारोम्णस्तु धर्मात्मा स्वर्णरोमा व्यजायत।

स्वर्णरोम्णस्तु राजर्षेर्हृस्वरोमा व्यजायत॥ १२॥

‘महारोमासे धर्मात्मा स्वर्णरोमाका जन्म हुआ। राजर्षि स्वर्णरोमासे हृस्वरोमा उत्पन्न हुए॥ १२॥

तस्य पुत्रद्वयं राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मन:।

ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीर: कुशध्वज:॥ १३॥

‘धर्मज्ञ महात्मा राजा हृस्वरोमाके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है॥ १३॥

मां तु ज्येष्ठं पिता राज्ये सोऽभिषिच्य पिता मम।

कुशध्वजं समावेश्य भारं मयि वनं गत:॥ १४॥

‘मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके कुशध्वजका सारा भार मुझे सौंपकर वनमें चले गये॥

वृद्धे पितरि स्वर्याते धर्मेण धुरमावहम्।

भ्रातरं देवसंकाशं स्नेहात् पश्यन् कुशध्वजम्॥ १५॥

‘वृद्ध पिताके स्वर्गगामी हो जानेपर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वजको स्नेह-दृष्टिसे देखता हुआ मैं इस राज्यका भार धर्मके अनुसार वहन करने लगा॥ १५॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागत: पुरात्।

सुधन्वा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधक:॥ १६॥

‘कुछ कालके अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वाने सांकाश्य नगरसे आकर मिथिलाको चारों ओरसे घेर लिया॥ १६॥

स च मे प्रेषयामास शैवं धनुरनुत्तमम्।

सीता च कन्या पद्माक्षी मह्यं वै दीयतामिति॥ १७॥

‘उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि ‘तुम शिवजीके परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीताको मेरे हवाले कर दो’॥ १७॥

तस्याप्रदानान्महर्षे युद्धमासीन्मया सह।

स हतोऽभिमुखो राजा सुधन्वा तु मया रणे॥ १८॥

‘महर्षे! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की। इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ। उस संग्राममें सम्मुख युद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथसे मारा गया॥ १८॥

निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम्।

सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्॥ १९॥

‘मुनिश्रेष्ठ! राजा सुधन्वाका वध करके मैंने सांकाश्य नगरके राज्यपर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वजको अभिषिक्त कर दिया॥ १९॥

कनीयानेष मे भ्राता अहं ज्येष्ठो महामुने।

ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥ २०॥

‘महामुने! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ। मुनिवर! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ॥ २०॥

सीतां रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणाय वै।

वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम्॥ २१॥

द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिर्वदामि न संशय:।

ददामि परमप्रीतो वध्वौ ते मुनिपुंगव॥ २२॥

‘आपका भला हो! मैं सीताको श्रीरामके लिये और ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये समर्पित करता हूँ। पराक्रम ही जिसको पानेका शुल्क (शर्त) था, उस देवकन्याके समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीताको श्रीरामके लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिलाको लक्ष्मणके लिये दे रहा हूँ। मैं इस बातको तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मुनिप्रवर! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ’॥ २१-२२॥

रामलक्ष्मणयो राजन् गोदानं कारयस्व ह।

पितृकार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु॥ २३॥

(वसिष्ठजीसे ऐसा कहकर राजा जनकने महाराज दशरथसे कहा—) ‘राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मणके मंगलके लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो। नान्दीमुख श्राद्धका कार्य भी सम्पन्न कीजिये। इसके बाद विवाहका कार्य आरम्भ कीजियेगा॥ २३॥

मघा ह्यद्य महाबाहो तृतीयदिवसे प्रभो।

फल्गुन्यामुत्तरे राजंस्तस्मिन् वैवाहिकं कुरु।

रामलक्ष्मणयोरर्थे दानं कार्यं सुखोदयम्॥ २४॥

‘महाबाहो! प्रभो! आज मघा नक्षत्र है। राजन्! आजके तीसरे दिन उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य कीजियेगा। आज श्रीराम और लक्ष्मणके अभ्युदयके लिये (गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदिका) दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्यमें सुख देनेवाला होता है’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकसप्ततितम: सर्ग:॥ ७१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥

द्विसप्ततितम: सर्ग:

विश्वामित्रद्वारा भरत और शत्रुघ्नके लिये कुशध्वजकी कन्याओंका वरण, राजा जनकद्वारा इसकी स्वीकृति तथा राजा दशरथका अपने पुत्रोंके मंगलके लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना

तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनि:।

उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम्॥ १॥

विदेहराज जनक जब अपनी बात समाप्त कर चुके, तब वसिष्ठसहित महामुनि विश्वामित्र उन वीर नरेशसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नरपुंगव।

इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन॥ २॥

‘नरश्रेष्ठ! इक्ष्वाकु और विदेह दोनों ही राजाओंके वंश अचिन्तनीय हैं। दोनोंके ही प्रभावकी कोई सीमा नहीं है। इन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई राजवंश नहीं है॥ २॥

सदृशो धर्मसम्बन्ध: सदृशो रूपसम्पदा।

रामलक्ष्मणयो राजन् सीता चोर्मिलया सह॥ ३॥

‘राजन्! इन दोनों कुलोंमें जो यह धर्म-सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा है, सर्वथा एक-दूसरेके योग्य है। रूप-वैभवकी दृष्टिसे भी समान योग्यताका है; क्योंकि ऊर्मिलासहित सीता श्रीराम और लक्ष्मणके अनुरूप है॥ ३॥

वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम।

भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वज:॥ ४॥

अस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि।

सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्न्यर्थं वरयामहे॥ ५॥

भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमत:।

वरये ते सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनो:॥ ६॥

‘नरश्रेष्ठ! इसके बाद मुझे भी कुछ कहना है; आप मेरी बात सुनिये। राजन्! आपके छोटे भाई जो ये धर्मज्ञ राजा कुशध्वज बैठे हैं, इन धर्मात्मा नरेशके भी दो कन्याएँ हैं, जो इस भूमण्डलमें अनुपम सुन्दरी हैं। नरश्रेष्ठ! भूपाल! मैं आपकी उन दोनों कन्याओंका कुमार भरत और बुद्धिमान् शत्रुघ्न इन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंके लिये इनकी धर्मपत्नी बनानेके उद्देश्यसे वरण करता हूँ॥ ४—६॥

पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिन:।

लोकपालसमा: सर्वे देवतुल्यपराक्रमा:॥ ७॥

‘राजा दशरथके ये सभी पुत्र रूप और यौवनसे सुशोभित, लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा देवताओंके तुल्य पराक्रमी हैं॥ ७॥

उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम्।

इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवत: पुण्यकर्मण:॥ ८॥

‘राजेन्द्र! इन दोनों भाइयों (भरत और शत्रुघ्न) को भी कन्यादान करके आप इस समस्त इक्ष्वाकुकुलको अपने सम्बन्धसे बाँध लीजिये। आप पुण्यकर्मा पुरुष हैं; आपके चित्तमें व्यग्रता नहीं आनी चाहिये (अर्थात् आप यह सोचकर व्यग्र न हों कि ऐसे महान् सम्राट्के साथ मैं एक ही समय चार वैवाहिक सम्बन्धोंका निर्वाह कैसे कर सकता हूँ।)’॥ ८॥

विश्वामित्रवच: श्रुत्वा वसिष्ठस्य मते तदा।

जनक: प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुंगवौ॥ ९॥

वसिष्ठजीकी सम्मतिके अनुसार विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर उस समय राजा जनकने हाथ जोड़कर उन दोनों मुनिवरोंसे कहा—॥ ९॥

कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां तौ मुनिपुंगवौ।

सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयत: स्वयम्॥ १०॥

‘मुनिपुंगवो! मैं अपने इस कुलको धन्य मानता हूँ, जिसे आप दोनों इक्ष्वाकुवंशके योग्य समझकर इसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये स्वयं आज्ञा दे रहे हैं॥

एवं भवतु भद्रं व: कुशध्वजसुते इमे।

पत्न्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ॥ ११॥

‘आपका कल्याण हो। आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो। ये सदा साथ रहनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं (मेंसे एक-एक) को अपनी-अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करें॥ ११॥

एकाह्ना राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने।

पाणीन् गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबला:॥ १२॥

‘महामुने! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करें॥ १२॥

उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिण:।

वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापति:॥ १३॥

‘ब्रह्मन्! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रोंसे युक्त हैं। इनमें (पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और) दूसरे दिन (अर्थात् परसों) उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग (तथा अर्यमा) हैं। मनीषी पुरुष उस नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं’॥ १३॥

एवमुक्त्वा वच: सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलि:।

उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत्॥ १४॥

इस प्रकार सौम्य (मनोहर) वचन कहकर राजा जनक उठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरोंसे हाथ जोड़कर बोले—॥ १४॥

परो धर्म: कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा।

इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुंगवौ॥ १५॥

‘आपलोगोंने कन्याओंका विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान् धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनोंका शिष्य हूँ। मुनिवरो! इन श्रेष्ठ आसनोंपर आप दोनों विराजमान हों॥ १५॥

यथा दशरथस्येयं तथायोध्या पुरी मम।

प्रभुत्वे नास्ति संदेहो यथार्हं कर्तुमर्हथ॥ १६॥

‘आपके लिये जैसी राजा दशरथकी अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है। आपका इसपर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अत: आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें’॥ १६॥

तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दन:।

राजा दशरथो हृष्ट: प्रत्युवाच महीपतिम्॥ १७॥

विदेहराज जनकके ऐसा कहनेपर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले राजा दशरथने प्रसन्न होकर उन मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १७॥

युवामसंख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ।

ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भ्यामभिपूजिता:॥ १८॥

‘मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयोंके गुण असंख्य हैं; आपलोगोंने ऋषियों तथा राजसमूहोंका भलीभाँति सत्कार किया है॥ १८॥

स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्याम: स्वमालयम्।

श्राद्धकर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत्॥ १९॥

‘आपका कल्याण हो, आप मंगलके भागी हों। अब हम अपने विश्रामस्थानको जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्धका कार्य सम्पन्न करूँगा।’ यह बात भी राजा दशरथने कही॥ १९॥

तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा।

मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशा:॥ २०॥

तदनन्तर मिथिलानरेशकी अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठको आगे करके तुरंत अपने आवासस्थानपर चले गये॥ २०॥

स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानत:।

प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम्॥ २१॥

डेरेपर जाकर राजा दशरथने (अपराह्णकालमें) विधिपूर्वक आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। तत्पश्चात् (रात बीतनेपर) प्रात:काल उठकर राजाने तत्कालोचित उत्तम गोदान-कर्म किया॥ २१॥

गवां शतसहस्रं च ब्राह्मणेभ्यो नराधिप:।

एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मत:॥ २२॥

राजा दशरथने अपने एक-एक पुत्रके मंगलके लिये धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं॥ २२॥

सुवर्णशृङ्ग्य: सम्पन्ना: सवत्सा: कांस्यदोहना:।

गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ:॥ २३॥

वित्तमन्यच्च सुबहु द्विजेभ्यो रघुनन्दन:।

ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सल:॥ २४॥

उन सबके सींग सोनेसे मढ़े हुए थे। उन सबके साथ बछड़े और काँसेके दुग्धपात्र थे। इस प्रकार पुत्रवत्सल रघुकुलनन्दन पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने चार लाख गौओंका दान किया तथा और भी बहुत-सा धन पुत्रोंके लिये गोदानके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको दिया॥ २३-२४॥

स सुतै: कृतगोदानैर्वृत: सन्नृपतिस्तदा।

लोकपालैरिवाभाति वृत: सौम्य: प्रजापति:॥ २५॥

गोदान-कर्म सम्पन्न करके आये हुए पुत्रोंसे घिरे हुए राजा दशरथ उस समय लोकपालोंसे घिरकर बैठे हुए शान्तस्वभाव प्रजापति ब्रह्माके समान शोभा पा रहे थे॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विसप्ततितम: सर्ग:॥ ७२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥

 


त्रिसप्ततितम: सर्ग:

श्रीराम आदि चारों भाइयोंका विवाह

यस्म‌िंस्तु दिवसे राजा चक्रे गोदानमुत्तमम्।

तस्म‌िंस्तु दिवसे वीरो युधाजित् समुपेयिवान्॥ १॥

पुत्र: केकयराजस्य साक्षाद्भरतमातुल:।

दृष्ट्वा पृष्ट्वा च कुशलं राजानमिदमब्रवीत्॥ २॥

राजा दशरथने जिस दिन अपने पुत्रोंके विवाहके निमित्त उत्तम गोदान किया, उसी दिन भरतके सगे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महाराजका दर्शन करके कुशल-मंगल पूछा और इस प्रकार कहा—॥ १-२॥

केकयाधिपती राजा स्नेहात् कुशलमब्रवीत्।

येषां कुशलकामोऽसि तेषां सम्प्रत्यनामयम्॥ ३॥

स्वस्रीयं मम राजेन्द्र द्रष्टुकामो महीपति:।

तदर्थमुपयातोऽहमयोध्यां रघुनन्दन॥ ४॥

‘रघुनन्दन! केकयदेशके महाराजने बड़े स्नेहके साथ आपका कुशल-समाचार पूछा है और आप भी हमारे यहाँके जिन-जिन लोगोंकी कुशलवार्ता जानना चाहते होंगे, वे सब इस समय स्वस्थ और सानन्द हैं। राजेन्द्र! केकयनरेश मेरे भान्जे भरतको देखना चाहते हैं। अत: इन्हें लेनेके लिये ही मैं अयोध्या आया था॥

श्रुत्वा त्वहमयोध्यायां विवाहार्थं तवात्मजान्।

मिथिलामुपयातांस्तु त्वया सह महीपते॥ ५॥

त्वरयाभ्युपयातोऽहं द्रष्टुकाम: स्वसु: सुतम्।

‘परंतु पृथ्वीनाथ! अयोध्यामें यह सुनकर कि ‘आपके सभी पुत्र विवाहके लिये आपके साथ मिथिला पधारे हैं, मैं तुरंत यहाँ चला आया; क्योंकि मेरे मनमें अपनी बहिनके बेटेको देखनेकी बड़ी लालसा थी’॥ ५/

अथ राजा दशरथ: प्रियातिथिमुपस्थितम्॥ ६॥

दृष्ट्वा परमसत्कारै: पूजनार्हमपूजयत्।

महाराज दशरथने अपने प्रिय अतिथिको उपस्थित देख बड़े सत्कारके साथ उनकी आवभगत की; क्योंकि वे सम्मान पानेके ही योग्य थे॥ ६/

ततस्तामुषितो रात्रिं सह पुत्रैर्महात्मभि:॥ ७॥

प्रभाते पुनरुत्थाय कृत्वा कर्माणि तत्त्ववित्।

ऋषींस्तदा पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥ ८॥

तदनन्तर अपने महामनस्वी पुत्रोंके साथ वह रात व्यतीत करके वे तत्त्वज्ञ नरेश प्रात:काल उठे और नित्यकर्म करके ऋषियोंको आगे किये जनककी यज्ञशालामें जा पहुँचे॥ ७-८॥

युक्ते मुहूर्ते विजये सर्वाभरणभूषितै:।

भ्रातृभि: सहितो राम: कृतकौतुकमंगल:॥ ९ ॥

वसिष्ठं पुरत: कृत्वा महर्षीनपरानपि।

वसिष्ठो भगवानेत्य वैदेहमिदमब्रवीत्॥ १०॥

तत्पश्चात् विवाहके योग्य विजय नामक मुहूर्त आनेपर दूल्हेके अनुरूप समस्त वेश-भूषासे अलंकृत हुए भाइयोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी भी वहाँ आये। वे विवाहकालोचित मंगलाचार पूर्ण कर चुके थे तथा वसिष्ठ मुनि एवं अन्यान्य महर्षियोंको आगे करके उस मण्डपमें पधारे थे। उस समय भगवान् वसिष्ठने विदेहराज जनकके पास जाकर इस प्रकार कहा—॥ ९-१०॥

राजा दशरथो राजन् कृतकौतुकमंगलै:।

पुत्रैर्नरवरश्रेष्ठो दातारमभिकाङ्क्षते॥ ११॥

‘राजन्! नरेशोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथ अपने पुत्रोंका वैवाहिकसूत्र-बन्धनरूप मंगलाचार सम्पन्न करके उन सबके साथ पधारे हैं और भीतर आनेके लिये दाताके आदेशकी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ ११॥

दातृप्रतिग्रहीतृभ्यां सर्वार्था: सम्भवन्ति हि।

स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व कृत्वा वैवाह्यमुत्तमम्॥ १२॥

‘क्योंकि दाता और प्रतिग्रहीता (दान ग्रहण करनेवाले) का संयोग होनेपर ही समस्त दान-धर्मोंका सम्पादन सम्भव होता है; अत: आप विवाह-कालोपयोगी शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके उन्हें बुलाइये और कन्यादानरूप स्वधर्मका पालन कीजिये’॥ १२॥

इत्युक्त: परमोदारो वसिष्ठेन महात्मना।

प्रत्युवाच महातेजा वाक्यं परमधर्मवित्॥ १३॥

महात्मा वसिष्ठके ऐसा कहनेपर परम उदार, परम धर्मज्ञ और महातेजस्वी राजा जनकने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३॥

क: स्थित: प्रतिहारो मे कस्याज्ञां सम्प्रतीक्षते।

स्वगृहे को विचारोऽस्ति यथा राज्यमिदं तव॥ १४॥

कृतकौतुकसर्वस्वा वेदिमूलमुपागता:।

मम कन्या मुनिश्रेष्ठ दीप्ता बह्नेरिवार्चिष:॥ १५॥

‘मुनिश्रेष्ठ! महाराजके लिये मेरे यहाँ कौन-सा पहरेदार खड़ा है। वे किसके आदेशकी प्रतीक्षा करते हैं। अपने घरमें आनेके लिये कैसा सोच-विचार है? यह जैसे मेरा राज्य है, वैसे ही आपका है। मेरी कन्याओंका वैवाहिक सूत्र-बन्धनरूप मंगलकृत्य सम्पन्न हो चुका है। अब वे यज्ञवेदीके पास आकर बैठी हैं और अग्निकी प्रज्वलित शिखाओंके समान प्रकाशित हो रही हैं॥ १४-१५॥

सद्योऽहं त्वत्प्रतीक्षोऽस्मि वेद्यामस्यां प्रतिष्ठित:।

अविघ्नं क्रियतां सर्वं किमर्थं हि विलम्ब्यते॥ १६॥

‘इस समय तो मैं आपकी ही प्रतीक्षामें वेदीपर बैठा हूँ। आप निर्विघ्नतापूर्वक सब कार्य पूर्ण कीजिये। विलम्ब किसलिये करते हैं?’॥ १६॥

तद् वाक्यं जनकेनोक्तं श्रुत्वा दशरथस्तदा।

प्रवेशयामास सुतान् सर्वानृषिगणानपि॥ १७॥

वसिष्ठजीके मुखसे राजा जनककी कही हुई बात सुनकर महाराज दशरथ उस समय अपने पुत्रों और सम्पूर्ण महर्षियोंको महलके भीतर ले आये॥ १७॥

ततो राजा विदेहानां वसिष्ठमिदमब्रवीत्।

कारयस्व ऋषे सर्वामृषिभि: सह धार्मिक॥ १८॥

रामस्य लोकरामस्य क्रियां वैवाहिकीं प्रभो।

तदनन्तर विदेहराजने वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा—‘धर्मात्मा महर्षे! प्रभो! आप ऋषियोंको साथ लेकर लोकाभिराम श्रीरामके विवाहकी सम्पूर्ण क्रिया कराइये’॥ १८/

तथेत्युक्त्वा तु जनकं वसिष्ठो भगवानृषि:॥ १९॥

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य शतानन्दं च धार्मिकम्।

प्रपामध्ये तु विधिवद् वेदिं कृत्वा महातपा:॥ २०॥

अलंचकार तां वेदिं गन्धपुष्पै: समन्तत:।

सुवर्णपालिकाभिश्च चित्रकुम्भैश्च साङ्कुरै:॥ २१॥

अङ्कुराढ्यै: शरावैश्च धूपपात्रै: सधूपकै:।

शङ्खपात्रै: स्रुवै: स्रग्भि: पात्रैरर्घ्यादिपूजितै:॥ २२॥

लाजपूर्णैश्च पात्रीभिरक्षतैरपि संस्कृतै:।

दर्भै: समै: समास्तीर्य विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ २३॥

अग्निमाधाय तं वेद्यां विधिमन्त्रपुरस्कृतम्।

जुहावाग्नौ महातेजा वसिष्ठो मुनिपुंगव:॥ २४॥

तब जनकजीसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने विश्वामित्र और धर्मात्मा शतानन्दजीको आगे करके विवाह-मण्डपके मध्यभागमें विधिपूर्वक वेदी बनायी और गन्ध तथा फूलोंके द्वारा उसे चारों ओरसे सुन्दर रूपमें सजाया। साथ ही बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाएँ, यवके अंकुरोंसे युक्त चित्रित कलश, अंकुर जमाये हुए सकोरे, धूपयुक्त धूपपात्र, शङ्खपात्र, स्रुवा, स्रुक्, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियोंको भी यथास्थान रख दिया। तत्पश्चात् महातेजस्वी मुनिवर वसिष्ठजीने बराबर-बराबर कुशोंको वेदीके चारों ओर बिछाकर मन्त्रोच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन किया और विधिको प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें हवन किया॥ १९—२४॥

तत: सीतां समानीय सर्वाभरणभूषिताम्।

समक्षमग्ने: संस्थाप्य राघवाभिमुखे तदा॥ २५॥

अब्रवीज्जनको राजा कौसल्यानन्दवर्धनम्।

इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव॥ २६॥

प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।

पतिव्रता महाभागा छायेवानुगता सदा॥ २७॥

तदनन्तर राजा जनकने सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सीताको ले आकर अग्निके समक्ष श्रीरामचन्द्रजीके सामने बिठा दिया और माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले उन श्रीरामसे कहा—‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। यह मेरी पुत्री सीता तुम्हारी सहधर्मिणीके रूपमें उपस्थित है; इसे स्वीकार करो और इसका हाथ अपने हाथमें लो। यह परम पतिव्रता, महान् सौभाग्यवती और छायाकी भाँति सदा तुम्हारे पीछे चलनेवाली होगी’॥ २५—२७॥

इत्युक्त्वा प्राक्षिपद् राजा मन्त्रपूतं जलं तदा।

साधुसाध्विति देवानामृषीणां वदतां तदा॥ २८॥

यह कहकर राजाने श्रीरामके हाथमें मन्त्रसे पवित्र हुआ संकल्पका जल छोड़ दिया। उस समय देवताओं और ऋषियोंके मुखसे जनकके लिये साधुवाद सुनायी देने लगा॥ २८॥

देवदुन्दुभिनिर्घोष: पुष्पवर्षो महानभूत्।

एवं दत्त्वा सुतां सीतां मन्त्रोदकपुरस्कृताम्॥ २९॥

अब्रवीज्जनको राजा हर्षेणाभिपरिप्लुत:।

लक्ष्मणागच्छ भद्रं ते ऊर्मिलामुद्यतां मया॥ ३०॥

प्रतीच्छ पाणिं गृह्णीष्व मा भूत् कालस्य पर्यय:।

देवताओंके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा हुई। इस प्रकार मन्त्र और संकल्पके जलके साथ अपनी पुत्री सीताका दान करके हर्षमग्न हुए राजा जनकने लक्ष्मणसे कहा—‘लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो। आओ, मैं ऊर्मिलाको तुम्हारी सेवामें दे रहा हूँ। इसे स्वीकार करो। इसका हाथ अपने हाथमें लो। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’॥ २९-३०/

तमेवमुक्त्वा जनको भरतं चाभ्यभाषत॥ ३१॥

गृहाण पाण‌िं माण्डव्या: पाणिना रघुनन्दन।

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर जनकने भरतसे कहा— ‘रघुनन्दन! माण्डवीका हाथ अपने हाथमें लो’॥ ३१/

शत्रुघ्नं चापि धर्मात्मा अब्रवीन्मिथिलेश्वर:॥ ३२॥

श्रुतकीर्तेर्महाबाहो पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।

सर्वे भवन्त: सौम्याश्च सर्वे सुचरितव्रता:॥ ३३॥

पत्नीभि: सन्तु काकुत्स्था मा भूत् कालस्य पर्यय:।

फिर धर्मात्मा मिथिलेशने शत्रुघ्नको सम्बोधित करके कहा—‘महाबाहो! तुम अपने हाथसे श्रुतकीर्तिका पाणिग्रहण करो। तुम चारों भाई शान्तस्वभाव हो। तुम सबने उत्तम व्रतका भलीभाँति आचरण किया है। ककुत्स्थकुलके भूषणरूप तुम चारों भाई पत्नीसे संयुक्त हो जाओ। इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’॥ ३२-३३/

जनकस्य वच: श्रुत्वा पाणीन् पाणिभिरस्पृशन्॥ ३४॥

चत्वारस्ते चतसृणां वसिष्ठस्य मते स्थिता:।

अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा वेदिं राजानमेव च॥ ३५॥

ऋषींश्चापि महात्मान: सहभार्या रघूद्वहा:।

यथोक्तेन ततश्चक्रुर्विवाहं विधिपूर्वकम्॥ ३६॥

राजा जनकका यह वचन सुनकर उन चारों राजकुमारोंने चारों राजकुमारियोंके हाथ अपने हाथमें लिये। फिर वसिष्ठजीकी सम्मतिसे उन रघुकुलरत्न महामनस्वी राजकुमारोंने अपनी-अपनी पत्नीके साथ अग्नि, वेदी, राजा दशरथ तथा ऋषि-मुनियोंकी परिक्रमा की और वेदोक्त विधिके अनुसार वैवाहिक कार्य पूर्ण किया॥ ३४—३६॥

पुष्पवृष्टिर्महत्यासीदन्तरिक्षात् सुभास्वरा।

दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतवादित्रनि:स्वनै: ॥ ३७॥

ननृतुश्चाप्सर:सङ्घा गन्धर्वाश्च जगु: कलम्।

विवाहे रघुमुख्यानां तदद्भुतमदृश्यत॥ ३८॥

उस समय आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा हुई, जो सुहावनी लगती थी। दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि, दिव्य गीतोंके मनोहर शब्द और दिव्य वाद्योंके मधुर घोषके साथ झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्व मधुर गीत गाने लगे। उन रघुवंशशिरोमणि राजकुमारोंके विवाहमें वह अद्भुत दृश्य दिखायी दिया॥ ३७-३८॥

ईदृशे वर्तमाने तु तूर्योद्घुष्टनिनादिते।

त्रिरग्निं ते परिक्रम्य ऊहुर्भार्या महौजस:॥ ३९॥

शहनाई आदि बाजोंके मधुर घोषसे गूँजते हुए उस वर्तमान विवाहोत्सवमें उन महातेजस्वी राजकुमारोंने अग्निकी तीन बार परिक्रमा करके पत्नियोंको स्वीकार करते हुए विवाहकर्म सम्पन्न किया॥ ३९॥

अथोपकार्यं जग्मुस्ते सभार्या रघुनन्दना:।

राजाप्यनुययौ पश्यन् सर्षिसङ्घ: सबान्धव:॥ ४०॥

तदनन्तर रघुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले वे चारों भाई अपनी पत्नियोंके साथ जनवासेमें चले गये। राजा दशरथ भी ऋषियों और बन्धु-बान्धवोंके साथ पुत्रों और पुत्र-वधुओंको देखते हुए उनके पीछे-पीछे गये॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिसप्ततितम: सर्ग:॥ ७३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३॥

 

चतु:सप्ततितम: सर्ग:

विश्वामित्रका अपने आश्रमको प्रस्थान, राजा जनकका कन्याओंको भारी दहेज देकर राजा दशरथ आदिको विदा करना, मार्गमें शुभाशुभ शकुन और परशुरामजीका आगमन

अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनि:।

आपृष्ट्वा तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम्॥ १॥

तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र राजा जनक और महाराज दशरथ दोनों राजाओंसे पूछकर उनकी स्वीकृति ले उत्तरपर्वतपर (हिमालयकी शाखाभूत पर्वतपर, जहाँ कौशिकीके तटपर उनका आश्रम था, वहाँ) चले गये॥ १॥

विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम्।

आपृष्ट्वैव जगामाशु राजा दशरथ: पुरीम्॥ २॥

विश्वामित्रजीके चले जानेपर महाराज दशरथ भी विदेहराज मिथिलानरेशसे अनुमति लेकर ही शीघ्र अपनी पुरी अयोध्याको जानेके लिये तैयार हो गये॥ २॥

अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु।

गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वर:॥ ३॥

कम्बलानां च मुख्यानां क्षौमान् कोट्यम्बराणि च।

हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम्॥ ४॥

उस समय विदेहराज जनकने अपनी कन्याओंके निमित्त दहेजमें बहुत अधिक धन दिया। उन मिथिला-नरेशने कई लाख गौएँ, कितनी ही अच्छी-अच्छी कालीनें तथा करोड़ोंकी संख्यामें रेशमी और सूती वस्त्र दिये, भाँति-भाँतिके गहनोंसे सजे हुए बहुत-से दिव्य हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक भेंट किये॥ ३-४॥

ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥ ५॥

अपनी पुत्रियोंके लिये सहेलीके रूपमें उन्होंने सौ-सौ कन्याएँ तथा उत्तम दास-दासियाँ अर्पित कीं। इन सबके अतिरिक्त राजाने उन सबके लिये एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रजतमुद्रा, मोती तथा मूँगे भी दिये॥ ५॥

ददौ राजा सुसंहृष्ट: कन्याधनमनुत्तमम्।

दत्त्वा बहुविधं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम्॥ ६॥

प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वर:।

राजाप्ययोध्याधिपति: सह पुत्रैर्महात्मभि:॥ ७॥

ऋषीन् सर्वान् पुरस्कृत्य जगाम सबलानुग:।

इस प्रकार मिथिलापति राजा जनकने बड़े हर्षके साथ उत्तमोत्तम कन्याधन (दहेज) दिया। नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेजमें देकर महाराज दशरथकी आज्ञा ले वे पुन: मिथिलानगरके भीतर अपने महलमें लौट आये। उधर अयोध्यानरेश राजा दशरथ भी सम्पूर्ण महर्षियोंको आगे करके अपने महात्मा पुत्रों, सैनिकों तथा सेवकोंके साथ अपनी राजधानीकी ओर प्रस्थित हुए॥ ६-७/

गच्छन्तं तु नरव्याघ्रं सर्षिसङ्घं सराघवम्॥ ८॥

घोरास्तु पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति समन्तत:।

भौमाश्चैव मृगा: सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम्॥ ९॥

उस समय ऋषि-समूह तथा श्रीरामचन्द्रजीके साथ यात्रा करते हुए पुरुषसिंह महाराज दशरथके चारों ओर भयंकर बोली बोलनेवाले पक्षी चहचहाने लगे और भूमिपर विचरनेवाले समस्त मृग उन्हें दाहिने रखकर जाने लगे॥ ८-९॥

तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत।

असौम्या: पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणा:॥ १०॥

किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति।

उन सबको देखकर राजसिंह दशरथने वसिष्ठजीसे पूछा—‘मुनिवर! एक ओर तो ये भयंकर पक्षी घोर शब्द कर रहे हैं और दूसरी ओर ये मृग हमें दाहिनी ओर करके जा रहे हैं; यह अशुभ और शुभ दो प्रकारका शकुन कैसा? यह मेरे हृदयको कम्पित किये देता है। मेरा मन विषादमें डूबा जाता है’॥ १०/

राज्ञो दशरथस्यैतच्छ्रुत्वा वाक्यं महानृषि:॥ ११॥

उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत् फलम्।

उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम्॥ १२॥

मृगा: प्रशमयन्त्येते संतापस्त्यज्यतामयम्।

राजा दशरथका यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मधुर वाणीमें कहा—‘राजन्! इस शकुनका जो फल है, उसे सुनिये—आकाशमें पक्षियोंके मुखसे जो बात निकल रही है, वह बताती है कि इस समय कोई घोर भय उपस्थित होनेवाला है, परंतु हमें दाहिने रखकर जानेवाले ये मृग उस भयके शान्त हो जानेकी सूचना दे रहे हैं; इसलिये आप यह चिन्ता छोडि़ये’॥ ११-१२/

तेषां संवदतां तत्र वायु: प्रादुर्बभूव ह॥ १३॥

कम्पयन् मेदिनीं सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान्।

तमसा संवृत: सूर्य: सर्वे नावेदिषुर्दिश:॥ १४॥

भस्मना चावृतं सर्वं सम्मूढमिव तद्बलम्।

इन लोगोंमें इस प्रकार बातें हो ही रही थीं कि वहाँ बड़े जोरोंकी आँधी उठी। वह सारी पृथ्वीको कँपाती हुई बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी करने लगी। सूर्य अन्धकारसे आच्छन्न हो गये। किसीको दिशाओंका भान न रहा। धूलसे ढक जानेके कारण वह सारी सेना मूर्च्छित-सी हो गयी॥ १३-१४/

वसिष्ठ ऋषयश्चान्ये राजा च ससुतस्तदा॥ १५॥

ससंज्ञा इव तत्रासन् सर्वमन्यद्विचेतनम्।

तस्म‌िंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमू:॥ १६॥

उस समय केवल वसिष्ठ मुनि, अन्यान्य ऋषियों तथा पुत्रोंसहित राजा दशरथको ही चेत रह गया था, शेष सभी लोग अचेत हो गये थे। उस घोर अन्धकारमें राजाकी वह सेना धूलसे आच्छादित-सी हो गयी थी॥ १५-१६॥

ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्।

भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम्॥ १७॥

कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दु:सहम्।

ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनै:॥ १८॥

स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम्।

प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरघ्नं यथा शिवम्॥ १९॥

उस समय राजा दशरथने देखा—क्षत्रिय राजाओंका मान-मर्दन करनेवाले भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार परशुराम सामनेसे आ रहे हैं। वे बड़े भयानक-से दिखायी देते थे। उन्होंने मस्तकपर बड़ी-बड़ी जटाएँ धारण कर रखी थीं। वे कैलासके समान दुर्जय और कालाग्निके समान दु:सह प्रतीत होते थे। तेजोमण्डलद्वारा जाज्वल्यमान-से हो रहे थे। साधारण लोगोंके लिये उनकी ओर देखना भी कठिन था। वे कंधेपर फरसा रखे और हाथमें विद्युद्गणोंके समान दीप्तिमान् धनुष एवं भयंकर बाण लिये त्रिपुरविनाशक भगवान् शिवके समान जान पड़ते थे॥ १७—१९॥

तं दृष्ट्वा भीमसंकाशं ज्वलन्तमिव पावकम्।

वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणा:॥ २०॥

संगता मुनय: सर्वे संजजल्पुरथो मिथ:।

प्रज्वलित अग्निके समान भयानक-से प्रतीत होनेवाले परशुरामको उपस्थित देख जप और होममें तत्पर रहनेवाले वसिष्ठ आदि सभी ब्रह्मर्षि एकत्र हो परस्पर इस प्रकार बातें करने लगे—॥ २०/

कच्चित् पितृवधामर्षी क्षत्रं नोत्सादयिष्यति॥ २१॥

पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वर:।

क्षत्रस्योत्सादनं भूयो न खल्वस्य चिकीर्षितम्॥ २२॥

‘क्या अपने पिताके वधसे अमर्षके वशीभूत हो ये क्षत्रियोंका संहार नहीं कर डालेंगे? पूर्वकालमें क्षत्रियोंका वध करके इन्होंने अपना क्रोध उतार लिया है। अब इनकी बदला लेनेकी चिन्ता दूर हो चुकी है। अत: फिर क्षत्रियोंका संहार करना इनके लिये अभीष्ट नहीं है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है’॥ २१-२२॥

एवमुक्त्वार्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम्।

ऋषयो राम रामेति मधुरं वाक्यमब्रुवन्॥ २३॥

ऐसा कहकर ऋषियोंने भयंकर दिखायी देनेवाले भृगुनन्दन परशुरामको अर्घ्य लेकर दिया और ‘राम! राम!’ कहकर उनसे मधुर वाणीमें बातचीत की॥ २३॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान्।

रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्योऽभ्यभाषत॥ २४॥

ऋषियोंकी दी हुई उस पूजाको स्वीकार करके प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुरामने दशरथनन्दन श्रीरामसे इस प्रकार कहा॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतु:सप्ततितम: सर्ग:॥ ७४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥

 

पञ्चसप्ततितम: सर्ग:

राजा दशरथकी बात अनसुनी करके परशुरामका श्रीरामको वैष्णव-धनुषपर बाण चढ़ानेके लिये ललकारना

राम दाशरथे वीर वीर्यं ते श्रूयतेऽद्भुतम्।

धनुषो भेदनं चैव निखिलेन मया श्रुतम्॥ १॥

‘दशरथनन्दन श्रीराम! वीर! सुना जाता है कि तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है। तुम्हारे द्वारा शिव-धनुषके तोड़े जानेका सारा समाचार भी मेरे कानोंमें पड़ चुका है॥

तदद्भुतमचिन्त्यं च भेदनं धनुषस्तथा।

तच्छ्रुत्वाहमनुप्राप्तो धनुर्गृह्यापरं शुभम्॥ २॥

‘उस धनुषका तोड़ना अद्भुत और अचिन्त्य है; उसके टूटनेकी बात सुनकर मैं एक दूसरा उत्तम धनुष लेकर आया हूँ॥ २॥

तदिदं घोरसंकाशं जामदग्न्यं महद्धनु:।

पूरयस्व शरेणैव स्वबलं दर्शयस्व च॥ ३॥

‘यह है वह जमदग्निकुमार परशुरामका भयंकर और विशाल धनुष। तुम इसे खींचकर इसके ऊपर बाण चढ़ाओ और अपना बल दिखाओ॥ ३॥

तदहं ते बलं दृष्ट्वा धनुषोऽप्यस्य पूरणे।

द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि वीर्यश्लाघ्यमहं तव॥ ४॥

‘इस धनुषके चढ़ानेमें भी तुम्हारा बल कैसा है? यह देखकर मैं तुम्हें ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रदान करूँगा, जो तुम्हारे पराक्रमके लिये स्पृहणीय होगा’॥ ४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा।

विषण्णवदनो दीन: प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ५॥

परशुरामजीका वह वचन सुनकर उस समय राजा दशरथके मुखपर विषाद छा गया। वे दीनभावसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ५॥

क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपा:।

बालानां मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि॥ ६॥

भार्गवाणां कुले जात: स्वाध्यायव्रतशालिनाम्।

सहस्राक्षे प्रतिज्ञाय शस्त्रं प्रक्षिप्तवानसि॥ ७॥

‘ब्रह्मन्! आप स्वाध्याय और व्रतसे शोभा पानेवाले भृगुवंशी ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न हुए हैं और स्वयं भी महान् तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं; क्षत्रियोंपर अपना रोष प्रकट करके अब शान्त हो चुके हैं; इसलिये मेरे बालक पुत्रोंको आप अभयदान देनेकी कृपा करें; क्योंकि आपने इन्द्रके समीप प्रतिज्ञा करके शस्त्रका परित्याग कर दिया है॥

स त्वं धर्मपरो भूत्वा कश्यपाय वसुंधराम्।

दत्त्वा वनमुपागम्य महेन्द्रकृतकेतन:॥ ८॥

‘इस तरह आप धर्ममें तत्पर हो कश्यपजीको पृथ्वीका दान करके वनमें आकर महेन्द्रपर्वतपर आश्रम बनाकर रहते हैं॥ ८॥

मम सर्वविनाशाय सम्प्राप्तस्त्वं महामुने।

न चैकस्मिन् हते रामे सर्वे जीवामहे वयम्॥ ९॥

‘महामुने! (इस प्रकार शस्त्रत्यागकी प्रतिज्ञा करके भी) आप मेरा सर्वनाश करनेके लिये कैसे आ गये? (यदि कहें—मेरा रोष तो केवल रामपर है तो) एकमात्र रामके मारे जानेपर ही हम सब लोग अपने जीवनका परित्याग कर देंगे’॥ ९॥

ब्रुवत्येवं दशरथे जामदग्न्य: प्रतापवान्।

अनादृत्य तु तद्वाक्यं राममेवाभ्यभाषत॥ १०॥

राजा दशरथ इस प्रकार कहते ही रह गये; परंतु प्रतापी परशुरामने उनके उन वचनोंकी अवहेलना करके रामसे ही बातचीत जारी रखी॥ १०॥

इमे द्वे धनुषी श्रेष्ठे दिव्ये लोकाभिपूजिते।

दृढे बलवती मुख्ये सुकृते विश्वकर्मणा॥ ११॥

वे बोले—‘रघुनन्दन! ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ और दिव्य थे। सारा संसार इन्हें सम्मानकी दृष्टिसे देखता था। साक्षात् विश्वकर्माने इन्हें बनाया था। ये बड़े प्रबल और दृढ़ थे॥ ११॥

अनुसृष्टं सुरैरेकं त्र्यम्बकाय युयुत्सवे।

त्रिपुरघ्नं नरश्रेष्ठ भग्नं काकुत्स्थ यत्त्वया॥ १२॥

‘नरश्रेष्ठ! इनमेंसे एकको देवताओंने त्रिपुरासुरसे युद्ध करनेके लिये भगवान् शङ्करको दे दिया था। ककुत्स्थनन्दन! जिससे त्रिपुरका नाश हुआ था, वह वही धनुष था; जिसे तुमने तोड़ डाला है॥ १२॥

इदं द्वितीयं दुर्धर्षं विष्णोर्दत्तं सुरोत्तमै:।

तदिदं वैष्णवं राम धनु: परपुरंजयम्॥ १३॥

‘और दूसरा दुर्धर्ष धनुष यह है, जो मेरे हाथमें है। इसे श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् विष्णुको दिया था। श्रीराम! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला वही यह वैष्णव धनुष है॥ १३॥

समानसारं काकुत्स्थ रौद्रेण धनुषा त्विदम्।

तदा तु देवता: सर्वा: पृच्छन्ति स्म पितामहम्॥ १४॥

शितिकण्ठस्य विष्णोश्च बलाबलनिरीक्षया।

‘ककुत्स्थनन्दन! यह भी शिवजीके धनुषके समान ही प्रबल है। उन दिनों समस्त देवताओंने भगवान् शिव और विष्णुके बलाबलकी परीक्षाके लिये पितामह ब्रह्माजीसे पूछा था कि ‘इन दोनों देवताओंमें कौन अधिक बलशाली है’॥ १४/

अभिप्रायं तु विज्ञाय देवतानां पितामह:॥ १५॥

विरोधं जनयामास तयो: सत्यवतां वर:।

‘देवताओंके इस अभिप्रायको जानकर सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजीने उन दोनों देवताओं (शिव और विष्णु) में विरोध उत्पन्न कर दिया॥ १५/

विरोधे तु महद् युद्धमभवद् रोमहर्षणम्॥ १६॥

शितिकण्ठस्य विष्णोश्च परस्परजयैषिणो:।

‘विरोध पैदा होनेपर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले शिव और विष्णुमें बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ १६/

तदा तु जृम्भितं शैवं धनुर्भीमपराक्रमम्॥ १७॥

हुंकारेण महादेव: स्तम्भितोऽथ त्रिलोचन:।

‘उस समय भगवान् विष्णुने हुङ्कारमात्रसे शिवजीके भयंकर बलशाली धनुषको शिथिल तथा त्रिनेत्रधारी महादेवजीको भी स्तम्भित कर दिया॥ १७/

देवैस्तदा समागम्य सर्षिसङ्घ: सचारणै:॥ १८॥

याचितौ प्रशमं तत्र जग्मतुस्तौ सुरोत्तमौ।

‘तब ऋषिसमूहों तथा चारणोंसहित देवताओंने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंसे शान्तिके लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये॥ १८/

जृम्भितं तद् धनुर्दृष्ट्वा शैवं विष्णुपराक्रमै:॥ १९॥

अधिकं मेनिरे विष्णुं देवा: सर्षिगणास्तथा।

‘भगवान् विष्णुके पराक्रमसे शिवजीके उस धनुषको शिथिल हुआ देख ऋषियोंसहित देवताओंने भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ माना॥ १९/

धनू रुद्रस्तु संक्रुद्धो विदेहेषु महायशा:॥ २०॥

देवरातस्य राजर्षेर्ददौ हस्ते ससायकम्।

‘तदनन्तर कुपित हुए महायशस्वी रुद्रने बाणसहित अपना धनुष विदेहदेशके राजर्षि देवरातके हाथमें दे दिया॥ २०/

इदं च वैष्णवं राम धनु: परपुरंजयम्॥ २१॥

ऋचीके भार्गवे प्रादाद् विष्णु: स न्यासमुत्तमम्।

‘श्रीराम! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले इस वैष्णवधनुषको भगवान् विष्णुने भृगुवंशी ऋचीक मुनिको उत्तम धरोहरके रूपमें दिया था॥ २१/

ऋचीकस्तु महातेजा: पुत्रस्याप्रतिकर्मण:॥ २२॥

पितुर्मम ददौ दिव्यं जमदग्नेर्महात्मन:।

‘फिर महातेजस्वी ऋचीकने प्रतीकार (प्रतिशोध) की भावनासे रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदग्निके अधिकारमें यह दिव्य धनुष दे दिया॥ २२/

न्यस्तशस्त्रे पितरि मे तपोबलसमन्विते॥ २३॥

अर्जुनो विदधे मृत्युं प्राकृतां बुद्धिमास्थित:।

‘तपोबलसे सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग करके जब ध्यानस्थ होकर बैठे थे, उस समय प्राकृत बुद्धिका आश्रय लेनेवाले कृतवीर्यकुमार अर्जुनने उनको मार डाला॥ २३/

वधमप्रतिरूपं तु पितु: श्रुत्वा सुदारुणम्।

क्षत्रमुत्सादयं रोषाज्जातं जातमनेकश:॥ २४॥

‘पिताके इस अत्यन्त भयंकर वधका, जो उनके योग्य नहीं था, समाचार सुनकर मैंने रोषपूर्वक बारंबार उत्पन्न हुए क्षत्रियोंका अनेक बार संहार किया॥ २४॥

पृथिवीं चाखिलां प्राप्य कश्यपाय महात्मने।

यज्ञस्यान्तेऽददं राम दक्षिणां पुण्यकर्मणे॥ २५॥

‘श्रीराम! फिर सारी पृथ्वीपर अधिकार करके मैंने एक यज्ञ किया और उस यज्ञके समाप्त होनेपर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यपको दक्षिणारूपसे यह सारी पृथ्वी दे डाली॥ २५॥

दत्त्वा महेन्द्रनिलयस्तपोबलसमन्वित:।

श्रुत्वा तु धनुषो भेदं ततोऽहं द्रुतमागत:॥ २६॥

‘पृथ्वीका दान करके मैं महेन्द्रपर्वतपर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबलसे सम्पन्न हुआ। वहाँसे शिवजीके धनुषके तोड़े जानेका समाचार सुनकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ॥ २६॥

तदेवं वैष्णवं राम पितृपैतामहं महत्।

क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गृह्णीष्व धनुरुत्तमम्॥ २७॥

योजयस्व धनु:श्रेष्ठे शरं परपुरंजयम्।

यदि शक्तोऽसि काकुत्स्थ द्वन्द्वं दास्यामि ते तत:॥ २८॥

‘श्रीराम! इस प्रकार यह महान् वैष्णवधनुष मेरे पिता-पितामहोंके अधिकारमें रहता चला आया है; अब तुम क्षत्रियधर्मको सामने रखकर यह उत्तम धनुष हाथमें लो और इस श्रेष्ठ धनुषपर एक ऐसा बाण चढ़ाओ, जो शत्रुनगरीपर विजय पानेमें समर्थ हो; यदि तुम ऐसा कर सके तो मैं तुम्हें द्वन्द्व-युद्धका अवसर दूँगा॥ २७-२८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चसप्ततितम: सर्ग:॥ ७५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥

 

षट्सप्ततितम: सर्ग:

श्रीरामका वैष्णव-धनुषको चढ़ाकर अमोघ बाणके द्वारा परशुरामके तप:प्राप्त पुण्यलोकोंका नाश करना तथा परशुरामका महेन्द्रपर्वतको लौट जाना

श्रुत्वा तु जामदग्न्यस्य वाक्यं दाशरथिस्तदा।

गौरवाद्यन्त्रितकथ: पितू राममथाब्रवीत्॥ १॥

दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने पिताके गौरवका ध्यान रखकर संकोचवश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे, परंतु जमदग्निकुमार परशुरामजीकी उपर्युक्त बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुरामजीसे कहा—

कृतवानसि यत् कर्म श्रुतवानस्मि भार्गव।

अनुरुध्यामहे ब्रह्मन् पितुरानृण्यमास्थित:॥ २॥

‘भृगुनन्दन! ब्रह्मन्! आपने पिताके ऋणसे ऊऋण होनेकी—पिताके मारनेवालेका वध करके वैरका बदला चुकानेकी भावना लेकर जो क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है और हमलोग आपके उस कर्मका अनुमोदन भी करते हैं (क्योंकि वीर पुरुष वैरका प्रतिशोध लेते ही हैं)॥ २॥

वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।

अवजानासि मे तेज: पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ ३॥

‘भार्गव! मैं क्षत्रियधर्मसे युक्त हूँ (इसीलिये आप ब्राह्मण-देवताके समक्ष विनीत रहकर कुछ बोल नहीं रहा हूँ) तो भी आप मुझे पराक्रमहीन और असमर्थ-सा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिये’॥ ३॥

इत्युक्त्वा राघव: क्रुद्धो भार्गवस्य वरायुधम्।

शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्लघुपराक्रम:॥ ४॥

ऐसा कहकर शीघ्र पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो परशुरामजीके हाथसे वह उत्तम धनुष और बाण ले लिया (साथ ही उनसे अपनी वैष्णवी शक्तिको भी वापस ले लिया)॥ ४॥

आरोप्य स धनू राम: शरं सज्यं चकार ह।

जामदग्न्यं ततो रामं राम: क्रुद्धोऽब्रवीदिदम्॥ ५॥

उस धनुषको चढ़ाकर श्रीरामने उसकी प्रत्यञ्चापर बाण रखा, फिर कुपित होकर उन्होंने जमदग्निकुमार परशुरामजीसे इस प्रकार कहा—॥ ५॥

ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्रकृतेन च।

तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम्॥ ६॥

‘(भृगुनन्दन) राम! आप ब्राह्मण होनेके नाते मेरे पूज्य हैं तथा विश्वामित्रजीके साथ भी आपका सम्बन्ध है—इन सब कारणोंसे मैं इस प्राण-संहारक बाणको आपके शरीरपर नहीं छोड़ सकता॥ ६॥

इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान्।

लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मति:॥ ७॥

न ह्ययं वैष्णवो दिव्य: शर: परपुरंजय:।

मोघ: पतति वीर्येण बलदर्पविनाशन:॥ ८॥

‘राम! मेरा विचार है कि आपको जो सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जानेकी शक्ति प्राप्त हुई है उसे अथवा आपने अपने तपोबलसे जिन अनुपम पुण्यलोकोंको प्राप्त किया है उन्हींको नष्ट कर डालूँ; क्योंकि अपने पराक्रमसे विपक्षीके बलके घमंडको चूर कर देनेवाला यह दिव्य वैष्णव बाण, जो शत्रुओंकी नगरीपर विजय दिलानेवाला है, कभी निष्फल नहीं जाता है’॥ ७-८॥

वरायुधधरं रामं द्रष्टुं सर्षिगणा: सुरा:।

पितामहं पुरस्कृत्य समेतास्तत्र सर्वश:॥ ९॥

उस समय उस उत्तम धनुष और बाणको धारण करके खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीको देखनेके लिये सम्पूर्ण देवता और ऋषि ब्रह्माजीको आगे करके वहाँ एकत्र हो गये॥ ९॥

गन्धर्वाप्सरसश्चैव सिद्धचारणकिन्नरा:।

यक्षराक्षसनागाश्च तद् द्रष्टुं महदद्भुतम्॥ १०॥

गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, राक्षस और नाग भी उस अत्यन्त अद्भुत दृश्यको देखनेके लिये वहाँ आ पहुँचे॥ १०॥

जडीकृते तदा लोके रामे वरधनुर्धरे।

निर्वीर्यो जामदग्न्योऽसौ रामो राममुदैक्षत॥ ११॥

जब श्रीरामचन्द्रजीने वह श्रेष्ठ धनुष हाथमें ले लिया, उस समय सब लोग आश्चर्यसे जडवत् हो गये। (परशुरामजीका वैष्णव तेज निकलकर श्रीरामचन्द्रजीमें मिल गया। इसलिये) वीर्यहीन हुए जमदग्निकुमार रामने दशरथनन्दन श्रीरामकी ओर देखा॥ ११॥

तेजोभिर्गतवीर्यत्वाज्जामदग्न्यो जडीकृत:।

रामं कमलपत्राक्षं मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १२॥

तेज निकल जानेसे वीर्यहीन हो जानेके कारण जडवत् बने हुए जमदग्निकुमार परशुरामने कमलनयन श्रीरामसे धीरे-धीरे कहा—॥ १२॥

काश्यपाय मया दत्ता यदा पूर्वं वसुंधरा।

विषये मे न वस्तव्यमिति मां काश्यपोऽब्रवीत्॥ १३॥

‘रघुनन्दन! पूर्वकालमें मैंने कश्यपजीको जब यह पृथिवी दान की थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘तुम्हें मेरे राज्यमें नहीं रहना चाहिये’॥ १३॥

सोऽहं गुरुवच: कुर्वन् पृथिव्यां न वसे निशाम्।

तदाप्रभृति काकुत्स्थ कृता मे काश्यपस्य ह॥ १४॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! तभीसे अपने गुरु कश्यपजीकी इस आज्ञाका पालन करता हुआ मैं कभी रातमें पृथिवीपर नहीं निवास करता हूँ; क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि मैंने कश्यपके सामने रातको पृथिवीपर न रहनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है॥ १४॥

तामिमां मद्गतिं वीर हन्तुं नार्हसि राघव।

मनोजवं गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥ १५॥

‘इसलिये वीर राघव! आप मेरी इस गमनशक्तिको नष्ट न करें। मैं मनके समान वेगसे अभी महेन्द्र नामक श्रेष्ठ पर्वतपर चला जाऊँगा॥ १५॥

लोकास्त्वप्रतिमा राम निर्जितास्तपसा मया।

जहि ताञ्छरमुख्येन मा भूत् कालस्य पर्यय:॥ १६॥

‘परंतु श्रीराम! मैंने अपनी तपस्यासे जिन अनुपम लोकोंपर विजय पायी है, उन्हींको आप इस श्रेष्ठ बाणसे नष्ट कर दें; अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये॥ १६॥

अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम्।

धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥ १७॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! आपने जो इस धनुषको चढ़ा दिया, इससे मुझे निश्चितरूपसे ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्यको मारनेवाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु हैं। आपका कल्याण हो॥ १७॥

एते सुरगणा: सर्वे निरीक्षन्ते समागता:।

त्वामप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ १८॥

‘ये सब देवता एकत्र होकर आपकी ओर देख रहे हैं। आपके कर्म अनुपम हैं; युद्धमें आपका सामना करनेवाला दूसरा कोई नहीं है॥ १८॥

न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति।

त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृत:॥ १९॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! आपके सामने जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई—यह मेरे लिये लज्जाजनक नहीं हो सकती; क्योंकि आप त्रिलोकीनाथ श्रीहरिने मुझे पराजित किया है॥ १९॥

शरमप्रतिमं राम मोक्तुमर्हसि सुव्रत।

शरमोक्षे गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥ २०॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! अब आप अपना अनुपम बाण छोडि़ये; इसके छूटनेके बाद ही मैं श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वतपर जाऊँगा’॥ २०॥

तथा ब्रुवति रामे तु जामदग्न्ये प्रतापवान्।

रामो दाशरथि: श्रीमांश्चिक्षेप शरमुत्तमम्॥ २१॥

जमदग्निनन्दन परशुरामजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी दशरथनन्दन श्रीमान् रामचन्द्रजीने वह उत्तम बाण छोड़ दिया॥ २१॥

स हतान् दृश्य रामेण स्वाँल्लोकांस्तपसार्जितान्।

जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥ २२॥

अपनी तपस्याद्वारा उपार्जित किये हुए पुण्यलोकोंको श्रीरामचन्द्रजीके चलाये हुए उस बाणसे नष्ट हुआ देखकर परशुरामजी शीघ्र ही उत्तम महेन्द्र पर्वतपर चले गये॥ २२॥

ततो वितिमिरा: सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा।

सुरा: सर्षिगणा रामं प्रशशंसुरुदायुधम्॥ २३॥

उनके जाते ही समस्त दिशाओं तथा उपदिशाओंका अन्धकार दूर हो गया। उस समय ऋषियोंसहित देवता उत्तम आयुधधारी श्रीरामकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥

रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्य: प्रपूजित:।

तत: प्रदक्षिणीकृत्य जगामात्मगतिं प्रभु:॥ २४॥

तदनन्तर दशरथनन्दन श्रीरामने जमदग्निकुमार परशुरामका पूजन किया। उनसे पूजित हो प्रभावशाली परशुराम दशरथकुमार श्रीरामकी परिक्रमा करके अपने स्थानको चले गये॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्सप्ततितम: सर्ग:॥ ७६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥

 


सप्तसप्ततितम: सर्ग:

राजा दशरथका पुत्रों और वधुओंके साथ अयोध्यामें प्रवेश, शत्रुघ्नसहित भरतका मामाके यहाँ जाना, श्रीरामके बर्तावसे सबका संतोष तथा सीता और श्रीरामका पारस्परिक प्रेम

गते रामे प्रशान्तात्मा रामो दाशरथिर्धनु:।

वरुणायाप्रमेयाय ददौ हस्ते महायशा:॥ १॥

जमदग्निकुमार परशुरामजीके चले जानेपर महायशस्वी दशरथनन्दन श्रीरामने शान्तचित्त होकर अपार शक्तिशाली वरुणके हाथमें वह धनुष दे दिया॥ १॥

अभिवाद्य ततो रामो वसिष्ठप्रमुखानृषीन्।

पितरं विकलं दृष्ट्वा प्रोवाच रघुनन्दन:॥ २॥

तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि ऋषियोंको प्रणाम करके रघुनन्दन श्रीरामने अपने पिताको विकल देखकर उनसे कहा—॥ २॥

जामदग्न्यो गतो राम: प्रयातु चतुरंगिणी।

अयोध्याभिमुखी सेना त्वया नाथेन पालिता॥ ३॥

‘पिताजी! जमदग्निकुमार परशुरामजी चले गये। अब आपके अधिनायकत्वमें सुरक्षित यह चतुरंगिणी सेना अयोध्याकी ओर प्रस्थान करे’॥ ३॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा राजा दशरथ: सुतम्।

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाघ्राय राघवम्॥ ४॥

गतो राम इति श्रुत्वा हृष्ट: प्रमुदितो नृप:।

पुनर्जातं तदा मेने पुत्रमात्मानमेव च॥ ५॥

श्रीरामका यह वचन सुनकर राजा दशरथने अपने पुत्र रघुनाथजीको दोनों भुजाओंसे खींचकर छातीसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघा। ‘परशुरामजी चले गये’ यह सुनकर राजा दशरथको बड़ा हर्ष हुआ, वे आनन्दमग्न हो गये। उस समय उन्होंने अपना और अपने पुत्रका पुनर्जन्म हुआ माना॥ ४-५॥

चोदयामास तां सेनां जगामाशु तत: पुरीम्।

पताकाध्वजिनीं रम्यां तूर्योद्घुष्टनिनादिताम्॥ ६॥

तदनन्तर उन्होंने सेनाको नगरकी ओर कूँच करनेकी आज्ञा दी और वहाँसे चलकर बड़ी शीघ्रताके साथ वे अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे। उस समय उस पुरीमें सब ओर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। सजावटसे नगरकी रमणीयता बढ़ गयी थी और भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनिसे सारी अयोध्या गूँज उठी थी॥ ६॥

सिक्तराजपथारम्यां प्रकीर्णकुसुमोत्कराम्।

राजप्रवेशसुमुखै: पौरैर्मङ्गलपाणिभि:॥ ७॥

सम्पूर्णां प्राविशद् राजा जनौघै: समलंकृताम्।

पौरै: प्रत्युद्गतो दूरं द्विजैश्च पुरवासिभि:॥ ८॥

सड़कोंपर जलका छिड़काव हुआ था, जिससे पुरीकी सुरम्य शोभा बढ़ गयी थी। यत्र-तत्र ढेर-के-ढेर फूल बिखेरे गये थे। पुरवासी मनुष्य हाथोंमें मांगलिक वस्तुएँ लेकर राजाके प्रवेशमार्गपर प्रसन्नमुख होकर खड़े थे। इन सबसे भरी-पूरी तथा भारी जनसमुदायसे अलंकृत हुई अयोध्यापुरीमें राजाने प्रवेश किया। नागरिकों तथा पुरवासी ब्राह्मणोंने दूरतक आगे जाकर महाराजकी अगवानी की थी॥ ७-८॥

पुत्रैरनुगत: श्रीमान् श्रीमद्भिश्च महायशा:।

प्रविवेश गृहं राजा हिमवत्सदृशं प्रियम्॥ ९॥

अपने कान्तिमान् पुत्रोंके साथ महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथने अपने प्रिय राजभवनमें, जो हिमालयके समान सुन्दर एवं गगनचुम्बी था, प्रवेश किया॥ ९॥

ननन्द स्वजनै राजा गृहे कामै: सुपूजित:।

कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च सुमध्यमा॥ १०॥

वधूप्रतिग्रहे युक्ता याश्चान्या राजयोषित:।

राजमहलमें स्वजनोंद्वारा मनोवाञ्छित वस्तुओंसे परम पूजित हो राजा दशरथने बड़े आनन्दका अनुभव किया। महारानी कौसल्या, सुमित्रा, सुन्दर कटिप्रदेशवाली कैकेयी तथा जो अन्य राजपत्नियाँ थीं, वे सब बहुओंको उतारनेके कार्यमें जुट गयीं॥ १०/

तत: सीतां महाभागामूर्मिलां च यशस्विनीम्॥ ११॥

कुशध्वजसुते चोभे जगृहुर्नृपयोषित:।

मंगलालापनैर्होमै: शोभिता: क्षौमवासस:॥ १२॥

तदनन्तर राजपरिवारकी उन स्त्रियोंने परम सौभाग्यवती सीता, यशस्विनी ऊर्मिला तथा कुशध्वजकी दोनों कन्याओं—माण्डवी और श्रुतकीर्तिको सवारीसे उतारा और मंगल गीत गाती हुई सब वधुओंको घरमें ले गयीं। वे प्रवेशकालिक होमकर्मसे सुशोभित तथा रेशमी साडि़योंसे अलंकृत थीं॥ ११-१२॥

देवतायतनान्याशु सर्वास्ता: प्रत्यपूजयन्।

अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वा राजसुतास्तदा॥ १३॥

रेमिरे मुदिता: सर्वा भर्तृभिर्मुदिता रह:।

उन सबने देवमन्दिरोंमें ले जाकर उन बहुओंसे देवताओंका पूजन करवाया। तदनन्तर नव-वधूरूपमें आयी हुई उन सभी राजकुमारियोंने वन्दनीय सास-ससुर आदिके चरणोंमें प्रणाम किया और अपने-अपने पतिके साथ एकान्तमें रहकर वे सब-की-सब बड़े आनन्दसे समय व्यतीत करने लगीं॥ १३/

कृतदारा: कृतास्त्राश्च सधना: ससुहृज्जना:॥ १४॥

शुश्रूषमाणा: पितरं वर्तयन्ति नरर्षभा:।

कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा दशरथ: सुतम्॥ १५॥

भरतं कैकयीपुत्रमब्रवीद् रघुनन्दन:।

श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई अस्त्रविद्यामें निपुण और विवाहित होकर धन और मित्रोंके साथ रहते हुए पिताकी सेवा करने लगे। कुछ कालके बाद रघुकुलनन्दन राजा दशरथने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरतसे कहा—॥ १४-१५/

अयं केकयराजस्य पुत्रो वसति पुत्रक॥ १६॥

त्वां नेतुमागतो वीरो युधाजिन्मातुलस्तव।

‘बेटा! ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् तुम्हें लेनेके लिये आये हैं और कई दिनोंसे यहाँ ठहरे हुए हैं’॥ १६/

श्रुत्वा दशरथस्यैतद् भरत: कैकयीसुत:॥ १७॥

गमनायाभिचक्राम शत्रुघ्नसहितस्तदा।

दशरथजीकी यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरतने उस समय शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ जानेका विचार किया॥ १७/

आपृच्छ्य पितरं शूरो रामं चाक्लिष्टकारिणम्॥ १८॥

मातृश्चापि नरश्रेष्ठ: शत्रुघ्नसहितो ययौ।

वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम तथा सभी माताओंसे पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्नसहित वहाँसे चल दिये॥ १८/

युधाजित् प्राप्य भरतं सशत्रुघ्नं प्रहर्षित:॥ १९॥

स्वपुरं प्राविशद् वीर: पिता तस्य तुतोष ह।

शत्रुघ्नसहित भरतको साथ लेकर वीर युधाजित्ने बड़े हर्षके साथ अपने नगरमें प्रवेश किया, इससे उनके पिताको बड़ा संतोष हुआ॥ १९/

गते च भरते रामो लक्ष्मणश्च महाबल:॥ २०॥

पितरं देवसंकाशं पूजयामासतुस्तदा।

भरतके चले जानेपर महाबली श्रीराम और लक्ष्मण उन दिनों अपने देवोपम पिताकी सेवा-पूजामें संलग्न रहने लगे॥ २०/

पितुराज्ञां पुरस्कृत्य पौरकार्याणि सर्वश:॥ २१॥

चकार राम: सर्वाणि प्रियाणि च हितानि च।

पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके वे नगरवासियोंके सब काम देखने तथा उनके समस्त प्रिय तथा हितकर कार्य करने लगे॥ २१/

मातृभ्यो मातृकार्याणि कृत्वा परमयन्त्रित:॥ २२॥

गुरूणां गुरुकार्याणि काले कालेऽन्ववैक्षत।

वे अपनेको बड़े संयममें रखते थे और समय-समयपर माताओंके लिये उनके आवश्यक कार्य पूर्ण करके गुरुजनोंके भारी-से-भारी कार्योंको भी सिद्ध करनेका ध्यान रखते थे॥ २२/

एवं दशरथ: प्रीतो ब्राह्मणा नैगमास्तथा॥ २३॥

रामस्य शीलवृत्तेन सर्वे विषयवासिन:।

उनके इस बर्तावसे राजा दशरथ, वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा वैश्यवर्ग बड़े प्रसन्न रहते थे; श्रीरामके उत्तम शील और सद्-व्यवहारसे उस राज्यके भीतर निवास करनेवाले सभी मनुष्य बहुत संतुष्ट रहते थे॥ २३/

तेषामतियशा लोके राम: सत्यपराक्रम:॥ २४॥

स्वयंभूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तर:।

राजाके उन चारों पुत्रोंमें सत्यपराक्रमी श्रीराम ही लोकमें अत्यन्त यशस्वी तथा महान् गुणवान् हुए—ठीक उसी तरह जैसे समस्त भूतोंमें स्वयम्भू ब्रह्मा ही अत्यन्त यशस्वी और महान् गुणवान् हैं॥ २४/

रामश्च सीतया सार्धं विजहार बहूनृतून्॥ २५॥

मनस्वी तद्गतमनास्तस्या हृदि समर्पित:।

श्रीरामचन्द्रजी सदा सीताके हृदयमन्दिरमें विराजमान रहते थे तथा मनस्वी श्रीरामका मन भी सीतामें ही लगा रहता था; श्रीरामने सीताके साथ अनेक ऋतुओंतक विहार किया॥ २५/

प्रिया तु सीता रामस्य दारा: पितृकृता इति॥ २६॥

गुणाद्रूपगुणाच्चापि प्रीतिर्भूयोऽभिवर्धते।

तस्याश्च भर्ता द्विगुणं हृदये परिवर्तते॥ २७॥

सीता श्रीरामको बहुत ही प्रिय थीं; क्योंकि वे अपने पिता राजा जनकद्वारा श्रीरामके हाथमें पत्नी-रूपसे समर्पित की गयी थीं। सीताके पातिव्रत्य आदि गुणसे तथा उनके सौन्दर्यगुणसे भी श्रीरामका उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम बढ़ता रहता था; इसी प्रकार सीताके हृदयमें भी उनके पति श्रीराम अपने गुण और सौन्दर्यके कारण द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर रहते थे॥ २६-२७॥

अन्तर्गतमपि व्यक्तमाख्याति हृदयं हृदा।

तस्य भूयो विशेषेण मैथिली जनकात्मजा।

देवताभि: समा रूपे सीता श्रीरिव रूपिणी॥ २८॥

जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको भी अपने हृदयसे ही और अधिकरूपसे जान लेती थीं तथा स्पष्टरूपसे बता भी देती थीं। वे रूपमें देवांगनाओंके समान थीं और मूर्तिमती लक्ष्मी-सी प्रतीत होती थीं॥ २८॥

तया स राजर्षिसुतोऽभिकामया।

समेयिवानुत्तमराजकन्यया ।

अतीव राम: शुशुभे मुदान्वितो

विभु: श्रिया विष्णुरिवामरेश्वर:॥ २९॥

श्रेष्ठ राजकुमारी सीता श्रीरामकी ही कामना रखती थीं और श्रीराम भी एकमात्र उन्हींको चाहते थे; जैसे लक्ष्मीके साथ देवेश्वर भगवान् विष्णुकी शोभा होती है, उसी प्रकार उन सीतादेवीके साथ राजर्षि दशरथकुमार श्रीराम परम प्रसन्न रहकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तसप्ततितम: सर्ग:॥ ७७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें
सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥

॥ बालकाण्डं सम्पूर्णम्॥

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

प्रथम: सर्ग:

श्रीरामके सद्गुणोंका वर्णन, राजा दशरथका श्रीरामको युवराज बनानेका विचार तथा विभिन्न नरेशों और नगर एवं जनपदके लोगोंको मन्त्रणाके लिये अपने दरबारमें बुलाना

गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघ:।

शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीत: प्रीतिपुरस्कृत:॥ १॥

(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामाके यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओंको सदाके लिये नष्ट कर देनेवाले निष्पाप शत्रुघ्नको भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥ १॥

स तत्र न्यवसद् भ्रात्रा सह सत्कारसत्कृत:।

मातुलेनाश्वपतिना पुत्रस्नेहेन लालित:॥ २॥

वहाँ भाईसहित उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ और वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उनके मामा युधाजित्, जो अश्वयूथके अधिपति थे, उन दोनोंपर पुत्रसे भी अधिक स्नेह रखते और बड़ा लाड़-प्यार करते थे॥ २॥

तत्रापि निवसन्तौ तौ तर्प्यमाणौ च कामत:।

भ्रातरौ स्मरतां वीरौ वृद्धं दशरथं नृपम्॥ ३॥

यद्यपि मामाके यहाँ उन दोनों वीर भाइयोंकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करके उन्हें पूर्णत: तृप्त किया जाता था, तथापि वहाँ रहते हुए भी उन्हें अपने वृद्ध पिता महाराज दशरथकी याद कभी नहीं भूलती थी॥ ३॥

राजापि तौ महातेजा: सस्मार प्रोषितौ सुतौ।

उभौ भरतशत्रुघ्नौ महेन्द्रवरुणोपमौ॥ ४॥

महातेजस्वी राजा दशरथ भी परदेशमें गये हुए महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी अपने उन दोनों पुत्र भरत और शत्रुघ्नका सदा स्मरण किया करते थे॥ ४॥

सर्व एव तु तस्येष्टाश्चत्वार: पुरुषर्षभा:।

स्वशरीराद् विनिर्वृत्ताश्चत्वार इव बाहव:॥ ५॥

अपने शरीरसे प्रकट हुई चारों भुजाओंके समान वे सब चारों ही पुरुषशिरोमणि पुत्र महाराजको बहुत ही प्रिय थे॥ ५॥

तेषामपि महातेजा रामो रतिकर: पितु:।

स्वयम्भूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तर:॥ ६॥

परंतु उनमें भी महातेजस्वी श्रीराम सबकी अपेक्षा अधिक गुणवान् होनेके कारण समस्त प्राणियोंके लिये ब्रह्माजीकी भाँति पिताके लिये विशेष प्रीतिवर्धक थे॥ ६॥

स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभि:।

अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णु: सनातन:॥ ७॥

इसका एक कारण और भी था—वे साक्षात् सनातन विष्णु थे और परम प्रचण्ड रावणके वधकी अभिलाषा रखनेवाले देवताओंकी प्रार्थनापर मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे॥ ७॥

कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।

यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना॥ ८॥

उन अमित तेजस्वी पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे महारानी कौसल्याकी वैसी ही शोभा होती थी, जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्रसे देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं॥ ८॥

स हि रूपोपपन्नश्च वीर्यवाननसूयक:।

भूमावनुपम: सूनुर्गुणैर्दशरथोपम:॥ ९॥

श्रीराम बड़े ही रूपवान् और पराक्रमी थे। वे किसीके दोष नहीं देखते थे। भूमण्डलमें उनकी समता करनेवाला कोई नहीं था। वे अपने गुणोंसे पिता दशरथके समान एवं योग्य पुत्र थे॥ ९॥

स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं च भाषते।

उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते॥ १०॥

वे सदा शान्त चित्त रहते और सान्त्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे; यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका उत्तर नहीं देते थे॥ १०॥

कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति।

न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया॥ ११॥

कभी कोई एक बार भी उपकार कर देता तो वे उसके उस एक ही उपकारसे सदा संतुष्ट रहते थे और मनको वशमें रखनेके कारण किसीके सैकड़ों अपराध करनेपर भी उसके अपराधोंको याद नहीं रखते थे॥

शीलवृद्धैर्ज्ञानवृद्धैर्वयोवृद्धैश्च सज्जनै:।

कथयन्नास्त वै नित्यमस्त्रयोग्यान्तरेष्वपि॥ १२॥

अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासके लिये उपयुक्त समयमें भी बीच-बीचमें अवसर निकालकर वे उत्तम चरित्रमें, ज्ञानमें तथा अवस्थामें बढ़े-चढ़े सत्पुरुषोंके साथ ही सदा बातचीत करते (और उनसे शिक्षा लेते थे)॥ १२॥

बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवद:।

वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन विस्मित:॥ १३॥

वे बड़े बुद्धिमान् थे और सदा मीठे वचन बोलते थे। अपने पास आये हुए मनुष्योंसे पहले स्वयं ही बात करते और ऐसी बातें मुँहसे निकालते जो उन्हें प्रिय लगें; बल और पराक्रमसे सम्पन्न होनेपर भी अपने महान् पराक्रमके कारण उन्हें कभी गर्व नहीं होता था॥ १३॥

न चानृतकथो विद्वान् वृद्धानां प्रतिपूजक:।

अनुरक्त: प्रजाभिश्च प्रजाश्चाप्यनुरज्यते॥ १४॥

झूठी बात तो उनके मुखसे कभी निकलती ही नहीं थी। वे विद्वान् थे और सदा वृद्ध पुरुषोंका सम्मान किया करते थे। प्रजाका श्रीरामके प्रति और श्रीरामका प्रजाके प्रति बड़ा अनुराग था॥ १४॥

सानुक्रोशो जितक्रोधो ब्राह्मणप्रतिपूजक:।

दीनानुकम्पी धर्मज्ञो नित्यं प्रग्रहवान् शुचि:॥ १५॥

वे परम दयालु क्रोधको जीतनेवाले और ब्राह्मणोंके पुजारी थे। उनके मनमें दीन-दु:खियोंके प्रति बड़ी दया थी। वे धर्मके रहस्यको जाननेवाले, इन्द्रियोंको सदा वशमें रखनेवाले और बाहर-भीतरसे परम पवित्र थे॥

कुलोचितमति: क्षात्रं स्वधर्मं बहु मन्यते।

मन्यते परया प्रीत्या महत् स्वर्गफलं तत:॥ १६॥

अपने कुलोचित आचार, दया, उदारता और शरणागतरक्षा आदिमें ही उनका मन लगता था। वे अपने क्षत्रियधर्मको अधिक महत्त्व देते और मानते थे। वे उस क्षत्रियधर्मके पालनसे महान् स्वर्ग (परम धाम) की प्राप्ति मानते थे; अत: बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें संलग्न रहते थे॥ १६॥

नाश्रेयसि रतो यश्च न विरुद्धकथारुचि:।

उत्तरोत्तरयुक्तीनां वक्ता वाचस्पतिर्यथा॥ १७॥

अमङ्गलकारी निषिद्ध कर्ममें उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी; शास्त्रविरुद्ध बातोंको सुननेमें उनकी रुचि नहीं थी; वे अपने न्याययुक्त पक्षके समर्थनमें बृहस्पतिके समान एक-से-एक बढ़कर युक्तियाँ देते थे॥ १७॥

अरोगस्तरुणो वाग्मी वपुष्मान् देशकालवित्।

लोके पुरुषसारज्ञ: साधुरेको विनिर्मित:॥ १८॥

उनका शरीर नीरोग था और अवस्था तरुण। वे अच्छे वक्ता, सुन्दर शरीरसे सुशोभित तथा देश-कालके तत्त्वको समझनेवाले थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था कि विधाताने संसारमें समस्त पुरुषोंके सारतत्त्वको समझनेवाले साधु पुरुषके रूपमें एकमात्र श्रीरामको ही प्रकट किया है॥ १८॥

स तु श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्त: प्रजानां पार्थिवात्मज:।

बहिश्चर इव प्राणो बभूव गुणत: प्रिय:॥ १९॥

राजकुमार श्रीराम श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण प्रजाजनोंको बाहर विचरनेवाले प्राणकी भाँति प्रिय थे॥ १९॥

सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित्।

इष्वस्त्रे च पितु: श्रेष्ठो बभूव भरताग्रज:॥ २०॥

भरतके बड़े भाई श्रीराम सम्पूर्ण विद्याओंके व्रतमें निष्णात और छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके यथार्थ ज्ञाता थे। बाणविद्यामें तो वे अपने पितासे भी बढ़कर थे॥ २०॥

कल्याणाभिजन: साधुरदीन: सत्यवागृजु:।

वृद्धैरभिविनीतश्च द्विजैर्धर्मार्थदर्शिभि:॥ २१॥

वे कल्याणकी जन्मभूमि, साधु, दैन्यरहित, सत्यवादी और सरल थे; धर्म और अर्थके ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी॥ २१॥

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञ: स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।

लौकिके समयाचारे कृतकल्पो विशारद:॥ २२॥

उन्हें धर्म, काम और अर्थके तत्त्वका सम्यक् ज्ञान था। वे स्मरणशक्तिसे सम्पन्न और प्रतिभाशाली थे। वे लोकव्यवहारके सम्पादनमें समर्थ और समयोचित धर्माचरणमें कुशल थे॥ २२॥

निभृत: संवृताकारो गुप्तमन्त्र: सहायवान्।

अमोघक्रोधहर्षश्च त्यागसंयमकालवित्॥ २३॥

वे विनयशील, अपने आकार (अभिप्राय)-को छिपानेवाले, मन्त्रको गुप्त रखनेवाले और उत्तम सहायकोंसे सम्पन्न थे। उनका क्रोध अथवा हर्ष निष्फल नहीं होता था। वे वस्तुओंके त्याग और संग्रहके अवसरको भलीभाँति जानते थे॥ २३॥

दृढभक्ति: स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वच:।

निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्॥ २४॥

गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी। वे स्थितप्रज्ञ थे और असद्वस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे। उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था। वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे॥ २४॥

शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविद:।

य: प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षण:॥ २५॥

वे शास्त्रोंके ज्ञाता, उपकारियोंके प्रति कृतज्ञ तथा पुरुषोंके तारतम्यको अथवा दूसरे पुरुषोंके मनोभावको जाननेमें कुशल थे। यथायोग्य निग्रह और अनुग्रह करनेमें वे पूर्ण चतुर थे॥ २५॥

सत्संग्रहानुग्रहणे स्थानविन्निग्रहस्य च।

आयकर्मण्युपायज्ञ: संदृष्टव्ययकर्मवित्॥ २६॥

उन्हें सत्पुरुषोंके संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषोंके निग्रहके अवसरोंका ठीक-ठीक ज्ञान था। धनकी आयके उपायोंको वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलोंको नष्ट न करके उनसे रस लेनेवाले भ्रमरोंकी भाँति वे प्रजाओंको कष्ट दिये बिना ही उनसे न्यायोचित धनका उपार्जन करनेमें कुशल थे) तथा शास्त्रवर्णित व्यय कर्मका भी उन्हें ठीक-ठीक ज्ञान था39॥ २६॥

श्रैष्ठ्यं चास्त्रसमूहेषु प्राप्तो व्यामिश्रकेषु च।

अर्थधर्मौ च संगृह्य सुखतन्त्रो न चालस:॥ २७॥

उन्होंने सब प्रकारके अस्त्रसमूहों तथा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओंसे मिश्रित नाटक आदिके ज्ञानमें निपुणता प्राप्त की थी। वे अर्थ और धर्मका संग्रह (पालन) करते हुए तदनुकूल कामका सेवन करते थे और कभी आलस्यको पास नहीं फटकने देते थे॥ २७॥

वैहारिकाणां शिल्पानां विज्ञातार्थविभागवित्।

आरोहे विनये चैव युक्तो वारणवाजिनाम्॥ २८॥

विहार (क्रीडा या मनोरञ्जन)-के उपयोगमें आनेवाले संगीत, वाद्य और चित्रकारी आदि शिल्पोंके भी वे विशेषज्ञ थे। अर्थोंके विभाजनका भी उन्हें सम्यक् ज्ञान था।40 वे हाथियों और घोड़ोंपर चढ़ने और उन्हें भाँति-भाँतिकी चालोंकी शिक्षा देनेमें भी निपुण थे॥ २८॥

धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मत:।

अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारद:॥ २९॥

श्रीरामचन्द्रजी इस लोकमें धनुर्वेदके सभी विद्वानोंमें श्रेष्ठ थे। अतिरथी वीर भी उनका विशेष सम्मान करते थे। शत्रुसेनापर आक्रमण और प्रहार करनेमें वे विशेष कुशल थे। सेना-संचालनकी नीतिमें उन्होंने अधिक निपुणता प्राप्त की थी॥ २९॥

अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरै:।

अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी॥ ३०॥

संग्राममें कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उनको परास्त नहीं कर सकते थे। उनमें दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव था। वे क्रोधको जीत चुके थे। दर्प और ईर्ष्याका उनमें अत्यन्त अभाव था॥ ३०॥

नावज्ञेयश्च भूतानां न च कालवशानुग:।

एवं श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्त: प्रजानां पार्थिवात्मज:॥ ३१॥

सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधाया: क्षमागुणै:।

बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये चापि शचीपते:॥ ३२॥

किसी भी प्राणीके मनमें उनके प्रति अवहेलनाका भाव नहीं था। वे कालके वशमें होकर उसके पीछे-पीछे चलनेवाले नहीं थे (काल ही उनके पीछे चलता था)। इस प्रकार उत्तम गुणोंसे युक्त होनेके कारण राजकुमार श्रीराम समस्त प्रजाओं तथा तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये आदरणीय थे। वे अपने क्षमासम्बन्धी गुणोंके द्वारा पृथ्वीकी समानता करते थे। बुद्धिमें बृहस्पति और बल-पराक्रममें शचीपति इन्द्रके तुल्य थे॥ ३१-३२॥

तथा सर्वप्रजाकान्तै: प्रीतिसंजननै: पितु:।

गुणैर्विरुरुचे रामो दीप्त: सूर्य इवांशुभि:॥ ३३॥

जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी समस्त प्रजाओंको प्रिय लगनेवाले तथा पिताकी प्रीति बढ़ानेवाले सद्गुणोंसे सुशोभित होते थे॥ ३३॥

तमेवंवृत्तसम्पन्नमप्रधृष्यपराक्रमम् ।

लोकनाथोपमं नाथमकामयत मेदिनी॥ ३४॥

ऐसे सदाचारसम्पन्न, अजेय पराक्रमी और लोकपालोंके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीको पृथ्वी (भूदेवी और भूमण्डलकी प्रजा)-ने अपना स्वामी बनानेकी कामना की॥ ३४॥

एतैस्तु बहुभिर्युक्तं गुणैरनुपमै: सुतम्।

दृष्ट्वा दशरथो राजा चक्रे चिन्तां परंतप:॥ ३५॥

अपने पुत्र श्रीरामको अनेक अनुपम गुणोंसे युक्त देखकर शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथने मन-ही-मन कुछ विचार करना आरम्भ किया॥ ३५॥

अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविन:।

प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति॥ ३६॥

उन चिरञ्जीवी बूढ़े महाराज दशरथके हृदयमें यह चिन्ता हुई कि किस प्रकार मेरे जीते-जी श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँ और उनके राज्याभिषेकसे प्राप्त होनेवाली यह प्रसन्नता मुझे कैसे सुलभ हो॥ ३६॥

एषा ह्यस्य परा प्रीतिर्हृदि सम्परिवर्तते।

कदा नाम सुतं द्रक्ष्याम्यभिषिक्तमहं प्रियम्॥ ३७॥

उनके हृदयमें यह उत्तम अभिलाषा बारम्बार चक्कर लगाने लगी कि कब मैं अपने प्रिय पुत्र श्रीरामका राज्याभिषेक देखूँगा॥ ३७॥

वृद्धिकामो हि लोकस्य सर्वभूतानुकम्पक:।

मत्त: प्रियतरो लोके पर्जन्य इव वृष्टिमान्॥ ३८॥

वे सोचने लगे कि ‘श्रीराम सब लोगोंके अभ्युदयकी कामना करते और सम्पूर्ण जीवोंपर दया रखते हैं। वे लोकमें वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति मुझसे भी बढ़कर प्रिय हो गये हैं॥ ३८॥

यमशक्रसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ।

महीधरसमो धृत्यां मत्तश्च गुणवत्तर:॥ ३९॥

‘श्रीराम बल-पराक्रममें यम और इन्द्रके समान, बुद्धिमें बृहस्पतिके समान और धैर्यमें पर्वतके समान हैं। गुणोंमें तो वे मुझसे सर्वथा बढ़े-चढ़े हैं॥ ३९॥

महीमहमिमां कृत्स्नामधितिष्ठन्तमात्मजम्।

अनेन वयसा दृष्ट्वा यथा स्वर्गमवाप्नुयाम्॥ ४०॥

‘मैं इसी उम्रमें अपने बेटे श्रीरामको इस सारी पृथ्वीका राज्य करते देख यथासमय सुखसे स्वर्ग प्राप्त करूँ, यही मेरे जीवनकी साध है’॥ ४०॥

इत्येवं विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभै:।

शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणै:॥ ४१॥

तं समीक्ष्य तदा राजा युक्तं समुदितैर्गुणै:।

निश्चित्य सचिवै: सार्धं यौवराज्यममन्यत॥ ४२॥

इस प्रकार विचारकर तथा अपने पुत्र श्रीरामको उन-उन नाना प्रकारके विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य तथा लोकोत्तर गुणोंसे, जो अन्य राजाओंमें दुर्लभ हैं, विभूषित देख राजा दशरथने मन्त्रियोंके साथ सलाह करके उन्हें युवराज बनानेका निश्चय कर लिया॥ ४१-४२॥

दिव्यन्तरिक्षे भूमौ च घोरमुत्पातजं भयम्।

संचचक्षेऽथ मेधावी शरीरे चात्मनो जराम्॥ ४३॥

बुद्धिमान् महाराज दशरथने मन्त्रीको स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूतलमें दृष्टिगोचर होनेवाले उत्पातोंका घोर भय सूचित किया और अपने शरीरमें वृद्धावस्थाके आगमनकी भी बात बतायी॥ ४३॥

पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मन:।

लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मन:॥ ४४॥

पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजाके प्रिय थे। लोकमें उनका सर्वप्रिय होना राजाके अपने आन्तरिक शोकको दूर करनेवाला था, इस बातको राजाने अच्छी तरह समझा॥ ४४॥

आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च।

प्राप्ते काले स धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृप:॥ ४५॥

तदनन्तर उपयुक्त समय आनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने अपने और प्रजाके कल्याणके लिये मन्त्रियोंको श्रीरामके राज्याभिषेकके लिये शीघ्र तैयारी करनेकी आज्ञा दी। इस उतावलीमें उनके हृदयका प्रेम और प्रजाका अनुराग भी कारण था॥ ४५॥

नानानगरवास्तव्यान् पृथग्जानपदानपि।

समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपति:॥ ४६॥

उन भूपालने भिन्न-भिन्न नगरोंमें निवास करनेवाले प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य जनपदोंके सामन्त राजाओंको भी मन्त्रियोंद्वारा अयोध्यामें बुलवा लिया॥ ४६॥

तान् वेश्मनानाभरणैर्यथार्हं प्रतिपूजितान्।

ददर्शालंकृतो राजा प्रजापतिरिव प्रजा:॥ ४७॥

उन सबको ठहरनेके लिये घर देकर नाना प्रकारके आभूषणोंद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार किया। तत्पश्चात् स्वयं भी अलंकृत होकर राजा दशरथ उन सबसे उसी प्रकार मिले, जैसे प्रजापति ब्रह्मा प्रजावर्गसे मिलते हैं॥

न तु केकयराजानं जनकं वा नराधिप:।

त्वरया चानयामास पश्चात्तौ श्रोष्यत: प्रियम्॥ ४८॥

जल्दीबाजीके कारण राजा दशरथने केकय-नरेशको तथा मिथिलापति जनकको भी नहीं बुलवाया।41 उन्होंने सोचा वे दोनों सम्बन्धी इस प्रिय समाचारको पीछे सुन लेंगे॥ ४८॥

अथोपविष्टे नृपतौ तस्मिन् परपुरार्दने।

तत: प्रविविशु: शेषा राजानो लोकसम्मता:॥ ४९॥

तदनन्तर शत्रुनगरीको पीडि़त करनेवाले राजा दशरथ जब दरबारमें आ बैठे, तब (केकयराज और जनकको छोड़कर) शेष सभी लोकप्रिय नरेशोंने राजसभामें प्रवेश किया॥ ४९॥

अथ राजवितीर्णेषु विविधेष्वासनेषु च।

राजानमेवाभिमुखा निषेदुर्नियता नृपा:॥ ५०॥

वे सभी नरेश राजाद्वारा दिये गये नाना प्रकारके सिंहासनोंपर उन्हींकी ओर मुँह करके विनीतभावसे बैठे थे॥ ५०॥

स लब्धमानैर्विनयान्वितैर्नृपै:

पुरालयैर्जानपदैश्च मानवै:।

उपोपविष्टैर्नृपतिर्वृतो बभौ

सहस्रचक्षुर्भगवानिवामरै: ॥ ५१॥

राजासे सम्मानित होकर विनीतभावसे उन्हींके आस-पास बैठे हुए सामन्त नरेशों तथा नगर और जनपदके निवासी मनुष्योंसे घिरे हुए महाराज दशरथ उस समय देवताओंके बीचमें विराजमान सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे॥ ५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे प्रथम: सर्ग:॥ १॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १॥

 

द्वितीय: सर्ग:

राजा दशरथद्वारा श्रीरामके राज्याभिषेकका प्रस्ताव तथा सभासदोंद्वारा श्रीरामके गुणोंका वर्णन करते हुए उक्त प्रस्तावका सहर्ष युक्तियुक्त समर्थन

तत: परिषदं सर्वामामन्त्र्य वसुधाधिप:।

हितमुद्धर्षणं चैवमुवाच प्रथितं वच:॥ १॥

दुन्दुभिस्वरकल्पेन गम्भीरेणानुनादिना।

स्वरेण महता राजा जीमूत इव नादयन्॥ २॥

उस समय राजसभामें बैठे हुए सब लोगोंको सम्बोधित करके महाराज दशरथने मेघके समान शब्द करते हुए दुन्दुभिकी ध्वनिके सदृश अत्यन्त गम्भीर एवं गूँजते हुए उच्च स्वरसे सबके आनन्दको बढ़ानेवाली यह हितकारक बात कही॥ १-२॥

राजलक्षणयुक्तेन कान्तेनानुपमेन च।

उवाच रसयुक्तेन स्वरेण नृपतिर्नृपान्॥ ३॥

राजा दशरथका स्वर राजोचित स्निग्धता और गम्भीरता आदि गुणोंसे युक्त था, अत्यन्त कमनीय और अनुपम था। वे उस अद्भुत रसमय स्वरसे समस्त नरेशोंको सम्बोधित करके बोले—॥ ३॥

विदितं भवतामेतद् यथा मे राज्यमुत्तमम्।

पूर्वकैर्मम राजेन्द्रै: सुतवत् परिपालितम्॥ ४॥

‘सज्जनो! आपलोगोंको यह तो विदित ही है कि मेरे पूर्वज राजाधिराजोंने इस श्रेष्ठ राज्यका (यहाँकी प्रजाका) किस प्रकार पुत्रकी भाँति पालन किया था॥

सोऽहमिक्ष्वाकुभि: सर्वैर्नरेन्द्रै: प्रतिपालितम्।

श्रेयसा योक्तुमिच्छामि सुखार्हमखिलं जगत्॥ ५॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंने जिसका प्रतिपालन किया है, उस सुख भोगनेके योग्य सम्पूर्ण जगत्को अब मैं भी कल्याणका भागी बनाना चाहता हूँ॥ ५॥

मयाप्याचरितं पूर्वै: पन्थानमनुगच्छता।

प्रजा नित्यमनिद्रेण यथाशक्त्यभिरक्षिता:॥ ६॥

‘मेरे पूर्वज जिस मार्गपर चलते आये हैं, उसीका अनुसरण करते हुए मैंने भी सदा जागरूक रहकर समस्त प्रजाजनोंकी यथाशक्ति रक्षा की है॥ ६॥

इदं शरीरं कृत्स्नस्य लोकस्य चरता हितम्।

पाण्डुरस्यातपत्रस्य च्छायायां जरितं मया॥ ७॥

‘समस्त संसारका हित-साधन करते हुए मैंने इस शरीरको श्वेत राजछत्रकी छायामें बूढ़ा किया है॥ ७॥

प्राप्य वर्षसहस्राणि बहून्यायूंषि जीवत:।

जीर्णस्यास्य शरीरस्य विश्रान्तिमभिरोचये॥ ८॥

‘अनेक सहस्र (साठ हजार) वर्षोंकी आयु पाकर जीवित रहते हुए अपने इस जराजीर्ण शरीरको अब मैं विश्राम देना चाहता हूँ॥ ८॥

राजप्रभावजुष्टां च दुर्वहामजितेन्द्रियै:।

परिश्रान्तोऽस्मि लोकस्य गुर्वीं धर्मधुरं वहन्॥ ९॥

‘जगत्के धर्मपूर्वक संरक्षणका भारी भार राजाओंके शौर्य आदि प्रभावोंसे ही उठाना सम्भव है। अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये इस बोझको ढोना अत्यन्त कठिन है। मैं दीर्घकालसे इस भारी भारको वहन करते-करते थक गया हूँ॥ ९॥

सोऽहं विश्राममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते।

संनिकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान्॥ १०॥

‘इसलिये यहाँ पास बैठे हुए इन सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजोंकी अनुमति लेकर प्रजाजनोंके हितके कार्यमें अपने पुत्र श्रीरामको नियुक्त करके अब मैं राजकार्यसे विश्राम लेना चाहता हूँ॥ १०॥

अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणै: श्रेष्ठो ममात्मज:।

पुरन्दरसमो वीर्ये राम: परपुरंजय:॥ ११॥

‘मेरे पुत्र श्रीराम मेरी अपेक्षा सभी गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामचन्द्र बल-पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान हैं॥ ११॥

तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्।

यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रात: पुरुषपुङ्गवम्॥ १२॥

‘पुष्य-नक्षत्रसे युक्त चन्द्रमाकी भाँति समस्त कार्योंके साधनमें कुशल तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उन पुरुषशिरोमणि श्रीरामचन्द्रको मैं कल प्रात:काल पुष्यनक्षत्रमें युवराजके पदपर नियुक्त करूँगा॥ १२॥

अनुरूप: स वो नाथो लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रज:।

त्रैलोक्यमपि नाथेन येन स्यान्नाथवत्तरम्॥ १३॥

‘लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीमान् राम आपलोगोंके लिये योग्य स्वामी सिद्ध होंगे; उनके-जैसे स्वामीसे सम्पूर्ण त्रिलोकी भी परम सनाथ हो सकती है॥ १३॥

अनेन श्रेयसा सद्य: संयोक्ष्येऽहमिमां महीम्।

गतक्लेशो भविष्यामि सुते तस्मिन् निवेश्य वै॥ १४॥

‘ये श्रीराम कल्याणस्वरूप हैं; इनका शीघ्र ही अभिषेक करके मैं इस भूमण्डलको तत्काल कल्याणका भागी बनाऊँगा। अपने पुत्र श्रीरामपर राज्यका भार रखकर मैं सर्वथा क्लेशरहित—निश्चिन्त हो जाऊँगा॥ १४॥

यदिदं मेऽनुरूपार्थं मया साधु सुमन्त्रितम्।

भवन्तो मेऽनुमन्यन्तां कथं वा करवाण्यहम्॥ १५॥

‘यदि मेरा यह प्रस्ताव आपलोगोंको अनुकूल जान पड़े और यदि मैंने यह अच्छी बात सोची हो तो आपलोग इसके लिये मुझे सहर्ष अनुमति दें अथवा यह बतावें कि मैं किस प्रकारसे कार्य करूँ॥ १५॥

यद्यप्येषा मम प्रीतिर्हितमन्यद् विचिन्त्यताम्।

अन्या मध्यस्थचिन्ता तु विमर्दाभ्यधिकोदया॥ १६॥

‘यद्यपि यह श्रीरामके राज्याभिषेकका विचार मेरे लिये अधिक प्रसन्नताका विषय है तथापि यदि इसके अतिरिक्त भी कोई सबके लिये हितकर बात हो तो आपलोग उसे सोचें; क्योंकि मध्यस्थ पुरुषोंका विचार एकपक्षीय पुरुषकी अपेक्षा विलक्षण होता है, कारण कि वह पूर्वपक्ष और अपरपक्षको लक्ष्य करके किया गया होनेके कारण अधिक अभ्युदय करनेवाला होता है’॥ १६॥

इति ब्रुवन्तं मुदिता: प्रत्यनन्दन् नृपा नृपम्।

वृष्टिमन्तं महामेघं नर्दन्त इव बर्हिण:॥ १७॥

राजा दशरथ जब ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित नरेशोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन महाराजका उसी प्रकार अभिनन्दन किया, जैसे मोर मधुर केकारव फैलाते हुए वर्षा करनेवाले महामेघका अभिनन्दन करते हैं॥ १७॥

स्निग्धोऽनुनाद: संजज्ञे ततो हर्षसमीरित:।

जनौघोद्घुष्टसंनादो मेदिनीं कम्पयन्निव॥ १८॥

तत्पश्चात् समस्त जनसमुदायकी स्नेहमयी हर्षध्वनि सुनायी पड़ी। वह इतनी प्रबल थी कि समस्त पृथ्वीको कँपाती हुई-सी जान पड़ी॥ १८॥

तस्य धर्मार्थविदुषो भावमाज्ञाय सर्वश:।

ब्राह्मणा बलमुख्याश्च पौरजानपदै: सह॥ १९॥

समेत्य ते मन्त्रयितुं समतागतबुद्धय:।

ऊचुश्च मनसा ज्ञात्वा वृद्धं दशरथं नृपम्॥ २०॥

धर्म और अर्थके ज्ञाता महाराज दशरथके अभिप्रायको पूर्णरूपसे जानकर सम्पूर्ण ब्राह्मण और सेनापति नगर और जनपदके प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके साथ मिलकर परस्पर सलाह करनेके लिये बैठे और मनसे सब कुछ समझकर जब वे एक निश्चयपर पहुँच गये, तब बूढ़े राजा दशरथसे इस प्रकार बोले—॥ १९-२०॥

अनेकवर्षसाहस्रो वृद्धस्त्वमसि पार्थिव।

स रामं युवराजानमभिषिञ्चस्व पार्थिवम्॥ २१॥

‘पृथ्वीनाथ! आपकी अवस्था कई हजार वर्षोंकी हो गयी। आप बूढ़े हो गये। अत: पृथ्वीके पालनमें समर्थ अपने पुत्र श्रीरामका अवश्य ही युवराजके पदपर अभिषेक कीजिये॥ २१॥

इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम्।

गजेन महता यान्तं रामं छत्रावृताननम्॥ २२॥

‘रघुकुलके वीर महाबलवान् महाबाहु श्रीराम महान् गजराजपर बैठकर यात्रा करते हों और उनके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ हो—इस रूपमें हम उनकी झाँकी करना चाहते हैं’॥ २२॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा तेषां मन:प्रियम्।

अजानन्निव जिज्ञासुरिदं वचनमब्रवीत्॥ २३॥

उनकी यह बात राजा दशरथके मनको प्रिय लगनेवाली थी; इसे सुनकर राजा दशरथ अनजान-से बनकर उन सबके मनोभावको जाननेकी इच्छासे इस प्रकार बोले—॥ २३॥

श्रुत्वैतद् वचनं यन्मे राघवं पतिमिच्छथ।

राजान: संशयोऽयं मे तदिदं ब्रूत तत्त्वत:॥ २४॥

‘राजागण! मेरी यह बात सुनकर जो आपलोगोंने श्रीरामको राजा बनानेकी इच्छा प्रकट की है, इसमें मुझे यह संशय हो रहा है जिसे आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। आप इसे सुनकर इसका यथार्थ उत्तर दें॥ २४॥

कथं नु मयि धर्मेण पृथिवीमनुशासति।

भवन्तो द्रष्टुमिच्छन्ति युवराजं महाबलम्॥ २५॥

‘मैं धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका निरन्तर पालन कर रहा हूँ, फिर मेरे रहते हुए आपलोग महाबली श्रीरामको युवराजके रूपमें क्यों देखना चाहते हैं?’॥ २५॥

ते तमूचुर्महात्मान: पौरजानपदै: सह।

बहवो नृप कल्याणगुणा: सन्ति सुतस्य ते॥ २६॥

यह सुनकर वे महात्मा नरेश नगर और जनपदके लोगोंके साथ राजा दशरथसे इस प्रकार बोले—‘महाराज! आपके पुत्र श्रीराममें बहुत-से कल्याणकारी सद्गुण हैं॥ २६॥

गुणान् गुणवतो देव देवकल्पस्य धीमत:।

प्रियानानन्दनान् कृत्स्नान् प्रवक्ष्यामोऽद्य तान् शृणु॥ २७॥

‘देव! देवताओंके तुल्य बुद्धिमान् और गुणवान् श्रीरामचन्द्रजीके सारे गुण सबको प्रिय लगनेवाले और आनन्ददायक हैं, हम इस समय उनका यत्क‌िंचित् वर्णन कर रहे हैं, आप उन्हें सुनिये॥ २७॥

दिव्यैर्गुणै: शक्रसमो राम: सत्यपराक्रम:।

इक्ष्वाकुभ्योऽपि सर्वेभ्यो ह्यतिरिक्तो विशाम्पते॥ २८॥

‘प्रजानाथ! सत्यपराक्रमी श्रीराम देवराज इन्द्रके समान दिव्य गुणोंसे सम्पन्न हैं। इक्ष्वाकुकुलमें भी ये सबसे श्रेष्ठ हैं॥ २८॥

राम: सत्पुरुषो लोके सत्य: सत्यपरायण:।

साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह॥ २९॥

‘श्रीराम संसारमें सत्यवादी, सत्यपरायण और सत्पुरुष हैं। साक्षात् श्रीरामने ही अर्थके साथ धर्मको भी प्रतिष्ठित किया है॥ २९॥

प्रजासुखत्वे चन्द्रस्य वसुधाया: क्षमागुणै:।

बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये साक्षाच्छचीपते:॥ ३०॥

‘ये प्रजाको सुख देनेमें चन्द्रमाकी और क्षमारूपी गुणमें पृथ्वीकी समानता करते हैं। बुद्धिमें बृहस्पति और बल-पराक्रममें साक्षात् शचीपति इन्द्रके समान हैं॥ ३०॥

धर्मज्ञ: सत्यसंधश्च शीलवाननसूयक:।

क्षान्त: सान्त्वयिता श्लक्ष्ण: कृतज्ञो विजितेन्द्रिय:॥ ३१॥

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयक:।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघव:॥ ३२॥

‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन-दु:खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं॥ ३१-३२॥

बहुश्रुतानां वृद्धानां ब्राह्मणानामुपासिता।

तेनास्येहातुला कीर्तिर्यशस्तेजश्च वर्धते॥ ३३॥

‘वे बहुश्रुत विद्वानों, बड़े-बूढ़ों तथा ब्राह्मणोंके उपासक हैं—सदा ही उनका संग किया करते हैं, इसलिये इस जगत्में श्रीरामकी अनुपम कीर्ति, यश और तेजका विस्तार हो रहा है॥ ३३॥

देवासुरमनुष्याणां सर्वास्त्रेषु विशारद:।

सम्यग् विद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित्॥ ३४॥

‘देवता, असुर और मनुष्योंके सम्पूर्ण अस्त्रोंका उन्हें विशेषरूपसे ज्ञान है। वे साङ्ग वेदके यथार्थ विद्वान् और सम्पूर्ण विद्याओंमें भलीभाँति निष्णात हैं॥ ३४॥

गान्धर्वे च भुवि श्रेष्ठो बभूव भरताग्रज:।

कल्याणाभिजन: साधुरदीनात्मा महामति:॥ ३५॥

‘भरतके बड़े भाई श्रीराम गान्धर्ववेद (संगीतशास्त्र)में भी इस भूतलपर सबसे श्रेष्ठ हैं। कल्याणकी तो वे जन्मभूमि हैं। उनका स्वभाव साधु पुरुषोंके समान है, हृदय उदार और बुद्धि विशाल है॥ ३५॥

द्विजैरभिविनीतश्च श्रेष्ठैर्धर्मार्थनैपुणै:।

यदा व्रजति संग्रामं ग्रामार्थे नगरस्य वा॥ ३६॥

गत्वा सौमित्रिसहितो नाविजित्य निवर्तते।

‘धर्म और अर्थके प्रतिपादनमें कुशल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उन्हें उत्तम शिक्षा दी है। वे ग्राम अथवा नगरकी रक्षाके लिये लक्ष्मणके साथ जब संग्रामभूमिमें जाते हैं, उस समय वहाँ जाकर विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते॥ ३६॥

संग्रामात् पुनरागत्य कुञ्जरेण रथेन वा॥ ३७॥

पौरान् स्वजनवन्नित्यं कुशलं परिपृच्छति।

पुत्रेष्वग्निषु दारेषु प्रेष्यशिष्यगणेषु च॥ ३८॥

‘संग्रामभूमिसे हाथी अथवा रथके द्वारा पुन: अयोध्या लौटनेपर वे पुरवासियोंसे स्वजनोंकी भाँति प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्रकी अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों और शिष्योंका कुशल-समाचार पूछते रहते हैं॥

निखिलेनानुपूर्व्या च पिता पुत्रानिवौरसान्।

शुश्रूषन्ते च व: शिष्या: कच्चिद् वर्मसु दंशिता:॥ ३९॥

इति व: पुरुषव्याघ्र: सदा रामोऽभिभाषते।

‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका कुशल-मङ्गल पूछता है, उसी प्रकार वे समस्त पुरवासियोंसे क्रमश: उनका सारा समाचार पूछा करते हैं। पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणोंसे सदा पूछते रहते हैं कि ‘आपके शिष्य आपलोगोंकी सेवा करते हैं न?’ क्षत्रियोंसे यह जिज्ञासा करते हैं कि ‘आपके सेवक कवच आदिसे सुसज्जित हो आपकी सेवामें तत्पर रहते हैं न?’॥ ३९/

व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दु:खित:॥ ४०॥

उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परितुष्यति।

‘नगरके मनुष्योंपर संकट आनेपर वे बहुत दु:खी हो जाते हैं और उन सबके घरोंमें सब प्रकारके उत्सव होनेपर उन्हें पिताकी भाँति प्रसन्नता होती है॥ ४०/

सत्यवादी महेष्वासो वृद्धसेवी जितेन्द्रिय:॥ ४१॥

स्मितपूर्वाभिभाषी च धर्मं सर्वात्मनाश्रित:।

सम्यग्योक्ता श्रेयसां च न विगृह्यकथारुचि:॥ ४२॥

‘वे सत्यवादी, महान् धनुर्धर, वृद्ध पुरुषोंके सेवक और जितेन्द्रिय हैं। श्रीराम पहले मुसकराकर वार्तालाप आरम्भ करते हैं। उन्होंने सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आश्रय ले रखा है। वे कल्याणका सम्यक् आयोजन करनेवाले हैं, निन्दनीय बातोंकी चर्चामें उनकी कभी रुचि नहीं होती है॥

उत्तरोत्तरयुक्तौ च वक्ता वाचस्पतिर्यथा।

सुभ्रूरायतताम्राक्ष: साक्षाद् विष्णुरिव स्वयम्॥ ४३॥

‘उत्तरोत्तर उत्तम युक्ति देते हुए वार्तालाप करनेमें वे साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं। उनकी भौंहें सुन्दर हैं, आँखें विशाल और कुछ लालिमा लिये हुए हैं। वे साक्षात् विष्णुकी भाँति शोभा पाते हैं॥ ४३॥

रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमै:।

प्रजापालनसंयुक्तो न रागोपहतेन्द्रिय:॥ ४४॥

‘सम्पूर्ण लोकोंको आनन्दित करनेवाले ये श्रीराम शूरता, वीरता और पराक्रम आदिके द्वारा सदा प्रजाका पालन करनेमें लगे रहते हैं। उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषोंसे दूषित नहीं होती हैं॥ ४४॥

शक्तस्त्रैलोक्यमप्येष भोक्तुं किं नु महीमिमाम्।

नास्य क्रोध: प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन॥ ४५॥

‘इस पृथ्वीकी तो बात ही क्या है, वे सम्पूर्ण त्रिलोकीकी भी रक्षा कर सकते हैं। उनका क्रोध और प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता है॥ ४५॥

हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति।

युनक्त्यर्थै: प्रहृष्टश्च तमसौ यत्र तुष्यति॥ ४६॥

‘जो शास्त्रके अनुसार प्राणदण्ड पानेके अधिकारी हैं, उनका ये नियमपूर्वक वध कर डालते हैं तथा जो शास्त्रदृष्टिसे अवध्य हैं, उनपर ये कदापि कुपित नहीं होते हैं। जिसपर ये संतुष्ट होते हैं, उसे हर्षमें भरकर धनसे परिपूर्ण कर देते हैं॥ ४६॥

दान्तै: सर्वप्रजाकान्तै: प्रीतिसंजननैर्नृणाम्।

गुणैर्विरोचते रामो दीप्त: सूर्य इवांशुभि:॥ ४७॥

‘समस्त प्रजाओंके लिये कमनीय तथा मनुष्योंका आनन्द बढ़ानेवाले मन और इन्द्रियोंके संयम आदि सद्गुणोंद्वारा श्रीराम वैसे ही शोभा पाते हैं, जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणोंसे सुशोभित होते हैं॥ ४७॥

तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम्।

लोकपालोपमं नाथमकामयत मेदिनी॥ ४८॥

‘ऐसे सर्वगुणसम्पन्न, लोकपालोंके समान प्रभावशाली एवं सत्यपराक्रमी श्रीरामको इस पृथ्वीकी जनता अपना स्वामी बनाना चाहती है॥ ४८॥

वत्स: श्रेयसि जातस्ते दिष्ट्यासौ तव राघव:।

दिष्ट्या पुत्रगुणैर्युक्तो मारीच इव कश्यप:॥ ४९॥

‘हमारे सौभाग्यसे आपके वे पुत्र श्रीरघुनाथजी प्रजाका कल्याण करनेमें समर्थ हो गये हैं तथा आपके सौभाग्यसे वे मरीचिनन्दन कश्यपकी भाँति पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं॥ ४९॥

बलमारोग्यमायुश्च रामस्य विदितात्मन:।

देवासुरमनुष्येषु सगन्धर्वोरगेषु च॥ ५०॥

आशंसते जन: सर्वो राष्ट्रे पुरवरे तथा।

आभ्यन्तरश्च बाह्यश्च पौरजानपदो जन:॥ ५१॥

‘देवताओं, असुरों, मनुष्यों, गन्धर्वों और नागोंमेंसे प्रत्येक वर्गके लोग तथा इस राज्य और राजधानीमें भी बाहर-भीतर आने-जानेवाले नगर और जनपदके सभी लोग सुविख्यात शीलस्वभाववाले श्रीरामचन्द्रजीके लिये सदा ही बल, आरोग्य और आयुकी शुभ कामना करते हैं॥

स्त्रियो वृद्धास्तरुण्यश्च सायं प्रात: समाहिता:।

सर्वा देवान्नमस्यन्ति रामस्यार्थे मनस्विन:।

तेषां तद् याचितं देव त्वत्प्रसादात्समृद्ध्यताम्॥ ५२॥

‘इस नगरकी बूढ़ी और युवती—सब तरहकी स्त्रियाँ सबेरे और सायंकालमें एकाग्रचित्त होकर परम उदार श्रीरामचन्द्रजीके युवराज होनेके लिये देवताओंसे नमस्कारपूर्वक प्रार्थना किया करती हैं। देव! उनकी वह प्रार्थना आपके कृपा-प्रसादसे अब पूर्ण होनी चाहिये॥ ५२॥

राममिन्दीवरश्यामं सर्वशत्रुनिबर्हणम्।

पश्यामो यौवराज्यस्थं तव राजोत्तमात्मजम्॥ ५३॥

‘नृपश्रेष्ठ! जो नीलकमलके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, आपके उन ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको हम युवराज-पदपर विराजमान देखना चाहते हैं॥ ५३॥

तं देवदेवोपममात्मजं ते

सर्वस्य लोकस्य हिते निविष्टम्।

हिताय न: क्षिप्रमुदारजुष्टं

मुदाभिषेक्तुं वरद त्वमर्हसि॥ ५४॥

‘अत: वरदायक महाराज! आप देवाधिदेव श्रीविष्णुके समान पराक्रमी, सम्पूर्ण लोकोंके हितमें संलग्न रहनेवाले और महापुरुषोंद्वारा सेवित अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीका जितना शीघ्र हो सके प्रसन्नतापूर्वक राज्याभिषेक कीजिये, इसीमें हमलोगोंका हित है’॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥ २॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥

 

तृतीय: सर्ग:

राजा दशरथका वसिष्ठ और वामदेवजीको श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी करनेके लिये कहना और उनका सेवकोंको तदनुरूप आदेश देना; राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीरामको राजसभामें बुला लाना और राजाका अपने पुत्र श्रीरामको हितकर राजनीतिकी बातें बताना

तेषामञ्जलिपद्मानि प्रगृहीतानि सर्वश:।

प्रतिगृह्याब्रवीद् राजा तेभ्य: प्रियहितं वच:॥ १॥

सभासदोंने कमलपुष्पकी-सी आकृतिवाली अपनी अञ्जलियोंको सिरसे लगाकर सब प्रकारसे महाराजके प्रस्तावका समर्थन किया; उनकी वह पद्माञ्जलि स्वीकार करके राजा दशरथ उन सबसे प्रिय और हितकारी वचन बोले—॥ १॥

अहोऽस्मि परमप्रीत: प्रभावश्चातुलो मम।

यन्मे ज्येष्ठं प्रियं पुत्रं यौवराज्यस्थमिच्छथ॥ २॥

‘अहो! आपलोग जो मेरे परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको युवराजके पदपर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है तथा मेरा प्रभाव अनुपम हो गया है’॥ २॥

इति प्रत्यर्चितान् राजा ब्राह्मणानिदमब्रवीत्।

वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम्॥ ३॥

इस प्रकारकी बातोंसे पुरवासी तथा अन्यान्य सभासदोंका सत्कार करके राजाने उनके सुनते हुए ही वामदेव और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥

चैत्र: श्रीमानयं मास: पुण्य: पुष्पितकानन:।

यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्॥ ४॥

‘यह चैत्रमास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें सारे वन-उपवन खिल उठे हैं; अत: इस समय श्रीरामका युवराजपदपर अभिषेक करनेके लिये आपलोग सब सामग्री एकत्र कराइये’॥ ४॥

राज्ञस्तूपरते वाक्ये जनघोषो महानभूत्।

शनैस्तस्मिन् प्रशान्ते च जनघोषे जनाधिप:॥ ५॥

वसिष्ठं मुनिशार्दूलं राजा वचनमब्रवीत्।

राजाकी यह बात समाप्त होनेपर सब लोग हर्षके कारण महान् कोलाहल करने लगे। धीरे-धीरे उस जनरवके शान्त होनेपर प्रजापालक नरेश दशरथने मुनिप्रवर वसिष्ठसे यह बात कही—॥ ५/

अभिषेकाय रामस्य यत् कर्म सपरिच्छदम्॥ ६॥

तदद्य भगवन् सर्वमाज्ञापयितुमर्हसि।

‘भगवन्! श्रीरामके अभिषेकके लिये जो कर्म आवश्यक हो, उसे साङ्गोपाङ्ग बताइये और आज ही उस सबकी तैयारी करनेके लिये सेवकोंको आज्ञा दीजिये’॥ ६/

तच्छ्रुत्वा भूमिपालस्य वसिष्ठो मुनिसत्तम:॥ ७॥

आदिदेशाग्रतो राज्ञ: स्थितान् युक्तान् कृताञ्जलीन्।

महाराजका यह वचन सुनकर मुनिवर वसिष्ठने राजाके सामने ही हाथ जोड़कर खड़े हुए आज्ञापालनके लिये तैयार रहनेवाले सेवकोंसे कहा—॥ ७/

सुवर्णादीनि रत्नानि बलीन् सर्वौषधीरपि॥ ८ ॥

शुक्लमाल्यानि लाजांश्च पृथक् च मधुसर्पिषी।

अहतानि च वासांसि रथं सर्वायुधान्यपि॥ ९ ॥

चतुरङ्गबलं चैव गजं च शुभलक्षणम्।

चामरव्यजने चोभे ध्वजं छत्रं च पाण्डुरम्॥ १०॥

शतं च शातकुम्भानां कुम्भानामग्निवर्चसाम्।

हिरण्यशृङ्गमृषभं समग्रं व्याघ्रचर्म च॥ ११॥

यच्चान्यत् किंचिदेष्टव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम्।

उपस्थापयत प्रातरग्न्यगारे महीपते:॥ १२॥

‘तुमलोग सुवर्ण आदि रत्न, देवपूजनकी सामग्री, सब प्रकारकी ओषधियाँ, श्वेत पुष्पोंकी मालाएँ, खील, अलग-अलग पात्रोंमें शहद और घी, नये वस्त्र, रथ, सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, चतुरङ्गिणी सेना, उत्तम लक्षणोंसे युक्त हाथी, चमरी गायकी पूँछके बालोंसे बने हुए दो व्यजन, ध्वज, श्वेत छत्र, अग्निके समान देदीप्यमान सोनेके सौ कलश, सुवर्णसे मढ़े हुए सींगोंवाला एक साँड, समूचा व्याघ्रचर्म तथा और जो कुछ भी वांछनीय वस्तुएँ हैं, उन सबको एकत्र करो और प्रात:काल महाराजकी अग्निशालामें पहुँचा दो॥ ८—१२॥

अन्त:पुरस्य द्वाराणि सर्वस्य नगरस्य च।

चन्दनस्रग्भिरर्च्यन्तां धूपैश्च घ्राणहारिभि:॥ १३॥

‘अन्त:पुर तथा समस्त नगरके सभी दरवाजोंको चन्दन और मालाओंसे सजा दो तथा वहाँ ऐसे धूप सुलगा दो जो अपनी सुगन्धसे लोगोंको आकर्षित कर लें॥ १३॥

प्रशस्तमन्नं गुणवद् दधिक्षीरोपसेचनम्।

द्विजानां शतसाहस्रं यत्प्रकाममलं भवेत्॥ १४॥

‘दही, दूध और घी आदिसे संयुक्त अत्यन्त उत्तम एवं गुणकारी अन्न तैयार कराओ, जो एक लाख ब्राह्मणोंके भोजनके लिये पर्याप्त हो॥ १४॥

सत्कृत्य द्विजमुख्यानां श्व: प्रभाते प्रदीयताम्।

घृतं दधि च लाजाश्च दक्षिणाश्चापि पुष्कला:॥ १५॥

‘कल प्रात:काल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें वह अन्न प्रदान करो; साथ ही घी, दही, खील और पर्याप्त दक्षिणाएँ भी दो॥ १५॥

सूर्येऽभ्युदितमात्रे श्वो भविता स्वस्तिवाचनम्।

ब्राह्मणाश्च निमन्त्र्यन्तां कल्प्यन्तामासनानि च॥ १६॥

‘कल सूर्योदय होते ही स्वस्तिवाचन होगा, इसके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करो और उनके लिये आसनोंका प्रबन्ध कर लो॥ १६॥

आबध्यन्तां पताकाश्च राजमार्गश्च सिच्यताम्।

सर्वे च तालापचरा गणिकाश्च स्वलंकृता:॥ १७॥

कक्ष्यां द्वितीयामासाद्य तिष्ठन्तु नृपवेश्मन:।

‘नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरायी जायँ तथा राजमार्गोंपर छिड़काव कराया जाय। समस्त तालजीवी (संगीतनिपुण) पुरुष और सुन्दर वेष-भूषासे विभूषित वाराङ्गनाएँ (नर्तकियाँ) राजमहलकी दूसरी कक्षा (ड्यौढ़ी) में पहुँचकर खड़ी रहें॥ १७/

देवायतनचैत्येषु सान्नभक्ष्या: सदक्षिणा:॥ १८॥

उपस्थापयितव्या: स्युर्माल्ययोग्या: पृथक्पृथक्।

‘देव-मन्दिरोंमें तथा चैत्यवृक्षोंके नीचे या चौराहोंपर जो पूजनीय देवता हैं, उन्हें पृथक्-पृथक् भक्ष्य-भोज्य पदार्थ एवं दक्षिणा प्रस्तुत करनी चाहिये॥ १८/

दीर्घासिबद्धगोधाश्च संनद्धा मृष्टवासस:॥ १९॥

महाराजाङ्गनं शूरा: प्रविशन्तु महोदयम्।

‘लंबी तलवार लिये और गोधाचर्मके बने दस्ताने पहने और कमर कसकर तैयार रहनेवाले शूर-वीर योद्धा स्वच्छ वस्त्र धारण किये महाराजके महान् अभ्युदयशाली आँगनमें प्रवेश करें’॥ १९/

एवं व्यादिश्य विप्रौ तु क्रियास्तत्र विनिष्ठितौ॥ २०॥

चक्रतुश्चैव यच्छेषं पार्थिवाय निवेद्य च।

सेवकोंको इस प्रकार कार्य करनेका आदेश देकर दोनों ब्राह्मण वसिष्ठ और वामदेवने पुरोहितद्वारा सम्पादित होने योग्य क्रियाओंको स्वयं पूर्ण किया। राजाके बताये हुए कार्योंके अतिरिक्त भी जो शेष आवश्यक कर्तव्य था उसे भी उन दोनोंने राजासे पूछकर स्वयं ही सम्पन्न किया॥ २०/

कृतमित्येव चाब्रूतामभिगम्य जगत्पतिम्॥ २१॥

यथोक्तवचनं प्रीतौ हर्षयुक्तौ द्विजोत्तमौ।

तदनन्तर महाराजके पास जाकर प्रसन्नता और हर्षसे भरे हुए वे दोनों श्रेष्ठ द्विज बोले—‘राजन्! आपने जैसा कहा था, उसके अनुसार सब कार्य सम्पन्न हो गया’॥ २१/

तत: सुमन्त्रं द्युतिमान् राजा वचनमब्रवीत्॥ २२॥

राम: कृतात्मा भवता शीघ्रमानीयतामिति।

इसके बाद तेजस्वी राजा दशरथने सुमन्त्रसे कहा— ‘सखे! पवित्रात्मा श्रीरामको तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ’॥ २२/

स तथेति प्रतिज्ञाय सुमन्त्रो राजशासनात्॥ २३॥

रामं तत्रानयांचक्रे रथेन रथिनां वरम्।

तब ‘जो आज्ञा’ कहकर सुमन्त्र गये तथा राजाके आदेशानुसार रथियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामको रथपर बिठाकर ले आये॥ २३/

अथ तत्र सहासीनास्तदा दशरथं नृपम्॥ २४॥

प्राच्योदीच्या प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च भूमिपा:।

म्लेच्छाश्चार्याश्च ये चान्ये वनशैलान्तवासिन:॥ २५॥

उपासांचक्रिरे सर्वे तं देवा वासवं यथा।

उस राजभवनमें साथ बैठे हुए पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिणके भूपाल, म्लेच्छ, आर्य तथा वनों और पर्वतोंमें रहनेवाले अन्यान्य मनुष्य सब-के-सब उस समय राजा दशरथकी उसी प्रकार उपासना कर रहे थे जैसे देवता देवराज इन्द्रकी॥ २४-२५/

तेषां मध्ये स राजर्षिर्मरुतामिव वासव:॥ २६॥

प्रासादस्थो दशरथो ददर्शायान्तमात्मजम्।

गन्धर्वराजप्रतिमं लोके विख्यातपौरुषम्॥ २७॥

उनके बीच अट्टालिकाके भीतर बैठे हुए राजा दशरथ मरुद्गणोंके मध्य देवराज इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहे थे; उन्होंने वहींसे अपने पुत्र श्रीरामको अपने पास आते देखा, जो गन्धर्वराजके समान तेजस्वी थे, उनका पौरुष समस्त संसारमें विख्यात था॥ २६-२७॥

दीर्घबाहुं महासत्त्वं मत्तमातङ्गगामिनम्।

चन्द्रकान्ताननं राममतीव प्रियदर्शनम्॥ २८॥

रूपौदार्यगुणै: पुंसां दृष्टिचित्तापहारिणम्।

घर्माभितप्ता: पर्जन्यं ह्लादयन्तमिव प्रजा:॥ २९॥

उनकी भुजाएँ बड़ी और बल महान् था। वे मतवाले गजराजके समान बड़ी मस्तीके साथ चल रहे थे। उनका मुख चन्द्रमासे भी अधिक कान्तिमान् था। श्रीरामका दर्शन सबको अत्यन्त प्रिय लगता था। वे अपने रूप और उदारता आदि गुणोंसे लोगोंकी दृष्टि और मन आकर्षित कर लेते थे। जैसे धूपमें तपे हुए प्राणियोंको मेघ आनन्द प्रदान करता है, उसी प्रकार वे समस्त प्रजाको परम आह्लाद देते रहते थे॥ २८-२९॥

न ततर्प समायान्तं पश्यमानो नराधिप:।

अवतार्य सुमन्त्रस्तु राघवं स्यन्दनोत्तमात्॥ ३०॥

पितु: समीपं गच्छन्तं प्राञ्जलि: पृष्ठतोऽन्वगात्।

आते हुए श्रीरामचन्द्रकी ओर एकटक देखते हुए राजा दशरथको तृप्ति नहीं होती थी। सुमन्त्रने उस श्रेष्ठ रथसे श्रीरामचन्द्रजीको उतारा और जब वे पिताके समीप जाने लगे, तब सुमन्त्र भी उनके पीछे-पीछे हाथ जोड़े हुए गये॥ ३०/

स तं कैलासशृङ्गाभं प्रासादं रघुनन्दन:॥ ३१॥

आरुरोह नृपं द्रष्टुं सहसा तेन राघव:।

वह राजमहल कैलासशिखरके समान उज्ज्वल और ऊँचा था, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम महाराजका दर्शन करनेके लिये सुमन्त्रके साथ सहसा उसपर चढ़ गये॥ ३१/

स प्राञ्जलिरभिप्रेत्य प्रणत: पितुरन्तिके॥ ३२॥

नाम स्वं श्रावयन् रामो ववन्दे चरणौ पितु:।

श्रीराम दोनों हाथ जोड़कर विनीतभावसे पिताके पास गये और अपना नाम सुनाते हुए उन्होंने उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया॥ ३२/

तं दृष्ट्वा प्रणतं पार्श्वे कृताञ्जलिपुटं नृप:॥ ३३॥

गृह्याञ्जलौ समाकृष्य सस्वजे प्रियमात्मजम्।

श्रीरामको पास आकर हाथ जोड़ प्रणाम करते देख राजाने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अपने प्रिय पुत्रको पास खींचकर छातीसे लगा लिया॥ ३३/

तस्मै चाभ्युद्यतं सम्यङ्मणिकाञ्चनभूषितम्॥ ३४॥

दिदेश राजा रुचिरं रामाय परमासनम्।

उस समय राजाने उन श्रीरामचन्द्रजीको मणिजटित सुवर्णसे भूषित एक परम सुन्दर सिंहासनपर बैठनेकी आज्ञा दी, जो पहलेसे उन्हींके लिये वहाँ उपस्थित किया गया था॥ ३४/

तथाऽऽसनवरं प्राप्य व्यदीपयत राघव:॥ ३५॥

स्वयैव प्रभया मेरुमुदये विमलो रवि:।

जैसे निर्मल सूर्य उदयकालमें मेरुपर्वतको अपनी किरणोंसे उद्भासित कर देते हैं उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी उस श्रेष्ठ आसनको ग्रहण करके अपनी ही प्रभासे उसे प्रकाशित करने लगे॥ ३५/

तेन विभ्राजिता तत्र सा सभापि व्यरोचत॥ ३६॥

विमलग्रहनक्षत्रा शारदी द्यौरिवेन्दुना।

उनसे प्रकाशित हुई वह सभा भी बड़ी शोभा पा रही थी। ठीक उसी तरह जैसे निर्मल ग्रह और नक्षत्रोंसे भरा हुआ शरत्-कालका आकाश चन्द्रमासे उद्भासित हो उठता है॥ ३६/

तं पश्यमानो नृपतिस्तुतोष प्रियमात्मजम्॥ ३७॥

अलंकृतमिवात्मानमादर्शतलसंस्थितम् ।

जैसे सुन्दर वेश-भूषासे अलंकृत हुए अपने ही प्रतिबिम्बको दर्पणमें देखकर मनुष्यको बड़ा संतोष प्राप्त होता है, उसी प्रकार अपने शोभाशाली प्रिय पुत्र उन श्रीरामको देखकर राजा बड़े प्रसन्न हुए॥ ३७/

स तं सुस्थितमाभाष्य पुत्रं पुत्रवतां वर:॥ ३८॥

उवाचेदं वचो राजा देवेन्द्रमिव कश्यप:।

जैसे कश्यप देवराज इन्द्रको पुकारते हैं, उसी प्रकार पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ राजा दशरथ सिंहासनपर बैठे हुए अपने पुत्र श्रीरामको सम्बोधित करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३८/

ज्येष्ठायामसि मे पत्न्यां सदृश्यां सदृश: सुत:॥ ३९॥

उत्पन्नस्त्वं गुणज्येष्ठो मम रामात्मज: प्रिय:।

त्वया यत: प्रजाश्चेमा: स्वगुणैरनुरञ्जिता:॥ ४०॥

तस्मात् त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि।

‘बेटा! तुम्हारा जन्म मेरी बड़ी महारानी कौसल्याके गर्भसे हुआ है। तुम अपनी माताके अनुरूप ही उत्पन्न हुए हो। श्रीराम! तुम गुणोंमें मुझसे भी बढ़कर हो, अत: मेरे परम प्रिय पुत्र हो; तुमने अपने गुणोंसे इन समस्त प्रजाओंको प्रसन्न कर लिया है, इसलिये कल पुष्यनक्षत्रके योगमें युवराजका पद ग्रहण करो॥ ३९-४०/

कामतस्त्वं प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति॥ ४१॥

गुणवत्यपि तु स्नेहात् पुत्र वक्ष्यामि ते हितम्।

भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रिय:॥ ४२॥

‘बेटा! यद्यपि तुम स्वभावसे ही गुणवान् हो और तुम्हारे विषयमें यही सबका निर्णय है तथापि मैं स्नेहवश सद्गुणसम्पन्न होनेपर भी तुम्हें कुछ हितकी बातें बताता हूँ। तुम और भी अधिक विनयका आश्रय लेकर सदा जितेन्द्रिय बने रहो॥ ४१-४२॥

कामक्रोधसमुत्थानि त्यजस्व व्यसनानि च।

परोक्षया वर्तमानो वृत्त्या प्रत्यक्षया तथा॥ ४३॥

‘काम और क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले दुर्व्यसनोंका सर्वथा त्याग कर दो, परोक्षवृत्तिसे (अर्थात् गुप्तचरोंद्वारा यथार्थ बातोंका पता लगाकर) तथा प्रत्यक्षवृत्तिसे (अर्थात् दरबारमें सामने आकर कहनेवाली जनताके मुखसे उसके वृत्तान्तोंको प्रत्यक्ष देख-सुनकर) ठीक-ठीक न्यायविचारमें तत्पर रहो॥ ४३॥

अमात्यप्रभृती: सर्वा: प्रजाश्चैवानुरञ्जय।

कोष्ठागारायुधागारै: कृत्वा संनिचयान् बहून्॥ ४४॥

इष्टानुरक्तप्रकृतिर्य: पालयति मेदिनीम्।

तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामरा:॥ ४५॥

‘मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनोंको सदा प्रसन्न रखना। जो राजा कोष्ठागार (भण्डारगृह) तथा शस्त्रागार आदिके द्वारा उपयोगी वस्तुओंका बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंको प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वीका पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृतको पाकर देवता प्रसन्न हुए थे॥ ४४-४५॥

तस्मात् पुत्र त्वमात्मानं नियम्यैवं समाचर।

तच्छ्रुत्वा सुहृदस्तस्य रामस्य प्रियकारिण:॥ ४६॥

त्वरिता: शीघ्रमागत्य कौसल्यायै न्यवेदयन्।

‘इसलिये बेटा! तुम अपने चित्तको वशमें रखकर इस प्रकारके उत्तम आचरणोंका पालन करते रहो।’ राजाकी ये बातें सुनकर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेवाले सुहृदोंने तुरंत माता कौसल्याके पास जाकर उन्हें यह शुभ समाचार निवेदन किया॥ ४६/

सा हिरण्यं च गाश्चैव रत्नानि विविधानि च॥ ४७॥

व्यादिदेश प्रियाख्येभ्य: कौसल्या प्रमदोत्तमा।

नारियोंमें श्रेष्ठ कौसल्याने वह प्रिय संवाद सुनानेवाले उन सुहृदोंको तरह-तरहके रत्न, सुवर्ण और गौएँ पुरस्काररूपमें दीं॥ ४७/

अथाभिवाद्य राजानं रथमारुह्य राघव:।

ययौ स्वं द्युतिमद् वेश्म जनौघै: प्रतिपूजित:॥ ४८॥

इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राजाको प्रणाम करके रथपर बैठे और प्रजाजनोंसे सम्मानित होते हुए वे अपने शोभाशाली भवनमें चले गये॥ ४८॥

ते चापि पौरा नृपतेर्वचस्त-

च्छ्रुत्वा तदा लाभमिवेष्टमाशु।

नरेन्द्रमामन्त्र्य गृहाणि गत्वा

देवान् समानर्चुरभिप्रहृष्टा:॥ ४९॥

नगरनिवासी मनुष्योंने राजाकी बातें सुनकर मन-ही-मन यह अनुभव किया कि हमें शीघ्र ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होगी, फिर भी महाराजकी आज्ञा लेकर अपने घरोंको गये और अत्यन्त हर्षसे भरकर अभीष्ट-सिद्धिके उपलक्ष्यमें देवताओंकी पूजा करने लगे॥ ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे तृतीय: सर्ग:॥ ३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३॥

 

चतुर्थ: सर्ग:

श्रीरामको राज्य देनेका निश्चय करके राजाका सुमन्त्रद्वारा पुन: श्रीरामको बुलवाकर उन्हें आवश्यक बातें बताना, श्रीरामका कौसल्याके भवनमें जाकर माताको यह समाचार बताना और मातासे आशीर्वाद पाकर लक्ष्मणसे प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके अपने महलमें जाना

गतेष्वथ नृपो भूय: पौरेषु सह मन्त्रिभि:।

मन्त्रयित्वा ततश्चक्रे निश्चयज्ञ: स निश्चयम्॥ १॥

श्व एव पुष्यो भविता श्वोऽभिषेच्यस्तु मे सुत:।

रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभु:॥ २॥

राजसभासे पुरवासियोंके चले जानेपर कार्यसिद्धिके योग्य देश-कालके नियमको जाननेवाले प्रभावशाली नरेशने पुन: मन्त्रियोंके साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि ‘कल ही पुष्य-नक्षत्र होगा, अत: कल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामका युवराजके पदपर अभिषेक कर देना चाहिये’॥ १-२॥

अथान्तर्गृहमाविश्य राजा दशरथस्तदा।

सूतमामन्त्रयामास रामं पुनरिहानय॥ ३॥

तदनन्तर अन्त:पुरमें जाकर महाराज दशरथने सूतको बुलाया और आज्ञा दी—‘जाओ, श्रीरामको एक बार फिर यहाँ बुला लाओ’॥ ३॥

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सूत: पुनरुपाययौ।

रामस्य भवनं शीघ्रं राममानयितुं पुन:॥ ४॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये पुन: उनके महलमें गये॥ ४॥

द्वा:स्थैरावेदितं तस्य रामायागमनं पुन:।

श्रुत्वैव चापि रामस्तं प्राप्तं शङ्कान्वितोऽभवत्॥ ५॥

द्वारपालोंने श्रीरामको सुमन्त्रके पुन: आगमनकी सूचना दी। उनका आगमन सुनते ही श्रीरामके मनमें संदेह हो गया॥ ५॥

प्रवेश्य चैनं त्वरितो रामो वचनमब्रवीत्।

यदागमनकृत्यं ते भूयस्तद्ब्रूह्यशेषत:॥ ६॥

उन्हें भीतर बुलाकर श्रीरामने उनसे बड़ी उतावलीके साथ पूछा—‘आपको पुन: यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी?’ यह पूर्णरूपसे बताइये॥ ६॥

तमुवाच तत: सूतो राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति।

श्रुत्वा प्रमाणं तत्र त्वं गमनायेतराय वा॥ ७॥

तब सूतने उनसे कहा—‘महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। मेरी इस बातको सुनकर वहाँ जाने या न जानेका निर्णय आप स्वयं करें’॥ ७॥

इति सूतवच: श्रुत्वा रामोऽपि त्वरयान्वित:।

प्रययौ राजभवनं पुनर्द्रष्टुं नरेश्वरम्॥ ८॥

सूतका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथका पुन: दर्शन करनेके लिये तुरंत उनके महलकी ओर चल दिये॥ ८॥

तं श्रुत्वा समनुप्राप्तं रामं दशरथो नृप:।

प्रवेशयामास गृहं विवक्षु: प्रियमुत्तमम्॥ ९॥

श्रीरामको आया हुआ सुनकर राजा दशरथने उनसे प्रिय तथा उत्तम बात कहनेके लिये उन्हें महलके भीतर बुला लिया॥ ९॥

प्रविशन्नेव च श्रीमान् राघवो भवनं पितु:।

ददर्श पितरं दूरात् प्रणिपत्य कृताञ्जलि:॥ १०॥

पिताके भवनमें प्रवेश करते ही श्रीमान् रघुनाथजीने उन्हें देखा और दूरसे ही हाथ जोड़कर वे उनके चरणोंमें पड़ गये॥ १०॥

प्रणमन्तं तमुत्थाप्य सम्परिष्वज्य भूमिप:।

प्रदिश्य चासनं चास्मै रामं च पुनरब्रवीत्॥ ११॥

प्रणाम करते हुए श्रीरामको उठाकर महाराजने छातीसे लगा लिया और उन्हें बैठनेके लिये आसन देकर पुन: उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ११॥

राम वृद्धोऽस्मि दीर्घायुर्भुक्ता भोगा यथेप्सिता:।

अन्नवद्भि: क्रतुशतैर्यथेष्टं भूरिदक्षिणै:॥ १२॥

‘श्रीराम! अब मैं बूढ़ा हुआ। मेरी आयु बहुत अधिक हो गयी। मैंने बहुत-से मनोवाञ्छित भोग भोग लिये, अन्न और बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों यज्ञ भी कर लिये॥ १२॥

जातमिष्टमपत्यं मे त्वमद्यानुपमं भुवि।

दत्तमिष्टमधीतं च मया पुरुषसत्तम॥ १३॥

‘पुरुषोत्तम! तुम मेरे परम प्रिय अभीष्ट संतानके रूपमें प्राप्त हुए जिसकी इस भूमण्डलमें कहीं उपमा नहीं है, मैंने दान, यज्ञ और स्वाध्याय भी कर लिये॥ १३॥

अनुभूतानि चेष्टानि मया वीर सुखान्यपि।

देवर्षिपितृविप्राणामनृणोऽस्मि तथाऽऽत्मन:॥ १४॥

‘वीर! मैंने अभीष्ट सुखोंका भी अनुभव कर लिया। मैं देवता, ऋषि, पितर और ब्राह्मणोंके तथा अपने ऋणसे भी उऋण हो गया॥ १४॥

न किंचिन्मम कर्तव्यं तवान्यत्राभिषेचनात्।

अतो यत्त्वामहं ब्रूयां तन्मे त्वं कर्तुमर्हसि॥ १५॥

‘अब तुम्हें युवराज-पदपर अभिषिक्त करनेके सिवा और कोई कर्तव्य मेरे लिये शेष नहीं रह गया है, अत: मैं तुमसे जो कुछ कहूँ, मेरी उस आज्ञाका तुम्हें पालन करना चाहिये॥ १५॥

अद्य प्रकृतय: सर्वास्त्वामिच्छन्ति नराधिपम्।

अतस्त्वां युवराजानमभिषेक्ष्यामि पुत्रक॥ १६॥

‘बेटा! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अत: मैं तुम्हें युवराजपदपर अभिषिक्त करूँगा॥ १६॥

अपि चाद्याशुभान् राम स्वप्नान् पश्यामि राघव।

सनिर्घाता दिवोल्काश्च पतन्ति हि महास्वना:॥ १७॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखायी देते हैं। दिनमें वज्रपातके साथ-साथ बड़ा भयंकर शब्द करनेवाली उल्काएँ भी गिर रही हैं॥ १७॥

अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहै:।

आवेदयन्ति दैवज्ञा: सूर्याङ्गारकराहुभि:॥ १८॥

‘श्रीराम! ज्योतिषियोंका कहना है कि मेरे जन्म-नक्षत्रको सूर्य, मङ्गल और राहु नामक भयंकर ग्रहोंने आक्रान्त कर लिया है॥ १८॥

प्रायेण च निमित्तानामीदृशानां समुद्भवे।

राजा हि मृत्युमाप्नोति घोरां चापदमृच्छति॥ १९॥

‘ऐसे अशुभ लक्षणोंका प्राकट्य होनेपर प्राय: राजा घोर आपत्तिमें पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु भी हो जाती है॥ १९॥

तद् यावदेव मे चेतो न विमुह्यति राघव।

तावदेवाभिषिञ्चस्व चला हि प्राणिनां मति:॥ २०॥

‘अत: रघुनन्दन! जबतक मेरे चित्तमें मोह नहीं छा जाता, तबतक ही तुम युवराज-पदपर अपना अभिषेक करा लो; क्योंकि प्राणियोंकी बुद्धि चञ्चल होती है॥

अद्य चन्द्रोऽभ्युपगमत् पुष्यात् पूर्वं पुनर्वसुम्।

श्व: पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तका:॥ २१॥

‘आज चन्द्रमा पुष्यसे एक नक्षत्र पहले पुनर्वसुपर विराजमान हैं, अत: निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्रपर रहेंगे—ऐसा ज्योतिषी कहते हैं॥ २१॥

तत्र पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम्।

श्वस्त्वाहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परंतप॥ २२॥

‘इसलिये उस पुष्यनक्षत्रमें ही तुम अपना अभिषेक करा लो। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! मेरा मन इस कार्यमें बहुत शीघ्रता करनेको कहता है। इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराजपदपर अभिषेक कर दूँगा॥ २२॥

तस्मात् त्वयाद्यप्रभृति निशेयं नियतात्मना।

सह वध्वोपवस्तव्या दर्भप्रस्तरशायिना॥ २३॥

‘अत: तुम इस समयसे लेकर सारी रात इन्द्रियसंयमपूर्वक रहते हुए वधू सीताके साथ उपवास करो और कुशकी शय्यापर सोओ॥ २३॥

सुहृदश्चाप्रमत्तास्त्वां रक्षन्त्वद्य समन्तत:।

भवन्ति बहुविघ्नानि कार्याण्येवंविधानि हि॥ २४॥

‘आज तुम्हारे सुहृद् सावधान रहकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें; क्योंकि इस प्रकारके शुभ कार्योंमें बहुत-से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है॥ २४॥

विप्रोषितश्च भरतो यावदेव पुरादित:।

तावदेवाभिषेकस्ते प्राप्तकालो मतो मम॥ २५॥

‘जबतक भरत इस नगरसे बाहर अपने मामाके यहाँ निवास करते हैं, तबतक ही तुम्हारा अभिषेक हो जाना मुझे उचित प्रतीत होता है॥ २५॥

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरत: स्थित:।

ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानुक्रोशो जितेन्द्रिय:॥ २६॥

किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम्।

सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव॥ २७॥

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें स्थित हैं, अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्योंका चित्त प्राय: स्थिर नहीं रहता—ऐसा मेरा मत है। रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषोंका मन भी विभिन्न कारणोंसे राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है’ ॥ २६-२७॥

इत्युक्त: सोऽभ्यनुज्ञात: श्वोभाविन्यभिषेचने।

व्रजेति राम: पितरमभिवाद्याभ्ययाद् गृहम्॥ २८॥

राजाके इस प्रकार कहने और कल होनेवाले राज्याभिषेकके निमित्त व्रतपालनके लिये जानेकी आज्ञा देनेपर श्रीरामचन्द्रजी पिताको प्रणाम करके अपने महलमें गये॥ २८॥

प्रविश्य चात्मनो वेश्म राज्ञाऽऽदिष्टेऽभिषेचने।

तत्क्षणादेव निष्क्रम्य मातुरन्त:पुरं ययौ॥ २९॥

राजाने राज्याभिषेकके लिये व्रतपालनके निमित्त जो आज्ञा दी थी, उसे सीताको बतानेके लिये अपने महलके भीतर प्रवेश करके जब श्रीरामने वहाँ सीताको नहीं देखा, तब वे तत्काल ही वहाँसे निकलकर माताके अन्त:पुरमें चले गये॥ २९॥

तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम्।

वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम्॥ ३०॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा माता कौसल्या रेशमी वस्त्र पहने मौन हो देवमन्दिरमें बैठकर देवताकी आराधनामें लगी हैं और पुत्रके लिये राजलक्ष्मीकी याचना कर रही हैं॥ ३०॥

प्रागेव चागता तत्र सुमित्रा लक्ष्मणस्तथा।

सीता चानयिता श्रुत्वा प्रियं रामाभिषेचनम्॥ ३१॥

श्रीरामके राज्याभिषेकका प्रिय समाचार सुनकर सुमित्रा और लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे तथा बादमें सीता वहीं बुला ली गयी थीं॥ ३१॥

तस्मिन् कालेऽपि कौसल्या तस्थावामीलितेक्षणा।

सुमित्रयान्वास्यमाना सीतया लक्ष्मणेन च॥ ३२॥

श्रीरामचन्द्रजी जब वहाँ पहुँचे, उस समय भी कौसल्या नेत्र बंद किये ध्यान लगाये बैठी थीं और सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे॥ ३२॥

श्रुत्वा पुष्ये च पुत्रस्य यौवराज्येऽभिषेचनम्।

प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम्॥ ३३॥

पुष्यनक्षत्रके योगमें पुत्रके युवराजपदपर अभिषिक्त होनेकी बात सुनकर वे उसकी मङ्गलकामनासे प्राणायामके द्वारा परमपुरुष नारायणका ध्यान कर रही थीं॥ ३३॥

तथा सनियमामेव सोऽभिगम्याभिवाद्य च।

उवाच वचनं रामो हर्षयंस्तामिदं वरम्॥ ३४॥

इस प्रकार नियममें लगी हुई माताके निकट उसी अवस्थामें जाकर श्रीरामने उनको प्रणाम किया और उन्हें हर्ष प्रदान करते हुए यह श्रेष्ठ बात कही—॥ ३४॥

अम्ब पित्रा नियुक्तोऽस्मि प्रजापालनकर्मणि।

भविता श्वोऽभिषेको मे यथा मे शासनं पितु:॥ ३५॥

सीतयाप्युपवस्तव्या रजनीयं मया सह।

एवमुक्तमुपाध्यायै: स हि मामुक्तवान् पिता॥ ३६॥

‘माँ! पिताजीने मुझे प्रजापालनके कर्ममें नियुक्त किया है। कल मेरा अभिषेक होगा। जैसा कि मेरे लिये पिताजीका आदेश है, उसके अनुसार सीताको भी मेरे साथ इस रातमें उपवास करना होगा। उपाध्यायोंने ऐसी ही बात बतायी थी, जिसे पिताजीने मुझसे कहा है॥

यानि यान्यत्र योग्यानि श्वोभाविन्यभिषेचने।

तानि मे मङ्गलान्यद्य वैदेह्याश्चैव कारय॥ ३७॥

‘अत: कल होनेवाले अभिषेकके निमित्तसे आज मेरे और सीताके लिये जो-जो मङ्गलकार्य आवश्यक हों, वे सब कराओ’॥ ३७॥

एतच्छ्रुत्वा तु कौसल्या चिरकालाभिकांक्षितम्।

हर्षबाष्पाकुलं वाक्यमिदं राममभाषत॥ ३८॥

चिरकालसे माताके हृदयमें जिस बातकी अभिलाषा थी, उसकी पूर्तिको सूचित करनेवाली यह बात सुनकर माता कौसल्याने आनन्दके आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठसे इस प्रकार कहा—॥ ३८॥

वत्स राम चिरं जीव हतास्ते परिपन्थिन:।

ज्ञातीन् मे त्वं श्रिया युक्त: सुमित्रायाश्च नन्दय॥ ३९॥

‘बेटा श्रीराम! चिरञ्जीवी होओ। तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेवाले शत्रु नष्ट हो जायँ। तुम राजलक्ष्मीसे युक्त होकर मेरे और सुमित्राके बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करो॥

कल्याणे बत नक्षत्रे मया जातोऽसि पुत्रक।

येन त्वया दशरथो गुणैराराधित: पिता॥ ४०॥

‘बेटा! तुम मेरे द्वारा किसी मङ्गलमय नक्षत्रमें उत्पन्न हुए थे, जिससे तुमने अपने गुणोंद्वारा पिता दशरथको प्रसन्न कर लिया॥ ४०॥

अमोघं बत मे क्षान्तं पुरुषे पुष्करेक्षणे।

येयमिक्ष्वाकुराजश्री: पुत्र त्वां संश्रयिष्यति॥ ४१॥

‘बड़े हर्षकी बात है कि मैंने कमलनयन भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये जो व्रत-उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया। बेटा! उसीके फलसे यह इक्ष्वाकुकुलकी राजलक्ष्मी तुम्हें प्राप्त होनेवाली है’॥ ४१॥

इत्येवमुक्तो मात्रा तु रामो भ्रातरमब्रवीत्।

प्राञ्जलिं प्रह्वमासीनमभिवीक्ष्य स्मयन्निव॥ ४२॥

माताके ऐसा कहनेपर श्रीरामने विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हुए अपने भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर मुसकराते हुए-से कहा—॥ ४२॥

लक्ष्मणेमां मया सार्धं प्रशाधि त्वं वसुंधराम्।

द्वितीयं मेऽन्तरात्मानं त्वामियं श्रीरुपस्थिता॥ ४३॥

‘लक्ष्मण! तुम मेरे साथ इस पृथ्वीके राज्यका शासन (पालन) करो। तुम मेरे द्वितीय अन्तरात्मा हो। यह राजलक्ष्मी तुम्हींको प्राप्त हो रही है॥ ४३॥

सौमित्रे भुङ्क्ष्व भोगांस्त्वमिष्टान् राज्यफलानि च।

जीवितं चापि राज्यं च त्वदर्थमभिकामये॥ ४४॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम अभीष्ट भोगों और राज्यके श्रेष्ठ फलोंका उपभोग करो। तुम्हारे लिये ही मैं इस जीवन तथा राज्यकी अभिलाषा करता हूँ’॥ ४४॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामो मातरावभिवाद्य च।

अभ्यनुज्ञाप्य सीतां च ययौ स्वं च निवेशनम्॥ ४५॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामने दोनों माताओंको प्रणाम किया और सीताको भी साथ चलनेकी आज्ञा दिलाकर वे उनको लिये हुए अपने महलमें चले गये॥ ४५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्थ: सर्ग:॥ ४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४॥

 

पञ्चम: सर्ग:

राजा दशरथके अनुरोधसे वसिष्ठजीका सीतासहित श्रीरामको उपवासव्रतकी दीक्षा देकर आना और राजाको इस समाचारसे अवगत कराना; राजाका अन्त:पुरमें प्रवेश

संदिश्य रामं नृपति: श्वोभाविन्यभिषेचने।

पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥ १॥

उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजीको दूसरे दिन होनेवाले अभिषेकके विषयमें आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठजीको बुलाकर बोले—॥ १॥

गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन।

श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत॥ २॥

‘नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तपोधन! आप जाइये और विघ्ननिवारणरूप कल्याणकी सिद्धि तथा राज्यकी प्राप्तिके लिये बहूसहित श्रीरामसे उपवासव्रतका पालन कराइये’॥ २॥

तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वर:।

स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम्॥ ३॥

उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम्।

ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रत:॥ ४॥

तब राजासे ‘तथास्तु’ कहकर वेदवेत्ता विद्वानोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीरामको उपवास-व्रतकी दीक्षा देनेके लिये ब्राह्मणके चढ़नेयोग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो श्रीरामके महलकी ओर चल दिये॥ ३-४॥

स रामभवनं प्राप्य पाण्डुराभ्रघनप्रभम्।

तिस्र: कक्ष्या रथेनैव विवेश मुनिसत्तम:॥ ५॥

श्रीरामका भवन श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वसिष्ठने उसकी तीन ड्योढि़योंमें रथके द्वारा ही प्रवेश किया॥ ५॥

तमागतमृषिं रामस्त्वरन्निव ससम्भ्रमम्।

मानयिष्यन् स मानार्हं निश्चक्राम निवेशनात्॥ ६॥

वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षिका सम्मान करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक घरसे बाहर निकले॥ ६॥

अभ्येत्य त्वरमाणोऽथ रथाभ्याशं मनीषिण:।

ततोऽवतारयामास परिगृह्य रथात् स्वयम्॥ ७॥

उन मनीषी महर्षिके रथके समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीरामने स्वयं उनका हाथ पकड़कर उन्हें रथसे नीचे उतारा॥ ७॥

स चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च।

प्रियार्हं हर्षयन् राममित्युवाच पुरोहित:॥ ८॥

श्रीराम प्रिय वचन सुननेके योग्य थे। उन्हें इतना विनीत देखकर पुरोहितजीने ‘वत्स!’ कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा—॥ ८॥

प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवाप्स्यसि।

उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया॥ ९॥

‘श्रीराम! तुम्हारे पिता तुमपर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा; अत: आजकी रातमें तुम वधू सीताके साथ उपवास करो॥ ९॥

प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिप:।

पिता दशरथ: प्रीत्या ययातिं नहुषो यथा॥ १०॥

‘रघुनन्दन! जैसे नहुषने ययातिका अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रात:काल बड़े प्रेमसे तुम्हारा युवराज-पदपर अभिषेक करेंगे’॥ १०॥

इत्युक्त्वा स तदा राममुपवासं यतव्रत:।

मन्त्रवत् कारयामास वैदेह्या सहितं शुचि:॥ ११॥

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक सीतासहित श्रीरामको उस समय उपवास-व्रतकी दीक्षा दी॥ ११॥

ततो यथावद् रामेण स राज्ञो गुरुरर्चित:।

अभ्यनुज्ञाप्य काकुत्स्थं ययौ रामनिवेशनात्॥ १२॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने महाराजके भी गुरु वसिष्ठका यथावत् पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीरामकी अनुमति ले उनके महलसे बाहर निकले॥ १२॥

सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीन: प्रियंवदै:।

सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वश:॥ १३॥

श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलनेवाले सुहृदोंके साथ कुछ देरतक बैठे रहे; फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुन: अपने महलके भीतर चले गये॥ १३॥

हृष्टनारीनरयुतं रामवेश्म तदा बभौ।

यथा मत्तद्विजगणं प्रफुल्लनलिनं सर:॥ १४॥

उस समय श्रीरामका भवन हर्षोत्फुल्ल नर-नारियोंसे भरा हुआ था और मतवाले पक्षियोंके कलरवोंसे युक्त खिले हुए कमलवाले तालाबके समान शोभा पा रहा था॥ १४॥

स राजभवनप्रख्यात् तस्माद् रामनिवेशनात्।

निर्गत्य ददृशे मार्गं वसिष्ठो जनसंवृतम्॥ १५॥

राजभवनोंमें श्रेष्ठ श्रीरामके महलसे बाहर आकर वसिष्ठजीने सारे मार्ग मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए देखे॥ १५॥

वृन्दवृन्दैरयोध्यायां राजमार्गा: समन्तत:।

बभूवुरभिसम्बाधा: कुतूहलजनैर्वृता:॥ १६॥

अयोध्याकी सड़कोंपर सब ओर झुंड-के-झुंड मनुष्य, जो श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे॥

जनवृन्दोर्मिसंघर्षहर्षस्वनवृतस्तदा ।

बभूव राजमार्गस्य सागरस्येव नि:स्वन:॥ १७॥

जनसमुदायरूपी लहरोंके परस्पर टकरानेसे उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्गका कोलाहल समुद्रकी गर्जनाकी भाँति सुनायी देता था॥ १७॥

सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा च वनमालिनी।

आसीदयोध्या तदह: समुच्छ्रितगृहध्वजा॥ १८॥

उस दिन वन और उपवनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित हुई अयोध्यापुरीके घर-घरमें ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं; वहाँकी सभी गलियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था॥ १८॥

तदा ह्ययोध्यानिलय: सस्त्रीबालाकुलो जन:।

रामाभिषेकमाकांक्षन्नाकांक्षन्नुदयं रवे:॥ १९॥

स्त्रियों और बालकोंसहित अयोध्यावासी जनसमुदाय श्रीरामके राज्याभिषेकको देखनेकी इच्छासे उस समय शीघ्र सूर्योदय होनेकी कामना कर रहा था॥ १९॥

प्रजालंकारभूतं च जनस्यानन्दवर्धनम्।

उत्सुकोऽभूज्जनो द्रष्टुं तमयोध्यामहोत्सवम्॥ २०॥

अयोध्याका वह महान् उत्सव प्रजाओंके लिये अलंकाररूप और सब लोगोंके आनन्दको बढ़ानेवाला था; वहाँके सभी मनुष्य उसे देखनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे थे॥ २०॥

एवं तज्जनसम्बाधं राजमार्गं पुरोहित:।

व्यूहन्निव जनौघं तं शनै राजकुलं ययौ॥ २१॥

इस प्रकार मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए राजमार्गपर पहुँचकर पुरोहितजी उस जनसमूहको एक ओर करते हुए-से धीरे-धीरे राजमहलकी ओर गये॥ २१॥

सिताभ्रशिखरप्रख्यं प्रासादमधिरुह्य च।

समीयाय नरेन्द्रेण शक्रेणेव बृहस्पति:॥ २२॥

श्वेत जलद-खण्डके समान सुशोभित होनेवाले महलके ऊपर चढ़कर वसिष्ठजी राजा दशरथसे उसी प्रकार मिले, जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्रसे मिल रहे हों॥ २२॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य हित्वा राजासनं नृप:।

पप्रच्छ स्वमतं तस्मै कृतमित्यभिवेदयत्॥ २३॥

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे—‘मुने! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया।’ वसिष्ठजीने उत्तर दिया—‘हाँ! कर दिया’॥ २३॥

तेन चैव तदा तुल्यं सहासीना: सभासद:।

आसनेभ्य: समुत्तस्थु: पूजयन्त: पुरोहितम्॥ २४॥

उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद् भी पुरोहितका समादर करते हुए अपने-अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये॥ २४॥

गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातो मनुजौघं विसृज्य तम्।

विवेशान्त:पुरं राजा सिंहो गिरिगुहामिव॥ २५॥

तदनन्तर गुरुजीकी आज्ञा ले राजा दशरथने उस जनसमुदायको विदा करके पर्वतकी कन्दरामें घुसनेवाले सिंहके समान अपने अन्त:पुरमें प्रवेश किया॥ २५॥

तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं

महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम्।

व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिव:

शशीव तारागणसंकुलं नभ:॥ २६॥

सुन्दर वेश-भूषा धारण करनेवाली सुन्दरियोंसे भरे हुए इन्द्रसदनके समान उस मनोहर राजभवनको अपनी शोभासे प्रकाशित करते हुए राजा दशरथने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओंसे भरे हुए आकाशमें पदार्पण करते हैं॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चम: सर्ग:॥ ५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५॥

 


षष्ठ: सर्ग:

सीतासहित श्रीरामका नियमपरायण होना, हर्षमें भरे पुरवासियोंद्वारा नगरकी सजावट, राजाके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा अयोध्यापुरीमें जनपदवासी मनुष्योंकी भीड़का एकत्र होना

गते पुरोहिते राम: स्नातो नियतमानस:।

सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥ १॥

पुरोहितजीके चले जानेपर मनको संयममें रखनेवाले श्रीरामने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नीके साथ श्रीनारायणकी42 उपासना आरम्भ की॥ १॥

प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत् तत:।

महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले॥ २॥

उन्होंने हविष्य-पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्निमें महान् देवता (शेषशायी नारायण) की प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक उस हविष्यकी आहुति दी॥ २॥

शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मन: प्रियम्।

ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे॥ ३॥

वाग्यत: सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानस:।

श्रीमत्यायतने विष्णो: शिश्ये नरवरात्मज:॥ ४॥

तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथकी सिद्धिका संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्यका भक्षण किया और मनको संयममें रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीताके साथ भगवान् विष्णुके सुन्दर मन्दिरमें श्रीनारायण देवका ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुशकी चटाईपर सोये॥ ३-४॥

एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य स:।

अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मन:॥ ५॥

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयनसे उठ बैठे। उस समय उन्होंने सभामण्डपको सजानेके लिये सेवकोंको आज्ञा दी॥ ५॥

तत्र शृण्वन् सुखा वाच: सूतमागधवन्दिनाम्।

पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहित:॥ ६॥

वहाँ सूत, मागध और बंदियोंकी श्रवणसुखद वाणी सुनते हुए श्रीरामने प्रात:कालिक संध्योपासना की; फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे॥ ६॥

तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम्।

विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास स द्विजान्॥ ७॥

तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीरामने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदनको प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया॥ ७॥

तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा।

अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादित:॥ ८॥

उन ब्राह्मणोंका पुण्याहवाचनसम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरीमें फैल गया॥ ८॥

कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम्।

अयोध्यानिलय: श्रुत्वा सर्व: प्रमुदितो जन:॥ ९॥

उस समय अयोध्यावासी मनुष्योंने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजीने सीताके साथ उपवास-व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ९॥

तत: पौरजन: सर्व: श्रुत्वा रामाभिषेचनम्।

प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम्॥ १०॥

सबेरा होनेपर श्रीरामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरीको सजानेमें लग गये॥ १०॥

सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च।

चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च॥ ११॥

नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च।

कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च॥ १२॥

सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च।

ध्वजा: समुच्छ्रिता: साधु पताकाश्चाभवंस्तथा॥ १३॥

जिनके शिखरोंपर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतोंके समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकारकी बेचनेयोग्य वस्तुओंसे भरी हुई व्यापारियोंकी बड़ी-बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थोंके सुन्दर समृद्धिशाली भवनोंमें और दूरसे दिखायी देनेवाले वृक्षोंपर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं॥ ११—१३॥

नटनर्तकसङ्घानां गायकानां च गायताम्।

मन:कर्णसुखा वाच: शुश्राव जनता तत:॥ १४॥

उस समय वहाँकी जनता सब ओर नटों और नर्तकोंके समूहों तथा गानेवाले गायकोंकी मन और कानोंको सुख देनेवाली वाणी सुनती थी॥ १४॥

रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चक्रुर्मिथो जना:।

रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च॥ १५॥

श्रीरामके राज्याभिषेकका शुभ अवसर प्राप्त होनेपर प्राय: सब लोग चौराहोंपर और घरोंमें भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही चर्चा करते थे॥ १५॥

बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घश:।

रामाभिषवसंयुक्ताश्चक्रुरेव कथा मिथ:॥ १६॥

घरोंके दरवाजोंपर खेलते हुए झुंड-के-झुंड बालक भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही बातें करते थे॥ १६॥

कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासित:।

राजमार्ग: कृत: श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने॥ १७॥

पुरवासियोंने श्रीरामके राज्याभिषेकके समय राजमार्गपर फूलोंकी भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूपकी सुगन्ध फैला दी; ऐसा करके उन्होंने राजमार्गको बहुत सुन्दर बना दिया॥ १७॥

प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया।

दीपवृक्षांस्तथा चक्रुरनुरथ्यासु सर्वश:॥ १८॥

राज्याभिषेक होते-होते रात हो जानेकी आशङ्कासे प्रकाशकी व्यवस्था करनेके लिये पुरवासियोंने सब ओर सड़कोंके दोनों तरफ वृक्षकी भाँति अनेक शाखाओंसे युक्त दीपस्तम्भ खड़े कर दिये॥ १८॥

अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिन:।

आकांक्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम्॥ १९॥

समेत्य सङ्घश: सर्वे चत्वरेषु सभासु च।

कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम्॥ २०॥

इस प्रकार नगरको सजाकर श्रीरामके युवराजपदपर अभिषेककी अभिलाषा रखनेवाले समस्त पुरवासी चौराहों और सभाओंमें झुंड-के-झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथकी प्रशंसा करने लगे—॥

अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दन:।

ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २१॥

‘अहो! इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने-आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीरामका राज्याभिषेक करने जा रहे हैं॥

सर्वे ह्यनुगृहीता: स्म यन्नो रामो महीपति:।

चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावर:॥ २२॥

‘भगवान्‌का हम सब लोगोंपर बड़ा अनुग्रह है कि श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकालतक हमारी रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकोंके निवासियोंमें जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं॥

अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सल:।

यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघव:॥ २३॥

‘श्रीरामका मन कभी उद्धत नहीं होता। वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले हैं। उनका अपने भाइयोंपर जैसा स्नेह है, वैसा ही हमलोगोंपर भी है॥

चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघ:।

यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम्॥ २४॥

‘धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकालतक जीवित रहें, जिनके प्रसादसे हमें श्रीरामके राज्याभिषेकका दर्शन सुलभ होगा’॥ २४॥

एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवु: परे।

दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ता: प्राप्ता जानपदा जना:॥ २५॥

अभिषेकका वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओंसे उस जनपदके लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पुरवासियोंकी सभी बातें सुनीं॥ २५॥

ते तु दिग्भ्य: पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम्।

रामस्य पूरयामासु: पुरीं जानपदा जना:॥ २६॥

वे सब-के-सब श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे अयोध्यापुरीमें आये थे। उन जनपदनिवासी मनुष्योंने श्रीरामपुरीको अपनी उपस्थितिसे भर दिया था॥ २६॥

जनौघैस्तैर्विसर्पद्भि: शुश्रुवे तत्र नि:स्वन:।

पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव नि:स्वन:॥ २७॥

वहाँ मनुष्योंकी भीड़-भाड़ बढ़नेसे जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वोंके दिन बढ़े हुए वेगवाले महासागरकी गर्जनाके समान जान पड़ता था॥ २७॥

ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं

दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितै: ।

समन्तत: सस्वनमाकुलं बभौ

समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम्॥ २८॥

उस समय श्रीरामके अभिषेकका उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्योंद्वारा सब ओरसे भरा हुआ वह इन्द्रपुरीके समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होनेके कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओंसे परिपूर्ण महासागरके समान प्रतीत होता था॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्ठ: सर्ग:॥ ६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥

 

सप्तम: सर्ग:

श्रीरामके अभिषेकका समाचार पाकर खिन्न हुई मन्थराका कैकेयीको उभाड़ना, परंतु प्रसन्न हुई कैकेयीका उसे पुरस्काररूपमें आभूषण देना और वर माँगनेके लिये प्रेरित करना

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता।

प्रासादं चन्द्रसंकाशमारुरोह यदृच्छया॥ १॥

रानी कैकेयीके पास एक दासी थी, जो उसके मायकेसे आयी हुई थी। वह सदा कैकेयीके ही साथ रहा करती थी। उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसीको नहीं था। अभिषेकसे एक दिन पहले वह स्वेच्छासे ही कैकेयीके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् महलकी छतपर जा चढ़ी॥ १॥

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम्।

अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत॥ २॥

उस दासीका नाम था—मन्थरा। उसने उस महलकी छतसे देखा—अयोध्याकी सड़कोंपर छिड़काव किया गया है और सारी पुरीमें यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं॥ २॥

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलंकृताम्।

सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिर:स्नातजनैर्युताम्॥ ३॥

सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं। ध्वजाओंसे इस पुरीकी अपूर्व शोभा हो रही है। राजमार्गोंपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरीके सब लोग उबटन लगाकर सिरके ऊपरसे स्नान किये हुए हैं॥ ३॥

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।

शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम्॥ ४॥

सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम्।

प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्॥ ५॥

श्रीरामके दिये हुए माल्य और मोदक हाथमें लिये श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरोंके दरवाजे चूने और चन्दन आदिसे लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्षमें भरे हुए मनुष्योंसे सारा नगर परिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकोंकी ध्वनि गूँज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर्षसे उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय-बैल प्रसन्न होकर रँभा रहे हैं॥ ४-५॥

हृष्टप्रमुदितै: पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।

अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता॥ ६॥

सारे नगरनिवासी हर्षजनित रोमाञ्चसे युक्त और आनन्दमग्न हैं तथा नगरमें सब ओर श्रेणीबद्ध ऊँचे-ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं। अयोध्याकी ऐसी शोभाको देखकर मन्थराको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ६॥

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम्।

अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा॥ ७॥

उसने पासके ही कोठेपर रामकी धायको खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे और शरीरपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी। उसे देखकर मन्थराने उससे पूछा—॥ ७॥

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती।

राममाता धनं किं नु जनेभ्य: सम्प्रयच्छति॥ ८॥

अतिमात्रं प्रहर्ष: किं जनस्यास्य च शंस मे।

कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपति:॥ ९॥

‘धाय! आज श्रीरामचन्द्रजीकी माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथके साधनमें तत्पर हो अत्यन्त हर्षमें भरकर लोगोंको धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँके सभी मनुष्योंको इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन-सा कर्म करायेंगे’॥ ८-९॥

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा।

आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम्॥ १०॥

श्व: पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम्।

राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम्॥ ११॥

श्रीरामकी धाय तो हर्षसे फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जाके पूछनेपर बड़े आनन्दके साथ उसे बताया—‘कुब्जे! रघुनाथजीको बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होनेवाली है। कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्रके योगमें क्रोधको जीतनेवाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त करेंगे’॥ १०-११॥

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षित:।

कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत॥ १२॥

धायका यह वचन सुनकर कुब्जा मन-ही-मन कुढ़ गयी और उस कैलास-शिखरकी भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासादसे तुरंत ही नीचे उतर गयी॥ १२॥

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी।

शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १३॥

मन्थराको इसमें कैकेयीका अनिष्ट दिखायी देता था, वह क्रोधसे जल रही थी। उसने महलमें लेटी हुई कैकेयीके पास जाकर इस प्रकार कहा—॥ १३॥

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते।

उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे॥ १४॥

‘मूर्खे! उठ। क्या सो रही है? तुझपर बड़ा भारी भय आ रहा है। अरी! तेरे ऊपर विपत्तिका पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्थाका बोध नहीं होता?’॥ १४॥

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे।

चलं हि तव सौभाग्यं नद्या: स्रोत इवोष्णगे॥ १५॥

‘तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ-पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं। तू उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर सौभाग्यकी डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतुमें नदीका प्रवाह सूखता चला जाता है, उसी प्रकार तेरा वह सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है—तेरे हाथसे चला जाना चाहता है!’॥ १५॥

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वच:।

कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम्॥ १६॥

इष्टमें भी अनिष्टका दर्शन करानेवाली रोषभरी कुब्जाके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर कैकेयीके मनमें बड़ा दु:ख हुआ॥ १६॥

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे।

विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदु:खिताम्॥ १७॥

उस समय केकयराजकुमारीने कुब्जासे पूछा—‘मन्थरे! कोई अमङ्गलकी बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुखपर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दु:खी दिखायी देती है’॥ १७॥

मन्थरा तु वच: श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम्।

उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा॥ १८॥

सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी।

विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम्॥ १९॥

मन्थरा बातचीत करनेमें बड़ी कुशल थी, वह कैकेयीके मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयीके मनमें श्रीरामके प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली—॥

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम्।

रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २०॥

‘देवि! तुम्हारे सौभाग्यके महान् विनाशका कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है। कल महाराज दशरथ श्रीरामको युवराजके पदपर अभिषिक्त कर देंगे॥ २०॥

सास्म्यगाधे भये मग्ना दु:खशोकसमन्विता।

दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता॥ २१॥

‘यह समाचार पाकर मैं दु:ख और शोकसे व्याकुल हो अगाध भयके समुद्रमें डूब गयी हूँ, चिन्ताकी आगसे मानो जली जा रही हूँ और तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये यहाँ आयी हूँ’॥ २१॥

तव दु:खेन कैकेयि मम दु:खं महद् भवेत्।

त्वद्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशय:॥ २२॥

‘केकयनन्दिनि! यदि तुमपर कोई दु:ख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दु:खमें पड़ना होगा। तुम्हारी उन्नतिमें ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है॥ २२॥

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपते:।

उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे॥ २३॥

‘देवि! तुम राजाओंके कुलमें उत्पन्न हुई हो और एक महाराजकी महारानी हो, फिर भी राजधर्मोंकी उग्रताको कैसे नहीं समझ रही हो?॥ २३॥

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुण:।

शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसंधिता॥ २४॥

‘तुम्हारे स्वामी धर्मकी बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ। मुँहसे चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदयके बड़े क्रूर हैं। तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भावसे ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा तुम बेतरह ठगी गयी॥ २४॥

उपस्थित: प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम्।

अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति॥ २५॥

‘तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देनेके लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौसल्याको अर्थसे सम्पन्न करने जा रहे हैं॥ २५॥

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु।

काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके॥ २६॥

‘उनका हृदय इतना दूषित है कि भरतको तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सबेरे ही अवधके निष्कण्टक राज्यपर वे श्रीरामका अभिषेक करेंगे॥ २६॥

शत्रु: पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया।

आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया॥ २७॥

‘बाले! जैसे माता हितकी कामनासे पुत्रका पोषण करती है, उसी प्रकार ‘पति’ कहलानेवाले जिस व्यक्तिका तुमने पोषण किया है, वह वास्तवमें शत्रु निकला। जैसे कोई अज्ञानवश सर्पको अपनी गोदमें लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करनेवाले महाराजको अपने अङ्कमें स्थान दिया है॥ २७॥

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सर्पो वा प्रत्युपेक्षित:।

राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता॥ २८॥

‘उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा बर्ताव कर सकता है, राजा दशरथने आज पुत्रसहित तुझ कैकेयीके प्रति वैसा ही बर्ताव किया है॥ २८॥

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता।

रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि॥ २९॥

‘बाले! तुम सदा सुख भोगनेके योग्य हो, परंतु मनमें पाप (दुर्भावना) रखकर ऊपरसे झूठी सान्त्वना देनेवाले महाराजने अपने राज्यपर श्रीरामको स्थापित करनेका विचार करके आज सगे-सम्बन्धियोंसहित तुमको मानो मौतके मुखमें डाल दिया है॥ २९॥

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव।

त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने॥ ३०॥

‘केकयराजकुमारी! तुम दु:खजनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातोंसे तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करनेका समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्यको शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्रकी और मेरी भी रक्षा करो’॥ ३०॥

मन्थराया वच: श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना।

उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी॥ ३१॥

मन्थराकी यह बात सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा शय्यासे उठ बैठी। उसका हृदय हर्षसे भर गया। वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलकी भाँति उद्दीप्त हो उठी॥ ३१॥

अतीव सा तु संतुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता।

दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम्॥ ३२॥

कैकेयी मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हुई। विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जाको पुरस्कारके रूपमें एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया॥ ३२॥

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा।

कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम्॥ ३३॥

इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम्।

एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूय: करोमि ते॥ ३४॥

कुब्जाको वह आभूषण देकर हर्षसे भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयीने पुन: मन्थरासे इस प्रकार कहा—‘मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया। तूने मेरे लिये जो यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये मैं तेरा और कौन-सा उपकार करूँ॥ ३३-३४॥

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये।

तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति॥ ३५॥

‘मैं भी राम और भरतमें कोई भेद नहीं समझती। अत: यह जानकर कि राजा श्रीरामका अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई है॥ ३५॥

न मे परं किंचिदितो वरं पुन:

प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम्।

तथा ह्यवोचस्त्वमत: प्रियोत्तरं

वरं परं ते प्रददामि तं वृणु॥ ३६॥

‘मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पानेके योग्य है। मेरे लिये श्रीरामके अभिषेकसम्बन्धी इस समाचारसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृतके समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता। ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अत: अब यह प्रिय संवाद सुनानेके बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूँगी’॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तम: सर्ग:॥ ७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥

 

अष्टम: सर्ग:

मन्थराका पुन: श्रीरामके राज्याभिषेकको कैकेयीके लिये अनिष्टकारी बताना, कैकेयीका श्रीरामके गुणोंको बताकर उनके अभिषेकका समर्थन करना तत्पश्चात् कुब्जाका पुन: श्रीरामराज्यको भरतके लिये भयजनक बताकर कैकेयीको भड़काना

मन्थरा त्वभ्यसूय्यैनामुत्सृज्याभरणं हि तत्।

उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदु:खसमन्विता॥ १॥

यह सुनकर मन्थराने कैकेयीकी निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषणको उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दु:खसे भरकर वह इस प्रकार बोली—॥ १॥

हर्षं किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे।

शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे॥ २॥

‘रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोकके स्थानपर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोकके समुद्रमें डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्थाका बोध नहीं हो रहा है॥ २॥

मनसा प्रसहामि त्वां देवि दु:खार्दिता सती।

यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत्॥ ३॥

‘देवि! महान् संकटमें पड़नेपर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है। मैं दु:खसे व्याकुल हुई जाती हूँ॥ ३॥

शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत्।

अरे: सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम्॥ ४॥

‘मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धिके लिये ही अधिक शोक होता है। अरी! सौतका बेटा शत्रु होता है। वह सौतेली माँके लिये साक्षात् मृत्युके समान है। भला, उसके अभ्युदयका अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मनमें हर्ष मानेगी॥ ४॥

भरतादेव रामस्य राज्यसाधारणाद् भयम्।

तद् विचिन्त्य विषण्णास्मि भयं भीताद्धि जायते॥ ५॥

‘यह राज्य भरत और राम दोनोंके लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इसपर दोनोंका समान अधिकार है, इसलिये श्रीरामको भरतसे ही भय है। यही सोचकर मैं विषादमें डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीतसे ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त कर लेनेपर जब सबल हो जायगा, तब अपने भयके हेतुको उखाड़ फेंकेगा॥ ५॥

लक्ष्मणो हि महाबाहू रामं सर्वात्मना गत:।

शत्रुघ्नश्चापि भरतं काकुत्स्थं लक्ष्मणो यथा॥ ६॥

‘महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदयसे श्रीरामचन्द्रजीके अनुगत हैं। जैसे लक्ष्मण श्रीरामके अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरतका अनुसरण करनेवाले हैं॥ ६॥

प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्यैव भामिनि।

राज्यक्रमो विसृष्टस्तु तयोस्तावद्यवीयसो:॥ ७॥

‘भामिनि! उत्पत्तिके क्रमसे श्रीरामके बाद भरतका ही पहले राज्यपर अधिकार हो सकता है (अत: भरतसे भय होना स्वाभाविक है)। लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अत: उनके लिये राज्यप्राप्तिकी सम्भावना दूर है॥

विदुष: क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिण:।

भयात् प्रवेपे रामस्य चिन्तयन्ती तवात्मजम्॥ ८॥

‘श्रीराम समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, विशेषत: क्षत्रियचरित्र (राजनीति) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्यका पालन करनेवाले हैं; अत: उनका तुम्हारे पुत्रके प्रति जो क्रूरतापूर्ण बर्ताव होगा, उसे सोचकर मैं भयसे काँप उठती हूँ॥ ८॥

सुभगा किल कौसल्या यस्या: पुत्रोऽभिषेक्ष्यते।

यौवराज्येन महता श्व: पुष्येण द्विजोत्तमै:॥ ९॥

‘वास्तवमें कौसल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्रका कल पुष्यनक्षत्रके योगमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा युवराजके महान् पदपर अभिषेक होने जा रहा है॥ ९॥

प्राप्तां वसुमतीं प्रीतिं प्रतीतां हतविद्विषम्।

उपस्थास्यसि कौसल्यां दासीवत् त्वं कृताञ्जलि:॥ १०॥

‘वे भूमण्डलका निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी; क्योंकि वे राजाकी विश्वासपात्र हैं और तुम दासीकी भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित होओगी॥ १०॥

एवं च त्वं सहास्माभिस्तस्या: प्रेष्या भविष्यसि।

पुत्रश्च तव रामस्य प्रेष्यत्वं हि गमिष्यति॥ ११॥

‘इस प्रकार हमलोगोंके साथ तुम भी कौसल्याकी दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरतको भी श्रीरामचन्द्रजीकी गुलामी करनी पड़ेगी॥ ११॥

हृष्टा: खलु भविष्यन्ति रामस्य परमा: स्त्रिय:।

अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये॥ १२॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके अन्त:पुरकी परम सुन्दरी स्त्रियाँ— सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरतके प्रभुत्वका नाश होनेसे तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायँगी’॥ १२॥

तां दृष्ट्वा परमप्रीतां ब्रुवन्तीं मन्थरां तत:।

रामस्यैव गुणान् देवी कैकेयी प्रशशंस ह॥ १३॥

मन्थराको अत्यन्त अप्रसन्नताके कारण इस प्रकार बहकी-बहकी बातें करती देख देवी कैकेयीने श्रीरामके गुणोंकी ही प्रशंसा करते हुए कहा—॥ १३॥

धर्मज्ञो गुणवान् दान्त: कृतज्ञ: सत्यवान् शुचि:।

रामो राजसुतो ज्येष्ठो यौवराज्यमतोऽर्हति॥ १४॥

‘कुब्जे! श्रीराम धर्मके ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होनेके साथ ही महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं; अत: युवराज होनेके योग्य वे ही हैं॥

भ्रातृन् भृत्यांश्च दीर्घायु: पितृवत् पालयिष्यति।

संतप्यसे कथं कुब्जे श्रुत्वा रामाभिषेचनम्॥ १५॥

‘वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्योंका पिताकी भाँति पालन करेंगे। कुब्जे! उनके अभिषेककी बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है?॥ १५॥

भरतश्चापि रामस्य ध्रुवं वर्षशतात् परम्।

पितृपैतामहं राज्यमवाप्स्यति नरर्षभ:॥ १६॥

‘श्रीरामकी राज्यप्राप्तिके सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरतको भी निश्चय ही अपने पिता-पितामहोंका राज्य मिलेगा॥ १६॥

सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे।

भविष्यति च कल्याणे किमिदं परितप्यसे॥ १७॥

‘मन्थरे! ऐसे अभ्युदयकी प्राप्तिके समय, जब कि भविष्यमें कल्याण-ही-कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई-सी संतप्त क्यों हो रही है?॥ १७॥

यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघव:।

कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु॥ १८॥

‘मेरे लिये जैसे भरत आदरके पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौसल्यासे भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं॥ १८॥

राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तदा।

मन्यते हि यथाऽऽत्मानं यथा भ्रातृंस्तु राघव:॥ १९॥

‘यदि श्रीरामको राज्य मिल रहा है तो उसे भरतको मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयोंको भी अपने ही समान समझते हैं’॥ १९॥

कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदु:खिता।

दीर्घमुष्णं विनि:श्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ २०॥

कैकेयीकी यह बात सुनकर मन्थराको बड़ा दु:ख हुआ। वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयीसे बोली—॥ २०॥

अनर्थदर्शिनी मौर्ख्यान्नात्मानमवबुध्यसे।

शोकव्यसनविस्तीर्णे मज्जन्ती दु:खसागरे॥ २१॥

‘रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थको ही अर्थ समझ रही हो। तुम्हें अपनी स्थितिका पता नहीं है। तुम दु:खके उस महासागरमें डूब रही हो, जो शोक (इष्टसे वियोगकी चिन्ता) और व्यसन (अनिष्टकी प्राप्तिके दु:ख) से महान् विस्तारको प्राप्त हो रहा है॥ २१॥

भविता राघवो राजा राघवस्य च य: सुत:।

राजवंशात्तु भरत: कैकेयि परिहास्यते॥ २२॥

‘केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसीको राज्य मिलेगा। भरत तो राजपरम्परासे अलग हो जायँगे॥ २२॥

नहि राज्ञ: सुता: सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि।

स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत्॥ २३॥

‘भामिनि! राजाके सभी पुत्र राज्यसिंहासनपर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाय तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाय॥ २३॥

तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवा:।

स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि॥ २४॥

‘परमसुन्दरी केकयनन्दिनि! इसीलिये राजालोग राजकाजका भार ज्येष्ठ पुत्रपर ही रखते हैं। यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रोंको भी राज्य सौंप देते हैं॥ २४॥

असावत्यन्तनिर्भग्नस्तव पुत्रो भविष्यति।

अनाथवत् सुखेभ्यश्च राजवंशाच्च वत्सले॥ २५॥

‘पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्यके अधिकारसे तो बहुत दूर हटा ही दिया जायगा, वह अनाथकी भाँति समस्त सुखोंसे भी वञ्चित हो जायगा॥ २५॥

साहं त्वदर्थे सम्प्राप्ता त्वं तु मां नावबुद्ध्यसे।

सपत्निवृद्धौ या मे त्वं प्रदेयं दातुमर्हसि॥ २६॥

‘इसलिये मैं तुम्हारे ही हितकी बात सुझानेके लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं, उलटे सौतका अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो॥ २६॥

ध्रुवं तु भरतं राम: प्राप्य राज्यमकण्टकम्।

देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा॥ २७॥

‘याद रखो, यदि श्रीरामको निष्कण्टक राज्य मिल गया तो वे भरतको अवश्य ही इस देशसे बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोकमें भी पहुँचा सकते हैं॥ २७॥

बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया।

संनिकर्षाच्च सौहार्दं जायते स्थावरेष्विव॥ २८॥

‘छोटी अवस्थामें ही तुमने भरतको मामाके घर भेज दिया। निकट रहनेसे सौहार्द उत्पन्न होता है। यह बात स्थावर योनियोंमें भी देखी जाती है (लता और वृक्ष आदि एक-दूसरेके निकट होनेपर परस्पर आलिङ्गन-पाशमें बद्ध हो जाते हैं। यदि भरत यहाँ होते तो राजाका उनमें भी समानरूपसे स्नेह बढ़ता; अत: वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते)॥ २८॥

भरतानुवशात् सोऽपि शत्रुघ्नस्तत्समं गत:।

लक्ष्मणो हि यथा रामं तथायं भरतं गत:॥ २९॥

‘भरतके अनुरोधसे शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये (यदि वे यहाँ होते तो भरतका काम बिगड़ने नहीं पाता। क्योंकि—) जैसे लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरतका अनुसरण करनेवाले हैं॥ २९॥

श्रूयते हि द्रुम: कश्चिच्छेत्तव्यो वनजीवनै:।

संनिकर्षादिषीकाभिर्मोचित: परमाद् भयात्॥ ३०॥

‘सुना जाता है, जंगलकी लकड़ी बेचकर जीविका चलानेवाले कुछ लोगोंने किसी वृक्षको काटनेका निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष कँटीली झाडि़योंसे घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके। इस प्रकार उन कँटीली झाडि़योंने निकट रहनेके कारण उस वृक्षको महान् भयसे बचा लिया॥ ३०॥

गोप्ता हि रामं सौमित्रिर्लक्ष्मणं चापि राघव:।

अश्विनोरिव सौभ्रात्रं तयोर्लोकेषु विश्रुतम्॥ ३१॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीरामकी रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी। उन दोनोंका उत्तम भ्रातृ-प्रेम दोनों अश्विनीकुमारोंकी भाँति तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ३१॥

तस्मान्न लक्ष्मणे राम: पापं किंचित् करिष्यति।

रामस्तु भरते पापं कुर्यादेव न संशय:॥ ३२॥

‘इसलिये श्रीराम लक्ष्मणका तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरतका अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है॥ ३२॥

तस्माद् राजगृहादेव वनं गच्छतु राघव:।

एतद्धि रोचते मह्यं भृशं चापि हितं तव॥ ३३॥

‘अत: श्रीरामचन्द्र महाराजके महलसे ही सीधे वनको चले जायँ—मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसीमें तुम्हारा परम हित है॥ ३३॥

एवं ते ज्ञातिपक्षस्य श्रेयश्चैव भविष्यति।

यदि चेद् भरतो धर्मात् पित्र्यं राज्यमवाप्स्यति॥ ३४॥

‘यदि भरत धर्मानुसार अपने पिताका राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्षके अन्य सब लोगोंका भी कल्याण होगा॥ ३४॥

स ते सुखोचितो बालो रामस्य सहजो रिपु:।

समृद्धार्थस्य नष्टार्थो जीविष्यति कथं वशे॥ ३५॥

‘सौतेला भाई होनेके कारण जो श्रीरामका सहज शत्रु है, वह सुख भोगनेके योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धनसे वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीरामके वशमें पड़कर कैसे जीवित रहेगा॥ ३५॥

अभिद्रुतमिवारण्ये सिंहेन गजयूथपम्।

प्रच्छाद्यमानं रामेण भरतं त्रातुमर्हसि॥ ३६॥

‘जैसे वनमें सिंह हाथियोंके यूथपतिपर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरतका तिरस्कार करेंगे; अत: उस तिरस्कारसे तुम भरतकी रक्षा करो॥ ३६॥

दर्पान्निराकृता पूर्वं त्वया सौभाग्यवत्तया।

राममाता सपत्नी ते कथं वैरं न यापयेत्॥ ३७॥

‘तुमने पहले पतिका अत्यन्त प्रेम प्राप्त होनेके कारण घमंडमें आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराममाता कौसल्या पुत्रकी राज्यप्राप्तिसे परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैरका बदला क्यों नहीं लेंगी॥ ३७॥

यदा च राम: पृथिवीमवाप्स्यते

प्रभूतरत्नाकरशैलसंयुताम् ।

तदा गमिष्यस्यशुभं पराभवं

सहैव दीना भरतेन भामिनि॥ ३८॥

‘भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतोंसे युक्त समस्त भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरतके साथ ही दीन-हीन होकर अशुभ पराभवका पात्र बन जाओगी॥ ३८॥

यदा हि राम: पृथिवीमवाप्स्यते

ध्रुवं प्रणष्टो भरतो भविष्यति।

अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे

परस्य चैवास्य विवासकारणम्॥ ३९॥

‘याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायँगे। अत: ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्रको तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीरामका वनवास हो जाय’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टम: सर्ग:॥ ८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८॥

 

नवम: सर्ग:

कुब्जाके कुचक्रसे कैकेयीका कोपभवनमें प्रवेश

एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना।

दीर्घमुष्णं विनि:श्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत्॥ १॥

मन्थराके ऐसा कहनेपर कैकेयीका मुख क्रोधसे तमतमा उठा। वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली—॥ १॥

अद्य राममित: क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम्।

यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये॥ २॥

‘कुब्जे! मैं श्रीरामको शीघ्र ही यहाँसे वनमें भेजूँगी और तुरंत ही युवराजके पदपर भरतका अभिषेक कराऊँगी॥ २॥

इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये।

भरत: प्राप्नुयाद् राज्यं न तु राम: कथंचन॥ ३॥

‘परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपायसे अपना अभीष्ट साधन करूँ? भरतको राज्य प्राप्त हो जाय और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें—यह काम कैसे बने?’॥ ३॥

एवमुक्ता तु सा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी।

रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ ४॥

देवी कैकेयीके ऐसा कहनेपर पापका मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीरामके स्वार्थपर कुठाराघात करती हुई वहाँ कैकेयीसे इस प्रकार बोली—॥ ४॥

हन्तेदानीं प्रपश्य त्वं कैकेयि श्रूयतां वच:।

यथा ते भरतो राज्यं पुत्र: प्राप्स्यति केवलम्॥ ५॥

‘केकयनन्दिनि! अच्छा, अब देखो कि मैं क्या करती हूँ? तुम मेरी बात सुनो, जिससे केवल तुम्हारे पुत्र भरत ही राज्य प्राप्त करेंगे (श्रीराम नहीं)॥ ५॥

किं न स्मरसि कैकेयि स्मरन्ती वा निगूहसे।

यदुच्यमानमात्मार्थं मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि॥ ६॥

‘कैकेयि! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है? या स्मरण होनेपर भी मुझसे छिपा रही हो? जिसकी तुम मुझसे अनेक बार चर्चा करती रहती हो, अपने उसी प्रयोजनको तुम मुझसे सुनना चाहती हो? इसका क्या कारण है?॥

मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि।

श्रूयतामभिधास्यामि श्रुत्वा चैतद् विधीयताम्॥ ७॥

‘विलासिनि! यदि मेरे ही मुँहसे सुननेके लिये तुम्हारा आग्रह है तो बताती हूँ, सुनो और सुनकर इसीके अनुसार कार्य करो’॥ ७॥

श्रुत्वैवं वचनं तस्या मन्थरायास्तु कैकयी।

किंचिदुत्थाय शयनात् स्वास्तीर्णादिदमब्रवीत्॥ ८॥

मन्थराका यह वचन सुनकर कैकेयी अच्छी तरहसे बिछे हुए उस पलंगसे कुछ उठकर उससे यों बोली—॥ ८॥

कथयस्व ममोपायं केनोपायेन मन्थरे।

भरत: प्राप्नुयाद् राज्यं न तु राम: कथंचन॥ ९॥

मन्थरे! मुझसे वह उपाय बताओ। किस उपायसे भरतको तो राज्य मिल जायगा, किंतु श्रीराम उसे किसी तरह नहीं पा सकेंगे’॥ ९॥

एवमुक्ता तदा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी।

रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ १०॥

देवी कैकेयीके ऐसा कहनेपर पापका मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीरामके स्वार्थपर कुठाराघात करती हुई उस समय कैकेयीसे इस प्रकार बोली—॥ १०॥

पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभि: पति:।

अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत्॥ ११॥

‘देवि! पूर्वकालकी बात है कि देवासुर-संग्रामके अवसरपर राजर्षियोंके साथ तुम्हारे पतिदेव तुम्हें साथ लेकर देवराजकी सहायता करनेके लिये गये थे॥ ११॥

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति।

वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वज:॥ १२॥

स शम्बर इति ख्यात: शतमायो महासुर:।

ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसङ्घैरनिर्जित:॥ १३॥

‘केकयराजकुमारी! दक्षिण दिशामें दण्डकारण्यके भीतर वैजयन्त नामसे विख्यात एक नगर है, जहाँ शम्बर नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर रहता था। वह अपनी ध्वजामें तिमि (ह्वेल मछली) का चिह्न धारण करता था और सैकड़ों मायाओंका जानकार था। देवताओंके समूह भी उसे पराजित नहीं कर पाते थे। एक बार उसने इन्द्रके साथ युद्ध छेड़ दिया॥ १२-१३॥

तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान्।

रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसा:॥ १४॥

‘उस महान् संग्राममें क्षत-विक्षत हुए पुरुष जब रातमें थककर सो जाते, उस समय राक्षस उन्हें उनके बिस्तरसे खींच ले जाते और मार डालते थे॥ १४॥

तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा।

असुरैश्च महाबाहु: शस्त्रैश्च शकलीकृत:॥ १५॥

‘उन दिनों महाबाहु राजा दशरथने भी वहाँ असुरोंके साथ बड़ा भारी युद्ध किया। उस युद्धमें असुरोंने अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा उनके शरीरको जर्जर कर दिया॥ १५॥

अपवाह्य त्वया देवि संग्रामान्नष्टचेतन:।

तत्रापि विक्षत: शस्त्रै: पतिस्ते रक्षितस्त्वया॥ १६॥

‘देवि! जब राजाकी चेतना लुप्त-सी हो गयी, उस समय सारथिका काम करती हुई तुमने अपने पतिको रणभूमिसे दूर हटाकर उनकी रक्षा की। जब वहाँ भी राक्षसोंके शस्त्रोंसे वे घायल हो गये, तब तुमने पुन: वहाँसे अन्यत्र ले जाकर उनकी रक्षा की॥ १६॥

तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने।

स त्वयोक्त: पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम्॥ १७॥

गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना।

अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा॥ १८॥

‘शुभदर्शने! इससे संतुष्ट होकर महाराजने तुम्हें दो वरदान देनेको कहा—देवि! उस समय तुमने अपने पतिसे कहा—‘प्राणनाथ! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं इन वरोंको माँग लूँगी।’ उस समय उन महात्मा नरेशने ‘तथास्तु’ कहकर तुम्हारी बात मान ली थी। देवि! मैं इस कथाको नहीं जानती थी। पूर्वकालमें तुम्हींने मुझसे यह वृत्तान्त कहा था॥ १७-१८॥

कथैषा तव तु स्नेहान्मनसा धार्यते मया।

रामाभिषेकसम्भारान्निगृह्य विनिवर्तय॥ १९॥

‘तबसे तुम्हारे स्नेहवश मैं इस बातको मन-ही-मन सदा याद रखती आयी हूँ। तुम इन वरोंके प्रभावसे स्वामीको वशमें करके श्रीरामके अभिषेकके आयोजनको पलट दो॥ १९॥

तौ च याचस्व भर्तारं भरतस्याभिषेचनम्।

प्रव्राजनं च रामस्य वर्षाणि च चतुर्दश॥ २०॥

‘तुम उन दोनों वरोंको अपने स्वामीसे माँगो। एक वरके द्वारा भरतका राज्याभिषेक और दूसरेके द्वारा श्रीरामका चौदह वर्षतकका वनवास माँग लो॥ २०॥

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्।

प्रजाभावगतस्नेह: स्थिर: पुत्रो भविष्यति॥ २१॥

‘जब श्रीराम चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जायँगे।’ तब उतने समयमें तुम्हारे पुत्र भरत समस्त प्रजाके हृदयमें अपने लिये स्नेह पैदा कर लेंगे और इस राज्यपर स्थिर हो जायँगे॥ २१॥

क्रोधागारं प्रविश्याद्य क्रुद्धेवाश्वपते: सुते।

शेष्वानन्तर्हितायां त्वं भूमौ मलिनवासिनी॥ २२॥

‘अश्वपतिकुमारी! तुम इस समय मैले वस्त्र पहन लो और कोपभवनमें प्रवेश करके कुपित-सी होकर बिना बिस्तरके ही भूमिपर लेट जाओ॥ २२॥

मा स्मैनं प्रत्युदीक्षेथा मा चैनमभिभाषथा:।

रुदन्ती पार्थिवं दृष्ट्वा जगत्यां शोकलालसा॥ २३॥

‘राजा आवें तो उनकी ओर आँखें उठाकर न देखो और न उनसे कोई बात ही करो। महाराजको देखते ही रोती हुई शोकमग्न हो धरतीपर लोटने लगो॥ २३॥

दयिता त्वं सदा भर्तुरत्र मे नास्ति संशय:।

त्वत्कृते च महाराजो विशेदपि हुताशनम्॥ २४॥

‘इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि तुम अपने पतिको सदा ही बड़ी प्यारी रही हो। तुम्हारे लिये महाराज आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं॥ २४॥

न त्वां क्रोधयितुं शक्तो न क्रुद्धां प्रत्युदीक्षितुम्।

तव प्रियार्थं राजा तु प्राणानपि परित्यजेत्॥ २५॥

‘वे न तो तुम्हें कुपित कर सकते हैं और न कुपित अवस्थामें तुम्हें देख ही सकते हैं। राजा दशरथ तुम्हारा प्रिय करनेके लिये अपने प्राणोंका भी त्याग कर सकते हैं॥ २५॥

न ह्यतिक्रमितुं शक्तस्तव वाक्यं महीपति:।

मन्दस्वभावे बुध्यस्व सौभाग्यबलमात्मन:॥ २६॥

‘महाराज तुम्हारी बात किसी तरह टाल नहीं सकते। मुग्धे! तुम अपने सौभाग्यके बलका स्मरण करो॥ २६॥

मणिमुक्तासुवर्णानि रत्नानि विविधानि च।

दद्याद् दशरथो राजा मा स्म तेषु मन: कृथा:॥ २७॥

‘राजा दशरथ तुम्हें भुलावेमें डालनेके लिये मणि, मोती, सुवर्ण तथा भाँति-भाँतिके रत्न देनेकी चेष्टा करेंगे; किंतु तुम उनकी ओर मन न चलाना॥ २७॥

यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ।

तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वा क्रमेदति॥ २८॥

‘महाभागे! देवासुर-संग्रामके अवसरपर राजा दशरथने वे जो दो वर दिये थे, उनका उन्हें स्मरण दिलाना। वरदानके रूपमें माँगा गया वह तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ सिद्ध हुए बिना नहीं रह सकता॥ २८॥

यदा तु ते वरं दद्यात् स्वयमुत्थाप्य राघव:।

व्यवस्थाप्य महाराजं त्वमिमं वृणुया वरम्॥ २९॥

‘रघुकुलनन्दन राजा दशरथ जब स्वयं तुम्हें धरतीसे उठाकर वर देनेको उद्यत हो जायँ, तब उन महाराजको सत्यकी शपथ दिलाकर खूब पक्का करके उनसे वर माँगना॥ २९॥

रामप्रव्रजनं दूरं नव वर्षाणि पञ्च च।

भरत: क्रियतां राजा पृथिव्यां पार्थिवर्षभ॥ ३०॥

‘वर माँगते समय कहना कि नृपश्रेष्ठ! आप श्रीरामको चौदह वर्षोंके लिये बहुत दूर वनमें भेज दीजिये और भरतको भूमण्डलका राजा बनाइये॥ ३०॥

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्।

रूढश्च कृतमूलश्च शेषं स्थास्यति ते सुत:॥ ३१॥

‘श्रीरामके चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जानेपर तुम्हारे पुत्र भरतका राज्य सुदृढ़ हो जायगा और प्रजा आदिको वशमें कर लेनेसे यहाँ उनकी जड़ जम जायगी। फिर चौदह वर्षोंके बाद भी वे आजीवन स्थिर बने रहेंगे॥ ३१॥

रामप्रव्राजनं चैव देवि याचस्व तं वरम्।

एवं सेत्स्यन्ति पुत्रस्य सर्वार्थास्तव कामिनि॥ ३२॥

‘देवि! तुम राजासे श्रीरामके वनवासका वर अवश्य माँगो। पुत्रके लिये राज्यकी कामना करनेवाली कैकेयि! ऐसा करनेसे तुम्हारे पुत्रके सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे॥ ३२॥

एवं प्रव्राजितश्चैव रामोऽरामो भविष्यति।

भरतश्च गतामित्रस्तव राजा भविष्यति॥ ३३॥

‘इस प्रकार वनवास मिल जानेपर ये राम राम नहीं रह जायँगे (इनका आज जो प्रभाव है वह भविष्यमें नहीं रह सकेगा) और तुम्हारे भरत भी शत्रुहीन राजा होंगे॥

येन कालेन रामश्च वनात् प्रत्यागमिष्यति।

अन्तर्बहिश्च पुत्रस्ते कृतमूलो भविष्यति॥ ३४॥

‘जिस समय श्रीराम वनसे लौटेंगे, उस समयतक तुम्हारे पुत्र भरत भीतर और बाहरसे भी दृढ़मूल हो जायँगे॥

संगृहीतमनुष्यश्च सुहृद्भि: साकमात्मवान्।

प्राप्तकालं नु मन्येऽहं राजानं वीतसाध्वसा॥ ३५॥

रामाभिषेकसंकल्पान्निगृह्य विनिवर्तय।

‘उनके पास सैनिक-बलका भी संग्रह हो जायगा; जितेन्द्रिय तो वे हैं ही; अपने सुहृदोंके साथ रहकर दृढ़मूल हो जायँगे। इस समय मेरी मान्यताके अनुसार राजाको श्रीरामके राज्याभिषेकके संकल्पसे हटा देनेका समय आ गया है; अत: तुम निर्भय होकर राजाको अपने वचनोंमें बाँध लो और उन्हें श्रीरामके अभिषेकके संकल्पसे हटा दो’॥ ३५/

अनर्थमर्थरूपेण ग्राहिता सा ततस्तया॥ ३६॥

हृष्टा प्रतीता कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्।

सा हि वाक्येन कुब्जाया: किशोरीवोत्पथं गता॥ ३७॥

कैकेयी विस्मयं प्राप्य परं परमदर्शना।

ऐसी बातें कहकर मन्थराने कैकेयीकी बुद्धिमें अनर्थको ही अर्थरूपमें जँचा दिया। कैकेयीको उसकी बातपर विश्वास हो गया और वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि वह बहुत समझदार थी, तो भी कुबरीके कहनेसे नादान बालिकाकी तरह कुमार्गपर चली गयी—अनुचित काम करनेको तैयार हो गयी। उसे मन्थराकी बुद्धिपर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उससे इस प्रकार बोली—॥ ३६-३७/

प्रज्ञां ते नावजानामि श्रेष्ठे श्रेष्ठाभिधायिनि॥ ३८॥

पृथिव्यामसि कुब्जानामुत्तमा बुद्धिनिश्चये।

त्वमेव तु ममार्थेषु नित्ययुक्ता हितैषिणी॥ ३९॥

‘हितकी बात बतानेमें कुशल कुब्जे! तू एक श्रेष्ठ स्त्री है; मैं तेरी बुद्धिकी अवहेलना नहीं करूँगी। बुद्धिके द्वारा किसी कार्यका निश्चय करनेमें तू इस पृथ्वीपर सभी कुब्जाओंमें उत्तम है। केवल तू ही मेरी हितैषिणी है और सदा सावधान रहकर मेरा कार्य सिद्ध करनेमें लगी रहती है॥ ३८-३९॥

नाहं समवबुद्ध्येयं कुब्जे राज्ञश्चिकीर्षितम्।

सन्ति दु:संस्थिता: कुब्जा: वक्रा: परमपापिका:॥ ४०॥

‘कुब्जे! यदि तू न होती तो राजा जो षड्यन्त्र रचना चाहते हैं, वह कदापि मेरी समझमें नहीं आता। तेरे सिवा जितनी कुब्जाएँ हैं, वे बेडौल शरीरवाली, टेढ़ी-मेढ़ी और बड़ी पापिनी होती हैं॥ ४०॥

त्वं पद्ममिव वातेन संनता प्रियदर्शना।

उरस्तेऽभिनिविष्टं वै यावत् स्कन्धात् समुन्नतम्॥ ४१॥

‘तू तो वायुके द्वारा झुकायी हुई कमलिनीकी भाँति कुछ झुकी हुई होनेपर भी देखनेमें प्रिय (सुन्दर) है। तेरा वक्ष:स्थल कुब्जताके दोषसे व्याप्त है, अतएव कंधोंतक ऊँचा दिखायी देता है॥ ४१॥

अधस्ताच्चोदरं शान्तं सुनाभमिव लज्जितम्।

प्रतिपूर्णं च जघनं सुपीनौ च पयोधरौ॥ ४२॥

‘वक्ष:स्थलसे नीचे सुन्दर नाभिसे युक्त जो उदर है, वह मानो वक्ष:स्थलकी ऊँचाई देखकर लज्जित-सा हो गया है, इसीलिये शान्त—कृश प्रतीत होता है। तेरा जघन विस्तृत है और दोनों स्तन सुन्दर एवं स्थूल हैं॥

विमलेन्दुसमं वक्त्रमहो राजसि मन्थरे।

जघनं तव निर्मृष्टं रशनादामभूषितम्॥ ४३॥

‘मन्थरे! तेरा मुख निर्मल चन्द्रमाके समान अद्भुत शोभा पा रहा है। करधनीकी लडि़योंसे विभूषित तेरी कटिका अग्रभाग बहुत ही स्वच्छ—रोमादिसे रहित है॥ ४३॥

जङ्घे भृशमुपन्यस्ते पादौ च व्यायतावुभौ।

त्वमायताभ्यां सक्थिभ्यां मन्थरे क्षौमवासिनी॥ ४४॥

अग्रतो मम गच्छन्ती राजसेऽतीव शोभने।

‘मन्थरे! तेरी पिण्डलियाँ परस्पर अधिक सटी हुई हैं और दोनों पैर बड़े-बड़े हैं। तू विशाल ऊरुओं (जाँघों) से सुशोभित होती है। शोभने! जब तू रेशमी साड़ी पहनकर मेरे आगे-आगे चलती है, तब तेरी बड़ी शोभा होती है॥ ४४/

आसन् या: शम्बरे माया: सहस्रमसुराधिपे॥ ४५॥

हृदये ते निविष्टास्ता भूयश्चान्या: सहस्रश:।

तदेव स्थगु यद् दीर्घं रथघोणमिवायतम्॥ ४६॥

मतय: क्षत्रविद्याश्च मायाश्चात्र वसन्ति ते।

‘असुरराज शम्बरको जिन सहस्रों मायाओंका ज्ञान है, वे सब तेरे हृदयमें स्थित हैं; इनके अलावे भी तू हजारों प्रकारकी मायाएँ जानती है। इन मायाओंका समुदाय ही तेरा यह बड़ा-सा कुब्बड़ है, जो रथके नकुए (अग्रभाग) के समान बड़ा है। इसीमें तेरी मति, स्मृति और बुद्धि, क्षत्रविद्या (राजनीति) तथा नाना प्रकारकी मायाएँ निवास करती हैं॥ ४५-४६/

अत्र तेऽहं प्रमोक्ष्यामि मालां कुब्जे हिरण्मयीम्॥ ४७॥

अभिषिक्ते च भरते राघवे च वनं गते।

जात्येन च सुवर्णेन सुनिष्टप्तेन सुन्दरि॥ ४८॥

लब्धार्था च प्रतीता च लेपयिष्यामि ते स्थगु।

‘सुन्दरी कुब्जे! यदि भरतका राज्याभिषेक हुआ और श्रीराम वनको चले गये तो मैं सफलमनोरथ एवं संतुष्ट होकर अच्छी जातिके खूब तपाये हुए सोनेकी बनी हुई सुन्दर स्वर्णमाला तेरे इस कुब्बड़को पहनाऊँगी और इसपर चन्दनका लेप लगवाऊँगी॥ ४७-४८/

मुखे च तिलकं चित्रं जातरूपमयं शुभम्॥ ४९॥

कारयिष्यामि ते कुब्जे शुभान्याभरणानि च।

परिधाय शुभे वस्त्रे देवतेव चरिष्यसि॥ ५०॥

‘कुब्जे! तेरे मुख (ललाट) पर सुन्दर और विचित्र सोनेका टीका लगवा दूँगी और तू बहुत-से सुन्दर आभूषण एवं दो उत्तम वस्त्र (लहँगा और दुपट्टा) धारण करके देवाङ्गनाके समान विचरण करेगी॥ ४९-५०॥

चन्द्रमाह्वयमानेन मुखेनाप्रतिमानना।

गमिष्यसि गतिं मुख्यां गर्वयन्ती द्विषज्जने॥ ५१॥

‘चन्द्रमासे होड़ लगानेवाले अपने मनोहर मुखद्वारा तू ऐसी सुन्दर लगेगी कि तेरे मुखकी कहीं समता नहीं रह जायगी तथा शत्रुओंके बीचमें अपने सौभाग्यपर गर्व प्रकट करती हुई तू सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेगी॥ ५१॥

तवापि कुब्जा: कुब्जाया: सर्वाभरणभूषिता:।

पादौ परिचरिष्यन्ति यथैव त्वं सदा मम॥ ५२॥

‘जैसे तू सदा मेरे चरणोंकी सेवा किया करती है, उसी प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित बहुत-सी कुब्जाएँ तुझ कुब्जाके भी चरणोंकी सदा परिचर्या किया करेंगी’॥

इति प्रशस्यमाना सा कैकेयीमिदमब्रवीत्।

शयानां शयने शुभ्रे वेद्यामग्निशिखामिव॥ ५३॥

जब इस प्रकार कुब्जाकी प्रशंसा की गयी, तब उसने वेदीपर प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान शुभ्र शय्यापर शयन करनेवाली कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ ५३॥

गतोदके सेतुबन्धो न कल्याणि विधीयते।

उत्तिष्ठ कुरु कल्याणं राजानमनुदर्शय॥ ५४॥

‘कल्याणि! नदीका पानी निकल जानेपर उसके लिये बाँध नहीं बाँधा जाता, (यदि रामका अभिषेक हो गया तो तुम्हारा वर माँगना व्यर्थ होगा; अत: बातोंमें समय न बिताओ) जल्दी उठो और अपना कल्याण करो। कोपभवनमें जाकर राजाको अपनी अवस्थाका परिचय दो’॥ ५४॥

तथा प्रोत्साहिता देवी गत्वा मन्थरया सह।

क्रोधागारं विशालाक्षी सौभाग्यमदगर्विता॥ ५५॥

अनेकशतसाहस्रं मुक्ताहारं वराङ्गना।

अवमुच्य वरार्हाणि शुभान्याभरणानि च॥ ५६॥

मन्थराके इस प्रकार प्रोत्साहन देनेपर सौभाग्यके मदसे गर्व करनेवाली विशाललोचना सुन्दरी कैकेयी देवी उसके साथ ही कोपभवनमें जाकर लाखोंकी लागतके मोतियोंके हार तथा दूसरे-दूसरे सुन्दर बहुमूल्य आभूषणोंको अपने शरीरसे उतार-उतारकर फेंकने लगी॥ ५५-५६॥

तदा हेमोपमा तत्र कुब्जावाक्यवशंगता।

संविश्य भूमौ कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्॥ ५७॥

सोनेके समान सुन्दर कान्तिवाली कैकेयी कुब्जाकी बातोंके वशीभूत हो गयी थी, अत: वह धरतीपर लेटकर मन्थरासे इस प्रकार बोली—॥ ५७॥

इह वा मां मृतां कुब्जे नृपायावेदयिष्यसि।

वनं तु राघवे प्राप्ते भरत: प्राप्स्यते क्षितिम्॥ ५८॥

सुवर्णेन न मे ह्यर्थो न रत्नैर्न च भोजनै:।

एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते॥ ५९॥

‘कुब्जे! मुझे न तो सुवर्णसे, न रत्नोंसे और न भाँति-भाँतिके भोजनोंसे ही कोई प्रयोजन है; यदि श्रीरामका राज्याभिषेक हुआ तो यह मेरे जीवनका अन्त होगा। अब या तो श्रीरामके वनमें चले जानेपर भरतको इस भूतलका राज्य प्राप्त होगा अथवा तू यहाँ महाराजको मेरी मृत्युका समाचार सुनायेगी’॥ ५८-५९॥

तत: पुनस्तां महिषीं महीक्षितो

वचोभिरत्यर्थमहापराक्रमै: ।

उवाच कुब्जा भरतस्य मातरं

हितं वचो राममुपेत्य चाहितम्॥ ६०॥

तदनन्तर कुब्जा महाराज दशरथकी रानी और भरतकी माता कैकेयीसे अत्यन्त क्रूर वचनोंद्वारा पुन: ऐसी बात कहने लगी, जो लौकिक दृष्टिसे भरतके लिये हितकर और श्रीरामके लिये अहितकर थी—॥ ६०॥

प्रपत्स्यते राज्यमिदं हि राघवो

यदि ध्रुवं त्वं ससुता च तप्स्यसे।

ततो हि कल्याणि यतस्व तत् तथा

यथा सुतस्ते भरतोऽभिषेक्ष्यते॥ ६१॥

‘कल्याणि! यदि श्रीराम इस राज्यको प्राप्त कर लेंगे तो निश्चय ही अपने पुत्र भरतसहित तुम भारी संतापमें पड़ जाओगी; अत: ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम्हारे पुत्र भरतका राज्याभिषेक हो जाय’॥ ६१॥

तथातिविद्धा महिषीति कुब्जया

समाहता वागिषुभिर्मुहुर्मुहु:।

विधाय हस्तौ हृदयेऽतिविस्मिता

शशंस कुब्जां कुपिता पुन: पुन:॥ ६२॥

इस प्रकार कुब्जाने अपने वचनरूपी बाणोंका बारंबार प्रहार करके जब रानी कैकेयीको अत्यन्त घायल कर दिया, तब वह अत्यन्त विस्मित और कुपित हो अपने हृदयपर दोनों हाथ रखकर कुब्जासे बारंबार इस प्रकार कहने लगी—॥ ६२॥

यमस्य वा मां विषयं गतामितो

निशम्य कुब्जे प्रतिवेदयिष्यसि।

वनं गते वा सुचिराय राघवे

समृद्धकामो भरतो भविष्यति॥ ६३॥

‘कुब्जे! अब या तो रामचन्द्रके अधिक कालके लिये वनमें चले जानेपर भरतका मनोरथ सफल होगा या तू मुझे यहाँसे यमलोकमें चली गयी सुनकर महाराजसे यह समाचार निवेदन करेगी॥ ६३॥

अहं हि नैवास्तरणानि न स्रजो

न चन्दनं नाञ्जनपानभोजनम्।

न किंचिदिच्छामि न चेह जीवनं

न चेदितो गच्छति राघवो वनम्॥ ६४॥

‘यदि राम यहाँसे वनको नहीं गये तो मैं न तो भाँति-भाँतिके बिछौने, न फूलोंके हार, न चन्दन, न अञ्जन, न पान, न भोजन और न दूसरी ही कोई वस्तु लेना चाहूँगी। उस दशामें तो मैं यहाँ इस जीवनको भी नहीं रखना चाहूँगी’॥ ६४॥

अथैवमुक्त्वा वचनं सुदारुणं

निधाय सर्वाभरणानि भामिनी।

असंस्कृतामास्तरणेन मेदिनीं

तदाधिशिश्ये पतितेव किंनरी॥ ६५॥

ऐसे अत्यन्त कठोर वचन कहकर कैकेयीने सारे आभूषण उतार दिये और बिना बिस्तरके ही वह खाली जमीनपर लेट गयी। उस समय वह स्वर्गसे भूतलपर गिरी हुई किसी किन्नरीके समान जान पड़ती थी॥ ६५॥

उदीर्णसंरम्भतमोवृतानना

तदावमुक्तोत्तममाल्यभूषणा ।

नरेन्द्रपत्नी विमना बभूव सा

तमोवृता द्यौरिव मग्नतारका॥ ६६॥

उसका मुख बढ़े हुए अमर्षरूपी अन्धकारसे आच्छादित हो रहा था। उसके अङ्गोंसे उत्तम पुष्पहार और आभूषण उतर चुके थे। उस दशामें उदास मनवाली राजरानी कैकेयी जिसके तारे डूब गये हों, उस अन्धकाराच्छन्न आकाशके समान प्रतीत होती थी॥ ६६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवम: सर्ग:॥ ९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९॥

 

दशम: सर्ग:

राजा दशरथका कैकेयीके भवनमें जाना, उसे कोपभवनमें स्थित देखकर दु:खी होना और उसको अनेक प्रकारसे सान्त्वना देना

विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम्।

तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किंनरी॥ १॥

पापिनी कुब्जाने जब देवी कैकेयीको बहुत उलटी बातें समझा दीं, तब वह विषाक्त बाणसे विद्ध हुई किन्नरीके समान धरतीपर लोटने लगी॥ १॥

निश्चित्य मनसा कृत्यं सा सम्यगिति भामिनी।

मन्थरायै शनै: सर्वमाचचक्षे विचक्षणा॥ २॥

मन्थराके बताये हुए समस्त कार्यको यह बहुत उत्तम है—ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके बातचीतमें कुशल भामिनी कैकेयीने मन्थरासे धीरे-धीरे अपना सारा मन्तव्य बता दिया॥ २॥

सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता।

नागकन्येव नि:श्वस्य दीर्घमुष्णं च भामिनी॥ ३॥

मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम्।

मन्थराके वचनोंसे मोहित एवं दीन हुई भामिनी कैकेयी पूर्वोक्त निश्चय करके नागकन्याकी भाँति गरम और लंबी साँस खींचने लगी और दो घड़ीतक अपने लिये सुखदायक मार्गका विचार करती रही॥ ३/

सा सुहृच्चार्थकामा च तं निशम्य विनिश्चयम्॥ ४॥

बभूव परमप्रीता सिद्धिं प्राप्येव मन्थरा।

और वह मन्थरा जो कैकेयीका हित चाहनेवाली सुहृद् थी और उसीके मनोरथको सिद्ध करनेकी अभिलाषा रखती थी, कैकेयीके उस निश्चयको सुनकर बहुत प्रसन्न हुई; मानो उसे कोई बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी हो॥

अथ सा रुषिता देवी सम्यक् कृत्वा विनिश्चयम्॥ ५॥

संविवेशाबला भूमौ निवेश्य भ्रुकुटिं मुखे।

तदनन्तर रोषमें भरी हुई देवी कैकेयी अपने कर्तव्यका भलीभाँति निश्चय कर मुखमण्डलमें स्थित भौंहोंको टेढ़ी करके धरतीपर सो गयी। और क्या करती अबला ही तो थी॥ ५/

ततश्चित्राणि माल्यानि दिव्यान्याभरणानि च॥ ६॥

अपविद्धानि कैकेय्या तानि भूमिं प्रपेदिरे।

तदनन्तर उस केकयराजकुमारीने अपने विचित्र पुष्पहारों और दिव्य आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया। वे सारे आभूषण धरतीपर यत्र-तत्र पड़े थे॥ ६/

तया तान्यपविद्धानि माल्यान्याभरणानि च॥ ७॥

अशोभयन्त वसुधां नक्षत्राणि यथा नभ:।

जैसे छिटके हुए तारे आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार फेंके हुए वे पुष्पहार और आभूषण वहाँ भूमिकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ७/

क्रोधागारे च पतिता सा बभौ मलिनाम्बरा॥ ८॥

एकवेणीं दृढां बद‍्ध्वा गतसत्त्वेव किंनरी।

मलिन वस्त्र पहनकर और सारे केशोंको दृढ़ता-पूर्वक एक ही वेणीमें बाँधकर कोपभवनमें पड़ी हुई कैकेयी बलहीन अथवा अचेत हुई किन्नरीके समान जान पड़ती थी॥ ८/

आज्ञाप्य तु महाराजो राघवस्याभिषेचनम्॥ ९॥

उपस्थानमनुज्ञाप्य प्रविवेश निवेशनम्।

उधर महाराज दशरथ मन्त्री आदिको श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारीके लिये आज्ञा दे सबको यथासमय उपस्थित होनेके लिये कहकर रनिवासमें गये॥ ९/

अद्य रामाभिषेको वै प्रसिद्ध इति जज्ञिवान्॥ १०॥

प्रियार्हां प्रियमाख्यातुं विवेशान्त:पुरं वशी।

उन्होंने सोचा—आज ही श्रीरामके अभिषेककी बात प्रसिद्ध की गयी है, इसलिये यह समाचार अभी किसी रानीको नहीं मालूम हुआ होगा; ऐसा विचारकर जितेन्द्रिय राजा दशरथने अपनी प्यारी रानीको यह प्रिय संवाद सुनानेके लिये अन्त:पुरमें प्रवेश किया॥ १०/

स कैकेय्या गृहं श्रेष्ठं प्रविवेश महायशा:॥ ११॥

पाण्डुराभ्रमिवाकाशं राहुयुक्तं निशाकर:।

उन महायशस्वी नरेशने पहले कैकेयीके श्रेष्ठ भवनमें प्रवेश किया, मानो श्वेत बादलोंसे युक्त राहुयुक्त आकाशमें चन्द्रमाने पदार्पण किया हो॥ ११/

शुकबर्हिसमायुक्तं क्रौञ्चहंसरुतायुतम्॥ १२॥

वादित्ररवसंघुष्टं कुब्जावामनिकायुतम्।

लतागृहैश्चित्रगृहैश्चम्पकाशोकशोभितै: ॥ १३॥

उस भवनमें तोते, मोर, क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी कलरव कर रहे थे, वहाँ वाद्योंका मधुर घोष गूँज रहा था, बहुत-सी कुब्जा और बौनी दासियाँ भरी हुई थीं, चम्पा और अशोकसे सुशोभित बहुत-से लताभवन और चित्रमन्दिर उस महलकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२-१३॥

दान्तराजतसौवर्णवेदिकाभि: समायुतम्।

नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्वापीभिरुपशोभितम् ॥ १४॥

हाथीदाँत, चाँदी और सोनेकी बनी हुई वेदियोंसे संयुक्त उस भवनको नित्य फूलने-फलनेवाले वृक्ष और बहुत-सी बावडि़याँ सुशोभित कर रही थीं॥ १४॥

दान्तराजतसौवर्णै: संवृतं परमासनै:।

विविधैरन्नपानैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि॥ १५॥

उपपन्नं महार्हैश्च भूषणैस्त्रिदिवोपमम्।

उसमें हाथीदाँत, चाँदी और सोनेके बने हुए उत्तम सिंहासन रखे गये थे। नाना प्रकारके अन्न, पान और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे वह भवन भरा-पूरा था। बहुमूल्य आभूषणोंसे सम्पन्न कैकेयीका वह भवन स्वर्गके समान शोभा पा रहा था॥ १५/

स प्रविश्य महाराज: स्वमन्त:पुरमृद्धिमत्॥ १६॥

न ददर्श स्त्रियं राजा कैकेयीं शयनोत्तमे।

अपने उस समृद्धिशाली अन्त:पुरमें प्रवेश करके महाराज राजा दशरथने वहाँकी उत्तम शय्यापर रानी कैकेयीको नहीं देखा॥ १६/

स कामबलसंयुक्तो रत्यर्थी मनुजाधिप:॥ १७॥

अपश्यन् दयितां भार्यां पप्रच्छ विषसाद च।

कामबलसे संयुक्त वे नरेश रानीकी प्रसन्नता बढ़ानेकी अभिलाषासे भीतर गये थे। वहाँ अपनी प्यारी पत्नीको न देखकर उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ और वे उनके विषयमें पूछ-ताछ करने लगे॥ १७/

नहि तस्य पुरा देवी तां वेलामत्यवर्तत॥ १८॥

न च राजा गृहं शून्यं प्रविवेश कदाचन।

ततो गृहगतो राजा कैकेयीं पर्यपृच्छत॥ १९॥

यथापुरमविज्ञाय स्वार्थलिप्सुमपण्डिताम्।

इससे पहले रानी कैकेयी राजाके आगमनकी उस बेलामें कहीं अन्यत्र नहीं जाती थीं, राजाने कभी सूने भवनमें प्रवेश नहीं किया था, इसीलिये वे घरमें आकर कैकेयीके बारेमें पूछने लगे। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वह मूर्खा कोई स्वार्थ सिद्ध करना चाहती है, अत: उन्होंने पहलेकी ही भाँति प्रतिहारीसे उसके विषयमें पूछा॥ १८-१९/

प्रतिहारी त्वथोवाच संत्रस्ता तु कृताञ्जलि:॥ २०॥

देव देवी भृशं क्रुद्धा क्रोधागारमभिद्रुता।

प्रतिहारी बहुत डरी हुई थी। उसने हाथ जोड़कर कहा—‘देव! देवी कैकेयी अत्यन्त कुपित हो कोपभवनकी ओर दौड़ी गयी हैं’॥ २०/

प्रतीहार्या वच: श्रुत्वा राजा परमदुर्मना:॥ २१॥

विषसाद पुनर्भूयो लुलितव्याकुलेन्द्रिय:।

प्रतिहारीकी यह बात सुनकर राजाका मन बहुत उदास हो गया, उनकी इन्द्रियाँ चञ्चल एवं व्याकुल हो उठीं और वे पुन: अधिक विषाद करने लगे॥ २१/

तत्र तां पतितां भूमौ शयानामतथोचिताम्॥ २२॥

प्रतप्त इव दु:खेन सोऽपश्यज्जगतीपति:।

कोपभवनमें वह भूमिपर पड़ी थी और इस तरह लेटी हुई थी, जो उसके लिये योग्य नहीं था। राजाने दु:खके कारण संतप्त-से होकर उसे इस अवस्थामें देखा॥ २२/

स वृद्धस्तरुणीं भार्यां प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥ २३॥

अपाप: पापसंकल्पां ददर्श धरणीतले।

लतामिव विनिष्कृत्तां पतितां देवतामिव॥ २४॥

राजा बूढ़े थे और उनकी वह पत्नी तरुणी थी, अत: वे उसे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर मानते थे। राजाके मनमें कोई पाप नहीं था; परंतु कैकेयी अपने मनमें पापपूर्ण संकल्प लिये हुए थी। उन्होंने उसे कटी हुई लताकी भाँति पृथ्वीपर पड़ी देखा—मानो कोई देवाङ्गना स्वर्गसे भूतलपर गिर पड़ी हो ॥ २३-२४॥

किन्नरीमिव निर्धूतां च्युतामप्सरसं यथा।

मायामिव परिभ्रष्टां हरिणीमिव संयताम्॥ २५॥

वह स्वर्गभ्रष्ट किन्नरी, देवलोकसे च्युत हुई अप्सरा, लक्ष्यभ्रष्ट माया और जालमें बँधी हुई हरिणीके समान जान पड़ती थी॥ २५॥

करेणुमिव दिग्धेन विद्धां मृगयुना वने।

महागज इवारण्ये स्नेहात् परमदु:खिताम्॥ २६॥

परिमृज्य च पाणिभ्यामभिसंत्रस्तचेतन:।

कामी कमलपत्राक्षीमुवाच वनितामिदम्॥ २७॥

जैसे कोई महान् गजराज वनमें व्याधके द्वारा विषलिप्त बाणसे विद्ध होकर गिरी हुई अत्यन्त दु:खित हथिनीका स्नेहवश स्पर्श करता है, उसी प्रकार कामी राजा दशरथने महान् दु:खमें पड़ी हुई कमलनयनी भार्या कैकेयीका स्नेहपूर्वक दोनों हाथोंसे स्पर्श किया। उस समय उनके मनमें सब ओरसे यह भय समा गया था कि न जाने यह क्या कहेगी और क्या करेगी? वे उसके अङ्गोंपर हाथ फेरते हुए उससे इस प्रकार बोले—॥ २६-२७॥

न तेऽहमभिजानामि क्रोधमात्मनि संश्रितम्।

देवि केनाभियुक्तासि केन वासि विमानिता॥ २८॥

‘देवि! तुम्हारा क्रोध मुझपर है, ऐसा तो मुझे विश्वास नहीं होता। फिर किसने तुम्हारा तिरस्कार किया है? किसके द्वारा तुम्हारी निन्दा की गयी है?॥

यदिदं मम दु:खाय शेषे कल्याणि पांसुषु।

भूमौ शेषे किमर्थं त्वं मयि कल्याणचेतसि॥ २९॥

भूतोपहतचित्तेव मम चित्तप्रमाथिनि।

‘कल्याणि! तुम जो इस तरह मुझे दु:ख देनेके लिये धूलमें लोट रही हो, इसका क्या कारण है? मेरे चित्तको मथ डालनेवाली सुन्दरी! मेरे मनमें तो सदा तुम्हारे कल्याणकी ही भावना रहती है। फिर मेरे रहते हुए तुम किस लिये धरतीपर सो रही हो? जान पड़ता है तुम्हारे चित्तपर किसी पिशाचने अधिकार कर लिया है॥ २९/

सन्ति मे कुशला वैद्यास्त्वभितुष्टाश्च सर्वश:॥ ३०॥

सुखितां त्वां करिष्यन्ति व्याधिमाचक्ष्व भामिनि।

‘भामिनि! तुम अपना रोग बताओ। मेरे यहाँ बहुत-से चिकित्साकुशल वैद्य हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकारसे संतुष्ट कर रखा है, वे तुम्हें सुखी कर देंगे॥ ३०/

कस्य वापि प्रियं कार्यं केन वा विप्रियं कृतम्॥ ३१॥

क: प्रियं लभतामद्य को वा सुमहदप्रियम्।

‘अथवा कहो, आज किसका प्रिय करना है? या किसने तुम्हारा अप्रिय किया है? तुम्हारे किस उपकारीको आज प्रिय मनोरथ प्राप्त हो अथवा किस अपकारीको अत्यन्त अप्रिय—कठोर दण्ड दिया जाय?॥ ३१/

मा रौत्सीर्मा च कार्षीस्त्वं देवि सम्परिशोषणम्॥ ३२॥

अवध्यो वध्यतां को वा वध्य: को वा विमुच्यताम्।

दरिद्र: को भवेदाढ्यो द्रव्यवान् वाप्यकिंचन:॥ ३३॥

‘देवि! तुम न रोओ, अपनी देहको न सुखाओ; आज तुम्हारी इच्छाके अनुसार किस अवध्यका वध किया जाय? अथवा किस प्राणदण्ड पानेयोग्य अपराधीको भी मुक्त कर दिया जाय? किस दरिद्रको धनवान् और किस धनवान्को कंगाल बना दिया जाय?॥ ३२-३३॥

अहं च हि मदीयाश्च सर्वे तव वशानुगा:।

न ते कंचिदभिप्रायं व्याहन्तुमहमुत्सहे॥ ३४॥

आत्मनो जीवितेनापि ब्रूहि यन्मनसि स्थितम्।

‘मैं और मेरे सभी सेवक तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं। तुम्हारे किसी भी मनोरथको मैं भंग नहीं कर सकता—उसे पूरा करके ही रहूँगा, चाहे उसके लिये मुझे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें; अत: तुम्हारे मनमें जो कुछ हो, उसे स्पष्ट कहो॥ ३४/

बलमात्मनि जानन्ती न मां शङ्कितुमर्हसि॥ ३५॥

करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे।

‘अपने बलको जानते हुए भी तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ, जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो, वही करूँगा॥ ३५/

यावदावर्तते चक्रं तावती मे वसुंधरा॥ ३६॥

द्राविडा: सिन्धुसौवीरा: सौराष्ट्रा दक्षिणापथा:।

वङ्गाङ्गमगधा मत्स्या: समृद्धा: काशिकोसला:॥ ३७॥

‘जहाँतक सूर्यका चक्र घूमता है, वहाँतक सारी पृथ्वी मेरे अधिकारमें है। द्रविड़, सिन्धु-सौवीर, सौराष्ट्र, दक्षिण भारतके सारे प्रदेश तथा अङ्ग, वङ्ग, मगध, मत्स्य, काशी और कोसल—इन सभी समृद्धिशाली देशोंपर मेरा आधिपत्य है॥ ३६-३७॥

तत्र जातं बहु द्रव्यं धनधान्यमजाविकम्।

ततो वृणीष्व कैकेयि यद् यत् त्वं मनसेच्छसि॥ ३८॥

‘केकयराजनन्दिनि! उनमें पैदा होनेवाले भाँति-भाँतिके द्रव्य, धन-धान्य और बकरी—भेंड़ आदि जो भी तुम मनसे लेना चाहती हो, वह मुझसे माँग लो॥

किमायासेन ते भीरु उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शोभने।

तत्त्वं मे ब्रूहि कैकेयि यतस्ते भयमागतम्।

तत् ते व्यपनयिष्यामि नीहारमिव रश्मिवान्॥ ३९॥

‘भीरु! इतना क्लेश उठाने—प्रयास करनेकी क्या आवश्यकता है? शोभने! उठो, उठो। कैकेयि! ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किससे कौन-सा भय प्राप्त हुआ है? जैसे अंशुमाली सूर्य कुहरा दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारे भयका सर्वथा निवारण कर दूँगा’॥ ३९॥

तथोक्ता सा समाश्वस्ता वक्तुकामा तदप्रियम्।

परिपीडयितुं भूयो भर्तारमुपचक्रमे॥ ४०॥

राजाके ऐसा कहनेपर कैकेयीको कुछ सान्त्वना मिली। अब उसे अपने स्वामीसे वह अप्रिय बात कहनेकी इच्छा हुई। उसने पतिको और अधिक पीड़ा देनेकी तैयारी की॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशम: सर्ग:॥ १०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥

 

एकादश: सर्ग:

कैकेयीका राजाको प्रतिज्ञाबद्ध करके उन्हें पहलेके दिये हुए दो वरोंका स्मरण दिलाकर भरतके लिये अभिषेक और रामके लिये चौदह वर्षोंका वनवास माँगना

तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम्।

उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वच:॥ १॥

भूपाल दशरथ कामदेवके बाणोंसे पीडि़त तथा कामवेगके वशीभूत हो उसीका अनुसरण कर रहे थे। उनसे कैकेयीने यह कठोर वचन कहा—॥ १॥

नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता।

अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तमिच्छामि त्वया कृतम्॥ २॥

‘देव! न तो किसीने मेरा अपकार किया है और न किसीके द्वारा मैं अपमानित या निन्दित ही हुई हूँ। मेरा कोई एक अभिप्राय (मनोरथ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ॥ २॥

प्रतिज्ञां प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि।

अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया॥ ३॥

‘यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये। इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी’॥ ३॥

तामुवाच महाराज: कैकेयीमीषदुत्स्मय:।

कामी हस्तेन संगृह्य मूर्धजेषु भुवि स्थिताम्॥ ४॥

महाराज दशरथ कामके अधीन हो रहे थे। वे कैकेयीकी बात सुनकर किंचित् मुस्कराये और पृथ्वीपर पड़ी हुई उस देवीके केशोंको हाथसे पकड़कर—उसके सिरको अपनी गोदमें रखकर उससे इस प्रकार बोले—॥ ४॥

अवलिप्ते न जानासि त्वत्त: प्रियतरो मम।

मनुजो मनुजव्याघ्राद् रामादन्यो न विद्यते॥ ५॥

‘अपने सौभाग्यपर गर्व करनेवाली कैकेयी! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि नरश्रेष्ठ श्रीरामके अतिरिक्त दूसरा कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो॥

तेनाजय्येन मुख्येन राघवेण महात्मना।

शपे ते जीवनार्हेण ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्॥ ६॥

‘जो प्राणोंके द्वारा भी आराधनीय हैं और जिन्हें जीतना किसीके लिये भी असम्भव है, उन प्रमुख वीर महात्मा श्रीरामकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कामना पूर्ण होगी; अत: तुम्हारे मनकी जो इच्छा हो उसे बताओ॥ ६॥

यं मुहूर्तमपश्यंस्तु न जीवे तमहं ध्रुवम्।

तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥ ७॥

‘कैकेयि! जिन्हें दो घड़ी भी न देखनेपर निश्चय ही मैं जीवित नहीं रह सकता, उन श्रीरामकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम जो कहोगी, उसे पूर्ण करूँगा॥ ७॥

आत्मना चात्मजैश्चान्यैर्वृणे यं मनुजर्षभम्।

तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥ ८॥

‘केकयनन्दिनि! अपने तथा अपने दूसरे पुत्रोंको निछावर करके भी मैं जिन नरश्रेष्ठ श्रीरामका वरण करनेको उद्यत हूँ, उन्हींकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कही हुई बात पूरी करूँगा॥ ८॥

भद्रे हृदयमप्येतदनुमृश्योद्धरस्व मे।

एतत् समीक्ष्य कैकेयि ब्रूहि यत् साधु मन्यसे॥ ९॥

‘भद्रे! केकयराजकुमारी! मेरा यह हृदय भी तुम्हारे वचनोंकी पूर्तिके लिये तत्पर है। ऐसा सोचकर तुम अपनी इच्छा व्यक्त करके इस दु:खसे मेरा उद्धार करो। श्रीराम सबको अधिक प्रिय हैं—इस बातपर दृष्टिपात करके तुम्हें जो अच्छा जान पड़े, वह कहो॥ ९॥

बलमात्मनि पश्यन्ती न विशङ्कितुमर्हसि।

करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे॥ १०॥

‘अपने बलको देखते हुए भी तुम्हें मुझपर शङ्का नहीं करनी चाहिये। मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा’॥ १०॥

सा तदर्थमना देवी तमभिप्रायमागतम्।

निर्माध्यस्थ्याच्च हर्षाच्च बभाषे दुर्वचं वच:॥ ११॥

रानी कैकेयीका मन स्वार्थकी सिद्धिमें ही लगा हुआ था। उसके हृदयमें भरतके प्रति पक्षपात था और राजाको अपने वशमें देखकर हर्ष हो रहा था; अत: यह सोचकर कि अब मेरे लिये अपना मतलब साधनेका अवसर आ गया है, वह राजासे ऐसी बात बोली, जिसे मुँहसे निकालना (शत्रुके लिये भी) कठिन है॥ ११॥

तेन वाक्येन संहृष्टा तमभिप्रायमात्मन:।

व्याजहार महाघोरमभ्यागतमिवान्तकम्॥ १२॥

राजाके उस शपथयुक्त वचनसे उसको बड़ा हर्ष हुआ था। उसने अपने उस अभिप्रायको जो पास आये हुए यमराजके समान अत्यन्त भयंकर था, इन शब्दोंमें व्यक्त किया—॥ १२॥

यथा क्रमेण शपसे वरं मम ददासि च।

तच्छृण्वन्तु त्रयस्त्रिंशद् देवा: सेन्द्रपुरोगमा:॥ १३॥

‘राजन्! आप जिस तरह क्रमश: शपथ खाकर मुझे वर देनेको उद्यत हुए हैं, उसे इन्द्र आदि तैंतीस देवता सुन लें॥ १३॥

चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात्र्यहनी दिश:।

जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वा: सराक्षसा:॥ १४॥

निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवता:।

यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव॥ १५॥

‘चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात, दिन, दिशा, जगत्, यह पृथ्वी, गन्धर्व, राक्षस, रातमें विचरनेवाले प्राणी, घरोंमें रहनेवाले गृहदेवता तथा इनके अतिरिक्त भी जितने प्राणी हों, वे सब आपके कथनको जान लें—आपकी बातोंके साक्षी बनें॥ १४-१५॥

सत्यसंधो महातेजा धर्मज्ञ: सत्यवाक्शुचि:।

वरं मम ददात्येष सर्वे शृण्वन्तु दैवता:॥ १६॥

‘सब देवता सुनें! महातेजस्वी, सत्यप्रतिज्ञ, धर्मके ज्ञाता, सत्यवादी तथा शुद्ध आचार-विचारवाले ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं’॥ १६॥

इति देवी महेष्वासं परिगृह्याभिशस्य च।

तत: परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्॥ १७॥

इस प्रकार काममोहित होकर वर देनेको उद्यत हुए महाधनुर्धर राजा दशरथको अपनी मुट्ठीमें करके देवी कैकेयीने पहले उनकी प्रशंसा की; फिर इस प्रकार कहा—॥ १७॥

स्मर राजन् पुरा वृत्तं तस्मिन् देवासुरे रणे।

तत्र त्वां च्यावयच्छत्रुस्तव जीवितमन्तरा॥ १८॥

‘राजन्! उस पुरानी बातको याद कीजिये, जब कि देवासुरसंग्राम हो रहा था। वहाँ शत्रुने आपको घायल करके गिरा दिया था, केवल प्राण नहीं लिये थे॥ १८॥

तत्र चापि मया देव यत् त्वं समभिरक्षित:।

जाग्रत्या यतमानायास्ततो मे प्रददौ वरौ॥ १९॥

‘देव! उस युद्धस्थलमें सारी रात जागकर अनेक प्रकारके प्रयत्न करके जो मैंने आपके जीवनकी रक्षा की थी उससे संतुष्ट होकर आपने मुझे दो वर दिये थे॥ १९॥

तौ दत्तौ च वरौ देव निक्षेपौ मृगयाम्यहम्।

तवैव पृथिवीपाल सकाशे रघुनन्दन॥ २०॥

‘देव! पृथ्वीपाल रघुनन्दन! आपके दिये हुए वे दोनों वर मैंने धरोहरके रूपमें आपके ही पास रख दिये थे। आज इस समय उन्हींकी मैं खोज करती हूँ॥ २०॥

तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण न चेद् दास्यसि मे वरम्।

अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता॥ २१॥

‘इस प्रकार धर्मत: प्रतिज्ञा करके यदि आप मेरे उन वरोंको नहीं देंगे तो मैं अपनेको आपके द्वारा अपमानित हुई समझकर आज ही प्राणोंका परित्याग कर दूँगी’॥ २१॥

वाङ्मात्रेण तदा राजा कैकेय्या स्ववशे कृत:।

प्रचस्कन्द विनाशाय पाशं मृग इवात्मन:॥ २२॥

जैसे मृग बहेलियेकी वाणीमात्रसे अपने ही विनाशके लिये उसके जालमें फँस जाता है, उसी प्रकार कैकेयीके वशीभूत हुए राजा दशरथ उस समय पूर्वकालके वरदान-वाक्यका स्मरण करानेमात्रसे अपने ही विनाशके लिये प्रतिज्ञाके बन्धनमें बँध गये॥ २२॥

तत: परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्।

वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते॥ २३॥

तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वच:।

अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पित:॥ २४॥

अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम्।

तदनन्तर कैकेयीने काममोहित होकर वर देनेके लिये उद्यत हुए राजासे इस प्रकार कहा—‘देव! पृथ्वीनाथ! उन दिनों आपने जो दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उन्हें अब मुझे देना चाहिये। उन दोनों वरोंको मैं अभी बताऊँगी—आप मेरी बात सुनिये—यह जो श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी की गयी है, इसी अभिषेक-सामग्रीद्वारा मेरे पुत्र भरतका अभिषेक किया जाय॥

यो द्वितीयो वरो देव दत्त: प्रीतेन मे त्वया॥ २५॥

तदा देवासुरे युद्धे तस्य कालोऽयमागत:।

‘देव! आपने उस समय देवासुरसंग्राममें प्रसन्न होकर मेरे लिये जो दूसरा वर दिया था, उसे प्राप्त करनेका यह समय भी अभी आया है॥ २५/

नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रित:॥ २६॥

चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापस:।

भरतो भजतामद्य यौवराज्यमकण्टकम्॥ २७॥

‘धीर स्वभाववाले श्रीराम तपस्वीके वेशमें वल्कल तथा मृगचर्म धारण करके चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें जाकर रहें। भरतको आज निष्कण्टक युवराजपद प्राप्त हो जाय॥ २६-२७॥

एष मे परम: कामो दत्तमेव वरं वृणे।

अद्य चैव हि पश्येयं प्रयान्तं राघवं वने॥ २८॥

‘यही मेरी सर्वश्रेष्ठ कामना है। मैं आपसे पहलेका दिया हुआ वर ही माँगती हूँ। आप ऐसी व्यवस्था करें, जिससे मैं आज ही श्रीरामको वनकी ओर जाते देखूँ॥

स राजराजो भव सत्यसंगर:

कुलं च शीलं च हि जन्म रक्ष च।

परत्र वासे हि वदन्त्यनुत्तमं

तपोधना: सत्यवचो हितं नृणाम्॥ २९॥

‘आप राजाओंके राजा हैं; अत: सत्यप्रतिज्ञ बनिये और उस सत्यके द्वारा अपने कुल, शील तथा जन्मकी रक्षा कीजिये। तपस्वी पुरुष कहते हैं कि सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वह परलोकमें निवास होनेपर मनुष्योंके लिये परम कल्याणकारी होता है॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादश: सर्ग:॥ ११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥

 

द्वादश: सर्ग:

महाराज दशरथकी चिन्ता, विलाप, कैकेयीको फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगनेके लिये अनुरोध करना

तत: श्रुत्वा महाराज: कैकेय्या दारुणं वच:।

चिन्तामभिसमापेदे मुहूर्तं प्रतताप च॥ १॥

कैकेयीका यह कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथको बड़ी चिन्ता हुई। वे एक मुहूर्ततक अत्यन्त संताप करते रहे॥ १॥

किं नु मेऽयं दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम।

अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रव:॥ २॥

उन्होंने सोचा—‘क्या दिनमें ही यह मुझे स्वप्न दिखायी दे रहा है? अथवा मेरे चित्तका मोह है? या किसी भूत (ग्रह आदि) के आवेशसे चित्तमें विकलता आ गयी है? या आधि-व्याधिके कारण यह कोई मनका ही उपद्रव है’॥ २॥

इति संचिन्त्य तद् राजा नाध्यगच्छत् तदासुखम्।

प्रतिलभ्य तत: संज्ञां कैकेयीवाक्यतापित:॥ ३॥

यही सोचते हुए उन्हें अपने भ्रमके कारणका पता नहीं लगा। उस समय राजाको मूर्च्छित कर देनेवाला महान् दु:ख प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् होशमें आनेपर कैकेयीकी बातको याद करके उन्हें पुन: संताप होने लगा॥ ३॥

व्यथितो विक्लवश्चैव व्याघ्रीं दृष्ट्वा यथा मृग:।

असंवृतायामासीनो जगत्यां दीर्घमुच्छ्वसन्॥ ४॥

मण्डले पन्नगो रुद्धो मन्त्रैरिव महाविष:।

जैसे किसी बाघिनको देखकर मृग व्यथित हो जाता है, उसी प्रकार वे नरेश कैकेयीको देखकर पीडि़त एवं व्याकुल हो उठे। बिस्तररहित खाली भूमिपर बैठे हुए राजा लंबी साँस खींचने लगे, मानो कोई महा विषैला सर्प किसी मण्डलमें मन्त्रोंद्वारा अवरुद्ध हो गया हो॥ ४/

अहो धिगिति सामर्षो वाचमुक्त्वा नराधिप:॥ ५॥

मोहमापेदिवान् भूय: शोकोपहतचेतन:।

राजा दशरथ रोषमें भरकर ‘अहो! धिक्कार है’ यह कहकर पुन: मूर्च्छित हो गये। शोकके कारण उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी॥ ५/

चिरेण तु नृप: संज्ञां प्रतिलभ्य सुदु:खित:॥ ६॥

कैकेयीमब्रवीत् क्रुद्धो निर्दहन्निव तेजसा।

बहुत देरके बाद जब उन्हें फिर चेत हुआ, तब वे नरेश अत्यन्त दु:खी होकर कैकेयीको अपने तेजसे दग्ध-सी करते हुए क्रोधपूर्वक उससे बोले—॥ ६/

नृशंसे दुष्टचारित्रे कुलस्यास्य विनाशिनि॥ ७॥

किं कृतं तव रामेण पापे पापं मयापि वा।

‘दयाहीन दुराचारिणी कैकेयि! तू इस कुलका विनाश करनेवाली डाइन है। पापिनि! बता, मैंने अथवा श्रीरामने तेरा क्या बिगाड़ा है?॥ ७/

सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघव:॥ ८॥

तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता।

‘श्रीरामचन्द्र तो तेरे साथ सदा सगी माताका-सा बर्ताव करते आये हैं; फिर तू किसलिये उनका इस तरह अनिष्ट करनेपर उतारू हो गयी है॥ ८/

त्वं मयाऽऽत्मविनाशाय भवनं स्वं निवेशिता॥ ९॥

अविज्ञानान्नृपसुता व्याला तीक्ष्णविषा यथा।

‘मालूम होता है—मैंने अपने विनाशके लिये ही तुझे अपने घरमें लाकर रखा था। मैं नहीं जानता था कि तू राजकन्याके रूपमें तीखे विषवाली नागिन है॥ ९/

जीवलोको यदा सर्वो रामस्याह गुणस्तवम्॥ १०॥

अपराधं कमुद्दिश्य त्यक्ष्यामीष्टमहं सुतम्।

‘जब सारा जीव-जगत् श्रीरामके गुणोंकी प्रशंसा करता है, तब मैं किस अपराधके कारण अपने उस प्यारे पुत्रको त्याग दूँ?॥ १०/

कौसल्यां च सुमित्रां च त्यजेयमपि वा श्रियम्॥ ११॥

जीवितं चात्मनो रामं न त्वेव पितृवत्सलम्।

‘मैं कौसल्या और सुमित्राको भी छोड़ सकता हूँ, राजलक्ष्मीका भी परित्याग कर सकता हूँ, परंतु अपने प्राणस्वरूप पितृभक्त श्रीरामको नहीं छोड़ सकता॥ ११/

परा भवति मे प्रीतिर्दृष्ट्वा तनयमग्रजम्॥ १२॥

अपश्यतस्तु मे रामं नष्टं भवति चेतनम्।

‘अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको देखते ही मेरे हृदयमें परमप्रेम उमड़ आता है; परंतु जब मैं श्रीरामको नहीं देखता हूँ, तब मेरी चेतना नष्ट होने लगती है॥ १२/

तिष्ठेल्लोको विना सूर्यं सस्यं वा सलिलं विना॥ १३॥

न तु रामं विना देहे तिष्ठेत्तु मम जीवितम्।

‘सम्भव है सूर्यके बिना यह संसार टिक सके अथवा पानीके बिना खेती उपज सके, परंतु श्रीरामके बिना मेरे शरीरमें प्राण नहीं रह सकते॥ १३/

तदलं त्यज्यतामेष निश्चय: पापनिश्चये॥ १४॥

अपि ते चरणौ मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे।

किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम्॥ १५॥

‘अत: ऐसा वर माँगनेसे कोई लाभ नहीं। पापपूर्ण निश्चयवाली कैकेयि! तू इस निश्चय अथवा दुराग्रहको त्याग दे। यह लो, मैं तेरे पैरोंपर अपना मस्तक रखता हूँ, मुझपर प्रसन्न हो जा। पापिनि! तूने ऐसी परम क्रूरतापूर्ण बात किस लिये सोची है?॥ १४-१५॥

अथ जिज्ञाससे मां त्वं भरतस्य प्रियाप्रिये।

अस्तु यत्तत्त्वया पूर्वं व्याहृतं राघवं प्रति॥ १६॥

‘यदि यह जानना चाहती है कि भरत मुझे प्रिय हैं या अप्रिय तो रघुनन्दन भरतके सम्बन्धमें तू पहले जो कुछ कह चुकी है, वह पूर्ण हो अर्थात् तेरे प्रथम वरके अनुसार मैं भरतका राज्याभिषेक स्वीकार करता हूँ॥ १६॥

स मे ज्येष्ठसुत: श्रीमान् धर्मज्येष्ठ इतीव मे।

तत् त्वया प्रियवादिन्या सेवार्थं कथितं भवेत्॥ १७॥

‘तू पहले कहा करती थी कि ‘श्रीराम मेरे बड़े बेटे हैं, वे धर्माचरणमें भी सबसे बड़े हैं!’ परंतु अब मालूम हुआ कि तू ऊपर-ऊपरसे चिकनी-चुपड़ी बातें किया करती थी और वह बात तूने श्रीरामसे अपनी सेवा करानेके लिये ही कही होगी॥ १७॥

तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्ता संतापयसि मां भृशम्।

आविष्टासि गृहे शून्ये सा त्वं परवशं गता॥ १८॥

‘आज श्रीरामके अभिषेककी बात सुनकर तू शोकसे संतप्त हो उठी है और मुझे भी बहुत संताप दे रही है; इससे जान पड़ता है कि इस सूने घरमें तुझपर भूत आदिका आवेश हो गया है, अत: तू परवश होकर ऐसी बातें कह रही है॥ १८॥

इक्ष्वाकूणां कुले देवि सम्प्राप्त: सुमहानयम्।

अनयो नयसम्पन्ने यत्र ते विकृता मति:॥ १९॥

‘देवि! न्यायशील इक्ष्वाकुवंशमें यह बड़ा भारी अन्याय आकर उपस्थित हुआ है, जहाँ तेरी बुद्धि इस प्रकार विकृत हो गयी है॥ १९॥

नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम।

अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन न श्रद्दधामि ते॥ २०॥

‘विशाललोचने! आजसे पहले तूने कभी कोई ऐसा आचरण नहीं किया है, जो अनुचित अथवा मेरे लिये अप्रिय हो; इसीलिये तेरी आजकी बातपर भी मुझे विश्वास नहीं होता है॥ २०॥

ननु ते राघवस्तुल्यो भरतेन महात्मना।

बहुशो हि स्म बाले त्वं कथा: कथयसे मम॥ २१॥

‘तेरे लिये तो श्रीराम भी महात्मा भरतके ही तुल्य हैं। बाले! तू बहुत बार बातचीतके प्रसंगमें स्वयं ही यह बात मुझसे कहती रही है॥ २१॥

तस्य धर्मात्मनो देवि वने वासं यशस्विन:।

कथं रोचयसे भीरु नव वर्षाणि पञ्च च॥ २२॥

‘भीरु स्वभाववाली देवि! उन्हीं धर्मात्मा और यशस्वी श्रीरामका चौदह वर्षोंके लिये वनवास तुझे कैसे अच्छा लगता है?॥ २२॥

अत्यन्तसुकुमारस्य तस्य धर्मे कृतात्मन:।

कथं रोचयसे वासमरण्ये भृशदारुणे॥ २३॥

‘जो अत्यन्त सुकुमार और धर्ममें दृढ़तापूर्वक मन लगाये रखनेवाले हैं, उन्हीं श्रीरामको वनवास देना तुझे कैसे रुचिकर जान पड़ता है? अहो! तेरा हृदय बड़ा कठोर है॥ २३॥

रोचयस्यभिरामस्य रामस्य शुभलोचने।

तव शुश्रूषमाणस्य किमर्थं विप्रवासनम्॥ २४॥

‘सुन्दर नेत्रोंवाली कैकेयि! जो सदा तेरी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते हैं, उन नयनाभिराम श्रीरामको देशनिकाला दे देनेकी इच्छा तुझे किसलिये हो रही है?॥

रामो हि भरताद् भूयस्तव शुश्रूषते सदा।

विशेषं त्वयि तस्मात् तु भरतस्य न लक्षये॥ २५॥

‘मैं देखता हूँ, भरतसे अधिक श्रीराम ही सदा तेरी सेवा करते हैं। भरत उनसे अधिक तेरी सेवामें रहते हों, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा है॥ २५॥

शुश्रूषां गौरवं चैव प्रमाणं वचनक्रियाम्।

कस्तु भूयस्तरं कुर्यादन्यत्र पुरुषर्षभात्॥ २६॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीरामसे बढ़कर दूसरा कौन है, जो गुरुजनोंकी सेवा करने, उन्हें गौरव देने, उनकी बातोंको मान्यता देने और उनकी आज्ञाका तुरंत पालन करनेमें अधिक तत्परता दिखाता हो॥ २६॥

बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्।

परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते॥ २७॥

‘मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत-से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसीके मुँहसे श्रीरामके सम्बन्धमें सच्ची या झूठी किसी प्रकारकी शिकायत नहीं सुनी जाती॥ २७॥

सान्त्वयन् सर्वभूतानि राम: शुद्धेन चेतसा।

गृह्णाति मनुजव्याघ्र: प्रियैर्विषयवासिन:॥ २८॥

‘पुरुषसिंह श्रीराम समस्त प्राणियोंको शुद्ध हृदयसे सान्त्वना देते हुए प्रिय आचरणोंद्वारा राज्यकी समस्त प्रजाओंको अपने वशमें किये रहते हैं॥ २८॥

सत्येन लोकाञ्जयति द्विजान् दानेन राघव:।

गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्॥ २९॥

‘वीर श्रीरामचन्द्र अपने सात्त्विक भावसे समस्त लोकोंको, दानके द्वारा द्विजोंको, सेवासे गुरुजनोंको और धनुष-बाणद्वारा युद्धस्थलमें शत्रु-सैनिकोंको जीतकर अपने अधीन कर लेते हैं॥ २९॥

सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्।

विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे॥ ३०॥

‘सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरु-शुश्रूषा—ये सभी सद्गुण श्रीराममें स्थिररूपसे रहते हैं॥ ३०॥

तस्मिन्नार्जवसम्पन्ने देवि देवोपमे कथम्।

पापमाशंससे रामे महर्षिसमतेजसि॥ ३१॥

‘देवि! महर्षियोंके समान तेजस्वी उन सीधे-सादे देवतुल्य श्रीरामका तू क्यों अनिष्ट करना चाहती है?॥

न स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिन:।

स कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम्॥ ३२॥

‘श्रीराम सब लोगोंसे प्रिय बोलते हैं। उन्होंने कभी किसीको अप्रिय वचन कहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। ऐसे सर्वप्रिय रामसे मैं तेरे लिये अप्रिय बात कैसे कहूँगा?॥ ३२॥

क्षमा यस्मिंस्तपस्त्याग: सत्यं धर्म: कृतज्ञता।

अप्यहिंसा च भूतानां तमृते का गतिर्मम॥ ३३॥

‘जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवोंके प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीरामके बिना मेरी क्या गति होगी?॥ ३३॥

मम वृद्धस्य कैकेयि गतान्तस्य तपस्विन:।

दीनं लालप्यमानस्य कारुण्यं कर्तुमर्हसि॥ ३४॥

‘कैकेयि! मैं बूढ़ा हूँ। मौतके किनारे बैठा हूँ। मेरी अवस्था शोचनीय हो रही है और मैं दीनभावसे तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ। तुझे मुझपर दया करनी चाहिये॥

पृथिव्यां सागरान्तायां यत् किंचिदधिगम्यते।

तत् सर्वं तव दास्यामि मा च त्वं मन्युमाविश॥ ३५॥

‘समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जो कुछ मिल सकता है, वह सब मैं तुझे दे दूँगा, परंतु तू ऐसे दुराग्रहमें न पड़, जो मुझे मौतके मुँहमें ढकेलनेवाला हो॥ ३५॥

अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते।

शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत्॥ ३६॥

‘केकयनन्दिनि! मैं हाथ जोड़ता हूँ और तेरे पैरों पड़ता हूँ। तू श्रीरामको शरण दे, जिससे यहाँ मुझे पाप न लगे’॥ ३६॥

इति दु:खाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम्।

घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम्॥ ३७॥

पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुन: पुन:।

प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वच:॥ ३८॥

महाराज दशरथ इस प्रकार दु:खसे संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्कमें चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागरसे शीघ्र पार होनेके लिये बारंबार अनुनय-विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयीका हृदय नहीं पिघला। वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी—॥ ३७-३८॥

यदि दत्त्वा वरौ राजन् पुन: प्रत्यनुतप्यसे।

धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि॥ ३९॥

‘राजन्! यदि दो वरदान देकर आप फिर उनके लिये पश्चात्ताप करते हैं तो वीर नरेश्वर! इस भूमण्डलमें आप अपनी धार्मिकताका ढिंढोरा कैसे पीट सकेंगे?॥

यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षय: सह।

कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि॥ ४०॥

‘धर्मके ज्ञाता महाराज! जब बहुत-से राजर्षि एकत्र होकर आपके साथ मुझे दिये हुए वरदानके विषयमें बातचीत करेंगे, उस समय वहाँ आप उन्हें क्या उत्तर देंगे?॥ ४०॥

यस्या: प्रसादे जीवामि या च मामभ्यपालयत्।

तस्या: कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि॥ ४१॥

‘यही कहेंगे न, कि जिसके प्रसादसे मैं जीवित हूँ, जिसने (बहुत बड़े संकटसे) मेरी रक्षा की, उसी कैकेयीको वर देनेके लिये की हुई प्रतिज्ञा मैंने झूठी कर दी॥ ४१॥

किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप।

यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे॥ ४२॥

‘महाराज! आज ही वरदान देकर यदि आप फिर उससे विपरीत बात कहेंगे तो अपने कुलके राजाओंके माथे कलंकका टीका लगायेंगे॥ ४२॥

शैब्य: श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ।

अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम्॥ ४३॥

‘राजा शैब्यने बाज और कबूतरके झगड़ेमें (कबूतरके प्राण बचानेकी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये) बाज नामक पक्षीको अपने शरीरका मांस काटकर दे दिया था। इसी तरह राजा अलर्कने (एक अंधे ब्राह्मणको) अपने दोनों नेत्रोंका दान करके परम उत्तम गति प्राप्त की थी॥ ४३॥

सागर: समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते।

समयं मानृतं कार्षी: पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥ ४४॥

‘समुद्रने (देवताओंके समक्ष) अपनी नियत सीमाको न लाँघनेकी प्रतिज्ञा की थी, सो अबतक वह उसका उल्लङ्घन नहीं करता है। आप भी पूर्ववर्ती महापुरुषोंके बर्तावको सदा ध्यानमें रखकर अपनी प्रतिज्ञा झूठी न करें॥ ४४॥

स त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च।

सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दुर्मते॥ ४५॥

‘(परंतु आप मेरी बात क्यों सुनेंगे?) दुर्बुद्धि नरेश! आप तो धर्मको तिलाञ्जलि देकर श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करके रानी कौसल्याके साथ सदा मौज उड़ाना चाहते हैं॥ ४५॥

भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम्।

यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रम:॥ ४६॥

‘अब धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जिस बातके लिये आपने मुझसे प्रतिज्ञा कर ली है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता॥ ४६॥

अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रत:।

पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते॥ ४७॥

‘यदि श्रीरामका राज्याभिषेक होगा तो मैं आपके सामने आपके देखते-देखते आज ही बहुत-सा विष पीकर मर जाऊँगी॥ ४७॥

एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम्।

अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम॥ ४८॥

‘यदि मैं एक दिन भी राममाता कौसल्याको राजमाता होनेके नाते दूसरे लोगोंसे अपनेको हाथ जोड़वाती देख लूँगी तो उस समय मैं अपने लिये मर जाना ही अच्छा समझूँगी॥ ४८॥

भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप।

यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात्॥ ४९॥

‘नरेश्वर! मैं आपके सामने अपनी और भरतकी शपथ खाकर कहती हूँ कि श्रीरामको इस देशसे निकाल देनेके सिवा दूसरे किसी वरसे मुझे संतोष नहीं होगा’॥

एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह।

विलपन्तं च राजानं न प्रतिव्याजहार सा॥ ५०॥

इतना कहकर कैकेयी चुप हो गयी। राजा बहुत रोये-गिड़गिड़ाये; किंतु उसने उनकी किसी बातका जवाब नहीं दिया॥ ५०॥

श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम्।

रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च॥ ५१॥

नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रिय:।

प्रैक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम्॥ ५२॥

‘श्रीरामका वनवास हो और भरतका राज्याभिषेक’ कैकेयीके मुखसे यह परम अमङ्गलकारी वचन सुनकर राजाकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वे एक मुहूर्ततक कैकेयीसे कुछ न बोले। उस अप्रिय वचन बोलनेवाली प्यारी रानीकी ओर केवल एकटक दृष्टिसे देखते रहे॥

तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम्।

दु:खशोकमयीं श्रुत्वा राजा न सुखितोऽभवत्॥ ५३॥

मनको अप्रिय लगनेवाली कैकेयीकी वह वज्रके समान कठोर तथा दु:ख-शोकमयी वाणी सुनकर राजाको बड़ा दु:ख हुआ। उनकी सुख-शान्ति छिन गयी॥

स देव्या व्यवसायं च घोरं च शपथं कृतम्।

ध्यात्वा रामेति नि:श्वस्य च्छिन्नस्तरुरिवापतत्॥ ५४॥

देवी कैकेयीके उस घोर निश्चय और किये हुए शपथकी ओर ध्यान जाते ही वे ‘हा राम!’ कहकर लंबी साँस खींचते हुए कटे वृक्षकी भाँति गिर पड़े॥ ५४॥

नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुर:।

हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपति:॥ ५५॥

उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। वे उन्मादग्रस्त-से प्रतीत होने लगे। उनकी प्रकृति विपरीत-सी हो गयी। वे रोगी-से जान पड़ते थे। इस प्रकार भूपाल दशरथ मन्त्रसे जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्पके समान निश्चेष्ट हो गये॥ ५५॥

दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम्।

अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता॥ ५६॥

तदनन्तर उन्होंने दीन और आतुर वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार कहा—‘अरी! तुझे अनर्थ ही अर्थ-सा प्रतीत हो रहा है, किसने तुझे इसका उपदेश दिया है?॥ ५६॥

भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां न लज्जसे।

शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा॥ ५७॥

‘जान पड़ता है, तेरा चित्त किसी भूतके आवेशसे दूषित हो गया है। पिशाचग्रस्त नारीकी भाँति मेरे सामने ऐसी बातें कहती हुई तू लज्जित क्यों नहीं होती? मुझे पहले इस बातका पता नहीं था कि तेरा यह कुलाङ्गनोचित शील इस तरह नष्ट हो गया है॥ ५७॥

बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत्।

कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम्॥ ५८॥

राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने।

विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च॥ ५९॥

‘बालावस्थामें जो तेरा शील था, उसे इस समय मैं विपरीत-सा देख रहा हूँ। तुझे किस बातका भय हो गया है जो इस तरहका वर माँगती है ? भरत राज्य-सिंहासनपर बैठें और श्रीराम वनमें रहें—यही तू माँग रही है। यह बड़ा असत्य तथा ओछा विचार है। तू अब भी इससे विरत हो जा॥ ५८-५९॥

यदि भर्तु: प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च।

नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि॥ ६०॥

‘क्रूर स्वभाव और पापपूर्ण विचारवाली नीच दुराचारिणि! यदि अपने पतिका, सारे जगत्का और भरतका भी प्रिय करना चाहती है तो इस दूषित संकल्पको त्याग दे॥ ६०॥

किं नु दु:खमलीकं वा मयि रामे च पश्यसि।

न कथंचिदृते रामाद् भरतो राज्यमावसेत्॥ ६१॥

‘तू मुझमें या श्रीराममें कौन-सा दु:खदायक या अप्रिय बर्ताव देख रही है (कि ऐसा नीच कर्म करनेपर उतारू हो गयी है); श्रीरामके बिना भरत किसी तरह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेंगे॥ ६१॥

रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्।

कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते॥ ६२॥

मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम्।

‘क्योंकि मेरी समझमें धर्मपालनकी दृष्टिसे भरत श्रीरामसे भी बढ़े-चढ़े हैं। श्रीरामसे यह कह देनेपर कि तुम वनको जाओ; जब उनके मुखकी कान्ति राहुग्रस्त चन्द्रमाकी भाँति फीकी पड़ जायगी, उस समय मैं कैसे उनके उस उदास मुखकी ओर देख सकूँगा?॥ ६२/

तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भि: सह निश्चिताम्॥ ६३॥

कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम्।

‘मैंने श्रीरामके अभिषेकका निश्चय सुहृदोंके साथ विचार करके किया है, मेरी यह बुद्धि शुभ कर्ममें प्रवृत्त हुई है; अब मैं इसे शत्रुओंद्वारा पराजित हुई सेनाकी भाँति पलटी हुई कैसे देखूँगा?॥ ६३/

किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्य: समागता:॥ ६४॥

बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत्।

‘नाना दिशाओंसे आये हुए राजालोग मुझे लक्ष्य करके खेदपूर्वक कहेंगे कि इस मूढ इक्ष्वाकुवंशी राजाने कैसे दीर्घकालतक इस राज्यका पालन किया है?॥ ६४/

यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुता:॥ ६५॥

परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा।

कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्र: प्रव्राजितो मया॥ ६६॥

‘जब बहुत-से बहुश्रुत गुणवान् एवं वृद्ध पुरुष आकर मुझसे पूछेंगे कि श्रीराम कहाँ हैं? तब मैं उनसे कैसे यह कहूँगा कि कैकेयीके दबाव देनेपर मैंने अपने बेटेको घरसे निकाल दिया॥ ६५-६६॥

यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति।

किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमास्थिते॥ ६७॥

किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम्।

‘यदि कहूँ कि श्रीरामको वनवास देकर मैंने सत्यका पालन किया है तो इसके पहले जो उन्हें राज्य देनेकी बात कह चुका हूँ, वह असत्य हो जायगी। यदि राम वनको चले गये तो कौसल्या मुझे क्या कहेगी? उसका ऐसा महान् अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूँगा॥ ६७/

यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च॥ ६८॥

भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति।

सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा॥ ६९॥

न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव।

‘हाय! जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, वह प्रिय वचन बोलनेवाली कौसल्या जब-जब दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माताकी भाँति मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे मेरी सेवामें उपस्थित होती थी, तब-तब उस सत्कार पानेयोग्य देवीका भी मैंने तेरे ही कारण कभी सत्कार नहीं किया॥ ६८-६९/

इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि॥ ७०॥

अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम्।

‘तेरे साथ जो मैंने इतना अच्छा बर्ताव किया, वह याद आकर इस समय मुझे उसी प्रकार संताप दे रहा है, जैसे अपथ्य (हानिकारक) व्यञ्जनोंसे युक्त खाया हुआ अन्न किसी रोगीको कष्ट देता है॥ ७०/

विप्रकारं च रामस्य सम्प्रयाणं वनस्य च॥ ७१॥

सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति।

‘श्रीरामके अभिषेकका निवारण और उनका वनकी ओर प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जायगी, फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी?॥ ७१/

कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम्॥ ७२॥

मां च पञ्चत्वमापन्नं रामं च वनमाश्रितम्।

‘हाय! बेचारी सीताको एक ही साथ दो दु:खद एवं अप्रिय समाचार सुनने पड़ेंगे—श्रीरामका वनवास और मेरी मृत्यु॥ ७२/

वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति॥ ७३॥

हीना हिमवत: पार्श्वे किंनरेणेव किंनरी।

‘जब वह श्रीरामके लिये शोक करने लगेगी, उस समय मेरे प्राणोंका नाश कर डालेगी—उसका शोक देखकर मेरे प्राण इस शरीरमें नहीं रह सकेंगे। उसकी दशा हिमालयके पार्श्वभागमें अपने स्वामी किन्नरसे बिछुड़ी हुई किन्नरीके समान हो जायगी॥ ७३/

नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने॥ ७४॥

चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम्।

सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ७५॥

‘मैं श्रीरामको विशाल वनमें निवास करते और मिथिलेशकुमारी सीताको रोती देख अधिक कालतक जीवित रहना नहीं चाहता। ऐसी दशामें तू निश्चय ही विधवा होकर बेटेके साथ अयोध्याका राज्य करना॥

सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम्।

रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नर:॥ ७६॥

‘ओह! मैं तुझे अत्यन्त सती-साध्वी समझता था, परंतु तू बड़ी दुष्टा निकली; ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखनेमें सुन्दर मदिराको पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकारसे यह समझ पाता है कि इसमें विष मिला हुआ था॥ ७६॥

अनृतैर्बत मां सान्त्वै: सान्त्वयन्ती स्म भाषसे।

गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधी:॥ ७७॥

‘अबतक जो तू सान्त्वनापूर्ण मीठे वचन बोलकर मुझे आश्वासन देती हुई बातें किया करती थी, वे तेरी कही हुई सारी बातें झूठी थीं। जैसे व्याध हरिणको मधुर संगीतसे आकृष्ट करके उसे मार डालता है, उसी प्रकार तू भी पहले मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है॥

अनार्य इति मामार्या: पुत्रविक्रायकं ध्रुवम्।

विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा॥ ७८॥

‘श्रेष्ठ पुरुष निश्चय ही मुझे नीच और एक नारीके मोहमें पड़कर बेटेको बेच देनेवाला कहकर शराबी ब्राह्मणकी भाँति मेरी राह-बाट और गली-कूचोंमें निन्दा करेंगे॥ ७८॥

अहो दु:खमहो कृच्छ्रं यत्र वाच: क्षमे तव।

दु:खमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम्॥ ७९॥

‘अहो! कितना दु:ख है! कितना कष्ट है!! जहाँ मुझे तेरी ये बातें सहन करनी पड़ती हैं। मानो यह मेरे पूर्वजन्मके किये हुए पापका ही अशुभ फल है, जो मुझपर ऐसा महान् दु:ख आ पड़ा॥ ७९॥

चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता।

अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुद्बन्धनी यथा॥ ८०॥

‘पापिनि! मुझ पापीने बहुत दिनोंसे तेरी रक्षा की और अज्ञानवश तुझे गले लगाया; किंतु तू आज मेरे गलेमें पड़ी हुई फाँसीकी रस्सी बन गयी॥ ८०॥

रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये।

बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम्॥ ८१॥

‘जैसे बालक एकान्तमें खेलता-खेलता काले नागको हाथमें पकड़ ले, उसी प्रकार मैंने एकान्तमें तेरे साथ क्रीड़ा करते हुए तेरा आलिङ्गन किया है; परंतु उस समय मुझे यह न सूझा कि तू ही एक दिन मेरी मृत्युका कारण बनेगी॥ ८१॥

तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टुमर्हति।

मया ह्यपितृक: पुत्र: स महात्मा दुरात्मना॥ ८२॥

‘हाय! मुझ दुरात्माने जीते-जी ही अपने महात्मा पुत्रको पितृहीन बना दिया। मुझे यह सारा संसार निश्चय ही धिक्कारेगा—गालियाँ देगा, जो उचित ही होगा॥ ८२॥

बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम्।

स्त्रीकृते य: प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति॥ ८३॥

‘लोग मेरी निन्दा करते हुए कहेंगे कि राजा दशरथ बड़ा ही मूर्ख और कामी है, जो एक स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये अपने प्यारे पुत्रको वनमें भेज रहा है॥ ८३॥

वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शित:।

भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते॥ ८४॥

‘हाय! अबतक तो श्रीराम वेदोंका अध्ययन करने, ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करने तथा अनेकानेक गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहनेके कारण दुबले होते चले आये हैं। अब जब इनके लिये सुखभोगका समय आया है, तब ये वनमें जाकर महान् कष्टमें पड़ेंगे॥ ८४॥

नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम्।

स वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति॥ ८५॥

‘अपने पुत्र श्रीरामसे यदि मैं कह दूँ कि तुम वनको चले जाओ तो वे तुरंत ‘बहुत अच्छा’ कहकर मेरी आज्ञाको स्वीकार कर लेंगे। मेरे पुत्र राम दूसरी कोई बात कहकर मुझे प्रतिकूल उत्तर नहीं दे सकते॥

यदि मे राघव: कुर्याद् वनं गच्छेति चोदित:।

प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्स: करिष्यति॥ ८६॥

‘यदि मेरे वन जानेकी आज्ञा दे देनेपर भी श्रीरामचन्द्र उसके विपरीत करते—वनमें नहीं जाते तो वही मेरे लिये प्रिय कार्य होगा; किंतु मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता॥ ८६॥

राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम्।

मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम्॥ ८७॥

‘यदि रघुनन्दन राम वनको चले गये तो सब लोगोंके धिक्कारपात्र बने हुए मुझ अक्षम्य अपराधीको मृत्यु अवश्य यमलोकमें पहुँचा देगी॥ ८७॥

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे।

इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे॥ ८८॥

‘यदि नरश्रेष्ठ श्रीरामके वनमें चले जानेपर मेरी मृत्यु हो गयी तो शेष जो मेरे प्रियजन (कौसल्या आदि) यहाँ रहेंगे, उनपर तू कौन-सा अत्याचार करेगी?॥ ८८॥

कौसल्या मां च रामं च पुत्रौ च यदि हास्यति।

दु:खान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति॥ ८९॥

‘देवी कौसल्याको यदि मुझसे, श्रीरामसे तथा शेष दोनों पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे विछोह हो जायगा तो वह इतने बड़े दु:खको सहन नहीं कर सकेगी; अत: मेरे ही पीछे वह भी परलोक सिधार जायगी। (सुमित्राका भी यही हाल होगा)॥ ८९॥

कौसल्यां च सुमित्रां च मां च पुत्रैस्त्रिभि: सह।

प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव॥ ९०॥

‘कैकेयि! इस प्रकार कौसल्याको, सुमित्राको और तीनों पुत्रोंके साथ मुझे भी नरक-तुल्य महान् शोकमें डालकर तू स्वयं सुखी होना॥ ९०॥

मया रामेण च त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणै:।

इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि॥ ९१॥

‘अनेकानेक गुणोंसे सत्कृत, शाश्वत तथा क्षोभरहित यह इक्ष्वाकुकुल जब मुझसे और श्रीरामसे परित्यक्त होकर शोकसे व्याकुल हो जायगा, तब उस अवस्थामें तू इसका पालन करेगी॥ ९१॥

प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत्।

मा स्म मे भरत: कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुष:॥ ९२॥

‘यदि भरतको भी श्रीरामका यह वनमें भेजा जाना प्रिय लगता हो तो मेरी मृत्युके बाद वे मेरे शरीरका दाहसंस्कार न करें॥ ९२॥

मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे।

सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ९३॥

‘पुरुषशिरोमणि श्रीरामके वन-गमनके पश्चात् मेरी मृत्यु हो जानेपर अब विधवा होकर तू बेटेके साथ अयोध्याका राज्य करेगी॥ ९३॥

त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि।

अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुव: परिभवश्च मे।

सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा॥ ९४॥

‘राजकुमारी! तू मेरे दुर्भाग्यसे मेरे घरमें आकर बस गयी। तेरे कारण संसारमें पापाचारीकी भाँति मुझे निश्चय ही अनुपम अपयश, तिरस्कार और समस्त प्राणियोंसे अवहेलना प्राप्त होगी॥ ९४॥

कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहु:।

पद‍्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति॥ ९५॥

‘मेरे पुत्र सामर्थ्यशाली राम बारंबार रथों, हाथियों और घोड़ोंसे यात्रा किया करते थे। वे ही अब उस विशाल वनमें पैदल कैसे चलेंगे?॥ ९५॥

यस्य चाहारसमये सूदा: कुण्डलधारिण:।

अहंपूर्वा: पचन्ति स्म प्रसन्ना: पानभोजनम्॥ ९६॥

स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च।

भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति॥ ९७॥

‘भोजनके समय जिनके लिये कुण्डलधारी रसोइये प्रसन्न होकर ‘पहले मैं बनाऊँगा’ ऐसा कहते हुए खाने-पीनेकी वस्तुएँ तैयार करते थे, वे ही मेरे पुत्र रामचन्द्र वनमें कसैले, तिक्त और कड़वे फलोंका आहार करते हुए किस तरह निर्वाह करेंगे॥ ९६-९७॥

महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचित:।

काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति॥ ९८॥

‘जो सदा बहुमूल्य वस्त्र पहना करते थे और जिनका चिरकालसे सुखमें ही समय बीता है, वे ही श्रीराम वनमें गेरुए वस्त्र पहनकर कैसे रह सकेंगे?॥ ९८॥

कस्येदं दारुणं वाक्यमेवंविधमपीरितम्।

रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम्॥ ९९॥

‘श्रीरामका वनगमन और भरतका अभिषेक—ऐसा कठोर वाक्य तूने किसकी प्रेरणासे अपने मुँहसे निकाला है॥ ९९॥

धिगस्तु योषितो नाम शठा: स्वार्थपरायणा:।

न ब्रवीमि स्त्रिय: सर्वा भरतस्यैव मातरम्॥ १००॥

‘स्त्रियोंको धिक्कार है; क्योंकि वे शठ और स्वार्थपरायण होती हैं; परंतु मैं सारी स्त्रियोंके लिये ऐसा नहीं कह सकता, केवल भरतकी माताकी ही निन्दा करता हूँ॥ १००॥

अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे

ममानुतापाय निवेशितासि।

किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं

हितानुकारिण्यथवापि रामे॥ १०१॥

‘अनर्थमें ही अर्थबुद्धि रखनेवाली क्रूर कैकेयि! तू मुझे संताप देनेके लिये ही इस घरमें बसायी गयी है। अरी! मेरे कारण तू अपना कौन-सा अप्रिय होता देख रही है? अथवा सबका निरन्तर हित करनेवाले श्रीराममें ही तुझे कौन-सी बुराई दिखायी देती है॥ १०१॥

परित्यजेयु: पितरोऽपि पुत्रान्

भार्या: पतींश्चापि कृतानुरागा:।

कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत् स्याद्

दृष्ट्वैव रामं व्यसने निमग्नम्॥ १०२॥

‘श्रीरामको संकटके समुद्रमें डूबा हुआ देखकर तो पिता अपने पुत्रोंको त्याग देंगे। अनुरागिणी स्त्रियाँ भी अपने पतियोंको त्याग देंगी। इस प्रकार यह सारा जगत् ही कुपित—विपरीत व्यवहार करनेवाला हो जायगा॥ १०२॥

अहं पुनर्देवकुमाररूप-

मलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम्।

नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन

भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव॥ १०३॥

‘देवकुमारके समान कमनीय रूपवाले अपने पुत्र श्रीरामको जब वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित होकर सामने आते देखता हूँ तो नेत्रोंसे उनकी शोभा निहारकर निहाल हो जाता हूँ। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो मैं फिर जवान हो गया॥ १०३॥

विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्ति-

रवर्षता वज्रधरेण वापि।

रामं तु गच्छन्तमित: समीक्ष्य

जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे॥ १०४॥

‘कदाचित् सूर्यके बिना भी संसारका काम चल जाय, वज्रधारी इन्द्रके वर्षा न करनेपर भी प्राणियोंका जीवन सुरक्षित रह जाय, परंतु रामको यहाँसे वनकी ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं रह सकता—मेरी ऐसी धारणा है॥ १०४॥

विनाशकामामहिताममित्रा-

मावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम्।

चिरं बताङ्केन धृतासि सर्पी

महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात्॥ १०५॥

‘अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है। जैसे कोई अपनी ही मृत्युको घरमें स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घरमें बसा लिया है। खेदकी बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिनको चिरकालसे अपने अङ्कमें धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया॥ १०५॥

मया च रामेण सलक्ष्मणेन

प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह।

पुरं च राष्ट्रं च निहत्य बान्धवान्

ममाहितानां च भवाभिहर्षिणी॥ १०६॥

‘मुझसे, श्रीराम और लक्ष्मणसे हीन होकर भरत समस्त बान्धवोंका विनाश करके तेरे साथ इस नगर तथा राष्ट्रका शासन करें तथा तू मेरे शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली हो॥

नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि

प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे।

न नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो

विशीर्यमाणा दशना: सहस्रधा॥ १०७॥

‘क्रूरतापूर्ण बर्ताव करनेवाली कैकेयी! तू संकटमें पड़े हुएपर प्रहार कर रही है। अरी! जब तू दुराग्रहपूर्वक आज ऐसी कठोर बातें मुँहसे निकालती है, उस समय तेरे दाँतोंके हजारों टुकड़े होकर मुँहसे नीचे क्यों नहीं गिर जाते?॥ १०७॥

न किंचिदाहाहितमप्रियं वचो

न वेत्ति राम: परुषाणि भाषितुम्।

कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि

ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते॥ १०८॥

‘श्रीराम कभी किसीसे कोई अहितकारक या अप्रिय वचन नहीं कहते हैं। वे कटुवचन बोलना जानते ही नहीं हैं। उनका अपने गुणोंके कारण सदा-सर्वदा सम्मान होता है। उन्हीं मनोहर वचन बोलनेवाले श्रीराममें तू दोष कैसे बता रही है? क्योंकि वनवास उसीको दिया जाता है, जिसके बहुत-से दोष सिद्ध हो चुके हों॥ १०८॥

प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा

सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज।

न ते करिष्यामि वच: सुदारुणं

ममाहितं केकयराजपांसने॥ १०९॥

‘ओ केकयराजके कुलकी जीती-जागती कलङ्क! तू चाहे ग्लानिमें डूब जा अथवा आगमें जलकर खाक हो जा या विष खाकर प्राण दे दे अथवा पृथ्वीमें हजारों दरारें बनाकर उसीमें समा जा; परंतु मेरा अहित करनेवाली तेरी यह अत्यन्त कठोर बात मैं कदापि नहीं मानूँगा॥ १०९॥

क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां

प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम्।

न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां

दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम्॥ ११०॥

‘तू छुरेके समान घात करनेवाली है। बातें तो मीठी-मीठी करती है, परंतु वे सदा झूठी और सद्भावनासे रहित होती हैं। तेरे हृदयका भाव अत्यन्त दूषित है तथा तू अपने कुलका भी नाश करनेवाली है। इतना ही नहीं, तू प्राणोंसहित मेरे हृदयको भी जलाकर भस्म कर डालना चाहती है; इसीलिये मेरे मनको नहीं भाती है। तुझ पापिनीका जीवित रहना मैं नहीं सह सकता॥ ११०॥

न जीवितं मेऽस्ति कुत: पुन: सुखं

विनात्मजेनात्मवतां कुतो रति:।

ममाहितं देवि न कर्तुमर्हसि

स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे॥ १११॥

‘देवि! अपने बेटे श्रीरामके बिना मेरा जीवन नहीं रह सकता, फिर कहाँसे सुख हो सकता है? आत्मज्ञ पुरुषोंको भी अपने पुत्रसे बिछोह हो जानेपर कैसे चैन मिल सकता है? अत: तू मेरा अहित न कर। मैं तेरे पैर छूता हूँ, तू मुझपर प्रसन्न हो जा’॥ १११॥

स भूमिपालो विलपन्ननाथवत्

स्त्रिया गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया।

पपात देव्याश्चरणौ प्रसारिता-

वुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा॥ ११२॥

इस प्रकार महाराज दशरथ मर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाली उस हठीली स्त्रीके वशमें पड़कर अनाथकी भाँति विलाप कर रहे थे। वे देवी कैकेयीके फैलाये हुए दोनों चरणोंको छूना चाहते थे; परंतु उन्हें न पाकर बीचमें ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तुको छूना चाहता है; किंतु दुर्बलताके कारण वहाँतक न पहुँचकर बीचमें ही अचेत होकर गिर जाता है॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादश: सर्ग:॥ १२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥

 


त्रयोदश: सर्ग:

राजाका विलाप और कैकेयीसे अनुनय-विनय

अतदर्हं महाराजं शयानमतथोचितम्।

ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम्॥ १॥

अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी।

पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना॥ २॥

महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्थामें पृथ्वीपर पड़े थे। उस समय वे पुण्य समाप्त होनेपर देवलोकसे भ्रष्ट हुए राजा ययातिके समान जान पड़ते थे। उनकी वैसी दशा देख अनर्थकी साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभीतक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवादका भय छोड़ चुकी थी और श्रीरामसे भरतके लिये भय देखती थी, पुन: उसी वरके लिये राजाको सम्बोधित करके कहने लगी—॥ १-२॥

त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रत:।

मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि॥ ३॥

‘महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदानको क्यों हजम कर जाना चाहते हैं?’॥ ३॥

एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा।

प्रत्युवाच तत: क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव॥ ४॥

कैकेयीके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ दो घड़ीतक व्याकुलकी-सी अवस्थामें रहे। तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे—॥ ४॥

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे।

हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव॥ ५॥

‘ओ नीच! तू मेरी शत्रु है। नरश्रेष्ठ श्रीरामके वनमें चले जानेपर जब मेरी मृत्यु हो जायगी, उस समय तू सफलमनोरथ होकर सुखसे रहना॥ ५॥

स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम्।

प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत॥ ६॥

‘हाय! स्वर्गमें भी जब देवता मुझसे श्रीरामका कुशल समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँ, उन्हें वनमें भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है॥ ६॥

कैकेय्या: प्रियकामेन राम: प्रव्राजितो वनम्।

यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति॥ ७॥

‘कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे उसके माँगे हुए वरदानके अनुसार मैंने श्रीरामको वनमें भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायगी, जिसके द्वारा मैंने रामको राज्य देनेका आश्वासन दिया है॥ ७॥

अपुत्रेण मया पुत्र: श्रमेण महता महान्।

रामो लब्धो महातेजा: स कथं त्यज्यते मया॥ ८॥

‘मैं पहले पुत्रहीन था, फिर महान् परिश्रम करके मैंने जिन महातेजस्वी महापुरुष श्रीरामको पुत्ररूपमें प्राप्त किया है, उनका मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा सकता है?॥ ८॥

शूरश्च कृतविद्यश्च जितक्रोध: क्षमापर:।

कथं कमलपत्राक्षो मया रामो विवास्यते॥ ९॥

‘जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोधको जीतनेवाले और क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीरामको मैं देशनिकाला कैसे दे सकता हूँ?॥ ९॥

कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम्।

अभिराममहं रामं स्थापयिष्यामि दण्डकान्॥ १०॥

‘जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमलके समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीरामको मैं दण्डकवनमें कैसे भेज सकूँगा?॥ १०॥

सुखानामुचितस्यैव दु:खैरनुचितस्य च।

दु:खं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमत:॥ ११॥

‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य हैं, कदापि दु:ख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामको दु:ख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ?॥ ११॥

यदि दु:खमकृत्वा तु मम संक्रमणं भवेत्।

अदु:खार्हस्य रामस्य तत: सुखमवाप्नुयाम्॥ १२॥

‘जो दु:ख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन श्रीरामको यह वनवासका दु:ख दिये बिना ही यदि मैं इस संसारसे विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता॥ १२॥

नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम्।

किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम॥ १३॥

अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवं परिभविष्यति।

‘ओ पापपूर्ण विचार रखनेवाली पाषाणहृदया कैकेयि! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका विछोह क्यों करा रही है? अरी! ऐसा करनेसे निश्चय ही संसारमें तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है’॥ १३/

तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतस:॥ १४॥

अस्तमभ्यागमत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत।

इस प्रकार विलाप करते-करते राजा दशरथका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और प्रदोषकाल आ पहुँचा॥ १४/

सा त्रियामा तदार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता॥ १५॥

राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी।

वह तीन पहरोंवाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डलकी चारुचन्द्रिकासे आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथके लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी॥ १५/

सदैवोष्णं विनि:श्वस्य वृद्धो दशरथो नृप:॥ १६॥

विललापार्तवद् दु:खं गगनासक्तलोचन:।

बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छ्वास लेते हुए आकाशकी ओर दृष्टि लगाये आर्तकी भाँति दु:खपूर्ण विलाप करने लगे—॥ १६/

न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते॥ १६॥

क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलि:।

‘नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवि! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात-काल लाया जाय। मुझपर दया करो। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ॥

अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निर्घृणाम्॥ १८॥

नृशंसां केकयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं मम।

‘अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयीको अब मैं नहीं देखना चाहता’॥ १८/

एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलि:॥ १९॥

प्रसादयामास पुन: कैकेयीं राजधर्मवित्।

कैकेयीसे ऐसा कहकर राजधर्मके ज्ञाता राजा दशरथने पुन: हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करनेकी चेष्टा आरम्भ की—॥ १९/

साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्गतस्य गतायुष:॥ २०॥

प्रसाद: क्रियतां भद्रे देवि राज्ञो विशेषत:।

‘कल्याणमयी देवि! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु (मरणासन्न) और विशेषत: राजा है—ऐसे मुझ दशरथपर कृपा कर॥ २०/

शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम्॥ २१॥

कुरु साधुप्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि।

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली केकयनन्दिनि! मैंने जो यह श्रीरामको राज्य देनेकी बात कही है, वह किसी सूने घरमें नहीं, भरी सभामें घोषित की है, अत: बाले! तू बड़ी सहृदय है; इसलिये मुझपर भलीभाँति कृपा कर (जिससे सभासदोंद्वारा मेरा उपहास न हो)॥ २१/

प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम्॥ २२॥

लभतामसितापाङ्गे यश: परमवाप्स्यसि।

‘देवि! प्रसन्न हो जा। कजरारे नेत्रप्रान्तवाली प्रिये! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्यको प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यशकी प्राप्ति होगी॥ २२/

मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च।

प्रियमेतद् गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे॥ २३॥

‘पृथुल नितम्बवाली देवि! सुमुखि! सुलोचने! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीरामको, समस्त प्रजावर्गको, गुरुजनोंको तथा भरतको भी प्रिय होगा, अत: इसे पूर्ण कर’॥ २३॥

विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा

दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञ:।

श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं

भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम्॥ २४॥

राजाके हृदयका भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसूभरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभावसे विचित्र करुणाजनक विलाप कर रहे थे, किंतु मनमें दूषित विचार रखनेवाली निष्ठुर कैकेयीने पतिके उस विलापको सुनकर भी उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया॥ २४॥

तत: स राजा पुनरेव मूर्च्छित:

प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम्।

समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति

क्षितौ विसंज्ञो निपपात दु:खित:॥ २५॥

(इतनी अनुनय-विनयके बाद भी) जब प्रिया कैकेयी किसी तरह संतुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल बात ही मुँहसे निकालती गयी, तब पुत्रके वनवासकी बात सोचकर राजा पुन: दु:खके मारे मूर्च्छित हो गये और सुध-बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २५॥

इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा

जगाम घोरं श्वसतो मनस्विन:।

विबोध्यमान: प्रतिबोधनं तदा

निवारयामास स राजसत्तम:॥ २६॥

इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छ्वास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथकी वह रात धीरे-धीरे बीत गयी। प्रात:काल राजाको जगानेके लिये मनोहर वाद्योंके साथ मङ्गलगान होने लगा, परंतु उन राज-शिरोमणिने तत्काल मनाही भेजकर वह सब बंद करा दिया॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदश: सर्ग:॥ १३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥

 

चतुर्दश: सर्ग:

कैकेयीका राजाको सत्यपर दृढ़ रहनेके लिये प्रेरणा देकर अपने वरोंकी पूर्तिके लिये दुराग्रह दिखाना, महर्षि वसिष्ठका अन्त:पुरके द्वारपर आगमन और सुमन्त्रको महाराजके पास भेजना, राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीरामको बुलानेके लिये जाना

पुत्रशोकार्दितं पापा विसंज्ञं पतितं भुवि।

विचेष्टमानमुत्प्रेक्ष्य ऐक्ष्वाकमिदमब्रवीत्॥ १॥

इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोकसे पीडि़त हो पृथ्वीपर अचेत पड़े थे और वेदनासे छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली—॥ १॥

पापं कृत्वेव किमिदं मम संश्रुत्य संश्रवम्।

शेषे क्षितितले सन्न: स्थित्यां स्थातुं त्वमर्हसि॥ २॥

‘महाराज! आपने मुझे दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों, यह क्या बात है? आपको सत्पुरुषोंकी मर्यादामें स्थिर रहना चाहिये॥ २॥

आहु: सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जना:।

सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदित:॥ ३॥

‘धर्मज्ञ पुरुष सत्यको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्यका सहारा लेकर मैंने आपको धर्मका पालन करनेके लिये ही प्रेरित किया है॥ ३॥

संश्रुत्य शैब्य: श्येनाय स्वां तनुं जगतीपति:।

प्रदाय पक्षिणे राजा जगाम गतिमुत्तमाम्॥ ४॥

‘पृथ्वीपति राजा शैब्यने बाज पक्षीको अपना शरीर देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली॥ ४॥

तथा ह्यलर्कस्तेजस्वी ब्राह्मणे वेदपारगे।

याचमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ॥ ५॥

‘इसी प्रकार तेजस्वी राजा अलर्कने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणको उसके याचना करनेपर मनमें खेद न लाते हुए अपनी दोनों आँखें निकालकर दे दी थीं॥ ५॥

सरितां तु पति: स्वल्पां मर्यादां सत्यमन्वित:।

सत्यानुरोधात् समये वेलां स्वां नातिवर्तते॥ ६॥

‘सत्यको प्राप्त हुआ समुद्र सत्यका ही अनुसरण करनेके कारण पर्व आदिके समय भी अपनी छोटी-सी सीमातट—भूमिका भी उल्लङ्घन नहीं करता॥ ६॥

सत्यमेकपदं ब्रह्म सत्ये धर्म: प्रतिष्ठित:।

सत्यमेवाक्षया वेदा: सत्येनावाप्यते परम्॥ ७॥

‘सत्य ही प्रणवरूप शब्दब्रह्म है, सत्यमें ही धर्म प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्यसे ही परब्रह्मकी प्राप्ति होती है॥ ७॥

सत्यं समनुवर्तस्व यदि धर्मे धृता मति:।

स वर: सफलो मेऽस्तु वरदो ह्यसि सत्तम॥ ८॥

‘इसलिये यदि आपकी बुद्धि धर्ममें स्थित है तो सत्यका अनुसरण कीजिये। साधुशिरोमणे! मेरा माँगा हुआ वह वर सफल होना चाहिये; क्योंकि आप स्वयं ही उस वरके दाता हैं॥ ८॥

धर्मस्यैवाभिकामार्थं मम चैवाभिचोदनात्।

प्रव्राजय सुतं रामं त्रि: खलु त्वां ब्रवीम्यहम्॥ ९॥

‘धर्मके ही अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये तथा मेरी प्रेरणासे भी आप अपने पुत्र श्रीरामको घरसे निकाल दीजिये। मैं अपने इस कथनको तीन बार दुहराती हूँ॥

समयं च ममार्येमं यदि त्वं न करिष्यसि।

अग्रतस्ते परित्यक्ता परित्यक्ष्यामि जीवितम्॥ १०॥

‘आर्य! यदि मुझसे की हुई इस प्रतिज्ञाका आप पालन नहीं करेंगे तो मैं आपसे परित्यक्त (उपेक्षित) होकर आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी’॥ १०॥

एवं प्रचोदितो राजा कैकेय्या निर्विशङ्कया।

नाशकत् पाशमुन्मोक्तुं बलिरिन्द्रकृतं यथा॥ ११॥

इस प्रकार कैकेयीने जब नि:शङ्क होकर राजाको प्रेरित किया, तब वे उस सत्यरूपी बन्धनको वैसे ही नहीं खोल सके—उस बन्धनसे अपनेको उसी तरह नहीं मुक्त कर सके, जैसे राजा बलि इन्द्रप्रेरित वामनके पाशसे अपनेको मुक्त करनेमें असमर्थ हो गये थे॥ ११॥

उद्भ्रान्तहृदयश्चापि विवर्णवदनोऽभवत्।

स धुर्यो वै परिस्पन्दन् युगचक्रान्तरं यथा॥ १२॥

दो पहियोंके बीचमें फँसकर वहाँसे निकलनेकी चेष्टा करनेवाले गाड़ीके बैलकी भाँति उनका हृदय उद्भ्रान्त हो उठा था और उनके मुखकी कान्ति भी फीकी पड़ गयी थी॥ १२॥

विकलाभ्यां च नेत्राभ्यामपश्यन्निव भूमिप:।

कृच्छ्राद् धैर्येण संस्तभ्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ १३॥

अपने विकल नेत्रोंसे कुछ भी देखनेमें असमर्थ-से होकर भूपाल दशरथने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके अपने हृदयको सँभाला और कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १३॥

यस्ते मन्त्रकृत: पाणिरग्नौ पापे मया धृत:।

संत्यजामि स्वजं चैव तव पुत्रं सह त्वया॥ १४॥

‘पापिनि! मैंने अग्निके समीप ‘साङ्गुष्ठं ते गृभ्णामि सौभगत्वाय हस्तम्०’ इत्यादि वैदिक मन्त्रका पाठ करके तेरे जिस हाथको पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ। साथ ही तेरे और अपने द्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्रका भी त्याग करता हूँ॥ १४॥

प्रयाता रजनी देवि सूर्यस्योदयनं प्रति।

अभिषेकाय हि जनस्त्वरयिष्यति मां ध्रुवम्॥ १५॥

‘देवि! रात बीत गयी। सूर्योदय होते ही सब लोग निश्चय ही श्रीरामका राज्याभिषेक करनेके लिये मुझे शीघ्रता करनेको कहेंगे॥ १५॥

रामाभिषेकसम्भारैस्तदर्थमुपकल्पितै: ।

राम: कारयितव्यो मे मृतस्य सलिलक्रियाम्॥ १६॥

सपुत्रया त्वया नैव कर्तव्या सलिलक्रिया।

‘उस समय जो सामान श्रीरामके अभिषेकके लिये जुटाया गया है, उसके द्वारा मेरे मरनेके बाद श्रीरामके हाथसे मुझे जलाञ्जलि दिलवा देना; परंतु अपने पुत्रसहित तू मेरे लिये जलाञ्जलि न देना॥ १६/

व्याहन्तास्यशुभाचारे यदि रामाभिषेचनम्॥ १७॥

न शक्तोऽद्यास्म्यहं द्रष्टुं दृष्ट्वा पूर्वं तथामुखम्।

हतहर्षं तथानन्दं पुनर्जनमवाङ्मुखम्॥ १८॥

‘पापाचारिणि! यदि तू श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न डालेगी (तो तुझे मेरे लिये जलाञ्जलि देनेका कोई अधिकार न होगा)। मैं पहले श्रीरामके राज्याभिषेकके समाचारसे जो जन-समुदायका हर्षोल्लाससे परिपूर्ण उन्नत मुख देख चुका हूँ, वैसा देखनेके पश्चात् आज पुन: उसी जनताके हर्ष और आनन्दसे शून्य, नीचे लटके हुए मुखको मैं नहीं देख सकूँगा’॥ १७-१८॥

तां तथा ब्रुवतस्तस्य भूमिपस्य महात्मन:।

प्रभाता शर्वरी पुण्या चन्द्रनक्षत्रमालिनी॥ १९॥

महात्मा राजा दशरथके कैकेयीसे इस तरहकी बातें करते-करते ही चन्द्रमा और नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत वह पुण्यमयी रजनी बीत गयी और प्रभातकाल आ गया॥ १९॥

तत: पापसमाचारा कैकेयी पार्थिवं पुन:।

उवाच परुषं वाक्यं वाक्यज्ञा रोषमूर्च्छिता॥ २०॥

तदनन्तर बातचीतके मर्मको समझनेवाली पापाचारिणी कैकेयी रोषसे मूर्च्छित-सी होकर राजासे पुन: कठोर वाणीमें बोली—॥ २०॥

किमिदं भाषसे राजन् वाक्यं गररुजोपमम्।

आनाययितुमक्लिष्टं पुत्रं राममिहार्हसि॥ २१॥

स्थाप्य राज्ये मम सुतं कृत्वा रामं वनेचरम्।

नि:सपत्नां च मां कृत्वा कृतकृत्यो भविष्यसि॥ २२॥

‘राजन्! आप विष और शूल आदि रोगोंके समान कष्ट देनेवाले ऐसे वचन क्यों बोल रहे हैं (इन बातोंसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है)। आप बिना किसी क्लेशके अपने पुत्र श्रीरामको यहाँ बुलवाइये। मेरे पुत्रको राज्यपर प्रतिष्ठित कीजिये और श्रीरामको वनमें भेजकर मुझे निष्कण्टक बनाइये; तभी आप कृतकृत्य हो सकेंगे’॥ २१-२२॥

स तुन्न इव तीक्ष्णेन प्रतोदेन हयोत्तम:।

राजा प्रचोदितोऽभीक्ष्णं कैकेय्या वाक्यमब्रवीत्॥ २३॥

तीखे कोड़ेकी मारसे पीडि़त हुए उत्तम अश्वकी भाँति कैकेयीद्वारा बारंबार प्रेरित होनेपर व्यथित हुए राजा दशरथने इस प्रकार कहा—॥ २३॥

धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि नष्टा च मम चेतना।

ज्येष्ठं पुत्रं प्रियं रामं द्रष्टुमिच्छामि धार्मिकम्॥ २४॥

‘मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हुआ हूँ। मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है। इसलिये इस समय मैं अपने धर्मपरायण परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको देखना चाहता हूँ’॥ २४॥

तत: प्रभातां रजनीमुदिते च दिवाकरे।

पुण्ये नक्षत्रयोगे च मुहूर्ते च समागते॥ २५॥

वसिष्ठो गुणसम्पन्न: शिष्यै: परिवृतस्तथा।

उपगृह्याशु सम्भारान् प्रविवेश पुरोत्तमम्॥ २६॥

उधर जब रात बीती, प्रभात हुआ, सूर्यदेवका उदय हो गया और पुण्यनक्षत्रके योगमें अभिषेकका शुभ मुहूर्त आ पहुँचा, उस समय शिष्योंसे घिरे हुए शुभगुणसम्पन्न महर्षि वसिष्ठ अभिषेककी आवश्यक सामग्रियोंका संग्रह करके शीघ्रतापूर्वक उस श्रेष्ठ पुरीमें आये॥ २५-२६॥

सिक्तसम्मार्जितपथां पताकोत्तमभूषिताम्।

संहृष्टमनुजोपेतां समृद्धविपणापणाम्॥ २७॥

उस पुण्यवेलामें अयोध्याकी सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं और उनपर जलका छिड़काव हुआ था। सारी पुरी उत्तम पताकाओंसे सुशोभित थी। वहाँके सभी मनुष्य हर्ष और उत्साहसे भरे हुए थे। बाजार और दूकानें इस तरह सजी हुई थीं कि उनकी समृद्धि देखते ही बनती थी॥ २७॥

महोत्सवसमायुक्तां राघवार्थे समुत्सुकाम्।

चन्दनागुरुधूपैश्च सर्वत: परिधूमिताम्॥ २८॥

सब ओर महान् उत्सव हो रहा था। सारी नगरी श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकके लिये उत्सुक थी। चारों ओर चन्दन, अगर और धूपकी सुगन्ध व्याप्त हो रही थी॥ २८॥

तां पुरीं समतिक्रम्य पुरंदरपुरोपमाम्।

ददर्शान्त:पुरं श्रीमान् नानाध्वजगणायुतम्॥ २९॥

इन्द्रनगरी अमरावतीके समान शोभा पानेवाली उस पुरीको पार करके श्रीमान् वसिष्ठजीने राजा दशरथके अन्त:पुरका दर्शन किया। जहाँ सहस्रों ध्वजाएँ फहरा रही थीं॥ २९॥

पौरजानपदाकीर्णं ब्राह्मणैरुपशोभितम्।

यष्टिमद्भि: सुसम्पूर्णं सदश्वै: परमार्चितै:॥ ३०॥

नगर और जनपदके लोग वहाँ भरे हुए थे। बहुत-से ब्राह्मण उस स्थानकी शोभा बढ़ाते थे। छड़ीदार राजसेवक तथा सजे-सजाये सुन्दर घोड़े वहाँ अधिक संख्यामें उपस्थित थे॥ ३०॥

तदन्त:पुरमासाद्य व्यतिचक्राम तं जनम्।

वसिष्ठ: परमप्रीत: परमर्षिभिरावृत:॥ ३१॥

श्रेष्ठ महर्षियोंसे घिरे हुए वसिष्ठजी परम प्रसन्न हो उस अन्त:पुरमें पहुँचकर उस जन-समुदायको लाँघकर आगे बढ़ गये॥ ३१॥

स त्वपश्यद् विनिष्क्रान्तं सुमन्त्रं नाम सारथिम्।

द्वारे मनुजसिंहस्य सचिवं प्रियदर्शनम्॥ ३२॥

वहाँ उन्होंने महाराजके सुन्दर सचिव तथा सारथि सुमन्त्रको अन्त:पुरके द्वारपर उपस्थित देखा, जो उसी समय भीतरसे निकले थे॥ ३२॥

तमुवाच महातेजा: सूतपुत्रं विशारदम्।

वसिष्ठ: क्षिप्रमाचक्ष्व नृपतेर्मामिहागतम्॥ ३३॥

तब महातेजस्वी वसिष्ठने परम चतुर सूतपुत्र सुमन्त्रसे कहा—‘सूत! तुम महाराजको शीघ्र ही मेरे आगमनकी सूचना दो॥ ३३॥

इमे गङ्गोदकघटा: सागरेभ्यश्च काञ्चना:।

औदुम्बरं भद्रपीठमभिषेकार्थमाहृतम्॥ ३४॥

‘(उन्हें बताओ कि श्रीरामके राज्याभिषेकके लिये सारी सामग्री एकत्र कर ली गयी है) ये गङ्गाजलसे भरे कलश रखे हैं, इन सोनेके कलशोंमें समुद्रोंसे लाया हुआ जल भरा हुआ है। यह गूलरकी लकड़ीका बना हुआ भद्रपीठ है, जो अभिषेकके लिये लाया गया है (इसीपर बिठाकर श्रीरामका अभिषेक होगा)॥ ३४॥

सर्वबीजानि गन्धाश्च रत्नानि विविधानि च।

क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भा: सुमनस: पय:॥ ३५॥

अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारण:।

चतुरश्वो रथ: श्रीमान् निस्त्रिंशो धनुरुत्तमम्॥ ३६॥

वाहनं नरसंयुक्तं छत्रं च शशिसंनिभम्।

श्वेते च वालव्यजने भृङ्गारं च हिरण्मयम्॥ ३७॥

हेमदामपिनद्धश्च ककुद्मान् पाण्डुरो वृष:।

केसरी च चतुर्दंष्ट्रो हरिश्रेष्ठो महाबल:॥ ३८॥

सिंहासनं व्याघ्रतनु: समिधश्च हुताशन:।

सर्वे वादित्रसङ्घाश्च वेश्याश्चालंकृता: स्त्रिय:॥ ३९॥

आचार्या ब्राह्मणा गाव: पुण्याश्च मृगपक्षिण:।

पौरजानपदश्रेष्ठा नैगमाश्च गणै: सह॥ ४०॥

एते चान्ये च बहव: प्रीयमाणा: प्रियंवदा:।

अभिषेकाय रामस्य सह तिष्ठन्ति पार्थिवै:॥ ४१॥

‘सब प्रकारके बीज, गन्ध, भाँति-भाँतिके रत्न, मधु, दही, घी, लावा या खील, कुश, फूल, दूध, आठ सुन्दरी कन्याएँ, मत्त गजराज, चार घोड़ोंवाला रथ, चमचमाता हुआ खड्ग, उत्तम धनुष, मनुष्योंद्वारा ढोयी जानेवाली सवारी (पालकी आदि), चन्द्रमाके समान श्वेत छत्र, सफेद चँवर, सोनेकी झारी, सुवर्णकी मालासे अलंकृत ऊँचे डीलवाला श्वेत पीतवर्णका वृषभ, चार दाढ़ोंवाला सिंह, महाबलवान् उत्तम अश्व, सिंहासन, व्याघ्रचर्म, समिधाएँ, अग्नि, सब प्रकारके बाजे, वाराङ्गनाएँ, शृङ्गारयुक्त सौभाग्यवती स्त्रियाँ, आचार्य, ब्राह्मण, गौ, पवित्र पशु-पक्षी, नगर और जनपदके श्रेष्ठ पुरुष अपने सेवक-गणोंसहित प्रसिद्ध-प्रसिद्ध व्यापारी—ये तथा और भी बहुत-से प्रियवादी मनुष्य बहुसंख्यक राजाओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामके अभिषेकके लिये यहाँ उपस्थित हैं॥ ३५—४१॥

त्वरयस्व महाराजं यथा समुदितेऽहनि।

पुष्ये नक्षत्रयोगे च रामो राज्यमवाप्नुयात्॥ ४२॥

‘तुम महाराजसे शीघ्रता करनेके लिये कहो, जिससे अब सूर्योदयके पश्चात् पुष्यनक्षत्रके योगमें श्रीराम राज्य प्राप्त कर लें’॥ ४२॥

इति तस्य वच: श्रुत्वा सूतपुत्रो महाबल:।

स्तुवन् नृपतिशार्दूलं प्रविवेश निवेशनम्॥ ४३॥

वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर महाबली सूतपुत्र सुमन्त्रने राजसिंह दशरथकी स्तुति करते हुए उनके भवनमें प्रवेश किया॥ ४३॥

तं तु पूर्वोदितं वृद्धं द्वारस्था राजसम्मता:।

न शेकुरभिसंरोद्धुं राज्ञ: प्रियचिकीर्षव:॥ ४४॥

राजाका प्रिय करनेकी इच्छा रखनेवाले और उनके द्वारा सम्मानित द्वारपाल उन बूढ़े सचिवको भीतर जानेसे रोक न सके; क्योंकि उनके लिये पहलेसे ही महाराजकी आज्ञा थी कि ये किसी समय भी भीतर आनेसे रोके न जायँ॥ ४४॥

स समीपस्थितो राज्ञस्तामवस्थामजज्ञिवान्।

वाग्भि: परमतुष्टाभिरभिष्टोतुं प्रचक्रमे॥ ४५॥

सुमन्त्र राजाके पास जाकर खड़े हो गये। उन्हें उनकी उस अवस्थाका पता नहीं था; इसलिये वे अत्यन्त संतोषदायक वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करनेको उद्यत हुए॥ ४५॥

तत: सूतो यथापूर्वं पार्थिवस्य निवेशने।

सुमन्त्र: प्राञ्जलिर्भूत्वा तुष्टाव जगतीपतिम्॥ ४६॥

सूत सुमन्त्र राजाके उस महलमें पहलेकी ही भाँति हाथ जोड़कर उन महाराजकी स्तुति करने लगे—॥ ४६॥

यथा नन्दति तेजस्वी सागरो भास्करोदये।

प्रीत: प्रीतेन मनसा तथा नन्दय नस्तत:॥ ४७॥

‘महाराज! जैसे सूर्योदय होनेपर तेजस्वी समुद्र स्वयं हर्षकी तरंगोंसे उल्लसित हो उसमें स्नानकी इच्छावाले मनुष्योंको आनन्दित करता है, उसी प्रकार आप स्वयं प्रसन्न हो प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे हम सेवकोंको आनन्द प्रदान कीजिये॥ ४७॥

इन्द्रमस्यां तु वेलायामभितुष्टाव मातलि:।

सोऽजयद् दानवान् सर्वांस्तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ४८॥

‘देवसारथि मातलिने इसी बेलामें देवराज इन्द्रकी स्तुति की थी, जिससे उन्होंने समस्त दानवोंपर विजय प्राप्त कर ली, उसी प्रकार मैं भी स्तुति-वचनोंद्वारा आपको जगा रहा हूँ॥ ४८॥

वेदा: सहाङ्गा विद्याश्च यथा ह्यात्मभुवं प्रभुम्।

ब्रह्माणं बोधयन्त्यद्य तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ४९॥

‘छहों अङ्गोंसहित चारों वेद तथा समस्त विद्याएँ जैसे स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको जगाती हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ॥ ४९॥

आदित्य: सह चन्द्रेण यथा भूतधरां शुभाम्।

बोधयत्यद्य पृथिवीं तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ५०॥

‘जैसे चन्द्रमाके साथ सूर्य समस्त भूतोंकी आधारभूता इस शुभ-स्वरूपा पृथ्वीको जगाया करते हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ॥ ५०॥

उत्तिष्ठ सुमहाराज कृतकौतुकमङ्गल:।

विराजमानो वपुषा मेरोरिव दिवाकर:॥ ५१॥

‘महाराज! उठिये और उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित शरीरसे सिंहासनपर विराजमान होइये। फिर मेरु पर्वतसे ऊपर उठनेवाले सूर्यदेवके समान आपकी शोभा होती रहे॥ ५१॥

सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि।

वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्तु ते॥ ५२॥

‘ककुत्स्थ-कुलनन्दन! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें॥ ५२॥

गता भगवती रात्रि: कृतं कृत्यमिदं तव।

बुध्यस्व नृपशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम्॥ ५३॥

‘राजसिंह! भगवती रात्रिदेवी विदा हो गयीं। आपने जिसके लिये आज्ञा दी थी, आपका वह सारा कार्य पूर्ण हो गया। इस बातको आप जान लें और इसके बाद जो अभिषेकका कार्य शेष है, उसे पूर्ण करें॥ ५३॥

उदतिष्ठत रामस्य समग्रमभिषेचनम्।

पौरजानपदाश्चापि नैगमश्च कृताञ्जलि:॥ ५४॥

‘श्रीरामके अभिषेककी सारी तैयारी हो चुकी है। नगर और जनपदके लोग तथा मुख्य-मुख्य व्यापारी भी हाथ जोड़े हुए उपस्थित हैं॥ ५४॥

स्वयं वसिष्ठो भगवान् ब्राह्मणै: सह तिष्ठति।

क्षिप्रमाज्ञाप्यतां राजन् राघवस्याभिषेचनम्॥ ५५॥

‘राजन्! ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ब्राह्मणोंके साथ द्वारपर खड़े हैं; अत: श्रीरामके अभिषेकका कार्य आरम्भ करनेके लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये॥ ५५॥

यथा ह्यपाला: पशवो यथा सेना ह्यनायका।

यथा चन्द्रं विना रात्रिर्यथा गावो विना वृषम्॥ ५६॥

एवं हि भविता राष्ट्रं यत्र राजा न दृश्यते।

‘जैसे चरवाहोंके बिना पशु, सेनापतिके बिना सेना, चन्द्रमाके बिना रात्रि और साँड़के बिना गौओंकी शोभा नहीं होती, ऐसी ही दशा उस राष्ट्रकी हो जाती है, जहाँ राजाका दर्शन नहीं होता है’॥ ५६/

एवं तस्य वच: श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमिवार्थवत्॥ ५७॥

अभ्यकीर्यत शोकेन भूय एव महीपति:।

सुमन्त्रके इस प्रकार कहे हुए सान्त्वनापूर्ण और सार्थक वचनको सुनकर राजा दशरथ पुन: शोकसे ग्रस्त हो गये॥ ५७/

ततस्तु राजा तं सूतं सन्नहर्ष: सुतं प्रति॥ ५८॥

शोकरक्तेक्षण: श्रीमानुद्वीक्ष्योवाच धार्मिक:।

वाक्यैस्तु खलु मर्माणि मम भूयो निकृन्तसि॥ ५९॥

उस समय पुत्रके वियोगकी सम्भावनासे उनकी प्रसन्नता नष्ट हो चुकी थी। शोकके कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। उन धर्मात्मा श्रीमान् नरेशने एक बार दृष्टि उठाकर सूतकी ओर देखा और इस प्रकार कहा—‘तुम ऐसी बातें सुनाकर मेरे मर्म-स्थानोंपर और अधिक आघात क्यों कर रहे हो’॥ ५८-५९॥

सुमन्त्र: करुणं श्रुत्वा दृष्ट्वा दीनं च पार्थिवम्।

प्रगृहीताञ्जलि: किंचित् तस्माद् देशादपाक्रमत्॥ ६०॥

राजाके ये करुण वचन सुनकर और उनकी दीन दशापर दृष्टिपात करके सुमन्त्र हाथ जोड़े हुए उस स्थानसे कुछ पीछे हट गये॥ ६०॥

यदा वक्तुं स्वयं दैन्यान्न शशाक महीपति:।

तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह॥ ६१॥

जब दु:ख और दीनताके कारण राजा स्वयं कुछ भी न कह सके, तब मन्त्रणाका ज्ञान रखनेवाली कैकेयीने सुमन्त्रको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ६१॥

सुमन्त्र राजा रजनीं रामहर्षसमुत्सुक:।

प्रजागरपरिश्रान्तो निद्रावशमुपागत:॥ ६२॥

‘सुमन्त्र! राजा रातभर श्रीरामके राज्याभिषेकजनित हर्षके कारण उत्कण्ठित होकर जागते रहे हैं। अधिक जागरणसे थक जानेके कारण इस समय इन्हें नींद आ गयी है॥ ६२॥

तद् गच्छ त्वरितं सूत राजपुत्रं यशस्विनम्।

राममानय भद्रं ते नात्र कार्या विचारणा॥ ६३॥

‘अत: सूत! तुम्हारा भला हो। तुम तुरंत जाओ और यशस्वी राजकुमार श्रीरामको यहाँ बुला लाओ। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’॥ ६३॥

अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि।

तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत्॥ ६४॥

तब सुमन्त्रने कहा—‘भामिनि! मैं महाराजकी आज्ञा सुने बिना कैसे जा सकता हूँ?’ मन्त्रीकी बात सुनकर राजाने उनसे कहा—॥ ६४॥

सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम्।

स मन्यमान: कल्याणं हृदयेन ननन्द च॥ ६५॥

‘सुमन्त्र! मैं सुन्दर श्रीरामको देखना चाहता हूँ। तुम शीघ्र उन्हें यहाँ ले आओ।’ उस समय श्रीरामके दर्शनसे ही कल्याण मानते हुए राजा मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करने लगे॥ ६५॥

निर्जगाम च स प्रीत्या त्वरितो राजशासनात्।

सुमन्त्रश्चिन्तयामास त्वरितं चोदितस्तया॥ ६६॥

इधर सुमन्त्र राजाकी आज्ञासे तुरंत प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे चल दिये। कैकेयीने जो तुरंत श्रीरामको बुला लानेकी आज्ञा दी थी, उसे याद करके वे सोचने लगे— ‘पता नहीं, यह उन्हें बुलानेके लिये इतनी जल्दी क्यों मचा रही है?॥ ६६॥

व्यक्तं रामाभिषेकार्थे इहायास्यति धर्मराट्।

इति सूतो मतिं कृत्वा हर्षेण महता पुन:॥ ६७॥

निर्जगाम महातेजा राघवस्य दिदृक्षया।

सागरहृदसंकाशात्सुमन्त्रोऽन्त:पुराच्छुभात् ।

निष्क्रम्य जनसम्बाधं ददर्श द्वारमग्रत:॥ ६८॥

‘जान पड़ता है, श्रीरामचन्द्रके अभिषेकके लिये ही यह जल्दी कर रही है। इस कार्यमें धर्मराज राजा दशरथको अधिक आयास करना पड़ता है (शायद इसीलिये ये बाहर नहीं निकलते)।’ ऐसा निश्चय करके महातेजस्वी सूत सुमन्त्र फिर बड़े हर्षके साथ श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे चल पड़े। समुद्रके अन्तर्वर्ती जलाशयके समान उस सुन्दर अन्त:पुरसे निकलकर सुमन्त्रने द्वारके सामने मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई देखी॥ ६७-६८॥

तत: पुरस्तात् सहसा विनि:सृतो

महीपतेर्द्वारगतान् विलोकयन्।

ददर्श पौरान् विविधान् महाधना-

नुपस्थितान् द्वारमुपेत्य विष्ठितान्॥ ६९॥

राजाके अन्त:पुरसे सहसा निकलकर सुमन्त्रने द्वारपर एकत्र हुए लोगोंकी ओर दृष्टिपात किया। उन्होंने देखा, बहुसंख्यक पुरवासी वहाँ उपस्थित थे और अनेकानेक महाधनी पुरुष राजद्वारपर आकर खड़े थे॥ ६९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुदर्श: सर्ग:॥ १४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥

पञ्चदश: सर्ग:

सुमन्त्रका राजाकी आज्ञासे श्रीरामको बुलानेके लिये उनके महलमें जाना

ते तु तां रजनीमुष्य ब्राह्मणा वेदपारगा:।

उपतस्थुरुपस्थानं सह राजपुरोहिता:॥ १॥

वे वेदोंके पारङ्गत ब्राह्मण तथा राजपुरोहित वह रात बिताकर प्रात:काल (राजाकी प्रेरणाके अनुसार) राजद्वारपर उपस्थित हुए थे॥ १॥

अमात्या बलमुख्याश्च मुख्या ये निगमस्य च।

राघवस्याभिषेकार्थे प्रीयमाणा: सुसंगता:॥ २॥

मन्त्री, सेनाके मुख्य-मुख्य अधिकारी और बड़े-बड़े सेठ-साहूकार श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ एकत्र हुए थे॥ २॥

उदिते विमले सूर्ये पुष्ये चाभ्यागतेऽहनि।

लग्ने कर्कटके प्राप्ते जन्म रामस्य च स्थिते॥ ३॥

अभिषेकाय रामस्य द्विजेन्द्रैरुपकल्पितम्।

काञ्चना जलकुम्भाश्च भद्रपीठं स्वलंकृतम्॥ ४॥

रथश्च सम्यगास्तीर्णो भास्वता व्याघ्रचर्मणा।

गङ्गायमुनयो: पुण्यात् संगमादाहृतं जलम्॥ ५॥

निर्मल सूर्योदय होनेपर दिनमें जब पुष्यनक्षत्रका योग आया तथा श्रीरामके जन्मका कर्क लग्न उपस्थित हुआ, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने श्रीरामके अभिषेकके लिये सारी सामग्री एकत्र करके उसे जँचाकर रख दिया। जलसे भरे हुए सोनेके कलश, भलीभाँति सजाया हुआ भद्रपीठ, चमकीले व्याघ्रचर्मसे अच्छी तरह आवृत रथ, गङ्गा-यमुनाके पवित्र सङ्गमसे लाया हुआ जल—ये सब वस्तुएँ एकत्र कर ली गयी थीं॥ ३—५॥

याश्चान्या: सरित: पुण्या हृदा: कूपा: सरांसि च।

प्राग्वहाश्चोर्ध्ववाहाश्च तिर्यग्वाहाश्च क्षीरिण:॥ ६॥

ताभ्यश्चैवाहृतं तोयं समुद्रेभ्यश्च सर्वश:।

क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भा: सुमनस: पय:॥ ७॥

अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारण:।

सजला: क्षीरिभिश्छन्ना घटा: काञ्चनराजता:॥ ८॥

पद्मोत्पलयुता भान्ति पूर्णा: परमवारिणा।

इनके सिवा जो अन्य नदियाँ, पवित्र जलाशय, कूप और सरोवर हैं तथा जो पूर्वकी ओर बहनेवाली (गोदावरी और कावेरी आदि) नदियाँ हैं, ऊपरकी ओर प्रवाहवाले जो (ब्रह्मावर्त आदि) सरोवर हैं तथा दक्षिण और उत्तरकी ओर बहनेवाली जो (गण्डकी एवं शोणभद्र आदि) नदियाँ हैं, जिनमें दूधके समान निर्मल जल भरा रहता है, उन सबसे और समस्त समुद्रोंसे भी लाया हुआ जल वहाँ संग्रह करके रखा गया था। इनके अतिरिक्त दूध, दही, घी, मधु, लावा, कुश, फूल, आठ सुन्दर कन्याएँ, मदमत्त गजराज और दूधवाले वृक्षोंके पल्लवोंसे ढके हुए सोने-चाँदीके जलपूर्ण कलश भी वहाँ विराजमान थे, जो उत्तम जलसे भरे होनेके साथ ही पद्म और उत्पलोंसे संयुक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ६—८/

चन्द्रांशुविकचप्रख्यं पाण्डुरं रत्नभूषितम्॥ ९॥

सज्जं तिष्ठति रामस्य वालव्यजनमुत्तमम्।

श्रीरामके लिये चन्द्रमाकी किरणोंके समान विकसित कान्तिसे युक्त श्वेत, पीतवर्णका रत्नजटित उत्तम चँवर सुसज्जितरूपसे रखा हुआ था॥ ९/

चन्द्रमण्डलसंकाशमातपत्रं च पाण्डुरम्॥ १०॥

सज्जं द्युतिकरं श्रीमदभिषेकपुरस्सरम्।

चन्द्रमण्डलके समान सुसज्जित श्वेत छत्र भी अभिषेक-सामग्रीके साथ शोभा पा रहा था, जो परम सुन्दर और प्रकाश फैलानेवाला था॥ १०/

पाण्डुरश्च वृष: सज्ज: पाण्डुराश्वश्च संस्थित:॥ ११॥

सुसज्जित श्वेत वृषभ और श्वेत अश्व भी खड़े थे॥ ११॥

वादित्राणि च सर्वाणि वन्दिनश्च तथापरे।

इक्ष्वाकूणां यथा राज्ये सम्भ्रियेताभिषेचनम्॥ १२॥

तथाजातीयमादाय राजपुत्राभिषेचनम्।

ते राजवचनात् तत्र समवेता महीपतिम्॥ १३॥

सब प्रकारके बाजे मौजूद थे। स्तुति-पाठ करनेवाले वन्दी तथा अन्य मागध आदि भी उपस्थित थे। इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके राज्यमें जैसी अभिषेक-सामग्रीका संग्रह होना चाहिये, राजकुमारके अभिषेककी वैसी ही सामग्री साथ लेकर वे सब लोग महाराज दशरथकी आज्ञाके अनुसार वहाँ उनके दर्शनके लिये एकत्र हुए थे॥ १२-१३॥

अपश्यन्तोऽब्रुवन् को नु राज्ञो न: प्रतिवेदयेत्।

न पश्यामश्च राजानमुदितश्च दिवाकर:॥ १४॥

यौवराज्याभिषेकश्च सज्जो रामस्य धीमत:।

राजाको द्वारपर न देखकर वे कहने लगे—‘कौन महाराजके पास जाकर हमारे आगमनकी सूचना देगा। हम महाराजको यहाँ नहीं देखते हैं। सूर्योदय हो गया है और बुद्धिमान् श्रीरामके यौवराज्याभिषेककी सारी सामग्री जुट गयी है’॥ १४/

इति तेषु ब्रुवाणेषु सर्वांस्तांश्च महीपतीन्॥ १५॥

अब्रवीत् तानिदं वाक्यं सुमन्त्रो राजसत्कृत:।

वे सब लोग जब इस प्रकारकी बातें कर रहे थे, उसी समय राजाद्वारा सम्मानित सुमन्त्रने वहाँ खड़े हुए उन समस्त भूपतियोंसे यह बात कही—॥ १५/

रामं राज्ञो नियोगेन त्वरया प्रस्थितो ह्यहम्॥ १६॥

पूज्या राज्ञो भवन्तश्च रामस्य तु विशेषत:।

अयं पृच्छामि वचनात् सुखमायुष्मतामहम्॥ १७॥

‘मैं महाराजकी आज्ञासे श्रीरामको बुलानेके लिये तुरंत जा रहा हूँ। आप सब लोग महाराजके तथा विशेषत: श्रीरामचन्द्रजीके पूजनीय हैं। मैं उन्हींकी ओरसे आप समस्त चिरंजीवी पुरुषोंके कुशल-समाचार पूछ रहा हूँ। आपलोग सुखसे हैं न?’॥ १६-१७॥

राज्ञ: सम्प्रतिबुद्धस्य चानागमनकारणम्।

इत्युक्त्वान्त:पुरद्वारमाजगाम पुराणवित्॥ १८॥

ऐसा कहकर और जगे हुए होनेपर श्रीमहाराजके बाहर न आनेका कारण बताकर पुरातन वृत्तान्तोंको जाननेवाले सुमन्त्र पुन: अन्त:पुरके द्वारपर लौट आये॥ १८॥

सदा सक्तं च तद् वेश्म सुमन्त्र: प्रविवेश ह।

तुष्टावास्य तदा वंशं प्रविश्य स विशाम्पते:॥ १९॥

वह राजभवन सुमन्त्रके लिये सदा खुला रहता था। उन्होंने भीतर प्रवेश किया और प्रवेश करके महाराजके वंशकी स्तुति की॥ १९॥

शयनीयं नरेन्द्रस्य तदासाद्य व्यतिष्ठत।

सोऽत्यासाद्य तु तद् वेश्म तिरस्करणिमन्तरा॥ २०॥

आशीर्भिर्गुणयुक्ताभिरभितुष्टाव राघवम्।

तदनन्तर वे राजाके शयनगृहके पास जाकर खड़े हो गये। उस घरके अत्यन्त निकट पहुँचकर जहाँ बीचमें केवल चिकका अन्तर रह गया था, खड़े हो वे गुणवर्णनपूर्वक आशीर्वादसूचक वचनोंद्वारा रघुकुलनरेशकी स्तुति करने लगे—॥ २०/

सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि॥ २१॥

वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्तु ते।

‘ककुत्स्थनन्दन! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें॥ २१/

गता भगवती रात्रिरह: शिवमुपस्थितम्॥ २२॥

बुद्ध्यस्व राजशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम्।

‘भगवती रात्रि विदा हो गयी। अब कल्याणस्वरूप दिन उपस्थित हुआ है। राजसिंह! निद्रा त्यागकर जग जाइये और अब जो कार्य प्राप्त है, उसे कीजिये॥ २२/

ब्राह्मणा बलमुख्याश्च नैगमाश्चागतास्त्विह॥ २३॥

दर्शनं तेऽभिकांक्षन्ते प्रतिबुद्ध्यस्व राघव।

‘ब्राह्मण, सेनाके मुख्य अधिकारी और बड़े-बड़े सेठ-साहूकार यहाँ आ गये हैं। वे सब लोग आपका दर्शन चाहते हैं। रघुनन्दन! जागिये’॥ २३/

स्तुवन्तं तं तदा सूतं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्॥ २४॥

प्रतिबुद्ध्य ततो राजा इदं वचनमब्रवीत्।

मन्त्रणा करनेमें कुशल सूत सुमन्त्र जब इस प्रकार स्तुति करने लगे, तब राजाने जागकर उनसे यह बात कही—॥ २४/

राममानय सूतेति यदस्यभिहितो मया॥ २५॥

किमिदं कारणं येन ममाज्ञा प्रतिवाह्यते।

न चैव सम्प्रसुप्तोऽहमानयेहाशु राघवम्॥ २६॥

‘सूत! श्रीरामको बुला लाओ’—यह जो मैंने तुमसे कहा था, उसका पालन क्यों नहीं हुआ? ऐसा कौन-सा कारण है, जिससे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया जा रहा है? मैं सोया नहीं हूँ। तुम श्रीरामको शीघ्र यहाँ बुला लाओ’॥

इति राजा दशरथ: सूतं तत्रान्वशात् पुन:।

स राजवचनं श्रुत्वा शिरसा प्रतिपूज्य तम्॥ २७॥

निर्जगाम नृपावासान्मन्यमान: प्रियं महत्।

प्रपन्नो राजमार्गं च पताकाध्वजशोभितम्॥ २८॥

इस प्रकार राजा दशरथने जब सूतको फिर उपदेश दिया, तब वे राजाकी वह आज्ञा सुनकर सिर झुकाकर उसका सम्मान करते हुए राजभवनसे बाहर निकल गये। वे मन-ही-मन अपना महान् प्रिय हुआ मानने लगे। राजभवनसे निकलकर सुमन्त्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राजमार्गपर आ गये॥ २७-२८॥

हृष्ट: प्रमुदित: सूतो जगामाशु विलोकयन्।

स सूतस्तत्र शुश्राव रामाधिकरणा: कथा:॥ २९॥

अभिषेचनसंयुक्ता: सर्वलोकस्य हृष्टवत्।

वे हर्ष और उल्लासमें भरकर सब ओर दृष्टि डालते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ने लगे। सूत सुमन्त्र वहाँ मार्गमें सब लोगोंके मुँहसे श्रीरामके राज्याभिषेककी आनन्ददायिनी बातें सुनते जा रहे थे॥ २९/

ततो ददर्श रुचिरं कैलाससदृशप्रभम्॥ ३०॥

रामवेश्म सुमन्त्रस्तु शक्रवेश्मसमप्रभम्।

महाकपाटपिहितं वितर्दिशतशोभितम्॥ ३१॥

तदनन्तर सुमन्त्रको श्रीरामका सुन्दर भवन दिखायी दिया, जो कैलासपर्वतके समान श्वेत प्रभासे प्रकाशित हो रहा था। वह इन्द्रभवनके समान दीप्तिमान् था। उसका फाटक विशाल किवाड़ोंसे बंद था (उसके भीतरका छोटा-सा द्वार ही खुला हुआ था)। सैकड़ों वेदिकाएँ उस भवनकी शोभा बढ़ा रही थीं॥ ३०-३१॥

काञ्चनप्रतिमैकाग्रं मणिविद्रुमतोरणम्।

शारदाभ्रघनप्रख्यं दीप्तं मेरुगुहासमम्॥ ३२॥

उसका मुख्य अग्रभाग सोनेकी देव-प्रतिमाओंसे अलंकृत था। उसके बाहर फाटकमें मणि और मूँगे जड़े हुए थे। वह सारा भवन शरद् ऋतुके बादलोंकी भाँति श्वेत कान्तिसे युक्त, दीप्तिमान् और मेरुपर्वतकी कन्दराके समान शोभायमान था॥ ३२॥

मणिभिर्वरमाल्यानां सुमहद्भिरलंकृतम्।

मुक्तामणिभिराकीर्णं चन्दनागुरुभूषितम्॥ ३३॥

सुवर्णनिर्मित पुष्पोंकी मालाओंके बीच-बीचमें पिरोयी हुई बहुमूल्य मणियोंसे वह भवन सजा हुआ था। दीवारोंमें जड़ी हुई मुक्तामणियोंसे व्याप्त होकर जगमगा रहा था (अथवा वहाँ मोती और मणियोंके भण्डार भरे हुए थे)। चन्दन और अगरकी सुगन्ध उसकी शोभा बढ़ा रही थी॥ ३३॥

गन्धान् मनोज्ञान् विसृजद् दार्दुरं शिखरं यथा।

सारसैश्च मयूरैश्च विनदद्भिर्विराजितम्॥ ३४॥

वह भवन मलयाचलके समीपवर्ती दर्दुर नामक चन्दनगिरिके शिखरकी भाँति सब ओर मनोहर सुगन्ध बिखेर रहा था। कलरव करते हुए सारस और मयूर आदि पक्षी उसकी शोभावृद्धि कर रहे थे॥ ३४॥

सुकृतेहामृगाकीर्णमुत्कीर्णं भक्तिभिस्तथा।

मनश्चक्षुश्च भूतानामाददत् तिग्मतेजसा॥ ३५॥

सोने आदिकी सुन्दर ढंगसे बनी हुई भेडि़योंकी मूर्तियोंसे वह व्याप्त था। शिल्पियोंने उसकी दीवारोंमें बड़ी सुन्दर नक्काशी की थी। वह अपनी उत्कृष्ट शोभासे समस्त प्राणियोंके मन और नेत्रोंको आकृष्ट कर लेता था॥ ३५॥

चन्द्रभास्करसंकाशं कुबेरभवनोपमम्।

महेन्द्रधामप्रतिमं नानापक्षिसमाकुलम्॥ ३६॥

चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी, कुबेर-भवनके समान अक्षय सम्पत्तिसे पूर्ण तथा इन्द्रधामके समान भव्य एवं मनोरम उस श्रीरामभवनमें नाना प्रकारके पक्षी चहक रहे थे॥ ३६॥

मेरुशृङ्गसमं सूतो रामवेश्म ददर्श ह।

उपस्थितै: समाकीर्णं जनैरञ्जलिकारिभि:॥ ३७॥

सुमन्त्रने देखा—श्रीरामका महल मेरु-पर्वतके शिखरकी भाँति शोभा पा रहा है। हाथ जोड़कर श्रीरामकी वन्दना करनेके लिये उपस्थित हुए असंख्य मनुष्योंसे वह भरा हुआ है॥ ३७॥

उपादाय समाक्रान्तैस्तदा जानपदैर्जनै:।

रामाभिषेकसुमुखैरुन्मुखै: समलंकृतम्॥ ३८॥

भाँति-भाँतिके उपहार लेकर जनपद-निवासी मनुष्य उस समय वहाँ पहुँचे हुए थे। श्रीरामके अभिषेकका समाचार सुनकर उनके मुख प्रसन्नतासे खिल उठे थे। वे उस उत्सवको देखनेके लिये उत्कण्ठित थे। उन सबकी उपस्थितिसे भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी॥

महामेघसमप्रख्यमुदग्रं सुविराजितम्।

नानारत्नसमाकीर्णं कुब्जकैरपि चावृतम्॥ ३९॥

वह विशाल राजभवन महान् मेघखण्डके समान ऊँचा और सुन्दर शोभासे सम्पन्न था। उसकी दीवारोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे और कुबड़े सेवकोंसे वह भरा हुआ था॥ ३९॥

स वाजियुक्तेन रथेन सारथि:

समाकुलं राजकुलं विराजयन्।

वरूथिना राजगृहाभिपातिना

पुरस्य सर्वस्य मनांसि हर्षयन्॥ ४०॥

सारथि सुमन्त्र राजभवनकी ओर जानेवाले वरूथ (लोहेकी चद्दर या सींकचोंके बने हुए आवरण) से युक्त तथा अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा मनुष्योंकी भीड़से भरे राजमार्गकी शोभा बढ़ाते तथा समस्त नगर-निवासियोंके मनको आनन्द प्रदान करते हुए श्रीरामके भवनके पास जा पहुँचे॥ ४०॥

तत: समासाद्य महाधनं महत्

प्रहृष्टरोमा स बभूव सारथि:।

मृगैर्मयूरैश्च समाकुलोल्बणं

गृहं वरार्हस्य शचीपतेरिव॥ ४१॥

उत्तम वस्तुको प्राप्त करनेके अधिकारी श्रीरामका वह महान् समृद्धिशाली विशाल भवन शचीपति इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होता था। इधर-उधर फैले हुए मृगों और मयूरोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वहाँ पहुँचकर सारथि सुमन्त्रके शरीरमें अधिक हर्षके कारण रोमाञ्च हो आया॥ ४१॥

स तत्र कैलासनिभा: स्वलंकृता:

प्रविश्य कक्ष्यास्त्रिदशालयोपमा:।

प्रियान् वरान् राममते स्थितान् बहून्

व्यपोह्य शुद्धान्तमुपस्थितौ रथी॥ ४२॥

वहाँ कैलास और स्वर्गके समान दिव्य शोभासे युक्त, सुन्दर सजी हुई अनेक ड्यौढि़योंको लाँघकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञामें चलनेवाले बहुतेरे श्रेष्ठ मनुष्योंको बीचमें छोड़ते हुए रथसहित सुमन्त्र अन्त:पुरके द्वारपर उपस्थित हुए॥ ४२॥

स तत्र शुश्राव च हर्षयुक्ता

रामाभिषेकार्थकृतां जनानाम्।

नरेन्द्रसूनोरभिमङ्गलार्था:

सर्वस्य लोकस्य गिर: प्रहृष्टा:॥ ४३॥

उस स्थानपर उन्होंने श्रीरामके अभिषेक-सम्बन्धी कर्म करनेवाले लोगोंकी हर्षभरी बातें सुनीं, जो राजकुमार श्रीरामके लिये सब ओरसे मङ्गलकामना सूचित करती थीं। इसी प्रकार उन्होंने अन्य सब लोगोंकी भी हर्षोल्लाससे परिपूर्ण वार्ताओंको श्रवण किया॥ ४३॥

महेन्द्रसद्मप्रतिमं च वेश्म

रामस्य रम्यं मृगपक्षिजुष्टम्।

ददर्श मेरोरिव शृङ्गमुच्चं

विभ्राजमानं प्रभया सुमन्त्र:॥ ४४॥

श्रीरामका वह भवन इन्द्रसदनकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा था। मृगों और पक्षियोंसे सेवित होनेके कारण उसकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी। सुमन्त्रने उस भवनको देखा। वह अपनी प्रभासे प्रकाशित होनेवाले मेरुगिरिके ऊँचे शिखरकी भाँति सुशोभित हो रहा था॥ ४४॥

उपस्थितैरञ्जलिकारिभिश्च

सोपायनैर्जानपदैर्जनैश्च ।

कोट्या परार्धैश्च विमुक्तयानै:

समाकुलं द्वारपदं ददर्श॥ ४५॥

उस भवनके द्वारपर पहुँचकर सुमन्त्रने देखा—श्रीरामकी वन्दनाके लिये हाथ जोड़े उपस्थित हुए जनपदवासी मनुष्य अपनी सवारियोंसे उतरकर हाथोंमें भाँति-भाँतिके उपहार लिये करोड़ों और परार्धोंकी संख्यामें खड़े थे, जिससे वहाँ बड़ी भारी भीड़ लग गयी थी॥ ४५॥

ततो महामेघमहीधराभं

प्रभिन्नमत्यङ्कुशमत्यसह्यम् ।

रामोपवाह्यं रुचिरं ददर्श

शत्रुञ्जयं नागमुदग्रकायम्॥ ४६॥

तदनन्तर उन्होंने श्रीरामकी सवारीमें आनेवाले सुन्दर शत्रुञ्जय नामक विशालकाय गजराजको देखा, जो महान् मेघसे युक्त पर्वतके समान प्रतीत होता था। उसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी। वह अंकुशसे काबूमें आनेवाला नहीं था। उसका वेग शत्रुओंके लिये अत्यन्त असह्य था। उसका जैसा नाम था, वैसा ही गुण भी था॥ ४६॥

स्वलंकृतान् साश्वरथान् सकुञ्जरा-

नमात्यमुख्यांश्च ददर्श वल्लभान्।

व्यपोह्य सूत: सहितान् समन्तत:

समृद्धमन्त:पुरमाविवेश ह॥ ४७॥

उन्होंने वहाँ राजाके परम प्रिय मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंको भी एक साथ उपस्थित देखा, जो सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे और घोड़े, रथ तथा हाथियोंके साथ वहाँ आये थे। सुमन्त्रने उन सबको एक ओर हटाकर स्वयं श्रीरामके समृद्धिशाली अन्त:पुरमें प्रवेश किया॥ ४७॥

ततोऽद्रिकूटाचलमेघसंनिभं

महाविमानोपमवेश्मसंयुतम् ।

अवार्यमाण: प्रविवेश सारथि:

प्रभूतरत्नं मकरो यथार्णवम्॥ ४८॥

जैसे मगर प्रचुर रत्नोंसे भरे हुए समुद्रमें बेरोक-टोक प्रवेश करता है, उसी प्रकार सारथि सुमन्त्रने पर्वत-शिखरपर आरूढ़ हुए अविचल मेघके समान शोभायमान महान् विमानके सदृश सुन्दर गृहोंसे संयुक्त तथा प्रचुर रत्न-भण्डारसे भरपूर उस महलमें बिना किसी रोक-टोकके प्रवेश किया॥ ४८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदश: सर्ग:॥ १५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥

 

षोडश: सर्ग:

सुमन्त्रका श्रीरामके महलमें पहुँचकर महाराजका संदेश सुनाना और श्रीरामका
सीतासे अनुमति ले लक्ष्मणके साथ रथपर बैठकर गाजेबाजेके साथ
मार्गमें स्त्री-पुरुषोंकी बातें सुनते हुए जाना

स तदन्त:पुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम्।

प्रविविक्तां तत: कक्ष्यामाससाद पुराणवित्॥ १॥

पुरातन वृत्तान्तोंके ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए उस अन्त:पुरके द्वारको लाँघकर महलकी एकान्तकक्षामें जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिलकुल नहीं थी॥ १॥

प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिर्मृष्टकुण्डलै: ।

अप्रमादिभिरेकाग्रै: स्वानुरक्तैरधिष्ठिताम्॥ २॥

वहाँ श्रीरामके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे। उनके कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे॥ २॥

तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलंकृतान्।

ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान् सुसमाहितान्॥ ३॥

उस ड्यौढ़ीमें सुमन्त्रको गेरुआ वस्त्र पहने और हाथमें छड़ी लिये वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत बहुत-से वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानीके साथ द्वारपर बैठे दिखायी दिये, जो अन्त:पुरकी स्त्रियोंके अध्यक्ष (संरक्षक) थे॥ ३॥

ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षव:।

सहसोत्पतिता: सर्वे ह्यासनेभ्य: ससम्भ्रमा:॥ ४॥

सुमन्त्रको आते देख श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छावाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनोंसे उठकर खड़े हो गये॥ ४॥

तानुवाच विनीतात्मा सूतपुत्र: प्रदक्षिण:।

क्षिप्रमाख्यात रामाय सुमन्त्रो द्वारि तिष्ठति॥ ५॥

राजसेवामें अत्यन्त कुशल तथा विनीत हृदयवाले सूतपुत्र सुमन्त्रने उनसे कहा—‘आपलोग श्रीरामचन्द्रजीसे शीघ्र जाकर कहें, कि सुमन्त्र दरवाजेपर खड़े हैं’॥ ५॥

ते राममुपसङ्गम्य भर्तु: प्रियचिकीर्षव:।

सहभार्याय रामाय क्षिप्रमेवाचचक्षिरे॥ ६॥

स्वामीका प्रिय करनेकी इच्छावाले वे सब सेवक श्रीरामचन्द्रजीके पास जा पहुँचे। उस समय श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ विराजमान थे। उन सेवकोंने शीघ्र ही उन्हें सुमन्त्रका संदेश सुना दिया॥ ६॥

प्रतिवेदितमाज्ञाय सूतमभ्यन्तरं पितु:।

तत्रैवानाययामास राघव: प्रियकाम्यया॥ ७॥

द्वाररक्षकोंद्वारा दी हुई सूचना पाकर श्रीरामने पिताकी प्रसन्नताके लिये उनके अन्तरङ्ग सेवक सुमन्त्रको वहीं अन्त:पुरमें बुलवा लिया॥ ७॥

तं वैश्रवणसंकाशमुपविष्टं स्वलंकृतम्।

ददर्श सूत: पर्यङ्के सौवर्णे सोत्तरच्छदे॥ ८॥

वहाँ पहुँचकर सुमन्त्रने देखा श्रीरामचन्द्रजी वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो कुबेरके समान जान पड़ते हैं और बिछौनोंसे युक्त सोनेके पलंगपर विराजमान हैं॥ ८॥

वराहरुधिराभेण शुचिना च सुगन्धिना।

अनुलिप्तं परार्घ्येन चन्दनेन परंतपम्॥ ९ ॥

स्थितया पार्श्वतश्चापि वालव्यजनहस्तया।

उपेतं सीतया भूयश्चित्रया शशिनं यथा॥ १०॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनाथजीके श्रीअङ्गोंमें वाराहके रुधिरकी भाँति लाल, पवित्र और सुगन्धित उत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ है और देवी सीता उनके पास बैठकर अपने हाथसे चवँर डुला रही हैं। सीताके अत्यन्त समीप बैठे हुए श्रीराम चित्रासे संयुक्त चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हैं॥ ९-१०॥

तं तपन्तमिवादित्यमुपपन्नं स्वतेजसा।

ववन्दे वरदं वन्दी विनयज्ञो विनीतवत्॥ ११॥

विनयके ज्ञाता वन्दी सुमन्त्रने तपते हुए सूर्यकी भाँति अपने नित्य प्रकाशसे सम्पन्न रहकर अधिक प्रकाशित होनेवाले वरदायक श्रीरामको विनीतभावसे प्रणाम किया॥

प्राञ्जलि: सुमुखं दृष्ट्वा विहारशयनासने।

राजपुत्रमुवाचेदं सुमन्त्रो राजसत्कृत:॥ १२॥

विहारकालिक शयनके लिये जो आसन था, उस पलंगपर बैठे हुए प्रसन्न मुखवाले राजकुमार श्रीरामका दर्शन करके राजा दशरथद्वारा सम्मानित सुमन्त्रने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—॥ १२॥

कौसल्या सुप्रजा राम पिता त्वां द्रष्टुमिच्छति।

महिष्यापि हि कैकेय्या गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ १३॥

‘श्रीराम! आपको पाकर महारानी कौसल्या सर्वश्रेष्ठ संतानवाली हो गयी हैं। इस समय रानी कैकेयीके साथ बैठे हुए आपके पिताजी आपको देखना चाहते हैं, अत: वहाँ चलिये, विलम्ब न कीजिये’॥ १३॥

एवमुक्तस्तु संहृष्टो नरसिंहो महाद्युति:।

तत: सम्मानयामास सीतामिदमुवाच ह॥ १४॥

सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी नरश्रेष्ठ श्रीरामने सीताजीका सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे इस प्रकार कहा—॥ १४॥

देवि देवश्च देवी च समागम्य मदन्तरे।

मन्त्रयेते ध्रुवं किंचिदभिषेचनसंहितम्॥ १५॥

‘देवि! जान पड़ता है, पिताजी और माता कैकेयी दोनों मिलकर मेरे विषयमें ही कुछ विचार कर रहे हैं। निश्चय ही मेरे अभिषेकके सम्बन्धमें ही कोई बात होती होगी॥ १५॥

लक्षयित्वा ह्यभिप्रायं प्रियकामा सुदक्षिणा।

संचोदयति राजानं मदर्थमसितेक्षणा॥ १६॥

‘मेरे अभिषेकके विषयमें राजाके अभिप्रायको लक्ष्य करके उनका प्रिय करनेकी इच्छावाली परम उदार एवं समर्थ कजरारे नेत्रोंवाली कैकेयी मेरे अभिषेकके लिये ही राजाको प्रेरित कर रही होंगी॥ १६॥

सा प्रहृष्टा महाराजं हितकामानुवर्तिनी।

जननी चार्थकामा मे केकयाधिपते: सुता॥ १७॥

‘मेरी माता केकयराजकुमारी इस समाचारसे बहुत प्रसन्न हुई होंगी। वे महाराजका हित चाहनेवाली और उनकी अनुगामिनी हैं। साथ ही वे मेरा भी भला चाहती हैं। अत: वे महाराजको अभिषेक करनेके लिये जल्दी करनेको कह रही होंगी॥ १७॥

दिष्ट्या खलु महाराजो महिष्या प्रियया सह।

सुमन्त्रं प्राहिणोद् दूतमर्थकामकरं मम॥ १८॥

‘सौभाग्यकी बात है कि महाराज अपनी प्यारी रानीके साथ बैठे हैं और उन्होंने मेरे अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाले सुमन्त्रको ही दूत बनाकर भेजा है॥

यादृशी परिषत् तत्र तादृशो दूत आगत:।

ध्रुवमद्यैव मां राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ १९॥

‘जैसी वहाँ अन्तरङ्ग परिषद् बैठी है, वैसे ही दूत सुमन्त्रजी यहाँ पधारे हैं। अवश्य आज ही महाराज मुझे युवराजके पदपर अभिषिक्त करेंगे॥ १९॥

हन्त शीघ्रमितो गत्वा द्रक्ष्यामि च महीपतिम्।

सह त्वं परिवारेण सुखमास्स्व रमस्व च॥ २०॥

‘अत: मैं प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे शीघ्र जाकर महाराजका दर्शन करूँगा। तुम परिजनोंके साथ यहाँ सुखपूर्वक बैठो और आनन्द करो’॥ २०॥

पतिसम्मानिता सीता भर्तारमसितेक्षणा।

आ द्वारमनुवव्राज मङ्गलान्यभिदध्युषी॥ २१॥

पतिके द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर कजरारे नेत्रोंवाली सीतादेवी उनका मङ्गल-चिन्तन करती हुई स्वामीके साथ-साथ द्वारतक उन्हें पहुँचानेके लिये गयीं॥

राज्यं द्विजातिभिर्जुष्टं राजसूयाभिषेचनम्।

कर्तुमर्हति ते राजा वासवस्येव लोककृत्॥ २२॥

उस समय वे बोलीं—‘आर्यपुत्र! ब्राह्मणोंके साथ रहकर आपका युवराजपदपर अभिषेक करके महाराज दूसरे समयमें राजसूय-यज्ञमें सम्राट्के पदपर आपका अभिषेक करनेयोग्य हैं। ठीक उसी तरह जैसे लोकस्रष्टा ब्रह्माने देवराज इन्द्रका अभिषेक किया था॥ २२॥

दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम्।

कुरङ्गशृङ्गपाण‌िं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम्॥ २३॥

‘आप राजसूय-यज्ञमें दीक्षित हो तदनुकूल व्रतका पालन करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ मृगचर्मधारी, पवित्र तथा हाथमें मृगका शृङ्ग धारण करनेवाले हों और इस रूपमें आपका दर्शन करती हुई मैं आपकी सेवामें संलग्न रहूँ—यही मेरी शुभ-कामना है॥ २३॥

पूर्वां दिशं वज्रधरो दक्षिणां पातु ते यम:।

वरुण: पश्चिमामाशां धनेशस्तूत्तरां दिशम्॥ २४॥

‘आपकी पूर्व दिशामें वज्रधारी इन्द्र, दक्षिण दिशामें यमराज, पश्चिम दिशामें वरुण और उत्तर दिशामें कुबेर रक्षा करें’॥ २४॥

अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमङ्गल:।

निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात्॥ २५॥

तदनन्तर सीताकी अनुमति ले उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्रके साथ अपने महलसे बाहर निकले॥ २५॥

पर्वतादिव निष्क्रम्य सिंहो गिरिगुहाशय:।

लक्ष्मणं द्वारि सोऽपश्यत् प्रह्वाञ्जलिपुटं स्थितम्॥ २६॥

पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाला सिंह जैसे पर्वतसे निकलकर आता है, उसी प्रकार महलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजीने द्वारपर लक्ष्मणको उपस्थित देखा, जो विनीतभावसे हाथ जोड़े खड़े थे॥ २६॥

अथ मध्यमकक्ष्यायां समागच्छत् सुहृज्जनै:।

स सर्वानर्थिनो दृष्ट्वा समेत्य प्रतिनन्द्य च॥ २७॥

तत: पावकसंकाशमारुरोह रथोत्तमम्।

वैयाघ्रं पुरुषव्याघ्रो राजितं राजनन्दन:॥ २८॥

तदनन्तर मध्यम कक्षामें आकर वे मित्रोंसे मिले। फिर प्रार्थी जनोंको उपस्थित देख उन सबसे मिलकर उन्हें संतुष्ट करके पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम व्याघ्रचर्मसे आवृत, शोभाशाली तथा अग्निके समान तेजस्वी उत्तम रथपर आरूढ़ हुए॥ २७-२८॥

मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम्।

मुष्णन्तमिव चक्षूंषि प्रभया मेरुवर्चसम्॥ २९॥

उस रथकी घरघराहट मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान प्रतीत होती थी। उसमें स्थानकी संकीर्णता नहीं थी। वह विस्तृत था और मणि एवं सुवर्णसे विभूषित था। उसकी कान्ति सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान जान पड़ती थी। वह रथ अपनी प्रभासे लोगोंकी आँखोंमें चकाचौंध-सा पैदा कर देता था॥ २९॥

करेणुशिशुकल्पैश्च युक्तं परमवाजिभि:।

हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवाशुगम्॥ ३०॥

उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे, जो अधिक पुष्ट होनेके कारण हाथीके बच्चोंके समान प्रतीत होते थे। जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त शीघ्रगामी रथपर सवार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम अपने उस रथपर आरूढ़ थे॥

प्रययौ तूर्णमास्थाय राघवो ज्वलित: श्रिया।

स पर्जन्य इवाकाशे स्वनवानभिनादयन्॥ ३१॥

निकेतान्निर्ययौ श्रीमान् महाभ्रादिव चन्द्रमा:।

अपनी सहज शोभासे प्रकाशित श्रीरघुनाथजी उस रथपर आरूढ़ हो तुरंत वहाँसे चल दिये। वह तेजस्वी रथ आकाशमें गरजनेवाले मेघकी भाँति अपनी घर्घर ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ महान् मेघखण्डसे निकलनेवाले चन्द्रमाके समान श्रीरामके उस भवनसे बाहर निकला॥ ३१/

चित्रचामरपाणिस्तु लक्ष्मणो राघवानुज:॥ ३२॥

जुगोप भ्रातरं भ्राता रथमास्थाय पृष्ठत:।

श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण भी हाथमें विचित्र चवँर लिये उस रथपर बैठ गये और पीछेसे अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामकी रक्षा करने लगे॥ ३२/

ततो हलहलाशब्दस्तुमुल: समजायत॥ ३३॥

तस्य निष्क्रममाणस्य जनौघस्य समन्तत:।

फिर तो सब ओरसे मनुष्योंकी भारी भीड़ निकलने लगी। उस समय उस जन-समूहके चलनेसे सहसा भयंकर कोलाहल मच गया॥ ३३/

ततो हयवरा मुख्या नागाश्च गिरिसंनिभा:॥ ३४॥

अनुजग्मुस्तथा रामं शतशोऽथ सहस्रश:।

श्रीरामके पीछे-पीछे अच्छे-अच्छे घोड़े और पर्वतोंके समान विशालकाय श्रेष्ठ गजराज सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें चलने लगे॥ ३४/

अग्रतश्चास्य संनद्धाश्चन्दनागुरुभूषिता:॥ ३५॥

खड्गचापधरा: शूरा जग्मुराशंसवो जना:।

उनके आगे-आगे कवच आदिसे सुसज्जित तथा चन्दन और अगुरुसे विभूषित हो खड्ग और धनुष धारण किये बहुत-से शूरवीर तथा मङ्गलाशंसी मनुष्य—वन्दी आदि चल रहे थे॥ ३५/

ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम्॥ ३६॥

सिंहनादाश्च शूराणां तत: शुश्रुविरे पथि।

हर्म्यवातायनस्थाभिर्भूषिताभि: समन्तत:॥ ३७॥

कीर्यमाण: सुपुष्पौघैर्ययौ स्त्रीभिररिंदम:।

तदनन्तर मार्गमें वाद्योंकी ध्वनि, वन्दीजनोंके स्तुतिपाठके शब्द तथा शूरवीरोंके सिंहनाद सुनायी देने लगे। महलोंकी खिड़कियोंमें बैठी हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वनिताएँ सब ओरसे शत्रुदमन श्रीरामपर ढेर-के-ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं। इस अवस्थामें श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे॥ ३६-३७/

रामं सर्वानवद्याङ्ग्यो रामपिप्रीषया तत:॥ ३८॥

वचोभिरग्र्यैर्हर्म्यस्था: क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे।

उस समय अट्टालिकाओं और भूतलपर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रेष्ठ वचनोंद्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं॥ ३८/

नूनं नन्दति ते माता कौसल्या मातृनन्दन॥ ३९॥

पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमुपस्थितम्।

‘माताको आनन्द प्रदान करनेवाले रघुवीर! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा। इस अवस्थामें आपको देखती हुई आपकी माता कौसल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी॥ ३९/

सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनीं वराम्॥ ४०॥

अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम्।

तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत् तप:॥ ४१॥

रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या।

‘वे नारियाँ श्रीरामकी हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीताको संसारकी समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंसे श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं—‘उन देवी सीताने पूर्वकालमें निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमासे संयुक्त हुई रोहिणीकी भाँति श्रीरामका संयोग प्राप्त किया है’॥ ४०-४१/

इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तम:।

शुश्राव राजमार्गस्थ: प्रिया वाच उदाहृता:॥ ४२॥

इस प्रकार राजमार्गपर रथपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासादशिखरोंपर बैठी हुई युवती स्त्रियोंके द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे॥ ४२॥

स राघवस्तत्र तदा प्रलापान्

शुश्राव लोकस्य समागतस्य।

आत्माधिकारा विविधाश्च वाच:

प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य॥ ४३॥

उस समय अयोध्यामें आये हुए दूर-दूरके लोग अत्यन्त हर्षसे भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें जो वार्तालाप और तरह-तरहकी बातें करते थे, अपने विषयमें कही गयी उन सभी बातोंको श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे॥ ४३॥

एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य

राजप्रसादाद् विपुलां गमिष्यन्।

एते वयं सर्वसमृद्धकामा

येषामयं नो भविता प्रशास्ता॥ ४४॥

वे कहते थे—‘इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथकी कृपासे बहुत बड़ी सम्पत्तिके अधिकारी होने जा रहे हैं। अब हम सब लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे॥ ४४॥

लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं

प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय।

न ह्यप्रियं किंचन जातु कश्चित्

पश्येन्न दु:खं मनुजाधिपेऽस्मिन्॥ ४५॥

यदि यह सारा राज्य चिरकालके लिये इनके हाथमें आ जाय तो इस जगत्की समस्त जनताके लिये यह महान् लाभ होगा। इनके राजा होनेपर कभी किसीका अप्रिय नहीं होगा और किसीको कोई दु:ख भी नहीं देखना पड़ेगा’॥ ४५॥

स घोषवद्भिश्च हयै: सनागै:

पुर:सरै: स्वस्तिकसूतमागधै:।

महीयमान: प्रवरैश्च वादकै-

रभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ॥ ४६॥

हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जय-जयकार करते हुए आगे-आगे चलनेवाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करनेवाले सूतों, वंशकी विरुदावलि बखाननेवाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकोंके तुमुल घोषके बीच उन वन्दी आदिसे पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेरके समान चल रहे थे॥ ४६॥

करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं

महाजनौघै: परिपूर्णचत्वरम्।

प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं

ददर्श रामो विमलं महापथम्॥ ४७॥

यात्रा करते हुए श्रीरामने उस विशाल राजमार्गको देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ोंसे खचाखच भरा हुआ था। उसके प्रत्येक चौराहेपर मनुष्योंकी भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी। उसके दोनों पार्श्वभागोंमें प्रचुर रत्नोंसे भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रयके योग्य और भी बहुत-से द्रव्योंके ढेर वहाँ दिखायी देते थे। वह राजमार्ग बहुत साफ-सुथरा था॥ ४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडश: सर्ग:॥ १६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६॥

 

सप्तदश: सर्ग:

श्रीरामका राजपथकी शोभा देखते और सुहृदोंकी बातें सुनते हुए पिताके भवनमें प्रवेश

स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जन:।

पताकाध्वजसम्पन्नं महार्हागुरुधूपितम्॥ १॥

अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम्।

स गृहैरभ्रसंकाशै: पाण्डुरैरुपशोभितम्॥ २॥

राजमार्गं ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम्।

इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदोंको आनन्द प्रदान करते हुए रथपर बैठे राजमार्गके बीचसे चले जा रहे थे; उन्होंने देखा—सारा नगर ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूपकी सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्योंकी भीड़ दिखायी देती है। वह राजमार्ग श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल भव्य भवनोंसे सुशोभित तथा अगुरुकी सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था॥ २/

चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयै:॥ ३॥

उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च।

अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमै: स्फाटिकैरपि॥ ४॥

शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम्।

संवृतं विविधै: पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि॥ ५॥

ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा।

दध्यक्षतहविर्लाजैर्धूपैरगुरुचन्दनै: ॥ ६॥

नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम्।

अच्छी श्रेणीके चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदिके रेशोंसे बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रोंके ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्गकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकारके पुष्पों तथा भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थोंसे भरा हुआ था। उसके चौराहोंकी दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकारके पुष्पहार और गन्धद्रव्योंसे सदा पूजा की जाती थी। स्वर्गलोकमें बैठे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति रथारूढ़ श्रीरामने उस राजमार्गको देखा॥ ३—६/

आशीर्वादान् बहून् शृण्वन् सुहृद्भि: समुदीरितान्॥ ७॥

यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ।

वे अपने सुहृदोंके मुखसे कहे गये बहुत-से आशीर्वादोंको सुनते और यथायोग्य उन सब लोगोंका सम्मान करते हुए चले जा रहे थे॥ ७/

पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहै:॥ ८॥

अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय।

(उनके हितैषी सुहृद् कहते थे—) ‘रघुनन्दन! तुम्हारे पितामह और प्रपितामह (दादे और परदादे) जिसपर चलते आये हैं, आज उसी मार्गको ग्रहण करके युवराज-पदपर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगोंका निरन्तर पालन करें’॥ ८/

यथा स्म पोषिता: पित्रा यथा सर्वै: पितामहै:।

तत: सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि॥ ९॥

(फिर वे आपसमें कहने लगे—)‘भाइयो! श्रीरामके पिता तथा समस्त पितामहोंद्वारा जिस प्रकार हमलोगोंका पालन-पोषण हुआ है, श्रीरामके राजा होनेपर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे॥ ९॥

अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं च न:।

यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम्॥ १०॥

‘यदि हम राज्यपर प्रतिष्ठित हुए श्रीरामको पिताके घरसे निकलते हुए देख लें—यदि राजा रामका दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोकके भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है॥ १०॥

ततो हि न: प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति।

यथाभिषेको रामस्य राज्येनामिततेजस:॥ ११॥

‘अमित तेजस्वी श्रीरामका यदि राज्यपर अभिषेक हो जाय तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा’॥

एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीन: शुभा: कथा:।

आत्मसम्पूजनी: शृण्वन् ययौ रामो महापथम्॥ १२॥

सुहृदोंके मुँहसे निकली हुई ये तथा और भी कई तरहकी अपनी प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथपर बढ़े चले जा रहे थे॥

न हि तस्मान्मन: कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात्।

नर: शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे॥ १३॥

(जो श्रीरामकी ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था।) श्रीरघुनाथजीके दूर चले जानेपर भी कोई उन पुरुषोत्तमकी ओरसे अपना मन या दृष्टि नहीं हटा पाता था॥ १३॥

यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति।

निन्दित: सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ १४॥

उस समय जो श्रीरामको नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकोंमें निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी॥ १५॥

सर्वेषु स हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम्।

चतुर्णां हि वय:स्थानां तेन ते तमनुव्रता:॥ १६॥

धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्णोंके सभी मनुष्योंपर उनकी अवस्थाके अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे॥ १६॥

चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि च।

प्रदक्षिणं परिहरज्जगाम नृपते: सुत:॥ १६॥

राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरोंको अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे॥

स राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमै: शुभै:।

प्रासादशृङ्गैर्विविधै: कैलासशिखरोपमै:॥ १७॥

आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरै:।

वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतै:॥ १८॥

तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम्।

राजपुत्र: पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन्॥ १९॥

राजा दशरथका भवन मेघसमूहोंके समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखरके समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी जालीसे विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभासे प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाईसे आकाशको भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहोंसे युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्रसदनके समान शोभा पाता था। उस राजभवनके पास पहुँचकर अपनी शोभासे प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीरामने पिताके महलमें प्रवेश किया॥ १७—१९॥

स कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्रोऽतिक्रम्य वाजिभि:।

पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तम:॥ २०॥

उन्होंने धनुर्धर वीरोंद्वारा सुरक्षित महलकी तीन ड्यौढि़योंको तो घोड़े जुते हुए रथसे ही पार किया, फिर दो ड्यौढि़योंमें वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये॥ २०॥

स सर्वा: समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मज:।

संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्त:पुरमत्यगात्॥ २१॥

इस प्रकार सारी ड्यौढि़योंको पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगोंको लौटाकर स्वयं अन्त:पुरमें गये॥ २१॥

तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा

जन: स सर्वो मुदितो नृपात्मजे।

प्रतीक्षते तस्य पुन: स्म निर्गमं

यथोदयं चन्द्रमस: सरित्पति:॥ २२॥

जब राजकुमार श्रीराम पिताके पास जानेके लिये अन्त:पुरमें प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुन: निकलनेकी प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र चन्द्रोदयकी प्रतीक्षा करता रहता है॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदश: सर्ग:॥ १७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७॥

 

अष्टादश: सर्ग:

श्रीरामका कैकेयीसे पिताके चिन्तित होनेका कारण पूछना और कैकेयीका कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरोंका वृत्तान्त बताकर श्रीरामको वनवासके लिये प्रेरित करना

स ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे।

कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता॥ १॥

महलमें जाकर श्रीरामने पिताको कैकेयीके साथ एक सुन्दर आसनपर बैठे देखा। वे विषादमें डूबे हुए थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय दिखायी देते थे॥ २॥

स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत्।

ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्या: सुसमाहित:॥ २॥

निकट पहुँचनेपर श्रीरामने विनीतभावसे पहले अपने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानीके साथ उन्होंने कैकेयीके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया॥ २॥

रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षण:।

शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्॥ ३॥

उस समय दीनदशामें पड़े हुए राजा दशरथ एक बार ‘राम!’ ऐसा कहकर चुप हो गये (इससे आगे उनसे बोला नहीं गया)। उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये, अत: वे श्रीरामकी ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके॥ ३॥

तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम्।

रामोऽपि भयमापन्न: पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम्॥ ४॥

राजाका वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीरामको भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैरसे किसी सर्पको छू दिया हो॥ ४॥

इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसंतापकर्शितम्।

नि:श्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्॥ ५॥

ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम्।

उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा॥ ६॥

राजाकी इन्द्रियोंमें प्रसन्नता नहीं थी; वे शोक और संतापसे दुर्बल हो रहे थे, बारंबार लंबी साँसें भरते थे तथा उनके चित्तमें बड़ी व्यथा और व्याकुलता थी। वे ऐसे दीखते थे, मानो तरङ्गमालाओंसे उपलक्षित अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा हो, सूर्यको राहुने ग्रस लिया हो अथवा किसी महर्षिने झूठ बोल दिया हो॥ ६॥

अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन्।

बभूव संरब्धतर: समुद्र इव पर्वणि॥ ७॥

राजाका वह शोक सम्भावनासे परे था। इस शोकका क्या कारण है—यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूर्णिमाके समुद्रकी भाँति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठे॥ ७॥

चिन्तयामास चतुरो राम: पितृहिते रत:।

किंस्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति॥ ८॥

पिताके हितमें तत्पर रहनेवाले परम चतुर श्रीराम सोचने लगे कि ‘आज ही ऐसी क्या बात हो गयी’ जिससे महाराज मुझसे प्रसन्न होकर बोलते नहीं हैं॥ ८॥

अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति।

तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायास: प्रवर्तते॥ ९॥

‘और दिन तो पिताजी कुपित होनेपर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाते थे, आज मेरी ओर दृष्टिपात करके इन्हें क्लेश क्यों हो रहा है’॥ ९॥

स दीन इव शोकार्तो विषण्णवदनद्युति:।

कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत्॥ १०॥

यह सब सोचकर श्रीराम दीन-से हो गये, शोकसे कातर हो उठे, विषादके कारण उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे कैकेयीको प्रणाम करके उसीसे पूछने लगे—॥ १०॥

कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता।

कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय॥ ११॥

‘मा! मुझसे अनजानमें कोई अपराध तो नहीं हो गया, जिससे पिताजी मुझपर नाराज हो गये हैं। तुम यह बात मुझे बताओ और तुम्हीं इन्हें मना दो॥ ११॥

अप्रसन्नमना: किं नु सदा मां प्रति वत्सल:।

विषण्णवदनो दीन: नहि मां प्रति भाषते॥ १२॥

‘ये तो सदा मुझे प्यार करते थे, आज इनका मन अप्रसन्न क्यों हो गया? देखता हूँ, ये आज मुझसे बोलतेतक नहीं हैं, इनके मुखपर विषाद छा रहा है और ये अत्यन्त दु:खी हो रहे हैं॥ १२॥

शारीरो मानसो वापि कच्चिदेनं न बाधते।

संतापो वाभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम्॥ १३॥

‘कोई शारीरिक व्याधिजनित संताप अथवा मानसिक अभिताप (चिन्ता) तो इन्हें पीडि़त नहीं कर रहा है? क्योंकि मनुष्यको सदा सुख-ही-सुख मिले—ऐसा सुयोग प्राय: दुर्लभ होता है॥ १३॥

कच्चिन्न किंचिद् भरते कुमारे प्रियदर्शने।

शत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मातृणां वा ममाशुभम्॥ १४॥

‘प्रियदर्शन कुमार भरत, महाबली शत्रुघ्न अथवा मेरी माताओंका तो कोई अमङ्गल नहीं हुआ है?॥ १४॥

अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वच:।

मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे॥ १५॥

‘महाराजको असंतुष्ट करके अथवा इनकी आज्ञा न मानकर इन्हें कुपित कर देनेपर मैं दो घड़ी भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा॥ १५॥

यतोमूलं नर: पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मन:।

कथं तस्मिन् न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते॥ १६॥

‘मनुष्य जिसके कारण इस जगत्में अपना प्रादुर्भाव (जन्म) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता पिताके जीते-जी वह उसके अनुकूल बर्ताव क्यों न करेगा?॥ १६॥

कच्चित्ते परुषं किंचिदभिमानात् पिता मम।

उक्तो भवत्या रोषेण येनास्य लुलितं मन:॥ १७॥

‘कहीं तुमने तो अभिमान या रोषके कारण मेरे पिताजीसे कोई कठोर बात नहीं कह डाली, जिससे इनका मन दु:खी हो गया है?॥ १७॥

एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छत:।

किंनिमित्तमपूर्वोऽयं विकारो मनुजाधिपे॥ १८॥

‘देवि! मैं सच्ची बात पूछता हूँ, बताओ, किस कारणसे महाराजके मनमें आज इतना विकार (संताप) है? इनकी ऐसी अवस्था तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी’॥ १८॥

एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना।

उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वच:॥ १९॥

महात्मा श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर अत्यन्त निर्लज्ज कैकेयी बड़ी ढिठाईके साथ अपने मतलबकी बात इस प्रकार बोली—॥ १९॥

न राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किंचन।

किंचिन्मनोगतं त्वस्य त्वद्भयान्नानुभाषते॥ २०॥

‘राम! महाराज कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई कष्ट ही हुआ है। इनके मनमें कोई बात है, जिसे तुम्हारे डरसे ये कह नहीं पा रहे हैं॥ २०॥

प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते।

तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम॥ २१॥

‘तुम इनके प्रिय हो, तुमसे कोई अप्रिय बात कहनेके लिये इनकी जबान नहीं खुलती; किंतु इन्होंने जिस कार्यके लिये मेरे सामने प्रतिज्ञा की है, उसका तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिये॥ २१॥

एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च।

स पश्चात् तप्यते राजा यथान्य: प्राकृतस्तथा॥ २२॥

‘इन्होंने पहले तो मेरा सत्कार करते हुए मुझे मुँहमाँगा वरदान दे दिया और अब ये दूसरे गँवार मनुष्योंकी भाँति उसके लिये पश्चात्ताप करते हैं॥ २२॥

अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशाम्पति:।

स निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति॥ २३॥

‘ये प्रजानाथ पहले ‘मैं दूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके मुझे वर दे चुके हैं और अब उसके निवारणके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं, पानी निकल जानेपर उसे रोकनेके लिये बाँध बाँधनेकी निरर्थक चेष्टा करते हैं॥ २३॥

धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि।

तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा॥ २४॥

‘राम! सत्य ही धर्मकी जड़ है, यह सत्पुरुषोंका भी निश्चय है। कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्यको ही छोड़ बैठें। जैसे भी इनके सत्यका पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये॥ २४॥

यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाशुभम्।

करिष्यसि तत: सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्॥ २५॥

‘यदि राजा जिस बातको कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुन: तुमसे कहूँगी॥ २५॥

यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते।

ततोऽहमभिधास्यामि न ह्येष त्वयि वक्ष्यति॥ २६॥

‘यदि राजाकी कही हुई बात तुम्हारे कानोंमें पड़कर वहीं नष्ट न हो जाय—यदि तुम उनकी प्रत्येक आज्ञाका पालन कर सको तो मैं तुमसे सब कुछ खोलकर बता दूँगी, ये स्वयं तुमसे कुछ नहीं कहेंगे’॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम्।

उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसंनिधौ॥ २७॥

कैकेयीकी कही हुई यह बात सुनकर श्रीरामके मनमें बड़ी व्यथा हुई। उन्होंने राजाके समीप ही देवी कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ २७॥

अहो धिङ् नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वच:।

अहं हि वचनाद् राज्ञ: पतेयमपि पावके॥ २८॥

भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे।

नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च॥ २९॥

तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्।

करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते॥ ३०॥

‘अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मैं महाराजके कहनेसे आगमें भी कूद सकता हूँ, तीव्र विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजाको जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा। राम दो तरहकी बात नहीं करता है’॥ २८—३०॥

तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्।

उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम्॥ ३१॥

श्रीराम सरल स्वभावसे युक्त और सत्यवादी थे, उनकी बात सुनकर अनार्या कैकेयीने अत्यन्त दारुण वचन कहना आरम्भ किया—॥ ३१॥

पुरा देवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव।

रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे॥ ३२॥

‘रघुनन्दन! पहलेकी बात है, देवासुरसंग्राममें तुम्हारे पिता शत्रुओंके बाणोंसे बिंध गये थे, उस महासमरमें मैंने इनकी रक्षा की थी, उससे प्रसन्न होकर इन्होंने मुझे दो वर दिये थे॥ ३२॥

तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्।

गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव॥ ३३॥

‘राघव! उन्हींमेंसे एक वरके द्वारा तो मैंने महाराजसे यह याचना की है कि भरतका राज्याभिषेक हो और दूसरा वर यह माँगा है कि तुम्हें आज ही दण्डकारण्यमें भेज दिया जाय॥ ३३॥

यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि।

आत्मानं च नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु॥ ३४॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिताको सत्यप्रतिज्ञ बनाना चाहते हो और अपनेको भी सत्यवादी सिद्ध करनेकी इच्छा रखते हो तो मेरी यह बात सुनो॥ ३४॥

संनिदेशे पितुस्तिष्ठ यथानेन प्रतिश्रुतम्।

त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥ ३५॥

‘तुम पिताकी आज्ञाके अधीन रहो, जैसी इन्होंने प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार तुम्हें चौदह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना चाहिये॥ ३५॥

भरतश्चाभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम्।

त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव॥ ३६॥

‘रघुनन्दन! राजाने तुम्हारे लिये जो यह अभिषेकका सामान जुटाया है, उस सबके द्वारा यहाँ भरतका अभिषेक किया जाय॥ ३६॥

सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रित:।

अभिषेकमिदं त्यक्त्वा जटाचीरधरो भव॥ ३७॥

‘और तुम इस अभिषेकको त्यागकर चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें रहते हुए जटा और चीर धारण करो॥

भरत: कोसलपते: प्रशास्तु वसुधामिमाम्।

नानारत्नसमाकीर्णां सवाजिरथसंकुलाम्॥ ३८॥

‘कोसलनरेशकी इस वसुधाका, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी और घोड़े तथा रथोंसे व्याप्त है, भरत शासन करें॥ ३८॥

एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं कारुण्येन समाप्लुत:।

शोकै: संक्लिष्टवदनो न शक्नोति निरीक्षितुम्॥ ३९॥

‘बस इतनी ही बात है, ऐसा करनेसे तुम्हारे वियोगका कष्ट सहन करना पड़ेगा, यह सोचकर महाराज करुणामें डूब रहे हैं। इसी शोकसे इनका मुख सूख गया है और इन्हें तुम्हारी ओर देखनेका साहस नहीं होता॥

एतत् कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन।

सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम्॥ ४०॥

‘रघुनन्दन राम! तुम राजाकी इस आज्ञाका पालन करो और इनके महान् सत्यकी रक्षा करके इन नरेशको संकटसे उबार लो’॥ ४०॥

इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यां

न चैव राम: प्रविवेश शोकम्।

प्रविव्यथे चापि महानुभावो

राजा च पुत्रव्यसनाभितप्त:॥ ४१॥

कैकेयीके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर भी श्रीरामके हृदयमें शोक नहीं हुआ, परंतु महानुभाव राजा दशरथ पुत्रके भावी वियोगजनित दु:खसे संतप्त एवं व्यथित हो उठे॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादश: सर्ग:॥ १८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८॥

 


एकोनविंश: सर्ग:

श्रीरामकी कैकेयीके साथ बातचीत और वनमें जाना स्वीकार करकेउनका माता कौसल्याके पास आज्ञा लेनेके लिये जाना

तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम्।

श्रुत्वा न विव्यथे राम: कैकेयीं चेदमब्रवीत्॥ १॥

वह अप्रिय तथा मृत्युके समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए। उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वित:।

जटाचीरधरो राज्ञ: प्रतिज्ञामनुपालयन्॥ २॥

‘मा! बहुत अच्छा! ऐसा ही हो। मैं महाराजकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जटा और चीर धारण करके वनमें रहनेके निमित्त अवश्य यहाँसे चला जाऊँगा॥ २॥

इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपति:।

नाभिनन्दति दुर्धर्षो यथापूर्वमरिंदम:॥ ३॥

‘परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज मुझसे पहलेकी तरह प्रसन्नतापूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं?॥ ३॥

मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रत:।

यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधर:॥ ४॥

‘देवि! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वनको चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो॥ ४॥

हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च।

नियुज्यमानो विस्रब्ध: किं न कुर्यामहं प्रियम्॥ ५॥

‘राजा मेरे हितैषी, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं। इनकी आज्ञा होनेपर मैं इनका कौन-सा ऐसा प्रिय कार्य है, जिसे नि:शङ्क होकर न कर सकूँ?॥ ५॥

अलीकं मानसं त्वेकं हृदयं दहते मम।

स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचनम्॥ ६॥

‘किंतु मेरे मनको एक ही हार्दिक दु:ख अधिक जला रहा है कि स्वयं महाराजने मुझसे भरतके अभिषेककी बात नहीं कही॥ ६॥

अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च।

हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरतायाप्रचोदित:॥ ७॥

‘मैं केवल तुम्हारे कहनेसे भी अपने भाई भरतके लिये इस राज्यको, सीताको, प्यारे प्राणोंको तथा सारी सम्पत्तिको भी प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही दे सकता हूँ॥

किं पुनर्मनुजेन्द्रेण स्वयं पित्रा प्रचोदित:।

तव च प्रियकामार्थं प्रतिज्ञामनुपालयन्॥ ८॥

‘फिर यदि स्वयं महाराज—मेरे पिताजी आज्ञा दें और वह भी तुम्हारा प्रिय कार्य करनेके लिये, तो मैं प्रतिज्ञाका पालन करते हुए उस कार्यको क्यों नहीं करूँगा?॥ ८॥

तथाश्वासय हृमन्तं किं त्विदं यन्महीपति:।

वसुधासक्तनयनो मन्दमश्रूणि मुञ्चति॥ ९॥

‘तुम मेरी ओरसे विश्वास दिलाकर इन लज्जाशील महाराजको आश्वासन दो। ये पृथ्वीनाथ पृथ्वीकी ओर दृष्टि किये धीरे-धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं?॥ ९॥

गच्छन्तु चैवानयितुं दूता: शीघ्रजवैर्हयै:।

भरतं मातुलकुलादद्यैव नृपशासनात्॥ १०॥

‘आज ही महाराजकी आज्ञासे दूत शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर भरतको मामाके यहाँसे बुलानेके लिये चले जायँ॥ १०॥

दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वर:।

अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश॥ ११॥

‘मैं अभी पिताकी बातपर कोई विचार न करके चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये तुरंत दण्डकारण्यको चला ही जाता हूँ॥ ११॥

सा हृष्टा तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा रामस्य कैकयी।

प्रस्थानं श्रद्दधाना सा त्वरयामास राघवम्॥ १२॥

श्रीरामकी वह बात सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई। उसे विश्वास हो गया कि ये वनको चले जायँगे। अत: श्रीरामको जल्दी जानेकी प्रेरणा देती हुई वह बोली—॥ १२॥

एवं भवतु यास्यन्ति दूता: शीघ्रजवैर्हयै:।

भरतं मातुलकुलादिहावर्तयितुं नरा:॥ १३॥

‘तुम ठीक कहते हो, ऐसा ही होना चाहिये। भरतको मामाके यहाँसे बुला लानेके लिये दूतलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर अवश्य जायँगे॥ १३॥

तव त्वहं क्षमं मन्ये नोत्सुकस्य विलम्बनम्।

राम तस्मादित: शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि॥ १४॥

‘परंतु राम! तुम वनमें जानेके लिये स्वयं ही उत्सुक जान पड़ते हो; अत: तुम्हारा विलम्ब करना मैं ठीक नहीं समझती। जितना शीघ्र सम्भव हो, तुम्हें यहाँसे वनको चल देना चाहिये॥ १४॥

व्रीडान्वित: स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते।

नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम्॥ १५॥

‘नरश्रेष्ठ! राजा लज्जित होनेके कारण जो स्वयं तुमसे नहीं कहते हैं, यह कोई विचारणीय बात नहीं है। अत: इसका दु:ख तुम अपने मनसे निकाल दो॥ १५॥

यावत्त्वं न वनं यात: पुरादस्मादतित्वरम्।

पिता तावन्न ते राम स्नास्यते भोक्ष्यतेऽपि वा॥ १६॥

‘श्रीराम! तुम जबतक अत्यन्त उतावलीके साथ इस नगरसे वनको नहीं चले जाते, तबतक तुम्हारे पिता स्नान अथवा भोजन नहीं करेंगे’॥ १६॥

धिक्कष्टमिति नि:श्वस्य राजा शोकपरिप्लुत:।

मूर्च्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते॥ १७॥

कैकेयीकी यह बात सुनकर शोकमें डूबे हुए राजा दशरथ लंबी साँस खींचकर बोले—‘धिक्कार है! हाय! बड़ा कष्ट हुआ!’ इतना कहकर वे मूर्च्छित हो उस सुवर्णभूषित पलंगपर गिर पड़े॥ १७॥

रामोऽप्युत्थाप्य राजानं कैकेय्याभिप्रचोदित:।

कशयेव हतो वाजी वनं गन्तुं कृतत्वर:॥ १८॥

उस समय श्रीरामने राजाको उठाकर बैठा दिया और कैकेयीसे प्रेरित हो कोड़ेकी चोट खाये हुए घोड़ेकी भाँति वे शीघ्रतापूर्वक वनको जानेके लिये उतावले हो उठे॥ १८॥

तदप्रियमनार्याया वचनं दारुणोदयम्।

श्रुत्वा गतव्यथो राम: कैकेयीं वाक्यमब्रवीत्॥ १९॥

अनार्या कैकेयीके उस अप्रिय एवं दारुण वचनको सुनकर भी श्रीरामके मनमें व्यथा नहीं हुई। वे कैकेयीसे बोले—॥ १९॥

नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे।

विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम्॥ २०॥

‘देवि! मैं धनका उपासक होकर संसारमें नहीं रहना चाहता। तुम विश्वास रखो! मैंने भी ऋषियोंकी ही भाँति निर्मल धर्मका आश्रय ले रखा है॥ २०॥

यत् तत्रभवत: किंचिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया।

प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत्॥ २१॥

‘पूज्य पिताजीका जो भी प्रिय कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे प्राण देकर भी करूँगा। तुम उसे सर्वथा मेरे द्वारा हुआ ही समझो॥ २१॥

न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्।

यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया॥ २२॥

‘पिताकी सेवा अथवा उनकी आज्ञाका पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसारमें दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है॥ २२॥

अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम्।

वने वत्स्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश॥ २३॥

‘यद्यपि पूज्य पिताजीने स्वयं मुझसे नहीं कहा है, तथापि मैं तुम्हारे ही कहनेसे चौदह वर्षोंतक इस भूतलपर निर्जन वनमें निवास करूँगा॥ २३॥

न नूनं मयि कैकेयि किंचिदाशंससे गुणान्।

यद् राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती॥ २४॥

‘कैकेयि! तुम्हारा मुझपर पूरा अधिकार है। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन कर सकता हूँ; फिर भी तुमने स्वयं मुझसे न कहकर इस कार्यके लिये महाराजसे कहा—इनको कष्ट दिया। इससे जान पड़ता है कि तुम मुझमें कोई गुण नहीं देखती हो॥ २४॥

यावन्मातरमापृच्छे सीतां चानुनयाम्यहम्।

ततोऽद्यैव गमिष्यामि दण्डकानां महद् वनम्॥ २५॥

‘अच्छा! अब मैं माता कौसल्यासे आज्ञा ले लूँ और सीताको भी समझा-बुझा लूँ, इसके बाद आज ही विशाल दण्डकवनकी यात्रा करूँगा॥ २५॥

भरत: पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा।

तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्म: सनातन:॥ २६॥

‘तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्यका पालन और पिताजीकी सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है’॥ २६॥

रामस्य तु वच: श्रुत्वा भृशं दु:खगत: पिता।

शोकादशक्नुवन् वक्तुं प्ररुरोद महास्वनम्॥ २७॥

श्रीरामका यह वचन सुनकर पिताको बहुत दु:ख हुआ। वे शोकके आवेगसे कुछ बोल न सके, केवल फूट-फूटकर रोने लगे॥ २७॥

वन्दित्वा चरणौ राज्ञो विसंज्ञस्य पितुस्तदा।

कैकेय्याश्चाप्यनार्याया निष्पपात महाद्युति:॥ २८॥

महातेजस्वी श्रीराम उस समय अचेत पड़े हुए पिता महाराज दशरथ तथा अनार्या कैकेयीके भी चरणोंमें प्रणाम करके उस भवनसे निकले॥ २८॥

स राम: पितरं कृत्वा कैकेयीं च प्रदक्षिणम्।

निष्क्रम्यान्त:पुरात् तस्मात् स्वं ददर्श सुहृज्जनम्॥ २९॥

पिता दशरथ और माता कैकेयीकी परिक्रमा करके उस अन्त:पुरसे बाहर निकलकर श्रीराम अपने सुहृदोंसे मिले॥ २९॥

तं बाष्पपरिपूर्णाक्ष: पृष्ठतोऽनुजगाम ह।

लक्ष्मण: परमक्रुद्ध: सुमित्रानन्दवर्धन:॥ ३०॥

सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण उस अन्यायको देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे थे, तथापि दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर वे चुपचाप श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले गये॥ ३०॥

आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा राम: प्रदक्षिणम्।

शनैर्जगाम सापेक्षो दृष्टिं तत्राविचालयन्॥ ३१॥

श्रीरामचन्द्रजीके मनमें अब वन जानेकी आकांक्षाका उदय हो गया था, अत: अभिषेकके लिये एकत्र की हुई सामग्रियोंकी प्रदक्षिणा करते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़ गये। उनकी ओर उन्होंने दृष्टिपात नहीं किया॥ ३१॥

न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति।

लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षय:॥ ३२॥

श्रीराम अविनाशी कान्तिसे युक्त थे, इसलिये उस समय राज्यका न मिलना उन लोककमनीय श्रीरामकी महती शोभामें कोई अन्तर न डाल सका; जैसे चन्द्रमाका क्षीण होना उसकी सहज शोभाका अपकर्ष नहीं कर पाता है॥ ३२॥

न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम्।

सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया॥ ३३॥

वे वनमें जानेको उत्सुक थे और सारी पृथ्वीका राज्य छोड़ रहे थे; फिर भी उनके चित्तमें सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्माकी भाँति कोई विकार नहीं देखा गया॥ ३३॥

प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते।

विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान्॥ ३४॥

धारयन् मनसा दु:खमिन्द्रियाणि निगृह्य च।

प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान्॥ ३५॥

श्रीरामने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगानेकी मनाही कर दी। डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये। वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्योंको भी बिदा करके (आत्मीय जनोंके दु:खसे होनेवाले) दु:खको मनमें ही दबाकर इन्द्रियोंको काबूमें करके यह अप्रिय समाचार सुनानेके लिये माता कौसल्याके महलमें गये। उस समय उन्होंने मनको पूर्णत: वशमें कर रखा था॥ ३४-३५॥

सर्वोऽप्यभिजन: श्रीमान् श्रीमत: सत्यवादिन:।

नालक्षयत रामस्य कंचिदाकारमानने॥ ३६॥

जो शोभाशाली मनुष्य सदा सत्यवादी श्रीमान् रामके निकट रहा करते थे, उन्होंने भी उनके मुखपर कोई विकार नहीं देखा॥ ३६॥

उचितं च महाबाहुर्न जहौ हर्षमात्मवान्।

शारद: समुदीर्णांशुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम्॥ ३७॥

मनको वशमें रखनेवाले महाबाहु श्रीरामने अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता उसी तरह नहीं छोड़ी थी, जैसे शरद्-कालका उद्दीप्त किरणोंवाला चन्द्रमा अपने सहज तेजका परित्याग नहीं करता है॥ ३७॥

वाचा मधुरया राम: सर्वं सम्मानयञ्जनम्।

मातु: समीपं धर्मात्मा प्रविवेश महायशा:॥ ३८॥

महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम मधुर वाणीसे सब लोगोंका सम्मान करते हुए अपनी माताके समीप गये॥ ३८॥

तं गुणै: समतां प्राप्तो भ्राता विपुलविक्रम:।

सौमित्रिरनुवव्राज धारयन् दु:खमात्मजम्॥ ३९॥

उस समय गुणोंमें श्रीरामकी ही समानता करनेवाले महापराक्रमी भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी अपने मानसिक दु:खको मनमें ही धारण किये हुए श्रीरामके पीछे-पीछे गये॥ ३९॥

प्रविश्य वेश्मातिभृशं मुदा युतं

समीक्ष्य तां चार्थविपत्तिमागताम्।

न चैव रामोऽत्र जगाम विक्रियां

सुहृज्जनस्यात्मविपत्तिशङ्कया॥ ४०॥

अत्यन्त आनन्दसे भरे हुए उस भवनमें प्रवेश करके लौकिक दृष्टिसे अपने अभीष्ट अर्थका विनाश हुआ देखकर भी हितैषी सुहृदोंके प्राणोंपर संकट आ जानेकी आशङ्कासे श्रीरामने यहाँ अपने मुखपर कोई विकार नहीं प्रकट होने दिया॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंश: सर्ग:॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥

 

विंश: सर्ग:

राजा दशरथकी अन्य रानियोंका विलाप, श्रीरामका कौसल्याजीके भवनमें जाना और
उन्हें अपने वनवासकी बात बताना, कौसल्याका अचेत होकर गिरना और
श्रीरामके उठा देनेपर उनकी ओर देखकर विलाप करना

तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ।

आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्त:पुरे तदा॥ १॥

उधर पुरुषसिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयीके महलसे बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्त:पुरमें रहनेवाली राजमहिलाओंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ॥

कृत्येष्वचोदित: पित्रा सर्वस्यान्त:पुरस्य च।

गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति॥ २॥

वे कह रही थीं—‘हाय! जो पिताके आज्ञा न देनेपर भी समस्त अन्त:पुरके आवश्यक कार्योंमें स्वत: संलग्न रहते थे, जो हमलोगोंके सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वनको चले जायँगे॥ २॥

कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा।

तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघव:॥ ३॥

‘वे रघुनाथजी जन्मसे ही अपनी माता कौसल्याके प्रति सदा जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी करते थे॥ ३॥

न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।

क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति॥ ४॥

‘जो कठोर बात कह देनेपर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करनेवाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियोंको मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँसे वनको चले जायँगे॥

अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम्।

यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम्॥ ५॥

‘बड़े खेदकी बात है कि हमारे महाराजकी बुद्धि मारी गयी। ये इस समय सम्पूर्ण जीव-जगत्का विनाश करनेपर तुले हुए हैं, तभी तो ये समस्त प्राणियोंके जीवनाधार श्रीरामका परित्याग कर रहे हैं’॥ ५॥

इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनव:।

पतिमाचुक्रुशुश्चापि सस्वनं चापि चुक्रुशु:॥ ६॥

इस प्रकार समस्त रानियाँ अपने पतिको कोसने लगीं और बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह उच्च स्वरसे क्रन्दन करने लगीं॥ ६॥

स हि चान्त:पुरे घोरमार्तशब्दं महीपति:।

पुत्रशोकाभिसंतप्त: श्रुत्वा व्यालीयतासने॥ ७॥

अन्त:पुरका वह भयङ्कर आर्तनाद सुनकर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे संतप्त हो लज्जाके मारे बिछौनेमें ही अपनेको छिपा लिया॥ ७॥

रामस्तु भृशमायस्तो नि:श्वसन्निव कुञ्जर:।

जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्त:पुरं वशी॥ ८॥

इधर जितेन्द्रिय श्रीरामचन्द्रजी स्वजनोंके दु:खसे अधिक खिन्न होकर हाथीके समान लंबी साँस खींचते हुए भाई लक्ष्मणके साथ माताके अन्त:पुरमें गये॥ ८॥

सोऽपश्यत् पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम्।

उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान् बहून्॥ ९॥

वहाँ उन्होंने उस घरके दरवाजेपर एक परम पूजित वृद्ध पुरुषको बैठा हुआ देखा और दूसरे भी बहुत-से मनुष्य वहाँ खड़े दिखायी दिये॥ ९॥

दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे समुपस्थिता:।

जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम्॥ १०॥

वे सब-के-सब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन श्रीरामको देखते ही जय-जयकार करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए और उन्हें बधाई देने लगे॥ १०॥

प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श स:।

ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् वृद्धान् राज्ञाभिसत्कृतान्॥ ११॥

पहली ड्योढ़ी पार करके जब वे दूसरीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें राजाके द्वारा सम्मानित बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण दिखायी दिये॥ ११॥

प्रणम्य रामस्तान् वृद्धांस्तृतीयायां ददर्श स:।

स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च द्वाररक्षणतत्परा:॥ १२॥

उन वृद्ध ब्राह्मणोंको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी जब तीसरी ड्योढ़ीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें द्वाररक्षाके कार्यमें लगी हुई बहुत-सी नववयस्का एवं वृद्ध अवस्थावाली स्त्रियाँ दिखायी दीं॥ १२॥

वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ता: प्रविश्य च गृहं स्त्रिय:।

न्यवेदयन्त त्वरितं राममातु: प्रियं तदा॥ १३॥

उन्हें देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा हर्ष हुआ। श्रीरामको बधाई देकर उन स्त्रियोंने तत्काल महलके भीतर प्रवेश किया और तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताको उनके आगमनका प्रिय समाचार सुनाया॥ १३॥

कौसल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता।

प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णो: पुत्रहितैषिणी॥ १४॥

उस समय देवी कौसल्या पुत्रकी मङ्गलकामनासे रातभर जागकर सबेरे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णुकी पूजा कर रही थीं॥ १४॥

सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा।

अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला॥ १५॥

वे रेशमी वस्त्र पहनकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गलकृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस समय अग्निमें आहुति दे रही थीं॥ १५॥

प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्त:पुरं शुभम्।

ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम्॥ १६॥

उसी समय श्रीरामने माताके शुभ अन्त:पुरमें प्रवेश करके वहाँ माताको देखा। वे अग्निमें हवन करा रही थीं॥ १६॥

देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम्।

दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा॥ १७॥

लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा।

समिध: पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दन:॥ १८॥

रघुनन्दनने देखा तो वहाँ देव-कार्यके लिये बहुत-सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई है। दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धानका लावा, सफेद माला, खीर, खिचड़ी, समिधा और भरे हुए कलश—ये सब वहाँ दृष्टिगोचर हुए॥ १७-१८॥

तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम्।

तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां वरवर्णिनीम्॥ १९॥

उत्तम कान्तिवाली माता कौसल्या सफेद रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। वे व्रतके अनुष्ठानसे दुर्बल हो गयी थीं और इष्टदेवताका तर्पण कर रही थीं। इस अवस्थामें श्रीरामने उन्हें देखा॥ १९॥

सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम्।

अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं वडवा यथा॥ २०॥

माताका आनन्द बढ़ानेवाले प्रिय पुत्रको बहुत देरके बाद सामने उपस्थित देख कौसल्यादेवी बड़े हर्षमें भरकर उसकी ओर चलीं, मानो कोई घोड़ी अपने बछेड़ेको देखकर बड़े हर्षसे उसके पास आयी हो॥ २०॥

स मातरमुपक्रान्तामुपसंगृह्य राघव:।

परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामवघ्रातश्च मूर्धनि॥ २१॥

श्रीरघुनाथजीने निकट आयी हुई माताके चरणोंमें प्रणाम किया और माता कौसल्याने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया तथा बड़े प्यारसे उनका मस्तक सूँघा॥ २१॥

तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मन:।

कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वच:॥ २२॥

उस समय कौसल्यादेवीने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे पुत्रस्नेहवश यह प्रिय एवं हितकर बात कही—॥ २२॥

वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम्।

प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चाप्युचितं कुले॥ २३॥

‘बेटा! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियोंके समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो॥ २३॥

सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव।

अद्यैव त्वां स धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २४॥

‘रघुनन्दन! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजाका दर्शन करो। वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराजके पदपर अभिषेक करेंगे’॥ २४॥

दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रित:।

मातरं राघव: किंचित् प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत्॥ २५॥

यह कहकर माताने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया और भोजन करनेको कहा। भोजनके लिये निमन्त्रित होकर श्रीरामने उस आसनका स्पर्शमात्र कर लिया। फिर वे अञ्जलि फैलाकर मातासे कुछ कहनेको उद्यत हुए॥

स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तथानत:।

प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे॥ २६॥

वे स्वभावसे ही विनयशील थे तथा माताके गौरवसे भी उनके सामने नतमस्तक हो गये थे। उन्हें दण्डकारण्यको प्रस्थान करना था, अत: वे उसके लिये आज्ञा लेनेका उपक्रम करने लगे॥ २६॥

देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम्।

इदं तव च दु:खाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च॥ २७॥

उन्होंने कहा—‘देवि! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है। इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुमको, सीताको और लक्ष्मणको भी दु:ख होगा; तथापि कहूँगा॥

गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे।

विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थित:॥ २८॥

‘अब तो मैं दण्डकारण्यमें जाऊँगा, अत: ऐसे बहुमूल्य आसनकी मुझे क्या आवश्यकता है? अब मेरे लिये यह कुशकी चटाईपर बैठनेका समय आया है॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने।

कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम्॥ २९॥

‘मैं राजभोग्य वस्तुका त्याग करके मुनिकी भाँति कन्द, मूल और फलोंसे जीवन-निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करूँगा॥ २९॥

भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति।

मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम्॥ ३०॥

‘महाराज युवराजका पद भरतको दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्यमें भेज रहे हैं॥ ३०॥

स षट् चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने।

आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन्॥ ३१॥

‘अत: चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें रहूँगा और जंगलमें सुलभ होनेवाले वल्कल आदिको धारण करके फल-मूलके आहारसे ही जीवन-निर्वाह करता रहूँगा’॥

सा निकृत्तेव सालस्य यष्टि: परशुना वने।

पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता॥ ३२॥

यह अप्रिय बात सुनकर वनमें फरसेसे काटी हुई शालवृक्षकी शाखाके समान कौसल्या देवी सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं, मानो स्वर्गसे कोई देवाङ्गना भूतलपर आ गिरी हो॥ ३२॥

तामदु:खोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव।

रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम्॥ ३३॥

जिन्होंने जीवनमें कभी दु:ख नहीं देखा था—जो दु:ख भोगनेके योग्य थीं ही नहीं, उन्हीं माता कौसल्याको कटी हुई कदलीकी भाँति अचेत-अवस्थामें भूमिपर पड़ी देख श्रीरामने हाथका सहारा देकर उठाया॥ ३३॥

उपावृत्योत्थितां दीनां वडवामिव वाहिताम्।

पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना॥ ३४॥

जैसे कोई घोड़ी पहले बड़ा भारी बोझ ढो चुकी हो और थकावट दूर करनेके लिये धरतीपर लोट-पोटकर उठी हो, उसी तरह उठी हुई कौसल्याजीके समस्त अङ्गोंमें धूल लिपट गयी थी और वे अत्यन्त दीन दशाको पहुँच गयी थीं। उस अवस्थामें श्रीरामने अपने हाथसे उनके अङ्गोंकी धूल पोंछी॥ ३४॥

सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता।

उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे॥ ३५॥

कौसल्याजीने जीवनमें पहले सदा सुख ही देखा था और उसीके योग्य थीं, परंतु उस समय वे दु:खसे कातर हो उठी थीं। उन्होंने लक्ष्मणके सुनते हुए अपने पास बैठे पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ ३५॥

यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव।

न स्म दु:खमतो भूय: पश्येयमहमप्रजा:॥ ३६॥

‘बेटा रघुनन्दन! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बातका शोक रहता। आज जो मुझपर इतना भारी दु:ख आ पड़ा है, इसे वन्ध्या होनेपर मुझे नहीं देखना पड़ता॥ ३६॥

एक एव हि वन्ध्याया: शोको भवति मानस:।

अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्य: पुत्र विद्यते॥ ३७॥

‘बेटा! वन्ध्याको एक मानसिक शोक होता है। उसके मनमें यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संतान नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई दु:ख उसे नहीं होता॥

न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे।

अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया॥ ३८॥

‘बेटा राम! पतिके प्रभुत्वकालमें एक ज्येष्ठ पत्नीको जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिये, वह मुझे पहले कभी नहीं देखनेको मिला। सोचती थी, पुत्रके राज्यमें मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशासे मैं अबतक जीती रही॥ ३८॥

सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम्।

अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां परा सती॥ ३९॥

‘बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातोंसे हृदयको विदीर्ण कर देनेवाली छोटी सौतोंके बहुत-से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे॥ ३९॥

अतो दु:खतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति।

मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तक:॥ ४०॥

‘स्त्रियोंके लिये इससे बढ़कर महान् दु:ख और क्या होगा; अत: मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कभी अन्त नहीं है॥ ४०॥

त्वयि संनिहितेऽप्येवमहमासं निराकृता।

किं पुन: प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव हि॥ ४१॥

‘तात! तुम्हारे निकट रहनेपर भी मैं इस प्रकार सौतोंसे तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेश चले जानेपर मेरी क्या दशा होगी? उस दशामें तो मेरा मरण ही निश्चित है॥ ४१॥

अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता।

परिवारेण कैकेय्या: समा वाप्यथवावरा॥ ४२॥

‘पतिकी ओरसे मुझे सदा अत्यन्त तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान नहीं प्राप्त हुआ है। मैं कैकेयीकी दासियोंके बराबर अथवा उनसे भी गयी-बीती समझी जाती हूँ॥

यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते।

कैकेय्या: पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते॥ ४३॥

‘जो कोई मेरी सेवामें रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयीके बेटेको देखकर चुप हो जाता है, मुझसे बात नहीं करता है॥ ४३॥

नित्यक्रोधतया तस्या: कथं नु खरवादि तत्।

कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता॥ ४४॥

‘बेटा! इस दुर्गतिमें पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वभावके कारण कटुवचन बोलनेवाले उस कैकेयीके मुखको कैसे देख सकूँगी॥ ४४॥

दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव।

अतीतानि प्रकांक्षन्त्या मया दु:खपरिक्षयम्॥ ४५॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारे उपनयनरूप द्वितीय जन्म लिये सत्रह वर्ष बीत गये (अर्थात् तुम अब सत्ताईस वर्षके हो गये)। अबतक मैं यही आशा लगाये चली आ रही थी कि अब मेरा दु:ख दूर हो जायगा॥ ४५॥

तदक्षयं महद्दु:खं नोत्सहे सहितुं चिरात्।

विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव॥ ४६॥

‘राघव! अब इस बुढ़ापेमें इस तरह सौतोंका तिरस्कार और उससे होनेवाले महान् अक्षय दु:खको मैं अधिक कालतक नहीं सह सकती॥ ४६॥

अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम्।

कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका॥ ४७॥

‘पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारे मनोहर मुखको देखे बिना मैं दु:खिनी दयनीय जीवनवृत्तिसे रहकर कैसे निर्वाह करूँगी॥ ४७॥

उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमै:।

दु:खसंवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया॥ ४८॥

‘बेटा! (यदि तुझे इस देशसे निकल ही जाना है तो) मुझ भाग्यहीनाने बारंबार उपवास, देवताओंका ध्यान तथा बहुत-से परिश्रमजनक उपाय करके व्यर्थ ही तुम्हारा इतने कष्टसे पालन-पोषण किया है॥ ४८॥

स्थिरं नु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते।

प्रावृषीव महानद्या: स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा॥ ४९॥

‘मैं समझती हूँ कि निश्चय ही यह मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो तुम्हारे बिछोहकी बात सुनकर भी वर्षाकालके नूतन जलके प्रवाहसे टकराये हुए महानदीके कगारकी भाँति फट नहीं जाता है॥ ४९॥

ममैव नूनं मरणं न विद्यते

न चावकाशोऽस्ति यमक्षये मम।

यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति

प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव॥ ५०॥

निश्चय ही मेरे लिये कहीं मौत नहीं है, यमराजके घरमें भी मेरे लिये जगह नहीं है, तभी तो जैसे किसी रोती हुई मृगीको सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है, उसी प्रकार यमराज मुझे आज ही उठा ले जाना नहीं चाहता है॥ ५०॥

स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं

न भिद्यते यद् भुवि नो विदीर्यते।

अनेन दु:खेन च देहमर्पितं

ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते॥ ५१॥

‘अवश्य ही मेरा कठोर हृदय लोहेका बना हुआ है, जो पृथिवीपर पड़नेपर भी न तो फटता है और न टूक-टूक हो जाता है। इसी दु:खसे व्याप्त हुए इस शरीरके भी टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाते हैं। निश्चय ही, मृत्युकाल आये बिना किसीका मरण नहीं होता है॥

इदं तु दु:खं यदनर्थकानि मे

व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि।

तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया

सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे॥ ५२॥

‘सबसे अधिक दु:खकी बात तो यह है कि पुत्रके सुखके लिये मेरे द्वारा किये गये व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गये। मैंने संतानकी हित-कामनासे जो तप किया है, वह भी ऊसरमें बोये हुए बीजकी भाँति निष्फल हो गया॥ ५२॥

यदि ह्यकाले मरणं यदृच्छया

लभेत कश्चिद् गुरुदु:खकर्शित:।

गताहमद्यैव परेतसंसदं

विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै॥ ५३॥

‘यदि कोई मनुष्य भारी दु:खसे पीडि़त हो असमयमें भी अपनी इच्छाके अनुसार मृत्यु पा सके तो मैं तुम्हारे बिना अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गायकी भाँति आज ही यमराजकी सभामें चली जाऊँ॥ ५३॥

अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा

त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ।

अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौ:

सुदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया॥ ५४॥

‘चन्द्रमाके समान मनोहर मुख-कान्तिवाले श्रीराम! यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ? बेटा! जैसे गौ दुर्बल होनेपर भी अपने बछड़ेके लोभसे उसके पीछे-पीछे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ ही वनको चली चलूँगी’॥

भृशमसुखममर्षिता तदा

बहु विललाप समीक्ष्य राघवम्।

व्यसनमुपनिशाम्य सा महत्

सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी॥ ५५॥

आनेवाले भारी दु:खको सहनेमें असमर्थ हो महान् संकटका विचार करके सत्यके ध्यानमें बँधे हुए अपने पुत्र श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर माता कौसल्या उस समय बहुत विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने पुत्रको बन्धनमें पड़ा हुआ देखकर बिलख रही हो॥ ५५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके
अयोध्याकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥

 

एकविंश: सर्ग:

लक्ष्मणका रोष, उनका श्रीरामको बलपूर्वक राज्यपर अधिकार कर लेनेके लिये प्रेरित करना तथा श्रीरामका पिताकी आज्ञाके पालनको ही धर्म बताकर माता और लक्ष्मणको समझाना

तथा तु विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्।

उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वच:॥ १॥

इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराममाता कौसल्यासे अत्यन्त दु:खी हुए लक्ष्मणने उस समयके योग्य बात कही—॥ १॥

न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्।

त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगत:॥ २॥

विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षित:।

नृप: किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमान: समन्मथ:॥ ३॥

‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके वनमें जायँ। महाराज तो इस समय स्त्रीकी बातमें आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है। एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयोंने उन्हें वशमें कर लिया है; अत: कामदेवके वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी-जैसी स्त्रीकी प्रेरणासे क्या नहीं कह सकते हैं?॥ २-३॥

नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।

येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघव:॥ ४॥

‘मैं श्रीरघुनाथजीका ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्यसे निकाला जाय और वनमें रहनेके लिये विवश किया जाय॥ ४॥

न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नर:।

स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्॥ ५॥

‘मैं संसारमें एक मनुष्यको भी ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त शत्रु एवं तिरस्कृत होनेपर भी परोक्षमें भी इनका कोई दोष बता सके॥ ५॥

देवकल्पमृजुं दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्।

अवेक्षमाण: को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात्॥ ६॥

‘धर्मपर दृष्टि रखनेवाला कौन ऐसा राजा होगा, जो देवताके समान शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओंपर भी स्नेह रखनेवाले (श्रीराम-जैसे) पुत्रका अकारण परित्याग करेगा?॥ ६॥

तदिदं वचनं राज्ञ: पुनर्बाल्यमुपेयुष:।

पुत्र: को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन्॥ ७॥

‘जो पुन: बालभाव (विवेकशून्यता) को प्राप्त हो गये हैं, ऐसे राजाके इस वचनको राजनीतिका ध्यान रखनेवाला कौन पुत्र अपने हृदयमें स्थान दे सकता है?॥

यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नर:।

तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्॥ ८॥

‘रघुनन्दन! जबतक कोई भी मनुष्य आपके वनवासकी बातको नहीं जानता है, तबतक ही, आप मेरी सहायतासे इस राज्यके शासनकी बागडोर अपने हाथमें ले लीजिये॥ ८॥

मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव।

क: समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठत:॥ ९॥

‘रघुवीर! जब मैं धनुष लिये आपके पास रहकर आपकी रक्षा करता रहूँ और आप कालके समान युद्धके लिये डट जायँ, उस समय आपसे अधिक पौरुष प्रकट करनेमें कौन समर्थ हो सकता है?॥ ९॥

निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ।

करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये॥ १०॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि नगरके लोग विरोधमें खड़े होंगे तो मैं अपने तीखे बाणोंसे सारी अयोध्याको मनुष्योंसे सूनी कर दूँगा॥ १०॥

भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वास्य हितमिच्छति।

सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते॥ ११॥

‘जो-जो भरतका पक्ष लेगा अथवा केवल जो उन्हींका हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा; क्योंकि जो कोमल या नम्र होता है, उसका सभी तिरस्कार करते हैं॥ ११॥

प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या संतुष्टो यदि न: पिता।

अमित्रभूतो नि:सङ्गं वध्यतां वध्यतामपि॥ १२॥

‘यदि कैकेयीके प्रोत्साहन देनेपर उसके ऊपर संतुष्ट हो पिताजी हमारे शत्रु बन रहे हैं तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर इन्हें कैद कर लेना या मार डालना चाहिये॥ १२॥

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।

उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥ १३॥

‘क्योंकि यदि गुरु भी घमंडमें आकर कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान खो बैठे और कुमार्गपर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है॥ १३॥

बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम।

दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव॥ १४॥

‘पुरुषोत्तम! राजा किस बलका सहारा लेकर अथवा किस कारणको सामने रखकर आपको न्यायत: प्राप्त हुआ यह राज्य अब कैकेयीको देना चाहते हैं?॥

त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम्।

कास्य शक्ति: श्रियं दातुं भरतायारिशासन॥ १५॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आपके और मेरे साथ भारी वैर बाँधकर इनकी क्या शक्ति है कि यह राज्यलक्ष्मी ये भरतको दे दें?॥ १५॥

अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वत:।

सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे॥ १६॥

‘देवि! (बड़ी माँ!) मैं सत्य, धनुष, दान तथा यज्ञ आदिकी शपथ खाकर तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि मेरा अपने पूज्य भ्राता श्रीराममें हार्दिक अनुराग है॥ १६॥

दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि राम: प्रवेक्ष्यति।

प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय॥ १७॥

‘देवि! आप विश्वास रखें, यदि श्रीराम जलती हुई आगमें या घोर वनमें प्रवेश करनेवाले होंगे तो मैं इनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हो जाऊँगा॥ १७॥

हरामि वीर्याद् दु:खं ते तम: सूर्य इवोदित:।

देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु॥ १८॥

‘इस समय आप, रघुनाथजी तथा अन्य सब लोग भी मेरे पराक्रमको देखें। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकारका नाश कर देता है, उसी प्रकार मैं भी अपनी शक्तिसे आपके सब दु:ख दूर कर दूँगा॥ १८॥

हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम्।

कृपणं च स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम्॥ १९॥

‘जो कैकेयीमें आसक्तचित्त होकर दीन बन गये हैं, बालभाव (अविवेक) में स्थित हैं और अधिक बुढ़ापेके कारण निन्दित हो रहे हैं, उन वृद्ध पिताको मैं अवश्य मार डालूँगा’॥ १९॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मन:।

उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा॥ २०॥

महामनस्वी लक्ष्मणके ये ओजस्वी वचन सुनकर शोकमग्न कौसल्या श्रीरामसे रोती हुई बोलीं—॥ २०॥

भ्रातुस्ते वदत: पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया।

यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते॥ २१॥

‘बेटा! तुमने अपने भाई लक्ष्मणकी कही हुई सारी बातें सुन लीं, यदि जँचे तो अब इसके बाद तुम जो कुछ करना उचित समझो, उसे करो॥ २१॥

न चाधर्म्यं वच: श्रुत्वा सपत्न्या मम भाषितम्।

विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामित:॥ २२॥

‘मेरी सौतकी कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोकसे संतप्त हुई माताको छोड़कर तुम्हें यहाँसे नहीं जाना चाहिये॥ २२॥

धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि।

शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम्॥ २३॥

‘धर्मिष्ठ! तुम धर्मको जाननेवाले हो, इसलिये यदि धर्मका पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्मका आचरण करो॥

शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन्।

परेण तपसा युक्त: काश्यपस्त्रिदिवं गत:॥ २४॥

‘वत्स! अपने घरमें नियमपूर्वक रहकर माताकी सेवा करनेवाले काश्यप उत्तम तपस्यासे युक्त हो स्वर्गलोकमें चले गये थे॥ २४॥

यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्।

त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम्॥ २५॥

‘जैसे गौरवके कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन जानेकी आज्ञा नहीं देती, अत: तुम्हें यहाँसे वनको नहीं जाना चाहिये॥ २५॥

त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च।

त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम्॥ २६॥

‘तुम्हारे साथ तिनके चबाकर रहना भी मेरे लिये श्रेयस्कर है, परंतु तुमसे विलग हो जानेपर न मुझे इस जीवनसे कोई प्रयोजन है और न सुखसे॥ २६॥

यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम्।

अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यामि जीवितुम्॥ २७॥

‘यदि तुम मुझे शोकमें डूबी हुई छोड़कर वनको चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूँगी, जीवित नहीं रह सकूँगी॥ २७॥

ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम्।

ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्र: सरितां पति:॥ २८॥

‘बेटा! ऐसा होनेपर तुम संसारप्रसिद्ध वह नरक-तुल्य कष्ट पाओगे, जो ब्रह्महत्याके समान है और जिसे सरिताओंके स्वामी समुद्रने अपने अधर्मके फलरूपसे प्राप्त किया था’43॥ २८॥

विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं तत:।

उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम्॥ २९॥

माता कौसल्याको इस प्रकार दीन होकर विलाप करती देख धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रने यह धर्मयुक्त वचन कहा—॥ २९॥

नास्ति शक्ति: पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम।

प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम्॥ ३०॥

‘माता! मैं तुम्हारे चरणोंमें सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझमें पिताजीकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेकी शक्ति नहीं है, अत: मैं वनको ही जाना चाहता हूँ॥ ३०॥

ऋषिणा च पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा।

गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना च विपश्चिता॥ ३१॥

‘वनवासी विद्वान् कण्डु मुनिने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये अधर्म समझते हुए भी गौका वध कर डाला था॥ ३१॥

अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितु:।

खनद्भि: सागरैर्भूमिमवाप्त: सुमहान् वध:॥ ३२॥

‘हमारे कुलमें भी पहले राजा सगरके पुत्र ऐसे हो गये हैं, जो पिताकी आज्ञासे पृथ्वी खोदते हुए बुरी तरहसे मारे गये॥ ३२॥

जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम्।

कृत्ता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात्॥ ३३॥

‘जमदग्निके पुत्र परशुरामने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही वनमें फरसेसे अपनी माता रेणुकाका गला काट डाला था॥ ३३॥

एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमै: कृतम्।

पितुर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम्॥ ३४॥

‘देवि! इन्होंने तथा और भी बहुत-से देवतुल्य मनुष्योंने उत्साहके साथ पिताके आदेशका पालन किया है। अत: मैं भी कायरता छोड़कर पिताका हित-साधन करूँगा॥ ३४॥

न खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम्।

एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिता:॥ ३५॥

‘देवि! केवल मैं ही इस प्रकार पिताके आदेशका पालन नहीं कर रहा हूँ। जिनकी मैंने अभी चर्चा की है, उन सबने भी पिताके आदेशका पालन किया है॥

नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये।

पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते॥ ३६॥

‘मा! मैं तुम्हारे प्रतिकूल किसी नवीन धर्मका प्रचार नहीं कर रहा हूँ। पूर्वकालके धर्मात्मा पुरुषोंको भी यह अभीष्ट था। मैं तो उनके चले हुए मार्गका ही अनुसरण करता हूँ॥ ३६॥

तदेतत् तु मया कार्यं क्रियते भुवि नान्यथा।

पितुर्हि वचनं कुर्वन् न कश्चिन्नाम हीयते॥ ३७॥

‘इस भूमण्डलपर जो सबके लिये करनेयोग्य है, वही मैं भी करने जा रहा हूँ। इसके विपरीत कोई न करनेयोग्य काम नहीं कर रहा हूँ। पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाला कोई भी पुरुष धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता’॥

तामेवमुक्त्वा जननीं लक्ष्मणं पुनरब्रवीत्।

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठ: श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्॥ ३८॥

अपनी मातासे ऐसा कहकर वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ समस्त धनुर्धरशिरोमणि श्रीरामने पुन: लक्ष्मणसे कहा—॥ ३८॥

तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम्।

विक्रमं चैव सत्त्वं च तेजश्च सुदुरासदम्॥ ३९॥

‘लक्ष्मण! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम उत्तम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ। तुम्हारे पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेजका भी मुझे ज्ञान है॥ ३९॥

मम मातुर्महद् दु:खमतुलं शुभलक्षण।

अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च॥ ४०॥

‘शुभलक्षण लक्ष्मण! मेरी माताको जो अनुपम एवं महान् दु:ख हो रहा है, वह सत्य और शमके विषयमें मेरे अभिप्रायको न समझनेके कारण है॥ ४०॥

धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।

धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम्॥ ४१॥

‘संसारमें धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। धर्ममें ही सत्यकी प्रतिष्ठा है। पिताजीका यह वचन भी धर्मके आश्रित होनेके कारण परम उत्तम है॥ ४१॥

संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा।

न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥ ४२॥

‘वीर! धर्मका आश्रय लेकर रहनेवाले पुरुषको पिता, माता अथवा ब्राह्मणके वचनोंका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करके उसे मिथ्या नहीं करना चाहिये॥ ४२॥

सोऽहं न शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम्।

पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याहं प्रचोदित:॥ ४३॥

‘वीर! अत: मैं पिताजीकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकता; क्योंकि पिताजीके कहनेसे ही कैकेयीने मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दी है॥ ४३॥

तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम्।

धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मद्बुद्धिरनुगम्यताम्॥ ४४॥

‘इसलिये केवल क्षात्रधर्मका अवलम्बन करनेवाली इस ओछी बुद्धिका त्याग करो, धर्मका आश्रय लो, कठोरता छोड़ो और मेरे विचारके अनुसार चलो’॥ ४४॥

तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रज:।

उवाच भूय: कौसल्यां प्राञ्जलि: शिरसा नत:॥ ४५॥

अपने भाई लक्ष्मणसे सौहार्दवश ऐसी बात कहकर उनके बड़े भ्राता श्रीरामने पुन: कौसल्याके चरणोंमें मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा—॥ ४५॥

अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम्।

शापितासि मम प्राणै: कुरु स्वस्त्ययनानि मे॥ ४६॥

‘देवि! मैं यहाँसे वनको जाऊँगा। तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन कराओ। यह बात मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ॥ ४६॥

तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम्।

ययातिरिव राजर्षि: पुरा हित्वा पुनर्दिवम्॥ ४७॥

‘जैसे पूर्वकालमें राजर्षि ययाति स्वर्गलोकका त्याग करके पुन: भूतलपर उतर आये थे, उसी प्रकार मैं भी प्रतिज्ञा पूर्ण करके पुन: वनसे अयोध्यापुरीको लौट आऊँगा॥ ४७॥

शोक: संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुच:।

वनवासादिहैष्यामि पुन: कृत्वा पितुर्वच:॥ ४८॥

‘मा! शोकको अपने हृदयमें ही अच्छी तरह दबाये रखो। शोक न करो। पिताकी आज्ञाका पालन करके मैं फिर वनवाससे यहाँ लौट आऊँगा॥ ४८॥

त्वया मया च वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया।

पितुर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्म: सनातन:॥ ४९॥

‘तुमको, मुझको, सीताको, लक्ष्मणको और माता सुमित्राको भी पिताजीकी आज्ञामें ही रहना चाहिये। यही सनातन धर्म है॥ ४९॥

अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दु:खं हृदि निगृह्य च।

वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम्॥ ५०॥

‘मा! यह अभिषेककी सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मनका दु:ख मनमें ही दबा लो और वनवासके सम्बन्धमें जो मेरा धर्मानुकूल विचार है, उसका अनुसरण करो—मुझे जानेकी आज्ञा दो’॥ ५०॥

एतद् वचस्तस्य निशम्य माता

सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च।

मृतेव संज्ञां प्रतिलभ्य देवी

समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच॥ ५१॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह धर्मानुकूल तथा व्यग्रता और आकुलतासे रहित बात सुनकर जैसे मरे हुए मनुष्यमें प्राण आ जाय, उसी प्रकार देवी कौसल्या मूर्च्छा त्यागकर होशमें आ गयीं तथा अपने पुत्र श्रीरामकी ओर देखकर इस प्रकार कहने लगीं—॥ ५१॥

यथैव ते पुत्र पिता तथाहं

गुरु: स्वधर्मेण सुहृत्तया च।

न त्वानुजानामि न मां विहाय

सुदु:खितामर्हसि पुत्र गन्तुम्॥ ५२॥

‘बेटा! धर्म और सौहार्दके नाते जैसे पिता तुम्हारे लिये आदरणीय गुरुजन हैं, वैसी ही मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वनमें जानेकी आज्ञा नहीं देती। वत्स! मुझ दु:खियाको छोड़कर तुम्हें कहीं नहीं जाना चाहिये॥ ५२॥

किं जीवितेनेह विना त्वया मे

लोकेन वा किं स्वधयामृतेन।

श्रेयो मुहूर्तं तव संनिधानं

ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥ ५३॥

‘तुम्हारे बिना मुझे यहाँ इस जीवनसे क्या लाभ है? इन स्वजनोंसे, देवता तथा पितरोंकी पूजासे और अमृतसे भी क्या लेना है? तुम दो घड़ी भी मेरे पास रहो तो वही मेरे लिये सम्पूर्ण संसारके राज्यसे भी बढ़कर सुख देनेवाला है’॥ ५३॥

नरैरिवोल्काभिरपोह्यमानो

महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्ट:।

भूय: प्रजज्वाल विलापमेवं

निशम्य राम: करुणं जनन्या:॥ ५४॥

जैसे कोई विशाल गजराज किसी अन्धकूपमें पड़ जाय और लोग उसे जलते लुआठोंसे मार-मारकर पीडि़त करने लगें, उस दशामें वह क्रोधसे जल उठे; उसी प्रकार श्रीराम भी माताका बारंबार करुण-विलाप सुनकर (इसे स्वधर्मपालनमें बाधा मानकर) आवेशमें भर गये। (वनमें जानेका ही दृढ़ निश्चय कर लिया)॥ ५४॥

स मातरं चैव विसंज्ञकल्पा-

मार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम्।

धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं

यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम्॥ ५५॥

उन्होंने धर्ममें ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अचेत-सी हो रही मातासे और आर्त एवं संतप्त हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे भी ऐसी धर्मानुकूल बात कही, जैसी उस अवसरपर वे ही कह सकते थे॥ ५५॥

अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव

जानामि भक्तिं च पराक्रमं च।

मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य

मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदु:खम्॥ ५६॥

‘लक्ष्मण! मैं जानता हूँ, तुम सदा ही मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम कितना महान् है, यह भी मुझसे छिपा नहीं है; तथापि तुम मेरे अभिप्रायकी ओर ध्यान न देकर माताजीके साथ स्वयं भी मुझे पीड़ा दे रहे हो। इस तरह मुझे अत्यन्त दु:खमें न डालो॥ ५६॥

धर्मार्थकामा: खलु जीवलोके

समीक्षिता धर्मफलोदयेषु।

ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे

भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥ ५७॥

‘इस जीवजगत्में पूर्वकृत धर्मके फलकी प्राप्तिके अवसरोंपर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के-सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधन होती है। वह पतिके वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि-सत्कार आदि धर्मके पालनमें सहायक होती है। प्रेयसीरूपसे कामका साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोककी प्राप्तिरूप अर्थकी साधिका होती है॥ ५७॥

यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा

धर्मो यत: स्यात् तदुपक्रमेत।

द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके

कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥ ५८॥

‘जिस कर्ममें धर्म आदि सब पुरुषार्थोंका समावेश न हो, उसको नहीं करना चाहिये। जिससे धर्मकी सिद्धि होती हो, उसीका आरम्भ करना चाहिये। जो केवल अर्थपरायण होता है, वह लोकमें सबके द्वेषका पात्र बन जाता है तथा धर्मविरुद्ध काममें अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा नहीं, निन्दाकी बात है॥ ५८॥

गुरुश्च राजा च पिता च वृद्ध:

क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात्।

यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्मं

कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्ति:॥ ५९॥

‘महाराज हमलोगोंके गुरु, राजा और पिता होनेके साथ ही बड़े-बूढ़े माननीय पुरुष हैं। वे क्रोधसे, हर्षसे अथवा कामसे प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्यके लिये आज्ञा दें तो हमें धर्म समझकर उसका पालन करना चाहिये। जिसके आचरणोंमें क्रूरता नहीं है, ऐसा कौन पुरुष पिताकी आज्ञाके पालनरूप धर्मका आचरण नहीं करेगा॥ ५९॥

न तेन शक्नोमि पितु: प्रतिज्ञा-

मिमां न कर्तुं सकलां यथावत्।

स ह्यावयोस्तात गुरुर्नियोगे

देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्म:॥ ६०॥

‘इसलिये मैं पिताकी इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करनेसे मुँह नहीं मोड़ सकता। तात लक्ष्मण! वे हम दोनोंको आज्ञा देनेमें समर्थ गुरु हैं और माताजीके तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं॥ ६०॥

तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे

विशेषत: स्वे पथि वर्तमाने।

देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत्

कथंस्विदन्या विधवेव नारी॥ ६१॥

‘वे धर्मके प्रवर्तक महाराज अभी जीवित हैं और विशेषत: अपने धर्ममय मार्गपर स्थित हैं, ऐसी दशामें माताजी, जैसे दूसरी कोई विधवा स्त्री बेटेके साथ रहती है, उस प्रकार मेरे साथ यहाँसे वनमें कैसे चल सकती हैं?॥ ६१॥

सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं

कुरुष्व न: स्वस्त्ययनानि देवि।

यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं

यथा हि सत्येन पुनर्ययाति:॥ ६२॥

‘अत: देवि! तुम मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दो और हमारे मङ्गलके लिये स्वस्तिवाचन कराओ, जिससे वनवासकी अवधि समाप्त होनेपर मैं फिर तुम्हारी सेवामें आ जाऊँ। जैसे राजा ययाति सत्यके प्रभावसे फिर स्वर्गमें लौट आये थे॥ ६२॥

यशो ह्यहं केवलराज्यकारणा-

न्न पृष्ठत: कर्तुमलं महोदयम्।

अदीर्घकालेन तु देवि जीविते

वृणेऽवरामद्य महीमधर्मत:॥ ६३॥

‘केवल धर्महीन राज्यके लिये मैं महान् फलदायक धर्मपालनरूप सुयशको पीछे नहीं ढकेल सकता। मा! जीवन अधिक कालतक रहनेवाला नहीं है; इसके लिये मैं आज अधर्मपूर्वक इस तुच्छ पृथ्वीका राज्य लेना नहीं चाहता’॥ ६३॥

प्रसादयन्नरवृषभ: स मातरं

पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान्।

अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं

चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम्॥ ६४॥

इस प्रकार नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने धैर्यपूर्वक दण्डकारण्यमें जानेकी इच्छासे माताको प्रसन्न करनेका प्रयत्न किया तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मणको भी अपने विचारके अनुसार भलीभाँति धर्मका रहस्य समझाकर मन-ही-मन माताकी परिक्रमा करनेका संकल्प किया॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकविंश: सर्ग:॥ २१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१॥

 

द्वाविंश: सर्ग:

श्रीरामका लक्ष्मणको समझाते हुए अपने वनवासमें दैवको ही कारण बताना और अभिषेककी सामग्रीको हटा लेनेका आदेश देना

अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम्।

सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम्॥ १॥

आसाद्य राम: सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम्।

उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान्॥ २॥

(श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेके कारण) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथासे बहुत दु:खी थे। उनके मनमें विशेष अमर्ष भरा हुआ था। वे रोषसे भरे हुए गजराजकी भाँति क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे। अपने मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्तको निर्विकाररूपसे काबूमें रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मणके पास जाकर इस प्रकार बोले—॥ १-२॥

निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम्।

अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम्॥ ३॥

उपक्लृप्तं यदैतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम्।

सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम्॥ ४॥

‘लक्ष्मण! केवल धैर्यका आश्रय लेकर अपने मनके क्रोध और शोकको दूर करो, चित्तसे अपमानकी भावना निकाल दो और हृदयमें भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेकके लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमनमें बाधा उपस्थित न हो॥ ३-४॥

सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रम:।

अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रम:॥ ५॥

‘सुमित्रानन्दन! अबतक अभिषेकके लिये सामग्री जुटानेमें जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे वन जानेकी तैयारी करनेमें होना चाहिये॥ ५॥

यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते।

माता न: सा यथा न स्यात् सविशङ्का तथा कुरु॥ ६॥

‘मेरे अभिषेकके कारण जिसके चित्तमें संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयीको जिससे किसी तरहकी शङ्का न रह जाय, वही काम करो॥ ६॥

तस्या: शङ्कामयं दु:खं मुहूर्तमपि नोत्सहे।

मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम्॥ ७॥

‘लक्ष्मण! उसके मनमें संदेहके कारण दु:ख उत्पन्न हो, इस बातको मैं दो घड़ीके लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ॥

न बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन।

मातृणां वा पितुर्वाहं कृतमल्पं च विप्रियम्॥ ८॥

‘मैंने यहाँ कभी जान-बूझकर या अनजानमें माताओंका अथवा पिताजीका कोई छोटा-सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता॥ ८॥

सत्य: सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रम:।

परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम॥ ९॥

‘पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं। वे परलोकके भयसे सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजीका पारलौकिक भय दूर हो जाय॥ ९॥

तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहृते।

सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम्॥ १०॥

‘यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्यको रोक नहीं दिया गया तो पिताजीको भी मन-ही-मन यह सोचकर संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका वह मनस्ताप मुझे सदा संतप्त करता रहेगा॥ १०॥

अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण।

अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमित: पुर:॥ ११॥

‘लक्ष्मण! इन्हीं सब कारणोंसे मैं अपने अभिषेकका कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगरसे वनको चला जाना चाहता हूँ॥ ११॥

मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा।

सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां तत:॥ १२॥

‘आज मेरे चले जानेसे कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरतका निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे॥ १२॥

मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि।

गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मन: सुखम्॥ १३॥

‘मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिरपर जटाजूट बाँधे जब वनको चला जाऊँगा, तभी कैकेयीके मनको सुख प्राप्त होगा॥ १३॥

बुद्धि: प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम्।

तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम्॥ १४॥

‘जिस विधाताने कैकेयीको ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणासे उसका मन मुझे वन भेजनेमें अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफलमनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है॥ १४॥

कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने।

राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने॥ १५॥

‘सुमित्राकुमार! मेरे इस प्रवासमें तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्यके फिर हाथसे निकल जानेमें दैवको ही कारण समझना चाहिये॥ १५॥

कैकेय्या: प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने।

यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत्॥ १६॥

‘मेरी समझसे कैकेयीका यह विपरीत मनोभाव दैवका ही विधान है। यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वनमें भेजकर पीड़ा देनेका विचार क्यों करती॥ १६॥

जानासि हि यथा सौम्य न मातृषु ममान्तरम्।

भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा॥ १७॥

‘सौम्य! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मनमें पहले भी कभी माताओंके प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्रमें कोई अन्तर नहीं समझती थी॥ १७॥

सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थै: प्रवासार्थैश्च दुर्वचै:।

उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये॥ १८॥

‘मेरे अभिषेकको रोकने और मुझे वनमें भेजनेके लिये उसने राजाको प्रेरित करनेके निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनोंका प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्योंके लिये भी मुँहसे निकालना कठिन है। उसकी ऐसी चेष्टामें मैं दैवके सिवा दूसरे किसी कारणका समर्थन नहीं करता॥ १८॥

कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा।

ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीड्यं भर्तृसंनिधौ॥ १९॥

‘यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्रीकी भाँति अपने पतिके समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती—मुझे कष्ट देनेके लिये रामको वनमें भेजनेका प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती॥ १९॥

यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते।

व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्यय:॥ २०॥

‘जिसके विषयमें कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैवका विधान है। प्राणियोंमें अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैवके विधानको मेट सके; अत: निश्चय ही उसीकी प्रेरणासे मुझमें और कैकेयीमें यह भारी उलट-फेर हुआ है (मेरे हाथमें आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयीकी बुद्धि बदल गयी)॥ २०॥

कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धुमुत्सहते पुमान्।

यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते॥ २१॥

‘सुमित्रानन्दन! कर्मोंके सुख-दु:खादिरूप फल प्राप्त होनेपर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफलसे अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैवके साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है?॥ २१॥

सुखदु:खे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ।

यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत्॥ २२॥

‘सुख-दु:ख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकारके और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझमें नहीं आता, वे सब दैवके ही कर्म हैं॥ २२॥

ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिता:।

उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभि:॥ २३॥

‘उग्र तपस्वी ऋषि भी दैवसे प्रेरित होकर अपने तीव्र नियमोंको छोड़ बैठते और काम-क्रोधके द्वारा विवश हो मर्यादासे भ्रष्ट हो जाते हैं॥ २३॥

असंकल्पितमेवेह यदकस्मात् प्रवर्तते।

निवर्त्यारब्धमारम्भैर्ननु दैवस्य कर्म तत्॥ २४॥

‘जो बात बिना सोचे-विचारे अकस्मात् सिरपर आ पड़ती है और प्रयत्नोंद्वारा आरम्भ किये हुए कार्यको रोककर एक नया ही काण्ड उपस्थित कर देती है, अवश्य वह दैवका ही विधान है॥ २४॥

एतया तत्त्वया बुद्ध्या संस्तभ्यात्मानमात्मना।

व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो न विद्यते॥ २५॥

‘इस तात्त्विक बुद्धिके द्वारा स्वयं ही मनको स्थिर कर लेनेके कारण मुझे अपने अभिषेकमें विघ्न पड़ जानेपर भी दु:ख या संताप नहीं हो रहा है॥ २५॥

तस्मादपरिताप: संस्त्वमप्यनुविधाय माम्।

प्रतिसंहारय क्षिप्रमाभिषेचनिकीं क्रियाम्॥ २६॥

‘इसी प्रकार तुम भी मेरे विचारका अनुसरण करके संतापशून्य हो राज्याभिषेकके इस आयोजनको शीघ्र बंद करा दो॥ २६॥

एभिरेव घटै: सर्वैरभिषेचनसम्भृतै:।

मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति॥ २७॥

‘लक्ष्मण! राज्याभिषेकके लिये सँजोकर रखे गये इन्हीं सब कलशोंद्वारा मेरा तापस-व्रतके संकल्पके लिये आवश्यक स्नान होगा॥ २७॥

अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु।

उद्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति॥ २८॥

‘अथवा राज्याभिषेकसम्बन्धी मङ्गल द्रव्यमय इस कलशजलकी मुझे क्या आवश्यकता है? स्वयं मेरे द्वारा अपने हाथसे निकाला हुआ जल ही मेरे व्रतादेशका साधक होगा॥ २८॥

मा च लक्ष्मण संतापं कार्षीर्लक्ष्म्या विपर्यये।

राज्यं वा वनवासो वा वनवासो महोदय:॥ २९॥

‘लक्ष्मण! लक्ष्मीके इस उलट-फेरके विषयमें तुम कोई चिन्ता न करो। मेरे लिये राज्य अथवा वनवास दोनों समान हैं, बल्कि विशेष विचार करनेपर वनवास ही महान् अभ्युदयकारी प्रतीत होता है॥ २९॥

न लक्ष्मणास्मिन् मम राज्यविघ्ने

माता यवीयस्यभिशङ्कितव्या।

दैवाभिपन्ना न पिता कथंचि-

ज्जानासि दैवं हि तथाप्रभावम्॥ ३०॥

‘लक्ष्मण! मेरे राज्याभिषेकमें जो विघ्न आया है, इसमें मेरी सबसे छोटी माता कारण है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह दैवके अधीन थी। इसी प्रकार पिताजी भी किसी तरह इसमें कारण नहीं हैं। तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभावको जानते ही हो, वही कारण है’॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वाविंश: सर्ग:॥ २२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥

 

त्रयोविंश: सर्ग:

लक्ष्मणकी ओजभरी बातें, उनके द्वारा दैवका खण्डन और पुरुषार्थका प्रतिपादन तथा उनका श्रीरामके अभिषेकके निमित्त विरोधियोंसे लोहा लेनेके लिये उद्यत होना

इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक् शिरा इव।

ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयो:॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दु:ख और हर्षके बीचकी स्थितिमें आ गये (श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेके कारण उन्हें दु:ख हुआ और उनकी धर्ममें दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई)॥

तदा तु बद‍्ध्वा भ्रुकुटीं भ्रुवोर्मध्ये नरर्षभ:।

निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषित:॥ २॥

नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने उस समय ललाटमें भौंहोंको चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिलमें बैठा हुआ महान् सर्प रोषमें भरकर फुंकार मार रहा हो॥

तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भ्रुकुटीसहितं तदा।

बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम्॥ ३॥

तनी हुई भौंहोंके साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंहके मुखके समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था॥ ३॥

अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मन:।

तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्॥ ४॥

अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।

जैसे हाथी अपनी सूँड हिलाया करता है, उसी प्रकार वे अपने दाहिने हाथको हिलाते और गर्दनको शरीरमें ऊपर-नीचे और अगल-बगल सब ओर घुमाते हुए नेत्रोंके अग्रभागसे टेढ़ी नजरोंद्वारा अपने भाई श्रीरामको देखकर उनसे बोले—॥ ४/

अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम्॥ ५॥

धर्मदोषप्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया।

कथं ह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति॥ ६॥

यथा ह्येवमशौण्डीरं शौण्डीर: क्षत्रियर्षभ:।

किं नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि॥ ७॥

‘भैया! आप समझते हैं कि यदि पिताकी इस आज्ञाका पालन करनेके लिये मैं वनको न जाऊँ तो धर्मके विरोधका प्रसङ्ग उपस्थित होता है, इसके सिवा लोगोंके मनमें यह बड़ी भारी शङ्का उठ खड़ी होगी कि जो पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन करता है, वह यदि राजा ही हो जाय तो हमारा धर्मपूर्वक पालन कैसे करेगा? साथ ही आप यह भी सोचते हैं कि यदि मैं पिताकी इस आज्ञाका पालन नहीं करूँ तो दूसरे लोग भी नहीं करेंगे। इस प्रकार धर्मकी अवहेलना होनेसे जगत्के विनाशका भय उपस्थित होगा। इन सब दोषों और शङ्काओंका निराकरण करनेके लिये आपके मनमें वनगमनके प्रति जो यह बड़ा भारी सम्भ्रम (उतावलापन) आ गया है, यह सर्वथा अनुचित एवं भ्रममूलक ही है; क्योंकि आप असमर्थ ‘दैव’ नामक तुच्छ वस्तुको प्रबल बता रहे हैं। दैवका निराकरण करनेमें समर्थ आप-जैसा क्षत्रियशिरोमणि वीर यदि भ्रममें नहीं पड़ गया होता तो ऐसी बात कैसे कह सकता था? अत: असमर्थ पुरुषोंद्वारा ही अपनाये जाने योग्य और पौरुषके निकट कुछ भी करनेमें असमर्थ ‘दैव’ की आप साधारण मनुष्यके समान इतनी स्तुति या प्रशंसा क्यों कर रहे हैं?॥ ५—७॥

पापयोस्ते कथं नाम तयो: शङ्का न विद्यते।

सन्ति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् किं न बुध्यसे॥ ८॥

‘धर्मात्मन्! आपको उन दोनों पापियोंपर संदेह क्यों नहीं होता? संसारमें कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं, जो दूसरोंको ठगनेके लिये धर्मका ढोंग बनाये रहते हैं, क्या आप उन्हें नहीं जानते हैं?॥ ८॥

तयो: सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात् परिजिहीर्षतो:।

यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव।

तयो: प्रागेव दत्तश्च स्याद् वर:प्रकृतश्च स:॥ ९॥

‘रघुनन्दन! वे दोनों अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये शठतावश धर्मके बहाने आप-जैसे सच्चरित्र पुरुषका परित्याग करना चाहते हैं। यदि उनका ऐसा विचार न होता तो जो कार्य आज हुआ है, वह पहले ही हो गया होता। यदि वरदानवाली बात सच्ची होती तो आपके अभिषेकका कार्य प्रारम्भ होनेसे पहले ही इस तरहका वर दे दिया गया होता॥ ९॥

लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम्।

नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि॥ १०॥

(गुणवान् ज्येष्ठ पुत्रके रहते हुए छोटेका अभिषेक करना) यह लोकविरुद्ध कार्य है, जिसका आज आरम्भ किया गया है। आपके सिवा दूसरे किसीका राज्याभिषेक हो, यह मुझसे सहन नहीं होनेका। इसके लिये आप मुझे क्षमा करेंगे॥ १०॥

येनैवमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते।

सोऽपि धर्मो मम द्वेष्यो यत्प्रसङ्गाद् विमुह्यसि॥ ११॥

‘महामते! पिताके जिस वचनको मानकर आप मोहमें पड़े हुए हैं और जिसके कारण आपकी बुद्धिमें दुविधा उत्पन्न हो गयी है, मैं उसे धर्म माननेका पक्षपाती नहीं हूँ; ऐसे धर्मका तो मैं घोर विरोध करता हूँ॥ ११॥

कथं त्वं कर्मणा शक्त: कैकेयीवशवर्तिन:।

करिष्यसि पितुर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम्॥ १२॥

‘आप अपने पराक्रमसे सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी कैकेयीके वशमें रहनेवाले पिताके अधर्मपूर्ण एवं निन्दित वचनका पालन कैसे करेंगे?॥ १२॥

यदयं किल्बिषाद् भेद: कृतोऽप्येवं न गृह्यते।

जायते तत्र मे दु:खं धर्मसङ्गश्च गर्हित:॥ १३॥

‘वरदानकी झूठी कल्पनाका पाप करके आपके अभिषेकमें रोड़ा अटकाया गया है, फिर भी आप इस रूपमें नहीं ग्रहण करते हैं। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा दु:ख होता है। ऐसे कपटपूर्ण धर्मके प्रति होनेवाली आसक्ति निन्दित है॥ १३॥

तवायं धर्मसंयोगो लोकस्यास्य विगर्हित:।

मनसापि कथं कामं कुर्यात् त्वां कामवृत्तयो:।

तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शत्र्वो: पित्रभिधानयो:॥ १४॥

‘ऐसे पाखण्डपूर्ण धर्मके पालनमें जो आपकी प्रवृत्ति हो रही है, वह यहाँके जनसमुदायकी दृष्टिमें निन्दित है। आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष सदा पुत्रका अहित करनेवाले, पिता-माता नामधारी उन कामाचारी शत्रुओंके मनोरथको मनसे भी कैसे पूर्ण कर सकता है (उसकी पूर्तिका विचार भी मनमें कैसे ला सकता है?)॥ १४॥

यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम्।

तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते॥ १५॥

‘माता-पिताके इस विचारको कि—‘आपका राज्याभिषेक न हो’ जो आप दैवकी प्रेरणाका फल मानते हैं, यह भी मुझे अच्छा नहीं लगता। यद्यपि वह आपका मत है, तथापि आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये॥ १५॥

विक्लवो वीर्यहीनो य: स दैवमनुवर्तते।

वीरा: सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते॥ १६॥

‘जो कायर है, जिसमें पराक्रमका नाम नहीं है, वही दैवका भरोसा करता है। सारा संसार जिन्हें आदरकी दृष्टिसे देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैवकी उपासना नहीं करते हैं॥ १६॥

दैवं पुरुषकारेण य: समर्थ: प्रबाधितुम्।

न दैवेन विपन्नार्थ: पुरुष: सोऽवसीदति॥ १७॥

‘जो अपने पुरुषार्थसे दैवको दबानेमें समर्थ है, वह पुरुष दैवके द्वारा अपने कार्यमें बाधा पड़नेपर खेद नहीं करता—शिथिल होकर नहीं बैठता॥ १७॥

द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च।

दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति॥ १८॥

‘आज संसारके लोग देखेंगे कि दैवकी शक्ति बड़ी है या पुरुषका पुरुषार्थ। आज दैव और मनुष्यमें कौन बलवान् है और कौन दुर्बल—इसका स्पष्ट निर्णय हो जायगा॥ १८॥

अद्य मे पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जना:।

यैर्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम्॥ १९॥

‘जिन लोगोंने दैवके बलसे आज आपके राज्याभिषेकको नष्ट हुआ देखा है, वे ही आज मेरे पुरुषार्थसे अवश्य ही दैवका भी विनाश देख लेंगे॥ १९॥

अत्यङ्कुशमिवोद्दामं गजं मदजलोद्धतम्।

प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये॥ २०॥

‘जो अङ्कुशकी परवा नहीं करता और रस्से या साँकलको भी तोड़ देता है, मदकी धारा बहानेवाले उस मत्त गजराजकी भाँति वेगपूर्वक दौड़नेवाले दैवको भी आज मैं अपने पुरुषार्थसे पीछे लौटा दूँगा॥ २०॥

लोकपाला: समस्तास्ते नाद्य रामाभिषेचनम्।

न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्यु: किं पुन: पिता॥ २१॥

‘समस्त लोकपाल और तीनों लोकोंके सम्पूर्ण प्राणी आज श्रीरामके राज्याभिषेकको नहीं रोक सकते, फिर केवल पिताजीकी तो बात ही क्या है?॥ २१॥

यैर्विवासस्तवारण्ये मिथो राजन् समर्थित:।

अरण्ये ते विवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा॥ २२॥

‘राजन्! जिन लोगोंने आपसमें आपके वनवासका समर्थन किया है, वे स्वयं चौदह वर्षोंतक वनमें जाकर छिपे रहेंगे॥ २२॥

अहं तदाशां धक्ष्यामि पितुस्तस्याश्च या तव।

अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते॥ २३॥

‘मैं पिताकी और जो आपके अभिषेकमें विघ्न डालकर अपने पुत्रको राज्य देनेके प्रयत्नमें लगी हुई है, उस कैकेयीकी भी उस आशाको जलाकर भस्म कर डालूँगा॥ २३॥

मद्बलेन विरुद्धाय न स्याद् दैवबलं तथा।

प्रभविष्यति दु:खाय यथोग्रं पौरुषं मम॥ २४॥

‘जो मेरे बलके विरोधमें खड़ा होगा, उसे मेरा भयंकर पुरुषार्थ जैसा दु:ख देनेमें समर्थ होगा, वैसा दैवबल उसे सुख नहीं पहुँचा सकेगा॥ २४॥

ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम्।

आर्यपुत्रा: करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि॥ २५॥

‘सहस्रों वर्ष बीतनेके पश्चात् जब आप अवस्थाक्रमसे वनमें निवास करनेके लिये जायँगे, उस समय आपके बाद आपके पुत्र प्रजापालनरूप कार्य करेंगे (अर्थात् उस समय भी दूसरोंको इस राज्यमें दखल देनेका अवसर नहीं प्राप्त होगा)॥ २५॥

पूर्वराजर्षिवृत्त्या हि वनवासोऽभिधीयते।

प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत् परिपालने॥ २६॥

‘पुरातन राजर्षियोंकी आचारपरम्पराके अनुसार प्रजाका पुत्रवत् पालन करनेके निमित्त प्रजावर्गको पुत्रोंके हाथमें सौंपकर वृद्ध राजाका वनमें निवास करना उचित बताया जाता है॥ २६॥

स चेद् राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया।

नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि॥ २७॥

‘धर्मात्मा श्रीराम! हमारे महाराज वानप्रस्थधर्मके पालनमें चित्तको एकाग्र नहीं कर रहे हैं, इसीलिये यदि आप यह समझते हों कि उनकी आज्ञाके विरुद्ध राज्य ग्रहण कर लेनेपर समस्त जनता विद्रोही हो जायगी, अत: राज्य अपने हाथमें नहीं रह सकेगा और इसी शङ्कासे यदि आप अपने ऊपर राज्यका भार नहीं लेना चाहते हैं अथवा वनमें चले जाना चाहते हैं तो इस शङ्काको छोड़ दीजिये॥ २७॥

प्रतिजाने च ते वीर मा भूवं वीरलोकभाक्।

राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम्॥ २८॥

‘वीर! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जैसे तटभूमि समुद्रको रोके रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी और आपके राज्यकी रक्षा करूँगा। यदि ऐसा न करूँ तो वीरलोकका भागी न होऊँ॥ २८॥

मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्यापृतो भव।

अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात्॥ २९॥

‘इसलिये आप मङ्गलमयी अभिषेक-सामग्रीसे अपना अभिषेक होने दीजिये। इस अभिषेकके कार्यमें आप तत्पर हो जाइये। मैं अकेला ही बलपूर्वक समस्त विरोधी भूपालोंको रोक रखनेमें समर्थ हूँ॥ २९॥

न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।

नासिराबन्धनार्थाय न शरा: स्तम्भहेतव:॥ ३०॥

‘ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभाके लिये नहीं हैं। मेरे इस धनुषका आभूषण नहीं बनेगा। यह तलवार केवल कमरमें बाँधे रखनेके लिये नहीं है तथा इन बाणोंके खम्भे नहीं बनेंगे॥ ३०॥

अमित्रमथनार्थाय सर्वमेतच्चतुष्टयम्।

न चाहं कामयेऽत्यर्थं य: स्याच्छत्रुर्मतो मम॥ ३१॥

‘ये सब चारों वस्तुएँ शत्रुओंका दमन करनेके लिये ही हैं। जिसे मैं अपना शत्रु समझता हूँ, उसे कदापि जीवित रहने देना नहीं चाहता॥ ३१॥

असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा।

प्रगृहीतेन वै शत्रुं वज्रिणं वा न कल्पये॥ ३२॥

‘जिस समय मैं इस तीखी धारवाली तलवारको हाथमें लेता हूँ, यह बिजलीकी तरह चञ्चल प्रभासे चमक उठती है। इसके द्वारा अपने किसी भी शत्रुको, वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, मैं कुछ नहीं समझता॥ ३२॥

खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे।

हस्त्यश्वरथिहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही॥ ३३॥

‘आज मेरे खड्गके प्रहारसे पीस डाले गये हाथी, घोड़े और रथियोंके हाथ, जाँघ और मस्तकोंद्वारा पटी हुई यह पृथ्वी ऐसी गहन हो जायगी कि इसपर चलना-फिरना कठिन हो जायगा॥ ३३॥

खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाग्नय:।

पतिष्यन्ति द्विषो भूमौ मेघा इव सविद्युत:॥ ३४॥

‘मेरी तलवारकी धारसे कटकर रक्तसे लथपथ हुए शत्रु जलती हुई आगके समान जान पड़ेंगे और बिजलीसहित मेघोंके समान आज पृथ्वीपर गिरेंगे॥ ३४॥

बद्धगोधाङ्गुलित्राणे प्रगृहीतशरासने।

कथं पुरुषमानी स्यात् पुरुषाणां मयि स्थिते॥ ३५॥

‘अपने हाथोंमें गोहके चर्मसे बने हुए दस्तानेको बाँधकर जब हाथमें धनुष ले मैं युद्धके लिये खड़ा हो जाऊँगा, उस समय पुरुषोंमेंसे कोई भी मेरे सामने कैसे अपने पौरुषपर अभिमान कर सकेगा?॥ ३५॥

बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहूञ्जनान्।

विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु॥ ३६॥

‘मैं बहुत-से बाणोंद्वारा एकको और एक ही बाणसे बहुत-से योद्धाओंको धराशायी करता हुआ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके मर्मस्थानोंपर बाण मारूँगा॥ ३६॥

अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभाव: प्रभविष्यति।

राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं च तव प्रभो॥ ३७॥

‘प्रभो! आज राजा दशरथकी प्रभुताको मिटाने और आपके प्रभुत्वकी स्थापना करनेके लिये अस्त्रबलसे सम्पन्न मुझ लक्ष्मणका प्रभाव प्रकट होगा॥ ३७॥

अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।

वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च॥ ३८॥

अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यत:।

अभिषेचनविघ्नस्य कर्तृणां ते निवारणे॥ ३९॥

‘श्रीराम! आज मेरी ये दोनों भुजाएँ, जो चन्दनका लेप लगाने, बाजूबंद पहनने, धनका दान करने और सुहृदोंके पालनमें संलग्न रहनेके योग्य हैं, आपके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेवालोंको रोकनेके लिये अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट करेंगी॥ ३८-३९॥

ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यतां

तवासुहृत् प्राणयश:सुहृज्जनै:।

यथा तवेयं वसुधा वशा भवेत्

तथैव मां शाधि तवास्मि किंकर:॥ ४०॥

‘प्रभो! बतलाइये, मैं आपके किस शत्रुको अभी प्राण, यश और सुहृज्जनोंसे सदाके लिये बिलग कर दूँ। जिस उपायसे भी यह पृथ्वी आपके अधिकारमें आ जाय, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपका दास हूँ’॥

विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत्

स लक्ष्मणं राघववंशवर्धन:।

उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं

निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथ:॥ ४१॥

रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले श्रीरामने लक्ष्मणकी ये बातें सुनकर उनके आँसू पोंछे और उन्हें बारंबार सान्त्वना देते हुए कहा—‘सौम्य! मुझे तो तुम माता-पिताकी आज्ञाके पालनमें ही दृढ़तापूर्वक स्थित समझो। यही सत्पुरुषोंका मार्ग है’॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग:॥ २३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३॥

 

चतुर्विंश: सर्ग:

विलाप करती हुई कौसल्याका श्रीरामसे अपनेको भी साथ ले चलनेके लिये आग्रह करना तथा पतिकी सेवा ही नारीका धर्म है, यह बताकर श्रीरामका उन्हें रोकना और वन जानेके लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना

तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने।

कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत्॥ १॥

कौसल्याने जब देखा कि श्रीरामने पिताकी आज्ञाके पालनका ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओंसे रुँधी हुई गद्गद वाणीमें धर्मात्मा श्रीरामसे इस प्रकार बोलीं—॥ १॥

अदृष्टदु:खो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवद:।

मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत्॥ २॥

‘हाय! जिसने जीवनमें कभी दु:ख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियोंसे सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथसे मेरे द्वारा हुआ है, वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्तिसे—खेतमें गिरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीनकर कैसे जीवन-निर्वाह कर सकेगा?॥ २॥

यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते।

कथं स भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥ ३॥

‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वनमें फल-मूलका आहार कैसे करेंगे?॥ ३॥

क एतच्छ्रद्दधेच्छ्रुत्वा कस्य वा न भवेद् भयम्।

गुणवान् दयितो राज्ञ: काकुत्स्थो यद् विवास्यते॥ ४॥

‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथके प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीरामको जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इसपर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा?॥ ४॥

नूनं तु बलवाँल्लोके कृतान्त: सर्वमादिशन्।

लोके रामाभिरामस्त्वं वनं यत्र गमिष्यसि॥ ५॥

‘श्रीराम! निश्चय ही इस जगत्में दैव सबसे बड़ा बलवान् है। उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है—वही सबको सुख-दु:खसे संयुक्त करता है; क्योंकि उसीके प्रभावमें आकर तुम्हारे-जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वनमें जानेको उद्यत है॥ ५॥

अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुत:।

विलापदु:खसमिधो रुदिताश्रुहुताहुति:॥ ६॥

चिन्ताबाष्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तज: ।

कर्शयित्वाधिकं पुत्र नि:श्वासायाससम्भव:॥ ७॥

त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान्।

प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये॥ ८॥

‘परंतु बेटा! तुमसे बिछुड़ जानेपर यहाँ मुझे शोककी अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतुमें दावानल सूखी लकडि़यों और घास-फूसको जला डालता है। शोककी यह आग मेरे अपने ही मनमें प्रकट हुई है। तुम्हें न देख पानेकी सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्निको उद्दीप्त कर रही है। विलापजनित दु:ख ही इसमें ईंधनका काम कर रहे हैं। रोनेसे जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घीकी आहुति हैं। चिन्ताके कारण जो गरम-गरम उच्छ्वास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है। तुम दूर देशमें जाकर फिर किस तरह आओगे—इस प्रकारकी चिंता ही इस शोकाग्निको जन्म दे रही है। साँस लेनेका जो प्रयत्न है, उसीसे इस आगकी प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है। तुम्हीं इसे बुझानेके लिये जल हो। तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी॥ ६—८॥

कथं हि धेनु: स्वं वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति।

अहं त्वानुगमिष्यामि यत्र वत्स गमिष्यसि॥ ९॥

‘वत्स! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़ेके पीछे-पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी’॥ ९॥

यथा निगदितं मात्रा तद् वाक्यं पुरुषर्षभ:।

श्रुत्वा रामोऽब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदु:खिताम्॥ १०॥

माता कौसल्याने जैसे जो कुछ कहा, उस वचनको सुनकर पुरुषोत्तम श्रीरामने अत्यन्त दु:खमें डूबी हुई अपनी माँसे पुन: इस प्रकार कहा—॥ १०॥

कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते।

भवत्या च परित्यक्तो न नूनं वर्तयिष्यति॥ ११॥

‘माँ! कैकेयीने राजाके साथ धोखा किया है। इधर मैं वनको चला जा रहा हूँ। इस दशामें यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे॥ ११॥

भर्तु: किल परित्यागो नृशंस: केवलं स्त्रिया:।

स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विगर्हित:॥ १२॥

‘पतिका परित्याग नारीके लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है। सत्पुरुषोंने इसकी बड़ी निन्दा की है; अत: तुम्हें तो ऐसी बात कभी मनमें भी नहीं लानी चाहिये॥ १२॥

यावज्जीवति काकुत्स्थ: पिता मे जगतीपति:।

शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्म: सनातन:॥ १३॥

‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हींकी सेवा करो। पतिकी सेवा ही स्त्रीके लिये सनातन धर्म है’॥ १३॥

एवमुक्ता तु रामेण कौसल्या शुभदर्शना।

तथेत्युवाच सुप्रीता राममक्लिष्टकारिणम्॥ १४॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर शुभ कर्मोंपर दृष्टि रखनेवाली देवी कौसल्याने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामसे कहा—‘अच्छा बेटा! ऐसा ही करूँगी’॥ १४॥

एवमुक्तस्तु वचनं रामो धर्मभृतां वर:।

भूयस्तामब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदु:खिताम्॥ १५॥

माँके इस प्रकार स्वीकृतिसूचक बात कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने अत्यन्त दु:खमें पड़ी हुई अपनी मातासे पुन: इस प्रकार कहा—॥ १५॥

मया चैव भवत्या च कर्तव्यं वचनं पितु:।

राजा भर्ता गुरु: श्रेष्ठ: सर्वेषामीश्वर: प्रभु:॥ १६॥

‘माँ! पिताजीकी आज्ञाका पालन करना मेरा और तुम्हारा—दोनोंका कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगोंके स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं॥ १६॥

इमानि तु महारण्ये विहृत्य नव पञ्च च।

वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तव॥ १७॥

‘इन चौदह वर्षोंतक मैं विशाल वनमें घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेमसे तुम्हारी आज्ञाका पालन करता रहूँगा’॥ १७॥

एवमुक्ता प्रियं पुत्रं बाष्पपूर्णानना तदा।

उवाच परमार्ता तु कौसल्या सुतवत्सला॥ १८॥

उनके ऐसा कहनेपर पुत्रवत्सला कौसल्याके मुखपर पुन: आँसुओंकी धारा बह चली। वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्रसे बोलीं—॥ १८॥

आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये न मे क्षमम्।

नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव॥ १९॥

यदि ते गमने बुद्धि: कृता पितरपेक्षया।

‘बेटा राम! अब मुझसे इन सौतोंके बीचमें नहीं रहा जायगा। काकुत्स्थ! यदि पिताकी आज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे तुमने वनमें जानेका ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हरिणीकी भाँति वनमें ही ले चलो’॥ १९/

तां तथा रुदतीं रामो रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २०॥

जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता दैवतं प्रभुरेव च।

भवत्या मम चैवाद्य राजा प्रभवति प्रभु:॥ २१॥

यह कहकर माता कौसल्या रोने लगीं। उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले—‘माँ! स्त्रीके जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वरके समान है। महाराज तुम्हारे और मेरे दोनोंके प्रभु हैं॥ २०-२१॥

न ह्यनाथा वयं राज्ञा लोकनाथेन धीमता।

भरतश्चापि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवद:॥ २२॥

भवतीमनुवर्तेत स हि धर्मरत: सदा।

‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तबतक हमें अपनेको अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सदा ही धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अत: वे तुम्हारा अनुसरण—तुम्हारी सेवा करेंगे॥ २२/

यथा मयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिव:॥ २३॥

श्रमं नावाप्नुयात् किंचिदप्रमत्ता तथा कुरु।

‘मेरे चले जानेपर जिस तरह भी महाराजको पुत्रशोकके कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानीके साथ वैसा ही प्रयत्न करना॥ २३/

दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं न विनाशयेत्॥ २४॥

राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता।

‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराजके हित-साधनमें लगी रहना॥ २४/

व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥ २५॥

भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत्।

‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदिकी दृष्टिसे परम उत्तम तथा व्रत-उपवासमें तत्पर होकर भी जो नारी पतिकी सेवा नहीं करती है, उसे पापियोंको मिलनेवाली गति (नरक आदि)- की प्राप्ति होती है॥ २५/

भर्तु: शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम्॥ २६॥

अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।

‘जो अन्यान्य देवताओंकी वन्दना और पूजासे दूर रहती है, वह नारी भी केवल पतिकी सेवामात्रसे उत्तम स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेती है॥ २६/

शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तु: प्रियहिते रता॥ २७॥

एष धर्म: स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुत: स्मृत:।

‘अत: नारीको चाहिये कि वह पतिके प्रिय एवं हितसाधनमें तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्रीका वेद और लोकमें प्रसिद्ध नित्य (सनातन) धर्म है। इसीका श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी वर्णन है॥ २७/

अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवता:॥ २८॥

पूज्यास्ते मत्कृते देवि ब्राह्मणाश्चैव सत्कृता:।

‘देवि! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामनासे सदा अग्निहोत्रके अवसरोंपर पुष्पोंसे देवताओंका तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणोंका भी पूजन करते रहना चाहिये॥ २८/

एवं कालं प्रतीक्षस्व ममागमनकांक्षिणी॥ २९॥

नियता नियताहारा भर्तृशुश्रूषणे रता।

‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमोंका पालन करती हुई स्वामीकी सेवामें लगी रहो और मेरे आगमनकी इच्छा रखकर समयकी प्रतीक्षा करो॥ २९/

प्राप्स्यसे परमं कामं मयि पर्यागते सति॥ ३०॥

यदि धर्मभृतां श्रेष्ठो धारयिष्यति जीवितम्।

‘यदि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आनेपर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’॥

एवमुक्ता तु रामेण बाष्पपर्याकुलेक्षणा॥ ३१॥

कौसल्या पुत्रशोकार्ता रामं वचनमब्रवीत्।

श्रीरामके ऐसा कहनेपर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। वे पुत्रशोकसे पीडि़त होकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोलीं—॥ ३१/

गमने सुकृतां बुद्धिं न ते शक्नोमि पुत्रक॥ ३२॥

विनिवर्तयितुं वीर नूनं कालो दुरत्यय:।

‘बेटा! मैं तुम्हारे वनमें जानेके निश्चित विचारको नहीं पलट सकती। वीर! निश्चय ही कालकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है॥ ३२/

गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो॥ ३३॥

पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा।

‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अब तुम निश्चिन्त होकर वनको जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वनसे लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश—सब संताप दूर हो जायँगे॥ ३३/

प्रत्यागते महाभागे कृतार्थे चरितव्रते।

पितुरानृण्यतां प्राप्ते स्वपिष्ये परमं सुखम्॥ ३४॥

‘बेटा! जब तुम वनवासका महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिताके ऋणसे उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुखकी नींद सो सकूँगी॥ ३४॥

कृतान्तस्य गति: पुत्र दुर्विभाव्या सदा भुवि।

यस्त्वां संचोदयति मे वच आविध्य राघव॥ ३५॥

‘बेटा रघुनन्दन! इस भूतलपर दैवकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जानेके लिये प्रेरित कर रहा है॥ ३५॥

गच्छेदानीं महाबाहो क्षेमेण पुनरागत:।

नन्दयिष्यसि मां पुत्र साम्ना श्लक्ष्णेन चारुणा॥ ३६॥

‘बेटा! महाबाहो! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वनाभरे मधुर एवं मनोहर वचनोंसे मुझे आनन्दित करना॥ ३६॥

अपीदानीं स काल: स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुन:।

यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम्॥ ३७॥

‘वत्स! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वनसे लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी’॥ ३७॥

तथा हि रामं वनवासनिश्चितं

ददर्श देवी परमेण चेतसा।

उवाच रामं शुभलक्षणं वचो

बभूव च स्वस्त्ययनाभिकांक्षिणी॥ ३८॥

देवी कौसल्याने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवासका दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदयसे उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन करानेकी इच्छा करने लगीं॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्विंश: सर्ग:॥ २४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४॥

 


पञ्चविंश: सर्ग:

कौसल्याका श्रीरामकी वनयात्राके लिये मङ्गलकामनापूर्वक स्वस्तिवाचन करनाऔर श्रीरामका उन्हें प्रणाम करके सीताके भवनकी ओर जाना

सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि।

चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी॥ १॥

तदनन्तर उस क्लेशजनक शोकको मनसे निकालकर श्रीरामकी मनस्विनी माता कौसल्याने पवित्र जलसे आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्योंका अनुष्ठान करने लगीं॥ १॥

न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।

शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥ २॥

(इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं—) ‘रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषोंके मार्गपर स्थिर रहो और शीघ्र ही वनसे लौट आओ॥ २॥

यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।

स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥ ३॥

‘रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नताके साथ जिस धर्मका पालन करते हो, वही सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करे॥ ३॥

येभ्य: प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च।

ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभि:॥ ४॥

‘बेटा! देवस्थानों और मन्दिरोंमें जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियोंके साथ वनमें तुम्हारी रक्षा करें॥ ४॥

यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता।

तानि त्वामभिरक्षन्तु गुणै: समुदितं सदा॥ ५॥

‘तुम सद्गुणोंसे प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सब-के-सब सदा सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें॥ ५॥

पितृशुश्रूषया पुत्र मातृशुश्रूषया तथा।

सत्येन च महाबाहो चिरं जीवाभिरक्षित:॥ ६॥

‘महाबाहु पुत्र! तुम पिताकी शुश्रूषा, माताकी सेवा तथा सत्यके पालनसे सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो॥

समित्कुशपवित्राणि वेद्यश्चायतनानि च।

स्थण्डिलानि च विप्राणां शैला वृक्षा: क्षुपा हृदा:।

पतङ्गा: पन्नगा: सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तम॥ ७॥

‘नरश्रेष्ठ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणोंके देवपूजनसम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप (छोटी शाखावाले वृक्ष), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वनमें तुम्हारी रक्षा करें॥ ७॥

स्वस्ति साध्याश्च विश्वे च मरुतश्च महर्षिभि:।

स्वस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूषा भगोऽर्यमा॥ ८॥

‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियोंसहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें॥ ८॥

लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।

ऋतव: षट् च ते सर्वे मासा: संवत्सरा: क्षपा:॥ ९॥

दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।

श्रुति: स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वत:॥ १०॥

‘वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें। बेटा! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें॥ ९-१०॥

स्कन्दश्च भगवान् देव: सोमश्च सबृहस्पति:।

सप्तर्षयो नारदश्च ते त्वां रक्षन्तु सर्वत:॥ ११॥

‘भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद—ये सभी सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें॥ ११॥

ते चापि सर्वत: सिद्धा दिशश्च सदिगीश्वरा:।

स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यश:॥ १२॥

‘बेटा! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हो उस वनमें सदा सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें॥ १२॥

शैला: सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च।

द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचर:॥ १३॥

नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतै:।

अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम्॥ १४॥

‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओंसहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ—ये सब-के-सब वनमें जानेपर सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ १३-१४॥

ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासा: संवत्सरास्तथा।

कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते॥ १५॥

‘छ: ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा—ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें॥ १५॥

महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमत:।

तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदा: सदा॥ १६॥

‘मुनिका वेष धारण करके उस विशाल वनमें विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्रके लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों॥ १६॥

राक्षसानां पिशाचानां रौद्राणां क्रूरकर्मणाम्।

क्रव्यादानां च सर्वेषां मा भूत् पुत्रक ते भयम्॥ १७॥

‘बेटा! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओंसे कभी भय न हो॥ १७॥

प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने।

सरीसृपाश्च कीटाश्च मा भूवन् गहने तव॥ १८॥

‘वनमें जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वनमें तुम्हारे लिये हिंसक न हों॥ १८॥

महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिण:।

महिषा: शृङ्गिणो रौद्रा न ते द्रुह्यन्तु पुत्रक॥ १९॥

‘पुत्र! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले अन्य जीव तथा विशाल सींगवाले भयंकर भैंसे वनमें तुमसे द्रोह न करें॥ १९॥

नृमांसभोजना रौद्रा ये चान्ये सर्वजातय:।

मा च त्वां हिंसिषु: पुत्र मया सम्पूजितास्त्विह॥ २०॥

‘वत्स! इनके सिवा जो सभी जातियोंमें नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वनमें तुम्हारी हिंसा न करें॥ २०॥

आगमास्ते शिवा: सन्तु सिध्यन्तु च पराक्रमा:।

सर्वसम्पत्तयो राम स्वस्तिमान् गच्छ पुत्रक॥ २१॥

‘बेटा राम! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों। तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें। तुम सकुशल यात्रा करो॥ २१॥

स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्य: पार्थिवेभ्य: पुन: पुन:।

सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिन:॥ २२॥

‘तुम्हें आकाशचारी प्राणियोंसे, भूतलके जीव-जन्तुओंसे, समस्त देवताओंसे तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे॥ २२॥

शुक्र: सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा।

पान्तु त्वामर्चिता राम दण्डकारण्यवासिनम्॥ २३॥

‘श्रीराम! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम—ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्यमें निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ २३॥

अग्निर्वायुस्तथा धूमो मन्त्राश्चर्षिमुखच्युता:।

उपस्पर्शनकाले तु पान्तु त्वां रघुनन्दन॥ २४॥

‘रघुनन्दन! स्नान और आचमनके समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियोंके मुखसे निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें॥ २४॥

सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्तृ तथर्षय:।

ये च शेषा: सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम्॥ २५॥

‘समस्त लोकोंके स्वामी ब्रह्मा, जगत्के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब-के-सब वनवासके समय तुम्हारी रक्षा करें’॥ २५॥

इति माल्यै: सुरगणान् गन्धैश्चापि यशस्विनी।

स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरानर्चायतलोचना ॥ २६॥

ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौसल्याने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारोंसे तथा अनुरूप स्तुतियोंद्वारा देवताओंका पूजन किया॥ २६॥

ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना।

हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात्॥ २७॥

उन्होंने श्रीरामकी मङ्गलकामनासे अग्निको लाकर एक महात्मा ब्राह्मणके द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया॥

घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान्।

उपसम्पादयामास कौसल्या परमाङ्गना॥ २८॥

श्रेष्ठ नारी महारानी कौसल्याने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मणके समीप रखवा दीं॥ २८॥

उपाध्याय: स विधिना हुत्वा शान्तिमनामयम्।

हुतहव्यावशेषेण बाह्यं बलिमकल्पयत्॥ २९॥

पुरोहितजीने समस्त उपद्रवोंकी शान्ति और आरोग्यके उद्देश्यसे विधिपूर्वक अग्निमें होम करके हवनसे बचे हुए हविष्यके द्वारा होमकी वेदीसे बाहर दसों दिशाओंमें इन्द्र आदि लोकपालोंके लिये बलि अर्पित की॥ २९॥

मधुदध्यक्षतघृतै: स्वस्तिवाच्यं द्विजांस्तत:।

वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम्॥ ३०॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचनके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके ‘वनमें श्रीरामका सदा मङ्गल हो’ इस कामनासे कौसल्याजीने उन सबसे स्वस्त्ययनसम्बन्धी मन्त्रोंका पाठ करवाया॥ ३०॥

ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी।

दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत्॥ ३१॥

इसके बाद यशश्विनी श्रीराममाताने उन विप्रवर पुरोहितजीको उनकी इच्छाके अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ ३१॥

यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते।

वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३२॥

‘वृत्रासुरका नाश करनेके निमित्त सर्वदेववन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो॥ ३२॥

यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा।

अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३३॥

‘पूर्वकालमें विनतादेवीने अमृत लानेकी इच्छावाले अपने पुत्र गरुड़के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो॥ ३३॥

अमृतोत्पादने दैत्यान् घ्नतो वज्रधरस्य यत्।

अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३४॥

‘अमृतकी उत्पत्तिके समय दैत्योंका संहार करनेवाले वज्रधारी इन्द्रके लिये माता अदितिने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो॥ ३४॥

त्रिविक्रमान् प्रक्रमतो विष्णोरतुलतेजस:।

यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३५॥

‘श्रीराम! तीन पगोंको बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुके लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो॥ ३५॥

ऋषय: सागरा द्वीपा वेदा लोका दिशश्च ते।

मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु शुभमङ्गलम्॥ ३६॥

‘महाबाहो! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो’॥ ३६॥

इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी।

गन्धैश्चापि समालभ्य राममायतलोचना॥ ३७॥

औषधीं च सुसिद्धार्थां विशल्यकरणीं शुभाम्।

चकार रक्षां कौसल्या मन्त्रैरभिजजाप च॥ ३८॥

इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्याने पुत्रके मस्तकपर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली विशल्यकरणी नामक शुभ ओषधि लेकर रक्षाके उद्देश्यसे मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीरामके हाथमें बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लानेके लिये मन्त्रका जप भी किया॥

उवाचापि प्रहृष्टेव सा दु:खवशवर्तिनी।

वाङ्मात्रेण न भावेन वाचा संसज्जमानया॥ ३९॥

तदनन्तर दु:खके अधीन हुई कौसल्याने ऊपरसे प्रसन्न-सी होकर मन्त्रोंका स्पष्ट उच्चारण भी किया। उस समय वे वाणीमात्रसे ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदयसे नहीं (क्योंकि हृदय श्रीरामके वियोगकी सम्भावनासे व्यथित था, इसीलिये) वे खेदसे गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणीसे मन्त्र बोल रही थीं॥ ३९॥

आनम्य मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनी।

अवदत् पुत्रमिष्टार्थो गच्छ राम यथासुखम्॥ ४०॥

अरोगं सर्वसिद्धार्थमयोध्यां पुनरागतम्।

पश्यामि त्वां सुखं वत्स संधितं राजवर्त्मसु॥ ४१॥

इसके बाद उनके मस्तकको कुछ झुकाकर यशस्विनी माताने सूँघा और बेटेको हृदयसे लगाकर कहा—‘वत्स राम! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वनको जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्यामें लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्गपर स्थित देखकर सुखी होऊँगी॥ ४०-४१॥

प्रणष्टदु:खसंकल्पा हर्षविद्योतितानना।

द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥ ४२॥

‘उस समय मेरे दु:खपूर्ण संकल्प मिट जायँगे, मुखपर हर्षजनित उल्लास छा जायगा और मैं वनसे आये हुए तुमको पूर्णिमाकी रातमें उदित हुए पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति देखूँगी॥ ४३॥

भद्रासनगतं राम वनवासादिहागतम्।

द्रक्ष्यामि च पुनस्त्वां तु तीर्णवन्तं पितुर्वच:॥ ४३॥

‘श्रीराम! वनवाससे यहाँ आकर पिताकी प्रतिज्ञाको पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासनपर बैठोगे, उस समय मैं पुन: प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी॥ ४३॥

मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागत:।

वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्ध याहि भो:॥ ४४॥

‘अब जाओ और वनवाससे यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीताकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते रहो॥ ४४॥

मयार्चिता देवगणा: शिवादयो

महर्षयो भूतगणा: सुरोरगा:।

अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते

हितानि कांक्षन्तु दिशश्च राघव॥ ४५॥

‘रघुनन्दन! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब-के-सब वनमें जानेपर चिरकालतक तुम्हारे हितसाधनकी कामना करते रहें’॥ ४५॥

अतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना

समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि।

प्रदक्षिणं चापि चकार राघवं

पुन: पुनश्चापि निरीक्ष्य सस्वजे॥ ४६॥

इस प्रकार माताने नेत्रोंमें अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया। फिर श्रीरामकी परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छातीसे लगाया॥ ४६॥

तया हि देव्या च कृतप्रदक्षिणो

निपीड्य मातुश्चरणौ पुन: पुन:।

जगाम सीतानिलयं महायशा:

स राघव: प्रज्वलितस्तया श्रिया॥ ४७॥

देवी कौसल्याने जब श्रीरामकी प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माताके चरणोंको दबाकर प्रणाम करके माताकी मङ्गलकामना-जनित उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न हो सीताजीके महलकी ओर चल दिये॥ ४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चविंश: सर्ग:॥ २५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥

 

षड्विंश: सर्ग:

श्रीरामको उदास देखकर सीताका उनसे इसका कारण पूछना और श्रीरामका पिताकी आज्ञासे वनमें जानेका निश्चय बताते हुए सीताको घरमें रहनेके लिये समझाना

अभिवाद्य तु कौसल्यां राम: सम्प्रस्थितो वनम्।

कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थित:॥ १॥

धर्मिष्ठ मार्गपर स्थित हुए श्रीराम माताद्वारा स्वस्तिवाचन-कर्म सम्पन्न हो जानेपर कौसल्याको प्रणाम करके वहाँसे वनके लिये प्रस्थित हुए॥ १॥

विराजयन् राजसुतो राजमार्गं नरैर्वृतम्।

हृदयान्याममन्थेव जनस्य गुणवत्तया॥ २॥

उस समय मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए राजमार्गको प्रकाशित करते हुए राजकुमार श्रीराम अपने सद्गुणोंके कारण लोगोंके मनको मथने-से लगे (ऐसे गुणवान् श्रीरामको वनवास दिया जा रहा है, यह सोचकर वहाँके लोगोंका जी कचोटने लगा)॥ २॥

वैदेही चापि तत् सर्वं न शुश्राव तपस्विनी।

तदेव हृदि तस्याश्च यौवराज्याभिषेचनम्॥ ३॥

तपस्विनी विदेहनन्दिनी सीताने अभीतक वह सारा हाल नहीं सुना था। उनके हृदयमें यही बात समायी हुई थी कि मेरे पतिका युवराजपदपर अभिषेक हो रहा होगा॥

देवकार्यं स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हृष्टचेतना।

अभिज्ञा राजधर्माणां राजपुत्री प्रतीक्षति॥ ४॥

विदेहराजकुमारी सीता सामयिक कर्तव्यों तथा राजधर्मोंको जानती थीं, अत: देवताओंकी पूजा करके प्रसन्नचित्तसे श्रीरामके आगमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं॥

प्रविवेशाथ रामस्तु स्ववेश्म सुविभूषितम्।

प्रहृष्टजनसम्पूर्णं ह्र‌िया किंचिदवाङ्मुख:॥ ५॥

इतनेमें ही श्रीरामने अपने भलीभाँति सजे-सजाये अन्त:पुरमें, जो प्रसन्न मनुष्योंसे भरा हुआ था, प्रवेश किया। उस समय लज्जासे उनका मुख कुछ नीचा हो रहा था॥

अथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च तं पतिम्।

अपश्यच्छोकसंतप्तं चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियम्॥ ६॥

सीता उन्हें देखते ही आसनसे उठकर खड़ी हो गयीं। उनकी अवस्था देखकर काँपने लगीं और चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियोंवाले अपने उन शोकसंतप्त पतिको निहारने लगीं॥ ६॥

तां दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम्।

तं शोकं राघव: सोढुं ततो विवृततां गत:॥ ७॥

धर्मात्मा श्रीराम सीताको देखकर अपने मानसिक शोकका वेग सहन न कर सके, अत: उनका वह शोक प्रकट हो गया॥ ७॥

विवर्णवदनं दृष्ट्वा तं प्रस्विन्नममर्षणम्।

आह दु:खाभिसंतप्ता किमिदानीमिदं प्रभो॥ ८॥

उनका मुख उदास हो गया था। उनके अङ्गोंसे पसीना निकल रहा था। वे अपने शोकको दबाये रखनेमें असमर्थ हो गये थे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर सीता दु:खसे संतप्त हो उठीं और बोलीं—‘प्रभो! इस समय यह आपकी कैसी दशा है?॥ ८॥

अद्य बार्हस्पत: श्रीमान् युक्त: पुष्येण राघव।

प्रोच्यते ब्राह्मणै: प्राज्ञै: केन त्वमसि दुर्मना:॥ ९॥

‘रघुनन्दन! आज बृहस्पति देवता-सम्बन्धी मङ्गलमय पुष्यनक्षत्र है, जो अभिषेकके योग्य है। उस पुष्यनक्षत्रके योगमें विद्वान् ब्राह्मणोंने आपका अभिषेक बताया है। ऐसे समयमें जब कि आपको प्रसन्न होना चाहिये था, आपका मन इतना उदास क्यों है?॥ ९॥

न ते शतशलाकेन जलफेननिभेन च।

आवृतं वदनं वल्गु च्छत्रेणाभिविराजते॥ १०॥

‘मैं देखती हूँ, इस समय आपका मनोहर मुख जलके फेनके समान उज्ज्वल तथा सौ तीलियोंवाले श्वेत छत्रसे आच्छादित नहीं है, अतएव अधिक शोभा नहीं पा रहा है॥ १०॥

व्यजनाभ्यां च मुख्याभ्यां शतपत्रनिभेक्षणम्।

चन्द्रहंसप्रकाशाभ्यां वीज्यते न तवाननम्॥ ११॥

‘कमल-जैसे सुन्दर नेत्र धारण करनेवाले आपके इस मुखपर चन्द्रमा और हंसके समान श्वेत वर्णवाले दो श्रेष्ठ चँवरोंद्वारा हवा नहीं की जा रही है॥ ११॥

वाग्मिनो वन्दिनश्चापि प्रहृष्टास्त्वां नरर्षभ।

स्तुवन्तो नाद्य दृश्यन्ते मङ्गलै: सूतमागधा:॥ १२॥

‘नरश्रेष्ठ! प्रवचनकुशल वन्दी, सूत और मागधजन आज अत्यन्त प्रसन्न हो अपने माङ्गलिक वचनोंद्वारा आपकी स्तुति करते नहीं दिखायी देते हैं॥ १२॥

न ते क्षौद्रं च दधि च ब्राह्मणा वेदपारगा:।

मूर्ध्नि मूर्धाभिषिक्तस्य ददति स्म विधानत:॥ १३॥

‘वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंने आज मूर्धाभिषिक्त हुए आपके मस्तकपर तीर्थोदकमिश्रित मधु और दधिका विधिपूर्वक अभिषेक नहीं किया॥ १३॥

न त्वां प्रकृतय: सर्वा: श्रेणीमुख्याश्च भूषिता:।

अनुव्रजितुमिच्छन्ति पौरजानपदास्तथा॥ १४॥

‘मन्त्री-सेनापति आदि सारी प्रकृतियाँ, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित मुख्य-मुख्य सेठ-साहूकार तथा नगर और जनपदके लोग आज आपके पीछे-पीछे चलनेकी इच्छा नहीं कर रहे हैं! (इसका क्या कारण है?)॥ १४॥

चतुर्भिर्वेगसम्पन्नैर्हयै: काञ्चनभूषणै:।

मुख्य: पुष्परथो युक्त: किं न गच्छति तेऽग्रत:॥ १५॥

‘सुनहरे साज-बाजसे सजे हुए चार वेगशाली घोड़ोंसे जुता हुआ श्रेष्ठ पुष्परथ (पुष्पभूषित केवल भ्रमणोपयोगी रथ) आज आपके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहा है?॥ १५॥

न हस्ती चाग्रत: श्रीमान् सर्वलक्षणपूजित:।

प्रयाणे लक्ष्यते वीर कृष्णमेघगिरिप्रभ:॥ १६॥

‘वीर! आपकी यात्राके समय समस्त शुभ लक्षणोंसे प्रशंसित तथा काले मेघवाले पर्वतके समान विशालकाय तेजस्वी गजराज आज आपके आगे क्यों नहीं दिखायी देता है?॥ १६॥

न च काञ्चनचित्रं ते पश्यामि प्रियदर्शन।

भद्रासनं पुरस्कृत्य यान्तं वीर पुर:सरम्॥ १७॥

‘प्रियदर्शन वीर! आज आपके सुवर्णजटित भद्रासनको सादर हाथमें लेकर अग्रगामी सेवक आगे जाता क्यों नहीं दिखायी देता है?॥ १७॥

अभिषेको यदा सज्ज: किमिदानीमिदं तव।

अपूर्वो मुखवर्णश्च न प्रहर्षश्च लक्ष्यते॥ १८॥

‘जब अभिषेककी सारी तैयारी हो चुकी है, ऐसे समयमें आपकी यह क्या दशा हो रही है? आपके मुखकी कान्ति उड़ गयी है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। आपके चेहरेपर प्रसन्नताका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है। इसका क्या कारण है?’॥ १८॥

इतीव विलपन्तीं तां प्रोवाच रघुनन्दन:।

सीते तत्रभवांस्तात: प्रव्राजयति मां वनम्॥ १९॥

इस प्रकार विलाप करती हुई सीतासे रघुनन्दन श्रीरामने कहा—‘सीते! आज पूज्य पिताजी मुझे वनमें भेज रहे हैं॥ १९॥

कुले महति सम्भूते धर्मज्ञे धर्मचारिणि।

शृणु जानकि येनेदं क्रमेणाद्यागतं मम॥ २०॥

‘महान् कुलमें उत्पन्न, धर्मको जाननेवाली तथा धर्मपरायणे जनकनन्दिनि! जिस कारण यह वनवास आज मुझे प्राप्त हुआ है, वह क्रमश: बताता हूँ, सुनो॥

राज्ञा सत्यप्रतिज्ञेन पित्रा दशरथेन वै।

कैकेय्यै मम मात्रे तु पुरा दत्तौ महावरौ॥ २१॥

‘मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता महाराज दशरथने माता कैकेयीको पहले कभी दो महान् वर दिये थे॥ २१॥

तयाद्य मम सज्जेऽस्मिन्नभिषेके नृपोद्यते।

प्रचोदित: स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जित:॥ २२॥

‘इधर जब महाराजके उद्योगसे मेरे राज्याभिषेककी तैयारी होने लगी, तब कैकेयीने उस वरदानकी प्रतिज्ञाको याद दिलाया और महाराजको धर्मत: अपने काबूमें कर लिया॥ २२॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया।

पित्रा मे भरतश्चापि यौवराज्ये नियोजित:॥ २३॥

‘इससे विवश होकर पिताजीने भरतको तो युवराजके पदपर नियुक्त किया और मेरे लिये दूसरा वर स्वीकार किया, जिसके अनुसार मुझे चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें निवास करना होगा॥ २३॥

सोऽहं त्वामागतो द्रष्टुं प्रस्थितो विजनं वनम्।

भरतस्य समीपे ते नाहं कथ्य: कदाचन॥ २४॥

ऋद्धियुक्ता हि पुरुषा न सहन्ते परस्तवम्।

तस्मान्न ते गुणा: कथ्या भरतस्याग्रतो मम॥ २५॥

‘इस समय मैं निर्जन वनमें जानेके लिये प्रस्थान कर चुका हूँ और तुमसे मिलनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम भरतके समीप कभी मेरी प्रशंसा न करना; क्योंकि समृद्धिशाली पुरुष दूसरेकी स्तुति नहीं सहन कर पाते हैं। इसीलिये कहता हूँ कि तुम भरतके सामने मेरे गुणोंकी प्रशंसा न करना॥ २४-२५॥

अहं ते नानुवक्तव्यो विशेषेण कदाचन।

अनुकूलतया शक्यं समीपे तस्य वर्तितुम्॥ २६॥

‘विशेषत: तुम्हें भरतके समक्ष अपनी सखियोंके साथ भी बारंबार मेरी चर्चा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनके मनके अनुकूल बर्ताव करके ही तुम उनके निकट रह सकती हो॥ २६॥

तस्मै दत्तं नृपतिना यौवराज्यं सनातनम्।

स प्रसाद्यस्त्वया सीते नृपतिश्च विशेषत:॥ २७॥

‘सीते! राजाने उन्हें सदाके लिये युवराजपद दे दिया है, इसलिये तुम्हें विशेष प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न रखना चाहिये; क्योंकि अब वे ही राजा होंगे॥ २७॥

अहं चापि प्रतिज्ञां तां गुरो: समनुपालयन्।

वनमद्यैव यास्यामि स्थिरीभव मनस्विनि॥ २८॥

‘मैं भी पिताजीकी उस प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये आज ही वनको चला जाऊँगा। मनस्विनि! तुम धैर्य धारण करके रहना॥ २८॥

याते च मयि कल्याणि वनं मुनिनिषेवितम्।

व्रतोपवासपरया भवितव्यं त्वयानघे॥ २९॥

‘कल्याणि! निष्पाप सीते! मेरे मुनिजनसेवित वनको चले जानेपर तुम्हें प्राय: व्रत और उपवासमें संलग्न रहना चाहिये॥ २९॥

कल्यमुत्थाय देवानां कृत्वा पूजां यथाविधि।

वन्दितव्यो दशरथ: पिता मम जनेश्वर:॥ ३०॥

‘प्रतिदिन सबेरे उठकर देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करके तुम्हें मेरे पिता महाराज दशरथकी वन्दना करनी चाहिये॥ ३०॥

माता च मम कौसल्या वृद्धा संतापकर्शिता।

धर्ममेवाग्रत: कृत्वा त्वत्त: सम्मानमर्हति॥ ३१॥

‘मेरी माता कौसल्याको भी प्रणाम करना चाहिये। एक तो वे बूढ़ी हुईं, दूसरे दु:ख और संतापने उन्हें दुर्बल कर दिया है; अत: धर्मको ही सामने रखकर तुमसे वे विशेष सम्मान पानेके योग्य हैं॥ ३१॥

वन्दितव्याश्च ते नित्यं या: शेषा मम मातर:।

स्नेहप्रणयसम्भोगै: समा हि मम मातर:॥ ३२॥

‘जो मेरी शेष माताएँ हैं, उनके चरणोंमें भी तुम्हें प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये; क्योंकि स्नेह, उत्कृष्ट प्रेम और पालन-पोषणकी दृष्टिसे सभी माताएँ मेरे लिये समान हैं॥ ३२॥

भ्रातृपुत्रसमौ चापि द्रष्टव्यौ च विशेषत:।

त्वया भरतशत्रुघ्नौ प्राणै: प्रियतरौ मम॥ ३३॥

‘भरत और शत्रुघ्न मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं, अत: तुम्हें उन दोनोंको विशेषत: अपने भाई और पुत्रके समान देखना और मानना चाहिये॥ ३३॥

विप्रियं च न कर्तव्यं भरतस्य कदाचन।

स हि राजा च वैदेहि देशस्य च कुलस्य च॥ ३४॥

‘विदेहनन्दिनि! तुम्हें भरतकी इच्छाके विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिये; क्योंकि इस समय वे मेरे देश और कुलके राजा हैं॥ ३४॥

आराधिता हि शीलेन प्रयत्नैश्चोपसेविता:।

राजान: सम्प्रसीदन्ति प्रकुप्यन्ति विपर्यये॥ ३५॥

‘अनुकूल आचरणके द्वारा आराधना और प्रयत्नपूर्वक सेवा करनेपर राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा विपरीत बर्ताव करनेपर वे कुपित हो जाते हैं॥ ३५॥

औरस्यानपि पुत्रान् हि त्यजन्त्यहितकारिण:।

समर्थान् सम्प्रगृह्णन्ति जनानपि नराधिपा:॥ ३६॥

‘जो अहित करनेवाले हैं, वे अपने औरस पुत्र ही क्यों न हों, राजा उन्हें त्याग देते हैं और आत्मीय न होनेपर भी जो सामर्थ्यवान् होते हैं, उन्हें वे अपना बना लेते हैं॥ ३६॥

सा त्वं वसेह कल्याणि राज्ञ: समनुवर्तिनी।

भरतस्य रता धर्मे सत्यव्रतपरायणा॥ ३७॥

‘अत: कल्याणि! तुम राजा भरतके अनुकूल बर्ताव करती हुई धर्म एवं सत्यव्रतमें तत्पर रहकर यहाँ निवास करो॥ ३७॥

अहं गमिष्यामि महावनं प्रिये

त्वया हि वस्तव्यमिहैव भामिनि।

यथा व्यलीकं कुरुषे न कस्यचित्

तथा त्वया कार्यमिदं वचो मम॥ ३८॥

‘प्रिये! अब मैं उस विशाल वनमें चला जाऊँगा। भामिनि! तुम्हें यहीं निवास करना होगा। तुम्हारे बर्तावसे किसीको कष्ट न हो, इसका ध्यान रखते हुए तुम्हें यहाँ मेरी इस आज्ञाका पालन करते रहना चाहिये’॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षड्विंश: सर्ग:॥ २६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥

 

सप्तविंश: सर्ग:

सीताकी श्रीरामसे अपनेको भी साथ ले चलनेके लिये प्रार्थना

एवमुक्ता तु वैदेही प्रियार्हा प्रियवादिनी।

प्रणयादेव संक्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकारसे अपने स्वामीका प्यार पाने योग्य थीं, प्रेमसे ही कुछ कुपित होकर पतिसे इस प्रकार बोलीं—॥ १॥

किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम्।

त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम॥ २॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है॥ २॥

वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप।

अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम्॥ ३॥

‘नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता वीर राजकुमारोंके योग्य नहीं है। वह अपयशका टीका लगानेवाला होनेके कारण सुनने योग्य भी नहीं है॥ ३॥

आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।

स्वानि पुण्यानि भुञ्जाना: स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥ ४॥

‘आर्यपुत्र! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू—ये सब पुण्यादि कर्मोंका फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं॥ ४॥

भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।

अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥ ५॥

‘पुरुषप्रवर! केवल पत्नी ही अपने पतिके भाग्यका अनुसरण करती है, अत: आपके साथ ही मुझे भी वनमें रहनेकी आज्ञा मिल गयी है॥ ५॥

न पिता नात्मजो वात्मा न माता न सखीजन:।

इह प्रेत्य च नारीणां पतिरेको गति: सदा॥ ६॥

‘नारियोंके लिये इस लोक और परलोकमें एकमात्र पति ही सदा आश्रय देनेवाला है। पिता, पुत्र, माता, सखियाँ तथा अपना यह शरीर भी उसका सच्चा सहायक नहीं है॥

यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव।

अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्॥ ७॥

‘रघुनन्दन! यदि आप आज ही दुर्गम वनकी ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्तेके कुश और काँटोंको कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी॥ ७॥

ईर्ष्यां रोषं बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम्।

नय मां वीर विस्रब्ध: पापं मयि न विद्यते॥ ८॥

‘अत: वीर! आप ईर्ष्या44 और रोषको45 दूर करके पीनेसे46 बचे हुए जलकी भाँति मुझे नि:शङ्क होकर साथ ले चलिये। मुझमें ऐसा कोई पाप—अपराध नहीं है, जिसके कारण आप मुझे यहाँ त्याग दें॥ ८॥

प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा।

सर्वावस्थागता भर्तु: पादच्छाया विशिष्यते॥ ९॥

‘ऊँचे-ऊँचे महलोंमें रहना, विमानोंपर चढ़कर घूमना अथवा अणिमा आदि सिद्धियोंके द्वारा आकाशमें विचरना—इन सबकी अपेक्षा स्त्रीके लिये सभी अवस्थाओंमें पतिके चरणोंकी छायामें रहना विशेष महत्त्व रखता है॥ ९॥

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम्।

नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया॥ १०॥

‘मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषयमें मेरी माता और पिताने मुझे अनेक प्रकारसे शिक्षा दी है। इस समय इसके विषयमें मुझे कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता नहीं है॥ १०॥

अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम्।

नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम्॥ ११॥

‘अत: नाना प्रकारके वन्य पशुओंसे व्याप्त तथा सिंहों और व्याघ्रोंसे सेवित उस निर्जन एवं दुर्गम वनमें मैं अवश्य चलूँगी॥ ११॥

सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितु:।

अचिन्तयन्ती त्रीँल्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम्॥ १२॥

‘मैं तो जैसे अपने पिताके घरमें रहती थी, उसी प्रकार उस वनमें भी सुखपूर्वक निवास करूँगी। वहाँ तीनों लोकोंके ऐश्वर्यको भी कुछ न समझती हुई मैं सदा पतिव्रत-धर्मका चिन्तन करती हुई आपकी सेवामें लगी रहूँगी॥ १२॥

शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी।

सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु॥ १३॥

‘वीर! नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करूँगी और सदा आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपहीके साथ मीठी-मीठी सुगन्धसे भरे हुए वनोंमें विचरूँगी॥ १३॥

त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम्।

अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद॥ १४॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले श्रीराम! आप तो वनमें रहकर दूसरे लोगोंकी भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ १४॥

साहं त्वया गमिष्यामि वनमद्य न संशय:।

नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितुमुद्यता॥ १५॥

‘महाभाग! अत: मैं आपके साथ आज अवश्य वनमें चलूँगी। इसमें संशय नहीं है। मैं हर तरह चलनेको तैयार हूँ। मुझे किसी तरह भी रोका नहीं जा सकता॥ १५॥

फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशय:।

न ते दु:खं करिष्यामि निवसन्ती त्वया सदा॥ १६॥

‘वहाँ चलकर मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूँगी, सदा आपके साथ रहूँगी और प्रतिदिन फल-मूल खाकर ही निर्वाह करूँगी। मेरे इस कथनमें किसी प्रकारके संदेहके लिये स्थान नहीं है॥ १६॥

अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि।

इच्छामि परत: शैलान् पल्वलानि सरांसि च॥ १७॥

द्रष्टुं सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता।

‘आपके आगे-आगे चलूँगी और आपके भोजन कर लेनेपर जो कुछ बचेगा, उसे ही खाकर रहूँगी। प्रभो! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आप बुद्धिमान् प्राणनाथके साथ निर्भय हो वनमें सर्वत्र घूमकर पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरोंको देखूँ॥ १७॥

हंसकारण्डवाकीर्णा: पद्मिनी: साधुपुष्पिता:॥ १८॥

इच्छेयं सुखिनी द्रष्टुं त्वया वीरेण संगता।

‘आप मेरे वीर स्वामी हैं। मैं आपके साथ रहकर सुखपूर्वक उन सुन्दर सरोवरोंकी शोभा देखना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ कमलपुष्पोंसे सुशोभित हैं तथा जिनमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी भरे रहते हैं॥ १८॥

अभिषेकं करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता॥ १९॥

सह त्वया विशालाक्ष रंस्ये परमनन्दिनी।

‘विशाल नेत्रोंवाले आर्यपुत्र! आपके चरणोंमें अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन सरोवरोंमें स्नान करूँगी और आपके साथ वहाँ सब ओर विचरूँगी, इससे मुझे परम आनन्दका अनुभव होगा॥ १९॥

एवं वर्षसहस्राणि शतं वापि त्वया सह॥ २०॥

व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मत:।

‘इस तरह सैकड़ों या हजारों वर्षोंतक भी यदि आपके साथ रहनेका सौभाग्य मिले तो मुझे कभी कष्टका अनुभव नहीं होगा। यदि आप साथ न हों तो मुझे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी अभीष्ट नहीं है॥ २०॥

स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राघव।

त्वया विना नरव्याघ्र नाहं तदपि रोचये॥ २१॥

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलोकका निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिये रुचिकर नहीं हो सकता—मैं उसे लेना नहीं चाहूँगी॥ २१॥

अहं गमिष्यामि वनं सुदुर्गमं

मृगायुतं वानरवारणैश्च।

वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे

तवैव पादावुपगृह्य सम्मता॥ २२॥

‘प्राणनाथ! अत: उस अत्यन्त दुर्गम वनमें, जहाँ सहस्रों मृग, वानर और हाथी निवास करते हैं, मैं अवश्य चलूँगी और आपके ही चरणोंकी सेवामें रहकर आपके अनुकूल चलती हुई उस वनमें उसी तरह सुखसे रहूँगी, जैसे पिताके घरमें रहा करती थी॥ २२॥

अनन्यभावामनुरक्तचेतसं

त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम्।

नयस्व मां साधु कुरुष्व याचनां

नातो मया ते गुरुता भविष्यति॥ २३॥

‘मेरे हृदयका सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र आपको ही अर्पित है, आपके सिवा और कहीं मेरा मन नहीं जाता, यदि आपसे वियोग हुआ तो निश्चय ही मेरी मृत्यु हो जायगी। इसलिये आप मेरी याचना सफल करें, मुझे साथ ले चलें, यही अच्छा होगा; मेरे रहनेसे आपपर कोई भार नहीं पड़ेगा’॥ २३॥

तथा ब्रुवाणामपि धर्मवत्सलां

न च स्म सीतां नृवरो निनीषति।

उवाच चैनां बहु संनिवर्तने

वने निवासस्य च दु:खितां प्रति॥ २४॥

धर्ममें अनुरक्त रहनेवाली सीताके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भी नरश्रेष्ठ श्रीरामको उन्हें साथ ले जानेकी इच्छा नहीं हुई। वे उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये वहाँके कष्टोंका अनेक प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तविंश: सर्ग:॥ २७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥

 

अष्टाविंश: सर्ग:

श्रीरामका वनवासके कष्टका वर्णन करते हुए सीताको वहाँ चलनेसे मना करना

स एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सल:।

न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दु:खानि चिन्तयन्॥ १॥

धर्मको जाननेवाली सीताके इस प्रकार कहनेपर भी धर्मवत्सल श्रीरामने वनमें होनेवाले दु:खोंको सोचकर उन्हें साथ ले जानेका विचार नहीं किया॥ १॥

सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम्।

निवर्तनार्थे धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥ २॥

सीताके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले—॥ २॥

सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा।

इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनस: सुखम्॥ ३॥

‘सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हो और सदा धर्मके आचरणमें ही लगी रहती हो; अत: यहीं रहकर धर्मका पालन करो, जिससे मेरे मनको संतोष हो॥

सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले।

वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥ ४॥

‘सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वनमें निवास करनेवाले मनुष्यको बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥ ४॥

सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मति:।

बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥ ५॥

‘सीते! वनवासके लिये चलनेका यह विचार छोड़ दो, वनको अनेक प्रकारके दोषोंसे व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है॥ ५॥

हितबुद्ध्या खलु वचो मयैतदभिधीयते।

सदा सुखं न जानामि दु:खमेव सदा वनम्॥ ६॥

‘तुम्हारे हितकी भावनासे ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँतक मेरी जानकारी है, वनमें सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दु:ख ही मिला करता है॥ ६॥

गिरिनिर्झरसम्भूता गिरिनिर्दरिवासिनाम्।

सिंहानां निनदा दु:खा: श्रोतुं दु:खमतो वनम्॥ ७॥

‘पर्वतोंसे गिरनेवाले झरनोंके शब्दको सुनकर उन पर्वतोंकी कन्दराओंमें रहनेवाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुननेमें बड़ी दु:खदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दु:खमय ही है॥ ७॥

क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ता: शून्ये तथा मृगा:।

दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दु:खमतो वनम्॥ ८॥

‘सीते! सूने वनमें निर्भय होकर क्रीड़ा करनेवाले मतवाले जंगली पशु मनुष्यको देखते ही उसपर चारों ओरसे टूट पड़ते हैं; अत: वन दु:खसे भरा हुआ है॥

सग्राहा: सरितश्चैव पङ्कवत्यस्तु दुस्तरा:।

मत्तैरपि गजैर्नित्यमतो दु:खतरं वनम्॥ ९॥

‘वनमें जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होनेके कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा वनमें मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इस सब कारणोंसे वन बहुत ही दु:खदायक होता है॥ ९॥

लताकण्टकसंकीर्णा: कृकवाकूपनादिता:।

निरपाश्च सुदु:खाश्च मार्गा दु:खमतो वनम्॥ १०॥

‘वनके मार्ग लताओं और काँटोंसे भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गोंपर चलनेमें बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वनमें दु:ख-ही-दु:ख है॥ १०॥

सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले।

रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दु:खमतो वनम्॥ ११॥

‘दिनभरके परिश्रमसे थके-माँदे मनुष्यको रातमें जमीनके ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तोंके बिछौनेपर सोना पड़ता है, अत: वन दु:खसे भरा हुआ है॥ ११॥

अहोरात्रं च संतोष: कर्तव्यो नियतात्मना।

फलैर्वृक्षावपतितै: सीते दु:खमतो वनम्॥ १२॥

‘सीते! वहाँ मनको वशमें रखकर वृक्षोंसे स्वत: गिरे हुए फलोंके आहारपर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अत: वन दु:ख देनेवाला ही है॥ १२॥

उपवासश्च कर्तव्यो यथा प्राणेन मैथिलि।

जटाभारश्च कर्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम्॥ १३॥

‘मिथिलेशकुमारी! अपनी शक्तिके अनुसार उपवास करना, सिरपर जटाका भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना—यही वहाँकी जीवनशैली है॥ १३॥

देवतानां पितृणां च कर्तव्यं विधिपूर्वकम्।

प्राप्तानामतिथीनां च नित्यश: प्रतिपूजनम्॥ १४॥

‘देवताओंका, पितरोंका तथा आये हुए अतिथियोंका प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधिके अनुसार पूजन करना—यह वनवासीका प्रधान कर्तव्य है॥ १४॥

कार्यस्त्रिरभिषेकश्च काले काले च नित्यश:।

चरतां नियमेनैव तस्माद् दु:खतरं वनम्॥ १५॥

‘वनवासीको प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय स्नान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है॥

उपहारश्च कर्तव्य: कुसुमै: स्वयमाहृतै:।

आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दु:खमतो वनम्॥ १६॥

‘सीते! वहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलोंद्वारा वेदोक्त विधिसे वेदीपर देवताओंकी पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वनको कष्टप्रद कहा गया है॥ १६॥

यथालब्धेन कर्तव्य: संतोषस्तेन मैथिलि।

यताहारैर्वनचरै: सीते दु:खमतो वनम्॥ १७॥

‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियोंको जब जैसा आहार मिल जाय उसीपर संतोष करना पड़ता है; अत: वन दु:खरूप ही है॥ १७॥

अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यश:।

भयानि च महान्त्यत्र ततो दु:खतरं वनम्॥ १८॥

‘वनमें प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूखका कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अत: वन अत्यन्त कष्टप्रद है॥ १८॥

सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि।

चरन्ति पथि ते दर्पात् ततो दु:खतरं वनम्॥ १९॥

‘भामिनि! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकारके रूपवाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्तेमें विचरते रहते हैं; अत: वन अत्यन्त कष्टदायक है॥ १९॥

नदीनिलयना: सर्पा नदीकुटिलगामिन:।

तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दु:खतरं वनम्॥ २०॥

‘जो नदियोंमें निवास करते और नदियोंके समान ही कुटिल गतिसे चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वनमें रास्तेको घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है॥ २०॥

पतङ्गा वृश्चिका: कीटा दंशाश्च मशकै: सह।

बाधन्ते नित्यमबले सर्वं दु:खमतो वनम्॥ २१॥

‘अबले! पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं; अत: सारा वन दु:खरूप ही है॥ २१॥

द्रुमा: कण्टकिनश्चैव कुशा: काशाश्च भामिनि।

वने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दु:खमतो वनम्॥ २२॥

‘भामिनि! वनमें काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओंके अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है॥ २२॥

कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च।

अरण्यवासे वसतो दु:खमेव सदा वनम्॥ २३॥

‘वनमें निवास करनेवाले मनुष्यको बहुत-से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकारके भयोंका सामना करना पड़ता है, अत: वन सदा दु:खरूप ही होता है॥ २३॥

क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मति:।

न भेतव्यं च भेतव्ये दु:खं नित्यमतो वनम्॥ २४॥

‘वहाँ क्रोध और लोभको त्याग देना होता है, तपस्यामें मन लगाना पड़ता है और जहाँ भयका स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होनेकी आवश्यकता होती है; अत: वनमें सदा दु:ख-ही-दु:ख है॥ २४॥

तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं नहि वनं तव।

विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम्॥ २५॥

‘इसलिये तुम्हारा वनमें जाना ठीक नहीं है। वहाँ जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच-विचारकर देखता और समझता हूँ—कि वनमें रहना अनेक दोषोंका उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है॥ २५॥

वनं तु नेतुं न कृता मतिर्यदा

बभूव रामेण तदा महात्मना।

न तस्य सीता वचनं चकार तं

ततोऽब्रवीद् राममिदं सुदु:खिता॥ २६॥

जब महात्मा श्रीरामने उस समय सीताको वनमें ले जानेका विचार नहीं किया, तब सीताने भी उनकी उस बातको नहीं माना। वे अत्यन्त दु:खी होकर श्रीरामसे इस प्रकार बोलीं॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाविंश: सर्ग:॥ २८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २८॥

 

एकोनत्रिंश: सर्ग:

सीताका श्रीरामके समक्ष उनके साथ अपने वनगमनका औचित्य बताना

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दु:खिता।

प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सीताको बड़ा दु:ख हुआ, उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वे धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं—॥ १॥

ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति।

गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥ २॥

‘प्राणनाथ! आपने वनमें रहनेके जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायँगे। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें॥

मृगा: सिंहा गजाश्चैव शार्दूला: शरभास्तथा।

चमरा: सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिण:॥ ३॥

अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव।

रूपं दृष्ट्वापसर्पेयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति॥ ४॥

‘रघुनन्दन! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ, चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायँगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे?॥ ३-४॥

त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया।

त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥ ५॥

‘श्रीराम! मुझे गुरुजनोंकी आज्ञासे निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जानेपर मैं यहाँ अपने जीवनका परित्याग कर दूँगी॥ ५॥

नहि मां त्वत्समीपस्थामपि शक्रोऽपि राघव।

सुराणामीश्वर: शक्त: प्रधर्षयितुमोजसा॥ ६॥

‘रघुनाथजी! आपके समीप रहनेपर देवताओंके राजा इन्द्र भी बलपूर्वक मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते॥ ६॥

पतिहीना तु या नारी न सा शक्ष्यति जीवितुम्।

काममेवंविधं राम त्वया मम निदर्शितम्॥ ७॥

‘श्रीराम! पतिव्रता स्त्री अपने पतिसे वियोग होनेपर जीवित नहीं रह सकेगी; ऐसी बात आपने भी मुझे भलीभाँति दर्शायी है॥ ७॥

अथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मया श्रुतम्।

पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल मे वने॥ ८॥

‘महाप्राज्ञ! यद्यपि वनमें दोष और दु:ख ही भरे हैं, तथापि अपने पिताके घरपर रहते समय मैं ब्राह्मणोंके मुखसे पहले यह बात सुन चुकी हूँ कि ‘मुझे अवश्य ही वनमें रहना पड़ेगा’ यह बात मेरे जीवनमें सत्य होकर रहेगी॥ ८॥

लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्य: श्रुत्वाहं वचनं गृहे।

वनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल॥ ९॥

‘महाबली वीर! हस्तरेखा देखकर भविष्यकी बातें जान लेनेवाले ब्राह्मणोंके मुखसे अपने घरपर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवासके लिये उत्साहित रहती हूँ॥

आदेशो वनवासस्य प्राप्तव्य: स मया किल।

सा त्वया सह भर्त्राहं यास्यामि प्रिय नान्यथा॥ १०॥

‘प्रियतम! ब्राह्मणसे ज्ञात हुआ वनमें रहनेका आदेश एक-न-एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, यह किसी तरह पलट नहीं सकता। अत: मैं अपने स्वामी आपके साथ वनमें अवश्य चलूँगी॥ १०॥

कृतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सह।

कालश्चायं समुत्पन्न: सत्यवान् भवतु द्विज:॥ ११॥

‘ऐसा होनेसे मैं उस भाग्यके विधानको भोग लूँगी। उसके लिये यह समय आ गया है, अत: आपके साथ मुझे चलना ही है; इससे उस ब्राह्मणकी बात भी सच्ची हो जायगी॥ ११॥

वनवासे हि जानामि दु:खानि बहुधा किल।

प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभि:॥ १२॥

‘वीर! मैं जानती हूँ कि वनवासमें अवश्य ही बहुत-से दु:ख प्राप्त होते हैं; परंतु वे उन्हींको दु:ख जान पड़ते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ और मन अपने वशमें नहीं हैं॥ १२॥

कन्यया च पितुर्गेहे वनवास: श्रुतो मया।

भिक्षिण्या: शमवृत्ताया मम मातुरिहाग्रत:॥ १३॥

‘पिताके घरपर कुमारी अवस्थामें एक शान्तिपरायणा भिक्षुकीके मुखसे भी मैंने अपने वनवासकी बात सुनी थी। उसने मेरी माताके सामने ही ऐसी बात कही थी॥

प्रसादितश्च वै पूर्वं त्वं मे बहुतिथं प्रभो।

गमनं वनवासस्य कांक्षितं हि सह त्वया॥ १४॥

‘प्रभो! यहाँ आनेपर भी मैंने पहले ही कई बार आपसे कुछ कालतक वनमें रहनेके लिये प्रार्थना की थी और आपको राजी भी कर लिया था। इससे आप निश्चितरूपसे जान लें कि आपके साथ वनको चलना मुझे पहलेसे ही अभीष्ट है॥ १४॥

कृतक्षणाहं भद्रं ते गमनं प्रति राघव।

वनवासस्य शूरस्य मम चर्या हि रोचते॥ १५॥

‘रघुनन्दन! आपका भला हो। मैं वहाँ चलनेके लिये पहलेसे ही आपकी अनुमति प्राप्त कर चुकी हूँ। अपने शूरवीर वनवासी पतिकी सेवा करना मेरे लिये अधिक रुचिकर है॥ १५॥

शुद्धात्मन् प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा।

भर्तारमनुगच्छन्ती भर्ता हि परदैवतम्॥ १६॥

‘शुद्धात्मन्! आप मेरे स्वामी हैं, आपके पीछे प्रेमभावसे वनमें जानेपर मेरे पाप दूर हो जायँगे; क्योंकि स्वामी ही स्त्रीके लिये सबसे बड़ा देवता है॥ १६॥

प्रेत्यभावे हि कल्याण: संगमो मे सदा त्वया।

श्रुतिर्हि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम्॥ १७॥

‘आपके अनुगमनसे परलोकमें भी मेरा कल्याण होगा और सदा आपके साथ मेरा संयोग बना रहेगा। इस विषयमें यशस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे एक पवित्र श्रुति सुनी जाती है (जो इस प्रकार है—)॥ १७॥

इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल।

अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा॥ १८॥

‘महाबली वीर! इस लोकमें पिता आदिके द्वारा जो कन्या जिस पुरुषको अपने धर्मके अनुसार जलसे संकल्प करके दे दी जाती है, वह मरनेके बाद परलोकमें भी उसीकी स्त्री होती है॥ १८॥

एवमस्मात् स्वकां नारीं सुवृत्तां हि पतिव्रताम्।

नाभिरोचयसे नेतुं त्वं मां केनेह हेतुना॥ १९॥

‘मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और पतिव्रता हूँ, फिर क्या कारण है कि आप मुझे यहाँसे अपने साथ ले चलना नहीं चाहते हैं॥ १९॥

भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदु:खयो:।

नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदु:खिनीम्॥ २०॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! मैं आपकी भक्त हूँ, पातिव्रत्यका पालन करती हूँ, आपके बिछोहके भयसे दीन हो रही हूँ तथा आपके सुख-दु:खमें समानरूपसे हाथ बँटानेवाली हूँ। मुझे सुख मिले या दु:ख, मैं दोनों अवस्थाओंमें सम रहूँगी—हर्ष या शोकके वशीभूत नहीं होऊँगी। अत: आप अवश्य ही मुझे साथ ले चलनेकी कृपा करें॥ २०॥

यदि मां दु:खितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि।

विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥ २१॥

‘यदि आप इस प्रकार दु:खमें पड़ी हुई मुझ सेविकाको अपने साथ वनमें ले जाना नहीं चाहते हैं तो मैं मृत्युके लिये विष खा लूँगी, आगमें कूद पड़ूँगी अथवा जलमें डूब जाऊँगी’॥ २१॥

एवं बहुविधं तं सा याचते गमनं प्रति।

नानुमेने महाबाहुस्तां नेतुं विजनं वनम्॥ २२॥

इस तरह अनेक प्रकारसे सीताजी वनमें जानेके लिये याचना कर रही थीं तथापि महाबाहु श्रीरामने उन्हें अपने साथ निर्जन वनमें ले जानेकी अनुमति नहीं दी॥

एवमुक्ता तु सा चिन्तां मैथिली समुपागता।

स्नापयन्तीव गामुष्णैरश्रुभिर्नयनच्युतै:॥ २३॥

इस प्रकार उनके अस्वीकार कर देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताको बड़ी चिन्ता हुई और वे अपने नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाकर धरतीको भिगोने-सी लगीं॥ २३॥

चिन्तयन्तीं तदा तां तु निवर्तयितुमात्मवान्।

क्रोधाविष्टां तु वैदेहीं काकुत्स्थो बह्वसान्त्वयत्॥ २४॥

उस समय विदेहनन्दिनी जानकीको चिन्तित और कुपित देख मनको वशमें रखनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये भाँति-भाँतिकी बातें कहकर समझाया॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंश: सर्ग:॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९॥

 

त्रिंश: सर्ग:

सीताका वनमें चलनेके लिये अधिक आग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीरामका उन्हें साथ ले चलनेकी स्वीकृति देना, पिता-माता और गुरुजनोंकी सेवाका महत्त्व बताना तथा सीताको वनमें चलनेकी तैयारीके लिये घरकी वस्तुओंका दान करनेकी आज्ञा देना

सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।

वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामके समझानेपर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवासकी आज्ञा प्राप्त करनेके लिये अपने पतिसे फिर इस प्रकार बोलीं॥ १॥

सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।

प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्॥ २॥

सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमानके कारण विशाल वक्ष:स्थलवाले श्रीरामचन्द्रजीपर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं—॥ २॥

किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिप:।

राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥ ३॥

‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनकने आपको जामाताके रूपमें पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीरसे ही पुरुष हैं; कार्यकलापसे तो स्त्री ही हैं॥ ३॥

अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।

तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे॥ ४॥

‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जानेपर संसारके लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्यके समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्रमें तेज और पराक्रमका अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दु:खकी बात होगी॥ ४॥

किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।

यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्॥ ५॥

‘आप क्या सोचकर विषादमें पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीताका, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं॥ ५॥

द्युमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनुव्रताम्।

सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्॥ ६॥

‘जैसे सावित्री द्युमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान्की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञाके अधीन समझिये॥ ६॥

न त्वहं मनसा त्वन्यं द्रष्टास्मि त्वदृतेऽनघ।

त्वया राघव गच्छेयं यथान्या कुलपांसनी॥ ७॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलङ्किनी स्त्री परपुरुषपर दृष्टि रखती है, वैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषको मनसे भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)॥ ७॥

स्वयं तु भार्यां कौमारीं चिरमध्युषितां सतीम्।

शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि॥ ८॥

‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्थामें ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकालतक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नीको आप औरतकी कमाई खानेवाले नटकी भाँति दूसरोंके हाथमें सौंपना चाहते हैं?॥ ८॥

यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।

त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ॥ ९॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलनेकी शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरतके सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूँगी॥ ९॥

स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितुमर्हसि।

तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह॥ १०॥

‘इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वनकी ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वनमें रहना हो अथवा स्वर्गमें जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ॥ १०॥

न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रम:।

पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव॥ ११॥

‘जैसे बगीचेमें घूमने और पलंगपर सोनेमें कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वनके मार्गपर चलनेमें भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा॥

कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमा:।

तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया॥ १२॥

‘रास्तेमें जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहनेसे रूई और मृगचर्मके समान सुखद प्रतीत होगा॥

महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति।

रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम्॥ १३॥

‘प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधीसे उड़कर मेरे शरीरपर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दनके समान समझूँगी॥

शाद्वलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा।

कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं तत:॥ १४॥

‘जब वनके भीतर रहूँगी, तब आपके साथ घासोंपर भी सो लूँगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनोंसे युक्त पलंगोंपर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है?॥ १४॥

पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु।

दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्॥ १५॥

‘आप अपने हाथसे लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत-रसके समान होगा॥ १५॥

न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मन:।

आर्तवान्युपभुञ्जाना पुष्पाणि च फलानि च॥ १६॥

‘ऋतुके अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहूँगी और माता-पिता अथवा महलको कभी याद नहीं करूँगी॥ १६॥

न च तत्र तत: किंचिद् द्रष्टुमर्हसि विप्रियम्।

मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा॥ १७॥

‘वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा॥ १७॥

यस्त्वया सह स स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना।

इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह॥ १८॥

‘आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरकके समान है। श्रीराम! मेरे इस निश्चयको जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वनको चलें॥ १८॥

अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे।

विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम्॥ १९॥

‘मुझे वनवासके कष्टसे कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशामें भी आप अपने साथ मुझे वनमें नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओंके अधीन होकर नहीं रहूँगी॥ १९॥

पश्चादपि हि दु:खेन मम नैवास्ति जीवितम्।

उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्॥ २०॥

नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वनको चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दु:खके कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशामें मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ॥ २०॥

इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।

किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दु:खिता॥ २१॥

‘आपके विरहका यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दु:खियासे यह चौदह वर्षोंतक कैसे सहा जायगा?’॥ २१॥

इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बहु।

चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्॥ २२॥

इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोकसे संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पतिको जोरसे पकड़कर—उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं॥ २२॥

सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना।

चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणि:॥ २३॥

जैसे कोई हथिनी विषमें बुझे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजीके पूर्वोक्त अनेकानेक वचनोंद्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अत: जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देरसे रोके हुए आँसुओंको बरसाने लगीं॥ २३॥

तस्या: स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम्।

नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्॥ २४॥

उनके दोनों नेत्रोंसे स्फटिकके समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलोंसे जलकी धारा गिर रही हो॥ २४॥

तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।

पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्॥ २५॥

बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित और पूर्णिमाके निर्मल चन्द्रमाके समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित तापके कारण पानीसे बाहर निकाले हुए कमलके समान सूख-सा गया था॥ २५॥

तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दु:खिताम्।

उवाच वचनं राम: परिविश्वासयंस्तदा॥ २६॥

सीताजी दु:खके मारे अचेत-सी हो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें दोनों हाथोंसे सँभालकर हृदयसे लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ २६॥

न देवि बत दु:खेन स्वर्गमप्यभिरोचये।

नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वत:॥ २७॥

‘देवि! तुम्हें दु:ख देकर मुझे स्वर्गका सुख मिलता हो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा। स्वयम्भू ब्रह्माजीकी भाँति मुझे किसीसे किञ्चित् भी भय नहीं है॥ २७॥

तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।

वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥ २८॥

‘शुभानने! यद्यपि वनमें तुम्हारी रक्षा करनेके लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्रायको पूर्णरूपसे जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था॥ २८॥

यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि।

न विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा॥ २९॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वनमें रहनेके लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नताका त्याग नहीं करते॥ २९॥

धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरित: पुरा।

तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्यं सुवर्चला॥ ३०॥

‘हाथीकी सूँड़के समान जाँघवाली जनककिशोरी! पूर्वकालके सत्पुरुषोंने अपनी पत्नीके साथ रहकर जिस धर्मका आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्यका अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो॥ ३०॥

न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।

वचनं तन्नयति मां पितु: सत्योपबृंहितम्॥ ३१॥

‘जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वनको न जाऊँ; क्योंकि पिताजीका वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वनकी ओर ले जा रहा है॥

एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।

आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ३२॥

‘सुश्रोणि! पिता और माताकी आज्ञाके अधीन रहना पुत्रका धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता॥ ३२॥

अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते।

स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥ ३३॥

‘जो अपनी सेवाके अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरुका उल्लङ्घन करके जो सेवाके अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैवकी विभिन्न प्रकारसे किस तरह आराधना की जा सकती है॥ ३३॥

यत्र त्रयं त्रयो लोका: पवित्रं तत्समं भुवि।

नान्यदस्ति शुभापाङ्गे तेनेदमभिराध्यते॥ ३४॥

‘सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करनेपर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकोंकी आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरुके समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतलपर नहीं है। इसीलिये भूतलके निवासी इन तीनों देवताओंकी आराधना करते हैं॥ ३४॥

न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणा:।

तथा बलकरा: सीते यथा सेवा पितुर्मता॥ ३५॥

‘सीते! पिताकी सेवा करना कल्याणकी प्राप्तिका जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञ ही हैं॥ ३५॥

स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्रा: सुखानि च।

गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम्॥ ३६॥

‘गुरुजनोंकी सेवाका अनुसरण करनेसे स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र और सुख—कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ३६॥

देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान्।

प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणा:॥ ३७॥

‘माता-पिताकी सेवामें लगे रहनेवाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकोंको भी प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥

स मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थित:।

तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्म: सनातन:॥ ३८॥

‘इसीलिये सत्य और धर्मके मार्गपर स्थित रहनेवाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातनधर्म है॥

मम सन्ना मति: सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम्।

वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता॥ ३९॥

‘सीते! ‘मैं आपके साथ वनमें निवास करूँगी’—ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलनेके सम्बन्धमें जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है॥ ३९॥

सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे।

अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव॥ ४०॥

‘मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वनमें चलनेके लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्मका आचरण करो॥ ४०॥

सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च।

व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्॥ ४१॥

‘प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलनेका जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुलके सर्वथा योग्य ही है॥ ४१॥

आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमा: क्रिया:।

नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥ ४२॥

‘सुश्रोणि! अब तुम वनवासके योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेनेपर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है॥ ४२॥

ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।

देहि चाशंसमानेभ्य: संत्वरस्व च मा चिरम्॥ ४३॥

‘ब्राह्मणोंको रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगनेवाले भिक्षुकोंको भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये॥ ४३॥

भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।

रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्करा:॥ ४४॥

शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।

देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्॥ ४५॥

तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जनकी जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोगमें आनेवाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमेंसे ब्राह्मणोंको दान करनेके पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकोंको बाँट दो’॥ ४४-४५॥

अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मन:।

क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे॥ ४६॥

‘स्वामीने वनमें मेरा जाना स्वीकार कर लिया—मेरा वनगमन उनके मनके अनुकूल हो गया’ यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुईं और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओंका दान करनेमें जुट गयीं॥ ४६॥

तत: प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा

यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।

धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना

प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी॥ ४७॥

तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे अत्यन्त हर्षमें भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामीके आदेशपर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणोंको धन और रत्नोंका दान करनेके लिये उद्यत हो गयीं॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंश: सर्ग:॥ ३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३०॥

 

एकत्रिंश: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणका संवाद, श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका सुहृदोंसे पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमनके लिये तैयार होना, श्रीरामका उनसे ब्राह्मणोंको धन बाँटनेका विचार व्यक्त करना

एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मण: पूर्वमागत:।

बाष्पपर्याकुलमुख: शोकं सोढुमशक्नुवन्॥ १॥

जिस समय श्रीराम और सीतामें बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे। उन दोनोंका ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओंसे भींग गया। भाईके विरहका शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा॥ १॥

स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दन:।

सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम्॥ २॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले लक्ष्मणने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीके दोनों पैर जोरसे पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ २॥

यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम्।

अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धर:॥ ३॥

‘आर्य! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियोंसे भरे हुए वनमें जानेका निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा। धनुष हाथमें लेकर आगे-आगे चलूँगा॥ ३॥

मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि।

पक्षिभिर्मृगयूथैश्च संघुष्टानि समन्तत:॥ ४॥

‘आप मेरे साथ पक्षियोंके कलरव और भ्रमर-समूहोंके गुञ्जारवसे गूँजते हुए रमणीय वनोंमें सब ओर विचरण कीजियेगा॥ ४॥

न देवलोकाक्रमणं नामरत्वमहं वृणे।

ऐश्वर्यं चापि लोकानां कामये न त्वया विना॥ ५॥

‘मैं आपके बिना स्वर्गमें जाने, अमर होने तथा सम्पूर्ण लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी भी इच्छा नहीं रखता’॥ ५॥

एवं ब्रुवाण: सौमित्रिर्वनवासाय निश्चित:।

रामेण बहुभि: सान्त्वैर्निषिद्ध: पुनरब्रवीत्॥ ६॥

वनवासके लिये निश्चित विचार करके ऐसी बात कहनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाकर जब वनमें चलनेसे मना किया, तब वे फिर बोले—॥ ६॥

अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम्।

किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम्॥ ७॥

‘भैया! आपने तो पहलेसे ही मुझे अपने साथ रहनेकी आज्ञा दे रखी है, फिर इस समय आप मुझे क्यों रोकते हैं?॥ ७॥

यदर्थं प्रतिषेधो मे क्रियते गन्तुमिच्छत:।

एतदिच्छामि विज्ञातुं संशयो हि ममानघ॥ ८॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! जिस कारणसे आपके साथ चलनेकी इच्छावाले मुझको आप मना करते हैं, उस कारणको मैं जानना चाहता हूँ। मेरे हृदयमें इसके लिये बड़ा संशय हो रहा है’॥ ८॥

ततोऽब्रवीन्महातेजा रामो लक्ष्मणमग्रत:।

स्थितं प्राग्गामिनं धीरं याचमानं कृताञ्जलिम्॥ ९॥

ऐसा कहकर धीर-वीर लक्ष्मण आगे जानेके लिये तैयार हो भगवान् श्रीरामके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर याचना करने लगे। तब महातेजस्वी श्रीरामने उनसे कहा—॥ ९॥

स्निग्धो धर्मरतो धीर: सततं सत्पथे स्थित:।

प्रिय: प्राणसमो वश्यो विजेयश्च सखा च मे॥ १०॥

‘लक्ष्मण! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर-वीर तथा सदा सन्मार्गमें स्थित रहनेवाले हो। मुझे प्राणोंके समान प्रिय हो तथा मेरे वशमें रहनेवाले आज्ञापालक और सखा हो॥ १०॥

मयाद्य सह सौमित्रे त्वयि गच्छति तद्वनम्।

को भजिष्यति कौसल्यां सुमित्रां वा यशस्विनीम्॥ ११॥

‘सुमित्रानन्दन! यदि आज मेरे साथ तुम भी वनको चल दोगे तो परमयशस्विनी माता कौसल्या और सुमित्राकी सेवा कौन करेगा?॥ ११॥

अभिवर्षति कामैर्य: पर्जन्य: पृथिवीमिव।

स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपति:॥ १२॥

‘जैसे मेघ पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते थे, वे महातेजस्वी महाराज दशरथ अब कैकेयीके प्रेमपाशमें बँध गये हैं॥ १२॥

सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपते: सुता।

दु:खितानां सपत्नीनां न करिष्यति शोभनम्॥ १३॥

‘केकयराज अश्वपतिकी पुत्री कैकेयी महाराजके इस राज्यको पाकर मेरे वियोगके दु:खमें डूबी हुई अपनी सौतोंके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी॥ १३॥

न भरिष्यति कौसल्यां सुमित्रां च सुदु:खिताम्।

भरतो राज्यमासाद्य कैकेय्यां पर्यवस्थित:॥ १४॥

‘भरत भी राज्य पाकर कैकेयीके अधीन रहनेके कारण दु:खिया कौसल्या और सुमित्राका भरण-पोषण नहीं करेंगे॥ १४॥

तामार्यां स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा।

सौमित्रे भर कौसल्यामुक्तमर्थममुं चर॥ १५॥

‘अत: सुमित्राकुमार! तुम यहीं रहकर अपने प्रयत्नसे अथवा राजाकी कृपा प्राप्त करके माता कौसल्याका पालन करो। मेरे बताये हुए इस प्रयोजनको ही सिद्ध करो॥

एवं मयि च ते भक्तिर्भविष्यति सुदर्शिता।

धर्मज्ञगुरुपूजायां धर्मश्चाप्यतुलो महान्॥ १६॥

‘ऐसा करनेसे मेरे प्रति जो तुम्हारी भक्ति है, वह भी भलीभाँति प्रकट हो जायगी तथा धर्मज्ञ गुरुजनोंकी पूजा करनेसे जो अनुपम एवं महान् धर्म होता है, वह भी तुम्हें प्राप्त हो जायगा॥ १६॥

एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन।

अस्माभिर्विप्रहीणाया मातुर्नो न भवेत् सुखम्॥ १७॥

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार! तुम मेरे लिये ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोगोंसे बिछुड़ी हुई हमारी माँको कभी सुख नहीं होगा (वह सदा हमारी ही चिन्तामें डूबी रहेगी)’॥ १७॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण: श्लक्ष्णया गिरा।

प्रत्युवाच तदा रामं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १८॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले लक्ष्मणने उस समय बातका तात्पर्य समझनेवाले श्रीरामको मधुर वाणीमें उत्तर दिया—॥ १८॥

तवैव तेजसा वीर भरत: पूजयिष्यति।

कौसल्यां च सुमित्रां च प्रयतो नास्ति संशय:॥ १९॥

‘वीर! आपके ही तेज (प्रभाव) से भरत माता कौसल्या और सुमित्रा दोनोंका पवित्र भावसे पूजन करेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ १९॥

यदि दु:स्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम्।

प्राप्य दुर्मनसा वीर गर्वेण च विशेषत:॥ २०॥

तमहं दुर्मतिं क्रूरं वधिष्यामि न संशय:।

तत्पक्षानपि तान् सर्वांस्त्रैलोक्यमपि किं तु सा॥ २१॥

कौसल्या बिभृयादार्या सहस्रं मद्विधानपि।

यस्या: सहस्रं ग्रामाणां सम्प्राप्तमुपजीविनाम्॥ २२॥

‘वीरवर! इस उत्तम राज्यको पाकर यदि भरत बुरे रास्तेपर चलेंगे और दूषित हृदय एवं विशेषत: घमण्डके कारण माताओंकी रक्षा नहीं करेंगे तो मैं उन दुर्बुद्धि और क्रूर भरतका तथा उनके पक्षका समर्थन करनेवाले उन सब लोगोंका वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है। यदि सारी त्रिलोकी उनका पक्ष करने लगे तो उसे भी अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, परंतु बड़ी माता कौसल्या तो स्वयं ही मेरे-जैसे सहस्रों मनुष्योंका भी भरण कर सकती हैं; क्योंकि उन्हें अपने आश्रितोंका पालन करनेके लिये एक सहस्र गाँव मिले हुए हैं॥

तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च।

पर्याप्ता मद्विधानां च भरणाय मनस्विनी॥ २३॥

‘इसलिये वे मनस्विनी कौसल्या स्वयं ही अपना, मेरी माताका तथा मेरे-जैसे और भी बहुत-से मनुष्योंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हैं॥ २३॥

कुरुष्व मामनुचरं वैधर्म्यं नेह विद्यते।

कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थ: प्रकल्प्यते॥ २४॥

‘अत: आप मुझको अपना अनुगामी बना लीजिये। इसमें कोई धर्मकी हानि नहीं होगी। मैं कृतार्थ हो जाऊँगा तथा आपका भी प्रयोजन मेरे द्वारा सिद्ध हुआ करेगा॥ २४॥

धनुरादाय सगुणं खनित्रपिटकाधर:।

अग्रतस्ते गमिष्यामि पन्थानं तव दर्शयन्॥ २५॥

‘प्रत्यञ्चासहित धनुष लेकर खंती और पिटारी लिये आपको रास्ता दिखाता हुआ मैं आपके आगे-आगे चलूँगा॥ २५॥

आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च।

वन्यानि च तथान्यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम्॥ २६॥

‘प्रतिदिन आपके लिये फल-मूल लाऊँगा तथा तपस्वीजनोंके लिये वनमें मिलनेवाली तथा अन्यान्य हवन-सामग्री जुटाता रहूँगा॥ २६॥

भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यसे।

अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रत: स्वपतश्च ते॥ २७॥

‘आप विदेहकुमारीके साथ पर्वतशिखरोंपर भ्रमण करेंगे। वहाँ आप जागते हों या सोते, मैं हर समय आपके सभी आवश्यक कार्य पूर्ण करूँगा’॥ २७॥

रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीत: प्रत्युवाच तम्।

व्रजापृच्छस्व सौमित्रे सर्वमेव सुहृज्जनम्॥ २८॥

लक्ष्मणकी इस बातसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! जाओ, माता आदि सभी सुहृदोंसे मिलकर अपनी वनयात्राके विषयमें पूछ लो—उनकी आज्ञा एवं अनुमति ले लो॥ २८॥

ये च राज्ञो ददौ दिव्ये महात्मा वरुण: स्वयम्।

जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने॥ २९॥

अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ।

आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ॥ ३०॥

सत्कृत्य निहितं सर्वमेतदाचार्यसद्मनि।

सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमाव्रज लक्ष्मण॥ ३१॥

‘लक्ष्मण! राजा जनकके महान् यज्ञमें स्वयं महात्मा वरुणने उन्हें जो देखनेमें भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस तथा सूर्यकी भाँति निर्मल दीप्तिसे दमकते हुए जो दो सुवर्णभूषित खड्ग प्रदान किये थे (वे सभी दिव्यास्त्र मिथिलानरेशने मुझे दहेजमें दे दिये थे), उन सबको आचार्यदेवके घरमें सत्कारपूर्वक रखा गया है। तुम उन सारे आयुधोंको लेकर शीघ्र लौट आओ’॥ २९—३१॥

स सुहृज्जनमामन्त्र्य वनवासाय निश्चित:।

इक्ष्वाकुगुरुमागम्य जग्राहायुधमुत्तमम्॥ ३२॥

आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी गये और सुहृज्जनोंकी अनुमति लेकर वनवासके लिये निश्चितरूपसे तैयार हो इक्ष्वाकुकुलके गुरु वसिष्ठजीके यहाँ गये। वहाँसे उन्होंने उन उत्तम आयुधोंको ले लिया॥ ३२॥

तद् दिव्यं राजशार्दूल: सत्कृतं माल्यभूषितम्।

रामाय दर्शयामास सौमित्रि: सर्वमायुधम्॥ ३३॥

क्षत्रियशिरोमणि सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सत्कारपूर्वक रखे हुए उन माल्यविभूषित समस्त दिव्य आयुधोंको लाकर उन्हें श्रीरामको दिखाया॥ ३३॥

तमुवाचात्मवान् राम: प्रीत्या लक्ष्मणमागतम्।

काले त्वमागत: सौम्य कांक्षिते मम लक्ष्मण॥ ३४॥

तब मनस्वी श्रीरामने वहाँ आये हुए लक्ष्मणसे प्रसन्न होकर कहा—‘सौम्य! लक्ष्मण! तुम ठीक समयपर आ गये। इसी समय तुम्हारा आना मुझे अभीष्ट था॥ ३५॥

अहं प्रदातुमिच्छामि यदिदं मामकं धनम्।

ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस्त्वया सह परंतप॥ ३५॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! मेरा जो यह धन है, इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणोंको बाँटना चाहता हूँ॥ ३५॥

वसन्तीह दृढं भक्त्या गुरुषु द्विजसत्तमा:।

तेषामपि च मे भूय: सर्वेषां चोपजीविनाम्॥ ३६॥

‘गुरुजनोंके प्रति सुदृढ़ भक्तिभावसे युक्त जो श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ मेरे पास रहते हैं, उनको तथा समस्त आश्रितजनोंको भी मुझे अपना यह धन बाँटना है॥ ३६॥

वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यं

त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम्।

अपि प्रयास्यामि वनं समस्ता-

नभ्यर्च्य शिष्टानपरान् द्विजातीन्॥ ३७॥

‘वसिष्ठजीके पुत्र जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ आर्य सुयज्ञ हैं, उन्हें तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं इन सबका तथा और जो ब्राह्मण शेष रह गये हों, उनका भी सत्कार करके वनको जाऊँगा’॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग:॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥

 

द्वात्रिंश: सर्ग:

सीतासहित श्रीरामका वसिष्ठपुत्र सुयज्ञको बुलाकर उनके तथा उनकी पत्नीके लिये बहुमूल्य आभूषण, रत्न और धन आदिका दान तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामद्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनोंको धनका वितरण

तत: शासनमाज्ञाय भ्रातु: प्रियकरं हितम्।

गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम्॥ १॥

तदनन्तर अपने भाई श्रीरामकी प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँसे चल दिये। उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञके घरमें प्रवेश किया॥ १॥

तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत्।

सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिण:॥ २॥

उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशालामें बैठे हुए थे। लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम करके कहा—‘सखे! दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके घरपर आओ और उनका कार्य देखो’॥ २॥

तत: संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह।

ऋद्धं स प्राविशल्लक्ष्म्या रम्यं रामनिवेशनम्॥ ३॥

सुयज्ञने मध्याह्नकालकी संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मणके साथ जाकर श्रीरामके रमणीय भवनमें प्रवेश किया, जो लक्ष्मीसे सम्पन्न था॥ ३॥

तमागतं वेदविदं प्राञ्जलि: सीतया सह।

सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम्॥ ४॥

होमकालमें पूजित अग्निके समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञको आया जान सीतासहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की॥ ४॥

जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदै: कुण्डलै: शुभै:।

सहेमसूत्रैर्मणिभि: केयूरैर्वलयैरपि॥ ५॥

अन्यैश्च रत्नैर्बहुभि: काकुत्स्थ: प्रत्यपूजयत्।

तत्पश्चात् ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने सोनेके बने हुए श्रेष्ठ अङ्गदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्णमय सूत्रमें पिरोयी हुई मणियों, केयूरों, वलयों तथा अन्य बहुत-से रत्नोंद्वारा उनका पूजन किया॥ ५॥

सुयज्ञं स तदोवाच राम: सीताप्रचोदित:॥ ६॥

हारं च हेमसूत्रं च भार्यायै सौम्य हारय।

रशनां चाथ सा सीता दातुमिच्छति ते सखी॥ ७॥

इसके बाद सीताकी प्रेरणासे श्रीरामने सुयज्ञसे कहा—‘सौम्य! तुम्हारी पत्नीकी सखी सीता तुम्हें अपना हार, सुवर्णसूत्र और करधनी देना चाहती है। इन वस्तुओंको अपनी पत्नीके लिये ले जाओ॥ ६-७॥

अङ्गदानि च चित्राणि केयूराणि शुभानि च।

प्रयच्छति सखी तुभ्यं भार्यायै गच्छती वनम्॥ ८॥

‘वनको प्रस्थान करनेवाली तुम्हारी स्त्रीकी सखी सीता तुम्हें तुम्हारी पत्नीके लिये विचित्र अङ्गद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती है॥ ८॥

पर्यङ्कमग्र्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम्।

तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि॥ ९॥

‘उत्तम बिछौनोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित जो पलंग है, उसे भी विदेहनन्दिनी सीता तुम्हारे ही घरमें भेज देना चाहती है॥ ९॥

नाग: शत्रुंजयो नाम मातुलोऽयं ददौ मम।

तं ते निष्कसहस्रेण ददामि द्विजपुङ्गव॥ १०॥

‘विप्रवर! शत्रुञ्जय नामक जो हाथी है, जिसे मेरे मामाने मुझे भेंट किया था, उसे एक हजार अशर्फियोंके साथ मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ’॥ १०॥

इत्युक्त: स तु रामेण सुयज्ञ: प्रतिगृह्य तत्।

रामलक्ष्मणसीतानां प्रयुयोजाशिष: शिवा:॥ ११॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुयज्ञने वे सब वस्तुएँ ग्रहण करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये॥ ११॥

अथ भ्रातरमव्यग्रं प्रियं राम: प्रियंवदम्।

सौमित्रिं तमुवाचेदं ब्रह्मेव त्रिदशेश्वरम्॥ १२॥

तदनन्तर श्रीरामने शान्तभावसे खड़े हुए और प्रिय वचन बोलनेवाले अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे उसी तरह निम्नाङ्कित बात कही, जैसे ब्रह्मा देवराज इन्द्रसे कुछ कहते हैं॥ १२॥

अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ।

अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नै: सस्यमिवाम्बुभि:॥ १३॥

तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्रेण राघव।

सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनै:॥ १४॥

‘सुमित्रानन्दन! अगस्त्य और विश्वामित्र दोनों उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाकर रत्नोंद्वारा उनकी पूजा करो। महाबाहु रघुनन्दन! जैसे मेघ जलकी वर्षाद्वारा खेतीको तृप्त करता है, उसी प्रकार तुम उन्हें सहस्रों गौओं, सुवर्णमुद्राओं, रजतद्रव्यों और बहुमूल्य मणियोंद्वारा संतुष्ट करो॥ १३-१४॥

कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्त: पर्युपतिष्ठति।

आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित्॥ १५॥

तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय।

कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विज:॥ १६॥

‘लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंके जो आचार्य और सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् हैं, साथ ही जिनमें दानप्राप्तिकी योग्यता है तथा जो माता कौसल्याके प्रति भक्तिभाव रखकर प्रतिदिन उनके पास आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उनको सवारी, दास-दासी, रेशमी वस्त्र और जितने धनसे वे ब्राह्मणदेवता संतुष्ट हों, उतना धन खजानेसे दिलवाओ॥ १५-१६॥

सूतश्चित्ररथश्चार्य: सचिव: सुचिरोषित:।

तोषयैनं महार्हैश्च रत्नैर्वस्त्रैर्धनैस्तथा॥ १७॥

पशुकाभिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च।

‘चित्ररथ नामक सूत श्रेष्ठ सचिव भी हैं। वे सुदीर्घकालसे यहीं राजकुलकी सेवामें रहते हैं। इनको भी तुम बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और धन देकर संतुष्ट करो। साथ ही, इन्हें उत्तम श्रेणीके अज आदि सभी पशु और एक सहस्र गौएँ अर्पित करके पूर्ण संतोष प्रदान करो॥ १७॥

ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवा:॥ १८॥

नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन।

अलसा: स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मता:॥ १९॥

तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय।

शालिवाहसहस्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा॥ २०॥

‘मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले जो कठशाखा और कलाप-शाखाके अध्येता बहुत-से दण्डधारी ब्रह्मचारी हैं, वे सदा स्वाध्यायमें ही संलग्न रहनेके कारण दूसरा कोई कार्य नहीं कर पाते। भिक्षा माँगनेमें आलसी हैं, परंतु स्वादिष्ट अन्न खानेकी इच्छा रखते हैं। महान् पुरुष भी उनका सम्मान करते हैं। उनके लिये रत्नोंके बोझसे लदे हुए अस्सी ऊँट, अगहनी चावलका भार ढोनेवाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्यविशेष (चने, मूँग आदि) का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ॥

व्यञ्जनार्थं च सौमित्रे गोसहस्रमुपाकुरु।

मेखलीनां महासङ्घ: कौसल्यां समुपस्थित:।

तेषां सहस्रं सौमित्रे प्रत्येकं सम्प्रदापय॥ २१॥

‘सुमित्राकुमार! उपर्युक्त वस्तुओंके सिवा उनके लिये दही, घी आदि व्यञ्जनके निमित्त एक सहस्र गौएँ भी हँकवा दो। माता कौसल्याके पास मेखलाधारी ब्रह्मचारियोंका बहुत बड़ा समुदाय आया है। उनमेंसे प्रत्येकको एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवा दो॥ २१॥

अम्बा यथा नो नन्देच्च कौसल्या मम दक्षिणाम्।

तथा द्विजातींस्तान् सर्वाल्लँक्ष्मणार्चय सर्वश:॥ २२॥

‘लक्ष्मण! उन समस्त ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंको मेरे द्वारा दिलायी हुई दक्षिणा देखकर जिस प्रकार मेरी माता कौसल्या आनन्दित हो उठे, उसी प्रकार तुम उन सबकी सब प्रकारसे पूजा करो’॥ २२॥

तत: पुरुषशार्दूलस्तद् धनं लक्ष्मण: स्वयम्।

यथोक्तं ब्राह्मणेन्द्राणामददाद् धनदो यथा॥ २३॥

इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होनेपर पुरुषसिंह लक्ष्मणने स्वयं ही कुबेरकी भाँति श्रीरामके कथनानुसार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उस धनका दान किया॥ २३॥

अथाब्रवीद् बाष्पगलांस्तिष्ठतश्चोपजीविन:।

स प्रदाय बहुद्रव्यमेकैकस्योपजीवनम्॥ २४॥

लक्ष्मणस्य च यद् वेश्म गृहं च यदिदं मम।

अशून्यं कार्यमेकैकं यावदागमनं मम॥ २५॥

इसके बाद वहाँ खड़े हुए अपने आश्रित सेवकोंको जिनका गला आँसुओंसे रुँधा हुआ था, बुलाकर श्रीरामने उनमेंसे एक-एकको चौदह वर्षोंतक जीविका चलानेयोग्य बहुत-सा द्रव्य प्रदान किया और उन सबसे कहा—‘जबतक मैं वनसे लौटकर न आऊँ, तबतक तुमलोग लक्ष्मणके और मेरे इस घरको कभी सूना न करना—छोड़कर अन्यत्र न जाना’॥ २४-२५॥

इत्युक्त्वा दु:खितं सर्वं जनं तमुपजीविनम्।

उवाचेदं धनाध्यक्षं धनमानीयतां मम॥ २६॥

वे सब सेवक श्रीरामके वनगमनसे बहुत दु:खी थे। उनसे उपर्युक्त बात कहकर श्रीराम अपने धनाध्यक्ष (खजांची) से बोले—‘खजानेमें मेरा जितना धन है, वह सब ले आओ’॥ २६॥

ततोऽस्य धनमाजहृ: सर्व एवोपजीविन:।

स राशि: सुमहांस्तत्र दर्शनीयो ह्यदृश्यत॥ २७॥

यह सुनकर सभी सेवक उनका धन ढो-ढोकर ले आने लगे। वहाँ उस धनकी बहुत बड़ी राशि एकत्र हुई दिखायी देने लगी, जो देखने ही योग्य थी॥ २७॥

तत: स पुरुषव्याघ्रस्तद् धनं सहलक्ष्मण:।

द्विजेभ्यो बालवृद्धेभ्य: कृपणेभ्यो ह्यदापयत्॥ २८॥

तब लक्ष्मणसहित पुरुषसिंह श्रीरामने बालक और बूढ़े ब्राह्मणों तथा दीन-दु:खियोंको वह सारा धन बँटवा दिया॥ २८॥

तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विज:।

क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली॥ २९॥

उन दिनों वहाँ अयोध्याके आस-पास वनमें त्रिजट नामवाले एक गर्गगोत्रीय ब्राह्मण रहते थे। उनके पास जीविकाका कोई साधन नहीं था, इसलिये उपवास आदिके कारण उनके शरीरका रंग पीला पड़ गया था। वे सदा फाल, कुदाल और हल लिये वनमें फल-मूलकी तलाशमें घूमा करते थे॥ २९॥

तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान्।

अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता॥ ३०॥

अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम।

रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि॥ ३१॥

वे स्वयं तो बूढ़े हो चले थे, परंतु उनकी पत्नी अभी तरुणी थी। उसने छोटे बच्चोंको लेकर ब्राह्मणदेवतासे यह बात कही—‘प्राणनाथ! (यद्यपि) स्त्रियोंके लिये पति ही देवता है, (अत: मुझे आपको आदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है, तथापि मैं आपकी भक्त हूँ; इसलिये विनयपूर्वक यह अनुरोध करती हूँ कि—) आप यह फाल और कुदाल फेंककर मेरा कहना कीजिये। धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीसे मिलिये। यदि आप ऐसा करें तो वहाँ अवश्य कुछ पा जायँगे’॥ ३०-३१॥

स भार्याया वच: श्रुत्वा शाटीमाच्छाद्य दुश्छदाम्।

स प्रातिष्ठत पन्थानं यत्र रामनिवेशनम्॥ ३२॥

पत्नीकी बात सुनकर ब्राह्मण एक फटी धोती, जिससे मुश्किलसे शरीर ढक पाता था, पहनकर उस मार्गपर चल दिये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका महल था॥ ३२॥

भृग्वङ्गिर:समं दीप्त्या त्रिजटं जनसंसदि।

आपञ्चमाया: कक्ष्याया नैतं कश्चिदवारयत्॥ ३३॥

भृगु और अङ्गिराके समान तेजस्वी त्रिजट, जनसमुदायके बीचसे होकर श्रीराम-भवनकी पाँचवीं ड्यौढ़ीतक चले गये, परंतु उनके लिये किसीने रोक-टोक नहीं की॥ ३३॥

स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत्।

निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल॥ ३४॥

क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति।

उस समय श्रीरामके पास पहुँचकर त्रिजटने कहा—‘महाबली राजकुमार! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत-से पुत्र हैं, जीविका नष्ट हो जानेसे सदा वनमें ही रहता हूँ, आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये’॥ ३४/

तमुवाच ततो राम: परिहाससमन्वितम्॥ ३५॥

गवां सहस्रमप्येकं न च विश्राणितं मया।

परिक्षिपसि दण्डेन यावत्तावदवाप्स्यसे॥ ३६॥

तब श्रीरामने विनोदपूर्वक कहा—‘ब्रह्मन्! मेरे पास असंख्य गौएँ हैं, इनमेंसे एक सहस्रका भी मैंने अभीतक किसीको दान नहीं किया है। आप अपना डंडा जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँतककी सारी गौएँ आपको मिल जायँगी’॥ ३६॥

स शाटीं परित: कट्यां सम्भ्रान्त: परिवेष्ट्य ताम्।

आविध्य दण्डं चिक्षेप सर्वप्राणेन वेगत:॥ ३७॥

यह सुनकर उन्होंने बड़ी तेजीके साथ धोतीके पल्लेको सब ओरसे कमरमें लपेट लिया और अपनी सारी शक्ति लगाकर डंडेको बड़े वेगसे घुमाकर फेंका॥

स तीर्त्वा सरयूपारं दण्डस्तस्य कराच्च्युत:।

गोव्रजे बहुसाहस्रे पपातोक्षणसंनिधौ॥ ३८॥

ब्राह्मणके हाथसे छूटा हुआ वह डंडा सरयूके उस पार जाकर हजारों गौओंसे भरे हुए गोष्ठमें एक साँड़के पास गिरा॥ ३८॥

तं परिष्वज्य धर्मात्मा आ तस्मात् सरयूतटात्।

आनयामास ता गावस्त्रिजटस्याश्रमं प्रति॥ ३९॥

धर्मात्मा श्रीरामने त्रिजटको छातीसे लगा लिया और उस सरयूतटसे लेकर उस पार गिरे हुए डंडेके स्थानतक जितनी गौएँ थीं, उन सबको मँगवाकर त्रिजटके आश्रमपर भेज दिया॥ ३९॥

उवाच च तदा रामस्तं गार्ग्यमभिसान्त्वयन्।

मन्युर्न खलु कर्तव्य: परिहासो ह्ययं मम॥ ४०॥

उस समय श्रीरामने गर्गवंशी त्रिजटको सान्त्वना देते हुए कहा—‘ब्रह्मन्! मैंने विनोदमें यह बात कही थी, आप इसके लिये बुरा न मानियेगा॥ ४०॥

इदं हि तेजस्तव यद् दुरत्ययं

तदेव जिज्ञासितुमिच्छता मया।

इमं भवानर्थमभिप्रचोदितो

वृणीष्व किंचेदपरं व्यवस्यसि॥ ४१॥

‘आपका यह जो दुर्लङ्‌घ्य तेज है, इसीको जाननेकी इच्छासे मैंने आपको यह डंडा फेंकनेके लिये प्रेरित किया था, यदि आप और कुछ चाहते हों तो माँगिये॥ ४१॥

ब्रवीमि सत्येन न ते स्म यन्त्रणां

धनं हि यद्यन्मम विप्रकारणात्।

भवत्सु सम्यक्प्रतिपादनेन

मयार्जितं चैव यशस्करं भवेत्॥ ४२॥

मैं सच कहता हूँ कि इसमें आपके लिये कोई संकोचकी बात नहीं है। मेरे पास जो-जो धन हैं, वह सब ब्राह्मणोंके लिये ही है। आप-जैसे ब्राह्मणोंको शास्त्रीय विधिके अनुसार दान देनेसे मेरे द्वारा उपार्जित किया हुआ धन मेरे यशकी वृद्धि करनेवाला होगा’॥

तत: सभार्यस्त्रिजटो महामुनि-

र्गवामनीकं प्रतिगृह्य मोदित:।

यशोबलप्रीतिसुखोपबृंहिणी-

स्तदाशिष: प्रत्यवदन्महात्मन:॥ ४३॥

गौओंके उस महान् समूहको पाकर पत्नीसहित महामुनि त्रिजटको बड़ी प्रसन्नता हुई, वे महात्मा श्रीरामको यश, बल, प्रीति तथा सुख बढ़ानेवाले आशीर्वाद देने लगे॥ ४३॥

स चापि राम: प्रतिपूर्णपौरुषो

महाधनं धर्मबलैरुपार्जितम्।

नियोजयामास सुहृज्जने चिराद्

यथार्हसम्मानवच: प्रचोदित:॥ ४४॥

तदनन्तर पूर्ण पराक्रमी भगवान् श्रीराम धर्मबलसे उपार्जित किये हुए उस महान् धनको लोगोंके यथायोग्य सम्मानपूर्ण वचनोंसे प्रेरित हो बहुत देरतक अपने सुहृदोंमें बाँटते रहे॥ ४४॥

द्विज: सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा

दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत्।

न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो

यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमै: ॥ ४५॥

उस समय वहाँ कोई भी ब्राह्मण, सुहृद्, सेवक, दरिद्र अथवा भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो श्रीरामके यथायोग्य सम्मान, दान तथा आदर-सत्कारसे तृप्त न किया गया हो॥ ४५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥

 


त्रयस्त्रिंश: सर्ग:

सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका दु:खी नगरवासियोंके मुखसे तरह-तरहकी बातें सुनते हुए पिताके दर्शनके लिये कैकेयीके महलमें जाना

दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु।

जग्मतु: पितरं द्रष्टुं सीतया सह राघवौ॥ १॥

विदेहकुमारी सीताके साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान करके वन जानेके लिये उद्यत हो पिताका दर्शन करनेके लिये गये॥ १॥

ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे।

मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते॥ २॥

उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मणके वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूलकी मालाओंसे सजाया गया था और सीताजीने पूजाके लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदिसे अलंकृत किया था। उन दोनोंके आयुधोंकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी॥ २॥

तत: प्रासादहर्म्याणि विमानशिखराणि च।

अभिरुह्य जन: श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत्॥ ३॥

उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों (तिमंजिले महलों), हर्म्यगृहों (राजभवनों) तथा विमानों (सात मंजिले महलों) की ऊपरी छतोंपर चढ़कर उदासीन भावसे उन तीनोंकी ओर देखने लगे॥ ३॥

न हि रथ्या: सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुला:।

आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीना: पश्यन्ति राघवम्॥ ४॥

उस समय सड़कें मनुष्योंकी भीड़से भरी थीं। इसलिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था। अत: अधिकांश मनुष्य प्रासादों (तिमंजिले मकानों) पर चढ़कर वहींसे दु:खी होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे थे॥ ४॥

पदातिं सानुजं दृष्ट्वा ससीतं च जनास्तदा।

ऊचुर्बहुजना वाच: शोकोपहतचेतस:॥ ५॥

श्रीरामको अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ पैदल जाते देख बहुत-से मनुष्योंका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा। वे खेदपूर्वक कहने लगे—॥ ५॥

यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत्।

तमेकं सीतया सार्धमनुयाति स्म लक्ष्मण:॥ ६॥

‘हाय! यात्राके समय जिनके पीछे विशाल चतुरङ्गिणी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम आज अकेले जा रहे हैं और उनके पीछे सीताके साथ लक्ष्मण चल रहे हैं॥ ६॥

ऐश्वर्यस्य रसज्ञ: सन् कामानां चाकरो महान्।

नेच्छत्येवानृतं कर्तुं वचनं धर्मगौरवात्॥ ७॥

‘जो ऐश्वर्यके सुखका अनुभव करनेवाले तथा भोग्य वस्तुओंके महान् भण्डार थे—जहाँ सबकी कामनाएँ पूर्ण होती थीं, वे ही श्रीराम आज धर्मका गौरव रखनेके लिये पिताकी बात झूठी करना नहीं चाहते हैं॥ ७॥

या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि।

तामद्य सीतां पश्यन्ति राजमार्गगता जना:॥ ८॥

‘ओह! पहले जिसे आकाशमें विचरनेवाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उसी सीताको इस समय सड़कोंपर खड़े हुए लोग देख रहे हैं॥ ८॥

अङ्गरागोचितां सीतां रक्तचन्दनसेविनीम्।

वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम्॥ ९॥

‘सीता अङ्गराग-सेवनके योग्य हैं, लाल चन्दनका सेवन करनेवाली हैं। अब वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही इनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी कर देगी॥ ९॥

अद्य नूनं दशरथ: सत्त्वमाविश्य भाषते।

नहि राजा प्रियं पुत्रं विवासयितुमर्हति॥ १०॥

‘निश्चय ही आज राजा दशरथ किसी पिशाचके आवेशमें पड़कर अनुचित बात कह रहे हैं; क्योंकि अपनी स्वाभाविक स्थितिमें रहनेवाला कोई भी राजा अपने प्यारे पुत्रको घरसे निकाल नहीं सकता॥ १०॥

निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम्।

किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम्॥ ११॥

‘पुत्र यदि गुणहीन हो तो भी उसे घरसे निकाल देनेका साहस कैसे हो सकता है? फिर जिसके केवल चरित्रसे ही यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसको वनवास देनेकी तो बात ही कैसे की जा सकती है?॥

आनृशंस्यमनुक्रोश: श्रुतं शीलं दम: शम:।

राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणा: पुरुषर्षभम्॥ १२॥

‘क्रूरताका अभाव, दया, विद्या, शील, दम (इन्द्रियसंयम) और शम (मनोनिग्रह)—ये छ: गुण नरश्रेष्ठ श्रीरामको सदा ही सुशोभित करते हैं॥ १२॥

तस्मात् तस्योपघातेन प्रजा: परमपीडिता:।

औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात्॥ १३॥

‘अत: इनके ऊपर आघात करने—इनके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे प्रजाको उसी तरह महान् क्लेश पहुँचा है, जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी सूख जानेसे उसके भीतर रहनेवाले जीव तड़पने लगते हैं॥

पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पते:।

मूलस्येवोपघातेन वृक्ष: पुष्पफलोपग:॥ १४॥

‘इन जगदीश्वर श्रीरामकी व्यथासे सम्पूर्ण जगत् व्यथित हो उठा है, जैसे जड़ काट देनेसे पुष्प और फलसहित सारा वृक्ष सूख जाता है॥ १४॥

मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मसारो महाद्युति:।

पुष्पं फलं च पत्रं च शाखाश्चास्येतरे जना:॥ १५॥

‘ये महान् तेजस्वी श्रीराम सम्पूर्ण मनुष्योंके मूल हैं, धर्म ही इनका बल है। जगत्के दूसरे प्राणी पत्र, पुष्प, फल और शाखाएँ हैं॥ १५॥

ते लक्ष्मण इव क्षिप्रं सपत्न्य: सहबान्धवा:।

गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति राघव:॥ १६॥

‘अत: हमलोग भी लक्ष्मणकी भाँति पत्नी और बन्धु-बान्धवोंके साथ शीघ्र ही इन जानेवाले श्रीरामके ही पीछे-पीछे चल दें। जिस मार्गसे श्रीरघुनाथजी जा रहे हैं, उसीका हम भी अनुसरण करें॥ १६॥

उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च।

एकदु:खसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम्॥ १७॥

‘बाग-बगीचे, घर-द्वार और खेती-बारी—सब छोड़कर धर्मात्मा श्रीरामका अनुगमन करें। इनके दु:ख-सुखके साथी बनें॥ १७॥

समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च।

उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वश:॥ १८॥

रजसाभ्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतै:।

मूषकै: परिधावद्भिरुद्बिलैरावृतानि च॥ १९॥

अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च।

प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च॥ २०॥

दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च।

अस्मत्त्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम्॥ २१॥

‘हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकालें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन-धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जायँ। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें—ऐसी दशामें इन घरोंपर कैकेयी आकर अधिकार कर ले॥ १८—२१॥

वनं नगरमेवास्तु येन गच्छति राघव:।

अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम्॥ २२॥

‘जहाँ पहुँचनेके लिये ये श्रीरामचन्द्रजी जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर भी वनके रूपमें परिणत हो जाय॥ २२॥

बिलानि दंष्ट्रिण: सर्वे सानूनि मृगपक्षिण:।

त्यजन्त्वस्मद्भयाद्भीता गजा: सिंहा वनान्यपि॥ २३॥

‘वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ। पर्वतपर रहनेवाले मृग और पक्षी उसके शिखरोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी उन वनोंको त्यागकर दूर चले जायँ॥ २३॥

अस्मत्त्यक्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च।

तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम्॥ २४॥

प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवै:।

राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृता:॥ २५॥

‘वे सर्प आदि उन स्थानोंमें चले जायँ, जिन्हें हमलोगोंने छोड़ रखा है और उन स्थानोंको त्याग दें, जिनका हम सेवन करते हैं। यह देश घास चरनेवाले पशुओं, मांसभक्षी हिंसक जन्तुओं और फल खानेवाले पक्षियोंका निवासस्थान बन जाय। यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें। उस दशामें पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित कैकेयी इसे अपने अधिकारमें कर ले। हम सब लोग वनमें श्रीरघुनाथजीके साथ बड़े आनन्दसे रहेंगे’॥ २४-२५॥

इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता:।

शुश्राव राघव: श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ २६॥

स तु वेश्म पुनर्मातु: कैलासशिखरप्रभम्।

अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रम:॥ २७॥

इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से मनुष्योंके मुँहसे निकली हुई तरह-तरहकी बातें सुनीं; किंतु सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं हुआ। मतवाले गजराजके समान पराक्रमी धर्मात्मा श्रीराम पुन: माता कैकेयीके कैलासशिखरके सदृश शुभ्र भवनमें गये॥ २६-२७॥

विनीतवीरपुरुषं प्रविश्य तु नृपालयम्।

ददर्शावस्थितं दीनं सुमन्त्रमविदूरत:॥ २८॥

विनयशील वीर पुरुषोंसे युक्त उस राजभवनमें प्रवेश करके उन्होंने देखा—सुमन्त्र पास ही दु:खी होकर खड़े हैं॥ २८॥

प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्त-

मनार्तरूप: प्रहसन्निवाथ।

जगाम राम: पितरं दिदृक्षु:

पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षु:॥ २९॥

पूर्वजोंकी निवासभूमि अवधके मनुष्य वहाँ शोकसे आतुर होकर खड़े थे। उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोकसे पीडि़त नहीं हुए—उनके शरीरपर व्यथाका कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ। वे पिताकी आज्ञाका विधिपूर्वक पालन करनेकी इच्छासे उनका दर्शन करनेके लिये हँसते हुए-से आगे बढ़े॥ २९॥

तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा

रामो गमिष्यन् नृपमार्तरूपम्।

व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं

पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम्॥ ३०॥

शोकाकुलरूपसे पड़े हुए राजाके पास जानेवाले महात्मा महामना इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीराम वहाँ पहुँचनेसे पहले सुमन्त्रको देखकर पिताके पास अपने आगमनकी सूचना भेजनेके लिये उस समय वहीं ठहर गये॥ ३०॥

पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो

वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चय:।

स राघव: प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी-

न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे॥ ३१॥

पिताके आदेशसे वनमें प्रवेश करनेका बुद्धिपूर्वक निश्चय करके आये हुए धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्रकी ओर देखकर बोले—‘आप महाराजको मेरे आगमनकी सूचना दे दें’॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंश: सर्ग:॥ ३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

 

चतुस्त्रिंश: सर्ग:

सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रानियोंसहित राजा दशरथके पास जाकर वनवासके लिये विदा माँगना, राजाका शोक और मूर्च्छा, श्रीरामका उन्हें समझाना तथा राजाका श्रीरामको हृदयसे लगाकर पुन: मूर्च्छित हो जाना

तत: कमलपत्राक्ष: श्यामो निरुपमो महान्।

उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति॥ १॥

स रामप्रेषित: क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्।

प्रविश्य नृपतिं सूतो नि:श्वसन्तं ददर्श ह॥ २॥

जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीरामने सूत सुमन्त्रसे कहा—‘आप पिताजीको मेरे आगमनकी सूचना दे दीजिये’ तब श्रीरामकी प्रेरणासे शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्रने राजाका दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संतापसे कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे॥ १-२॥

उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्।

तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्॥ ३॥

आबोध्य च महाप्राज्ञ: परमाकुलचेतनम्।

राममेवानुशोचन्तं सूत: प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ ४॥

सुमन्त्रने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राखसे ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाबके समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीरामका ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूतने महाराजको सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा॥

तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।

भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥ ५॥

पहले तो सूत सुमन्त्रने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराजकी अभ्युदय-कामना की; फिर भयसे व्याकुल मन्द-मधुर वाणीद्वारा यह बात कही—॥ ५॥

अयं स पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुत:।

ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम्॥ ६॥

स त्वां पश्यतु भद्रं ते राम: सत्यपराक्रम:।

सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानीं दिदृक्षते॥ ७॥

गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते।

वृतं राजगुणै: सर्वैरादित्यमिव रश्मिभि:॥ ८॥

‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकोंको अपना सारा धन देकर द्वारपर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदोंसे मिलकर—उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन्! अब ये विशाल वनमें चले जायँगे, अत: किरणोंसे युक्त सूर्यकी भाँति समस्त राजोचित गुणसे सम्पन्न इन श्रीरामको आप भी जी भरकर देख लीजिये’॥ ६—८॥

स सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपम:।

आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्र: प्रत्युवाच तम्॥ ९॥

यह सुनकर समुद्रके समान गम्भीर तथा आकाशकी भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथने उन्हें उत्तर दिया—॥ ९॥

सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामका:।

दारै: परिवृत: सर्वैर्द्रष्टुमिच्छामि राघवम्॥ १०॥

‘सुमन्त्र! यहाँ जो कोई भी मेरी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ। उन सबके साथ मैं श्रीरामको देखना चाहता हूँ’॥ १०॥

सोऽन्त:पुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत्।

आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ ११॥

तब सुमन्त्रने बड़े वेगसे अन्त:पुरमें जाकर सब स्त्रियोंसे कहा—‘देवियो! आपलोगोंको महाराज बुला रहे हैं, अत: वहाँ शीघ्र चलें’॥ ११॥

एवमुक्ता: स्त्रिय: सर्वा: सुमन्त्रेण नृपाज्ञया।

प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम्॥ १२॥

राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर वे सब रानियाँ स्वामीका आदेश समझकर उस भवनकी ओर चलीं॥ १२॥

अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचना:।

कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुर्धृतव्रता:॥ १३॥

कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौसल्याको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे उस भवनमें गयीं॥ १३॥

आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपति:।

उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम्॥ १४॥

उन सबके आ जानेपर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथने सूतसे कहा—‘सुमन्त्र! अब मेरे पुत्रको ले आओ’॥

स सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिलीं तथा।

जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपते:॥ १५॥

आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीताको साथ लेकर शीघ्र ही महाराजके पास लौट आये॥ १५॥

स राजा पुत्रमायान्तं दृष्ट्वा चारात् कृताञ्जलिम्।

उत्पपातासनात् तूर्णमार्त: स्त्रीजनसंवृत:॥ १६॥

महाराज दूरसे ही अपने पुत्रको हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसनसे उठ खड़े हुए। उस समय स्त्रियोंसे घिरे हुए वे नरेश शोकसे आर्त हो रहे थे॥

सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पति:।

तमसम्प्राप्य दु:खार्त: पपात भुवि मूर्च्छित:॥ १७॥

श्रीरामको देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहुँचनेके पहले ही दु:खसे व्याकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये॥ १७॥

तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथ:।

विसंज्ञमिव दु:खेन सशोकं नृपतिं तथा॥ १८॥

उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजीसे चलकर दु:खके कारण अचेत-से हुए शोकमग्न महाराजके पास जा पहुँचे॥ १८॥

स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि।

हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रित:॥ १९॥

इतनेहीमें उस राजभवनके भीतर सहसा आभूषणोंकी ध्वनिके साथ सहस्रों स्त्रियोंका ‘हा राम! हा राम!’ यह आर्तनाद गूँज उठा॥ १९॥

तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ।

पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्त: समवेशयन्॥ २०॥

श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीताके साथ रो पड़े और उन तीनोंने महाराजको दोनों भुजाओंसे उठाकर पलंगपर बिठा दिया॥ २०॥

अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम्।

उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम्॥ २१॥

शोकाश्रुके सागरमें डूबे हुए महाराज दशरथको दो घड़ीमें जब फिर चेत हुआ, तब श्रीरामने हाथ जोड़कर उनसे कहा—॥ २१॥

आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि न:।

प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम्॥ २२॥

‘महाराज! आप हमलोगोंके स्वामी हैं। मैं दण्डकारण्यको जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। आप अपनी कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखिये॥

लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम्।

कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छत:॥ २३॥

अनुजानीहि सर्वान् न: शोकमुत्सृज्य मानद।

लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान्॥ २४॥

‘मेरे साथ लक्ष्मणको भी वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये। साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वनको जाय। मैंने बहुत-से सच्चे कारण बताकर इन दोनोंको रोकनेकी चेष्टा की है, परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अत: दूसरोंको मान देनेवाले नरेश! आप शोक छोड़कर हम सबको—मुझको, लक्ष्मणको और सीताको भी उसी तरह वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र सनकादिकोंको तपके लिये वनमें जानेकी अनुमति दी थी’॥ २३-२४॥

प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपते:।

उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम्॥ २५॥

इस प्रकार शान्तभावसे वनवासके लिये राजाकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर महाराजने उनसे कहा—॥ २५॥

अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहित:।

अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम्॥ २६॥

‘रघुनन्दन! मैं कैकेयीको दिये हुए वरके कारण मोहमें पड़ गया हूँ। तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्याके राजा बन जाओ’॥ २६॥

एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वर:।

प्रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविद:॥ २७॥

महाराजके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने दोनों हाथ जोड़कर पिताको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २७॥

भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पति:।

अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य कांक्षिता॥ २८॥

‘महाराज! आप सहस्रों वर्षोंतक इस पृथ्वीके अधिपति बने रहें। मैं तो अब वनमें ही निवास करूँगा। मुझे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं है॥ २८॥

नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते।

पुन: पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप॥ २९॥

‘नरेश्वर! चौदह वर्षोंतक वनमें घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेनेके पश्चात् मैं पुन: आपके युगल चरणोंमें मस्तक झुकाऊँगा’॥ २९॥

रुदन्नार्त: प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुत:।

कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत्॥ ३०॥

राजा दशरथ एक तो सत्यके बन्धनमें बँधे हुए थे, दूसरे एकान्तमें कैकेयी उन्हें श्रीरामको वनमें तुरंत भेजनेके लिये बाध्य कर रही थी—इस अवस्थामें वे आर्तभावसे रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीरामसे बोले—॥ ३०॥

श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च।

गच्छस्वारिष्टमव्यग्र: पन्थानमकुतोभयम्॥ ३१॥

‘तात! तुम कल्याणके लिये, वृद्धिके लिये और फिर लौट आनेके लिये शान्तभावसे जाओ। तुम्हारा मार्ग विघ्न-बाधाओंसे रहित और निर्भय हो॥ ३१॥

न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव।

संनिवर्तयितुं बुद्धि: शक्यते रघुनन्दन॥ ३२॥

अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा।

एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम्॥ ३३॥

‘बेटा रघुनन्दन! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो। तुम्हारे विचारको पलटना तो असम्भव है; परंतु रातभर और रह जाओ। सिर्फ एक रातके लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो। केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखनेका सुख उठा लूँ॥ ३२-३३॥

मातरं मां च सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम्।

तर्पित: सर्वकामैस्त्वं श्व: काल्ये साधयिष्यसि॥ ३४॥

‘अपनी माताको और मुझको इस अवस्थामें देखकर आजकी इस रातमें यहीं रह जाओ। मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंसे तृप्त होकर कल प्रात:काल यहाँसे जाना॥

दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय।

त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम्॥ ३५॥

‘मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो। मेरा प्रिय करनेके लिये ही तुमने इस प्रकार वनका आश्रय लिया है॥ ३५॥

न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव।

छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया॥ ३६॥

वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि।

अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदित:॥ ३७॥

‘परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है। मुझे तुम्हारा वनमें जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राखमें छिपी हुई आगके समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्रायको छिपा रखा था। इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्पसे विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचारका विनाश करनेवाली इस कैकेयीने मुझे वरदानके लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो॥ ३६-३७॥

न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठ: सुतो मम।

अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि॥ ३८॥

‘पुत्र! तुम अपने पिताको सत्यवादी बनाना चाहते हो। तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो’॥ ३८॥

अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम्।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत्॥ ३९॥

अपने शोकाकुल पिताका यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने दु:खी होकर कहा—॥ ३९॥

प्राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति।

अपक्रमणमेवात: सर्वकामैरहं वृणे॥ ४०॥

‘महाराज! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों (लाभों) को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा?47 अत: मैं सम्पूर्ण कामनाओंके बदले आज यहाँसे निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसीका वरण करता हूँ॥

इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला।

मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम्॥ ४१॥

‘राष्ट्र और यहाँके निवासी मनुष्योंसहित धनधान्यसे सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप इसे भरतको दे दें॥ ४१॥

वनवासकृता बुद्धिर्न च मेऽद्य चलिष्यति।

यस्तु युद्धे वरो दत्त: कैकेय्यै वरद त्वया॥ ४२॥

दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव।

‘मेरा वनवासविषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा। वरदायक नरेश! आपने देवासुर-संग्राममें कैकेयीको जो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूपसे दीजिये और सत्यवादी बनिये॥ ४२॥

अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन्॥ ४३॥

चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरै: सह।

मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम्॥ ४४॥

‘मैं आपकी उक्त आज्ञाका पालन करता हुआ चौदह वर्षोंतक वनमें वनचारी प्राणियोंके साथ निवास करूँगा। आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आप यह सारी पृथ्वी भरतको दे दीजिये॥

नहि मे कांक्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम्।

यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन॥ ४५॥

‘रघुनन्दन! मैंने अपने मनको सुख देने अथवा स्वजनोंका प्रिय करनेके उद्देश्यसे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की थी। आपकी आज्ञाका यथावत्रूपसे पालन करनेके लिये ही मैंने उसे ग्रहण करनेकी अभिलाषा की थी॥ ४५॥

अपगच्छतु ते दु:खं मा भूर्बाष्पपरिप्लुत:।

नहि क्षुभ्यति दुर्धर्ष: समुद्र: सरितां पति:॥ ४६॥

‘आपका दु:ख दूर हो जाय, आप इस प्रकार आँसू न बहावें। सरिताओंका स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है—अपनी मर्यादाका त्याग नहीं करता है (इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये)॥ ४६॥

नैवाहं राज्यमिच्छामि न सुखं न च मेदिनीम्।

नैव सर्वानिमान् कामान् न स्वर्गं न च जीवितुम्॥ ४७॥

‘मुझे न तो इस राज्यकी, न सुखकी, न पृथ्वीकी, न इन सम्पूर्ण भोगोंकी, न स्वर्गकी और न जीवनकी ही इच्छा है॥ ४७॥

त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ।

प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे॥ ४८॥

‘पुरुषशिरोमणे! मेरे मनमें यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें। आपका वचन मिथ्या न होने पावे। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ॥ ४८॥

न च शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो।

स शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्यय:॥ ४९॥

‘तात! प्रभो! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। अत: आप इस शोकको अपने भीतर ही दबा लें। मैं अपने निश्चयके विपरीत कुछ नहीं कर सकता॥

अर्थितो ह्यस्मि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव।

मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये॥ ५०॥

‘रघुनन्दन! कैकेयीने मुझसे यह याचना की कि ‘राम! तुम वनको चले जाओ’ मैंने वचन दिया था कि ‘अवश्य जाऊँगा’ उस सत्यका मुझे पालन करना है॥

मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम्।

प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते॥ ५१॥

‘देव! बीचमें हमें देखने या हमसे मिलनेके लिये आप उत्कण्ठित न होंगे। शान्तस्वभाववाले मृगोंसे भरे हुए और भाँति-भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे गूँजते हुए उस वनमें हमलोग बड़े आनन्दसे रहेंगे॥ ५१॥

पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम्।

तस्माद् दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वच:॥ ५२॥

‘तात! पिता देवताओंके भी देवता माने गये हैं। अत: मैं देवता समझकर ही पिता (आप) की आज्ञाका पालन करूँगा॥ ५२॥

चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम।

पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम्॥ ५३॥

‘नृपश्रेष्ठ! अब यह संताप छोडि़ये। चौदह वर्ष बीत जानेपर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे॥ ५३॥

येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जन:।

स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गत:॥ ५४॥

‘पुरुषसिंह! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं?॥ ५४॥

पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला

मया विसृष्टा भरताय दीयताम्।

अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन्

वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम्॥ ५५॥

‘यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप यह सब कुछ भरतको दे दीजिये। अब मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ दीर्घकालतक वनमें निवास करनेके लिये यहाँसे यात्रा कर रहा हूँ॥

मया विसृष्टां भरतो महीमिमां

सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम्।

शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं

त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत्॥ ५६॥

‘मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनोंसहित इस सारी पृथ्वीका भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओंमें स्थित रहकर पालन करें। नरेश्वर! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो॥ ५६॥

न मे तथा पार्थिव धीयते मनो

महत्सु कामेषु न चात्मन: प्रिये।

यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते

व्यपैतु दु:खं तव मत्कृतेऽनघ॥ ५७॥

‘पृथ्वीनाथ! निष्पाप महाराज! सत्पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञाका पालन करनेमें मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े-बड़े भोगोंमें तथा अपने किसी प्रिय पदार्थमें भी नहीं लगता; अत: मेरे लिये आपके मनमें जो दु:ख है, वह दूर हो जाना चाहिये॥ ५७॥

तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं

न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम्।

न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन्

वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा॥ ५८॥

‘निष्पाप नरेश! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकारके भोग, वसुधाका आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थको भी स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि ‘आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो’॥ ५८॥

फलानि मूलानि च भक्षयन् वने

गिरींश्च पश्यन् सरित: सरांसि च।

वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं

सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृति:॥ ५९॥

‘मैं विचित्र वृक्षोंसे युक्त वनमें प्रवेश करके फल-मूलका भोजन करता हुआ वहाँके पर्वतों, नदियों और सरोवरोंको देख-देखकर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मनको शान्त कीजिये’॥ ५९॥

एवं स राजा व्यसनाभिपन्न-

स्तापेन दु:खेन च पीड्यमान:।

आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो

भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित्॥ ६०॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर पुत्र-बिछोहके संकटमें पड़े हुए राजा दशरथने दु:ख और संतापसे पीडि़त हो उन्हें छातीसे लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय उनका शरीर जडकी भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका॥ ६०॥

देव्य: समस्ता रुरुदु: समेता-

स्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम्।

रुदन् सुमन्त्रोऽपि जगाम मूर्च्छां

हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम्॥ ६१॥

यह देख राजरानी कैकेयीको छोड़कर वहाँ एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं। सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार मच गया॥ ६१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुस्त्र‌िंश: सर्ग:॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥

 


पञ्चत्रिंश: सर्ग:

सुमन्त्रके समझाने और फटकारनेपर भी कैकेयीका टस-से-मस न होना

ततो निधूय सहसा शिरो नि:श्वस्य चासकृत्।

पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च॥ १॥

लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत्।

कोपाभिभूत: सहसा संतापमशुभं गत:॥ २॥

मन: समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च।

कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरै: शितै:॥ ३॥

तदनन्तर होशमें आनेपर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मनमें बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोधके मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुखकी पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोधसे आँखें लाल करके दोनों हाथोंसे सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथके मनकी वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणोंसे कैकेयीके हृदयको कम्पित-सा करने लगे॥ १—३॥

वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभै:।

कैकेय्या: सर्वमर्माणि सुमन्त्र: प्रत्यभाषत॥ ४॥

अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्रसे कैकेयीके सारे मर्मस्थानोंको विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्रने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४॥

यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथ: स्वयम्।

भर्ता सर्वस्य जगत: स्थावरस्य चरस्य च॥ ५॥

नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते।

पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलघ्नीमपि चान्तत:॥ ६॥

‘देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथका ही त्याग कर दिया, तब इस जगत्में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पतिकी हत्या करनेवाली तो हो ही; अन्तत: कुलघातिनी भी हो॥ ५-६॥

यन्महेन्द्रमिवाजय्यं दुष्प्रकम्प्यमिवाचलम्।

महोदधिमिवाक्षोभ्यं संतापयसि कर्मभि:॥ ७॥

‘ओह! जो देवराज इन्द्रके समान अजेय, पर्वतके समान अकम्पनीय और महासागरके समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथको भी तुम अपने कर्मोंसे संतप्त कर रही हो॥ ७॥

मावमंस्था दशरथं भर्तारं वरदं पतिम्।

भर्तुरिच्छा हि नारीणां पुत्रकोट्या विशिष्यते॥ ८॥

राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं। तुम इनका अपमान न करो। नारियोंके लिये पतिकी इच्छाका महत्त्व करोड़ों पुत्रोंसे भी अधिक है॥ ८॥

यथावयो हि राज्यानि प्राप्नुवन्ति नृपक्षये।

इक्ष्वाकुकुलनाथेऽस्म‌िंस्तं लोपयितुमिच्छसि॥ ९॥

‘इस कुलमें राजाका परलोकवास हो जानेपर उसके पुत्रोंकी अवस्थाका विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं। राजकुलके इस परम्परागत आचारको तुम इन इक्ष्वाकुवंशके स्वामी महाराज दशरथके जीते-जी ही मिटा देना चाहती हो॥ ९॥

राजा भवतु ते पुत्रो भरत: शास्तु मेदिनीम्।

वयं तत्र गमिष्यामो यत्र रामो गमिष्यति॥ १०॥

‘तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जायँ और इस पृथ्वीका शासन करें; किंतु हमलोग तो वहीं चले जायँगे जहाँ श्रीराम जायँगे॥ १०॥

न च ते विषये कश्चिद् ब्राह्मणो वस्तुमर्हति।

तादृशं त्वममर्यादमद्य कर्म करिष्यसि॥ ११॥

नूनं सर्वे गमिष्यामो मार्गं रामनिषेवितम्।

‘तुम्हारे राज्यमें कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्गपर चले जायँगे, जिसका श्रीरामने सेवन किया है॥ ११/

त्यक्ता या बान्धवै: सर्वैर्ब्ह्मणै: साधुभि: सदा॥ १२॥

का प्रीती राज्यलाभेन तव देवि भविष्यति।

तादृशं त्वममर्यादं कर्म कर्तुं चिकीर्षसि॥ १३॥

‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे। देवि! फिर इस राज्यको पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा। ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो॥ १२-१३॥

आश्चर्यमिव पश्यामि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम्।

आचरन्त्या न विवृता सद्यो भवति मेदिनी॥ १४॥

‘मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करनेपर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती?॥ १४॥

महाब्रह्मर्षिसृष्टा वा ज्वलन्तो भीमदर्शना:।

धिग्वाग्दण्डा न हिंसन्ति रामप्रव्राजने स्थिताम्॥ १५॥

‘अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंके धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखनेमें भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीरामको घरसे निकालनेके लिये तैयार खड़ी हुई तुम-जैसी पाषाणहृदयाका सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं?॥ १५॥

आम्रं छित्त्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत् तु क:।

यश्चैनं पयसा सिञ्चेन्नैवास्य मधुरो भवेत्॥ १६॥

‘भला आमको कुल्हाड़ीसे काटकर उसकी जगह नीमका सेवन कौन करेगा? जो आमकी जगह नीमको ही दूधसे सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता (अत: वरदानके बहाने श्रीरामको वनवास देकर कैकेयीके चित्तको संतुष्ट करना राजाके लिये कभी सुखद परिणामका जनक नहीं हो सकता)॥ १६॥

आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च।

न हि निम्बात् स्रवेत् क्षौद्रं लोके निगदितं वच:॥ १७॥

‘कैकेयि! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माताका अपने कुलके अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोकमें कही जानेवाली यह कहावत सत्य ही है कि नीमसे मधु नहीं टपकता॥ १७॥

तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।

पितुस्ते वरद: कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम्॥ १८॥

‘तुम्हारी माताके दुराग्रहकी बात भी हम जानते हैं। इसके विषयमें पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है। एक समय किसी वर देनेवाले साधुने तुम्हारे पिताको अत्यन्त उत्तम वर दिया था॥ १८॥

सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिप:।

तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वच:॥ १९॥

‘उस वरके प्रभावसे केकयनरेश समस्त प्राणियोंकी बोली समझने लगे। तिर्यक् योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी बातें भी उनकी समझमें आ जाती थीं॥ १९॥

ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चस:।

पितुस्ते विदितो भाव: स तत्र बहुधाहसत्॥ २०॥

‘एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्यापर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षीकी आवाज उनके कानोंमें पड़ी। उसकी बोलीका अभिप्राय उनकी समझमें आ गया। अत: वे वहाँ कई बार हँसे॥ २०॥

तत्र ते जननी क्रुद्धा मृत्युपाशमभीप्सती।

हासं ते नृपते सौम्य जिज्ञासामीति चाब्रवीत्॥ २१॥

‘उसी शय्यापर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गलेमें मौतकी फाँसी लगानेकी इच्छा रखती हुई बोली—‘सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसनेका क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ’॥ २१॥

नृपश्चोवाच तां देवीं हासं शंसामि ते यदि।

ततो मे मरणं सद्यो भविष्यति न संशय:॥ २२॥

‘तब राजाने उस देवीसे कहा—‘रानी! यदि मैं अपने हँसनेका कारण बता दूँ तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’॥ २२॥

माता ते पितरं देवि पुन: केकयमब्रवीत्।

शंस मे जीव वा मा वा न मां त्वं प्रहसिष्यसि॥ २३॥

‘देवि! यह सुनकर तुम्हारी रानी माताने तुम्हारे पिता केकयराजसे फिर कहा—‘तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो। भविष्यमें तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे’॥ २३॥

प्रियया च तथोक्त: स केकय: पृथिवीपति:।

तस्मै तं वरदायार्थं कथयामास तत्त्वत:॥ २४॥

‘अपनी प्यारी रानीके ऐसा कहनेपर केकयनरेशने उस वर देनेवाले साधुके पास जाकर सारा समाचार ठीक-ठीक कह सुनाया॥ २४॥

तत: स वरद: साधू राजानं प्रत्यभाषत।

म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते॥ २५॥

‘तब उस वर देनेवाले साधुने राजाको उत्तर दिया— ‘महाराज! रानी मरे या घरसे निकल जाय; तुम कदापि यह बात उसे न बताना’॥ २५॥

स तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृप:।

मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्॥ २६॥

‘प्रसन्न चित्तवाले उस साधुका यह वचन सुनकर केकयनरेशने तुम्हारी माताको तुरंत घरसे निकाल दिया और स्वयं कुबेरके समान विहार करने लगे॥ २६॥

तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि।

असद्ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी॥ २७॥

‘तुम भी इसी प्रकार दुर्जनोंके मार्गपर स्थित हो पापपर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजासे यह अनुचित आग्रह कर रही हो॥ २७॥

सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिक: प्रतिभाति मा।

पितृन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गना:॥ २८॥

‘आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिताके समान होते हैं और कन्याएँ माताके समान॥ २८॥

नैवं भव गृहाणेदं यदाह वसुधाधिप:।

भर्तुरिच्छामुपास्वेह जनस्यास्य गतिर्भव॥ २९॥

‘तुम ऐसी न बनो—इस लोकोक्तिको अपने जीवनमें चरितार्थ न करो। राजाने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो (श्रीरामका राज्याभिषेक होने दो)। अपने पतिकी इच्छाका अनुसरण करके इस जन-समुदायको यहाँ शरण देनेवाली बनो॥ २९॥

मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम्।

भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपादध॥ ३०॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर तुम देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी अपने लोक-प्रतिपालक स्वामीको अनुचित कर्ममें न लगाओ॥ ३०॥

नहि मिथ्या प्रतिज्ञातं करिष्यति तवानघ:।

श्रीमान् दशरथो राजा देवि राजीवलोचन:॥ ३१॥

‘देवि! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पापसे दूर रहते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे॥ ३१॥

ज्येष्ठो वदान्य: कर्मण्य: स्वधर्मस्यापि रक्षिता।

रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम्॥ ३२॥

‘श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयोंमें ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्मके पालक, जीवजगत्के रक्षक और बलवान् हैं। इनका इस राज्यपर अभिषेक होने दो॥ ३२॥

परिवादो हि ते देवि महाँल्लोके चरिष्यति।

यदि रामो वनं याति विहाय पितरं नृपम्॥ ३३॥

‘देवि! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथको छोड़कर वनको चले जायँगे तो संसारमें तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी॥ ३३॥

स्वराज्यं राघव: पातु भव त्वं विगतज्वरा।

नहि ते राघवादन्य: क्षम: पुरवरे वसन्॥ ३४॥

‘अत: श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्यका पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो। श्रीरामके सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगरमें रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता॥ ३४॥

रामे हि यौवराज्यस्थे राजा दशरथो वनम्।

प्रवेक्ष्यति महेष्वास: पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥ ३५॥

‘श्रीरामके युवराजपदपर प्रतिष्ठित हो जानेके बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजोंके वृत्तान्तका स्मरण करके स्वयं वनमें प्रवेश करेंगे’॥ ३५॥

इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि।

भूय: संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलि:॥ ३६॥

नैव सा क्षुभ्यते देवी न च स्म परिदूयते।

न चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा॥ ३७॥

इस प्रकार सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कैकेयीको उस राजभवनमें सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनोंसे भी बारम्बार विचलित करनेकी चेष्टा की; किंतु वह टस-से-मस न हुई। देवी कैकेयीके मनमें न तो क्षोभ हुआ और न दु:ख ही। उस समय उसके चेहरेके रंगमें भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी दिया॥ ३६-३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग:॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

 

षट्त्रिंश: सर्ग:

राजा दशरथका श्रीरामके साथ सेना और खजाना भेजनेका आदेश, कैकेयीद्वारा इसका विरोध, सिद्धार्थका कैकेयीको समझाना तथा राजाका श्रीरामके साथ जानेकी इच्छा प्रकट करना

तत: सुमन्त्रमैक्ष्वाक: पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया।

सबाष्पमतिनि:श्वस्य जगादेदं पुनर्वच:॥ १॥

तब इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञासे पीडि़त हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्रसे फिर इस प्रकार बोले—॥ १॥

सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमू:।

राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम्॥ २॥

‘सूत! तुम शीघ्र ही रत्नोंसे भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीरामके पीछे-पीछे जानेकी आज्ञा दो॥ २॥

रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधना:।

शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनी: सुप्रसारिता:॥ ३॥

‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलनेवाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्योंका प्रसारण करनेमें कुशल वैश्य राजकुमार श्रीरामकी सेनाओंको सुशोभित करें॥ ३॥

ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यत:।

तेषां बहुविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय॥ ४॥

‘जो श्रीरामके पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लोंसे ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकारका धन देकर उन्हें भी इनके साथ जानेकी आज्ञा दे दो॥ ४॥

आयुधानि च मुख्यानि नागरा: शकटानि च।

अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं व्याधाश्चारण्यकोविदा:॥ ५॥

‘मुख्य-मुख्य आयुध, नगरके निवासी, छकड़े तथा वनके भीतरी रहस्यको जाननेवाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पीछे-पीछे जायँ॥ ५॥

निघ्नन् मृगान् कुञ्जरांश्च पिबंश्चारण्यकं मधु।

नदीश्च विविधा: पश्यन् न राज्यं संस्मरिष्यति॥ ६॥

‘वे रास्तेमें आये हुए मृगों एवं हाथियोंको पीछे लौटाते, जंगली मधुका पान करते और नाना प्रकारकी नदियोंको देखते हुए अपने राज्यका स्मरण नहीं करेंगे॥

धान्यकोशश्च य: कश्चिद् धनकोशश्च मामक:।

तौ राममनुगच्छेतां वसन्तं निर्जने वने॥ ७॥

‘श्रीराम निर्जन वनमें निवास करनेके लिये जा रहे हैं, अत: मेरा खजाना और अन्नभण्डार—ये दोनों वस्तुएँ इनके साथ जायँ॥ ७॥

यजन् पुण्येषु देशेषु विसृजंश्चाप्तदक्षिणा:।

ऋषिभिश्चापि संगम्य प्रवत्स्यति सुखं वने॥ ८॥

‘ये वनके पावन प्रदेशोंमें यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदिको पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियोंसे मिलकर वनमें सुखपूर्वक रहेंगे॥ ८॥

भरतश्च महाबाहुरयोध्यां पालयिष्यति।

सर्वकामै: पुन: श्रीमान् राम: संसाध्यतामिति॥ ९॥

‘महाबाहु भरत अयोध्याका पालन करेंगे। श्रीमान् रामको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न करके यहाँसे भेजा जाय’॥ ९॥

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे कैकेय्या भयमागतम्।

मुखं चाप्यगमच्छोषं स्वरश्चापि व्यरुध्यत॥ १०॥

जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयीको बड़ा भय हुआ। उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया॥ १०॥

सा विषण्णा च संत्रस्ता मुखेन परिशुष्यता।

राजानमेवाभिमुखी कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥ ११॥

वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँहसे राजाकी ओर ही मुँह करके बोली—॥ ११॥

राज्यं गतधनं साधो पीतमण्डां सुरामिव।

निरास्वाद्यतमं शून्यं भरतो नाभिपत्स्यते॥ १२॥

‘श्रेष्ठ महाराज! जिसका सारभाग पहलेसे ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुराको जैसे उसका सेवन करनेवाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धनहीन और सूने राज्यको, जो कदापि सेवन करनेयोग्य नहीं रह जायगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे’॥ १२॥

कैकेय्यां मुक्तलज्जायां वदन्त्यामतिदारुणम्।

राजा दशरथो वाक्यमुवाचायतलोचनाम्॥ १३॥

कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथने उस विशाललोचना कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १३॥

वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते।

अनार्ये कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुध:॥ १४॥

‘अनार्ये! अहितकारिणि! तू रामको वनवास देनेके दुर्वह भारमें लगाकर जब मैं उस भारको ढो रहा हूँ, उस अवस्थामें क्यों अपने वचनोंका चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीरामके साथ सेना और सामग्री भेजनेमें जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? (अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीरामको अकेले वनमें जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती)’॥ १४॥

तस्यैतत् क्रोधसंयुक्तमुक्तं श्रुत्वा वराङ्गना।

कैकेयी द्विगुणं क्रुद्धा राजानमिदमब्रवीत्॥ १५॥

राजाका यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली—॥ १५॥

तवैव वंशे सगरो ज्येष्ठपुत्रमुपारुधत्।

असमञ्ज इति ख्यातं तथायं गन्तुमर्हति॥ १६॥

‘महाराज! आपके ही वंशमें पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्जको निकालकर उसके लिये राज्यका दरवाजा सदाके लिये बंद कर दिया था। इसी तरह इनको भी यहाँसे निकल जाना चाहिये’॥ १६॥

एवमुक्तो धिगित्येव राजा दशरथोऽब्रवीत्।

व्रीडितश्च जन: सर्व: सा च तन्नावबुध्यत॥ १७॥

उसके ऐसा कहनेपर राजा दशरथने कहा—‘धिक्कार है।’ वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाजसे गड़ गये; किंतु कैकेयी अपने कथनके अनौचित्यको अथवा राजाद्वारा दिये गये धिक्कारके औचित्यको नहीं समझ सकी॥ १७॥

तत्र वृद्धो महामात्र: सिद्धार्थो नाम नामत:।

शुचिर्बहुमतो राज्ञ: कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ १८॥

उस समय वहाँ राजाके प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे। वे बड़े ही शुद्ध स्वभाववाले और राजाके विशेष आदरणीय थे। उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १८॥

असमञ्जो गृहीत्वा तु क्रीडत: पथि दारकान्।

सरय्वां प्रक्षिपन्नप्सु रमते तेन दुर्मति:॥ १९॥

‘देवि! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धिका राजकुमार था। वह मार्गपर खेलते हुए बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता था और ऐसे ही कार्योंसे अपना मनोरञ्जन करता था॥ १९॥

तं दृष्ट्वा नागरा: सर्वे क्रुद्धा राजानमब्रुवन्।

असमञ्जं वृणीष्वैकमस्मान् वा राष्ट्रवर्धन॥ २०॥

‘उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजाके पास जाकर बोले—‘राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज! या तो आप अकेले असमञ्जको लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगरमें रहने दीजिये’॥ २०॥

तानुवाच ततो राजा किंनिमित्तमिदं भयम्।

ताश्चापि राज्ञा सम्पृष्टा वाक्यं प्रकृतयोऽब्रुवन्॥ २१॥

‘तब राजाने उनसे पूछा—‘तुम्हें असमञ्जसे किस कारण भय हुआ है?’ राजाके पूछनेपर उन प्रजाजनोंने यह बात कही—॥ २१॥

क्रीडतस्त्वेष न: पुत्रान् बालानुद्भ्रान्तचेतस:।

सरय्वां प्रक्षिपन्मौर्ख्यादतुलां प्रीतिमश्नुते॥ २२॥

‘महाराज! यह हमारे खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चोंको पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयूमें फेंक देते हैं। मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है’॥ २२॥

स तासां वचनं श्रुत्वा प्रकृतीनां नराधिप:।

तं तत्याजाहितं पुत्रं तासां प्रियचिकीर्षया॥ २३॥

‘उन प्रजाजनोंकी वह बात सुनकर राजा सगरने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्रको त्याग दिया॥ २३॥

तं यानं शीघ्रमारोप्य सभार्यं सपरिच्छदम्।

यावज्जीवं विवास्योऽयमिति तानन्वशात् पिता॥ २४॥

‘पिताने अपने उस पुत्रको पत्नी और आवश्यक सामग्रीसहित शीघ्र रथपर बिठाकर अपने सेवकोंको आज्ञा दी—‘इसे जीवनभरके लिये राज्यसे बाहर निकाल दो’॥ २४॥

स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत्।

दिश: सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत्॥ २५॥

इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिक:।

राम: किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते॥ २६॥

‘असमञ्जने फाल और पिटारी लेकर पर्वतोंकी दुर्गम गुफाओंको ही अपने निवासके योग्य देखा और कन्द आदिके लिये वह सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा। वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगरने उसको त्याग दिया था। श्रीरामने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पानेसे रोका जा रहा है?॥

नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम्।

दुर्लभो ह्यस्य निरय: शशाङ्कस्येव कल्मषम्॥ २७॥

‘हमलोग तो श्रीरामचन्द्रजीमें कोई अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे (शुक्लपक्षकी द्वितीयाके) चन्द्रमामें मलिनताका दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें कोई पाप या अपराध ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता॥ २७॥

अथवा देवि त्वं कंचिद् दोषं पश्यसि राघवे।

तमद्य ब्रूहि तत्त्वेन तदा रामो विवास्यते॥ २८॥

‘अथवा देवि! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीमें कोई दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक-ठीक बताओ। उस दशामें श्रीरामको निकाल दिया जा सकता है॥ २८॥

अदुष्टस्य हि संत्याग: सत्पथे निरतस्य च।

निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान्॥ २९॥

‘जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्गमें ही स्थित है, ऐसे पुरुषका त्याग धर्मसे विरुद्ध माना जाता है। ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्रके भी तेजको दग्ध कर देगा॥ २९॥

तदलं देवि रामस्य श्रिया विहतया त्वया।

लोकतोऽपि हि ते रक्ष्य: परिवाद: शुभानने॥ ३०॥

‘अत: देवि! श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। शुभानने! तुम्हें लोकनिन्दासे भी बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये’॥ ३०॥

श्रुत्वा तु सिद्धार्थवचो राजा श्रान्ततरस्वर:।

शोकोपहतया वाचा कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ ३१॥

सिद्धार्थकी बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वरसे शोकाकुल वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार बोले—॥ ३१॥

एतद्वचो नेच्छसि पापरूपे

हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा।

आस्थाय मार्गं कृपणं कुचेष्टा

चेष्टा हि ते साधुपथादपेता॥ ३२॥

‘पापिनि! क्या तुझे यह बात नहीं रुची? तुझे मेरे या अपने हितका भी बिलकुल ज्ञान नहीं है? तू दु:खद मार्गका आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है। तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषोंके मार्गके विपरीत है॥ ३२॥

अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं

राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च।

सर्वे च राज्ञा भरतेन च त्वं

यथासुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम्॥ ३३॥

‘अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीरामके पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हींके साथ जायँगे। तू अकेली राजा भरतके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक राज्य भोगती रह’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्त्रिंश: सर्ग:॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥

 


सप्तत्रिंश: सर्ग:

श्रीराम आदिका वल्कल-वस्त्र-धारण, सीताके वल्कल-धारणसे रनिवासकी स्त्रियोंको खेद तथा गुरु वसिष्ठका कैकेयीको फटकारते हुए सीताके वल्कल-धारणका अनौचित्य बताना

महामात्रवच: श्रुत्वा रामो दशरथं तदा।

अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्॥ १॥

प्रधान मन्त्रीकी पूर्वोक्त बात सुनकर विनयके ज्ञाता श्रीरामने उस समय राजा दशरथसे विनीत होकर कहा—॥ १॥

त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवत:।

किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वत:॥ २॥

‘राजन्! मैं भोगोंका परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगलके फल-मूलोंसे जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओरसे आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेनासे क्या प्रयोजन है?॥ २॥

यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मन:।

रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजत: कुञ्जरोत्तमम्॥ ३॥

‘जो श्रेष्ठ गजराजका दान करके उसके रस्सेमें मन लगाता है—लोभवश रस्सेको रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथीका त्याग करनेवाले पुरुषको उसके रस्सेमें आसक्ति रखनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ३॥

तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते।

सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे॥ ४॥

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरतको अर्पित करनेकी अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयीकी दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कल-वस्त्र) ला दें॥ ४॥

खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत।

चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम॥ ५॥

‘दासियो! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं’॥

अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्।

उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा॥ ६॥

कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदायमें श्रीरामचन्द्रजीसे बोली, ‘लो, पहन लो’॥ ६॥

स चीरे पुरुषव्याघ्र: कैकेय्या: प्रतिगृह्य ते।

सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त ह॥ ७॥

पुरुषसिंह श्रीरामने कैकेयीके हाथसे दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियोंके-से वस्त्र धारण कर लिये॥ ७॥

लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे।

तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रत:॥ ८॥

इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अपने पिताके सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र पहन लिये॥ ८॥

अथात्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी।

सम्प्रेक्ष्य चीरं संत्रस्ता पृषती वागुरामिव॥ ९॥

सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मना:।

कैकेय्या: कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा॥ १०॥

अश्रुसम्पूर्णनेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी।

गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत्॥ ११॥

कथं नु चीरं बघ्नन्ति मुनयो वनवासिन:।

इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहु:॥ १२॥

तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहननेके लिये भी चीरवस्त्रको प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जालको देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयीके हाथसे दो वल्कल-वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं। उनके मनमें बड़ा दु:ख हुआ और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उस समय उन्होंने गन्धर्वराजके समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा—‘नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं?’ यह कहकर उसे धारण करनेमें कुशल न होनेके कारण सीता बारम्बार मोहमें पड़ जाती थीं—भूल कर बैठती थीं॥

कृत्वा कण्ठे स्म सा चीरमेकमादाय पाणिना।

तस्थौ ह्यकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा॥ १३॥

चीर-धारणमें कुशल न होनेसे जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गलेमें डाल दूसरा हाथमें लेकर चुपचाप खड़ी रहीं॥ १३॥

तस्यास्तत् क्षिप्रमागत्य रामो धर्मभृतां वर:।

चीरं बबन्ध सीताया: कौशेयस्योपरि स्वयम्॥ १४॥

तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीराम जल्दीसे उनके पास आकर स्वयं अपने हाथोंसे उनके रेशमी वस्त्रके ऊपर वल्कल-वस्त्र बाँधने लगे॥ १४॥

रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बध्नन्तं चीरमुत्तमम्।

अन्त:पुरचरा नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम्॥ १५॥

सीताको उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीरामकी ओर देखकर रनवासकी स्त्रियाँ अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं॥ १५॥

ऊचुश्च परमायत्ता रामं ज्वलिततेजसम्।

वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी॥ १६॥

वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उदीप्त तेजवाले श्रीरामसे बोलीं—‘बेटा! मनस्विनी सीताको इस प्रकार वनवासकी आज्ञा नहीं दी गयी है॥ १६॥

पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम्।

तावद् दर्शनमस्या न: सफलं भवतु प्रभो॥ १७॥

‘प्रभो! तुम पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये जबतक निर्जन वनमें जाकर रहोगे, तबतक इसीको देखकर हमारा जीवन सफल होने दो॥ १७॥

लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक।

नेयमर्हति कल्याणि वस्तुं तापसवद् वने॥ १८॥

‘बेटा! तुम लक्ष्मणको अपना साथी बनाकर उनके साथ वनको जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनिकी भाँति वनमें निवास करनेके योग्य नहीं है॥ १८॥

कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी।

धर्मनित्य: स्वयं स्थातुं न हीदानीं त्वमिच्छसि॥ १९॥

‘पुत्र! तुम हमारी यह याचना सफल करो। भामिनी सीता यहीं रहे। तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अत: स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो (परंतु सीताको तो रहने दो)’॥ १९॥

तासामेवंविधा वाच: शृण्वन् दशरथात्मज:।

बबन्धैव तथा चीरं सीतया तुल्यशीलया॥ २०॥

चीरे गृहीते तु तया सबाष्पो नृपतेर्गुरु:।

निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ २१॥

माताओंकी ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथ-नन्दन श्रीरामने सीताको वल्कल-वस्त्र पहना ही दिया। पतिके समान शीलस्वभाववाली सीताके वल्कल धारण कर लेनेपर राजाके गुरु वसिष्ठजीके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उन्होंने सीताको रोककर कैकेयीसे कहा—॥ २०-२१॥

अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि।

वञ्चयित्वा तु राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसि॥ २२॥

‘मर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्मकी ओर पैर बढ़ानेवाली दुर्बुद्धि कैकेयी! तू केकयराजके कुलकी जीती-जागती कलङ्क है। अरी! राजाको धोखा देकर अब तू सीमाके भीतर नहीं रहना चाहती है?॥ २२॥

न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते।

अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम्॥ २३॥

‘शीलका परित्याग करनेवाली दुष्टे! देवी सीता वनमें नहीं जायँगी। रामके लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासनपर ये ही बैठेंगी॥ २३॥

आत्मा हि दारा: सर्वेषां दारसंग्रहवर्तिनाम्।

आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम्॥ २४॥

‘सम्पूर्ण गृहस्थोंकी पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं। इस तरह सीता देवी भी श्रीरामकी आत्मा हैं; अत: उनकी जगह ये ही इस राज्यका पालन करेंगी॥ २४॥

अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता।

वयमत्रानुयास्याम: पुरं चेदं गमिष्यति॥ २५॥

अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघव:।

सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम्॥ २६॥

‘यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामके साथ वनमें जायँगी तो हमलोग भी इनके साथ चले जायँगे। यह सारा नगर भी चला जायगा और अन्त:पुरके रक्षक भी चले जायँगे। अपनी पत्नीके साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगरके लोग भी धन-दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायँगे॥

भरतश्च सशत्रुघ्नश्चीरवासा वनेचर:।

वने वसन्तं काकुत्स्थमनुवत्स्यति पूर्वजम्॥ २७॥

‘भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वनमें रहेंगे और वहाँ निवास करनेवाले अपने बड़े भाई श्रीरामकी सेवा करेंगे॥ २७॥

तत: शून्यां गतजनां वसुधां पादपै: सह।

त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता॥ २८॥

‘फिर तू वृक्षोंके साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वीका राज्य करना। तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजाका अहित करनेमें लगी हुई है॥ २८॥

न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपति:।

तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति॥ २९॥

‘याद रख, श्रीराम जहाँके राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायगा—जंगल हो जायगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायगा॥ २९॥

न ह्यदत्तां महीं पित्रा भरत: शास्तुमिच्छति।

त्वयि वा पुत्रवद् वस्तुं यदि जातो महीपते:॥ ३०॥

‘यदि भरत राजा दशरथसे पैदा हुए हैं तो पिताके प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्यको कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करनेके लिये भी यहाँ बैठे रहनेकी इच्छा नहीं करेंगे॥ ३०॥

यद्यपि त्वं क्षितितलाद् गगनं चोत्पतिष्यसि।

पितृवंशचरित्रज्ञ: सोऽन्यथा न करिष्यति॥ ३१॥

‘तू पृथ्वी छोड़कर आसमानमें उड़ जाय तो भी अपने पितृकुलके आचार-व्यवहारको जाननेवाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥ ३१॥

तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम्।

लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रत:॥ ३२॥

‘तूने पुत्रका प्रिय करनेकी इच्छासे वास्तवमें उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसारमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो श्रीरामका भक्त न हो॥ ३२॥

द्रक्ष्यस्यद्यैव कैकेयि पशुव्यालमृगद्विजान्।

गच्छत: सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान्॥ ३३॥

‘कैकेयि! तू आज ही देखेगी कि वनको जाते हुए श्रीरामके साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले जा रहे हैं। औरोंकी तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जानेको उत्सुक हैं॥ ३३॥

अथोत्तमान्याभरणानि देवि

देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम्।

न चीरमस्या: प्रविधीयतेति

न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठ:॥ ३४॥

‘देवि! सीता तेरी पुत्रवधू हैं। इनके शरीरसे वल्कल-वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहननेके लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे। इनके लिये वल्कल-वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है।’ ऐसा कहकर वसिष्ठने उसे जानकीको वल्कल-वस्त्र पहनानेसे मना किया॥ ३४॥

एकस्य रामस्य वने निवास-

स्त्वया वृत: केकयराजपुत्रि।

विभूषितेयं प्रतिकर्मनित्या

वसत्वरण्ये सह राघवेण॥ ३५॥

वे फिर बोले—‘केकयराजकुमारी! तूने अकेले श्रीरामके लिये ही वनवासका वर माँगा है (सीताके लिये नहीं); अत: ये राजकुमारी वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होकर सदा शृङ्गार धारण करके वनमें श्रीरामचन्द्रजीके साथ निवास करें॥ ३५॥

यानैश्च मुख्यै: परिचारकैश्च

सुसंवृता गच्छतु राजपुत्री।

वस्त्रैश्च सर्वै: सहितैर्विधानै-

र्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने॥ ३६॥

‘राजकुमारी सीता मुख्य-मुख्य सेवकों तथा सवारियोंके साथ सब प्रकारके वस्त्रों और आवश्यक उपकरणोंसे सम्पन्न होकर वनकी यात्रा करें। तूने वर माँगते समय पहले सीताके वनवासकी कोई चर्चा नहीं की थी (अत: इन्हें वल्कल-वस्त्र नहीं पहनाया जा सकता)’॥

तस्म‌िंस्तथा जल्पति विप्रमुख्ये

गुरौ नृपस्याप्रतिमप्रभावे।

नैव स्म सीता विनिवृत्तभावा

प्रियस्य भर्तु: प्रतिकारकामा॥ ३७॥

ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर भी सीता अपने प्रियतम पतिके समान ही वेशभूषा धारण करनेकी इच्छा रखकर उस चीर-धारणसे विरत नहीं हुईं॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तत्रिंश: सर्ग:॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥

 


अष्टात्रिंश: सर्ग:

राजा दशरथका सीताको वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयीको फटकारना और श्रीरामका उनसे कौसल्यापर कृपादृष्टि रखनेके लिये अनुरोध करना

तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत्।

प्रचुक्रोश जन: सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति॥ १॥

सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथकी भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे—‘राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’॥ १॥

तेन तत्र प्रणादेन दु:खित: स महीपति:।

चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मन:॥ २॥

स नि:श्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्।

कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति॥ ३॥

वहाँ होनेवाले उस कोलाहलसे दु:खी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथने अपने जीवन, धर्म और यशकी उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयीसे इस प्रकार बोले—‘कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वनमें जानेके योग्य नहीं है॥ २-३॥

सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता।

नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम॥ ४॥

‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखोंमें ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वनमें जाने योग्य नहीं है॥ ४॥

इयं हि कस्यापि करोति किंचित्

तपस्विनी राजवरस्य पुत्री।

या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये

स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित्॥ ५॥

‘राजाओंमें श्रेष्ठ जनककी यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन-समुदायके बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकीके समान चीर धारण करके खड़ी है?॥ ५॥

चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या

नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा।

यथासुखं गच्छतु राजपुत्री

वनं समग्रा सह सर्वरत्नै:॥ ६॥

‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। ‘यह इस रूपमें वन जाय’ ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरहका वचन ही दिया है। अत: राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारोंसे सम्पन्न हो सब प्रकारके रत्नोंके साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वनको जा सकती है॥ ६॥

अजीवनार्हेण मया नृशंसा

कृता प्रतिज्ञा नियमेन तावत्।

त्वया हि बाल्यात् प्रतिपन्नमेतत्

तन्मा दहेद् वेणुमिवात्मपुष्पम्॥ ७॥

‘मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनोंमें बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानीके कारण सीताको इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँसका फूल उसीको सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझीको भस्म किये डालती है॥ ७॥

रामेण यदि ते पापे किंचित्कृतमशोभनम्।

अपकार: क इह ते वैदेह्या दर्शितोऽधमे॥ ८॥

‘नीच पापिनि! यदि श्रीरामने तेरा कोई अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीताने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है?॥ ८॥

मृगीवोत्फुल्लनयना मृदुशीला मनस्विनी।

अपकारं कमिव ते करोति जनकात्मजा॥ ९॥

‘जिसके नेत्र हरिणीके नेत्रोंके समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है?॥ ९॥

ननु पर्याप्तमेवं ते पापे रामविवासनम्।

किमेभि: कृपणैर्भूय: पातकैरपि ते कृतै:॥ १०॥

‘पापिनि! तूने श्रीरामको वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है। अब सीताको भी वनमें भेजने और वल्कल पहनाने आदिका अत्यन्त दु:खद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है?॥ १०॥

प्रतिज्ञातं मया तावत् त्वयोक्तं देवि शृण्वता।

रामं यदभिषेकाय त्वमिहागतमब्रवी:॥ ११॥

‘देवि! श्रीराम जब अभिषेकके लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतनेके लिये ही प्रतिज्ञा की थी॥ ११॥

तत्त्वेतत् समतिक्रम्य निरयं गन्तुमिच्छसि।

मैथिलीमपि या हि त्वमीक्षसे चीरवासिनीम्॥ १२॥

‘उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकीको भी वल्कल-वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरकमें ही जानेकी इच्छा हो रही है’॥ १२॥

एवं ब्रुवन्तं पितरं राम: सम्प्रस्थितो वनम्।

अवाक्शिरसमासीनमिदं वचनमब्रवीत्॥ १३॥

राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वनकी ओर जाते हुए श्रीरामने पितासे इस प्रकार कहा—॥ १३॥

इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी।

वृद्धा चाक्षुद्रशीला च न च त्वां देव गर्हते॥ १४॥

मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम्।

अदृष्टपूर्वव्यसनां भूय: सम्मन्तुमर्हसि॥ १५॥

‘धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश! ये मेरे न रहनेसे शोकके समुद्रमें डूब जायँगी। अत: आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें॥ १४-१५॥

पुत्रशोकं यथा नर्च्छेत् त्वया पूज्येन पूजिता।

मां हि संचिन्तयन्ती सा त्वयि जीवेत् तपस्विनी॥ १६॥

‘आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोकका अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रयमें ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये॥ १६॥

इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनीं

तथा विधातुं जननीं ममार्हसि।

यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता

न जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत्॥ १७॥

‘इन्द्रके समान तेजस्वी महाराज! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटेको देखनेके लिये उत्सुक रहेंगी। कहीं ऐसा न हो मेरे वनमें रहते समय ये शोकसे कातर हो अपने प्राणोंको त्याग करके यमलोकको चली जायँ। अत: आप मेरी माताको सदा ऐसी ही परिस्थितिमें रखें, जिससे उक्त आशङ्काके लिये अवकाश न रह जाय’॥ १७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥

 

एकोनचत्वारिंश: सर्ग:

राजा दशरथका विलाप, उनकी आज्ञासे सुमन्त्रका रामके लिये रथ जोतकर लाना, कोषाध्यक्षका सीताको बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण देना, कौसल्याका सीताको पतिसेवाका उपदेश, सीताके द्वारा उसकी स्वीकृति तथा श्रीरामका अपनी मातासे पिताके प्रति दोषदृष्टि न रखनेका अनुरोध करके अन्य माताओंसे भी विदा माँगना

रामस्य तु वच: श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम्।

समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतन:॥ १॥

श्रीरामकी बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोकसे अचेत हो गये॥ १॥

नैनं दु:खेन संतप्त: प्रत्यवैक्षत राघवम्।

न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मना:॥ २॥

दु:खसे संतप्त होनेके कारण वे श्रीरामकी ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मनमें दु:ख होनेके कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके॥ २॥

स मुहूर्तमिवासंज्ञो दु:खितश्च महीपति:।

विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन्॥ ३॥

दो घड़ीतक अचेत-सा रहनेके बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीरामका ही चिन्तन करते हुए दु:खी होकर विलाप करने लगे—॥ ३॥

मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहव: कृता:।

प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम्॥ ४॥

‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्ममें अवश्य ही बहुत-सी गौओंका उनके बछड़ोंसे विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियोंकी हिंसा की है, इसीसे आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है॥ ४॥

न त्वेवानागते काले देहाच्च्यवति जीवितम्।

कैकेय्या क्लिश्यमानस्य मृत्युर्मम न विद्यते॥ ५॥

‘समय पूरा हुए बिना किसीके शरीरसे प्राण नहीं निकलते; तभी तो कैकेयीके द्वारा इतना क्लेश पानेपर भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है॥ ५॥

योऽहं पावकसंकाशं पश्यामि पुरत: स्थितम्।

विहाय वसने सूक्ष्मे तापसाच्छादमात्मजम्॥ ६॥

‘ओह! अपने अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको महीन वस्त्र त्यागकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र धारण किये सामने खड़ा देख रहा हूँ (फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते हैं)॥ ६॥

एकस्या: खलु कैकेय्या: कृतेऽयं खिद्यते जन:।

स्वार्थे प्रयतमानाया: संश्रित्य निकृतिं त्विमाम्॥ ७॥

‘इस वरदानरूप शठताका आश्रय लेकर अपने स्वार्थसाधनके प्रयत्नमें लगी हुई एकमात्र कैकेयीके कारण ये सब लोग महान् कष्टमें पड़ गये हैं’॥ ७॥

एवमुक्त्वा तु वचनं बाष्पेण विहतेन्द्रिय:।

रामेति सकृदेवोक्त्वा व्याहर्तुं न शशाक स:॥ ८॥

‘ऐसी बात कहते-कहते राजाके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं और वे एक ही बार ‘हे राम!’ कहकर मूर्च्छित हो गये। आगे कुछ न बोल सके’॥ ८॥

संज्ञां तु प्रतिलभ्यैव मुहूर्तात् स महीपति:।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥ ९॥

दो घड़ी बाद होशमें आते ही वे महाराज आँसू-भरे नेत्रोंसे देखते हुए सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥ ९॥

औपवाह्यं रथं युक्त्वा त्वमायाहि हयोत्तमै:।

प्रापयैनं महाभागमितो जनपदात् परम्॥ १०॥

‘तुम सवारीके योग्य एक रथको उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीरामको उसपर बिठाकर इस जनपदसे बाहरतक पहुँचा आओ॥ १०॥

एवं मन्ये गुणवतां गुणानां फलमुच्यते।

पित्रा मात्रा च यत्साधुर्वीरो निर्वास्यते वनम्॥ ११॥

‘अपने श्रेष्ठ वीर पुत्रको स्वयं माता-पिता ही जब घरसे निकालकर वनमें भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्रमें गुणवान् पुरुषोंके गुणोंका यही फल बताया जाता है’॥ ११॥

राज्ञो वचनमाज्ञाय सुमन्त्र: शीघ्रविक्रम:।

योजयित्वा ययौ तत्र रथमश्वैरलंकृतम्॥ १२॥

राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ोंसे सुशोभित रथ जोतकर ले आये॥ १२॥

तं रथं राजपुत्राय सूत: कनकभूषितम्।

आचचक्षेऽञ्जलिं कृत्वा युक्तं परमवाजिभि:॥ १३॥

फिर सूत सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कहा—‘महाराज! राजकुमार श्रीरामके लिये उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है’॥ १३॥

राजा सत्वरमाहूय व्यापृतं वित्तसंचये।

उवाच देशकालज्ञो निश्चितं सर्वत: शुचि:॥ १४॥

तब देश और कालको समझनेवाले, सब ओरसे शुद्ध (इहलोक और परलोकसे उऋण) राजा दशरथने तुरंत ही धन-संग्रहके व्यापारमें नियुक्त कोषाध्यक्षको बुलाकर यह निश्चित बात कही—॥ १४॥

वासांसि च वरार्हाणि भूषणानि महान्ति च।

वर्षाण्येतानि संख्याय वैदेह्या: क्षिप्रमानय॥ १५॥

‘तुम विदेहकुमारी सीताके पहननेयोग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षोंके लिये पर्याप्त हों, गिनकर शीघ्र ले आओ’॥ १५॥

नरेन्द्रेणैवमुक्तस्तु गत्वा कोशगृहं तत:।

प्रायच्छत् सर्वमाहृत्य सीतायै क्षिप्रमेव तत्॥ १६॥

महाराजके ऐसा कहनेपर कोषाध्यक्षने खजानेमें जा वहाँसे सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीताको समर्पित कर दीं॥ १६॥

सा सुजाता सुजातानि वैदेही प्रस्थिता वनम्।

भूषयामास गात्राणि तैर्विचित्रैर्विभूषणै:॥ १७॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवासके लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीताने सुन्दर लक्षणोंसे युक्त अपने सभी अङ्गोंको उन विचित्र आभूषणोंसे विभूषित किया॥ १७॥

व्यराजयत वैदेही वेश्म तत् सुविभूषिता।

उद्यतोंऽशुमत: काले खं प्रभेव विवस्वत:॥ १८॥

उन आभूषणोंसे विभूषित हुई विदेहनन्दिनी सीता उस घरको उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रात:काल उगते हुए अंशुमाली सूर्यकी प्रभा आकाशको प्रकाशित करती है॥ १८॥

तां भुजाभ्यां परिष्वज्य श्वश्रूर्वचनमब्रवीत्।

अनाचरन्तीं कृपणं मूर्ध्न्युपाघ्राय मैथिलीम्॥ १९॥

उस समय सास कौसल्याने कभी दु:खद बर्ताव न करनेवाली मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और उनके मस्तकको सूँघकर कहा—॥ १९॥

असत्य: सर्वलोकेऽस्मिन् सततं सत्कृता: प्रियै:।

भर्तारं नानुमन्यन्ते विनिपातगतं स्त्रिय:॥ २०॥

‘बेटी! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पतिके द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकटमें पड़नेपर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत्में ‘असती’ (दुष्टा) के नामसे पुकारी जाती हैं॥ २०॥

एष स्वभावो नारीणामनुभूय पुरा सुखम्।

अल्पामप्यापदं प्राप्य दुष्यन्ति प्रजहत्यपि॥ २१॥

‘दुष्टा स्त्रियोंका यह स्वभाव होता है कि पहले तो वे पतिके द्वारा यथेष्ट सुख भोगती हैं, परंतु जब वह थोड़ी-सी भी विपत्तिमें पड़ता है, तब उसपर दोषारोपण करती और उसका साथ छोड़ देती हैं॥ २१॥

असत्यशीला विकृता दुर्गा अहृदया: सदा।

असत्य: पापसंकल्पा: क्षणमात्रविरागिण:॥ २२॥

‘जो झूठ बोलनेवाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषोंसे संसर्ग रखनेवाली, पतिके प्रति सदा हृदयहीनताका परिचय देनेवाली, कुलटा, पापके ही मनसूबे बाँधनेवाली और छोटी-सी बातके लिये भी क्षणमात्रमें पतिकी ओरसे विरक्त हो जानेवाली हैं, वे सब-की-सब असती या दुष्टा कही गयी हैं॥ २२॥

न कुलं न कृतं विद्या न दत्तं नापि संग्रह:।

स्त्रीणां गृह्णाति हृदयमनित्यहृदया हि ता:॥ २३॥

‘उत्तम कुल, किया हुआ उपकार, विद्या, भूषण आदिका दान और संग्रह (पतिके द्वारा स्नेहपूर्वक अपनाया जाना), यह सब कुछ दुष्टा स्त्रियोंके हृदयको नहीं वशमें कर पाता है; क्योंकि उनका चित्त अव्यवस्थित होता है॥

साध्वीनां तु स्थितानां तु शीले सत्ये श्रुते स्थिते।

स्त्रीणां पवित्रं परमं पतिरेको विशिष्यते॥ २४॥

‘इसके विपरीत जो सत्य, सदाचार, शास्त्रोंकी आज्ञा और कुलोचित मर्यादाओंमें स्थित रहती हैं, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ देवता है॥ २४॥

स त्वया नावमन्तव्य: पुत्र: प्रव्राजितो वनम्।

तव देवसमस्त्वेष निर्धन: सधनोऽपि वा॥ २५॥

‘इसलिये तुम मेरे पुत्र श्रीरामका, जिन्हें वनवासकी आज्ञा मिली है, कभी अनादर न करना। ये निर्धन हों या धनी, तुम्हारे लिये देवताके तुल्य हैं’॥ २५॥

विज्ञाय वचनं सीता तस्या धर्मार्थसंहितम्।

कृत्वाञ्जलिमुवाचेदं श्वश्रूमभिमुखे स्थिता॥ २६॥

सासके धर्म और अर्थयुक्त वचनोंका तात्पर्य भलीभाँति समझकर उनके सामने खड़ी हुई सीताने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा—॥ २६॥

करिष्ये सर्वमेवाहमार्या यदनुशास्ति माम्।

अभिज्ञास्मि यथा भर्तुर्वर्तितव्यं श्रुतं च मे॥ २७॥

‘आर्ये! आप मेरे लिये जो कुछ उपदेश दे रही हैं, मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगी। स्वामीके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह मुझे भलीभाँति विदित है; क्योंकि इस विषयको मैंने पहलेसे ही सुन रखा है॥

न मामसज्जनेनार्या समानयितुमर्हति।

धर्माद् विचलितुं नाहमलं चन्द्रादिव प्रभा॥ २८॥

‘पूजनीया माताजी! आपको मुझे असती स्त्रियोंके समान नहीं मानना चाहिये; क्योंकि जैसे प्रभा चन्द्रमासे दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार मैं पतिव्रत-धर्मसे विचलित नहीं हो सकती॥ २८॥

नातन्त्री वाद्यते वीणा नाचक्रो विद्यते रथ:।

नापति: सुखमेधेत या स्यादपि शतात्मजा॥ २९॥

‘जैसे बिना तारकी वीणा नहीं बज सकती और बिना पहियेका रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार नारी सौ बेटोंकी माता होनेपर भी बिना पतिके सुखी नहीं हो सकती॥ २९॥

मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुत:।

अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥ ३०॥

‘पिता, भ्राता और पुत्र—ये परिमित सुख प्रदान करते हैं, परंतु पति अपरिमित सुखका दाता है—उसकी सेवासे इहलोक और परलोक दोनोंमें कल्याण होता है; अत: ऐसी कौन स्त्री है, जो अपने पतिका सत्कार नहीं करेगी॥ ३०॥

साहमेवंगता श्रेष्ठा श्रुतधर्मपरावरा।

आर्ये किमवमन्येयं स्त्रिया भर्ता हि दैवतम्॥ ३१॥

‘आर्ये! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों—माता आदिके मुखसे नारीके सामान्य और विशेष धर्मोंका श्रवण किया है। इस प्रकार पातिव्रत्यका महत्त्व जानकर भी मैं पतिका क्यों अपमान करूँगी? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्रीका देवता है’॥ ३१॥

सीताया वचनं श्रुत्वा कौसल्या हृदयङ्गमम्।

शुद्धसत्त्वा मुमोचाश्रु सहसा दु:खहर्षजम्॥ ३२॥

सीताका यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्त:करणवाली देवी कौसल्याके नेत्रोंसे सहसा दु:ख और हर्षके आँसू बहने लगे॥ ३२॥

तां प्राञ्जलिरभिप्रेक्ष्य मातृमध्येऽतिसत्कृताम्।

राम: परमधर्मात्मा मातरं वाक्यमब्रवीत्॥ ३३॥

तब परम धर्मात्मा श्रीरामने माताओंके बीचमें अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौसल्याकी ओर देख हाथ जोड़कर कहा—॥ ३३॥

अम्ब मा दु:खिता भूत्वा पश्येस्त्वं पितरं मम।

क्षयोऽपि वनवासस्य क्षिप्रमेव भविष्यति॥ ३४॥

‘माँ! (इन्हींके कारण मेरे पुत्रका वनवास हुआ है; ऐसा समझकर) तुम मेरे पिताजीकी ओर दु:खित होकर न देखना। वनवासकी अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायगी॥ ३४॥

सुप्तायास्ते गमिष्यन्ति नव वर्षाणि पञ्च च।

समग्रमिह सम्प्राप्तं मां द्रक्ष्यसि सुहृद्वृतम्॥ ३५॥

‘ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते-सोते निकल जायँगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदोंसे घिरा हुआ सीता और लक्ष्मणके साथ सम्पूर्णरूपसे यहाँ आ पहुँचा हूँ’॥ ३५॥

एतावदभिनीतार्थमुक्त्वा स जननीं वच:।

त्रय: शतशतार्धा हि ददर्शावेक्ष्य मातर:॥ ३६॥

ताश्चापि स तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मज:।

धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलि:॥ ३७॥

मातासे इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीरामने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओंकी ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्याकी ही भाँति शोकाकुल पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ३६-३७॥

संवासात् परुषं किंचिदज्ञानादपि यत् कृतम्।

तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि व:॥ ३८॥

‘माताओ! सदा एक साथ रहनेके कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजानमें भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें। मैं आप सब माताओंसे विदा माँगता हूँ’॥ ३८॥

वचनं राघवस्यैतद् धर्मयुक्तं समाहितम्।

शुश्रुवुस्ता: स्त्रिय: सर्वा: शोकोपहतचेतस:॥ ३९॥

राजा दशरथकी उन सभी स्त्रियोंने श्रीरघुनाथजीका यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोकसे व्याकुल हो गया॥ ३९॥

जज्ञेऽथ तासां संनाद: क्रौञ्चीनामिव नि:स्वन:।

मानवेन्द्रस्य भार्याणामेवं वदति राघवे॥ ४०॥

श्रीरामके ऐसी बात कहते समय महाराज दशरथकी रानियाँ कुररियोंके समान विलाप करने लगीं। उनका वह आर्तनाद उस राजभवनमें सब ओर गूँज उठा॥ ४०॥

मुरजपणवमेघघोषवद् दशरथवेश्म बभूव यत् पुरा।

विलपितपरिदेवनाकुलं व्यसनगतं तदभूत् सुदु:खितम्॥ ४१॥

राजा दशरथका जो भवन पहले मुरज, पणव और मेघ आदि वाद्योंके गम्भीर घोषसे गूँजता रहता था, वही विलाप और रोदनसे व्याप्त हो संकटमें पड़कर अत्यन्त दु:खमय प्रतीत होने लगा॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग:॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥

 

चत्वारिंश: सर्ग:

सीता, राम और लक्ष्मणका दशरथकी परिक्रमा करके कौसल्या आदिको प्रणाम करना, सुमित्राका लक्ष्मणको उपदेश, सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मणका रथमें बैठकर वनकी ओर प्रस्थान, पुरवासियों तथा रानियोंसहित महाराज दशरथकी शोकाकुल अवस्था

अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलि:।

उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीना: प्रदक्षिणम्॥ १॥

तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीताने हाथ जोड़कर दीनभावसे राजा दशरथके चरणोंका स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की॥ १॥

तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञ: सह सीतया।

राघव: शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत्॥ २॥

उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजीने माताका कष्ट देखकर शोकसे व्याकुल हो उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ २॥

अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातु: कौसल्यामभ्यवादयत्।

अपि मातु: सुमित्राया जग्राह चरणौ पुन:॥ ३॥

श्रीरामके बाद लक्ष्मणने भी पहले माता कौसल्याको प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्राके भी दोनों पैर पकड़े॥ ३॥

तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत्।

हितकामा महाबाहुं मूर्ध्न्युपाघ्राय लक्ष्मणम्॥ ४॥

अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मणको प्रणाम करते देख उनका हित चाहनेवाली माता सुमित्राने बेटेका मस्तक सूँघकर कहा—॥ ४॥

सृष्टस्त्वं वनवासाय स्वनुरक्त: सुहृज्जने।

रामे प्रमादं मा कार्षी: पुत्र भ्रातरि गच्छति॥ ५॥

‘वत्स! तुम अपने सुहृद् श्रीरामके परम अनुरागी हो, इसलिये मैं तुम्हें वनवासके लिये विदा करती हूँ। अपने बड़े भाईके वनमें इधर-उधर जाते समय तुम उनकी सेवामें कभी प्रमाद न करना॥ ५॥

व्यसनी वा समृद्धो वा गतिरेष तवानघ।

एष लोके सतां धर्मो यज्ज्येष्ठवशगो भवेत्॥ ६॥

‘ये संकटमें हों या समृद्धिमें, ये ही तुम्हारी परम गति हैं। निष्पाप लक्ष्मण! संसारमें सत्पुरुषोंका यही धर्म है कि सर्वदा अपने बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहें॥

इदं हि वृत्तमुचितं कुलस्यास्य सनातनम्।

दानं दीक्षा च यज्ञेषु तनुत्यागो मृधेषु हि॥ ७॥

‘दान देना, यज्ञमें दीक्षा ग्रहण करना और युद्धमें शरीर त्यागना—यही इस कुलका उचित एवं सनातन आचार है’॥ ७॥

लक्ष्मणं त्वेवमुक्त्वासौ संसिद्धं प्रियराघवम्।

सुमित्रा गच्छ गच्छेति पुन: पुनरुवाच तम्॥ ८॥

अपने पुत्र लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुमित्राने वनवासके लिये निश्चित विचार रखनेवाले सर्वप्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘बेटा! जाओ, जाओ (तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो)।’ इसके बाद वे लक्ष्मणसे फिर बोलीं—॥ ८॥

रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्।

अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥ ९॥

‘बेटा! तुम श्रीरामको ही अपने पिता महाराज दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीताको ही अपनी माता सुमित्रा मानो और वनको ही अयोध्या जानो। अब सुखपूर्वक यहाँसे प्रस्थान करो’॥ ९॥

तत: सुमन्त्र: काकुत्स्थं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्।

विनीतो विनयज्ञश्च मातलिर्वासवं यथा॥ १०॥

इसके बाद जैसे मातलि इन्द्रसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनयके ज्ञाता सुमन्त्रने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—॥ १०॥

रथमारोह भद्रं ते राजपुत्र महायश:।

क्षिप्रं त्वां प्रापयिष्यामि यत्र मां राम वक्ष्यसे॥ ११॥

‘महायशस्वी राजकुमार श्रीराम! आपका कल्याण हो। आप इस रथपर बैठिये। आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीं मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूँगा॥ ११॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यानि वने त्वया।

तान्युपक्रमितव्यानि यानि देव्या प्रचोदित:॥ १२॥

‘आपको जिन चौदह वर्षोंतक वनमें रहना है, उनकी गणना आजसे ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयीने आज ही आपको वनमें जानेके लिये प्रेरित किया है’॥ १२॥

तं रथं सूर्यसंकाशं सीता हृष्टेन चेतसा।

आरुरोह वरारोहा कृत्वालंकारमात्मन:॥ १३॥

तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गोंमें उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्तसे उस सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुईं॥ १३॥

वनवासं हि संख्याय वासांस्याभरणानि च।

भर्तारमनुगच्छन्त्यै सीतायै श्वशुरो ददौ॥ १४॥

पतिके साथ जानेवाली सीताके लिये उनके श्वशुरने वनवासकी वर्षसंख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे॥ १४॥

तथैवायुधजातानि भ्रातृभ्यां कवचानि च।

रथोपस्थे प्रविन्यस्य सचर्म कठिनं च यत्॥ १५॥

इसी प्रकार महाराजने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके लिये जो बहुत-से अस्त्र-शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथके पिछले भागमें रखकर उन्होंने चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसीपर रख दी॥ १५॥

अथो ज्वलनसंकाशं चामीकरविभूषितम्।

तमारुरुहतुस्तूर्णं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १६॥

इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्निके समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथपर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये॥ १६॥

सीतातृतीयानारूढान् दृष्ट्वा रथमचोदयत्।

सुमन्त्र: सम्मतानश्वान् वायुवेगसमाञ्जवे॥ १७॥

जिनमें सीताकी संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदिको रथपर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्रने रथको आगे बढ़ाया। उसमें जुते हुए वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंको हाँका॥ १७॥

प्रयाते तु महारण्यं चिररात्राय राघवे।

बभूव नगरे मूर्च्छा बलमूर्च्छा जनस्य च॥ १८॥

जब श्रीरामचन्द्रजी सुदीर्घकालके लिये महान् वनकी ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शकरूपमें आये हुए बाहरी लोगोंको भी मूर्च्छा आ गयी॥ १८॥

तत् समाकुलसम्भ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम्।

हयसिञ्जितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम्॥ १९॥

उस समय सारी अयोध्यामें महान् कोलाहल मच गया। सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे। मतवाले हाथी श्रीरामके वियोगसे कुपित हो उठे और इधर-उधर भागते हुए घोड़ोंके हिनहिनाने एवं उनके आभूषणोंके खनखनानेकी आवाज सब ओर गूँजने लगी॥ १९॥

तत: सबालवृद्धा सा पुरी परमपीडिता।

राममेवाभिदुद्राव घर्मार्त: सलिलं यथा॥ २०॥

अयोध्यापुरीके आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीडि़त होकर श्रीरामके ही पीछे दौड़े, मानो धूपसे पीडि़त हुए प्राणी पानीकी ओर भागे जाते हों॥ २०॥

पार्श्वत: पृष्ठतश्चापि लम्बमानास्तदुन्मुखा:।

बाष्पपूर्णमुखा: सर्वे तमूचुर्भृशनि:स्वना:॥ २१॥

उनमेंसे कुछ लोग रथके पीछे और अगल-बगलमें लटक गये। सभी श्रीरामके लिये उत्कण्ठित थे और सबके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे सब-के-सब उच्चस्वरसे कहने लगे—॥ २१॥

संयच्छ वाजिनां रश्मीन् सूत याहि शनै: शनै:।

मुखं द्रक्ष्याम रामस्य दुर्दर्शं नो भविष्यति॥ २२॥

‘सूत! घोड़ोंकी लगाम खींचो। रथको धीरे-धीरे ले चलो। हम श्रीरामका मुख देखेंगे; क्योंकि अब इस मुखका दर्शन हमलोगोंके लिये दुर्लभ हो जायगा॥ २२॥

आयसं हृदयं नूनं राममातुरसंशयम्।

यद् देवगर्भप्रतिमे वनं याति न भिद्यते॥ २३॥

निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताका हृदय लोहेका बना हुआ है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तभी तो देवकुमारके समान तेजस्वी पुत्रके वनकी ओर जाते समय फट नहीं जाता है॥ २३॥

कृतकृत्या हि वैदेही छायेवानुगता पतिम्।

न जहाति रता धर्मे मेरुमर्कप्रभा यथा॥ २४॥

‘विदेहनन्दिनी सीता कृतार्थ हो गयीं; क्योंकि वे पतिव्रत-धर्ममें तत्पर रहकर छायाकी भाँति पतिके पीछे-पीछे चली जा रही हैं। वे श्रीरामका साथ उसी प्रकार नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्वतका त्याग नहीं करती है॥ २४॥

अहो लक्ष्मण सिद्धार्थ: सततं प्रियवादिनम्।

भ्रातरं देवसंकाशं यस्त्वं परिचरिष्यसि॥ २५॥

‘अहो लक्ष्मण! तुम भी कृतार्थ हो गये; क्योंकि तुम सदा प्रिय वचन बोलनेवाले अपने देवतुल्य भाईकी वनमें सेवा करोगे॥ २५॥

महत्येषा हि ते बुद्धिरेष चाभ्युदयो महान्।

एष स्वर्गस्य मार्गश्च यदेनमनुगच्छसि॥ २६॥

‘तुम्हारी यह बुद्धि विशाल है। तुम्हारा यह महान् अभ्युदय है और तुम्हारे लिये यह स्वर्गका मार्ग मिल गया है; क्योंकि तुम श्रीरामका अनुसरण कर रहे हो’॥ २६॥

एवं वदन्तस्ते सोढुं न शेकुर्बाष्पमागतम्।

नरास्तमनुगच्छन्ति प्रियमिक्ष्वाकुनन्दनम्॥ २७॥

ऐसी बातें कहते हुए वे पुरवासी मनुष्य उमड़े हुए आँसुओंका वेग न सह सके। वे लोग सबके प्रेमपात्र इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले जा रहे थे॥ २७॥

अथ राजा वृत: स्त्रीभिर्दीनाभिर्दीनचेतन:।

निर्जगाम प्रियं पुत्रं द्रक्ष्यामीति ब्रुवन् गृहात्॥ २८॥

उसी समय दयनीय दशाको प्राप्त हुई अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा दशरथ अत्यन्त दीन होकर ‘मैं अपने प्यारे पुत्र श्रीरामको देखूँगा’ ऐसा कहते हुए महलसे बाहर निकल आये॥ २८॥

शुश्रुवे चाग्रत: स्त्रीणां रुदतीनां महास्वन:।

यथा नाद: करेणूनां बद्धे महति कुञ्जरे॥ २९॥

उन्होंने अपने आगे रोती हुई स्त्रियोंका महान् आर्तनाद सुना। वह वैसा ही जान पड़ता था, जैसे बड़े हाथी यूथपतिके बाँध लिये जानेपर हथिनियोंका चीत्कार सुनायी देता है॥ २९॥

पिता हि राजा काकुत्स्थ: श्रीमान् सन्नस्तदा बभौ।

परिपूर्ण: शशी काले ग्रहेणोपप्लुतो यथा॥ ३०॥

उस समय श्रीरामके पिता ककुत्स्थवंशी श्रीमान् राजा दशरथ उसी तरह खिन्न जान पड़ते थे, जैसे पर्वके समय राहुसे ग्रस्त होनेपर पूर्ण चन्द्रमा श्रीहीन प्रतीत होते हैं॥ ३०॥

स च श्रीमानचिन्त्यात्मा रामो दशरथात्मज:।

सूतं संचोदयामास त्वरितं वाह्यतामिति॥ ३१॥

यह देख अचिन्त्यस्वरूप दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् रामने सुमन्त्रको प्रेरित करते हुए कहा—‘आप रथको तेजीसे चलाइये’॥ ३१॥

रामो याहीति तं सूतं तिष्ठेति च जनस्तथा।

उभयं नाशकत् सूत: कर्तुमध्वनि चोदित:॥ ३२॥

एक ओर श्रीरामचन्द्रजी सारथिसे रथ हाँकनेके लिये कहते थे और दूसरी ओर सारा जनसमुदाय उन्हें ठहर जानेके लिये कहता था। इस प्रकार दुविधामें पड़कर सारथि सुमन्त्र उस मार्गपर दोनोंमेंसे कुछ न कर सके—न तो रथको आगे बढ़ा सके और न सर्वथा रोक ही सके॥ ३२॥

निर्गच्छति महाबाहौ रामे पौरजनाश्रुभि:।

पतितैरभ्यवहितं प्रणनाश महीरज:॥ ३३॥

महाबाहु श्रीरामके नगरसे निकलते समय पुरवासियोंके नेत्रोंसे गिरे हुए आँसुओंद्वारा भीगकर धरतीकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी॥ ३३॥

रुदिताश्रुपरिद्यूनं हाहाकृतमचेतनम्।

प्रयाणे राघवस्यासीत् पुरं परमपीडितम्॥ ३४॥

श्रीरामचन्द्रजीके प्रस्थान करते समय सारा नगर अत्यन्त पीडि़त हो गया। सब रोने और आँसू बहाने लगे तथा सभी हाहाकार करते-करते अचेत-से हो गये॥ ३४॥

सुस्राव नयनै: स्त्रीणामस्रमायाससम्भवम्।

मीनसंक्षोभचलितै: सलिलं पङ्कजैरिव॥ ३५॥

नारियोंके नेत्रोंसे उसी तरह खेदजनित अश्रु झर रहे थे, जैसे मछलियोंके उछलनेसे हिले हुए कमलोंद्वारा जलकणोंकी वर्षा होने लगती है॥ ३५॥

दृष्ट्वा तु नृपति: श्रीमानेकचित्तगतं पुरम्।

निपपातैव दु:खेन कृत्तमूल इव द्रुम:॥ ३६॥

श्रीमान् राजा दशरथ सारी अयोध्यापुरीके लोगोंको एक-सा व्याकुलचित्त देखकर अत्यन्त दु:खके कारण जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति भूमिपर गिर पड़े॥ ३६॥

ततो हलहलाशब्दो जज्ञे रामस्य पृष्ठत:।

नराणां प्रेक्ष्य राजानं सीदन्तं भृशदु:खितम्॥ ३७॥

उस समय राजाको अत्यन्त दु:खमें मग्न हो कष्ट पाते देख श्रीरामके पीछे जाते हुए मनुष्योंका पुन: महान् कोलाहल प्रकट हुआ॥ ३७॥

हा रामेति जना: केचिद् राममातेति चापरे।

अन्त:पुरसमृद्धं च क्रोशन्तं पर्यदेवयन्॥ ३८॥

अन्त:पुरकी रानियोंके सहित राजा दशरथको उच्चस्वरसे विलाप करते देख कोई ‘हा राम!’ कहकर और कोई ‘हा राममाता!’ की पुकार मचाकर करुणक्रन्दन करने लगे॥ ३८॥

अन्वीक्षमाणो रामस्तु विषण्णं भ्रान्तचेतसम्।

राजानं मातरं चैव ददर्शानुगतौ पथि॥ ३९॥

उस समय श्रीरामचन्द्रजीने पीछे घूमकर देखा तो उन्हें विषादग्रस्त तथा भ्रान्तचित्त पिता राजा दशरथ और दु:खमें डूबी हुई माता कौसल्या दोनों ही मार्गपर अपने पीछे आते हुए दिखायी दिये॥ ३९॥

स बद्ध इव पाशेन किशोरो मातरं यथा।

धर्मपाशेन संयुक्त: प्रकाशं नाभ्युदैक्षत॥ ४०॥

जैसे रस्सीमें बँधा हुआ घोड़ेका बच्चा अपनी माको नहीं देख पाता, उसी प्रकार धर्मके बन्धनमें बँधे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी माताकी ओर स्पष्टरूपसे न देख सके॥ ४०॥

पदातिनौ च यानार्हावदु:खार्हौ सुखोचितौ।

दृष्ट्वा संचोदयामास शीघ्रं याहीति सारथिम्॥ ४१॥

जो सवारीपर चलने योग्य, दु:ख भोगनेके अयोग्य और सुख भोगनेके ही योग्य थे, उन माता-पिताको पैदल ही अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीरामचन्द्रजीने सारथिको शीघ्र रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया॥ ४१॥

नहि तत् पुरुषव्याघ्रो दु:खजं दर्शनं पितु:।

मातुश्च सहितुं शक्तस्तोत्त्रैर्नुन्न इव द्विप:॥ ४२॥

जैसे अंकुशसे पीडि़त किया हुआ गजराज उस कष्टको नहीं सहन कर पाता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीरामके लिये माता-पिताको इस दु:खद अवस्थामें देखना असह्य हो गया॥ ४२॥

प्रत्यगारमिवायान्ती सवत्सा वत्सकारणात्।

बद्धवत्सा यथा धेनू राममाताभ्यधावत॥ ४३॥

जैसे बँधे हुए बछड़ेवाली सवत्सा गौ शामको घरकी ओर लौटते समय बछड़ेके स्नेहसे दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीरामकी माता कौसल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं॥ ४३॥

तथा रुदन्तीं कौसल्यां रथं तमनुधावतीम्।

क्रोशन्तीं राम रामेति हा सीते लक्ष्मणेति च॥ ४४॥

रामलक्ष्मणसीतार्थं स्रवन्तीं वारि नेत्रजम्।

असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम्॥ ४५॥

‘हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की रट लगाती और रोती हुई कौसल्या उस रथके पीछे दौड़ रही थीं। वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये नेत्रोंसे आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती—चक्कर लगाती-सी डोल रही थीं। इस अवस्थामें माता कौसल्याको श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार देखा॥ ४४-४५॥

तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघव:।

सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा॥ ४६॥

राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे—‘सुमन्त्र! ठहरो।’ किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे—‘आगे बढि़ये, शीघ्र आगे बढि़ये।’ उन दो प्रकारके आदेशोंमें पड़े हुए बेचारे सुमन्त्रका मन उस समय दो पहियोंके बीचमें फँसे हुए मनुष्यका-सा हो रहा था॥ ४६॥

नाश्रौषमिति राजानमुपालब्धोऽपि वक्ष्यसि।

चिरं दु:खस्य पापिष्ठमिति रामस्तमब्रवीत्॥ ४७॥

उस समय श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा—‘यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजीके लिये दु:ख ही नहीं, महान् दु:खका कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये। लौटनेपर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी’॥ ४७॥

स रामस्य वच: कुर्वन्ननुज्ञाप्य च तं जनम्।

व्रजतोऽपि हयान् शीघ्रं चोदयामास सारथि:॥ ४८॥

अन्तमें श्रीरामके ही आदेशका पालन करते हुए सारथिने पीछेसे आनेवाले लोगोंसे जानेकी आज्ञा ली और स्वत: चलते हुए घोड़ोंको भी तीव्रगतिसे चलनेके लिये हाँका॥ ४८॥

न्यवर्तत जनो राज्ञो रामं कृत्वा प्रदक्षिणम्।

मनसाप्याशुवेगेन न न्यवर्तत मानुषम्॥ ४९॥

राजा दशरथके साथ आनेवाले लोग मन-ही-मन श्रीरामकी परिक्रमा करके शरीरमात्रसे लौटे (मनसे नहीं लौटे); क्योंकि वह उनके रथकी अपेक्षा भी तीव्रगामी था। दूसरे मनुष्योंका समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनोंसे ही नहीं लौटा (वे सब लोग श्रीरामके पीछे-पीछे दौड़े चले गये)॥ ४९॥

यमिच्छेत् पुनरायातं नैनं दूरमनुव्रजेत्।

इत्यमात्या महाराजमूचुर्दशरथं वच:॥ ५०॥

इधर मन्त्रियोंने महाराज दशरथसे कहा—‘राजन्! जिसके लिये यह इच्छा की जाय कि वह पुन: शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूरतक नहीं जाना चाहिये’॥ ५०॥

तेषां वच: सर्वगुणोपपन्न:

प्रस्विन्नगात्र: प्रविषण्णरूप:।

निशम्य राजा कृपण: सभार्यो

व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाण:॥ ५१॥

सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथका शरीर पसीनेसे भीग रहा था। वे विषादके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे। अपने मन्त्रियोंकी उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और रानियोंसहित अत्यन्त दीनभावसे पुत्रकी ओर देखने लगे॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥

 

एकचत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामके वनगमनसे रनवासकी स्त्रियोंका विलाप तथा नगरनिवासियोंकी शोकाकुल अवस्था

तस्म‌िंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ।

आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्त:पुरे महान्॥ १॥

पुरुषसिंह श्रीरामने माताओंसहित पिताके लिये दूरसे ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्थामें जब वे रथद्वारा नगरसे बाहर निकलने लगे, उस समय रनवासकी रानियोंमें बड़ा हाहाकार मच गया॥ १॥

अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विन:।

यो गति: शरणं चासीत् स नाथ: क्व नु गच्छति॥ २॥

वे रोती हुई कहने लगीं—‘हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनोंकी गति (सब सुखोंकी प्राप्ति करानेवाले) और शरण (समस्त आपत्तियोंसे रक्षा करनेवाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करनेवाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं?॥ २॥

न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।

क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदु:ख: क्व गच्छति॥ ३॥

‘जो किसीके द्वारा झूठा कलंक लगाये जानेपर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलानेवाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगोंको मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरोंके दु:खमें संवेदना प्रकट करनेवाले राम कहाँ जा रहे हैं?॥ ३॥

कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते।

तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति॥ ४॥

‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं?॥ ४॥

कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम्।

परित्राता जनस्यास्य जगत: क्व नु गच्छति॥ ५॥

‘कैकेयीके द्वारा क्लेशमें डाले गये महाराजके वन जानेके लिये कहनेपर हमलोगोंकी अथवा समस्त जगत्की रक्षा करनेवाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं?॥ ५॥

अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम्।

धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति॥ ६॥

‘अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव-जगत्के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीरामको वनवासके लिये देशनिकाला दे रहे हैं’॥ ६॥

इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनव:।

रुरुदुश्चैव दु:खार्ता: सस्वरं च विचुक्रुशु:॥ ७॥

इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह दु:खसे आर्त होकर रोने और उच्चस्वरसे क्रन्दन करने लगीं॥ ७॥

स तमन्त:पुरे घोरमार्तशब्दं महीपति:।

पुत्रशोकाभिसंतप्त: श्रुत्वा चासीत् सुदु:खित:॥ ८॥

अन्त:पुरमें वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोकसे संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दु:खी हो गये॥ ८॥

नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिन:।

अकुर्वन् न प्रजा: कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत॥ ९॥

व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् न पाययन्।

पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत॥ १०॥

उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थोंके घर भोजन नहीं बना, प्रजाओंने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, हाथियोंने मुँहमें लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओंने बछड़ोंको दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्रको जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई॥ ९-१०॥

त्रिशङ्कुर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि।

दारुणा: सोममभ्येत्य ग्रहा: सर्वे व्यवस्थिता:॥ ११॥

त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रातमें वक्रगतिसे चन्द्रमाके पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्तियुक्त) होकर स्थित हो गये॥

नक्षत्राणि गतार्चींषि ग्रहाश्च गततेजस:।

विशाखाश्च सधूमाश्च नभसि प्रचकाशिरे॥ १२॥

नक्षत्रोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब-के-सब आकाशमें विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे॥ १२॥

कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थित:।

रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत्॥ १३॥

आकाशमें छायी हुई मेघमाला वायुके वेगसे उमड़े हुए समुद्रके समान प्रतीत होती थी। श्रीरामके वनको जाते समय वह सारा नगर जोर-जोरसे हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया)॥ १३॥

दिश: पर्याकुला: सर्वास्तिमिरेणेव संवृता:।

न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे न किंचन॥ १४॥

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार-सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र॥

अकस्मान्नागर: सर्वो जनो दैन्यमुपागमत्।

आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मन:॥ १५॥

सहसा सारे नागरिक दीन-दशाको प्राप्त हो गये। किसीने भी आहार या विहारमें मन नहीं लगाया॥ १५॥

शोकपर्यायसंतप्त: सततं दीर्घमुच्छ्वसन्।

अयोध्यायां जन: सर्वश्चुक्रोश जगतीपतिम्॥ १६॥

अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परासे संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथको कोसने लगे॥ १६॥

बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जन:।

न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्व: शोकपरायण:॥ १७॥

सड़कपर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबका मुख आँसुओंसे भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे॥ १७॥

न वाति पवन: शीतो न शशी सौम्यदर्शन:।

न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्॥ १८॥

शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत्को उचित मात्रामें ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था॥ १८॥

अनर्थिन: सुता: स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा।

सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन्॥ १९॥

बालक माँ-बापको भूल गये। पतियोंको स्त्रियोंकी याद नहीं आती थी और भाई भाईका स्मरण नहीं करते थे—सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीरामका ही चिन्तन करने लगे॥ १९॥

ये तु रामस्य सुहृद: सर्वे ते मूढचेतस:।

शोकभारेण चाक्रान्ता: शयनं नैव भेजिरे॥ २०॥

जो श्रीरामके मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोकके भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे रातमें सोयेतक नहीं॥ २०॥

ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना

पुरन्दरेणेव मही सपर्वता।

चचाल घोरं भयशोकदीपिता

सनागयोधाश्वगणा ननाद च॥ २१॥

इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीरामसे रहित होकर भय और शोकसे प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचलमें पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्रसे रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है। हाथी, घोड़े और सैनिकोंसहित उस नगरीमें भयंकर आर्तनाद होने लगा॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥

 

द्विचत्वारिंश: सर्ग:

राजा दशरथका पृथ्वीपर गिरना, श्रीरामके लिये विलाप करना, कैकेयीको अपने पास आनेसे मना करना और उसे त्याग देना, कौसल्या और सेवकोंकी सहायतासे उनका कौसल्याके भवनमें आना और वहाँ भी श्रीरामके लिये दु:खका ही अनुभव करना

यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत।

नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी॥ १॥

वनकी ओर जाते हुए श्रीरामके रथकी धूल जबतक दिखायी देती रही, तबतक इक्ष्वाकुवंशके स्वामी राजा दशरथने उधरसे अपनी आँखें नहीं हटायीं॥ १॥

यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्।

तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने॥ २॥

वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्रको जबतक देखते रहे, तबतक पुत्रको देखनेके लिये उनका शरीर मानो पृथ्वीपर बढ़ रहा था—वे ऊँचे उठ-उठकर उनकी ओर निहार रहे थे॥ २॥

न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिप:।

तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले॥ ३॥

जब राजाको श्रीरामके रथकी धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३॥

तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना।

परं चास्यान्वगात् पार्श्वं कैकेयी सा सुमध्यमा॥ ४॥

उस समय उन्हें सहारा देनेके लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँहके पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभागमें जा पहुँचीं॥ ४॥

तां नयेन च सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च।

उवाच राजा कैकेयीं समीक्ष्य व्यथितेन्द्रिय:॥ ५॥

कैकेयीको देखते ही नय, विनय और धर्मसे सम्पन्न राजा दशरथकी समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं; वे बोल उठे—॥ ५॥

कैकेयि मामकाङ्गानि मा स्प्राक्षी: पापनिश्चये।

नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि न भार्या न च बान्धवी॥ ६॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली कैकेयि! तू मेरे अङ्गोंका स्पर्श न कर। मैं तुझे देखना नहीं चाहता। तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी॥ ६॥

ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम।

केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम्॥ ७॥

‘जो तेरा आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं। तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ॥ ७॥

अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं च यत्।

अनुजानामि तत् सर्वमस्ंिमल्लोके परत्र च॥ ८॥

‘मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्निकी परिक्रमा की है, तेरे साथका वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोकके लिये भी त्याग देता हूँ॥ ८॥

भरतश्चेत् प्रतीत: स्याद् राज्यं प्राप्यैतदव्ययम्।

यन्मे स दद्यात् पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत्॥ ९॥

‘तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न-बाधासे रहित राज्यको पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्धमें जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो’॥ ९॥

अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम्।

न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता॥ १०॥

तदनन्तर शोकसे कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरतीपर लोटनेके कारण धूलसे व्याप्त हुए महाराजको उठाकर उनके साथ राजभवनकी ओर लौटीं॥ १०॥

हत्वेव ब्राह्मणं कामात् स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना।

अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम्॥ ११॥

जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मणकी हत्या कर डाले अथवा हाथसे प्रज्वलित अग्निका स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदानके कारण वनमें गये हुए श्रीरामका चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे॥ ११॥

निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु।

राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा॥ १२॥

राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथके मार्गोंपर देखनेका कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था॥ १२॥

विललाप स दु:खार्त: प्रियं पुत्रमनुस्मरन्।

नगरान्तमनुप्राप्तं बुद‍्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत्॥ १३॥

वे अपने प्रिय पुत्रका बारंबार स्मरण करके दु:खसे आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटेको नगरकी सीमापर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे—॥ १३॥

वाहनानां च मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम्।

पदानि पथि दृश्यन्ते स महात्मा न दृश्यते॥ १४॥

‘हाय! मेरे पुत्रको वनकी ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों (घोड़ों) के पदचिह्न तो मार्गमें दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीरामका दर्शन नहीं हो रहा है॥ १४॥

य: सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषित:।

वीज्यमानो महार्हाभि: स्त्रीभिर्मम सुतोत्तम:॥ १५॥

स नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रित:।

काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते॥ १६॥

‘जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दनसे चर्चित हो तकियोंका सहारा लेकर उत्तम शय्याओंपर सुखसे सोते थे और उत्तम अलंकारोंसे विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्षकी जड़का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थरको सिरके नीचे रखकर भूमिपर ही शयन करेंगे॥ १५-१६॥

उत्थास्यति च मेदिन्या: कृपण: पांसुगुण्ठित:।

विनि:श्वसन् प्रस्रवणात् करेणूनामिवर्षभ:॥ १७॥

‘फिर अङ्गोंमें धूल लपेटे दीनकी भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन-भूमिसे उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरनेके पाससे गजराज उठता है॥

द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा दीर्घबाहुं वनेचरा:।

राममुत्थाय गच्छन्तं लोकनाथमनाथवत्॥ १८॥

‘निश्चय ही वनमें रहनेवाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीरामको वहाँसे अनाथकी भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे॥ १८॥

सा नूनं जनकस्येष्टा सुता सुखसदोचिता।

कण्टकाक्रमणक्लान्ता वनमद्य गमिष्यति॥ १९॥

‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह जनककी प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटोंपर पैर पड़नेसे व्यथाका अनुभव करती हुई वनको जायगी॥ १९॥

अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति।

श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम्॥ २०॥

‘वह वनके कष्टोंसे अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंका गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जन-तर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी॥ २०॥

सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस।

नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे॥ २१॥

‘अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीरामके बिना जीवित नहीं रह सकता’॥ २१॥

इत्येवं विलपन् राजा जनौघेनाभिसंवृत:।

अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम्॥ २२॥

इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथने मरघटसे नहाकर आये हुए पुरुषकी भाँति मनुष्योंकी भारी भीड़से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवनमें प्रवेश किया॥ २२॥

शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम्।

क्लान्तदुर्बलदु:खार्तां नात्याकीर्णमहापथाम्॥ २३॥

तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्।

विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्॥ २४॥

उन्होंने देखा, अयोध्यापुरीके प्रत्येक घरका बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरोंके सब लोग श्रीरामके पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगरमें हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दु:खसे आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कोंपर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगरकी यह अवस्था देखकर श्रीरामके लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महलके भीतर गये, जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जाते हैं॥ २३-२४॥

महाहृदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्।

रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥ २५॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीतासे रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशयके समान जान पड़ता था, जिसके भीतरके नागको गरुड़ उठा ले गये हों॥ २५॥

अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन् वसुधाधिप:।

उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम्॥ २६॥

उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथने गद्गद वाणीमें द्वारपालोंसे यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वरसे रहित बात कही—॥ २६॥

कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम्।

नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति॥ २७॥

‘मुझे शीघ्र ही श्रीराम-माता कौसल्याके घरमें पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदयको और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती’॥ २७॥

इति ब्रुवन्तं राजानमनयन् द्वारदर्शिन:।

कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत्॥ २८॥

ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथको द्वारपालोंने बड़ी विनयके साथ रानी कौसल्याके भवनमें पहुँचाया और पलंगपर सुला दिया॥ २८॥

ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम्।

अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मन:॥ २९॥

वहाँ कौसल्याके भवनमें प्रवेश करके पलंगपर आरूढ़ हो जानेपर भी राजा दशरथका मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा॥ २९॥

पुत्रद्वयविहीनं च स्नुषया च विवर्जितम्।

अपश्यद् भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम्॥ ३०॥

दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीतासे रहित वह भवन राजाको चन्द्रहीन आकाशकी भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा॥ ३०॥

तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान्।

उच्चै:स्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ॥ ३१॥

सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमा:।

परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥ ३२॥

उसे देखकर पराक्रमी महाराजने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वरसे विलाप करते हुए कहा—‘हा राम! तुम हम दोनों माता-पिताको त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षोंकी अवधितक जीवित रहेंगे और अयोध्यामें पुन: लौटे हुए श्रीरामको हृदयसे लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तवमें सुखी होंगे’॥ ३१-३२॥

अथ रात्र्यां प्रपन्नायां कालरात्र्यामिवात्मन:।

अर्धरात्रे दशरथ: कौसल्यामिदमब्रवीत्॥ ३३॥

तदनन्तर अपनी कालरात्रिके समान वह रात्रि आनेपर राजा दशरथने आधी रात होनेपर कौसल्यासे इस प्रकार कहा—॥ ३३॥

न त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश।

रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि न निवर्तते॥ ३४॥

‘कौसल्ये! मेरी दृष्टि श्रीरामके ही साथ चली गयी और वह अबतक नहीं लौटी है; अत: मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। एक बार अपने हाथसे मेरे शरीरका स्पर्श तो करो’॥

तं राममेवानुविचिन्तयन्तं

समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम्।

उपोपविश्याधिकमार्तरूपा

विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम्॥ ३५॥

शय्यापर पड़े हुए महाराज दशरथको श्रीरामका ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौसल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठीं और बड़े कष्टसे विलाप करने लगीं॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥

 

त्रिचत्वारिंश: सर्ग:

महारानी कौसल्याका विलाप

तत: समीक्ष्य शयने सन्नं शोकेन पार्थिवम्।

कौसल्या पुत्रशोकार्ता तमुवाच महीपतिम्॥ १॥

शय्यापर पड़े हुए राजाको पुत्रशोकसे व्याकुल देख पुत्रके ही शोकसे पीडि़त हुई कौसल्याने उन महाराजसे कहा—॥ १॥

राघवे नरशार्दूले विषं मुक्त्वाहिजिह्मगा।

विचरिष्यति कैकेयी निर्मुक्तेव हि पन्नगी॥ २॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीरामपर अपना विष उँड़ेलकर टेढ़ी चालसे चलनेवाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीरसे प्रकट हुई सर्पिणीकी भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी॥ २॥

विवास्य रामं सुभगा लब्धकामा समाहिता।

त्रासयिष्यति मां भूयो दुष्टाहिरिव वेश्मनि॥ ३॥

‘जैसे घरमें रहनेवाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रको वनवास देकर सफलमनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी॥ ३॥

अथास्मिन् नगरे रामश्चरन् भैक्षं गृहे वसेत्।

कामकारो वरं दातुमपि दासं ममात्मजम्॥ ४॥

‘यदि श्रीराम इस नगरमें भीख माँगते हुए भी घरमें रहते अथवा मेरे पुत्रको कैकेयीका दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता (क्योंकि उस दशामें मुझे भी श्रीरामका दर्शन होता रहता। श्रीरामके वनवासका वरदान तो कैकेयीने मुझे दु:ख देनेके लिये ही माँगा है।)॥ ४॥

पातयित्वा तु कैकेय्या रामं स्थानाद् यथेष्टत:।

प्रविद्धो रक्षसां भाग: पर्वणीवाहिताग्निना॥ ५॥

‘कैकेयीने अपनी इच्छाके अनुसार श्रीरामको उनके स्थानसे भ्रष्ट करके वैसा ही किया है, जैसे किसी अग्निहोत्रीने पर्वके दिन देवताओंको उनके भागसे वञ्चित करके राक्षसोंको वह भाग अर्पित कर दिया हो॥ ५॥

नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धर:।

वनमाविशते नूनं सभार्य: सहलक्ष्मण:॥ ६॥

‘गजराजके समान मन्द गतिसे चलनेवाले वीर महाबाहु धनुर्धर श्रीराम निश्चय ही अपनी पत्नी और लक्ष्मणके साथ वनमें प्रवेश कर रहे होंगे॥ ६॥

वने त्वदृष्टदु:खानां कैकेय्यनुमते त्वया।

त्यक्तानां वनवासाय कान्यावस्था भविष्यति॥ ७॥

‘महाराज! जिन्होंने जीवनमें कभी दु:ख नहीं देखे थे, उन श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको आपने कैकेयीकी बातोंमें आकर वनमें भेज दिया। अब उन बेचारोंकी वनवासके कष्ट भोगनेके सिवा और क्या अवस्था होगी?॥

ते रत्नहीनास्तरुणा: फलकाले विवासिता:।

कथं वत्स्यन्ति कृपणा: फलमूलै: कृताशना:॥ ८॥

‘रत्नतुल्य उत्तम वस्तुओंसे वञ्चित वे तीनों तरुण सुखरूप फल भोगनेके समय घरसे निकाल दिये गये। अब वे बेचारे फल-मूलका भोजन करके कैसे रह सकेंगे?॥ ८॥

अपीदानीं स काल: स्यान्मम शोकक्षय: शिव:।

सहभार्यं सह भ्रात्रा पश्येयमिह राघवम्॥ ९॥

‘क्या अब फिर मेरे शोकको नष्ट करनेवाला वह शुभ समय आयेगा, जब मैं सीता और लक्ष्मणके साथ वनसे लौटे हुए श्रीरामको देखूँगी?॥ ९॥

श्रुत्वैवोपस्थितौ वीरौ कदायोध्या भविष्यति।

यशस्विनी हृष्टजना सूच्छ्रितध्वजमालिनी॥ १०॥

‘कब वह शुभ अवसर प्राप्त होगा जब कि ‘वीर श्रीराम और लक्ष्मण वनसे लौट आये’ यह सुनते ही यशस्विनी अयोध्यापुरीके सब लोग हर्षसे उल्लसित हो उठेंगे और घर-घर फहराये गये ऊँचे-ऊँचे ध्वज-समूह पुरीकी शोभा बढ़ाने लगेंगे॥ १०॥

कदा प्रेक्ष्य नरव्याघ्रावरण्यात् पुनरागतौ।

भविष्यति पुरी हृष्टा समुद्र इव पर्वणि॥ ११॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मणको पुन: वनसे आया हुआ देख यह अयोध्यापुरी पूर्णिमाके उमड़ते हुए समुद्रकी भाँति कब हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होगी?॥ ११॥

कदायोध्यां महाबाहु: पुरीं वीर: प्रवेक्ष्यति।

पुरस्कृत्य रथे सीतां वृषभो गोवधूमिव॥ १२॥

‘जैसे साँड़ गायको आगे करके चलता है, उसी प्रकार वीर महाबाहु श्रीराम रथपर सीताको आगे करके कब अयोध्यापुरीमें प्रवेश करेंगे?॥ १२॥

कदा प्राणिसहस्राणि राजमार्गे ममात्मजौ।

लाजैरवकरिष्यन्ति प्रविशन्तावरिंदमौ॥ १३॥

‘कब यहाँके सहस्रों मनुष्य पुरीमें प्रवेश करते और राजमार्गपर चलते हुए मेरे दोनों शत्रुदमन पुत्रोंपर लावा (खील)-की वर्षा करेंगे?॥ १३॥

प्रविशन्तौ कदायोध्यां द्रक्ष्यामि शुभकुण्डलौ।

उदग्रायुधनिस्त्र‌िंशौ सशृङ्गाविव पर्वतौ॥ १४॥

‘उत्तम आयुध एवं खड्ग लिये शिखरयुक्त पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले श्रीराम और लक्ष्मण सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत हो कब अयोध्यापुरीमें प्रवेश करते हुए मेरे नेत्रोंके समक्ष प्रकट होंगे?॥ १४॥

कदा सुमनस:कन्या द्विजातीनां फलानि च।

प्रदिशन्त्य: पुरीं हृष्टा: करिष्यन्ति प्रदक्षिणम्॥ १५॥

‘कब ब्राह्मणोंकी कन्याएँ हर्षपूर्वक फूल और फल अर्पण करती हुई अयोध्यापुरीकी परिक्रमा करेंगी?॥ १५॥

कदा परिणतो बुद्ध्या वयसा चामरप्रभा:।

अभ्युपैष्यति धर्मात्मा सुवर्ष इव लालयन्॥ १६॥

‘कब ज्ञानमें बढ़े-चढ़े और अवस्थामें देवताओंके समान तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम उत्तम वर्षाकी भाँति जनसमुदायका लालन करते हुए यहाँ पधारेंगे?॥ १६॥

नि:संशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया।

पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिता: स्तना:॥ १७॥

‘वीर! इसमें संदेह नहीं कि पूर्व जन्ममें मुझ नीच आचार-विचारवाली नारीने बछड़ोंके दूध पीनेके लिये उद्यत होते ही उनकी माताओंके स्तन काट दिये होंगे॥ १७॥

साहं गौरिव सिंहेन विवत्सा वत्सला कृता।

कैकेय्या पुरुषव्याघ्र बालवत्सेव गौर्बलात्॥ १८॥

‘पुरुषसिंह! जैसे किसी सिंहने छोटे-से बछड़ेवाली वत्सला गौको बलपूर्वक बछड़ेसे हीन कर दिया हो, उसी प्रकार कैकेयीने मुझे बलात् अपने बेटेसे विलग कर दिया है॥ १८॥

नहि तावद्गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम्।

एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे॥ १९॥

‘जो उत्तम गुणोंसे युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीरामके बिना मैं इकलौते बेटेवाली माँ जीवित नहीं रह सकती॥ १९॥

न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते।

अपश्यन्त्या: प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम्॥ २०॥

‘अब प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको देखे बिना मुझमें जीवित रहनेकी कुछ भी शक्ति नहीं है॥ २०॥

अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्नि-

स्तनूजशोकप्रभवो महाहित:।

महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो

यथा निदाघे भगवान् दिवाकर:॥ २१॥

‘जैसे ग्रीष्म ऋतुमें उत्कृष्ट प्रभावाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंद्वारा इस पृथ्वीको अधिक ताप देते हैं, उसी प्रकार यह पुत्रशोकजनित महान् अहितकारक अग्नि आज मुझे जलाये दे रही है’॥ २१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥

 

चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:

सुमित्राका कौसल्याको आश्वासन देना

विलपन्तीं तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम्।

इदं धर्मे स्थिता धर्म्यं सुमित्रा वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

नारियोंमें श्रेष्ठ कौसल्याको इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली—॥ १॥

तवार्ये सद्गुणैर्युक्त: स पुत्र: पुरुषोत्तम:।

किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा॥ २॥

‘आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणोंसे युक्त और पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनतापूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोनेसे क्या लाभ?॥ २॥

यस्तवार्ये गत: पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबल:।

साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम्॥ ३॥

शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये।

रामो धर्मे स्थित: श्रेष्ठो न स शोच्य: कदाचन॥ ४॥

‘बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिताको भलीभाँति सत्यवादी बनानेके लिये वनमें चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्ममें स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषोंने सर्वदा और सम्यक् प्रकारसे पालन किया है तथा जो परलोकमें भी सुखमय फल प्रदान करनेवाला है। ऐसे धर्मात्माके लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये॥ ३-४॥

वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघ:।

दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मन:॥ ५॥

‘निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं। वे सदा श्रीरामके प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अत: उन महात्मा लक्ष्मणके लिये यह लाभकी ही बात है॥ ५॥

अरण्यवासे यद् दु:खं जानन्त्येव सुखोचिता।

अनुगच्छति वैदेही धर्मात्मानं तवात्मजम्॥ ६॥

‘विदेहनन्दिनी सीता भी जो सुख भोगनेके ही योग्य है, वनवासके दु:खोंको भलीभाँति सोच-समझकर ही तुम्हारे धर्मात्मा पुत्रका अनुसरण करती है॥ ६॥

कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभु:।

धर्म: सत्यव्रतपर: किं न प्राप्तस्तवात्मज:॥ ७॥

‘जो प्रभु संसारमें अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीरामको कौन-सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है॥ ७॥

व्यक्तं रामस्य विज्ञाय शौचं माहात्म्यमुत्तमम्।

न गात्रमंशुभि: सूर्य: संतापयितुमर्हति॥ ८॥

‘श्रीरामकी पवित्रता और उत्तम माहात्म्यको जानकर निश्चय ही सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उनके शरीरको संतप्त नहीं कर सकते॥ ८॥

शिव: सर्वेषु कालेषु काननेभ्यो विनि:सृत:।

राघवं युक्तशीतोष्ण: सेविष्यति सुखोऽनिल:॥ ९॥

‘सभी समयोंमें वनोंसे निकली हुई उचित सरदी और गरमीसे युक्त सुखद एवं मङ्गलमय वायु श्रीरघुनाथजीकी सेवा करेगी॥ ९॥

शयानमनघं रात्रौ पितेवाभिपरिष्वजन्।

घर्मघ्न: संस्पृशन् शीतश्चन्द्रमा ह्लादयिष्यति॥ १०॥

‘रात्रिकालमें धूपका कष्ट दूर करनेवाले शीतल चन्द्रमा सोते हुए निष्पाप श्रीरामका अपने किरणरूपी करोंसे आलिङ्गन और स्पर्श करके उन्हें आह्लाद प्रदान करेंगे॥ १०॥

ददौ चास्त्राणि दिव्यानि यस्मै ब्रह्मा महौजसे।

दानवेन्द्रं हतं दृष्ट्वा तिमिध्वजसुतं रणे॥ ११॥

‘श्रीरामके द्वारा रणभूमिमें तिमिध्वज (शम्बर)-के पुत्र दानवराज सुबाहुको मारा गया देख विश्वामित्रजीने उन महातेजस्वी वीरको बहुत-से दिव्यास्त्र प्रदान किये थे॥ ११॥

स शूर: पुरुषव्याघ्र: स्वबाहुबलमाश्रित:।

असंत्रस्तो ह्यरण्येऽसौ वेश्मनीव निवत्स्यते॥ १२॥

‘वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। वे अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर जैसे महलमें रहते थे, उसी तरह वनमें भी निडर होकर रहेंगे॥ १२॥

यस्येषुपथमासाद्य विनाशं यान्ति शत्रव:।

कथं न पृथिवी तस्य शासने स्थातुमर्हति॥ १३॥

‘जिनके बाणोंका लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाशको प्राप्त होते हैं, उनके शासनमें यह पृथ्वी और यहाँके प्राणी कैसे नहीं रहेंगे?॥ १३॥

या श्री: शौर्यं च रामस्य या च कल्याणसत्त्वता।

निवृत्तारण्यवास: स्वं क्षिप्रं राज्यमवाप्स्यति॥ १४॥

‘श्रीरामकी जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान पड़ता है कि वे वनवाससे लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे॥ १४॥

सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्नि: प्रभो: प्रभु:।

श्रिया: श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्या: कीर्ति: क्षमाक्षमा॥ १५॥

दैवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तम:।

तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे॥ १६॥

‘देवि! श्रीराम सूर्यके भी सूर्य (प्रकाशक) और अग्निके भी अग्नि (दाहक) हैं। वे प्रभुके भी प्रभु, लक्ष्मीकी भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमाकी भी क्षमा हैं। इतना ही नहीं—वे देवताओंके भी देवता तथा भूतोंके भी उत्तम भूत हैं। वे वनमें रहें या नगरमें, उनके लिये कौन-से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं॥ १५-१६॥

पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभ:।

क्षिप्रं तिसृभिरेताभि: सह रामोऽभिषेक्ष्यते॥ १७॥

‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी—इन तीनोंके साथ राज्यपर अभिषिक्त होंगे॥ १७॥

दु:खजं विसृजत्यश्रु निष्क्रामन्तमुदीक्ष्य यम्।

अयोध्यायां जन: सर्व: शोकवेगसमाहत:॥ १८॥

कुशचीरधरं वीरं गच्छन्तमपराजितम्।

सीतेवानुगता लक्ष्मीस्तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ १९॥

जिनको नगरसे निकलते देख अयोध्याका सारा जनसमुदाय शोकके वेगसे आहत हो नेत्रोंसे दु:खके आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वनको जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीरके पीछे-पीछे सीताके रूपमें साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है?॥ १८-१९॥

धनुर्ग्रहवरो यस्य बाणखड्गास्त्रभृत् स्वयम्।

लक्ष्मणो व्रजति ह्यग्रे तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ २०॥

‘जिनके आगे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगत्में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?॥ २०॥

निवृत्तवनवासं तं द्रष्टासि पुनरागतम्।

जहि शोकं च मोहं च देवि सत्यं ब्रवीमि ते॥ २१॥

‘देवि! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ। तुम वनवासकी अवधि पूर्ण होनेपर यहाँ लौटे हुए श्रीरामको फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो॥ २१॥

शिरसा चरणावेतौ वन्दमानमनिन्दिते।

पुनर्द्रक्ष्यसि कल्याणि पुत्रं चन्द्रमिवोदितम्॥ २२॥

‘कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमाके समान अपने पुत्रको पुन: अपने चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी॥ २२॥

पुन: प्रविष्टं दृष्ट्वा तमभिषिक्तं महाश्रियम्।

समुत्स्रक्ष्यसि नेत्राभ्यां शीघ्रमानन्दजं जलम्॥ २३॥

‘राजभवनमें प्रविष्ट होकर पुन: राजपदपर अभिषिक्त हुए अपने पुत्रको बड़ी भारी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी॥ २३॥

मा शोको देवि दु:खं वा न रामे दृष्यतेऽशिवम्।

क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पुत्रं त्वं ससीतं सहलक्ष्मणम्॥ २४॥

‘देवि! श्रीरामके लिये तुम्हारे मनमें शोक और दु:ख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई अशुभ बात नहीं दिखायी देती। तुम सीता और लक्ष्मणके साथ अपने पुत्र श्रीरामको शीघ्र ही यहाँ उपस्थित देखोगी॥ २४॥

त्वयाऽशेषो जनश्चायं समाश्वास्यो यतोऽनघे।

किमिदानीमिदं देवि करोषि हृदि विक्लवम्॥ २५॥

‘पापरहित देवि! तुम्हें तो इन सब लोगोंको धैर्य बँधाना चाहिये, फिर स्वयं ही इस समय अपने हृदयमें इतना दु:ख क्यों करती हो?॥ २५॥

नार्हा त्वं शोचितुं देवि यस्यास्ते राघव: सुत:।

नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थित:॥ २६॥

‘देवि! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें रघुकुलनन्दन राम-जैसा बेटा मिला है। श्रीरामसे बढ़कर सन्मार्गमें स्थिर रहनेवाला मनुष्य संसारमें दूसरा कोई नहीं है॥ २६॥

अभिवादयमानं तं दृष्ट्वा ससुहृदं सुतम्।

मुदाश्रु मोक्ष्यसे क्षिप्रं मेघरेखेव वार्षिकी॥ २७॥

‘जैसे वर्षाकालके मेघोंकी घटा जलकी वृष्टि करती है, उसी प्रकार तुम सुहृदोंसहित अपने पुत्र श्रीरामको अपने चरणोंमें प्रणाम करते देख शीघ्र ही आनन्दपूर्वक आँसुओंकी वर्षा करोगी॥ २७॥

पुत्रस्ते वरद: क्षिप्रमयोध्यां पुनरागत:।

कराभ्यां मृदुपीनाभ्यां चरणौ पीडयिष्यति॥ २८॥

‘तुम्हारे वरदायक पुत्र पुन: शीघ्र ही अयोध्यामें आकर अपने मोटे-मोटे कोमल हाथोंद्वारा तुम्हारे दोनों पैरोंको दबायँगे॥ २८॥

अभिवाद्य नमस्यन्तं शूरं ससुहृदं सुतम्।

मुदास्रै: प्रोक्षसे पुत्रं मेघराजिरिवाचलम्॥ २९॥

‘जैसे मेघमाला पर्वतको नहलाती है, उसी प्रकार तुम अभिवादन करके नमस्कार करते हुए सुहृदोंसहित अपने शूरवीर पुत्रका आनन्दके आँसुओंसे अभिषेक करोगी’॥ २९॥

आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यै-

र्वाक्योपचारे कुशलानवद्या।

रामस्य तां मातरमेवमुक्त्वा

देवी सुमित्रा विरराम रामा॥ ३०॥

बातचीत करनेमें कुशल, दोषरहित तथा रमणीय रूपवाली देवी सुमित्रा इस प्रकार तरह-तरहकी बातोंसे श्रीराममाता कौसल्याको आश्वासन देती हुई उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गयीं॥ ३०॥

निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं

रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्या:।

सद्य: शरीरे विननाश शोक:

शरद्गतो मेघ इवाल्पतोय:॥ ३१॥

लक्ष्मणकी माताका वह वचन सुनकर महाराज दशरथकी पत्नी तथा श्रीरामकी माता कौसल्याका सारा शोक उनके शरीर (मन) में ही तत्काल विलीन हो गया। ठीक उसी तरह, जैसे शरद् ऋतुका थोड़े जलवाला बादल शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो जाता है॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

 


पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामका पुरवासियोंसे भरत और महाराज दशरथके प्रति प्रेम-भाव रखनेका अनुरोध करते हुए लौट जानेके लिये कहना; नगरके वृद्ध ब्राह्मणोंका श्रीरामसे लौट चलनेके लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीरामका तमसातटपर पहुँचना

अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।

अनुजग्मु: प्रयान्तं तं वनवासाय मानवा:॥ १॥

उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वनकी ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखनेवाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वनमें निवास करनेके लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये॥ १॥

निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि।

नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्॥ २॥

‘जिसके जल्दी लौटनेकी कामना की जाय, उस स्वजनको दूरतक नहीं पहुँचाना चाहिये’—इत्यादि रूपसे बताये गये सुहृद्धर्मके अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजीके रथके पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घरकी ओर नहीं लौटे॥ २॥

अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशा:।

बभूव गुणसम्पन्न: पूर्णचन्द्र इव प्रिय:॥ ३॥

क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषोंके लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रिय हो गये थे॥

स याच्यमान: काकुत्स्थस्ताभि: प्रकृतिभिस्तदा।

कुर्वाण: पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत॥ ४॥

उन प्रजाजनोंने श्रीरामसे घर लौट चलनेके लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिताके सत्यकी रक्षा करनेके लिये वनकी ओर ही बढ़ते गये॥ ४॥

अवेक्षमाण: सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव।

उवाच राम: सस्नेहं ता: प्रजा: स्वा: प्रजा इव॥ ५॥

वे प्रजाजनोंको इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टिसे देख रहे थे मानो नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हों। उस समय श्रीरामने अपनी संतानके समान प्रिय उन प्रजाजनोंसे स्नेहपूर्वक कहा—॥ ५॥

या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम्।

मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम्॥ ६॥

‘अयोध्यानिवासियोंका मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नताके लिये भरतके प्रति और अधिक रूपमें होना चाहिये॥ ६॥

स हि कल्याणचारित्र: कैकेय्यानन्दवर्धन:।

करिष्यति यथावद् व: प्रियाणि च हितानि च॥ ७॥

‘उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करनेवाला है। कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले भरत आप लोगोंका यथावत् प्रिय और हित करेंगे॥ ७॥

ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वित:।

अनुरूप: स वो भर्ता भविष्यति भयापह:॥ ८॥

‘वे अवस्थामें छोटे होनेपर भी ज्ञानमें बड़े हैं। पराक्रमोचित गुणोंसे सम्पन्न होनेपर भी स्वभावके बड़े कोमल हैं। वे आपलोगोंके लिये योग्य राजा होंगे और प्रजाके भयका निवारण करेंगे॥ ८॥

स हि राजगुणैर्युक्तो युवराज: समीक्षित:।

अपि चापि मया शिष्टै: कार्यं वो भर्तृशासनम्॥ ९॥

‘वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणोंसे युक्त हैं, इसीलिये महाराजने उन्हें युवराज बनानेका निश्चय किया है; अत: आपलोगोंको अपने स्वामी भरतकी आज्ञाका सदा पालन करना चाहिये॥ ९॥

न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि।

महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया॥ १०॥

‘मेरे वनमें चले जानेपर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोकसे संतप्त न होने पायें, इस बातके लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें। मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे आपको मेरी इस प्रार्थनापर अवश्य ध्यान देना चाहिये’॥

यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत्।

तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन्॥ ११॥

दशरथनन्दन श्रीरामने ज्यों-ज्यों धर्मका आश्रय लेनेके लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनोंके मनमें उन्हींको अपना स्वामी बनानेकी इच्छा प्रबल होती गयी॥

बाष्पेण पिहितं दीनं राम: सौमित्रिणा सह।

चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम्॥ १२॥

समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणोंमें बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे॥ १२॥

ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा।

वय:प्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वच:॥ १३॥

उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल—तीनों ही दृष्टियोंसे बड़े थे। वृद्धावस्थाके कारण कितनोंके तो सिर काँप रहे थे। वे दूरसे ही इस प्रकार बोले—॥ १३॥

वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमा:।

निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि॥ १४॥

‘अरे! ओ तेज चलनेवाले अच्छी जातिके घोड़ो! तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीरामको वनकी ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामीके हितैषी बनो! तुम्हें वनमें नहीं जाना चाहिये॥ १४॥

कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमा:।

यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिता:॥ १५॥

‘यों तो सभी प्राणियोंके कान होते हैं, परंतु घोड़ोंके कान बड़े होते हैं; अत: तुम्हें हमारी याचनाका ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घरकी ओर लौट चलो॥ १५॥

धर्मत: स विशुद्धात्मा वीर: शुभदृढव्रत:।

उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्य: पुराद् वनम्॥ १६॥

‘तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रतका दृढ़तासे पालन करनेवाले हैं, अत: तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये—इन्हें बाहरसे नगरके समीप ले चलना चाहिये। नगरसे वनकी ओर इनका अपवहन करना—इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है’॥ १६॥

एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान्।

अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह॥ १७॥

वृद्ध ब्राह्मणोंको इस प्रकार आर्तभावसे प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथसे नीचे उतर गये॥

पद्भ्यामेव जगामाथ ससीत: सहलक्ष्मण:।

संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायण:॥ १८॥

वे सीता और लक्ष्मणके साथ पैदल ही चलने लगे। ब्राह्मणोंका साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे—लंबे डगसे नहीं चलते थे। वनमें पहुँचना ही उनकी यात्राका परम लक्ष्य था॥ १८॥

द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सल:।

न शशाक घृणाचक्षु: परिमोक्तुं रथेन स:॥ १९॥

श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रमें वात्सल्य-गुणकी प्रधानता थी। उनकी दृष्टिमें दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथके द्वारा चलकर उन पैदल चलनेवाले ब्राह्मणोंको पीछे छोड़नेका साहस न कर सके॥ १९॥

गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसा:।

ऊचु: परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजा:॥ २०॥

श्रीरामको अब भी वनकी ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ २०॥

ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति।

द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी ॥ २१॥

‘रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणोंके हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण-समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। इन ब्राह्मणोंके कंधोंपर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं॥ २१॥

वाजपेयसमुत्थानि च्छत्राण्येतानि पश्य न:।

पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये॥ २२॥

‘वर्षा बीतनेपर शरद् ऋतुमें दिखायी देनेवाले सफेद बादलोंके समान हमारे इन श्वेत छत्रोंकी ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं। ये हमें वाजपेय-यज्ञमें प्राप्त हुए थे॥ २२॥

अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते।

एभिश्छायां करिष्याम: स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकै:॥ २३॥

‘तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेवकी किरणोंसे संतप्त हो रहे हो। इस अवस्थामें हम वाजपेय-यज्ञमें प्राप्त हुए इन अपने छत्रोंद्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे॥ २३॥

या हि न: सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी।

त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी॥ २४॥

‘वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रोंके पीछे चलती थी—उन्हींके चिन्तनमें लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवासका अनुसरण करनेवाली हो गयी है॥ २४॥

हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये न: परं धनम्।

वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिता:॥ २५॥

‘जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयोंमें स्थित हैं। हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबलसे सुरक्षित रहकर घरोंमें ही रहेंगी॥ २५॥

पुनर्न निश्चय: कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मति:।

त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम्॥ २६॥

‘अब हमें अपने कर्तव्यके विषयमें पुन: कुछ निश्चय नहीं करना है। हमने तुम्हारे साथ जानेका विचार स्थिर कर लिया है। तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ‘जब तुम ही ब्राह्मणकी आज्ञाके पालनरूपी धर्मकी ओरसे निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्गपर स्थित रह सकेगा॥ २६॥

याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहै:।

शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलै:॥ २७॥

‘सदाचारका पोषण करनेवाले श्रीराम! हमारे सिरके बाल पककर हंसके समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वीपर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करनेसे इनमें धूल भर गयी है। हम अपने ऐसे मस्तकोंको झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घरको लौट चलो (वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। इसीलिये उनका श्रीरामके प्रति प्रणाम करना दोषकी बात नहीं है)॥

बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागता:।

तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने॥ २८॥

‘(इतनेपर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण बोले—) वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत-से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया है; अब इनके यज्ञोंकी समाप्ति तुम्हारे लौटनेपर ही निर्भर है॥

भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च।

याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय॥ २९॥

‘संसारके स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं। वे सब तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं। अपने उन भक्तोंपर तुम अपना स्नेह दिखाओ॥

अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिन:।

उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपा:॥ ३०॥

‘ये वृक्ष अपनी जड़ोंके कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसीसे तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायुके वेगसे इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं—तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं॥ ३०॥

निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षैकस्थाननिश्चिता:।

पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम्॥ ३१॥

‘जो सब प्रकारकी चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगनेके लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चितरूपसे वृक्षके एक स्थानपर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हो’॥ ३१॥

एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने।

ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम्॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीरामसे लौटनेके लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणोंपर मानो कृपा करनेके लिये मार्गमें तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह (तिरछी धारा) से श्रीरघुनाथजीको रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी॥ ३२॥

तत: सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य

श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम्।

पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गा-

नचारयद् वै तमसाविदूरे॥ ३३॥

वहाँ पहुँचनेपर सुमन्त्रने भी थके हुए घोड़ोंको शीघ्र ही रथसे खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसाके निकट ही चरनेके लिये छोड़ दिया॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥

 

षट्चत्वार‌िंश: सर्ग:

सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका रात्रिमें तमसा-तटपर निवास, माता-पिता और अयोध्याके लिये चिन्ता तथा पुरवासियोंको सोते छोड़कर वनकी ओर जाना

ततस्तु तमसातीरं रम्यमाश्रित्य राघव:।

सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर तमसाके रमणीय तटका आश्रय लेकर श्रीरामने सीताकी ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम्।

वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि॥ २॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हमलोग जो वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवासकी आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अत: अब तुम्हें नगरके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥ २॥

पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्तत:।

यथानिलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजै:॥ ३॥

‘इन सूने वनोंकी ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु-पक्षी अपने-अपने स्थानपर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्दसे सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्थामें देखकर खिन्न हो सब ओरसे रो रहे हैं॥ ३॥

अद्यायोध्या तु नगरी राजधानी पितुर्मम।

सस्त्रीपुंसा गतानस्मान् शोचिष्यति न संशय:॥ ४॥

‘आज मेरे पिताकी राजधानी अयोध्या नगरी वनमें आये हुए हमलोगोंके लिये समस्त नर-नारियोंसहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है॥ ४॥

अनुरक्ता हि मनुजा राजानं बहुभिर्गुणै:।

त्वां च मां च नरव्याघ्र शत्रुघ्नभरतौ तथा॥ ५॥

‘पुरुषसिंह! अयोध्याके मनुष्य बहुत-से सद्गुणोंके कारण महाराजमें, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्नमें भी अनुरक्त हैं॥ ५॥

पितरं चानुशोचामि मातरं च यशस्विनीम्।

अपि नान्धौ भवेतां नौ रुदन्तौ तावभीक्ष्णश:॥ ६॥

‘इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माताके लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहनेके कारण अंधे हो जायँ॥ ६॥

भरत: खलु धर्मात्मा पितरं मातरं च मे।

धर्मार्थकामसहितैर्वाक्यैराश्वासयिष्यति ॥ ७॥

‘परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं। अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम—तीनोंके अनुकूल वचनोंद्वारा पिताजीको और मेरी माताको भी सान्त्वना देंगे॥ ७॥

भरतस्यानृशंसत्वं संचिन्त्याहं पुन: पुन:।

नानुशोचामि पितरं मातरं च महाभुज॥ ८॥

‘महाबाहो! जब मैं भरतके कोमल स्वभावका बार-बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता-पिताके लिये अधिक चिन्ता नहीं होती॥ ८॥

त्वया कार्यं नरव्याघ्र मामनुव्रजता कृतम्।

अन्वेष्टव्या हि वैदेह्या रक्षणार्थं सहायता॥ ९॥

‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तो मुझे विदेहकुमारी सीताकी रक्षाके लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता॥ ९॥

अद्भिरेव हि सौमित्रे वत्स्याम्यद्य निशामिमाम्।

एतद्धि रोचते मह्यं वन्येऽपि विविधे सति॥ १०॥

‘सुमित्रानन्दन! यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके जंगली फल-मूल मिल सकते हैं तथापि आजकी यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा। यही मुझे अच्छा जान पड़ता है’॥ १०॥

एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं सुमन्त्रमपि राघव:।

अप्रमत्तस्त्वमश्वेषु भव सौम्येत्युवाच ह॥ ११॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रसे भी कहा—‘सौम्य! अब आप घोड़ोंकी रक्षापर ध्यान दें, उनकी ओरसे असावधान न हों’॥ ११॥

सोऽश्वान् सुमन्त्र: संयम्य सूर्येऽस्तं समुपागते।

प्रभूतयवसान् कृत्वा बभूव प्रत्यनन्तर:॥ १२॥

सुमन्त्रने सूर्यास्त हो जानेपर घोड़ोंको लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत-सा चारा डालकर वे श्रीरामके पास आ गये॥ १२॥

उपास्य तु शिवां संध्यां दृष्ट्वा रात्रिमुपागताम्।

रामस्य शयनं चक्रे सूत: सौमित्रिणा सह॥ १३॥

फिर (वर्णानुकूल) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मणसहित सुमन्त्रने श्रीरामचन्द्रजीके शयन करनेयोग्य स्थान और आसन ठीक किया॥ १३॥

तां शय्यां तमसातीरे वीक्ष्य वृक्षदलैर्वृताम्।

राम: सौमित्रिणा सार्धं सभार्य: संविवेश ह॥ १४॥

तमसाके तटपर वृक्षके पत्तोंसे बनी हुई वह शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके साथ उसपर बैठे॥ १४॥

सभार्यं सम्प्रसुप्तं तु श्रान्तं सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मण:।

कथयामास सूताय रामस्य विविधान् गुणान्॥ १५॥

थोड़ी देरमें सीतासहित श्रीरामको थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्रसे उनके नाना प्रकारके गुणोंका वर्णन करने लगे॥ १५॥

जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रवि:।

सूतस्य तमसातीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान्॥ १६॥

सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसाके किनारे श्रीरामके गुणोंकी चर्चा करते हुए रातभर जागते रहे। इतनेहीमें सूर्योदयका समय निकट आ पहुँचा॥ १६॥

गोकुलाकुलतीरायास्तमसाया विदूरत:।

अवसत् तत्र तां रात्रिं राम: प्रकृतिभि: सह॥ १७॥

तमसाका वह तट गौओंके समुदायसे भरा हुआ था। श्रीरामचन्द्रजीने प्रजाजनोंके साथ वहीं रात्रिमें निवास किया। वे प्रजाजनोंसे कुछ दूरपर सोये थे॥ १७॥

उत्थाय च महातेजा: प्रकृतीस्ता निशाम्य च।

अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम्॥ १८॥

महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनोंको सोते देख पवित्र लक्षणोंवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ १८॥

अस्मद‍्व्यपेक्षान् सौमित्रे निर्व्यपेक्षान् गृहेष्वपि।

वृक्षमूलेषु संसक्तान् पश्य लक्ष्मण साम्प्रतम्॥ १९॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! इन पुरवासियोंकी ओर देखो, ये इस समय वृक्षोंकी जड़से सटकर सो रहे हैं। इन्हें केवल हमारी चाह है। ये अपने घरोंकी ओरसे भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं॥ १९॥

यथैते नियमं पौरा: कुर्वन्त्यस्मन्निवर्तने।

अपि प्राणान् न्यसिष्यन्ति न तु त्यक्ष्यन्ति निश्चयम्॥ २०॥

‘हमें लौटा ले चलनेके लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे॥ २०॥

यावदेव तु संसुप्तास्तावदेव वयं लघु।

रथमारुह्य गच्छाम: पन्थानमकुतोभयम्॥ २१॥

‘अत: जबतक ये सो रहे हैं तभीतक हमलोग रथपर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दें। फिर हमें इस मार्गपर और किसीके आनेका भय नहीं रहेगा॥ २१॥

अतो भूयोऽपि नेदानीमिक्ष्वाकुपुरवासिन:।

स्वपेयुरनुरक्ता मा वृक्षमूलेषु संश्रिता:॥ २२॥

‘अयोध्यावासी हमलोगोंके अनुरागी हैं। जब हम यहाँसे निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षोंकी जड़ोंसे सटकर नहीं सोना पड़ेगा॥ २२॥

पौरा ह्यात्मकृताद् दु:खाद् विप्रमोच्या नृपात्मजै:।

न तु खल्वात्मना योज्या दु:खेन पुरवासिन:॥ २३॥

‘राजकुमारोंका यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियोंको अपने द्वारा होनेवाले दु:खसे मुक्त करें, न कि अपना दु:ख देकर उन्हें और दु:खी बना दें’॥ २३॥

अब्रवील्लक्ष्मणो रामं साक्षाद् धर्ममिव स्थितम्।

रोचते मे तथा प्राज्ञ क्षिप्रमारुह्यतामिति॥ २४॥

यह सुनकर लक्ष्मणने साक्षात् धर्मके समान विराजमान भगवान् श्रीरामसे कहा—‘परम बुद्धिमान् आर्य! मुझे आपकी राय पसंद है। शीघ्र ही रथपर सवार होइये’॥ २४॥

अथ रामोऽब्रवीत् सूतं शीघ्रं संयुज्यतां रथ:।

गमिष्यामि ततोऽरण्यं गच्छ शीघ्रमित: प्रभो॥ २५॥

तब श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा—‘प्रभो! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये। फिर मैं जल्दी ही यहाँसे वनकी ओर चलूँगा’॥ २५॥

सूतस्तत: संत्वरित: स्यन्दनं तैर्हयोत्तमै:।

योजयित्वा तु रामस्य प्राञ्जलि: प्रत्यवेदयत्॥ २६॥

आज्ञा पाकर सुमन्त्रने उन उत्तम घोड़ोंको तुरंत ही रथमें जोत दिया और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर निवेदन किया—॥ २६॥

अयं युक्तो महाबाहो रथस्ते रथिनां वर।

त्वरयाऽऽरोह भद्रं ते ससीत: सहलक्ष्मण:॥ २७॥

‘महाबाहो! रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! आपका कल्याण हो। आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है। अब सीता और लक्ष्मणके साथ शीघ्र इसपर सवार होइये’॥ २७॥

तं स्यन्दनमधिष्ठाय राघव: सपरिच्छद:।

शीघ्रगामाकुलावर्तां तमसामतरन्नदीम्॥ २८॥

श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथपर बैठकर तीव्र-गतिसे बहनेवाली भँवरोंसे भरी हुई तमसा नदीके उस पार गये॥ २८॥

स संतीर्य महाबाहु: श्रीमान् शिवमकण्टकम्।

प्रापद्यत महामार्गमभयं भयदर्शिनाम्॥ २९॥

नदीको पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्गपर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टकरहित तथा सर्वत्र भय देखनेवालोंके लिये भी भयसे रहित था॥ २९॥

मोहनार्थं तु पौराणां सूतं रामोऽब्रवीद् वच:।

उदङ्मुख: प्रयाहि त्वं रथमारुह्य सारथे॥ ३०॥

मुहूर्तं त्वरितं गत्वा निवर्तय रथं पुन:।

यथा न विद्यु: पौरा मां तथा कुरु समाहित:॥ ३१॥

उस समय श्रीरामने पुरवासियोंको भुलावा देनेके लिये सुमन्त्रसे यह बात कही—‘सारथे! (हमलोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथपर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशाकी ओर जाइये। दो घड़ीतक तीव्र गतिसे उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्गसे रथको यहीं लौटा लाइये। जिस तरह भी पुरवासियोंको मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये’॥ ३०-३१॥

रामस्य तु वच: श्रुत्वा तथा चक्रे च सारथि:।

प्रत्यागम्य च रामस्य स्यन्दनं प्रत्यवेदयत्॥ ३२॥

श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारथिने वैसा ही किया और लौटकर पुन: श्रीरामकी सेवामें रथ उपस्थित कर दिया॥ ३२॥

तौ सम्प्रयुक्तं तु रथं समास्थितौ

तदा ससीतौ रघुवंशवर्धनौ।

प्रचोदयामास ततस्तुरंगमान्

स सारथिर्येन पथा तपोवनम्॥ ३३॥

तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथपर चढ़े। तदनन्तर सारथिने घोड़ोंको उस मार्गपर बढ़ा दिया, जिससे तपोवनमें पहुँचा जा सकता था॥ ३३॥

तत: समास्थाय रथं महारथ:

ससारथिर्दाशरथिर्वनं ययौ।

उदङ्मुखं तं तु रथं चकार

प्रयाणमाङ्गल्यनिमित्तदर्शनात्॥ ३४॥

तदनन्तर सारथिसहित महारथी श्रीरामने यात्राकालिक मङ्गलसूचक शकुन देखनेके लिये पहले तो उस रथको उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथपर आरूढ़ होकर वनकी ओर चल दिये॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥

 

 


सप्तचत्वारिंश: सर्ग:

प्रात:काल उठनेपर पुरवासियोंका विलाप करना और निराश होकर नगरको लौटना

प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना।

शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतस:॥ १॥

इधर रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजीको न देखकर अचेत हो गये। शोकसे व्याकुल होनेके कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी॥ १॥

शोकजाश्रुपरिद्यूना वीक्षमाणास्ततस्तत:।

आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दु:खिता:॥ २॥

वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। परंतु उन दु:खी पुरवासियोंको श्रीराम किधर गये, इस बातका पता देनेवाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया॥ २॥

ते विषादार्तवदना रहितास्तेन धीमता।

कृपणा: करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिण:॥ ३॥

बुद्धिमान् श्रीरामसे विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये। उनके मुखपर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी। वे मनीषी पुरवासी करुणाभरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे—॥ ३॥

धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतस:।

नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम्॥ ४॥

‘हाय! हमारी उस निद्राको धिक्कार है, जिससे अचेत हो जानेके कारण हम उस समय विशाल वक्षवाले महाबाहु श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित हो गये हैं॥ ४॥

कथं रामो महाबाहु: स तथावितथक्रिय:।

भक्तं जनमभित्यज्य प्रवासं तापसो गत:॥ ५॥

‘जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती, वे तापसवेषधारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनोंको छोड़कर परदेश (वन) में कैसे चले गये?॥ ५॥

यो न: सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान्।

कथं रघूणां स श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गत:॥ ६॥

‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वनको क्यों चले गये?॥ ६॥

इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा।

रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम्॥ ७॥

‘अब हमलोग यहीं प्राण दे दें या मरनेका निश्चय करके उत्तर दिशाकी ओर चल दें। श्रीरामसे रहित होकर हमारा जीवन-धारण किसलिये हितकर हो सकता है?॥ ७॥

सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च।

तै: प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम्॥ ८॥

‘अथवा यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसीमें प्रवेश कर जायँ॥ ८॥

किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूय: प्रियंवद:।

नीत: स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम्॥ ९॥

‘(यदि हमसे कोई श्रीरामका वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे?) क्या हम यह कहेंगे कि जो किसीके दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजीको हमने वनमें पहुँचा दिया है? हाय! यह अयोग्य बात हमारे मुँहसे कैसे निकल सकती है?॥ ९॥

सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना।

भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका॥ १०॥

‘श्रीरामके बिना हमलोगोंको लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी॥ १०॥

निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना।

विहीनास्तेन च पुन: कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम्॥ ११॥

‘हमलोग वीरवर महात्मा श्रीरामके साथ सर्वदा निवास करनेके लिये निकले थे। अब उनसे बिछुड़कर हम अयोध्यापुरीको कैसे देख सकेंगे’॥ ११॥

इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जना:।

विलपन्ति स्म दु:खार्ता हृतवत्सा इवाग्र्यगा:॥ १२॥

इस प्रकार अनेक तरहकी बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे। वे बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओंकी भाँति दु:खसे व्याकुल हो रहे थे॥ १२॥

ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् तत: क्षणम्।

मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुता:॥ १३॥

फिर रास्तेपर रथकी लीक देखते हुए सब-के-सब कुछ दूरतक गये; किंतु क्षणभरमें मार्गका चिह्न न मिलनेके कारण वे महान् शोकमें डूब गये॥ १३॥

रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विन:।

किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति॥ १४॥

उस समय यह कहते हुए कि ‘यह क्या हुआ? अब हम क्या करें? दैवने हमें मार डाला’ वे मनस्वी पुरुष रथकी लीकका अनुसरण करते हुए अयोध्याकी ओर लौट पड़े॥ १४॥

तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतस:।

अयोध्यामगमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम्॥ १५॥

उनका चित्त क्लान्त हो रहा था। वे सब जिस मार्गसे गये थे, उसीसे लौटकर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे, जहाँके सभी सत्पुरुष श्रीरामके लिये व्यथित थे॥ १५॥

आलोक्य नगरीं तां च क्षयव्याकुलमानसा:।

आवर्तयन्त तेऽश्रूणि नयनै: शोकपीडितै:॥ १६॥

उस नगरीको देखकर उनका हृदय दु:खसे व्याकुल हो उठा। वे अपने शोकपीडि़त नेत्रोंद्वारा आँसुओंकी वर्षा करने लगे॥ १६॥

एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते।

आपगा गरुडेनेव हृदादुद्धृतपन्नगा॥ १७॥

(वे बोले—)‘जिसके गहरे कुण्डसे वहाँका नाग गरुड़के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीरामसे रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है’॥

चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम्।

अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतस:॥ १८॥

उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्रके समान आनन्दशून्य हो गया है। पुरीकी यह दुरवस्था देख वे अचेत-से हो गये॥ १८॥

ते तानि वेश्मानि महाधनानि

दु:खेन दु:खोपहता विशन्त:।

नैव प्रजग्मु: स्वजनं परं वा

निरीक्ष्यमाणा: प्रविनष्टहर्षा:॥ १९॥

उनके हृदयका सारा उल्लास नष्ट हो चुका था। वे दु:खसे पीडि़त हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहोंमें बड़े क्लेशके साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और परायेकी पहचान न कर सके॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥

अष्टचत्वारिंश: सर्ग:

नगरनिवासिनी स्त्रियोंका विलाप करना

तेषामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव च।

बाष्पविप्लुतनेत्राणां सशोकानां मुमूर्षया॥ १॥

अभिगम्य निवृत्तानां रामं नगरवासिनाम्।

उद्गतानीव सत्त्वानि बभूवुरमनस्विनाम्॥ २॥

इस प्रकार जो विषादग्रस्त, अत्यन्त पीडि़त, शोकमग्न तथा प्राण त्याग देनेकी इच्छासे युक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहा रहे थे, श्रीरामचन्द्रजीके साथ जाकर भी जो उन्हें लिये बिना लौट आये थे और इसीलिये जिनका चित्त ठिकाने नहीं था, उन नगरवासियोंकी ऐसी दशा हो रही थी मानो उनके प्राण निकल गये हों॥ १-२॥

स्वं स्वं निलयमागम्य पुत्रदारै: समावृता:।

अश्रूणि मुमुचु: सर्वे बाष्पेण पिहितानना:॥ ३॥

वे सब अपने-अपने घरमें आकर पत्नी और पुत्रोंसे घिरे हुए आँसू बहाने लगे। उनके मुख अश्रुधारासे आच्छादित थे॥ ३॥

न चाहृष्यन् न चामोदन् वणिजो न प्रसारयन्।

न चाशोभन्त पण्यानि नापचन् गृहमेधिन:॥ ४॥

उनके शरीरमें हर्षका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था तथा मनमें भी आनन्दका अभाव ही था। वैश्योंने अपनी दुकानें नहीं खोलीं। क्रय-विक्रयकी वस्तुएँ बाजारोंमें फैलायी जानेपर भी उनकी शोभा नहीं हुई (उन्हें लेनेके लिये ग्राहक नहीं आये)। उस दिन गृहस्थोंके घरमें चूल्हे नहीं जले—रसोई नहीं बनी॥ ४॥

नष्टं दृष्ट्वा नाभ्यनन्दन् विपुलं वा धनागमम्।

पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाप्यनन्दत॥ ५॥

खोयी हुई वस्तु मिल जानेपर भी किसीको प्रसन्नता नहीं हुई, विपुल धन-राशि प्राप्त हो जानेपर भी किसीने उसका अभिनन्दन नहीं किया। जिसने प्रथम बार पुत्रको जन्म दिया था, वह माता भी आनन्दित नहीं हुई॥ ५॥

गृहे गृहे रुदत्यश्च भर्तारं गृहमागतम्।

व्यगर्हयन्त दु:खार्ता वाग्भिस्तोत्त्रैरिव द्विपान्॥ ६॥

प्रत्येक घरकी स्त्रियाँ अपने पतियोंको श्रीरामके बिना ही लौटकर आये देख रो पड़ीं और दु:खसे आतुर हो कठोर वचनोंद्वारा उन्हें कोसने लगीं, मानो महावत अंकुशोंसे हाथियोंको मार रहे हों॥ ६॥

किं नु तेषां गृहै: कार्यं किं दारै: किं धनेन वा।

पुत्रैर्वापि सुखैर्वापि ये न पश्यन्ति राघवम्॥ ७॥

वे बोलीं—‘जो लोग श्रीरामको नहीं देखते, उन्हें घर-द्वार, स्त्री-पुत्र, धन-दौलत और सुख-भोगोंसे क्या प्रयोजन है?॥ ७॥

एक: सत्पुरुषो लोके लक्ष्मण: सह सीतया।

योऽनुगच्छति काकुत्स्थं रामं परिचरन् वने॥ ८॥

‘संसारमें एकमात्र लक्ष्मण ही सत्पुरुष हैं, जो सीताके साथ श्रीरामकी सेवा करनेके लिये उनके पीछे-पीछे वनमें जा रहे हैं॥ ८॥

आपगा: कृतपुण्यास्ता: पद्मिन्यश्च सरांसि च।

येषु यास्यति काकुत्स्थो विगाह्य सलिलं शुचि॥ ९॥

‘उन नदियों, कमलमण्डित बावडि़यों तथा सरोवरोंने अवश्य ही बहुत पुण्य किया होगा, जिनके पवित्र जलमें स्नान करके श्रीरामचन्द्रजी आगे जायँगे॥ ९॥

शोभयिष्यन्ति काकुत्स्थमटव्यो रम्यकानना:।

आपगाश्च महानूपा: सानुमन्तश्च पर्वता:॥ १०॥

‘जिनमें रमणीय वृक्षावलियाँ शोभा पाती हैं, वे सुन्दर वनश्रेणियाँ, बड़े कछारवाली नदियाँ और शिखरोंसे सम्पन्न पर्वत श्रीरामकी शोभा बढ़ायेंगे॥ १०॥

काननं वापि शैलं वा यं रामोऽनुगमिष्यति।

प्रियातिथिमिव प्राप्तं नैनं शक्ष्यन्त्यनर्चितुम्॥ ११॥

‘श्रीराम जिस वन अथवा पर्वतपर जायँगे, वहाँ उन्हें अपने प्रिय अतिथिकी भाँति आया हुआ देख वे वन और पर्वत उनकी पूजा किये बिना नहीं रह सकेंगे॥

विचित्रकुसुमापीडा बहुमञ्जरिधारिण:।

राघवं दर्शयिष्यन्ति नगा भ्रमरशालिन:॥ १२॥

‘विचित्र फूलोंके मुकुट पहने और बहुत-सी मञ्जरियाँ धारण किये भ्रमरोंसे सुशोभित वृक्ष वनमें श्रीरामचन्द्रजीको अपनी शोभा दिखायेंगे॥ १२॥

अकाले चापि मुख्यानि पुष्पाणि च फलानि च।

दर्शयिष्यन्त्यनुक्रोशाद् गिरयो राममागतम्॥ १३॥

‘वहाँके पर्वत अपने यहाँ पधारे हुए श्रीरामको अत्यन्त आदरके कारण असमयमें भी उत्तम-उत्तम फूल और फल दिखायेंगे (भेंट करेंगे)॥ १३॥

प्रस्रविष्यन्ति तोयानि विमलानि महीधरा:।

विदर्शयन्तो विविधान् भूयश्चित्रांश्च निर्झरान्॥ १४॥

‘वे पर्वत बारंबार नाना प्रकारके विचित्र झरने दिखाते हुए श्रीरामके लिये निर्मल जलके स्रोत बहायेंगे॥

पादपा: पर्वताग्रेषु रमयिष्यन्ति राघवम्।

यत्र रामो भयं नात्र नास्ति तत्र पराभव:॥ १५॥

स हि शूरो महाबाहु: पुत्रो दशरथस्य च।

पुरा भवति नोऽदूरादनुगच्छाम राघवम्॥ १६॥

‘पर्वत-शिखरोंपर लहलहाते हुए वृक्ष श्रीरघुनाथजीका मनोरंजन करेंगे। जहाँ श्रीराम हैं वहाँ न तो कोई भय है और न किसीके द्वारा पराभव ही हो सकता है; क्योंकि दशरथनन्दन महाबाहु श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। अत: जबतक वे हमलोगोंसे बहुत दूर नहीं निकल जाते, इसके पहले ही हमें उनके पास पहुँचकर पीछे लग जाना चाहिये॥

पादच्छाया सुखं भर्तुस्तादृशस्य महात्मन:।

स हि नाथो जनस्यास्य स गति: स परायणम्॥ १७॥

‘उनके-जैसे महात्मा एवं स्वामीके चरणोंकी छाया ही हमारे लिये परम सुखद है। वे ही हमारे रक्षक, गति और परम आश्रय हैं॥ १७॥

वयं परिचरिष्याम: सीतां यूयं च राघवम्।

इति पौरस्त्रियोभर्तृन् दु:खार्तास्तत्तदब्रुवन्॥ १८॥

‘हम स्त्रियाँ सीताजीकी सेवा करेंगी और तुम सब लोग श्रीरघुनाथजीकी सेवामें लगे रहना।’ इस प्रकार पुरवासियोंकी स्त्रियाँ दु:खसे आतुर हो अपने पतियोंसे उपर्युक्त बातें कहने लगीं॥ १८॥

युष्माकं राघवोऽरण्ये योगक्षेमं विधास्यति।

सीता नारीजनस्यास्य योगक्षेमं करिष्यति॥ १९॥

(वे पुन: बोलीं—) ‘वनमें श्रीरामचन्द्रजी आपलोगोंका योगक्षेम सिद्ध करेंगे और सीताजी हम नारियोंके योगक्षेमका निर्वाह करेंगी॥ १९॥

को न्वनेनाप्रतीतेन सोत्कण्ठितजनेन च।

सम्प्रीयेतामनोज्ञेन वासेन हृतचेतसा॥ २०॥

‘यहाँका निवास प्रीति और प्रतीतिसे रहित है। यहाँके सब लोग श्रीरामके लिये उत्कण्ठित रहते हैं। किसीको यहाँका रहना अच्छा नहीं लगता तथा यहाँ रहनेसे मन अपनी सुध-बुध खो बैठता है। भला, ऐसे निवाससे किसको प्रसन्नता होगी?॥ २०॥

कैकेय्या यदि चेद् राज्यं स्यादधर्म्यमनाथवत्।

न हि नो जीवितेनार्थ: कुत: पुत्रै: कुतो धनै:॥ २१॥

‘यदि इस राज्यपर कैकेयीका अधिकार हो गया तो यह अनाथ-सा हो जायगा। इसमें धर्मकी मर्यादा नहीं रहने पायेगी। ऐसे राज्यमें तो हमें जीवित रहनेकी ही आवश्यकता नहीं जान पड़ती, फिर यहाँ धन और पुत्रोंसे क्या लेना है?॥ २१॥

यया पुत्रश्च भर्ता च त्यक्तावैश्वर्यकारणात्।

कं सा परिहरेदन्यं कैकेयी कुलपांसनी॥ २२॥

‘जिसने राज्य-वैभवके लिये अपने पुत्र और पतिको त्याग दिया, वह कुलकलङ्किनी कैकेयी दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी?॥ २२॥

कैकेय्या न वयं राज्ये भृतका हि वसेमहि।

जीवन्त्या जातु जीवन्त्य: पुत्रैरपि शपामहे॥ २३॥

‘हम अपने पुत्रोंकी शपथ खाकर कहती हैं कि जबतक कैकेयी जीवित रहेगी, तबतक हम जीते-जी कभी उसके राज्यमें नहीं रह सकेंगी, भले ही यहाँ हमारा पालन-पोषण होता रहे (फिर भी हम यहाँ रहना नहीं चाहेंगी)॥ २३॥

या पुत्रं पार्थिवेन्द्रस्य प्रवासयति निर्घृणा।

कस्तां प्राप्य सुखं जीवेदधर्म्यां दुष्टचारिणीम्॥ २४॥

‘जिस निर्दय स्वभाववाली नारीने महाराजके पुत्रको राज्यसे बाहर निकलवा दिया है, उस अधर्मपरायणा दुराचारिणी कैकेयीके अधिकारमें रहकर कौन सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है?॥ २४॥

उपद्रुतमिदं सर्वमनालम्भमनायकम्।

कैकेय्यास्तु कृते सर्वं विनाशमुपयास्यति॥ २५॥

‘कैकेयीके कारण यह सारा राज्य अनाथ एवं यज्ञरहित होकर उपद्रवका केन्द्र बन गया है, अत: एक दिन सबका विनाश हो जायगा॥ २५॥

नहि प्रव्रजिते रामे जीविष्यति महीपति:।

मृते दशरथे व्यक्तं विलोपस्तदनन्तरम्॥ २६॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके वनवासी हो जानेपर महाराज दशरथ जीवित नहीं रहेंगे। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि राजा दशरथकी मृत्युके पश्चात् इस राज्यका लोप हो जायगा॥ २६॥

ते विषं पिबतालोड्य क्षीणपुण्या: सुदु:खिता:।

राघवं वानुगच्छध्वमश्रुतिं वापि गच्छत॥ २७॥

‘इसलिये अब तुमलोग यह समझ लो कि अब हमारे पुण्य समाप्त हो गये। यहाँ रहकर हमें अत्यन्त दु:ख ही भोगना पड़ेगा। ऐसी दशामें या तो जहर घोलकर पी जाओ या श्रीरामका अनुसरण करो अथवा किसी ऐसे देशमें चले चलो, जहाँ कैकेयीका नाम भी न सुनायी पड़े॥ २७॥

मिथ्याप्रव्राजितो राम: सभार्य: सहलक्ष्मण:।

भरते संनिबद्धा: स्म: सौनिके पशवो यथा॥ २८॥

‘झूठे वरकी कल्पना करके पत्नी और लक्ष्मणके साथ श्रीरामको देशनिकाला दे दिया गया और हमें भरतके साथ बाँध दिया गया। अब हमारी दशा कसाईके घर बँधे हुए पशुओंके समान हो गयी है॥ २८॥

पूर्णचन्द्रानन: श्यामो गूढजत्रुररिंदम:।

आजानुबाहु: पद्माक्षो रामो लक्ष्मणपूर्वज:॥ २९॥

पूर्वाभिभाषी मधुर: सत्यवादी महाबल:।

सौम्यश्च सर्वलोकस्य चन्द्रवत् प्रियदर्शन:॥ ३०॥

‘लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है। उनके शरीरकी कान्ति श्याम, गलेकी हँसली मांससे ढकी हुई, भुजाएँ घुटनोंतक लंबी और नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं। वे सामने आनेपर पहले ही बातचीत छेड़ते हैं तथा मीठे और सत्य वचन बोलते हैं। श्रीराम शत्रुओंका दमन करनेवाले और महान् बलवान् हैं। समस्त जगत्के लिये सौम्य (कोमल स्वभाववाले) हैं। उनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्यारा है॥ २९-३०॥

नूनं पुरुषशार्दूलो मत्तमातङ्गविक्रम:।

शोभयिष्यत्यरण्यानि विचरन् स महारथ:॥ ३१॥

‘निश्चय ही मतवाले गजराजके समान पराक्रमी पुरुषसिंह महारथी श्रीराम भूतलपर विचरते हुए वनस्थलियोंकी शोभा बढ़ायेंगे’॥ ३१॥

तास्तथा विलपन्त्यस्तु नगरे नागरस्त्रिय:।

चुक्रुशुर्दु:खसंतप्ता मृत्योरिव भयागमे॥ ३२॥

नगरमें नागरिकोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप करती हुई दु:खसे संतप्त हो इस तरह जोर-जोरसे रोने लगीं, मानो उनपर मृत्युका भय आ गया हो॥ ३२॥

इत्येवं विलपन्तीनां स्त्रीणां वेश्मसु राघवम्।

जगामास्तं दिनकरो रजनी चाभ्यवर्तत॥ ३३॥

अपने-अपने घरोंमें श्रीरामके लिये स्त्रियाँ इस प्रकार दिनभर विलाप करती रहीं। धीरे-धीरे सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और रात हो गयी॥ ३३॥

नष्टज्वलनसंतापा प्रशान्ताध्यायसत्कथा।

तिमिरेणानुलिप्तेव तदा सा नगरी बभौ॥ ३४॥

उस समय किसीके घरमें अग्निहोत्रके लिये भी आग नहीं जली। स्वाध्याय और कथा-वार्ता भी नहीं हुई। सारी अयोध्यापुरी अन्धकारसे पुती हुई-सी प्रतीत होती थी॥

उपशान्तवणिक्पण्या नष्टहर्षा निराश्रया।

अयोध्या नगरी चासीन्नष्टतारमिवाम्बरम्॥ ३५॥

बनियोंकी दुकानें बंद होनेके कारण वहाँ चहल-पहल नहीं थी, सारी पुरीकी हँसी-खुशी छिन गयी थी, श्रीरामरूपी आश्रयसे रहित अयोध्यानगरी जिसके तारे छिप गये हों, उस आकाशके समान श्रीहीन जान पड़ती थी॥ ३५॥

तदा स्त्रियो रामनिमित्तमातुरा

यथा सुते भ्रातरि वा विवासिते।

विलप्य दीना रुरुदुर्विचेतस:

सुतैर्हि तासामधिकोऽपि सोऽभवत्॥ ३६॥

उस समय नगरवासिनी स्त्रियाँ श्रीरामके लिये इस तरह शोकातुर हो रही थीं, मानो उनके सगे बेटे या भाईको देशनिकाला दे दिया गया हो। वे अत्यन्त दीनभावसे विलाप करके रोने लगीं और रोते-रोते अचेत हो गयीं; क्योंकि श्रीराम उनके लिये पुत्रों (तथा भाइयों)-से भी बढ़कर थे॥ ३६॥

प्रशान्तगीतोत्सवनृत्यवादना

विभ्रष्टहर्षा पिहितापणोदया।

तदा ह्ययोध्या नगरी बभूव सा

महार्णव: संक्षपितोदको यथा॥ ३७॥

वहाँ गाने, बजाने और नाचनेके उत्सव बंद हो गये, सबका उत्साह जाता रहा, बाजारकी दुकानें नहीं खुलीं, इन सब कारणोंसे उस समय अयोध्यानगरी जलहीन समुद्रके समान सूनसान लग रही थी॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

 


एकोनपञ्चाश: सर्ग:

ग्रामवासियोंकी बातें सुनते हुए श्रीरामका कोसल जनपदको लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दिका नदियोंको पार करके सुमन्त्रसे कुछ कहना

रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम्।

जगाम पुरुषव्याघ्र: पितुराज्ञामनुस्मरन्॥ १॥

उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिताकी आज्ञाका बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रिमें ही बहुत दूर निकल गये॥

तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद् रजनी शिवा।

उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत॥ २॥

उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सबेरा होनेपर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदोंको लाँघते हुए चल दिये॥ २॥

ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च।

पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमै:॥ ३॥

जिनकी सीमाके पासकी भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलोंसे सुशोभित वनोंको देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्योंके देखनेमें तन्मय रहनेके कारण उन्हें उस रथकी गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी॥

शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।

राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम्॥ ४॥

मार्गमें जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करनेवाले मनुष्योंकी निम्नाङ्कित बातें उनके कानोंमें पड़ रही थीं—‘अहो! कामके वशमें पड़े हुए राजा दशरथको धिक्कार है!॥ ४॥

हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी।

तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते॥ ५॥

‘हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादाका त्याग करनेवाली कैकेयीको तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर्ममें ही लगी रहती है॥ ५॥

या पुत्रमीदृशं राज्ञ: प्रवासयति धार्मिकम्।

वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्॥ ६॥

‘जिसने महाराजके ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्रको वनवासके लिये घरसे निकलवा दिया है॥ ६॥

कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी।

सदा सुखेष्वभिरता दु:खान्यनुभविष्यति॥ ७॥

‘जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखोंमें ही रत रहती थीं, अब वनवासके दु:ख कैसे भोग सकेंगी?

अहो दशरथो राजा नि:स्नेह: स्वसुतं प्रति।

प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति॥ ८॥

‘अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्रके प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओंके प्रति कोई अपराध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं’॥ ८॥

एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।

शृण्वन्नतिययौ वीर: कोसलान् कोसलेश्वर:॥ ९॥

छोटे-बड़े गाँवोंमें रहनेवाले मनुष्योंकी ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपदकी सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये॥ ९॥

ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम्।

उत्तीर्याभिमुख: प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम्॥ १०॥

तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहानेवाली वेदश्रुति नामक नदीको पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण-दिशाकी ओर बढ़ गये॥ १०॥

गत्वा तु सुचिरं कालं तत: शीतवहां नदीम्।

गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम्॥ ११॥

दीर्घकालतक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदीको पार किया, जो शीतल जलका स्रोत बहाती थी। उसके कछारमें बहुत-सी गौएँ विचरती थीं॥ ११॥

गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघव: शीघ्रगैर्हयै:।

मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम्॥ १२॥

शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा गोमती नदीको लाँघ करके श्रीरघुनाथजीने मोरों और हंसोंके कलरवोंसे व्याप्त स्यन्दिका नामक नदीको भी पार किया॥ १२॥

स महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा।

स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत्॥ १३॥

वहाँ जाकर श्रीरामने धन-धान्यसे सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदोंसे घिरी हुई भूमिका सीताको दर्शन कराया, जिसे पूर्वकालमें राजा मनुने इक्ष्वाकुको दिया था॥ १३॥

सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णश:।

हंसमत्तस्वर: श्रीमानुवाच पुरुषोत्तम:॥ १४॥

फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीरामने ‘सूत!’ कहकर सारथिको बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा—॥ १४॥

कदाहं पुनरागम्य सरय्वा: पुष्पिते वने।

मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगत:॥ १५॥

‘सूत! मैं कब पुन: लौटकर माता-पितासे मिलूँगा और सरयूके पार्श्ववर्ती पुष्पित वनमें मृगयाके लिये भ्रमण करूँगा?॥ १५॥

नात्यर्थमभिकांक्षामि मृगयां सरयूवने।

रतिर्ह्येषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता॥ १६॥

‘मैं सरयूके वनमें शिकार खेलनेकी बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोकमें एक प्रकारकी अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियोंके समुदायको अभिमत है॥ १६॥

राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने।

काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकांक्षिताम्॥ १७॥

‘इस लोकमें वनमें जाकर शिकार खेलना राजर्षियोंकी क्रीड़ाके लिये प्रचलित हुआ था। अत: मनुपुत्रोंद्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरोंको भी अभीष्ट हुई’॥ १७॥

स तमध्वानमैक्ष्वाक: सूतं मधुरया गिरा।

तं तमर्थमभिप्रेत्य ययौ वाक्यमुदीरयन्॥ १८॥

इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयोंको लेकर सूतसे मधुर वाणीमें उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्गपर बढ़ते चले गये॥ १८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाश: सर्ग:॥ ४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥

 


पञ्चाश: सर्ग:

श्रीरामका मार्गमें अयोध्यापुरीसे वनवासकी आज्ञा माँगना और शृङ्गवेरपुरमें गङ्गातटपर पहुँचकर रात्रिमें निवास करना, वहाँ निषादराज गुहद्वारा उनका सत्कार

विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वज:।

अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेशकी सीमाको पार करके लक्ष्मणके बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्याकी ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा—॥ १॥

आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते।

दैवतानि च यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति च॥ २॥

‘ककुत्स्थवंशी राजाओंसे परिपालित पुरीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ॥ २॥

निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपते:।

पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा च पित्रा च सह संगत:॥ ३॥

‘वनवासकी अवधि पूरी करके महाराजके ऋणसे उऋण हो मैं पुन: लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पितासे भी मिलूँगा’॥ ३॥

ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम्।

अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम्॥ ४॥

इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्रवाले श्रीरामने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दु:खी होकर जनपदके लोगोंसे कहा—॥ ४॥

अनुक्रोशो दया चैव यथार्हं मयि व: कृत:।

चिरं दु:खस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये॥ ५॥

‘आपने मुझपर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी। मेरे लिये आपलोगोंने बहुत देरतक कष्ट सहन किया। इस तरह आपका देरतक दु:खमें पड़े रहना अच्छा नहीं है; इसलिये अब आपलोग अपना-अपना कार्य करनेके लिये जाइये’॥ ५॥

तेऽभिवाद्य महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।

विलपन्तो नरा घोरं व्यतिष्ठंश्च क्वचित् क्वचित्॥ ६॥

यह सुनकर उन मनुष्योंने महात्मा श्रीरामको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ-तहाँ खड़े हो गये॥ ६॥

तथा विलपतां तेषामतृप्तानां च राघव:।

अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्क: क्षणदामुखे॥ ७॥

उनकी आँखें अभी श्रीरामके दर्शनसे तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूपसे विलाप कर ही रहे थे, इतनेमें श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टिसे ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकालमें छिप जाते हैं॥ ७॥

ततो धान्यधनोपेतान् दानशीलजनान् शिवान्।

अकुतश्चिद्भयान् रम्यांश्चैत्ययूपसमावृतान्॥ ८ ॥

उद्यानाम्रवणोपेतान् सम्पन्नसलिलाशयान्।

तुष्टपुष्टजनाकीर्णान् गोकुलाकुलसेवितान्॥ ९ ॥

रक्षणीयान् नरेन्द्राणां ब्रह्मघोषाभिनादितान्।

रथेन पुरुषव्याघ्र: कोसलानत्यवर्तत॥ १०॥

इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथके द्वारा ही उस कोसल जनपदको लाँघ गये, जो धन-धान्यसे सम्पन्न और सुखदायक था। वहाँके सब लोग दानशील थे। उस जनपदमें कहींसे कोई भय नहीं था। वहाँके भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञ-सम्बन्धी यूपोंसे व्याप्त थे। बहुत-से उद्यान और आमोंके वन उस जनपदकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ जलसे भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे। सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा था; गौओंके समूहोंसे व्याप्त और सेवित था। वहाँके ग्रामोंकी बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी॥ ८—१०॥

मध्येन मुदितं स्फीतं रम्योद्यानसमाकुलम्।

राज्यं भोज्यं नरेन्द्राणां ययौ धृतिमतां वर:॥ ११॥

कोसलदेशसे आगे बढ़नेपर धैर्यवानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्गसे ऐसे राज्यमें होकर निकले, जो सुख-सुविधासे युक्त, धन-धान्यसे सम्पन्न, रमणीय उद्यानोंसे व्याप्त तथा सामन्त नरेशोंके उपभोगमें आनेवाला था॥ ११॥

तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम्।

ददर्श राघवो गङ्गां रम्यामृषिनिषेविताम्॥ १२॥

उस राज्यमें श्रीरघुनाथजीने त्रिपथगामिनी दिव्य नदी गङ्गाका दर्शन किया, जो शीतल जलसे भरी हुई, सेवारोंसे रहित तथा रमणीय थीं। बहुत-से महर्षि उनका सेवन करते थे॥ १२॥

आश्रमैरविदूरस्थै: श्रीमद्भि: समलंकृताम्।

कालेऽप्सरोभिर्हृष्टाभि: सेविताम्भोहृदां शिवाम्॥ १३॥

उनके तटपर थोड़ी-थोड़ी दूरपर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते थे। समय-समयपर हर्षभरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्डका सेवन करती हैं। वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं॥ १३॥

देवदानवगन्धर्वै: किंनरैरुपशोभिताम्।

नागगन्धर्वपत्नीभि: सेवितां सततं शिवाम्॥ १४॥

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथीकी शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वोंकी पत्नियाँ उनके जलका सदा सेवन करती हैं॥ १४॥

देवाक्रीडशताकीर्णां देवोद्यानयुतां नदीम्।

देवार्थमाकाशगतां विख्यातां देवपद्मिनीम्॥ १५॥

गङ्गाके दोनों तटोंपर देवताओंके सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ास्थल हैं। उनके किनारे देवताओंके बहुत-से उद्यान भी हैं। वे देवताओंकी क्रीड़ाके लिये आकाशमें भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनीके रूपमें विख्यात हैं॥

जलाघाताट्टहासोग्रां फेननिर्मलहासिनीम्।

क्वचिद् वेणीकृतजलां क्वचिदावर्तशोभिताम्॥ १६॥

प्रस्तरखण्डोंसे गङ्गाके जलके टकरानेसे जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है। जलसे जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदीका निर्मल हास है। कहीं तो उनका जल वेणीके आकारका है और कहीं वे भँवरोंसे सुशोभित होती हैं॥ १६॥

क्वचित् स्तिमितगम्भीरां क्वचिद् वेगसमाकुलाम्।

क्वचिद् गम्भीरनिर्घोषां क्वचिद् भैरवनि:स्वनाम्॥ १७॥

कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है। कहीं वे महान् वेगसे व्याप्त हैं। कहीं उनके जलसे मृदङ्ग आदिके समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदिके समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है॥ १७॥

देवसंघाप्लुतजलां निर्मलोत्पलसंकुलाम्।

क्वचिदाभोगपुलिनां क्वचिन्निर्मलवालुकाम्॥ १८॥

उनके जलमें देवताओंके समुदाय गोते लगाते हैं। कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदोंसे आच्छादित होता है। कहीं विशाल पुलिनका दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका-राशिका॥ १८॥

हंससारससंघुष्टां चक्रवाकोपशोभिताम्।

सदामत्तैश्च विहगैरभिपन्नामनिन्दिताम्॥ १९॥

हंसों और सारसोंके कलरव वहाँ गूँजते रहते हैं। चकवे उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते हैं। सदा मदमत्त रहनेवाले विहंगम उनके जलपर मँडराते रहते हैं। वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं॥ १९॥

क्वचित् तीररुहैर्वृक्षैर्मालाभिरिव शोभिताम्।

क्वचित् फुल्लोत्पलच्छन्नां क्वचित् पद्मवनाकुलाम्॥ २०॥

कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलोंसे आच्छादित है और कहीं कमलवनोंसे व्याप्त॥ २०॥

क्वचित् कुमुदखण्डैश्च कुड्मलैरुपशोभिताम्।

नानापुष्परजोध्वस्तां समदामिव च क्वचित्॥ २१॥

कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। कहीं नाना प्रकारके पुष्पोंके परागोंसे व्याप्त होकर वे मदमत्त नारीके समान प्रतीत होती हैं॥

व्यपेतमलसंघातां मणिनिर्मलदर्शनाम्।

दिशागजैर्वनगजैर्मत्तैश्च वरवारणै:॥ २२॥

देवराजोपवाह्यैश्च संनादितवनान्तराम्।

वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं। उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणिके समान निर्मल दिखायी देता है। उनके तटवर्ती वनका भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराजकी सवारीमें आनेवाले श्रेष्ठ गजराजोंसे कोलाहलपूर्ण बना रहता है॥

प्रमदामिव यत्नेन भूषितां भूषणोत्तमै:॥ २३॥

फलपुष्पै: किसलयैर्वृतां गुल्मैर्द्विजैस्तथा।

विष्णुपादच्युतां दिव्यामपापां पापनाशिनीम्॥ २४॥

वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियोंसे आवृत होकर उत्तम आभूषणोंसे यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवतीके समान शोभा पाती हैं। उनका प्राकट्य भगवान् विष्णुके चरणोंसे हुआ है। उनमें पापका लेश भी नहीं है। वे दिव्य नदी गङ्गा जीवोंके समस्त पापोंका नाश कर देनेवाली हैं॥ २३-२४॥

शिंशुमारैश्च नक्रैश्च भुजंगैश्च समन्विताम्।

शंकरस्य जटाजूटाद् भ्रष्टां सागरतेजसा॥ २५॥

समुद्रमहिषीं गङ्गां सारसक्रौञ्चनादिताम्।

आससाद महाबाहु: शृङ्गवेरपुरं प्रति॥ २६॥

उनके जलमें सूँस, घडि़याल और सर्प निवास करते हैं। सगरवंशी राजा भगीरथके तपोमय तेजसे जिनका शंकरजीके जटाजूटसे अवतरण हुआ था, जो समुद्रकी रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गाके पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे। गङ्गाकी वह धारा शृङ्गवेरपुरमें बह रही थी॥ २५-२६॥

तामूर्मिकलिलावर्तामन्ववेक्ष्य महारथ:।

सुमन्त्रमब्रवीत् सूतमिहैवाद्य वसामहे॥ २७॥

जिनके आवर्त (भँवरें) लहरोंसे व्याप्त थे, उन गङ्गाजीका दर्शन करके महारथी श्रीरामने सारथि सुमन्त्रसे कहा— ‘सूत! आज हमलोग यहीं रहेंगे’॥ २७॥

अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवान्।

सुमहानिङ्गुदीवृक्षो वसामोऽत्रैव सारथे॥ २८॥

‘सारथे! गङ्गाजीके समीप ही जो यह बहुत-से फूलों और नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित महान् इङ्गुदीका वृक्ष है, इसीके नीचे आज रातमें हम निवास करेंगे॥ २८॥

प्रेक्षामि सरितां श्रेष्ठां सम्मान्यसलिलां शिवाम्।

देवमानवगन्धर्वमृगपन्नगपक्षिणाम् ॥ २९॥

‘जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियोंके लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका भी मुझे यहाँसे दर्शन होता रहेगा’॥ २९॥

लक्ष्मणश्च सुमन्त्रश्च बाढमित्येव राघवम्।

उक्त्वा तमिङ्गुदीवृक्षं तदोपययतुर्हयै:॥ ३०॥

तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजीसे बहुत अच्छा कहकर अश्वोंद्वारा उस इंगुदी-वृक्षके समीप गये॥

रामोऽभियाय तं रम्यं वृक्षमिक्ष्वाकुनन्दन:।

रथादवतरत् तस्मात् सभार्य: सहलक्ष्मण:॥ ३१॥

उस रमणीय वृक्षके पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ रथसे उतर गये॥ ३१॥

सुमन्त्रोऽप्यवतीर्याथ मोचयित्वा हयोत्तमान्।

वृक्षमूलगतं राममुपतस्थे कृताञ्जलि:॥ ३२॥

फिर सुमन्त्रने भी उतरकर उत्तम घोड़ोंको खोल दिया और वृक्षकी जड़पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ ३२॥

तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसम: सखा।

निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुत:॥ ३३॥

शृङ्गवेरपुरमें गुहनामका राजा राज्य करता था। वह श्रीरामचन्द्रजीका प्राणोंके समान प्रिय मित्र था। उसका जन्म निषादकुलमें हुआ था। वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्तिकी दृष्टिसे भी बलवान् था तथा वहाँके निषादोंका सुविख्यात राजा था॥ ३३॥

स श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम्।

वृद्धै: परिवृतोऽमात्यैर्ज्ञातिभिश्चाप्युपागत:॥ ३४॥

उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्यमें पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ वहाँ आया॥ ३४॥

ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम्।

सह सौमित्रिणा राम: समागच्छद् गुहेन स:॥ ३५॥

निषादराजको दूरसे आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ आगे बढ़कर उससे मिले॥ ३५॥

तमार्त: सम्परिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत्।

यथायोध्या तथेदं ते राम किं करवाणि ते॥ ३६॥

ईदृशं हि महाबाहो क: प्राप्स्यत्यतिथिं प्रियम्।

श्रीरामचन्द्रजीको वल्कल आदि धारण किये देख गुहको बड़ा दु:ख हुआ। उसने श्रीरघुनाथजीको हृदयसे लगाकर कहा—‘श्रीराम! आपके लिये जैसे अयोध्याका राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा?’॥ ३६/

ततो गुणवदन्नाद्यमुपादाय पृथग्विधम्॥ ३७॥

अर्घ्यं चोपानयच्छीघ्रं वाक्यं चेदमुवाच ह।

स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही॥ ३८॥

वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि न:।

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम्।

शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते॥ ३९॥

फिर भाँति-भाँतिका उत्तम अन्न लेकर वह सेवामें उपस्थित हुआ। उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा—‘महाबाहो! आपका स्वागत है। यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकारमें है, आपकी ही है। हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आजसे आप ही हमारे इस राज्यका भलीभाँति शासन करें। यह भक्ष्य (अन्न आदि), भोज्य (खीर आदि), पेय (पानकरस आदि) तथा लेह्य (चटनी आदि) आपकी सेवामें उपस्थित है, इसे स्वीकार करें। ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ोंके खानेके लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं—ये सब सामग्री ग्रहण करें’॥ ३७—३९॥

गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघव: प्रत्युवाच ह।

अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम्॥ ४०॥

पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च।

गुहके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—‘सखे! तुम्हारे यहाँतक पैदल आने और स्नेह दिखानेसे ही हमारा सदाके लिये भलीभाँति पूजन—स्वागत-सत्कार हो गया। तुमसे मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है’॥ ४०/

भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत्॥ ४१॥

दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवै:।

अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च॥ ४२॥

फिर श्रीरामने अपनी दोनों गोल-गोल भुजाओंसे गुहका अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा—‘गुह! सौभाग्यकी बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ। बताओ, तुम्हारे राज्यमें, मित्रोंके यहाँ तथा वनोंमें सर्वत्र कुशल तो है?॥ ४१-४२॥

यत् त्विदं भवता किंचित् प्रीत्या समुपकल्पितम्।

सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे॥ ४३॥

‘तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जानेकी आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरोंकी दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता—अपने उपयोगमें नहीं लाता॥

कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम्।

विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम्॥ ४४॥

‘वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल-मूलका आहार करता हूँ और धर्ममें स्थित रहकर तापसवेशमें वनके भीतर ही विचरता हूँ। इन दिनों तुम मुझे इसी नियममें स्थित जानो॥ ४४॥

अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित्।

एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजित:॥ ४५॥

‘इन सामग्रियोंमें जो घोड़ोंके खाने-पीनेकी वस्तु है, उसीकी इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तुकी नहीं। घोड़ोंको खिला-पिला देनेमात्रसे तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा॥ ४५॥

एते हि दयिता राज्ञ: पितुर्दशरथस्य मे।

एतै: सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चित:॥ ४६॥

‘ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथको बहुत प्रिय हैं। इनके खाने-पीनेका सुन्दर प्रबन्ध कर देनेसे मेरा भलीभाँति पूजन हो जायगा’॥ ४६॥

अश्वानां प्रतिपानं च खादनं चैव सोऽन्वशात्।

गुहस्तत्रैव पुरुषांस्त्वरितं दीयतामिति॥ ४७॥

तब गुहने अपने सेवकोंको उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ोंके खाने-पीनेके लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो॥ ४७॥

ततश्चीरोत्तरासङ्ग: संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्।

जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणेनाहृतं स्वयम्॥ ४८॥

तत्पश्चात् वल्कलका उत्तरीय-वस्त्र धारण करनेवाले श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना करके भोजनके नामपर स्वयं लक्ष्मणका लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया॥ ४८॥

तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मण:।

सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमुपाश्रित:॥ ४९॥

फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमिपर ही तृणकी शय्या बिछाकर सोये। उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणोंको धो-पोंछकर वहाँसे कुछ दूरपर हट आये और एक वृक्षका सहारा लेकर बैठ गये॥ ४९॥

गुहोऽपि सह सूतेन सौमित्रिमनुभाषयन्।

अन्वजाग्रत् ततो राममप्रमत्तो धनुर्धर:॥ ५०॥

गुह भी सावधानीके साथ धनुष धारण करके सुमन्त्रके साथ बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बातचीत करता हुआ श्रीरामकी रक्षाके लिये रातभर जागता रहा॥ ५०॥

तथा शयानस्य ततो यशस्विनो

मनस्विनो दाशरथेर्महात्मन:।

अदृष्टदु:खस्य सुखोचितस्य सा

तदा व्यतीता सुचिरेण शर्वरी॥ ५१॥

इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामकी, जिन्होंने कभी दु:ख नहीं देखा था तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य थे, वह रात उस समय (नींद न आनेके कारण) बहुत देरके बाद व्यतीत हुई॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाश: सर्ग:॥ ५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥

एकपञ्चाश: सर्ग:

निषादराज गुहके समक्ष लक्ष्मणका विलाप

तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम्।

गुह: संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

लक्ष्मणको अपने भाईके लिये स्वाभाविक अनुरागसे जागते देख निषादराज गुहको बड़ा संताप हुआ। उसने रघुकुलनन्दन लक्ष्मणसे कहा—॥ १॥

इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।

प्रत्याश्वसिहि साध्वस्यां राजपुत्र यथासुखम्॥ २॥

‘तात! राजकुमार! तुम्हारे लिये यह आराम देनेवाली शय्या तैयार है, इसपर सुखपूर्वक सोकर भलीभाँति विश्राम कर लो॥ २॥

उचितोऽयं जन: सर्व: क्लेशानां त्वं सुखोचित:।

गुप्त्यर्थं जागरिष्याम: काकुत्स्थस्य वयं निशाम्॥ ३॥

‘यह (मैं) सेवक तथा इसके साथके सब लोग वनवासी होनेके कारण सब प्रकारके क्लेश सहन करनेके योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहनेका अभ्यास है), परंतु तुम सुखमें ही पले हो, अत: उसीके योग्य हो (इसलिये सो जाओ)। हम सब लोग श्रीरामचन्द्रजीकी रक्षाके लिये रातभर जागते रहेंगे॥ ३॥

नहि रामात् प्रियतमो ममास्ते भुवि कश्चन।

ब्रवीम्येव च ते सत्यं सत्येनैव च ते शपे॥ ४॥

‘मैं सत्यकी ही शपथ खाकर तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस भूतलपर मुझे श्रीरामसे बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है॥ ४॥

अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद् यश:।

धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च पुष्कलौ॥ ५॥

‘इन श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे ही मैं इस लोकमें महान् यश, विपुल धर्म-लाभ तथा प्रचुर अर्थ एवं भोग्य वस्तु पानेकी आशा करता हूँ॥ ५॥

सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया।

रक्षिष्यामि धनुष्पाणि: सर्वथा ज्ञातिभि: सह॥ ६॥

‘अत: मैं अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ हाथमें धनुष लेकर सीतासहित सोये हुए प्रियसखा श्रीरामकी सब प्रकारसे रक्षा करूँगा॥ ६॥

न मेऽस्त्यविदितं किंचिद् वनेऽस्म‌िंश्चरत: सदा।

चतुरङ्गं ह्यतिबलं सुमहत् संतरेमहि॥ ७॥

‘इस वनमें सदा विचरते रहनेके कारण मुझसे यहाँकी कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ शत्रुकी अत्यन्त शक्तिशालिनी विशाल चतुरङ्गिणी सेनाको भी अनायास ही जीत लेंगे’॥ ७॥

लक्ष्मणस्तु तदोवाच रक्ष्यमाणास्त्वयानघ।

नात्र भीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता॥ ८॥

कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।

शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितं वा सुखानि वा॥ ९॥

यह सुनकर लक्ष्मणने कहा—‘निष्पाप निषादराज! तुम धर्मपर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो, इसलिये इस स्थानपर हम सब लोगोंके लिये कोई भय नहीं है। फिर भी जब महाराज दशरथके ज्येष्ठ पुत्र सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन-धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ८-९॥

यो न देवासुरै: सर्वै: शक्य: प्रसहितुं युधि।

तं पश्य सुखसंसुप्तं तृणेषु सह सीतया॥ १०॥

‘देखो! सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें जिनके वेगको नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीताके साथ तिनकोंके ऊपर सुखसे सो रहे हैं॥ १०॥

यो मन्त्रतपसा लब्धो विविधैश्च पराक्रमै:।

एको दशरथस्यैष पुत्र: सदृशलक्षण:॥ ११॥

अस्मिन् प्रव्रजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।

विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति॥ १२॥

‘गायत्री आदि मन्त्रोंके जप, कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तप तथा नाना प्रकारके पराक्रम (यज्ञानुष्ठान आदि प्रयत्न) करनेसे जो महाराज दशरथको अपने समान उत्तम लक्षणोंसे युक्त ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीरामके वनमें आ जानेसे अब राजा दशरथ अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेंगे। जान पड़ता है, निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी॥ ११-१२॥

विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरता: स्त्रिय:।

निर्घोषोपरतं तात मन्ये राजनिवेशनम्॥ १३॥

‘तात! रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोरसे आर्तनाद करके अधिक श्रमके कारण अब चुप हो गयी होंगी। मैं समझता हूँ, राजभवनका हाहाकार और चीत्कार अब शान्त हो गया होगा॥ १३॥

कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम।

नाशंसे यदि जीवन्ति सर्वे ते शर्वरीमिमाम्॥ १४॥

‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आजकी राततक जीवित रहेंगे या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता॥ १४॥

जीवेदपि हि मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया।

तद् दु:खं यदि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति॥ १५॥

‘शत्रुघ्नकी बाट देखनेके कारण सम्भव है मेरी माता जीवित रह जाय, परंतु यदि वीरजननी कौसल्या श्रीरामके विरहमें नष्ट हो जायँगी तो यह हमलोगोंके लिये बड़े दु:खकी बात होगी॥ १५॥

अनुरक्तजनाकीर्णा सुखालोकप्रियावहा।

राजव्यसनसंसृष्टा सा पुरी विनशिष्यति॥ १६॥

‘जिसमें श्रीरामके अनुरागी मनुष्य भरे हुए हैं तथा जो सदा सुखका दर्शनरूप प्रिय वस्तुकी प्राप्ति करानेवाली रही है, वह अयोध्यापुरी राजा दशरथके निधनजनित दु:खसे युक्त होकर नष्ट हो जायगी॥ १६॥

कथं पुत्रं महात्मानं ज्येष्ठपुत्रमपश्यत:।

शरीरं धारयिष्यन्ति प्राणा राज्ञो महात्मन:॥ १७॥

‘अपने ज्येष्ठ पुत्र महात्मा श्रीरामको न देखनेपर महामना राजा दशरथके प्राण उनके शरीरमें कैसे टिके रह सकेंगे॥ १७॥

विनष्टे नृपतौ पश्चात् कौसल्या विनशिष्यति।

अनन्तरं च मातापि मम नाशमुपैष्यति॥ १८॥

‘महाराजके नष्ट होनेपर देवी कौसल्या भी नष्ट हो जायँगी। तदनन्तर मेरी माता सुमित्रा भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेंगी॥ १८॥

अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।

राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥ १९॥

‘(महाराजकी इच्छा थी कि श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथको न पाकर श्रीरामको राज्यपर स्थापित किये बिना ही ‘हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया, नष्ट हो गया’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे॥ १९॥

सिद्धार्था: पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते।

प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति राघवम्॥ २०॥

‘उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता रघुकुलशिरोमणि दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं॥ २०॥

रम्यचत्वरसंस्थानां संविभक्तमहापथाम्।

हर्म्यप्रासादसम्पन्नां गणिकावरशोभिताम्॥ २१॥

रथाश्वगजसम्बाधां तूर्यनादनिनादिताम्।

सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्॥ २२॥

आरामोद्यानसम्पन्नां समाजोत्सवशालिनीम्।

सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम॥ २३॥

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे विभूषित तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥ २१—२३॥

अपि जीवेद् दशरथो वनवासात् पुनर्वयम्।

प्रत्यागम्य महात्मानमपि पश्याम सुव्रतम्॥ २४॥

‘क्या मेरे पिता महाराज दशरथ हमलोगोंके लौटनेतक जीवित रहेंगे? क्या वनवाससे लौटकर उन उत्तम व्रतधारी महात्माका हम फिर दर्शन कर सकेंगे?॥

अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम्।

निवृत्ते वनवासेऽस्मिन्नयोध्यां प्रविशेमहि॥ २५॥

‘क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर हमलोग सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ कुशलपूर्वक अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे?’॥ २५॥

परिदेवयमानस्य दु:खार्तस्य महात्मन:।

तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत॥ २६॥

इस प्रकार दु:खसे आर्त होकर विलाप करते हुए महामना राजकुमार लक्ष्मणको वह सारी रात जागते ही बीती॥ २६॥

तथा हि सत्यं ब्रुवति प्रजाहिते

नरेन्द्रसूनौ गुरुसौहृदाद् गुह:।

मुमोच बाष्पं व्यसनाभिपीडितो

ज्वरातुरो नाग इव व्यथातुर:॥ २७॥

प्रजाके हितमें संलग्न रहनेवाले राजकुमार लक्ष्मण जब बड़े भाईके प्रति सौहार्दवश उपर्युक्तरूपसे यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उसे सुनकर निषादराज गुह दु:खसे पीडि़त हो उठा और व्यथासे व्याकुल हो ज्वरसे आतुर हुए हाथीकी भाँति आँसू बहाने लगा॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकपञ्चाश: सर्ग:॥ ५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥

 

द्विपञ्चाश: सर्ग:

श्रीरामकी आज्ञासे गुहका नाव मँगाना, श्रीरामका सुमन्त्रको समझा-बुझाकर अयोध्यापुरी लौट जानेके लिये आज्ञा देना और माता-पिता आदिसे कहनेके लिये संदेश सुनाना, सुमन्त्रके वनमें ही चलनेके लिये आग्रह करनेपर श्रीरामका उन्हें युक्तिपूर्वक समझाकर लौटनेके लिये विवश करना, फिर तीनोंका नावपर बैठना,सीताकी गङ्गाजीसे प्रार्थना, नावसे पार उतरकर श्रीराम आदिका वत्सदेशमें पहुँचना और सायंकालमें एक वृक्षके नीचे रहनेके लिये जाना

प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशा:।

उवाच राम: सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ १॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा।

असौ सुकृष्णो विहग: कोकिलस्तात कूजति॥ २॥

‘तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी। अब सूर्योदयका समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त काले रंगका पक्षी कोकिल कुहू-कुहू बोल रहा है॥ २॥

बर्हिणानां च निर्घोष: श्रूयते नदतां वने।

तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम्॥ ३॥

‘वनमें अव्यक्त शब्द करनेवाले मयूरोंकी केका वाणी भी सुनायी देती है; अत: सौम्य! अब हमें तीव्र गतिसे बहनेवाली समुद्रगामिनी गङ्गाजीके पार उतरना चाहिये’॥

विज्ञाय रामस्य वच: सौमित्रिर्मित्रनन्दन:।

गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रत:॥ ४॥

मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके कथनका अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्रको बुलाकर पार उतरनेकी व्यवस्था करनेके लिये कहा और स्वयं वे भाईके सामने आकर खड़े हो गये॥

स तु रामस्य वचनं निशम्य प्रतिगृह्य च।

स्थपतिस्तूर्णमाहूय सचिवानिदमब्रवीत्॥ ५॥

श्रीरामचन्द्रजीका वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराजने तुरंत अपने सचिवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा—॥ ५॥

अस्यवाहनसंयुक्तां कर्णग्राहवतीं शुभाम्।

सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहर॥ ६॥

‘तुम घाटपर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होनेके साथ ही सुगमतापूर्वक खेनेयोग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखनेमें सुन्दर हो’॥ ६॥

तं निशम्य गुहादेशं गुहामात्यो गतो महान्।

उपोह्य रुचिरां नावं गुहाय प्रत्यवेदयत्॥ ७॥

निषादराज गुहका वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाटपर पहुँचाकर उसने गुहको इसकी सूचना दी॥ ७॥

तत: स प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो राघवमब्रवीत्।

उपस्थितेयं नौर्देव भूय: किं करवाणि ते॥ ८॥

तब गुहने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘देव! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ?॥ ८॥

तवामरसुतप्रख्य तर्तुं सागरगामिनीम्।

नौरियं पुरुषव्याघ्र शीघ्रमारोह सुव्रत॥ ९॥

‘देवकुमारके समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम! समुद्रगामिनी गङ्गानदीको पार करनेके लिये आपकी सेवामें यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इसपर आरूढ़ होइये’॥ ९॥

अथोवाच महातेजा रामो गुहमिदं वच:।

कृतकामोऽस्मि भवता शीघ्रमारोप्यतामिति॥ १०॥

तब महातेजस्वी श्रीराम गुहसे इस प्रकार बोले—‘सखे! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नावपर चढ़ाओ’॥ १०॥

तत: कलापान् संनह्य खड्गौ बध्वा च धन्विनौ।

जग्मतुर्येन तां गङ्गां सीतया सह राघवौ॥ ११॥

यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मणने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्गसे सब लोग घाटपर जाया करते थे, उसीसे सीताके साथ गङ्गाजीके तटपर गये॥ ११॥

राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत्।

किमहं करवाणीति सूत: प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ १२॥

उस समय धर्मके ज्ञाता भगवान् श्रीरामके पास जाकर सारथि सुमन्त्रने विनीतभावसे हाथ जोड़कर पूछा—‘प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ १२॥

ततोऽब्रवीद् दाशरथि: सुमन्त्रं

स्पृशन् करेणोत्तमदक्षिणेन।

सुमन्त्र शीघ्रं पुनरेव याहि

राज्ञ: सकाशे भव चाप्रमत्त:॥ १३॥

तब दशरथनन्दन श्रीरामने सुमन्त्रको उत्तम दाहिने हाथसे स्पर्श करते हुए कहा—‘सुमन्त्रजी! अब आप शीघ्र ही पुन: महाराजके पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये’॥ १३॥

निवर्तस्वेत्युवाचैनमेतावद्धि कृतं मम।

रथं विहाय पद‍्भ्यां तु गमिष्यामो महावनम्॥ १४॥

उन्होंने फिर कहा—‘इतनी दूरतक महाराजकी आज्ञासे मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वनकी यात्रा करेंगे; अत: आप लौट जाइये’॥ १४॥

आत्मानं त्वभ्यनुज्ञातमवेक्ष्यार्त: स सारथि:।

सुमन्त्र: पुरुषव्याघ्रमैक्ष्वाकमिदमब्रवीत्॥ १५॥

अपनेको घर लौटनेकी आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोकसे व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ १५॥

नातिक्रान्तमिदं लोके पुरुषेणेह केनचित्।

तव सभ्रातृभार्यस्य वास: प्राकृतवद् वने॥ १६॥

‘रघुनन्दन! जिसकी प्रेरणासे आपको भाई और पत्नीके साथ साधारण मनुष्योंकी भाँति वनमें रहनेको विवश होना पड़ा है, उस दैवका इस संसारमें किसी भी पुरुषने उल्लङ्घन नहीं किया॥ १६॥

न मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदय:।

मार्दवार्जवयोर्वापि त्वां चेद् व्यसनमागतम्॥ १७॥

‘जब आप-जैसे महान् पुरुषपर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य-पालन, वेदोंके स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलतामें भी किसी फलकी सिद्धि नहीं है॥ १७॥

सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन्।

त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रींल्लोकांस्तु जयन्निव॥ १८॥

‘वीर रघुनन्दन! (इस प्रकार पिताके सत्यकी रक्षाके लिये) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें निवास करते हुए आप तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायणकी भाँति उत्कर्ष (महान् यश) प्राप्त करेंगे॥ १८॥

वयं खलु हता राम ये त्वया ह्युपवञ्चिता:।

कैकेय्या वशमेष्याम: पापाया दु:खभागिन:॥ १९॥

‘श्रीराम! निश्चय ही हमलोग हर तरहसे मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियोंको अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुखसे वञ्चित कर दिया। अब हम पापिनी कैकेयीके वशमें पड़ेंगे और दु:ख भोगते रहेंगे’॥ १९॥

इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्र: सारथिस्तदा।

दृष्ट्वा दूरगतं रामं दु:खार्तो रुरुदे चिरम्॥ २०॥

आत्माके समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जानेको उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दु:खसे व्याकुल होकर देरतक रोते रहे॥ २०॥

ततस्तु विगते बाष्पे सूतं स्पृष्ट्वोदकं शुचिम्।

रामस्तु मधुरं वाक्यं पुन: पुनरुवाच तम्॥ २१॥

आँसुओंका प्रवाह रुकनेपर आचमन करके पवित्र हुए सारथिसे श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार मधुर वाणीमें कहा—॥ २१॥

इक्ष्वाकूणां त्वया तुल्यं सुहृदं नोपलक्षये।

यथा दशरथो राजा मां न शोचेत् तथा कुरु॥ २२॥

‘सुमन्त्रजी! मेरी दृष्टिमें इक्ष्वाकुवंशियोंका हित करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथको मेरे लिये शोक न हो॥ २२॥

शोकोपहतचेताश्च वृद्धश्च जगतीपति:।

कामभारावसन्नश्च तस्मादेतद् ब्रवीमि ते॥ २३॥

‘पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोकसे पीडि़त है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभालके लिये कहता हूँ॥ २३॥

यद् यथा ज्ञापयेत् किंचित् स महात्मा महीपति:।

कैकेय्या: प्रियकामार्थं कार्यं तदविकांक्षया॥ २४॥

‘वे महामनस्वी महाराज कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें—यही मेरा अनुरोध है॥ २४॥

एतदर्थं हि राज्यानि प्रशासति नराधिपा:।

यदेषां सर्वकृत्येषु मनो न प्रतिहन्यते॥ २५॥

‘राजालोग इसीलिये राज्यका पालन करते हैं कि किसी भी कार्यमें इनके मनकी इच्छा-पूर्तिमें विघ्न न डाला जाय॥ २५॥

यद् यथा स महाराजो नालीकमधिगच्छति।

न च ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा॥ २६॥

‘सुमन्त्रजी! जिस किसी भी कार्यमें जिस किसी तरह भी महाराजको अप्रिय बातसे खिन्न होनेका अवसर न आवे तथा वे शोकसे दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये॥ २६॥

अदृष्टदु:खं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम्।

ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वच:॥ २७॥

‘जिन्होंने कभी दु:ख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराजको मेरी ओरसे प्रणाम करके यह बात कहियेगा॥ २७॥

न चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो न च शोचति।

अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा॥ २८॥

‘हमलोग अयोध्यासे निकल गये अथवा हमें वनमें रहना पड़ेगा, इस बातको लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मणको ही इसका शोक है॥ २८॥

चतुर्दशसु वर्षेषु निवृत्तेषु पुन: पुन:।

लक्ष्मणं मां च सीतां च द्रक्ष्यसे शीघ्रमागतान्॥ २९॥

‘चौदह वर्ष समाप्त होनेपर हम पुन: शीघ्र ही लौट आयँगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मणको और सीताको भी फिर देखेंगे॥ २९॥

एवमुक्त्वा तु राजानं मातरं च सुमन्त्र मे।

अन्याश्च देवी: सहिता: कैकेयीं च पुन: पुन:॥ ३०॥

‘सुमन्त्रजी! महाराजसे ऐसा कहकर आप मेरी मातासे, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों (माताओं) से तथा कैकेयीसे भी बारंबार मेरा कुशल-समाचार कहियेगा॥ ३०॥

आरोग्यं ब्रूहि कौसल्यामथ पादाभिवन्दनम्।

सीताया मम चार्यस्य वचनाल्लक्ष्मणस्य च॥ ३१॥

‘माता कौसल्यासे कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है। इसके बाद सीताकी ओरसे, मुझ ज्येष्ठ पुत्रकी ओरसे तथा लक्ष्मणकी ओरसे भी माताकी चरणवन्दना कह दीजियेगा॥ ३१॥

ब्रूयाश्चापि महाराजं भरतं क्षिप्रमानय।

आगतश्चापि भरत: स्थाप्यो नृपमते पदे॥ ३२॥

‘तदनन्तर मेरी ओरसे महाराजसे भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरतको शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायँ, तब अपने अभीष्ट युवराजपदपर उनका अभिषेक कर दें॥ ३२॥

भरतं च परिष्वज्य यौवराज्येऽभिषिच्य च।

अस्मत्संतापजं दु:खं न त्वामभिभविष्यति॥ ३३॥

‘भरतको छातीसे लगाकर और युवराजके पदपर अभिषिक्त करके आपको हमलोगोंके वियोगसे होनेवाला दु:ख दबा नहीं सकेगा॥ ३३॥

भरतश्चापि वक्तव्यो यथा राजनि वर्तसे।

तथा मातृषु वर्तेथा: सर्वास्वेवाविशेषत:॥ ३४॥

‘भरतसे भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराजके प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूपसे सभी माताओंके प्रति होना चाहिये॥ ३४॥

यथा च तव कैकेयी सुमित्रा चाविशेषत:।

तथैव देवी कौसल्या मम माता विशेषत:॥ ३५॥

‘तुम्हारी दृष्टिमें कैकेयीका जो स्थान है, वही समानरूपसे सुमित्रा और मेरी माता कौसल्याका भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना॥ ३५॥

तातस्य प्रियकामेन यौवराज्यमवेक्षता।

लोकयोरुभयो: शक्यं नित्यदा सुखमेधितुम्॥ ३६॥

‘पिताजीका प्रिय करनेकी इच्छासे युवराजपदको स्वीकार करके यदि तुम राजकाजकी देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोकमें सदा ही सुख पाओगे’॥

निवर्त्यमानो रामेण सुमन्त्र: प्रतिबोधित:।

तत्सर्वं वचनं श्रुत्वा स्नेहात् काकुत्स्थमब्रवीत्॥ ३७॥

श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीरामसे स्नेहपूर्वक बोले—॥ ३७॥

यदहं नोपचारेण ब्रूयां स्नेहादविक्लवम्।

भक्तिमानिति तत् तावद् वाक्यं त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ ३८॥

कथं हि त्वद्विहीनोऽहं प्रतियास्यामि तां पुरीम्।

तव तात वियोगेन पुत्रशोकातुरामिव॥ ३९॥

‘तात! सेवकका स्वामीके प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुखसे स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोगसे पुत्रशोकसे आतुर हुई माताकी भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरीमें मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा? ॥ ३८-३९॥

सराममपि तावन्मे रथं दृष्ट्वा तदा जन:।

विना रामं रथं दृष्ट्वा विदीर्येतापि सा पुरी॥ ४०॥

‘आते समय लोगोंने मेरे रथमें श्रीरामको विराजमान देखा था, अब इस रथको श्रीरामसे रहित देखकर उन लोगोंका और उस अयोध्यापुरीका भी हृदय विदीर्ण हो जायगा॥ ४०॥

दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम्।

सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे॥ ४१॥

‘जैसे युद्धमें अपने स्वामी वीर रथीके मारे जानेपर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथको देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्थामें पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथको आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशाको प्राप्त हो जायगी॥ ४१॥

दूरेऽपि निवसन्तं त्वां मानसेनाग्रत: स्थितम्।

चिन्तयन्तोऽद्य नूनं त्वां निराहारा: कृता: प्रजा:॥ ४२॥

‘आप दूर रहकर भी प्रजाके हृदयमें निवास करनेके कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं। निश्चय ही इस समय प्रजावर्गके सब लोगोंने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा॥ ४२॥

दृष्टं तद् वै त्वया राम यादृशं त्वत्प्रवासने।

प्रजानां संकुलं वृत्तं त्वच्छोकक्लान्तचेतसाम्॥ ४३॥

‘श्रीराम! जिस समय आप वनको आने लगे, उस समय आपके शोकसे व्याकुलचित्त हुई प्रजाने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था॥ ४३॥

आर्तनादो हि य: पौरैरुन्मुक्तस्त्वत्प्रवासने।

सरथं मां निशाम्यैव कुर्यु: शतगुणं तत:॥ ४४॥

‘आपके अयोध्यासे निकलते समय पुरवासियोंने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे॥

अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया।

नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति॥ ४५॥

असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम्।

कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वच:॥ ४६॥

‘क्या मैं महारानी कौसल्यासे जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटेको मामाके घर पहुँचा दिया है? इसलिये आप संताप न करें, यह बात प्रिय होनेपर भी असत्य है, अत: ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता। फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्रको वनमें पहुँचा आया॥ ४५-४६॥

मम तावन्नियोगस्थास्त्वद्बन्धुजनवाहिन:।

कथं रथं त्वया हीनं प्रवाह्यन्ति हयोत्तमा:॥ ४७॥

‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञाके अधीन रहकर आपके बन्धुजनोंका भार वहन करते हैं (आपके बन्धुजनोंसे हीन रथका ये वहन नहीं करते हैं), ऐसी दशामें आपसे सूने रथको ये कैसे खींच सकेंगे?॥ ४७॥

तन्न शक्ष्याम्यहं गन्तुमयोध्यां त्वदृतेऽनघ।

वनवासानुयानाय मामनुज्ञातुमर्हसि॥ ४८॥

‘अत: निष्पाप रघुनन्दन! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा। मुझे भी वनमें चलनेकी ही आज्ञा दीजिये॥ ४८॥

यदि मे याचमानस्य त्यागमेव करिष्यसि।

सरथोऽग्निं प्रवेक्ष्यामि त्यक्तमात्र इह त्वया॥ ४९॥

‘यदि इस तरह याचना करनेपर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा॥ ४९॥

भविष्यन्ति वने यानि तपोविघ्नकराणि ते।

रथेन प्रतिबाधिष्ये तानि सर्वाणि राघव॥ ५०॥

‘रघुनन्दन! वनमें आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथके द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा॥ ५०॥

त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्याकृतं सुखम्।

आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम्॥ ५१॥

‘श्रीराम! आपकी कृपासे मुझे आपको रथपर बिठाकर यहाँतक लानेका सुख प्राप्त हुआ। अब आपके ही अनुग्रहसे मैं आपके साथ वनमें रहनेका सुख भी पानेकी आशा करता हूँ॥ ५१॥

प्रसीदेच्छामि तेऽरण्ये भवितुं प्रत्यनन्तर:।

प्रीत्याभिहितमिच्छामि भव मे प्रत्यनन्तर:॥ ५२॥

‘आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये। मैं वनमें आपके पास ही रहना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वनमें मेरे साथ ही रहो॥ ५२॥

इमेऽपि च हया वीर यदि ते वनवासिन:।

परिचर्यां करिष्यन्ति प्राप्स्यन्ति परमां गतिम्॥ ५३॥

‘वीर! ये घोड़े भी यदि वनमें रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी॥ ५३॥

तव शुश्रूषणं मूर्ध्ना करिष्यामि वने वसन्।

अयोध्यां देवलोकं वा सर्वथा प्रजहाम्यहम्॥ ५४॥

‘प्रभो! मैं वनमें रहकर अपने सिरसे (सारे शरीरसे) आपकी सेवा करूँगा और इस सुखके आगे अयोध्या तथा देवलोकका भी सर्वथा त्याग कर दूँगा॥

नहि शक्या प्रवेष्टुं सा मयायोध्या त्वया विना।

राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा॥ ५५॥

‘जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्रकी राजधानी स्वर्गमें नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरीमें नहीं जा सकता॥ ५५॥

वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैष हि मनोरथ:।

यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरीं पुन:॥ ५६॥

‘मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवासकी अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथपर बिठाकर आपको अयोध्यापुरीमें ले चलूँ॥ ५६॥

चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने।

क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा॥ ५७॥

‘वनमें आपके साथ रहनेसे ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणोंके समान बीत जायँगे। अन्यथा चौदह सौ वर्षोंके समान भारी जान पड़ेंगे॥ ५७॥

भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि।

भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या न मा त्वं हातुमर्हसि॥ ५८॥

‘अत: भक्तवत्सल! आप मेरे स्वामीके पुत्र हैं। आप जिस पथपर चल रहे हैं, उसीपर आपकी सेवाके लिये साथ चलनेको मैं भी तैयार खड़ा हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादाके भीतर स्थित हूँ; अत: आप मेरा परित्याग न करें’॥ ५८॥

एवं बहुविधं दीनं याचमानं पुन: पुन:।

रामो भृत्यानुकम्पी तु सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥ ५९॥

इस तरह अनेक प्रकारसे दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्रसे सेवकोंपर कृपा करनेवाले श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ ५९॥

जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल।

शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमित:॥ ६०॥

‘सुमन्त्रजी! आप स्वामीके प्रति स्नेह रखनेवाले हैं। मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्यके लिये मैं आपको यहाँसे अयोध्यापुरीमें भेज रहा हूँ, उसे सुनिये॥ ६०॥

नगरीं त्वां गतं दृष्ट्वा जननी मे यवीयसी।

कैकेयी प्रत्ययं गच्छेदिति रामो वनं गत:॥ ६१॥

‘जब आप नगरको लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयीको यह विश्वास हो जायगा कि राम वनको चले गये॥ ६१॥

विपरीते तुष्टिहीना वनवासं गते मयि।

राजानं नातिशङ्केत मिथ्यावादीति धार्मिकम्॥ ६२॥

‘इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा। मेरे वनवासी हो जानेपर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथके प्रति मिथ्यावादी होनेका संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता॥ ६२॥

एष मे प्रथम: कल्पो यदम्बा मे यवीयसी।

भरतारक्षितं स्फीतं पुत्रराज्यमवाप्स्यते॥ ६३॥

‘आपको भेजनेमें मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरतद्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्यको हस्तगत कर ले॥ ६३॥

मम प्रियार्थं राज्ञश्च सुमन्त्र त्वं पुरीं व्रज।

संदिष्टश्चापि यानर्थांस्तांस्तान् ब्रूयास्तथा तथा॥ ६४॥

‘सुमन्त्रजी! मेरा तथा महाराजका प्रिय करनेके लिये आप अयोध्यापुरीको अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगोंसे कह दीजिये’॥ ६४॥

इत्युक्त्वा वचनं सूतं सान्त्वयित्वा पुन: पुन:।

गुहं वचनमक्लीबो रामो हेतुमदब्रवीत्॥ ६५॥

ऐसा कहकर श्रीरामने सुमन्त्रको बारंबार सान्त्वना दी। इसके बाद उन्होंने गुहसे उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही—॥ ६५॥

नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने।

अवश्यमाश्रमे वास: कर्तव्यस्तद्गतो विधि:॥ ६६॥

‘निषादराज गुह! इस समय मेरे लिये ऐसे वनमें रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपदके लोगोंका आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वनके आश्रममें ही वास करना होगा। इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधिका मुझे पालन करना चाहिये॥

सोऽहं गृहीत्वा नियमं तपस्विजनभूषणम्।

हितकाम: पितुर्भूय: सीताया लक्ष्मणस्य च॥ ६७॥

जटा: कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोधक्षीरमानय।

तत्क्षीरं राजपुत्राय गुह: क्षिप्रमुपाहरत्॥ ६८॥

‘अत: फल-मूलका आहार और पृथ्वीपर शयन आदि नियमोंको ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मणकी अनुमति लेकर पिताका हित करनेकी इच्छासे सिरपर तपस्वी जनोंके आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँसे वनको जाऊँगा। मेरे केशोंको जटाका रूप देनेके लिये तुम बड़का दूध ला दो।’ गुहने तुरंत ही बड़का दूध लाकर श्रीरामको दिया॥ ६७-६८॥

लक्ष्मणस्यात्मनश्चैव रामस्तेनाकरोज्जटा:।

दीर्घबाहुर्नरव्याघ्रो जटिलत्वमधारयत्॥ ६९॥

श्रीरामने उसके द्वारा लक्ष्मणकी तथा अपनी जटाएँ बनायीं। महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये॥ ६९॥

तौ तदा चीरसम्पन्नौ जटामण्डलधारिणौ।

अशोभेतामृषिसमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ ७०॥

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियोंके समान शोभा पाने लगे॥ ७०॥

ततो वैखानसं मार्गमास्थित: सहलक्ष्मण:।

व्रतमादिष्टवान् राम: सहायं गुहमब्रवीत्॥ ७१॥

तदनन्तर वानप्रस्थमार्गका आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने वानप्रस्थोचित व्रतको ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुहसे बोले—॥ ७१॥

अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा।

भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम्॥ ७२॥

‘निषादराज! तुम सेना, खजाना, किला और राज्यके विषयमें सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्यकी रक्षाका काम बड़ा कठिन माना गया है’॥ ७२॥

ततस्तं समनुज्ञाप्य गुहमिक्ष्वाकुनन्दन:।

जगाम तूर्णमव्यग्र: सभार्य: सहलक्ष्मण:॥ ७३॥

गुहको इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मणके साथ तुरंत ही वहाँसे चल दिये। उस समय उनके चित्तमें तनिक भी व्यग्रता नहीं थी॥ ७३॥

स तु दृष्ट्वा नदीतीरे नावमिक्ष्वाकुनन्दन:।

तितीर्षु: शीघ्रगां गङ्गामिदं वचनमब्रवीत्॥ ७४॥

नदीके तटपर लगी हुई नावको देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामने शीघ्रगामी गङ्गानदीके पार जानेकी इच्छासे लक्ष्मणको सम्बोधित करके कहा—॥ ७४॥

आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनै:।

सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम्॥ ७५॥

‘पुरुषसिंह! यह सामने नाव खड़ी है। तुम मनस्विनी सीताको पकड़कर धीरेसे उसपर बिठा दो, फिर स्वयं भी नावपर बैठ जाओ’॥ ७५॥

स भ्रातु: शासनं श्रुत्वा सर्वमप्रतिकूलयन्।

आरोप्य मैथिलीं पूर्वमारुरोहात्मवांस्तत:॥ ७६॥

भाईका यह आदेश सुनकर मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने पूर्णत: उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीताको नावपर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए॥ ७६॥

अथारुरोह तेजस्वी स्वयं लक्ष्मणपूर्वज:।

ततो निषादाधिपतिर्गुहो ज्ञातीनचोदयत्॥ ७७॥

सबके अन्तमें लक्ष्मणके बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौकापर बैठे। तदनन्तर निषादराज गुहने अपने भाई-बन्धुओंको नौका खेनेका आदेश दिया॥ ७७॥

राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां तत:।

ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मन:॥ ७८॥

महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नावपर आरूढ़ होनेके पश्चात् अपने हितके उद्देश्यसे ब्राह्मण और क्षत्रियके जपनेयोग्य ‘दैवी नाव’ इत्यादि वैदिक मन्त्रका जप करने लगे॥ ७८॥

आचम्य च यथाशास्त्रं नदीं तां सह सीतया।

प्रणमत्प्रीतिसंतुष्टो लक्ष्मणश्च महारथ:॥ ७९॥

फिर शास्त्रविधिके अनुसार आचमन करके सीताके साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजीको प्रणाम किया। महारथी लक्ष्मणने भी उन्हें मस्तक झुकाया॥ ७९॥

अनुज्ञाय सुमन्त्रं च सबलं चैव तं गुहम्।

आस्थाय नावं रामस्तु चोदयामास नाविकान्॥ ८०॥

इसके बाद श्रीरामने सुमन्त्रको तथा सेनासहित गुहको भी जानेकी आज्ञा दे नावपर भलीभाँति बैठकर मल्लाहोंको उसे चलानेका आदेश दिया॥ ८०॥

ततस्तैश्चालिता नौका कर्णधारसमाहिता।

शुभस्फ्यवेगाभिहता शीघ्रं सलिलमत्यगात्॥ ८१॥

तदनन्तर मल्लाहोंने नाव चलायी। कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था। वेगसे सुन्दर डाँड़ चलानेके कारण वह नाव बड़ी तेजीसे पानीपर बढ़ने लगी॥ ८१॥

मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता।

वैदेही प्राञ्जलिर्भूत्वा तां नदीमिदमब्रवीत्॥ ८२॥

भागीरथीकी बीच धारामें पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीताने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे यह प्रार्थना की—॥ ८२॥

पुत्रो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमत:।

निदेशं पालयत्वेनं गङ्गे त्वदभिरक्षित:॥ ८३॥

‘देवि गङ्गे! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथके पुत्र हैं और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वनमें जा रहे हैं। ये आपसे सुरक्षित होकर पिताकी इस आज्ञाका पालन कर सकें—ऐसी कृपा कीजिये॥ ८३॥

चतुर्दश हि वर्षाणि समग्राण्युष्य कानने।

भ्रात्रा सह मया चैव पुन: प्रत्यागमिष्यति॥ ८४॥

‘वनमें पूरे चौदह वर्षोंतक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाईके साथ पुन: अयोध्यापुरीको लौटेंगे॥ ८४॥

ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता।

यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी॥ ८५॥

‘सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे! उस समय वनसे पुन: कुशलपूर्वक लौटनेपर सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी पूजा करूँगी॥ ८५॥

त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे।

भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे॥ ८६॥

‘स्वर्ग, भूतल और पाताल—तीनों मार्गोंपर विचरनेवाली देवि! तुम यहाँसे ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोकमें समुद्रराजकी पत्नीके रूपमें दिखायी देती हो॥ ८६॥

सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि च शोभने।

प्राप्तराज्ये नरव्याघ्रे शिवेन पुनरागते॥ ८७॥

‘शोभाशालिनी देवि! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुन: वनसे सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं सीता पुन: आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी॥ ८७॥

गवां शतसहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम्।

ब्राह्मणेभ्य: प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया॥ ८८॥

‘इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ब्राह्मणोंको एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी॥ ८८॥

सुराघटसहस्रेण मांसभूतौदनेन च।

यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरीं पुनरुपागता॥ ८९॥

‘देवि! पुन: अयोध्यापुरीमें लौटनेपर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थोंसे तथा राजकीय भागसे रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्नके द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी। आप मुझपर प्रसन्न हों48॥ ८९॥

यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि च सन्ति हि।

तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि च॥ ९०॥

‘आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी॥ ९०॥

पुनरेव महाबाहुर्मया भ्रात्रा च संगत:।

अयोध्यां वनवासात् तु प्रविशत्वनघोऽनघे॥ ९१॥

‘निष्पाप गङ्गे! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भाईके साथ वनवाससे लौटकर पुन: अयोध्या नगरीमें प्रवेश करें’॥ ९१॥

तथा सम्भाषमाणा सा सीता गङ्गामनिन्दिता।

दक्षिणा दक्षिणं तीरं क्षिप्रमेवाभ्युपागमत्॥ ९२॥

पतिके अनुकूल रहनेवाली सती-साध्वी सीता इस प्रकार गङ्गाजीसे प्रार्थना करती हुई शीघ्र ही दक्षिणतटपर जा पहुँचीं॥ ९२॥

तीरं तु समनुप्राप्य नावं हित्वा नरर्षभ:।

प्रातिष्ठत सह भ्रात्रा वैदेह्या च परंतप:॥ ९३॥

किनारे पहुँचकर शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ श्रीरामने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीताके साथ आगेको प्रस्थान किया॥ ९३॥

अथाब्रवीन्महाबाहु: सुमित्रानन्दवर्धनम्।

भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा॥ ९४॥

अवश्यं रक्षणं कार्यं मद्विधैर्विजने वने।

अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु॥ ९५॥

पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन्।

अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ॥ ९६॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे बोले—‘सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वनमें सीताकी रक्षाके लिये सावधान हो जाओ। हम-जैसे लोगोंको निर्जन वनमें नारीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अत: तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर! हमलोगोंको एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये॥ ९४—९६॥

न हि तावदतिक्रान्तासुकरा काचन क्रिया।

अद्य दु:खं तु वैदेही वनवासस्य वेत्स्यति॥ ९७॥

‘अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है—इस समयसे ही कठिनाइयोंका सामना आरम्भ हुआ है। आज विदेहकुमारी सीताको वनवासके वास्तविक कष्टका अनुभव होगा॥ ९७॥

प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम्।

विषमं च प्रपातं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति॥ ९८॥

‘अब ये ऐसे वनमें प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्योंके आने-जानेका कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदिके खेत होंगे, न टहलनेके लिये बगीचे। जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरनेका भय रहेगा’॥ ९८॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रतस्थे लक्ष्मणोऽग्रत:।

अनन्तरं च सीताया राघवो रघुनन्दन:॥ ९९॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े। उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीताके पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे॥ ९९॥

गतं तु गङ्गापरपारमाशु

रामं सुमन्त्र: सततं निरीक्ष्य।

अध्वप्रकर्षाद् विनिवृत्तदृष्टि-

र्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी॥ १००॥

श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजीके उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वनके मार्गमें बहुत दूर निकल जानेके कारण वे दृष्टिसे ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्रके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ १००॥

स लोकपालप्रतिमप्रभाव-

स्तीर्त्वा महात्मा वरदो महानदीम्।

तत: समृद्धान् शुभसस्यमालिन:

क्रमेण वत्सान् मुदितानुपागमत्॥ १०१॥

लोकपालोंके समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गाको पार करके क्रमश: समृद्धिशाली वत्सदेश (प्रयाग)-में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्यसे सम्पन्न था। वहाँके लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट थे॥ १०१॥

तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान्

वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम्।

आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ

वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम्॥ १०२॥

वहाँ उन दोनों भाइयोंने मृगया-विनोदके लिये वराह, ऋष्य, पृषत् और महारुरु—इन चार महामृगोंपर बाणोंका प्रहार किया। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकालके समय ठहरनेके लिये (वे सीताजीके साथ) एक वृक्षके नीचे चले गये॥ १०२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग:॥ ५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

 

त्रिपञ्चाश: सर्ग:

श्रीरामका राजाको उपालम्भ देते हुए कैकेयीसे कौसल्या आदिके अनिष्टकी आशङ्का बताकर लक्ष्मणको अयोध्या लौटानेके लिये प्रयत्न करना, लक्ष्मणका श्रीरामके बिना अपना जीवन असम्भव बताकर वहाँ जानेसे इनकार करना, फिर श्रीरामका उन्हें वनवासकी अनुमति देना

स तं वृक्षं समासाद्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्।

रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम्॥ १॥

उस वृक्षके नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना करके लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहि:।

या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि॥ २॥

‘सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपदसे बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है; जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं। इस रातको पाकर तुम्हें नगरकी सुख-सुविधाओंके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥ २॥

जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु।

योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयो:॥ ३॥

‘लक्ष्मण! आजसे हम दोनों भाइयोंको आलस्य छोड़कर रातमें जागना होगा; क्योंकि सीताके योगक्षेम हम दोनोंके ही अधीन हैं॥ ३॥

रात्रिं कथंचिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे।

अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितै:॥ ४॥

‘सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तोंकी शय्या बनाकर उसे भूमिपर बिछाकर उसपर किसी तरह सो लेंगे’॥ ४॥

स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचित:।

इमा: सौमित्रये रामो व्याजहार कथा: शुभा:॥ ५॥

जो बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य थे, वे श्रीराम भूमिपर ही बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे ये शुभ बातें कहने लगे—49॥ ५॥

ध्रुवमद्य महाराजो दु:खं स्वपिति लक्ष्मण।

कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति॥ ६॥

‘लक्ष्मण! आज महाराज निश्चय ही बड़े दु:खसे सो रहे होंगे; परंतु कैकेयी सफलमनोरथ होनेके कारण बहुत संतुष्ट होगी॥ ६॥

सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात्।

अपि न च्यावयेत् प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम्॥ ७॥

‘कहीं ऐसा न हो कि रानी कैकेयी भरतको आया देख राज्यके लिये महाराजको प्राणोंसे भी वियुक्त कर दे॥ ७॥

अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृत:।

किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागत:॥ ८॥

‘महाराजका कोई रक्षक न होनेके कारण वे इस समय अनाथ हैं, बूढ़े हैं और उन्हें मेरे वियोगका सामना करना पड़ा है। उनकी कामना मनमें ही रह गयी तथा वे कैकेयीके वशमें पड़ गये हैं; ऐसी दशामें वे बेचारे अपनी रक्षाके लिये क्या करेंगे?॥ ८॥

इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम्।

काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मति:॥ ९॥

‘अपने ऊपर आये हुए इस संकटको और राजाकी मतिभ्रान्तिको देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि अर्थ और धर्मकी अपेक्षा कामका ही गौरव अधिक है॥ ९॥

को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदाया: कृते त्यजेत्।

छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण॥ १०॥

‘लक्ष्मण! पिताजीने जिस तरह मुझे त्याग दिया है, उस प्रकार अत्यन्त अज्ञ होनेपर भी कौन ऐसा पुरुष होगा, जो एक स्त्रीके लिये अपने आज्ञाकारी पुत्रका परित्याग कर दे?॥ १०॥

सुखी बत सुभार्यश्च भरत: केकयीसुत:।

मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत्॥ ११॥

‘कैकेयीकुमार भरत ही सुखी और सौभाग्यवती स्त्रीके पति हैं, जो अकेले ही हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए कोसलदेशका सम्राट्की भाँति पालन करेंगे॥ ११॥

स हि राज्यस्य सर्वस्य सुखमेकं भविष्यति।

ताते तु वयसातीते मयि चारण्यमाश्रिते॥ १२॥

‘पिताजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और मैं वनमें चला आया हूँ, ऐसी दशामें केवल भरत ही समस्त राज्यके श्रेष्ठ सुखका उपभोग करेंगे॥ १२॥

अर्थधर्मौ परित्यज्य य: काममनुवर्तते।

एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा॥ १३॥

‘सच है, जो अर्थ और धर्मका परित्याग करके केवल कामका अनुसरण करता है, वह उसी प्रकार शीघ्र ही आपत्तिमें पड़ जाता है, जैसे इस समय महाराज दशरथ पड़े हैं॥ १३॥

मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च।

कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च॥ १४॥

‘सौम्य! मैं समझता हूँ कि महाराज दशरथके प्राणोंका अन्त करने, मुझे देशनिकाला देने और भरतको राज्य दिलानेके लिये ही कैकेयी इस राजभवनमें आयी थी॥ १४॥

अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता।

कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते॥ १५॥

‘इस समय भी सौभाग्यके मदसे मोहित हुई कैकेयी मेरे कारण कौसल्या और सुमित्राको कष्ट पहुँचा सकती है॥ १५॥

मातास्मत्कारणाद् देवी सुमित्रा दु:खमावसेत्।

अयोध्यामित एव त्वं काले प्रविश लक्ष्मण॥ १६॥

‘हमलोगोंके कारण तुम्हारी माता सुमित्रादेवीको बड़े दु:खके साथ वहाँ रहना पड़ेगा; अत: लक्ष्मण! तुम यहींसे कल प्रात:काल अयोध्याको लौट जाओ॥ १६॥

अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान्।

अनाथाया हि नाथस्त्वं कौसल्याया भविष्यसि॥ १७॥

‘मैं अकेला ही सीताके साथ दण्डकवनको जाऊँगा। तुम वहाँ मेरी असहाय माता कौसल्याके सहायक हो जाओगे॥ १७॥

क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेषादन्यायमाचरेत्।

परिदद्याद्धि धर्मज्ञ गरं ते मम मातरम्॥ १८॥

‘धर्मज्ञ लक्ष्मण! कैकेयीके कर्म बड़े खोटे हैं। वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है। तुम्हारी और मेरी माताको जहर भी दे सकती है॥ १८॥

नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रिय: पुत्रैर्वियोजिता:।

जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम्॥ १९॥

‘तात सुमित्राकुमार! निश्चय ही पूर्वजन्ममें मेरी माताने कुछ स्त्रियोंका उनके पुत्रोंसे वियोग कराया होगा, उसी पापका यह पुत्र-बिछोहरूप फल आज उन्हें प्राप्त हुआ है॥ १९॥

मया हि चिरपुष्टेन दु:खसंवर्धितेन च।

विप्रयुज्यत कौसल्या फलकाले धिगस्तु माम्॥ २०॥

‘मेरी माताने चिरकालतक मेरा पालन-पोषण किया और स्वयं दु:ख सहकर मुझे बड़ा किया। अब जब पुत्रसे प्राप्त होनेवाले सुखरूपी फलके भोगनेका अवसर आया, तब मैंने माता कौसल्याको अपनेसे बिलग कर दिया। मुझे धिक्कार है!॥ २०॥

मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम्।

सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम्॥ २१॥

‘सुमित्रानन्दन! कोई भी सौभाग्यवती स्त्री कभी ऐसे पुत्रको जन्म न दे, जैसा मैं हूँ; क्योंकि मैं अपनी माताको अनन्त शोक दे रहा हूँ॥ २१॥

मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण सारिका।

यत्तस्या: श्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश॥ २२॥

‘लक्ष्मण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि माता कौसल्यासे मुझसे अधिक प्रेम उनकी पाली हुई वह सारिका ही करती है; क्योंकि उसके मुखसे माँको सदा यह बात सुनायी देती है कि ‘ऐ तोते! तू शत्रुके पैरको काट खा’ (अर्थात् हमें पालनेवाली माता कौसल्याके शत्रुके पाँवको चोंच मार दे। वह पक्षिणी होकर माताका इतना ध्यान रखती है और मैं उनका पुत्र होकर भी उनके लिये कुछ नहीं कर पाता)॥ २२॥

शोचन्त्याश्चाल्पभाग्याया न किंचिदुपकुर्वता।

पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिंदम॥ २३॥

‘शत्रुदमन! जो मेरे लिये शोकमग्न रहती है, मन्दभागिनी-सी हो रही है और पुत्रका कोई फल न पानेके कारण निपूती-सी हो गयी है, उस मेरी माताको कुछ भी उपकार न करनेवाले मुझ-जैसे पुत्रसे क्या प्रयोजन है?॥ २३॥

अल्पभाग्या हि मे माता कौसल्या रहिता मया।

शेते परमदु:खार्ता पतिता शोकसागरे॥ २४॥

‘मुझसे बिछुड़ जानेके कारण माता कौसल्या वास्तवमें मन्दभागिनी हो गयी है और शोकके समुद्रमें पड़कर अत्यन्त दु:खसे आतुर हो उसीमें शयन करती है॥

एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।

तरेयमिषुभि: क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम्॥ २५॥

‘लक्ष्मण! यदि मैं कुपित हो जाऊँ तो अपने बाणोंद्वारा अकेला ही अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डलको निष्कण्टक बनाकर अपने अधिकारमें कर लूँ; परंतु पारलौकिक हित-साधनमें बल-पराक्रम कारण नहीं होता है (इसीलिये मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ।)॥ २५॥

अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ।

तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये॥ २६॥

‘निष्पाप लक्ष्मण! मैं अधर्म और परलोकके डरसे डरता हूँ; इसीलिये आज अयोध्याके राज्यपर अपना अभिषेक नहीं कराता हूँ’॥ २६॥

एतदन्यच्च करुणं विलप्य विजने बहु।

अश्रुपूर्णमुखो दीनो निशि तूष्णीमुपाविशत्॥ २७॥

यह तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर श्रीरामने उस निर्जन वनमें करुणाजनक विलाप किया। तत्पश्चात् वे उस रातमें चुपचाप बैठ गये। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और दीनता छा रही थी॥

विलापोपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम्।

समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मण:॥ २८॥

विलापसे निवृत्त होनेपर श्रीराम ज्वालारहित अग्नि और वेगशून्य समुद्रके समान शान्त प्रतीत होते थे। उस समय लक्ष्मणने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा—॥ २८॥

ध्रुवमद्य पुरी राम अयोध्याऽऽयुधिनां वर।

निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी॥ २९॥

‘अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आपके निकल आनेसे निश्चय ही आज अयोध्यापुरी चन्द्रहीन रात्रिके समान निस्तेज हो गयी॥ २९॥

नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यसे।

विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ॥ ३०॥

‘पुरुषोत्तम श्रीराम! आप जो इस तरह संतप्त हो रहे हैं, यह आपके लिये कदापि उचित नहीं है। आप ऐसा करके सीताको और मुझको भी खेदमें डाल रहे हैं॥ ३०॥

न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव।

मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्धृतौ॥ ३१॥

‘रघुनन्दन! आपके बिना सीता और मैं दोनों दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। ठीक उसी तरह, जैसे जलसे निकाले हुए मत्स्य नहीं जीते हैं॥ ३१॥

नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परंतप।

द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना॥ ३२॥

‘शत्रुओंको ताप देनेवाले रघुवीर! आपके बिना आज मैं न तो पिताजीको, न भाई शत्रुघ्नको, न माता सुमित्राको और न स्वर्गलोकको ही देखना चाहता हूँ’॥

ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम्।

न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ॥ ३३॥

तदनन्तर वहाँ बैठे हुए धर्मवत्सल सीता और श्रीरामने थोड़ी ही दूरपर वटवृक्षके नीचे लक्ष्मणद्वारा सुन्दर ढंगसे निर्मित हुई शय्या देखकर उसीका आश्रय लिया (अर्थात् वे दोनों वहाँ जाकर सो गये।)॥ ३३॥

स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो

निशम्य चैवं वनवासमादरात्।

समा: समस्ता विदधे परंतप:

प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघव:॥ ३४॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनाथजीने इस प्रकार वनवासके प्रति आदरपूर्वक कहे हुए लक्ष्मणके अत्यन्त उत्तम वचनोंको सुनकर स्वयं भी दीर्घकालके लिये वनवासरूप धर्मको स्वीकार करके सम्पूर्ण वर्षोंतक लक्ष्मणको अपने साथ वनमें रहनेकी अनुमति दे दी॥

ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ

महावने राघववंशवर्धनौ।

न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु-

र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ॥ ३५॥

तदनन्तर उस महान् निर्जन वनमें रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वे दोनों महाबली वीर पर्वतशिखरपर विचरनेवाले दो सिंहोंके समान कभी भय और उद्वेगको नहीं प्राप्त हुए॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाश: सर्ग:॥ ५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

 

चतु:पञ्चाश: सर्ग:

लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामका प्रयागमें गङ्गा-यमुना-संगमके समीप भरद्वाज-आश्रममें जाना, मुनिके द्वारा उनका अतिथिसत्कार, उन्हें चित्रकूट पर्वतपर ठहरनेका आदेश तथा चित्रकूटकी महत्ता एवं शोभाका वर्णन

ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनीं शुभाम्।

विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे॥ १॥

उस महान् वृक्षके नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकालमें उस स्थानसे आगेको प्रस्थित हुए॥ १॥

यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते।

जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम्॥ २॥

जहाँ भागीरथी गङ्गासे यमुना मिलती हैं, उस स्थानपर जानेके लिये वे महान् वनके भीतरसे होकर यात्रा करने लगे॥ २॥

ते भूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान्।

अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विन:॥ ३॥

वे तीनों यशस्वी यात्री मार्गमें जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकारके भू-भाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ ३॥

यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् द्रुमान्।

निर्वृत्तमात्रे दिवसे राम: सौमित्रिमब्रवीत्॥ ४॥

सुखपूर्वक आरामसे उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन तीनोंने फूलोंसे सुशोभित भाँति-भाँतिके वृक्षोंका दर्शन किया। इस प्रकार जब दिन प्राय: समाप्त हो चला, तब श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ ४॥

प्रयागमभित: पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम्।

अग्नेर्भगवत: केतुं मन्ये संनिहितो मुनि:॥ ५॥

‘सुमित्रानन्दन! वह देखो, प्रयागके पास भगवान् अग्निदेवकी ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं॥ ५॥

नूनं प्राप्ता: स्म सम्भेदं गङ्गायमुनयोर्वयम्।

तथाहि श्रूयते शब्दो वारिणोर्वारिघर्षज:॥ ६॥

‘निश्चय ही हमलोग गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके पास आ पहुँचे हैं; क्योंकि दो नदियोंके जलोंके परस्पर टकरानेसे जो शब्द प्रकट होता है, वह सुनायी दे रहा है॥ ६॥

दारूणि परिभिन्नानि वनजैरुपजीविभि:।

छिन्नाश्चाप्याश्रमे चैते दृश्यन्ते विविधा द्रुमा:॥ ७॥

‘वनमें उत्पन्न हुए फल-मूल और काष्ठ आदिसे जीविका चलानेवाले लोगोंने जो लकडि़याँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकडि़याँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकारके वृक्ष भी आश्रमके समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं’॥ ७॥

धन्विनौ तौ सुखं गत्वा लम्बमाने दिवाकरे।

गङ्गायमुनयो: संधौ प्रापतुर्निलयं मुने:॥ ८॥

इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते-होते गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके समीप मुनिवर भरद्वाजके आश्रमपर जा पहुँचे॥ ८॥

रामस्त्वाश्रममासाद्य त्रासयन् मृगपक्षिण:।

गत्वा मुहूर्तमध्वानं भरद्वाजमुपागमत्॥ ९॥

श्रीरामचन्द्रजी आश्रमकी सीमामें पहुँचकर अपने धनुर्धर वेशके द्वारा वहाँके पशु-पक्षियोंको डराते हुए दो ही घड़ीमें तै करनेयोग्य मार्गसे चलकर भरद्वाज मुनिके समीप जा पहुँचे॥ ९॥

ततस्त्वाश्रममासाद्य मुनेर्दर्शनकांक्षिणौ।

सीतयानुगतौ वीरौ दूरादेवावतस्थतु:॥ १०॥

आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये॥

स प्रविश्य महात्मानमृषिं शिष्यगणैर्वृतम्।

संशितव्रतमेकाग्रं तपसा लब्धचक्षुषम्॥ ११॥

हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभाग: कृताञ्जलि:।

राम: सौमित्रिणा सार्धं सीतया चाभ्यवादयत्॥ १२॥

(दूर खड़े हो महर्षिके शिष्यसे अपने आगमनकी सूचना दिलवाकर भीतर आनेकी अनुमति प्राप्त कर लेनेके बाद) पर्णशालामें प्रवेश करके उन्होंने तपस्याके प्रभावसे तीनों कालोंकी सारी बातें देखनेकी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेनेवाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्योंसे घिरे हुए आसनपर विराजमान थे। महर्षिको देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीरामने हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ११-१२॥

न्यवेदयत चात्मानं तस्मै लक्ष्मणपूर्वज:।

पुत्रौ दशरथस्यावां भगवन् रामलक्ष्मणौ॥ १३॥

भार्या ममेयं कल्याणी वैदेही जनकात्मजा।

मां चानुयाता विजनं तपोवनमनिन्दिता॥ १४॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया—‘भगवन्! हम दोनों राजा दशरथके पुत्र हैं। मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवनमें भी मेरा साथ देनेके लिये आयी हैं॥ १३-१४॥

पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुज: प्रिय:।

अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रत:॥ १५॥

‘पिताकी आज्ञासे मुझे वनकी ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वनमें ही रहनेका व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं॥ १५॥

पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम्।

धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशना:॥ १६॥

‘भगवन्! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे हम तीनों तपोवनमें जायँगे और वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए धर्मका ही आचरण करेंगे’॥ १६॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमत:।

उपानयत धर्मात्मा गामर्घ्यमुदकं तत:॥ १७॥

परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीरामका वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनिने उनके लिये आतिथ्य-सत्कारके रूपमें एक गौ तथा अर्घ्य-जल समर्पित किये॥ १७॥

नानाविधानन्नरसान् वन्यमूलफलाश्रयान्।

तेभ्यो ददौ तप्ततपा वासं चैवाभ्यकल्पयत्॥ १८॥

उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकारके अन्न, रस और जंगली फल-मूल प्रदान किये। साथ ही उनके ठहरनेके लिये स्थानकी भी व्यवस्था की॥ १८॥

मृगपक्षिभिरासीनो मुनिभिश्च समन्तत:।

राममागतमभ्यर्च्य स्वागतेनागतं मुनि:॥ १९॥

प्रतिगृह्य तु तामर्चामुपविष्टं स राघवम्।

भरद्वाजोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा॥ २०॥

महर्षिके चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके बीचमें वे विराजमान थे। उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथिरूपमें पधारे हुए श्रीरामका स्वागतपूर्वक सत्कार किया। उनके उस सत्कारको ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसनपर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजीने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा—॥

चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम्।

श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम्॥ २१॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रमपर दीर्घकालसे तुम्हारे शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ (आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है)। मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है॥ २१॥

अवकाशो विविक्तोऽयं महानद्यो: समागमे।

पुण्यश्च रमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम्॥ २२॥

‘गङ्गा और यमुना—इन दोनों महानदियोंके संगमके पासका यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है। यहाँकी प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अत: तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो’॥ २२॥

एवमुक्तस्तु वचनं भरद्वाजेन राघव:।

प्रत्युवाच शुभं वाक्यं राम: सर्वहिते रत:॥ २३॥

भरद्वाज मुनिके ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले रघुकुलनन्दन श्रीरामने इन शुभ वचनोंके द्वारा उन्हें उत्तर दिया—॥ २३॥

भगवन्नित आसन्न: पौरजानपदो जन:।

सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम्॥ २४॥

आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जन:।

अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये॥ २५॥

‘भगवन्! मेरे नगर और जनपदके लोग यहाँसे बहुत निकट पड़ते हैं, अत: मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रमपर मुझे और सीताको देखनेके लिये प्राय: आते-जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता॥

एकान्ते पश्य भगवन्नाश्रमस्थानमुत्तमम्।

रमते यत्र वैदेही सुखार्हा जनकात्मजा॥ २६॥

‘भगवन्! किसी एकान्त प्रदेशमें आश्रमके योग्य उत्तम स्थान देखिये (सोचकर बताइये), जहाँ सुख भोगनेके योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें’॥ २६॥

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरद्वाजो महामुनि:।

राघवस्य तु तद् वाक्यमर्थग्राहकमब्रवीत्॥ २७॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजीने उनके उक्त उद्देश्यकी सिद्धिका बोध करानेवाली बात कही—॥ २७॥

दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन् निवत्स्यसि।

महर्षिसेवित: पुण्य: पर्वत: शुभदर्शन:॥ २८॥

‘तात! यहाँसे दस कोस (अन्य व्याख्याके अनुसार ३० कोस)50 की दूरीपर एक सुन्दर और महर्षियोंद्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, जिसपर तुम्हें निवास करना होगा॥ २८॥

गोलाङ्गूलानुचरितो वानरर्क्षनिषेवित:।

चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसंनिभ:॥ २९॥

‘उसपर बहुत-से लंगूर विचरते रहते हैं। वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं। वह पर्वत चित्रकूट नामसे विख्यात है और गन्धमादनके समान मनोहर है॥

यावता चित्रकूटस्य नर: शृङ्गाण्यवेक्षते।

कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मन:॥ ३०॥

‘जब मनुष्य चित्रकूटके शिखरोंका दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मोंका फल पा लेता है और कभी पापमें मन नहीं लगाता है॥ ३०॥

ऋषयस्तत्र बहवो विहृत्य शरदां शतम्।

तपसा दिवमारूढा: कपालशिरसा सह॥ ३१॥

‘वहाँ बहुत-से ऋषि, जिनके सिरके बाल वृद्धावस्थाके कारण खोपड़ीकी भाँति सफेद हो गये थे, तपस्याद्वारा सैकड़ों वर्षोंतक क्रीड़ा करके स्वर्गलोकको चले गये हैं॥

प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवत: सुखम्।

इह वा वनवासाय वस राम मया सह॥ ३२॥

‘उसी पर्वतको मैं तुम्हारे लिये एकान्तवासके योग्य और सुखद मानता हूँ अथवा श्रीराम! तुम वनवासके उद्देश्यसे मेरे साथ इस आश्रमपर ही रहो’॥ ३२॥

स रामं सर्वकामैस्तं भरद्वाज: प्रियातिथिम्।

सभार्यं सह च भ्रात्रा प्रतिजग्राह हर्षयन्॥ ३३॥

ऐसा कहकर भरद्वाजजीने पत्नी और भ्रातासहित प्रिय अतिथि श्रीरामका हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा उन सबका आतिथ्यसत्कार किया॥ ३३॥

तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुष:।

प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्रा: कथयत: कथा:॥ ३४॥

प्रयागमें श्रीरामचन्द्रजी महर्षिके पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतनेमें ही पुण्यमयी रात्रिका आगमन हुआ॥ ३४॥

सीतातृतीय: काकुत्स्थ: परिश्रान्त: सुखोचित:।

भरद्वाजाश्रमे रम्ये तां रात्रिमवसत् सुखम्॥ ३५॥

वे सुख भोगनेयोग्य होनेपर भी परिश्रमसे बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनिके उस मनोहर आश्रममें श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की॥ ३५॥

प्रभातायां तु शर्वर्यां भरद्वाजमुपागमत्।

उवाच नरशार्दूलो मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ ३६॥

तदनन्तर जब रात बीती और प्रात:काल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेजवाले भरद्वाज मुनिके पास गये और बोले—॥ ३६॥

शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे।

उषिता: स्मोऽह वसतिमनुजानातु नो भवान्॥ ३७॥

‘भगवन्! आप स्वभावत: सत्य बोलनेवाले हैं। आज हमलोगोंने आपके आश्रममें बड़े आरामसे रात बितायी है, अब आप हमें आगेके गन्तव्य-स्थानपर जानेके लिये आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७॥

रात्र्यां तु तस्यां व्युष्टायां भरद्वाजोऽब्रवीदिदम्।

मधुमूलफलोपेतं चित्रकूटं व्रजेति ह॥ ३८॥

वासमौपयिकं मन्ये तव राम महाबल।

रात बीतने और सबेरा होनेपर श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजजीने कहा—‘महाबली श्रीराम! तुम मधुर फल-मूलसे सम्पन्न चित्रकूट पर्वतपर जाओ। मैं उसीको तुम्हारे लिये उपयुक्त निवासस्थान मानता हूँ॥

नानानगगणोपेत: किन्नरोरगसेवित:॥ ३९॥

मयूरनादाभिरतो गजराजनिषेवित:।

गम्यतां भवता शैलश्चित्रकूट: स विश्रुत:॥ ४०॥

‘वह सुविख्यात चित्रकूट पर्वत नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरा-भरा है। वहाँ बहुत-से किन्नर और सर्प निवास करते हैं। मोरोंके कलरवोंसे वह और भी रमणीय प्रतीत होता है। बहुत-से गजराज उस पर्वतका सेवन करते हैं। तुम वहीं चले जाओ॥ ३९-४०॥

पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुत:।

तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चैव हि॥ ४१॥

विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव।

सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान्।

चरत: सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव॥ ४२॥

‘वह पर्वत परम पवित्र, रमणीय तथा बहुसंख्यक फल-मूलोंसे सम्पन्न है। वहाँ झुंड-के-झुंड हाथी और हिरन वनके भीतर विचरते रहते हैं। रघुनन्दन! तुम उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे। मन्दाकिनी नदी, अनेकानेक जलस्रोत, पर्वतशिखर, गुफा, कन्दरा और झरने भी तुम्हारे देखनेमें आयेंगे। वह पर्वत सीताके साथ विचरते हुए तुम्हारे मनको आनन्द प्रदान करेगा॥ ४१-४२॥

प्रहृष्टकोयष्टिभकोकिलस्वनै-

र्विनोदयन्तं च सुखं परं शिवम्।

मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरै:

सुरम्यमासाद्य समावसाश्रयम्॥ ४३॥

‘हर्षमें भरे हुए टिट्टिभ और कोकिलोंके कलरवोंद्वारा वह पर्वत यात्रियोंका मनोरञ्जन-सा करता है। वह परम सुखद एवं कल्याणकारी है, मदमत्त मृगों और बहुसंख्यक मतवाले हाथियोंने उसकी रमणीयताको और बढ़ा दिया है। तुम उसी पर्वतपर जाकर डेरा डालो और उसमें निवास करो’॥ ४३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:पञ्चाश: सर्ग:॥ ५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥

पञ्चपञ्चाश: सर्ग:

भरद्वाजजीका श्रीराम आदिके लिये स्वस्तिवाचन करके उन्हें चित्रकूटका मार्ग बताना, उन सबका अपने ही बनाये हुए बेड़ेसे यमुनाजीको पार करना, सीताकी यमुना और श्यामवटसे प्रार्थना, तीनोंका यमुनाके किनारेके मार्गसे एक कोसतक जाकर वनमें घूमना-फिरना, यमुनाजीके समतल तटपर रात्रिमें निवास करना

उषित्वा रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ।

महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति॥ १॥

उस आश्रममें रातभर रहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों राजकुमार महर्षिको प्रणाम करके चित्रकूट पर्वतपर जानेको उद्यत हुए॥ १॥

तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षि: स चकार ह।

प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान्॥ २॥

उन तीनोंको प्रस्थान करते देख महर्षिने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंको यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है॥ २॥

तत: प्रचक्रमे वक्तुं वचनं स महामुनि:।

भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम्॥ ३॥

तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाजने सत्य पराक्रमी श्रीरामसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

गङ्गायमुनयो: संधिमासाद्य मनुजर्षभौ।

कालिन्दीमनुगच्छेतां नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम्॥ ४॥

‘नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुनाके संगमपर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुनाके निकट जाना॥ ४॥

अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्रोत:समागताम्।

तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव।

तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम्॥ ५॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर गङ्गाजीके जलके वेगसे अपने प्रवाहके प्रतिकूल दिशामें मुड़ी हुई यमुनाके पास पहुँचकर लोगोंके आने-जानेके कारण उनके पदचिह्नोंसे चिह्नित हुए अवतरण-प्रदेश (पार उतरनेके लिये उपयोगी घाट) को अच्छी तरह देख-भालकर वहाँ जाना और एक बेड़ा बनाकर उसीके द्वारा सूर्यकन्या यमुनाके उस पार उतर जाना॥ ५॥

ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम्।

परीतं बहुभिर्वृक्षै: श्यामं सिद्धोपसेवितम्॥ ६॥

तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम्।

समासाद्य च तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा॥ ५॥

‘तत्पश्चात् आगे जानेपर एक बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंगके हैं। वह चारों ओरसे बहुसंख्यक दूसरे वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है। उस वृक्षका नाम श्यामवट है। उसकी छायाके नीचे बहुत-से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्षसे आशीर्वादकी याचना करें। यात्रीकी इच्छा हो तो उस वृक्षके पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करे अथवा वहाँसे आगे बढ़ जाय॥ ६-७॥

क्रोशमात्रं ततो गत्वा नीलं प्रेक्ष्य च काननम्।

सल्लकीबदरीमिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनै:॥ ८॥

‘श्यामवटसे एक कोस दूर जानेपर तुम्हें नीलवनका दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी (चीड़) और बेरके भी पेड़ मिले हुए हैं। यमुनाके तटपर उत्पन्न हुए बाँसोंके कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है॥ ८॥

स पन्थाश्चित्रकूटस्य गतस्य बहुशो मया।

रम्यो मार्दवयुक्तश्च दावैश्चैव विवर्जित:॥ ९॥

‘यह वही स्थान है जहाँसे चित्रकूटको रास्ता जाता है। मैं उस मार्गसे कई बार गया हूँ। वहाँकी भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है। उधर कभी दावानलका भय नहीं होता है’॥ ९॥

इति पन्थानमादिश्य महर्षि: संन्यवर्तत।

अभिवाद्य तथेत्युक्त्वा रामेण विनिवर्तित:॥ १०॥

इस प्रकार मार्ग बताकर जब महर्षि भरद्वाज लौटने लगे, तब श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—‘अब आप आश्रमको लौट जाइये’॥ १०॥

उपावृत्ते मुनौ तस्मिन् रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

कृतपुण्या: स्म भद्रं ते मुनिर्यन्नोऽनुकम्पते॥ ११॥

उन महर्षिके लौट जानेपर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। ये मुनि हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता है कि हमलोगोंने पहले कभी महान् पुण्य किया है’॥

इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ।

सीतामेवाग्रत: कृत्वा कालिन्दीं जग्मतुर्नदीम्॥ १२॥

इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी पुरुषसिंह सीताको ही आगे करके यमुना नदीके तटपर गये॥ १२॥

अथासाद्य तु कालिन्दीं शीघ्रस्रोतस्विनीं नदीम्।

चिन्तामापेदिरे सद्यो नदीजलतितीर्षव:॥ १३॥

वहाँ कालिन्दीका स्रोत बड़ी तीव्रगतिसे प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्तामें पड़े कि कैसे नदीको पार किया जाय; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजीके जलको पार करना चाहते थे॥ १३॥

तौ काष्ठसंघाटमथो चक्रतु: सुमहाप्लवम्।

शुष्कैर्वंशै: समाकीर्णमुशीरैश्च समावृतम्॥ १४॥

ततो वैतसशाखाश्च जम्बुशाखाश्च वीर्यवान्।

चकार लक्ष्मणश्छित्त्वा सीताया: सुखमासनम्॥ १५॥

फिर उन दोनों भाइयोंने जंगलके सूखे काठ बटोरकर उन्हींके द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया। वह बेड़ा सूखे बाँसोंसे व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था। तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मणने बेंत और जामुनकी टहनियोंको काटकर सीताके बैठनेके लिये एक सुखद आसन तैयार किया॥ १४-१५॥

तत्र श्रियमिवाचिन्त्यां रामो दाशरथि: प्रियाम्।

ईषत्स लज्जमानां तामध्यारोपयत प्लवम्॥ १६॥

पार्श्वे तत्र च वैदेह्या वसने भूषणानि च।

प्लवे कठिनकाजं च रामश्चक्रे समाहित:॥ १७॥

दशरथनन्दन श्रीरामने लक्ष्मीके समान अचिन्त्य ऐश्वर्यवाली अपनी प्रिया सीताको जो कुछ लज्जित-सी हो रही थीं, उस बेड़ेपर चढ़ा दिया और उनके बगलमें वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; फिर श्रीरामने बड़ी सावधानीके साथ खन्ती (कुदारी) और बकरेके चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारीको भी बेड़ेपर ही रखा॥ १६-१७॥

आरोप्य सीतां प्रथमं संघाटं परिगृह्य तौ।

तत: प्रतेरतुर्यत्तौ प्रीतौ दशरथात्मजौ॥ १८॥

इस प्रकार पहले सीताको चढ़ाकर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उस बेड़ेको पकड़कर खेने लगे। उन्होंने बड़े प्रयत्न और प्रसन्नताके साथ नदीको पार करना आरम्भ किया॥ १८॥

कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवन्दत।

स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिर्व्रतम्॥ १९॥

यमुनाकी बीच धारामें आनेपर सीताने उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘देवि! इस बेड़े द्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ। आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमलोग सकुशल पार हो जायँ और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञाको निर्विघ्न पूर्ण करें॥ १९॥

यक्ष्ये त्वां गोसहस्रेण सुराघटशतेन च।

स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम्॥ २०॥

‘इक्ष्वाकुवंशी वीरोंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें श्रीरघुनाथजीके सकुशल लौट आनेपर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओंका दान करूँगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी’॥ २०॥

कालिन्दीमथ सीता तु याचमाना कृताञ्जलि:।

तीरमेवाभिसम्प्राप्ता दक्षिणं वरवर्णिनी॥ २१॥

इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजीसे प्रार्थना कर रही थीं, इतनेहीमें वे दक्षिण तटपर जा पहुँचीं॥

तत: प्लवेनांशुमतीं शीघ्रगामूर्मिमालिनीम्।

तीरजैर्बहुभिर्वृक्षै: संतेरुर्यमुनां नदीम्॥ २२॥

इस तरह उन तीनोंने उसी बेड़ेद्वारा बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षोंसे सुशोभित और तरङ्गमालाओंसे अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य-कन्या यमुना नदीको पार किया॥ २२॥

ते तीर्णा: प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात्।

श्यामं न्यग्रोधमासेदु: शीतलं हरितच्छदम्॥ २३॥

पार उतरकर उन्होंने बेड़ेको तो वहीं तटपर छोड़ दिया और यमुना-तटवर्ती वनसे प्रस्थान करके वे हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित शीतल छायावाले श्यामवटके पास जा पहुँचे॥ २३॥

न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत।

नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्व्रतम्॥ २४॥

वटके समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीताने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा—‘महावृक्ष! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवास-विषयक व्रतको पूर्ण करें॥ २४॥

कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम्।

इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी॥ २५॥

‘तथा हमलोग वनसे सकुशल लौटकर माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रादेवीका दर्शन कर सकें।’ इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीताने हाथ जोड़े हुए उस वृक्षकी परिक्रमा की॥ २५॥

अवलोक्य तत: सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम्।

दयितां च विधेयां च रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २६॥

सदा अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्राणप्यारी सती-साध्वी सीताको श्यामवटसे आशीर्वादकी याचना करती देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ २६॥

सीतामादाय गच्छ त्वमग्रतो भरतानुज।

पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सायुधो द्विपदां वर॥ २७॥

‘भरतके छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम सीताको साथ लेकर आगे-आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछेसे तुमलोगोंकी रक्षा करता हुआ चलूँगा॥ २७॥

यद् यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा।

तत् तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मन:॥ २८॥

‘विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो-जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तुको पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो’॥ २८॥

एकैकं पादपं गुल्मं लतां वा पुष्पशालिनीम्।

अदृष्टरूपां पश्यन्ती रामं पप्रच्छ साऽबला॥ २९॥

अबला सीता एक-एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहलेकी न देखी हुई पुष्पशोभित लताको देखकर उसके विषयमें श्रीरामचन्द्रजीसे पूछती थीं॥ २९॥

रमणीयान् बहुविधान् पादपान् कुसुमोत्करान्।

सीतावचनसंरब्ध आनयामास लक्ष्मण:॥ ३०॥

तथा लक्ष्मण सीताके कथनानुसार तुरंत ही भाँति-भाँतिके वृक्षोंकी मनोहर शाखाएँ और फूलोंके गुच्छे ला-लाकर उन्हें देते थे॥ ३०॥

विचित्रवालुकजलां हंससारसनादिताम्।

रेमे जनकराजस्य सुता प्रेक्ष्य तदा नदीम्॥ ३१॥

उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशिसे सुशोभित तथा हंस और सारसोंके कलनादसे मुखरित यमुना नदीको देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं॥ ३१॥

क्रोशमात्रं ततो गत्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनावने॥ ३२॥

इस तरह एक कोसकी यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण (प्राणियोंके हितके लिये) मार्गमें मिले हुए हिंसक पशुओंका वध करते हुए यमुना-तटवर्ती वनमें विचरने लगे॥ ३२॥

विहृत्य ते बर्हिणपूगनादिते

शुभे वने वारणवानरायुते।

समं नदीवप्रमुपेत्य सत्वरं

निवासमाजग्मुरदीनदर्शना: ॥ ३३॥

उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरोंके झुंडोंकी मीठी बोलीसे गूँजते तथा हाथियों और वानरोंसे भरे हुए उस सुन्दर वनमें घूम-फिरकर शीघ्र ही यमुनानदीके समतल तटपर आ गये और रातमें उन्होंने वहीं निवास किया॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चपञ्चाश: सर्ग:॥ ५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥

 

षट्पञ्चाश: सर्ग:

वनकी शोभा देखते-दिखाते हुए श्रीराम आदिका चित्रकूटमें पहुँचना, वाल्मीकिजीका दर्शन करके श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा पर्णशालाका निर्माण तथा उसकी वास्तुशान्ति करके उन सबका कुटीमें प्रवेश

अथ रात्र्यां व्यातीतायामवसुप्तमनन्तरम्।

प्रबोधयामास शनैर्लक्ष्मणं रघुपुङ्गव:॥ १॥

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर रघुकुल-शिरोमणि श्रीरामने अपने जागनेके बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मणको धीरेसे जगाया (और इस प्रकार कहा—)॥ १॥

सौमित्रे शृणु वन्यानां वल्गु व्याहरतां स्वनम्।

सम्प्रतिष्ठामहे काल: प्रस्थानस्य परंतप॥ २॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्राकुमार! मीठी बोली बोलनेवाले शुक-पिक आदि जंगली पक्षियोंका कलरव सुनो। अब हमलोग यहाँसे प्रस्थान करें; क्योंकि प्रस्थानके योग्य समय आ गया है’॥ २॥

प्रसुप्तस्तु ततो भ्रात्रा समये प्रतिबोधित:।

जहौ निद्रां च तन्द्रां च प्रसक्तं च परिश्रमम्॥ ३॥

सोये हुए लक्ष्मणने अपने बड़े भाईद्वारा ठीक समयपर जगा दिये जानेपर निद्रा, आलस्य तथा राह चलनेकी थकावटको दूर कर दिया॥ ३॥

तत उत्थाय ते सर्वे स्पृष्ट्वा नद्या: शिवं जलम्।

पन्थानमृषिभिर्जुष्टं चित्रकूटस्य तं ययु:॥ ४॥

फिर सब लोग उठे और यमुना नदीके शीतल जलमें स्नान आदि करके ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित चित्रकूटके उस मार्गपर चल दिये॥ ४॥

तत: सम्प्रस्थित: काले राम: सौमित्रिणा सह।

सीतां कमलपत्राक्षीमिदं वचनमब्रवीत्॥ ५॥

उस समय लक्ष्मणके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए श्रीरामने कमलनयनी सीतासे इस प्रकार कहा—॥ ५॥

आदीप्तानिव वैदेहि सर्वत: पुष्पितान् नगान्।

स्वै: पुष्पै: किंशुकान् पश्य मालिन: शिशिरात्यये॥ ६॥

‘विदेहराजनन्दिनी! इस वसन्त-ऋतुमें सब ओरसे खिले हुए इन पलाश-वृक्षोंको तो देखो। ये अपने ही पुष्पोंसे पुष्पमालाधारी-से प्रतीत होते हैं और उन फूलोंकी अरुण प्रभाके कारण प्रज्वलित होते-से दिखायी देते हैं॥ ६॥

पश्य भल्लातकान् बिल्वान् नरैरनुपसेवितान्।

फलपुष्पैरवनतान् नूनं शक्ष्याम जीवितुम्॥ ७॥

‘देखो, ये भिलावे और बेलके पेड़ अपने फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए हैं। दूसरे मनुष्योंका यहाँतक आना सम्भव न होनेसे ये उनके द्वारा उपयोगमें नहीं लाये गये हैं; अत: निश्चय ही इन फलोंसे हम जीवननिर्वाह कर सकेंगे’॥ ७॥

पश्य द्रोणप्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण।

मधूनि मधुकारीभि: सम्भृतानि नगे नगे॥ ८॥

(फिर लक्ष्मणसे कहा—) ‘लक्ष्मण! देखो, यहाँके एक-एक वृक्षमें मधुमक्खियोंद्वारा लगाये और पुष्ट किये गये मधुके छत्ते कैसे लटक रहे हैं। इन सबमें एक-एक द्रोण (लगभग सोलह सेर) मधु भरा हुआ है॥ ८॥

एष क्रोशति नत्यूहस्तं शिखी प्रतिकूजति।

रमणीये वनोद्देशे पुष्पसंस्तरसंकटे॥ ९॥

‘वनका यह भाग बड़ा ही रमणीय है, यहाँ फूलोंकी वर्षा-सी हो रही है और सारी भूमि पुष्पोंसे आच्छादित दिखायी देती है। इस वनप्रान्तमें यह चातक ‘पी कहाँ’ ‘पी कहाँ’ की रट लगा रहा है। उधर वह मोर बोल रहा है, मानो पपीहेकी बातका उत्तर दे रहा हो॥ ९॥

मातङ्गयूथानुसृतं पक्षिसंघानुनादितम्।

चित्रकूटमिमं पश्य प्रवृद्धशिखरं गिरिम्॥ १०॥

‘यह रहा चित्रकूट पर्वत—इसका शिखर बहुत ऊँचा है। झुंड-के-झुंड हाथी उसी ओर जा रहे हैं और वहाँ बहुत-से पक्षी चहक रहे हैं॥ १०॥

समभूमितले रम्ये द्रुमैर्बहुभिरावृते।

पुण्ये रंस्यामहे तात चित्रकूटस्य कानने॥ ११॥

‘तात! जहाँकी भूमि समतल है और जो बहुत-से वृक्षोंसे भरा हुआ है, चित्रकूटके उस पवित्र काननमें हमलोग बड़े आनन्दसे विचरेंगे’॥ ११॥

ततस्तौ पादचारेण गच्छन्तौ सह सीतया।

रम्यमासेदतु: शैलं चित्रकूटं मनोरमम्॥ १२॥

सीताके साथ दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पैदल ही यात्रा करते हुए यथासमय रमणीय एवं मनोरम पर्वत चित्रकूटपर जा पहुँचे॥ १२॥

तं तु पर्वतमासाद्य नानापक्षिगणायुतम्।

बहुमूलफलं रम्यं सम्पन्नसरसोदकम्॥ १३॥

वह पर्वत नाना प्रकारके पक्षियोंसे परिपूर्ण था। वहाँ फल-मूलोंकी बहुतायत थी और स्वादिष्ट जल पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध होता था। उस रमणीय शैलके समीप जाकर श्रीरामने कहा—॥ १३॥

मनोज्ञोऽयं गिरि: सौम्य नानाद्रुमलतायुत:।

बहुमूलफलो रम्य: स्वाजीव: प्रतिभाति मे॥ १४॥

‘सौम्य! यह पर्वत बड़ा मनोहर है। नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ फल-मूल भी बहुत हैं; यह रमणीय तो है ही। मुझे जान पड़ता है कि यहाँ बड़े सुखसे जीवन-निर्वाह हो सकता है॥ १४॥

मुनयश्च महात्मानो वसन्त्यस्मिन् शिलोच्चये।

अयं वासो भवेत् तात वयमत्र वसेमहि॥ १५॥

‘इस पर्वतपर बहुत-से महात्मा मुनि निवास करते हैं। तात! यही हमारा वासस्थान होनेयोग्य है। हम यहीं निवास करेंगे’॥ १५॥

इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलि:।

अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभिवादयन्॥ १६॥

ऐसा निश्चय करके सीता, श्रीराम और लक्ष्मणने हाथ जोड़कर महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें प्रवेश किया और सबने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया॥ १६॥

तान् महर्षि: प्रमुदित: पूजयामास धर्मवित्।

आस्यतामिति चोवाच स्वागतं तं निवेद्य च॥ १७॥

धर्मको जाननेवाले महर्षि उनके आगमनसे बहुत प्रसन्न हुए और ‘आपलोगोंका स्वागत है। आइये, बैठिये।’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका आदर-सत्कार किया॥ १७॥

ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्लक्ष्मणं लक्ष्मणाग्रज:।

संनिवेद्य यथान्यायमात्मानमृषये प्रभु:॥ १८॥

तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीरामने महर्षिको अपना यथोचित परिचय दिया और लक्ष्मणसे कहा—॥ १८॥

लक्ष्मणानय दारूणि दृढानि च वराणि च।

कुरुष्वावसथं सौम्य वासे मेऽभिरतं मन:॥ १९॥

‘सौम्य लक्ष्मण! तुम जंगलसे अच्छी-अच्छी मजबूत लकडि़याँ ले आओ और रहनेके लिये एक कुटी तैयार करो। यहीं निवास करनेको मेरा जी चाहता है’॥ १९॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सौमित्रिर्विविधान् द्रुमान्।

आजहार ततश्चक्रे पर्णशालामरिंदम:॥ २०॥

श्रीरामकी यह बात सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण अनेक प्रकारके वृक्षोंकी डालियाँ काट लाये और उनके द्वारा एक पर्णशाला तैयार की॥ २०॥

तां निष्ठितां बद्धकटां दृष्ट्वा राम: सुदर्शनाम्।

शुश्रूषमाणमेकाग्रमिदं वचनमब्रवीत्॥ २१॥

वह कुटी बाहर-भीतरसे लकड़ीकी ही दीवारसे सुस्थिर बनायी गयी थी और उसे ऊपरसे छा दिया गया था, जिससे वर्षा आदिका निवारण हो। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर लगती थी। उसे तैयार हुई देखकर एकाग्रचित्त होकर अपनी बात सुननेवाले लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ २१॥

ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम्।

कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभि:॥ २२॥

‘सुमित्राकुमार! हम गजकन्दका गूदा लेकर उसीसे पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे;51 क्योंकि दीर्घ जीवनकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको वास्तुशान्ति अवश्य करनी चाहिये॥ २२॥

मृगं हत्वाऽऽनय क्षिप्रं लक्ष्मणेह शुभेक्षण।

कर्तव्य: शास्त्रदृष्टो हि विधिर्धर्ममनुस्मर॥ २३॥

‘कल्याणदर्शी लक्ष्मण! तुम ‘गजकन्द’ नामक कन्दको52 उखाड़कर या खोदकर शीघ्र यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रोक्त विधिका अनुष्ठान हमारे लिये अवश्य-कर्तव्य है। तुम धर्मका ही सदा चिन्तन किया करो’॥ २३॥

भ्रातुर्वचनमाज्ञाय लक्ष्मण: परवीरहा।

चकार च यथोक्तं हि तं राम: पुनरब्रवीत्॥ २४॥

भाईकी इस बातको समझकर शत्रुवीरोंका वध करनेवाले लक्ष्मणने उनके कथनानुसार कार्य किया। तब श्रीरामने पुन: उनसे कहा—॥ २४॥

ऐणेयं श्रपयस्वैतच्छालां यक्ष्यामहे वयम्।

त्वर सौम्यमुहूर्तोऽयं ध्रुवश्च दिवसो ह्ययम्॥ २५॥

‘लक्ष्मण! इस गजकन्दको पकाओ। हम पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे। जल्दी करो। यह सौम्यमुहूर्त है और यह दिन भी ‘ध्रुव’53 संज्ञक है (अत: इसीमें यह शुभ कार्य होना चाहिये)’॥ २५॥

स लक्ष्मण: कृष्णमृगं हत्वा मेध्यं प्रतापवान्।

अथ चिक्षेप सौमित्रि: समिद्धे जातवेदसि॥ २६॥

प्रतापी सुमित्राकुमार लक्ष्मणने पवित्र और काले छिलकेवाले गजकन्दको उखाड़कर प्रज्वलित आगमें डाल दिया॥ २६॥

तत् तु पक्वं समाज्ञाय निष्टप्तं छिन्नशोणितम्।

लक्ष्मण: पुरुषव्याघ्रमथ राघवमब्रवीत्॥ २७॥

रक्तविकारका नाश करनेवाले54 उस गजकंदको भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मणने पुरुषसिंह श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ २७॥

अयं सर्व: समस्ताङ्ग: शृत: कृष्णमृगो मया।

देवता देवसंकाश यजस्व कुशलो ह्यसि॥ २८॥

‘देवोपम तेजस्वी श्रीरघुनाथजी! यह काले छिलकेवाला गजकन्द, जो बिगड़े हुए सभी अङ्गोंको ठीक करनेवाला है,55 मेरेद्वारा सम्पूर्णत: पका दिया गया है। अब आप वास्तुदेवताओंका यजन कीजिये; क्योंकि आप इस कर्ममें कुशल हैं॥ २८॥

राम: स्नात्वा तु नियतो गुणवाञ्जपकोविद:।

संग्रहेणाकरोत् सर्वान् मन्त्रान् सत्रावसानिकान्॥ २९॥

सद्गुणसम्पन्न तथा जपकर्मके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके शौच-संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक संक्षेपसे उन सभी मन्त्रोंका पाठ एवं जप किया, जिनसे वास्तुयज्ञकी पूर्ति हो जाती है॥ २९॥

इष्ट्वा देवगणान् सर्वान् विवेशावसथं शुचि:।

बभूव च मनोह्लादो रामस्यामिततेजस:॥ ३०॥

समस्त देवताओंका पूजन करके पवित्र भावसे श्रीरामने पर्णकुटीमें प्रवेश किया। उस समय अमित-तेजस्वी श्रीरामके मनमें बड़ा आह्लाद हुआ॥ ३०॥

वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च।

वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन्॥ ३१॥

तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव कर्म, रुद्रयाग तथा वैष्णवयाग करके श्रीरामने वास्तुदोषकी शान्तिके लिये मङ्गलपाठ किया॥ ३१॥

जपं च न्यायत: कृत्वा स्नात्वा नद्यां यथाविधि।

पापसंशमनं रामश्चकार बलिमुत्तमम्॥ ३२॥

नदीमें विधिपूर्वक स्नान करके न्यायत: गायत्री आदि मन्त्रोंका जप करनेके अनन्तर श्रीरामने पञ्चसूना आदि दोषोंकी शान्तिके लिये उत्तम बलिकर्म सम्पन्न किया॥ ३२॥

वेदिस्थलविधानानि चैत्यान्यायतनानि च।

आश्रमस्यानुरूपाणि स्थापयामास राघव:॥ ३३॥

रघुनाथजीने अपनी छोटी-सी कुटीके अनुरूप ही वेदिस्थलों (आठ दिक्पालोंके लिये बलि-समर्पणके स्थानों), चैत्यों (गणेश आदिके स्थानों) तथा आयतनों (विष्णु आदि देवोंके स्थानों) का निर्माण एवं स्थापना की॥ ३३॥

तां वृक्षपर्णच्छदनां मनोज्ञां

यथाप्रदेशं सुकृतां निवाताम्।

वासाय सर्वे विविशु: समेता:

सभां यथा देवगणा: सुधर्माम्॥ ३४॥

वह मनोहर कुटी उपयुक्त स्थानपर बनी थी। उसे वृक्षोंके पत्तोंसे छाया गया था और उसके भीतर प्रचण्ड वायुसे बचनेका पूरा प्रबन्ध था। सीता, लक्ष्मण और श्रीराम सबने एक साथ उसमें निवासके लिये प्रवेश किया। ठीक वैसे ही, जैसे देवतालोग सुधर्मा सभामें प्रवेश करते हैं॥ ३४॥

सुरम्यमासाद्य तु चित्रकूटं

नदीं च तां माल्यवतीं सुतीर्थाम्।

ननन्द हृष्टो मृगपक्षिजुष्टां

जहौ च दु:खं पुरविप्रवासात्॥ ३५॥

चित्रकूट पर्वत बड़ा ही रमणीय था। वहाँ उत्तम तीर्थों (तीर्थस्थान, सीढ़ी और घाटों) से सुशोभित माल्यवती (मन्दाकिनी) नदी बह रही थी, जिसका बहुत-से पशुपक्षी सेवन करते थे। उस पर्वत और नदीका सांनिध्य पाकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा हर्ष और आनन्द हुआ। वे नगरसे दूर वनमें आनेके कारण होनेवाले कष्टको भूल गये॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥

 


सप्तपञ्चाश: सर्ग:

सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना, उनके मुखसे श्रीरामका संदेश सुनकर पुरवासियोंका विलाप, राजा दशरथ और कौसल्याकी मूर्च्छा तथा अन्त:पुरकी रानियोंका आर्तनाद

कथयित्वा तु दु:खार्त: सुमन्त्रेण चिरं सह।

रामे दक्षिणकूलस्थे जगाम स्वगृहं गुह:॥ १॥

इधर, जब श्रीराम गङ्गाके दक्षिणतटपर उतर गये, तब गुह दु:खसे व्याकुल हो सुमन्त्रके साथ बड़ी देरतक बातचीत करता रहा। इसके बाद वह सुमन्त्रको साथ ले अपने घरको चला गया॥ १॥

भरद्वाजाभिगमनं प्रयागे च सभाजनम्।

आ गिरेर्गमनं तेषां तत्रस्थैरभिलक्षितम्॥ २॥

श्रीरामचन्द्रजीका प्रयागमें भरद्वाजके आश्रमपर जाना, मुनिके द्वारा सत्कार पाना तथा चित्रकूट पर्वतपर पहुँचना—ये सब वृत्तान्त शृङ्गवेरके निवासी गुप्तचरोंने देखे और लौटकर गुहको इन बातोंसे अवगत कराया॥ २॥

अनुज्ञात: सुमन्त्रोऽथ योजयित्वा हयोत्तमान्।

अयोध्यामेव नगरीं प्रययौ गाढदुर्मना:॥ ३॥

इन सब बातोंको जानकर सुमन्त्र गुहसे विदा ले अपने उत्तम घोड़ोंको रथमें जोतकर अयोध्याकी ओर ही लौट पड़े। उस समय उनके मनमें बड़ा दु:ख हो रहा था॥

स वनानि सुगन्धीनि सरितश्च सरांसि च।

पश्यन् यत्तो ययौ शीघ्रं ग्रामाणि नगराणि च॥ ४॥

वे मार्गमें सुगन्धित वनों, नदियों, सरोवरों, गाँवों और नगरोंको देखते हुए बड़ी सावधानीके साथ शीघ्रतापूर्वक जा रहे थे॥ ४॥

तत: सायाह्नसमये द्वितीयेऽहनि सारथि:।

अयोध्यां समनुप्राप्य निरानन्दां ददर्श ह॥ ५॥

शृङ्गवेरपुरसे लौटनेके दूसरे दिन सायंकालमें अयोध्या पहुँचकर उन्होंने देखा, सारी पुरी आनन्दशून्य हो गयी है॥ ५॥

स शून्यामिव नि:शब्दां दृष्ट्वा परमदुर्मना:।

सुमन्त्रश्चिन्तयामास शोकवेगसमाहत:॥ ६॥

वहाँ कहीं एक शब्द भी सुनायी नहीं देता था। सारी पुरी ऐसी नीरव थी, मानो मनुष्योंसे सूनी हो गयी हो। अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दु:ख हुआ। वे शोकके वेगसे पीडि़त हो इस प्रकार चिन्ता करने लगे—॥ ६॥

कच्चिन्न सगजा साश्वा सजना सजनाधिपा।

रामसंतापदु:खेन दग्धा शोकाग्निना पुरी॥ ७॥

‘कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीरामके विरहजनित संतापके दु:खसे व्यथित हो हाथी, घोड़े, मनुष्य और महाराजसहित सारी अयोध्यापुरी शोकाग्निसे दग्ध हो गयी हो’॥ ७॥

इति चिन्तापर: सूतो वाजिभि: शीघ्रयायिभि:।

नगरद्वारमासाद्य त्वरित: प्रविवेश ह॥ ८॥

इसी चिन्तामें पड़े हुए सारथि सुमन्त्रने शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा नगरद्वारपर पहुँचकर तुरंत ही पुरीके भीतर प्रवेश किया॥ ८॥

सुमन्त्रमभिधावन्त: शतशोऽथ सहस्रश:।

क्व राम इति पृच्छन्त: सूतमभ्यद्रवन् नरा:॥ ९॥

सुमन्त्रको देखकर सैकड़ों और हजारों पुरवासी मनुष्य दौड़े आये और ‘श्रीराम कहाँ हैं?’ यह पूछते हुए उनके रथके साथ-साथ दौड़ने लगे॥ ९॥

तेषां शशंस गङ्गायामहमापृच्छ्य राघवम्।

अनुज्ञातो निवृत्तोऽस्मि धार्मिकेण महात्मना॥ १०॥

ते तीर्णा इति विज्ञाय बाष्पपूर्णमुखा नरा:।

अहो धिगिति नि:श्वस्य हा रामेति विचुक्रुशु:॥ ११॥

उस समय सुमन्त्रने उन लोगोंसे कहा—‘सज्जनो! मैं गङ्गाजीके किनारेतक श्रीरघुनाथजीके साथ गया था। वहाँसे उन धर्मनिष्ठ महात्माने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। अत: मैं उनसे बिदा लेकर यहाँ लौट आया हूँ। ‘वे तीनों व्यक्ति गङ्गाके उस पार चले गये’ यह जानकर सब लोगोंके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह चलीं। ‘अहो! हमें धिक्कार है।’ ऐसा कहकर वे लंबी साँसें खींचते और ‘हा राम!’ की पुकार मचाते हुए जोर-जोरसे करुणक्रन्दन करने लगे॥ १०-११॥

शुश्राव च वचस्तेषां वृन्दं वृन्दं च तिष्ठताम्।

हता: स्म खलु ये नेह पश्याम इति राघवम्॥ १२॥

सुमन्त्रने उनकी बातें सुनीं। वे झुंड-के-झुंड खड़े होकर कह रहे थे—‘हाय! निश्चय ही हमलोग मारे गये; क्योंकि अब हम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीको नहीं देख पायँगे॥ १२॥

दानयज्ञविवाहेषु समाजेषु महत्सु च।

न द्रक्ष्याम: पुनर्जातु धार्मिकं राममन्तरा॥ १३॥

‘दान, यज्ञ, विवाह तथा बड़े-बड़े सामाजिक उत्सवोंके समय अब हम कभी धर्मात्मा श्रीरामको अपने बीचमें खड़ा हुआ नहीं देख सकेंगे॥ १३॥

किं समर्थं जनस्यास्य किं प्रियं किं सुखावहम्।

इति रामेण नगरं पित्रेव परिपालितम्॥ १४॥

‘अमुक पुरुषके लिये कौन-सी वस्तु उपयोगी है? क्या करनेसे उसका प्रिय होगा? और कैसे किस-किस वस्तुसे उसे सुख मिलेगा, इत्यादि बातोंका विचार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पिताकी भाँति इस नगरका पालन करते थे’॥ १४॥

वातायनगतानां च स्त्रीणामन्वन्तरापणम्।

राममेवाभितप्तानां शुश्राव परिदेवनाम्॥ १५॥

बाजारके बीचसे निकलते समय सारथिके कानोंमें स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनायी दी, जो महलोंकी खिड़कियोंमें बैठकर श्रीरामके लिये ही संतप्त हो विलाप कर रहीं थीं॥ १५॥

स राजमार्गमध्येन सुमन्त्र: पिहितानन:।

यत्र राजा दशरथस्तदेवोपययौ गृहम्॥ १६॥

राजमार्गके बीचसे जाते हुए सुमन्त्रने कपड़ेसे अपना मुँह ढक लिया। वे रथ लेकर उसी भवनकी ओर गये, जहाँ राजा दशरथ मौजूद थे॥ १६॥

सोऽवतीर्य रथाच्छीघ्रं राजवेश्म प्रविश्य च।

कक्ष्या: सप्ताभिचक्राम महाजनसमाकुला:॥ १७॥

राजमहलके पास पहुँचकर वे शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और भीतर प्रवेश करके बहुत-से मनुष्योंसे भरी हुई सात ड्योढि़योंको पार कर गये॥ १७॥

हर्म्यैर्विमानै: प्रासादैरवेक्ष्याथ समागतम्।

हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिता:॥ १८॥

धनियोंकी अट्टालिकाओं, सतमंजिले मकानों तथा राजभवनोंमें बैठी हुईं स्त्रियाँ सुमन्त्रको लौटा हुआ देख श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित होनेके दु:खसे दुर्बल हो हाहाकर कर उठीं॥ १८॥

आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतै: ।

अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततरा: स्त्रिय:॥ १९॥

उनके कज्जल आदिसे रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे। वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्तभावसे एक-दूसरीकी ओर देख रही थीं॥

ततो दशरथस्त्रीणां प्रासादेभ्यस्ततस्तत:।

रामशोकाभितप्तानां मन्दं शुश्राव जल्पितम्॥ २०॥

तदनन्तर राजमहलोंमें जहाँ-तहाँसे श्रीरामके शोकसे संतप्त हुई राजा दशरथकी रानियोंके मन्दस्वरमें कहे गये वचन सुनायी पड़े॥ २०॥

सह रामेण निर्यातो विना राममिहागत:।

सूत: किं नाम कौसल्यां क्रोशन्तीं प्रतिवक्ष्यति॥ २१॥

‘ये सारथि सुमन्त्र श्रीरामके साथ यहाँसे गये थे और उनके बिना ही यहाँ लौटे हैं, ऐसी दशामें करुण क्रन्दन करती हुई कौसल्याको ये क्या उत्तर देंगे?॥ २१॥

यथा च मन्ये दुर्जीवमेवं न सुकरं ध्रुवम्।

आच्छिद्य पुत्रे निर्याते कौसल्या यत्र जीवति॥ २२॥

‘मैं समझती हूँ, जैसे जीवन दु:खजनित है, निश्चय ही उसी प्रकार इसका नाश भी सुकर नहीं है; तभी तो न्यायत: प्राप्त हुए अभिषेकको त्यागकर पुत्रके वनमें चले जानेपर भी कौसल्या अभीतक जीवित हैं’॥ २२॥

सत्यरूपं तु तद् वाक्यं राजस्त्रीणां निशामयन्।

प्रदीप्त इव शोकेन विवेश सहसा गृहम्॥ २३॥

रानियोंकी वह सच्ची बात सुनकर शोकसे दग्ध-से होते हुए सुमन्त्रने सहसा राजभवनमें प्रवेश किया॥ २३॥

स प्रविश्याष्टमीं कक्ष्यां राजानं दीनमातुरम्।

पुत्रशोकपरिद्यूनमपश्यत् पाण्डुरे गृहे॥ २४॥

आठवीं ड्योढ़ीमें प्रवेश करके उन्होंने देखा, राजा एक श्वेत भवनमें बैठे और पुत्रशोकसे मलिन, दीन एवं आतुर हो रहे हैं॥ २४॥

अभिगम्य तमासीनं राजानमभिवाद्य च।

सुमन्त्रो रामवचनं यथोक्तं प्रत्यवेदयत्॥ २५॥

सुमन्त्रने वहाँ बैठे हुए महाराजके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं॥ २५॥

स तूष्णीमेव तच्छ्रुत्वा राजा विद्रुतमानस:।

मूर्च्छितो न्यपतद् भूमौ रामशोकाभिपीडित:॥ २६॥

राजाने चुपचाप ही वह सुन लिया, सुनकर उनका हृदय द्रवित (व्याकुल) हो गया। फिर वे श्रीरामके शोकसे अत्यन्त पीडि़त हो मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६॥

ततोऽन्त:पुरमाविद्धं मूर्च्छिते पृथिवीपतौ।

उच्छ्रित्य बाहू चुक्रोश नृपतौ पतिते क्षितौ॥ २७॥

महाराजके मूर्च्छित हो जानेपर सारा अन्त:पुर दु:खसे व्यथित हो उठा। राजाके पृथ्वीपर गिरते ही सब लोग दोनों बाहें उठाकर जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे॥ २७॥

सुमित्रया तु सहिता कौसल्या पतितं पतिम्।

उत्थापयामास तदा वचनं चेदमब्रवीत्॥ २८॥

उस समय कौसल्याने सुमित्राकी सहायतासे अपने गिरे हुए पतिको उठाया और इस प्रकार कहा—॥ २८॥

इमं तस्य महाभाग दूतं दुष्करकारिण:।

वनवासादनुप्राप्तं कस्मान्न प्रतिभाषसे॥ २९॥

‘महाभाग! ये सुमन्त्रजी दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामके दूत होकर—उनका संदेश लेकर वनवाससे लौटे हैं। आप इनसे बात क्यों नहीं करते हैं?॥ २९॥

अद्येममनयं कृत्वा व्यपत्रपसि राघव।

उत्तिष्ठ सुकृतं तेऽस्तु शोके न स्यात् सहायता॥ ३०॥

‘रघुनन्दन! पुत्रको वनवास दे देना अन्याय है। यह अन्याय करके आप लज्जित क्यों हो रहे हैं? उठिये, आपको अपने सत्यके पालनका पुण्य प्राप्त हो। जब आप इस तरह शोक करेंगे, तब आपके सहायकोंका समुदाय भी आपके साथ ही नष्ट हो जायगा॥ ३०॥

देव यस्या भयाद् रामं नानुपृच्छसि सारथिम्।

नेह तिष्ठति कैकेयी विश्रब्धं प्रतिभाष्यताम्॥ ३१॥

‘देव! आप जिसके भयसे सुमन्त्रजीसे श्रीरामका समाचार नहीं पूछ रहे हैं, वह कैकेयी यहाँ मौजूद नहीं है; अत: निर्भय होकर बात कीजिये’॥ ३१॥

सा तथोक्त्वा महाराजं कौसल्या शोकलालसा।

धरण्यां निपपाताशु बाष्पविप्लुतभाषिणी॥ ३२॥

महाराजसे ऐसा कहकर कौसल्याका गला भर आया। आँसुओंके कारण उनसे बोला नहीं गया और वे शोकसे व्याकुल होकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ ३२॥

विलपन्तीं तथा दृष्ट्वा कौसल्यां पतितां भुवि।

पतिं चावेक्ष्य ता: सर्वा: समन्ताद् रुरुदु: स्त्रिय:॥ ३३॥

इस प्रकार विलाप करती हुई कौसल्याको भूमिपर पड़ी देख और अपने पतिकी मूर्च्छित दशापर दृष्टिपात करके सभी रानियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं॥ ३३॥

ततस्तमन्त:पुरनादमुत्थितं

समीक्ष्य वृद्धास्तरुणाश्च मानवा:।

स्त्रियश्च सर्वा रुरुदु: समन्तत:

पुरं तदासीत् पुनरेव संकुलम्॥ ३४॥

अन्त:पुरसे उठे हुए उस आर्तनादको देख-सुनकर नगरके बूढ़े और जवान पुरुष रो पड़े। सारी स्त्रियाँ भी रोने लगीं। वह सारा नगर उस समय सब ओरसे पुन: शोकसे व्याकुल हो उठा॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

 

अष्टपञ्चाश: सर्ग:

महाराज दशरथकी आज्ञासे सुमन्त्रका श्रीराम और लक्ष्मणके संदेश सुनाना

प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृति:।

तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात्॥ १॥

मूर्च्छा दूर होनेपर जब राजाको चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीरामका वृत्तान्त सुननेके लिये सारथि सुमन्त्रको सामने बुलाया॥ १॥

तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थित:।

राममेवानुशोचन्तं दु:खशोकसमन्वितम्॥ २॥

उस समय सुमन्त्र श्रीरामके ही शोक और चिन्तामें निरन्तर डूबे रहनेवाले दु:ख-शोकसे व्याकुल महाराज दशरथके पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २॥

वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम्।

विनि:श्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम्॥ ३॥

राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम्।

अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत्॥ ४॥

जैसे जंगलसे तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराजका चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीरामके लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हींका ध्यान करते हुए अस्वस्थ-से हो गये थे। राजाने देखा, सारथिका सारा शरीर धूलसे भर गया है। यह सामने खड़ा है। इसके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है। उस अवस्थामें राजाने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा—॥

क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रित:।

सोऽत्यन्तसुखित: सूत किमशिष्यति राघव:॥ ५॥

‘सूत! धर्मात्मा श्रीराम वृक्षकी जड़का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुखमें पले थे, वे मेरे लाड़ले राम वहाँ क्या खायेंगे?॥ ५॥

दु:खस्यानुचितो दु:खं सुमन्त्र शयनोचित:।

भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत्॥ ६॥

‘सुमन्त्र! जो दु:ख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीरामको भारी दु:ख प्राप्त हुआ है। जो राजोचित शय्यापर शयन करनेयोग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथकी भाँति भूमिपर कैसे सोते होंगे?॥ ६॥

यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जरा:।

स वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रित:॥ ७॥

‘जिनके यात्रा करते समय पीछे-पीछे पैदलों, रथियों और हाथीसवारोंकी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वनमें पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे?॥

व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम्।

कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपाश्रितौ॥ ८॥

‘जहाँ अजगर और व्याघ्र-सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वनका आश्रय लेनेवाले मेरे दोनों कुमार सीताके साथ वहाँ कैसे रहेंगे?॥ ८॥

सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया।

राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद् गतौ॥ ९॥

‘सुमन्त्र! परम सुकुमारी तपस्विनी सीताके साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथसे उतरकर पैदल कैसे गये होंगे?॥ ९॥

सिद्धार्थ: खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ।

वनान्तं प्रविशन्तौ तावश्विनाविव मन्दरम्॥ १०॥

‘सारथे! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचलके वनमें जाते हैं, उसी प्रकार वनके भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रोंको तुमने अपनी आँखोंसे देखा है॥ १०॥

किमुवाच वचो राम: किमुवाच च लक्ष्मण:।

सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच च मैथिली॥ ११॥

‘सुमन्त्र! वनमें पहुँचकर श्रीरामने तुमसे क्या कहा? लक्ष्मणने भी क्या कहा? तथा मिथिलेशकुमारी सीताने क्या संदेश दिया?॥ ११॥

आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय।

जीविष्याम्ययमेतेन ययातिरिव साधुषु॥ १२॥

‘सूत! तुम श्रीरामके बैठने, सोने और खाने-पीनेसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें बताओ। जैसे स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषोंके बीचमें उपस्थित होनेपर सत्संगके प्रभावसे पुन: सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम-जैसे साधुपुरुषके मुखसे पुत्रका वृत्तान्त सुननेसे मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा’॥ १२॥

इति सूतो नरेन्द्रेण चोदित: सज्जमानया।

उवाच वाचा राजानं स बाष्पपरिबद्धया॥ १३॥

महाराजके इस प्रकार पूछनेपर सारथि सुमन्त्रने आँसुओंसे रुँधी हुई गद्गद वाणीद्वारा उनसे कहा—॥

अब्रवीन्मे महाराज धर्ममेवानुपालयन्।

अञ्जलिं राघव: कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य च॥ १४॥

सूत मद्वचनात् तस्य तातस्य विदितात्मन:।

शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मन:॥ १५॥

सर्वमन्त:पुरं वाच्यं सूत मद्वचनात् त्वया।

आरोग्यमविशेषेण यथार्हमभिवादनम्॥ १६॥

‘महाराज! श्रीरामचन्द्रजीने धर्मका ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है—‘सूत! तुम मेरी ओरसे आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिताके दोनों चरणोंमें प्रणाम कहना तथा अन्त:पुरमें सभी माताओंको मेरे आरोग्यका समाचार देते हुए उनसे विशेषरूपसे मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना॥ १४—१६॥

माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम्।

अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वच:॥ १७॥

धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव।

देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय॥ १८॥

‘इसके बाद मेरी माता कौसल्यासे मेरा प्रणाम करके बताना कि ‘मैं कुशलसे हूँ और धर्मपालनमें सावधान रहता हूँ।’ फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि ‘माँ! तुम सदा धर्ममें तत्पर रहकर यथासमय अग्निशालाके सेवन (अग्निहोत्र-कार्य) में संलग्न रहना। देवि! महाराजको देवताके समान मानकर उनके चरणोंकी सेवा करना॥

अभिमानं च मानं च त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु।

अनुराजानमार्यां च कैकेयीमम्ब कारय॥ १९॥

‘अभिमान56 और मानको57 त्यागकर सभी माताओंके प्रति समान बर्ताव करना—उनके साथ हिल-मिलकर रहना। अम्बे! जिसमें राजाका अनुराग है, उस कैकेयीको भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना॥ १९॥

कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या च राजवत्।

अप्यज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर॥ २०॥

‘कुमार भरतके प्रति राजोचित बर्ताव करना। राजा छोटी उम्रके हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं—इस राजधर्मको याद रखना’॥ २०॥

भरत: कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्वचनेन च।

सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु॥ २१॥

‘कुमार भरतसे भी मेरा कुशल-समाचार बताकर उनसे मेरी ओरसे कहना—‘भैया! तुम सभी माताओंके प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना॥ २१॥

वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दन:।

पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय॥ २२॥

‘इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु भरतसे यह भी कहना चाहिये कि युवराजपदपर अभिषिक्त होनेके बाद भी तुम राज्यसिंहासनपर विराजमान पिताजीकी रक्षा एवं सेवामें संलग्न रहना॥ २२॥

अतिक्रान्तवया राजा मा स्मैनं व्यपरोरुध:।

कुमारराज्ये जीवस्व तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात्॥ २३॥

‘राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं—ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना—उन्हें राजसिंहासनसे न उतारना। युवराज-पदपर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञाका पालन करते हुए ही जीवन-निर्वाह करना॥ २३॥

अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन्।

मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी॥ २४॥

इत्येवं मां महाबाहुर्ब्रुवन्नेव महायशा:।

रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत्॥ २५॥

‘फिर उन्होंने नेत्रोंसे बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरतसे कहनेके लिये ही यह संदेश दिया—‘भरत! मेरी पुत्रवत्सला माताको अपनी ही माताके समान समझना।’ मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेगसे आँसुओंकी वर्षा करने लगे॥

लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो नि:श्वसन् वाक्यमब्रवीत्।

केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासित:॥ २६॥

‘परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले—‘सुमन्त्रजी! किस अपराधके कारण महाराजने इन राजकुमार श्रीरामको देशनिकाला दे दिया है?॥ २६॥

राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघु चाश्रुत्य शासनम्।

कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिता:॥ २७॥

‘राजाने कैकेयीका आदेश सुनकर झटसे उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली। उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हमलोगोंको उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है॥ २७॥

यदि प्रव्राजितो रामो लोभकारणकारितम्।

वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ २८॥

‘श्रीरामको वनवास देना कैकेयीके लोभके कारण हुआ हो अथवा राजाके दिये हुए वरदानके कारण, मेरी दृष्टिमें यह सर्वथा पाप ही किया गया है॥ २८॥

इदं तावद् यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम्।

रामस्य तु परित्यागे न हेतुमुपलक्षये॥ २९॥

‘यह श्रीरामको वनवास देनेका कार्य राजाकी स्वेच्छाचारिताके कारण किया गया हो अथवा ईश्वरकी प्रेरणासे, परंतु मुझे श्रीरामके परित्यागका कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है॥ २९॥

असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात्।

जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम्॥ ३०॥

‘बुद्धिकी कमी अथवा तुच्छताके कारण उचित- अनुचितका विचार किये बिना ही जो यह राम-वनवासरूपी शास्त्रविरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है, यह अवश्य ही निन्दा और दु:खका जनक होगा॥ ३०॥

अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये।

भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघव:॥ ३१॥

‘मुझे इस समय महाराजमें पिताका भाव नहीं दिखायी देता। अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु-बान्धव तथा पिता हैं॥ ३१॥

सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम्।

सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं चानेन कर्मणा॥ ३२॥

‘जो सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर होनेके कारण सब लोगोंके प्रिय हैं, उन श्रीरामका परित्याग करके राजाने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है? (अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है?)॥ ३२॥

सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्रज्य धार्मिकम्।

सर्वलोकविरोधेन कथं राजा भविष्यति॥ ३३॥

‘जिनमें समस्त प्रजाका मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीरामको देशनिकाला देकर समस्त लोकोंका विरोध करनेके कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे?॥ ३३॥

जानकी तु महाराज नि:श्वसन्ती तपस्विनी।

भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता॥ ३४॥

‘महाराज! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उनमें किसी भूतका आवेश हो गया हो। वे भूली-सी जान पड़ती थीं॥ ३४॥

अदृष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी।

तेन दु:खेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत्॥ ३५॥

‘उन यशस्विनी राजकुमारीने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था। वे पतिके ही दु:खसे दु:खी होकर रो रही थीं। उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा॥ ३५॥

उद्वीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता।

मुमोच सहसा बाष्पं प्रयान्तमुपवीक्ष्य सा॥ ३६॥

‘मुझे इधर आनेके लिये उद्यत देख वे सूखे मुँहसे पतिकी ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं॥

तथैव रामोऽश्रुमुख: कृताञ्जलि:

स्थितोऽब्रवील्लक्ष्मणबाहुपालित:।

तथैव सीता रुदती तपस्विनी

निरीक्षते राजरथं तथैव माम्॥ ३७॥

‘इसी प्रकार लक्ष्मणकी भुजाओंसे सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके इस रथकी ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर’॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टपञ्चाश: सर्ग: ॥ ५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८॥

 

एकोनषष्टितम: सर्ग:

सुमन्त्रद्वारा श्रीरामके शोकसे जड-चेतन एवं अयोध्यापुरीकी दुरवस्थाका वर्णन तथा राजा दशरथका विलाप

मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि।

उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे सम्प्रस्थिते वनम्॥ १॥

उभाभ्यां राजपुत्राभ्यामथ कृत्वाहमञ्जलिम्।

प्रस्थितो रथमास्थाय तद्दु:खमपि धारयन्॥ २॥

सुमन्त्रने कहा—‘जब श्रीरामचन्द्रजी वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारोंको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोगके दु:खको हृदयमें धारण करके रथपर आरूढ़ हो उधरसे लौटा। लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे। रास्ता चलनेमें उनका मन नहीं लगता था॥ १-२॥

गुहेन सार्धं तत्रैव स्थितोऽस्मि दिवसान् बहून्।

आशया यदि मां राम: पुन: शब्दापयेदिति॥ ३॥

‘मैं गुहके साथ कई दिनोंतक वहाँ इस आशासे ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें॥ ३॥

विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिता:।

अपि वृक्षा: परिम्लाना: सपुष्पाङ्कुरकोरका:॥ ४॥

‘महाराज! आपके राज्यमें वृक्ष भी इस महान् संकटसे कृशकाय हो गये हैं, फूल, अंकुर और कलियोंसहित मुरझा गये हैं॥ ४॥

उपतप्तोदका नद्य: पल्वलानि सरांसि च।

परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च॥ ५॥

‘नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरोंके जल गरम हो गये हैं। वनों और उपवनोंके पत्ते सूख गये हैं॥

न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रचरन्ति च।

रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमभवद् वनम्॥ ६॥

‘वनके जीव-जन्तु आहारके लिये भी कहीं नहीं जाते हैं। अजगर आदि सर्प भी जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं, आगे नहीं बढ़ते हैं। श्रीरामके शोकसे पीडि़त हुआ वह सारा वन नीरव-सा हो गया है॥ ६॥

लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदका:।

संतप्तपद्मा: पद्मिन्यो लीनमीनविहंगमा:॥ ७॥

‘नदियोंके जल मलिन हो गये हैं। उनमें फैले हुए कमलोंके पत्ते गल गये हैं। सरोवरोंके कमल भी सूख गये हैं। उनमें रहनेवाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं॥ ७॥

जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च।

नातिभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम्॥ ८॥

‘जलमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प तथा स्थलसे पैदा होनेवाले फूल भी बहुत थोड़ी सुगन्धसे युक्त होनेके कारण अधिक शोभा नहीं पाते हैं तथा फल भी पूर्ववत् नहीं दृष्टिगोचर होते हैं॥ ८॥

अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च।

न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ॥ ९॥

‘नरश्रेष्ठ! अयोध्याके उद्यान भी सूने हो गये हैं, उनमें रहनेवाले पक्षी भी कहीं छिप गये हैं। यहाँके बगीचे भी मुझे पहलेकी भाँति मनोहर नहीं दिखायी देते हैं॥ ९॥

प्रविशन्तमयोध्यायां न कश्चिदभिनन्दति।

नरा राममपश्यन्तो नि:श्वसन्ति मुहुर्मुहु:॥ १०॥

‘अयोध्यामें प्रवेश करते समय मुझसे किसीने प्रसन्न होकर बात नहीं की। श्रीरामको न देखकर लोग बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे॥ १०॥

देव राजरथं दृष्ट्वा विना राममिहागतम्।

दूरादश्रुमुख: सर्वो राजमार्गे गतो जन:॥ ११॥

‘देव! सड़कपर आये हुए सब लोग राजाका रथ श्रीरामके बिना ही यहाँ लौट आया है, यह देखकर दूरसे ही आँसू बहाने लगे थे॥ ११॥

हर्म्यैर्विमानै: प्रासादैरवेक्ष्य रथमागतम्।

हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिता:॥ १२॥

‘अट्टालिकाओं, विमानों और प्रासादोंपर बैठी हुई स्त्रियाँ वहाँसे रथको सूना ही लौटा देखकर श्रीरामको न देखनेके कारण व्यथित हो उठीं और हाहाकार करने लगीं॥ १२॥

आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतै: ।

अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततरा: स्त्रिय:॥ १३॥

‘उनके कज्जल आदिसे रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे। वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्त भावसे एक-दूसरीकी ओर देख रही थीं॥

नामित्राणां न मित्राणामुदासीनजनस्य च।

अहमार्ततया कंचिद् विशेषं नोपलक्षये॥ १४॥

‘शत्रुओं, मित्रों तथा उदासीन (मध्यस्थ) मनुष्योंको भी मैंने समानरूपसे दु:खी देखा है। किसीके शोकमें मुझे कुछ अन्तर नहीं दिखायी दिया है॥ १४॥

अप्रहृष्टमनुष्या च दीननागतुरंगमा।

आर्तस्वरपरिम्लाना विनि:श्वसितनि:स्वना॥ १५॥

निरानन्दा महाराज रामप्रव्राजनातुरा।

कौसल्या पुत्रहीनेव अयोध्या प्रतिभाति मे॥ १६॥

‘महाराज! अयोध्याके मनुष्योंका हर्ष छिन गया है। वहाँके घोड़े और हाथी भी बहुत दु:खी हैं। सारी पुरी आर्तनादसे मलिन दिखायी देती है। लोगोंकी लंबी-लंबी साँसें ही इस नगरीका उच्छ्वास बन गयी हैं। यह अयोध्यापुरी श्रीरामके वनवाससे व्याकुल हुई पुत्रवियोगिनी कौसल्याकी भाँति मुझे आनन्दशून्य प्रतीत हो रही है’॥ १५-१६॥

सूतस्य वचनं श्रुत्वा वाचा परमदीनया।

बाष्पोपहतया सूतमिदं वचनमब्रवीत्॥ १७॥

सुमन्त्रके वचन सुनकर राजाने उनसे अश्रु-गद्गद परम दीन वाणीमें कहा—॥ १७॥

कैकेय्या विनियुक्तेन पापाभिजनभावया।

मया न मन्त्रकुशलैर्वृद्धै: सह समर्थितम्॥ १८॥

‘सूत! जो पापी कुल और पापपूर्ण देशमें उत्पन्न हुई है तथा जिसके विचार भी पापसे भरे हैं, उस कैकेयीके कहनेमें आकर मैंने सलाह देनेमें कुशल वृद्ध पुरुषोंके साथ बैठकर इस विषयमें कोई परामर्श भी नहीं किया॥ १८॥

न सुहृद्भिर्न चामात्यैर्मन्त्रयित्वा सनैगमै:।

मयायमर्थ: सम्मोहात् स्त्रीहेतो: सहसा कृत:॥ १९॥

‘सुहृदों, मन्त्रियों और वेदवेत्ताओंसे सलाह लिये बिना ही मैंने मोहवश केवल एक स्त्रीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये सहसा यह अनर्थमय कार्य कर डाला है॥

भवितव्यतया नूनमिदं वा व्यसनं महत्।

कुलस्यास्य विनाशाय प्राप्तं सूत यदृच्छया॥ २०॥

‘सुमन्त्र! होनहारवश यह भारी विपत्ति निश्चय ही इस कुलका विनाश करनेके लिये अकस्मात् आ पहुँची है॥ २०॥

सूत यद्यस्ति ते किंचिन्मयापि सुकृतं कृतम्।

त्वं प्रापयाशु मां रामं प्राणा: संत्वरयन्ति माम्॥ २१॥

‘सारथे! यदि मैंने तुम्हारा कभी कुछ थोड़ा-सा भी उपकार किया हो तो तुम मुझे शीघ्र ही श्रीरामके पास पहुँचा दो। मेरे प्राण मुझे श्रीरामके दर्शनके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा दे रहे हैं॥ २१॥

यद्यद्यापि ममैवाज्ञा निवर्तयतु राघवम्।

न शक्ष्यामि विना रामं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥ २२॥

‘यदि आज भी इस राज्यमें मेरी ही आज्ञा चलती हो तो तुम मेरे ही आदेशसे जाकर श्रीरामको वनसे लौटा ले आओ; क्योंकि अब मैं उनके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकूँगा॥ २२॥

अथवापि महाबाहुर्गतो दूरं भविष्यति।

मामेव रथमारोप्य शीघ्रं रामाय दर्शय॥ २३॥

‘अथवा महाबाहु श्रीराम तो अब दूर चले गये होंगे, इसलिये मुझे ही रथपर बिठाकर ले चलो और शीघ्र ही रामका दर्शन कराओ॥ २३॥

वृत्तदंष्ट्रो महेष्वास: क्वासौ लक्ष्मणपूर्वज:।

यदि जीवामि साध्वेनं पश्येयं सीतया सह॥ २४॥

‘कुन्दकलीके समान श्वेत दाँतोंवाले, लक्ष्मणके बड़े भाई महाधनुर्धर श्रीराम कहाँ हैं? यदि सीताके साथ भली-भाँति उनका दर्शन कर लूँ, तभी मैं जीवित रह सकता हूँ॥ २४॥

लोहिताक्षं महाबाहुमामुक्तमणिकुण्डलम्।

रामं यदि न पश्येयं गमिष्यामि यमक्षयम्॥ २५॥

‘जिनके लाल नेत्र और बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं तथा जो मणियोंके कुण्डल धारण करते हैं, उन श्रीरामको यदि मैं नहीं देखूँगा तो अवश्य यमलोकको चला जाऊँगा॥ २५॥

अतो नु किं दु:खतरं योऽहमिक्ष्वाकुनन्दनम्।

इमामवस्थामापन्नो नेह पश्यामि राघवम्॥ २६॥

‘इससे बढ़कर दु:खकी बात और क्या होगी कि मैं इस मरणासन्न अवस्थामें पहुँचकर भी इक्ष्वाकुकुलनन्दन राघवेन्द्र श्रीरामको यहाँ नहीं देख रहा हूँ॥ २६॥

हा राम रामानुज हा हा वैदेहि तपस्विनि।

न मां जानीत दु:खेन म्रियमाणमनाथवत्॥ २७॥

‘हा राम! हा लक्ष्मण! हा विदेहराजकुमारी तपस्विनी सीते! तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं किस प्रकार दु:खसे अनाथकी भाँति मर रहा हूँ’॥ २७॥

स तेन राजा दु:खेन भृशमर्पितचेतन:।

अवगाढ: सुदुष्पारं शोकसागरमब्रवीत्॥ २८॥

राजा उस दु:खसे अत्यन्त अचेत हो रहे थे, अत: वे उस परम दुर्लङ्‌घ्य शोकसमुद्रमें निमग्न होकर बोले—॥

रामशोकमहावेग: सीताविरहपारग:।

श्वसितोर्मिमहावर्तो बाष्पवेगजलाविल:॥ २९॥

बाहुविक्षेपमीनोऽसौ विक्रन्दितमहास्वन:।

प्रकीर्णकेशशैवाल: कैकेयीवडवामुख:॥ ३०॥

ममाश्रुवेगप्रभव: कुब्जावाक्यमहाग्रह:।

वरवेलो नृशंसाया रामप्रव्राजनायत:॥ ३१॥

यस्मिन् बत निमग्नोऽहं कौसल्ये राघवं विना।

दुस्तरो जीवता देवि मयायं शोकसागर:॥ ३२॥

‘देवि कौसल्ये! मैं श्रीरामके बिना जिस शोक-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, उसे जीते-जी पार करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। श्रीरामका शोक ही उस समुद्रका महान् वेग है। सीताका बिछोह ही उसका दूसरा छोर है। लंबी-लंबी साँसें उसकी लहरें और बड़ी-बड़ी भँवरें हैं। आँसुओंका वेगपूर्वक उमड़ा हुआ प्रवाह ही उसका मलिन जल है। मेरा हाथ पटकना ही उसमें उछलती हुई मछलियोंका विलास है। करुण-क्रन्दन ही उसकी महान् गर्जना है। ये बिखरे हुए केश ही उसमें उपलब्ध होनेवाले सेवार हैं। कैकेयी बड़वानल है। वह शोक-समुद्र मेरी वेगपूर्वक होनेवाली अश्रुवर्षाकी उत्पत्तिका मूल कारण है। मन्थराके कुटिलतापूर्ण वचन ही उस समुद्रके बड़े-बड़े ग्राह हैं। क्रूर कैकेयीके माँगे हुए दो वर ही उसके दो तट हैं तथा श्रीरामका वनवास ही उस शोक-सागरका महान् विस्तार है॥ २९—३२॥

अशोभनं योऽहमिहाद्य राघवं

दिदृक्षमाणो न लभे सलक्ष्मणम्।

इतीव राजा विलपन् महायशा:

पपात तूर्णं शयने स मूर्च्छित:॥ ३३॥

‘मैं लक्ष्मणसहित श्रीरामको देखना चाहता हूँ, परंतु इस समय उन्हें यहाँ देख नहीं पाता हूँ—यह मेरे बहुत बड़े पापका फल है।’ इस तरह विलाप करते हुए महायशस्वी राजा दशरथ तुरंत ही मूर्च्छित होकर शय्यापर गिर पड़े॥ ३३॥

इति विलपति पार्थिवे प्रणष्टे

करुणतरं द्विगुणं च रामहेतो:।

वचनमनुनिशम्य तस्य देवी

भयमगमत् पुनरेव राममाता॥ ३४॥

श्रीरामचन्द्रजीके लिये इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथके मूर्च्छित हो जानेपर उनके उस अत्यन्त करुणाजनक वचनको सुनकर राममाता देवी कौसल्याको पुन: दुगुना भय हो गया॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनषष्टितम: सर्ग:॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

 

षष्टितम: सर्ग:

कौसल्याका विलाप और सारथि सुमन्त्रका उन्हें समझाना

ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुन: पुन:।

धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर जैसे उनमें भूतका आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत-सी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। उसी अवस्थामें उन्होंने सारथिसे कहा—॥ १॥

नय मां यत्र काकुत्स्थ: सीता यत्र च लक्ष्मण:।

तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम्॥ २॥

‘सुमन्त्र! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीं मुझे भी पहुँचा दो। मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती॥ २॥

निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि।

अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्॥ ३॥

‘जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्यमें ले चलो। यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोककी यात्रा करूँगी’॥ ३॥

बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया।

इदमाश्वासयन् देवीं सूत: प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ ४॥

देवी कौसल्याकी बात सुनकर सारथि सुमन्त्रने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओंके वेगसे अवरुद्ध हुई गद्गदवाणीमें कहा—॥ ४॥

त्यज शोकं च मोहं च सम्भ्रमं दु:खजं तथा।

व्यवधूय च संतापं वने वत्स्यति राघव:॥ ५॥

‘महारानी! यह शोक, मोह और दु:खजनित व्याकुलता छोडि़ये। श्रीरामचन्द्रजी इस समय सारा संताप भूलकर वनमें निवास करते हैं॥ ५॥

लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने।

आराधयति धर्मज्ञ: परलोकं जितेन्द्रिय:॥ ६॥

‘धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय लक्ष्मण भी उस वनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करते हुए अपना परलोक बना रहे हैं॥ ६॥

विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव।

विस्रम्भं लभतेऽभीता रामे विन्यस्तमानसा॥ ७॥

‘सीताका मन भगवान् श्रीराममें ही लगा हुआ है। इसलिये निर्जन वनमें रहकर भी घरकी ही भाँति प्रेम एवं प्रसन्नता पाती तथा निर्भय रहती हैं॥ ७॥

नास्या दैन्यं कृतं किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्ष्यते।

उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मे॥ ८॥

‘वनमें रहनेके कारण उनके मनमें कुछ थोड़ा-सा भी दु:ख नहीं दिखायी देता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो विदेहराजकुमारी सीताको परदेशमें रहनेका पहलेसे ही अभ्यास हो॥ ८॥

नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते पुरा।

तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि॥ ९॥

‘जैसे यहाँ नगरके उपवनमें जाकर वे पहले घूमा करती थीं, उसी प्रकार निर्जन वनमें भी सीता सानन्द विचरती हैं॥ ९॥

बालेव रमते सीताबालचन्द्रनिभानना।

रामा रामे ह्यदीनात्मा विजनेऽपि वने सती॥ १०॥

‘पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली रमणी-शिरोमणि उदारहृदया सती-साध्वी सीता उस निर्जन वनमें भी श्रीरामके समीप बालिकाके समान खेलती और प्रसन्न रहती हैं॥ १०॥

तद्गतं हृदयं यस्यास्तदधीनं च जीवितम्।

अयोध्या हि भवेदस्या रामहीना तथा वनम्॥ ११॥

‘उनका हृदय श्रीराममें ही लगा हुआ है। उनका जीवन भी श्रीरामके ही अधीन है, अत: रामके बिना अयोध्या भी उनके लिये वनके समान ही होगी (और श्रीरामके साथ रहनेपर वे वनमें भी अयोध्याके समान ही सुखका अनुभव करेंगी)॥ ११॥

परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च।

गतिं दृष्ट्वा नदीनां च पादपान् विविधानपि॥ १२॥

‘विदेहनन्दिनी सीता मार्गमें मिलनेवाले गाँवों, नगरों, नदियोंके प्रवाहों और नाना प्रकारके वृक्षोंको देखकर उनका परिचय पूछा करती हैं॥ १२॥

रामं वा लक्ष्मणं वापि दृष्ट्वा जानाति जानकी।

अयोध्या क्रोशमात्रे तु विहारमिव साश्रिता॥ १३॥

‘श्रीराम और लक्ष्मणको अपने पास देखकर जानकीको यही जान पड़ता है कि मैं अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर मानो घूमने-फिरनेके लिये ही आयी हूँ॥

इदमेव स्मराम्यस्या: सहसैवोपजल्पितम्।

कैकेयीसंश्रितं जल्पं नेदानीं प्रतिभाति माम्॥ १४॥

‘सीताके सम्बन्धमें मुझे इतना ही स्मरण है। उन्होंने कैकेयीको लक्ष्य करके जो सहसा कोई बात कह दी थी, वह इस समय मुझे याद नहीं आ रही है’॥

ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम्।

ह्लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत्॥ १५॥

इस प्रकार भूलसे निकली हुई कैकेयीविषयक उस बातको पलटकर सारथि सुमन्त्रने देवी कौसल्याके हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाला मधुर वचन कहा—॥ १५॥

अध्वना वातवेगेन सम्भ्रमेणातपेन च।

न विगच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा॥ १६॥

‘मार्गमें चलनेकी थकावट, वायुके वेग, भयदायक वस्तुओंको देखनेके कारण होनेवाली घबराहट तथा धूपसे भी विदेहराजकुमारीकी चन्द्रकिरणोंके समान कमनीय कान्ति उनसे दूर नहीं होती है॥ १६॥

सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम्।

वदनं तद् वदान्याया वैदेह्या न विकम्पते॥ १७॥

‘उदारहृदया सीताका विकसित कमलके समान सुन्दर तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक कान्तिसे युक्त मुख कभी मलिन नहीं होता है॥ १७॥

अलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ ।

अद्यापि चरणौ तस्या: पद्मकोशसमप्रभौ॥ १८॥

‘जिनमें महावरके रंग नहीं लग रहे हैं, सीताके वे दोनों चरण आज भी महावरके समान ही लाल तथा कमलकोशके समान कान्तिमान् हैं॥ १८॥

नूपुरोत्कृष्टलीलेव खेलं गच्छति भामिनी।

इदानीमपि वैदेही तद्रागान्यस्तभूषणा॥ १९॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनुरागके कारण उन्हींकी प्रसन्नताके लिये जिन्होंने आभूषणोंका परित्याग नहीं किया है, वे विदेहराजकुमारी भामिनी सीता इस समय भी अपने नूपुरोंकी झनकारसे हंसोंके कलनादका तिरस्कार-सा करती हुई लीलाविलासयुक्त गतिसे चलती हैं॥ १९॥

गजं वा वीक्ष्य सिंहं वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता।

नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता॥ २०॥

‘वे श्रीरामचन्द्रजीके बाहुबलका भरोसा करके वनमें रहती हैं और हाथी, बाघ अथवा सिंहको भी देखकर कभी भय नहीं मानती हैं॥ २०॥

न शोच्यास्ते न चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिप:।

इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम्॥ २१॥

‘अत: आप श्रीराम, लक्ष्मण अथवा सीताके लिये शोक न करें, अपने और महाराजके लिये भी चिन्ता छोड़ें। श्रीरामचन्द्रजीका यह पावन चरित्र संसारमें सदा ही स्थिर रहेगा॥ २१॥

विधूय शोकं परिहृष्टमानसा

महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिता:।

वने रता वन्यफलाशना: पितु:

शुभां प्रतिज्ञां प्रतिपालयन्ति ते॥ २२॥

‘वे तीनों ही शोक छोड़कर प्रसन्नचित्त हो महर्षियोंके मार्गपर दृढ़तापूर्वक स्थित हैं और वनमें रहकर फल-मूलका भोजन करते हुए पिताकी उत्तम प्रतिज्ञाका पालन कर रहे हैं’॥ २२॥

तथापि सूतेन सुयुक्तवादिना

निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता।

न चैव देवी विरराम कूजितात्

प्रियेति पुत्रेति च राघवेति च॥ २३॥

इस प्रकार युक्तियुक्त वचन कहकर सारथि सुमन्त्रने पुत्रशोकसे पीडि़त हुई कौसल्याको चिन्ता करने और रोनेसे रोका तो भी देवी कौसल्या विलापसे विरत न हुईं । वे ‘हा प्यारे!’ ‘हा पुत्र!’ और ‘हा रघुनन्दन!’ की रट लगाती हुई करुण क्रन्दन करती ही रहीं॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्टितम: सर्ग:॥ ६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६०॥

 

एकषष्टितम: सर्ग:

कौसल्याका विलापपूर्वक राजा दशरथको उपालम्भ देना

वनं गते धर्मरते रामे रमयतां वरे।

कौसल्या रुदती चार्ता भर्तारमिदमब्रवीत्॥ १॥

प्रजाजनोंको आनन्द प्रदान करनेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीरामके वनमें चले जानेपर आर्त होकर रोती हुई कौसल्याने अपने पतिसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

यद्यपि त्रिषु लोकेषु प्रथितं ते महद् यश:।

सानुक्रोशो वदान्यश्च प्रियवादी च राघव:॥ २॥

‘महाराज! यद्यपि तीनों लोकोंमें आपका महान् यश फैला हुआ है,—सब लोग यही जानते हैं कि—रघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलनेवाले हैं॥ २॥

कथं नरवरश्रेष्ठ पुत्रौ तौ सह सीतया।

दु:खितौ सुखसंवृद्धौ वने दु:खं सहिष्यत:॥ ३॥

‘नरेशोंमें श्रेष्ठ आर्यपुत्र! तथापि आपने इस बातका विचार नहीं किया कि सुखमें पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीताके साथ वनवासका कष्ट कैसे सहन करेंगे॥ ३॥

सा नूनं तरुणी श्यामा सुकुमारी सुखोचिता।

कथमुष्णं च शीतं च मैथिली विसहिष्यते॥ ४॥

‘वह सोलह-अठारह वर्षोंकी सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगनेके ही योग्य है, वनमें सर्दी-गरमीका दु:ख कैसे सहेगी?॥ ४॥

भुक्त्वाशनं विशालाक्षी सूपदंशान्वितं शुभम्।

वन्यं नैवारमाहारं कथं सीतोपभोक्ष्यते॥ ५॥

‘विशाललोचना सीता सुन्दर व्यञ्जनोंसे युक्त सुन्दर स्वादिष्ट अन्न भोजन किया करती थी, अब वह जंगलकी तिन्नीके चावलका सूखा भात कैसे खायगी?॥

गीतवादित्रनिर्घोषं श्रुत्वा शुभसमन्विता।

कथं क्रव्यादसिंहानां शब्दं श्रोष्यत्यशोभनम्॥ ६॥

‘जो माङ्गलिक वस्तुओंसे सम्पन्न रहकर सदा गीत और वाद्यकी मधुर ध्वनि सुना करती थी, वही जंगलमें मांसभक्षी सिंहोंका अशोभन (अमङ्गलकारी) शब्द कैसे सुन सकेगी?॥ ६॥

महेन्द्रध्वजसंकाश: क्व नु शेते महाभुज:।

भुजं परिघसंकाशमुपाधाय महाबल:॥ ७॥

‘जो इन्द्रध्वजके समान समस्त लोकोंके लिये उत्सव प्रदान करनेवाले थे, वे महाबली, महाबाहु श्रीराम अपनी परिघ-जैसी मोटी बाँहका तकिया लगाकर कहाँ सोते होंगे?॥ ७॥

पद्मवर्णं सुकेशान्तं पद्मनि:श्वासमुत्तमम्।

कदा द्रक्ष्यामि रामस्य वदनं पुष्करेक्षणम्॥ ८॥

‘जिसकी कान्ति कमलके समान है, जिसके ऊपर सुन्दर केश शोभा पाते हैं, जिसकी प्रत्येक साँससे कमलकी-सी सुगन्ध निकलती है तथा जिसमें विकसित कमलके सदृश सुन्दर नेत्र सुशोभित होते हैं, श्रीरामके स मनोहर मुखको मैं कब देखूँगी?॥ ८॥

वज्रसारमयं नूनं हृदयं मे न संशय:।

अपश्यन्त्या न तं यद् वै फलतीदं सहस्रधा॥ ९॥

‘मेरा हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि श्रीरामको न देखनेपर भी मेरे इस हृदयके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं॥ ९॥

यत् त्वया करुणं कर्म व्यपोह्य मम बान्धवा:।

निरस्ता: परिधावन्ति सुखार्हा: कृपणा वने॥ १०॥

‘आपने यह बड़ा ही निर्दयतापूर्ण कर्म किया है कि बिना कुछ सोच-विचार किये मेरे बान्धवोंको (कैकेयीके कहनेसे) निकाल दिया है, जिसके कारण वे सुख भोगनेके योग्य होनेपर भी दीन होकर वनमें दौड़ रहे हैं॥ १०॥

यदि पञ्चदशे वर्षे राघव: पुनरेष्यति।

जह्याद् राज्यं च कोशं च भरतो नोपलक्ष्यते॥ ११॥

‘यदि पंद्रहवें वर्षमें श्रीरामचन्द्र पुन: वनसे लौटें तो भरत उनके लिये राज्य और खजाना छोड़ देंगे, ऐसी सम्भावना नहीं दिखायी देती॥ ११॥

भोजयन्ति किल श्राद्धे केचित् स्वानेव बान्धवान्।

तत: पश्चात् समीक्षन्ते कृतकार्या द्विजोत्तमान्॥ १२॥

तत्र ये गुणवन्तश्च विद्वांसश्च द्विजातय:।

न पश्चात् तेऽभिमन्यन्ते सुधामपि सुरोपमा:॥ १३॥

‘कहते हैं, कुछ लोग श्राद्धमें पहले अपने बान्धवों (दौहित्र आदि)-को ही भोजन करा देते हैं, उसके बाद कृतकृत्य होकर निमन्त्रित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी ओर ध्यान देते हैं। परंतु वहाँ जो गुणवान् एवं विद्वान् देवतुल्य उत्तम ब्राह्मण होते हैं, वे पीछे अमृत भी परोसा गया हो तो उसको स्वीकार नहीं करते हैं॥ १२-१३॥

ब्राह्मणेष्वपि वृत्तेषु भुक्तशेषं द्विजोत्तमा:।

नाभ्युपेतुमलं प्राज्ञा: शृङ्गच्छेदमिवर्षभा:॥ १४॥

‘यद्यपि पहली पंक्तिमें भी ब्राह्मण ही भोजन करके उठे होते हैं, तथापि जो श्रेष्ठ और विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे अपमानके भयसे उस भुक्तशेष अन्नको उसी तरह ग्रहण नहीं कर पाते जैसे अच्छे बैल अपने सींग कटानेको नहीं तैयार होते हैं॥ १४॥

एवं कनीयसा भ्रात्रा भुक्तं राज्यं विशाम्पते।

भ्राता ज्येष्ठो वरिष्ठश्च किमर्थं नावमन्यते॥ १५॥

‘महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ और श्रेष्ठ भ्राता अपने छोटे भाईके भोगे हुए राज्यको कैसे ग्रहण करेंगे? वे उसका तिरस्कार (त्याग) क्यों नहीं कर देंगे?॥ १५॥

न परेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्र: खादितुमिच्छति।

एवमेव नरव्याघ्र: परलीढं न मंस्यते॥ १६॥

‘जैसे बाघ गीदड़ आदि दूसरे जन्तुओंके लाये या खाये हुए भक्ष्य पदार्थ (शिकार)-को खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम दूसरोंके चाटे (भोगे) हुए राज्य-भोगको नहीं स्वीकार करेंगे॥ १६॥

हविराज्यं पुरोडाश: कुशा यूपाश्च खादिरा:।

नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे॥ १७॥

‘हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर)-के यूप—ये एक यज्ञके उपयोगमें आ जानेपर ‘यातयाम’ (उपभुक्त) हो जाते हैं; इसलिये विद्वान् इनका फिर दूसरे यज्ञमें उपयोग नहीं करते हैं॥ १७॥

तथा ह्यात्तमिदं राज्यं हृतसारां सुरामिव।

नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम्॥ १८॥

‘इसी प्रकार नि:सार सुरा और भुक्तावशिष्ट यज्ञसम्बन्धी सोमरसकी भाँति इस भोगे हुए राज्यको श्रीराम नहीं ग्रहण कर सकते॥ १८॥

नैवंविधमसत्कारं राघवो मर्षयिष्यति।

बलवानिव शार्दूलो वालधेरभिमर्शनम्॥ १९॥

‘जैसे बलवान् शेर किसीके द्वारा अपनी पूँछका पकड़ा जाना नहीं सह सकता, उसी प्रकार श्रीराम ऐसे अपमानको नहीं सह सकेंगे॥ १९॥

नैतस्य सहिता लोका भयं कुर्युर्महामृधे।

अधर्मं त्विह धर्मात्मा लोकं धर्मेण योजयेत्॥ २०॥

‘समस्त लोक एक साथ होकर यदि महासमरमें आ जायँ तो भी वे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें भय उत्पन्न नहीं कर सकते, तथापि इस तरह राज्य लेनेमें अधर्म मानकर उन्होंने इसपर अधिकार नहीं किया। जो धर्मात्मा समस्त जगत्को धर्ममें लगाते हैं, वे स्वयं अधर्म कैसे कर सकते हैं?॥ २०॥

नन्वसौ काञ्चनैर्बाणैर्महावीर्यो महाभुज:।

युगान्त इव भूतानि सागरानपि निर्दहेत्॥ २१॥

‘वे महापराक्रमी महाबाहु श्रीराम अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा सारे समुद्रोंको भी उसी प्रकार दग्ध कर सकते हैं, जैसे संवर्तक अग्निदेव प्रलयकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालते हैं॥ २१॥

स तादृश: सिंहबलो वृषभाक्षो नरर्षभ:।

स्वयमेव हत: पित्रा जलजेनात्मजो यथा॥ २२॥

‘सिंहके समान बल और बैलके समान बड़े-बड़े नेत्रवाला वैसा नरश्रेष्ठ वीर पुत्र स्वयं अपने पिताके ही हाथोंद्वारा मारा गया (राज्यसे वञ्चित कर दिया गया)। ठीक उसी तरह, जैसे मत्स्यका बच्चा अपने पिता मत्स्यके द्वारा ही खा लिया जाता है॥ २२॥

द्विजातिचरितो धर्म: शास्त्रे दृष्ट: सनातनै:।

यदि ते धर्मनिरते त्वया पुत्रे विवासिते॥ २३॥

‘आपके द्वारा धर्मपरायण पुत्रको देशनिकाला दे दिया गया, अत: यह प्रश्न उठता है कि सनातन ऋषियोंने वेदमें जिसका साक्षात्कार किया है तथा श्रेष्ठ द्विज जिसे अपने आचरणमें लाये हैं, वह धर्म आपकी दृष्टिमें सत्य है या नहीं॥ २३॥

गतिरेका पतिर्नार्या द्वितीया गतिरात्मज:।

तृतीया ज्ञातयो राजंश्चतुर्थी नैव विद्यते॥ २४॥

‘राजन्! नारीके लिये एक सहारा उसका पति है, दूसरा उसका पुत्र है तथा तीसरा सहारा उसके पिता-भाई आदि बन्धु-बान्धव हैं, चौथा कोई सहारा उसके लिये नहीं है॥ २४॥

तत्र त्वं मम नैवासि रामश्च वनमाहित:।

न वनं गन्तुमिच्छामि सर्वथा हा हता त्वया॥ २५॥

‘इन सहारोंमेंसे आप तो मेरे हैं ही नहीं (क्योंकि आप सौतके अधीन हैं)। दूसरा सहारा श्रीराम हैं, जो वनमें भेज दिये गये (और बन्धु-बान्धव भी दूर हैं। अत: तीसरा सहारा भी नहीं रहा)। आपकी सेवा छोड़कर मैं श्रीरामके पास वनमें जाना नहीं चाहती हूँ, इसलिये सर्वथा आपके द्वारा मारी ही गयी॥ २५॥

हतं त्वया राष्ट्रमिदं सराज्यं

हता: स्म सर्वा: सह मन्त्रिभिश्च।

हता सपुत्रास्मि हताश्च पौरा:

सुतश्च भार्या च तव प्रहृष्टौ॥ २६॥

‘आपने श्रीरामको वनमें भेजकर इस राष्ट्रका तथा आस- पासके अन्य राज्योंका भी नाश कर डाला, मन्त्रियोंसहित सारी प्रजाका वध कर डाला। आपके द्वारा पुत्रसहित मैं भी मारी गयी और इस नगरके निवासी भी नष्टप्राय हो गये। केवल आपके पुत्र भरत और पत्नी कैकेयी दो ही प्रसन्न हुए हैं’॥ २६॥

इमां गिरं दारुणशब्दसंहितां

निशम्य रामेति मुमोह दु:खित:।

तत: स शोकं प्रविवेश पार्थिव:

स्वदुष्कृतं चापि पुनस्तथास्मरत्॥ २७॥

कौसल्याकी यह कठोर शब्दोंसे युक्त वाणी सुनकर राजा दशरथको बड़ा दु:ख हुआ। वे ‘हा राम!’ कहकर मूर्च्छित हो गये। राजा शोकमें डूब गये। फिर उसी समय उन्हें अपने एक पुराने दुष्कर्मका स्मरण हो आया, जिसके कारण उन्हें यह दु:ख प्राप्त हुआ था॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकषष्टितम: सर्ग:॥ ६१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥

द्विषष्टितम: सर्ग:

दु:खी हुए राजा दशरथका कौसल्याको हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्याका उनके चरणोंमें पड़कर क्षमा माँगना

एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया।

श्रावित: परुषं वाक्यं चिन्तयामास दु:खित:॥ १॥

शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौसल्याने जब राजा दशरथको इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दु:खित होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ १॥

चिन्तयित्वा स च नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रिय:।

अथ दीर्घेण कालेन संज्ञामाप परंतप:॥ २॥

चिन्तित होनेके कारण राजाकी सारी इन्द्रियाँ मोहसे आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथको चेत हुआ॥ २॥

स संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं च नि:श्वसन्।

कौसल्यां पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत्॥ ३॥

होशमें आनेपर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्याको बगलमें बैठी हुई देख वे फिर चिन्तामें पड़ गये॥ ३॥

तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम्।

यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना॥ ४॥

चिन्तामें पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्मका स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलानेवाले नरेशके द्वारा पहले अनजानमें बन गया था॥ ४॥

अमनास्तेन शोकेन रामशोकेन च प्रभु:।

द्वाभ्यामपि महाराज: शोकाभ्यामभितप्यते॥ ५॥

उस शोकसे तथा श्रीरामके शोकसे भी राजाके मनमें बड़ी वेदना हुई। उन दोनों ही शोकोंसे महाराज संतप्त होने लगे॥ ५॥

दह्यमानस्तु शोकाभ्यां कौसल्यामाह दु:खित:।

वेपमानोऽञ्जलिं कृत्वा प्रसादार्थमवाङ्मुख:॥ ६॥

उन दोनों शोकोंसे दग्ध होते हुए दु:खी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौसल्याको मनानेके लिये हाथ जोड़कर बोले—॥ ६॥

प्रसादये त्वां कौसल्ये रचितोऽयं मयाञ्जलि:।

वत्सला चानृशंसा च त्वं हि नित्यं परेष्वपि॥ ७॥

‘कौसल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ। देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं। तुम तो दूसरोंपर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो (फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी?)॥ ७॥

भर्ता तु खलु नारीणां गुणवान् निर्गुणोऽपि वा।

धर्मं विमृशमानानां प्रत्यक्षं देवि दैवतम्॥ ८॥

‘देवि! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्मका विचार करनेवाली सती नारियोंके लिये वह प्रत्यक्ष देवता है॥

सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा।

नार्हसे विप्रियं वक्तुं दु:खितापि सुदु:खितम्॥ ९॥

‘तुम तो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और लोकमें भले-बुरेको समझनेवाली हो। यद्यपि तुम भी दु:खित हो तथापि मैं भी महान् दु:खमें पड़ा हुआ हूँ, अत: तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये’॥ ९॥

तद् वाक्यं करुणं राज्ञ: श्रुत्वा दीनस्य भाषितम्।

कौसल्या व्यसृजद् बाष्पं प्रणालीव नवोदकम्॥ १०॥

दु:खी हुए राजा दशरथके मुखसे कहे गये उस करुणाजनक वचनको सुनकर कौसल्या अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं, मानो छतकी नालीसे नूतन (वर्षाका) जल गिर रहा हो॥ १०॥

सा मूर्ध्नि बद‍्ध्वा रुदती राज्ञ: पद्ममिवाञ्जलिम्।

सम्भ्रमादब्रवीत् त्रस्ता त्वरमाणाक्षरं वच:॥ ११॥

वे अधर्मके भयसे रो पड़ीं और राजाके जुड़े हुए कमलसदृश हाथोंको अपने सिरसे सटाकर घबराहटके कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षरका उच्चारण करती हुई बोलीं—॥ ११॥

प्रसीद शिरसा याचे भूमौ निपतितास्मि ते।

याचितास्मि हता देव क्षन्तव्याहं नहि त्वया॥ १२॥

‘देव! मैं आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों। यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी। मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पानेके योग्य हूँ, प्रहार पानेके नहीं॥ १२॥

नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता।

उभयोर्लोकयोर्लोके पत्या या सम्प्रसाद्यते॥ १३॥

‘पति अपनी स्त्रीके लिये इहलोक और परलोकमें भी स्पृहणीय है। इस जगत्में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पतिके द्वारा मनायी जाती है, वह कुल-स्त्री कहलानेके योग्य नहीं है॥ १३॥

जानामि धर्मं धर्मज्ञ त्वां जाने सत्यवादिनम्।

पुत्रशोकार्तया तत्तु मया किमपि भाषितम्॥ १४॥

‘धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री-धर्मको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं। इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोकसे पीडि़त होनेके कारण मेरे मुखसे निकल गयी है॥ १४॥

शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्।

शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपु:॥ १५॥

‘शोक धैर्यका नाश कर देता है। शोक शास्त्रज्ञानको भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अत: शोकके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है॥ १५॥

शक्यमापतित: सोढुं प्रहारो रिपुहस्तत:।

सोढुमापतित: शोक: सुसूक्ष्मोऽपि न शक्यते॥ १६॥

‘शत्रुके हाथसे अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रोंका प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता॥ १६॥

वनवासाय रामस्य पञ्चरात्रोऽत्र गण्यते।

य: शोकहतहर्षाया: पञ्चवर्षोपमो मम॥ १७॥

‘श्रीरामको वनमें गये आज पाँच रातें बीत गयीं। मैं यही गिनती रहती हूँ। शोकने मेरे हर्षको नष्ट कर दिया है, अत: ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षोंके समान प्रतीत हुई हैं॥ १७॥

तं हि चिन्तयमानाया: शोकोऽयं हृदि वर्धते।

नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत्॥ १८॥

‘श्रीरामका ही चिन्तन करनेके कारण मेरे हृदयका यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियोंके वेगसे समुद्रका जल बहुत बढ़ जाता है’॥ १८॥

एवं हि कथयन्त्यास्तु कौसल्याया: शुभं वच:।

मन्दरश्मिरभूत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत॥ १९॥

अथ प्रह्लादितो वाक्यैर्देव्या कौसल्यया नृप:।

शोकेन च समाक्रान्तो निद्राया वशमेयिवान्॥ २०॥

कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्यकी किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहुँचा। देवी कौसल्याकी इन बातोंसे राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही वे श्रीरामके शोकसे भी पीडि़त थे। इस हर्ष और शोककी अवस्थामें उन्हें नींद आ गयी॥ १९-२०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विषष्टितम: सर्ग:॥ ६२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥

 

त्रिषष्टितम: सर्ग:

राजा दशरथका शोक और उनका कौसल्यासे अपने द्वारा मुनिकुमारके मारे जानेका प्रसङ्ग सुनाना

प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतन:।

अथ राजा दशरथ: स चिन्तामभ्यपद्यत॥ १॥

राजा दशरथ दो ही घड़ीके बाद फिर जाग उठे। उस समय उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो रहा था। वे मन- ही-मन चिन्ता करने लगे॥ १॥

रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद् वासवोपमम्।

आपेदे उपसर्गस्तं तम: सूर्यमिवासुरम्॥ २॥

श्रीराम और लक्ष्मणके वनमें चले जानेसे इन इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथको शोकने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहुका अन्धकार सूर्यको ढक देता है॥ २॥

सभार्ये हि गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वर:।

विवक्षुरसितापाङ्गीं स्मृत्वा दुष्कृतमात्मन:॥ ३॥

पत्नीसहित श्रीरामके वनमें चले जानेपर कोसलनरेश दशरथने अपने पुरातन पापका स्मरण करके कजरारे नेत्रोंवाली कौसल्यासे कहनेका विचार किया॥ ३॥

स राजा रजनीं षष्ठीं रामे प्रव्राजिते वनम्।

अर्धरात्रे दशरथ: सोऽस्मरद् दुष्कृतं कृतम्॥ ४॥

उस समय श्रीरामचन्द्रजीको वनमें गये छठी रात बीत रही थी। जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथको उस पहलेके किये हुए दुष्कर्मका स्मरण हुआ॥ ४॥

स राजा पुत्रशोकार्त: स्मृत्वा दुष्कृतमात्मन:।

कौसल्यां पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत्॥ ५॥

पुत्रशोकसे पीडि़त हुए महाराजने अपने उस दुष्कर्मको याद करके पुत्रशोकसे व्याकुल हुई कौसल्यासे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ५॥

यदाचरति कल्याणि शुभं वा यदि वाशुभम्।

तदेव लभते भद्रे कर्ता कर्मजमात्मन:॥ ६॥

‘कल्याणि! मनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, भद्रे! अपने उसी कर्मके फलस्वरूप सुख या दु:ख कर्ताको प्राप्त होते हैं॥ ६॥

गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम्।

दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते॥ ७॥

‘जो कर्मोंका आरम्भ करते समय उनके फलोंकी गुरुता या लघुताको नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोषको नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है॥ ७॥

कश्चिदाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च निषिञ्चति।

पुष्पं दृष्ट्वा फले गृध्नु: स शोचति फलागमे॥ ८॥

‘कोई मनुष्य पलाशका सुन्दर फूल देखकर मन-ही-मन यह अनुमान करके कि इसका फल और भी मनोहर तथा सुस्वादु होगा, फलकी अभिलाषासे आमके बगीचेको काटकर वहाँ पलाशके पौदे लगाता और सींचता है, वह फल लगनेके समय पश्चात्ताप करता है (क्योंकि उससे अपनी आशाके अनुरूप फल वह नहीं पाता है)॥ ८॥

अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति।

स शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचक:॥ ९॥

‘जो क्रियमाण कर्मके फलका ज्ञान या विचार न करके केवल कर्मकी ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलनेके समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवालेको हुआ करता है॥ ९॥

सोऽहमाम्रवणं छित्त्वा पलाशांश्च न्यषेचयम्।

रामं फलागमे त्यक्त्वा पश्चाच्छोचामि दुर्मति:॥ १०॥

‘मैंने भी आमका वन काटकर पलाशोंको ही सींचा है, इस कर्मके फलकी प्राप्तिके समय अब श्रीरामको खोकर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ। मेरी बुद्धि कैसी खोटी है?॥

लब्धशब्देन कौसल्ये कुमारेण धनुष्मता।

कुमार: शब्दवेधीति मया पापमिदं कृतम्॥ ११॥

‘कौसल्ये! पिताके जीवनकालमें जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धरके रूपमें मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि ‘राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं।’ इसी ख्यातिमें पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था (जिसे अभी बताऊँगा)॥ ११॥

तदिदं मेऽनुसम्प्राप्तं देवि दु:खं स्वयंकृतम्।

सम्मोहादिह बालेन यथा स्याद् भक्षितं विषम्॥ १२॥

‘देवि! उस अपने ही किये हुए कुकर्मका फल मुझे इस महान् दु:खके रूपमें प्राप्त हुआ है। जैसे कोई बालक अज्ञानवश विष खा ले तो उसे भी वह विष मार ही डालता है, उसी प्रकार मोह या अज्ञानवश किये हुए दुष्कर्मका फल भी यहाँ मुझे भोगना पड़ रहा है॥

यथान्य: पुरुष: कश्चित् पलाशैर्मोहितो भवेत्।

एवं मयाप्यविज्ञातं शब्दवेध्यमिदं फलम्॥ १३॥

‘जैसे दूसरा कोई गँवार मनुष्य पलाशके फूलोंपर ही मोहित हो उसके कड़वे फलको नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी ‘शब्दवेधी बाण-विद्या’ की प्रशंसा सुनकर उसपर लट्टू हो गया। उसके द्वारा ऐसा क्रूरतापूर्ण पापकर्म बन सकता है और ऐसा भयंकर फल प्राप्त हो सकता है, इसका ज्ञान मुझे नहीं हुआ॥ १३॥

देव्यनूढा त्वमभवो युवराजो भवाम्यहम्।

तत: प्रावृडनुप्राप्ता मम कामविवर्धिनी॥ १४॥

‘देवि! तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था और मैं अभी युवराज ही था, उन्हीं दिनोंकी बात है। मेरी कामभावनाको बढ़ानेवाली वर्षा ऋतु आयी॥ १४॥

अपास्य हि रसान् भौमांस्तप्त्वा च जगदंशुभि:।

परेताचरितां भीमां रविराचरते दिशम्॥ १५॥

‘सूर्यदेव पृथ्वीके रसोंको सुखाकर और जगत्को अपनी किरणोंसे भलीभाँति संतप्त करके जिसमें यमलोकवर्ती प्रेत विचरा करते हैं, उस भयंकर दक्षिण दिशामें संचरण करते थे॥ १५॥

उष्णमन्तर्दधे सद्य: स्निग्धा ददृशिरे घना:।

ततो जहृषिरे सर्वे भेकसारङ्गबर्हिण:॥ १६॥

‘सब ओर सजल मेघ दृष्टिगोचर होने लगे और गरमी तत्काल शान्त हो गयी; इससे समस्त मेढकों, चातकों और मयूरोंमें हर्ष छा गया॥ १६॥

क्लिन्नपक्षोत्तरा: स्नाता: कृच्छ्रादिव पतत्त्रिण:।

वृष्टिवातावधूताग्रान् पादपानभिपेदिरे॥ १७॥

‘पक्षियोंकी पाँखें ऊपरसे भींग गयी थीं। वे नहा उठे थे और बड़ी कठिनाईसे उन वृक्षोंतक पहुँच पाते थे, जिनकी डालियोंके अग्रभाग वर्षा और वायुके झोकोंसे झूम रहे थे॥ १७॥

पतितेनाम्भसाऽऽच्छन्न: पतमानेन चासकृत्।

आबभौ मत्तसारङ्गस्तोयराशिरिवाचल:॥ १८॥

‘गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जलसे आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वतके समान प्रतीत होता था॥ १८॥

पाण्डुरारुणवर्णानि स्रोतांसि विमलान्यपि।

सुस्रुवुर्गिरिधातुभ्य: सभस्मानि भुजंगवत्॥ १९॥

‘पर्वतोंसे गिरनेवाले स्रोत या झरने निर्मल होनेपर भी पर्वतीय धातुओंके सम्पर्कसे श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सर्पोंकी भाँति कुटिल गतिसे बह रहे थे॥ १९॥

तस्मिन्नतिसुखे काले धनुष्मानिषुमान् रथी।

व्यायामकृतसंकल्प: सरयूमन्वगां नदीम्॥ २०॥

‘वर्षा ऋतुके उस अत्यन्त सुखद सुहावने समयमें मैं धनुष-बाण लेकर रथपर सवार हो शिकार खेलनेके लिये सरयू नदीके तटपर गया॥ २०॥

निपाने महिषं रात्रौ गजं वाभ्यागतं मृगम्।

अन्यद् वा श्वापदं किंचिज्जिघांसुरजितेन्द्रिय:॥ २१॥

‘मेरी इन्द्रियाँ मेरे वशमें नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीनेके घाटपर रातके समय जब कोई उपद्रवकारी भैंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा॥ २१॥

अथान्धकारे त्वश्रौषं जले कुम्भस्य पूर्यत:।

अचक्षुर्विषये घोषं वारणस्येव नर्दत:॥ २२॥

‘उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानीमें घड़ा भरनेकी आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँतक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथीके पानी पीते समय होनेवाले शब्दके समान जान पड़ी॥ २२॥

ततोऽहं शरमुद्धृत्य दीप्तमाशीविषोपमम्।

शब्दं प्रति गजप्रेप्सुरभिलक्ष्यमपातयम्॥ २३॥

‘तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूँड़में पानी खींच रहा होगा; अत: वही मेरे बाणका निशाना बनेगा। तरकससे एक तीर निकाला और उस शब्दको लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्पके समान भयंकर था॥ २३॥

अमुञ्चं निशितं बाणमहमाशीविषोपमम्।

तत्र वागुषसि व्यक्ता प्रादुरासीद् वनौकस:॥ २४॥

हा हेति पततस्तोये बाणाद् व्यथितमर्मण:।

तस्मिन्निपतिते भूमौ वागभूत् तत्र मानुषी॥ २५॥

‘वह उष:कालकी वेला थी। विषैले सर्पके सदृश उस तीखे बाणको मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानीमें गिरते हुए किसी वनवासीका हाहाकार मुझे स्पष्टरूपसे सुनायी दिया। मेरे बाणसे उसके मर्ममें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस पुरुषके धराशायी हो जानेपर वहाँ यह मानव-वाणी प्रकट हुई—सुनायी देने लगी—॥ २४-२५॥

कथमस्मद्विधे शस्त्रं निपतेच्च तपस्विनि।

प्रविविक्तां नदीं रात्रावुदाहारोऽहमागत:॥ २६॥

‘‘आह! मेरे-जैसे तपस्वीपर शस्त्रका प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदीके इस एकान्त तटपर रातमें पानी लेनेके लिये आया था॥ २६॥

इषुणाभिहत: केन कस्य वापकृतं मया।

ऋषेर्हि न्यस्तदण्डस्य वने वन्येन जीवत:॥ २७॥

कथं नु शस्त्रेण वधो मद्विधस्य विधीयते।

जटाभारधरस्यैव वल्कलाजिनवासस:॥ २८॥

को वधेन ममार्थी स्यात् किं वास्यापकृतं मया।

एवं निष्फलमारब्धं केवलानर्थसंहितम्॥ २९॥

‘‘किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवोंको पीड़ा देनेकी वृत्तिका त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वनमें रहकर जंगली फल-मूलोंसे ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्यका शस्त्रसे वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहननेवाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करनेमें किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारनेवालेका क्या अपराध किया था? मेरी हत्याका प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया! इससे किसीको कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा॥ २७—२९॥

न क्वचित् साधु मन्येत यथैव गुरुतल्पगम्।

नेमं तथानुशोचामि जीवितक्षयमात्मन:॥ ३०॥

मातरं पितरं चोभावनुशोचामि मद्वधे।

तदेतन्मिथुनं वृद्धं चिरकालभृतं मया॥ ३१॥

मयि पञ्चत्वमापन्ने कां वृत्तिं वर्तयिष्यति।

वृद्धौ च मातापितरावहं चैकेषुणा हत:॥ ३२॥

केन स्म निहता: सर्वे सुबालेनाकृतात्मना।

‘‘इस हत्यारेको संसारमें कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामीको। मुझे अपने इस जीवनके नष्ट होनेकी उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जानेसे मेरे माता-पिताको जो कष्ट होगा, उसीके लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है। मैंने इन दोनों वृद्धोंका बहुत समयसे पालन-पोषण किया है; अब मेरे शरीरके न रहनेपर ये किस प्रकार जीवन-निर्वाह करेंगे? घातकने एक ही बाणसे मुझे और मेरे बूढ़े माता-पिताको भी मौतके मुखमें डाल दिया। किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुषने हम सब लोगोंका एक साथ ही वध कर डाला?’॥ ३०—३२/

तां गिरं करुणं श्रुत्वा मम धर्मानुकांक्षिण:॥ ३३॥

कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद् भुवि।

‘ये करुणाभरे वचन सुनकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई। कहाँ तो मैं धर्मकी अभिलाषा रखनेवाला था और कहाँ यह अधर्मका कार्य बन गया। उस समय मेरे हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥

तस्याहं करुणं श्रुत्वा ऋषेर्विलपतो निशि॥ ३४॥

सम्भ्रान्त: शोकवेगेन भृशमासं विचेतन:।

‘रातमें विलाप करते हुए ऋषिका वह करुण वचन सुनकर मैं शोकके वेगसे घबरा उठा। मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त-सी होने लगी॥ ३४/

तं देशमहमागम्य दीनसत्त्व: सुदुर्मना:॥ ३५॥

अपश्यमिषुणा तीरे सरय्वास्तापसं हतम्।

अवकीर्णजटाभारं प्रविद्धकलशोदकम्॥ ३६॥

पांसुशोणितदिग्धाङ्गं शयानं शल्यवेधितम्।

स मामुद्वीक्ष्य नेत्राभ्यां त्रस्तमस्वस्थचेतनम्॥ ३७॥

इत्युवाच वच: क्रूरं दिधक्षन्निव तेजसा।

‘मेरे हृदयमें दीनता छा गयी, मन बहुत दु:खी हो गया। सरयूके किनारे उस स्थानपर जाकर मैंने देखा—एक तपस्वी बाणसे घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़ेका जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खूनमें सना हुआ है। वे बाणसे बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रोंसे मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेजसे मुझे भस्म कर देना चाहते हों। वे कठोर वाणीमें यों बोले—॥ ३५—३७/

किं तवापकृतं राजन् वने निवसता मया॥ ३८॥

जिहीर्षुरम्भो गुर्वर्थं यदहं ताडितस्त्वया।

‘‘राजन्! वनमें रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिताके लिये पानी लेनेकी इच्छासे यहाँ आया था॥ ३८/

एकेन खलु बाणेन मर्मण्यभिहते मयि॥ ३९॥

द्वावन्धौ निहतौ वृद्धौ माता जनयिता च मे।

‘‘तुमने एक ही बाणसे मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता-पिताको भी मार डाला॥ ३९/

तौ नूनं दुर्बलावन्धौ मत्प्रतीक्षौ पिपासितौ॥ ४०॥

चिरमाशां कृतां कष्टां तृष्णां संधारयिष्यत:।

‘‘वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्याससे पीडि़त होकर वे मेरी प्रतीक्षामें बैठे होंगे। वे देरतक मेरे आगमनकी आशा लगाये दु:खदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे॥ ४०/

न नूनं तपसो वास्ति फलयोग: श्रुतस्य वा॥ ४१॥

पिता यन्मां न जानीते शयानं पतितं भुवि।

‘‘अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञानका कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजीको यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वीपर गिरकर मृत्युशय्यापर पड़ा हुआ हूँ॥ ४१/

जानन्नपि च किं कुर्यादशक्तश्चापरिक्रम:॥ ४२॥

भिद्यमानमिवाशक्तस्त्रातुमन्यो नगो नगम्।

‘‘यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल-फिर भी नहीं सकते हैं। जैसे वायु आदिके द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्षको कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते॥ ४२/

पितुस्त्वमेव मे गत्वा शीघ्रमाचक्ष्व राघव॥ ४३॥

न त्वामनुदहेत् क्रुद्धो वनमग्निरिवैधित:।

‘‘अत: रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिताको यह समाचार सुना दो। (यदि स्वयं कह दोगे तो) जैसे प्रज्वलित अग्नि समूचे वनको जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोधमें भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे॥ ४३/

इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रम:॥ ४४॥

तं प्रसादय गत्वा त्वं न त्वा संकुपित: शपेत्।

‘‘राजन्! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिताका आश्रम है। तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें॥ ४४/

विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशित: शर:॥ ४५॥

रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा।

‘‘राजन्! मेरे शरीरसे इस बाणको निकाल दो। यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थानको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे नदीके जलका वेग उसके कोमल बालुकामय ऊँचे तटको छिन्न-भिन्न कर देता है’॥ ४५/

सशल्य: क्लिश्यते प्राणैर्विशल्यो विनशिष्यति॥ ४६॥

इति मामविशच्चिन्ता तस्य शल्यापकर्षणे।

दु:खितस्य च दीनस्य मम शोकातुरस्य च॥ ४७॥

लक्षयामास स ऋषिश्चिन्तां मुनिसुतस्तदा।

‘मुनिकुमारकी यह बात सुनकर मेरे मनमें यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणोंसे भी हाथ धो बैठते हैं। इस प्रकार बाणको निकालनेके विषयमें मुझ दीन-दु:खी और शोकाकुल दशरथकी इस चिन्ताको उस समय मुनिकुमारने लक्ष्य किया॥ ४६-४७/

ताम्यमानं स मां कृच्छ्रादुवाच परमार्थवित्॥ ४८॥

सीदमानो विवृत्ताङ्गोऽचेष्टमानो गत: क्षयम्।

संस्तभ्य शोकं धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम्॥ ४९॥

‘यथार्थ बातको समझ लेनेवाले उन महर्षिने मुझे अत्यन्त ग्लानिमें पड़ा हुआ देख बड़े कष्टसे कहा—‘राजन्! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग-अङ्गमें तड़पन हो रही है। मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती। अब मैं मृत्युके समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्यके द्वारा शोकको रोककर अपने चित्तको स्थिर करता हूँ (अब मेरी बात सुनो)॥ ४८-४९॥

ब्रह्महत्याकृतं तापं हृदयादपनीयताम्।

न द्विजातिरहं राजन् मा भूत् ते मनसो व्यथा॥ ५०॥

‘‘मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी—इस चिन्ताको अपने हृदयसे निकाल दो। राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मनमें ब्राह्मणवधको लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये॥ ५०॥

शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप।

इतीव वदत: कृच्छ्राद् बाणाभिहतमर्मण:॥ ५१॥

विघूर्णतो विचेष्टस्य वेपमानस्य भूतले।

तस्य त्वाताम्यमानस्य तं बाणमहमुद्धरम्।

स मामुद्वीक्ष्य संत्रस्तो जहौ प्राणांस्तपोधन:॥ ५२॥

‘‘नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिताद्वारा शूद्रजातीय माताके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ।’ बाणसे मर्ममें आघात पहुँचनेके कारण वे बड़े कष्टसे इतना ही कह सके। उनकी आँखें घूम रही थीं। उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी। वे पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्टका अनुभव करते थे। उस अवस्थामें मैंने उनके शरीरसे उस बाणको निकाल दिया। फिर तो अत्यन्त भयभीत हो उन तपोधनने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये॥

जलार्द्रगात्रं तु विलप्य कृच्छ्रं

मर्मव्रणं संततमुच्छ्वसन्तम्।

तत: सरय्वां तमहं शयानं

समीक्ष्य भद्रे सुभृशं विषण्ण:॥ ५३॥

‘पानीमें गिरनेके कारण उनका सारा शरीर भीग गया था। मर्ममें आघात लगनेके कारण बड़े कष्टसे विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने प्राणोंका त्याग किया था। कल्याणी कौसल्ये! उस अवस्थामें सरयूके तटपर मरे पड़े मुनिपुत्रको देखकर मुझे बड़ा दु:ख हुआ’॥ ५३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग:॥ ६३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

 


चतु:षष्टितम: सर्ग:

राजा दशरथका अपने द्वारा मुनिकुमारके वधसे दु:खी हुए उनके माता-पिताके विलाप और उनके दिये हुए शापका प्रसंग सुनाकर कौसल्याके समीप रोते-बिलखते हुए आधी रातके समय अपने प्राणोंको त्याग देना

वधमप्रतिरूपं तु महर्षेस्तस्य राघव:।

विलपन्नेव धर्मात्मा कौसल्यामिदमब्रवीत्॥ १॥

उन महर्षिके अनुचित वधका स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेशने अपने पुत्रके लिये विलाप करते हुए ही रानी कौसल्यासे इस प्रकार कहा—॥ १॥

तदज्ञानान्महत्पापं कृत्वा संकुलितेन्द्रिय:।

एकस्त्वचिन्तयं बुद्ध्या कथं नु सुकृतं भवेत्॥ २॥

‘देवि! अनजानमें यह महान् पाप कर डालनेके कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं। मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपायसे मेरा कल्याण हो?॥ २॥

ततस्तं घटमादाय पूर्णं परमवारिणा।

आश्रमं तमहं प्राप्य यथाख्यातपथं गत:॥ ३॥

‘तदनन्तर उस घड़ेको उठाकर मैंने सरयूके उत्तम जलसे भरा और उसे लेकर मुनिकुमारके बताये हुए मार्गसे उनके आश्रमपर गया॥ ३॥

तत्राहं दुर्बलावन्धौ वृद्धावपरिणायकौ।

अपश्यं तस्य पितरौ लूनपक्षाविव द्विजौ॥ ४॥

‘वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता-पिताको देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था। उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियोंके समान थी॥ ४॥

तन्निमित्ताभिरासीनौ कथाभिरपरिश्रमौ।

तामाशां मत्कृते हीनावुपासीनावनाथवत्॥ ५॥

‘वे अपने पुत्रकी ही चर्चा करते हुए उसके आनेकी आशा लगाये बैठे थे। उस चर्चाके कारण उन्हें कुछ परिश्रम या थकावटका अनुभव नहीं होता था। यद्यपि मेरे कारण उनकी वह आशा धूलमें मिल चुकी थी तो भी वे उसीके आसरे बैठे थे। अब वे दोनों सर्वथा अनाथ-से हो गये थे॥ ५॥

शोकोपहतचित्तश्च भयसंत्रस्तचेतन:।

तच्चाश्रमपदं गत्वा भूय: शोकमहं गत:॥ ६॥

‘मेरा हृदय पहलेसे ही शोकके कारण घबराया हुआ था। भयसे मेरा होश ठिकाने नहीं था। मुनिके आश्रमपर पहुँचकर मेरा वह शोक और भी अधिक हो गया॥ ६॥

पदशब्दं तु मे श्रुत्वा मुनिर्वाक्यमभाषत।

किं चिरायसि मे पुत्र पानीयं क्षिप्रमानय॥ ७॥

‘मेरे पैरोंकी आहट सुनकर वे मुनि इस प्रकार बोले—‘बेटा! देर क्यों लगा रहे हो? शीघ्र पानी ले आओ॥ ७॥

यन्निमित्तमिदं तात सलिले क्रीडितं त्वया।

उत्कण्ठिता ते मातेयं प्रविश क्षिप्रमाश्रमम्॥ ८॥

‘‘तात! जिस कारणसे तुमने बड़ी देरतक जलमें क्रीड़ा की है, उसी कारणको लेकर तुम्हारी यह माता तुम्हारे लिये उत्कण्ठित हो गयी है; अत: शीघ्र ही आश्रमके भीतर प्रवेश करो॥ ८॥

यद् व्यलीकं कृतं पुत्र मात्रा ते यदि वा मया।

न तन्मनसि कर्तव्यं त्वया तात तपस्विना॥ ९॥

‘‘बेटा! तात! यदि तुम्हारी माताने अथवा मैंने तुम्हारा कोई अप्रिय किया हो तो उसे तुम्हें अपने मनमें नहीं लाना चाहिये; क्योंकि तुम तपस्वी हो॥ ९॥

त्वं गतिस्त्वगतीनां च चक्षुस्त्वं हीनचक्षुषाम्।

समासक्तास्त्वयि प्राणा: कथं त्वं नाभिभाषसे॥ १०॥

‘हम असहाय हैं, तुम्हीं हमारे सहायक हो। हम अन्धे हैं, तुम्हीं हमारे नेत्र हो। हमलोगोंके प्राण तुम्हींमें अटके हुए हैं। बताओ, तुम बोलते क्यों नहीं हो?’॥ १०॥

मुनिमव्यक्तया वाचा तमहं सज्जमानया।

हीनव्यञ्जनया प्रेक्ष्य भीतचित्त इवाब्रुवम्॥ ११॥

‘मुनिको देखते ही मेरे मनमें भय-सा समा गया। मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। कितने अक्षरोंका उच्चारण नहीं हो पाता था। इस प्रकार अस्पष्ट वाणीमें मैंने बोलनेका प्रयास किया॥ ११॥

मनस: कर्म चेष्टाभिरभिसंस्तभ्य वाग्बलम्।

आचचक्षे त्वहं तस्मै पुत्रव्यसनजं भयम्॥ १२॥

‘मानसिक भयको बाहरी चेष्टाओंसे दबाकर मैंने कुछ कहनेकी क्षमता प्राप्त की और मुनिपर पुत्रकी मृत्युसे जो संकट आ पड़ा था, वह उनपर प्रकट करते हुए कहा—॥ १२॥

क्षत्रियोऽहं दशरथो नाहं पुत्रो महात्मन:।

सज्जनावमतं दु:खमिदं प्राप्तं स्वकर्मजम्॥ १३॥

‘‘महात्मन्! मैं आपका पुत्र नहीं, दशरथ नामका एक क्षत्रिय हूँ। मैंने अपने कर्मवश यह ऐसा दु:ख पाया है, जिसकी सत्पुरुषोंने सदा निन्दा की है॥ १३॥

भगवंश्चापहस्तोऽहं सरयूतीरमागत:।

जिघांसु: श्वापदं किंचिन्निपाने वागतं गजम्॥ १४॥

‘‘भगवन्! मैं धनुष-बाण लेकर सरयूके तटपर आया था। मेरे आनेका उद्देश्य यह था कि कोई जंगली हिंसक पशु अथवा हाथी घाटपर पानी पीनेके लिये आवे तो मैं उसे मारूँ॥ १४॥

तत: श्रुतो मया शब्दो जले कुम्भस्य पूर्यत:।

द्विपोऽयमिति मत्वाहं बाणेनाभिहतो मया॥ १५॥

‘‘थोड़ी देर बाद मुझे जलमें घड़ा भरनेका शब्द सुनायी पड़ा। मैंने समझा कोई हाथी आकर पानी पी रहा है, इसलिये उसपर बाण चला दिया॥ १५॥

गत्वा तस्यास्ततस्तीरमपश्यमिषुणा हृदि।

विनिर्भिन्नं गतप्राणं शयानं भुवि तापसम्॥ १६॥

‘‘फिर सरयूके तटपर जाकर देखा कि मेरा बाण एक तपस्वीकी छातीमें लगा है और वे मृतप्राय होकर धरतीपर पड़े हैं॥ १६॥

ततस्तस्यैव वचनादुपेत्य परितप्यत:।

स मया सहसा बाण उद्धृतो मर्मतस्तदा॥ १७॥

‘‘उस बाणसे उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी, अत: उस समय उन्हींके कहनेसे मैंने सहसा वह बाण उनके मर्म- स्थानसे निकाल दिया॥ १७॥

स चोद्धृतेन बाणेन सहसा स्वर्गमास्थित:।

भगवन्तावुभौ शोचन्नन्धाविति विलप्य च॥ १८॥

‘‘बाण निकलनेके साथ ही वे तत्काल स्वर्ग सिधार गये। मरते समय उन्होंने आप दोनों पूजनीय अंधे पिता-माताके लिये बड़ा शोक और विलाप किया था॥ १८॥

अज्ञानाद् भवत: पुत्र: सहसाभिहतो मया।

शेषमेवं गते यत् स्यात् तत् प्रसीदतु मे मुनि:॥ १९॥

‘‘इस प्रकार अनजानमें मेरे हाथसे आपके पुत्रका वध हो गया है। ऐसी अवस्थामे मेरे प्रति जो शाप या अनुग्रह शेष हो, उसे देनेके लिये आप महर्षि मुझपर प्रसन्न हों’॥ १९॥

स तच्छ्रुत्वा वच: क्रूरं मया तदघशंसिना।

नाशकत् तीव्रमायासं स कर्तुं भगवानृषि:॥ २०॥

‘मैंने अपने मुँहसे अपना पाप प्रकट कर दिया था, इसलिये मेरी क्रूरतासे भरी हुई वह बात सुनकर भी वे पूज्यपाद महर्षि मुझे कठोर दण्ड—भस्म हो जानेका शाप नहीं दे सके॥ २०॥

स बाष्पपूर्णवदनो नि:श्वसन् शोकमूर्च्छित:।

मामुवाच महातेजा: कृताञ्जलिमुपस्थितम्॥ २१॥

‘उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वे शोकसे मूर्च्छित होकर दीर्घ नि:श्वास लेने लगे। मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था। उस समय उन महातेजस्वी मुनिने मुझसे कहा—॥ २१॥

यद्येतदशुभं कर्म न स्म मे कथये: स्वयम्।

फलेन्मूर्धा स्म ते राजन् सद्य: शतसहस्रधा॥ २२॥

‘‘राजन्! यदि यह अपना पापकर्म तुम स्वयं यहाँ आकर न बताते तो शीघ्र ही तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों-हजारों टुकड़े हो जाते॥ २२॥

क्षत्रियेण वधो राजन् वानप्रस्थे विशेषत:।

ज्ञानपूर्वं कृत: स्थानाच्च्यावयेदपि वज्रिणम्॥ २३॥

‘‘नरेश्वर! यदि क्षत्रिय जान-बूझकर विशेषत: किसी वानप्रस्थीका वध कर डाले तो वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, वह उसे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देता है॥

सप्तधा तु भवेन्मूर्धा मुनौ तपसि तिष्ठति।

ज्ञानाद् विसृजत: शस्त्रं तादृशे ब्रह्मवादिनि॥ २४॥

‘‘तपस्यामें लगे हुए वैसे ब्रह्मवादी मुनिपर जान-बूझकर शस्त्रका प्रहार करनेवाले पुरुषके मस्तकके सात टुकड़े हो जाते हैं॥ २४॥

अज्ञानाद्धि कृतं यस्मादिदं ते तेन जीवसे।

अपि ह्यकुशलं न स्याद् राघवाणां कुतो भवान्॥ २५॥

‘‘तुमने अनजानमें यह पाप किया है, इसीलिये अभीतक जीवित हो। यदि जान-बूझकर किया होता तो समस्त रघुवंशियोंका कुल ही नष्ट हो जाता, अकेले तुम्हारी तो बात ही क्या है?’॥ २५॥

नय नौ नृप तं देशमिति मां चाभ्यभाषत।

अद्य तं द्रष्टुमिच्छाव: पुत्रं पश्चिमदर्शनम्॥ २६॥

‘उन्होंने मुझसे यह भी कहा—‘नरेश्वर! तुम हम दोनोंको उस स्थानपर ले चलो, जहाँ हमारा पुत्र मरा पड़ा है। इस समय हम उसे देखना चाहते हैं। यह हमारे लिये उसका अन्तिम दर्शन होगा’॥ २६॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रकीर्णाजिनवाससम्।

शयानं भुवि नि:संज्ञं धर्मराजवशं गतम्॥ २७॥

अथाहमेकस्तं देशं नीत्वा तौ भृशदु:खितौ।

अस्पर्शयमहं पुत्रं तं मुनिं सह भार्यया॥ २८॥

‘तब मैं अकेला ही अत्यन्त दु:खमें पड़े हुए उन दम्पतिको उस स्थानपर ले गया, जहाँ उनका पुत्र कालके अधीन होकर पृथ्वीपर अचेत पड़ा था। उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे थे, मृगचर्म और वस्त्र बिखरे पड़े थे। मैंने पत्नीसहित मुनिको उनके पुत्रके शरीरका स्पर्श कराया॥ २७-२८॥

तौ पुत्रमात्मन: स्पृष्ट्वा तमासाद्य तपस्विनौ।

निपेततु: शरीरेऽस्य पिता चैनमुवाच ह॥ २९॥

‘वे दोनों तपस्वी अपने उस पुत्रका स्पर्श करके उसके अत्यन्त निकट जाकर उसके शरीरपर गिर पड़े। फिर पिताने पुत्रको सम्बोधित करके उससे कहा—॥ २९॥

नाभिवादयसे माद्य न च मामभिभाषसे।

किं च शेषे तु भूमौ त्वं वत्स किं कुपितो ह्यसि॥ ३०॥

‘‘बेटा! आज तुम मुझे न तो प्रणाम करते हो और न मुझसे बोलते ही हो। तुम धरतीपर क्यों सो रहे हो? क्या तुम हमसे रूठ गये हो?॥ ३०॥

नन्वहं तेऽप्रिय: पुत्र मातरं पश्य धार्मिकीम्।

किं च नालिङ्गसे पुत्र सुकुमार वचो वद॥ ३१॥

‘‘बेटा! यदि मैं तुम्हारा प्रिय नहीं हूँ तो तुम अपनी इस धर्मात्मा माताकी ओर तो देखो। तुम इसके हृदयसे क्यों नहीं लग जाते हो? वत्स! कुछ तो बोलो॥ ३१॥

कस्य वा पररात्रेऽहं श्रोष्यामि हृदयङ्गमम्।

अधीयानस्य मधुरं शास्त्रं वान्यद् विशेषत:॥ ३२॥

‘‘अब पिछली रातमें मधुर स्वरसे शास्त्र या पुराण आदि अन्य किसी ग्रन्थका विशेषरूपसे स्वाध्याय करते हुए किसके मुँहसे मैं मनोरम शास्त्रचर्चा सुनूँगा?॥ ३२॥

को मां संध्यामुपास्यैव स्नात्वा हुतहुताशन:।

श्लाघयिष्यत्युपासीन: पुत्रशोकभयार्दितम्॥ ३३॥

‘‘अब कौन स्नान, संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर पुत्रशोकके भयसे पीडि़त हुए मुझ बूढ़ेको सान्त्वना देता हुआ मेरी सेवा करेगा?॥ ३३॥

कन्दमूलफलं हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम्।

भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम् ॥ ३४॥

‘‘अब कौन ऐसा है, जो कन्द, मूल और फल लाकर मुझ अकर्मण्य, अन्नसंग्रहसे रहित और अनाथको प्रिय अतिथिकी भाँति भोजन करायेगा॥ ३४॥

इमामन्धां च वृद्धां च मातरं ते तपस्विनीम्।

कथं पुत्र भरिष्यामि कृपणां पुत्रगर्धिनीम्॥ ३५॥

‘‘बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्रके लिये उत्कण्ठित रहनेवाली है। मैं (स्वयं अन्धा होकर) इसका भरण-पोषण कैसे करूँगा?॥

तिष्ठ मा मा गम: पुत्र यमस्य सदनं प्रति।

श्वो मया सह गन्तासि जनन्या च समेधित:॥ ३६॥

‘‘पुत्र! ठहरो, आज यमराजके घर न जाओ। कल मेरे और अपनी माताके साथ चलना॥ ३६॥

उभावपि च शोकार्तावनाथौ कृपणौ वने।

क्षिप्रमेव गमिष्यावस्त्वया हीनौ यमक्षयम्॥ ३७॥

‘‘हम दोनों शोकसे आर्त, अनाथ और दीन हैं। तुम्हारे न रहनेपर हम शीघ्र ही यमलोककी राह लेंगे॥

ततो वैवस्वतं दृष्ट्वा तं प्रवक्ष्यामि भारतीम्।

क्षमतां धर्मराजो मे बिभृयात् पितरावयम्॥ ३८॥

‘‘तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराजका दर्शन करके मैं उनसे यह बात कहूँगा—धर्मराज मेरे अपराधको क्षमा करें और मेरे पुत्रको छोड़ दें, जिससे यह अपने माता-पिताका भरण-पोषण कर सके॥ ३८॥

दातुमर्हति धर्मात्मा लोकपालो महायशा:।

ईदृशस्य ममाक्षय्यामेकामभयदक्षिणाम्॥ ३९॥

‘‘ये धर्मात्मा हैं, महायशस्वी लोकपाल हैं। मुझ-जैसे अनाथको वह एक बार अभय दान दे सकते हैं॥

अपापोऽसि यथा पुत्र निहत: पापकर्मणा।

तेन सत्येन गच्छाशु ये लोकास्त्वस्त्रयोधिनाम्॥ ४०॥

यां हि शूरा गतिं यान्ति संग्रामेष्वनिर्वितन:।

हतास्त्वभिमुखा: पुत्र गतिं तां परमां व्रज॥ ४१॥

‘‘बेटा! तुम निष्पाप हो, किंतु एक पापकर्मा क्षत्रियने तुम्हारा वध किया है, इस कारण मेरे सत्यके प्रभावसे तुम शीघ्र ही उन लोकोंमें जाओ, जो अस्त्रयोधी शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं। बेटा! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर सम्मुख युद्धमें मारे जानेपर जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसी उत्तम गतिको तुम भी जाओ॥ ४०-४१॥

यां गतिं सगर: शैब्यो दिलीपो जनमेजय:।

नहुषो धुन्धुमारश्च प्राप्तास्तां गच्छ पुत्रक॥ ४२॥

‘वत्स! राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जिस गतिको प्राप्त हुए हैं, वही तुम्हें भी मिले॥ ४२॥

या गति: सर्वभूतानां स्वाध्यायात् तपसश्च या।

भूमिदस्याहिताग्नेश्च एकपत्नीव्रतस्य च॥ ४३॥

गोसहस्रप्रदातृणां गुरुसेवाभृतामपि।

देहन्यासकृतां या च तां गतिं गच्छ पुत्रक॥ ४४॥

‘‘स्वाध्याय और तपस्यासे समस्त प्राणियोंके आश्रयभूत जिस परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो। वत्स! भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नीव्रती, एक हजार गौओंका दान करनेवाले, गुरुकी सेवा करनेवाले तथा महाप्रस्थान आदिके द्वारा देहत्याग करनेवाले पुरुषोंको जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो॥

नहि त्वस्मिन् कुले जातो गच्छत्यकुशलां गतिम्।

स तु यास्यति येन त्वं निहतो मम बान्धव:॥ ४५॥

‘‘हम-जैसे तपस्वियोंके इस कुलमें पैदा हुआ कोई पुरुष बुरी गतिको नहीं प्राप्त हो सकता। बुरी गति तो उसकी होगी, जिसने मेरे बान्धवरूप तुम्हें अकारण मारा है?’॥ ४५॥

एवं स कृपणं तत्र पर्यदेवयतासकृत्।

ततोऽस्मै कर्तुमुदकं प्रवृत्त: सह भार्यया॥ ४६॥

‘इस प्रकार वे दीनभावसे बारम्बार विलाप करने लगे। तत्पश्चात् अपनी पत्नीके साथ वे पुत्रको जलाञ्जलि देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुए॥ ४६॥

स तु दिव्येन रूपेण मुनिपुत्र: स्वकर्मभि:।

स्वर्गमध्यारुहत् क्षिप्रं शक्रेण सह धर्मवित्॥ ४७॥

‘इसी समय वह धर्मज्ञ मुनिकुमार अपने पुण्य-कर्मोंके प्रभावसे दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्रके साथ स्वर्गको जाने लगा॥ ४७॥

आबभाषे च तौ वृद्धौ शक्रेण सह तापस:।

आश्वस्य च मुहूर्तं तु पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ ४८॥

‘इन्द्रसहित उस तपस्वीने अपने दोनों बूढ़े पिता-माताको एक मुहूर्ततक आश्वासन देते हुए उनसे बातचीत की; फिर वह अपने पितासे बोला—॥ ४८॥

स्थानमस्मि महत् प्राप्तो भवतो: परिचारणात्।

भवन्तावपि च क्षिप्रं मम मूलमुपैष्यथ:॥ ४९॥

‘‘मैं आप दोनोंकी सेवासे महान् स्थानको प्राप्त हुआ हूँ, अब आपलोग भी शीघ्र ही मेरे पास आ जाइयेगा’॥ ४९॥

एवमुक्त्वा तु दिव्येन विमानेन वपुष्मता।

आरुरोह दिवं क्षिप्रं मुनिपुत्रो जितेन्द्रिय:॥ ५०॥

‘यह कहकर वह जितेन्द्रिय मुनिकुमार उस सुन्दर आकारवाले दिव्य विमानसे शीघ्र ही देवलोकको चला गया॥ ५०॥

स कृत्वाथोदकं तूर्णं तापस: सह भार्यया।

मामुवाच महातेजा: कृताञ्जलिमुपस्थितम्॥ ५१॥

‘तदनन्तर पत्नीसहित उन महातेजस्वी तपस्वी मुनिने तुरंत ही पुत्रको जलाञ्जलि देकर हाथ जोड़े खड़े हुए मुझसे कहा—॥ ५१॥

अद्यैव जहि मां राजन् मरणे नास्ति मे व्यथा।

य: शरेणैकपुत्रं मां त्वमकार्षीरपुत्रकम्॥ ५२॥

‘‘राजन्! तुम आज ही मुझे भी मार डालो; अब मरनेमें मुझे कष्ट नहीं होगा। मेरे एक ही बेटा था, जिसे तुमने अपने बाणका निशाना बनाकर मुझे पुत्रहीन कर दिया॥ ५२॥

त्वयापि च यदज्ञानान्निहतो मे स बालक:।

तेन त्वामपि शप्स्येऽहं सुदु:खमतिदारुणम्॥ ५३॥

‘‘तुमने अज्ञानवश जो मेरे बालककी हत्या की है, उसके कारण मैं तुम्हें भी अत्यन्त भयंकर एवं भलीभाँति दु:ख देनेवाला शाप दूँगा॥ ५३॥

पुत्रव्यसनजं दु:खं यदेतन्मम साम्प्रतम्।

एवं त्वं पुत्रशोकेन राजन् कालं करिष्यसि॥ ५४॥

‘राजन्! इस समय पुत्रके वियोगसे मुझे जैसा कष्ट हो रहा है, ऐसा ही तुम्हें भी होगा। तुम भी पुत्रशोकसे ही कालके गालमें जाओगे॥ ५४॥

अज्ञानात्तु हतो यस्मात् क्षत्रियेण त्वया मुनि:।

तस्मात् त्वां नाविशत्याशु ब्रह्महत्या नराधिप॥ ५५॥

त्वामप्येतादृशो भाव: क्षिप्रमेव गमिष्यति।

जीवितान्तकरो घोरो दातारमिव दक्षिणाम्॥ ५६॥

‘‘नरेश्वर! क्षत्रिय होकर अनजानमें तुमने वैश्यजातीय मुनिका वध किया है, इसलिये शीघ्र ही तुम्हें ब्रह्महत्याका पाप तो नहीं लगेगा तथापि जल्दी ही तुम्हें भी ऐसी ही भयानक और प्राण लेनेवाली अवस्था प्राप्त होगी। ठीक उसी तरह, जैसे दक्षिणा देनेवाले दाताको उसके अनुरूप फल प्राप्त होता है,॥ ५५-५६॥

एवं शापं मयि न्यस्य विलप्य करुणं बहु।

चितामारोप्य देहं तन्मिथुनं स्वर्गमभ्ययात्॥ ५७॥

‘इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करते रहे; फिर वे दोनों पति-पत्नी अपने शरीरोंको जलती हुई चितामें डालकर स्वर्गको चले गये॥ ५७॥

तदेतच्चिन्तयानेन स्मृतं पापं मया स्वयम्।

तदा बाल्यात् कृतं देवि शब्दवेध्यनुकर्षिणा॥ ५८॥

‘देवि! इस प्रकार बालस्वभावके कारण मैंने पहले शब्दवेधी बाण मारकर और फिर उस मुनिके शरीरसे बाणको खींचकर जो उनका वधरूपी पाप किया था, वह आज इस पुत्रवियोगकी चिन्तामें पड़े हुए मुझे स्वयं ही स्मरण हो आया है॥ ५८॥

तस्यायं कर्मणो देवि विपाक: समुपस्थित:।

अपथ्यै: सह सम्भुक्ते व्याधिरन्नरसे यथा॥ ५९॥

तस्मान्मामागतं भद्रे तस्योदारस्य तद् वच:।

‘देवि! अपथ्य वस्तुओंके साथ अन्नरस ग्रहण कर लेनेपर जैसे शरीरमें रोग पैदा हो जाता है, उसी प्रकार यह उस पापकर्मका फल उपस्थित हुआ है। अत: कल्याणि! उन उदार महात्माका शापरूपी वचन इस समय मेरे पास फल देनेके लिये आ गया है’॥ ५९/

इत्युक्त्वा स रुदंस्त्रस्तो भार्यामाह तु भूमिप:॥ ६०॥

यदहं पुत्रशोकेन संत्यजिष्यामि जीवितम्।

चक्षुभ्यां त्वां न पश्यामि कौसल्ये त्वं हि मां स्पृश॥ ६१॥

ऐसा कहकर वे भूपाल मृत्युके भयसे त्रस्त हो अपनी पत्नीसे रोते हुए बोले—‘कौसल्ये! अब मैं पुत्रशोकसे अपने प्राणोंका त्याग करूँगा। इस समय मैं तुम्हें अपनी आँखोंसे देख नहीं पाता हूँ; तुम मेरा स्पर्श करो॥ ६०-६१॥

यमक्षयमनुप्राप्ता द्रक्ष्यन्ति नहि मानवा:।

यदि मां संस्पृशेद् राम: सकृदन्वारभेत वा॥ ६२॥

धनं वा यौवराज्यं वा जीवेयमिति मे मति:।

‘जो मनुष्य यमलोकमें जानेवाले (मरणासन्न) होते हैं, वे अपने बान्धवजनोंको नहीं देख पाते हैं। यदि श्रीराम आकर एक बार मेरा स्पर्श करें अथवा यह धन-वैभव और युवराजपद स्वीकार कर लें तो मेरा विश्वास है कि मैं जी सकता हूँ॥ ६२/

न तन्मे सदृशं देवि यन्मया राघवे कृतम्॥ ६३॥

सदृशं तत्तु तस्यैव यदनेन कृतं मयि।

‘देवि! मैंने श्रीरामके साथ जो बर्ताव किया है, वह मेरे योग्य नहीं था; परंतु श्रीरामने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, वह सर्वथा उन्हींके योग्य है॥ ६३/

दुर्वृत्तमपि क: पुत्रं त्यजेद् भुवि विचक्षण:॥ ६४॥

कश्च प्रव्राज्यमानो वा नासूयेत् पितरं सुत:।

‘कौन बुद्धिमान् पुरुष इस भूतलपर अपने दुराचारी पुत्रका भी परित्याग कर सकता है? (एक मैं हूँ, जिसने अपने धर्मात्मा पुत्रको त्याग दिया) तथा कौन ऐसा पुत्र है, जिसे घरसे निकाल दिया जाय और वह पिताको कोसेतक नहीं? (परंतु श्रीराम चुपचाप चले गये। उन्होंने मेरे विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा)॥ ६४/

चक्षुषा त्वां न पश्यामि स्मृतिर्मम विलुप्यते॥ ६५॥

दूता वैवस्वतस्यैते कौसल्ये त्वरयन्ति माम्।

‘कौसल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें नहीं देख पाती हैं, स्मरण-शक्ति भी लुप्त होती जा रही है। उधर देखो, ये यमराजके दूत मुझे यहाँसे ले जानेके लिये उतावले हो उठे हैं॥ ६५/

अतस्तु किं दु:खतरं यदहं जीवितक्षये॥ ६६॥

नहि पश्यामि धर्मज्ञं रामं सत्यपराक्रमम्।

‘इससे बढ़कर दु:ख मेरे लिये और क्या हो सकता है कि मैं प्राणान्तके समय सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ रामका दर्शन नहीं पा रहा हूँ॥ ६६/

तस्यादर्शनज: शोक: सुतस्याप्रतिकर्मण:॥ ६७॥

उच्छोषयति वै प्राणान् वारि स्तोकमिवातप:।

‘जिनकी समता करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है, उन प्रिय पुत्र श्रीरामके न देखनेका शोक मेरे प्राणोंको उसी तरह सुखाये डालता है, जैसे धूप थोड़े-से जलको शीघ्र सुखा देती है॥ ६७/

न ते मनुष्या देवास्ते ये चारुशुभकुण्डलम्॥ ६८॥

मुखं द्रक्ष्यन्ति रामस्य वर्षे पञ्चदशे पुन:।

‘वे मनुष्य नहीं देवता हैं, जो आपके पंद्रहवें वर्ष वनसे लौटनेपर श्रीरामका सुन्दर मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मुख देखेंगे॥ ६८/

पद्मपत्रेक्षणं सुभ्रु सुदंष्ट्रं चारुनासिकम्॥ ६९॥

धन्या द्रक्ष्यन्ति रामस्य ताराधिपसमं मुखम्।

‘जो कमलके समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, स्वच्छ दाँत और मनोहर नासिकासे सुशोभित श्रीरामके चन्द्रोपम मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं॥ ६९/

सदृशं शारदस्येन्दो: फुल्लस्य कमलस्य च॥ ७०॥

सुगन्धि मम रामस्य धन्या द्रक्ष्यन्ति ये मुखम्।

निवृत्तवनवासं तमयोध्यां पुनरागतम्॥ ७१॥

द्रक्ष्यन्ति सुखिनो रामं शुक्रं मार्गगतं यथा।

‘जो मेरे श्रीरामके शरच्चन्द्रसदृश मनोहर और प्रफुल्ल कमलके समान सुवासित मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं। जैसे मूढ़ता आदि अवस्थाओंको त्यागकर अपने उच्च मार्गमें स्थित शुक्रका दर्शन करके लोग सुखी होते हैं, उसी प्रकार वनवासकी अवधि पूरी करके पुन: अयोध्यामें लौटकर आये हुए श्रीरामको जो लोग देखेंगे वे ही सुखी होंगे॥ ७०-७१/

कौसल्ये चित्तमोहेन हृदयं सीदतेतराम्॥ ७२॥

वेदये न च संयुक्तान् शब्दस्पर्शरसानहम्।

‘कौसल्ये! मेरे चित्तपर मोह छा रहा है, हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है, इन्द्रियोंसे संयोग होनेपर भी मुझे शब्द, स्पर्श और रस आदि विषयोंका अनुभव नहीं हो रहा है॥

चित्तनाशाद् विपद्यन्ते सर्वाण्येवेन्द्रियाणि हि।

क्षीणस्नेहस्य दीपस्य संरक्ता रश्मयो यथा॥ ७३॥

‘जैसे तेल समाप्त हो जानेपर दीपककी अरुण प्रभा विलीन हो जाती है, उसी प्रकार चेतनाके नष्ट होनेसे मेरी सारी इन्द्रियाँ ही नष्ट हो चली हैं॥ ७३॥

अयमात्मभव: शोको मामनाथमचेतनम्।

संसाधयति वेगेन यथा कूलं नदीरय:॥ ७४॥

‘जिस प्रकार नदीका वेग अपने ही किनारेको काट गिराता है, उसी प्रकार मेरा अपना ही उत्पन्न किया हुआ शोक मुझे वेगपूर्वक अनाथ और अचेत किये दे रहा है॥ ७४॥

हा राघव महाबाहो हा ममायासनाशन।

हा पितृप्रिय मे नाथ हा ममासि गत: सुत॥ ७५॥

‘हा महाबाहु रघुनन्दन! हा मेरे कष्टोंको दूर करनेवाले श्रीराम! हा पिताके प्रिय पुत्र! हा मेरे नाथ! हा मेरे बेटे! तुम कहाँ चले गये?॥ ७५॥

हा कौसल्ये न पश्यामि हा सुमित्रे तपस्विनि।

हा नृशंसे ममामित्रे कैकेयि कुलपांसनि॥ ७६॥

‘हा कौसल्ये! अब मुझे कुछ नहीं दिखायी देता। हा तपस्विनि सुमित्रे! अब मैं इस लोकसे जा रहा हूँ। हा मेरी शत्रु, क्रूर, कुलाङ्गार कैकेयि! (तेरी कुटिल इच्छा पूरी हुई)’॥ ७६॥

इति मातुश्च रामस्य सुमित्रायाश्च संनिधौ।

राजा दशरथ: शोचञ्जीवितान्तमुपागमत्॥ ७७॥

इस प्रकार श्रीराम-माता कौसल्या और सुमित्राके निकट शोकपूर्ण विलाप करते हुए राजा दशरथके जीवनका अन्त हो गया॥ ७७॥

तथा तु दीन: कथयन् नराधिप:

प्रियस्य पुत्रस्य विवासनातुर:।

गतेऽर्धरात्रे भृशदु:खपीडित-

स्तदा जहौ प्राणमुदारदर्शन:॥ ७८॥

अपने प्रिय पुत्रके वनवाससे शोकाकुल हुए राजा दशरथ इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन कहते हुए आधी रात बीतते-बीतते अत्यन्त दु:खसे पीडि़त हो गये और उसी समय उन उदारदर्शी नरेशने अपने प्राणोंको त्याग दिया॥ ७८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग:॥ ६४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

 

पञ्चषष्टितम: सर्ग:

वन्दीजनोंका स्तुतिपाठ, राजा दशरथको दिवंगत हुआ जान उनकी रानियोंका करुण-विलाप

अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि।

वन्दिन: पर्युपातिष्ठंस्तत्पार्थिवनिवेशनम्॥ १॥

तदनन्तर रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराजकी स्तुति करनेके लिये) राजमहलमें उपस्थित हुए॥ १॥

सूता: परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुता:।

गायका: श्रुतिशीलाश्च निगदन्त: पृथक्पृथक्॥ २॥

व्याकरण-ज्ञानसे सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारोंसे विभूषित) सूत, उत्तमरूपसे वंशपरम्पराका श्रवण करानेवाले मागध और सङ्गीतशास्त्रका अनुशीलन करनेवाले गायक अपने-अपने मार्गके अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये॥ २॥

राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम्।

प्रासादाभोगविस्तीर्ण: स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत॥ ३॥

उच्चस्वरसे आशीर्वाद देते हुए राजाकी स्तुति करनेवाले उन सूत-मागध आदिका शब्द राजमहलोंके भीतरी भागमें फैलकर गूँजने लगा॥ ३॥

ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादका:।

अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन्॥ ४॥

वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतनेहीमें पाणिवादक (हाथोंसे ताल देकर गानेवाले) वहाँ आये और राजाओंके बीते हुए अद्भुत कर्मोंका बखान करते हुए तालगतिके अनुसार तालियाँ बजाने लगे॥ ४॥

तेन शब्देन विहगा: प्रतिबुद्धाश्च सस्वनु:।

शाखास्था: पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचरा:॥ ५॥

उस शब्दसे वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए तथा राजकुलमें ही विचरनेवाले पिंजड़ेमें बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे॥ ५॥

व्याहृता:पुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि नि:स्वना:।

आशीर्गेयं च गाथानां पूरयामास वेश्म तत्॥ ६॥

शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओंके मधुर नाद तथा गाथाओंके आशीर्वादयुक्त गानसे वह सारा भवन गूँज उठा॥ ६॥

तत: शुचिसमाचारा: पर्युपस्थानकोविदा:।

स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा॥ ७॥

तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजोंकी संख्या अधिक थी, पहलेकी भाँति उस दिन भी राजभवनमें उपस्थित हुए॥ ७॥

हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटै:।

आनिन्यु: स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि॥ ८॥

स्नानविधिके ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोनेके घड़ोंमें चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समयपर आये॥ ८॥

मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान्।

उपानिन्युस्तथा पुण्या: कुमारीबहुला: स्त्रिय:॥ ९॥

पवित्र आचार-विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओंकी संख्या अधिक थी, मङ्गलके लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीनेयोग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण—दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं॥ ९॥

सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम्।

सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम्॥ १०॥

प्रात:काल राजाओंके मङ्गलके लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, विधिके अनुरूप, आदर और प्रशंसाके योग्य उत्तम गुणसे युक्त तथा शोभायमान थी॥ १०॥

तत: सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम्।

तस्थावनुपसम्प्राप्तं किंस्विदित्युपशङ्कितम्॥ ११॥

सूर्योदय होनेतक राजाकी सेवाके लिये उत्सुक हुआ सारा परिजनवर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समयतक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मनमें यह शङ्का हो गयी कि महाराजके न आनेका क्या कारण हो सकता है?॥ ११॥

अथ या: कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तरा:।

ता: स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन्॥ १२॥

तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहनेवाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्याके पास जाकर अपने स्वामीको जगाने लगीं॥ १२॥

अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च।

नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे॥ १३॥

वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करनेके योग्य थीं; अत: विनीतभावसे युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्याका स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवनका कोई चिह्न नहीं पा सकीं॥ १३॥

ता: स्त्रिय: स्वप्नशीलज्ञाश्चेष्टां संचलनादिषु।

ता वेपथुपरीताश्च राज्ञ: प्राणेषु शङ्किता:॥ १४॥

सोये हुए पुरुषकी जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अत: उन्होंने हृदय एवं हाथके मूलभागमें चलनेवाली नाडि़योंकी भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई। फिर तो वे काँप उठीं। उनके मनमें राजाके प्राणोंके निकल जानेकी आशङ्का हो गयी॥ १४॥

प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे।

अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा च पार्थिवम्।

यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चय:॥ १५॥

वे जलके प्रवाहके सम्मुख पड़े हुए तिनकोंके अग्रभागकी भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशयमें पड़ी हुई उन स्त्रियोंको राजाकी ओर देखकर उनकी मृत्युके विषयमें जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया॥

कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकपराजिते।

प्रसुप्ते न प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते॥ १६॥

पुत्रशोकसे आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुईके समान सो गयी थीं और उस समयतक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी॥ १६॥

निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता।

न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता॥ १७॥

सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीरका रंग बदल गया था। वे शोकसे पराजित एवं पीडि़त हो अन्धकारसे आच्छादित हुई तारिकाके समान शोभा नहीं पा रही थीं॥ १७॥

कौसल्यानन्तरं राज्ञ: सुमित्रा तदनन्तरम्।

न स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना॥ १८॥

राजाके पास कौसल्या थीं और कौसल्याके समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जानेके कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनोंके मुखपर शोकके आँसू फैले हुए थे॥ १८॥

ते च दृष्ट्वा तदा सुप्ते उभे देव्यौ च तं नृपम्।

सुप्तमेवोद्गतप्राणमन्त:पुरममन्यत ॥ १९॥

उस समय उन दोनों देवियोंको निद्रामग्न देख अन्त:पुरकी अन्य स्त्रियोंने यही समझा कि सोते अवस्थामें ही महाराजके प्राण निकल गये हैं॥ १९॥

तत: प्रचुक्रुशुर्दीना: सस्वरं ता वराङ्गना:।

करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपा:॥ २०॥

फिर तो जैसे जंगलमें यूथपति गजराजके अपने वासस्थानसे अन्यत्र चले जानेपर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्त:पुरकी सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दु:खी हो उच्चस्वरसे आर्तनाद करने लगीं॥ २०॥

तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्गतचेतने।

कौसल्या च सुमित्रा च त्यक्तनिद्रे बभूवतु:॥ २१॥

उनके रोनेकी आवाजसे कौसल्या और सुमित्राकी भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं॥ २१॥

कौसल्या च सुमित्रा च दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च पार्थिवम्।

हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले॥ २२॥

कौसल्या और सुमित्राने राजाको देखा, उनके शरीरका स्पर्श किया और ‘हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ २२॥

सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले।

न भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता॥ २३॥

कोसलराजकुमारी कौसल्या धरतीपर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाशसे टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूलमें लोट रही हो॥ २३॥

नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि।

अपश्यंस्ता: स्त्रिय: सर्वा हतां नागवधूमिव॥ २४॥

राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्त:पुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा॥ २४॥

तत: सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखा: स्त्रिय:।

रुदन्त्य: शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतना:॥ २५॥

तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराजकी कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोकसे संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं॥ २५॥

ताभि: स बलवान् नाद: क्रोशन्तीभिरनुद्रुत:।

येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत्॥ २६॥

उन क्रन्दन करती हुई रानियोंने वहाँ पहलेसे होनेवाले प्रबल आर्तनादको और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनादसे वह सारा राजमहल पुन: बड़े जोरसे गूँज उठा॥

तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम्।

सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम्॥ २७॥

सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम्।

बभूव नरदेवस्य सद्म दिष्टान्तमीयुष:॥ २८॥

कालधर्मको प्राप्त हुए राजा दशरथका वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्योंसे भर गया। सब ओर रोने-चिल्लानेका भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजाके सभी बन्धु-बान्धव शोक-संतापसे पीडि़त होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दु:खी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा॥ २७-२८॥

अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं

यशस्विनं तं परिवार्य पत्नय:।

भृशं रुदन्त्य: करुणं सुदु:खिता:

प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत्॥ २९॥

उन यशस्वी भूपालशिरोमणिको दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर अत्यन्त दु:खी हो जोर-जोरसे रोने लगीं और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथकी भाँति करुण-विलाप करने लगीं॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितम: सर्ग:॥ ६५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥

 

षट्षष्टितम: सर्ग:

राजाके लिये कौसल्याका विलाप और कैकेयीकी भर्त्सना, मन्त्रियोंका राजाके शवको तेलसे भरे हुए कड़ाहमें सुलाना, रानियोंका विलाप, पुरीकी श्रीहीनता और पुरवासियोंका शोक

तमग्निमिव संशान्तमम्बुहीनमिवार्णवम्।

गतप्रभमिवादित्यं स्वर्गस्थं प्रेक्ष्य भूमिपम्॥ १॥

कौसल्या बाष्पपूर्णाक्षी विविधं शोककर्शिता।

उपगृह्य शिरो राज्ञ: कैकेयीं प्रत्यभाषत॥ २॥

बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्यकी भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजाका शव देखकर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे अनेक प्रकारसे शोकाकुल होकर राजाके मस्तकको गोदमें ले कैकेयीसे इस प्रकार बोलीं—॥ १-२॥

सकामा भव कैकेयी भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।

त्यक्त्वा राजानमेकाग्रा नृशंसे दुष्टचारिणि॥ ३॥

‘दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई। अब राजाको भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग॥ ३॥;

विहाय मां गतो रामो भर्ता च स्वर्गतो मम।

विपथे सार्थहीनेव नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ४॥

‘राम मुझे छोड़कर वनमें चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे। अब मैं दुर्गम मार्गमें साथियोंसे बिछुड़कर असहाय हुई अबलाकी भाँति जीवित नहीं रह सकती॥

भर्तारं तु परित्यज्य का स्त्री दैवतमात्मन:।

इच्छेज्जीवितुमन्यत्र कैकेय्यास्त्यक्तधर्मण:॥ ५॥

‘नारीधर्मको त्याग देनेवाली कैकेयीके सिवा संसारमें दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पतिका परित्याग करके जीना चाहेगी?॥ ५॥

न लुब्धो बुध्यते दोषान् किंपाकमिव भक्षयन्।

कुब्जानिमित्तं कैकेय्या राघवाणां कुलं हतम्॥ ६॥

‘जैसे कोई धनका लोभी दूसरोंको विष खिला देता है और उससे होनेवाले हत्याके दोषोंपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयीने कुब्जाके कारण रघुवंशियोंके इस कुलका नाश कर डाला॥ ६॥

अनियोगे नियुक्तेन राज्ञा रामं विवासितम्।

सभार्यं जनक: श्रुत्वा परितप्स्यत्यहं यथा॥ ७॥

‘कैकेयीने महाराजको अयोग्य कार्यमें लगाकर उनके द्वारा पत्नीसहित श्रीरामको वनवास दिलवा दिया। यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान उनको भी बड़ा कष्ट होगा॥ ७॥

स मामनाथां विधवां नाद्य जानाति धार्मिक:।

राम: कमलपत्राक्षो जीवन्नाशमितो गत:॥ ८॥

‘मैं अनाथ और विधवा हो गयी—यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीरामको नहीं मालूम है। वे तो यहाँसे जीते-जी अदृश्य हो गये हैं॥ ८॥

विदेहराजस्य सुता तथा चारुतपस्विनी।

दु:खस्यानुचिता दु:खं वने पर्युद्विजिष्यति॥ ९॥

‘पति-सेवारूप मनोहर तप करनेवाली विदेहराजकुमारी सीता दु:ख भोगनेके योग्य नहीं है। वह वनमें दु:खका अनुभव करके उद्विग्न हो उठेगी॥ ९॥

नदतां भीमघोषाणां निशासु मृगपक्षिणाम्।

निशम्यमाना संत्रस्ता राघवं संश्रयिष्यति॥ १०॥

‘रातके समय भयानक शब्द करनेवाले पशु-पक्षियोंकी बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीरामकी ही शरण लेगी— उन्हींकी गोदमें जाकर छिपेगी॥ १०॥

वृद्धश्चैवाल्पपुत्रश्च वैदेहीमनुचिन्तयन्।

सोऽपि शोकसमाविष्टो नूनं त्यक्ष्यति जीवितम्॥ ११॥

‘जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँमात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीताकी ही बारम्बार चिन्ता करते हुए शोकमें डूबकर अवश्य ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे॥ ११॥

साहमद्यैव दिष्टान्तं गमिष्यामि पतिव्रता।

इदं शरीरमालिङ्ग्य प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १२॥

‘मैं भी आज ही मृत्युका वरण करूँगी। एक पतिव्रताकी भाँति पतिके शरीरका आलिङ्गन करके चिताकी आगमें प्रवेश कर जाऊँगी’॥ १२॥

तां तत: सम्परिष्वज्य विलपन्तीं तपस्विनीम्।

व्यपनिन्यु: सुदु:खार्तां कौसल्यां व्यावहारिका:॥ १३॥

पतिके शरीरको हृदयसे लगाकर अत्यन्त दु:खसे आर्त हो करुण विलाप करती हुई तपस्विनी कौसल्याको राजकाज देखनेवाले मन्त्रियोंने दूसरी स्त्रियोंद्वारा वहाँसे हटवा दिया॥ १३॥

तैलद्रोण्यां तदामात्या: संवेश्य जगतीपतिम्।

राज्ञ: सर्वाण्यथादिष्टाश्चक्रु: कर्माण्यनन्तरम्॥ १४॥

फिर उन्होंने महाराजके शरीरको तेलसे भरी हुई नावमें रखकर वसिष्ठ आदिकी आज्ञाके अनुसार शवकी रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्योंकी सँभाल आरम्भ कर दी॥ १४॥

न तु संकालनं राज्ञो विना पुत्रेण मन्त्रिण:।

सर्वज्ञा: कर्तुमीषुस्ते ततो रक्षन्ति भूमिपम्॥ १५॥

वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्रके बिना राजाका दाह-संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शवकी रक्षा करने लगे॥

तैलद्रोण्यां शायितं तं सचिवैस्तु नराधिपम्।

हा मृतोऽयमिति ज्ञात्वा स्त्रियस्ता: पर्यदेवयन्॥ १६॥

जब मन्त्रियोंने राजाके शवको तैलकी नावमें सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ ‘हाय! ये महाराज परलोकवासी हो गये’ ऐसा कहती हुई पुन: विलाप करने लगीं॥ १६॥

बाहूनुच्छ्रित्य कृपणा नेत्रप्रस्रवणैर्मुखै:।

रुदत्य: शोकसंतप्ता: कृपणं पर्यदेवयन्॥ १७॥

उनके मुखपर नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे। वे अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर दीनभावसे रोने और शोकसंतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं॥ १७॥

हा महाराज रामेण सततं प्रियवादिना।

विहीना: सत्यसंधेन किमर्थं विजहासि न:॥ १८॥

वे बोलीं—‘हा महाराज! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलनेवाले अपने पुत्र श्रीरामसे तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं?॥ १८॥

कैकेय्या दुष्टभावाया राघवेण विवर्जिता:।

कथं सपत्न्या वत्स्याम: समीपे विधवा वयम्॥ १९॥

‘श्रीरामसे बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचारवाली सौत कैकेयीके समीप कैसे रहेंगी?॥ १९॥

स हि नाथ: स चास्माकं तव च प्रभुरात्मवान्।

वनं रामो गत: श्रीमान् विहाय नृपतिश्रियम्॥ २०॥

‘जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे, वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मीको छोड़कर वन चले गये॥

त्वया तेन च वीरेण विना व्यसनमोहिता:।

कथं वयं निवत्स्याम: कैकेय्या च विदूषिता:॥ २१॥

‘वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहनेसे हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं। अब सौत कैकेयीके द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी?॥ २१॥

यया च राजा रामश्च लक्ष्मणश्च महाबल:।

सीतया सह संत्यक्ता: सा कमन्यं न हास्यति॥ २२॥

‘जिसने राजाका तथा सीतासहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मणका भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी?॥ २२॥

ता बाष्पेण च संवीता: शोकेन विपुलेन च।

व्यचेष्टन्त निरानन्दा राघवस्य वरस्त्रिय:॥ २३॥

रघुकुलनरेश दशरथकी वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोकसे ग्रस्त हो आँसू बहाती हुई नाना प्रकारकी चेष्टाएँ और विलाप कर रही थीं। उनका आनन्द लुट गया था॥

निशा नक्षत्रहीनेव स्त्रीव भर्तृविवर्जिता।

पुरी नाराजतायोध्या हीना राज्ञा महात्मना॥ २४॥

महामना राजा दशरथसे हीन हुई वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारीकी भाँति श्रीहीन हो गयी थी॥ २४॥

बाष्पपर्याकुलजना हाहाभूतकुलाङ्गना।

शून्यचत्वरवेश्मान्ता न बभ्राज यथापुरम्॥ २५॥

नगरके सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे। कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं। चौराहे तथा घरोंके द्वार सूने दिखायी देते थे। (वहाँ झाड़-बुहार, लीपने-पोतने तथा बलि अर्पण करने आदिकी क्रियाएँ नहीं होती थीं।) इस प्रकार वह पुरी पहलेकी भाँति शोभा नहीं पाती थी॥

गते तु शोकात् त्रिदिवं नराधिपे

महीतलस्थासु नृपाङ्गनासु च।

निवृत्तचार: सहसा गतो रवि:

प्रवृत्तचारा रजनी ह्युपस्थिता॥ २६॥

राजा दशरथ शोकवश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोकसे ही भूतलपर लोटती रहीं। इस शोकमें ही सहसा सूर्यकी किरणोंका प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये। तत्पश्चात् अन्धकारका प्रचार करती हुई रात्रि उपस्थित हुई॥ २६॥

ऋते तु पुत्राद् दहनं महीपते-

र्नारोचयंस्ते सुहृद: समागता:।

इतीव तस्मिन् शयने न्यवेशयन्

विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥ २७॥

वहाँ पधारे हुए सुहृदोंने किसी भी पुत्रके बिना राजाका दाह-संस्कार होना नहीं पसंद किया। अब राजाका दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तैलपूर्ण कड़ाहमें उनके शवको सुरक्षित रख दिया॥ २७॥

गतप्रभा द्यौरिव भास्करं विना

व्यपेतनक्षत्रगणेव शर्वरी।

पुरी बभासे रहिता महात्मना

कण्ठास्रकण्ठाकुलमार्गचत्वरा॥ २८॥

सूर्यके बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रोंके बिना शोभाहीन रात्रिकी भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथसे रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी। उसकी सड़कों और चौराहोंपर आँसुओंसे अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्योंकी भीड़ एकत्र हो गयी थी॥ २८॥

नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो

विगर्हमाणा भरतस्य मातरम्।

तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये

बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे॥ २९॥

झुंड-के-झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत-माता कैकेयीकी निन्दा करने लगे। उस समय महाराजकी मृत्युसे अयोध्यापुरीमें रहनेवाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे। कोई भी शान्ति नहीं पाता था॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्षष्टितम: सर्ग:॥ ६६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥

 

सप्तषष्टितम: सर्ग:

मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियोंका राजाके बिना होनेवाली देशकी दुरवस्थाका वर्णन करके वसिष्ठजीसे किसीको राजा बनानेके लिये अनुरोध

आक्रन्दिता निरानन्दा सास्रकण्ठजनाविला।

अयोध्यायामवतता सा व्यतीयाय शर्वरी॥ १॥

अयोध्यामें लोगोंकी वह रात रोते-कलपते ही बीती। उसमें आनन्दका नाम भी नहीं था। आँसुओंसे सब लोगोंके कण्ठ भरे हुए थे। दु:खके कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी॥ १॥

व्यतीतायां तु शर्वर्यामादित्यस्योदये तत:।

समेत्य राजकर्तार: सभामीयुर्द्विजातय:॥ २॥

जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्यका प्रबन्ध करनेवाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबारमें आये॥ २॥

मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च कश्यप:।

कात्यायनो गौतमश्च जाबालिश्च महायशा:॥ ३॥

एते द्विजा: सहामात्यै: पृथग्वाचमुदीरयन्।

वसिष्ठमेवाभिमुखा: श्रेष्ठं राजपुरोहितम्॥ ४॥

मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि—ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठजीके सामने बैठकर मन्त्रियोंके साथ अपनी अलग- अलग राय देने लगे॥ ३-४॥

अतीता शर्वरी दु:खं या नो वर्षशतोपमा।

अस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने पुत्रशोकेन पार्थिवे॥ ५॥

वे बोले—‘पुत्रशोकसे इन महाराजके स्वर्गवासी होनेके कारण यह रात बड़े दु:खसे बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षोंके समान प्रतीत हुई थी॥ ५॥

स्वर्गस्थश्च महाराजो रामश्चारण्यमाश्रित:।

लक्ष्मणश्चापि तेजस्वी रामेणैव गत: सह॥ ६॥

‘महाराज दशरथ स्वर्ग सिधारे। श्रीरामचन्द्रजी वनमें रहने लगे और तेजस्वी लक्ष्मण भी श्रीरामके साथ ही चले गये॥ ६॥

उभौ भरतशत्रुघ्नौ केकयेषु परंतपौ।

पुरे राजगृहे रम्ये मातामहनिवेशने॥ ७॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न केकयदेशके रमणीय राजगृहमें नानाके घरमें निवास करते हैं॥ ७॥

इक्ष्वाकूणामिहाद्यैव कश्चिद् राजा विधीयताम्।

अराजकं हि नो राष्ट्रं विनाशं समवाप्नुयात्॥ ८॥

‘इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारोंमेंसे किसीको आज ही यहाँका राजा बनाया जाय; क्योंकि राजाके बिना हमारे इस राज्यका नाश हो जायगा॥ ८॥

नाराजके जनपदे विद्युन्माली महास्वन:।

अभिवर्षति पर्जन्यो महीं दिव्येन वारिणा॥ ९॥

‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, ऐसे जनपदमें विद्युन्मालाओंसे अलंकृत महान् गर्जन करनेवाला मेघ पृथ्वीपर दिव्य जलकी वर्षा नहीं करता है॥ ९॥

नाराजके जनपदे बीजमुष्टि: प्रकीर्यते।

नाराजके पितु: पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे॥ १०॥

‘जिस जनपदमें कोई राजा नहीं, वहाँके खेतोंमें मुट्ठी-के-मुट्ठी बीज नहीं बिखेरे जाते। राजासे रहित देशमें पुत्र पिता और स्त्री पतिके वशमें नहीं रहती॥ १०॥

अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके।

इदमत्याहितं चान्यत् कुत: सत्यमराजके॥ ११॥

‘राजहीन देशमें धन अपना नहीं होता है। बिना राजाके राज्यमें पत्नी भी अपनी नहीं रह पाती है। राजारहित देशमें यह महान् भय बना रहता है। (जब वहाँ पति-पत्नी आदिका सत्य सम्बन्ध नहीं रह सकता,) तब फिर दूसरा कोई सत्य कैसे रह सकता है?॥ ११॥

नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नरा:।

उद्यानानि च रम्याणि हृष्टा: पुण्यगृहाणि च॥ १२॥

‘बिना राजाके राज्यमें मनुष्य कोई पञ्चायत-भवन नहीं बनवाते, रमणीय उद्यानका भी निर्माण नहीं करवाते तथा हर्ष और उत्साहके साथ पुण्यगृह (धर्मशाला, मन्दिर आदि) भी नहीं बनवाते हैं॥ १२॥

नाराजके जनपदे यज्ञशीला द्विजातय:।

सत्राण्यन्वासते दान्ता ब्राह्मण: संशितव्रता:॥ १३॥

‘जहाँ कोई राजा नहीं, उस जनपदमें स्वभावत: यज्ञ करनेवाले द्विज और कठोर व्रतका पालन करनेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करते, जिनमें सभी ऋत्विज् और सभी यजमान होते हैं॥

नाराजके जनपदे महायज्ञेषु यज्वन:।

ब्राह्मणा वसुसम्पूर्णा विसृजन्त्याप्तदक्षिणा:॥ १४॥

‘राजारहित जनपदमें कदाचित् महायज्ञोंका आरम्भ हो भी तो उनमें धनसम्पन्न ब्राह्मण भी ऋत्विजोंको पर्याप्त दक्षिणा नहीं देते (उन्हें भय रहता है कि लोग हमें धनी समझकर लूट न लें)॥ १४॥

नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तका:।

उत्सवाश्च समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धना:॥ १५॥

‘अराजक देशमें राष्ट्रको उन्नतिशील बनानेवाले उत्सव, जिनमें नट और नर्तक हर्षमें भरकर अपनी कलाका प्रदर्शन करते हैं, बढ़ने नहीं पाते हैं तथा दूसरे-दूसरे राष्ट्रहितकारी संघ भी नहीं पनपने पाते हैं॥ १५॥

नाराजके जनपदे सिद्धार्था व्यवहारिण:।

कथाभिरभिरज्यन्ते कथाशीला: कथाप्रियै:॥ १६॥

‘बिना राजाके राज्यमें वादी और प्रतिवादीके विवादका संतोषजनक निपटारा नहीं हो पाता अथवा व्यापारियोंको लाभ नहीं होता। कथा सुननेकी इच्छावाले लोग कथावाचक पौराणिकोंकी कथाओंसे प्रसन्न नहीं होते॥

नाराजके जनपदे तूद्यानानि समागता:।

सायाह्ने क्रीडितुं यान्ति कुमार्यो हेमभूषिता:॥ १७॥

‘राजारहित जनपदमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुई कुमारियाँ एक साथ मिलकर संध्याके समय उद्यानोंमें क्रीड़ा करनेके लिये नहीं जाती हैं॥ १७॥

नाराजके जनपदे धनवन्त: सुरक्षिता:।

शेरते विवृतद्वारा: कृषिगोरक्षजीविन:॥ १८॥

‘बिना राजाके राज्यमें धनीलोग सुरक्षित नहीं रह पाते तथा कृषि और गोरक्षासे जीवन-निर्वाह करनेवाले वैश्य भी दरवाजा खोलकर नहीं सो पाते हैं॥ १८॥

नाराजके जनपदे वाहनै: शीघ्रवाहिभि:।

नरा निर्यान्त्यरण्यानि नारीभि: सह कामिन:॥ १९॥

‘राजासे रहित जनपदमें कामी मनुष्य नारियोंके साथ शीघ्रगामी वाहनोंद्वारा वनविहारके लिये नहीं निकलते हैं॥ १९॥

नाराजके जनपदे बद्धघण्टा विषाणिन:।

अटन्ति राजमार्गेषु कुञ्जरा: षष्टिहायना:॥ २०॥

‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपदमें साठ वर्षके दन्तार हाथी घंटे बाँधकर सड़कोंपर नहीं घूमते हैं॥ २०॥

नाराजके जनपदे शरान् संततमस्यताम्।

श्रूयते तलनिर्घोष इष्वस्त्राणामुपासने॥ २१॥

‘बिना राजाके राज्यमें धनुर्विद्याके अभ्यासकालमें निरन्तर लक्ष्यकी ओर बाण चलानेवाले वीरोंकी प्रत्यञ्चा तथा करतलका शब्द नहीं सुनायी देता है॥ २१॥

नाराजके जनपदे वणिजो दूरगामिन:।

गच्छन्ति क्षेममध्वानं बहुपण्यसमाचिता:॥ २२॥

‘राजासे रहित जनपदमें दूर जाकर व्यापार करनेवाले वणिक् बेचनेकी बहुत-सी वस्तुएँ साथ लेकर कुशलपूर्वक मार्ग तै नहीं कर सकते॥ २२॥

नाराजके जनपदे चरत्येकचरो वशी।

भावयन्नात्मनाऽऽत्मानं यत्र सायं गृहो मुनि:॥ २३॥

‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपदमें जहाँ संध्या हो वहीं डेरा डाल देनेवाला, अपने अन्त:करणके द्वारा परमात्माका ध्यान करनेवाला और अकेला ही विचरनेवाला जितेन्द्रिय मुनि नहीं घूमता-फिरता है (क्योंकि उसे कोई भोजन देनेवाला नहीं होता)॥ २३॥

नाराजके जनपदे योगक्षेम: प्रवर्तते।

न चाप्यराजके सेना शत्रून् विषहते युधि॥ २४॥

‘अराजक देशमें लोगोंको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति और प्राप्त वस्तुकी रक्षा नहीं हो पाती। राजाके न रहनेपर सेना भी युद्धमें शत्रुओंका सामना नहीं करती॥ २४॥

नाराजके जनपदे हृष्टै: परमवाजिभि:।

नरा: संयान्ति सहसा रथैश्च प्रतिमण्डिता:॥ २५॥

‘बिना राजाके राज्यमें लोग वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो हृष्ट-पुष्ट उत्तम घोड़ों तथा रथोंद्वारा सहसा यात्रा नहीं करते हैं (क्योंकि उन्हें लुटेरोंका भय बना रहता है)॥

नाराजके जनपदे नरा: शास्त्रविशारदा:।

संवदन्तोपतिष्ठन्ते वनेषूपवनेषु वा॥ २६॥

‘राजासे रहित राज्यमें शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् मनुष्य वनों और उपवनोंमें शास्त्रोंकी व्याख्या करते हुए नहीं ठहर पाते हैं॥ २६॥

नाराजके जनपदे माल्यमोदकदक्षिणा:।

देवताभ्यर्चनार्थाय कल्प्यन्ते नियतैर्जनै:॥ २७॥

‘जहाँ अराजकता फैल जाती है, उस जनपदमें मनको वशमें रखनेवाले लोग देवताओंकी पूजाके लिये फूल, मिठाई और दक्षिणाकी व्यवस्था नहीं करते हैं॥ २७॥

नाराजके जनपदे चन्दनागुरुरूषिता:।

राजपुत्रा विराजन्ते वसन्ते इव शाखिन:॥ २८॥

‘जिस जनपदमें कोई राजा नहीं होता है, वहाँ चन्दन और अगुरुका लेप लगाये हुए राजकुमार वसन्त-ऋतुके खिले हुए वृक्षोंकी भाँति शोभा नहीं पाते हैं॥ २८॥

यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम्।

अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम्॥ २९॥

‘जैसे जलके बिना नदियाँ, घासके बिना वन और ग्वालोंके बिना गौओंकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार राजाके बिना राज्य शोभा नहीं पाता है॥ २९॥

ध्वजो रथस्य प्रज्ञानं धूमो ज्ञानं विभावसो:।

तेषां यो नो ध्वजो राजा स देवत्वमितो गत:॥ ३०॥

‘जैसे ध्वज रथका ज्ञान कराता है और धूम अग्निका बोधक होता है, उसी प्रकार राजकाज देखनेवाले हमलोगोंके अधिकारको प्रकाशित करनेवाले जो महाराज थे, वे यहाँसे देवलोकको चले गये॥ ३०॥

नाराजके जनपदे स्वकं भवति कस्यचित्।

मत्स्या इव जना नित्यं भक्षयन्ति परस्परम्॥ ३१॥

‘राजाके न रहनेपर राज्यमें किसी भी मनुष्यकी कोई भी वस्तु अपनी नहीं रह जाती। जैसे मत्स्य एक-दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अराजक देशके लोग सदा एक-दूसरेको खाते—लूटते-खसोटते रहते हैं॥ ३१॥

ये हि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिकाश्छिन्नसंशया:।

तेऽपि भावाय कल्पन्ते राजदण्डनिपीडिता:॥ ३२॥

‘जो वेद-शास्त्रोंकी तथा अपनी-अपनी जातिके लिये नियत वर्णाश्रमकी मर्यादाको भङ्ग करनेवाले नास्तिक मनुष्य पहले राजदण्डसे पीडि़त होकर दबे रहते थे, वे भी अब राजाके न रहनेसे नि:शङ्क होकर अपना प्रभुत्व प्रकट करेंगे॥ ३२॥

यथा दृष्टि: शरीरस्य नित्यमेव प्रवर्तते।

तथा नरेन्द्रो राष्ट्रस्य प्रभव: सत्यधर्मयो:॥ ३३॥

‘जैसे दृष्टि सदा ही शरीरके हितमें प्रवृत्त रहती है, उसी प्रकार राजा राज्यके भीतर सत्य और धर्मका प्रवर्त्तक होता है॥ ३३॥

राजा सत्यं च धर्मश्च राजा कुलवतां कुलम्।

राजा माता पिता चैव राजा हितकरो नृणाम्॥ ३४॥

‘राजा ही सत्य और धर्म है। राजा ही कुलवानोंका कुल है। राजा ही माता और पिता है तथा राजा ही मनुष्योंका हित करनेवाला है॥ ३४॥

यमो वैश्रवण: शक्रो वरुणश्च महाबल:।

विशिष्यन्ते नरेन्द्रेण वृत्तेन महता तत:॥ ३५॥

‘राजा अपने महान् चरित्रके द्वारा यम, कुबेर, इन्द्र और महाबली वरुणसे भी बढ़ जाते हैं (यमराज केवल दण्ड देते हैं, कुबेर केवल धन देते हैं, इन्द्र केवल पालन करते हैं और वरुण केवल सदाचारमें नियन्त्रित करते हैं; परंतु एक श्रेष्ठ राजामें ये चारों गुण मौजूद होते हैं। अत: वह इनसे बढ़ जाता है)॥ ३५॥

अहो तम इवेदं स्यान्न प्रज्ञायेत किंचन।

राजा चेन्न भवेल्लोके विभजन् साध्वसाधुनी॥ ३६॥

‘यदि संसारमें भले-बुरेका विभाग करनेवाला राजा न हो तो यह सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो जाय, कुछ भी सूझ न पड़े॥ ३६॥

जीवत्यपि महाराजे तवैव वचनं वयम्।

नातिक्रमामहे सर्वे बेलां प्राप्येव सागर:॥ ३७॥

‘वसिष्ठजी! जैसे उमड़ता हुआ समुद्र अपनी तटभूमितक पहुँचकर उससे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार हम सब लोग महाराजके जीवनकालमें भी केवल आपकी ही बातका उल्लङ्घन नहीं करते थे॥ ३७॥

स न: समीक्ष्य द्विजवर्य वृत्तं

नृपं विना राष्ट्रमरण्यभूतम्।

कुमारमिक्ष्वाकुसुतं तथान्यं

त्वमेव राजानमिहाभिषेचय॥ ३८॥

‘अत: विप्रवर! इस समय हमारे व्यवहारको देखकर तथा राजाके अभावमें जंगल बने हुए इस देशपर दृष्टिपात करके आप ही किसी इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारको अथवा दूसरे किसी योग्य पुरुषको राजाके पदपर अभिषिक्त कीजिये’॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तषष्टितम: सर्ग:॥ ६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥

 

अष्टषष्टितम: सर्ग:

वसिष्ठजीकी आज्ञासे पाँच दूतोंका अयोध्यासे केकयदेशके राजगृह नगरमें जाना

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठ: प्रत्युवाच ह।

मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वच:॥ १॥

मार्कण्डेय आदिके ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १॥

यदसौ मातुलकुले दत्तराज्य: परं सुखी।

भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वित:॥ २॥

‘राजा दशरथने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं॥ २॥

तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयै:।

आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम्॥ ३॥

‘उन दोनों वीर बन्धुओंको बुलानेके लिये शीघ्र ही तेज चलनेवाले दूत घोड़ोंपर सवार होकर यहाँसे जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं?’॥ ३॥

गच्छन्त्विति तत: सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन्।

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥ ४॥

इसपर सबने वसिष्ठजीसे कहा—‘हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।’ उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजीने दूतोंको सम्बोधित करके कहा—॥ ४॥

एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन।

श्रूयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि व:॥ ५॥

‘सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक! और नन्दन! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो। मैं तुम सब लोगोंसे ही कहता हूँ॥ ५॥

पुरं राजगृहं गत्वा शीघ्रं शीघ्रजवैर्हयै:।

त्यक्तशोकैरिदं वाच्य: शासनाद् भरतो मम॥ ६॥

‘तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगरको जाओ और शोकका भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञाके अनुसार भरतसे इस प्रकार कहो॥ ६॥

पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिण:।

त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया॥ ७॥

‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँसे शीघ्र ही चलिये। अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥

मा चास्मै प्रोषितं रामं मा चास्मै पितरं मृतम्।

भवन्त: शंसिषुर्गत्वा राघवाणामित: क्षयम्॥ ८॥

‘भरतको श्रीरामचन्द्रके वनवास और पिताकी मृत्युका हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियोंके कारण रघुवंशियोंके यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना॥ ८॥

कौशेयानि च वस्त्राणि भूषणानि वराणि च।

क्षिप्रमादाय राज्ञश्च भरतस्य च गच्छत॥ ९॥

‘केकयराज तथा भरतको भेंट देनेके लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँसे शीघ्र चल दो’॥

दत्तपथ्यशना दूता जग्मु: स्वं स्वं निवेशनम्।

केकयांस्ते गमिष्यन्तो हयानारुह्य सम्मतान्॥ १०॥

केकय देशको जानेवाले वे दूत रास्तेका खर्च ले अच्छे घोड़ोंपर सवार हो अपने-अपने घरको गये॥ १०॥

तत: प्रास्थानिकं कृत्वा कार्यशेषमनन्तरम्।

वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता दूता: संत्वरितं ययु:॥ ११॥

तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजीकी आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँसे प्रस्थित हो गये॥ ११॥

न्यन्तेनापरतालस्य प्रलम्बस्योत्तरं प्रति।

निषेवमाणास्ते जग्मुर्नदीं मध्येन मालिनीम्॥ १२॥

अपरताल नामक पर्वतके अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरिके उत्तरभागमें दोनों पर्वतोंके बीचसे बहनेवाली मालिनी नदीके तटपर होते हुए वे दूत आगे बढ़े॥ १२॥

ते हास्तिनपुरे गङ्गां तीर्त्वा प्रत्यङ्मुखा ययु:।

पाञ्चालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजाङ्गलम्॥ १३॥

हस्तिनापुरमें गङ्गाको पार करके वे पश्चिमकी ओर गये और पाञ्चालदेशमें पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेशके बीचसे होते हुए आगे बढ़ गये॥ १३॥

सरांसि च सुफुल्लानि नदीश्च विमलोदका:।

निरीक्षमाणा जग्मुस्ते दूता: कार्यवशाद्द्रुतम्॥ १४॥

मार्गमें सुन्दर फूलोंसे सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियोंका दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र- गतिसे आगे बढ़ते गये॥ १४॥

ते प्रसन्नोदकां दिव्यां नानाविहगसेविताम्।

उपातिजग्मुर्वेगेन शरदण्डां जलाकुलाम्॥ १५॥

तदनन्तर वे स्वच्छ जलसे सुशोभित, पानीसे भरी हुई और भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सेवित दिव्य नदी शरदण्डाके तटपर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये॥ १५॥

निकूलवृक्षमासाद्य दिव्यं सत्योपयाचनम्।

अभिगम्याभिवाद्यं तं कुलिङ्गां प्राविशन् पुरीम्॥ १६॥

शरदण्डाके पश्चिमतटपर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवताका आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य (सफल) होती थी, अत: उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था। उस वन्दनीय वृक्षके निकट पहुँचकर दूतोंने उसकी परिक्रमा की और वहाँसे आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरीमें प्रवेश किया॥

अभिकालं तत: प्राप्य तेजोऽभिभवनाच्च्युता:।

पितृपैतामहीं पुण्यां तेरुरिक्षुमतीं नदीम्॥ १७॥

वहाँसे तेजोऽभिभवन नामक गाँवको पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँवमें पहुँचे और वहाँसे आगे बढ़नेपर उन्होंने राजा दशरथके पिता-पितामहोंद्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदीको पार किया॥ १७॥

अवेक्ष्याञ्जलिपानांश्च ब्राह्मणान् वेदपारगान्।

ययुर्मध्येन बाह्लीकान् सुदामानं च पर्वतम्॥ १८॥

वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करनेवाले वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंका दर्शन करके वे दूत बाह्लीक देशके मध्यभागमें स्थित सुदामा नामक पर्वतके पास जा पहुँचे॥ १८॥

विष्णो: पदं प्रेक्ष्यमाणा विपाशां चापि शाल्मलीम्।

नदीर्वापीतटाकानि पल्वलानि सरांसि च॥ १९॥

पश्यन्तो विविधांश्चापि सिंहान् व्याघ्रान् मृगान् द्विपान्।

ययु: पथातिमहता शासनं भर्तुरीप्सव:॥ २०॥

उस पर्वतके शिखरपर स्थित भगवान् विष्णुके चरणचिह्नका दर्शन करके वे विपाशा (व्यास) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्षके निकट गये। वहाँसे आगे बढ़नेपर बहुत-सी नदियों, बावडि़यों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँतिके वनजन्तुओं—सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियोंका दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्गके द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामीकी आज्ञाका शीघ्र पालन करनेकी इच्छा रखते थे॥ १९-२०॥

ते श्रान्तवाहना दूता विकृष्टेन सता पथा।

गिरिव्रजं पुरवरं शीघ्रमासेदुरञ्जसा॥ २१॥

उन दूतोंके वाहन (घोड़े) चलते-चलते थक गये थे। वह मार्ग बड़ी दूरका होनेपर उपद्रवसे रहित था। उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्टके श्रेष्ठ नगर गिरिव्रजमें जा पहुँचे॥ २१॥

भर्तु: प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं

भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम्।

अहेडमानास्त्वरया स्म दूता

रात्र्यां तु ते तत्पुरमेव याता:॥ २२॥

अपने स्वामी (आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी) का प्रिय और प्रजावर्गकी रक्षा करने तथा महाराज दशरथके वंशपरम्परागत राज्यको भरतजीसे स्वीकार करानेके लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावलीके साथ चलकर रातमें ही उस नगरमें जा पहुँचे॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टषष्टितम: सर्ग:॥ ६८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥

 


एकोनसप्ततितम: सर्ग:

भरतकी चिन्ता, मित्रोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयास तथा उनके पूछनेपर भरतका मित्रोंके समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दु:स्वप्नका वर्णन करना

यामेव रात्रिं ते दूता: प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्।

भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रिय:॥ १॥

जिस रातमें दूतोंने उस नगरमें प्रवेश किया था, उससे पहली रातमें भरतने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था॥

व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्।

पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत॥ २॥

रात बीतकर प्राय: सबेरा हो चला था तभी उस अप्रिय स्वप्नको देखकर राजाधिराज दशरथके पुत्र भरत मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए॥ २॥

तप्यमानं तमाज्ञाय वयस्या: प्रियवादिन:।

आयासं विनयिष्यन्त: सभायां चक्रिरे कथा:॥ ३॥

उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रोंने उनका मानसिक क्लेश दूर करनेकी इच्छासे एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकारकी बातें करने लगे॥ ३॥

वादयन्ति तदा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे।

नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च॥ ४॥

कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे। दूसरे लोग उनके खेदकी शान्तिके लिये नृत्य कराने लगे। दूसरे मित्रोंने नाना प्रकारके नाटकोंका आयोजन किया, जिनमें हास्यरसकी प्रधानता थी॥ ४॥

स तैर्महात्मा भरत: सखिभि: प्रियवादिभि:।

गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघव:॥ ५॥

किंतु रघुकुलभूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रोंकी गोष्ठीमें हास्यविनोद करनेपर भी प्रसन्न नहीं हुए॥ ५॥

तमब्रवीत् प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम्।

सुहृद्भि: पर्युपासीन: किं सखे नानुमोदसे॥ ६॥

तब सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्रने मित्रोंके बीचमें विराजमान भरतसे पूछा—‘सखे! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो?’॥ ६॥

एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरत: प्रत्युवाच ह।

शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम्॥ ७॥

स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम्।

पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये हृदे॥ ८॥

इस प्रकार पूछते हुए सुहृद्को भरतने इस प्रकार उत्तर दिया—‘मित्र! जिस कारणसे मेरे मनमें यह दैन्य आया है, वह बताता हूँ, सुनो। मैंने आज स्वप्नमें अपने पिताजीको देखा है। उनका मुख मलिन था; बाल खुले हुए थे और वे पर्वतकी चोटीसे एक ऐसे गंदे गढेमें गिर पड़े थे, जिसमें गोबर भरा हुआ था॥ ७-८॥

प्लवमानश्च मे दृष्ट: स तस्मिन् गोमये हृदे।

पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्निव मुहुर्मुहु:॥ ९॥

‘मैंने उस गोबरके कुण्डमें उन्हें तैरते देखा था। वे अञ्जलिमें तेल लेकर पी रहे थे और बारम्बार हँसते हुए-से प्रतीत होते थे॥ ९॥

ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुन: पुनरध:शिरा:।

तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवान्वगाहत ॥ १०॥

‘फिर उन्होंने तिल और भात खाया। इसके बाद उनके सारे शरीरमें तेल लगाया गया और फिर वे सिर नीचे किये तैलमें ही गोते लगाने लगे॥ १०॥

स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि।

उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्॥ ११॥

‘स्वप्नमें ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वीपर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रवसे ग्रस्त और अन्धकारसे आच्छादित-सी हो गयी है॥ ११॥

औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।

सहसा चापि संशान्ता ज्वलिता जातवेदस:॥ १२॥

‘महाराजकी सवारीके काममें आनेवाले हाथीका दाँत टूक-टूक हो गया है और पहलेसे प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है॥ १२॥

अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान्।

अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पर्वतान्॥ १३॥

‘मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकारके वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है॥ १३॥

पीठे कार्ष्णायसे चैव निषष्ण्णं कृष्णवाससम्।

प्रहरन्ति स्म राजानं प्रमदा: कृष्णपिङ्गला:॥ १४॥

‘काले लोहेकी चौकीपर महाराज दशरथ बैठे हैं। उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्णकी स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं॥ १४॥

त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपन:।

रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुख:॥ १५॥

‘धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंगके फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथपर बैठकर बड़ी तेजीके साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये हैं॥

प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी।

प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतानना॥ १६॥

‘लाल वस्त्र धारण करनेवाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराजको हँसती हुई-सी खींचकर लिये जा रही थी। यह दृश्य भी मेरे देखनेमें आया॥ १६॥

एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहाम्।

अहं रामोऽथवा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति॥ १७॥

‘इस प्रकार इस भयंकर रात्रिके समय मैंने यह स्वप्न देखा है। इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम, राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण—इनमेंसे किसी एककी अवश्य मृत्यु होगी॥ १७॥

नरो यानेन य: स्वप्ने खरयुक्तेन याति हि।

अचिरात्तस्य धूम्राग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते॥ १८॥

एतन्निमित्तं दीनोऽहं न वच: प्रतिपूजये।

शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मन:॥ १९॥

‘जो मनुष्य स्वप्नमें गधे जुते हुए रथसे यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिताका धुआँ शीघ्र ही देखनेमें आता है। यही कारण है कि मैं दु:खी हो रहा हूँ और आपलोगोंकी बातोंका आदर नहीं करता हूँ। मेरा गला सूखा-सा जा रहा है और मन अस्वस्थ-सा हो चला है॥

न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारये।

भ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चापगता मम।

जुगुप्सु इव चात्मानं न च पश्यामि कारणम्॥ २०॥

‘मैं भयका कोई कारण नहीं देखता तो भी भयको प्राप्त हो रहा हूँ। मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है। मैं अपने-आपसे घृणा-सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझमें नहीं आता॥ २०॥

इमां च दु:स्वप्नगतिं निशम्य हि

त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा।

भयं महत् तुद् हृदयान्न याति मे

विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥ २१॥

‘जिनके विषयमें मैंने पहले कभी सोचातक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकारके दु:स्वप्नोंको देखकर तथा महाराजका दर्शन इस रूपमें क्यों हुआ, जिसकी मेरे मनमें कोई कल्पना नहीं थी—यह सोचकर मेरे हृदयसे महान् भय दूर नहीं हो रहा है’॥ २१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितम: सर्ग:॥ ६९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥

 

सप्ततितम: सर्ग:

दूतोंका भरतको उनके नाना और मामाके लिये उपहारकी वस्तुएँ अर्पित करना और वसिष्ठजीका संदेश सुनाना, भरतका पिता आदिकी कुशल पूछना और नानासे आज्ञा तथा उपहारकी वस्तुएँ पाकर शत्रुघ्नके साथ अयोध्याकी ओर प्रस्थान करना

भरते ब्रुवति स्वप्नं दूतास्ते क्लान्तवाहना:।

प्रविश्यासह्यपरिखं रम्यं राजगृहं पुरम्॥ १॥

इस प्रकार भरत जब अपने मित्रोंको स्वप्नका वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनोंवाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुरमें प्रविष्ट हुए, जिसकी खाईको लाँघनेका कष्ट शत्रुओंके लिये असह्य था॥ १॥

समागम्य च राज्ञा ते राजपुत्रेण चार्चिता:।

राज्ञ: पादौ गृहीत्वा च तमूचुर्भरतं वच:॥ २॥

नगरमें आकर वे दूत केकयदेशके राजा और राजकुमारसे मिले तथा उन दोनोंने भी उनका सत्कार किया। फिर वे भावी राजा भरतके चरणोंका स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ २॥

पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिण:।

त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया॥ ३॥

‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँसे शीघ्र चलिये। अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥ ३॥

इमानि च महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च।

प्रतिगृह्य विशालाक्ष मातुलस्य च दापय॥ ४॥

‘विशाल नेत्रोंवाले राजकुमार! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामाको भी दीजिये॥ ४॥

अत्र विंशतिकोट्यस्तु नृपतेर्मातुलस्य ते।

दशकोट्यस्तु सम्पूर्णास्तथैव च नृपात्मज॥ ५॥

‘राजकुमार! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़की लागतका सामान आपके नाना केकेयनरेशके लिये है और पूरे दस करोड़की लागतका सामान आपके मामाके लिये है’॥ ५॥

प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं स्वनुरक्त: सुहृज्जने।

दूतानुवाच भरत: कामै: सम्प्रतिपूज्य तान्॥ ६॥

वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदोंमें अनुराग रखनेवाले भरतने उन्हें भेंट कर दीं। तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतोंका सत्कार करनेके अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा—॥ ६॥

कच्चित् स कुशली राजा पिता दशरथो मम।

कच्चिदारोग्यता रामे लक्ष्मणे च महात्मनि॥ ७॥

‘मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न?॥ ७॥

आर्या च धर्मनिरता धर्मज्ञा धर्मवादिनी।

अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमत:॥ ८॥

‘धर्मको जानने और धर्मकी ही चर्चा करनेवाली बुद्धिमान् श्रीरामकी माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्याको तो कोई रोग या कष्ट नहीं है?॥ ८॥

कच्चित् सुमित्रा धर्मज्ञा जननी लक्ष्मणस्य या।

शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोगा चापि मध्यमा॥ ९॥

‘क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं?॥ ९॥

आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी।

अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह॥ १०॥

‘जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाववाली कोपशीला मेरी माता कैकेयीको तो कोई कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है?’॥ १०॥

एवमुक्तास्तु ते दूता भरतेन महात्मना।

ऊचु: सम्प्रश्रितं वाक्यमिदं तं भरतं तदा॥ ११॥

महात्मा भरतके इस प्रकार पूछनेपर उस समय दूतोंने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही—॥ ११॥

कुशलास्ते नरव्याघ्र येषां कुशलमिच्छसि।

श्रीश्च त्वां वृणुते पद्मा युज्यतां चापि ते रथ:॥ १२॥

‘पुरुषसिंह! आपको जिनका कुशल-मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं। हाथमें कमल लिये रहनेवाली लक्ष्मी (शोभा) आपका वरण कर रही है। अब यात्राके लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये’॥ १२॥

भरतश्चापि तान् दूतानेवमुक्तोऽभ्यभाषत।

आपृच्छेऽहं महाराजं दूता: संत्वरयन्ति माम्॥ १३॥

उन दूतोंके ऐसा कहनेपर भरतने उनसे कहा—‘अच्छा मैं महाराजसे पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या चलनेके लिये कह रहे हैं। आपकी क्या आज्ञा है?’॥ १३॥

एवमुक्त्वा तु तान् दूतान् भरत: पार्थिवात्मज:।

दूतै: संचोदितो वाक्यं मातामहमुवाच ह॥ १४॥

दूतोंसे ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नानाके पास जाकर बोले—॥ १४॥

राजन् पितुर्गमिष्यामि सकाशं दूतचोदित:।

पुनरप्यहमेष्यामि यदा मे त्वं स्मरिष्यसि॥ १५॥

‘राजन्! मैं दूतोंके कहनेसे इस समय पिताजीके पास जा रहा हूँ। पुन: जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा’॥

भरतेनैवमुक्तस्तु नृपो मातामहस्तदा।

तमुवाच शुभं वाक्यं शिरस्याघ्राय राघवम्॥ १६॥

भरतके ऐसा कहनेपर नाना केकयनरेशने उस समय उन रघुकुलभूषण भरतका मस्तक सूँघकर यह शुभ वचन कहा—॥ १६॥

गच्छ तातानुजाने त्वां कैकेयी सुप्रजास्त्वया।

मातरं कुशलं ब्रूया: पितरं च परंतप॥ १७॥

‘तात! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतानवाली हो गयी। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! तुम अपनी माता और पितासे यहाँका कुशल-समाचार कहना॥ १७॥

पुरोहितं च कुशलं ये चान्ये द्विजसत्तमा:।

तौ च तात महेष्वासौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १८॥

‘तात! अपने पुरोहितजीसे तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल-मङ्गल कहना। उन महाधनुर्धर दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे भी यहाँका कुशल-समाचार सुना देना’॥ १८॥

तस्मै हस्त्युत्तमांश्चित्रान् कम्बलानजिनानि च।

सत्कृत्य केकयो राजा भरताय ददौ धनम्॥ १९॥

ऐसा कहकर केकयनरेशने भरतका सत्कार करके उन्हें बहुत-से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत-सा धन दिये॥ १९॥

अन्त:पुरेऽतिसंवृद्धान् व्याघ्रवीर्यबलोपमान्।

दंष्ट्रायुक्तान् महाकायान् शुनश्चोपायनं ददौ॥ २०॥

जो अन्त:पुरमें पाल-पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रममें बाघोंके समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत-से कुत्ते भी केकयनरेशने भरतको भेंटमें दिये॥ २०॥

रुक्मनिष्कसहस्रे द्वे षोडशाश्वशतानि च।

सत्कृत्य केकयीपुत्रं केकयो धनमादिशत्॥ २१॥

दो हजार सोनेकी मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये। इस प्रकार केकयनरेशने केकयीकुमार भरतको सत्कारपूर्वक बहुत-सा धन दिया॥ २१॥

तदामात्यानभिप्रेतान् विश्वास्यांश्च गुणान्वितान्।

ददावश्वपति: शीघ्रं भरतायानुयायिन:॥ २२॥

उस समय केकयनरेश अश्वपतिने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियोंको भरतके साथ जानेके लिये शीघ्र आज्ञा दी॥ २२॥

ऐरावतानैन्द्रशिरान् नागान् वै प्रियदर्शनान्।

खरान् शीघ्रान् सुसंयुक्तान् मातुलोऽस्मै धनं ददौ॥ २३॥

भरतके मामाने उन्हें उपहारमें दिये जानेवाले फलके रूपमें इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थानके आस-पास उत्पन्न होनेवाले बहुत-से सुन्दर-सुन्दर हाथी तथा तेज चलनेवाले सुशिक्षित खच्चर दिये॥ २३॥

स दत्तं केकयेन्द्रेण धनं तन्नाभ्यनन्दत।

भरत: केकयीपुत्रो गमनत्वरया तदा॥ २४॥

उस समय जानेकी जल्दी होनेके कारण केकयीपुत्र भरतने केकयराजके दिये हुए उस धनका अभिनन्दन नहीं किया॥ २४॥

बभूव ह्यस्य हृदये चिन्ता सुमहती तदा।

त्वरया चापि दूतानां स्वप्नस्यापि च दर्शनात्॥ २५॥

उस अवसरपर उनके हृदयमें बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी। इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँसे चलनेकी जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दु:स्वप्नका दर्शन भी हुआ था॥

स स्ववेश्माभ्यतिक्रम्य नरनागाश्वसंकुलम्।

प्रपेदे सुमहच्छ्रीमान् राजमार्गमनुत्तमम्॥ २६॥

वे यात्राकी तैयारीके लिये पहले अपने आवास-स्थानपर गये। फिर वहाँसे निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरे हुए परम उत्तम राजमार्गपर गये। उस समय भरतजीके पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी थी॥

अभ्यतीत्य ततोऽपश्यदन्त:पुरमनुत्तमम्।

ततस्तद् भरत: श्रीमानाविवेशानिवारित:॥ २७॥

सड़कको पार करके श्रीमान् भरतने राजभवनके परम उत्तम अन्त:पुरका दर्शन किया और उसमें वे बेरोक-टोक घुस गये॥ २७॥

स मातामहमापृच्छ्य मातुलं च युधाजितम्।

रथमारुह्य भरत: शत्रुघ्नसहितो ययौ॥ २८॥

वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामीसे विदा ले शत्रुघ्नसहित रथपर सवार हो भरतने यात्रा आरम्भ की॥ २८॥

रथान् मण्डलचक्रांश्च योजयित्वा पर: शतम्।

उष्ट्रगोऽश्वखरैर्भृत्या भरतं यान्तमन्वयु:॥ २९॥

गोलाकार पहियेवाले सौसे भी अधिक रथोंमें ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकोंने जाते हुए भरतका अनुसरण किया॥ २९॥

बलेन गुप्तो भरतो महात्मा

सहार्यकस्यात्मसमैरमात्यै: ।

आदाय शत्रुघ्नमपेतशत्रु-

र्गृहाद् ययौ सिद्ध इवेन्द्रलोकात्॥ ३०॥

शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामाकी सेनासे सुरक्षित हो शत्रुघ्नको अपने साथ रथपर लेकर नानाके अपने ही समान माननीय मन्त्रियोंके साथ मामाके घरसे चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोकसे किसी अन्य स्थानके लिये प्रस्थित हुआ हो॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ततितम: सर्ग:॥ ७०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥

 

एकसप्ततितम: सर्ग:

रथ और सेनासहित भरतकी यात्रा, विभिन्न स्थानोंको पार करके उनका उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें पहुँचना और सेनाको धीरे-धीरे आनेकी आज्ञा दे स्वयं रथद्वारा तीव्रवेगसे आगे बढ़ते हुए सालवनको पार करके अयोध्याके निकट जाना, वहाँसे अयोध्याकी दुरवस्था देखते हुए आगे बढ़ना और सारथिसे अपना दु:खपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवनमें प्रवेश करना

स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान्।

तत: सुदामां द्युतिमान् संतीर्यावेक्ष्य तां नदीम्॥ १॥

हृदिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम्।

शतद्रुमतरच्छ्रीमान् नदीमिक्ष्वाकुनन्दन:॥ २॥

राजगृहसे निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशाकी ओर चले।58 उन तेजस्वी राजकुमारने मार्गमें सुदामा नदीका दर्शन करके उसे पार किया। तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन श्रीमान् भरतने, जिसका पाट दूरतक फैला हुआ था, उस हृदिनी नदीको लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहनेवाली शतद्रु नदी (सतलज) को पार किया॥ १-२॥

 

ऐलधाने नदीं तीर्त्वा प्राप्य चापरपर्वतान्।

शिलामाकुर्वतीं तीर्त्वा आग्नेयं शल्यकर्षणम्॥ ३॥

वहाँसे ऐलधान नामक गाँवमें जाकर वहाँ बहनेवाली नदीको पार किया। तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपदमें गये। वहाँ शिला नामकी नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तुको शिलास्वरूप बना देती थी। उसे पार करके भरत वहाँसे आग्नेय कोणमें स्थित शल्यकर्षण नामक देशमें गये, जहाँ शरीरसे काँटेको निकालनेमें सहायता करनेवाली ओषधि उपलब्ध होती थी॥ ३॥

सत्यसंध: शुचिर्भूत्वा प्रेक्षमाण: शिलावहाम्।

अभ्यगात् स महाशैलान् वनं चैत्ररथं प्रति॥ ४॥

तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरतने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदीका दर्शन किया (जो अपनी प्रखर धारासे शिलाखण्डों—बड़ी-बड़ी चट्टानोंको भी बहा ले जानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध थी)। उस नदीका दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँघते हुए चैत्ररथ नामक वनमें जा पहुँचे॥ ४॥

सरस्वतीं च गङ्गां च युग्मेन प्रतिपद्य च।

उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद् वनम्॥ ५॥

तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गाकी धारा-विशेषके सङ्गमसे होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देशके उत्तरवर्ती देशोंमें पदार्पण किया और वहाँसे आगे बढ़कर वे भारुण्डवनके भीतर गये॥ ५॥

वेगिनीं च कुलिङ्गाख्यां हृदिनीं पर्वतावृताम्।

यमुनां प्राप्य संतीर्णो बलमाश्वासयत् तदा॥ ६॥

फिर अत्यन्त वेगसे बहनेवाली तथा पर्वतोंसे घिरी होनेके कारण अपने प्रखर प्रवाहके द्वारा कलकल नाद करनेवाली कुलिङ्गा नदीको पार करके यमुनाके तटपर पहुँचकर उन्होंने सेनाको विश्राम कराया॥ ६॥

शीतीकृत्य तु गात्राणि क्लान्तानाश्वास्य वाजिन:।

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च प्रायादादाय चोदकम्॥ ७॥

राजपुत्रो महारण्यमनभीक्ष्णोपसेवितम्।

भद्रो भद्रेण यानेन मारुत: खमिवात्यगात्॥ ८॥

थके हुए घोड़ोंको नहलाकर उनके अङ्गोंको शीतलता प्रदान करके उन्हें छायामें घास आदि देकर आराम करनेका अवसर दे राजकुमार भरत स्वयं भी स्नान और जलपान करके रास्तेके लिये जल साथ ले आगे बढ़े। मङ्गलाचारसे युक्त हो माङ्गलिक रथके द्वारा उन्होंने, जिसमें मनुष्योंका बहुधा आना-जाना या रहना नहीं होता था, उस विशाल वनको उसी प्रकार वेगपूर्वक पार किया, जैसे वायु आकाशको लाँघ जाती है॥ ७-८॥

भागीरथीं दुष्प्रतरां सोंऽशुधाने महानदीम्।

उपायाद् राघवस्तूर्णं प्राग्वटे विश्रुते पुरे॥ ९॥

तत्पश्चात् अंशुधान नामक ग्रामके पास महानदी भागीरथी गङ्गाको दुस्तर जानकर रघुनन्दन भरत तुरंत ही प्राग्वट नामसे विख्यात नगरमें आ गये॥ ९॥

स गङ्गां प्राग्वटे तीर्त्वा समायात् कुटिकोष्टिकाम्।

सबलस्तां स तीर्त्वाथ समगाद् धर्मवर्धनम्॥ १०॥

प्राग्वट नगरमें गङ्गाको पार करके वे कुटिकोष्टिका नामवाली नदीके तटपर आये और सेनासहित उसको भी पार करके धर्मवर्धन नामक ग्राममें जा पहुँचे॥ १०॥

तोरणं दक्षिणार्धेन जम्बूप्रस्थं समागमत्।

वरूथं च ययौ रम्यं ग्रामं दशरथात्मज:॥ ११॥

वहाँसे तोरण ग्रामके दक्षिणार्ध भागमें होते हुए जम्बूप्रस्थमें गये। तदनन्तर दशरथकुमार भरत एक रमणीय ग्राममें गये, जो वरूथके नामसे विख्यात था॥

तत्र रम्ये वने वासं कृत्वासौ प्राङ्मुखो ययौ।

उद्यानमुज्जिहानाया: प्रियका यत्र पादपा:॥ १२॥

वहाँ एक रमणीय वनमें निवास करके वे प्रात:काल पूर्व दिशाकी ओर गये। जाते-जाते उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें पहुँच गये, जहाँ कदम्ब नामवाले वृक्षोंकी बहुतायत थी॥ १२॥

स तांस्तु प्रियकान् प्राप्य शीघ्रानास्थाय वाजिन:।

अनुज्ञाप्याथ भरतो वाहिनीं त्वरितो ययौ॥ १३॥

उन कदम्बोंके उद्यानमें पहुँचकर अपने रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतकर सेनाको धीरे-धीरे आनेकी आज्ञा दे भरत तीव्रगतिसे चल दिये॥ १३॥

वासं कृत्वा सर्वतीर्थे तीर्त्वा चोत्तानिकां नदीम्।

अन्या नदीश्च विविधै: पार्वतीयैस्तुरङ्गमै:॥ १४॥

हस्तिपृष्ठकमासाद्य कुटिकामप्यवर्तत।

ततार च नरव्याघ्रो लोहित्ये च कपीवतीम्॥ १५॥

तत्पश्चात् सर्वतीर्थ नामक ग्राममें एक रात रहकर उत्तानिका नदी तथा अन्य नदियोंको भी नाना प्रकारके पर्वतीय घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथसे पार करके नरश्रेष्ठ भरतजी हस्तिपृष्ठक नामक ग्राममें जा पहुँचे। वहाँसे आगे जानेपर उन्होंने कुटिका नदी पार की। फिर लोहित्य नामक ग्राममें पहुँचकर कपीवती नामक नदीको पार किया॥ १४-१५॥

एकसाले स्थाणुमतीं विनते गोमतीं नदीम्।

कलिङ्गनगरे चापि प्राप्य सालवनं तदा॥ १६॥

फिर एकसाल नगरके पास स्थाणुमती और विनत-ग्रामके निकट गोमती नदीको पार करके वे तुरंत ही कलिङ्गनगरके पास सालवनमें जा पहुँचे॥ १६॥

भरत: क्षिप्रमागच्छत् सुपरिश्रान्तवाहन:।

वनं च समतीत्याशु शर्वर्यामरुणोदये॥ १७॥

अयोध्यां मनुना राज्ञा निर्मितां स ददर्श ह।

तां पुरीं पुरुषव्याघ्र: सप्तरात्रोषित: पथि॥ १८॥

वहाँ जाते-जाते भरतके घोड़े थक गये। तब उन्हें विश्राम देकर वे रातों-रात शीघ्र ही सालवनको लाँघ गये और अरुणोदयकालमें राजा मनुकी बसायी हुई अयोध्यापुरीका उन्होंने दर्शन किया। पुरुषसिंह भरत मार्गमें सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरीका दर्शन कर सके थे॥ १७-१८॥

अयोध्यामग्रतो दृष्ट्वा सारथिं चेदमब्रवीत्।

एषा नातिप्रतीता मे पुण्योद्याना यशस्विनी॥ १९॥

अयोध्या दृश्यते दूरात् सारथे पाण्डुमृत्तिका।

यज्विभिर्गुणसम्पन्नैर्ब्ह्मणैर्वेदपारगै: ॥ २०॥

भूयिष्ठमृद्धैराकीर्णा राजर्षिवरपालिता।

सामने अयोध्यापुरीको देखकर वे अपने सारथिसे इस प्रकार बोले—‘सूत! पवित्र उद्यानोंसे सुशोभित यह यशस्विनी नगरी आज मुझे अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देती है। यह वही नगरी है, जहाँ निरन्तर यज्ञ-याग करनेवाले गुणवान् और वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण निवास करते हैं, जहाँ बहुत-से धनियोंकी भी बस्ती है तथा राजर्षियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथ जिसका पालन करते हैं, वही अयोध्या इस समय दूरसे सफेद मिट्टीके ढूहकी भाँति दीख रही है॥ १९-२०/

अयोध्यायां पुरा शब्द: श्रूयते तुमुलो महान्॥ २१॥

समन्तान्नरनारीणां तमद्य न शृणोम्यहम्।

‘पहले अयोध्यामें चारों ओर नर-नारियोंका महान् तुमुलनाद सुनायी पड़ता था; परंतु आज मैं उसे नहीं सुन रहा हूँ॥ २१/

उद्यानानि हि सायाह्ने क्रीडित्वोपरतैर्नरै:॥ २२॥

समन्ताद् विप्रधावद्भि: प्रकाशन्ते ममान्यथा।

तान्यद्यानुरुदन्तीव परित्यक्तानि कामिभि:॥ २३॥

‘सायंकालके समय लोग उद्यानोंमें प्रवेश करके वहाँ क्रीड़ा करते और उस क्रीड़ासे निवृत्त होकर सब ओरसे अपने घरोंकी ओर दौड़ते थे, अत: उस समय इन उद्यानोंकी अपूर्व शोभा होती थी, परंतु आज ये मुझे कुछ और ही प्रकारके दिखायी देते हैं। वे ही उद्यान आज कामीजनोंसे परित्यक्त होकर रोते हुए-से प्रतीत होते हैं॥ २२-२३॥

अरण्यभूतेव पुरी सारथे प्रतिभाति माम्।

नह्यत्र यानैर्दृश्यन्ते न गजैर्न च वाजिभि:।

निर्यान्तो वाभियान्तो वा नरमुख्या यथा पुरा॥ २४॥

‘सारथे! यह पुरी मुझे जंगल-सी जान पड़ती है। अब यहाँ पहलेकी भाँति घोड़ों, हाथियों तथा दूसरी-दूसरी सवारियोंसे आते-जाते हुए श्रेष्ठ मनुष्य नहीं दिखायी दे रहे हैं॥ २४॥

उद्यानानि पुरा भान्ति मत्तप्रमुदितानि च।

जनानां रतिसंयोगेष्वत्यन्तगुणवन्ति च॥ २५॥

तान्येतान्यद्य पश्यामि निरानन्दानि सर्वश:।

स्रस्तपर्णैरनुपथं विक्रोशद्भिरिव द्रुमै:॥ २६॥

‘जो उद्यान पहले मदमत्त एवं आनन्दमग्न भ्रमरों, कोकिलों और नर-नारियोंसे भरे प्रतीत होते थे तथा लोगोंके प्रेम-मिलनके लिये अत्यन्त गुणकारी (अनुकूल सुविधाओंसे सम्पन्न) थे, उन्हींको आज मैं सर्वथा आनन्दशून्य देख रहा हूँ। वहाँ मार्गपर वृक्षोंके जो पत्ते गिर रहे हैं, उनके द्वारा मानो वे वृक्ष करुण क्रन्दन कर रहे हैं (और उनसे उपलक्षित होनेके कारण वे उद्यान आनन्दहीन प्रतीत होते हैं)॥ २५-२६॥

नाद्यापि श्रूयते शब्दो मत्तानां मृगपक्षिणाम्।

सरक्तां मधुरां वाणीं कलं व्याहरतां बहु॥ २७॥

‘रागयुक्त मधुर कलरव करनेवाले मतवाले मृगों और पक्षियोंका तुमुल शब्द अभीतक सुनायी नहीं पड़ रहा है॥ २७॥

चन्दनागुरुसम्पृक्तो धूपसम्मूर्च्छितोऽमल:।

प्रवाति पवन: श्रीमान् किं नु नाद्य यथा पुरा॥ २८॥

‘चन्दन और अगुरुकी सुगन्धसे मिश्रित तथा धूपकी मनोहर गन्धसे व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहलेकी भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा है?॥ २८॥

भेरीमृदङ्गवीणानां कोणसंघट्टित: पुन:।

किमद्य शब्दो विरत: सदादीनगति: पुरा॥ २९॥

‘वादनदण्डद्वारा बजायी जानेवाली भेरी, मृदङ्ग और वीणाका जो आघातजनित शब्द होता है, वह पहले अयोध्यामें सदा होता रहता था, कभी उसकी गति अवरुद्ध नहीं होती थी; परंतु आज वह शब्द न जाने क्यों बंद हो गया है?॥ २९॥

अनिष्टानि च पापानि पश्यामि विविधानि च।

निमित्तान्यमनोज्ञानि तेन सीदति मे मन:॥ ३०॥

‘मुझे अनेक प्रकारके अनिष्टकारी, क्रूर और अशुभसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिससे मेरा मन खिन्न हो रहा है॥ ३०॥

सर्वथा कुशलं सूत दुर्लभं मम बन्धुषु।

तथा ह्यसति सम्मोहे हृदयं सीदतीव मे॥ ३१॥

‘सारथे! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवोंको कुशल-मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोहका कोई कारण न होनेपर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है’॥ ३१॥

विषण्ण: श्रान्तहृदयस्त्रस्त: संलुलितेन्द्रिय:।

भरत: प्रविवेशाशु पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम्॥ ३२॥

भरत मन-ही-मन बहुत खिन्न थे। उनका हृदय शिथिल हो रहा था। वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठी थीं, इसी अवस्थामें उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया॥ ३२॥

द्वारेण वैजयन्तेन प्राविशच्छ्रान्तवाहन:।

द्वा:स्थैरुत्थाय विजयमुक्तस्तै: सहितो ययौ॥ ३३॥

पुरीके द्वारपर सदा वैजयन्ती पताका फहरानेके कारण उस द्वारका नाम वैजयन्त रखा गया था। (यह पुरीके पश्चिम भागमें था।) उस वैजयन्तद्वारसे भरत पुरीके भीतर प्रविष्ट हुए। उस समय उनके रथके घोड़े बहुत थके हुए थे। द्वारपालोंने उठकर कहा—‘महाराजकी जय हो!’ फिर वे उनके साथ आगे बढ़े॥ ३३॥

स त्वनेकाग्रहृदयो द्वा:स्थं प्रत्यर्च्य तं जनम्।

सूतमश्वपते: क्लान्तमब्रवीत् तत्र राघव:॥ ३४॥

भरतका हृदय एकाग्र नहीं था—वे घबराये हुए थे। अत: उन रघुकुलनन्दन भरतने साथ आये हुए द्वारपालोंको सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपतिके थके- माँदे सारथिसे वहाँ इस प्रकार कहा—॥ ३४॥

किमहं त्वरयाऽऽनीत: कारणेन विनानघ।

अशुभाशङ्कि हृदयं शीलं च पततीव मे॥ ३५॥

‘निष्पाप सूत! मैं बिना कारण ही इतनी उतावलीके साथ क्यों बुलाया गया? इस बातका विचार करके मेरे हृदयमें अशुभकी आशङ्का होती है। मेरा दीनतारहित स्वभाव भी अपनी स्थितिसे भ्रष्ट-सा हो रहा है॥ ३५॥

श्रुता नु यादृशा: पूर्वं नृपतीनां विनाशने।

आकारांस्तानहं सर्वानिह पश्यामि सारथे॥ ३६॥

‘सारथे! अबसे पहले मैंने राजाओंके विनाशके जैसे-जैसे लक्षण सुन रखे हैं, उन सभी लक्षणोंको आज मैं यहाँ देख रहा हूँ॥ ३६॥

सम्मार्जनविहीनानि परुषाण्युपलक्षये।

असंयतकवाटानि श्रीविहीनानि सर्वश:॥ ३७॥

बलिकर्मविहीनानि धूपसम्मोदनेन च।

अनाशितकुटुम्बानि प्रभाहीनजनानि च॥ ३८॥

अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम्।

‘मैं देखता हूँ—गृहस्थोंके घरोंमें झाडू नहीं लगी है। वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं। इनकी किवाड़ें खुली हैं। इन घरोंमें बलिवैश्वदेवकर्म नहीं हो रहे हैं। ये धूपकी सुगन्धसे वञ्चित हैं। इनमें रहनेवाले कुटुम्बीजनोंको भोजन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन (उदास) दिखायी देते हैं। जान पड़ता है—इनमें लक्ष्मीका निवास नहीं है॥ ३७-३८॥

अपेतमाल्यशोभानि असम्मृष्टाजिराणि च॥ ३९॥

देवागाराणि शून्यानि न भान्तीह यथा पुरा।

‘देवमन्दिर फूलोंसे सजे हुए नहीं दिखायी देते। इनके आँगन झाड़े-बुहारे नहीं गये हैं। ये मनुष्योंसे सूने हो रहे हैं, अतएव इनकी पहले-जैसी शोभा नहीं हो रही है॥ ३९॥

देवतार्चा: प्रविद्धाश्च यज्ञगोष्ठास्तथैव च॥ ४०॥

माल्यापणेषु राजन्ते नाद्य पण्यानि वा तथा।

दृश्यन्ते वणिजोऽप्यद्य न यथापूर्वमत्र वै॥ ४१॥

ध्यानसंविग्नहृदया नष्टव्यापारयन्त्रिता:।

‘देवप्रतिमाओंकी पूजा बंद हो गयी है। यज्ञशालाओंमें यज्ञ नहीं हो रहे हैं। फूलों और मालाओंके बाजारमें आज बिकनेकी कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं। यहाँ पहलेके समान बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं। चिन्तासे उनका हृदय उद्विग्न जान पड़ता है और अपना व्यापार नष्ट हो जानेके कारण वे संकुचित हो रहे हैं॥ ४०-४१॥

देवायतनचैत्येषु दीना: पक्षिमृगास्तथा॥ ४२॥

मलिनं चाश्रुपूर्णाक्षं दीनं ध्यानपरं कृशम्।

सस्त्रीपुंसं च पश्यामि जनमुत्कण्ठितं पुरे॥ ४३॥

‘देवालयों तथा चैत्य (देव) वृक्षोंपर जिनका निवास है, वे पशु-पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं। मैं देखता हूँ, नगरके सभी स्त्री-पुरुषोंका मुख मलिन है, उनकी आँखोंमें आँसू भरे हैं और वे सब-के-सब दीन, चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं’॥ ४२-४३॥

इत्येवमुक्त्वा भरत: सूतं तं दीनमानस:।

तान्यनिष्टान्ययोध्यायां प्रेक्ष्य राजगृहं ययौ॥ ४४॥

सारथिसे ऐसा कहकर अयोध्यामें होनेवाले उन अनिष्टसूचक चिह्नोंको देखते हुए भरत मन-ही-मन दु:खी हो राजमहलमें गये॥ ४४॥

तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां

रजोरुणद्वारकवाटयन्त्राम् ।

दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरीप्रकाशां

दु:खेन सम्पूर्णतरो बभूव॥ ४५॥

जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरीके समान शोभा पाती थी; उसीके चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी दिखायी देती थीं तथा दरवाजोंकी किवाड़ें धूलि-धूसर हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णत: दु:खमें निमग्न हो गये॥ ४५॥

बभूव पश्यन् मनसोऽप्रियाणि

यान्यन्यदा नास्य पुरे बभूवु:।

अवाक्शिरा दीनमना न हृष्ट:

पितुर्महात्मा प्रविवेश वेश्म॥ ४६॥

उस नगरमें जो पहले कभी नहीं हुई थीं, ऐसी अप्रिय बातोंको देखकर महात्मा भरतने अपना मस्तक नीचेको झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने दीन-हृदयसे पिताके भवनमें प्रवेश किया॥ ४६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकसप्ततितम: सर्ग:॥ ७१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इकहत्तरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥

 

द्विसप्ततितम: सर्ग:

भरतका कैकेयीके भवनमें जाकर उसे प्रणाम करना, उसके द्वारा पिताके परलोकवासका समाचार पा दु:खी हो विलाप करना तथा श्रीरामके विषयमें पूछनेपर कैकेयीद्वारा उनका श्रीरामके वनगमनके वृत्तान्तसे अवगत होना

अपश्यंस्तु ततस्तत्र पितरं पितुरालये।

जगाम भरतो द्रष्टुं मातरं मातुरालये॥ १॥

तदनन्तर पिताके घरमें पिताको न देखकर भरत माताका दर्शन करनेके लिये अपनी माताके महलमें गये॥ १॥

अनुप्राप्तं तु तं दृष्ट्वा कैकेयी प्रोषितं सुतम्।

उत्पपात तदा हृष्टा त्यक्त्वा सौवर्णमासनम्॥ २॥

अपने परदेश गये हुए पुत्रको घर आया देख उस समय कैकेयी हर्षसे भर गयी और अपने सुवर्णमय आसनको छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी॥ २॥

स प्रविश्यैव धर्मात्मा स्वगृहं श्रीविवर्जितम्।

भरत: प्रेक्ष्य जग्राह जनन्याश्चरणौ शुभौ॥ ३॥

धर्मात्मा भरतने अपने उस घरमें प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माताके शुभ चरणोंका स्पर्श किया॥ ३॥

तं मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम्।

अङ्के भरतमारोप्य प्रष्टुं समुपचक्रमे॥ ४॥

अपने यशस्वी पुत्र भरतको छातीसे लगाकर कैकेयीने उनका मस्तक सूँघा और उन्हें गोदमें बिठाकर पूछना आरम्भ किया—॥ ४॥

अद्य ते कतिचिद् रात्र्यश्च्युतस्यार्यकवेश्मन:।

अपि नाध्वश्रम: शीघ्रं रथेनापततस्तव॥ ५॥

‘बेटा! तुम्हें अपने नानाके घरसे चले आज कितनी रातें व्यतीत हो गयीं? तुम रथके द्वारा बड़ी शीघ्रताके साथ आये हो। रास्तेमें तुम्हें अधिक थकावट तो नहीं हुई?॥ ५॥

आर्यकस्ते सुकुशली युधाजिन्मातुलस्तव।

प्रवासाच्च सुखं पुत्र सर्वं मे वक्तुमर्हसि॥ ६॥

‘तुम्हारे नाना सकुशल तो हैं न? तुम्हारे मामा युधाजित् तो कुशलसे हैं? बेटा! जब तुम यहाँसे गये थे, तबसे लेकर अबतक सुखसे रहे हो न? ये सारी बातें मुझे बताओ’॥ ६॥

एवं पृष्टस्तु कैकेय्या प्रियं पार्थिवनन्दन:।

आचष्ट भरत: सर्वं मात्रे राजीवलोचन:॥ ७॥

कैकेयीके इस प्रकार प्रिय वाणीमें पूछनेपर दशरथनन्दन कमलनयन भरतने माताको सब बातें बतायीं॥ ७॥

अद्य मे सप्तमी रात्रिश्च्युतस्यार्यकवेश्मन:।

अम्बाया: कुशली तातो युधाजिन्मातुलश्च मे॥ ८॥

(वे बोले—) ‘मा! नानाके घरसे चले मेरी यह सातवीं रात बीती है। मेरे नानाजी और मामा युधाजित् भी कुशलसे हैं॥ ८॥

यन्मे धनं च रत्नं च ददौ राजा परंतप:।

परिश्रान्तं पथ्यभवत् ततोऽहं पूर्वमागत:॥ ९ ॥

राजवाक्यहरैर्दूतैस्त्वर्यमाणोऽहमागत: ।

यदहं प्रष्टुमिच्छामि तदम्बा वक्तुमर्हति॥ १०॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले केकयनरेशने मुझे जो धन-रत्न प्रदान किये हैं, उनके भारसे मार्गमें सब वाहन थक गये थे, इसलिये मैं राजकीय संदेश लेकर गये हुए दूतोंके जल्दी मचानेसे यहाँ पहले ही चला आया हूँ। अच्छा माँ, अब मैं जो कुछ पूछता हूँ, उसे तुम बताओ’॥ ९-१०॥

शून्योऽयं शयनीयस्ते पर्यङ्को हेमभूषित:।

न चायमिक्ष्वाकुजन: प्रहृष्ट: प्रतिभाति मे॥ ११॥

‘यह तुम्हारी शय्या सुवर्णभूषित पलंग इस समय सूना है, इसका क्या कारण है (आज यहाँ महाराज उपस्थित क्यों नहीं हैं)? ये महाराजके परिजन आज प्रसन्न क्यों नहीं जान पड़ते हैं?॥ ११॥

राजा भवति भूयिष्ठमिहाम्बाया निवेशने।

तमहं नाद्य पश्यामि द्रष्टुमिच्छन्निहागत:॥ १२॥

‘महाराज (पिताजी) प्राय: माताजीके ही महलमें रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ। मैं उन्हींका दर्शन करनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ॥

पितुर्ग्रहीष्ये पादौ च तं ममाख्याहि पृच्छत:।

आहोस्विदम्बाज्येष्ठाया: कौसल्याया निवेशने॥ १३॥

‘मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं? मैं उनके पैर पकडूँगा। अथवा बड़ी माता कौसल्याके घरमें तो वे नहीं हैं?’॥ १३॥

तं प्रत्युवाच कैकेयी प्रियवद् घोरमप्रियम्।

अजानन्तं प्रजानन्ती राज्यलोभेन मोहिता॥ १४॥

कैकेयी राज्यके लोभसे मोहित हो रही थी। वह राजाका वृत्तान्त न जाननेवाले भरतसे उस घोर अप्रिय समाचारको प्रिय-सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी—॥ १४॥

या गति: सर्वभूतानां तां गतिं ते पिता गत:।

राजा महात्मा तेजस्वी यायजूक: सतां गति:॥ १५॥

‘बेटा! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषोंके आश्रयदाता थे। एक दिन समस्त प्राणियोंकी जो गति होती है, उसी गतिको वे भी प्राप्त हुए हैं’॥ १५॥

तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं धर्माभिजनवाञ्छुचि:।

पपात सहसा भूमौ पितृशोकबलार्दित:॥ १६॥

हा हतोऽस्मीति कृपणां दीनां वाचमुदीरयन्।

निपपात महाबाहुर्बाहू विक्षिप्य वीर्यवान्॥ १७॥

भरत धार्मिक कुलमें उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था। माताकी बात सुनकर वे पितृशोकसे अत्यन्त पीडि़त हो सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े और ‘हाय, मैं मारा गया!’ इस प्रकार अत्यन्त दीन और दु:खमय वचन कहकर रोने लगे। पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओंको बारम्बार पृथ्वीपर पटककर गिरने और लोटने लगे॥ १६-१७॥

तत: शोकेन संवीत: पितुर्मरणदु:खित:।

विललाप महातेजा भ्रान्ताकुलितचेतन:॥ १८॥

उन महातेजस्वी राजकुमारकी चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी। वे पिताकी मृत्युसे दु:खी और शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे—॥ १८॥

एतत् सुरुचिरं भाति पितुर्मे शयनं पुरा।

शशिनेवामलं रात्रौ गगनं तोयदात्यये॥ १९॥

तदिदं न विभात्यद्य विहीनं तेन धीमता।

व्योमेव शशिना हीनमप्शुष्क इव सागर:॥ २०॥

‘हाय! मेरे पिताजीकी जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्कालकी रातमें चन्द्रमासे सुशोभित होनेवाले निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराजसे रहित होकर चन्द्रमासे हीन आकाश और सूखे हुए समुद्रके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’॥ १९-२०॥

बाष्पमुत्सृज्य कण्ठेन स्वात्मना परिपीडित:।

प्रच्छाद्य वदनं श्रीमद् वस्त्रेण जयतां वर:॥ २१॥

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्रसे ढककर अपने कण्ठस्वरके साथ आँसू गिराकर मन-ही-मन अत्यन्त पीडि़त हो पृथ्वीपर पड़कर विलाप करने लगे॥ २१॥

तमार्तं देवसंकाशं समीक्ष्य पतितं भुवि।

निकृत्तमिव सालस्य स्कन्धं परशुना वने॥ २२॥

माता मातङ्गसंकाशं चन्द्रार्कसदृशं सुतम्।

उत्थापयित्वा शोकार्तं वचनं चेदमब्रवीत्॥ २३॥

देवतुल्य भरत शोकसे व्याकुल हो वनमें फरसेसे काटे गये साखूके तनेकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे, मतवाले हाथीके समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्यके समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्रको इस तरह भूमिपर पड़ा देख माता कैकेयीने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा—॥ २२-२३॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे राजन्नत्र महायश:।

त्वद्विधा नहि शोचन्ति सन्त: सदसि सम्मता:॥ २४॥

‘राजन्! उठो! उठो! महायशस्वी कुमार! तुम इस तरह यहाँ धरतीपर क्यों पड़े हो? तुम्हारे-जैसे सभाओंमें सम्मानित होनेवाले सत्पुरुष शोक नहीं किया करते हैं॥ २४॥

दानयज्ञाधिकारा हि शीलश्रुतितपोनुगा।

बुद्धिस्ते बुद्धिसम्पन्न प्रभेवार्कस्य मन्दिरे॥ २५॥

‘बुद्धिसम्पन्न पुत्र! जैसे सूर्यमण्डलमें प्रभा निश्चलरूपसे रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि सुस्थिर है। वह दान और यज्ञमें लगनेकी अधिकारिणी है; क्योंकि सदाचार और वेदवाक्योंका अनुसरण करनेवाली है’॥ २५॥

स रुदित्वा चिरं कालं भूमौ परिविवृत्य च।

जननीं प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृत:॥ २६॥

भरत पृथ्वीपर लोटते-पोटते बहुत देरतक रोते रहे। तत्पश्चात् अधिकाधिक शोकसे आकुल होकर वे मातासे इस प्रकार बोले—॥ २६॥

अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते।

इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम्॥ २७॥

‘मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीरामका राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञका अनुष्ठान करेंगे—यही सोचकर मैंने बड़े हर्षके साथ वहाँसे यात्रा की थी॥ २७॥

तदिदं ह्यन्यथाभूतं व्यवदीर्णं मनो मम।

पितरं यो न पश्यामि नित्यं प्रियहिते रतम्॥ २८॥

‘किंतु यहाँ आनेपर सारी बातें मेरी आशाके विपरीत हो गयीं। मेरा हृदय फटा जा रहा है; क्योंकि सदा अपने प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले पिताजीको मैं नहीं देख रहा हूँ॥ २८॥

अम्ब केनात्यगाद् राजा व्याधिना मय्यनागते।

धन्या रामादय: सर्वे यै: पिता संस्कृत: स्वयम्॥ २९॥

‘मा! महाराजको ऐसा कौन-सा रोग हो गया था, जिससे वे मेरे आनेके पहले ही चल बसे? श्रीराम आदि सब भाई धन्य हैं, जिन्होंने स्वयं उपस्थित रहकर पिताजीका अन्त्येष्टि-संस्कार किया॥ २९॥

न नूनं मां महाराज: प्राप्तं जानाति कीर्तिमान्।

उपजिघ्रेत् तु मां मूर्ध्नि तात: संनाम्य सत्वरम्॥ ३०॥

‘निश्चय ही मेरे पूज्य पिता यशस्वी महाराजको मेरे यहाँ आनेका कुछ पता नहीं है, अन्यथा वे शीघ्र ही मेरे मस्तकको झुकाकर उसे प्यारसे सूँघते॥ ३०॥

क्व स पाणि: सुखस्पर्शस्तातस्याक्लिष्टकर्मण:।

यो हि मां रजसा ध्वस्तमभीक्ष्णं परिमार्जति॥ ३१॥

‘हा! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे पिताका वह कोमल हाथ कहाँ है, जिसका स्पर्श मेरे लिये बहुत ही सुखदायक था? वे उसी हाथसे मेरे धूलिधूसर शरीरको बारंबार पोंछा करते थे॥ ३१॥

यो मे भ्राता पिता बन्धुर्यस्य दासोऽस्मि सम्मत:।

तस्य मां शीघ्रमाख्याहि रामस्याक्लिष्टकर्मण:॥ ३२॥

‘अब जो मेरे भाई, पिता और बन्धु हैं तथा जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले उन श्रीरामचन्द्रजीको तुम शीघ्र ही मेरे आनेकी सूचना दो॥ ३२॥

पिता हि भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानत:।

तस्य पादौ ग्रहीष्यामि स हीदानीं गतिर्मम॥ ३३॥

‘धर्मके ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुषके लिये बड़ा भाई पिताके समान होता है। मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करूँगा। अब वे ही मेरे आश्रय हैं॥ ३३॥

धर्मविद् धर्मशीलश्च महाभागो दृढव्रत:।

आर्ये किमब्रवीद् राजा पिता मे सत्यविक्रम:॥ ३४॥

पश्चिमं साधुसंदेशमिच्छामि श्रोतुमात्मन:।

‘आर्ये! धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया था तथा जो बड़ी दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करते थे, वे मेरे सत्यपराक्रमी और धर्मज्ञ पिता महाराज दशरथ अन्तिम समयमें क्या कह गये थे? मेरे लिये जो उनका अन्तिम संदेश हो उसे मैं सुनना चाहता हूँ’॥ ३४॥

इति पृष्टा यथातत्त्वं कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥ ३५॥

रामेति राजा विलपन् हा सीते लक्ष्मणेति च।

स महात्मा परं लोकं गतो मतिमतां वर:॥ ३६॥

भरतके इस प्रकार पूछनेपर कैकेयीने सब बात ठीक-ठीक बता दी। वह कहने लगी—‘बेटा! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे महात्मा पिता महाराजने ‘हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ इस प्रकार विलाप करते हुए परलोककी यात्रा की थी॥ ३५-३६॥

इतीमां पश्चिमां वाचं व्याजहार पिता तव।

कालधर्मं परिक्षिप्त: पाशैरिव महागज:॥ ३७॥

‘जैसे पाशोंसे बँधा हुआ महान् गज विवश हो जाता है, उसी प्रकार कालधर्मके वशीभूत हुए तुम्हारे पिताने अन्तिम वचन इस प्रकार कहा था—॥ ३७॥

सिद्धार्थास्तु नरा राममागतं सह सीतया।

लक्ष्मणं च महाबाहुं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥ ३८॥

‘जो लोग सीताके साथ पुन: लौटकर आये हुए महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणको देखेंगे, वे ही कृतार्थ होंगे’॥

तच्छ्रुत्वा विषसादैव द्वितीयाप्रियशंसनात्।

विषण्णवदनो भूत्वा भूय: पप्रच्छ मातरम्॥ ३९॥

माताके द्वारा यह दूसरी अप्रिय बात कही जानेपर भरत और भी दु:खी ही हुए। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन्होंने पुन: मातासे पूछा—॥ ३९॥

क्व चेदानीं स धर्मात्मा कौसल्यानन्दवर्धन:।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च समागत:॥ ४०॥

‘मा! माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इस अवसरपर भाई लक्ष्मण और सीताके साथ कहाँ चले गये हैं?’॥ ४०॥

तथा पृष्टा यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।

मातास्य युगपद्वाक्यं विप्रियं प्रियशंसया॥ ४१॥

इस प्रकार पूछनेपर उनकी माता कैकेयीने एक साथ ही प्रिय बुद्धिसे वह अप्रिय संवाद यथोचित रीतिसे सुनाना आरम्भ किया—॥ ४१॥

स हि राजसुत: पुत्र चीरवासा महावनम्।

दण्डकान् सह वैदेह्या लक्ष्मणानुचरो गत:॥ ४२॥

‘बेटा! राजकुमार श्रीराम वल्कल-वस्त्र धारण करके सीताके साथ दण्डकवनमें चले गये हैं। लक्ष्मणने भी उन्हींका अनुसरण किया है’॥ ४२॥

तच्छ्रुत्वा भरतस्त्रस्तो भ्रातुश्चारित्रशङ्कया।

स्वस्य वंशस्य माहात्म्यात् प्रष्टुं समुपचक्रमे॥ ४३॥

यह सुनकर भरत डर गये, उन्हें अपने भाईके चरित्रपर शङ्का हो आयी। (वे सोचने लगे—श्रीराम कहीं धर्मसे गिर तो नहीं गये?) अपने वंशकी महत्ता (धर्मपरायणता) का स्मरण करके वे कैकेयीसे इस प्रकार पूछने लगे—॥ ४३॥

कच्चिन्न ब्राह्मणधनं हृतं रामेण कस्यचित्।

कच्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसित:॥ ४४॥

‘मा! श्रीरामने किसी कारणवश ब्राह्मणका धन तो नहीं हर लिया था? किसी निष्पाप धनी या दरिद्रकी हत्या तो नहीं कर डाली थी?॥ ४४॥

कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते।

कस्मात् स दण्डकारण्ये भ्राता रामो विवासित:॥ ४५॥

‘राजकुमार श्रीरामका मन किसी परायी स्त्रीकी ओर तो नहीं चला गया? किस अपराधके कारण भैया श्रीरामको दण्डकारण्यमें जानेके लिये निर्वासित कर दिया गया है?’॥ ४५॥

अथास्य चपला माता तत् स्वकर्म यथातथम्।

तेनैव स्त्रीस्वभावेन व्याहर्तुमुपचक्रमे॥ ४६॥

तब चपल स्वभाववाली भरतकी माता कैकेयीने उस विवेकशून्य चञ्चल नारीस्वभावके कारण ही अपनी करतूतको ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया॥ ४६॥

एवमुक्ता तु कैकेयी भरतेन महात्मना।

उवाच वचनं हृष्टा वृथापण्डितमानिनी॥ ४७॥

महात्मा भरतके पूर्वोक्त रूपसे पूछनेपर व्यर्थ ही अपनेको बड़ी विदुषी माननेवाली कैकेयीने बड़े हर्षमें भरकर कहा—॥ ४७॥

न ब्राह्मणधनं किंचिद्धृतं रामेण कस्यचित्।

कश्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसित:।

न राम: परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति॥ ४८॥

‘बेटा! श्रीरामने किसी कारणवश किञ्चिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं किया है। किसी निरपराध धनी या दरिद्रकी हत्या भी उन्होंने नहीं की है। श्रीराम कभी किसी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डालते हैं॥ ४८॥

मया तु पुत्र श्रुत्वैव रामस्येहाभिषेचनम्।

याचितस्ते पिता राज्यं रामस्य च विवासनम्॥ ४९॥

‘बेटा! (उनके वनमें जानेका कारण इस प्रकार है)—मैंने सुना था कि अयोध्यामें श्रीरामका राज्याभिषेक होने जा रहा है, तब मैंने तुम्हारे पितासे तुम्हारे लिये राज्य और श्रीरामके लिये वनवासकी प्रार्थना की॥ ४९॥

स स्ववृत्त‌िं समास्थाय पिता ते तत् तथाकरोत्।

रामस्तु सहसौमित्रि: प्रेषित: सह सीतया॥ ५०॥

तमपश्यन् प्रियं पुत्रं महीपालो महायशा:।

पुत्रशोकपरिद्यून: पञ्चत्वमुपपेदिवान्॥ ५१॥

‘उन्होंने अपने सत्यप्रतिज्ञ स्वभावके अनुसार मेरी माँग पूरी की। श्रीराम लक्ष्मण और सीताके साथ वनको भेज दिये गये, फिर अपने प्रिय पुत्र श्रीरामको न देखकर वे महायशस्वी महाराज पुत्रशोकसे पीडि़त हो परलोकवासी हो गये॥ ५०-५१॥

त्वया त्विदानीं धर्मज्ञ राजत्वमवलम्ब्यताम्।

त्वत्कृते हि मया सर्वमिदमेवंविधं कृतम्॥ ५२॥

‘धर्मज्ञ! अब तुम राजपद स्वीकार करो। तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारसे यह सब कुछ किया है॥ ५२॥

मा शोकं मा च संतापं धैर्यमाश्रय पुत्रक।

त्वदधीना हि नगरी राज्यं चैतदनामयम्॥ ५३॥

‘बेटा! शोक और संताप न करो, धैर्यका आश्रय लो। अब यह नगर और निष्कण्टक राज्य तुम्हारे ही अधीन है॥

तत् पुत्र शीघ्रं विधिना विधिज्ञै-

र्वसिष्ठमुख्यै: सहितो द्विजेन्द्रै:।

संकाल्य राजानमदीनसत्त्व-

मात्मानमुर्व्यामभिषेचयस्व ॥ ५४॥

‘अत: वत्स! अब विधि-विधानके ज्ञाता वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणोंके साथ तुम उदार हृदयवाले महाराजका अन्त्येष्टि-संस्कार करके इस पृथ्वीके राज्यपर अपना अभिषेक कराओ’॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितम: सर्ग:॥ ७२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥

 

त्रिसप्ततितम: सर्ग:

भरतका कैकेयीको धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना

श्रुत्वा च स पितुर्वृत्तं भ्रातरौ च विवासितौ।

भरतो दु:खसंतप्त इदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

पिताके परलोकवास और दोनों भाइयोंके वनवासका समाचार सुनकर भरत दु:खसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले—॥ १॥

किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचत:।

विहीनस्याथ पित्रा च भ्रात्रा पितृसमेन च॥ २॥

‘हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पितासे सदाके लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाईसे भी बिलग हो गया। अब तो मैं शोकमें डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है?॥ २॥

दु:खे मे दु:खमकरोर्व्रणे क्षारमिवाददा:।

राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम्॥ ३॥

‘तूने राजाको परलोकवासी तथा श्रीरामको तपस्वी बनाकर मुझे दु:ख-पर-दु:ख दिया है, घावपर नमक-सा छिड़क दिया है॥ ३॥

कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता।

अङ्गारमुपगूह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान्॥ ४॥

‘तू इस कुलका विनाश करनेके लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिताने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गारको हृदयसे लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझमें नहीं आयी थी॥ ४॥

मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि।

सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि॥ ५॥

‘पापपर ही दृष्टि रखनेवाली! कुलकलङ्किनी! तूने मेरे महाराजको कालके गालमें डाल दिया और मोहवश इस कुलका सुख सदाके लिये छीन लिया॥ ५॥

त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशा:।

तीव्रदु:खाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृप:॥ ६॥

‘तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दु:सह दु:खसे संतप्त होकर प्राण त्यागनेको विवश हुए हैं॥ ६॥

विनाशितो महाराज: पिता मे धर्मवत्सल:।

कस्मात् प्रव्राजितो राम: कस्मादेव वनं गत:॥ ७॥

‘बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथका विनाश क्यों किया? मेरे बड़े भाई श्रीरामको क्यों घरसे निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहनेसे) वनको चले गये?॥ ७॥

कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकाभिपीडिते।

दुष्करं यदि जीवेतां प्राप्य त्वां जननीं मम॥ ८॥

‘कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलानेवाली तुझ कैकेयीको पाकर पुत्रशोकसे पीडि़त हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है॥ ८॥

नन्वार्योऽपि च धर्मात्मा त्वयि वृत्तिमनुत्तमाम्।

वर्तते गुरुवृत्तिज्ञो यथा मातरि वर्तते॥ ९॥

‘बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये—इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माताके प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे॥ ९॥

तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी।

त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते॥ १०॥

‘मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्मका ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिनका-सा बर्ताव करती हैं॥ १०॥

तस्या: पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम्।

प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे न शोचसे॥ ११॥

‘पापिनि! उनके महात्मा पुत्रको चीर और वल्कल पहनाकर तूने वनमें रहनेके लिये भेज दिया। फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है॥ ११॥

अपापदर्शिनं शूरं कृतात्मानं यशस्विनम्।

प्रव्राज्य चीरवसनं किं नु पश्यसि कारणम्॥ १२॥

‘श्रीराम किसीकी बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं। उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देनेमें तू कौन-सा लाभ देख रही है?॥ १२॥

लुब्धाया विदितो मन्ये न तेऽहं राघवं यथा।

तथा ह्यनर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम्॥ १३॥

‘तू लोभिन है। मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्यके लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है॥ १३॥

अहं हि पुरुषव्याघ्रावपश्यन् रामलक्ष्मणौ।

केन शक्तिप्रभावेण राज्यं रक्षितुमुत्सहे॥ १४॥

‘मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर किस शक्तिके प्रभावसे इस राज्यकी रक्षा कर सकता हूँ? (मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं)॥ १४॥

तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महौजसम्।

उपाश्रितोऽभूद् धर्मात्मा मेरुर्मेरुवनं यथा॥ १५॥

‘मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीरामका ही आश्रय लेते थे (उन्हींसे अपने लोक-परलोककी सिद्धिकी आशा रखते थे), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षाके लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वनका ही आश्रय लेता है (यदि वह दुर्गम वनसे घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उसपर आक्रमण कर सकते हैं)॥ १५॥

सोऽहं कथमिमं भारं महाधुर्यसमुद्यतम्।

दम्यो धुरमिवासाद्य सहेयं केन चौजसा॥ १६॥

‘यह राज्यका भार, जिसे किसी महाधुरंधरने धारण किया था, मैं कैसे, किस बलसे धारण कर सकता हूँ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलोंद्वारा ढोये जानेयोग्य महान् भारको नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्यका महान् भार मेरे लिये असह्य है॥ १६॥

अथवा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा।

सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्द्धिनीम्॥ १७॥

अथवा नाना प्रकारके उपायों तथा बुद्धिबलसे मुझमें राज्यके भरण-पोषणकी शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटेके लिये राज्य चाहनेवाली तुझ कैकेयीकी मन:कामना पूरी नहीं होने दूँगा॥ १७॥

न मे विकांक्षा जायेत त्यक्तुं त्वां पापनिश्चयाम्।

यदि रामस्य नावेक्षा त्वयि स्यान्मातृवत् सदा॥ १८॥

‘यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माताके समान नहीं देखते होते तो तेरी-जैसी पापपूर्ण विचारवाली माताका त्याग करनेमें मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती॥ १८॥

उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी।

साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता॥ १९॥

‘उत्तम चरित्रसे गिरी हुई पापिनि! मेरे पूर्वजोंने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पापपर ही दृष्टि रखनेवाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी?॥ १९॥

अस्मिन् कुले हि सर्वेषां ज्येष्ठो राज्येऽभिषिच्यते।

अपरे भ्रातरस्तस्मिन् प्रवर्तन्ते समाहिता:॥ २०॥

‘इस कुलमें जो सबसे बड़ा होता है, उसीका राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानीके साथ बड़ेकी आज्ञाके अधीन रहकर कार्य करते हैं॥ २०॥

न हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे।

गतिं वा न विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम्॥ २१॥

‘क्रूर स्वभाववाली कैकेयि! मेरी समझमें तू राजधर्मपर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती। राजाओंके बर्तावका जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है॥ २१॥

सततं राजपुत्रेषु ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते।

राज्ञामेतत् समं तत् स्यादिक्ष्वाकूणां विशेषत:॥ २२॥

‘राजकुमारोंमें जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाता है। सभी राजाओंके यहाँ समान रूपसे इस नियमका पालन होता है। इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके कुलमें इसका विशेष आदर है॥ २२॥

तेषां धर्मैकरक्षाणां कुलचारित्रशोभिनाम्।

अद्य चारित्रशौटीर्यं त्वां प्राप्य विनिवर्तितम्॥ २३॥

‘जिनकी एकमात्र धर्मसे ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचारके पालनसे ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभियान आज तुझे पाकर—तेरे सम्बन्धके कारण दूर हो गया॥ २३॥

तवापि सुमहाभागे जनेन्द्रकुलपूर्वके।

बुद्धिमोह: कथमयं सम्भूतस्त्वयि गर्हित:॥ २४॥

‘महाभागे! तेरा जन्म भी तो महाराज केकयके कुलमें हुआ है, फिर तेरे हृदयमें यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया?॥ २४॥

न तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये।

यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम॥ २५॥

‘अरी! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है। मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा। तूने मेरे लिये उस विपत्तिकी नींव डाल दी है, जो मेरे प्राणतक ले सकती है॥ २५॥

एष त्विदानीमेवाहमप्रियार्थं तवानघम्।

निवर्तयिष्यामि वनाद् भ्रातरं स्वजनप्रियम्॥ २६॥

‘यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करनेके लिये तुल गया हूँ। मैं वनसे निष्पाप भ्राता श्रीरामको, जो स्वजनोंके प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा॥ २६॥

निवर्तयित्वा रामं च तस्याहं दीप्ततेजस:।

दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना॥ २७॥

श्रीरामको लौटा लाकर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुषका दास बनकर स्वस्थचित्तसे जीवन व्यतीत करूँगा’॥ २७॥

इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा

प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् ।

शोकार्दितश्चापि ननाद भूय:

सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थ:॥ २८॥

ऐसा कहकर महात्मा भरत शोकसे पीडि़त हो पुन: जली-कटी बातोंसे कैकेयीको व्यथित करते हुए उसे जोर-जोरसे फटकारने लगे, मानो मन्दराचलकी गुहामें बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितम: सर्ग:॥ ७३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३॥

 


चतु:सप्ततितम: सर्ग:

भरतका कैकेयीको कड़ी फटकार देना

तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा।

रोषेण महताविष्ट: पुनरेवाब्रवीद् वच:॥ १॥

इस प्रकार माताकी निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेशसे भर गये और फिर कठोर वाणीमें कहने लगे—॥ १॥

राज्याद् भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि।

परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव॥ २॥

‘दुष्टतापूर्ण बर्ताव करनेवाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्यसे भ्रष्ट हो जा। धर्मने तेरा परित्याग कर दिया है, अत: अब तू मरे हुए महाराजके लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्मसे गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्रके लिये रोया कर॥ २॥

किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिक:।

ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ॥ ३॥

‘श्रीरामने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्युका कष्ट भोगना पड़ा?॥ ३॥

भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात्।

कैकेयि नरकं गच्छ मा च तातसलोकताम्॥ ४॥

कैकेयि! तूने इस कुलका विनाश करनेके कारण भ्रूणहत्याका पाप अपने सिरपर लिया है, इसलिये तू नरकमें जा और पिताजीका लोक तुझे न मिले॥ ४॥

यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा।

सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम्॥ ५॥

‘तूने इस घोर कर्मके द्वारा समस्त लोकोंके प्रिय श्रीरामको देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है॥ ५॥

त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रित:।

अयशो जीवलोके च त्वयाहं प्रतिपादित:॥ ६॥

‘तेरे कारण मेरे पिताकी मृत्यु हुई, श्रीरामको वनका आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगत्में अपयशका भागी बना दिया॥ ६॥

मातृरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके।

न तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि॥ ७॥

‘राज्यके लोभमें पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माताके रूपमें मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये॥ ७॥

कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या मम मातर:।

दु:खेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम्॥ ८॥

‘कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनीके कारण महान् दु:खमें पड़ गयी हैं॥ ८॥

न त्वमश्वपते: कन्या धर्मराजस्य धीमत:।

राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितु:॥ ९॥

‘तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपतिकी कन्या नहीं है। तू उनके कुलमें कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिताके वंशका विध्वंस करनेवाली है॥ ९॥

यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायण:।

वनं प्रस्थापितो वीर: पितापि त्रिदिवं गत:॥ १०॥

यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते।

भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये॥ ११॥

‘तूने सदा सत्यमें तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीरामको जो वनमें भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्योंद्वारा तूने प्रधान रूपसे जिस पापका अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयोंसे बिछुड़ गया और समस्त जगत्के लोगोंके लिये अप्रिय बन गया॥ १०-११॥

कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये।

कृत्वा कं प्राप्स्यसे ह्यद्य लोकं निरयगामिनि॥ १२॥

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली नरकगामिनी कैकेयि! धर्मपरायणा माता कौसल्याको पति और पुत्रसे वञ्चित करके अब तू किस लोकमें जायगी?॥ १२॥

किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम्।

ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसम्भवम्॥ १३॥

‘क्रूरहृदये! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिताके तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओंके आश्रयदाता हैं। क्या तू उन्हें इस रूपमें नहीं जानती है?॥ १३॥

अङ्गप्रत्यङ्गज: पुत्रो हृदयाच्चाभिजायते।

तस्मात् प्रियतरो मातु: प्रिया एव तु बान्धवा:॥ १४॥

‘पुत्र माताके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदयसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह माताको अधिक प्रिय होता है। अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं (किंतु पुत्र प्रियतर होता है)॥ १४॥

अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभि: सुरसम्मता।

वहमानौ ददर्शोर्व्यां पुत्रौ विगतचेतसौ॥ १५॥

‘एक समयकी बात है कि धर्मको जाननेवाली देव-सम्मानित सुरभि (कामधेनु) ने पृथ्वीपर अपने दो पुत्रोंको देखा, जो हल जोतते-जोतते अचेत हो गये थे॥ १५॥

तावर्धदिवसं श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले।

रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलेक्षणम्॥ १६॥

‘मध्याह्नका समय होनेतक लगातार हल जोतनेसे वे बहुत थक गये थे। पृथ्वीपर अपने उन दोनों पुत्रोंको ऐसी दुर्दशामें पड़ा देख सुरभि पुत्रशोकसे रोने लगी। उसके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये॥ १६॥

अधस्ताद् व्रजतस्तस्या: सुरराज्ञो महात्मन:।

बिन्दव: पतिता गात्रे सूक्ष्मा: सुरभिगन्धिन:॥ १७॥

‘उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभिके नीचेसे होकर कहीं जा रहे थे। उनके शरीरपर कामधेनुके दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े॥ १७॥

निरीक्षमाणस्तां शक्रो ददर्श सुरभिं स्थिताम्।

आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदु:खिताम्॥ १८॥

‘जब इन्द्रने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा—आकाशमें सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दु:खी हो दीनभावसे रो रही हैं॥ १८॥

तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम्।

इन्द्र: प्राञ्जलिरुद्विग्न: सुरराजोऽब्रवीद् वच:॥ १९॥

‘यशस्विनी सुरभिको शोकसे संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले—॥ १९॥

भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद् विद्यते महत्।

कुतोनिमित्त: शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि॥ २०॥

‘सबका हित चाहनेवाली देवि! हमलोगोंपर कहींसे कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? बताओ, किस कारणसे तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है?॥ २०॥

एवमुक्ता तु सुरभि: सुरराजेन धीमता।

प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा॥ २१॥

‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेमें चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २१॥

शान्तं पापं न व: किंचित् कुतश्चिदमराधिप।

अहं तु मग्नौ शोचामि स्व पुत्रौ विषमे स्थितौ॥ २२॥

‘देवेश्वर! पाप शान्त हो। तुमलोगोंपर कहींसे कोई भय नहीं है। मैं तो अपने इन दोनों पुत्रोंको विषम अवस्था (घोर सङ्कट) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ॥ २२॥

एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ।

वध्यमानौ बलीवर्दौ कर्षकेण दुरात्मना॥ २३॥

‘ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दु:खी हैं, सूर्यकी किरणोंसे बहुत तप गये हैं और ऊपरसे वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है॥ २३॥

मम कायात् प्रसूतौ हि दु:खितौ भारपीडितौ।

यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसम: प्रिय:॥ २४॥

‘मेरे शरीरसे इनकी उत्पत्ति हुई है। ये दोनों भारसे पीडि़त और दु:खी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोकसे संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्रके समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है’॥ २४॥

यस्या: पुत्रसहस्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत्।

तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान् मन्यते परम्॥ २५॥

‘जिनके सहस्रों पुत्रोंसे यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनुको इस तरह रोती देख इन्द्रने यह माना कि पुत्रसे बढ़कर और कोई नहीं है॥ २५॥

इन्द्रो ह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम्।

सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसीं तामिहेश्वर:॥ २६॥

‘देवेश्वर इन्द्रने अपने शरीरपर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपातको देखकर देवी सुरभिको इस जगत्में सबसे श्रेष्ठ माना॥ २६॥

समाप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया।

श्रीमत्या गुणमुख्याया: स्वभावपरिचेष्टया॥ २७॥

यस्या: पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक्।

किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति॥ २८॥

‘जिनका चरित्र समस्त प्राणियोंके लिये समान रूपसे हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्तिसे सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुणसे युक्त तथा लोकरक्षाकी कामनासे कार्यमें प्रवृत्त होनेवाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रोंके लिये उनके स्वाभाविक चेष्टामें रत होनेपर भी कष्ट पानेके कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीरामके बिना कैसे जीवित रहेंगी?॥ २७-२८॥

एकपुत्रा च साध्वी च विवत्सेयं त्वया कृता।

तस्मात् त्वं सततं दु:खं प्रेत्य चेह च लप्स्यसे॥ २९॥

‘इकलौते बेटेवाली इन सती-साध्वी कौसल्याका तूने उनके पुत्रसे बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोकमें भी दु:ख ही पायेगी॥ २९॥

अहं त्वपचितिं भ्रातु: पितुश्च सकलामिमाम्।

वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशय:॥ ३०॥

‘मैं तो यह राज्य लौटाकर भाईकी पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिताका भी पूर्णरूपसे पूजन करूँगा तथा नि:संदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो (तेरे दिये हुए कलङ्कको मिटानेवाला और) मेरे यशको बढ़ानेवाला हो॥ ३०॥

आनाय्य च महाबाहुं कोसलेन्द्रं महाबलम्।

स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम्॥ ३१॥

‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीरामको यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वनमें प्रवेश करूँगा॥

नह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम्।

शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षित:॥ ३२॥

‘पापपूर्ण संकल्प करनेवाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पापका बोझ ढोता रहूँ—यह मुझसे नहीं हो सकता॥ ३२॥

सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा विश दण्डकान्।

रज्जुं बद‍्ध्वाथवा कण्ठे नहि तेऽन्यत् परायणम्॥ ३३॥

‘अब तू जलती आगमें प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्यमें चली जा अथवा गलेमें रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है॥ ३३॥

अहमप्यवनीं प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे।

कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मष:॥ ३४॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्याकी भूमिपर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा’॥ ३४॥

इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कुशतोदित:।

पपात भुवि संक्रुद्धो नि:श्वसन्निव पन्नग:॥ ३५॥

यह कहकर भरत वनमें तोमर और अंकुशद्वारा पीडि़त किये गये हाथीकी भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए साँपकी भाँति लम्बी साँस खींचने लगे॥ ३५॥

संरक्तनेत्र: शिथिलाम्बरस्तथा

विधूतसर्वाभरण: परंतप:।

बभूव भूमौ पतितो नृपात्मज:

शचीपते: केतुरिवोत्सवक्षये॥ ३६॥

शत्रुओंको तपानेवाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होनेपर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्रके ध्वजकी भाँति उस समय पृथ्वीपर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:सप्ततितम: सर्ग:॥ ७४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥

 

पञ्चसप्ततितम: सर्ग:

कौसल्याके सामने भरतका शपथ खाना

दीर्घकालात् समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा स वीर्यवान्।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्वीक्ष्य मातरम्॥ १॥

सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत्।

बहुत देरके बाद होशमें आनेपर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसूभरे नेत्रोंसे दीन बनी बैठी हुई माताकी ओर देखकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी निन्दा करते हुए बोले—॥ १/

राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम्॥ २॥

अभिषेकं न जानामि योऽभूद् राज्ञा समीक्षित:।

विप्रकृष्टे ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽभवम्॥ ३॥

‘मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी मातासे इसके लिये बातचीत ही की है। महाराजने जिस अभिषेकका निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्नके साथ दूर देशमें था॥ २-३॥

वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मन:।

विवासनं च सौमित्रे: सीतायाश्च यथाभवत्॥ ४॥

‘महात्मा श्रीरामके वनवास और सीता तथा लक्ष्मणके निर्वासनका भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ?’॥ ४॥

तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मन:।

कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रां चेदमब्रवीत्॥ ५॥

महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माताको कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाजको पहचानकर कौसल्याने सुमित्रासे इस प्रकार कहा—॥ ५॥

आगत: क्रूरकार्याया: कैकेय्या भरत: सुत:।

तमहं द्रष्टुमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम्॥ ६॥

‘क्रूर कर्म करनेवाली कैकेयीके पुत्र भरत आ गये हैं। वे बड़े दूरदर्शी हैं, अत: मैं उन्हें देखना चाहती हूँ’॥ ६॥

एवमुक्त्वा सुमित्रां तां विवर्णवदना कृशा।

प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना॥ ७॥

सुमित्रासे ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत-सी हुई कौसल्या जहाँ भरत थे, उस स्थानपर जानेके लिये काँपती हुई चलीं॥ ७॥

स तु राजात्मजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा।

प्रतस्थे भरतो येन कौसल्याया निवेशनम्॥ ८॥

उसी समय उधरसे राजकुमार भरत भी शत्रुघ्नको साथ लिये उसी मार्गसे चले आ रहे थे, जिससे कौसल्याके भवनमें आना-जाना होता था॥ ८॥

तत: शत्रुघ्नभरतौ कौसल्यां प्रेक्ष्य दु:खितौ।

पर्यष्वजेतां दु:खार्तां पतितां नष्टचेतनाम्॥ ९॥

रुदन्तौ रुदती दु:खात् समेत्यार्या मनस्विनी।

भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदु:खिता॥ १०॥

तदनन्तर शत्रुघ्न और भरतने दूरसे ही देखा कि माता कौसल्या दु:खसे व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं। यह देखकर उन्हें बड़ा दु:ख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदीसे लग गये तथा फूट-फूटकर रोने लगे। आर्या मनस्विनी कौसल्या भी दु:खसे रो पड़ीं और उन्हें छातीसे लगाकर अत्यन्त दु:खित हो भरतसे इस प्रकार बोलीं—॥ ९-१०॥

इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम्।

सम्प्राप्तं बत कैकेय्या शीघ्रं क्रूरेण कर्मणा॥ ११॥

‘बेटा! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयीने जल्दीके कारण बड़े क्रूर कर्मके द्वारा इसे पाया है॥

प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम्।

कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी॥ १२॥

‘क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखनेवाली कैकेयी न जाने इसमें कौन-सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटेको चीर-वस्त्र पहनाकर वनमें भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया॥ १२॥

क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति।

हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशा:॥ १३॥

‘अब कैकेयीको चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही उसी स्थानपर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभिसे सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं॥ १३॥

अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम्।

अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघव:॥ १४॥

‘अथवा सुमित्राको साथ लेकर और अग्निहोत्रको आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थानको प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं॥ १४॥

कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि।

यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे सुतस्तप:॥ १५॥

‘अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छाके अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं॥ १५॥

इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम्।

हस्त्यश्वरथसम्पूर्णं राज्यं निर्यातितं तया॥ १६॥

‘यह धन-धान्यसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथोंसे भरा-पूरा विस्तृत राज्य कैकेयीने (श्रीरामसे छीनकर) तुम्हें दिलाया है’॥ १६॥

इत्यादिबहुभिर्वाक्यै: क्रूरै: सम्भर्त्सितोऽनघ:।

विव्यथे भरतोऽतीव व्रणे तुद्येव सूचिना॥ १७॥

इस तरहकी बहुत-सी कठोर बातें कहकर जब कौसल्याने निरपराध भरतकी भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसीने घावमें सूई चुभो दी हो॥ १७॥

पपात चरणौ तस्यास्तदा सम्भ्रान्तचेतन:।

विलप्य बहुधासंज्ञो लब्धसंज्ञस्तदाभवत्॥ १८॥

वे कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े, उस समय उनके चित्तमें बड़ी घबराहट थी। वे बारम्बार विलाप करके अचेत हो गये। थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ॥ १८॥

एवं विलपमानां तां प्राञ्जलिर्भरतस्तदा।

कौसल्यां प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृताम्॥ १९॥

तब भरत अनेक प्रकारके शोकोंसे घिरी हुई और पूर्वोक्त रूपसे विलाप करती हुई माता कौसल्यासे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले—॥ १९॥

आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकल्मषम्।

विपुलां च मम प्रीतिं स्थितां जानासि राघवे॥ २०॥

‘आर्ये! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिलकुल जानकारी नहीं थी। मैं सर्वथा निरपराध हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजीमें मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम है॥ २०॥

कृतशास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत् तस्य कदाचन।

सत्यसंध: सतां श्रेष्ठो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २१॥

‘जिसकी अनुमतिसे सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वनमें गये हों, उस पापीकी बुद्धि कभी गुरुसे सीखे हुए शास्त्रोंमें बताये गये मार्गका अनुसरण करनेवाली न हो॥ २१॥

प्रैष्यं पापीयसां यातु सूर्यं च प्रति मेहतु।

हन्तु पादेन गा: सुप्ता यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २२॥

‘जिसकी सलाहसे बड़े भाई श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों—हीन जातियोंका सेवक हो। सूर्यकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करे और सोयी हुई गौओंको लातसे मारे (अर्थात् वह इन पापकर्मोंके दुष्परिणामका भागी हो)॥ २२॥

कारयित्वा महत् कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम्।

अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २३॥

‘जिसकी सम्मतिसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवकसे भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देनेवाले स्वामीको लगता है॥ २३॥

परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुत्रवत्।

ततस्तु द्रुह्यतां पापं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २४॥

‘जिसके कहनेसे आर्य श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियोंका पुत्रकी भाँति पालन करनेवाले राजासे द्रोह करनेवाले लोगोंको लगता है॥ २४॥

बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षितु: प्रजा:।

अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २५॥

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उसी अधर्मका भागी हो, जो प्रजासे उसकी आयका छठा भाग लेकर भी प्रजावर्गकी रक्षा न करनेवाले राजाको प्राप्त होता है॥ २५॥

संश्रुत्य च तपस्विभ्य: सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम्।

तां चापलपतां पापं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २६॥

‘जिसकी सलाहसे भैया श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञमें कष्ट सहनेवाले ऋत्विजोंको दक्षिणा देनेकी प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देनेवाले लोगोंको लगता है॥ २६॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले।

मा स्म कार्षीत् सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २७॥

‘हाथी, घोड़े और रथोंसे भरे एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त संग्राममें सत्पुरुषोंके धर्मका पालन न करनेवाले योद्धाओंको जो पाप लगता है, वही उस मनुष्यको भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामजीको वनमें भेजा गया हो॥ २७॥

उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यत्नेन धीमता।

स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २८॥

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामको वनमें प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुष्टात्मा बुद्धिमान् गुरुके द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्रके सूक्ष्म विषयका उपदेश भुला दे॥ २८॥

मा च तं व्यूढबाह्वंसं चन्द्रभास्करतेजसम्।

द्राक्षीद् राज्यस्थमासीनं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २९॥

‘जिसकी सलाहसे बड़े भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधोंसे सुशोभित श्रीरामचन्द्रजीको राज्यसिंहासनपर विराजमान न देख सके—वह राजा श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित रह जाय॥ २९॥

पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निर्घृण:।

गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३०॥

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामचन्द्रजी वनमें गये हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरीके दूधको देवताओं, पितरों एवं भगवान्को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाय॥ ३०॥

गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून् परिवदेत च।

मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यर्थं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३१॥

‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओंके शरीरका पैरसे स्पर्श, गुरुजनोंकी निन्दा तथा मित्रके प्रति अत्यन्त द्रोह करे॥ ३१॥

विश्वासात् कथितं किंचित् परिवादं मिथ: क्वचित्।

विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३२॥

‘जिसके कहनेसे बड़े भैया श्रीराम वनमें गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखनेके विश्वासपर एकान्तमें कहे हुए किसीके दोषको दूसरोंपर प्रकट कर दे (अर्थात् उसे विश्वासघात करनेका पाप लगे)॥ ३२॥

अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रप:।

लोके भवतु विद्विष्टो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३३॥

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगत्में सबके द्वेषका पात्र हो॥

पुत्रैर्दासैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारित:।

स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३४॥

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह अपने घरमें पुत्रों, दासों और भृत्योंसे घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेके पापका भागी हो॥

अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्य: प्रमीयताम्।

अनवाप्य क्रियां धर्म्यां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३५॥

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नीको न पाकर अग्निहोत्र आदि धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान किये बिना संतानहीन अवस्थामें ही मर जाय॥ ३५॥

माऽऽत्मन: संततिं द्राक्षीत् स्वेषु दारेषु दु:खित:।

आयु:समग्रमप्राप्य यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३६॥

‘जिसकी सम्मतिसे मेरे बड़े भाई श्रीराम वनमें गये हों, वह सदा दु:खी रहकर अपनी धर्मपत्नीसे होनेवाली संतानका मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयुका उपभोग किये बिना ही मर जाय॥ ३६॥

राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत् पापमुच्यते।

भृत्यत्यागे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम्॥ ३७॥

‘राजा, स्त्री, बालक और वृद्धोंका वध करने तथा भृत्योंको त्याग देनेमें जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे॥ ३७॥

लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च।

सदैव बिभृयाद् भृत्यान् यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३८॥

‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओंको बेचकर कमाये हुए धनसे अपने भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंका पालन करे॥ ३८॥

संग्रामे समुपोढे च शत्रुपक्षभयंकरे।

पलायमानो वध्येत यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३९॥

‘जिसकी रायसे श्रीराम वनमें जानेको विवश हुए हों, वह शत्रुपक्षको भय देनेवाले युद्धके प्राप्त होनेपर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय॥ ३९॥

कपालपाणि: पृथिवीमटतां चीरसंवृत:।

भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४०॥

‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रसे अपने शरीरको ढककर हाथमें खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीपर घूमता फिरे॥ ४०॥

मद्यप्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यश:।

कामक्रोधाभिभूतश्च यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४१॥

‘जिसकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह काम-क्रोधके वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान, स्त्रीसमागम और द्यूतक्रीड़ामें आसक्त रहे॥ ४१॥

मास्य धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम्।

अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४२॥

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, उसका मन कभी धर्ममें न लगे, वह अधर्मका ही सेवन करे और अपात्रको धन दान करे॥ ४२॥

संचितान्यस्य वित्तानि विविधानि सहस्रश:।

दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४३॥

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामका वन-गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रोंकी संख्यामें संचित किये गये नाना प्रकारके धन-वैभवोंको लुटेरे लूट ले जायँ॥ ४३॥

उभे संध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते।

तच्च पापं भवेत् तस्य यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४४॥

यदग्निदायके पापं यत् पापं गुरुतल्पगे।

मित्रद्रोहे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम्॥ ४५॥

‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओंके समय सोये हुए पुरुषको प्राप्त होता है। आग लगानेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, गुरुपत्नीगामीको जिस पापकी प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करनेसे जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे॥ ४४-४५॥

देवतानां पितृणां च मातापित्रोस्तथैव च।

मा स्म कार्षीत् स शुश्रूषां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४६॥

‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता-पिताकी सेवा कभी न करे (अर्थात् उनकी सेवाके पुण्यसे वञ्चित रह जाय)॥ ४६॥

सतां लोकात् सतां कीर्त्या: सज्जुष्टात् कर्मणस्तथा।

भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४७॥

‘जिसकी अनुमतिसे विवश होकर भैया श्रीरामने वनमें पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषोंके लोकसे, सत्पुरुषोंकी कीर्तिसे तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित कर्मसे शीघ्र भ्रष्ट हो जाय॥ ४७॥

अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम्।

दीर्घबाहुर्महावक्षा यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४८॥

‘जिसकी सम्मतिसे बड़ी-बड़ी बाँह और विशाल वक्षवाले आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह माताकी सेवा छोड़कर अनर्थके पथमें स्थित रहे॥ ४८॥

बहुभृत्यो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वित:।

समायात् सततं क्लेशं यस्यार्योनुमते गत:॥ ४९॥

‘जिसकी सलाहसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण-पोषण पानेके योग्य पुत्र आदिकी संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वर-रोगसे पीडि़त होकर सदा क्लेश भोगता रहे॥ ४९॥

आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम्।

अर्थिनां वितथां कुर्याद् यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५०॥

‘जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह आशा लगाये ऊपरकी ओर आँख उठाकर दाताके मुँहकी ओर देखनेवाले दीन याचकोंकी आशाको निष्फल कर दे॥ ५०॥

मायया रमतां नित्यं पुरुष: पिशुनोऽशुचि:।

राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५१॥

‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजासे भयभीत रहकर सदा छल-कपटमें ही रचा-पचा रहे॥ ५१॥

ऋतुस्नातां सतीं भार्यामृतुकालानुरोधिनीम्।

अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५२॥

‘जिसके परामर्शसे आर्यका वनमगन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु-स्नानकाल प्राप्त होनेके कारण अपने पास आयी हुई सती-साध्वी ऋतुस्नाता पत्नीको ठुकरा दे (उसकी इच्छा न पूर्ण करनेके पापका भागी हो)॥ ५२॥

विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत्।

तदेतत् प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५३॥

‘जिसकी सलाहसे मेरे बड़े भाईको वनमें जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो (अन्न आदिका दान न करने अथवा स्त्रीसे द्वेष रखनेके कारण ) नष्ट हुई संतानवाले ब्राह्मणको प्राप्त होता है॥ ५३॥

ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रिय:।

बालवत्सां च गां दोग्धु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५४॥

‘जिसकी रायसे आर्यने वनमें पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मणके लिये की जाती हुई पूजामें विघ्न डाल दे और छोटे बछड़ेवाली (दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई) गायका दूध दुहे॥ ५४॥

धर्मदारान् परित्यज्य परदारान् निषेवताम्।

त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५५॥

‘जिसने आर्य श्रीरामके वनमगनकी अनुमति दी हो, वह मूढ़ धर्मपत्नीको छोड़कर परस्त्रीका सेवन करे तथा धर्मविषयक अनुरागको त्याग दे॥ ५५॥

पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके।

यत्तदेक: स लभतां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५६॥

‘पानीको गन्दा करनेवाले तथा दूसरोंको जहर देनेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, वह सारा पाप अकेला वही प्राप्त करे, जिसकी अनुमतिसे विवश होकर आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है॥ ५६॥

तृषार्तं सति पानीये विप्रलम्भेन योजयन्।

यत् पापं लभते तत् स्याद् यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५७॥

‘जिसकी सम्मतिसे आर्यका वनगमन हुआ हो, उसे वही पाप प्राप्त हो, जो पानी होते हुए भी प्यासेको उससे वञ्चित कर देनेवाले मनुष्यको लगता है॥ ५७॥

भक्त्या विवदमानेषु मार्गमाश्रित्य पश्यत:।

तेन पापेन युज्येत यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५८॥

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उस पापका भागी हो, जो परस्पर झगड़ते हुए मनुष्योंमेंसे किसी एकके प्रति पक्षपात रखकर मार्गमें खड़ा हो उनका झगड़ा देखनेवाले कलहप्रिय मनुष्यको प्राप्त होता है’॥ ५८॥

एवमाश्वासयन्नेव दु:खार्तोऽनुपपात ह।

विहीनां पतिपुत्राभ्यां कौसल्यां पार्थिवात्मज:॥ ५९॥

इस प्रकार पति और पुत्रसे बिछुड़ी हुई कौसल्याको शपथके द्वारा आश्वासन देते हुए ही राजकुमार भरत दु:खसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५९॥

तदा तं शपथै: कष्टै: शपमानमचेतनम्।

भरतं शोकसंतप्तं कौसल्या वाक्यमब्रवीत्॥ ६०॥

उस समय दुष्कर शपथोंद्वारा अपनी सफाई देते हुए शोकसंतप्त एवं अचेत भरतसे कौसल्याने इस प्रकार कहा—॥ ६०॥

मम दु:खमिदं पुत्र भूय: समुपजायते।

शपथै: शपमानो हि प्राणानुपरुणत्सि मे॥ ६१॥

‘बेटा! तुम अनेकानेक शपथ खाकर जो मेरे प्राणोंको पीड़ा दे रहे हो, इससे मेरा यह दु:ख और भी बढ़ता जा रहा है॥ ६१॥

दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सहलक्षण:।

वत्स सत्यप्रतिज्ञो हि सतां लोकानवाप्स्यसि॥ ६२॥

‘वत्स! सौभाग्यकी बात है कि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्मसे विचलित नहीं हुआ है। तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषोंके लोक प्राप्त होंगे’॥ ६२॥

इत्युक्त्वा चाङ्कमानीय भरतं भ्रातृवत्सलम्।

परिष्वज्य महाबाहुं रुरोद भृशदु:खिता॥ ६३॥

ऐसा कहकर कौसल्याने भ्रातृभक्त महाबाहु भरतको गोदमें खींच लिया और अत्यन्त दु:खी हो उन्हें गलेसे लगाकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ६३॥

एवं विलपमानस्य दु:खार्तस्य महात्मन:।

मोहाच्च शोकसंरम्भाद् बभूव लुलितं मन:॥ ६४॥

महात्मा भरत भी दु:खसे आर्त होकर विलाप कर रहे थे। उनका मन मोह और शोकके वेगसे व्याकुल हो गया था॥ ६४॥

लालप्यमानस्य विचेतनस्य

प्रणष्टबुद्धे: पतितस्य भूमौ।

मुहुर्मुहुर्नि:श्वसतश्च दीर्घं

सा तस्य शोकेन जगाम रात्रि:॥ ६५॥

पृथ्वीपर पड़े हुए भरतकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो गयी थी। वे अचेत-से होकर विलाप करते और बारंबार लंबी साँस खींचते थे। इस तरह शोकमें ही उनकी वह रात बीत गयी॥ ६५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितम: सर्ग:॥ ७५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥

 

षट्सप्ततितम: सर्ग:

राजा दशरथका अन्त्येष्टिसंस्कार

तमेवं शोकसंतप्तं भरतं कैकयीसुतम्।

उवाच वदतां श्रेष्ठो वसिष्ठ: श्रेष्ठवागृषि:॥ १॥

इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए केकयीकुमार भरतसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठने उत्तम वाणीमें कहा—

अलं शोकेन भद्रं ते राजपुत्र महायश:।

प्राप्तकालं नरपते: कुरु संयानमुत्तमम्॥ २॥

‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जानेवाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्यपर ध्यान दो। राजा दशरथके शवको दाहसंस्कारके लिये ले चलनेका उत्तम प्रबन्ध करो’॥ २॥

वसिष्ठस्य वच: श्रुत्वा भरतो धरणीं गत:।

प्रेतकृत्यानि सर्वाणि कारयामास धर्मवित्॥ ३॥

वसिष्ठजीका वचन सुनकर धर्मज्ञ भरतने पृथ्वीपर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियोंद्वारा पिताके सम्पूर्ण प्रेतकर्मका प्रबन्ध करवाया॥ ३॥

उद्धृत्य तैलसंसेकात् स तु भूमौ निवेशितम्।

आपीतवर्णवदनं प्रसुप्तमिव भूमिपम्॥ ४॥

राजा दशरथका शव तेलके कड़ाहसे निकालकर भूमिपर रखा गया। अधिक समयतक तेलमें पड़े रहनेसे उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों॥ ४॥

संवेश्य शयने चाग्र्ये नानारत्नपरिष्कृते।

ततो दशरथं पुत्रो विललाप सुदु:खित:॥ ५॥

तदनन्तर मृत राजा दशरथको धो-पोंछकर नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दु:खी हो विलाप करने लगे—॥ ५॥

किं ते व्यवसितं राजन् प्रोषिते मय्यनागते।

विवास्य रामं धर्मज्ञं लक्ष्मणं च महाबलम्॥ ६॥

‘राजन्! मैं परदेशमें था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तबतक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर आपने इस तरह स्वर्गमें जानेका निश्चय कैसे कर लिया?॥ ६॥

क्व यास्यसि महाराज हित्वेमं दु:खितं जनम्।

हीनं पुरुषसिंहेन रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥ ७॥

‘महाराज! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे हीन इस दु:खी सेवकको छोड़ आप कहाँ चले जायँगे?॥ ७॥

योगक्षेमं तु तेऽव्यग्रं कोऽस्मिन् कल्पयिता पुरे।

त्वयि प्रयाते स्वस्तात रामे च वनमाश्रिते॥ ८॥

‘तात! आप स्वर्गको चल दिये और श्रीरामने वनका आश्रय लिया—ऐसी दशामें आपके इस नगरमें निश्चिन्तता-पूर्वक प्रजाके योगक्षेमकी व्यवस्था कौन करेगा?॥ ८॥

विधवा पृथिवी राजंस्त्वया हीना न राजते।

हीनचन्द्रेव रजनी नगरी प्रतिभाति माम्॥ ९॥

‘राजन्! आपके बिना यह पृथ्वी विधवाके समान हो गयी है, अत: इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रिके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’॥

एवं विलपमानं तं भरतं दीनमानसम्।

अब्रवीद् वचनं भूयो वसिष्ठस्तु महामुनि:॥ १०॥

इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरतसे महामुनि वसिष्ठने फिर कहा—॥ १०॥

प्रेतकार्याणि यान्यस्य कर्तव्यानि विशाम्पते:।

तान्यव्यग्रं महाबाहो क्रियतामविचारितम्॥ ११॥

‘महाबाहो! इन महाराजके लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो’॥ ११॥

तथेति भरतो वाक्यं वसिष्ठस्याभिपूज्य तत्।

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यांस्त्वरयामास सर्वश:॥ १२॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतने वसिष्ठजीकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य—सबको इस कार्यके लिये जल्दी करनेको कहा—॥

ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराद् बहिष्कृता:।

ऋत्विग्भिर्याजकैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि॥ १३॥

राजाकी अग्निशालासे जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकोंद्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया॥ १३॥

शिबिकायामथारोप्य राजानं गतचेतनम्।

बाष्पकण्ठा विमनसस्तमूहु: परिचारका:॥ १४॥

तत्पश्चात् महाराज दशरथके प्राणहीन शरीरको पालकीमें बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमिको ले चले। उस समय आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दु:ख हो रहा था॥ १४॥

हिरण्यं च सुवर्णं च वासांसि विविधानि च।

प्रकिरन्तो जना मार्गे नृपतेरग्रतो ययु:॥ १५॥

मार्गमें राजकीय पुरुष राजाके शवके आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र लुटाते चलते थे॥

चन्दनागुरुनिर्यासान् सरलं पद्मकं तथा।

देवदारूणि चाहृत्य क्षेपयन्ति तथापरे॥ १६॥

गन्धानुच्चावचांश्चान्यांस्तत्र गत्वाथ भूमिपम्।

तत्र संवेशयामासुश्चितामध्ये तमृत्विज:॥ १७॥

श्मशानभूमिमें पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसीने चन्दन लाकर रखा तो किसीने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारुकी लकडि़याँ ला-लाकर चितामें डालने लगे। कुछ लोगोंने तरह-तरहके सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजोंने राजाके शवको चितापर रखा॥

तदा हुताशनं हुत्वा जेपुस्तस्य तदृत्विज:।

जगुश्च ते यथाशास्त्रं तत्र सामानि सामगा:॥ १८॥

उस समय अग्निमें आहुति देकर उनके ऋत्विजोंने वेदोक्त मन्त्रोंका जप किया। सामगान करनेवाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धतिके अनुसार साम-श्रुतियोंका गायन करने लगे॥ १८॥

शिबिकाभिश्च यानैश्च यथार्हं तस्य योषित:।

नगरान्निर्ययुस्तत्र वृद्धै: परिवृतास्तथा॥ १९॥

प्रसव्यं चापि तं चक्रुऋर्त्विजोऽग्निचितं नृपम्।

स्त्रियश्च शोकसंतप्ता: कौसल्याप्रमुखास्तदा॥ २०॥

(इसके बाद चितामें आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथकी कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकोंसे घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथोंपर आरूढ़ होकर नगरसे निकलीं तथा शोकसे संतप्त हो श्मशानभूमिमें आकर अश्वमेधान्त यज्ञोंके अनुष्ठाता राजा दशरथके शवकी परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजोंने भी उस शवकी परिक्रमा की॥ १९-२०॥

क्रौञ्चीनामिव नारीणां निनादस्तत्र शुश्रुवे।

आर्तानां करुणं काले क्रोशन्तीनां सहस्रश:॥ २१॥

उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियोंका आर्तनाद कुररियोंके चीत्कारके समान सुनायी देता था॥ २१॥

ततो रुदन्त्यो विवशा विलप्य च पुन: पुन:।

यानेभ्य: सरयूतीरमवतेरुर्नृपाङ्गना:॥ २२॥

दाहकर्मके पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियोंसे ही सरयूके तटपर जाकर उतरीं॥ २२॥

कृत्वोदकं ते भरतेन सार्धं

नृपाङ्गना मन्त्रिपुरोहिताश्च।

पुरं प्रविश्याश्रुपरीतनेत्रा

भूमौ दशाहं व्यनयन्त दु:खम्॥ २३॥

भरतके साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितोंने भी राजाके लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए नगरमें आये और दस दिनोंतक भूमिपर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दु:खसे अपना समय व्यतीत किया॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षट्सप्ततितम: सर्ग:॥ ७६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥

सप्तसप्ततितम: सर्ग:

भरतका पिताके श्राद्धमें ब्राह्मणोंको बहुत धन-रत्न आदिका दान देना, तेरहवें दिन अस्थि-संचयका शेष कार्य पूर्ण करनेके लिये पिताकी चिताभूमिपर जाकर भरत और शत्रुघ्नका विलाप करना और वसिष्ठ तथा सुमन्त्रका उन्हें समझाना

ततो दशाहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मज:।

द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत्॥ १॥

तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जानेपर राजकुमार भरतने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धिके लिये स्नान और एकादशाह श्राद्धका अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आनेपर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये॥ १॥

ब्राह्मणेभ्यो धनं रत्नं ददावन्नं च पुष्कलम्।

वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।

वास्तिकं बहु शुक्लं च गाश्चापि बहुशस्तदा॥ २॥

उसमें भरतने ब्राह्मणोंको धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकारके रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं॥ २॥

दासीर्दासांश्च यानानि वेश्मानि सुमहान्ति च।

ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुत्रो राज्ञस्तस्यौर्ध्वदेहिकम्॥ ३॥

राजपुत्र भरतने राजाके पारलौकिक हितके लिये बहुत-से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणोंको दिये॥ ३॥

तत: प्रभातसमये दिवसे च त्रयोदशे।

विललाप महाबाहुर्भरत: शोकमूर्च्छित:॥ ४॥

तदनन्तर तेरहवें दिन प्रात:काल महाबाहु भरत शोकसे मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे॥ ४॥

शब्दापिहितकण्ठश्च शोधनार्थमुपागत:।

चितामूले पितुर्वाक्यमिदमाह सुदु:खित:॥ ५॥

तात यस्मिन् निसृष्टोऽहं त्वया भ्रातरि राघवे।

तस्मिन् वनं प्रव्रजिते शून्ये त्यक्तोऽस्म्यहं त्वया॥ ६॥

उस समय रोनेसे उनका गला भर आया था, वे पिताके चितास्थानपर अस्थिसंचयके लिये आये और अत्यन्त दु:खी होकर इस प्रकार कहने लगे—‘तात! आपने मुझे जिन ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजीके हाथमें सौंपा था, उनके वनमें चले जानेपर आपने मुझे सूनेमें ही छोड़ दिया (इस समय मेरा कोई सहारा नहीं)॥ ५-६॥

यस्या गतिरनाथाया: पुत्र: प्रव्राजितो वनम्।

तामम्बां तात कौसल्यां त्यक्त्वा त्वं क्व गतो नृप॥ ७॥

‘तात! नरेश्वर! जिन अनाथ हुई देवीके एकमात्र आधार पुत्रको आपने वनमें भेज दिया, उन माता कौसल्याको छोड़कर आप कहाँ चले गये?’॥ ७॥

दृष्ट्वा भस्मारुणं तच्च दग्धास्थि स्थानमण्डलम्।

पितु: शरीरनिर्वाणं निष्टनन् विषसाद ह॥ ८॥

पिताकी चिताका वह स्थानमण्डल भस्मसे भरा हुआ था, अत्यन्त दाहके कारण कुछ लाल दिखायी देता था। वहाँ पिताकी जली हुई हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। पिताके शरीरके निर्वाणका वह स्थान देखकर भरत अत्यन्त विलाप करते हुए शोकमें डूब गये॥ ८॥

स तु दृष्ट्वा रुदन् दीन: पपात धरणीतले।

उत्थाप्यमान: शक्रस्य यन्त्रध्वज इवोच्छ्रित:॥ ९॥

उस स्थानको देखते ही वे दीनभावसे रोकर पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे इन्द्रका यन्त्रबद्ध ऊँचा ध्वज ऊपरको उठाये जाते समय खिसककर गिर पड़ा हो॥ ९॥

अभिपेतुस्तत: सर्वे तस्यामात्या: शुचिव्रतम्।

अन्तकाले निपतितं ययातिमृषयो यथा॥ १०॥

तब उनके सारे मन्त्री उन पवित्र व्रतवाले भरतके पास आ पहुँचे, जैसे पुण्योंका अन्त होनेपर स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययातिके पास अष्टक आदि राजर्षि आ गये थे॥

शत्रुघ्नश्चापि भरतं दृष्ट्वा शोकपरिप्लुतम्।

विसंज्ञो न्यपतद् भूमौ भूमिपालमनुस्मरन्॥ ११॥

भरतको शोकमें डूबा हुआ देख शत्रुघ्न भी अपने पिता महाराज दशरथका बारंबार स्मरण करते हुए अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ११॥

उन्मत्त इव निश्चित्तो विललाप सुदु:खित:।

स्मृत्वा पितुर्गुणाङ्गानि तानि तानि तदा तदा॥ १२॥

वे समय-समयपर अनुभवमें आये हुए पिताके लालन-पालनसम्बन्धी उन-उन गुणोंका स्मरण करके अत्यन्त दु:खी हो सुध-बुध खोकर उन्मत्तके समान विलाप करने लगे—

मन्थराप्रभवस्तीव्र कैकेयीग्राहसंकुल:।

वरदानमयोऽक्षोभ्योऽमज्जयच्छोकसागर: ॥ १३॥

हाय! मन्थरासे जिसका प्राकट्य हुआ है, कैकेयीरूपी ग्राहसे जो व्याप्त है तथा जो किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता, उस वरदानमय शोकरूपी उग्र समुद्रने हम सब लोगोंको अपने भीतर निमग्न कर दिया है॥

सुकुमारं च बालं च सततं लालितं त्वया।

क्व तात भरतं हित्वा विलपन्तं गतो भवान्॥ १४॥

‘तात! आपने जिनका सदा लाड़-प्यार किया है तथा जो सुकुमार और बालक हैं, उन रोते-बिलखते हुए भरतको छोड़कर आप कहाँ चले गये?॥ १४॥

ननु भोज्येषु पानेषु वस्त्रेष्वाभरणेषु च।

प्रवारयति सर्वान् नस्तन्न: कोऽद्य करिष्यति॥ १५॥

‘भोजन, पान, वस्त्र और आभूषण—इन सबको अधिक संख्यामें एकत्र करके आप हम सब लोगोंसे अपनी रुचिकी वस्तुएँ ग्रहण करनेको कहते थे। अब कौन हमारे लिये ऐसी व्यवस्था करेगा?॥ १५॥

अवदारणकाले तु पृथिवी नावदीर्यते।

विहीना या त्वया राज्ञा धर्मज्ञेन महात्मना॥ १६॥

‘आप-जैसे धर्मज्ञ महात्मा राजासे रहित होनेपर पृथ्वीको फट जाना चाहिये। इस फटनेके अवसरपर भी जो यह फट नहीं रही है, यह आश्चर्यकी बात है॥ १६॥

पितरि स्वर्गमापन्ने रामे चारण्यमाश्रिते।

किं मे जीवितसामर्थ्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १७॥

‘पिता स्वर्गवासी हो गये और श्रीराम वनमें चले गये। अब मुझमें जीवित रहनेकी क्या शक्ति है? अब तो मैं अग्निमें ही प्रवेश करूँगा॥ १७॥

हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्यामिक्ष्वाकुपालिताम्।

अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपोवनम्॥ १८॥

‘बड़े भाई और पितासे हीन होकर इक्ष्वाकुवंशी नरेशों- द्वारा पालित इस सूनी अयोध्यामें मैं प्रवेश नहीं करूँगा; तपोवनको ही चला जाऊँगा’॥ १८॥

तयोर्विलपितं श्रुत्वा व्यसनं चाप्यवेक्ष्य तत्।

भृशमार्ततरा भूय: सर्व एवानुगामिन:॥ १९॥

उन दोनोंका विलाप सुनकर और उस संकटको देखकर समस्त अनुचर-वर्गके लोग पुन: अत्यन्त शोकसे व्याकुल हो उठे॥ १९॥

ततो विषण्णौ श्रान्तौ च शत्रुघ्नभरतावुभौ।

धरायां स्म व्यचेष्टेतां भग्नशृङ्गाविवर्षभौ॥ २०॥

उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई विषादग्रस्त और थकित होकर टूटे सींगोंवाले दो बैलोंके समान पृथ्वीपर लोट रहे थे॥ २०॥

तत: प्रकृतिमान् वैद्य: पितुरेषां पुरोहित:।

वसिष्ठो भरतं वाक्यमुत्थाप्य तमुवाच ह॥ २१॥

तदनन्तर दैवी प्रकृतिसे युक्त और सर्वज्ञ वसिष्ठजी, जो इन श्रीराम आदिके पिताके पुरोहित थे, भरतको उठाकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ २१॥

त्रयोदशोऽयं दिवस: पितुर्वृत्तस्य ते विभो।

सावशेषास्थिनिचये किमिह त्वं विलम्बसे॥ २२॥

‘प्रभो! तुम्हारे पिताके दाहसंस्कार हुए यह तेरहवाँ दिन है; अब अस्थिसंचयका जो शेष कार्य है, उसके करनेमें तुम यहाँ विलम्ब क्यों लगा रहे हो?॥ २२॥

त्रीणि द्वन्द्वानि भूतेषु प्रवृत्तान्यविशेषत:।

तेषु चापरिहार्येषु नैवं भवितुमर्हसि॥ २३॥

‘भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मृत्यु—ये तीन द्वन्द्व सभी प्राणियोंमें समानरूपसे उपलब्ध होते हैं। इन्हें रोकना सर्वथा असम्भव है—ऐसी स्थितिमें तुम्हें इस तरह शोकाकुल नहीं होना चाहिये’॥ २३॥

सुमन्त्रश्चापि शत्रुघ्नमुत्थाप्याभिप्रसाद्य च।

श्रावयामास तत्त्वज्ञ: सर्वभूतभवाभवौ॥ २४॥

तत्त्वज्ञ सुमन्त्रने भी शत्रुघ्नको उठाकर उनके चित्तको शान्त किया तथा समस्त प्राणियोंके जन्म और मरणकी अनिवार्यताका उपदेश सुनाया॥ २४॥

उत्थितौ तौ नरव्याघ्रौ प्रकाशेते यशस्विनौ।

वर्षातपपरिग्लानौ पृथगिन्द्रध्वजाविव॥ २५॥

उस समय उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ वर्षा और धूपसे मलिन हुए दो अलग-अलग इन्द्रध्वजोंके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ २५॥

अश्रूणि परिमृद्नन्तौ रक्ताक्षौ दीनभाषिणौ।

अमात्यास्त्वरयन्ति स्म तनयौ चापरा: क्रिया:॥ २६॥

वे आँसू पोंछते हुए दीनतापूर्ण वाणीमें बोलते थे। उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं तथा मन्त्रीलोग उन दोनों राजकुमारोंको दूसरी-दूसरी क्रियाएँ शीघ्र करनेके लिये प्रेरित कर रहे थे॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तसप्ततितम: सर्ग:॥ ७७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥

 

अष्टसप्ततितम: सर्ग:

शत्रुघ्नका रोष, उनका कुब्जाको घसीटना और भरतजीके कहनेसे उसे मूर्च्छित अवस्थामें छोड़ देना

अथ यात्रां समीहन्तं शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुज:।

भरतं शोकसंतप्तमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

तेरहवें दिनका कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार करते हुए शोकसंतप्त भरतसे लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने इस प्रकार कहा—॥ १॥

गतिर्य: सर्वभूतानां दु:खे किं पुनरात्मन:।

स राम: सत्त्वसम्पन्न: स्त्रिया प्रव्राजितो वनम्॥ २॥

‘भैया! जो दु:खके समय अपने तथा आत्मीयजनोंके लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियोंको भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्रीके द्वारा वनमें भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है)॥ २॥

बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ।

किं न मोचयते रामं कृत्वापि पितृनिग्रहम्॥ ३॥

‘तथा वे जो बल और पराक्रमसे सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिताको कैद करके भी श्रीरामको इस संकटसे क्यों नहीं छुड़ाया?॥ ३॥

पूर्वमेव तु विग्राह्य: समवेक्ष्य नयानयौ।

उत्पथं य: समारूढो नार्या राजा वशं गत:॥ ४॥

‘जब राजा एक नारीके वशमें होकर बुरे मार्गपर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्यायका विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’॥ ४॥

इति सम्भाषमाणे तु शत्रुघ्ने लक्ष्मणानुजे।

प्राग्द्वारेऽभूत् तदा कुब्जा सर्वाभरणभूषिता॥ ५॥

लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोषमें भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो उस राजभवनके पूर्वद्वारपर आकर खड़ी हो गयी॥ ५॥

लिप्ता चन्दनसारेण राजवस्त्राणि बिभ्रती।

विविधं विविधैस्तैस्तैर्भूषणैश्च विभूषिता॥ ६॥

उसके अङ्गोंमें उत्तमोत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियोंके पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे सज-धजकर वहाँ आयी थी॥ ६॥

मेखलादामभिश्चित्रैरन्यैश्च वरभूषणै:।

बभासे बहुभिर्बद्धा रज्जुबद्धेव वानरी॥ ७॥

करधनीकी विचित्र लडि़यों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियोंमें बँधी हुई वानरीके समान जान पड़ती थी॥ ७॥

तां समीक्ष्य तदा द्वा:स्थो भृशं पापस्य कारिणीम्।

गृहीत्वाकरुणं कुब्जां शत्रुघ्नाय न्यवेदयत्॥ ८॥

वही सारी बुराइयोंकी जड़ थी। वही श्रीरामके वनवासरूपी पापका मूल कारण थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपालने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयताके साथ घसीट लाकर शत्रुघ्नके हाथमें देते हुए कहा—॥ ८॥

यस्या: कृते वने रामो न्यस्तदेहश्च व: पिता।

सेयं पापा नृशंसा च तस्या: कुरु यथामति॥ ९॥

‘राजकुमार! जिसके कारण श्रीरामको वनमें निवास करना पड़ा है और आपलोगोंके पिताने शरीरका परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें’॥

शत्रुघ्नश्च तदाज्ञाय वचनं भृशदु:खित:।

अन्त:पुरचरान् सर्वानित्युवाच धृतव्रत:॥ १०॥

द्वारपालकी बातपर विचार करके शत्रुघ्नका दु:ख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अन्त:पुरमें रहनेवाले सब लोगोंको सुनाकर इस प्रकार कहा—॥ १०॥

तीव्रमुत्पादितं दु:खं भ्रातृणां मे तथा पितु:।

यथा सेयं नृशंसस्य कर्मण: फलमश्नुताम्॥ ११॥

‘इस पापिनीने मेरे भाइयों तथा पिताको जैसा दु:सह दु:ख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्मका वैसा ही फल यह भी भोगे’॥ ११॥

एवमुक्त्वा च तेनाशु सखीजनसमावृता।

गृहीता बलवत् कुब्जा सा तद् गृहमनादयत्॥ १२॥

ऐसा कहकर शत्रुघ्नने सखियोंसे घिरी हुई कुब्जाको तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डरके मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा॥ १२॥

तत: सुभृशसंतप्तस्तस्या: सर्व: सखीजन:।

क्रुद्धमाज्ञाय शत्रुघ्नं व्यपलायत सर्वश:॥ १३॥

फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्नको कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं॥ १३॥

अमन्त्रयत कृत्स्नश्च तस्या: सर्व: सखीजन:।

यथायं समुपक्रान्तो नि:शेषं न: करिष्यति॥ १४॥

उसकी सम्पूर्ण सखियोंने एक जगह एकत्र होकर आपसमें सलाह की कि ‘जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जाको पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगोंमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे॥ १४॥

सानुक्रोशां वदान्यां च धर्मज्ञां च यशस्विनीम्।

कौसल्यां शरणं याम: सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गति:॥ १५॥

‘अत: हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’॥ १५॥

स च रोषेण संवीत: शत्रुघ्न: शत्रुशासन:।

विचकर्ष तदा कुब्जां क्रोशन्तीं पृथिवीतले॥ १६॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोषमें भरकर कुब्जाको जमीनपर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोरसे चीत्कार कर रही थी॥ १६॥

तस्यां ह्याकृष्यमाणायां मन्थरायां ततस्तत:।

चित्रं बहुविधं भाण्डं पृथिव्यां तद‍्व्यशीर्यत॥ १७॥

जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकारके विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वीपर इधर-उधर विखरे जाते थे॥ १७॥

तेन भाण्डेन विस्तीर्णं श्रीमद् राजनिवेशनम्।

अशोभत तदा भूय: शारदं गगनं यथा॥ १८॥

आभूषणोंके उन टुकड़ोंसे वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत शरत्कालके आकाशकी भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था॥ १८॥

स बली बलवत् क्रोधाद् गृहीत्वा पुरुषर्षभ:।

कैकेयीमभिनिर्भर्त्स्य बभाषे परुषं वच:॥ १९॥

बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थराको जोरसे पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ानेके लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा॥ १९॥

तैर्वाक्यै: परुषैर्दु:खै: कैकेयी भृशदु:खिता।

शत्रुघ्नभयसंत्रस्ता पुत्रं शरणमागता॥ २०॥

शत्रुघ्नके वे कठोर वचन बड़े ही दु:खदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयीको बहुत दु:ख हुआ। वह शत्रुघ्नके भयसे थर्रा उठी और अपने पुत्रकी शरणमें आयी॥ २०॥

तं प्रेक्ष्य भरत: क्रुद्धं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्।

अवध्या: सर्वभूतानां प्रमदा: क्षम्यतामिति॥ २१॥

शत्रुघ्नको क्रोधमें भरा हुआ देख भरतने उनसे कहा—‘सुमित्राकुमार! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होती हैं॥ २१॥

हन्यामहमिमां पापां कैकेयीं दुष्टचारिणीम्।

यदि मां धार्मिको रामो नासूयेन्मातृघातकम्॥ २२॥

‘यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयीको मार डालता॥ २२॥

इमामपि हतां कुब्जां यदि जानाति राघव:।

त्वां च मां चैव धर्मात्मा नाभिभाषिष्यते ध्रुवम्॥ २३॥

‘धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जाके भी मारे जानेका समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे’॥ २३॥

भरतस्य वच: श्रुत्वा शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुज:।

न्यवर्तत ततो दोषात् तां मुमोच च मूर्च्छिताम्॥ २४॥

भरतजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थराके वधरूपी दोषसे निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्थामें ही छोड़ दिया॥ २४॥

सा पादमूले कैकेय्या मन्थरा निपपात ह।

नि:श्वसन्ती सुदु:खार्ता कृपणं विललाप ह॥ २५॥

मन्थरा कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दु:खसे आर्त हो करुण विलाप करने लगी॥ २५॥

शत्रुघ्नविक्षेपविमूढसंज्ञां

समीक्ष्य कुब्जां भरतस्य माता।

शनै: समाश्वासयदार्तरूपां

क्रौञ्चीं विलग्नामिव वीक्षमाणाम्॥ २६॥

शत्रुघ्नके पटकने और घसीटनेसे आर्त एवं अचेत हुई कुब्जाको देखकर भरतकी माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होशमें लानेकी चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिंजड़ेंमें बँधी हुई क्रौञ्चीकी भाँति कातर दृष्टिसे उसकी ओर देख रही थी॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टसप्ततितम: सर्ग:॥ ७८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥

 

एकोनाशीतितम: सर्ग:

मन्त्री आदिका भरतसे राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रस्ताव तथा भरतका अभिषेक-सामग्रीकी परिक्रमा करके श्रीरामको ही राज्यका अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लानेके लिये चलनेके निमित्त व्यवस्था करनेकी सबको आज्ञा देना

तत: प्रभातसमये दिवसेऽथ चतुर्दशे।

समेत्य राजकर्तारो भरतं वाक्यमब्रुवन्॥ १॥

तदनन्तर चौदहवें दिन प्रात:काल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरतसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

गतो दशरथ: स्वर्गं यो नो गुरुतरो गुरु:।

रामं प्रव्राज्य वै ज्येष्ठं लक्ष्मणं च महाबलम्॥ २॥

त्वमद्य भव नो राजा राजपुत्रो महायश:।

संगत्या नापराध्नोति राज्यमेतदनायकम्॥ ३॥

‘महायशस्वी राजकुमार! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर स्वयं स्वर्गलोकको चले गये, अब इस राज्यका कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाईको स्वयं महाराजने वनवासकी आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया! अत: आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गतिके कारण ही आप राज्यको अपने अधिकारमें लेकर किसीके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं॥ २-३॥

आभिषेचनिकं सर्वमिदमादाय राघव।

प्रतीक्षते त्वां स्वजन: श्रेणयश्च नृपात्मज॥ ४॥

‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेककी सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं॥ ४॥

राज्यं गृहाण भरत पितृपैतामहं ध्रुवम्।

अभिषेचय चात्मानं पाहि चास्मान् नरर्षभ॥ ५॥

‘भरतजी! आप अपने माता-पितामहोंके इस राज्यको अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगोंकी रक्षा कीजिये’॥

आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा सर्वं प्रदक्षिणम्।

भरतस्तं जनं सर्वं प्रत्युवाच धृतव्रत:॥ ६॥

यह सुनकर उत्तम व्रतको धारण करनेवाले भरतने अभिषेकके लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्रीकी प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ६॥

ज्येष्ठस्य राजता नित्यमुचिता हि कुलस्य न:।

नैवं भवन्तो मां वक्तुमर्हन्ति कुशला जना:॥ ७॥

‘सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुलमें सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्यका अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है॥ ७॥

राम: पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपति:।

अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च॥ ८॥

‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगोंके बड़े भाई हैं, अत: वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा॥ ८॥

युज्यतां महती सेना चतुरङ्गमहाबला।

आनयिष्याम्यहं ज्येष्ठं भ्रातरं राघवं वनात्॥ ९॥

‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकारसे सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीको वनसे लौटा लाऊँगा॥ ९॥

आभिषेचनिकं चैव सर्वमेतदुपस्कृतम्।

पुरस्कृत्य गमिष्यामि रामहेतोर्वनं प्रति॥ १०॥

तत्रैव तं नरव्याघ्रमभिषिच्य पुरस्कृतम्।

आनयिष्यामि वै रामं हव्यवाहमिवाध्वरात्॥ ११॥

‘अभिषेकके लिये संचित हुई इस सारी सामग्रीको आगे करके मैं श्रीरामसे मिलनेके लिये वनमें चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीका वहीं अभिषेक करके यज्ञसे लायी जानेवाली अग्निके समान उन्हें आगे करके अयोध्यामें ले आऊँगा॥ १०-११॥

न सकामां करिष्यामि स्वामिमां मातृगन्धिनीम्।

वने वत्स्याम्यहं दुर्गे रामो राजा भविष्यति॥ १२॥

‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलानेवाली इस कैकेयीको मैं कदापि सफलमनोरथ नहीं होने दूँगा। श्रीराम यहाँके राजा होंगे और मैं दुर्गम वनमें निवास करूँगा॥ १२॥

क्रियतां शिल्पिभि: पन्था: समानि विषमाणि च।

रक्षिणश्चानुसंयान्तु पथि दुर्गविचारका:॥ १३॥

‘कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमिको बराबर करें तथा मार्गमें दुर्गम स्थानोंकी जानकारी रखनेवाले रक्षक भी साथ-साथ चलें’॥ १३॥

एवं सम्भाषमाणं तं रामहेतोर्नृपात्मजम्।

प्रत्युवाच जन: सर्व: श्रीमद् वाक्यमनुत्तमम्॥ १४॥

श्रीरामचन्द्रजीके लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरतसे वहाँ आये हुए सब लोगोंने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही—॥ १४॥

एवं ते भाषमाणस्य पद्मा श्रीरुपतिष्ठताम्।

यस्त्वं ज्येष्ठे नृपसुते पृथिवीं दातुमिच्छसि॥ १५॥

‘भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहनेवाले आपके पास कमलवनमें निवास करनेवाली लक्ष्मी अवस्थित हों; क्योंकि आप राजाके ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं’॥ १५॥

अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मज:

प्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च।

प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो

निपेतुरार्यानननेत्रसम्भवा: ॥ १६॥

उन लोगोंका कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कानमें पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरतको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सबकी ओर देखकर भरतके मुखमण्डलमें सुशोभित होनेवाले नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥ १६॥

ऊचुस्ते वचनमिदं निशम्य हृष्टा:

सामात्या: सपरिषदो वियातशोका:।

पन्थानं नरवरभक्तिमान् जनश्च

व्यादिष्टस्तव वचनाच्च शिल्पिवर्ग:॥ १७॥

भरतके मुखसे श्रीरामको ले आनेकी बात सुनकर उस सभाके सभी सदस्यों और मन्त्रियोंसहित समस्त राजकर्मचारी हर्षसे खिल उठे। उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरतसे बोले—‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञाके अनुसार राजपरिवारके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले कारीगरों और रक्षकोंको मार्ग ठीक करनेके लिये भेज दिया गया है’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनाशीतितम: सर्ग:॥ ७९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७९॥

 

अशीतितम: सर्ग:

अयोध्यासे गङ्गातटतक सुरम्य शिविर और कूप आदिसे युक्त सुखद राजमार्गका निर्माण

अथ भूमिप्रदेशज्ञा: सूत्रकर्मविशारदा:।

स्वकर्माभिरता: शूरा: खनका यन्त्रकास्तथा॥ १॥

कर्मान्तिका: स्थपतय: पुरुषा यन्त्रकोविदा:।

तथा वर्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षका:॥ २॥

सूपकारा: सुधाकारा वंशचर्मकृतस्तथा।

समर्था ये च द्रष्टार: पुरतश्च प्रतस्थिरे॥ ३॥

तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमिका ज्ञान रखनेवाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनानेके लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्गकी रक्षा आदि अपने कर्ममें सदा सावधान रहनेवाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनानेवाले, नदी आदि पार करनेके लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जलके प्रवाहको रोकनेवाले वेतनभोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनानेवाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटनेवाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदिका काम करनेवाले, बाँसकी चटाई और सूप आदि बनानेवाले, चमड़ेका चारजामा आदि बनानेवाले तथा रास्तेकी विशेष जानकारी रखनेवाले सामर्थ्यशाली पुरुषोंने पहले प्रस्थान किया॥ १—३॥

स तु हर्षात् तमुद्देशं जनौघो विपुल: प्रयान्।

अशोभत महावेग: सागरस्येव पर्वणि॥ ४॥

उस समय मार्ग ठीक करनेके लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्षके साथ वनप्रदेशकी ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमाके दिन उमड़े हुए समुद्रके महान् वेगकी भाँति शोभा पा रहा था॥ ४॥

ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदा:।

करणैर्विविधोपेतै: पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे॥ ५॥

वे मार्ग-निर्माणमें निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकारके औजारोंके साथ आगे चल दिये॥ ५॥

लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च।

जनास्ते चक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान्॥ ६॥

वे लोग लताएँ, बेलें, झाडि़याँ, ठूँठे वृक्ष तथा पत्थरोंको हटाते और नाना प्रकारके वृक्षोंको काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे॥ ६॥

अवृक्षेषु च देशेषु केचिद् वृक्षानरोपयन्।

केचित् कुठारैष्टङ्कैश्च दात्रैश्छिन्दन् क्वचित् क्वचित्॥ ७॥

जिन स्थानोंमें वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगोंने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरोंने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़नेके औजारों) तथा हँसियोंसे कहीं-कहीं वृक्षों और घासोंको काट-काटकर रास्ता साफ किया॥ ७॥

अपरे वीरणस्तम्बान् बलिनो बलवत्तरा:।

विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि च ततस्तत:॥ ८॥

अपरेऽपूरयन् कूपान् पांसुभि: श्वभ्रमायतम्।

निम्नभागांस्तथैवाशु समांश्चक्रु: समन्तत:॥ ९॥

अन्य प्रबल मनुष्योंने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदिके झुरमुटोंको हाथोंसे ही उखाड़ फेंका। वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानोंको खोद-खोदकर बराबर कर देते थे। दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढोंको धूलोंसे ही पाट देते थे। जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओरसे मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे॥ ८-९॥

बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान् संचुक्षुदुस्तथा।

बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान् देशान् नरास्तदा॥ १०॥

उन्होंने जहाँ पुल बाँधनेके योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहनेके लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा, वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशोंमें वहाँकी आवश्यकताके अनुसार कार्य किया॥ १०॥

अचिरेण तु कालेन परिवाहान् बहूदकान्।

चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान् बहून्॥ ११॥

छोटे-छोटे सोतोंको, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओरसे बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समयमें उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारके बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जलसे भरे होनेके कारण समुद्रके समान जान पड़ते थे॥ ११॥

निर्जलेषु च देशेषु खानयामासुरुत्तमान्।

उदपानान् बहुविधान् वेदिकापरिमण्डितान्॥ १२॥

निर्जल स्थानोंमें नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओंसे अलंकृत थे॥ १२॥

ससुधाकुट्टिमतल: प्रपुष्पितमहीरुह:।

मत्तोद्घुष्टद्विजगण: पताकाभिरलंकृत:॥ १३॥

चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषित:।

बह्वशोभत सेनाया: पन्था: सुरपथोपम:॥ १४॥

इस प्रकार सेनाका वह मार्ग देवताओंके मार्गकी भाँति अधिक शोभा पाने लगा। उसकी भूमिपर चूना-सुर्खी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था। उसके किनारे-किनारे फूलोंसे सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँके वृक्षोंपर मतवाले पक्षी चहक रहे थे। सारे मार्गको पताकाओंसे सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकारके फूलोंसे वह सड़क सजायी गयी थी॥

आज्ञाप्याथ यथाज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नरा:।

रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च॥ १५॥

यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मन:।

भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम्॥ १६॥

मार्ग बन जानेपर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनानेके लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्यमें दत्त-चित्त रहनेवाले उन लोगोंने भरतकी आज्ञाके अनुसार सेवकोंको काम करनेका आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलोंकी अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशोंमें छावनियाँ बनवायीं और जो भरतको अभीष्ट था, मार्गके भूषणरूप उस शिविरको नाना प्रकारके अलंकारोंसे और भी सजा दिया॥ १५-१६॥

नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विद:।

निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मन:॥ १७॥

वास्तु-कर्मके ज्ञाता विद्वानोंने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तोंमें महात्मा भरतके ठहरनेके लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी॥ १७॥

बहुपांसुचयाश्चापि परिखा: परिवारिता:।

तत्रेन्द्रनीलप्रतिमा: प्रतोलीवरशोभिता:॥ १८॥

प्रासादमालासंयुक्ता: सौधप्राकारसंवृता:।

पताकाशोभिता: सर्वे सुनिर्मितमहापथा:॥ १९॥

विसर्पद्भिरिवाकाशे विटङ्काग्रविमानकै:।

समुच्छ्रितैर्निवेशास्ते बभु: शक्रपुरोपमा:॥ २०॥

मार्गमें बने हुए वे निवेश (विश्राम-स्थान) इन्द्रपुरीके समान शोभा पाते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं, धूल-मिट्टीके ऊँचे ढेर लगाये गये थे। खेमोंके भीतर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं। गलियों और सड़कोंसे उनकी विशेष शोभा होती थी। राजकीय गृहों और देवस्थानोंसे युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों (चहारदीवारियों)से घिरे थे। सभी विश्रामस्थान पताकाओंसे सुशोभित थे। सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कोंका सुन्दर ढंगसे निर्माण किया गया था। विटङ्कों (कबूतरोंके रहनेके स्थानों—कावकों) और ऊँचे-ऊँचे श्रेष्ठ विमानोंके कारण उन सभी शिविरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १८—२०॥

जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम्।

शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम्॥ २१॥

सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा

नभ: क्षपायाममलं विराजते।

नरेन्द्रमार्ग: स तदा व्यराजत

क्रमेण रम्य: शुभशिल्पिनिर्मित:॥ २२॥

नाना प्रकारके वृक्षों और वनोंसे सुशोभित, शीतल निर्मल जलसे भरी हुई और बड़े-बड़े मत्स्योंसे व्याप्त गङ्गाके किनारेतक बना हुआ वह रमणीय राजमार्ग उस समय बड़ी शोभा पा रहा था। अच्छे कारीगरोंने उसका निर्माण किया था। रात्रिके समय वह चन्द्रमा और तारागणोंसे मण्डित निर्मल आकाशके समान सुशोभित होता था॥ २१-२२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽशीतितम: सर्ग:॥ ८०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८०॥

 


एकाशीतितम: सर्ग:

प्रात:कालके मङ्गलवाद्य-घोषको सुनकर भरतका दु:खी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजीका सभामें आकर मन्त्री आदिको बुलानेके लिये दूत भेजना

ततो नान्दीमुखीं रात्रिं भरतं सूतमागधा:।

तुष्टुवु: सविशेषज्ञा: स्तवैर्मङ्गलसंस्तवै:॥ १॥

इधर अयोध्यामें उस अभ्युदयसूचक रात्रिका थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधोंने मङ्गलमयी स्तुतियोंद्वारा भरतका स्तवन आरम्भ किया॥ १॥

सुवर्णकोणाभिहत: प्राणदद्यामदुन्दुभि:।

दध्मु: शङ्खांश्च शतशो वाद्यांश्चोच्चावचस्वरान्॥ २॥

प्रहरकी समाप्तिको सूचित करनेवाली दुन्दुभि सोनेके डंडेसे आहत होकर बज उठी। बाजे बजानेवालोंने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके सैकड़ों बाजे बजाये॥ २॥

स तूर्यघोष: सुमहान् दिवमापूरयन्निव।

भरतं शोकसंतप्तं भूय: शोकैररन्धयत्॥ ३॥

वाद्योंका वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा गूँज उठा और शोकसंतप्त भरतको पुन: शोकाग्निकी आँचसे राँधने लगा॥ ३॥

तत: प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च।

नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥ ४॥

वाद्योंकी उस ध्वनिसे भरतकी नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजोंका बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्नसे बोले—

पश्य शत्रुघ्न कैकेय्या लोकस्यापकृतं महत्।

विसृज्य मयि दु:खानि राजा दशरथो गत:॥ ५॥

‘शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयीने जगत्का कितना महान् अपकार किया है। महाराज दशरथ मुझपर बहुत-से दु:खोंका बोझ डालकर स्वर्गलोकको चले गये॥ ५॥

तस्यैषा धर्मराजस्य धर्ममूला महात्मन:।

परिभ्रमति राजश्रीर्नौरिवाकर्णिका जले॥ ६॥

‘आज उन धर्मराज महामना नरेशकी यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जलमें पड़ी हुई बिना नाविककी नौकाके समान इधर-उधर डगमगा रही है॥ ६॥

यो हि न: सुमहान् नाथ: सोऽपि प्रव्राजितो वने।

अनया धर्ममुत्सृज्य मात्रा मे राघव: स्वयम्॥ ७॥

‘जो हमलोगोंके सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजीको भी स्वयं मेरी इस माताने धर्मको तिलाञ्जलि देकर वनमें भेज दिया’॥ ७॥

इत्येवं भरतं वीक्ष्य विलपन्तमचेतनम्।

कृपणा रुरुदु: सर्वा: सुस्वरं योषितस्तदा॥ ८॥

उस समय भरतको इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ८॥

तथा तस्मिन् विलपति वसिष्ठो राजधर्मवित्।

सभामिक्ष्वाकुनाथस्य प्रविवेश महायशा:॥ ९॥

जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्मके ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथके सभाभवनमें प्रवेश किया॥ ९॥

शातकुम्भमयीं रम्यां मणिहेमसमाकुलाम्।

सुधर्मामिव धर्मात्मा सगण: प्रत्यपद्यत॥ १०॥

स काञ्चनमयं पीठं स्वस्त्यास्तरणसंवृतम्।

अध्यास्त सर्ववेदज्ञो दूताननुशशास च॥ ११॥

वह सभाभवन अधिकांश सुवर्णका बना हुआ था। उसमें सोनेके खम्भे लगे थे। वह रमणीय सभा देवताओंकी सुधर्मा सभाके समान शोभा पाती थी। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठने अपने शिष्यगणके साथ उस सभामें पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठपर जो स्वस्तिकाकार बिछौनेसे ढका हुआ था, वे विराजमान हुए। आसन ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने दूतोंको आज्ञा दी—॥ १०-११॥

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् योधानमात्यान् गणवल्लभान्।

क्षिप्रमानयताव्यग्रा: कृत्यमात्ययिकं हि न:॥ १२॥

सराजपुत्रं शत्रुघ्नं भरतं च यशस्विनम्।

युधाजितं सुमन्त्रं च ये च तत्र हिता जना:॥ १३॥

‘तुमलोग शान्तभावसे जाकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, अमात्यों और सेनापतियोंको शीघ्र बुला लाओ। अन्य राजकुमारोंके साथ यशस्वी भरत और शत्रुघ्नको, मन्त्री युधाजित् और सुमन्त्रको तथा और भी जो हितैषी पुरुष वहाँ हों उन सबको शीघ्र बुलाओ। हमें उनसे बहुत ही आवश्यक कार्य है’॥ १२-१३॥

ततो हलहलाशब्दो महान् समुदपद्यत।

रथैरश्वैर्गजैश्चापि जनानामुपगच्छताम्॥ १४॥

तदनन्तर घोड़े, हाथी और रथोंसे आनेवाले लोगोंका महान् कोलाहल आरम्भ हुआ॥ १४॥

ततो भरतमायान्तं शतक्रतुमिवामरा:।

प्रत्यनन्दन् प्रकृतयो यथा दशरथं तथा॥ १५॥

तत्पश्चात् जैसे देवता इन्द्रका अभिनन्दन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियों (मन्त्री-प्रजा आदि) ने आते हुए भरतका राजा दशरथकी ही भाँति अभिनन्दन किया॥

हृद इव तिमिनागसंवृत:

स्तिमितजलो मणिशङ्खशर्कर:।

दशरथसुतशोभिता सभा

सदशरथेव बभूव सा पुरा॥ १६॥

तिमि नामक महान् मत्स्य और जलहस्तीसे युक्त, स्थिर जलवाले तथा मुक्ता आदि मणियोंसे युक्त शङ्ख और बालुकावाले समुद्रके जलाशयकी भाँति वह सभा दशरथपुत्र भरतसे सुशोभित होकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे पूर्वकालमें राजा दशरथकी उपस्थितिसे शोभा पाती थी59॥ १६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाशीतितम: सर्ग:॥ ८१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८१॥

 

 


द्वॺशीतितम: सर्ग:

वसिष्ठजीका भरतको राज्यपर अभिषिक्त होनेके लिये आदेश देना तथा भरतका उसे अनुचित बताकर अस्वीकार करना और श्रीरामको लौटा लानेके लिये वनमें चलनेकी तैयारीके निमित्त सबको आदेश देना

तामार्यगणसम्पूर्णां भरत: प्रग्रहां सभाम्।

ददर्श बुद्धिसम्पन्न: पूर्णचन्द्रां निशामिव॥ १॥

बुद्धिमान् भरतने उत्तम ग्रह-नक्षत्रोंसे सुशोभित और पूर्ण चन्द्रमण्डलसे प्रकाशित रात्रिकी भाँति उस सभाको देखा। वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी मण्डलीसे भरी-पूरी तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियोंकी उपस्थितिसे शोभायमान थी॥ १॥

आसनानि यथान्यायमार्याणां विशतां तदा।

वस्त्राङ्गरागप्रभया द्योतिता सा सभोत्तमा॥ २॥

उस समय यथायोग्य आसनोंपर बैठे हुए आर्य पुरुषोंके वस्त्रों तथा अङ्गरागोंकी प्रभासे वह उत्तम सभा अधिक दीप्तिमती हो उठी थी॥ २॥

सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा।

अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी॥ ३॥

जैसे वर्षाकाल व्यतीत होनेपर शरद्-ऋतुकी पूर्णिमाको पूर्ण चन्द्रमण्डलसे अलंकृत रजनी बड़ी मनोहर दिखायी देती है, उसी प्रकार विद्वानोंके समुदायसे भरी हुई वह सभा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी॥ ३॥

राज्ञस्तु प्रकृती: सर्वा: स सम्प्रेक्ष्य च धर्मवित्।

इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत्॥ ४॥

उस समय धर्मके ज्ञाता पुरोहित वसिष्ठजीने राजाकी सम्पूर्ण प्रकृतियोंको उपस्थित देख भरतसे यह मधुर वचन कहा—॥ ४॥

तात राजा दशरथ: स्वर्गतो धर्ममाचरन्।

धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव॥ ५॥

‘तात! राजा दशरथ यह धन-धान्यसे परिपूर्ण समृद्धिशालिनी पृथिवी तुम्हें देकर स्वयं धर्मका आचरण करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं॥ ५॥

रामस्तथा सत्यवृत्ति: सतां धर्ममनुस्मरन्।

नाजहात् पितुरादेशं शशी ज्योत्स्नामिवोदित:॥ ६॥

‘सत्यपूर्ण बर्ताव करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने सत्पुरुषोंके धर्मका विचार करके पिताकी आज्ञाका उसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया, जैसे उदित चन्द्रमा अपनी चाँदनीको नहीं छोड़ता है॥ ६॥

पित्रा भ्रात्रा च ते दत्तं राज्यं निहतकण्टकम्।

तद् भुङ्क्ष्व मुदितामात्य: क्षिप्रमेवाभिषेचय॥ ७॥

उदीच्याश्च प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च केवला:।

कोट्यापरान्ता: सामुद्रा रत्नान्युपहरन्तु ते॥ ८॥

‘इस प्रकार पिता और ज्येष्ठ भ्राता—दोनोंने ही तुम्हें यह अकण्टक राज्य प्रदान किया है। अत: तुम मन्त्रियोंको प्रसन्न रखते हुए इसका पालन करो और शीघ्र ही अपना अभिषेक करा लो। जिससे उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और अपरान्त देशके निवासी राजा तथा समुद्रमें जहाजोंद्वारा व्यापार करनेवाले व्यवसायी तुम्हें असंख्य रत्न प्रदान करें॥ ७-८॥

तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुत:।

जगाम मनसा रामं धर्मज्ञो धर्मकांक्षया॥ ९॥

यह बात सुनकर धर्मज्ञ भरत शोकमें डूब गये और धर्मपालनकी इच्छासे उन्होंने मन-ही-मन श्रीरामकी शरण ली॥ ९॥

सबाष्पकलया वाचा कलहंसस्वरो युवा।

विललाप सभामध्ये जगर्हे च पुरोहितम्॥ १०॥

नवयुवक भरत उस भरी सभामें आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीद्वारा कलहंसके समान मधुर स्वरसे विलाप करने और पुरोहितजीको उपालम्भ देने लगे—॥ १०॥

चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमत:।

धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यं मद्विधो हरेत्॥ ११॥

‘गुरुदेव! जिन्होंने ब्रह्मचर्यका पालन किया, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात हुए तथा जो सदा ही धर्मके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीके राज्यका मेरे-जैसा कौन मनुष्य अपहरण कर सकता है?॥ ११॥

कथं दशरथाज्जातो भवेद् राज्यापहारक:।

राज्यं चाहं च रामस्य धर्मं वक्तुमिहार्हसि॥ १२॥

‘महाराज दशरथका कोई भी पुत्र बड़े भाईके राज्यका अपहरण कैसे कर सकता है? यह राज्य और मैं दोनों ही श्रीरामके हैं; यह समझकर आपको इस सभामें धर्मसंगत बात कहनी चाहिये (अन्याययुक्त नहीं)॥

ज्येष्ठ: श्रेष्ठश्च धर्मात्मा दिलीपनहुषोपम:।

लब्धुमर्हति काकुत्स्थो राज्यं दशरथो यथा॥ १३॥

‘धर्मात्मा श्रीराम मुझसे अवस्थामें बड़े और गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। वे दिलीप और नहुषके समान तेजस्वी हैं; अत: महाराज दशरथकी भाँति वे ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं॥ १३॥

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं कुर्यां पापमहं यदि।

इक्ष्वाकूणामहं लोके भवेयं कुलपांसन:॥ १४॥

‘पापका आचरण तो नीच पुरुष करते हैं। वह मनुष्यको निश्चय ही नरकमें डालनेवाला है। यदि श्रीरामचन्द्रजीका राज्य लेकर मैं भी पापाचरण करूँ तो संसारमें इक्ष्वाकुकुलका कलंक समझा जाऊँगा॥ १४॥

यद्धि मात्रा कृतं पापं नाहं तदपि रोचये।

इहस्थो वनदुर्गस्थं नमस्यामि कृताञ्जलि:॥ १५॥

‘मेरी माताने जो पाप किया है, उसे मैं कभी पसंद नहीं करता; इसीलिये यहाँ रहकर भी मैं दुर्गम वनमें निवास करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ॥ १५॥

राममेवानुगच्छामि स राजा द्विपदां वर:।

त्रयाणामपि लोकानां राघवो राज्यमर्हति॥ १६॥

‘मैं श्रीरामका ही अनुसरण करूँगा। मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ही इस राज्यके राजा हैं। वे तीनों ही लोकोंके राजा होनेयोग्य हैं’॥ १६॥

तद्वाक्यं धर्मसंयुक्तं श्रुत्वा सर्वे सभासद:।

हर्षान्मुमुचुरश्रूणि रामे निहितचेतस:॥ १७॥

भरतका वह धर्मयुक्त वचन सुनकर सभी सभासद् श्रीराममें चित्त लगाकर हर्षके आँसू बहाने लगे॥ १७॥

यदि त्वार्यं न शक्ष्यामि विनिवर्तयितुं वनात्।

वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा॥ १८॥

भरतने फिर कहा—‘यदि मैं आर्य श्रीरामको वनसे न लौटा सकूँगा तो स्वयं भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मणकी भाँति वहीं निवास करूँगा॥ १८॥

सर्वोपायं तु वर्तिष्ये विनिवर्तयितुं बलात्।

समक्षमार्यमिश्राणां साधूनां गुणवर्तिनाम्॥ १९॥

‘मैं आप सभी सद्गुणयुक्त बर्ताव करनेवाले पूजनीय श्रेष्ठ सभासदोंके समक्ष श्रीरामचन्द्रजीको बलपूर्वक लौटा लानेके लिये सारे उपायोंसे चेष्टा करूँगा॥ १९॥

विष्टिकर्मान्तिका: सर्वे मार्गशोधकदक्षका:।

प्रस्थापिता मया पूर्वं यात्रा च मम रोचते॥ २०॥

‘मैंने मार्गशोधनमें कुशल सभी अवैतनिक तथा वेतनभोगी कार्यकर्ताओंको पहले ही यहाँसे भेज दिया है। अत: मुझे श्रीरामचन्द्रजीके पास चलना ही अच्छा जान पड़ता है’॥ २०॥

एवमुक्त्वा तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सल:।

समीपस्थमुवाचेदं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्॥ २१॥

सभासदोंसे ऐसा कहकर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत पास बैठे हुए मन्त्रवेत्ता सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥

तूर्णमुत्थाय गच्छ त्वं सुमन्त्र मम शासनात्।

यात्रामाज्ञापय क्षिप्रं बलं चैव समानय॥ २२॥

‘सुमन्त्रजी! आप जल्दी उठकर जाइये और मेरी आज्ञासे सबको वनमें चलनेका आदेश सूचित कर दीजिये और सेनाको भी शीघ्र ही बुला भेजिये’॥ २२॥

एवमुक्त: सुमन्त्रस्तु भरतेन महात्मना।

प्रहृष्ट: सोऽदिशत् सर्वं यथासंदिष्टमिष्टवत्॥ २३॥

महात्मा भरतके ऐसा कहनेपर सुमन्त्रने बड़े हर्षके साथ सबको उनके कथनानुसार वह प्रिय संदेश सुना दिया॥ २३॥

ता: प्रहृष्टा: प्रकृतयो बलाध्यक्षा बलस्य च।

श्रुत्वा यात्रां समाज्ञप्तां राघवस्य निवर्तने॥ २४॥

‘श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये भरत जायँगे और उनके साथ जानेके लिये सेनाको भी आदेश प्राप्त हुआ है’—यह समाचार सुनकर वे सभी प्रजाजन तथा सेनापतिगण बहुत प्रसन्न हुए॥ २४॥

ततो योधाङ्गना: सर्वा भर्तृन् सर्वान् गृहे गृहे।

यात्रागमनमाज्ञाय त्वरयन्ति स्म हर्षिता:॥ २५॥

तदनन्तर उस यात्राका समाचार पाकर सैनिकोंकी सभी स्त्रियाँ घर-घरमें हर्षसे खिल उठीं और अपने पतियोंको जल्दी तैयार होनेके लिये प्रेरित करने लगीं॥

ते हयैर्गोरथै: शीघ्रं स्यन्दनैश्च मनोजवै:।

सह योषिद्बलाध्यक्षा बलं सर्वमचोदयन्॥ २६॥

सेनापतियोंने घोड़ों, बैलगाडि़यों तथा मनके समान वेगशाली रथोंसहित सम्पूर्ण सेनाको स्त्रियोंसहित यात्राके लिये शीघ्र तैयार होनेकी आज्ञा दी॥ २६॥

सज्जं तु तद् बलं दृष्ट्वा भरतो गुरुसंनिधौ।

रथं मे त्वरयस्वेति सुमन्त्रं पार्श्वतोऽब्रवीत्॥ २७॥

सेनाको कूँचके लिये उद्यत देख भरतने गुरुके समीप ही बगलमें खड़े हुए सुमन्त्रसे कहा—‘आप मेरे रथको शीघ्र तैयार करके लाइये’॥ २७॥

भरतस्य तु तस्याज्ञां परिगृह्य प्रहर्षित:।

रथं गृहीत्वोपययौ युक्तं परमवाजिभि:॥ २८॥

भरतकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े हर्षके साथ गये और उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ रथ लेकर लौट आये॥ २८॥

स राघव: सत्यधृति: प्रतापवान्

ब्रुवन् सुयुक्तं दृढसत्यविक्रम:।

गुरुं महारण्यगतं यशस्विनं

प्रसादयिष्यन् भरतोऽब्रवीत् तदा॥ २९॥

तब सुदृढ़ एवं सत्य पराक्रमवाले सत्यपरायण प्रतापी भरत विशाल वनमें गये हुए अपने बड़े भाई यशस्वी श्रीरामको लौटा लानेके निमित्त राजी करनेके लिये यात्राके उद्देश्यसे उस समय इस प्रकार बोले—॥ २९॥

तूर्णं त्वमुत्थाय सुमन्त्र गच्छ

बलस्य योगाय बलप्रधानान्।

आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं

प्रसाद्य रामं जगतो हिताय॥ ३०॥

‘सुमन्त्रजी! आप शीघ्र उठकर सेनापतियोंके पास जाइये और उनसे कहकर सेनाको कल कूँच करनेके लिये तैयार होनेका प्रबन्ध कीजिये; क्योंकि मैं सारे जगत्का कल्याण करनेके लिये उन वनवासी श्रीरामको प्रसन्न करके यहाँ ले आना चाहता हूँ’॥ ३०॥

स सूतपुत्रो भरतेन सम्य-

गाज्ञापित: सम्परिपूर्णकाम:।

शशास सर्वान् प्रकृतिप्रधानान्

बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं च॥ ३१॥

भरतकी यह उत्तम आज्ञा पाकर सूतपुत्र सुमन्त्रने अपना मनोरथ सफल हुआ समझा और उन्होंने प्रजावर्गके सभी प्रधान व्यक्तियों, सेनापतियों तथा सुहृदोंको भरतका आदेश सुना दिया॥ ३१॥

तत: समुत्थाय कुले कुले ते

राजन्यवैश्या वृषलाश्च विप्रा:।

अयूयुजन्नुष्ट्ररथान् खरांश्च

नागान् हयांश्चैव कुलप्रसूतान्॥ ३२॥

तब प्रत्येक घरके लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उठ-उठकर अच्छी जातिके घोड़े, हाथी, ऊँट, गधे तथा रथोंको जोतने लगे॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वॺशीतितम: सर्ग:॥ ८२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८२॥

 

त्र्यशीतितम: सर्ग:

भरतकी वनयात्रा और शृङ्गवेरपुरमें रात्रिवास

तत: समुत्थित: कल्यमास्थाय स्यन्दनोत्तमम्।

प्रययौ भरत: शीघ्रं रामदर्शनकाम्यया॥ १॥

तदनन्तर प्रात:काल उठकर भरतने उत्तम रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥ १॥

अग्रत: प्रययुस्तस्य सर्वे मन्त्रिपुरोहिता:।

अधिरुह्य हयैर्युक्तान् रथान् सूर्यरथोपमान्॥ २॥

उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेवके रथके समान तेजस्वी दिखायी देते थे॥ २॥

नवनागसहस्राणि कल्पितानि यथाविधि।

अन्वयुर्भरतं यान्तमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम्॥ ३॥

यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरतके पीछे-पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥

षष्ठी रथसहस्राणि धन्विनो विविधायुधा:।

अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्॥ ४॥

यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरतके पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे॥ ४॥

शतं सहस्राण्यश्वानां समारूढानि राघवम्।

अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्॥ ५॥

उसी प्रकार एक लाख घुड़सवार भी उन यशस्वी रघुकुलनन्दन राजकुमार भरतकी यात्राके समय उनका अनुसरण कर रहे थे॥ ५॥

कैकेयी च सुमित्रा च कौसल्या च यशस्विनी।

रामानयनसंतुष्टा ययुर्यानेन भास्वता॥ ६॥

कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौसल्या देवी भी श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये की जानेवाली उस यात्रासे संतुष्ट हो तेजस्वी रथके द्वारा प्रस्थित हुईं॥

प्रयाताश्चार्यसंघाता रामं द्रष्टुं सलक्ष्मणम्।

तस्यैव च कथाश्चित्रा: कुर्वाणा हृष्टमानसा:॥ ७॥

ब्राह्मण आदि आर्यों (त्रैवर्णिकों) के समूह मनमें अत्यन्त हर्ष लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामका दर्शन करनेके लिये उन्हींके सम्बन्धमें विचित्र बातें कहते-सुनते हुए यात्रा कर रहे थे॥ ७॥

मेघश्यामं महाबाहुं स्थिरसत्त्वं दृढव्रतम्।

कदा द्रक्ष्यामहे रामं जगत: शोकनाशनम्॥ ८॥

(वे आपसमें कहते थे—) ‘हमलोग दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा संसारका दु:ख दूर करनेवाले, स्थितप्रज्ञ, श्यामवर्ण महाबाहु श्रीरामका कब दर्शन करेंगे?॥ ८॥

दृष्ट एव हि न: शोकमपनेष्यति राघव:।

तम: सर्वस्य लोकस्य समुद्यन्निव भास्कर:॥ ९॥

‘जैसे सूर्यदेव उदय होते ही सारे जगत्का अन्धकार हर लेते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी हमारी आँखोंके सामने पड़ते ही हमलोगोंका सारा शोक-संताप दूर कर देंगे’॥ ९॥

इत्येवं कथयन्तस्ते सम्प्रहृष्टा: कथा: शुभा:।

परिष्वजानाश्चान्योन्यं ययुर्नागरिकास्तदा॥ १०॥

इस प्रकारकी बातें कहते और अत्यन्त हर्षसे भरकर एक-दूसरेका आलिङ्गन करते हुए अयोध्याके नागरिक उस समय यात्रा कर रहे थे॥ १०॥

ये च तत्रापरे सर्वे सम्मता ये च नैगमा:।

रामं प्रतिययुर्हृष्टा: सर्वा: प्रकृतय: शुभा:॥ ११॥

उस नगरमें जो दूसरे सम्मानित पुरुष थे, वे सब लोग तथा व्यापारी और शुभ विचारवाले प्रजाजन भी बड़े हर्षके साथ श्रीरामसे मिलनेके लिये प्रस्थित हुए॥ ११॥

मणिकाराश्च ये केचित् कुम्भकाराश्च शोभना:।

सूत्रकर्मविशेषज्ञा ये च शस्त्रोपजीविन:॥ १२॥

मायूरका: क्राकचिका वेधका रोचकास्तथा।

दन्तकारा: सुधाकारा ये च गन्धोपजीविन:॥ १३॥

सुवर्णकारा: प्रख्यातास्तथा कम्बलकारका:।

स्नापकोष्णोदका वैद्या धूपका: शौण्डिकास्तथा॥ १४॥

रजकास्तुन्नवायाश्च ग्रामघोषमहत्तरा:।

शैलूषाश्च सह स्त्रीभिर्यान्ति कैवर्तकास्तथा॥ १५॥

समाहिता वेदविदो ब्राह्मणा वृत्तसम्मता:।

गोरथैर्भरतं यान्तमनुजग्मु: सहस्रश:॥ १६॥

जो कोई मणिकार (मणियोंको सानपर चढ़ाकर चमका देनेवाले), अच्छे कुम्भकार, सूतका ताना-बाना करके वस्त्र बनानेकी कलाके विशेषज्ञ, शस्त्र निर्माण करके जीविका चलानेवाले, मायूरक (मोरकी पाँखोंसे छत्र-व्यजन आदि बनानेवाले), आरेसे चन्दन आदिकी लकड़ी चीरनेवाले, मणि-मोती आदिमें छेद करनेवाले, रोचक (दीवारों और वेदी आदिमें शोभाका सम्पादन करनेवाले), दन्तकार (हाथीके दाँत आदिसे नाना प्रकारकी वस्तुओंका निर्माण करनेवाले), सुधाकार (चूना बनानेवाले), गन्धी, प्रसिद्ध सोनार, कम्बल और कालीन बनानेवाले, गरम जलसे नहलानेका काम करनेवाले, वैद्य, धूपक (धूपन-क्रियाद्वारा जीविका चलानेवाले), शौण्डिक (मद्यविक्रेता), धोबी, दर्जी, गाँवों तथा गोशालाओंके महतो, स्त्रियोंसहित नट, केवट तथा समाहितचित्त सदाचारी वेदवेत्ता सहस्रों ब्राह्मण बैलगाडि़योंपर चढ़कर वनकी यात्रा करनेवाले भरतके पीछे-पीछे गये॥ १२—१६॥

सुवेषा: शुद्धवसनास्ताम्रमृष्टानुलेपिन:।

सर्वे ते विविधैर्यानै: शनैर्भरतमन्वयु:॥ १७॥

सबके वेश सुन्दर थे। सबने शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे तथा सबके अङ्गोंमें ताँबेके समान लाल रंगका अङ्गराग लगा था। वे सब-के-सब नाना प्रकारके वाहनोंद्वारा धीरे-धीरे भरतका अनुसरण कर रहे थे॥ १७॥

प्रहृष्टमुदिता सेना सान्वयात् कैकयीसुतम्।

भ्रातुरानयने यातं भरतं भ्रातृवत्सलम्॥ १८॥

हर्ष और आनन्दमें भरी हुई वह सेना भाईको बुलानेके लिये प्रस्थित हुए कैकेयीकुमार भ्रातृवत्सल भरतके पीछे-पीछे चलने लगी॥ १८॥

ते गत्वा दूरमध्वानं रथयानाश्वकुञ्जरै:।

समासेदुस्ततो गङ्गां शृङ्गवेरपुरं प्रति॥ १९॥

इस प्रकार रथ, पालकी, घोड़े और हाथियोंके द्वारा बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद वे सब लोग शृङ्गवेरपुरमें गङ्गाजीके तटपर जा पहुँचे॥ १९॥

यत्र रामसखा वीरो गुहो ज्ञातिगणैर्वृत:।

निवसत्यप्रमादेन देशं तं परिपालयन्॥ २०॥

जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका सखा वीर निषादराज गुह सावधानीके साथ उस देशकी रक्षा करता हुआ अपने भाई-बन्धुओंके साथ निवास करता था॥ २०॥

उपेत्य तीरं गङ्गायाश्चक्रवाकैरलंकृतम्।

व्यवतिष्ठत सा सेना भरतस्यानुयायिनी॥ २१॥

चक्रवाकोंसे अलंकृत गङ्गातटपर पहुँचकर भरतका अनुसरण करनेवाली वह सेना ठहर गयी॥ २१॥

निरीक्ष्यानुत्थितां सेनां तां च गङ्गां शिवोदकाम्।

भरत: सचिवान् सर्वानब्रवीद् वाक्यकोविद:॥ २२॥

पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके अपनी उस सेनाको शिथिल हुई देख बातचीत करनेकी कलामें कुशल भरतने समस्त सचिवोंसे कहा—॥ २२॥

निवेशयत मे सैन्यमभिप्रायेण सर्वत:।

विश्रान्ता: प्रतरिष्याम: श्व इमां सागरङ्गमाम्॥ २३॥

‘आपलोग मेरे सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार यहाँ सब ओर ठहरा दीजिये। आज रातमें विश्राम कर लेनेके बाद हम सब लोग कल सबेरे इन सागर-गामिनी नदी गङ्गाजीको पार करेंगे॥ २३॥

दातुं च तावदिच्छामि स्वर्गतस्य महीपते:।

और्ध्वदेहनिमित्तार्थमवतीर्योदकं नदीम्॥ २४॥

‘यहाँ ठहरनेका एक और प्रयोजन है—मैं चाहता हूँ कि गङ्गाजीमें उतरकर स्वर्गीय महाराजके पारलौकिक कल्याणके लिये जलाञ्जलि दे दूँ’॥ २४॥

तस्यैवं ब्रुवतोऽमात्यास्तथेत्युक्त्वा समाहिता:।

न्यवेशयंस्तांश्छन्देन स्वेन स्वेन पृथक् पृथक्॥ २५॥

उनके इस प्रकार कहनेपर सभी मन्त्रियोंने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और समस्त सैनिकोंको उनकी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ठहरा दिया॥ २५॥

निवेश्य गङ्गामनु तां महानदीं

चमूं विधानै: परिबर्हशोभिनीम्।

उवास रामस्य तदा महात्मनो

विचिन्तमानो भरतो निवर्तनम्॥ २६॥

महानदी गङ्गाके तटपर खेमे आदिसे सुशोभित होनेवाली उस सेनाको व्यवस्थापूर्वक ठहराकर भरतने महात्मा श्रीरामके लौटनेके विषयमें विचार करते हुए उस समय वहीं निवास किया॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यशीतितम: सर्ग:॥ ८३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३॥

 

चतुरशीतितम: सर्ग:

निषादराज गुहका अपने बन्धुओंको नदीकी रक्षा करते हुए युद्धके लिये तैयार रहनेका आदेश दे भेंटकी सामग्री ले भरतके पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोध करना

ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम्।

निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन् स परितोऽब्रवीत्॥ १॥

उधर निषादराज गुहने गङ्गा नदीके तटपर ठहरी हुई भरतकी सेनाको देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई- बन्धुओंसे कहा—॥ १॥

महतीयमित: सेना सागराभा प्रदृश्यते।

नास्यान्तमवगच्छामि मनसापि विचिन्तयन्॥ २॥

‘भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्रके समान अपार दिखायी देती है; मैं मनसे बहुत सोचनेपर भी इसका पार नहीं पाता हूँ॥ २॥

यदा नु खलु दुर्बुद्धिर्भरत: स्वयमागत:।

स एष हि महाकाय: कोविदारध्वजो रथे॥ ३॥

‘निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदारके चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसीके रथपर फहरा रही है॥ ३॥

बन्धयिष्यति वा पाशैरथ वास्मान् वधिष्यति।

अनु दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद् विवासितम्॥ ४॥

‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियोंद्वारा पहले हमलोगोंको पाशोंसे बँधवायगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिताने राज्यसे निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीरामको भी मार डालेगा॥ ४॥

सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञ: सुदुर्लभाम्।

भरत: कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति॥ ५॥

‘कैकेयीका पुत्र भरत राजा दशरथकी सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मीको अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजीको वनमें मार डालनेके लिये जा रहा है॥ ५॥

भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम।

तस्यार्थकामा: संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत॥ ६॥

‘परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हितकी कामना रखकर तुमलोग अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित हो यहाँ गङ्गाके तटपर मौजूद रहो॥

तिष्ठन्तु सर्वदाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम्।

बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशना:॥ ७॥

‘सभी मल्लाह सेनाके साथ नदीकी रक्षा करते हुए गङ्गाके तटपर ही खड़े रहें और नावपर रखे हुए फल-मूल आदिका आहार करके ही आजकी रात बितावें॥ ७॥

नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम्।

संनद्धानां तथा यूनां तिष्ठन्त्वित्यभ्यचोदयत्॥ ८॥

‘हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमेंसे एक-एक नावपर मल्लाहोंके सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्रीसे लैस होकर बैठे रहें।’ इस प्रकार गुहने उन सबको आदेश दिया॥ ८॥

यदि तुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति।

इयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति॥ ९॥

उसने फिर कहा कि ‘यदि यहाँ भरतका भाव श्रीरामके प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गाके पार जा सकेगी’॥ ९॥

इत्युक्त्वोपायनं गृह्य मत्स्यमांसमधूनि च।

अभिचक्राम भरतं निषादाधिपतिर्गुह:॥ १०॥

यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी60 (मिश्री), फलके गूदे और मधु आदि भेंटकी सामग्री लेकर भरतके पास गया॥ १०॥

तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्र: प्रतापवान्।

भरतायाचचक्षेऽथ समयज्ञो विनीतवत्॥ ११॥

उसे आते देख समयोचित कर्तव्यको समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्रने विनीतकी भाँति भरतसे कहा—॥ ११॥

एष ज्ञातिसहस्रेण स्थपति: परिवारित:।

कुशलो दण्डकारण्ये वृद्धो भ्रातुश्च ते सखा॥ १२॥

तस्मात् पश्यतु काकुत्स्थं त्वां निषादाधिपो गुह:।

असंशयं विजानीते यत्र तौ रामलक्ष्मणौ॥ १३॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओंके साथ यहाँ निवास करता है। यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीरामका सखा है। इसे दण्डकारण्यके मार्गकी विशेष जानकारी है। निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अत: निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये अवसर दो’॥ १२-१३॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुमन्त्राद् भरत: शुभम्।

उवाच वचनं शीघ्रं गुह: पश्यतु मामिति॥ १४॥

सुमन्त्रके मुखसे यह शुभ वचन सुनकर भरतने कहा—‘निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें—इसकी व्यवस्था की जाय’॥ १४॥

लब्ध्वानुज्ञां सम्प्रहृष्टो ज्ञातिभि: परिवारित:।

आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत्॥ १५॥

मिलनेकी अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओंके साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरतसे मिलकर बड़ी नम्रताके साथ बोला—॥ १५॥

निष्कुटश्चैव देशोऽयं वञ्चिताश्चापि ते वयम्।

निवेदयाम ते सर्वं स्वके दाशगृहे वस॥ १६॥

‘यह वन-प्रदेश आपके लिये घरमें लगे हुए बगीचेके समान है। आपने अपने आगमनकी सूचना न देकर हमें धोखेमें रख दिया—हम आपके स्वागतकी कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवामें अर्पित है। यह निषादोंका घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें॥ १६॥

अस्ति मूलफलं चैतन्निषादै: स्वयमर्जितम्।

आर्द्रं शुष्कं तथा मांसं वन्यं चोच्चावचं तथा॥ १७॥

‘यह फल-मूल आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमेंसे कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फलका गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकारके दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें॥ १७॥

आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यत्येनां विभावरीम्।

अर्चितो विविधै: कामै: श्व: ससैन्यो गमिष्यसि॥ १८॥

‘हम आशा करते हैं कि यह सेना आजकी रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकोंके साथ यहाँसे अन्यत्र जाइयेगा’॥ १८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरशीतितम: सर्ग:॥ ८४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८४॥

 

पञ्चाशीतितम: सर्ग:

गुह और भरतकी बातचीत तथा भरतका शोक

एवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम्।

प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम्॥ १॥

निषादराज गुहके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् भरतने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनोंमें उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १॥

ऊर्जित: खलु ते काम: कृतो मम गुरो: सखे।

यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि॥ २॥

‘भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीरामके सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेनाका सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो—तुम्हारी श्रद्धासे ही हम सब लोगोंका सत्कार हो गया’॥ २॥

इत्युक्त्वा स महातेजा गुहं वचनमुत्तमम्।

अब्रवीद् भरत: श्रीमान् पन्थानं दर्शयन् पुन:॥ ३॥

यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरतने गन्तव्य मार्गको हाथके संकेतसे दिखाते हुए पुन: गुहसे उत्तम वाणीमें पूछा—॥ ३॥

कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा।

गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्यय:॥ ४॥

‘निषादराज! इन दो मार्गोंमेंसे किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाना होगा? गङ्गाके किनारेका यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है’॥ ४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमत:।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो गहनगोचर:॥ ५॥

बुद्धिमान् राजकुमार भरतका यह वचन सुनकर वनमें विचरनेवाले गुहने हाथ जोड़कर कहा—॥ ५॥

दाशास्त्वनुगमिष्यन्ति देशज्ञा: सुसमाहिता:।

अहं चानुगमिष्यामि राजपुत्र महाबल॥ ६॥

‘महाबली राजकुमार! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेशसे पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा॥ ६॥

कच्चिन्न दुष्टो व्रजसि रामस्याक्लिष्टकर्मण:।

इयं ते महती सेना शङ्कां जनयतीव मे॥ ७॥

‘परन्तु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है’॥ ७॥

तमेवमभिभाषन्तमाकाश इव निर्मल:।

भरत: श्लक्ष्णया वाचा गुहं वचनमब्रवीत्॥ ८॥

ऐसी बात कहते हुए गुहसे आकाशके समान निर्मल भरतने मधुर वाणीमें कहा—॥ ८॥

मा भूत् स कालो यत् कष्टं न मां शङ्कितुमर्हसि।

राघव: स हि मे भ्राता ज्येष्ठ: पितृसमो मत:॥ ९॥

‘निषादराज! ऐसा समय कभी न आये। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिताके समान मानता हूँ॥ ९॥

तं निवर्तयितुं यामि काकुत्स्थं वनवासिनम्।

बुद्धिरन्या न मे कार्या गुह सत्यं ब्रवीमि ते॥ १०॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वनमें निवास करते हैं, अत: उन्हें लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। गुह! मैं तुमसे सच कहता हूँ। तुम्हें मेरे विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’॥ १०॥

स तु संहृष्टवदन: श्रुत्वा भरतभाषितम्।

पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं भरतं प्रति हर्षित:॥ ११॥

भरतकी बात सुनकर निषादराजका मुँह प्रसन्नतासे खिल उठा। वह हर्षसे भरकर पुन: भरतसे बोला—॥ ११॥

धन्यस्त्वं न त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले।

अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि॥ १२॥

‘आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्नके हाथमें आये हुए राज्यको त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डलमें कोई नहीं दिखायी देता॥ १२॥

शाश्वती खलु ते र्कीतिर्लोकाननु चरिष्यति।

यस्त्वं कृच्छ्रगतं रामं प्रत्यानयितुमिच्छसि॥ १३॥

‘कष्टप्रद वनमें निवास करनेवाले श्रीरामको जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इससे समस्त लोकोंमें आपकी अक्षय कीर्तिका प्रसार होगा’॥ १३॥

एवं सम्भाषमाणस्य गुहस्य भरतं तदा।

बभौ नष्टप्रभ: सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत॥ १४॥

जब गुह भरतसे इस प्रकारकी बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेवकी प्रभा अदृश्य हो गयी और रातका अन्धकार सब ओर फैल गया॥ १४॥

संनिवेश्य स तां सेनां गुहेन परितोषित:।

शत्रुघ्नेन समं श्रीमाञ्छयनं पुनरागमत्॥ १५॥

गुहके बर्तावसे श्रीमान् भरतको बड़ा संतोष हुआ और वे सेनाको विश्राम करनेकी आज्ञा दे शत्रुघ्नके साथ शयन करनेके लिये गये॥ १५॥

रामचिन्तामय: शोको भरतस्य महात्मन:।

उपस्थितो ह्यनर्हस्य धर्मप्रेक्षस्य तादृश:॥ १६॥

धर्मपर दृष्टि रखनेवाले महात्मा भरत शोकके योग्य नहीं थे तथापि उनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके लिये चिन्ताके कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ १६॥

अन्तर्दाहेन दहन: संतापयति राघवम्।

वनदाहाग्निसंतप्तं गूढोऽग्निरिव पादपम्॥ १७॥

जैसे वनमें फैले हुए दावानलसे संतप्त हुए वृक्षको उसके खोखलेमें छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ताकी आगसे संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरतको वह राम-वियोगसे उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी॥ १७॥

प्रसृत: सर्वगात्रेभ्य: स्वेदं शोकाग्निसम्भवम्।

यथा सूर्यांशुसंतप्तो हिमवान् प्रसृतो हिमम्॥ १८॥

जैसे सूर्यकी किरणोंसे तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फको बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्निसे संतप्त होनेके कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गोंसे पसीना बहाने लगे॥ १८॥

ध्याननिर्दरशैलेन विनि:श्वसितधातुना।

दैन्यपादपसंघेन शोकायासाधिशृङ्गिणा॥ १९॥

प्रमोहानन्तसत्त्वेन संतापौषधिवेणुना।

आक्रान्तो दु:खशैलेन महता कैकयीसुत:॥ २०॥

उस समय कैकेयीकुमार भरत दु:खके विशाल पर्वतसे आक्रान्त हो गये थे। श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओंका समूह था। दु:खपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातुका स्थान ले रहा था। दीनता (इन्द्रियोंकी अपने विषयोंसे विमुखता) ही वृक्षसमूहोंके रूपमें प्रतीत होती थी। शोकजनित आयास ही उस दु:खरूपी पर्वतके ऊँचे शिखर थे। अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे। बाहर-भीतरकी इन्द्रियोंमें होनेवाले संताप ही उस पर्वतकी ओषधियाँ तथा बाँसके वृक्ष थे॥ १९-२०॥

विनि:श्वसन् वै भृशदुर्मनास्तत:

प्रमूढसंज्ञ: परमापदं गत:।

शमं न लेभे हृदयज्वरार्दितो

नरर्षभो यूथहतो यथर्षभ:॥ २१॥

उनका मन बहुत दु:खी था। वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्तिमें पड़ गये। मानसिक चिन्तासे पीडि़त होनेके कारण नरश्रेष्ठ भरतको शान्ति नहीं मिलती थी। उनकी दशा अपने झुंडसे बिछुड़े हुए वृषभकी-सी हो रही थी॥ २१॥

गुहेन सार्धं भरत: समागतो

महानुभाव: सजन: समाहित:।

सुदुर्मनास्तं भरतं तदा पुन-

र्गुह: समाश्वासयदग्रजं प्रति॥ २२॥

परिवारसहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुहसे मिले, उस समय उनके मनमें बड़ा दु:ख था। वे अपने बड़े भाईके लिये चिन्तित थे, अत: गुहने उन्हें पुन: आश्वासन दिया॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाशीतितम: सर्ग:॥ ८५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५॥

 

षडशीतितम: सर्ग:

निषादराज गुहके द्वारा लक्ष्मणके सद्भाव और विलापका वर्णन

आचचक्षेऽथ सद्भावं लक्ष्मणस्य महात्मन:।

भरतायाप्रमेयाय गुहो गहनगोचर:॥ १॥

वनचारी गुहने अप्रमेय शक्तिशाली भरतसे महात्मा लक्ष्मणके सद्भावका इस प्रकार वर्णन किया—॥ १॥

तं जाग्रतं गुणैर्युक्तं वरचापेषुधारिणम्।

भ्रातृगुप्त्यर्थमत्यन्तमहं लक्ष्मणमब्रुवम्॥ २॥

‘लक्ष्मण अपने भाईकी रक्षाके लिये श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये अधिक कालतक जागते रहे। उस समय उन सद्गुणशाली लक्ष्मणसे मैंने इस प्रकार कहा—॥ २॥

इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।

प्रत्याश्वसिहि शेष्वास्यां सुखं राघवनन्दन॥ ३॥

उचितोऽयं जन: सर्वो दु:खानां त्वं सुखोचित:।

धर्मात्मंस्तस्य गुप्त्यर्थं जागरिष्यामहे वयम्॥ ४॥

‘तात रघुकुलनन्दन! मैंने तुम्हारे लिये यह सुखदायिनी शय्या तैयार की है। तुम इसपर सुखपूर्वक सोओ और भलीभाँति विश्राम करो। यह (मैं) सेवक तथा इसके साथके सब लोग वनवासी होनेके कारण दु:ख सहन करनेके योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहनेका अभ्यास है); परंतु तुम सुखमें ही पले होनेके कारण उसीके योग्य हो। धर्मात्मन्! हमलोग श्रीरामचन्द्रजीकी रक्षाके लिये रातभर जागते रहेंगे॥ ३-४॥

नहि रामात् प्रियतरो ममास्ति भुवि कश्चन।

मोत्सुको भूर्ब्रवीम्येतदथ सत्यं तवाग्रत:॥ ५॥

‘मैं तुम्हारे सामने सत्य कहता हूँ कि इस भूमण्डलमें मुझे श्रीरामसे बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है; अत: तुम इनकी रक्षाके लिये उत्सुक न होओ॥ ५॥

अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद्यश:।

धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च केवलौ॥ ६॥

‘इन श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे ही मैं इस लोकमें महान् यश, प्रचुर धर्मलाभ तथा विशुद्ध अर्थ एवं भोग्य वस्तु पानेकी आशा करता हूँ॥ ६॥

सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया।

रक्षिष्यामि धनुष्पाणि: सर्वै: स्वैर्ज्ञातिभि: सह॥ ७॥

‘अत: मैं अपने समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ हाथमें धनुष लेकर सीताके साथ सोये प्रिय सखा श्रीरामकी (सब प्रकारसे) रक्षा करूँगा॥ ७॥

नहि मेऽविदितं किंचिद् वनेऽस्म‌िंश्चरत: सदा।

चतुरङ्गं ह्यपि बलं प्रसहेम वयं युधि॥ ८॥

‘इस वनमें सदा विचरते रहनेके कारण मुझसे यहाँकी कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ युद्धमें शत्रुकी चतुरङ्गिणी सेनाका भी अच्छी तरह सामना कर सकते हैं’॥ ८॥

एवमस्माभिरुक्तेन लक्ष्मणेन महात्मना।

अनुनीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता॥ ९॥

‘हमारे इस प्रकार कहनेपर धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाले महात्मा लक्ष्मणने हम सब लोगोंसे अनुनयपूर्वक कहा—॥ ९॥

कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।

शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितानि सुखानि वा॥ १०॥

‘निषादराज! जब दशरथनन्दन श्रीराम देवी सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन-धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है?॥ १०॥

यो न देवासुरै: सर्वै: शक्य: प्रसहितुं युधि।

तं पश्य गुह संविष्टं तृणेषु सह सीतया॥ ११॥

‘गुह! देखो, सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें जिनके वेगको नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीताके साथ तिनकोंपर सो रहे हैं॥ ११॥

महता तपसा लब्धो विविधैश्च परिश्रमै:।

एको दशरथस्यैष पुत्र: सदृशलक्षण:॥ १२॥

अस्मिन् प्रव्राजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।

विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति॥ १३॥

‘महान् तप और नाना प्रकारके परिश्रमसाध्य उपायोंद्वारा जो यह महाराज दशरथको अपने समान उत्तम लक्षणोंसे युक्त ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीरामके वनमें आ जानेसे राजा दशरथ अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकेंगे। जान पड़ता है निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी॥ १२-१३॥

विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरता: स्त्रिय:।

निर्घोषो विरतो नूनमद्य राजनिवेशने॥ १४॥

‘अवश्य ही अब रनिवासकी स्त्रियाँ बड़े जोरसे आर्तनाद करके अधिक श्रमके कारण अब चुप हो गयी होंगी और राजमहलका वह हाहाकार इस समय शान्त हो गया होगा॥ १४॥

कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम।

नाशंसे यदि ते सर्वे जीवेयु: शर्वरीमिमाम्॥ १५॥

‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आजकी इस राततक जीवित रह सकेंगे या नहीं; यह मैं नहीं कह सकता॥ १५॥

जीवेदपि च मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया।

दु:खिता या हि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति॥ १६॥

‘शत्रुघ्नकी बाट देखनेके कारण सम्भव है, मेरी माता सुमित्रा जीवित रह जायँ; परंतु पुत्रके विरहसे दु:खमें डूबी हुई वीर-जननी कौसल्या अवश्य नष्ट हो जायँगी॥ १६॥

अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।

राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥ १७॥

‘(महाराजकी इच्छा थी कि श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करूँ) अपने उस मनोरथको न पाकर श्रीरामको राज्यपर स्थापित किये बिना ही ‘हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया! नष्ट हो गया!!’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे॥ १७॥

सिद्धार्था: पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते।

प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति भूमिपम्॥ १८॥

‘उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग वहाँ रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता महाराज दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं॥ १८॥

रम्यचत्वरसंस्थानां सुविभक्तमहापथाम्।

हर्म्यप्रासादसम्पन्नां सर्वरत्नविभूषिताम्॥ १९॥

गजाश्वरथसम्बाधां तूर्यनादविनादिताम्।

सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्॥ २०॥

आरामोद्यानसम्पूर्णां समाजोत्सवशालिनीम्।

सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम॥ २१॥

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, हाथियों, घोड़ों और रथोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे व्याप्त, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे परिपूर्ण तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥ १९—२१॥

अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम्।

निवृत्ते समये ह्यस्मिन् सुखिता: प्रविशेमहि॥ २२॥

‘क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर सकुशल लौटे हुए सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ हमलोग अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे’॥ २२॥

परिदेवयमानस्य तस्यैवं हि महात्मन:।

तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत॥ २३॥

‘इस प्रकार विलाप करते हुए महामनस्वी राजकुमार लक्ष्मणकी वह सारी रात जागते ही बीती॥ २३॥

प्रभाते विमले सूर्ये कारयित्वा जटा उभौ।

अस्मिन् भागीरथीतीरे सुखं संतारितौ मया॥ २४॥

‘प्रात:काल निर्मल सूर्योदय होनेपर मैंने भागीरथीके तटपर (वटके दूधसे) उन दोनोंके केशोंको जटाका रूप दिलवाया और उन्हें सुखपूर्वक पार उतारा॥ २४॥

जटाधरौ तौ द्रुमचीरवाससौ

महाबलौ कुञ्जरयूथपोपमौ।

वरेषुधीचापधरौ परंतपौ

व्यपेक्षमाणौ सह सीतया गतौ॥ २५॥

‘सिरपर जटा धारण करके वल्कल एवं चीर-वस्त्र पहने हुए, महाबली, शत्रुसंतापी श्रीराम और लक्ष्मण दो गजयूथपतियोंके समान शोभा पाते थे। वे सुन्दर तरकस और धनुष धारण किये इधर-उधर देखते हुए सीताके साथ चले गये’॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रारामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडशीतितम: सर्ग:॥ ८६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८६॥

 

सप्ताशीतितम: सर्ग:

भरतकी मूर्च्छासे गुह, शत्रुघ्न और माताओंका दु:खी होना, होशमें आनेपर भरतका गुहसे श्रीराम आदिके भोजन और शयन आदिके विषयमें पूछना और गुहका उन्हें सब बातें बताना

गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम्।

ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छ्रुतमप्रियम्॥ १॥

गुहका श्रीरामके जटाधारण आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीरामके विषयमें उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीरामने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)॥ १॥

सुकुमारो महासत्त्व: सिंहस्कन्धो महाभुज:।

पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुण: प्रियदर्शन:॥ २॥

प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मना:।

ससाद सहसा तोत्रैर्हृदि विद्ध इव द्विप:॥ ३॥

भरत सुकुमार होनेके साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंहके समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखनेमें बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुहकी बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मनमें बड़ा दु:ख हुआ। वे अंकुशसे विद्ध हुए हाथीके समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दु:खसे शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये॥ २-३॥

भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुह:।

बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुम:॥ ४॥

भरतको मूर्च्छित हुआ देख गुहके चेहरेका रंग उड़ गया। वह भूकम्पके समय मथित हुए वृक्षकी भाँति वहाँ व्यथित हो उठा॥ ४॥

तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थित:।

परिष्वज्य रुरोदोच्चैर्विसंज्ञ: शोककर्शित:॥ ५॥

शत्रुघ्न भरतके पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदयसे लगाकर जोर-जोरसे रोने लगे और शोकसे पीडि़त हो अपनी सुध-बुध खो बैठे॥ ५॥

तत: सर्वा: समापेतुर्मातरो भरतस्य ता:।

उपवासकृशा दीना भर्तृव्यसनकर्शिता:॥ ६॥

तदनन्तर भरतकी सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पतिवियोगके दु:खसे दु:खी, उपवास करनेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं॥ ६॥

ताश्च तं पतितं भूमौ रुदत्य: पर्यवारयन्।

कौसल्या त्वनुसृत्यैनं दुर्मना: परिषस्वजे॥ ७॥

भूमिपर पड़े हुए भरतको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं। कौसल्याका हृदय तो दु:खसे और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरतके पास जाकर उन्हें अपनी गोदमें चिपका लिया॥ ७॥

वत्सला स्वं यथा वत्समुपगुह्य तपस्विनी।

परिपप्रच्छ भरतं रुदती शोकलालसा॥ ८॥

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेको गलेसे लगाकर चाटती है, उसी तरह शोकसे व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्याने भरतको गोदमें लेकर रोते-रोते पूछा—॥

पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते।

अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम्॥ ९॥

‘बेटा! तुम्हारे शरीरको कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंशका जीवन तुम्हारे ही अधीन है॥ ९॥

त्वां दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते।

वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकस्त्वमद्य न:॥ १०॥

‘वत्स! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ। श्रीराम लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके रक्षक हो॥ १०॥

कच्चिन्न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतं ते किंचिदप्रियम्।

पुत्रे वा ह्येकपुत्राया: सहभार्ये वनं गते॥ ११॥

‘बेटा! सच बताओ, तुमने लक्ष्मणके सम्बन्धमें अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली माके बेटे वनमें सीतासहित गये हुए श्रीरामके विषयमें कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है?’॥ ११॥

स मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशा:।

कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत्॥ १२॥

दो ही घड़ीमें जब महायशस्वी भरतका चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौसल्याको सान्त्वना दी (और कहा—‘मा! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है’)। फिर निषादराज गुहसे इस प्रकार पूछा—॥ १२॥

भ्राता मे क्वावसद् रात्रौ क्व सीता क्व च लक्ष्मण:।

अस्वपच्छयने कस्मिन् किं भुक्त्वा गुह शंस मे॥ १३॥

‘गुह! उस दिन रातमें मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौनेपर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ’॥ १३॥

सोऽब्रवीद् भरतं हृष्टो निषादाधिपतिर्गुह:।

यद्विधं प्रतिपेदे च रामे प्रियहितेऽतिथौ॥ १४॥

ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीरामके आनेपर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरतसे कहा—॥ १४॥

अन्नमुच्चावचं भक्ष्या: फलानि विविधानि च।

रामायाभ्यवहारार्थं बहुशोऽपहृतं मया॥ १५॥

‘मैंने भाँति-भाँतिके अन्न, अनेक प्रकारके खाद्य-पदार्थ और कई तरहके फल श्रीरामचन्द्रजीके पास भोजनके लिये प्रचुर मात्रामें पहुँचाये॥ १५॥

तत् सर्वं प्रत्यनुज्ञासीद् राम: सत्यपराक्रम:।

न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्रधर्ममनुस्मरन्॥ १६॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्मका स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया—मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया॥

नह्यस्माभि: प्रतिग्राह्यं सखे देयं तु सर्वदा।

इति तेन वयं सर्वे अनुनीता महात्मना॥ १७॥

‘फिर उन महात्माने हम सब लोगोंको समझाते हुए कहा—‘सखे! हम-जैसे क्षत्रियोंको किसीसे कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये’॥ १७॥

लक्ष्मणेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना।

औपवास्यं तदाकार्षीद् राघव: सह सीतया॥ १८॥

‘सीतासहित श्रीरामने उस रातमें उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसीको उन महात्माने पीया॥ १८॥

ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणोऽप्यकरोत् तदा।

वाग्यतास्ते त्रय: संध्यां समुपासन्त संहिता:॥ १९॥

‘उनके पीनेसे बचा हुआ जल लक्ष्मणने ग्रहण किया। (जलपानके पहले) उन तीनोंने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी॥ १९॥

सौमित्रिस्तु तत: पश्चादकरोत् स्वास्तरं शुभम्।

स्वयमानीय बर्हींषि क्षिप्रं राघवकारणात्॥ २०॥

‘तदनन्तर लक्ष्मणने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजीके लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया॥ २०॥

तस्मिन् समाविशद् राम: स्वास्तरे सह सीतया।

प्रक्षाल्य च तयो: पादौ व्यपाक्रामत् स लक्ष्मण:॥ २१॥

‘उस सुन्दर बिस्तरपर जब सीताके साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनोंके चरण पखारकर वहाँसे दूर हट आये॥ २१॥

एतत् तदिङ्गुदीमूलमिदमेव च तत् तृणम्।

यस्मिन् रामश्च सीता च रात्रिं तां शयितावुभौ॥ २२॥

‘यही वह इङ्गुदी-वृक्षकी जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता—दोनोंने रात्रिमें शयन किया था॥ २२॥

नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गुलित्रवान्

शरै: सुपूर्णाविषुधी परंतप:।

महद्धनु: सज्जमुपोह्य लक्ष्मणो

निशामतिष्ठत् परितोऽस्य केवलम्॥ २३॥

‘शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठपर बाणोंसे भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीरामके चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रातभर खड़े रहे॥ २३॥

ततस्त्वहं चोत्तमबाणचापभृत्

स्थितोऽभवं तत्र स यत्र लक्ष्मण:।

अतन्द्रितैर्ज्ञातिभिरात्तकार्मुकै-

र्महेन्द्रकल्पं परिपालयंस्तदा॥ २४॥

‘तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु- बान्धवोंके साथ, जो निद्रा और आलस्यका त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीरामकी रक्षा करता रहा’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताशीतितम: सर्ग:॥ ८७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८७॥

 

अष्टाशीतितम: सर्ग:

श्रीरामकी कुश-शय्या देखकर भरतका शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कलऔर जटाधारण करके वनमें रहनेका विचार प्रकट करना

तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरत: सह मन्त्रिभि:।

इङ्गुदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत॥ १॥

निषादराजकी सारी बातें ध्यानसे सुनकर मन्त्रियोंसहित भरतने इंगुदी-वृक्षकी जड़के पास आकर श्रीरामचन्द्रजीकी शय्याका निरीक्षण किया॥ १॥

अब्रवीज्जननी: सर्वा इह तस्य महात्मन:।

शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम्॥ २॥

फिर उन्होंने समस्त माताओंसे कहा—‘यहीं महात्मा श्रीरामने भूमिपर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गोंसे विमर्दित हुआ था॥

महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता।

जातो दशरथेनोर्व्यां न राम: स्वप्तुमर्हति॥ ३॥

‘महाराजोंके कुलमें उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमिपर शयन करनेके योग्य नहीं हैं॥ ३॥

अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये।

शयित्वा पुरुषव्याघ्र: कथं शेते महीतले॥ ४॥

‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्मकी विशेष चादरसे ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनोंके समूहसे सजे हुए पलंगपर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वीपर कैसे शयन करते होंगे?॥ ४॥

प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु च सर्वदा।

हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु॥ ५॥

पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु।

पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघरुतेषु च॥ ६॥

प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु।

उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु॥ ७॥

‘जो सदा विमानाकार प्रासादोंके श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओंमें सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदीकी बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनोंसे सुशोभित हैं, पुष्पराशिसे विभूषित होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरुकी सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहोंका कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदिकी सुगन्धसे व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारोंपर सुवर्णका काम किया गया है तथा जो ऊँचाईमें मेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलोंमें जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वनमें पृथ्वीपर कैसे सोते होंगे?॥ ५—७॥

गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनि:स्वनै: ।

मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधित:॥ ८॥

बन्दिभिर्वन्दित: काले बहुभि: सूतमागधै:।

गाथाभिरनुरूपाभि: स्तुतिभिश्च परंतप:॥ ९॥

‘जो गीतों और वाद्योंकी ध्वनियोंसे, श्रेष्ठ आभूषणोंकी झनकारोंसे तथा मृदङ्गोंके उत्तम शब्दोंसे सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समयपर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियोंसे जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमिपर कैसे शयन करते होंगे?॥ ८-९॥

अश्रद्धेयमिदं लोके न सत्यं प्रतिभाति मा।

मुह्यते खलु मे भाव: स्वप्नोऽयमिति मे मति:॥ १०॥

‘यह बात जगत्में विश्वासके योग्य नहीं है। मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती। मेरा अन्त:करण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है॥ १०॥

न नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम्।

यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत स:॥ ११॥

‘निश्चय ही कालके समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभावसे दशरथनन्दन श्रीरामको भी इस प्रकार भूमिपर सोना पड़ा॥ ११॥

यस्मिन् विदेहराजस्य सुता च प्रियदर्शना।

दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च॥ १२॥

‘उस कालके ही प्रभावसे विदेहराजकी परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथकी प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वीपर शयन करती हैं॥ १२॥

इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम्।

स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम्॥ १३॥

‘यही मेरे बड़े भाईकी शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदीपर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गोंसे कुचला गया सारा तृण अभीतक पड़ा है॥ १३॥

मन्ये साभरणा सुप्ता सीतास्मिन्शयने शुभा।

तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ता: कनकबिन्दव:॥ १४॥

‘जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्णके कण सटे दिखायी देते हैं॥ १४॥

उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा।

तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ता: कौशेयतन्तव:॥ १५॥

‘यहाँ उस समय सीताकी चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशमके तागे चमक रहे हैं॥ १५॥

मन्ये भर्तु: सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी।

सुकुमारी सती दु:खं न विजानाति मैथिली॥ १६॥

‘मैं समझता हूँ कि पतिकी शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियोंके लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दु:खका अनुभव नहीं कर रही हैं॥ १६॥

हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत् सभार्य: कृते मम।

ईदृशीं राघव: शय्यामधिशेते ह्यनाथवत्॥ १७॥

‘हाय! मैं मर गया—मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीरामको अनाथकी भाँति ऐसी शय्यापर सोना पड़ता है॥ १७॥

सार्वभौमकुले जात: सर्वलोकसुखावह:।

सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम्॥ १८॥

कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्ष: प्रियदर्शन:।

सुखभागी न दु:खार्ह: शयितो भुवि राघव:॥ १९॥

‘जो चक्रवर्ती सम्राट्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकोंको सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करनेमें तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमलके समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगनेवाला है तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य हैं, दु:ख भोगनेके कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्यका परित्याग करके इस समय पृथ्वीपर शयन करते हैं॥ १८-१९॥

धन्य: खलु महाभागो लक्ष्मण: शुभलक्षण:।

भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते॥ २०॥

‘उत्तम लक्षणोंवाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकटके समय बड़े भाई श्रीरामके साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं॥ २०॥

सिद्धार्था खलु वैदेही पतिं यानुगता वनम्।

वयं संशयिता: सर्वे हीनास्तेन महात्मना॥ २१॥

‘निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पतिके साथ वनका अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीरामसे बिछुड़कर संशयमें पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं)॥ २१॥

अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे।

गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते॥ २२॥

‘महाराज दशरथ स्वर्गलोकको गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशामें यह पृथ्वी बिना नाविककी नौकाके समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है॥ २२॥

न च प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम्।

वने निवसतस्तस्य बाहुवीर्याभिरक्षिताम्॥ २३॥

‘वनमें निवास करनेपर भी उन्हीं श्रीरामके बाहुबलसे सुरक्षित हुई इस वसुन्धराको कोई शत्रु मनसे भी नहीं लेना चाहता है॥ २३॥

शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम् ।

अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम्॥ २४॥

अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम्।

शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव॥ २५॥

‘इस समय अयोध्याकी चहारदीवारीकी सब ओरसे रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं—खुले विचरते हैं, नगरद्वारका फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेनामें हर्ष और उत्साहका अभाव है, समस्त नगरी रक्षकोंसे सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कटमें पड़ी हुई है, रक्षकोंके अभावसे आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजनकी भाँति इसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करते हैं। श्रीरामके बाहुबलसे ही इसकी रक्षा हो रही है॥ २४-२५॥

अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा।

फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥ २६॥

‘आजसे मैं भी पृथ्वीपर अथवा तिनकोंपर ही सोऊँगा, फल-मूलका ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा॥ २६॥

तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने।

तत् प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति॥ २७॥

‘वनवासके जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनोंतक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होनेसे आर्य श्रीरामकी की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी॥ २७॥

वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुघ्नो मानुवत्स्यति।

लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यो मे पालयिष्यति॥ २८॥

‘भाईके लिये वनमें निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मणको साथ लेकर अयोध्याका पालन करेंगे॥ २८॥

अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातय:।

अपि मे देवता: कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम्॥ २९॥

‘अयोध्यामें ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथको सत्य (सफल) करेंगे?॥ २९॥

प्रसाद्यमान: शिरसा मया स्वयं

बहुप्रकारं यदि न प्रपत्स्यते।

ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं

वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम्॥ ३०॥

‘मैं उनके चरणोंपर मस्तक रखकर उन्हें मनानेकी चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहनेपर भी वे लौटनेको राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीरामके साथ मैं भी दीर्घकालतक वहीं निवास करूँगा। वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे’॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाशीतितम: सर्ग:॥ ८८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८८॥

 

एकोननवतितम: सर्ग:

भरतका सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाजके आश्रमपर जाना

व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघव:।

काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

शृङ्गवेरपुरमें ही गङ्गाके तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रात:काल उठे और शत्रुघ्नसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम्।

शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम्॥ २॥

‘शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुहको शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गाके पार उतारेगा’॥ २॥

जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन्।

इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुघ्नो विप्रचोदित:॥ ३॥

उनसे इस प्रकार प्रेरित होनेपर शत्रुघ्नने कहा—‘भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीरामका चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’॥ ३॥

इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयो:।

आगम्य प्राञ्जलि: काले गुहो वचनमब्रवीत्॥ ४॥

वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेलामें आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला—॥ ४॥

कच्चित् सुखं नदीतीरेऽवात्सी: काकुत्स्थ शर्वरीम्।

कच्चिच्च सहसैन्यस्य तव नित्यमनामयम्॥ ५॥

‘ककुत्स्थकूलभूषण भरतजी! इस नदीके तटपर आप रातमें सुखसे रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न?’॥

गुहस्य तत् तु वचनं श्रुत्वा स्नेहादुदीरितम्।

रामस्यानुवशो वाक्यं भरतोऽपीदमब्रवीत्॥ ६॥

गुहके स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचनको सुनकर श्रीरामके अधीन रहनेवाले भरतने यों कहा—॥ ६॥

सुखा न: शर्वरी धीमन् पूजिताश्चापि ते वयम्।

गङ्गां तु नौभिर्बह्वीभिर्दाशा: संतारयन्तु न:॥ ७॥

‘बुद्धिमान् निषादराज! हम सब लोगोंकी रात बड़े सुखसे बीती है। तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया। अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओंद्वारा हमें गङ्गाके पार उतार दें’॥ ७॥

ततो गुह: संत्वरित: श्रुत्वा भरतशासनम्।

प्रतिप्रविश्य नगरं तं ज्ञातिजनमब्रवीत्॥ ८॥

भरतका यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगरमें गया और भाई-बन्धुओंसे बोला—॥ ८॥

उत्तिष्ठत प्रबुध्यध्वं भद्रमस्तु हि व: सदा।

नाव: समुपकर्षध्वं तारयिष्यामि वाहिनीम्॥ ९॥

‘उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो। नौकाओंको खींचकर घाटपर ले आओ। भरतकी सेनाको गङ्गाजीके पार उतारूँगा’॥ ९॥

ते तथोक्ता: समुत्थाय त्वरिता राजशासनात्।

पञ्च नावां शतान्येव समानिन्यु: समन्तत:॥ १०॥

गुहके इस प्रकार कहनेपर अपने राजाकी आज्ञासे सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओरसे पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये॥ १०॥

अन्या: स्वस्तिकविज्ञेया महाघण्टाधरावरा:।

शोभमाना: पताकिन्यो युक्तवाहा: सुसंहता:॥ ११॥

इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नामसे प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्तिकके चिह्नोंसे अलंकृत होनेके कारण उन्हीं चिह्नोंसे पहचानी जाती थीं। उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं। स्वर्ण आदिके बने हुए चित्रोंसे उन नौकाओंकी विशेष शोभा हो रही थी। उनमें नौका खेनेके लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलानेके लिये तैयार बैठे थे। वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं॥ ११॥

तत: स्वस्तिकविज्ञेयां पाण्डुकम्बलसंवृताम्।

सनन्दिघोषां कल्याणीं गुहो नावमुपाहरत्॥ १२॥

उन्हींमेंसे एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नावपर माङ्गलिक शब्द हो रहा था॥ १२॥

तामारुरोह भरत: शत्रुघ्नश्च महाबल:।

कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या राजयोषित:॥ १३॥

पुरोहितश्च तत् पूर्वं गुरवो ब्राह्मणाश्च ये।

अनन्तरं राजदारास्तथैव शकटापणा:॥ १४॥

उसपर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे। तत्पश्चात् उसपर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथकी जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं। तदनन्तर राजपरिवारकी दूसरी स्त्रियाँ बैठीं। गाडि़याँ तथा क्रय-विक्रयकी सामग्रियाँ दूसरी-दूसरी नावोंपर लादी गयीं॥ १३-१४॥

आवासमादीपयतां तीर्थं चाप्यवगाहताम्।

भाण्डानि चाददानानां घोषस्तु दिवमस्पृशत्॥ १५॥

कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर61 अपने खेमोंमें छूटी हुई वस्तुओंको सँभालने लगे। कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाटपर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामानको ‘यह मेरा है, यह मेरा है’ इस तरह पहचानकर उठाने लगे। उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाशमें गूँज उठा॥ १५॥

पताकिन्यस्तु ता नाव: स्वयं दाशैरधिष्ठिता:।

वहन्त्यो जनमारूढं तदा सम्पेतुराशुगा:॥ १६॥

उन सभी नावोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। सबके ऊपर खेनेवाले कई मल्लाह बैठे थे। वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्योंको तीव्रगतिसे पार ले जाने लगीं॥ १६॥

नारीणामभिपूर्णास्तु काश्चित् काश्चित् तु वाजिनाम्।

काश्चित् तत्र वहन्ति स्म यानयुग्यं महाधनम्॥ १७॥

कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियोंसे भरी थीं, कुछ नावोंपर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाडि़यों, उनमें जोते जानेवाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदिको ढो रही थीं॥ १७॥

तास्तु गत्वा परं तीरमवरोप्य च तं जनम्।

निवृत्ता काण्डचित्राणि क्रियन्ते दाशबन्धुभि:॥ १८॥

वे दूसरे तटपर पहुँचकर वहाँ लोगोंको उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जलमें उनकी विचित्र गतियोंका प्रदर्शन करने लगे॥ १८॥

सवैजयन्तास्तु गजा गजारोहै: प्रचोदिता:।

तरन्त: स्म प्रकाशन्ते सपक्षा इव पर्वता:॥ १९॥

वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित होनेवाले हाथी महावतोंसे प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे। उस समय वे पंखधारी पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे॥

नावश्चारुरुहुस्त्वन्ये प्लवैस्तेरुस्तथापरे।

अन्ये कुम्भघटैस्तेरुरन्ये तेरुश्च बाहुभि:॥ २०॥

कितने ही मनुष्य नावोंपर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकोंसे बने हुए बेड़ोंपर सवार थे। कुछ लोग बड़े-बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओंसे ही तैरकर पार हो रहे थे॥ २०॥

सा पुण्या ध्वजिनी गङ्गां दाशै: संतारिता स्वयम्।

मैत्रे मुहूर्ते प्रययौ प्रयागवनमुत्तमम्॥ २१॥

इस प्रकार मल्लाहोंकी सहायतासे वह सारी पवित्र सेना गङ्गाके पार उतारी गयी। फिर वह स्वयं मैत्र62 नामक मुहूर्तमें उत्तम प्रयागवनकी ओर प्रस्थित हो गयी॥ २१॥

आश्वासयित्वा च चमूं महात्मा

निवेशयित्वा च यथोपजोषम्।

द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्य-

मृत्विक्सदस्यैर्भरत: प्रतस्थे॥ २२॥

वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेनाको सुखपूर्वक विश्रामकी आज्ञा दे उसे प्रयागवनमें ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभाके सदस्योंके साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाजका दर्शन करनेके लिये गये॥ २२॥

स ब्राह्मणस्याश्रममभ्युपेत्य

महात्मनो देवपुरोहितस्य।

ददर्श रम्योटजवृक्षदेशं

महद्वनं विप्रवरस्य रम्यम्॥ २३॥

देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर भरतने उन विप्रशिरोमणिके रमणीय एवं विशाल वनको देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियोंसे सुशोभित था॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोननवतितम: सर्ग:॥ ८९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९॥

 

नवतितम: सर्ग:

भरत और भरद्वाज मुनिकी भेंट एवं बातचीत तथा मुनिका अपने आश्रमपर ही ठहरनेका आदेश देना

भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभ:।

जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभि:॥ १॥

पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छद:।

वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम्॥ २॥

धर्मके ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरतने भरद्वाज-आश्रमके पास पहुँचकर अपने साथके सब लोगोंको आश्रमसे एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्र-शस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहितको आगे किये वे मन्त्रियोंके साथ पैदल ही वहाँ गये॥ १-२॥

तत: संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघव:।

मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम्॥ ३॥

आश्रममें प्रवेश करके जहाँ दूरसे ही मुनिवर भरद्वाजका दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियोंको खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजीको आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषिके पास गये॥ ३॥

वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपा:।

संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन्॥ ४॥

महर्षि वसिष्ठको देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसनसे उठ खड़े हुए और शिष्योंसे शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आनेको कहा॥ ४॥

समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादित:।

अबुध्यत महातेजा: सुतं दशरथस्य तम्॥ ५॥

फिर वे वसिष्ठसे मिले। तत्पश्चात् भरतने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथके पुत्र हैं॥ ५॥

ताभ्यामर्घ्यं च पाद्यं च दत्त्वा पश्चात् फलानि च।

आनुपूर्व्याच्च धर्मज्ञ: पप्रच्छ कुशलं कुले॥ ६॥

धर्मज्ञ ऋषिने क्रमश: वसिष्ठ और भरतको अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनोंके कुलका कुशल-समाचार पूछा॥ ६॥

अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि च मन्त्रिषु।

जानन् दशरथं वृत्तं न राजानमुदाहरत्॥ ७॥

इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डलका हाल पूछा। राजा दशरथकी मृत्युका वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषयमें उन्होंने कुछ नहीं पूछा॥ ७॥

वसिष्ठो भरतश्चैनं पप्रच्छतुरनामयम्।

शरीरेऽग्निषु शिष्येषु वृक्षेषु मृगपक्षिषु॥ ८॥

वसिष्ठ और भरतने भी महर्षिके शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदिका कुशल समाचार पूछा॥ ८॥

तथेति तु प्रतिज्ञाय भरद्वाजो महायशा:।

भरतं प्रत्युवाचेदं राघवस्नेहबन्धनात्॥ ९॥

महायशस्वी भरद्वाज ‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर श्रीरामके प्रति स्नेह होनेके कारण भरतसे इस प्रकार बोले—॥ ९॥

किमिहागमने कार्यं तव राज्यं प्रशासत:।

एतदाचक्ष्व सर्वं मे न हि मे शुध्यते मन:॥ १०॥

‘तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओरसे शुद्ध नहीं हो रहा है—मेरा विश्वास तुमपर नहीं जमता है॥ १०॥

सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्याऽऽनन्दवर्धनम्।

भ्रात्रा सह सभार्यो यश्चिरं प्रव्राजितो वनम्॥ ११॥

नियुक्त: स्त्रीनिमित्तेन पित्रा योऽसौ महायशा:।

वनवासी भवेतीह समा: किल चतुर्दश॥ १२॥

कच्चिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि।

अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य च॥ १३॥

‘जो शत्रुओंका नाश करनेवाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्रको कौसल्याने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिताने स्त्रीके कारण जिस महायशस्वी पुत्रको चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेकी आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नीके साथ दीर्घकालके लिये वनमें भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मणका तुम अकण्टक राज्य भोगनेकी इच्छासे कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’॥ ११—१३॥

एवमुक्तो भरद्वाजं भरत: प्रत्युवाच ह।

पर्यश्रुनयनो दु:खाद् वाचा संसज्जमानया॥ १४॥

भरद्वाजजीके ऐसा कहनेपर दु:खके कारण भरतकी आँखें डबडबा आयीं। वे लड़खड़ाती हुई वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले—॥ १४॥

हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते।

मत्तो न दोषमाशङ्के मैवं मामनुशाधि हि॥ १५॥

‘भगवन्! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरहसे मारा गया। यह मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि श्रीरामके वनवासमें मेरी ओरसे कोई अपराध नहीं हुआ है, अत: आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें॥ १५॥

न चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे।

नाहमेतेन तुष्टश्च न तद्वचनमाददे॥ १६॥

‘मेरी आड़ लेकर मेरी माताने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माताकी उस बातको स्वीकार ही करता हूँ॥

अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयात: प्रसादक:।

प्रतिनेतुमयोध्यायां पादौ चास्याभिवन्दितुम्॥ १७॥

‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीरामको प्रसन्न करके अयोध्यामें लौटा लाने और उनके चरणोंकी वन्दना करनेके लिये जा रहा हूँ॥ १७॥

तं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि।

शंस मे भगवन् राम: क्व सम्प्रति महीपति:॥ १८॥

‘इसी उद्देश्यसे मैं यहाँ आया हूँ। ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये। भगवन्! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं?’॥ १८॥

वसिष्ठादिभिऋर्त्विग्भिर्याचितो भगवांस्तत:।

उवाच तं भरद्वाज: प्रसादाद् भरतं वच:॥ १९॥

इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजोंने भी यह प्रार्थना की कि भरतका कोई अपराध नहीं है। आप इनपर प्रसन्न हों। तब भगवान् भरद्वाजने प्रसन्न होकर भरतसे कहा—॥ १९॥

त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे।

गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता॥ २०॥

‘पुरुषसिंह! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो। तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है॥ २०॥

जाने चैतन्मन:स्थं ते दृढीकरणमस्त्विति।

अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन्॥ २१॥

‘तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्तिका अधिकाधिक विस्तार हो॥ २१॥

जाने च रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम्।

अयं वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ॥ २२॥

‘मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीरामका पता जानता हूँ। ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूटपर निवास करते हैं॥ २२॥

श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभि:।

एतं मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद॥ २३॥

‘अब कल तुम उस स्थानकी यात्रा करना। आज अपने मन्त्रियोंके साथ इस आश्रममें ही रहो। महाबुद्धिमान् भरत! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तुको देनेमें समर्थ हो, अत: मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो’॥ २३॥

ततस्तथेत्येवमुदारदर्शन:

प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद् वच:।

चकार बुद्धिं च तदाश्रमे तदा

निशानिवासाय नराधिपात्मज:॥ २४॥

तब जिनके स्वरूप एवं स्वभावका परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरतने ‘तथास्तु’ कहकर मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमारने उस समय रातको उस आश्रममें ही निवास करनेका विचार किया॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवतितम: सर्ग:॥ ९०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९०॥

 

एकनवतितम: सर्ग:

भरद्वाज मुनिके द्वारा सेनासहित भरतका दिव्य सत्कार

कृतबुद्धिं निवासाय तत्रैव स मुनिस्तदा।

भरतं केकयीपुत्रमातिथ्येन न्यमन्त्रयत्॥ १॥

जब भरतने उस आश्रममें ही निवासका दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनिने कैकेयीकुमार भरतको अपना आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये न्यौता दिया॥ १॥

अब्रवीद् भरतस्त्वेनं नन्विदं भवता कृतम्।

पाद्यमर्घ्यमथातिथ्यं वने यदुपपद्यते॥ २॥

यह सुनकर भरतने उनसे कहा—‘मुने! वनमें जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके’॥ २॥

अथोवाच भरद्वाजो भरतं प्रहसन्निव।

जाने त्वां प्रीतिसंयुक्तं तुष्येस्त्वं येन केनचित्॥ ३॥

उनके ऐसा कहनेपर भरद्वाजजी भरतसे हँसते हुए-से बोले—‘भरत! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अत: मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसीसे तुम संतुष्ट हो जाओगे॥ ३॥

सेनायास्तु तवैवास्या: कर्तुमिच्छामि भोजनम्।

मम प्रीतिर्यथारूपा त्वमर्हो मनुजर्षभ॥ ४॥

‘किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेनाको भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये॥ ४॥

किमर्थं चापि निक्षिप्य दूरे बलमिहागत:।

कस्मान्नेहोपयातोऽसि सबल: पुरुषर्षभ॥ ५॥

‘पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेनाको किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहीं आये?’॥ ५॥

भरत: प्रत्युवाचेदं प्राञ्जलिस्तं तपोधनम्।

न सैन्येनोपयातोऽस्मि भगवन् भगवद्भयात्॥ ६॥

तब भरतने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिको उत्तर दिया—‘भगवन्! मैं आपके ही भयसे सेनाके साथ यहाँ नहीं आया॥ ६॥

राज्ञा हि भगवन् नित्यं राजपुत्रेण वा तथा।

यत्नत: परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विन:॥ ७॥

‘प्रभो! राजा और राजपुत्रको चाहिये कि वे सभी देशोंमें प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनोंको दूर छोड़कर रहें (क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचनेकी सम्भावना रहती है)॥

वाजिमुख्या मनुष्याश्च मत्ताश्च वरवारणा:।

प्रच्छाद्य भगवन् भूमिं महतीमनुयान्ति माम्॥ ८॥

‘भगवन्! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभागको ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं॥ ८॥

ते वृक्षानुदकं भूमिमाश्रमेषूटजांस्तथा।

न हिंस्युरिति तेनाहमेक एवागतस्तत:॥ ९॥

‘वे आश्रमके वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओंको हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ’॥

आनीयतामित: सेनेत्याज्ञप्त: परमर्षिणा।

तथानुचक्रे भरत: सेनाया: समुपागमम्॥ १०॥

तदनन्तर उन महर्षिने आज्ञा दी कि ‘सेनाको यहीं ले आओ।’ तब भरतने सेनाको वहीं बुलवा लिया॥ १०॥

अग्निशालां प्रविश्याथ पीत्वाप: परिमृज्य च।

आतिथ्यस्य क्रियाहेतोर्विश्वकर्माणमाह्वयत्॥ ११॥

इसके बाद मुनिवर भरद्वाजने अग्निशालामें प्रवेश करके जलका आचमन किया और ओठ पोंछकर भरतके आतिथ्य-सत्कारके लिये विश्वकर्मा आदिका आवाहन किया॥ ११॥

आह्वये विश्वकर्माणमहं त्वष्टारमेव च।

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥ १२॥

वे बोले—‘मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवताका आवाहन करता हूँ। मेरे मनमें सेनासहित भरतका आतिथ्य-सत्कार करनेकी इच्छा हुई है। इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें॥ १२॥

आह्वये लोकपालांस्त्रीन् देवान् शक्रपुरोगमान्।

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम्॥ १३॥

‘जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालोंका (अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओंका) मैं आवाहन करता हूँ। इस समय भरतका आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें॥ १३॥

प्राक्स्रोतसश्च या नद्यस्तिर्यक्स्रोतस एव च।

पृथिव्यामन्तरिक्षे च समायान्त्वद्य सर्वश:॥ १४॥

‘पृथिवी और आकाशमें जो पूर्व एवं पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें॥ १४॥

अन्या: स्रवन्तु मैरेयं सुरामन्या: सुनिष्ठिताम्।

अपराश्चोदकं शीतमिक्षुकाण्डरसोपमम्॥ १५॥

‘कुछ नदियाँ मैरेय प्रस्तुत करें। दूसरी अच्छी तरह तैयार की हुई सुरा ले आवें तथा अन्य नदियाँ ईंखके पोरुओंमें होनेवाले रसकी भाँति मधुर एवं शीतल जल तैयार करके रखें॥ १५॥

आह्वये देवगन्धर्वान् विश्वावसुहहाहुहून्।

तथैवाप्सरसो देवगन्धर्वैश्चापि सर्वश:॥ १६॥

‘मैं विश्वावसु, हाहा और हूहू आदि देव-गन्धर्वोंका तथा उनके साथ समस्त अप्सराओंका भी आवाहन करता हूँ॥

घृताचीमथ विश्वाचीं मिश्रकेशीमलम्बुषाम्।

नागदत्तां च हेमां च सोमामद्रिकृतस्थलीम्॥ १७॥

‘घृताची, विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा नागदत्ता, हेमा, सोमा तथा अद्रिकृतस्थली (अथवा पर्वतपर निवास करनेवाली सोमा) का भी मैं आवाहन करता हूँ॥ १७॥

शक्रं याश्चोपतिष्ठन्ति ब्रह्माणं याश्च भामिनी:।

सर्वास्तुम्बुरुणा सार्धमाह्वये सपरिच्छदा:॥ १८॥

‘जो अप्सराएँ इन्द्रकी सभामें उपस्थित होती हैं तथा जो देवाङ्गनाएँ ब्रह्माजीकी सेवामें जाया करती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरुके साथ आवाहन करता हूँ। वे अलङ्कारों तथा नृत्यगीतके लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणोंके साथ यहाँ पधारें॥ १८॥

वनं कुरुषु यद् दिव्यं वासोभूषणपत्रवत्।

दिव्यनारीफलं शश्वत् तत्कौबेरमिहैव तु॥ १९॥

‘उत्तर कुरुवर्षमें जो दिव्य चैत्ररथ नामक वन है, जिसमें दिव्य वस्त्र और आभूषण ही वृक्षोंके पत्ते हैं और दिव्य नारियाँ ही फल हैं, कुबेरका वह सनातन दिव्य वन यहीं आ जाय॥ १९॥

इह मे भगवान् सोमो विधत्तामन्नमुत्तमम्।

भक्ष्यं भोज्यं च चोष्यं च लेह्यं च विविधं बहु॥ २०॥

‘यहाँ भगवान् सोम मेरे अतिथियोंके लिये उत्तम अन्न, नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्यकी प्रचुर मात्रामें व्यवस्था करें॥ २०॥

विचित्राणि च माल्यानि पादपप्रच्युतानि च।

सुरादीनि च पेयानि मांसानि विविधानि च॥ २१॥

‘वृक्षोंसे तुरंत चुने गये नाना प्रकारके पुष्प, मधु आदि पेय पदार्थ तथा नाना प्रकारके फलोंके गूदे भी भगवान् सोम यहाँ प्रस्तुत करें’॥ २१॥

एवं समाधिना युक्तस्तेजसाप्रतिमेन च।

शिक्षास्वरसमायुक्तं सुव्रतश्चाब्रवीन्मुनि:॥ २२॥

इस प्रकार उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भरद्वाज मुनिने एकाग्रचित्त और अनुपम तेजसे सम्पन्न हो शिक्षा (शिक्षाशास्त्रमें बतायी गयी उच्चारणविधि) और (व्याकरणशास्त्रोक्त प्रकृति-प्रत्यय सम्बन्धी)स्वरसे युक्त वाणीमें उन सबका आवाहन किया॥ २२॥

मनसा ध्यायतस्तस्य प्राङ्मुखस्य कृताञ्जले:।

आजग्मुस्तानि सर्वाणि दैवतानि पृथक् पृथक्॥ २३॥

इस तरह आवाहन करके मुनि पूर्वाभिमुख हो हाथ जोड़े मन-ही-मन ध्यान करने लगे। उनके स्मरण करते ही वे सभी देवता एक-एक करके वहाँ आ पहुँचे॥ २३॥

मलयं दर्दुरं चैव तत: स्वेदनुदोऽनिल:।

उपस्पृश्य ववौ युक्त्या सुप्रियात्मा सुखं शिव:॥ २४॥

फिर तो वहाँ मलय और दर्दुर नामक पर्वतोंका स्पर्श करके बहनेवाली अत्यन्त प्रिय और सुखदायिनी हवा धीरे-धीरे चलने लगी, जो स्पर्शमात्रसे शरीरके पसीनेको सुखा देनेवाली थी॥ २४॥

ततोऽभ्यवर्षन्त घना दिव्या: कुसुमवृष्टय:।

देवदुन्दुभिघोषश्च दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे॥ २५॥

तत्पश्चात् मेघगण दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओंमें देवताओंकी दुन्दुभियोंका मधुर शब्द सुनायी देने लगा॥ २५॥

प्रववुश्चोत्तमा वाता ननृतुश्चाप्सरोगणा:।

प्रजगुर्देवगन्धर्वा वीणा: प्रमुमुचु: स्वरान्॥ २६॥

उत्तम वायु चलने लगी। अप्सराओंके समुदायोंका नृत्य होने लगा। देवगन्धर्व गाने लगे और सब ओर वीणाओंकी स्वरलहरियाँ फैल गयीं॥ २६॥

स शब्दो द्यां च भूमिं च प्राणिनां श्रवणानि च।

विवेशोच्चावच: श्लक्ष्ण: समो लयगुणान्वित:॥ २७॥

सङ्गीतका वह शब्द पृथ्वी, आकाश तथा प्राणियोंके कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होकर गूँजने लगा। आरोह-अवरोहसे युक्त वह शब्द कोमल एवं मधुर था, समतालसे विशिष्ट और लयगुणसे सम्पन्न था॥ २७॥

तस्मिन्नेवंगते शब्दे दिव्ये श्रोत्रसुखे नृणाम्।

ददर्श भारतं सैन्यं विधानं विश्वकर्मण:॥ २८॥

इस प्रकार मनुष्योंके कानोंको सुख देनेवाला वह दिव्य शब्द हो ही रहा था कि भरतकी सेनाको विश्वकर्माका निर्माणकौशल दिखायी पड़ा॥ २८॥

बभूव हि समा भूमि: समन्तात् पञ्चयोजनम्।

शाद्वलैर्बहुभिश्छन्ना नीलवैदूर्यसंनिभै:॥ २९॥

चारों ओर पाँच योजनतककी भूमि समतल हो गयी। उसपर नीलम और वैदूर्य मणिके समान नाना प्रकारकी घनी घास छा रही थी॥ २९॥

तस्मिन् बिल्वा: कपित्थाश्च पनसा बीजपूरका:।

आमलक्यो बभूवुश्च चूताश्च फलभूषिता:॥ ३०॥

स्थान-स्थानपर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आमके वृक्ष लगे थे, जो फलोंसे सुशोभित हो रहे थे॥ ३०॥

उत्तरेभ्य: कुरुभ्यश्च वनं दिव्योपभोगवत्।

आजगाम नदी सौम्या तीरजैर्बहुभिर्वृता॥ ३१॥

उत्तर कुरुवर्षसे दिव्य भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न चैत्ररथ नामक वन वहाँ आ गया। साथ ही वहाँकी रमणीय नदियाँ भी आ पहुँचीं, जो बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षोंसे घिरी हुई थीं॥ ३१॥

चतु:शालानि शुभ्राणि शालाश्च गजवाजिनाम्।

हर्म्यप्रासादसंयुक्ततोरणानि शुभानि च॥ ३२॥

उज्ज्वल, चार-चार कमरोंसे युक्त गृह (अथवा गृहयुक्त चबूतरे) तैयार हो गये। हाथी और घोड़ोंके रहनेके लिये शालाएँ बन गयीं। अट्टालिकाओं तथा सतमंजिले महलोंसे युक्त सुन्दर नगरद्वार भी निर्मित हो गये॥ ३२॥

सितमेघनिभं चापि राजवेश्म सुतोरणम्।

शुक्लमाल्यकृताकारं दिव्यगन्धसमुक्षितम्॥ ३३॥

राजपरिवारके लिये बना हुआ सुन्दर द्वारसे युक्त दिव्य भवन श्वेत बादलोंके समान शोभा पा रहा था। उसे सफेद फूलोंकी मालाओंसे सजाया और दिव्य सुगन्धित जलसे सींचा गया था॥ ३३॥

चतुरस्रमसम्बाधं शयनासनयानवत्।

दिव्यै: सर्वरसैर्युक्तं दिव्यभोजनवस्त्रवत्॥ ३४॥

वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था—उसमें संकीर्णताका अनुभव नहीं होता था। उसमें सोने, बैठने और सवारियोंके रहनेके लिये अलग-अलग स्थान थे। वहाँ सब प्रकारके दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे॥ ३४॥

उपकल्पितसर्वान्नं धौतनिर्मलभाजनम्।

क्लृप्तसर्वासनं श्रीमत्स्वास्तीर्णशयनोत्तमम्॥ ३५॥

सब तरहके अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे। उस सुन्दर भवनमें कहीं बैठनेके लिये सब प्रकारके आसन उपस्थित थे और कहीं सोनेके लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं॥ ३५॥

प्रविवेश महाबाहुरनुज्ञातो महर्षिणा।

वेश्म तद् रत्नसम्पूर्णं भरत: कैकयीसुत:॥ ३६॥

अनुजग्मुश्च ते सर्वे मन्त्रिण: सपुरोहिता:।

बभूवुश्च मुदा युक्तास्तं दृष्ट्वा वेश्मसंविधिम्॥ ३७॥

महर्षि भरद्वाजकी आज्ञासे कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे भरे हुए उस महलमें प्रवेश किया। उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये। उस भवनका निर्माणकौशल देखकर उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३६-३७॥

तत्र राजासनं दिव्यं व्यजनं छत्रमेव च।

भरतो मन्त्रिभि: सार्धमभ्यवर्तत राजवत्॥ ३८॥

उस भवनमें भरतने दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीरामकी भावना करके मन्त्रियोंके साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओंकी प्रदक्षिणा की॥

आसनं पूजयामास रामायाभिप्रणम्य च।

वालव्यजनमादाय न्यषीदत् सचिवासने॥ ३९॥

सिंहासनपर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीरामको प्रणाम किया और उस सिंहासनकी भी पूजा की। फिर अपने हाथमें चँवर ले, वे मन्त्रीके आसनपर जा बैठे॥ ३९॥

आनुपूर्व्यान्निषेदुश्च सर्वे मन्त्रिपुरोहिता:।

तत: सेनापति: पश्चात् प्रशास्ता च न्यषीदत॥ ४०॥

तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमश: अपने योग्य आसनोंपर बैठे; फिर सेनापति और प्रशास्ता (छावनीकी रक्षा करनेवाले) भी बैठ गये॥ ४०॥

ततस्तत्र मुहूर्तेन नद्य: पायसकर्दमा:।

उपातिष्ठन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात्॥ ४१॥

तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ीमें भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतकी सेवामें नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीचके स्थानमें खीर भरी थी॥ ४१॥

आसामुभयत:कूलं पाण्डुमृत्तिकलेपना:।

रम्याश्चावसथा दिव्या ब्राह्मणस्य प्रसादजा:॥ ४२॥

उन नदियोंके दोनों तटोंपर ब्रह्मर्षि भरद्वाजकी कृपासे दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूनेसे पुते हुए थे॥ ४२॥

तेनैव च मुहूर्तेन दिव्याभरणभूषिता:।

आगुर्विंशतिसाहस्रा: ब्रह्मणा प्रहिता: स्त्रिय:॥ ४३॥

उसी मुहूर्तमें ब्रह्माजीकी भेजी हुई दिव्य आभूषणोंसे विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं॥ ४३॥

सुवर्णमणिमुक्तेन प्रवालेन च शोभिता:।

आगुर्विंशतिसाहस्रा: कुबेरप्रहिता: स्त्रिय:॥ ४४॥

याभिर्गृहीत: पुरुष: सोन्माद इव लक्ष्यते।

इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूँगोंके आभूषणोंसे सुशोभित, कुबेरकी भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हुईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्मादग्रस्त-सा दिखायी देता है॥ ४४॥

आगुर्विंशतिसाहस्रा नन्दनादप्सरोगणा:॥ ४५॥

नारदस्तुम्बुरुर्गोप: प्रभया सूर्यवर्चस:।

एते गन्धर्वराजानो भरतस्याग्रतो जगु:॥ ४६॥

इनके सिवा नन्दनवनसे बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं। नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। ये तीनों गन्धर्वराज भरतके सामने गीत गाने लगे॥ ४५-४६॥

अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ वामना।

उपानृत्यन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात्॥ ४७॥

अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना—ये चार अप्सराएँ भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतके समीप नृत्य करने लगीं॥ ४७॥

यानि माल्यानि देवेषु यानि चैत्ररथे वने।

प्रयागे तान्यदृश्यन्त भरद्वाजस्य तेजसा॥ ४८॥

जो फूल देवताओंके उद्यानोंमें और जो चैत्ररथ वनमें हुआ करते हैं, वे महर्षि भरद्वाजके प्रतापसे प्रयागमें दिखायी देने लगे॥ ४८॥

बिल्वा मार्दङ्गिका आसन् शम्याग्राहा बिभीतका:।

अश्वत्था नर्तकाश्चासन् भरद्वाजस्य तेजसा॥ ४९॥

भरद्वाज मुनिके तेजसे बेलके वृक्ष मृदङ्ग बजाते, बहेड़ेके पेड़ शम्या नामक ताल देते और पीपलके वृक्ष वहाँ नृत्य करते थे॥ ४९॥

तत: सरलतालाश्च तिलका: सतमालका:।

प्रहृष्टास्तत्र सम्पेतु: कुब्जा भूत्वाथ वामना:॥ ५०॥

तदनन्तर देवदारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्षके साथ भरतकी सेवामें उपस्थित हुए॥ ५०॥

शिंशपाऽऽमलकी जम्बूर्याश्चान्या: कानने लता:।

मालती मल्लिका जातिर्याश्चान्या: कानने लता:।

प्रमदाविग्रहं कृत्वा भरद्वाजाश्रमेऽवसन्॥ ५१॥

शिंशपा, आमलकी और जम्बू आदि स्त्रीलिङ्ग वृक्ष तथा मालती, मल्लिका और जाति आदि वनकी लताएँ नारीका रूप धारण करके भरद्वाज मुनिके आश्रममें आ बसीं॥ ५१॥

सुरां सुरापा: पिबत पायसं च बुभुक्षिता:।

मांसानि च सुमेध्यानि भक्ष्यन्तां यो यदिच्छति॥ ५२॥

(वे भरतके सैनिकोंको पुकार-पुकारकर कहती थीं—) ‘मधुका पान करनेवाले लोगो! लो, यह मधु पान कर लो। तुममेंसे जिन्हें भूख लगी हो, वे सब लोग यह खीर खाओ और परम पवित्र फलोंके गूदे भी प्रस्तुत हैं, इनका आस्वादन करो। जिसकी जो इच्छा हो, वही भोजन करो’॥ ५२॥

उच्छोद्य स्नापयन्ति स्म नदीतीरेषु वल्गुषु।

अप्येकमेकं पुरुषं प्रमदा: सप्त चाष्ट च॥ ५३॥

सात-आठ तरुणी स्त्रियाँ मिलकर एक-एक पुरुषको नदीके मनोहर तटोंपर उबटन लगा-लगाकर नहलाती थीं॥

संवाहन्त्य: समापेतुर्नार्यो विपुललोचना:।

परिमृज्य तदान्योन्यं पाययन्ति वराङ्गना:॥ ५४॥

बड़े-बड़े नेत्रोंवाली सुन्दरी रमणियाँ अतिथियोंका पैर दबानेके लिये आयी थीं। वे उनके भीगे हुए अङ्गोंको वस्त्रोंसे पोंछकर शुद्ध वस्त्र धारण कराकर उन्हें स्वादिष्ट पेय (दूध आदि) पिलाती थीं॥ ५४॥

हयान् गजान् खरानुष्ट्रांस्तथैव सुरभे: सुतान्।

अभोजयन् वाहनपास्तेषां भोज्यं यथाविधि॥ ५५॥

तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न वाहनोंकी रक्षामें नियुक्त मनुष्योंने हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट और बैलोंको भलीभाँति दाना-घास आदिका भोजन कराया॥ ५५॥

इक्षूंश्च मधुलाजांश्च भोजयन्ति स्म वाहनान्।

इक्ष्वाकुवरयोधानां चोदयन्तो महाबला:॥ ५६॥

इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ योद्धाओंकी सवारीमें आनेवाले वाहनोंको वे महाबली वाहन-रक्षक (जिन्हें महर्षिने सेवाके लिये नियुक्त किया था) प्रेरणा दे-देकर गन्नेके टुकड़े और मधुमिश्रित लावे खिलाते थे॥ ५६॥

नाश्वबन्धोऽश्वमाजानान्न गजं कुञ्जरग्रह:।

मत्तप्रमत्तमुदिता सा चमूस्तत्र सम्बभौ॥ ५७॥

घोड़े बाँधनेवाले सईसको अपने घोड़ेका और हाथीवानको अपने हाथीका कुछ पता नहीं था। सारी सेना वहाँ मत्त-प्रमत्त और आनन्दमग्न प्रतीत होती थी॥ ५७॥

तर्पिता: सर्वकामैश्च रक्तचन्दनरूषिता:।

अप्सरोगणसंयुक्ता: सैन्या वाचमुदीरयन्॥ ५८॥

सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंसे तृप्त होकर लाल चन्दनसे चर्चित हुए सैनिक अप्सराओंका संयोग पाकर निम्नाङ्कित बातें कहने लगे—॥ ५८॥

नैवायोध्यां गमिष्यामो न गमिष्याम दण्डकान्।

कुशलं भरतस्यास्तु रामस्यास्तु तथा सुखम्॥ ५९॥

‘अब हम अयोध्या नहीं जायँगे, दण्डकारण्यमें भी नहीं जायँगे। भरत सकुशल रहें (जिनके कारण हमें इस भूतलपर स्वर्गका सुख मिला) तथा श्रीरामचन्द्रजी भी सुखी रहें (जिनके दर्शनके लिये आनेपर हमें इस दिव्य सुखकी प्राप्ति हुई)’॥ ५९॥

इति पादातयोधाश्च हस्त्यश्वारोहबन्धका:।

अनाथास्तं विधिं लब्ध्वा वाचमेतामुदीरयन्॥ ६०॥

इस प्रकार पैदल सैनिक तथा हाथीसवार, घुड़सवार, सईस और महावत आदि उस सत्कारको पाकर स्वच्छन्द हो उपर्युक्त बातें कहने लगे॥ ६०॥

सम्प्रहृष्टा विनेदुस्ते नरास्तत्र सहस्रश:।

भरतस्यानुयातार: स्वर्गोऽयमिति चाब्रुवन्॥ ६१॥

भरतके साथ आये हुए हजारों मनुष्य वहाँका वैभव देखकर हर्षके मारे फूले नहीं समाते थे और जोर-जोरसे कहते थे—यह स्थान स्वर्ग है॥ ६१॥

नृत्यन्तश्च हसन्तश्च गायन्तश्चैव सैनिका:।

समन्तात् परिधावन्तो माल्योपेता: सहस्रश:॥ ६२॥

सहस्रों सैनिक फूलोंके हार पहनकर नाचते, हँसते और गाते हुए सब ओर दौड़ते फिरते थे॥ ६२॥

ततो भुक्तवतां तेषां तदन्नममृतोपमम्।

दिव्यानुद्वीक्ष्य भक्ष्यांस्तानभवद् भक्षणे मति:॥ ६३॥

उस अमृतके समान स्वादिष्ट अन्नका भोजन कर चुकनेपर भी उन दिव्य भक्ष्य पदार्थोंको देखकर उन्हें पुन: भोजन करनेकी इच्छा हो जाती थी॥ ६३॥

प्रेष्याश्चेट्यश्च वध्वश्च बलस्थाश्चापि सर्वश:।

बभूवुस्ते भृशं प्रीता: सर्वे चाहतवासस:॥ ६४॥

दास-दासियाँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ और सैनिक सब- के-सब नूतन वस्त्र धारण करके सब प्रकारसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे॥ ६४॥

कुञ्जराश्च खरोष्ट्राश्च गोऽश्वाश्च मृगपक्षिण:।

बभूवु: सुभृतास्तत्र नातो ह्यन्यमकल्पयत्॥ ६५॥

हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग तथा पक्षी भी वहाँ पूर्ण तृप्त हो गये थे; अत: कोई दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करता था॥ ६५॥

नाशुक्लवासास्तत्रासीत् क्षुधितो मलिनोऽपि वा।

रजसा ध्वस्तकेशो वा नर: कश्चिददृश्यत॥ ६६॥

उस समय वहाँ कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखायी देता था, जिसके कपड़े सफेद न हों, जो भूखा या मलिन रह गया हो, अथवा जिसके केश धूलसे धूसरित हो गये हों॥ ६६॥

आजैश्चापि च वाराहैर्निष्ठानवरसंचयै:।

फलनिर्यूहसंसिद्धै: सूपैर्गन्धरसान्वितै:॥ ६७॥

पुष्पध्वजवती: पूर्णा: शुक्लस्यान्नस्य चाभित:।

ददृशुर्विस्मितास्तत्र नरा लौही: सहस्रश:॥ ६८॥

अजवाइन मिलाकर बनाये गये, वराही कन्दसे तैयार किये गये तथा आम आदि फलोंके गरम किये हुए रसमें पकाये गये उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंके संग्रहों, सुगन्धयुक्त रसवाली दालों तथा श्वेत रंगके भातोंसे भरे हुए सहस्रों सुवर्ण आदिके पात्र वहाँ सब ओर रखे हुए थे, जिन्हें फूलोंकी ध्वजाओंसे सजाया गया था। भरतके साथ आये हुए सब लोगोंने उन पात्रोंको आश्चर्यचकित होकर देखा॥ ६७-६८॥

बभूवुर्वनपार्श्वेषु कूपा: पायसकर्दमा:।

ताश्च कामदुघा गावो द्रुमाश्चासन् मधुच्युत:॥ ६९॥

वनके आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी। वहाँकी गौएँ कामधेनु (सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली) हो गयी थीं और उस दिव्य वनके वृक्ष मधुकी वर्षा करते थे॥ ६९॥

वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांसचयैर्वृता:।

प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूरकौक्कुटै:॥ ७०॥

भरतकी सेनामें आये हुए निषाद आदि निम्नवर्गके लोगोंकी तृप्तिके लिये वहाँ मधुसे भरी हुई बावडि़याँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटोंपर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गोंके स्वच्छ मांस भी ढेर-के-ढेर रख दिये गये थे॥ ७०॥

पात्रीणां च सहस्राणि स्थालीनां नियुतानि च।

न्यर्बुदानि च पात्राणि शातकुम्भमयानि च॥ ७१॥

वहाँ सहस्रों सोनेके अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जनपात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं॥ ७१॥

स्थाल्य: कुम्भ्य: करम्भ्यश्च दधिपूर्णा: सुसंस्कृता:।

यौवनस्थस्य गौरस्य कपित्थस्य सुगन्धिन:॥ ७२॥

हृदा: पूर्णा रसालस्य दध्न: श्वेतस्य चापरे।

बभूवु: पायसस्यान्ये शर्कराणां च संचया:॥ ७३॥

पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दहीसे भरे हुए थे और उनमें दहीको सुस्वादु बनानेवाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहलेके तैयार किये हुए केसरमिश्रित पीतवर्णवाले सुगन्धित तक्रके कई तालाब भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र (रसाल), सफेद दही तथा दूधके भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे। शक्करोंके कई ढेर लगे थे॥ ७२-७३॥

कल्कांश्चूर्णकषायांश्च स्नानानि विविधानि च।

ददृशुर्भाजनस्थानि तीर्थेषु सरितां नरा:॥ ७४॥

स्नान करनेवाले मनुष्योंको नदीके घाटोंपर भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथा और भी नाना प्रकारके स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे॥ ७४॥

शुक्लानंशुमतश्चापि दन्तधावनसंचयान्।

शुक्लांश्चन्दनकल्कांश्च समुद्रेष्ववतिष्ठत:॥ ७५॥

साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कूँचेवाले थे, वहाँ रखे हुए थे। सम्पुटोंमें घिसे हुए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओंको लोगोंने देखा॥ ७५॥

दर्पणान् परिमृष्टांश्च वाससां चापि संचयान्।

पादुकोपानहं चैव युग्मान्यत्र सहस्रश:॥ ७६॥

इतना ही नहीं, वहाँ बहुत-से स्वच्छ दर्पण, ढेर-के-ढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे॥ ७६॥

आञ्जनी: कङ्कतान् कूर्चांश्छत्राणि च धनूंषि च।

मर्मत्राणानि चित्राणि शयनान्यासनानि च॥ ७७॥

काजलोंसहित कजरौटे, कंघे, कूर्च (थकरी या ब्रश), छत्र, धनुष, मर्मस्थानोंकी रक्षा करनेवाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे॥ ७७॥

प्रतिपानहृदान् पूर्णान् खरोष्ट्रगजवाजिनाम्।

अवगाह्यसुतीर्थांश्च हृदान् सोत्पलपुष्करान्।

आकाशवर्णप्रतिमान् स्वच्छतोयान् सुखाप्लवान्॥ ७८॥

गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ोंके पानी पीनेके लिये कई जलाशय भरे थे, जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरनेयोग्य थे। उन जलाशयोंमें कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाशके समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था॥

नीलवैदूर्यवर्णांश्च मृदून् यवससंचयान्।

निर्वापार्थं पशूनां ते ददृशुस्तत्र सर्वश:॥ ७९॥

पशुओंके खानेके लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणिके समान रंगवाली हरी एवं कोमल घासकी ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगोंने वे सारी वस्तुएँ देखीं॥ ७९॥

व्यस्मयन्त मनुष्यास्ते स्वप्नकल्पं तदद्भुतम्।

दृष्ट्वाऽऽतिथ्यं कृतं तादृग् भरतस्य महर्षिणा॥ ८०॥

महर्षि भरद्वाजके द्वारा सेनासहित भरतका किया हुआ वह अनिर्वचनीय आतिथ्य-सत्कार अद्भुत और स्वप्नके समान था। उसे देखकर वे सब मनुष्य आश्चर्यचकित हो उठे॥ ८०॥

इत्येवं रममाणानां देवानामिव नन्दने।

भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत॥ ८१॥

जैसे देवता नन्दनवनमें विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनिके रमणीय आश्रममें यथेष्ट क्रीडा—विहार करते हुए उन लोगोंकी वह रात्रि बड़े सुखसे बीती॥

प्रतिजग्मुश्च ता नद्यो गन्धर्वाश्च यथागतम्।

भरद्वाजमनुज्ञाप्य ताश्च सर्वा वराङ्गना:॥ ८२॥

तत्पश्चात् वे नदियाँ, गन्धर्व और समस्त सुन्दरी अप्सराएँ भरद्वाजजीकी आज्ञा ले जैसे आयी थीं, उसी प्रकार लौट गयीं॥ ८२॥

तथैव मत्ता मदिरोत्कटा नरा-

स्तथैव दिव्यागुरुचन्दनोक्षिता:।

तथैव दिव्या विविधा: स्रगुत्तमा:

पृथग्विकीर्णा मनुजै: प्रमर्दिता:॥ ८३॥

सबेरा हो जानेपर भी लोग उसी प्रकार मधुपानसे मत्त एवं उन्मत्त दिखायी देते थे। उनके अङ्गोंपर दिव्य अगुरुयुक्त चन्दनका लेप ज्यों-का-त्यों दृष्टिगोचर हो रहा था। मनुष्योंके उपभोगमें लाये गये नाना प्रकारके दिव्य उत्तम पुष्पहार भी उसी अवस्थामें पृथक्-पृथक् बिखरे पड़े थे॥ ८३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकनवतितम: सर्ग:॥ ९१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९१॥

 


द्विनवतितम: सर्ग:

भरतका भरद्वाज मुनिसे जानेकी आज्ञा लेते हुए श्रीरामके आश्रमपर जानेका मार्ग जानना और मुनिको अपनी माताओंका परिचय देकर वहाँसे चित्रकूटके लिये सेनासहित प्रस्थान करना

ततस्तां रजनीं व्युष्य भरत: सपरिच्छद:।

कृतातिथ्यो भरद्वाजं कामादभिजगाम ह॥ १॥

परिवारसहित भरत इच्छानुसार मुनिका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर आश्रममें ही रहे। फिर सबेरे जानेकी आज्ञा लेनेके लिये वे महर्षि भरद्वाजके पास गये॥ १॥

तमृषि: पुरुषव्याघ्रं प्रेक्ष्य प्राञ्जलिमागतम्।

हुताग्निहोत्रो भरतं भरद्वाजोऽभ्यभाषत॥ २॥

पुरुषसिंह भरतको हाथ जोड़े अपने पास आया देख भरद्वाजजी अग्निहोत्रका कार्य करके उनसे बोले—॥ २॥

कच्चिदत्र सुखा रात्रिस्तवास्मद्विषये गता।

समग्रस्ते जन: कच्चिदातिथ्ये शंस मेऽनघ॥ ३॥

‘निष्पाप भरत! क्या हमारे इस आश्रममें तुम्हारी यह रात सुखसे बीती है? क्या तुम्हारे साथ आये हुए सब लोग इस आतिथ्यसे संतुष्ट हुए हैं? यह बताओ’॥

तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा भरतोऽभिप्रणम्य च।

आश्रमादुपनिष्क्रान्तमृषिमुत्तमतेजसम् ॥ ४॥

तब भरतने आश्रमसे बाहर निकले हुए उन उत्तम तेजस्वी महर्षिको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर कहा—॥ ४॥

सुखोषितोऽस्मि भगवन् समग्रबलवाहन:।

बलवत्तर्पितश्चाहं बलवान् भगवंस्त्वया॥ ५॥

‘भगवन्! मैं सम्पूर्ण सेना और सवारीके साथ यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ तथा सैनिकोंसहित मुझे पूर्णरूपसे तृप्त किया गया है॥ ५॥

अपेतक्लमसंतापा: सुभिक्षा: सुप्रतिश्रया:।

अपि प्रेष्यानुपादाय सर्वे स्म सुसुखोषिता:॥ ६॥

‘सेवकोंसहित हम सब लोग ग्लानि और संतापसे रहित हो उत्तम अन्न-पान ग्रहण करके सुन्दर गृहोंका आश्रय ले बड़े सुखसे यहाँ रातभर रहे हैं॥ ६॥

आमन्त्रयेऽहं भगवन् कामं त्वामृषिसत्तम।

समीपं प्रस्थितं भ्रातुर्मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥ ७॥

‘भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अपनी इच्छाके अनुसार आपसे आज्ञा लेने आया हूँ और अपने भाईके समीप प्रस्थान कर रहा हूँ; आप मुझे स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखिये॥

आश्रमं तस्य धर्मज्ञ धार्मिकस्य महात्मन:।

आचक्ष्व कतमो मार्ग: कियानिति च शंस मे॥ ८॥

‘धर्मज्ञ मुनीश्वर! बताइये, धर्मपरायण महात्मा श्रीरामका आश्रम कहाँ है? कितनी दूर है? और वहाँ पहुँचनेके लिये कौन-सा मार्ग है? इसका भी मुझसे स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये’॥ ८॥

इति पृष्टस्तु भरतं भ्रातुर्दर्शनलालसम्।

प्रत्युवाच महातेजा भरद्वाजो महातपा:॥ ९॥

इस प्रकार पूछे जानेपर महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनिने भाईके दर्शनकी लालसावाले भरतको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ९॥

भरतार्धतृतीयेषु योजनेष्वजने वने।

चित्रकूटगिरिस्तत्र रम्यनिर्झरकानन:॥ १०॥

‘भरत! यहाँसे ढाई योजन (दस कोस)63 की दूरीपर एक निर्जन वनमें चित्रकूट नामक पर्वत है, जहाँके झरने और वन बड़े ही रमणीय हैं (प्रयागसे चित्रकूटकी आधुनिक दूरी लगभग २८ कोस है)॥ १०॥

उत्तरं पार्श्वमासाद्य तस्य मन्दाकिनी नदी।

पुष्पितद्रुमसंछन्ना रम्यपुष्पितकानना॥ ११॥

अनन्तरं तत्सरितश्चित्रकूटं च पर्वतम्।

तयो: पर्णकुटीं तात तत्र तौ वसतो ध्रुवम्॥ १२॥

‘उसके उत्तरी किनारेसे मन्दाकिनी नदी बहती है, जो फूलोंसे लदे सघन वृक्षोंसे आच्छादित रहती है, उसके आस-पासका वन बड़ा ही रमणीय और नाना प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। उस नदीके उस पार चित्रकूट पर्वत है। तात! वहाँ पहुँचकर तुम नदी और पर्वतके बीचमें श्रीरामकी पर्णकुटी देखोगे। वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसीमें निवास करते हैं॥ ११-१२॥

दक्षिणेन च मार्गेण सव्यदक्षिणमेव च।

गजवाजिसमाकीर्णां वाहिनीं वाहिनीपते॥ १३॥

वाहयस्व महाभाग ततो द्रक्ष्यसि राघवम्।

‘सेनापते! तुम यहाँसे हाथी-घोड़ोंसे भरी हुई अपनी सेना लेकर पहले यमुनाके दक्षिणी किनारेसे जो मार्ग गया है, उससे जाओ। आगे जाकर दो रास्ते मिलेंगे, उनमेंसे जो रास्ता बायें दाबकर दक्षिण दिशाकी ओर गया है, उसीसे सेनाको ले जाना। महाभाग! उस मार्गसे चलकर तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन पा जाओगे’॥

प्रयाणमिति च श्रुत्वा राजराजस्य योषित:॥ १४॥

हित्वा यानानि यानार्हा ब्राह्मणं पर्यवारयन्।

‘अब यहाँसे प्रस्थान करना है’—यह सुनकर महाराज दशरथकी स्त्रियाँ, जो सवारीपर ही रहने योग्य थीं, सवारियोंको छोड़कर ब्रह्मर्षि भरद्वाजको प्रणाम करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥

वेपमाना कृशा दीना सह देव्या सुमित्रया॥ १५॥

कौसल्या तत्र जग्राह कराभ्यां चरणौ मुने:।

उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दीन हुई देवी कौसल्याने, जो काँप रही थीं, सुमित्रा देवीके साथ अपने दोनों हाथोंसे भरद्वाज मुनिके पैर पकड़ लिये॥

असमृद्धेन कामेन सर्वलोकस्य गर्हिता॥ १६॥

कैकेयी तत्र जग्राह चरणौ सव्यपत्रपा।

तं प्रदक्षिणमागम्य भगवन्तं महामुनिम्॥ १७॥

अदूराद् भरतस्यैव तस्थौ दीनमनास्तदा।

तत्पश्चात् जो अपनी असफल कामनाके कारण सब लोगोंके लिये निन्दित हो गयी थी, उस कैकेयीने लज्जित होकर वहाँ मुनिके चरणोंका स्पर्श किया और उन महामुनि भगवान् भरद्वाजकी परिक्रमा करके वह दीनचित्त हो उस समय भरतके ही पास आकर खड़ी हो गयी॥ १६-१७/

तत्र पप्रच्छ भरतं भरद्वाजो महामुनि:॥ १८॥

विशेषं ज्ञातुमिच्छामि मातृणां तव राघव।

तब महामुनि भरद्वाजने वहाँ भरतसे पूछा—‘रघुनन्दन! तुम्हारी इन माताओंका विशेष परिचय क्या है? यह मैं जानना चाहता हूँ’॥ १८/

एवमुक्तस्तु भरतो भरद्वाजेन धार्मिक:॥ १९॥

उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यं वचनकोविद:।

भरद्वाजके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेकी कलामें कुशल धर्मात्मा भरतने हाथ जोड़कर कहा—॥ १९/

यामिमां भगवन् दीनां शोकानशनकर्शिताम्॥ २०॥

पितुर्हि महिषीं देवीं देवतामिव पश्यसि।

एषां तं पुरुषव्याघ्रं सिंहविक्रान्तगामिनम्॥ २१॥

कौसल्या सुषुवे रामं धातारमदितिर्यथा।

‘भगवन्! आप जिन्हें शोक और उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दु:खी देख रहे हैं, जो देवी-सी दृष्टिगोचर हो रही हैं’ ये मेरे पिताकी सबसे बड़ी महारानी कौसल्या हैं। जैसे अदितिने धाता नामक आदित्यको उत्पन्न किया था, उसी प्रकार इन कौसल्या देवीने सिंहके समान पराक्रमसूचक गतिसे चलनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामको जन्म दिया है॥ २०-२१/

अस्या वामभुजं श्लिष्टा या सा तिष्ठति दुर्मना:॥ २२॥

इयं सुमित्रा दु:खार्ता देवी राज्ञश्च मध्यमा।

कर्णिकारस्य शाखेव शीर्णपुष्पा वनान्तरे॥ २३॥

एतस्यास्तौ सुतौ देव्या: कुमारौ देववर्णिनौ।

उभौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ वीरौ सत्यपराक्रमौ॥ २४॥

‘इनकी बायीं बाँहसे सटकर जो उदास मनसे खड़ी हैं तथा दु:खसे आतुर हो रही हैं और आभूषणशून्य होनेसे वनके भीतर झड़े हुए पुष्पवाले कनेरकी डालके समान दिखायी देती हैं, ये महाराजकी मझली रानी देवी सुमित्रा हैं। सत्यपराक्रमी वीर तथा देवताओंके तुल्य कान्तिमान् वे दोनों भाई राजकुमार लक्ष्मण और शत्रुघ्न इन्हीं सुमित्रा देवीके पुत्र हैं॥ २२—२४॥

यस्या: कृते नरव्याघ्रौ जीवनाशमितो गतौ।

राजा पुत्रविहीनश्च स्वर्गं दशरथो गत:॥ २५॥

क्रोधनामकृतप्रज्ञां दृप्तां सुभगमानिनीम्।

ऐश्वर्यकामां कैकेयीमनार्यामार्यरूपिणीम्॥ २६॥

ममैतां मातरं विद्धि नृशंसां पापनिश्चयाम्।

यतोमूलं हि पश्यामि व्यसनं महदात्मन:॥ २७॥

‘और जिसके कारण पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण यहाँसे प्राण-सङ्कटकी अवस्था (वनवास) में जा पहुँचे हैं तथा राजा दशरथ पुत्रवियोगका कष्ट पाकर स्वर्गवासी हुए हैं, जो स्वभावसे ही क्रोध करनेवाली, अशिक्षित बुद्धिवाली, गर्वीली, अपने-आपको सबसे अधिक सुन्दरी और भाग्यवती समझनेवाली तथा राज्यका लोभ रखनेवाली है, जो शक्ल-सूरतसे आर्या होनेपर भी वास्तवमें अनार्या है, इस कैकेयीको मेरी माता समझिये। यह बड़ी ही क्रूर और पापपूर्ण विचार रखनेवाली है। मैं अपने ऊपर जो महान् संकट आया हुआ देख रहा हूँ, इसका मूल कारण यही है’॥ २५—२७॥

इत्युक्त्वा नरशार्दूलो बाष्पगद्गदया गिरा।

विनि:श्वस्य स ताम्राक्ष: क्रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २८॥

अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहकर लाल आँखें किये पुरुषसिंह भरत रोषसे भरकर फुफकारते हुए सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे॥ २८॥

भरद्वाजो महर्षिस्तं ब्रुवन्तं भरतं तदा।

प्रत्युवाच महाबुद्धिरिदं वचनमर्थवित्॥ २९॥

उस समय ऐसी बातें कहते हुए भरतसे श्रीरामावतारके प्रयोजनको जाननेवाले महाबुद्धिमान् महर्षि भरद्वाजने उनसे यह बात कही—॥ २९॥

न दोषेणावगन्तव्या कैकेयी भरत त्वया।

रामप्रव्राजनं ह्येतत् सुखोदर्कं भविष्यति॥ ३०॥

‘भरत! तुम कैकेयीके प्रति दोष-दृष्टि न करो। श्रीरामका यह वनवास भविष्यमें बड़ा ही सुखद होगा॥

देवानां दानवानां च ऋषीणां भावितात्मनाम्।

हितमेव भविष्यद्धि रामप्रव्राजनादिह॥ ३१॥

‘श्रीरामके वनमें जानेसे देवताओं, दानवों तथा परमात्माका चिन्तन करनेवाले महर्षियोंका इस जगत्में हित ही होनेवाला है’॥ ३१॥

अभिवाद्य तु संसिद्ध: कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्।

आमन्त्र्य भरत: सैन्यं युज्यतामिति चाब्रवीत्॥ ३२॥

श्रीरामका पता जानकर और मुनिका आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य हुए भरतने मुनिको मस्तक झुका उनकी प्रदक्षिणा करके जानेकी आज्ञा ले सेनाको कूचके लिये तैयार होनेका आदेश दिया॥ ३२॥

ततो वाजिरथान् युक्त्वा दिव्यान् हेमविभूषितान्।

अध्यारोहत् प्रयाणार्थं बहून् बहुविधो जन:॥ ३३॥

तदनन्तर अनेक प्रकारकी वेश-भूषावाले लोग बहुत-से दिव्य घोड़ों और दिव्य रथोंको, जो सुवर्णसे विभूषित थे, जोतकर यात्राके लिये उनपर सवार हुए॥

गजकन्या गजाश्चैव हेमकक्ष्या: पताकिन:।

जीमूता इव घर्मान्ते सघोषा: सम्प्रतस्थिरे॥ ३४॥

बहुत-सी हथिनियाँ और हाथी, जो सुनहरे रस्सोंसे कसे गये थे और जिनके ऊपर पताकाएँ फहरा रही थीं, वर्षा-कालके गरजते हुए मेघोंके समान घण्टानाद करते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ३४॥

विविधान्यपि यानानि महान्ति च लघूनि च।

प्रययु: सुमहार्हाणि पादैरपि पदातय:॥ ३५॥

नाना प्रकारके छोटे-बड़े बहुमूल्य वाहनोंपर सवार हो उनके अधिकारी चले और पैदल सैनिक अपने पैरोंसे ही यात्रा करने लगे॥ ३५॥

अथ यानप्रवेकैस्तु कौसल्याप्रमुखा: स्त्रिय:।

रामदर्शनकांक्षिण्य: प्रययुर्मुदितास्तदा॥ ३६॥

तत्पश्चात् कौसल्या आदि रानियाँ उत्तम सवारियोंपर बैठकर श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी अभिलाषासे प्रसन्नतापूर्वक चलीं॥ ३६॥

चन्द्रार्कतरुणाभासां नियुक्तां शिबिकां शुभाम्।

आस्थाय प्रययौ श्रीमान् भरत: सपरिच्छद:॥ ३७॥

इसी प्रकार श्रीमान् भरत नवोदित चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिमती शिविकामें बैठकर आवश्यक सामग्रियोंके साथ प्रस्थित हुए। उस शिविकाको कहाँरोंने अपने कंधोंपर उठा रखा था॥ ३७॥

सा प्रयाता महासेना गजवाजिसमाकुला।

दक्षिणां दिशमावृत्य महामेघ इवोत्थित:॥ ३८॥

हाथी-घोड़ोंसे भरी हुई वह विशाल वाहिनी दक्षिण दिशाको घेरकर उमड़ी हुई महामेघोंकी घटाके समान चल पड़ी॥ ३८॥

वनानि च व्यतिक्रम्य जुष्टानि मृगपक्षिभि:।

गङ्गाया: परवेलायां गिरिष्वथ नदीष्वपि॥ ३९॥

गङ्गाके उस पार पर्वतों तथा नदियोंके निकटवर्ती वनोंको, जो मृगों और पक्षियोंसे सेवित थे, लाँघकर वह आगे बढ़ गयी॥ ३९॥

सा सम्प्रहृष्टद्विपवाजियूथा

वित्रासयन्ती मृगपक्षिसंघान्।

महद्वनं तत् प्रविगाहमाना

रराज सेना भरतस्य तत्र॥ ४०॥

उस सेनाके हाथी और घोड़ोंके समुदाय बड़े प्रसन्न थे। जंगलके मृगों और पक्षिसमूहोंको भयभीत करती हुई भरतकी वह सेना उस विशाल वनमें प्रवेश करके वहाँ बड़ी शोभा पा रही थी॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विनवतितम: सर्ग:॥ ९२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९२॥

 

त्रिनवतितम: सर्ग:

सेनासहित भरतकी चित्रकूट-यात्राका वर्णन

तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिन:।

अर्दिता यूथपा मत्ता: सयूथा: सम्प्रदुद्रुवु:॥ १॥

यात्रा करनेवाली उस विशाल वाहिनीसे पीडि़त हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथोंके साथ भाग चले॥ १॥

ऋक्षा: पृषतमुख्याश्च रुरवश्च समन्तत:।

दृश्यन्ते वनवाटेषु गिरिष्वपि नदीषु च॥ २॥

रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वनप्रदेशोंमें, पर्वतोंमें और नदियोंके तटोंपर चारों ओर उस सेनासे पीडि़त दिखायी देते थे॥ २॥

स सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मज:।

वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया॥ ३॥

महान् कोलाहल करनेवाली उस विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नताके साथ यात्रा कर रहे थे॥ ३॥

सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मन:।

महीं संछादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुद:॥ ४॥

जैसे वर्षा-ऋतुमें मेघोंकी घटा आकाशको ढक लेती है, उसी प्रकार महात्मा भरतकी समुद्र-जैसी उस विशाल सेनाने दूरतकके भूभागको आच्छादित कर लिया था॥

तुरंगौघैरवतता वारणैश्च महाबलै:।

अनालक्ष्या चिरं कालं तस्मिन् काले बभूव सा॥ ५॥

घोड़ोंके समूहों तथा महाबली हाथियोंसे भरी और दूरतक फैली हुई वह सेना उस समय बहुत देरतक दृष्टिमें ही नहीं आती थी॥ ५॥

स गत्वा दूरमध्वानं सम्परिश्रान्तवाहन:।

उवाच वचनं श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम्॥ ६॥

दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर जब भरतकी सवारियाँ बहुत थक गयीं, तब श्रीमान् भरतने मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीसे कहा—॥ ६॥

यादृशं लक्ष्यते रूपं यथा चैव मया श्रुतम्।

व्यक्तं प्राप्ता: स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्॥ ७॥

‘ब्रह्मन्! मैंने जैसा सुन रखा था और जैसा इस देशका स्वरूप दिखायी देता है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि भरद्वाजजीने जहाँ पहुँचनेका आदेश दिया था, उस देशमें हमलोग आ पहुँचे हैं॥ ७॥

अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा मन्दाकिनी नदी।

एतत् प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभं वनम्॥ ८॥

‘जान पड़ता है यही चित्रकूट पर्वत है तथा वह मन्दाकिनी नदी बह रही है। यह पर्वतके आस-पासका वन दूरसे नील मेघके समान प्रकाशित हो रहा है॥ ८॥

गिरे: सानूनि रम्याणि चित्रकूटस्य सम्प्रति।

वारणैरवमृद्यन्ते मामकै: पर्वतोपमै:॥ ९॥

‘इस समय मेरे पर्वताकार हाथी चित्रकूटके रमणीय शिखरोंका अवमर्दन कर रहे हैं॥ ९॥

मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगा: पर्वतसानुषु।

नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घना:॥ १०॥

‘ये वृक्ष पर्वतशिखरोंपर उसी प्रकार फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षाकालमें नील जलधर मेघ उनपर जलकी वृष्टि करते हैं’॥ १०॥

किंनराचरितं देशं पश्य शत्रुघ्न पर्वते।

हयै: समन्तादाकीर्णं मकरैरिव सागरम्॥ ११॥

(इसके बाद भरत शत्रुघ्नसे कहने लगे—) ‘शत्रुघ्न! देखो, इस पर्वतकी उपत्यकामें जो देश है, जहाँपर किन्नर विचरा करते हैं, वही प्रदेश हमारी सेनाके घोड़ोंसे व्याप्त होकर मगरोंसे भरे हुए समुद्रके समान प्रतीत होता है॥

एते मृगगणा भान्ति शीघ्रवेगा: प्रचोदिता:।

वायुप्रविद्धा: शरदि मेघजाला इवाम्बरे॥ १२॥

‘सैनिकोंके खदेड़े हुए ये मृगोंके झुंड तीव्र वेगसे भागते हुए वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे शरत्-कालके आकाशमें हवासे उड़ाये गये बादलोंके समूह सुशोभित होते हैं॥ १२॥

कुर्वन्ति कुसुमापीडान् शिर:सु सुरभीनमी।

मेघप्रकाशै: फलकैर्दाक्षिणात्या नरा यथा॥ १३॥

‘ये सैनिक अथवा वृक्ष मेघके समान कान्तिवाली ढालोंसे उपलक्षित होनेवाले दक्षिण भारतीय मनुष्योंके समान अपने मस्तकों अथवा शाखाओंपर सुगन्धित पुष्प गुच्छमय आभूषणोंको धारण करते हैं॥ १३॥

निष्कूजमिव भूत्वेदं वनं घोरप्रदर्शनम्।

अयोध्येव जनाकीर्णा सम्प्रति प्रतिभाति मे॥ १४॥

‘यह वन जो पहले जनरव-शून्य होनेके कारण अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था, वही इस समय हमारे साथ आये हुए लोगोंसे व्याप्त होनेके कारण मुझे अयोध्यापुरीके समान प्रतीत होता है॥ १४॥

खुरैरुदीरितो रेणुर्दिवं प्रच्छाद्य तिष्ठति।

तं वहत्यनिल: शीघ्रं कुर्वन्निव मम प्रियम्॥ १५॥

‘घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई धूल आकाशको आच्छादित करके स्थित होती है, परंतु उसे हवा मेरा प्रिय करती हुई-सी शीघ्र ही अन्यत्र उड़ा ले जाती है॥

स्यन्दनांस्तुरगोपेतान् सूतमुख्यैरधिष्ठितान्।

एतान् सम्पतत: शीघ्रं पश्य शत्रुघ्न कानने॥ १६॥

‘शत्रुघ्न! देखो, इस वनमें घोड़ोंसे जुते हुए और श्रेष्ठ सारथियोंद्वारा संचालित हुए ये रथ कितनी शीघ्रतासे आगे बढ़ रहे हैं॥ १६॥

एतान् वित्रासितान् पश्य बर्हिण: प्रियदर्शनान्।

एवमापतत: शैलमधिवासं पतत्त्रिण:॥ १७॥

‘जो देखनेमें बड़े प्यारे लगते हैं उन मोरोंको तो देखो। ये हमारे सैनिकोंके भयसे कितने डरे हुए हैं। इसी प्रकार अपने आवास-स्थान पर्वतकी ओर उड़ते हुए अन्य पक्षियोंपर भी दृष्टिपात करो॥ १७॥

अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञ: प्रतिभाति मे।

तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथोऽनघ॥ १८॥

‘निष्पाप शत्रुघ्न! यह देश मुझे बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता है। तपस्वी जनोंका यह निवासस्थान वास्तवमें स्वर्गीय पथ है॥ १८॥

मृगा मृगीभि: सहिता बहव: पृषता वने।

मनोज्ञरूपा लक्ष्यन्ते कुसुमैरिव चित्रिता:॥ १९॥

‘इस वनमें मृगियोंके साथ विचरनेवाले बहुत-से चितकबरे मृग ऐसे मनोहर दिखायी देते हैं, मानो इन्हें फूलोंसे चित्रित—सुसज्जित किया गया हो॥ १९॥

साधु सैन्या: प्रतिष्ठन्तां विचिन्वन्तु च काननम्।

यथा तौ पुरुषव्याघ्रौ दृश्येते रामलक्ष्मणौ॥ २०॥

‘मेरे सैनिक यथोचित रूपसे आगे बढ़ें और वनमें सब ओर खोजें, जिससे उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणका पता लग जाय’॥ २०॥

भरतस्य वच: श्रुत्वा पुरुषा: शस्त्रपाणय:।

विविशुस्तद्वनं शूरा धूमाग्रं ददृशुस्तत:॥ २१॥

भरतका यह वचन सुनकर बहुत-से शूरवीर पुरुषोंने हाथोंमें हथियार लेकर उस वनमें प्रवेश किया। तदनन्तर आगे जानेपर उन्हें कुछ दूरपर ऊपरको धुआँ उठता दिखायी दिया॥ २१॥

ते समालोक्य धूमाग्रमूचुर्भरतमागता:।

नामनुष्ये भवत्यग्निर्व्यक्तमत्रैव राघवौ॥ २२॥

उस धूमशिखाको देखकर वे लौट आये और भरतसे बोले—‘प्रभो! जहाँ कोई मनुष्य नहीं होता, वहाँ आग नहीं होती। अत: श्रीराम और लक्ष्मण अवश्य यहीं होंगे॥

अथ नात्र नरव्याघ्रौ राजपुत्रौ परंतपौ।

अन्ये रामोपमा: सन्ति व्यक्तमत्र तपस्विन:॥ २३॥

‘यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ न हों तो भी श्रीराम-जैसे तेजस्वी दूसरे कोई तपस्वी तो अवश्य ही होंगे’॥ २३॥

तच्छ्रुत्वा भरतस्तेषां वचनं साधुसम्मतम्।

सैन्यानुवाच सर्वांस्तानमित्रबलमर्दन:॥ २४॥

उनकी बातें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा मानने योग्य थीं, उन्हें सुनकर शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले भरतने उन समस्त सैनिकोंसे कहा—॥ २४॥

यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रत:।

अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो धृतिरेव च॥ २५॥

‘तुम सब लोग सावधान होकर यहीं ठहरो! यहाँसे आगे न जाना। अब मैं ही वहाँ जाऊँगा। मेरे साथ सुमन्त्र और धृति भी रहेंगे’॥ २५॥

एवमुक्तास्तत: सैन्यास्तत्र तस्थु: समन्तत:।

भरतो यत्र धूमाग्रं तत्र दृष्टिं समादधत्॥ २६॥

उनकी ऐसी आज्ञा पाकर समस्त सैनिक वहीं सब ओर फैलकर खड़े हो गये और भरतने जहाँ धुआँ उठ रहा था, उस ओर अपनी दृष्टि स्थिर की॥ २६॥

व्यवस्थिता या भरतेन सा चमू-

र्निरीक्षमाणापि च भूमिमग्रत:।

बभूव हृष्टा नचिरेण जानती

प्रियस्य रामस्य समागमं तदा॥ २७॥

भरतके द्वारा वहाँ ठहरायी गयी वह सेना आगेकी भूमिका निरीक्षण करती हुई भी वहाँ हर्षपूर्वक खड़ी रही; क्योंकि उस समय उसे मालूम हो गया था कि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीसे मिलनेका अवसर आनेवाला है॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिनवतितम: सर्ग:॥ ९३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३॥

 

चतुर्नवतितम: सर्ग:

श्रीरामका सीताको चित्रकूटकी शोभा दिखाना

दीर्घकालोषितस्तस्मिन् गिरौ गिरिवरप्रिय:।

वैदेह्या: प्रियमाकांक्षन् स्वं च चित्तं विलोभयन्॥ १॥

अथ दाशरथिश्चित्रं चित्रकूटमदर्शयत्।

भार्याममरसंकाश: शचीमिव पुरंदर:॥ २॥

गिरिवर चित्रकूट श्रीरामको बहुत ही प्रिय लगता था। वे उस पर्वतपर बहुत दिनोंसे रह रहे थे। एक दिन अमरतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम विदेहराजकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे तथा अपने मनको भी बहलानेके लिये अपनी भार्याको विचित्र चित्रकूटकी शोभाका दर्शन कराने लगे, मानो देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शचीको पर्वतीय सुषमाका दर्शन करा रहे हों॥

न राज्यभ्रंशनं भद्रे न सुहृद्भिर्विनाभव:।

मनो मे बाधते दृष्ट्वा रमणीयमिमं गिरिम्॥ ३॥

(वे बोले—) ‘भद्रे! यद्यपि मैं राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ तथा मुझे अपने हितैषी सुहृदोंसे विलग होकर रहना पड़ता है, तथापि जब मैं इस रमणीय पर्वतकी ओर देखता हूँ, तब मेरा सारा दु:ख दूर हो जाता है—राज्यका न मिलना और सुहृदोंका विछोह होना भी मेरे मनको व्यथित नहीं कर पाता है॥ ३॥

पश्येममचलं भद्रे नानाद्विजगणायुतम्।

शिखरै: खमिवोद्विद्धैर्धातुमद्भिर्विभूषितम्॥ ४॥

‘कल्याणि! इस पर्वतपर दृष्टिपात तो करो, नाना प्रकारके असंख्य पक्षी यहाँ कलरव कर रहे हैं। नाना प्रकारके धातुओंसे मण्डित इसके गगन-चुम्बी शिखर मानो आकाशको बेध रहे हैं। इन शिखरोंसे विभूषित हुआ यह चित्रकूट कैसी शोभा पा रहा है!॥ ४॥

केचिद् रजतसंकाशा: केचित् क्षतजसंनिभा:।

पीतमाञ्जिष्ठवर्णाश्च केचिन्मणिवरप्रभा:॥ ५॥

पुष्पार्ककेतकाभाश्च केचिज्ज्योतीरसप्रभा:।

विराजन्तेऽचलेन्द्रस्य देशा धातुविभूषिता:॥ ६॥

‘विभिन्न धातुओंसे अलंकृत अचलराज चित्रकूटके प्रदेश कितने सुन्दर लगते हैं! इनमेंसे कोई तो चाँदीके समान चमक रहे हैं। कोई लोहूकी लाल आभाका विस्तार करते हैं। किन्हीं प्रदेशोंके रंग पीले और मंजिष्ठ वर्णके हैं। कोई श्रेष्ठ मणियोंके समान उद्भासित होते हैं। कोई पुखराजके समान, कोई स्फटिकके सदृश और कोई केवड़ेके फूलके समान कान्तिवाले हैं तथा कुछ प्रदेश नक्षत्रों और पारेके समान प्रकाशित होते हैं॥ ५-६॥

नानामृगगणैर्द्वीपितरक्ष्वृक्षगणैर्वृत: ।

अदुष्टैर्भात्ययं शैलो बहुपक्षिसमाकुल:॥ ७॥

‘यह पर्वत बहुसंख्यक पक्षियोंसे व्याप्त है तथा नाना प्रकारके मृगों, बड़े-बड़े व्याघ्रों, चीतों और रीछोंसे भरा हुआ है। वे व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु अपने दुष्टभावका परित्याग करके यहाँ रहते हैं और इस पर्वतकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ७॥

आम्रजम्ब्वसनैर्लोध्रै: प्रियालै: पनसैर्धवै:।

अङ्कोलैर्भव्यतिनिशैर्बिल्वतिन्दुकवेणुभि: ॥ ८ ॥

काश्मर्यारिष्टवरणैर्मधूकैस्तिलकैरपि ।

बदर्यामलकैर्नीपैर्वेत्रधन्वनबीजकै: ॥ ९ ॥

पुष्पवद्भि: फलोपेतैश्छायावद्भिर्मनोरमै:।

एवमादिभिराकीर्ण: श्रियं पुष्यत्ययं गिरि:॥ १०॥

‘आम, जामुन, असन, लोध, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल, भव्य, तिनिश, बेल, तिन्दुक, बाँस, काश्मरी (मधुपर्णिका), अरिष्ट (नीम), वरण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेत, धन्वन (इन्द्रजौ), बीजक (अनार) आदि घनी छायावाले वृक्षोंसे, जो फूलों और फलोंसे लदे होनेके कारण मनोरम प्रतीत होते थे, व्याप्त हुआ यह पर्वत अनुपम शोभाका पोषण एवं विस्तार कर रहा है॥ ८—१०॥

शैलप्रस्थेषु रम्येषु पश्येमान् कामहर्षणान्।

किंनरान् द्वन्द्वशो भद्रे रममाणान् मनस्विन:॥ ११॥

‘इन रमणीय शैलशिखरोंपर उन प्रदेशोंको देखो, जो प्रेम-मिलनकी भावनाका उद्दीपन करके आन्तरिक हर्षको बढ़ानेवाले हैं। वहाँ मनस्वी किन्नर दो-दो एक साथ होकर टहल रहे हैं॥ ११॥

शाखावसक्तान् खड्गांश्च प्रवराण्यम्बराणि च।

पश्य विद्याधरस्त्रीणां क्रीडोद्देशान् मनोरमान्॥ १२॥

‘इन किन्नरोंके खड्ग पेड़ोंकी डालियोंमें लटक रहे हैं। इधर विद्याधरोंकी स्त्रियोंके मनोरम क्रीड़ास्थलों तथा वृक्षोंकी शाखाओंपर रखे हुए उनके सुन्दर वस्त्रोंकी ओर भी देखो॥ १२॥

जलप्रपातैरुद्भेदैर्निष्पन्दैश्च क्वचित् क्वचित्।

स्रवद्भिर्भात्ययं शैल: स्रवन्मद इव द्विप:॥ १३॥

‘इसके ऊपर कहीं ऊँचेसे झरने गिर रहे हैं, कहीं जमीनके भीतरसे सोते निकले हैं और कहीं-कहीं छोटे-छोटे स्रोत प्रवाहित हो रहे हैं। इन सबके द्वारा यह पर्वत मदकी धारा बहानेवाले हाथीके समान शोभा पाता है॥ १३॥

गुहासमीरणो गन्धान् नानापुष्पभवान् बहून्।

घ्राणतर्पणमभ्येत्य कं नरं न प्रहर्षयेत्॥ १४॥

‘गुफाओंसे निकली हुई वायु नाना प्रकारके पुष्पोंकी प्रचुर गन्ध लेकर नासिकाको तृप्त करती हुई किस पुरुषके पास आकर उसका हर्ष नहीं बढ़ा रही है॥ १४॥

यदीह शरदोऽनेकास्त्वया सार्धमनिन्दिते।

लक्ष्मणेन च वत्स्यामि न मां शोक: प्रधर्षति॥ १५॥

‘सती-साध्वी सीते! यदि तुम्हारे और लक्ष्मणके साथ मैं यहाँ अनेक वर्षोंतक रहूँ तो भी नगरत्यागका शोक मुझे कदापि पीडि़त नहीं करेगा॥ १५॥

बहुपुष्पफले रम्ये नानाद्विजगणायुते।

विचित्रशिखरे ह्यस्मिन् रतवानस्मि भामिनि॥ १६॥

‘भामिनि! बहुतेरे फूलों और फलोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे सेवित इस विचित्र शिखरवाले रमणीय पर्वतपर मेरा मन बहुत लगता है॥ १६॥

अनेन वनवासेन मम प्राप्तं फलद्वयम्।

पितुश्चानृण्यता धर्मे भरतस्य प्रियं तथा॥ १७॥

‘प्रिये! इस वनवाससे मुझे दो फल प्राप्त हुए हैं—दो लाभ हुए हैं—एक तो धर्मानुसार पिताकी आज्ञाका पालनरूप ऋण चुक गया और दूसरा भाई भरतका प्रिय हुआ॥ १७॥

वैदेहि रमसे कच्चिच्चित्रकूटे मया सह।

पश्यन्ती विविधान् भावान् मनोवाक्कायसम्मतान्॥ १८॥

‘विदेहकुमारी! क्या चित्रकूट पर्वतपर मेरे साथ मन, वाणी और शरीरको प्रिय लगनेवाले भाँति-भाँतिके पदार्थोंको देखकर तुम्हें आनन्द प्राप्त होता है?॥ १८॥

इदमेवामृतं प्राहू राज्ञि राजर्षय: परे।

वनवासं भवार्थाय प्रेत्य मे प्रपितामहा:॥ १९॥

‘रानी! मेरे प्रपितामह मनु आदि उत्कृष्ट राजर्षियोंने नियमपूर्वक किये गये इन वनवासको ही अमृत बतलाया है; इससे शरीरत्यागके पश्चात् परम कल्याणकी प्राप्ति होती है॥ १९॥

शिला: शैलस्य शोभन्ते विशाला: शतशोऽभित:।

बहुला बहुलैर्वर्णैर्नीलपीतसितारुणै:॥ २०॥

‘चारों ओर इस पर्वतकी सैकड़ों विशाल शिलाएँ शोभा पा रही हैं, जो नीले, पीले, सफेद और लाल आदि विविध रंगोंसे अनेक प्रकारकी दिखायी देती हैं॥ २०॥

निशि भान्त्यचलेन्द्रस्य हुताशनशिखा इव।

ओषध्य: स्वप्रभालक्ष्म्या भ्राजमाना: सहस्रश:॥ २१॥

‘रातमें इस पर्वतराजके ऊपर लगी हुई सहस्रों ओषधियाँ अपनी प्रभासम्पत्तिसे प्रकाशित होती हुई अग्निशिखाके समान उद्भासित होती हैं॥ २१॥

केचित् क्षयनिभा देशा: केचिदुद्यानसंनिभा:।

केचिदेकशिला भान्ति पर्वतस्यास्य भामिनि॥ २२॥

‘भामिनि! इस पर्वतके कई स्थान घरकी भाँति दिखायी देते हैं (क्योंकि वे वृक्षोंकी घनी छायासे आच्छादित हैं) और कई स्थान चम्पा, मालती आदि फूलोंकी अधिकताके कारण उद्यानके समान सुशोभित होते हैं तथा कितने ही स्थान ऐसे हैं जहाँ बहुत दूरतक एक ही शिला फैली हुई है। इन सबकी बड़ी शोभा होती है॥ २२॥

भित्त्वेव वसुधां भाति चित्रकूट: समुत्थित:।

चित्रकूटस्य कूटोऽयं दृश्यते सर्वत: शुभ:॥ २३॥

‘ऐसा जान पड़ता है कि यह चित्रकूट पर्वत पृथ्वीको फाड़कर ऊपर उठ आया है। चित्रकूटका यह शिखर सब ओरसे सुन्दर दिखायी देता है॥ २३॥

कुष्ठस्थगरपुंनागभूर्जपत्रोत्तरच्छदान् ।

कामिनां स्वास्तरान् पश्य कुशेशयदलायुतान्॥ २४॥

‘प्रिये! देखो, ये विलासियोंके बिस्तर हैं, जिनपर उत्पल, पुत्रजीवक, पुन्नाग और भोजपत्र—इनके पत्ते ही चादरका काम देते हैं तथा इनके ऊपर सब ओरसे कमलोंके पत्ते बिछे हुए हैं॥ २४॥

मृदिताश्चापविद्धाश्च दृश्यन्ते कमलस्रज:।

कामिभिर्वनिते पश्य फलानि विविधानि च॥ २५॥

‘प्रियतमे! ये कमलोंकी मालाएँ दिखायी देती हैं, जो विलासियोंद्वारा मसलकर फेंक दी गयी हैं। उधर देखो, वृक्षोंमें नाना प्रकारके फल लगे हुए हैं॥ २५॥

वस्वौकसारां नलिनीमतीत्यैवोत्तरान् कुरून्।

पर्वतश्चित्रकूटोऽसौ बहुमूलफलोदक:॥ २६॥

‘बहुत-से फल, मूल और जलसे सम्पन्न यह चित्रकूट पर्वत कुबेर-नगरी वस्वौकसारा (अलका), इन्द्रपुरी नलिनी (अमरावती अथवा नलिनी नामसे प्रसिद्ध कुबेरकी सौगन्धिक कमलोंसे युक्त पुष्करिणी) तथा उत्तर कुरुको भी अपनी शोभासे तिरस्कृत कर रहा है॥ २६॥

इमं तु कालं वनिते विजह्र‌िवां-

स्त्वया च सीते सह लक्ष्मणेन।

रतिं प्रपत्स्ये कुलधर्मवर्धिनीं

सतां पथि स्वैर्नियमै: परै: स्थित:॥ २७॥

‘प्राणवल्लभे सीते! अपने उत्तम नियमोंको पालन करते हुए सन्मार्गपर स्थित रहकर यदि तुम्हारे और लक्ष्मणके साथ यह चौदह वर्षोंका समय मैं सानन्द व्यतीत कर लूँगा तो मुझे वह सुख प्राप्त होगा जो कुलधर्मको बढ़ानेवाला है’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्नवतितम: सर्ग:॥ ९४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४॥

 


पञ्चनवतितम: सर्ग:

श्रीरामका सीताके प्रति मन्दाकिनी नदीकी शोभाका वर्णन

अथ शैलाद् विनिष्क्रम्य मैथिलीं कोसलेश्वर:।

अदर्शयच्छुभजलां रम्यां मन्दाकिनीं नदीम्॥ १॥

तदनन्तर उस पर्वतसे निकलकर कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी- ने मिथिलेशकुमारी सीताको पुण्यसलिला रमणीय मन्दाकिनी नदीका दर्शन कराया॥ १॥

अब्रवीच्च वरारोहां चन्द्रचारुनिभाननाम्।

विदेहराजस्य सुतां रामो राजीवलोचन:॥ २॥

और उस समय कमलनयन श्रीरामने चन्द्रमाके समान मनोहर मुख तथा सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहराजनन्दिनी सीतासे इस प्रकार कहा—॥ २॥

विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्।

कुसुमैरुपसम्पन्नां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्॥ ३॥

‘प्रिये! अब मन्दाकिनी नदीकी शोभा देखो, हंस और सारसोंसे सेवित होनेके कारण यह कितनी सुन्दर जान पड़ती है। इसका किनारा बड़ा ही विचित्र है। नाना प्रकारके पुष्प इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ३॥

नानाविधैस्तीररुहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमै:।

राजन्तीं राजराजस्य नलिनीमिव सर्वत:॥ ४॥

‘फल और फूलोंके भारसे लदे हुए नाना प्रकारके तटवर्ती वृक्षोंसे घिरी हुई यह मन्दाकिनी कुबेरके सौगन्धिक सरोवरकी भाँति सब ओरसे सुशोभित हो रही है॥ ४॥

मृगयूथनिपीतानि कलुषाम्भांसि साम्प्रतम्।

तीर्थानि रमणीयानि रतिं संजनयन्ति मे॥ ५॥

‘हरिनोंके झुंड पानी पीकर इस समय यद्यपि यहाँका जल गँदला कर गये हैं तथापि इसके रमणीय घाट मेरे मनको बड़ा आनन्द दे रहे हैं॥ ५॥

जटाजिनधरा: काले वल्कलोत्तरवासस:।

ऋषयस्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनीं प्रिये॥ ६॥

‘प्रिये! वह देखो, जटा, मृगचर्म और वल्कलका उत्तरीय धारण करनेवाले महर्षि उपयुक्त समयमें आकर इस मन्दाकिनी नदीमें स्नान कर रहे हैं॥ ६॥

आदित्यमुपतिष्ठन्ते नियमादूर्ध्वबाहव:।

एते परे विशालाक्षि मुनय: संशितव्रता:॥ ७॥

‘विशाललोचने! ये दूसरे मुनि, जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, नैत्यिक नियमके कारण दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यदेवका उपस्थान कर रहे हैं॥

मारुतोद्धूतशिखरै: प्रनृत्त इव पर्वत:।

पादपै: पुष्पपत्राणि सृजद्भिरभितो नदीम्॥ ८॥

‘हवाके झोंकेसे जिनकी शिखाएँ झूम रही हैं, अतएव जो मन्दाकिनी नदीके उभय तटोंपर फूल और पत्ते बिखेर रहे हैं, उन वृक्षोंसे उपलक्षित हुआ यह पर्वत मानो नृत्य-सा करने लगा है॥ ८॥

क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित् पुलिनशालिनीम्।

क्वचित् सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्॥ ९॥

‘देखो! मन्दाकिनी नदीकी कैसी शोभा है; कहीं तो इसमें मोतियोंके समान स्वच्छ जल बहता दिखायी देता है, कहीं यह ऊँचे कगारोंसे ही शोभा पाती है (वहाँका जल कगारोंमें छिप जानेके कारण दिखायी नहीं देता है) और कहीं सिद्धजन इसमें अवगाहन कर रहे हैं तथा यह उनसे व्याप्त दिखायी देती है॥ ९॥

निर्धूतान् वायुना पश्य विततान् पुष्पसंचयान्।

पोप्लूयमानानपरान् पश्य त्वं तनुमध्यमे॥ १०॥

‘सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! देखो, वायुके द्वारा उड़ाकर लाये हुए ये ढेर-के-ढेर फूल किस तरह मन्दाकिनीके दोनों तटोंपर फैले हुए हैं और वे दूसरे पुष्पसमूह कैसे पानीपर तैर रहे हैं॥ १०॥

पश्यैतद्वल्गुवचसो रथाङ्गाह्वयना द्विजा:।

अधिरोहन्ति कल्याणि निष्कूजन्त: शुभा गिर:॥ ११॥

‘कल्याणि! देखो तो सही, ये मीठी बोली बोलनेवाले चक्रवाक पक्षी सुन्दर कलरव करते हुए किस तरह नदीके तटोंपर आरूढ़ हो रहे हैं॥ ११॥

दर्शनं चित्रकूटस्य मन्दाकिन्याश्च शोभने।

अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात्॥ १२॥

‘शोभने! यहाँ जो प्रतिदिन चित्रकूट और मन्दाकिनीका दर्शन होता है, वह नित्य-निरन्तर तुम्हारा दर्शन होनेके कारण अयोध्यानिवासकी अपेक्षा भी अधिक सुखद जान पड़ता है॥ १२॥

विधूतकल्मषै: सिद्धैस्तपोदमशमान्वितै:।

नित्यविक्षोभितजलां विगाहस्व मया सह॥ १३॥

‘इस नदीमें प्रतिदिन तपस्या, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न निष्पाप सिद्ध महात्माओंके अवगाहन करनेसे इसका जल विक्षुब्ध होता रहता है। चलो, तुम भी मेरे साथ इसमें स्नान करो॥ १३॥

सखीवच्च विगाहस्व सीते मन्दाकिनीं नदीम्।

कमलान्यवमज्जन्ती पुष्कराणि च भामिनि॥ १४॥

‘भामिनि सीते! एक सखी दूसरी सखीके साथ जैसे क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार तुम मन्दाकिनी नदीमें उतरकर इसके लाल और श्वेत कमलोंको जलमें डुबोती हुई इसमें स्नान-क्रीड़ा करो॥ १४॥

त्वं पौरजनवद् व्यालानयोध्यामिव पर्वतम्।

मन्यस्व वनिते नित्यं सरयूवदिमां नदीम्॥ १५॥

‘प्रिये! तुम इस वनके निवासियोंको पुरवासी मनुष्योंके समान समझो, चित्रकूट पर्वतको अयोध्याके तुल्य मानो और इस मन्दाकिनी नदीको सरयूके सदृश जानो॥ १५॥

लक्ष्मणश्चैव धर्मात्मा मन्निदेशे व्यवस्थित:।

त्वं चानुकूला वैदेहि प्रीतिं जनयती मम॥ १६॥

‘विदेहनन्दिनि! धर्मात्मा लक्ष्मण सदा मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं और तुम भी मेरे मनके अनुकूल ही चलती हो; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है॥ १६॥

उपस्पृशंस्त्रिषवणं मधुमूलफलाशन:।

नायोध्यायै न राज्याय स्पृहये च त्वया सह॥ १७॥

‘प्रिये! तुम्हारे साथ तीनों काल स्नान करके मधुर फल- मूलका आहार करता हुआ मैं न तो अयोध्या जानेकी इच्छा रखता हूँ और न राज्य पानेकी ही॥ १७॥

इमां हि रम्यां गजयूथलोडितां

निपीततोयां गजसिंहवानरै:।

सुपुष्पितां पुष्पभरैरलंकृतां

न सोऽस्ति य: स्यान्न गतक्लम: सुखी॥ १८॥

‘जिसे हाथियोंके समूह मथे डालते हैं तथा सिंह और वानर जिसका जल पिया करते हैं, जिसके तटपर सुन्दर पुष्पोंसे लदे वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जो पुष्पसमूहोंसे अलंकृत है, ऐसी इस रमणीय मन्दाकिनी नदीमें स्नान करके जो ग्लानिरहित और सुखी न हो जाय—ऐसा मनुष्य इस संसारमें नहीं है’॥ १८॥

इतीव रामो बहुसंगतं वच:

प्रियासहाय: सरितं प्रति ब्रुवन्।

चचार रम्यं नयनाञ्जनप्रभं

स चित्रकूटं रघुवंशवर्धन:॥ १९॥

रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी मन्दाकिनी नदीके प्रति ऐसी अनेक प्रकारकी सुसंगत बातें कहते हुए नील-कान्तिवाले रमणीय चित्रकूट पर्वतपर अपनी प्रिया पत्नी सीताके साथ विचरने लगे॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चनवतितम: सर्ग:॥ ९५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पंचानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९५॥

 

षण्णवतितम: सर्ग:

वन-जन्तुओंके भागनेका कारण जाननेके लिये श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका शाल-वृक्षपर चढ़कर भरतकी सेनाको देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना

तां तदा दर्शयित्वा तु मैथिलीं गिरिनिम्नगाम्।

निषसाद गिरिप्रस्थे सीतां मांसेन छन्दयन्॥ १॥

इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीताको मन्दाकिनी नदीका दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वतके समतल प्रदेशमें उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनोंके उपभोगमें आने योग्य फल-मूलके गूदेसे उनकी मानसिक प्रसन्नताको बढ़ाने—उनका लालन करने लगे॥

इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना।

एवमास्ते स धर्मात्मा सीतया सह राघव:॥ २॥

धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजीके साथ इस प्रकारकी बातें कर रहे थे—‘प्रिये! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्दको अच्छी तरह आगपर सेका गया है’॥ २॥

तथा तत्रासतस्तस्य भरतस्योपयायिन:।

सैन्यरेणुश्च शब्दश्च प्रादुरास्तां नभस्पृशौ॥ ३॥

इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेशमें बैठे हुए ही थे कि उनके पास आनेवाली भरतकी सेनाकी धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाशमें फैलने लगे॥ ३॥

एतस्मिन्नन्तरे त्रस्ता: शब्देन महता तत:।

अर्दिता यूथपा मत्ता: सयूथाद् दुद्रुवुर्दिश:॥ ४॥

इसी बीचमें सेनाके महान् कोलाहलसे भयभीत एवं पीडि़त हो हाथियोंके कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथोंके साथ सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे॥ ४॥

स तं सैन्यसमुद्धूतं शब्दं शुश्राव राघव:।

तांश्च विप्रद्रुतान् सर्वान् यूथपानन्ववैक्षत॥ ५॥

श्रीरामचन्द्रजीने सेनासे प्रकट हुए उस महान् कोलाहलको सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियोंको भी देखा॥ ५॥

तांश्च विप्रद्रुतान् दृष्ट्वा तं च श्रुत्वा महास्वनम्।

उवाच राम: सौमित्रिं लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥ ६॥

उन भागे हुए हाथियोंको देखकर और उस महाभयंकर शब्दको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेजवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले—॥ ६॥

हन्त लक्ष्मण पश्येह सुमित्रा सुप्रजास्त्वया।

भीमस्तनितगम्भीरं तुमुल: श्रूयते स्वन:॥ ७॥

‘लक्ष्मण! इस जगत्में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्रवाली हुई हैं। देखो तो सही—यह भयंकर गर्जनाके साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है॥ ७॥

गजयूथानि वारण्ये महिषा वा महावने।

वित्रासिता मृगा: सिंहै: सहसा प्रद्रुता दिश:॥ ८॥

राजा वा राजपुत्रो वा मृगयामटते वने।

अन्यद्वा श्वापदं किंचित् सौमित्रे ज्ञातुमर्हसि॥ ९॥

‘सुमित्रानन्दन! पता तो लगाओ, इस विशाल वनमें ये जो हाथियोंके झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है? इन्हें सिंहोंने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वनमें आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है?॥ ८-९॥

सुदुश्चरो गिरिश्चायं पक्षिणामपि लक्ष्मण।

सर्वमेतद् यथातत्त्वमभिज्ञातुमिहार्हसि॥ १०॥

‘लक्ष्मण! इस पर्वतपर अपरिचित पक्षियोंका आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है (फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु वा राजाका आक्रमण कैसे सम्भव है)। अत: इन सारी बातोंकी ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो’॥ १०॥

स लक्ष्मण: संत्वरित: सालमारुह्य पुष्पितम्।

प्रेक्षमाणो दिश: सर्वा: पूर्वां दिशमवैक्षत॥ ११॥

भगवान् श्रीरामकी आज्ञा पाकर लक्ष्मण तुरंत ही फूलोंसे भरे हुए एक शाल-वृक्षपर चढ़ गये और सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए उन्होंने पूर्व दिशाकी ओर दृष्टिपात किया॥ ११॥

उदङ्मुख: प्रेक्षमाणो ददर्श महतीं चमूम्।

गजाश्वरथसम्बाधां यत्तैर्युक्तां पदातिभि:॥ १२॥

तत्पश्चात् उत्तरकी ओर मुँह करके देखनेपर उन्हें एक विशाल सेना दिखायी दी, जो हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण तथा प्रयत्नशील पैदल सैनिकोंसे संयुक्त थी॥

तामश्वरथसम्पूर्णां रथध्वजविभूषिताम्।

शशंस सेनां रामाय वचनं चेदमब्रवीत्॥ १३॥

घोड़ों और रथोंसे भरी हुई तथा रथकी ध्वजासे विभूषित उस सेनाकी सूचना उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको दी और यह बात कही—॥ १३॥

अग्निं संशमयत्वार्य: सीता च भजतां गुहाम्।

सज्यं कुरुष्व चापं च शरांश्च कवचं तथा॥ १४॥

‘आर्य! अब आप आग बुझा दें (अन्यथा धुआँ देखकर यह सेना यहीं चली आयगी); देवी सीता गुफामें जा बैठें। आप अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा लें और बाण तथा कवच धारण कर लें’॥ १४॥

तं राम: पुरुषव्याघ्रो लक्ष्मणं प्रत्युवाच ह।

अङ्गावेक्षस्व सौमित्रे कस्येमां मन्यसे चमूम्॥ १५॥

यह सुनकर पुरुषसिंह श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘प्रिय सुमित्राकुमार! अच्छी तरह देखो तो सही, तुम्हारी समझमें यह किसकी सेना हो सकती है?’॥ १५॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

दिधक्षन्निव तां सेनां रुषित: पावको यथा॥ १६॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण रोषसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवकी भाँति उस सेनाकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हों और इस प्रकार बोले—॥ १६॥

सम्पन्नं राज्यमिच्छंस्तु व्यक्तं प्राप्याभिषेचनम्।

आवां हन्तुं समभ्येति कैकेय्या भरत: सुत:॥ १७॥

‘भैया! निश्चय ही यह कैकेयीका पुत्र भरत है, जो अयोध्यामें अभिषिक्त होकर अपने राज्यको निष्कण्टक बनानेकी इच्छासे हम दोनोंको मार डालनेके लिये यहाँ आ रहा है॥ १७॥

एष वै सुमहान् श्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते।

विराजत्युज्ज्वलस्कन्ध: कोविदारध्वजो रथे॥ १८॥

‘सामनेकी ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपर उज्ज्वल तनेसे युक्त कोविदार वृक्षसे चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है॥ १८॥

भजन्त्येते यथाकाममश्वानारुह्य शीघ्रगान्।

एते भ्राजन्ति संहृष्टा गजानारुह्य सादिन:॥ १९॥

‘ये घुड़सवार सैनिक इच्छानुसार शीघ्रगामी घोड़ोंपर आरूढ़ हो इधर ही आ रहे हैं और ये हाथीसवार भी बड़े हर्षसे हाथियोंपर चढ़कर आते हुए प्रकाशित हो रहे हैं॥

गृहीतधनुषावावां गिरिं वीर श्रयावहे।

अथवेहैव तिष्ठाव: संनद्धावुद्यतायुधौ॥ २०॥

‘वीर! हम दोनोंको धनुष लेकर पर्वतके शिखरपर चलना चाहिये अथवा कवच बाँधकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये यहीं डटे रहना चाहिये॥ २०॥

अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदारध्वजो रणे।

अपि द्रक्ष्यामि भरतं यत्कृते व्यसनं महत्॥ २१॥

त्वया राघव सम्प्राप्तं सीतया च मया तथा।

यन्निमित्तं भवान् राज्याच्च्युतो राघव शाश्वतात्॥ २२॥

‘रघुनन्दन! आज यह कोविदारके चिह्नसे युक्त ध्वजवाला रथ रणभूमिमें हम दोनोंके अधिकारमें आ जायगा और आज मैं अपनी इच्छाके अनुसार उस भरतको भी सामने देखूँगा कि जिसके कारण आपको, सीताको और मुझे भी महान् संकटका सामना करना पड़ा है तथा जिसके कारण आप अपने सनातन राज्याधिकारसे वञ्चित किये गये हैं॥ २२॥

सम्प्राप्तोऽयमरिर्वीर भरतो वध्य एव हि।

भरतस्य वधे दोषं नाहं पश्यामि राघव॥ २३॥

‘वीर रघुनाथजी! यह भरत हमारा शत्रु है और सामने आ गया है; अत: वधके ही योग्य है। भरतका वध करनेमें मुझे कोई दोष नहीं दिखायी देता॥ २३॥

पूर्वापकारिणं हत्वा न ह्यधर्मेण युज्यते।

पूर्वापकारी भरतस्त्यागेऽधर्मश्च राघव॥ २४॥

‘रघुनन्दन! जो पहलेका अपकारी रहा हो, उसको मारकर कोई अधर्मका भागी नहीं होता है। भरतने पहले हमलोगोंका अपकार किया है, अत: उसे मारनेमें नहीं, जीवित छोड़ देनेमें ही अधर्म है॥ २४॥

एतस्मिन् निहते कृत्स्नामनुशाधि वसुंधराम्।

अद्य पुत्रं हतं संख्ये कैकेयी राज्यकामुका॥ २५॥

मया पश्येत् सुदु:खार्ता हस्तिभिन्नमिव द्रुमम्।

‘इस भरतके मारे जानेपर आप समस्त वसुधाका शासन करें। जैसे हाथी किसी वृक्षको तोड़ डालता है, उसी प्रकार राज्यका लोभ करनेवाली कैकेयी आज अत्यन्त दु:खसे आर्त हो इसे मेरे द्वारा युद्धमें मारा गया देखे॥ २५॥

कैकेयीं च वधिष्यामि सानुबन्धां सबान्धवाम्॥ २६॥

कलुषेणाद्य महता मेदिनी परिमुच्यताम्।

‘मैं कैकेयीका भी उसके सगे-सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंसहित वध कर डालूँगा। आज यह पृथ्वी कैकेयीरूप महान् पापसे मुक्त हो जाय॥ २६॥

अद्येमं संयतं क्रोधमसत्कारं च मानद॥ २७॥

मोक्ष्यामि शत्रुसैन्येषु कक्षेष्विव हुताशनम्।

‘मानद! आज मैं अपने रोके हुए क्रोध और तिरस्कारको शत्रुकी सेनाओंपर उसी प्रकार छोडूँगा, जैसे सूखे घास-फूँसके ढेरमें आग लगा दी जाय॥ २७॥

अद्यैव चित्रकूटस्य काननं निशितै: शरै:॥ २८॥

छिन्दन् शत्रुशरीराणि करिष्ये शोणितोक्षितम्।

‘अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े करके मैं अभी चित्रकूटके इस वनको रक्तसे सींच दूँगा॥ २८॥

शरैर्निभिन्नहृदयान् कुञ्जरांस्तुरगांस्तथा॥ २९॥

श्वापदा: परिकर्षन्तु नरांश्च निहतान् मया।

‘मेरे बाणोंसे विदीर्ण हुए हृदयवाले हाथियों और घोड़ोंको तथा मेरे हाथसे मारे गये मनुष्योंको भी गीदड़ आदि मांसभक्षी जन्तु इधर-उधर घसीटें॥ २९॥

शराणां धनुषश्चाहमनृणोऽस्मिन् महावने।

ससैन्यं भरतं हत्वा भविष्यामि न संशय:॥ ३०॥

‘इस महान् वनमें सेनासहित भरतका वध करके मैं धनुष और बाणके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा—इसमें संशय नहीं है’॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षण्णवतितम: सर्ग॥ ९६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें
छियानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९६॥

 


सप्तनवतितम: सर्ग:

श्रीरामका लक्ष्मणके रोषको शान्त करके भरतके सद्भावका वर्णन करना, लक्ष्मणका लज्जित हो श्रीरामके पास खड़ा होना और भरतकी सेनाका पर्वतके नीचे छावनी डालना

सुसंरब्धं तु भरतं लक्ष्मणं क्रोधमूर्च्छितम्।

रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत्॥ १॥

लक्ष्मण भरतके प्रति रोषावेशके कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, उस अवस्थामें श्रीरामने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और इस प्रकार कहा—॥

किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा।

महाबले महोत्साहे भरते स्वयमागते॥ २॥

‘लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल- तलवारसे क्या काम है?॥ २॥

पितु: सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमाहवे।

किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण॥ ३॥

‘लक्ष्मण! पिताके सत्यकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्धमें भरतको मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसारमें मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्यको लेकर मैं क्या करूँगा?॥ ३॥

यद् द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्।

नाहं तत् प्रतिगृह्णीयां भक्ष्यान् विषकृतानिव॥ ४॥

‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रोंका विनाश करके जिस धनकी प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजनके समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा॥ ४॥

धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।

इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते॥ ५॥

‘लक्ष्मण! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि—धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वीका राज्य भी मैं तुम्हीं लोगोंके लिये चाहता हूँ॥ ५॥

भ्रातृणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण।

राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे॥ ६॥

‘सुमित्राकुमार! मैं भाइयोंके संग्रह और सुखके लिये ही राज्यकी भी इच्छा करता हूँ और इस बातकी सच्चाईके लिये मैं अपना धनुष छूकर शपथ खाता हूँ॥

नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा।

नहीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण॥ ७॥

‘सौम्य लक्ष्मण! समुद्रसे घिरी हुई यह पृथिवी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्मसे इन्द्रका पद पानेकी भी इच्छा नहीं कर सकता॥ ७॥

यद् विना भरतं त्वां च शत्रुघ्नं वापि मानद।

भवेन्मम सुखं किंचिद् भस्म तत् कुरुतां शिखी॥ ८॥

‘मानद! भरतको, तुमको और शत्रुघ्नको छोड़कर यदि मुझे कोई सुख मिलता हो तो उसे अग्निदेव जलाकर भस्म कर डालें॥ ८॥

मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सल:।

मम प्राणै: प्रियतर: कुलधर्ममनुस्मरन्॥ ९ ॥

श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम्।

जानक्या सहितं वीर त्वया च पुरुषोत्तम॥ १०॥

स्नेहेनाक्रान्तहृदय: शोकेनाकुलितेन्द्रिय:।

द्रष्टुमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथाऽऽगत:॥ ११॥

‘वीर! पुरुषप्रवर! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरतने अयोध्यामें आनेपर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकीके साथ जटा-वल्कल धारण करके वनमें आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्मका विचार करके स्नेहयुक्त हृदयसे हमलोगोंसे मिलने आये हैं। इन भरतके आगमनका इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता॥ ९—११॥

अम्बां च केकयीं रुष्य भरतश्चाप्रियं वदन्।

प्रसाद्य पितरं श्रीमान् राज्यं मे दातुमागत:॥ १२॥

‘माता कैकेयीके प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजीको प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देनेके लिये आये हैं॥ १२॥

प्राप्तकालं यथैषोऽस्मान् भरतो द्रष्टुमर्हति।

अस्मासु मनसाप्येष नाहितं किंचिदाचरेत्॥ १३॥

‘भरतका हमलोगोंसे मिलनेके लिये आना सर्वथा समयोचित है। वे हमसे मिलनेके योग्य हैं। हमलोगोंका कोई अहित करनेका विचार तो वे कभी मनमें भी नहीं ला सकते॥ १३॥

विप्रियं कृतपूर्वं ते भरतेन कदा नु किम्।

ईदृशं वा भयं तेऽद्य भरतं यद् विशङ्कसे॥ १४॥

‘भरतने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन-सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषयमें इस तरहकी आशङ्का कर रहे हो?॥ १४॥

नहि ते निष्ठुरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वच:।

अहं ह्यप्रियमुक्त: स्यां भरतस्याप्रिये कृते॥ १५॥

‘भरतके आनेपर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी॥ १५॥

कथं नु पुत्रा: पितरं हन्यु: कस्यांचिदापदि।

भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मन:॥ १६॥

‘सुमित्रानन्दन! कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिताको कैसे मार सकते हैं? अथवा भाई अपने प्राणोंके समान प्रिय भाईकी हत्या कैसे कर सकता है?॥ १६॥

यदि राज्यस्य हेतोस्त्वमिमां वाचं प्रभाषसे।

वक्ष्यामि भरतं दृष्ट्वा राज्यमस्मै प्रदीयताम्॥ १७॥

‘यदि तुम राज्यके लिये ऐसी कठोर बात कहते हो तो मैं भरतसे मिलनेपर उन्हें कह दूँगा कि तुम यह राज्य लक्ष्मणको दे दो॥ १७॥

उच्यमानो हि भरतो मया लक्ष्मण तद्वच:।

राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव मंस्यते॥ १८॥

‘लक्ष्मण! यदि मैं भरतसे यह कहूँ कि ‘तुम राज्य इन्हें दे दो’ तो वे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अवश्य मेरी बात मान लेंगे’॥ १८॥

तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रत:।

लक्ष्मण: प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया॥ १९॥

अपने धर्मपरायण भाईके ऐसा कहनेपर उन्हींके हितमें तत्पर रहनेवाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गोंमें ही समा गये—लाजसे गड़ गये॥ १९॥

तद्वाक्यं लक्ष्मण: श्रुत्वा व्रीडित: प्रत्युवाच ह।

त्वां मन्ये द्रष्टुमायात: पिता दशरथ: स्वयम्॥ २०॥

श्रीरामका पूर्वोक्त वचन सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मणने कहा—‘भैया! मैं समझता हूँ, हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आये हैं’॥ २०॥

व्रीडितं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघव: प्रत्युवाच ह।

एष मन्ये महाबाहुरिहास्मान् द्रष्टुमागत:॥ २१॥

लक्ष्मणको लज्जित हुआ देख श्रीरामने उत्तर दिया—‘मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हमलोगोंसे मिलने आये हैं॥ २१॥

अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमान: सुखोचितौ।

वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति॥ २२॥

‘अथवा मैं ऐसा समझता हूँ कि हमें सुख भोगनेके योग्य मानते हुए पिताजी वनवासके कष्टका विचार करके हम दोनोंको निश्चय ही घर लौटा ले जायँगे॥ २२॥

इमां चाप्येष वैदेहीमत्यन्तसुखसेविनीम्।

पिता मे राघव: श्रीमान् वनादादाय यास्यति॥ २३॥

‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुखका सेवन करनेवाली इन विदेहराजनन्दिनी सीताको भी वनसे साथ लेकर ही घरको लौटेंगे॥ २३॥

एतौ तौ सम्प्रकाशेते गोत्रवन्तौ मनोरमौ।

वायुवेगसमौ वीरौ जवनौ तुरगोत्तमौ॥ २४॥

‘अच्छे घोड़ोंके कुलमें उत्पन्न हुए ये ही वे दोनों वायुके समान वेगशाली, शीघ्रगामी, वीर एवं मनोरम अपने उत्तम घोड़े चमक रहे हैं॥ २४॥

स एष सुमहाकाय: कम्पते वाहिनीमुखे।

नाग: शत्रुंजयो नाम वृद्धस्तातस्य धीमत:॥ २५॥

‘परम बुद्धिमान् पिताजीकी सवारीमें रहनेवाला यह वही विशालकाय शत्रुंजय नामक बूढ़ा गजराज है, जो सेनाके मुहानेपर झूमता हुआ चल रहा है॥ २५॥

न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डुरं लोकविश्रुतम्।

पितुर्दिव्यं महाभाग संशयो भवतीह मे॥ २६॥

‘महाभाग! परंतु इसके ऊपर पिताजीका वह विश्वविख्यात दिव्य श्वेतछत्र मुझे नहीं दिखायी देता है—इससे मेरे मनमें संशय उत्पन्न होता है॥ २६॥

वृक्षाग्रादवरोह त्वं कुरु लक्ष्मण मद्वच:।

इतीव रामो धर्मात्मा सौमित्रिं तमुवाच ह॥ २७॥

अवतीर्य तु सालाग्रात् तस्मात् स समितिंजय:।

लक्ष्मण: प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ रामस्य पार्श्वत:॥ २८॥

‘लक्ष्मण! अब मेरी बात मानो और पेड़से नीचे उतर आओ।’ धर्मात्मा श्रीरामने सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे जब ऐसी बात कही, तब युद्धमें विजय पानेवाले लक्ष्मण उस शाल वृक्षके अग्रभागसे उतरे और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २७-२८॥

भरतेनाथ संदिष्टा सम्मर्दो न भवेदिति।

समन्तात् तस्य शैलस्य सेना वासमकल्पयत्॥ २९॥

उधर भरतने सेनाको आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसीको हमलोगोंके द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वतके चारों ओर नीचे ही ठहर गये॥ २९॥

अध्यर्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य ह।

पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिनराकुला॥ ३०॥

उस समय हाथी, घोड़े और मनुष्योंसे भरी हुई इक्ष्वाकुवंशी नरेशकी वह सेना पर्वतके आस-पासकी डेढ़ योजन (छ: कोस) भूमि घेरकर पड़ाव डाले हुए थी॥

सा चित्रकूटे भरतेन सेना

धर्मं पुरस्कृत्य विधूय दर्पम्।

प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य

विरोचते नीतिमता प्रणीता॥ ३१॥

नीतिज्ञ भरत धर्मको सामने रखते हुए गर्वको त्यागकर रघुकुलनन्दन श्रीरामको प्रसन्न करनेके लिये जिसे अपने साथ ले आये थे, वह सेना चित्रकूट पर्वतके समीप बड़ी शोभा पा रही थी॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तनवतितम: सर्ग:॥ ९७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७॥

 

अष्टनवतितम: सर्ग:

भरतके द्वारा श्रीरामके आश्रमकी खोजका प्रबन्ध तथा उन्हें आश्रमका दर्शन

निवेश्य सेनां तु विभु: पद‍्भ्यां पादवतां वर:।

अभिगन्तुं स काकुत्स्थमियेष गुरुवर्तकम्॥ १॥

निविष्टमात्रे सैन्ये तु यथोद्देशं विनीतवत्।

भरतो भ्रातरं वाक्यं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥ २॥

इस प्रकार सेनाको ठहराकर जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली भरतने गुरुसेवापरायण (एवं पिताके आज्ञापालक) श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार किया। जब सारी सेना विनीत भावसे यथास्थान ठहर गयी, तब भरतने अपने भाई शत्रुघ्नसे इस प्रकार कहा—॥ १-२॥

क्षिप्रं वनमिदं सौम्य नरसंघै: समन्तत:।

लुब्धैश्च सहितैरेभिस्त्वमन्वेषितुमर्हसि॥ ३॥

‘सौम्य! बहुत-से मनुष्योंके साथ इन निषादोंको भी साथ लेकर तुम्हें शीघ्र ही इस वनमें चारों ओर श्रीरामचन्द्रजीकी खोज करनी चाहिये॥ ३॥

गुहो ज्ञातिसहस्रेण शरचापासिपाणिना।

समन्वेषतु काकुत्स्थावस्मिन् परिवृत: स्वयम्॥ ४॥

‘निषादराज गुह स्वयं भी धनुष-बाण और तलवार धारण करनेवाले अपने सहस्रों बन्धु-बान्धवोंसे घिरे हुए जायँ और इस वनमें ककुत्स्थवंशी श्रीराम और लक्ष्मणका अन्वेषण करें॥ ४॥

अमात्यै: सह पौरैश्च गुरुभिश्च द्विजातिभि:।

सह सर्वं चरिष्यामि पद‍्भ्यां परिवृत: स्वयम्॥ ५॥

‘मैं स्वयं भी मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ उन सबसे घिरा रहकर पैदल ही सारे वनमें विचरण करूँगा॥ ५॥

यावन्न रामं द्रक्ष्यामि लक्ष्मणं वा महाबलम्।

वैदेहीं वा महाभागां न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ६॥

‘जबतक श्रीराम, महाबली लक्ष्मण अथवा महाभागा विदेहराजकुमारी सीताको न देख लूँगा, तबतक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी॥ ६॥

यावन्न चन्द्रसंकाशं तद् द्रक्ष्यामि शुभाननम्।

भ्रातु: पद्मविशालाक्षं न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ७॥

‘जबतक अपने पूज्य भ्राता श्रीरामके कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले सुन्दर मुखचन्द्रका दर्शन न कर लूँगा, तबतक मेरे मनको शान्ति नहीं प्राप्त होगी॥ ७॥

सिद्धार्थ: खलु सौमित्रिर्यश्चन्द्रविमलोपमम्।

मुखं पश्यति रामस्य राजीवाक्षं महाद्युतिम्॥ ८॥

‘निश्चय ही सुमित्राकुमार लक्ष्मण कृतार्थ हो गये, जो श्रीरामचन्द्रजीके उस कमलसदृश नेत्रवाले महातेजस्वी मुखका निरन्तर दर्शन करते हैं, जो चन्द्रमाके समान निर्मल एवं आह्लाद प्रदान करनेवाला है॥ ८॥

यावन्न चरणौ भ्रातु: पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।

शिरसा प्रग्रहीष्यामि न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ९॥

‘जबतक भाई श्रीरामके राजोचित लक्षणोंसे युक्त चरणारविन्दोंको अपने सिरपर नहीं रखूँगा, तबतक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी॥ ९॥

यावन्न राज्ये राज्यार्ह: पितृपैतामहे स्थित:।

अभिषिक्तो जलक्लिन्नो न मे शान्तिर्भविष्यति॥ १०॥

‘जबतक राज्यके सच्चे अधिकारी आर्य श्रीराम पिता-पितामहोंके राज्यपर प्रतिष्ठित हो अभिषेकके जलसे आर्द्र नहीं हो जायँगे, तबतक मेरे मनको शान्ति नहीं प्राप्त होगी॥ १०॥

कृतकृत्या महाभागा वैदेही जनकात्मजा।

भर्तारं सागरान्ताया: पृथिव्या यानुगच्छति॥ ११॥

‘जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके स्वामी अपने पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करती हैं, वे जनककिशोरी विदेहराजनन्दिनी महाभागा सीता अपने इस सत्कर्मसे कृतार्थ हो गयीं॥ ११॥

सुशुभश्चित्रकूटोऽसौ गिरिराजसमो गिरि:।

यस्मिन् वसति काकुत्स्थ: कुबेर इव नन्दने॥ १२॥

‘जैसे नन्दनवनमें कुबेर निवास करते हैं, उसी प्रकार जिसके वनमें ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी विराज रहे हैं, वह चित्रकूट परम मङ्गलकारी तथा गिरिराज हिमालय एवं वेंकटाचलके समान श्रेष्ठ पर्वत है॥ १२॥

कृतकार्यमिदं दुर्गवनं व्यालनिषेवितम्।

यदध्यास्ते महाराजो राम: शस्त्रभृतां वर:॥ १३॥

‘यह सर्पसेवित दुर्गम वन भी कृतार्थ हो गया, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाराज श्रीराम निवास करते हैं’॥

एवमुक्त्वा महाबाहुर्भरत: पुरुषर्षभ:।

पद्भ्यामेव महातेजा: प्रविवेश महद् वनम्॥ १४॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी पुरुषप्रवर महाबाहु भरतने उस विशाल वनमें पैदल ही प्रवेश किया॥ १४॥

स तानि द्रुमजालानि जातानि गिरिसानुषु।

पुष्पिताग्राणि मध्येन जगाम वदतां वर:॥ १५॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ भरत पर्वतशिखरोंपर उत्पन्न हुए वृक्षसमूहोंके, जिनकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे भरे थे, बीचसे निकले॥ १५॥

स गिरेश्चित्रकूटस्य सालमारुह्य सत्वरम्।

रामाश्रमगतस्याग्नेर्ददर्श ध्वजमुच्छ्रितम्॥ १६॥

आगे जाकर वे बड़ी तेजीसे चित्रकूट पर्वतके एक शाल-वृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमपर सुलगती हुई आगका ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा॥ १६॥

तं दृष्ट्वा भरत: श्रीमान् मुमोद सहबान्धव:।

अत्र राम इति ज्ञात्वा गत: पारमिवाम्भस:॥ १७॥

उस धूमको देखकर श्रीमान् भरतको अपने भाई शत्रुघ्न- सहित बड़ी प्रसन्नता हुई और ‘यहीं श्रीराम हैं’ यह जानकर उन्हें अथाह जलसे पार हो जानेके समान संतोष प्राप्त हुआ॥ १७॥

स चित्रकूटे तु गिरौ निशम्य

रामाश्रमं पुण्यजनोपपन्नम्।

गुहेन सार्धं त्वरितो जगाम

पुनर्निवेश्यैव चमूं महात्मा॥ १८॥

इस प्रकार चित्रकूट पर्वतपर पुण्यात्मा महर्षियोंसे युक्त श्रीरामचन्द्रजीका आश्रम देखकर महात्मा भरतने ढूँढ़नेके लिये आयी हुई सेनाको पुन: पूर्वस्थानपर ठहरा दिया और वे स्वयं गुहके साथ शीघ्रतापूर्वक आश्रमकी ओर चल दिये॥ १८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टनवतितम: सर्ग:॥ ९८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९८॥

 

नवनवतितम: सर्ग:

भरतका शत्रुघ्न आदिके साथ श्रीरामके आश्रमपर जाना, उनकी पर्णशालाको देखना तथा रोते-रोते उनके चरणोंमें गिर जाना, श्रीरामका उन सबको हृदयसे लगाना और मिलना

निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्तत:।

जगाम भ्रातरं द्रष्टुं शत्रुघ्नमनुदर्शयन्॥ १॥

सेनाके ठहर जानेपर भाईके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्नको आश्रमके चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले॥ १॥

ऋषिं वसिष्ठं संदिश्य मातृर्मे शीघ्रमानय।

इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सल:॥ २॥

गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठको यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओंको साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये॥ २॥

सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत।

रामदर्शनजस्तर्षो भरतस्येव तस्य च॥ ३॥

सुमन्त्र भी शत्रुघ्नके समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें भी भरतके समान ही श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी तीव्र अभिलाषा थी॥ ३॥

गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालयसंस्थिताम्।

भ्रातु: पर्णकुटीं श्रीमानुटजं च ददर्श ह॥ ४॥

चलते-चलते ही श्रीमान् भरतने तपस्वीजनोंके आश्रमोंके समान प्रतिष्ठित हुई भाईकी पर्णकुटी और झोंपड़ी देखी॥ ४॥

शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा।

काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि च॥ ५॥

उस पर्णशालाके सामने भरतने उस समय बहुत-से कटे हुए काष्ठके टुकड़े देखे, जो होमके लिये संगृहीत थे। साथ ही वहाँ पूजाके लिये संचित किये हुए फूल भी दृष्टिगोचर हुए॥ ५॥

स लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाश्रममीयुष:।

कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशचीरै: क्वचित् क्वचित्॥ ६॥

आश्रमपर आने-जानेवाले श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा निर्मित मार्गबोधक चिह्न भी उन्हें वृक्षोंमें लगे दिखायी दिये, जो कुशों और चीरोंद्वारा तैयार करके कहीं-कहीं वृक्षोंकी शाखाओंमें लटका दिये गये थे॥ ६॥

ददर्श च वने तस्मिन् महत: संचयान् कृतान्।

मृगाणां महिषाणां च करीषै: शीतकारणात्॥ ७॥

उस वनमें शीत-निवारणके लिये मृगोंकी लेंडी और भैंसोंके सूखे हुए गोबरके ढेर एकत्र करके रखे गये थे, जिन्हें भरतने अपनी आँखों देखा॥ ७॥

गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान् भरतस्तदा।

शत्रुघ्नं चाब्रवीद् हृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वश:॥ ८॥

उस समय चलते-चलते ही परम कान्तिमान् महाबाहु भरतने शत्रुघ्न तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ ८॥

मन्ये प्राप्ता: स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्।

नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमित:॥ ९॥

‘जान पड़ता है कि महर्षि भरद्वाजने जिस स्थानका पता बताया था, वहाँ हमलोग आ गये हैं। मैं समझता हूँ मन्दाकिनी नदी यहाँसे अधिक दूर नहीं है॥ ९॥

उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम्।

अभिज्ञानकृत: पन्था विकाले गन्तुमिच्छता॥ १०॥

‘वृक्षोंमें ऊँचे बँधे हुए ये चीर दिखायी दे रहे हैं। अत: समय-बेसमय जल आदि लानेके निमित्त बाहर जानेकी इच्छावाले लक्ष्मणने जिसकी पहचानके लिये यह चिह्न बनाया है, वह आश्रमको जानेवाला मार्ग यही हो सकता है॥ १०॥

इतश्चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम्।

शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम्॥ ११॥

‘इधरसे बड़े-बड़े दाँतवाले वेगशाली हाथी निकलकर एक-दूसरेके प्रति गर्जना करते हुए इस पर्वतके पार्श्वभागमें चक्कर लगाते रहते हैं (अत: उधर जानेसे रोकनेके लिये लक्ष्मणने ये चिह्न बनाये होंगे)॥ ११॥

यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसा: सततं वने।

तस्यासौ दृश्यते धूम: संकुल: कृष्णवर्त्मन:॥ १२॥

‘वनमें तपस्वी मुनि सदा जिनका आधान करना चाहते हैं, उन अग्निदेवका यह अति सघन धूम दृष्टिगोचर हो रहा है॥ १२॥

अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम्।

आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टं महर्षिमिव राघवम्॥ १३॥

‘यहाँ मैं गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले पुरुषसिंह आर्य रघुनन्दनका सदा आनन्दमग्न रहनेवाले महर्षिकी भाँति दर्शन करूँगा’॥ १३॥

अथ गत्वा मुहूर्तं तु चित्रकूटं स राघव:।

मन्दाकिनीमनुप्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत्॥ १४॥

तदनन्तर रघुकुलभूषण भरत दो ही घड़ीमें मन्दाकिनीके तटपर विराजमान चित्रकूटके पास जा पहुँचे और अपने साथवाले लोगोंसे इस प्रकार बोले—॥

जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रत:।

जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम्॥ १५॥

‘अहो! मेरे ही कारण पुरुषसिंह महाराज श्रीरामचन्द्र इस निर्जन वनमें आकर खुली पृथ्वीके ऊपर वीरासनसे बैठते हैं; अत: मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है॥ १५॥

मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युति:।

सर्वान् कामान् परित्यज्य वने वसति राघव:॥ १६॥

‘मेरे ही कारण महातेजस्वी लोकनाथ रघुनाथ भारी संकटमें पड़कर समस्त कामनाओंका परित्याग करके वनमें निवास करते हैं॥ १६॥

इति लोकसमाक्रुष्ट: पादेष्वद्य प्रसादयन्।

रामं तस्य पतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च॥ १७॥

‘इसलिये मैं सब लोगोंके द्वारा निन्दित हूँ, अत: मेरे जन्मको धिक्कार है! आज मैं श्रीरामको प्रसन्न करनेके लिये उनके चरणोंमें गिर जाऊँगा। सीता और लक्ष्मणके भी पैरों पडूँगा’॥ १७॥

एवं स विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मज:।

ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम्॥ १८॥

इस तरह विलाप करते हुए दशरथकुमार भरतने उस वनमें एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो परम पवित्र और मनोरम थी॥ १८॥

सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम्।

विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे॥ १९॥

वह शाल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंके बहुत-से पत्तोंद्वारा छायी हुई थी; अत: यज्ञशालामें जिसपर कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लंबी-चौड़ी वेदीके समान शोभा पा रही थी॥ १९॥

शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनै:।

रुक्मपृष्ठैर्महासारै: शोभितां शत्रुबाधकै:॥ २०॥

वहाँ इन्द्रधनुषके समान बहुत-से धनुष रखे गये थे, जो गुरुतर कार्य-साधनमें समर्थ थे। जिनके पृष्ठभाग सोनेसे मढ़े गये थे और जो बहुत ही प्रबल तथा शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले थे। उनसे उस पर्णकुटीकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ २०॥

अर्करश्मिप्रतीकाशैर्घोरैस्तूणगतै: शरै:।

शोभितां दीप्तवदनै: सर्पैर्भोगवतीमिव॥ २१॥

वहाँ तरकसोंमें बहुत-से बाण भरे थे, जो सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले और भयङ्कर थे। उन बाणोंसे वह पर्णशाला उसी प्रकार सुशोभित होती थी, जैसे दीप्तिमान् मुखवाले सर्पोंसे भोगवती पुरी शोभित होती है॥ २१॥

महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम्।

रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम्॥ २२॥

सोनेकी म्यानोंमें रखी हुई दो तलवारें और स्वर्णमय बिन्दुओंसे विभूषित दो विचित्र ढालें भी उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रही थीं॥ २२॥

गोधाङ्गुलित्रैरासक्तैश्चित्रकाञ्चनभूषितै: ।

अरिसंघैरनाधृष्यां मृगै: सिंहगुहामिव॥ २३॥

वहाँ गोहके चमड़ेके बने हुए बहुत-से सुवर्णजटित दस्ताने भी टँगे हुए थे। जैसे मृग सिंहकी गुफापर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार वह पर्णशाला शत्रुसमूहोंके लिये अगम्य एवं अजेय थी॥ २३॥

प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम्।

ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने॥ २४॥

श्रीरामके उस निवासस्थानमें भरतने एक पवित्र एवं विशाल वेदी भी देखी, जो ईशानकोणकी ओर कुछ नीची थी। उसपर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी॥ २४॥

निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम्।

उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम्॥ २५॥

कृष्णाजिनधरं तं तु चीरवल्कलवाससम्।

ददर्श राममासीनमभित: पावकोपमम्॥ २६॥

पर्णशालाकी ओर थोड़ी देरतक देखकर भरतने कुटियामें बैठे हुए अपने पूजनीय भ्राता श्रीरामको देखा, जो सिरपर जटामण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने अपने अङ्गोंमें कृष्णमृगचर्म तथा चीर एवं वल्कल वस्त्र धारण कर रखे थे। भरतको दिखायी दिया कि श्रीराम पास ही बैठे हैं और प्रज्वलित अग्निके समान अपनी दिव्य प्रभा फैला रहे हैं॥ २५-२६॥

सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम्।

पृथिव्या: सागरान्ताया भर्तारं धर्मचारिणम्॥ २७॥

उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम्।

स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च॥ २८॥

समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके स्वामी, धर्मात्मा, महाबाहु श्रीराम सनातन ब्रह्माकी भाँति कुश बिछी हुई वेदीपर बैठे थे। उनके कंधे सिंहके समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान थे। उस वेदीपर वे सीता और लक्ष्मणके साथ विराजमान थे॥ २७-२८॥

तं दृष्ट्वा भरत: श्रीमान् शोकमोहपरिप्लुत:।

अभ्यधावत धर्मात्मा भरत: केकयीसुत:॥ २९॥

उन्हें इस अवस्थामें देख धर्मात्मा श्रीमान् कैकेयीकुमार भरत शोक और मोहमें डूब गये तथा बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े॥ २९॥

दृष्ट्वैव विललापार्तो बाष्पसंदिग्धया गिरा।

अशक्नुवन् वारयितुं धैर्याद् वचनमब्रुवन्॥ ३०॥

भाईकी ओर दृष्टि पड़ते ही भरत आर्तभावसे विलाप करने लगे। वे अपने शोकके आवेगको धैर्यसे रोक न सके और आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले—॥ ३०॥

य: संसदि प्रकृतिभिर्भवेद् युक्त उपासितुम्।

वन्यैर्मृगैरुपासीन: सोऽयमास्ते ममाग्रज:॥ ३१॥

‘हाय! जो राजसभामें बैठकर प्रजा और मन्त्रिवर्गके द्वारा सेवा तथा सम्मान पानेके योग्य हैं, वे ही ये मेरे बड़े भ्राता श्रीराम यहाँ जंगली पशुओंसे घिरे हुए बैठे हैं॥

वासोभिर्बहुसाहस्रैर्यो महात्मा पुरोचित:।

मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन्॥ ३२॥

‘जो महात्मा पहले कई सहस्र वस्त्रोंका उपयोग करते थे, वे अब धर्माचरण करते हुए यहाँ केवल दो मृगचर्म धारण करते हैं॥ ३२॥

अधारयद् यो विविधाश्चित्रा: सुमनस: सदा।

सोऽयं जटाभारमिमं सहते राघव: कथम्॥ ३३॥

‘जो सदा नाना प्रकारके विचित्र फूलोंको अपने सिरपर धारण करते थे, वे ही ये श्रीरघुनाथजी इस समय इस जटाभारको कैसे सहन करते हैं?॥ ३३॥

यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचय:।

शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते॥ ३४॥

‘जिनके लिये शास्त्रोक्त यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा धर्मका संग्रह करना उचित है, वे इस समय शरीरको कष्ट देनेसे प्राप्त होनेवाले धर्मका अनुसंधान कर रहे हैं॥ ३४॥

चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम्।

मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते॥ ३५॥

‘जिनके अङ्गोंकी बहुमूल्य चन्दनसे सेवा होती थी, उन्हीं मेरे पूज्य भ्राताका यह शरीर कैसे मलसे सेवित हो रहा है॥ ३५॥

मन्निमित्तमिदं दु:खं प्राप्तो राम: सुखोचित:।

धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम्॥ ३६॥

‘हाय! जो सर्वथा सुख भोगनेके योग्य हैं, वे श्रीराम मेरे ही कारण ऐसे दु:खमें पड़ गये हैं। ओह! मैं कितना क्रूर हूँ? मेरे इस लोकनिन्दित जीवनको धिक्कार है!’॥ ३६॥

इत्येवं विलपन् दीन: प्रस्विन्नमुखपङ्कज:।

पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन्॥ ३७॥

इस प्रकार विलाप करते-करते भरत अत्यन्त दु:खी हो गये। उनके मुखारविन्दपर पसीनेकी बूँदें दिखायी देने लगीं। वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंतक पहुँचनेके पहले ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३७॥

दु:खाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबल:।

उक्त्वाऽऽर्येति सकृद् दीनं पुनर्नोवाच किंचन॥ ३८॥

अत्यन्त दु:खसे संतप्त होकर महाबली राजकुमार भरतने एक बार दीनवाणीमें ‘आर्य’ कहकर पुकारा। फिर वे कुछ न बोल सके॥ ३८॥

बाष्पै: पिहितकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम्।

आर्येत्येवाभिसंक्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत् तत:॥ ३९॥

आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था। यशस्वी श्रीरामकी ओर देख वे ‘हा! आर्य’ कहकर चीख उठे। इससे आगे उनसे कुछ बोला न जा सका॥ ३९॥

शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन्।

तावुभौ च समालिङ्गॺ रामोऽप्यश्रूण्यवर्तयत्॥ ४०॥

फिर शत्रुघ्नने भी रोते-रोते श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम किया। श्रीरामने उन दोनोंको उठाकर छातीसे लगा लिया। फिर वे भी नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे॥ ४०॥

तत: सुमन्त्रेण गुहेन चैव

समीयतू राजसुतावरण्ये।

दिवाकरश्चैव निशाकरश्च

यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम्॥ ४१॥

तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वनमें सुमन्त्र और निषादराज गुहसे मिले, मानो आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पतिसे मिल रहे हों॥

तान् पार्थिवान् वारणयूथपार्हान्

समागतांस्तत्र महत्यरण्ये।

वनौकसस्तेऽभिसमीक्ष्य सर्वे

त्वश्रूण्यमुञ्चन् प्रविहाय हर्षम्॥ ४२॥

यूथपति गजराजपर बैठकर यात्रा करनेयोग्य उन चारों राजकुमारोंको उस विशाल वनमें आया देख समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोकके आँसू बहाने लगे॥ ४२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवनवतितम: सर्ग:॥ ९९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९९॥

 

शततम: सर्ग:

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्नके बहाने राजनीतिका उपदेश करना

जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।

ददर्श रामो दुर्दर्शं युगान्ते भास्करं यथा॥ १॥

कथंचिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम्।

भ्रातरं भरतं राम: परिजग्राह पाणिना॥ २॥

आघ्राय रामस्तं मूर्ध्नि परिष्वज्य च राघवम्।

अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत सादरम्॥ ३॥

जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वीपर पड़े थे, मानो प्रलयकालमें सूर्यदेव धरतीपर गिर गये हों। उनको उस अवस्थामें देखना किसी भी स्नेही सुहृद्के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीरामने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीरामने भाई भरतको अपने हाथसे पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरतको गोदमें बिठाकर श्रीरामने बड़े आदरसे पूछा—॥ १—३॥

क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागत:।

न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि॥ ४॥

‘तात! पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वनमें आये हो? उनके जीते-जी तो तुम वनमें नहीं आ सकते थे॥

चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम्।

दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागत:॥ ५॥

‘मैं दीर्घकालके बाद दूरसे (नानाके घरसे) आये हुए भरतको आज इस वनमें देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वनमें आये हो?॥ ५॥

कच्चिन्नु धरते तात राजा यत् त्वमिहागत:।

कच्चिन्न दीन: सहसा राजा लोकान्तरं गत:॥ ६॥

‘भाई! महाराज जीवित हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे अत्यन्त दु:खी होकर सहसा परलोकवासी हो गये हों और इसीलिये तुम्हें स्वयं यहाँ आना पड़ा हो?॥

कच्चित् सौम्य न ते राज्यं भ्रष्टं बालस्य शाश्वतम्।

कच्चिच्छुश्रूषसे तात पितु: सत्यपराक्रम॥ ७॥

‘सौम्य! तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परासे चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? सत्यपराक्रमी तात भरत! तुम पिताजीकी सेवा-शुश्रूषा तो करते हो न?॥ ७॥

कच्चिद् दशरथो राजा कुशली सत्यसंगर:।

राजसूयाश्वमेधानामाहर्ता धर्मनिश्चित:॥ ८॥

‘जो धर्मपर अटल रहनेवाले हैं तथा जिन्होंने राजसूय एवं अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न?॥ ८॥

स कच्चिद् ब्राह्मणो विद्वान् धर्मनित्यो महाद्युति:।

इक्ष्वाकूणामुपाध्यायो यथावत् तात पूज्यते॥ ९॥

‘तात! क्या तुम सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुलके आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजीकी यथावत् पूजा करते हो?॥ ९॥

तात कच्चिच्च कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती।

सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकयी॥ १०॥

‘भाई! क्या माता कौसल्या सुखसे हैं? उत्तम संतानवाली सुमित्रा प्रसन्न हैं और आर्या कैकेयी देवी भी आनन्दित हैं?॥ १०॥

कच्चिद् विनयसम्पन्न: कुलपुत्रो बहुश्रुत:।

अनसूयुरनुद्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहित:॥ ११॥

‘जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, किसीके दोष न देखनेवाले तथा शास्त्रोक्त धर्मोंपर निरन्तर दृष्टि रखनेवाले हैं, उन पुरोहितजीका तुमने पूर्णत: सत्कार किया है?॥ ११॥

कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजु:।

हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा॥ १२॥

‘हवनविधिके ज्ञाता, बुद्धिमान् और सरल स्वभाववाले जिन ब्राह्मण देवताको तुमने अग्निहोत्र-कार्यके लिये नियुक्त किया है, वे सदा ठीक समयपर आकर क्या तुम्हें यह सूचित करते हैं कि इस समय अग्निमें आहुति दे दी गयी और अब अमुक समयमें हवन करना है?॥

कच्चिद् देवान् पितृन् भृत्यान् गुरून् पितृसमानपि।

वृद्धांश्च तात वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे॥ १३॥

‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिताके समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणोंका सम्मान करते हो?॥ १३॥

इष्वस्त्रवरसम्पन्नमर्थशास्त्रविशारदम् ।

सुधन्वानमुपाध्यायं कच्चित् त्वं तात मन्यसे॥ १४॥

‘भाई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणोंके प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रोंके प्रयोगके ज्ञानसे सम्पन्न और अर्थशास्त्र (राजनीति) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वाका क्या तुम समादर करते हो?॥ १४॥

कच्चिदात्मसमा: शूरा: श्रुतवन्तो जितेन्द्रिया:।

कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिण:॥ १५॥

‘तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओंसे ही मनकी बात समझ लेनेवाले सुयोग्य व्यक्तियोंको ही मन्त्री बनाया है?॥ १५॥

मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव।

सुसंवृतो मन्त्रिधुरैरमात्यै: शास्त्रकोविदै:॥ १६॥

‘रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओंकी विजयका मूलकारण है। वह भी तभी सफल होती है, जब नीति-शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें॥ १६॥

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित् कालेऽवबुध्यसे।

कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थनैपुणम्॥ १७॥

‘भरत! तुम असमयमें ही निद्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जाग जाते हो न? रातके पिछले पहरमें अर्थसिद्धिके उपायपर विचार करते हो न?॥ १७॥

कच्चिन्मन्त्रयसे नैक: कच्चिन्न बहुभि: सह।

कच्चित् ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति॥ १८॥

‘(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है; छ: कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अत: मैं पूछता हूँ—) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो?॥ १८॥

कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम्।

क्षिप्रमारभसे कर्म न दीर्घयसि राघव॥ १९॥

‘रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्यका निश्चय करनेके बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते?॥ १९॥

कच्चिन्नु सुकृतान्येव कृतरूपाणि वा पुन:।

विदुस्ते सर्वकार्याणि न कर्तव्यानि पार्थिवा:॥ २०॥

‘तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों?॥ २०॥

कच्चिन्न तर्कैर्युक्त्या वा ये चाप्यपरिकीर्तिता:।

त्वया वा तव वामात्यैर्बुध्यते तात मन्त्रितम्॥ २१॥

‘तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारोंको तुम्हारे या मन्त्रियोंके प्रकट न करनेपर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियोंके द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? (तथा तुमको और तुम्हारे अमात्योंको दूसरोंके गुप्त विचारोंका पता लगता रहता है न?)॥ २१॥

कच्चित् सहस्रैर्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम्।

पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्नि:श्रेयसं महत्॥ २२॥

‘क्या तुम सहस्रों मूर्खोंके बदले एक पण्डितको ही अपने पास रखनेकी इच्छा रखते हो? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान् कल्याण कर सकता है॥ २२॥

सहस्राण्यपि मूर्खाणां यद्युपास्ते महीपति:।

अथवाप्ययुतान्येव नास्ति तेषु सहायता॥ २३॥

‘यदि राजा हजार या दस हजार मूर्खोंको अपने पास रख ले तो भी उनसे अवसरपर कोई अच्छी सहायता नहीं मिलती॥ २३॥

एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षण:।

राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्॥ २४॥

‘यदि एक मन्त्री भी मेधावी, शूर-वीर, चतुर एवं नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमारको बहुत बड़ी सम्पत्तिकी प्राप्ति करा सकता है॥ २४॥

कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमा:।

जघन्याश्च जघन्येषु भृत्यास्ते तात योजिता:॥ २५॥

‘तात! तुमने प्रधान व्यक्तियोंको प्रधान, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मध्यम और छोटी श्रेणीके लोगोंको छोटे ही कामोंमें नियुक्त किया है न?॥ २५॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन्।

श्रेष्ठान् श्रेष्ठेषु कच्चित् त्वं नियोजयसि कर्मसु॥ २६॥

‘जो घूस न लेते हों अथवा निश्छल हों, बाप-दादोंके समयसे ही काम करते आ रहे हों तथा बाहर-भीतरसे पवित्र एवं श्रेष्ठ हों, ऐसे अमात्योंको ही तुम उत्तम कार्योंमें नियुक्त करते हो न?॥ २६॥

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजिता: प्रजा:।

राष्ट्रे तवावजानन्ति मन्त्रिण: कैकयीसुत॥ २७॥

‘कैकेयीकुमार! तुम्हारे राज्यकी प्रजा कठोर दण्डसे अत्यन्त उद्विग्न होकर तुम्हारे मन्त्रियोंका तिरस्कार तो नहीं करती?॥ २७॥

कच्चित् त्वां नावजानन्ति याजका: पतितं यथा।

उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रिय:॥ २८॥

‘जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?॥ २८॥

उपायकुशलं वैद्यं भृत्यसंदूषणे रतम्।

शूरमैश्वर्यकामं च यो हन्ति न स हन्यते॥ २९॥

‘जो साम-दाम आदि उपायोंके प्रयोगमें कुशल, राजनीतिशास्त्रका विद्वान्, विश्वासी भृत्योंको फोड़नेमें लगा हुआ, शूर (मरनेसे न डरनेवाला) तथा राजाके राज्यको हड़प लेनेकी इच्छा रखनेवाला है—ऐसे पुरुषको जो राजा नहीं मार डालता है, वह स्वयं उसके हाथसे मारा जाता है॥ २९॥

कच्चिद् धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमान् शुचि:।

कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्ष: सेनापति: कृत:॥ ३०॥

‘क्या तुमने सदा संतुष्ट रहनेवाले, शूर-वीर, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले, रणकर्मदक्ष पुरुषको ही सेनापति बनाया है?॥ ३०॥

बलवन्तश्च कच्चित् ते मुख्या युद्धविशारदा:।

दृष्टापदाना विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिता:॥ ३१॥

‘तुम्हारे प्रधान-प्रधान योद्धा (सेनापति) बलवान्, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न? क्या तुमने उनके शौर्यकी परीक्षा कर ली है? तथा क्या वे तुम्हारे द्वारा सत्कारपूर्वक सम्मान पाते रहते हैं?॥ ३१॥

कच्चिद् बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्।

सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे॥ ३२॥

‘सैनिकोंको देनेके लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समयपर दे देते हो न? देनेमें विलम्ब तो नहीं करते?॥ ३२॥

कालातिक्रमणे ह्येव भक्तवेतनयोर्भृता:।

भर्तुरप्यतिकुप्यन्ति सोऽनर्थ: सुमहान् कृत:॥ ३३॥

‘यदि समय बिताकर भत्ता और वेतन दिये जाते हैं तो सैनिक अपने स्वामीपर भी अत्यन्त कुपित हो जाते हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ घटित हो जाता है॥

कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्रा: प्रधानत:।

कच्चित् प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति समाहिता:॥ ३४॥

‘क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणोंका त्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं?॥ ३४॥

कच्चिज्जानपदो विद्वान् दक्षिण: प्रतिभानवान्।

यथोक्तवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डित:॥ ३५॥

‘भरत! तुमने जिसे राजदूतके पदपर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देशका निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरेके सामने कहनेवाला और सदसद्विवेकयुक्त है न?॥ ३५॥

कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।

त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकै:॥ ३६॥

‘क्या तुम शत्रुपक्षके अठारह64 और अपने पक्षके पंद्रह65 तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो?॥ ३६॥

कच्चिद् व्यपास्तानहितान् प्रतियातांश्च सर्वदा।

दुर्बलाननवज्ञाय वर्तसे रिपुसूदन॥ ३७॥

‘शत्रुसूदन! जिन शत्रुओंको तुमने राज्यसे निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते?॥ ३७॥

कच्चिन्न लोकायतिकान् ब्राह्मणांस्तात सेवसे।

अनर्थकुशला ह्येते बाला: पण्डितमानिन:॥ ३८॥

‘तात! तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणोंका संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धिको परमार्थकी ओरसे विचलित करनेमें कुशल होते हैं तथा वास्तवमें अज्ञानी होते हुए भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं॥ ३८॥

धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यमानेषु दुर्बुधा:।

बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थं प्रवदन्ति ते॥ ३९॥

‘उनका ज्ञान वेदके विरुद्ध होनेके कारण दूषित होता है और वे प्रमाणभूत प्रधान-प्रधान धर्मशास्त्रोंके होते हुए भी तार्किक बुद्धिका आश्रय लेकर व्यर्थ बकवाद किया करते हैं॥ ३९॥

वीरैरध्युषितां पूर्वमस्माकं तात पूर्वकै:।

सत्यनामां दृढद्वारां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्॥ ४०॥

ब्राह्मणै: क्षत्रियैर्वैश्यै: स्वकर्मनिरतै: सदा।

जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यै: सहस्रश:॥ ४१॥

प्रासादैर्विविधाकारैर्वृतां वैद्यजनाकुलाम्।

कच्चित् समुदितां स्फीतामयोध्यां परिरक्षसे॥ ४२॥

‘तात! अयोध्या हमारे वीर पूर्वजोंकी निवासभूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओरसे सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकारके राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानोंसे भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्याकी तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न?॥ ४०—४२॥

कच्चिच्चैत्यशतैर्जुष्ट: सुनिविष्टजनाकुल:।

देवस्थानै: प्रपाभिश्च तटाकैश्चोपशोभित:॥ ४३॥

प्रहृष्टनरनारीक: समाजोत्सवशोभित:।

सुकृष्टसीमापशुमान् हिंसाभिरभिवर्जित:॥ ४४॥

अदेवमातृको रम्य: श्वापदै: परिवर्जित:।

परित्यक्तो भयै: सर्वै: खनिभिश्चोपशोभित:॥ ४५॥

विवर्जितो नरै: पापैर्मम पूर्वै: सुरक्षित:।

कच्चिज्जनपद: स्फीत: सुखं वसति राघव॥ ४६॥

‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकारके अश्वमेध आदि महायज्ञोंके बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्यामें निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँके स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवोंके कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतनेमें समर्थ पशुओंकी अधिकता है, जहाँ किसी प्रकारकी हिंसा नहीं होती, जहाँ खेतीके लिये वर्षाके जलपर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियोंके जलसे ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओंसे रहित है, जहाँ किसी तरहका भय नहीं है, नाना प्रकारकी खानें जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्योंका सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजोंने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्यसे सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?॥ ४३—४६॥

कच्चित् ते दयिता: सर्वे कृषिगोरक्षजीविन:।

वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते॥ ४७॥

‘तात! कृषि और गोरक्षासे आजीविका चलानेवाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदिमें संलग्न रहनेपर ही यह लोक सुखी एवं उन्नतिशील होता है॥ ४७॥

तेषां गुप्तिपरीहारै: कच्चित् ते भरणं कृतम्।

रक्ष्या हि राज्ञा धर्मेण सर्वे विषयवासिन:॥ ४८॥

‘उन वैश्योंको इष्टकी प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्टका निवारण करके तुम उन सब लोगोंका भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजाको अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंका धर्मानुसार पालन करना चाहिये॥ ४८॥

कच्चित् स्त्रिय: सान्त्वयसे कच्चित् तास्ते सुरक्षिता:।

कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद् गुह्यं न भाषसे॥ ४९॥

‘क्या तुम अपनी स्त्रियोंको संतुष्ट रखते हो? क्या वे तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सुरक्षित रहती हैं? तुम उनपर अधिक विश्वास तो नहीं करते? उन्हें अपनी गुप्त बात तो नहीं कह देते?॥ ४९॥

कच्चिन्नागवनं गुप्तं कच्चित् ते सन्ति धेनुका:।

कच्चिन्न गणिकाश्वानां कुञ्जराणां च तृप्यसि॥ ५०॥

‘जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देनेवाली गौएँ तो अधिक संख्यामें हैं न? (अथवा हाथियोंको फँसानेवाली हथिनियोंकी तो तुम्हारे पास कमी नहीं है?) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियोंके संग्रहसे कभी तृप्ति तो नहीं होती?॥ ५०॥

कच्चिद् दर्शयसे नित्यं मानुषाणां विभूषितम्।

उत्थायोत्थाय पूर्वाह्णे राजपुत्र महापथे॥ ५१॥

‘राजकुमार! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्णकालमें वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो प्रधान सड़कपर जा-जाकर नगरवासी मनुष्योंको दर्शन देते हो?॥ ५१॥

कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ता: प्रत्यक्षास्तेऽविशङ्कया।

सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा मध्यमेवात्र कारणम्॥ ५२॥

‘काम-काजमें लगे हुए सभी मनुष्य निडर होकर तुम्हारे सामने तो नहीं आते? अथवा वे सब सदा तुमसे दूर तो नहीं रहते? क्योंकि कर्मचारियोंके विषयमें मध्यम स्थितिका अवलम्बन करना ही अर्थसिद्धिका कारण होता है॥ ५२॥

कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकै:।

यन्त्रैश्च प्रतिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरै:॥ ५३॥

‘क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं?॥ ५३॥

आयस्ते विपुल: कच्चित् कच्चिदल्पतरो व्यय:।

अपात्रेषु न ते कच्चित् कोषो गच्छति राघव॥ ५४॥

‘रघुनन्दन! क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? तुम्हारे खजानेका धन अपात्रोंके हाथमें तो नहीं चला जाता?॥ ५४॥

देवतार्थे च पित्रर्थे ब्राह्मणाभ्यागतेषु च।

योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद् गच्छति ते व्यय:॥ ५५॥

‘देवता, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागत, योद्धा तथा मित्रोंके लिये ही तो तुम्हारा धन खर्च होता है न?॥ ५५॥

कच्चिदार्योऽपि शुद्धात्मा क्षारितश्चापकर्मणा।

अदृष्ट: शास्त्रकुशलैर्न लोभाद् बध्यते शुचि:॥ ५६॥

‘कभी ऐसा तो नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी श्रेष्ठ, निर्दोष और शुद्धात्मा पुरुषपर भी दोष लगा दे तथा शास्त्रज्ञानमें कुशल विद्वानोंद्वारा उसके विषयमें विचार कराये बिना ही लोभवश उसे आर्थिक दण्ड दे दिया जाता हो?॥ ५६॥

गृहीतश्चैव पृष्टश्च काले दृष्ट: सकारण:।

कच्चिन्न मुच्यते चोरो धनलोभान्नरर्षभ॥ ५७॥

‘नरश्रेष्ठ! जो चोरीमें पकड़ा गया हो, जिसे किसीने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछसे भी जिसके चोर होनेका प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरीका माल बरामद होना आदि) और भी बहुत-से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोरको भी तुम्हारे राज्यमें धनके लालचसे छोड़ तो नहीं दिया जाता है?॥ ५७॥

व्यसने कच्चिदाढ्यस्य दुर्बलस्य च राघव।

अर्थं विरागा: पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुता:॥ ५८॥

‘रघुकुलभूषण! यदि धनी और गरीबमें कोई विवाद छिड़ा हो और वह राज्यके न्यायालयमें निर्णयके लिये आया हो तो तुम्हारे बहुज्ञ मन्त्री धन आदिके लोभको छोड़कर उस मामलेपर विचार करते हैं न?॥ ५८॥

यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि राघव।

तानि पुत्रपशून् घ्नन्ति प्रीत्यर्थमनुशासत:॥ ५९॥

‘रघुनन्दन! निरपराध होनेपर भी जिन्हें मिथ्या दोष लगाकर दण्ड दिया जाता है, उन मनुष्योंकी आँखोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्ण शासन करनेवाले राजाके पुत्र और पशुओंका नाश कर डालते हैं॥ ५९॥

कच्चिद् वृद्धांश्च बालांश्च वैद्यान् मुख्यांश्च राघव।

दानेन मनसा वाचा त्रिभिरेतैर्बुभूषसे॥ ६०॥

‘राघव! क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों और प्रधान-प्रधान वैद्योंका आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन और धनदान—इन तीनोंके द्वारा सम्मान करते हो?॥ ६०॥

कच्चिद् गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन्।

चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि॥ ६१॥

‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणोंको नमस्कार करते हो न?॥ ६१॥

कच्चिदर्थेन वा धर्ममर्थं धर्मेण वा पुन:।

उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन न विबाधसे॥ ६२॥

‘तुम अर्थके द्वारा धर्मको अथवा धर्मके द्वारा अर्थको हानि तो नहीं पहुँचाते? अथवा आसक्ति और लोभरूप कामके द्वारा धर्म और अर्थ दोनोंमें बाधा तो नहीं आने देते?॥

कच्चिदर्थं च कामं च धर्मं च जयतां वर।

विभज्य काले कालज्ञ सर्वान् वरद सेवसे॥ ६३॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता तथा दूसरोंको वर देनेमें समर्थ भरत! क्या तुम समयका विभाग करके धर्म, अर्थ और कामका योग्य समयमें सेवन करते हो?॥ ६३॥

कच्चित् ते ब्राह्मणा: शर्म सर्वशास्त्रार्थकोविदा:।

आशंसन्ते महाप्राज्ञ पौरजानपदै: सह॥ ६४॥

‘महाप्राज्ञ! सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थको जाननेवाले ब्राह्मण पुरवासी और जनपदवासी मनुष्योंके साथ तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं न?॥ ६४॥

नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम्।

अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम्॥ ६५॥

एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च मन्त्रणम्।

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम्॥ ६६॥

मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वत:।

कच्चित् त्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश॥ ६७॥

‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषोंका संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत होना, राजकार्योंके विषयमें अकेले ही विचार करना, प्रयोजनको न समझनेवाले विपरीतदर्शी मूर्खोंसे सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्योंका शीघ्र प्रारम्भ न करना, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्योंका अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओंपर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजाके चौदह दोष हैं। तुम इन दोषोंका सदा परित्याग करते हो न?॥ ६५—६७॥

दशपञ्चचतुर्वर्गान् सप्तवर्गं च तत्त्वत:।

अष्टवर्गं त्रिवर्गं च विद्यास्तिस्रश्च राघव॥ ६८॥

इन्द्रियाणां जयं बुद‍्ध्वा षाड्गुण्यं दैवमानुषम्।

कृत्यं विंशतिवर्गं च तथा प्रकृतिमण्डलम्॥ ६९॥

यात्रादण्डविधानं च द्वियोनी संधिविग्रहौ।

कच्चिदेतान् महाप्राज्ञ यथावदनुमन्यसे॥ ७०॥

‘महाप्राज्ञ भरत! दशवर्ग,66 पञ्चवर्ग,67 चतुर्वर्ग,68 सप्तवर्ग,69 अष्टवर्ग,70 त्रिवर्ग,71 तीन विद्या,72 बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको जीतना, छ: गुण,73 दैवी74 और मानुषी बाधाएँ, राजाके नीतिपूर्ण कार्य,75 विंशतिवर्ग,76 प्रकृतिमण्डल,77 यात्रा (शत्रुपर आक्रमण), दण्डविधान (व्यूहरचना) तथा दो-दो गुणोंकी78 योनिभूत संधि और विग्रह—इन सबकी ओर तुम यथार्थ रूपसे ध्यान देते हो न? इनमेंसे त्यागनेयोग्य दोषोंको त्यागकर ग्रहण करनेयोग्य गुणोंको ग्रहण करते हो न?॥ ६८—७०॥

मन्त्रिभिस्त्वं यथोद्दिष्टं चतुर्भिस्त्रिभिरेव वा।

कच्चित् समस्तैर्व्यस्तैश्च मन्त्रं मन्त्रयसे बुध॥ ७१॥

‘विद्वन्! क्या तुम नीतिशास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चार या तीन मन्त्रियोंके साथ—सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग-अलग मिलकर सलाह करते हो?॥ ७१॥

कच्चित् ते सफला वेदा: कच्चित् ते सफला: क्रिया:।

कच्चित् ते सफला दारा: कच्चित् ते सफलं श्रुतम्॥ ७२॥

‘क्या तुम वेदोंकी आज्ञाके अनुसार काम करके उन्हें सफल करते हो? क्या तुम्हारी क्रियाएँ सफल (उद्देश्यकी सिद्धि करनेवाली) हैं? क्या तुम्हारी स्त्रियाँ भी सफल (संतानवती) हैं? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान भी विनय आदि गुणोंका उत्पादक होकर सफल हुआ है?॥ ७२॥

कच्चिदेषैव ते बुद्धिर्यथोक्ता मम राघव।

आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थसंहिता॥ ७३॥

‘रघुनन्दन! मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हारी बुद्धिका भी ऐसा ही निश्चय है न? क्योंकि यह विचार आयु और यशको बढ़ानेवाला तथा धर्म, काम और अर्थकी सिद्धि करनेवाला है॥ ७३॥

यां वृत्तिं वर्तते तातो यां च न: प्रपितामह:।

तां वृत्तिं वर्तसे कच्चिद् या च सत्पथगा शुभा॥ ७४॥

‘हमारे पिताजी जिस वृत्तिका आश्रय लेते हैं, हमारे प्रपितामहोंने जिस आचरणका पालन किया है, सत्पुरुष भी जिसका सेवन करते हैं और जो कल्याणका मूल है, उसीका तुम पालन करते हो न?॥ ७४॥

कच्चित् स्वादुकृतं भोज्यमेको नाश्नासि राघव।

कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्य: सम्प्रयच्छसि॥ ७५॥

‘रघुनन्दन! तुम स्वादिष्ट अन्न अकेले ही तो नहीं खा जाते? उसकी आशा रखनेवाले मित्रोंको भी देते हो न?॥ ७५॥

राजा तु धर्मेण हि पालयित्वा

महीपतिर्दण्डधर: प्रजानाम्।

अवाप्य कृत्स्नां वसुधां यथाव-

दितश्च्युत: स्वर्गमुपैति विद्वान्॥ ७६॥

‘इस प्रकार धर्मके अनुसार दण्ड धारण करनेवाला विद्वान् राजा प्रजाओंका पालन करके समूची पृथ्वीको यथावत्रूपसे अपने अधिकारमें कर लेता है तथा देहत्याग करनेके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है’॥ ७६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे शततम: सर्ग:॥ १००॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १००॥

 

 


एकाधिकशततम: सर्ग:

श्रीरामका भरतसे वनमें आगमनका प्रयोजन पूछना, भरतका उनसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना और श्रीरामका उसे अस्वीकार कर देना

तं तु राम: समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम्।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे॥ १॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने अपने गुरुभक्त भाई भरतको अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ १॥

किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया।

यस्मात् त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी॥ २॥

यन्निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधर:।

हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि॥ ३॥

‘भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देशमें आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्तसे इस वनमें तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँहसे सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये’॥ २-३॥

इत्युक्त: केकयीपुत्र: काकुत्स्थेन महात्मना।

प्रगृह्य बलवद् भूय: प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ४॥

ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतने बलपूर्वक आन्तरिक शोकको दबा पुन: हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—॥ ४॥

आर्य तात: परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।

गत: स्वर्गं महाबाहु: पुत्रशोकाभिपीडित:॥ ५॥

‘आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोकसे पीडि़त हो हमें छोड़कर स्वर्गलोकको चले गये॥ ५॥

स्त्रिया नियुक्त: कैकेय्या मम मात्रा परंतप।

चकार सा महत्पापमिदमात्मयशोहरम्॥ ६॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयीकी प्रेरणासे ही विवश हो पिताजीने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँने अपने सुयशको नष्ट करनेवाला यह बड़ा भारी पाप किया है॥ ६॥

सा राज्यफलमप्राप्य विधवा शोककर्शिता।

पतिष्यति महाघोरे नरके जननी मम॥ ७॥

‘अत: वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोकसे दुर्बल हो महाघोर नरकमें पड़ेगी॥ ७॥

तस्य मे दासभूतस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि।

अभिषिञ्चस्व चाद्यैव राज्येन मघवानिव॥ ८॥

‘अब आप अपने दासस्वरूप मुझ भरतपर कृपा कीजिये और इन्द्रकी भाँति आज ही राज्य ग्रहण करनेके लिये अपना अभिषेक कराइये॥ ८॥

इमा: प्रकृतय: सर्वा विधवा मातरश्च या:।

त्वत्सकाशमनुप्राप्ता: प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ ९॥

‘ये सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं। आप इन सबपर कृपा करें॥ ९॥

तथानुपूर्व्या युक्तश्च युक्तं चात्मनि मानद।

राज्यं प्राप्नुहि धर्मेण सकामान् सुहृद: कुरु॥ १०॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले रघुवीर! आप ज्येष्ठ होनेके नाते राज्य-प्राप्तिके क्रमिक अधिकारसे युक्त हैं, न्यायत: आपको ही राज्य मिलना उचित है; अत: आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदोंको सफल-मनोरथ बनावें॥ १०॥

भवत्वविधवा भूमि: समग्रा पतिना त्वया।

शशिना विमलेनेव शारदी रजनी यथा॥ ११॥

‘आप-जैसे पतिसे युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमासे सनाथ हुई शरत्कालकी रात्रिके समान शोभा पाने लगे॥ ११॥

एभिश्च सचिवै: सार्धं शिरसा याचितो मया।

भ्रातु: शिष्यस्य दासस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ १२॥

‘मैं इन समस्त सचिवोंके साथ आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ। आप मुझपर कृपा करें॥ १२॥

तदिदं शाश्वतं पित्र्यं सर्वं सचिवमण्डलम्।

पूजितं पुरुषव्याघ्र नातिक्रमितुमर्हसि॥ १३॥

‘पुरुषसिंह! यह सारा मन्त्रिमण्डल अपने यहाँ कुलपरम्परासे चला आ रहा है। ये सभी सचिव पिताजीके समयमें भी थे। हम सदासे इनका सम्मान करते आये हैं, अत: आप इनकी प्रार्थना न ठुकरायें’॥ १३॥

एवमुक्त्वा महाबाहु: सबाष्प: कैकयीसुत:।

रामस्य शिरसा पादौ जग्राह भरत: पुन:॥ १४॥

ऐसा कहकर कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए पुन: श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंसे माथा टेक दिया॥ १४॥

तं मत्तमिव मातङ्गं नि:श्वसन्तं पुन: पुन:।

भ्रातरं भरतं राम: परिष्वज्येदमब्रवीत्॥ १५॥

उस समय वे मतवाले हाथीके समान बारंबार लंबी साँस खींचने लगे, तब श्रीरामने भाई भरतको उठाकर हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ १५॥

कुलीन: सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रत:।

राज्यहेतो: कथं पापमाचरेन्मद्विधो जन:॥ १६॥

‘भाई! तुम्हीं बताओ। उत्तम कुलमें उत्पन्न, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतोंका पालन करनेवाला मेरे-जैसा मनुष्य राज्यके लिये पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन रूप पाप कैसे कर सकता है?॥ १६॥

न दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन।

न चापि जननीं बाल्यात् त्वं विगर्हितुमर्हसि॥ १७॥

‘शत्रुसूदन! मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता। अज्ञानवश तुम्हें अपनी माताकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ १७॥

कामकारो महाप्राज्ञ गुरूणां सर्वदानघ।

उपपन्नेषु दारेषु पुत्रेषु च विधीयते॥ १८॥

‘निष्पाप महाप्राज्ञ! गुरुजनोंका अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रोंपर सदा पूर्ण अधिकार होता है। वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं॥ १८॥

वयमस्य यथा लोके संख्याता: सौम्य साधुभि:।

भार्या: पुत्राश्च शिष्याश्च त्वमपि ज्ञातुमर्हसि॥ १९॥

‘सौम्य! माताओंसहित हम भी इस लोकमें श्रेष्ठ पुरुषों- द्वारा महाराजके स्त्री-पुत्र और शिष्य कहे गये हैं, अत: हमें भी उनको सब तरहकी आज्ञा देनेका अधिकार था। इस बातको तुम भी समझने योग्य हो॥

वने वा चीरवसनं सौम्य कृष्णाजिनाम्बरम्।

राज्ये वापि महाराजो मां वासयितुमीश्वर:॥ २०॥

‘सौम्य! महाराज मुझे वल्कल वस्त्र और मृगचर्म धारण कराकर वनमें ठहरावें अथवा राज्यपर बिठावें—इन दोनों बातोंके लिये वे सर्वथा समर्थ थे॥ २०॥

यावत् पितरि धर्मज्ञ गौरवं लोकसत्कृते।

तावद् धर्मकृतां श्रेष्ठ जनन्यामपि गौरवम्॥ २१॥

‘धर्मज्ञ! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरत! मनुष्यकी विश्ववन्द्य पितामें जितनी गौरव-बुद्धि होती है, उतनी ही मातामें भी होनी चाहिये॥ २१॥

एताभ्यां धर्मशीलाभ्यां वनं गच्छेति राघव।

मातापितृभ्यामुक्तोऽहं कथमन्यत् समाचरे॥ २२॥

‘रघुनन्दन! इन धर्मशील माता और पिता दोनोंने जब मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञाके विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ?॥ २२॥

त्वया राज्यमयोध्यायां प्राप्तव्यं लोकसत्कृतम्।

वस्तव्यं दण्डकारण्ये मया वल्कलवाससा॥ २३॥

‘तुम्हें अयोध्यामें रहकर समस्त जगत्के लिये आदरणीय राज्य प्राप्त करना चाहिये और मुझे वल्कल वस्त्र धारण करके दण्डकारण्यमें रहना चाहिये॥ २३॥

एवमुक्त्वा महाराजो विभागं लोकसंनिधौ।

व्यादिश्य च महाराजो दिवं दशरथो गत:॥ २४॥

‘क्योंकि महाराज दशरथ बहुत लोगोंके सामने हम दोनोंके लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्गको सिधारे हैं॥ २४॥

स च प्रमाणं धर्मात्मा राजा लोकगुरुस्तव।

पित्रा दत्तं यथाभागमुपभोक्तुं त्वमर्हसि॥ २५॥

‘इस विषयमें लोकगुरु धर्मात्मा राजा ही तुम्हारे लिये प्रमाणभूत हैं—उन्हींकी आज्ञा तुम्हें माननी चाहिये और पिताने तुम्हारे हिस्सेमें जो कुछ दिया है, उसीका तुम्हें यथावत् रूपसे उपभोग करना चाहिये॥ २५॥

चतुर्दश समा: सौम्य दण्डकारण्यमाश्रित:।

उपभोक्ष्ये त्वहं दत्तं भागं पित्रा महात्मना॥ २६॥

‘सौम्य! चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें रहनेके बाद ही महात्मा पिताके दिये हुए राज्य-भागका मैं उपभोग करूँगा॥ २६॥

यदब्रवीन्मां नरलोकसत्कृत:

पिता महात्मा विबुधाधिपोपम:।

तदेव मन्ये परमात्मनो हितं

न सर्वलोकेश्वरभावमव्ययम्॥ २७॥

‘मनुष्यलोकमें सम्मानित और देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिताने मुझे जो वनवासकी आज्ञा दी है, उसीको मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञाके विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्माका अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाधिकशततम: सर्ग:॥ १०१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०१॥79

 

द्वॺधिकशततम: सर्ग:

भरतका पुन: श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेका अनुरोध करके उनसे पिताकी मृत्युका समाचार बताना

रामस्य वचनं श्रुत्वा भरत: प्रत्युवाच ह।

किं मे धर्माद् विहीनस्य राजधर्म: करिष्यति॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीकी बात सुनकर भरतने इस प्रकार उत्तर दिया—‘भैया! मैं राज्यका अधिकारी न होनेके कारण उस राजधर्मके अधिकारसे रहित हूँ, अत: मेरे लिये यह राजधर्मका उपदेश किस काम आयगा?॥ १॥

शाश्वतोऽयं सदा धर्म: स्थितोऽस्मासु नरर्षभ।

ज्येष्ठे पुत्रे स्थिते राजा न कनीयान् भवेन्नृप:॥ २॥

‘नरश्रेष्ठ! हमारे यहाँ सदासे ही इस शाश्वत धर्मका पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्रके रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता॥ २॥

स समृद्धां मया सार्धमयोध्यां गच्छ राघव।

अभिषेचय चात्मानं कुलस्यास्य भवाय न:॥ ३॥

‘अत: रघुनन्दन! आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरीको चलिये और हमारे कुलके अभ्युदयके लिये राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये॥ ३॥

राजानं मानुषं प्राहुर्देवत्वे सम्मतो मम।

यस्य धर्मार्थसहितं वृत्तमाहुरमानुषम्॥ ४॥

‘यद्यपि सब लोग राजाको मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी रायमें वह देवत्वपर प्रतिष्ठित है; क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचारको साधारण मनुष्यके लिये असम्भावित बताया गया है॥ ४॥

केकयस्थे च मयि तु त्वयि चारण्यमाश्रिते।

धीमान् स्वर्गं गतो राजा यायजूक: सतां मत:॥ ५॥

‘जब मैं केकयदेशमें था और आप वनमें चले आये थे, तब अश्वमेध आदि यज्ञोंके कर्ता और सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् महाराज दशरथ स्वर्गलोकको चले गये॥ ५॥

निष्क्रान्तमात्रे भवति सहसीते सलक्ष्मणे।

दु:खशोकाभिभूतस्तु राजा त्रिदिवमभ्यगात्॥ ६॥

‘सीता और लक्ष्मणके साथ आपके राज्यसे निकलते ही दु:ख-शोकसे पीडि़त हुए महाराज स्वर्गलोकको चल दिये॥ ६॥

उत्तिष्ठ पुरुषव्याघ्र क्रियतामुदकं पितु:।

अहं चायं च शत्रुघ्न: पूर्वमेव कृतोदकौ॥ ७॥

‘पुरुषसिंह! उठिये और पिताको जलाञ्जलि दान कीजिये। मैं और यह शत्रुघ्न—दोनों पहले ही उनके लिये जलाञ्जलि दे चुके हैं॥ ७॥

प्रियेण किल दत्तं हि पितृलोकेषु राघव।

अक्षयं भवतीत्याहुर्भवांश्चैव पितु: प्रिय:॥ ८॥

‘रघुनन्दन! कहते हैं, प्रिय पुत्रका दिया हुआ जल आदि पितृलोकमें अक्षय होता है और आप पिताके परम प्रिय पुत्र हैं॥ ८॥

त्वामेव शोचंस्तव दर्शनेप्सु-

स्त्वय्येव सक्तामनिवर्त्य बुद्धिम्।

त्वया विहीनस्तव शोकरुग्ण-

स्त्वां संस्मरन्नेव गत: पिता ते॥ ९ ॥

‘आपके पिता आपसे विलग होते ही शोकके कारण रुग्ण हो गये और आपके ही शोकमें मग्न हो, आपको ही देखनेकी इच्छा रखकर, आपमें ही लगी हुई बुद्धिको आपकी ओरसे न हटाकर, आपका ही स्मरण करते हुए स्वर्गको चले गये’॥ ९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वॺधिकशततम: सर्ग:॥ १०२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२॥

 

त्र्यधिकशततम: सर्ग:

श्रीराम आदिका विलाप, पिताके लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन

तां श्रुत्वा करुणां वाचं पितुर्मरणसंहिताम्।

राघवो भरतेनोक्तां बभूव गतचेतन:॥ १॥

भरतकी कही हुई पिताकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दु:खके कारण अचेत हो गये॥ १॥

तं तु वज्रमिवोत्सृष्टमाहवे दानवारिणा।

वाग्वज्रं भरतेनोक्तममनोज्ञं परंतप:॥ २॥

प्रगृह्य रामो बाहू वै पुष्पिताङ्ग इव द्रुम:।

वने परशुना कृत्तस्तथा भुवि पपात ह॥ ३॥

भरतके मुखसे निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्रने युद्धस्थलमें वज्रका प्रहार-सा कर दिया हो। मनको प्रिय न लगनेवाले उस वाग्-वज्रको सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वनमें कुल्हाड़ीसे कटे हुए उस वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े (भरतके दर्शनसे श्रीरामको हर्ष हुआ था, पिताकी मृत्युके संवादसे दु:ख; अत: उन्हें खिले और कटे हुए पेड़की उपमा दी गयी है)॥ २-३॥

तथा हि पतितं रामं जगत्यां जगतीपतिम्।

कूलघातपरिश्रान्तं प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥ ४॥

भ्रातरस्ते महेष्वासं सर्वत: शोककर्शितम्।

रुदन्त: सह वैदेह्या सिषिचु: सलिलेन वै॥ ५॥

पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वीपर गिरकर नदीके तटको दाँतोंसे विदीर्ण करनेके परिश्रमसे थककर सोये हुए हाथीके समान प्रतीत होते थे। शोकके कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीरामको सब ओरसे घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओंके जलसे भिगोने लगे॥ ४-५॥

स तु संज्ञां पुनर्लब्ध्वा नेत्राभ्यामश्रुमुत्सृजन्।

उपाक्रामत काकुत्स्थ: कृपणं बहु भाषितुम्॥ ६॥

थोड़ी देर बाद पुन: होशमें आनेपर नेत्रोंसे अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अत्यन्त दीन वाणीमें विलाप आरम्भ किया॥ ६॥

स राम: स्वर्गतं श्रुत्वा पितरं पृथिवीपतिम्।

उवाच भरतं वाक्यं धर्मात्मा धर्मसंहितम्॥ ७॥

पृथ्वीपति महाराज दशरथको स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीरामने भरतसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥

किं करिष्याम्ययोध्यायां ताते दिष्टां गतिं गते।

कस्तां राजवराद्धीनामयोध्यां पालयिष्यति॥ ८॥

‘भैया! जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्यामें चलकर अब मैं क्या करूँगा? उन राजशिरोमणि पितासे हीन हुई उस अयोध्याका अब कौन पालन करेगा?॥ ८॥

किं नु तस्य मया कार्यं दुर्जातेन महात्मन:।

यो मृतो मम शोकेन स मया न च संस्कृत:॥ ९॥

‘हाय! जो पिताजी मेरे ही शोकसे मृत्युको प्राप्त हुए, उन्हींका मैं दाह-संस्कारतक न कर सका। मुझ-जैसे व्यर्थ जन्म लेनेवाले पुत्रसे उन महात्मा पिताका कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ?॥ ९॥

अहो भरत सिद्धार्थो येन राजा त्वयानघ।

शत्रुघ्नेन च सर्वेषु प्रेतकृत्येषु सत्कृत:॥ १०॥

‘निष्पाप भरत! तुम्हीं कृतार्थ हो, तुम्हारा अहोभाग्य है, जिससे तुमने और शत्रुघ्नने सभी प्रेतकार्यों (पारलौकिक कृत्यों) में संस्कार-कर्मके द्वारा महाराजका पूजन किया है॥ १०॥

निष्प्रधानामनेकाग्रां नरेन्द्रेण विना कृताम्।

निवृत्तवनवासोऽपि नायोध्यां गन्तुमुत्सहे॥ ११॥

‘महाराज दशरथसे हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासकसे रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अत: वनवाससे लौटनेपर भी मेरे मनमें अयोध्या जानेका उत्साह नहीं रह गया है॥ ११॥

समाप्तवनवासं मामयोध्यायां परंतप।

कोऽनुशासिष्यति पुनस्ताते लोकान्तरं गते॥ १२॥

‘परंतप भरत! वनवासकी अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्यामें जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्यका उपदेश देगा; क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये॥ १२॥

पुरा प्रेक्ष्य सुवृत्तं मां पिता यान्याह सान्त्वयन्।

वाक्यानि तानि श्रोष्यामि कुत: कर्णसुखान्यहम्॥ १३॥

‘पहले जब मैं उनकी किसी आज्ञाका पालन करता था, तब वे मेरे सद‍्व्यवहारको देखकर मेरा उत्साह बढ़ानेके लिये जो-जो बातें कहा करते थे, कानोंको सुख पहुँचानेवाली उन बातोंको अब मैं किसके मुखसे सुनूँगा’॥

एवमुक्त्वाथ भरतं भार्यामभ्येत्य राघव:।

उवाच शोकसंतप्त: पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥ १४॥

भरतसे ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्रीरामचन्द्रजी पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नीके पास आकर बोले—॥ १४॥

सीते मृतस्ते श्वशुर: पितृहीनोऽसि लक्ष्मण।

भरतो दु:खमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपते:॥ १५॥

‘सीते! तुम्हारे श्वशुर चल बसे। लक्ष्मण! तुम पितृहीन हो गये। भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथके स्वर्गवासका दु:खदायी समाचार सुना रहे हैं’॥ १५॥

ततो बहुगुणं तेषां बाष्पं नेत्रेष्वजायत।

तथा ब्रुवति काकुत्स्थे कुमाराणां यशस्विनाम्॥ १६॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन सभी यशस्वी कुमारोंके नेत्रोंमें बहुत अधिक आँसू उमड़ आये॥ १६॥

ततस्ते भ्रातर: सर्वे भृशमाश्वास्य दु:खितम्।

अब्रुवञ्जगतीभर्तु: क्रियतामुदकं पितु:॥ १७॥

तदनन्तर सभी भाइयोंने दु:खी हुए श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना देते हुए कहा—‘भैया! अब पृथ्वीपति पिताजीके लिये जलाञ्जलि दान कीजिये’॥ १७॥

सा सीता स्वर्गतं श्रुत्वा श्वशुरं तं महानृपम्।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां न शशाकेक्षितुं प्रियम्॥ १८॥

अपने श्वशुर महाराज दशरथके स्वर्गवासका समाचार सुनकर सीताके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख न सकीं॥ १८॥

सान्त्वयित्वा तु तां रामो रुदतीं जनकात्मजाम्।

उवाच लक्ष्मणं तत्र दु:खितो दु:खितं वच:॥ १९॥

तदनन्तर रोती हुई जनककुमारीको सान्त्वना देकर दु:खमग्न श्रीरामने अत्यन्त दु:खी हुए लक्ष्मणसे कहा—

आनयेङ्गुदिपिण्याकं चीरमाहर चोत्तरम्।

जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मन:॥ २०॥

‘भाई! तुम इङ्गुदीका पिसा हुआ फल और चीर एवं उत्तरीय ले आओ। मैं महात्मा पिताको जलदान देनेके लिये चलूँगा॥ २०॥

सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज।

अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा॥ २१॥

‘सीता आगे-आगे चलें। इनके पीछे तुम चलो और तुम्हारे पीछे मैं चलूँगा। शोकके समयकी यही परिपाटी है, जो अत्यन्त दारुण होती है’॥ २१॥

ततो नित्यानुगस्तेषां विदितात्मा महामति:।

मृदुर्दान्तश्च कान्तश्च रामे च दृढभक्तिमान्॥ २२॥

सुमन्त्रस्तैर्नृपसुतै: सार्धमाश्वास्य राघवम्।

अवतारयदालम्ब्य नदीं मन्दाकिनीं शिवाम्॥ २३॥

तत्पश्चात् उनके कुलके परम्परागत सेवक, आत्मज्ञानी, परम बुद्धिमान्, कोमल स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, तेजस्वी और श्रीरामके सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारोंके साथ श्रीरामको धैर्य बँधाकर उन्हें हाथका सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनीके तटपर ले गये॥ २२-२३॥

ते सुतीर्थां तत: कृच्छ्रादुपगम्य यशस्विन:।

नदीं मन्दाकिनीं रम्यां सदा पुष्पितकाननाम्॥ २४॥

शीघ्रस्रोतसमासाद्य तीर्थं शिवमकर्दमम्।

सिषिचुस्तूदकं राज्ञे तत एतद् भवत्विति॥ २५॥

वे यशस्वी राजकुमार सदा पुष्पित काननसे सुशोभित, शीघ्र गतिसे प्रवाहित होनेवाली और उत्तम घाटवाली रमणीय नदी मन्दाकिनीके तटपर कठिनाईसे पहुँचे तथा उसके पङ्करहित, कल्याणप्रद, तीर्थभूत जलको लेकर उन्होंने राजाके लिये जल दिया। उस समय वे बोले—‘पिताजी! यह जल आपकी सेवामें उपस्थित हो’॥

प्रगृह्य तु महीपालो जलापूरितमञ्जलिम्।

दिशं याम्यामभिमुखो रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २६॥

एतत् ते राजशार्दूल विमलं तोयमक्षयम्।

पितृलोकगतस्याद्य मद्दत्तमुपतिष्ठतु॥ २७॥

पृथ्वीपालक श्रीरामने जलसे भरी हुई अञ्जलि ले दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके रोते हुए इस प्रकार कहा—‘मेरे पूज्य पिता राजशिरोमणि महाराज दशरथ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोकमें गये हुए आपको अक्षयरूपसे प्राप्त हो’॥ २६-२७॥

ततो मन्दाकिनीतीरं प्रत्युत्तीर्य स राघव:।

पितुश्चकार तेजस्वी निर्वापं भ्रातृभि: सह॥ २८॥

इसके बाद मन्दाकिनीके जलसे निकलकर किनारेपर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजीने अपने भाइयोंके साथ मिलकर पिताके लिये पिण्डदान किया॥ २८॥

ऐङ्गुदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे।

न्यस्य राम: सुदु:खार्तो रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २९॥

उन्होंने इङ्गुदीके गूदेमें बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशोंपर उसे रखकर अत्यन्त दु:खसे आर्त हो रोते हुए यह बात कही—॥ २९॥

इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम्।

यदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता:॥ ३०॥

‘महाराज! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिये; क्योंकि आजकल यही हमलोगोंका आहार है। मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं’॥ ३०॥

ततस्तेनैव मार्गेण प्रत्युत्तीर्य सरित्तटात्।

आरुरोह नरव्याघ्रो रम्यसानुं महीधरम्॥ ३१॥

तत: पर्णकुटीद्वारमासाद्य जगतीपति:।

परिजग्राह पाणिभ्यामुभौ भरतलक्ष्मणौ॥ ३२॥

इसके बाद उसी मार्गसे मन्दाकिनीतटके ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखरवाले चित्रकूट पर्वतपर चढ़े और पर्णकुटीके द्वारपर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर रोने लगे॥ ३१-३२॥

तेषां तु रुदतां शब्दात् प्रतिशब्दोऽभवद् गिरौ।

भ्रातृणां सह वैदेह्या सिंहानां नर्दतामिव॥ ३३॥

सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयोंके रुदन-शब्दसे उस पर्वतपर गरजते हुए सिंहोंके दहाड़नेके समान प्रतिध्वनि होने लगी॥ ३३॥

महाबलानां रुदतां कुर्वतामुदकं पितु:।

विज्ञाय तुमुलं शब्दं त्रस्ता भरतसैनिका:॥ ३४॥

अब्रुवंश्चापि रामेण भरत: संगतो ध्रुवम्।

तेषामेव महान् शब्द: शोचतां पितरं मृतम्॥ ३५॥

पिताको जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइयोंके रोदनका तुमुल नाद सुनकर भरतके सैनिक किसी भयकी आशङ्कासे डर गये। फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरेसे बोले—‘निश्चय ही भरत श्रीरामचन्द्रजीसे मिले हैं। अपने परलोकवासी पिताके लिये शोक करनेवाले उन चारों भाइयोंके रोनेका ही यह महान् शब्द है’॥ ३४-३५॥

अथ वाहान् परित्यज्य तं सर्वेऽभिमुखा: स्वनम्।

अप्येकमनसो जग्मुर्यथास्थानं प्रधाविता:॥ ३६॥

यों कहकर उन सबने अपनी सवारियोंको तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थानसे वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े॥

हयैरन्ये गजैरन्ये रथैरन्ये स्वलंकृतै:।

सुकुमारास्तथैवान्ये पद्भिरेव नरा ययु:॥ ३७॥

उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंसे, कुछ हाथियोंसे और कुछ सजे-सजाये रथोंसे ही आगे बढ़े। कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये॥ ३७॥

अचिरप्रोषितं रामं चिरविप्रोषितं यथा।

द्रष्टुकामो जन: सर्वो जगाम सहसाश्रमम्॥ ३८॥

यद्यपि श्रीरामचन्द्रजीको परदेशमें आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगोंको ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकालसे परदेशमें रह रहे हैं; अत: सब लोग उनके दर्शनकी इच्छासे सहसा आश्रमकी ओर चल दिये॥ ३८॥

भ्रातृणां त्वरितास्ते तु द्रष्टुकामा: समागमम्।

ययुर्बहुविधैर्यानै: खुरनेमिसमाकुलै:॥ ३९॥

वे लोग चारों भाइयोंका मिलन देखनेकी इच्छासे खुरों एवं पहियोंसे युक्त नाना प्रकारकी सवारियोंद्वारा बड़ी उतावलीके साथ चले॥ ३९॥

सा भूमिर्बहुभिर्यानै रथनेमिसमाहता।

मुमोच तुमुलं शब्दं द्यौरिवाभ्रसमागमे॥ ४०॥

अनेक प्रकारकी सवारियों तथा रथकी पहियोंसे आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी; ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटा घिर आनेपर आकाशमें गड़गड़ाहट होने लगती है॥ ४०॥

तेन वित्रासिता नागा: करेणुपरिवारिता:।

आवासयन्तो गन्धेन जग्मुरन्यद्वनं तत:॥ ४१॥

उस तुमुल नादसे भयभीत हुए हाथी हथिनियोंसे घिरकर मदकी गन्धसे उस स्थानको सुवासित करते हुए वहाँसे दूसरे वनमें भाग गये॥ ४१॥

वराहवृकसिंहाश्च महिषा: सृमरास्तथा।

व्याघ्रगोकर्णगवया वित्रेसु: पृषतै: सह॥ ४२॥

वराह, भेडि़ये, सिंह, भैंसे, सृमर (मृगविशेष), व्याघ्र, गोकर्ण (मृगविशेष) और गवय (नीलगाय), चितकबरे हरिणोंसहित संत्रस्त हो उठे॥ ४२॥

रथाह्वहंसानत्यूहा: प्लवा: कारण्डवा: परे।

तथा पुंस्कोकिला: क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिश:॥ ४३॥

चक्रवाक, हंस, जलकुक्कुट, वक, कारण्डव, नरकोकिल और क्रौञ्च पक्षी होश-हवाश खोकर विभिन्न दिशाओंमें उड़ गये॥ ४३॥

तेन शब्देन वित्रस्तैराकाशं पक्षिभिर्वृतम्।

मनुष्यैरावृता भूमिरुभयं प्रबभौ तदा॥ ४४॥

उस शब्दसे डरे हुए पक्षी आकाशमें छा गये और नीचेकी भूमि मनुष्योंसे भर गयी। इस प्रकार उन दोनोंकी समानरूपसे शोभा होने लगी॥ ४४॥

ततस्तं पुरुषव्याघ्रं यशस्विनमकल्मषम्।

आसीनं स्थण्डिले रामं ददर्श सहसा जन:॥ ४५॥

लोगोंने सहसा पहुँचकर देखा—यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदीपर बैठे हैं॥ ४५॥

विगर्हमाण: कैकेयीं मन्थरासहितामपि।

अभिगम्य जनो रामं बाष्पपूर्णमुखोऽभवत्॥ ४६॥

श्रीरामके पास जानेपर सबके मुख आँसुओंसे भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयीकी निन्दा करने लगे॥ ४६॥

तान् नरान् बाष्पपूर्णाक्षान् समीक्ष्याथ सुदु:खितान्।

पर्यष्वजत धर्मज्ञ: पितृवन्मातृवच्च स:॥ ४७॥

उन सब लोगोंके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए थे और वे सब-के-सब अत्यन्त दु:खी हो रहे थे। धर्मज्ञ श्रीरामने उन्हें देखकर पिता-माताकी भाँति हृदयसे लगाया॥

स तत्र कांश्चित् परिषस्वजे नरान्

नराश्च केचित्तु तमभ्यवादयन्।

चकार सर्वान् सवयस्यबान्धवान्

यथार्हमासाद्य तदा नृपात्मज:॥ ४८॥

श्रीरामने कुछ मनुष्योंको वहाँ छातीसे लगाया तथा कुछ लोगोंने पहुँचकर वहाँ उनके चरणोंमें प्रणाम किया। राजकुमार श्रीरामने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंका यथायोग्य सम्मान किया॥ ४८॥

तत: स तेषां रुदतां महात्मनां

भुवं च खं चानुविनादयन् स्वन:।

गुहा गिरीणां च दिशश्च संततं

मृदङ्गघोषप्रतिमो विशुश्रुवे॥ ४९॥

उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओंका वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतोंकी गुफा और सम्पूर्ण दिशाओंको निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनिके समान सुनायी पड़ता था॥ ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यधिकशततम: सर्ग:॥ १०३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३॥

 

चतुरधिकशततम: सर्ग:

वसिष्ठजीके साथ आती हुई कौसल्याका मन्दाकिनीके तटपर सुमित्रा आदिके समक्ष दु:खपूर्ण उद्गार, श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके द्वारा माताओंकी चरणवन्दना तथा वसिष्ठजीको प्रणाम करके श्रीराम आदिका सबके साथ बैठना

वसिष्ठ: पुरत: कृत्वा दारान् दशरथस्य च।

अभिचक्राम तं देशं रामदर्शनतर्षित:॥ १॥

महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथकी रानियोंको आगे करके श्रीरामचन्द्रजीको देखनेकी अभिलाषा लिये उस स्थानकी ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था॥ १॥

राजपत्न्यश्च गच्छन्त्यो मन्दं मन्दाकिनीं प्रति।

ददृशुस्तत्र तत् तीर्थं रामलक्ष्मणसेवितम्॥ २॥

राजरानियाँ मन्द गतिसे चलती हुई जब मन्दाकिनीके तटपर पहुँचीं, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मणके स्नान करनेका घाट देखा॥ २॥

कौसल्या बाष्पपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता।

सुमित्रामब्रवीद् दीनां याश्चान्या राजयोषित:॥ ३॥

इस समय कौसल्याके मुँहपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने सूखे एवं उदास मुखसे दीन सुमित्रा तथा अन्य राजरानियोंसे कहा—॥ ३॥

इदं तेषामनाथानां क्लिष्टमक्लिष्टकर्मणाम्।

वने प्राक्कलनं तीर्थं ये ते निर्विषयीकृता:॥ ४॥

‘जो राज्यसे निकाल दिये गये हैं तथा जो दूसरोंको क्लेश न देनेवाले कार्य ही करते हैं, उन मेरे अनाथ बच्चोंका यह वनमें दुर्गम तीर्थ है, जिसे इन्होंने पहले-पहल स्वीकार किया है॥ ४॥

इत: सुमित्रे पुत्रस्ते सदा जलमतन्द्रित:।

स्वयं हरति सौमित्रिर्मम पुत्रस्य कारणात्॥ ५॥

‘सुमित्रे! आलस्यरहित तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण स्वयं आकर सदा यहींसे मेरे पुत्रके लिये जल ले जाया करते हैं॥ ५॥

जघन्यमपि ते पुत्र: कृतवान् न तु गर्हित:।

भ्रातुर्यदर्थरहितं सर्वं तद् गर्हितं गुणै:॥ ६॥

‘यद्यपि तुम्हारे पुत्रने छोटे-से-छोटा सेवा-कार्य भी स्वीकार किया है, तथापि इससे वे निन्दित नहीं हुए हैं; क्योंकि सद्गुणोंसे युक्त ज्येष्ठ भाईके प्रयोजनसे रहित जो कार्य होते हैं, वे ही सब निन्दित माने गये हैं॥ ६॥

अद्यायमपि ते पुत्र: क्लेशानामतथोचित:।

नीचानर्थसमाचारं सज्जं कर्म प्रमुञ्चतु॥ ७॥

‘तुम्हारा यह पुत्र भी उन क्लेशोंके योग्य नहीं है, जिन्हें आजकल वह सहन करता है। अब श्रीराम लौट चलें और निम्न श्रेणीके पुरुषोंके योग्य जो दु:खजनक कार्य उसके सामने प्रस्तुत है, उसे वह छोड़ दे—उसे करनेका अवसर ही उसके लिये न रह जाय’॥ ७॥

दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु सा दर्दश महीतले।

पितुरिङ्गुदिपिण्याकं न्यस्तमायतलोचना॥ ८॥

आगे जाकर विशाललोचना कौसल्याने देखा कि श्रीरामने पृथ्वीपर बिछे हुए दक्षिणाग्र कुशोंके ऊपर अपने पिताके लिये पिसे हुए इङ्गुदीके फलका पिण्ड रख छोड़ा है॥ ८॥

तं भूमौ पितुरार्तेन न्यस्तं रामेण वीक्ष्य सा।

उवाच देवी कौसल्या सर्वा दशरथस्त्रिय:॥ ९॥

दु:खी रामके द्वारा पिताके लिये भूमिपर रखे हुए उस पिण्डको देखकर देवी कौसल्याने दशरथकी सब रानियोंसे कहा—॥ ९॥

इदमिक्ष्वाकुनाथस्य राघवस्य महात्मन:।

राघवेण पितुर्दत्तं पश्यतैतद् यथाविधि॥ १०॥

‘बहनो! देखो, श्रीरामने इक्ष्वाकुकुलके स्वामी रघुकुलभूषण महात्मा पिताके लिये यह विधिपूर्वक पिण्डदान किया है॥ १०॥

तस्य देवसमानस्य पार्थिवस्य महात्मन:।

नैतदौपयिकं मन्ये भुक्तभोगस्य भोजनम्॥ ११॥

‘देवताके समान तेजस्वी वे महामना भूपाल नाना प्रकारके उत्तम भोग भोग चुके हैं। उनके लिये यह भोजन मैं उचित नहीं मानती॥ ११॥

चतुरन्तां महीं भुक्त्वा महेन्द्रसदृशो भुवि।

कथमिङ्गुदिपिण्याकं स भुङ्क्ते वसुधाधिप:॥ १२॥

‘जो चारों समुद्रोंतककी पृथ्वीका राज्य भोगकर भूतलपर देवराज इन्द्रके समान प्रतापी थे, वे भूपाल महाराज दशरथ पिसे हुए इङ्गुदी-फलका पिण्ड कैसे खा रहे होंगे?॥ १२॥

अतो दु:खतरं लोके न किंचित् प्रतिभाति मे।

यत्र राम: पितुर्दद्यादिङ्गुदीक्षोदमृद्धिमान्॥ १३॥

‘संसारमें इससे बढ़कर महान् दु:ख मुझे और कोई नहीं प्रतीत होता है, जिसके अधीन होकर श्रीराम समृद्धिशाली होते हुए भी अपने पिताको इङ्गुदीके पिसे हुए फलका पिण्ड दें॥ १३॥

रामेणेङ्गुदिपिण्याकं पितुर्दत्तं समीक्ष्य मे।

कथं दु:खेन हृदयं न स्फोटति सहस्रधा॥ १४॥

‘श्रीरामने अपने पिताको इङ्गुदीका पिण्याक (पिसा हुआ फल) प्रदान किया है—यह देखकर दु:खसे मेरे हृदयके सहस्रों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते हैं?॥ १४॥

श्रुतिस्तु खल्वियं सत्या लौकिकी प्रतिभाति मे।

यदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता:॥ १५॥

‘यह लौकिकी श्रुति (लोकविख्यात कहावत) निश्चय ही मुझे सत्य प्रतीत हो रही है कि मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, उसके देवता भी उसी अन्नको ग्रहण करते हैं’॥

एवमार्तां सपत्न्यस्ता जग्मुराश्वास्य तां तदा।

ददृशुश्चाश्रमे रामं स्वर्गच्युतमिवामरम्॥ १६॥

इस प्रकार शोकसे आर्त हुई कौसल्याको उस समय उनकी सौतें समझा-बुझाकर उन्हें आगे ले गयीं। आश्रमपर पहुँचकर उन सबने श्रीरामको देखा, जो स्वर्गसे गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे॥ १६॥

तं भोगै: सम्परित्यक्तं रामं सम्प्रेक्ष्य मातर:।

आर्ता मुमुचुरश्रूणि सस्वरं शोककर्शिता:॥ १७॥

भोगोंका परित्याग करके तपस्वी जीवन व्यतीत करनेवाले श्रीरामको देखकर उनकी माताएँ शोकसे कातर हो गयीं और आर्तभावसे फूट-फूटकर रोती हुई आँसू बहाने लगीं॥ १७॥

तासां राम: समुत्थाय जग्राह चरणाम्बुजान्।

मातृणां मनुजव्याघ्र: सर्वासां सत्यसंगर:॥ १८॥

सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ श्रीराम माताओंको देखते ही उठकर खड़े हो गये और बारी-बारीसे उन सबके चरणारविन्दोंका स्पर्श किया॥ १८॥

ता: पाणिभि: सुखस्पर्शैर्मृद्वङ्गुलितलै: शुभै:।

प्रममार्जू रज: पृष्ठाद् रामस्यायतलोचना:॥ १९॥

विशाल नेत्रोंवाली माताएँ स्नेहवश जिनकी अंगुलियाँ कोमल और स्पर्श सुखद था, उन सुन्दर हाथोंसे श्रीरामकी पीठसे धूल पोंछने लगीं॥ १९॥

सौमित्रिरपि ता: सर्वा मातृ: सम्प्रेक्ष्य दु:खित:।

अभ्यवादयदासक्तं शनै रामादनन्तरम्॥ २०॥

श्रीरामके बाद लक्ष्मण भी उन सभी दु:खिया माताओंको देखकर दु:खी हो गये और उन्होंने स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ २०॥

यथा रामे तथा तस्मिन् सर्वा ववृतिरे स्त्रिय:।

वृत्तिं दशरथाज्जाते लक्ष्मणे शुभलक्षणे॥ २१॥

उन सब माताओंने श्रीरामके साथ जैसा बर्ताव किया था, वैसे ही उत्तम लक्षणोंसे युक्त दशरथनन्दन लक्ष्मणके साथ भी किया॥ २१॥

सीतापि चरणांस्तासामुपसंगृह्य दु:खिता।

श्वश्रूणामश्रुपूर्णाक्षी सम्बभूवाग्रत: स्थिता॥ २२॥

तदनन्तर आँसूभरे नेत्रोंवाली दु:खिनी सीता भी सभी सासुओंके चरणोंमें प्रणाम करके उनके आगे खड़ी हो गयी॥ २२॥

तां परिष्वज्य दु:खार्ता माता दुहितरं यथा।

वनवासकृतां दीनां कौसल्या वाक्यमब्रतीत्॥ २३॥

तब दु:खसे पीडि़त हुई कौसल्याने जैसे माता अपनी बेटीको हृदयसे लगा लेती है, उसी प्रकार वनवासके कारण दीन (दुर्बल) हुई सीताको छातीसे चिपका लिया और इस प्रकार कहा—॥ २३॥

वैदेहराजन्यसुता स्नुषा दशरथस्य च।

रामपत्नी कथं दु:खं सम्प्राप्ता विजने वने॥ २४॥

‘विदेहराज जनककी पुत्री, राजा दशरथकी पुत्रवधू तथा श्रीरामकी पत्नी इस निर्जन वनमें क्यों दु:ख भोग रही है?॥ २४॥

पद्ममातपसंतप्तं परिक्लिष्टमिवोत्पलम्।

काञ्चनं रजसा ध्वस्तं क्लिष्टं चन्द्रमिवाम्बुदै:॥ २५॥

‘बेटी! तुम्हारा मुख धूपसे तपे हुए कमल, कुचले हुए उत्पल, धूलसे ध्वस्त हुए सुवर्ण और बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति श्रीहीन हो रहा है॥ २५॥

मुखं ते प्रेक्ष्य मां शोको दहत्यग्निरिवाश्रयम्।

भृशं मनसि वैदेहि व्यसनारणिसम्भव:॥ २६॥

‘विदेहनन्दिनि! जैसे आग अपने उत्पत्तिस्थान काष्ठको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार तुम्हारे इस मुखको देखकर मेरे मनमें संकटरूपी अरणिसे उत्पन्न हुआ यह शोकानल मुझे जलाये देता है’॥ २६॥

ब्रुवन्त्यामेवमार्तायां जनन्यां भरताग्रज:।

पादावासाद्य जग्राह वसिष्ठस्य च राघव:॥ २७॥

शोकाकुल हुई माता जब इस प्रकार विलाप कर रही थी, उसी समय भरतके बड़े भाई श्रीरामने वसिष्ठजीके चरणोंमें पड़कर उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़ लिया॥ २७॥

पुरोहितस्याग्निसमस्य तस्य वै

बृहस्पतेरिन्द्र इवामराधिप:।

प्रगृह्य पादौ सुसमृद्धतेजस:

सहैव तेनोपविवेश राघव:॥ २८॥

जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिके चरणोंका स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार अग्निके समान बढ़े हुए तेजवाले पुरोहित वसिष्ठजीके दोनों पैर पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी उनके साथ ही पृथ्वीपर बैठ गये॥ २८॥

ततो जघन्यं सहितै: स्वमन्त्रिभि:

पुरप्रधानैश्च तथैव सैनिकै:।

जनेन धर्मज्ञतमेन धर्मवा-

नुपोपविष्टो भरतस्तदाग्रजम्॥ २९॥

तदनन्तर धर्मात्मा भरत एक साथ आये हुए अपने सभी मन्त्रियों, प्रधान-प्रधान पुरवासियों, सैनिकों तथा परम धर्मज्ञ पुरुषोंके साथ अपने बड़े भाईके पास उनके पीछे जा बैठे॥ २९॥

उपोपविष्टस्तु तदातिवीर्यवां-

स्तपस्विवेषेण समीक्ष्य राघवम्।

श्रिया ज्वलन्तं भरत: कृताञ्जलि-

र्यथा महेन्द्र: प्रयत: प्रजापतिम्॥ ३०॥

उस समय श्रीरामके आसनके समीप बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी भरतने दिव्य दीप्तिसे प्रकाशित होनेवाले श्रीरघुनाथजीको तपस्वीके वेशमें देखकर उनके प्रति उसी प्रकार हाथ जोड़ लिये जैसे देवराज इन्द्र प्रजापति ब्रह्माके समक्ष विनीतभावसे हाथ जोड़ते हैं॥ ३०॥

किमेष वाक्यं भरतोऽद्य राघवं

प्रणम्य सत्कृत्य च साधु वक्ष्यति।

इतीव तस्यार्यजनस्य तत्त्वतो

बभूव कौतूहलमुत्तमं तदा॥ ३१॥

उस समय वहाँ बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषोंके हृदयमें यथार्थ रूपसे यह उत्तम कौतूहल-सा जाग उठा कि देखें ये भरतजी श्रीरामचन्द्रजीको सत्कारपूर्वक प्रणाम करके आज उत्तम रीतिसे उनके समक्ष क्या कहते हैं?॥ ३१॥

स राघव: सत्यधृतिश्च लक्ष्मणो

महानुभावो भरतश्च धार्मिक:।

वृता: सुहृद्भिश्च विरेजिरेऽध्वरे

यथा सदस्यै: सहितास्त्रयोऽग्नय:॥ ३२॥

वे सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम, महानुभाव लक्ष्मण तथा धर्मात्मा भरत—ये तीनों भाई अपने सुहृदोंसे घिरकर यज्ञशालामें सदस्योंद्वारा घिरे हुए त्रिविध अग्नियोंके समान शोभा पा रहे थे॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरधिकशततम: सर्ग:॥ १०४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४॥

पञ्चाधिकशततम: सर्ग:

भरतका श्रीरामको अयोध्यामें चलकर राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना, श्रीरामका जीवनकी अनित्यता बताते हुए पिताकी मृत्युके लिये शोक न करनेका भरतको उपदेश देना और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही राज्य ग्रहण न करके वनमें रहनेका ही दृढ़ निश्चय बताना

तत: पुरुषसिंहानां वृतानां तै: सुहृद्गणै:।

शोचतामेव रजनी दु:खेन व्यत्यवर्तत॥ १॥

रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्वृता:।

मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्॥ २॥

अपने सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयोंकी वह रात्रि पिताकी मृत्युके दु:खसे शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होनेपर भरत आदि तीनों भाई सुहृदोंके साथ ही मन्दाकिनीके तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुन: श्रीरामके पास लौट आये॥ १-२॥

तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित् किंचिदब्रवीत्।

भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्॥ ३॥

वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदोंके बीचमें बैठे हुए भरतने श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ ३॥

सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम।

तद् ददामि तवैवाहं भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्॥ ४॥

‘भैया! पिताजीने वरदान देकर मेरी माताको संतुष्ट कर दिया और माताने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओरसे यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवामें समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये॥ ४॥

महतेवाम्बुवेगेन भिन्न: सेतुर्जलागमे।

दुरावरं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत्॥ ५॥

‘वर्षाकालमें जलके महान् वेगसे टूटे हुए सेतुकी भाँति इस विशाल राज्यखण्डको सँभालना आपके सिवा दूसरेके लिये अत्यन्त कठिन है॥ ५॥

गतिं खर इवाश्वस्य तार्क्ष्यस्येव पतत्त्रिण:।

अनुगन्तुं न शक्तिर्मे गतिं तव महीपते॥ ६॥

‘पृथ्वीनाथ! जैसे गदहा घोड़ेकी और अन्य साधारण पक्षी गरुड़की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गतिका—आपकी पालन-पद्धतिका अनुसरण करनेकी शक्ति नहीं है॥ ६॥

सुजीवं नित्यशस्तस्य य: परैरुपजीव्यते।

राम तेन तु दुर्जीवं य: परानुपजीवति॥ ७॥

‘श्रीराम! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवन-निर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरोंका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है, उसका जीवन दु:खमय है (अत: आपके लिये राज्य करना ही उचित है)॥ ७॥

यथा तु रोपितो वृक्ष: पुरुषेण विवर्धित:।

हृस्वकेन दुरारोहो रूढस्कन्धो महाद्रुम:॥ ८ ॥

स यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि न विदर्शयेत्।

स तां नानुभवेत् प्रीतिं यस्य हेतो: प्ररोपित:॥ ९ ॥

एषोपमा महाबाहो तदर्थं वेत्तुमर्हसि।

यत्र त्वमस्मान् वृषभो भर्ता भृत्यान् न शाधि हि॥ १०॥

‘जैसे फलकी इच्छा रखनेवाले किसी पुरुषने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कदके पुरुषके लिये उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्षमें जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्षको लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका। ऐसी स्थितिमें उसे लगानेवाला पुरुष उस प्रसन्नताका अनुभव नहीं करता, जो फलकी प्राप्ति होनेसे सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजीने आप-जैसे सर्वसद्गुणसम्पन्न पुत्रको लोकरक्षाके लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालनका भार अपने हाथमें नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालनके अवसरपर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषणमें समर्थ होकर भी यदि हम भृत्योंका शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी॥ ८—१०॥

श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वग्र्याश्च सर्वश:।

प्रतपन्तमिवादित्यं राज्यस्थितमरिंदमम्॥ ११॥

‘महाराज! विभिन्न जातियोंके सङ्घ और प्रधान-प्रधान पुरुष आप शत्रुदमन नरेशको सब ओर तपते हुए सूर्यकी भाँति राज्यसिंहासनपर विराजमान देखें॥ ११॥

तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जरा:।

अन्त:पुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिता:॥ १२॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्याको लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्त:पुरकी स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता-पूर्वक आपका अभिनन्दन करें’॥ १२॥

तस्य साध्वनुमन्यन्त नागरा विविधा जना:।

भरतस्य वच: श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचत:॥ १३॥

इस प्रकार श्रीरामसे राज्य-ग्रहणके लिये प्रार्थना करते हुए भरतजीकी बात सुनकर नगरके भिन्न-भिन्न मनुष्योंने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया॥ १३॥

तमेवं दु:खितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम्।

राम: कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान्॥ १४॥

तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरतको इस तरह दु:खी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ १४॥

नात्मन: कामकारो हि पुरुषोऽयमनीश्वर:।

इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्त: परिकर्षति॥ १५॥

‘भाई! यह जीव ईश्वरके समान स्वतन्त्र नहीं है, अत: कोई यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुषको इधर-उधर खींचता रहता है॥ १५॥

सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छ्रया:।

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥ १६॥

‘समस्त संग्रहोंका अन्त विनाश है। लौकिक उन्नतियोंका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है॥ १६॥

यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्।

एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम्॥ १७॥

‘जैसे पके हुए फलोंको पतनके सिवा और किसीसे भय नहीं है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्योंको मृत्युके सिवा और किसीसे भय नहीं है॥ १७॥

यथाऽऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वोपसीदति।

तथावसीदन्ति नरा जरामृत्युवशंगता:॥ १८॥

‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होनेपर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्युके वशमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं॥ १८॥

अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते।

यात्येव यमुना पूर्णं समुद्रमुदकार्णवम्॥ १९॥

‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जलसे भरे हुए समुद्रकी ओर जाती ही है, उधरसे लौटती नहीं॥ १९॥

अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह।

आयूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशव:॥ २०॥

‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसारमें सभी प्राणियोंकी आयुका तीव्र गतिसे नाश कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म-ऋतुमें जलको शीघ्रतापूर्वक सोखती रहती हैं॥ २०॥

आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि।

आयुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गतस्य च॥ २१॥

‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरेके लिये क्यों बार-बार शोक करते हो। कोई इस लोकमें स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है॥ २१॥

सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति।

गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते॥ २२॥

‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्गकी यात्रामें भी साथ ही जाकर वह मनुष्यके साथ ही लौटती है॥ २२॥

गात्रेषु वलय: प्राप्ता: श्वेताश्चैव शिरोरुहा:।

जरया पुरुषो जीर्ण: किं हि कृत्वा प्रभावयेत्॥ २३॥

‘शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिरके बाल सफेद हो गये। फिर जरावस्थासे जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्युसे बचनेके लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है?॥ २३॥

नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि।

आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम्॥ २४॥

‘लोग सूर्योदय होनेपर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होनेपर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवनका नाश हो रहा है॥ २४॥

हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिवागतम्।

ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षय:॥ २५॥

‘किसी ऋतुका प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी हो (पहले कभी आयी ही न हो), ऐसा समझकर लोग हर्षसे खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओंके परिवर्तनसे प्राणियोंके प्राणोंका (आयुका) क्रमश: क्षय हो रहा है॥ २५॥

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।

समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन॥ २६॥

एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च।

समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभव:॥ २७॥

‘जैसे महासागरमें बहते हुए दो काठ कभी एक-दूसरेसे मिल जाते हैं और कुछ कालके बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है॥ २६-२७॥

नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते।

तेन तस्मिन् न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचत:॥ २८॥

‘इस संसारमें कोई भी प्राणी यथासमय प्राप्त होनेवाले जन्म-मरणका उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्तिके लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्युको टाल सके॥ २८॥

यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थित:।

अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति॥ २९॥

एवं पूर्वैर्गतो मार्ग: पितृपैतामहैर्ध्रुव:।

तमापन्न: कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रम:॥ ३०॥

‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियोंके समुदायसे रास्तेमें खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगोंके पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिसपर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचनेका कोई उपाय नहीं है, उसी मार्गपर स्थित हुआ मनुष्य किसी औरके लिये शोक कैसे करे?॥ २९-३०॥

वयस: पतमानस्य स्रोतसो वानिवर्तिन:।

आत्मा सुखे नियोक्तव्य: सुखभाज: प्रजा: स्मृता:॥ ३१॥

‘जैसे नदियोंका प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है। उसका क्रमश: नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्माको कल्याणके साधनभूत धर्ममें लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं॥ ३१॥

धर्मात्मा सुशुभै: कृत्स्नै: क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणै:।

धूतपापो गत: स्वर्गं पिता न: पृथिवीपति:॥ ३२॥

‘तात! हमारे पिता धर्मात्मा थे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्राय: सभी परम शुभकारक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उनके सारे पाप धुल गये थे। अत: वे महाराज स्वर्गलोकमें गये हैं॥ ३२॥

भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात्।

अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गत:॥ ३३॥

‘वे भरण-पोषणके योग्य परिजनोंका भरण करते थे। प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनोंसे धर्मके अनुसार कर आदिके रूपमें धन लेते थे—इन सब कारणोंसे हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोकमें पधारे हैं॥ ३३॥

कर्मभिस्तु शुभैरिष्टै: क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणै:।

स्वर्गं दशरथ: प्राप्त: पिता न: पृथिवीपति:॥ ३४॥

‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंके अनुष्ठानोंसे हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोकमें गये हैं॥ ३४॥

इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्भोगांश्चावाप्य पुष्कलान्।

उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गत: पृथिवीपति:॥ ३५॥

‘उन्होंने नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा यज्ञपुरुषकी आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँसे स्वर्गलोकको पधारे हैं॥

आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघव:।

न स शोच्य: पिता तात स्वर्गत: सत्कृत: सताम्॥ ३६॥

‘तात! अन्य राजाओंकी अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगोंको पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषोंके द्वारा सम्मानित हुए हैं; अत: स्वर्गवासी हो जानेपर भी वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं॥ ३६॥

स जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि न:।

दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम्॥ ३७॥

‘हमारे पिताने जराजीर्ण मानव-शरीरका परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोकमें विहार करानेवाली है॥ ३७॥

तं तु नैवंविध: कश्चित् प्राज्ञ: शोचितुमर्हसि।

त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तर:॥ ३८॥

‘कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजीके लिये शोक नहीं कर सकता॥ ३८॥

एते बहुविधा: शोका विलापरुदिते तदा।

वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता॥ ३९॥

‘धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुषको सभी अवस्थाओंमें ये नाना प्रकारके शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये॥

स स्वस्थो भव मा शोको यात्वा चावस तां पुरीम्।

तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर॥ ४०॥

‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मनमें शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओंमे श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँसे जाकर अयोध्यापुरीमें निवास करो; क्योंकि मनको वशमें रखनेवाले पूज्य पिताजीने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है॥ ४०॥

यत्राहमपि तेनैव नियुक्त: पुण्यकर्मणा।

तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम्॥ ४१॥

‘उन पुण्यकर्मा महाराजने मुझे भी जहाँ रहनेकी आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिताके आदेशका पालन करूँगा॥ ४१॥

न मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्यमरिंदम।

स त्वयापि सदा मान्य: स वै बन्धु: स न: पिता॥ ४२॥

‘शत्रुदमन भरत! पिताकी आज्ञाकी अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मानके योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगोंके हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे॥ ४२॥

तद् वच: पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम्।

कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव॥ ४३॥

‘रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्मके द्वारा पिताजीके ही वचनका जो धर्मात्माओंको भी मान्य है, पालन करूँगा॥ ४३॥

धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना।

भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता॥ ४४॥

‘नरश्रेष्ठ! परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको धार्मिक, क्रूरतासे रहित और गुरुजनोंका आज्ञापालक होना चाहिये॥ ४४॥

आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ।

निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य न:॥ ४५॥

‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथके शुभ आचरणोंपर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभावके द्वारा आत्माकी उन्नतिके लिये प्रयत्न करो’॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा

पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम् ।

यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च

प्रभुर्मुहूर्ताद् विरराम राम:॥ ४६॥

सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्ततक अपने छोटे भाई भरतसे पिताकी आज्ञाका पालन करानेके उद्देश्यसे ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये॥ ४६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततम: सर्ग:॥ १०५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥

 

षडधिकशततम: सर्ग:

भरतकी पुन: श्रीरामसे अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करनेकी प्रार्थना

एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत्।

ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम्॥ १॥

उवाच भरतश्चित्रं धार्मिको धार्मिकं वच:।

को हि स्यादीदृशो लोके यादृशस्त्वमरिंदम॥ २॥

ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरतने मन्दाकिनीके तटपर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीरामसे यह विचित्र बात कही—‘शत्रुदमन रघुवीर! इस जगत्में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है?॥ १-२॥

न त्वां प्रव्यथयेद् दु:खं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत्।

सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान्॥ ३॥

‘कोई भी दु:ख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषोंके सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेहकी बातें पूछते हैं॥ ३॥

यथा मृतस्तथा जीवन् यथासति तथा सति।

यस्यैष बुद्धिलाभ: स्यात् परितप्येत केन स:॥ ४॥

‘जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है। जैसे वस्तुके अभावमें उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहनेपर भी मनुष्यको राग-द्वेषसे शून्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा?॥ ४॥

परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप।

स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति॥ ५॥

‘नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकटमें पड़नेपर भी विषाद नहीं कर सकता॥ ५॥

अमरोपमसत्त्वस्त्वं महात्मा सत्यसंगर:।

सर्वज्ञ: सर्वदर्शी च बुद्धिमांश्चासि राघव॥ ६॥

‘रघुनन्दन! आप देवताओंकी भाँति सत्त्वगुणसे सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं॥ ६॥

न त्वामेवंगुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम्।

अविषह्यतमं दु:खमासादयितुमर्हति॥ ७॥

‘ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त और जन्म-मरणके रहस्यको जाननेवाले आपके पास असह्य दु:ख नहीं आ सकता॥ ७॥

प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम्।

क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम॥ ८॥

‘जब मैं परदेशमें था, उस समय नीच विचार रखनेवाली मेरी माताने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अत: आप उसे क्षमा करके मुझपर प्रसन्न हों॥ ८॥

धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम्।

हन्मि तीव्रेण दण्डेन दण्डार्हां पापकारिणीम्॥ ९॥

‘मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करनेवाली एवं दण्डनीय माताको मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता॥ ९॥

कथं दशरथाज्जात: शुभाभिजनकर्मण:।

जानन् धर्ममधर्मं च कुर्यां कर्म जुगुप्सितम्॥ १०॥

‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथसे उत्पन्न होकर धर्म और अधर्मको जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ?॥ १०॥

गुरु: क्रियावान् वृद्धश्च राजा प्रेत: पितेति च।

तातं न परिगर्हेऽहं दैवतं चेति संसदि॥ ११॥

‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करनेवाले, बड़े-बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभामें मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ॥ ११॥

को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम्।

स्त्रिय: प्रियचिकीर्षु: सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित्॥ १२॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्मको जानते हुए भी स्त्रीका प्रिय करनेकी इच्छासे ऐसा धर्म और अर्थसे हीन कुत्सित कर्म कर सकता है?॥ १२॥

अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुति:।

राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षा सा श्रुति: कृता॥ १३॥

‘लोकमें एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकालमें सब प्राणी मोहित हो जाते हैं—उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्तीकी सत्यताको प्रत्यक्ष कर दिखाया॥ १३॥

साध्वर्थमभिसंधाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात्।

तातस्य यदतिक्रान्तं प्रत्याहरतु तद् भवान्॥ १४॥

‘पिताजीने क्रोध, मोह और साहसके कारण ठीक समझ कर जो धर्मका उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें—उसका संशोधन कर दें॥ १४॥

पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो य: साधु मन्यते।

तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा॥ १५॥

‘जो पुत्र पिताकी की हुई भूलको ठीक कर देता है, वही लोकमें उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है॥ १५॥

तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितु:।

अति यत् तत् कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम्॥ १६॥

‘अत: आप पिताकी योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्मका समर्थन न करें। उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्मकी सीमासे बाहर है। संसारमें धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं॥ १६॥

कैकेयीं मां च तातं च सुहृदो बान्धवांश्च न:।

पौरजानपदान् सर्वांस्त्रातुं सर्वमिदं भवान्॥ १७॥

‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्रकी प्रजा—इन सबकी रक्षाके लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें॥ १७॥

क्व चारण्यं क्व च क्षात्रं क्व जटा: क्व च पालनम्।

ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान् कर्तुमर्हति॥ १८॥

‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटा-धारण और कहाँ प्रजाका पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये॥ १८॥

एष हि प्रथमो धर्म: क्षत्रियस्याभिषेचनम्।

येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम्॥ १९॥

‘महाप्राज्ञ! क्षत्रियके लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजाका भलीभाँति पालन कर सके॥ १९॥

कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम्।

आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम्॥ २०॥

‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुखके साधनभूत प्रजापालनरूप धर्मका परित्याग करके संशयमें स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्यमें फल देनेवाले अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा?॥ २०॥

अथ क्लेशजमेव त्वं धर्मं चरितुमिच्छसि।

धर्मेण चतुरो वर्णान् पालयन् क्लेशमाप्नुहि॥ २१॥

‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्मका ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णोंका पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये॥ २१॥

चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम्।

आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तुमिच्छसि॥ २२॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्मके ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमोंमें गार्हस्थ्यको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं?॥ २२॥

श्रुतेन बाल: स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम्।

स कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति॥ २३॥

‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधाका पालन कैसे करूँगा?॥ २३॥

हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम्।

भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सहे॥ २४॥

‘मैं बुद्धि और गुण दोनोंसे हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अत: मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्यका पालन तो दूरकी बात है॥ २४॥

इदं निखिलमप्यग्र्यं राज्यं पित्र्यमकण्टकम्।

अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सह बान्धवै:॥ २५॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अत: आप बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये॥ २५॥

इहैव त्वाभिषिञ्चन्तु सर्वा: प्रकृतय: सह।

ऋत्विज: सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदा:॥ २६॥

‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रोंके ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें॥ २६॥

अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज।

विजित्य तरसा लोकान् मरुद्भिरिव वासव:॥ २७॥

‘हमलोगोंके द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणोंसे अभिषिक्त हुए इन्द्रकी भाँति वेगपूर्वक सब लोकोंको जीतकर प्रजाका पालन करनेके लिये अयोध्याको चलें॥

ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुर्हृद: साधु निर्दहन्।

सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम्॥ २८॥

‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओंका भलीभाँति दमन करें तथा मित्रोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्यामें मुझे धर्मकी शिक्षा देते रहें॥ २८॥

अद्यार्य मुदिता: सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने।

अद्य भीता: पलायन्तु दुष्प्रदास्ते दिशो दश॥ २९॥

‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होनेपर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दु:ख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग जायँ॥ २९॥

आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ।

अद्य तत्रभवन्तं च पितरं रक्ष किल्बिषात्॥ ३०॥

‘पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माताके कलङ्कको धो-पोंछकर पूज्य पिताजीको भी निन्दासे बचाइये॥ ३०॥

शिरसा त्वाभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि।

बान्धवेषु च सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वर:॥ ३१॥

‘मैं आपके चरणोंमें माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियोंपर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवोंपर कृपा कीजिये॥ ३१॥

अथवा पृष्ठत: कृत्वा वनमेव भवानित:।

गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम्॥ ३२॥

‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थनाको ठुकराकर यहाँसे वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’॥ ३२॥

तथाभिरामो भरतेन ताम्यता

प्रसाद्यमान: शिरसा महीपति:।

न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान्

मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठित:॥ ३३॥

ग्लानिमें पड़े हुए भरतने मनोभिराम राजा श्रीरामको उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजीने पिताकी आज्ञामें ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जानेका विचार नहीं किया॥ ३३॥

तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे

समं जनो हर्षमवाप दु:खित:।

न यात्ययोध्यामिति दु:खितोऽभवत्

स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षित:॥ ३४॥

श्रीरामचन्द्रजीकी वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दु:खी भी हुए और हर्षको भी प्राप्त हुए। ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं—यह सोचकर वे दु:खी हुए और प्रतिज्ञा-पालनमें उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ॥

तमृत्विजो नैगमयूथवल्लभा-

स्तथा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातर:।

तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टुवु:

प्रणम्य रामं च ययाचिरे सह॥ ३५॥

उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदायके नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँसू बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहनेवाले भरतकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजीके सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलनेकी याचना की॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडधिकशततम: सर्ग:॥ १०६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ छवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०६॥

 

 


सप्ताधिकशततम: सर्ग:

श्रीरामका भरतको समझाकर उन्हें अयोध्या जानेका आदेश देना

पुनरेवं ब्रुवाणं तं भरतं लक्ष्मणाग्रज:।

प्रत्युवाच तत: श्रीमान् ज्ञातिमध्ये सुसत्कृत:॥ १॥

जब भरत पुन: इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनोंके बीचमें सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १॥

उपपन्नमिदं वाक्यं यस्त्वमेवमभाषथा:।

जात: पुत्रो दशरथात् कैकेय्यां राजसत्तमात्॥ २॥

‘भाई! तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथके द्वारा केकय-राजकन्या माता कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो; अत: तुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं॥

पुरा भ्रात: पिता न: स मातरं ते समुद्वहन्।

मातामहे समाश्रौषीद् राज्यशुल्कमनुत्तमम्॥ ३॥

‘भैया! आजसे बहुत पहलेकी बात है—पिताजीका जब तुम्हारी माताजीके साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नानासे कैकेयीके पुत्रको राज्य देनेकी उत्तम शर्त कर ली थी॥ ३॥

देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिव:।

सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधित: प्रभु:॥ ४॥

‘इसके बाद देवासुर-संग्राममें तुम्हारी माताने प्रभावशाली महाराजकी बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजाने उन्हें वरदान दिया॥ ४॥

तत: सा सम्प्रतिश्राव्य तव माता यशस्विनी।

अयाचत नरश्रेष्ठं द्वौ वरौ वरवर्णिनी॥ ५॥

‘उसीकी पूर्तिके लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माताने उन नरश्रेष्ठ पिताजीसे दो वर माँगे॥ ५॥

तव राज्यं नरव्याघ्र मम प्रव्राजनं तथा।

तच्च राजा तथा तस्यै नियुक्त: प्रददौ वरम्॥ ६॥

‘पुरुषसिंह! एक वरके द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरेके द्वारा मेरा वनवास। इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजाने वे दोनों वर इन्हें दे दिये॥

तेन पित्राहमप्यत्र नियुक्त: पुरुषर्षभ।

चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वरदानिकम्॥ ७॥

‘पुरुषप्रवर! इस प्रकार उन पिताजीने वरदानके रूपमें मुझे चौदह वर्षोंतक वनवासकी आज्ञा दी है॥

सोऽयं वनमिदं प्राप्तो निर्जनं लक्ष्मणान्वित:।

सीतया चाप्रतिद्वन्द्व: सत्यवादे स्थित: पितु:॥ ८॥

‘यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मणके साथ इस निर्जन वनमें चला आया हूँ। यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। मैं यहाँ पिताजीके सत्यकी रक्षामें स्थित रहूँगा॥

भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादिनम्।

कर्तुमर्हसि राजेन्द्र क्षिप्रमेवाभिषिञ्चनात्॥ ९॥

‘राजेन्द्र! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्यपदपर अपना अभिषेक करा लो और पिताको सत्यवादी बनाओ—यही तुम्हारे लिये उचित है॥ ९॥

ऋणान्मोचय राजानं मत्कृते भरत प्रभुम्।

पितरं त्राहि धर्मज्ञ मातरं चाभिनन्दय॥ १०॥

‘धर्मज्ञ भरत! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथको कैकेयीके ऋणसे मुक्त करो, उन्हें नरकमें गिरनेसे बचाओ और माताका भी आनन्द बढ़ाओ॥ १०॥

श्रूयते धीमता तात श्रुतिर्गीता यशस्विना।

गयेन यजमानेन गयेष्वेव पितृन् प्रति॥ ११॥

‘तात! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गयने गय-देशमें ही यज्ञ करते हुए पितरोंके प्रति एक कहावत कही थी॥ ११॥

पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुत:।

तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त: पितृन् य: पाति सर्वत:॥ १२॥

‘(वह इस प्रकार है—) बेटा पुत् नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है। वही पुत्र है, जो पितरोंकी सब ओरसे रक्षा करता है॥

एष्टव्या बहव: पुत्रा गुणवन्तो बहुश्रुता:।

तेषां वै समवेतानामपि कश्चिद् गयां व्रजेत्॥ १३॥

‘बहुत-से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये। सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रोंमेंसे कोई एक भी गयाकी यात्रा करे?॥ १३॥

एवं राजर्षय: सर्वे प्रतीता रघुनन्दन।

तस्मात् त्राहि नरश्रेष्ठ पितरं नरकात् प्रभो॥ १४॥

‘रघुनन्दन! नरश्रेष्ठ भरत! इस प्रकार सभी राजर्षियोंने पितरोंके उद्धारका निश्चय किया है, अत: प्रभो! तुम भी अपने पिताका नरकसे उद्धार करो॥ १४॥

अयोध्यां गच्छ भरत प्रकृतीरुपरञ्जय।

शत्रुघ्नसहितो वीर सह सर्वैर्द्विजातिभि:॥ १५॥

‘वीर भरत! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणोंको साथ लेकर अयोध्याको लौट जाओ और प्रजाको सुख दो॥

प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन्।

आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥ १६॥

‘वीर! अब मैं भी लक्ष्मण और सीताके साथ शीघ्र ही दण्डकारण्यमें प्रवेश करूँगा॥ १६॥

त्वं राजा भरत भव स्वयं नराणां

वन्यानामहमपि राजराण्मृगाणाम्।

गच्छ त्वं पुरवरमद्य सम्प्रहृष्ट:

संहृष्टस्त्वहमपि दण्डकान् प्रवेक्ष्ये॥ १७॥

‘भरत! तुम स्वयं मनुष्योंके राजा बनो और मैं जंगली पशुओंका सम्राट् बनूँगा। अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्याको जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डक-वनमें प्रवेश करूँगा॥ १७॥

छायां ते दिनकरभा: प्रबाधमानं

वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम्।

एतेषामहमपि काननद्रुमाणां

छायां तामतिशयिनीं शनै: श्रयिष्ये॥ १८॥

‘भरत! सूर्यकी प्रभाको तिरोहित कर देनेवाला छत्र तुम्हारे मस्तकपर शीतल छाया करे। अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षोंकी घनी छायाका आश्रय लूँगा॥ १८॥

शत्रुघ्नस्त्वतुलमतिस्तु ते सहाय:

सौमित्रिर्मम विदित: प्रधानमित्रम्।

चत्वारस्तनयवरा वयं नरेन्द्रं

सत्यस्थं भरत चराम मा विषीद॥ १९॥

‘भरत! अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायतामें रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र (सहायक) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथके सत्यकी रक्षा करें। तुम विषाद मत करो’॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताधिकशततम: सर्ग:॥ १०७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७॥

 

अष्टाधिकशततम: सर्ग:

जाबालिका नास्तिकोंके मतका अवलम्बन करके श्रीरामको समझाना

आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तम:।

उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वच:॥ १॥

जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरतको इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालिने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा—॥ १॥

साधु राघव मा भूत् ते बुद्धिरेवं निरर्थिका।

प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेस्तपस्विन:॥ २॥

‘रघुनन्दन! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अत: आपको गँवार मनुष्यकी तरह ऐसा निरर्थक विचार मनमें नहीं लाना चाहिये॥ २॥

क: कस्य पुरुषो बन्धु: किमाप्यं कस्य केनचित्।

एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति॥ ३॥

‘संसारमें कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है॥ ३॥

तस्मान्माता पिता चेति राम सज्जेत यो नर:।

उन्मत्त इव स ज्ञेयो नास्ति कश्चिद्धि कस्यचित्॥ ४॥

‘अत: श्रीराम! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसीके प्रति आसक्त होता है, उसे पागलके समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोई किसीका कुछ भी नहीं है॥ ४॥

यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नर: कश्चिद् बहिर्वसेत्।

उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि॥ ५॥

एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु।

आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जना:॥ ६॥

‘जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन—ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं। ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं॥ ६॥

पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम।

आस्थातुं कापथं दु:खं विषमं बहुकण्टकम्॥ ७॥

‘अत: नरश्रेष्ठ! आपको पिताका राज्य छोड़कर इस दु:खमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वनके कुत्सित मार्गपर नहीं चलना चाहिये॥ ७॥

समृद्धायामयोध्यायामात्मानमभिषेचय ।

एकवेणीधरा हि त्वा नगरी सम्प्रतीक्षते॥ ८॥

‘आप समृद्धिशालिनी अयोध्यामें राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये। वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारीकी भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है॥ ८॥

राजभोगाननुभवन् महार्हान् पार्थिवात्मज।

विहर त्वमयोध्यायां यथा शक्रस्त्रिविष्टपे॥ ९॥

‘राजकुमार! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगोंका उपभोग करते हुए अयोध्यामें विहार कीजिये॥ ९॥

न ते कश्चिद् दशरथस्त्वं च तस्य च कश्चन।

अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते॥ १०॥

‘राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये॥ १०॥

बीजमात्रं पिता जन्तो: शुक्रं शोणितमेव च।

संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत्॥ ११॥

‘पिता जीवके जन्ममें निमित्तकारणमात्र होता है। वास्तवमें ऋतुमती माताके द्वारा गर्भमें धारण किये हुए वीर्य और रजका परस्पर संयोग होनेपर ही पुरुषका यहाँ जन्म होता है॥ ११॥

गत: स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै।

प्रवृत्तिरेषा भूतानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे॥ १२॥

‘राजाको जहाँ जाना था, वहाँ चले गये। यह प्राणियोंके लिये स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ ही मारे जाते (कष्ट उठाते) हैं॥ १२॥

अर्थधर्मपरा ये ये तांस्तान् शोचामि नेतरान्।

ते हि दु:खमिह प्राप्य विनाशं प्रेत्य लेभिरे॥ १३॥

‘जो-जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थका परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हींके लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरोंके लिये नहीं। वे इस जगत्में धर्मके नामपर केवल दु:ख भोगकर मृत्युके पश्चात् नष्ट हो गये हैं॥

अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जन:।

अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति॥ १४॥

‘अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं—श्राद्धका दान पितरोंको मिलता है। यही सोचकर लोग श्राद्धमें प्रवृत्त होते हैं; किन्तु विचार करके देखिये तो इसमें अन्नका नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा॥ १४॥

यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति।

दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं न तत् पथ्यशनं भवेत्॥ १५॥

‘यदि यहाँ दूसरेका खाया हुआ अन्न दूसरेके शरीरमें चला जाता हो तो परदेशमें जानेवालोंके लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्तेके लिये भोजन देना उचित नहीं है॥ १५॥

दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभि: कृता:।

यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज॥ १६॥

‘देवताओंके लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बतानेवाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्योंने दानकी ओर लोगोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये ही बनाये हैं॥ १६॥

स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते।

प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठत: कुरु॥ १७॥

‘अत: महामते! आप अपने मनमें यह निश्चय कीजिये कि इस लोकके सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है (अत: वहाँ फल भोगनेके लिये धर्म आदिके पालनकी आवश्यकता नहीं है)। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष (पारलौकिक लाभ) को पीछे ढकेल दीजिये॥ १७॥

सतां बुद्धिं पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम्।

राज्यं स त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादित:॥ १८॥

‘सत्पुरुषोंकी बुद्धि, जो सब लोगोंके लिये राह दिखानेवाली होनेके कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरतके अनुरोधसे आप अयोध्याका राज्य ग्रहण कीजिये’॥ १८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाधिकशततम: सर्ग:॥ १०८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८॥

 

नवाधिकशततम: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा जाबालिके नास्तिक मतका खण्डन करके आस्तिक मतका स्थापन

जाबालेस्तु वच: श्रुत्वा राम: सत्यपराक्रम:।

उवाच परया सूक्त्या बुद्ध्याविप्रतिपन्नया॥ १॥

जाबालिका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी संशयरहित बुद्धिके द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्तिका आश्रय लेकर कहा—॥ १॥

भवान् मे प्रियकामार्थं वचनं यदिहोक्तवान्।

अकार्यं कार्यसंकाशमपथ्यं पथ्य संनिभम्॥ २॥

‘विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी दिखायी देती है; किंतु वास्तवमें करनेयोग्य नहीं है। वह पथ्य-सी दीखनेपर भी वास्तवमें अपथ्य है॥ २॥

निर्मर्यादस्तु पुरुष: पापाचारसमन्वित:।

मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्रदर्शन:॥ ३॥

‘जो पुरुष धर्म अथवा वेदकी मर्यादाको त्याग देता है, वह पापकर्ममें प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं; इसलिये वह सत्पुरुषोंमें कभी सम्मान नहीं पाता है॥ ३॥

कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम्।

चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाशुचिम्॥ ४॥

‘आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुलमें, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपनेको पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?॥ ४॥

अनार्यस्त्वार्य संस्थान: शौचाद्धीनस्तथा शुचि:।

लक्षण्यवदलक्षण्यो दु:शील: शीलवानिव॥ ५॥

‘आपने जो आचार बताया है, उसे अपनानेवाला पुरुष श्रेष्ठ-सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें अनार्य होगा। बाहरसे पवित्र दीखनेपर भी भीतरसे अपवित्र होगा। उत्तम लक्षणोंसे युक्त-सा प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें उसके विपरीत होगा तथा शीलवान्-सा दीखनेपर भी वस्तुत: वह दु:शील ही होगा॥ ५॥

अधर्मं धर्मवेषेण यद्यहं लोकसंकरम्।

अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियां विधिविवर्जिताम्॥ ६॥

कश्चेतयान: पुरुष: कार्याकार्यविचक्षण:।

बहु मन्येत मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम्॥ ७॥

‘आपका उपदेश चोला तो धर्मका पहने हुए है, किंतु वास्तवमें अधर्म है। इससे संसारमें वर्ण-संकरताका प्रचार होगा। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मोंका अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मोंमें लग जाऊँ तो कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान रखनेवाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? उस दशामें तो मैं इस जगत्में दुराचारी तथा लोकको कलङ्कित करनेवाला समझा जाऊँगा॥ ६-७॥

कस्य यास्याम्यहं वृत्तं केन वा स्वर्गमाप्नुयाम्।

अनया वर्तमानोऽहं वृत्त्या हीनप्रतिज्ञया॥ ८॥

‘जहाँ अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दी जाती है, उस वृत्तिके अनुसार बर्ताव करनेपर मैं किस साधनसे स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा तथा आपने जिस आचारका उपदेश दिया है, वह किसका है, जिसका मुझे अनुसरण करना होगा; क्योंकि आपके कथनानुसार मैं पिता आदिमेंसे किसीका कुछ भी नहीं हूँ॥ ८॥

कामवृत्तोऽन्वयं लोक: कृत्स्न: समुपवर्तते।

यद्वृत्ता: सन्ति राजानस्तद्वृत्ता: सन्ति हि प्रजा:॥ ९॥

‘आपके बताये हुए मार्गसे चलनेपर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा; क्योंकि राजाओंके जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है॥ ९॥

सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम्।

तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोक: प्रतिष्ठित:॥ १०॥

‘सत्यका पालन ही राजाओंका दयाप्रधान धर्म है— सनातन आचार है, अत: राज्य सत्यस्वरूप है। सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है॥ १०॥

ऋषयश्चैव देवाश्च सत्यमेव हि मेनिरे।

सत्यवादी हि लोकेऽस्मिन् परं गच्छति चाक्षयम्॥ ११॥

‘ऋषियों और देवताओंने सदा सत्यका ही आदर किया है। इस लोकमें सत्यवादी मनुष्य अक्षय परम धाममें जाता है॥ ११॥

उद्विजन्ते यथा सर्पान्नरादनृतवादिन:।

धर्म: सत्यपरो लोके मूलं सर्वस्य चोच्यते॥ १२॥

‘झूठ बोलनेवाले मनुष्यसे सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँपसे। संसारमें सत्य ही धर्मकी पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है॥ १२॥

सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्म: सदाश्रित:।

सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥ १३॥

‘जगत्में सत्य ही ईश्वर है। सदा सत्यके ही आधारपर धर्मकी स्थिति रहती है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है॥ १३॥

दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च।

वेदा: सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत्॥ १४॥

‘दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद—इन सबका आधार सत्य ही है; इसलिये सबको सत्यपरायण होना चाहिये॥ १४॥

एक: पालयते लोकमेक: पालयते कुलम्।

मज्जत्येको हि निरय एक: स्वर्गे महीयते॥ १५॥

‘एक मनुष्य सम्पूर्ण जगत्का पालन करता है, एक समूचे कुलका पालन करता है, एक नरकमें डूबता है और एक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १५॥

सोऽहं पितुर्निदेशं तु किमर्थं नानुपालये।

सत्यप्रतिश्रव: सत्यं सत्येन समयीकृतम्॥ १६॥

‘मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्यकी शपथ खाकर पिताके सत्यका पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशामें मैं पिताके आदेशका किसलिये पालन नहीं करूँ?॥ १६॥

नैव लोभान्न मोहाद् वा न चाज्ञानात् तमोऽन्वित:।

सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरो: सत्यप्रतिश्रव:॥ १७॥

‘पहले सत्यपालनकी प्रतिज्ञा करके अब लोभ, मोह अथवा अज्ञानसे विवेकशून्य होकर मैं पिताके सत्यकी मर्यादा भङ्ग नहीं करूँगा॥ १७॥

असत्यसंधस्य सतश्चलस्यास्थिरचेतस:।

नैव देवा न पितर: प्रतीच्छन्तीति न: श्रुतम्॥ १८॥

‘हमने सुना है कि जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करनेके कारण धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुषके दिये हुए हव्य-कव्यको देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं॥ १८॥

प्रत्यगात्ममिमं धर्मं सत्यं पश्याम्यहं ध्रुवम्।

भार: सत्पुरुषैश्चीर्णस्तदर्थमभिनन्द्यते॥ १९॥

‘मैं इस सत्यरूपी धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये हितकर और सब धर्मोंमें श्रेष्ठ समझता हूँ। सत्पुरुषोंने जटा-वल्कल आदिके धारणरूप तापस धर्मका पालन किया है, इसलिये मैं भी उसका अभिनन्दन करता हूँ॥

क्षात्रं धर्ममहं त्यक्ष्ये ह्यधर्मं धर्मसंहितम्।

क्षुद्रैर्नृशंसैर्लुब्धैश्च सेवितं पापकर्मभि:॥ २०॥

‘जो धर्मयुक्त प्रतीत हो रहा है, किंतु वास्तवमें अधर्मरूप है, जिसका नीच, क्रूर, लोभी और पापाचारी पुरुषोंने सेवन किया है, ऐसे क्षात्रधर्मका (पिताकी आज्ञा भङ्ग करके राज्य ग्रहण करनेका) मैं अवश्य त्याग करूँगा (क्योंकि वह न्याययुक्त नहीं है)॥ २०॥

कायेन कुरुते पापं मनसा सम्प्रधार्य तत्।

अनृतं जिह्वया चाह त्रिविधं कर्म पातकम्॥ २१॥

‘मनुष्य अपने शरीरसे जो पाप करता है, उसे पहले मनके द्वारा कर्तव्यरूपसे निश्चित करता है। फिर जिह्वाकी सहायतासे उस अनृत कर्म (पाप) को वाणीद्वारा दूसरोंसे कहता है, तत्पश्चात् औरोंके सहयोगसे उसे शरीरद्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेदसे तीन प्रकारका होता है॥ २१॥

भूमि: कीर्तिर्यशो लक्ष्मी: पुरुषं प्रार्थयन्ति हि।

सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् तत:॥ २२॥

‘पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी—ये सब-की-सब सत्यवादी पुरुषको पानेकी इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्यका ही अनुसरण करते हैं, अत: मनुष्यको सदा सत्यका ही सेवन करना चाहिये॥ २२॥

श्रेष्ठं ह्यनार्यमेव स्याद् यद् भवानवधार्य माम्।

आह युक्तिकरैर्वाक्यैरिदं भद्रं कुरुष्व ह॥ २३॥

‘आपने उचित सिद्ध करके तर्कपूर्ण वचनोंके द्वारा मुझसे जो यह कहा है कि राज्य ग्रहण करनेमें ही कल्याण है; अत: इसे अवश्य स्वीकार करो। आपका यह आदेश श्रेष्ठ-सा प्रतीत होनेपर भी सज्जन पुरुषोंद्वारा आचरणमें लानेयोग्य नहीं है (क्योंकि इसे स्वीकार करनेसे सत्य और न्यायका उल्लङ्घन होता है)॥ २३॥

कथं ह्यहं प्रतिज्ञाय वनवासमिमं गुरो:।

भरतस्य करिष्यामि वचो हित्वा गुरोर्वच:॥ २४॥

‘मैं पिताजीके सामने इस तरह वनमें रहनेकी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अब उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके मैं भरतकी बात कैसे मान लूँगा॥ २४॥

स्थिरा मया प्रतिज्ञाता प्रतिज्ञा गुरुसंनिधौ।

प्रहृष्टमानसा देवी कैकेयी चाभवत् तदा॥ २५॥

‘गुरुके समीप की हुई मेरी वह प्रतिज्ञा अटल है— किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती। उस समय जब कि मैंने प्रतिज्ञा की थी, देवी कैकेयीका हृदय हर्षसे खिल उठा था॥ २५॥

वनवासं वसन्नेव शुचिर्नियतभोजन:।

मूलपुष्पफलै: पुण्यै: पितृन् देवांश्च तर्पयन्॥ २६॥

‘मैं वनमें ही रहकर बाहर-भीतरसे पवित्र हो नियमित भोजन करूँगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पोंद्वारा देवताओं और पितरोंको तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञाका पालन करूँगा॥ २६॥

संतुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवाहये।

अकुह: श्रद्दधान: सन् कार्याकार्यविचक्षण:॥ २७॥

‘क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इसका निश्चय मैं कर चुका हूँ। अत: फल-मूल आदिसे पाँचों इन्द्रियोंको संतुष्ट करके निश्छल, श्रद्धापूर्वक लोकयात्रा (पिताकी आज्ञाके पालनरूप व्यवहार) का निर्वाह करूँगा॥ २७॥

कर्मभूमिमिमां प्राप्य कर्तव्यं कर्म यच्छुभम्।

अग्निर्वायुश्च सोमश्च कर्मणां फलभागिन:॥ २८॥

‘इस कर्मभूमिको पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिये; क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्मोंके ही फलसे उन-उन पदोंके भागी हुए हैं॥

शतं क्रतूनामाहृत्य देवराट् त्रिदिवं गत:।

तपांस्युग्राणि चास्थाय दिवं प्राप्ता महर्षय:॥ २९॥

‘देवराज इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। महर्षियोंने भी उग्र तपस्या करके दिव्य लोकोंमें स्थान प्राप्त किया है’॥ २९॥

अमृष्यमाण: पुनरुग्रतेजा

निशम्य तन्नास्तिकवाक्यहेतुम्।

अथाब्रवीत् तं नृपतेस्तनूजो

विगर्हमाणो वचनानि तस्य॥ ३०॥

उग्र तेजस्वी राजकुमार श्रीराम परलोककी सत्ताका खण्डन करनेवाले जाबालिके पूर्वोक्त वचनोंको सुनकर उन्हें सहन न कर सकनेके कारण उन वचनोंकी निन्दा करते हुए पुन: उनसे बोले—॥ ३०॥

सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च

भूतानुकम्पां प्रियवादितां च।

द्विजातिदेवातिथिपूजनं च

पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्त:॥ ३१॥

‘सत्य, धर्म, पराक्रम, समस्त प्राणियोंपर दया, सबसे प्रिय वचन बोलना तथा देवताओं, अतिथियों और ब्राह्मणोंकी पूजा करना—इन सबको साधु पुरुषोंने स्वर्गलोकका मार्ग बताया है॥ ३१॥

तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थ-

मेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्रा:।

धर्मं चरन्त: सकलं यथावत्

कांक्षन्ति लोकागममप्रमत्ता:॥ ३२॥

‘सत्पुरुषोंके इस वचनके अनुसार धर्मका स्वरूप जानकर तथा अनुकूल तर्कसे उसका यथार्थ निर्णय करके एक निश्चयपर पहुँचे हुए सावधान ब्राह्मण भलीभाँति धर्माचरण करते हुए उन-उन उत्तम लोकोंको प्राप्त करना चाहते हैं॥ ३२॥

निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद्

यस्त्वामगृह्णाद् विषमस्थबुद्धिम्।

बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं

सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्॥ ३३॥

‘आपकी बुद्धि विषम-मार्गमें स्थित है—आपने वेद-विरुद्ध मार्गका आश्रय ले रखा है। आप घोर नास्तिक और धर्मके रास्तेसे कोसों दूर हैं। ऐसी पाखण्डमयी बुद्धिके द्वारा अनुचित विचारका प्रचार करनेवाले आपको मेरे पिताजीने जो अपना याजक बना लिया, उनके इस कार्यकी मैं निन्दा करता हूँ॥ ३३॥

यथा हि चोर: स तथा हि बुद्ध-

स्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।

तस्माद्धि य: शक्यतम: प्रजानां

स नास्तिके नाभिमुखो बुध: स्यात्॥ ३४॥

‘जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्धमतावलम्बी) भी दण्डनीय है। तथागत (नास्तिकविशेष) और नास्तिक (चार्वाक्) को भी यहाँ इसी कोटिमें समझना चाहिये। इसलिये प्रजापर अनुग्रह करनेके लिये राजाद्वारा जिस नास्तिकको दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोरके समान दण्ड दिलाया ही जाय; परंतु जो वशके बाहर हो, उस नास्तिकके प्रति विद्वान् ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो—उससे वार्तालापतक न करे॥ ३४॥

त्वत्तो जना: पूर्वतरे द्विजाश्च

शुभानि कर्माणि बहूनि चक्रु:।

छित्त्वा सदेमं च परं च लोकं

तस्माद् द्विजा: स्वस्ति कृतं हुतं च॥ ३५॥

‘आपके सिवा पहलेके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने इहलोक और परलोककी फल-कामनाका परित्याग करके वेदोक्त धर्म समझकर सदा ही बहुत-से शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया है। अत: जो भी ब्राह्मण हैं, वे वेदोंको ही प्रमाण मानकर स्वस्ति (अहिंसा और सत्य आदि), कृत (तप, दान और परोपकार आदि) तथा हुत (यज्ञ-याग आदि) कर्मोंका सम्पादन करते हैं॥ ३५॥

धर्मे रता: सत्पुरुषै: समेता-

स्तेजस्विनो दानगुणप्रधाना:।

अहिंसका वीतमलाश्च लोके

भवन्ति पूज्या मुनय: प्रधाना:॥ ३६॥

‘जो धर्ममें तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषोंका साथ करते हैं, तेजसे सम्पन्न हैं, जिनमें दानरूपी गुणकी प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणीकी हिंसा नहीं करते तथा जो मलसंसर्गसे रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसारमें पूजनीय होते हैं’॥ ३६॥

इति ब्रुवन्तं वचनं सरोषं

रामं महात्मानमदीनसत्त्वम्।

उवाच पथ्यं पुनरास्तिकं च

सत्यं वच: सानुनयं च विप्र:॥ ३७॥

महात्मा श्रीराम स्वभावसे ही दैन्यभावसे रहित थे। उन्होंने जब रोषपूर्वक पूर्वोक्त बात कही, तब ब्राह्मण जाबालिने विनयपूर्वक यह आस्तिकतापूर्ण सत्य एवं हितकर वचन कहा—॥ ३७॥

न नास्तिकानां वचनं ब्रवीम्यहं

न नास्तिकोऽहं न च नास्ति किंचन।

समीक्ष्य कालं पुनरास्तिकोऽभवं

भवेय काले पुनरेव नास्तिक:॥ ३८॥

‘रघुनन्दन! न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकोंकी बात ही करता हूँ। परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है। मैं अवसर देखकर फिर आस्तिक हो गया और लौकिक व्यवहारके समय आवश्यकता होनेपर पुन: नास्तिक हो सकता हूँ—नास्तिकोंकी-सी बातें कर सकता हूँ॥ ३८॥

स चापि कालोऽयमुपागत: शनै-

र्यथा मया नास्तिकवागुदीरिता।

निवर्तनार्थं तव राम कारणात्

प्रसादनार्थं च मयैतदीरितम्॥ ३९॥

‘इस समय ऐसा अवसर आ गया था, जिससे मैंने धीरे-धीरे नास्तिकोंकी-सी बातें कह डालीं। श्रीराम! मैंने जो यह बात कही, इसमें मेरा उद्देश्य यही था कि किसी तरह आपको राजी करके अयोध्या लौटनेके लिये तैयार कर लूँ’॥ ३९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवाधिकशततम: सर्ग:॥ १०९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ नौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०९॥

 

दशाधिकशततम: सर्ग:

वसिष्ठजीका सृष्टिपरम्पराके साथ इक्ष्वाकुकुलकी परम्परा बताकर ज्येष्ठके ही राज्याभिषेकका औचित्य सिद्ध करना और श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना

क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठ: प्रत्युवाच ह।

जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम्॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीको रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजीने उनसे कहा—‘रघुनन्दन! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोकके प्राणियोंका परलोकमें जाना और आना होता रहता है (अत: ये नास्तिक नहीं हैं)॥ १॥

निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद् वाक्यमब्रवीत्।

इमां लोकसमुत्पत्तिं लोकनाथ निबोध मे॥ २॥

‘जगदीश्वर! इस समय तुम्हें लौटानेकी इच्छासे ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी। तुम मुझसे इस लोककी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो॥ २॥

सर्वं सलिलमेवासीत् पृथिवी तत्र निर्मिता।

तत: समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूर्दैवतै: सह॥ ३॥

‘सृष्टिके प्रारम्भकालमें सब कुछ जलमय ही था। उस जलके भीतर ही पृथ्वीका निर्माण हुआ। तदनन्तर देवताओंके साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए॥ ३॥

स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुंधराम्।

असृजच्च जगत् सर्वं सह पुत्रै: कृतात्मभि:॥ ४॥

‘इसके बाद उन भगवान् विष्णुस्वरूप ब्रह्माने ही वराहरूपसे प्रकट होकर जलके भीतरसे इस पृथ्वीको निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रोंके साथ इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की॥ ४॥

आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्यय:।

तस्मान्मरीचि: संजज्ञे मरीचे: कश्यप: सुत:॥ ५॥

‘आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं। उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए॥

विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वत: स्वयम्।

स तु प्रजापति: पूर्वमिक्ष्वाकुस्तु मनो: सुत:॥ ६॥

‘कश्यपसे विवस्वान्का जन्म हुआ। विवस्वान्के पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे। मनुके पुत्र इक्ष्वाकु हुए॥ ६॥

यस्येयं प्रथमं दत्ता समृद्धा मनुना मही।

तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम्॥ ७॥

‘जिन्हें मनुने सबसे पहले इस पृथ्वीका समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकुको तुम अयोध्याका प्रथम राजा समझो॥ ७॥

इक्ष्वाकोस्तु सुत: श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुत:।

कुक्षेरथात्मजो वीरो विकुक्षिरुदपद्यत॥ ८॥

‘इक्ष्वाकुके पुत्र श्रीमान् कुक्षिके नामसे विख्यात हुए। कुक्षिके वीर पुत्र विकुक्षि हुए॥ ८॥

विकुक्षेस्तु महातेजा: बाण: पुत्र: प्रतापवान्।

बाणस्य च महाबाहुरनरण्यो महातपा:॥ ९॥

‘विकुक्षिके महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए। बाणके महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे॥

नानावृष्टिर्बभूवास्मिन् न दुर्भिक्ष: सतां वरे।

अनरण्ये महाराजे तस्करो वापि कश्चन॥ १०॥

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज अनरण्यके राज्यमें कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ॥ १०॥

अनरण्यान्महाराज पृथू राजा बभूव ह।

तस्मात् पृथोर्महातेजास्त्रिशङ्कुरुदपद्यत॥ ११॥

‘महाराज! अनरण्यसे राजा पृथु हुए। उन पृथुसे महातेजस्वी त्रिशंकुकी उत्पत्ति हुई॥ ११॥

स सत्यवचनाद् वीर: सशरीरो दिवं गत:।

त्रिशङ्कोरभवत् सूनुर्धुन्धुमारो महायशा:॥ १२॥

‘वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्रके सत्य वचनके प्रभावसे सदेह स्वर्गलोकको चले गये थे। त्रिशंकुके महायशस्वी धुन्धुमार हुए॥ १२॥

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो व्यजायत।

युवनाश्वसुत: श्रीमान् मान्धाता समपद्यत॥ १३॥

‘धुन्धुमारसे महातेजस्वी युवनाश्वका जन्म हुआ। युवनाश्वके पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए॥ १३॥

मान्धातुस्तु महातेजा: सुसंधिरुदपद्यत।

सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधि: प्रसेनजित्॥ १४॥

‘मान्धाताके महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए। सुसंधिके दो पुत्र हुए—ध्रुवसंधि और प्रसेनजित्॥ १४॥

यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो रिपुसूदन:।

भरतात् तु महाबाहोरसितो नाम जायत॥ १५॥

‘ध्रुवसंधिके यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे। महाबाहु भरतसे असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ १५॥

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रव:।

हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दव:॥ १६॥

‘जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे॥ १६॥

तांस्तु सर्वान् प्रतिव्यूह्य युद्धे राजा प्रवासित:।

स च शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनि:॥ १७॥

‘उन सबका सामना करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाकर युद्धके लिये डटे रहनेपर भी शत्रुओंकी संख्या अधिक होनेके कारण राजा असितको हारकर परदेशकी शरण लेनी पड़ी। वे रमणीय शैल-शिखरपर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभावसे परमात्माका मनन-चिन्तन करने लगे॥

द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुति:।

तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्॥ १८॥

ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षिणी पुत्रमुत्तमम्।

एका गर्भविनाशाय सपत्न्यै गरलं ददौ॥ १९॥

‘सुना जाता है कि असितकी दो पत्नियाँ गर्भवती थीं। उनमेंसे एक महाभागा कमललोचना राजपत्नीने उत्तम पुत्र पानेकी अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशी च्यवन मुनिके चरणोंमें वन्दना की और दूसरी रानीने अपनी सौतके गर्भका विनाश करनेके लिये उसे जहर दे दिया॥

भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रित:।

तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी त्वभ्यवादयत्॥ २०॥

‘उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालयपर रहते थे। राजा असितकी कालिन्दी नामवाली पत्नीने ऋषिके चरणोंमें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया॥ २०॥

स तामभ्यवदत् प्रीतो वरेप्सुं पुत्रजन्मनि।

पुत्रस्ते भविता देवि महात्मा लोकविश्रुत:॥ २१॥

धार्मिकश्च सुभीमश्च वंशकर्तारिसूदन:।

‘मुनिने प्रसन्न होकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये वरदान चाहनेवाली रानीसे इस प्रकार कहा—‘देवि! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंशको चलानेवाला और शत्रुओंका संहारक होगा’॥ २१/

श्रुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा मुनिं तमनुमान्य च॥ २२॥

पद्मपत्रसमानाक्षं पद्मगर्भसमप्रभम्।

तत: सा गृहमागम्य पत्नी पुत्रमजायत॥ २३॥

‘यह सुनकर रानीने मुनिकी परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँसे अपने घर आनेपर उस रानीने एक पुत्रको जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर थी और नेत्र कमलदलके समान मनोहर थे॥ २२-२३॥

सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया।

गरेण सह तेनैव तस्मात् स सगरोऽभवत्॥ २४॥

‘सौतने उसके गर्भको नष्ट करनेके लिये जो गर (विष) दिया था, उस गरके साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ २४॥

स राजा सगरो नाम य: समुद्रमखानयत्।

इष्ट्वा पर्वणि वेगेन त्रासयान इमा: प्रजा:॥ २५॥

‘राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्वके दिन यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके खुदाईके वेगसे इन समस्त प्रजाओंको भयभीत करते हुए अपने पुत्रोंद्वारा समुद्रको खुदवाया था॥ २५॥

असमञ्जस्तु पुत्रोऽभूत् सगरस्येति न: श्रुतम्।

जीवन्नेव स पित्रा तु निरस्त: पापकर्मकृत्॥ २६॥

‘हमारे सुननेमें आया है कि सगरके पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्ममें प्रवृत्त होनेके कारण पिताने जीते-जी ही राज्यसे निकाल दिया था॥ २६॥

अंशुमानपि पुत्रोऽभूदसमञ्जस्य वीर्यवान्।

दिलीपोंऽशुमत: पुत्रो दिलीपस्य भगीरथ:॥ २७॥

‘असमञ्जके पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे। अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए॥ २७॥

भगीरथात् ककुत्स्थश्च काकुत्स्था येन तु स्मृता:।

ककुत्स्थस्य तु पुत्रोऽभूद् रघुर्येन तु राघवा:॥ २८॥

‘भगीरथसे ककुत्स्थका जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ‘काकुत्स्थ’ कहलाते हैं। ककुत्स्थके पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंशके लोग ‘राघव’ कहलाये॥ २८॥

रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्ध: पुरुषादक:।

कल्माषपाद: सौदास इत्येवं प्रथितो भुवि॥ २९॥

‘रघुके तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होनेपर शापवश कुछ वर्षोंके लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे। वे इस पृथ्वीपर सौदास नामसे विख्यात थे॥

कल्माषपादपुत्रोऽभूच्छङ्खणस्त्विति न: श्रुतम्।

यस्तु तद्वीर्यमासाद्य सहसैन्यो व्यनीनशत्॥ ३०॥

‘कल्माषपादके पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुननेमें आया है, जो युद्धमें सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे॥ ३०॥

शङ्खणस्य तु पुत्रोऽभूच्छूर: श्रीमान् सुदर्शन:।

सुदर्शनस्याग्निवर्ण अग्निवर्णस्य शीघ्रग:॥ ३१॥

‘शङ्खणके शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए। सुदर्शनके पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्णके पुत्र शीघ्रग थे॥

शीघ्रगस्य मरु: पुत्रो मरो: पुत्र: प्रशुश्रुव:।

प्रशुश्रुवस्य पुत्रोऽभूदम्बरीषो महामति:॥ ३२॥

‘शीघ्रगके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रशुश्रुव तथा प्रशुश्रुवके महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए॥ ३२॥

अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुष: सत्यविक्रम:।

नहुषस्य च नाभाग: पुत्र: परमधार्मिक:॥ ३३॥

‘अम्बरीषके पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे। नहुषके पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे॥ ३३॥

अजश्च सुव्रतश्चैव नाभागस्य सुतावुभौ।

अजस्य चैव धर्मात्मा राजा दशरथ: सुत:॥ ३४॥

‘नाभागके दो पुत्र हुए—अज और सुव्रत। अजके धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे॥ ३४॥

तस्य ज्येष्ठोऽसि दायादो राम इत्यभिविश्रुत:।

तद् गृहाण स्वकं राज्यमवेक्षस्व जगन्नृप॥ ३५॥

‘दशरथके ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ‘श्रीराम’ के नामसे प्रसिद्धि है। नरेश्वर! यह अयोध्याका राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देखभाल करते रहो॥ ३५॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां राजा भवति पूर्वज:।

पूर्वजे नावर: पुत्रो ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते॥ ३६॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके यहाँ ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता आया है। ज्येष्ठके होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है। ज्येष्ठ पुत्रका ही राजाके पदपर अभिषेक होता है॥ ३६॥

स राघवाणां कुलधर्ममात्मन:

सनातनं नाद्य विहन्तुमर्हसि।

प्रभूतरत्नामनुशाधि मेदिनीं

प्रभूतराष्ट्रां पितृवन्महायश:॥ ३७॥

‘महायशस्वी श्रीराम! रघुवंशियोंका जो अपना सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो। बहुत-से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रत्नराशिसे सम्पन्न इस वसुधाका पिताकी भाँति पालन करो’॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११०॥

 

एकादशाधिकशततम: सर्ग:

वसिष्ठजीके समझानेपर भी श्रीरामको पिताकी आज्ञाके पालनसे विरत होते न देख भरतका धरना देनेको तैयार होना तथा श्रीरामका उन्हें समझाकर अयोध्या लौटनेकी आज्ञा देना

वसिष्ठ: स तदा राममुक्त्वा राजपुरोहित:।

अब्रवीद् धर्मसंयुक्तं पुनरेवापरं वच:॥ १॥

उस समय राजपुरोहित वसिष्ठने पूर्वोक्त बातें कहकर पुन: श्रीरामसे दूसरी धर्मयुक्त बातें कहीं—॥ १॥

पुरुषस्येह जातस्य भवन्ति गुरव: सदा।

आचार्यश्चैव काकुत्स्थ पिता माता च राघव॥ २॥

‘रघुनन्दन! ककुत्स्थकुलभूषण! इस संसारमें उत्पन्न हुए पुरुषके सदा तीन गुरु होते हैं—आचार्य, पिता और माता॥ २॥

पिता ह्येनं जनयति पुरुषं पुरुषर्षभ।

प्रज्ञां ददाति चाचार्यस्तस्मात् स गुरुरुच्यते॥ ३॥

‘पुरुषप्रवर! पिता पुरुषके शरीरको उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है॥ ३॥

स तेऽहं पितुराचार्यस्तव चैव परंतप।

मम त्वं वचनं कुर्वन् नातिवर्ते: सतां गतिम्॥ ४॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर! मैं तुम्हारे पिताका और तुम्हारा भी आचार्य हूँ; अत: मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम सत्पुरुषोंके पथका त्याग करनेवाले नहीं समझे जाओगे॥ ४॥

इमा हि ते परिषदो ज्ञातयश्च नृपास्तथा।

एषु तात चरन् धर्मं नातिवर्ते: सतां गतिम्॥ ५॥

‘तात! ये तुम्हारे सभासद्, बन्धु-बान्धव तथा सामन्त राजा पधारे हुए हैं, इनके प्रति धर्मानुकूल बर्ताव करनेसे भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गका उल्लङ्घन नहीं होगा॥ ५॥

वृद्धाया धर्मशीलाया मातुर्नार्हस्यवर्तितुम्।

अस्या हि वचनं कुर्वन् नातिवर्ते: सतां गतिम्॥ ६॥

‘अपनी धर्मपरायणा बूढ़ी माताकी बात तो तुम्हें कभी टालनी ही नहीं चाहिये। इनकी आज्ञाका पालन करके तुम श्रेष्ठ पुरुषोंके आश्रयभूत धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं माने जाओगे॥ ६॥

भरतस्य वच: कुर्वन् याचमानस्य राघव।

आत्मानं नातिवर्तेस्त्वं सत्यधर्मपराक्रम॥ ७॥

‘सत्य, धर्म और पराक्रमसे सम्पन्न रघुनन्दन! भरत अपने आत्मस्वरूप तुमसे राज्य ग्रहण करने और अयोध्या लौटनेकी प्रार्थना कर रहे हैं, उनकी बात मान लेनेसे भी तुम धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं कहलाओगे’॥ ७॥

एवं मधुरमुक्त: स गुरुणा राघव: स्वयम्।

प्रत्युवाच समासीनं वसिष्ठं पुरुषर्षभ:॥ ८॥

गुरु वसिष्ठने सुमधुर वचनोंमें जब इस प्रकार कहा, तब साक्षात् पुरुषोत्तम श्रीराघवेन्द्रने वहाँ बैठे हुए वसिष्ठजीको यों उत्तर दिया॥ ८॥

यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुत: सदा।

न सुप्रतिकरं तत् तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम्॥ ९ ॥

यथाशक्तिप्रदानेन स्वापनोच्छादनेन च।

नित्यं च प्रियवादेन तथा संवर्धनेन च॥ १०॥

‘माता और पिता पुत्रके प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करते हैं, अपनी शक्तिके अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौनेपर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा मीठी बातें बोलने तथा पालन-पोषण करने आदिके द्वारा माता और पिताने जो उपकार किया है, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता॥

स हि राजा दशरथ: पिता जनयिता मम।

आज्ञापयन्मां यत् तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति॥ ११॥

‘अत: मेरे जन्मदाता पिता महाराज दशरथने मुझे जो आज्ञा दी है, वह मिथ्या नहीं होगी’॥ ११॥

एवमुक्तस्तु रामेण भरत: प्रत्यनन्तरम्।

उवाच विपुलोरस्क: सूतं परमदुर्मना:॥ १२॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर चौड़ी छातीवाले भरतजीका मन बहुत उदास हो गया। वे पास ही बैठे हुए सूत सुमन्त्रसे बोले—॥ १२॥

इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे।

आर्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति॥ १३॥

निराहारो निरालोको धनहीनो यथा द्विज:।

शये पुरस्ताच्छालायां यावन्मां प्रतियास्यति॥ १४॥

‘सारथे! आप इस वेदीपर शीघ्र ही बहुत-से कुश बिछा दीजिये। जबतक आर्य मुझपर प्रसन्न नहीं होंगे, तबतक मैं यहीं इनके पास धरना दूँगा। जैसे साहूकार या महाजनके द्वारा निर्धन किया हुआ ब्राह्मण उसके घरके दरवाजेपर मुँह ढककर बिना खाये-पिये पड़ा रहता है, उसी प्रकार मैं भी उपवासपूर्वक मुखपर आवरण डालकर इस कुटियाके सामने लेट जाऊँगा। जबतक मेरी बात मानकर ये अयोध्याको नहीं लौटेंगे, तबतक मैं इसी तरह पड़ा रहूँगा’॥ १३-१४॥

स तु राममवेक्षन्तं सुमन्त्रं प्रेक्ष्य दुर्मना:।

कुशोत्तरमुपस्थाप्य भूमावेवास्थित: स्वयम्॥ १५॥

यह सुनकर सुमन्त्र श्रीरामचन्द्रजीका मुँह ताकने लगे। उन्हें इस अवस्थामें देख भरतके मनमें बड़ा दु:ख हुआ और वे स्वयं ही कुशकी चटाई बिछाकर जमीनपर बैठ गये॥ १५॥

तमुवाच महातेजा रामो राजर्षिसत्तम:।

किं मां भरत कुर्वाणं तात प्रत्युपवेक्ष्यसे॥ १६॥

तब महातेजस्वी राजर्षिशिरोमणि श्रीरामने उनसे कहा— ‘तात भरत! मैं तुम्हारी क्या बुराई करता हूँ, जो मेरे आगे धरना दोगे?॥ १६॥

ब्राह्मणो ह्येकपार्श्वेन नरान् रोद्धुमिहार्हति।

न तु मूर्धाभिषिक्तानां विधि: प्रत्युपवेशने॥ १७॥

‘ब्राह्मण एक करवटसे सोकर—धरना देकर मनुष्योंको अन्यायसे रोक सकता है, परंतु राजतिलक ग्रहण करनेवाले क्षत्रियोंके लिये इस प्रकार धरना देनेका विधान नहीं है॥ १७॥

उत्तिष्ठ नरशार्दूल हित्वैतद् दारुणं व्रतम्।

पुरवर्यामित: क्षिप्रमयोध्यां याहि राघव॥ १८॥

‘अत: नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कठोर व्रतका परित्याग करके उठो और यहाँसे शीघ्र ही अयोध्यापुरीको जाओ’॥

आसीनस्त्वेव भरत: पौरजानपदं जनम्।

उवाच सर्वत: प्रेक्ष्य किमार्यं नानुशासथ॥ १९॥

यह सुनकर भरत वहाँ बैठे-बैठे ही सब ओर दृष्टि डालकर नगर और जनपदके लोगोंसे बोले—‘आपलोग भैयाको क्यों नहीं समझाते हैं ?’॥ १९॥

ते तदोचुर्महात्मानं पौरजानपदा जना:।

काकुत्स्थमभिजानीम: सम्यग् वदति राघव:॥ २०॥

तब नगर और जनपदके लोग महात्मा भरतसे बोले—‘हम जानते हैं, काकुत्स्थ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप रघुकुल- तिलक भरतजी ठीक ही कहते हैं॥ २०॥

एषोऽपि हि महाभाग: पितुर्वचसि तिष्ठति।

अत एव न शक्ता: स्मो व्यावर्तयितुमञ्जसा॥ २१॥

‘परंतु ये महाभाग श्रीरामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञाके पालनमें लगे हैं, इसलिये यह भी ठीक ही है। अतएव हम इन्हें सहसा उस ओरसे लौटानेमें असमर्थ हैं’॥ २१॥

तेषामाज्ञाय वचनं रामो वचनमब्रवीत्।

एवं निबोध वचनं सुहृदां धर्मचक्षुषाम्॥ २२॥

उन पुरवासियोंके वचनका तात्पर्य समझकर श्रीरामने भरतसे कहा—‘भरत! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले सुहृदोंके इस कथनको सुनो और समझो॥ २२॥

एतच्चैवोभयं श्रुत्वा सम्यक् सम्पश्य राघव।

उत्तिष्ठ त्वं महाबाहो मां च स्पृश तथोदकम्॥ २३॥

‘रघुनन्दन! मेरी और इनकी दोनों बातोंको सुनकर उनपर सम्यक् रूपसे विचार करो। महाबाहो! अब शीघ्र उठो तथा मेरा और जलका स्पर्श करो’॥ २३॥

अथोत्थाय जलं स्पृष्ट्वा भरतो वाक्यमब्रवीत्।

शृण्वन्तु मे परिषदो मन्त्रिण: शृणुयुस्तथा॥ २४॥

न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम्।

एवं परमधर्मज्ञं नानुजानामि राघवम्॥ २५॥

यह सुनकर भरत उठकर खड़े हो गये और श्रीराम एवं जलका स्पर्श करके बोले—‘मेरे सभासद् और मन्त्री सब लोग सुनें—न तो मैंने पिताजीसे राज्य माँगा था और न मातासे ही कभी इसके लिये कुछ कहा था। साथ ही, परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके वनवासमें भी मेरी कोई सम्मति नहीं है॥ २४-२५॥

यदि त्ववश्यं वस्तव्यं कर्तव्यं च पितुर्वच:।

अहमेव निवत्स्यामि चतुर्दश वने समा:॥ २६॥

‘फिर भी यदि इनके लिये पिताजीकी आज्ञाका पालन करना और वनमें रहना अनिवार्य है तो इनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा’॥ २६॥

धर्मात्मा तस्य सत्येन भ्रातुर्वाक्येन विस्मित:।

उवाच राम: सम्प्रेक्ष्य पौरजानपदं जनम्॥ २७॥

भाई भरतकी इस सत्य बातसे धर्मात्मा श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने पुरवासी तथा राज्यनिवासी लोगोंकी ओर देखकर कहा—॥ २७॥

विक्रीतमाहितं क्रीतं यत् पित्रा जीवता मम।

न तल्लोपयितुं शक्यं मया वा भरतेन वा॥ २८॥

‘पिताजीने अपने जीवनकालमें जो वस्तु बेच दी है, या धरोहर रख दी है, अथवा खरीदी है, उसे मैं अथवा भरत कोई भी पलट नहीं सकता॥ २८॥

उपाधिर्न मया कार्यो वनवासे जुगुप्सित:।

युक्तमुक्तं च कैकेय्या पित्रा मे सुकृतं कृतम्॥ २९॥

‘मुझे वनवासके लिये किसीको प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि सामर्थ्य रहते हुए प्रतिनिधिसे काम लेना लोकमें निन्दित है। कैकेयीने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी और मेरे पिताजीने उसे देकर पुण्य कर्म ही किया था॥

जानामि भरतं क्षान्तं गुरुसत्कारकारिणम्।

सर्वमेवात्र कल्याणं सत्यसंधे महात्मनि॥ ३०॥

‘मैं जानता हूँ, भरत बड़े क्षमाशील और गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले हैं, इन सत्यप्रतिज्ञ महात्मामें सभी कल्याणकारी गुण मौजूद हैं॥ ३०॥

अनेन धर्मशीलेन वनात् प्रत्यागत: पुन:।

भ्रात्रा सह भविष्यामि पृथिव्या: पतिरुत्तम:॥ ३१॥

‘चौदह वर्षोंकी अवधि पूरी करके जब मैं वनसे लौटूँगा, तब अपने इन धर्मशील भाईके साथ इस भूमण्डलका श्रेष्ठ राजा होऊँगा॥ ३१॥

वृतो राजा हि कैकेय्या मया तद्वचनं कृतम्।

अनृतान्मोचयानेन पितरं तं महीपतिम्॥ ३२॥

‘कैकेयीने राजासे वर माँगा और मैंने उसका पालन स्वीकार कर लिया, अत: भरत! अब तुम मेरा कहना मानकर उस वरके पालनद्वारा अपने पिता महाराज दशरथको असत्यके बन्धनसे मुक्त करो’॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशाधिकशततम: सर्ग:॥ १११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १११॥

 

द्वादशाधिकशततम: सर्ग:

ऋषियोंका भरतको श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार लौट जानेकी सलाह देना, भरतका पुन: श्रीरामके चरणोंमें गिरकर चलनेकी प्रार्थना करना, श्रीरामका उन्हें समझाकर अपनी चरणपादुका देकर उन सबको विदा करना

तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम्।

विस्मिता: संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षय:॥ १॥

उन अनुपम तेजस्वी भ्राताओंका वह रोमाञ्चकारी समागम देख वहाँ आये हुए महर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ १॥

अन्तर्हिता मुनिगणा: स्थिताश्च परमर्षय:।

तौ भ्रातरौ महाभागौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे॥ २॥

अन्तरिक्षमें अदृश्य भावसे खड़े हुए मुनि तथा वहाँ प्रत्यक्षरूपमें बैठे हुए महर्षि उन महान् भाग्यशाली ककुत्स्थवंशी बन्धुओंकी इस प्रकार प्रशंसा करने लगे—॥ २॥

सदार्यौ राजपुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्मविक्रमौ।

श्रुत्वा वयं हि सम्भाषामुभयो: स्पृहयामहे॥ ३॥

‘ये दोनों राजकुमार सदा श्रेष्ठ, धर्मके ज्ञाता और धर्ममार्गपर ही चलनेवाले हैं। इन दोनोंकी बातचीत सुनकर हमें उसे बारंबार सुनते रहनेकी ही इच्छा होती है’॥ ३॥

ततस्त्वृषिगणा: क्षिप्रं दशग्रीववधैषिण:।

भरतं राजशार्दूलमित्यूचु: संगता वच:॥ ४॥

तदनन्तर दशग्रीव रावणके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ऋषियोंने मिलकर राजसिंह भरतसे तुरंत ही यह बात कही—॥ ४॥

कुले जात महाप्राज्ञ महावृत्त महायश:।

ग्राह्यं रामस्य वाक्यं ते पितरं यद्यवेक्षसे॥ ५॥

‘महाप्राज्ञ! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महान् है। यदि तुम अपने पिताकी ओर देखो—उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान लेनी चाहिये॥ ५॥

सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितु:।

अनृणत्वाच्च कैकेय्या: स्वर्गं दशरथो गत:॥ ६॥

‘हमलोग इन श्रीरामको पिताके ऋणसे सदा उऋण देखना चाहते हैं। कैकेयीका ऋण चुका देनेके कारण ही राजा दशरथ स्वर्गमें पहुँचे हैं’॥ ६॥

एतावदुक्त्वा वचनं गन्धर्वा: समहर्षय:।

राजर्षयश्चैव तथा सर्वे स्वां स्वां गतिं गता:॥ ७॥

इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ७॥

ह्लादितस्तेन वाक्येन शुशुभे शुभदर्शन:।

राम: संहृष्टवदनस्तानृषीनभ्यपूजयत्॥ ८॥

जिनके दर्शनसे जगत्का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियोंके वचनसे बहुत प्रसन्न हुए। उनका मुख हर्षोल्लाससे खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियोंकी सादर प्रशंसा की॥ ८॥

त्रस्तगात्रस्तु भरत: स वाचा सज्जमानया।

कृताञ्जलिरिदं वाक्यं राघवं पुनरब्रवीत्॥ ९॥

परंतु भरतका सारा शरीर थर्रा उठा। वे लड़खड़ाती हुई जबानसे हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ९॥

राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम्।

कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम्॥ १०॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! हमारे कुलधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला जो ज्येष्ठ पुत्रका राज्यग्रहण और प्रजापालनरूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माताकी याचना सफल कीजिये॥ १०॥

रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे।

पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा॥ ११॥

‘मैं अकेला ही इस विशाल राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगोंको भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता॥ ११॥

ज्ञातयश्चापि योधाश्च मित्राणि सुहृदश्च न:।

त्वामेव हि प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षका:॥ १२॥

‘जैसे किसान मेघकी प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु-बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं॥ १२॥

इदं राज्यं महाप्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि।

शक्तिमान् स हि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने॥ १३॥

‘महाप्राज्ञ! आप इस राज्यको स्वीकार करके दूसरे किसीको इसके पालनका भार सौंप दीजिये। वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोकका पालन करनेमें समर्थ हो सकता है’॥ १३॥

एवमुक्त्वापतद् भ्रातु: पादयोर्भरतस्तदा।

भृशं सम्प्रार्थयामास राघवेऽतिप्रियं वदन्॥ १४॥

ऐसा कहकर भरत अपने भाईके चरणोंपर गिर पड़े। उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजीसे अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करनेके लिये बड़ी प्रार्थना की॥

तमङ्के भ्रातरं कृत्वा रामो वचनमब्रवीत्।

श्यामं नलिनपत्राक्षं मत्तहंसस्वर: स्वयम्॥ १५॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरतको उठाकर गोदमें बिठा लिया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें स्वयं यह बात कही—॥ १५॥

आगता त्वामियं बुद्धि: स्वजा वैनयिकी च या।

भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि॥ १६॥

‘तात! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धिके द्वारा तुम समस्त भूमण्डलकी रक्षा करनेमें भी पूर्णरूपसे समर्थ हो सकते हो॥ १६॥

अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्भिश्च मन्त्रिभि:।

सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय॥ १७॥

‘इसके सिवा अमात्यों, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियोंसे सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो॥ १७॥

लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत्।

अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितु:॥ १८॥

‘चन्द्रमासे उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिमका परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिताकी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता॥ १८॥

कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम्।

न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत्॥ १९॥

‘तात! माता कैकेयीने कामनासे अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मनमें न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माताके प्रति करना उचित है’॥ १९॥

एवं ब्रुवाणं भरत: कौसल्यासुतमब्रवीत्।

तेजसाऽऽदित्यसंकाशं प्रतिपच्चन्द्रदर्शनम्॥ २०॥

जो सूर्यके समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा (द्वितीया) के चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है, उन कौसल्यानन्दन श्रीरामके इस प्रकार कहनेपर भरत उनसे यों बोले—॥ २०॥

अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते।

एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यत:॥ २१॥

‘आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणोंमें अर्पित हैं, आप इनपर अपने चरण रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत्के योगक्षेमका निर्वाह करेंगी’॥ २१॥

सोऽधिरुह्य नरव्याघ्र: पादुके व्यवमुच्य च।

प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने॥ २२॥

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीरामने उन पादुकाओंपर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरतको सौंप दिया॥ २२॥

स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत्।

चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्॥ २३॥

फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन।

तवागमनमाकांक्षन् वसन् वै नगराद् बहि:॥ २४॥

तव पादुकयोर्न्यस्य राज्यतन्त्रं परंतप।

उन पादुकाओंको प्रणाम करके भरतने श्रीरामसे कहा—‘वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षोंतक जटा और चीर धारण करके फल-मूलका भोजन करता हुआ आपके आगमनकी प्रतीक्षामें नगरसे बाहर ही रहूँगा। परंतप! इतने दिनोंतक राज्यका सारा भार आपकी इन चरण-पादुकाओंपर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा॥

चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम॥ २५॥

न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।

‘रघुकुलशिरोमणे! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्षके प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगा’॥

तथेति च प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम्॥ २६॥

शत्रुघ्नं च परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत्।

श्रीरामचन्द्रजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदरके साथ भरतको हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् शत्रुघ्नको भी छातीसे लगाकर यह बात कही—

मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति॥ २७॥

मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रघुनन्दन।

इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज ह॥ २८॥

‘रघुनन्दन! मैं तुम्हें अपनी और सीताकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयीकी रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना’—इतना कहते-कहते उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। उन्होंने व्यथित हृदयसे भाई शत्रुघ्नको विदा किया॥ २७-२८॥

स पादुके ते भरत: स्वलंकृते

महोज्ज्वले सम्परिगृह्य धर्मवित्।

प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं

चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि॥ २९॥

धर्मज्ञ भरतने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओंको लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की तथा उन पादुकाओंको राजाकी सवारीमें आनेवाले सर्वश्रेष्ठ गजराजके मस्तकपर स्थापित किया॥

अथानुपूर्व्या प्रतिपूज्य तं जनं

गुरूंश्च मन्त्रीन् प्रकृतीस्तथानुजौ।

व्यसर्जयद् राघववंशवर्धन:

स्थित: स्वधर्मे हिमवानिवाचल:॥ ३०॥

तदनन्तर अपने धर्ममें हिमालयकी भाँति अविचल भावसे स्थित रहनेवाले रघुवंशवर्धन श्रीरामने क्रमश: वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयोंका यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया॥

तं मातरो बाष्पगृहीतकण्ठ्यो

दु:खेन नामन्त्रयितुं हि शेकु:।

स चैव मातृरभिवाद्य सर्वा

रुदन् कुटीं स्वां प्रविवेश राम:॥ ३१॥

उस समय कौसल्या आदि सभी माताओंका गला आँसुओंसे रुँध गया था। वे दु:खके कारण श्रीरामको सम्बोधित भी न कर सकीं। श्रीराम भी सब माताओंको प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटियामें चले गये॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११२॥

 

त्रयोदशाधिकशततम: सर्ग:

भरतका भरद्वाजसे मिलते हुए अयोध्याको लौट आना

तत: शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा।

आरुरोह रथं हृष्ट: शत्रुघ्नसहितस्तदा॥ १॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी दोनों चरणपादुकाओंको अपने मस्तकपर रखकर भरत शत्रुघ्नके साथ प्रसन्नता-पूर्वक रथपर बैठे॥ १॥

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिश्च दृढव्रत:।

अग्रत: प्रययु: सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिता:॥ २॥

वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देनेके कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले॥ २॥

मन्दाकिनीं नदीं रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा।

प्रदक्षिणं च कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम्॥ ३॥

वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वतकी परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदीको पार करके पूर्वदिशाकी ओर प्रस्थित हुए॥ ३॥

पश्यन् धातुसहस्राणि रम्याणि विविधानि च।

प्रययौ तस्य पार्श्वेन ससैन्यो भरतस्तदा॥ ४॥

उस समय भरत अपनी सेनाके साथ सहस्रों प्रकारके रमणीय धातुओंको देखते हुए चित्रकूटके किनारेसे होकर निकले॥ ४॥

अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श भरतस्तदा।

आश्रमं यत्र स मुनिर्भरद्वाज: कृतालय:॥ ५॥

चित्रकूटसे थोड़ी ही दूर जानेपर भरतने वह आश्रम देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाजजी निवास करते थे80॥ ५॥

स तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य वीर्यवान्।

अवतीर्य रथात् पादौ ववन्दे कुलनन्दन:॥ ६॥

अपने कुलको आनन्दित करनेवाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाजके उस आश्रमपर पहुँचकर रथसे उतर पड़े और उन्होंने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ६॥

ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत्।

अपि कृत्यं कृतं तात रामेण च समागतम्॥ ७॥

उनके आनेसे महर्षि भरद्वाजको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरतसे पूछा—‘तात! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट हुई?’॥ ७॥

एवमुक्त: स तु ततो भरद्वाजेन धीमता।

प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सल:॥ ८॥

बुद्धिमान् भरद्वाजजीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मवत्सल भरतने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ८॥

स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रम:।

राघव: परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत्॥ ९॥

‘मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रमपर दृढ़ रहनेवाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजीने भी अनुरोध किया। तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा—॥ ९॥

पितु: प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वत:।

चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम॥ १०॥

‘मैं चौदह वर्षोंतक वनमें रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजीने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञाका ही मैं यथार्थरूपसे पालन करूँगा’॥ १०॥

एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठ: प्रत्युवाच ह।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत्॥ ११॥

‘उनके ऐसा कहनेपर बातके मर्मको समझनेवाले महाज्ञानी वसिष्ठजीने बातचीत करनेमें कुशल श्रीरघुनाथजीसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ ११॥

एते प्रयच्छ संहृष्ट: पादुके हेमभूषिते।

अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव॥ १२॥

‘महाप्राज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधिके रूपमें भरतको दे दो और इन्हींके द्वारा अयोध्याके योगक्षेमका निर्वाह करो’॥

एवमुक्तो वसिष्ठेन राघव: प्राङ्मुख: स्थित:।

पादुके हेमविकृते मम राज्याय ते ददौ॥ १३॥

‘गुरु वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजीने अयोध्याके राज्यका संचालन करनेके लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं॥ १३॥

निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना।

अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे॥ १४॥

‘तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीरामकी आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओंको लेकर अयोध्याको ही जा रहा हूँ’॥ १४॥

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मन:।

भरद्वाज: शुभतरं मुनिर्वाक्यमुदाहरत्॥ १५॥

महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनिने यह परम मङ्गलमय बात कही—॥ १५॥

नैतच्चित्रं नरव्याघ्रे शीलवृत्तविदां वरे।

यदार्यं त्वयि तिष्ठेत्तु निम्नोत्सृष्टमिवोदकम्॥ १६॥

‘भरत! तुम मनुष्योंमें सिंहके समान वीर तथा शील और सदाचारके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमिवाले जलाशयमें सब ओरसे बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है॥ १६॥

अनृण: स महाबाहु: पिता दशरथस्तव।

यस्य त्वमीदृश: पुत्रो धर्मात्मा धर्मवत्सल:॥ १७॥

‘तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकारसे उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्मप्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है’॥ १७॥

तमृषिं तु महाप्राज्ञमुक्तवाक्यं कृताञ्जलि:।

आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य च॥ १८॥

उन महाज्ञानी महर्षिके ऐसा कहनेपर भरतने हाथ जोड़कर उनके चरणोंका स्पर्श किया; फिर वे उनसे जानेकी आज्ञा लेनेको उद्यत हुए॥ १८॥

तत: प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुन: पुन:।

भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभि:॥ १९॥

तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनिकी परिक्रमा करके मन्त्रियोंसहित अयोध्याकी ओर चल दिये॥ १९॥

यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमू:।

पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी॥ २०॥

फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियोंके साथ भरतका अनुसरण करती हुई अयोध्याको लौटी॥ २०॥

ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्त्वोर्मिमालिनीम्।

ददृशुस्तां पुन: सर्वे गङ्गां शिवजलां नदीम्॥ २१॥

तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगोंने तरंग-मालाओंसे सुशोभित दिव्य नदी यमुनाको पार करके पुन: शुभसलिला गङ्गाजीका दर्शन किया॥ २१॥

तां रम्यजलसम्पूर्णां संतीर्य सहबान्धव:।

शृङ्गवेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिक:॥ २२॥

फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकोंके साथ मनोहर जलसे भरी हुई गङ्गाके भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुरमें जा पहुँचे॥ २२॥

शृङ्गवेरपुराद् भूय अयोध्यां संददर्श ह।

अयोध्यां तु तदा दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम्॥ २३॥

भरतो दु:खसंतप्त: सारथिं चेदमब्रवीत्।

शृङ्गवेरपुरसे प्रस्थान करनेपर उन्हें पुन: अयोध्यापुरीका दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनोंसे विहीन थी। उसे देखकर भरतने दु:खसे संतप्त हो सारथिसे इस प्रकार कहा—॥ २३॥

सारथे पश्य विध्वस्ता अयोध्या न प्रकाशते॥ २४॥

निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वना॥ २५॥

‘सारथि सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्याकी सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अत: यह पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होती है। इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा। इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है’॥ २४-२५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११३॥

 

चतुर्दशाधिकशततम: सर्ग:

भरतके द्वारा अयोध्याकी दुरवस्थाका दर्शन तथा अन्त:पुरमें प्रवेश करके भरतका दु:खी होना

स्निग्धगम्भीरघोषेण स्यन्दनेनोपयान् प्रभु:।

अयोध्यां भरत: क्षिप्रं प्रविवेश महायशा:॥ १॥

इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरतने स्निग्ध, गम्भीर घर्घर घोषसे युक्त रथके द्वारा यात्रा करके शीघ्र ही अयोध्यामें प्रवेश किया॥ १॥

बिडालोलूकचरितामालीननरवारणाम् ।

तिमिराभ्याहतां कालीमप्रकाशां निशामिव॥ २॥

उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे। घरोंके किवाड़ बंद थे। सारे नगरमें अन्धकार छा रहा था। प्रकाश न होनेके कारण वह पुरी कृष्णपक्षकी काली रातके समान जान पड़ती थी॥ २॥

राहुशत्रो: प्रियां पत्नीं श्रिया प्रज्वलितप्रभाम्।

ग्रहेणाभ्युदितेनैकां रोहिणीमिव पीडिताम्॥ ३॥

जैसे चन्द्रमाकी प्रिय पत्नी और अपनी शोभासे प्रकाशित कान्तिवाली रोहिणी उदित हुए राहु नामक ग्रहके द्वारा अपने पतिके ग्रस लिये जानेपर अकेली—असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्यसे प्रकाशित होनेवाली अयोध्या राजाके कालकवलित हो जानेके कारण पीडि़त एवं असहाय हो रही थी॥ ३॥

अल्पोष्णक्षुब्धसलिलां घर्मतप्तविहंगमाम्।

लीनमीनझषग्राहां कृशां गिरिनदीमिव॥ ४॥

वह पुरी उस पर्वतीय नदीकी भाँति कृशकाय दिखायी देती थी, जिसका जल सूर्यकी किरणोंसे तपकर कुछ गरम और गँदला हो रहा हो, जिसके पक्षी धूपसे संतप्त होकर भाग गये हों तथा जिसके मीन, मत्स्य और ग्राह गहरे जलमें छिप गये हों॥ ४॥

विधूमामिव हेमाभां शिखामग्ने: समुत्थिताम्।

हविरभ्युक्षितां पश्चाच्छिखां विप्रलयं गताम्॥ ५॥

जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखाके समान प्रकाशित होती थी, वही श्रीरामवनवासके बाद हवनीय दुग्धसे सींची गयी अग्निकी ज्वालाके समान बुझकर विलीन-सी हो गयी है॥ ५॥

विध्वस्तकवचां रुग्णगजवाजिरथध्वजाम्।

हतप्रवीरामापन्नां चमूमिव महाहवे॥ ६॥

उस समय अयोध्या महासमरमें संकटग्रस्त हुई उस सेनाके समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न-भिन्न हो गये हों और मुख्य-मुख्य वीर मार डाले गये हों॥ ६॥

सफेनां सस्वनां भूत्वा सागरस्य समुत्थिताम्।

प्रशान्तमारुतोद्धूतां जलोर्मिमिव नि:स्वनाम्॥ ७॥

प्रबल वायुके वेगसे फेन और गर्जनाके साथ उठी हुई समुद्रकी उत्ताल तरंग सहसा वायुके शान्त हो जानेपर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्दशून्य-सी जान पड़ती थी॥ ७॥

त्यक्तां यज्ञायुधै: सर्वैरभिरूपैश्च याजकै:।

सुत्याकाले सुनिर्वृत्ते वेदिं गतरवामिव॥ ८॥

यज्ञकाल समाप्त होनेपर ‘स्फ्य’ आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकोंसे सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारणकी ध्वनिसे रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी॥ ८॥

गोष्ठमध्ये स्थितामार्तामचरन्तीं नवं तृणम्।

गोवृषेण परित्यक्तां गवां पत्नीमिवोत्सुकाम्॥ ९॥

जैसे कोई गाय साँड़के साथ समागमके लिये उत्सुक हो, उसी अवस्थामें उसे साँड़से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भावसे गोष्ठमें बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदनासे पीडि़त थी॥ ९॥

प्रभाकराद्यै: सुस्निग्धै: प्रज्वलद्भिरिवोत्तमै:।

वियुक्तां मणिभिर्जात्यैर्नवां मुक्तावलीमिव॥ १०॥

श्रीराम आदिसे रहित हुई अयोध्या मोतियोंकी उस नूतन मालाके समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसकी अत्यन्त चिकनी-चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जातिकी पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों॥ १०॥

सहसाचरितां स्थानान्महीं पुण्यक्षयाद् गताम्।

संहृतद्युतिविस्तारां तारामिव दिवश्च्युताम्॥ ११॥

जो पुण्य-क्षय होनेके कारण सहसा अपने स्थानसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाशसे गिरी हुई उस तारिकाकी भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी॥ ११॥

पुष्पनद्धां वसन्तान्ते मत्तभ्रमरशालिनीम्।

द्रुतदावाग्निविप्लुष्टां क्लान्तां वनलतामिव॥ १२॥

जो ग्रीष्म-ऋतुमें पहले फूलोंसे लदी हुई होनेके कारण मतवाले भ्रमरोंसे सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानलके लपेटमें आकर मुरझा गयी हो, वनकी उस लताके समान पहलेकी उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी॥ १२॥

सम्मूढनिगमां सर्वां संक्षिप्तविपणापणाम्।

प्रच्छन्नशशिनक्षत्रां द्यामिवाम्बुधरैर्युताम्॥ १३॥

वहाँके व्यापारी वणिक् शोकसे व्याकुल होनेके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार-हाट और दूकानें बहुत कम खुली थीं। उस समय सारी पुरी उस आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलोंकी घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों॥ १३॥

क्षीणपानोत्तमैर्भग्नै: शरावैरभिसंवृताम्।

हतशौण्डामिव ध्वस्तां पानभूमिमसंस्कृताम्॥ १४॥

(उन दिनों अयोध्यापुरीकी सड़कें झाड़ी-बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र-तत्र कूड़े-करकटके ढेर पड़े थे। उस अवस्थामें) वह नगरी उस उजड़ी हुई पानभूमि (मधुशाला) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधुसे खाली टूटी-फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँके पीनेवाले भी नष्ट हो गये हों॥ १४॥

वृक्णभूमितलां निम्नां वृक्णपात्रै: समावृताम्।

उपयुक्तोदकां भग्नां प्रपां निपतितामिव॥ १५॥

उस पुरीकी दशा उस पौंसलेकी-सी हो रही थी, जो खम्भोंके टूट जानेसे ढह गया हो, जिसका चबूतरा छिन्न-भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट-फूटकर इधर-उधर सब ओर बिखरे पड़े हों॥ १५॥

विपुलां विततां चैव युक्तपाशां तरस्विनाम्।

भूमौ बाणैर्विनिष्कृत्तां पतितां ज्यामिवायुधात्॥ १६॥

जो विशाल और सम्पूर्ण धनुषमें फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों (किनारों) में बाँधनेके लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरोंके बाणोंसे कटकर धनुषसे पृथ्वीपर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चाके समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई-सी दिखायी देती थी॥ १६॥

सहसा युद्धशौण्डेन हयारोहेण वाहिताम्।

निहतां प्रतिसैन्येन वडवामिव पातिताम्॥ १७॥

जिसपर युद्धकुशल घुड़सवारने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्षकी सेनाने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमिमें पड़ी हुई उस घोड़ीकी जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरीकी भी थी (कैकेयीके कुचक्रसे उसके संचालक नरेशका स्वर्गवास और युवराजका वनवास हो गया था)॥ १७॥

भरतस्तु रथस्थ: सन् श्रीमान् दशरथात्मज:।

वाहयन्तं रथश्रेष्ठं सारथिं वाक्यमब्रवीत्॥ १८॥

रथपर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरतने उस समय श्रेष्ठ रथका संचालन करनेवाले सारथि सुमन्त्रसे इस प्रकार कहा—॥ १८॥

किं नु खल्वद्य गम्भीरो मूर्च्छितो न निशाम्यते।

यथापुरमयोध्यायां गीतवादित्रनि:स्वन:॥ १९॥

‘अब अयोध्यामें पहलेकी भाँति सब ओर फैला हुआ गाने-बजानेका गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्टकी बात है!॥ १९॥

वारुणीमदगन्धश्च माल्यगन्धश्च मूर्च्छित:।

चन्दनागुरुगन्धश्च न प्रवाति समन्तत:॥ २०॥

‘अब चारों ओर वारुणी (मधु) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलोंकी सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरुकी पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है॥ २०॥

यानप्रवरघोषश्च सुस्निग्धहयनि:स्वन:।

प्रमत्तगजनादश्च महांश्च रथनि:स्वन:॥ २१॥

‘अच्छी-अच्छी सवारियोंकी आवाज, घोड़ोंके हींसनेका सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियोंका चिग्घाड़ना तथा रथोंकी घर्घराहटका महान् शब्द—ये सब नहीं सुनायी दे रहे हैं॥ २१॥

नेदानीं श्रूयते पुर्यामस्यां रामे विवासिते।

चन्दनागुरुगन्धांश्च महार्हाश्च वनस्रज:॥ २२॥

गते रामे हि तरुणा: संतप्ता नोपभुञ्जते।

बहिर्यात्रां न गच्छन्ति चित्रमाल्यधरा नरा:॥ २३॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके निर्वासित होनेके कारण ही इस पुरीमें इस समय इन सब प्रकारके शब्दोंका श्रवण नहीं हो रहा है। श्रीरामके चले जानेसे यहाँके तरुण बहुत ही संतप्त हैं। वे चन्दन और अगुरुकी सुगन्धका सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते। अब इस पुरीके लोग विचित्र फूलोंके हार पहनकर बाहर घूमनेके लिये नहीं निकलते हैं॥ २२-२३॥

नोत्सवा: सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे।

सा हि नूनं मम भ्रात्रा पुरस्यास्य द्युतिर्गता॥ २४॥

‘श्रीरामके शोकसे पीडि़त हुए इस नगरमें अब नाना प्रकारके उत्सव नहीं हो रहे हैं। निश्चय ही इस पुरीकी वह सारी शोभा मेरे भाईके साथ ही चली गयी॥

नहि राजत्ययोध्येयं सासारेवार्जुनी क्षपा।

कदा नु खलु मे भ्राता महोत्सव इवागत:॥ २५॥

जनयिष्यत्ययोध्यायां हर्षं ग्रीष्म इवाम्बुद:।

‘जैसे वेगयुक्त वर्षाके कारण शुक्लपक्षकी चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है। अब कब मेरे भाई महोत्सवकी भाँति अयोध्यामें पधारेंगे और ग्रीष्म-ऋतुमें प्रकट हुए मेघकी भाँति सबके हृदयमें हर्षका संचार करेंगे॥ २५/

तरुणैश्चारुवेषैश्च नरैरुन्नतगामिभि:॥ २६॥

सम्पतद्भिरयोध्यायां नाभिभान्ति महापथा:।

‘अब अयोध्याकी बड़ी-बड़ी सड़कें हर्षसे उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणोंके शुभागमनसे शोभा नहीं पा रही हैं’॥ २६/

इति ब्रुवन् सारथिना दु:खितो भरतस्तदा॥ २७॥

अयोध्यां सम्प्रविश्यैव विवेश वसतिं पितु:।

तेन हीनां नरेन्द्रेण सिंहहीनां गुहामिव॥ २८॥

इस प्रकार सारथिके साथ बातचीत करते हुए दु:खी भरत उस समय सिंहसे रहित गुफाकी भाँति राजा दशरथसे हीन पिताके निवासस्थान राजमहलमें गये॥

तदा तदन्त:पुरमुज्झितप्रभं

सुरैरिवोत्कृष्टमभास्करं दिनम्।

निरीक्ष्य सर्वत्र विभक्तमात्मवान्

मुमोच बाष्पं भरत: सुदु:खित:॥ २९॥

जैसे सूर्यके छिप जानेसे दिनकी शोभा नष्ट हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय वह अन्त:पुर शोभाहीन हो गया था और वहाँके लोग शोकमग्न थे। उसे सब ओरसे स्वच्छता और सजावटसे हीन देख भरत धैर्यवान् होनेपर भी अत्यन्त दु:खी हो आँसू बहाने लगे॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११४॥

 

पञ्चदशाधिकशततम: सर्ग:

भरतका नन्दिग्राममें जाकर श्रीरामकी चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्तकरके उन्हें निवेदनपूर्वक राज्यका सब कार्य करना

ततो निक्षिप्य मातृस्ता अयोध्यायां दृढव्रत:।

भरत: शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर सब माताओंको अयोध्यामें रखकर दृढप्रतिज्ञ भरतने शोकसे संतप्त हो गुरुजनोंसे इस प्रकार कहा—

नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रयेऽत्र व:।

तत्र दु:खमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना॥ २॥

‘अब मैं नन्दिग्रामको जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगोंकी आज्ञा चाहता हूँ। वहाँ श्रीरामके बिना प्राप्त होनेवाले इस सारे दु:खको सहन करूँगा॥ २॥

गतश्चाहो दिवं राजा वनस्थ: स गुरुर्मम।

रामं प्रतीक्षे राज्याय स हि राजा महायशा:॥ ३॥

‘अहो! महाराज (पूज्य पिताजी) तो स्वर्गको सिधारे और वे मेरे गुरु (पूजनीय भ्राता) श्रीरामचन्द्रजी वनमें विराज रहे हैं। मैं इस राज्यके लिये वहाँ श्रीरामकी प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं’॥ ३॥

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मन:।

अब्रुवन् मन्त्रिण: सर्वे वसिष्ठश्च पुरोहित:॥ ४॥

महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वसिष्ठजी बोले—॥ ४॥

सुभृशं श्लाघनीयं च यदुक्तं भरत त्वया।

वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत्॥ ५॥

‘भरत! भ्रातृभक्तिसे प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। वास्तवमें वह तुम्हारे ही योग्य है॥ ५॥

नित्यं ते बन्धुलुब्धस्य तिष्ठतो भ्रातृसौहृदे।

मार्गमार्यं प्रपन्नस्य नानुमन्येत क: पुमान्॥ ६॥

‘तुम अपने भाईके दर्शनके लिये सदा लालायित रहते हो और भाईके ही सौहार्द (हितसाधन) में संलग्न हो। साथ ही श्रेष्ठ मार्गपर स्थित हो, अत: कौन पुरुष तुम्हारे विचारका अनुमोदन नहीं करेगा’॥ ६॥

मन्त्रिणां वचनं श्रुत्वा यथाभिलषितं प्रियम्।

अब्रवीत् सारथिं वाक्यं रथो मे युज्यतामिति॥ ७॥

मन्त्रियोंका अपनी रुचिके अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरतने सारथिसे कहा—‘मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’॥ ७॥

प्रहृष्टवदन: सर्वा मातृ: समभिभाष्य च।

आरुरोह रथं श्रीमान्शत्रुघ्नेन समन्वित:॥ ८॥

फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओंसे बातचीत करके जानेकी आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् भरत रथपर सवार हुए॥ ८॥

आरुह्य तु रथं क्षिप्रं शत्रुघ्नभरतावुभौ।

ययतु: परमप्रीतौ वृतौ मन्त्रिपुरोहितै:॥ ९॥

रथपर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितोंसे घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ९॥

अग्रतो गुरव: सर्वे वसिष्ठप्रमुखा द्विजा:।

प्रययु: प्राङ्मुखा: सर्वे नन्दिग्रामो यतो भवेत्॥ १०॥

आगे-आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मण चल रहे थे। उन सब लोगोंने अयोध्यासे पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्गको पकड़ा, जो नन्दिग्रामकी ओर जाता था॥ १०॥

बलं च तदनाहूतं गजाश्वरथसंकुलम्।

प्रययौ भरते याते सर्वे च पुरवासिन:॥ ११॥

भरतके प्रस्थित होनेपर हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे-पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये॥ ११॥

रथस्थ: स तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सल:।

नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं शिरस्यादाय पादुके॥ १२॥

धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तकपर भगवान् श्रीरामकी चरणपादुका लिये रथपर बैठकर बड़ी शीघ्रतासे नन्दिग्रामकी ओर चले॥ १२॥

भरतस्तु तत: क्षिप्रं नन्दिग्रामं प्रविश्य स:।

अवतीर्य रथात् तूर्णं गुरूनिदमभाषत॥ १३॥

नन्दिग्राममें शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथसे उतर पड़े और गुरुजनोंसे इस प्रकार बोले—॥ १३॥

एतद् राज्यं मम भ्रात्रा दत्तं संन्यासमुत्तमम्।

योगक्षेमवहे चेमे पादुके हेमभूषिते॥ १४॥

‘मेरे भाईने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहरके रूपमें दिया है, उनकी ये सुवर्णविभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाली हैं’॥ १४॥

भरत: शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके तत:।

अब्रवीद् दु:खसंतप्त: सर्वं प्रकृतिमण्डलम्॥ १५॥

तत्पश्चात् भरतने मस्तक झुकाकर उन चरण-पादुकाओंके प्रति उस धरोहररूप राज्यको समर्पित करके दु:खसे संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल (मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि) से कहा—॥ १५॥

छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ।

आभ्यां राज्ये स्थितो धर्म: पादुकाभ्यां गुरोर्मम॥ १६॥

‘आप सब लोग इन चरणपादुकाओंके ऊपर छत्र धारण करें। मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजीके साक्षात् चरण मानता हूँ। मेरे गुरुकी इन चरणपादुकाओंसे ही इस राज्यमें धर्मकी स्थापना होगी॥ १६॥

भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्त: सौहृदादयम्।

तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति॥ १७॥

‘मेरे भाईने प्रेमके कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अत: मैं उनके लौटनेतक इसकी भलीभाँति रक्षा करूँगा॥ १७॥

क्षिप्रं संयोजयित्वा तु राघवस्य पुन: स्वयम्।

चरणौ तौ तु रामस्य द्रक्ष्यामि सहपादुकौ॥ १८॥

‘इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओंको पुन: शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीके चरणोंसे संयुक्त करके इन पादुकाओंसे सुशोभित श्रीरामके उन युगल चरणोंका दर्शन करूँगा॥

ततो निक्षिप्तभारोऽहं राघवेण समागत:।

निवेद्य गुरवे राज्यं भजिष्ये गुरुवर्तिताम्॥ १९॥

‘श्रीरघुनाथजीके आनेपर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेवको यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञाके अधीन हो उन्हींकी सेवामें लग जाऊँगा। राज्यका यह भार उनपर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा॥ १९॥

राघवाय च संन्यासं दत्त्वेमे वरपादुके।

राज्यं चेदमयोध्यां च धूतपापो भवाम्यहम्॥ २०॥

‘मेरे पास धरोहररूपमें रखे हुए इस राज्यको, अयोध्याको तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओंको श्रीरघुनाथजीकी सेवामें समर्पित करके मैं सब प्रकारके पापतापसे मुक्त हो जाऊँगा॥ २०॥

अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे प्रहृष्टमुदिते जने।

प्रीतिर्मम यशश्चैव भवेद् राज्याच्चतुर्गुणम्॥ २१॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अयोध्याके राज्यपर अभिषेक हो जानेपर जब सब लोग हर्ष और आनन्दमें निमग्न हो जायँगे, तब मुझे राज्य पानेकी अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यशकी प्राप्ति होगी’॥ २१॥

एवं तु विलपन् दीनो भरत: स महायशा:।

नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं दु:खितो मन्त्रिभि: सह॥ २२॥

इस प्रकार दीनभावसे विलाप करते हुए दु:खमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियोंके साथ नन्दिग्राममें रहकर राज्यका शासन करने लगे॥ २२॥

स वल्कलजटाधारी मुनिवेषधर: प्रभु:।

नन्दिग्रामेऽवसद् धीर: ससैन्यो भरतस्तदा॥ २३॥

सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरतने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राममें निवास किया॥ २३॥

रामागमनमाकांक्षन् भरतो भ्रातृ़वत्सल:।

भ्रातुर्वचनकारी च प्रतिज्ञापारगस्तदा।

पादुके त्वभिषिच्याथ नन्दिग्रामेऽवसत् तदा॥ २४॥

भाईकी आज्ञाका पालन और प्रतिज्ञाके पार जानेकी इच्छा करनेवाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजीके आगमनकी आकांक्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राममें रहने लगे॥

सवालव्यजनं छत्रं धारयामास स स्वयम्।

भरत: शासनं सर्वं पादुकाभ्यां निवेदयन्॥ २५॥

भरतजी राज्य-शासनका समस्त कार्य भगवान् श्रीरामकी चरणपादुकाओंको निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे॥ २५॥

ततस्तु भरत: श्रीमानभिषिच्यार्यपादुके।

तदधीनस्तदा राज्यं कारयामास सर्वदा॥ २६॥

श्रीमान् भरत बड़े भाईकी उन पादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्यका सब कार्य मन्त्री आदिसे कराते थे॥ २६॥

तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि-

दुपायनं चोपहृतं महार्हम्।

स पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य

चकार पश्चाद् भरतो यथावत्॥ २७॥

उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओंको निवेदन करके पीछे भरतजी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११५॥

 

 


षोडशाधिकशततम: सर्ग:

वृद्ध कुलपतिसहित बहुत-से ऋषियोंका चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रममें जाना

प्रतियाते तु भरते वसन् रामस्तदा वने।

लक्षयामास सोद्वेगमथौत्सुक्यं तपस्विनाम्॥ १॥

भरतके लौट जानेपर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वनमें निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँके तपस्वी उद्विग्न हो वहाँसे अन्यत्र चले जानेके लिये उत्सुक हैं॥ १॥

ये तत्र चित्रकूटस्य पुरस्तात् तापसाश्रमे।

राममाश्रित्य निरतास्तानलक्षयदुत्सुकान्॥ २॥

पहले चित्रकूटके उस आश्रममें जो तपस्वी श्रीरामका आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हींको श्रीरामने उत्कण्ठित देखा (मानो वे कहीं जानेके विषयमें कुछ कहना चाहते हों)॥ २॥

नयनैर्भ्रुकुटीभिश्च रामं निर्दिश्य शङ्किता:।

अन्योन्यमुपजल्पन्त: शनैश्चक्रुर्मिथ: कथा:॥ ३॥

नेत्रोंसे, भौंहें टेढ़ी करके, श्रीरामकी ओर संकेत करके मन-ही-मन शङ्कित हो आपसमें कुछ सलाह करते हुए वे तपस्वी मुनि धीरे-धीरे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे॥ ३॥

तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कित:।

कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं तत:॥ ४॥

उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया। तब वे हाथ जोड़कर वहाँके कुलपति महर्षिसे इस प्रकार बोले—॥ ४॥

न कश्चिद् भगवन् किंचित् पूर्ववृत्तमिदं मयि।

दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विन:॥ ५॥

‘भगवन्! क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओंका-सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है, जिससे यहाँके तपस्वी मुनि विकारको प्राप्त हो रहे हैं॥ ५॥

प्रमादाच्चरितं किंचित् कच्चिन्नावरजस्य मे।

लक्ष्मणस्यर्षिभिर्दृष्टं नानुरूपं महात्मन:॥ ६॥

‘क्या मेरे छोटे भाई महात्मा लक्ष्मणका प्रमादवश किया हुआ कोई ऐसा आचरण ऋषियोंने देखा है, जो उसके योग्य नहीं है॥ ६॥

कच्चिच्छुश्रूषमाणा व: शुश्रूषणपरा मयि।

प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां न वर्तते॥ ७॥

‘अथवा क्या जो अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा सदा आपलोगोंकी सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवामें लग जानेके कारण एक गृहस्थकी सती नारीके अनुरूप ऋषियोंकी समुचित सेवा नहीं कर पाती है?’॥ ७॥

अथर्षिर्जरया वृद्धस्तपसा च जरां गत:।

वेपमान इवोवाच रामं भूतदयापरम्॥ ८॥

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर एक महर्षि जो जरावस्थाके कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्याद्वारा भी वृद्ध हो गये थे, समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले श्रीरामसे काँपते हुए-से बोले—॥ ८॥

कुत: कल्याणसत्त्वाया: कल्याणाभिरते: सदा।

चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विषु विशेषत:॥ ९॥

‘तात! जो स्वभावसे ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याणमें ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषत: तपस्वीजनोंके प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभावसे विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है?॥ ९॥

त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते।

रक्षोभ्यस्तेन संविग्ना: कथयन्ति मिथ: कथा:॥ १०॥

‘आपके ही कारण तापसोंपर यह राक्षसोंकी ओरसे भय उपस्थित होनेवाला है, उससे उद्विग्न हुए ऋषि आपसमें कुछ बातें (कानाफूसी) कर रहे हैं॥ १०॥

रावणावरज: कश्चित् खरो नामेह राक्षस:।

उत्पाट्य तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिन:॥ ११॥

धृष्टश्च जितकाशी च नृशंस: पुरुषादक:।

अवलिप्तश्च पापश्च त्वां च तात न मृष्यते॥ १२॥

‘तात! यहाँ वनप्रान्तमें रावणका छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थानमें रहनेवाले समस्त तापसोंको उखाड़ फेंका है। वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है। वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है॥ ११-१२॥

त्वं यदाप्रभृति ह्यस्मिन्नाश्रमे तात वर्तसे।

तदाप्रभृति रक्षांसि विप्रकुर्वन्ति तापसान्॥ १३॥

‘तात! जबसे आप इस आश्रममें रह रहे हैं, तबसे सब राक्षस तापसोंको विशेषरूपसे सताने लगे हैं॥

दर्शयन्ति हि बीभत्सै: क्रूरैर्भीषणकैरपि।

नानारूपैर्विरूपैश्च रूपैरसुखदर्शनै:॥ १४॥

अप्रशस्तैरशुचिभि: सम्प्रयुज्य च तापसान्।

प्रतिघ्नन्त्यपरान् क्षिप्रमनार्या: पुरत: स्थितान्॥ १५॥

‘वे अनार्य राक्षस बीभत्स (घृणित), क्रूर और भीषण, नाना प्रकारके विकृत एवं देखनेमें दु:खदायक रूप धारण करके सामने आते हैं और पापजनक अपवित्र पदार्थोंसे तपस्वियोंका स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियोंको भी पीड़ा देते हैं॥ १४-१५॥

तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्वबुद्धमवलीय च।

रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतस:॥ १६॥

‘वे उन-उन आश्रमोंमें अज्ञातरूपसे आकर छिप जाते हैं और अल्पज्ञ अथवा असावधान तापसोंका विनाश करते हुए वहाँ सानन्द विचरते रहते हैं॥ १६॥

अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा।

कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते॥ १७॥

‘होमकर्म आरम्भ होनेपर वे स्रुक्-स्रुवा आदि यज्ञ-सामग्रियोंको इधर-उधर फेंक देते हैं। प्रज्वलित अग्निमें पानी डाल देते हैं और कलशोंको फोड़ डालते हैं॥

तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासव:।

गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्यृषयोऽद्य माम्॥ १८॥

‘उन दुरात्मा राक्षसोंसे आविष्ट हुए आश्रमोंको त्याग देनेकी इच्छा रखकर ये ऋषिलोग आज मुझे यहाँसे अन्य स्थानमें चलनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं॥ १८॥

तत् पुरा राम शारीरीमुपहिंसां तपस्विषु।

दर्शयन्ति हि दुष्टास्ते त्यक्ष्याम इममाश्रमम्॥ १९॥

‘श्रीराम! वे दुष्ट राक्षस तपस्वियोंकी शारीरिक हिंसाका प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रमको त्याग देंगे॥ १९॥

बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम्।

अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगण: पुन:॥ २०॥

‘यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूलकी अधिकता है। वहीं अश्वमुनिका आश्रम है, अत: ऋषियोंके समूहको साथ लेकर मैं पुन: उसी आश्रमका आश्रय लूँगा॥ २०॥

खरस्त्वय्यपि चायुक्तं पुरा राम प्रवर्तते।

सहास्माभिरितो गच्छ यदि बुद्धि: प्रवर्तते॥ २१॥

‘श्रीराम! खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँसे चल दीजिये॥ २१॥

सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव।

समर्थस्यापि हि सतो वासो दु:खमिहाद्य ते॥ २२॥

‘रघुनन्दन! यद्यपि आप सदा सावधान रहनेवाले तथा राक्षसोंके दमनमें समर्थ हैं, तथापि पत्नीके साथ आजकल उस आश्रममें आपका रहना संदेहजनक एवं दु:खदायक है’॥ २२॥

इत्युक्तवन्तं रामस्तं राजपुत्रस्तपस्विनम्।

न शशाकोत्तरैर्वाक्यैरवबद्धुं समुत्सुकम्॥ २३॥

ऐसी बात कहकर अन्यत्र जानेके लिये उत्कण्ठित हुए उन तपस्वी मुनिको राजकुमार श्रीराम सान्त्वनाजनक उत्तरवाक्योंद्वारा वहाँ रोक नहीं सके॥ २३॥

अभिनन्द्य समापृच्छ्य समाधाय च राघवम्।

स जगामाश्रमं त्यक्त्वा कुलै: कुलपति: सह॥ २४॥

तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजीका अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रमको छोड़ वहाँसे अपने दलके ऋषियोंके साथ चले गये॥ २४॥

राम: संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद्

देशात् तस्मात् कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम्।

सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थ:

पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे॥ २५॥

श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे जानेवाले ऋषियोंके पीछे-पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषिको प्रणाम करके परम प्रसन्न हुए उन ऋषियोंकी अनुमति ले उनके दिये हुए कर्तव्यविषयक उपदेशको सुनकर लौटे और निवास करनेके लिये अपने पवित्र आश्रममें आये॥ २५॥

आश्रममृषिविरहितं प्रभु:

क्षणमपि न जहौ स राघव:।

राघवं हि सततमनुगता-

स्तापसाश्चार्षचरिते धृतगुणा:॥ २६॥

उन ऋषियोंसे रहित हुए आश्रमको भगवान् श्रीरामने एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ा। जिनका ऋषियोंके समान ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजीमें निश्चय ही ऋषियोंकी रक्षाकी शक्तिरूप गुण विद्यमान है। ऐसा विश्वास रखनेवाले कुछ तपस्वीजनोंने सदा श्रीरामका ही अनुसरण किया। वे दूसरे किसी आश्रममें नहीं गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११६॥

 

सप्तदशाधिकशततम: सर्ग:

श्रीराम आदिका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूयाद्वारा सीताका सत्कार

राघवस्त्वपयातेषु सर्वेष्वनुविचिन्तयन्।

न तत्रारोचयद् वासं कारणैर्बहुभिस्तदा॥ १॥

उन सब ऋषियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत-से ऐसे कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना उचित न समझा॥ १॥

इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागरा:।

सा च मे स्मृतिरन्वेति तान् नित्यमनुशोचत:॥ २॥

उन्होंने मन-ही-मन सोचा, ‘इस आश्रममें मैं भरतसे, माताओंसे तथा पुरवासी मनुष्योंसे मिल चुका हूँ। वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगोंका चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ॥

स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मन:।

हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्द: कृतो भृशम्॥ ३॥

‘महात्मा भरतकी सेनाका पड़ाव पड़नेके कारण हाथी और घोड़ोंकी लीदोंसे यहाँकी भूमि अधिक अपवित्र कर दी गयी है॥ ३॥

तस्मादन्यत्र गच्छाम इति संचिन्त्य राघव:।

प्रातिष्ठत स वैदेह्या लक्ष्मणेन च संगत:॥ ४॥

‘अत: हमलोग भी अन्यत्र चले जायँ’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँसे चल दिये॥

सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशा:।

तं चापि भगवानत्रि: पुत्रवत् प्रत्यपद्यत॥ ५॥

वहाँसे अत्रिके आश्रमपर पहुँचकर महायशस्वी श्रीरामने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रिने भी उन्हें अपने पुत्रकी भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया॥ ५॥

स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमस्य सुसत्कृतम्।

सौमित्रिं च महाभागं सीतां च समसान्त्वयत्॥ ६॥

उन्होंने स्वयं ही श्रीरामका सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीताको भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया॥ ६॥

पत्नीं च तामनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम्।

सान्त्वयामास धर्मज्ञ: सर्वभूतहिते रत:॥ ७॥

अनसूयां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्।

प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तम:॥ ८॥

सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रिने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूयाको सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा संतुष्ट किया और कहा—‘देवि! विदेहराजनन्दिनी सीताको सत्कारपूर्वक हृदयसे लगाओ’॥ ७-८॥

रामाय चाचचक्षे तां तापसीं धर्मचारिणीम्।

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्॥ ९ ॥

यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।

उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलंकृता॥ १०॥

दश वर्षसहस्राणि यया तप्तं महत् तप:।

अनसूयाव्रतैस्तात प्रत्यूहाश्च निबर्हिता:॥ ११॥

तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयाका परिचय देते हुए कहा—‘एक समय दस वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्यासे युक्त तथा कठोर नियमोंसे अलंकृत होकर अपने तपके प्रभावसे यहाँ फल-मूल उत्पन्न किये और मन्दाकिनीकी पवित्र धारा बहायी तथा तात! जिन्होंने दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतोंके प्रभावसे ऋषियोंके समस्त विघ्नोंका निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं॥

देवकार्यनिमित्तं च यया संत्वरमाणया।

दशरात्रं कृता रात्रि: सेयं मातेव तेऽनघ॥ १२॥

‘निष्पाप श्रीराम! इन्होंने देवताओंके कार्यके लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रातके बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माताकी भाँति पूजनीया हैं॥ १२॥

तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यां तपस्विनीम्।

अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा॥ १३॥

‘ये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं। क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है। विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवीके पास जायँ’॥ १३॥

एवं ब्रुवाणं तमृषिं तथेत्युक्त्वा स राघव:।

सीतामालोक्य धर्मज्ञामिदं वचनमब्रवीत्॥ १४॥

ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनिसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीने धर्मज्ञा सीताकी ओर देखकर यह बात कही—॥ १४॥

राजपुत्रि श्रुतं त्वेतन्मुनेरस्य समीरितम्।

श्रेयोऽर्थमात्मन: शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम्॥ १५॥

‘राजकुमारी! महर्षि अत्रिके वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवीके पास जाओ॥ १५॥

अनसूयेति या लोके कर्मभि: ख्यातिमागता।

तां शीघ्रमभिगच्छ त्वमभिगम्यां तपस्विनीम्॥ १६॥

‘जो अपने सत्कर्मोंसे संसारमें अनसूयाके नामसे विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ’॥ १६॥

सीता त्वेतद् वच: श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी।

तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली॥ १७॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेश-कुमारी सीता धर्मको जाननेवाली अत्रिपत्नी अनसूयाके पास गयीं॥ १७॥

शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम्।

सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीमिव॥ १८॥

अनसूया वृद्धावस्थाके कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं थीं तथा सिरके बाल सफेद हो गये थे। अधिक हवा चलनेपर हिलते हुए कदली-वृक्षके समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे॥ १८॥

तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम्।

अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत्॥ १९॥

सीताने निकट जाकर शान्तभावसे अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूयाको प्रणाम किया॥ १९॥

अभिवाद्य च वैदेही तापसीं तां दमान्विताम्।

बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम्॥ २०॥

उन संयमशीला तपस्विनीको प्रणाम करके हर्षसे भरी हुई सीताने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशल-समाचार पूछा॥ २०॥

तत: सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम्।

सान्त्वयन्त्यब्रवीद् वृद्धा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे॥ २१॥

धर्मका आचरण करनेवाली महाभागा सीताको देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं—‘सीते! सौभाग्यकी बात है कि तुम धर्मपर ही दृष्टि रखती हो॥ २१॥

त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानवृद्धिं च मानिनि।

अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि॥ २२॥

‘मानिनी सीते! बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर और उनसे प्राप्त होनेवाली मान-प्रतिष्ठाका परित्याग करके तुम वनमें भेजे हुए श्रीरामका अनुसरण कर रही हो—यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २२॥

नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाशुभ:।

यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदया:॥ २३॥

‘अपने स्वामी नगरमें रहें या वनमें, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियोंको वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकोंकी प्राप्ति होती है॥ २३॥

दु:शील: कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जित:।

स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पति:॥ २४॥

‘पति बुरे स्वभावका, मनमाना बर्ताव करनेवाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियोंके लिये श्रेष्ठ देवताके समान है॥ २४॥

नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशन्त्यहम्।

सर्वत्र योग्यं वैदेहि तप:कृतमिवाव्ययम्॥ २५॥

‘विदेहराजनन्दिनि! मैं बहुत विचार करनेपर भी पतिसे बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती। अपनी की हुई तपस्याके अविनाशी फलकी भाँति वह इस लोकमें और परलोकमें सर्वत्र सुख पहुँचानेमें समर्थ होता है॥ २५॥

न त्वेवमनुगच्छन्ति गुणदोषमसत्स्त्रिय:।

कामवक्तव्यहृदया भर्तृनाथाश्चरन्ति या:॥ २६॥

‘जो अपने पतिपर भी शासन करती हैं, वे कामके अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पतिका अनुसरण नहीं करतीं। उन्हें गुण-दोषोंका ज्ञान नहीं होता; अत: वे इच्छानुसार इधर-उधर विचरती रहती हैं॥ २६॥

प्राप्नुवन्त्ययशश्चैव धर्मभ्रंशं च मैथिलि।

अकार्यवशमापन्ना: स्त्रियो या: खलु तद्विधा:॥ २७॥

‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्ममें फँसकर धर्मसे भ्रष्ट हो जाती हैं और संसारमें उन्हें अपयशकी प्राप्ति होती है॥ २७॥

त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्टलोकपरावरा:।

स्त्रिय: स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा पुण्यकृतस्तथा॥ २८॥

‘किंतु जो तुम्हारे समान लोक-परलोकको जाननेवाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणोंसे युक्त होकर पुण्यकर्मोंमें संलग्न रहती हैं; अत: वे दूसरे पुण्यात्माओंकी भाँति स्वर्गलोकमें विचरण करेंगी॥ २८॥

तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती

पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी।

भव स्वभर्तु: सहधर्मचारिणी

यशश्च धर्मं च तत: समाप्स्यसि॥ २९॥

‘अत: तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो—सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११७॥

 


अष्टादशाधिकशततम: सर्ग:

सीता-अनसूया-संवाद, अनसूयाका सीताको प्रेमोपहार देना तथा अनसूयाके पूछनेपर सीताका उन्हें अपने स्वयंवरकी कथा सुनाना

सा त्वेवमुक्ता वैदेही त्वनसूयानसूयया।

प्रतिपूज्य वचो मन्दं प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ १॥

तपस्विनी अनसूयाके इस प्रकार उपदेश देनेपर किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाली विदेहराजकुमारी सीताने उनके वचनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १॥

नैतदाश्चर्यमार्यायां यन्मां त्वमनुभाषसे।

विदितं तु ममाप्येतद् यथा नार्या: पतिर्गुरु:॥ २॥

‘देवि! आप संसारकी स्त्रियोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। आपके मुँहसे ऐसी बातोंका सुनना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। नारीका गुरु पति ही है, इस विषयमें जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहलेसे ही विदित है॥ २॥

यद्यप्येष भवेद् भर्ता अनार्यो वृत्तिवर्जित:।

अद्वैधमत्र वर्तव्यं यथाप्येष मया भवेत्॥ ३॥

‘मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन) तथा जीविकाके साधनोंसे रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधाके इनकी सेवामें लगी रहती॥ ३॥

किं पुनर्यो गुणश्लाघ्य: सानुक्रोशो जितेन्द्रिय:।

स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रिय:॥ ४॥

‘फिर जब कि ये अपने गुणोंके कारण ही सबकी प्रशंसाके पात्र हैं, तब तो इनकी सेवाके लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखनेवाले, धर्मात्मा तथा माता-पिताके समान प्रिय हैं॥ ४॥

यां वृत्तिं वर्तते राम: कौसल्यायां महाबल:।

तामेव नृपनारीणामन्यासामपि वर्तते॥ ५॥

‘महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्याके प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथकी दूसरी रानियोंके साथ भी करते हैं॥ ५॥

सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सल:।

मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित्॥ ६॥

‘महाराज दशरथने एक बार भी जिन स्त्रियोंको प्रेमदृष्टिसे देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माताके समान ही बर्ताव करते हैं॥ ६॥

आगच्छन्त्याश्च विजनं वनमेवं भयावहम्।

समाहितं हि मे श्वश्र्वा हृदये यत् स्थिरं मम॥ ७॥

‘जब मैं पतिके साथ निर्जन वनमें आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्याने मुझे जो कर्तव्यका उपदेश दिया था, वह मेरे हृदयमें ज्यों-का-त्यों स्थिरभावसे अङ्कित है॥ ७॥

पाणिप्रदानकाले च यत् पुरा त्वग्निसंनिधौ।

अनुशिष्टं जनन्या मे वाक्यं तदपि मे धृतम्॥ ८॥

‘पहले मेरे विवाह-कालमें अग्निके समीप माताने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है॥ ८॥

न विस्मृतं तु मे सर्वं वाक्यै: स्वैर्धर्मचारिणि।

पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद् विधीयते॥ ९॥

‘धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनोंने अपने वचनोंद्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है। स्त्रीके लिये पतिकी सेवाके अतिरिक्त दूसरे किसी तपका विधान नहीं है॥ ९॥

सावित्री पतिशुश्रूषां कृत्वा स्वर्गे महीयते।

तथावृत्तिश्च याता त्वं पतिशुश्रूषया दिवम्॥ १०॥

‘सत्यवान्की पत्नी सावित्री पतिकी सेवा करके ही स्वर्गलोकमें पूजित हो रही हैं। उन्हींके समान बर्ताव करनेवाली आप (अनसूया देवी) ने भी पतिकी सेवाके ही प्रभावसे स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया है॥ १०॥

वरिष्ठा सर्वनारीणामेषा च दिवि देवता।

रोहिणी न विना चन्द्रं मुहूर्तमपि दृश्यते॥ ११॥

‘सम्पूर्ण स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह स्वर्गकी देवी रोहिणी पतिसेवाके प्रभावसे ही एक मुहूर्तके लिये भी चन्द्रमासे बिलग होती नहीं देखी जाती॥ ११॥

एवंविधाश्च प्रवरा: स्त्रियो भर्तृदृढव्रता:।

देवलोके महीयन्ते पुण्येन स्वेन कर्मणा॥ १२॥

‘इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्मका पालन करनेवाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्मके बलसे देवलोकमें आदर पा रही हैं’॥ १२॥

ततोऽनसूया संहृष्टा श्रुत्वोक्तं सीतया वच:।

शिरसाऽऽघ्राय चोवाच मैथिलीं हर्षयन्त्युत॥ १३॥

तदनन्तर सीताके कहे हुए वचन सुनकर अनसूयाको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा—

नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे।

तत् संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते॥ १४॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीते! मैंने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहती हूँ॥ १४॥

उपपन्नं च युक्तं च वचनं तव मैथिलि।

प्रीता चास्म्युचितां सीते करवाणि प्रियं च किम्॥ १५॥

‘मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है। उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अत: बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विस्मिता मन्दविस्मया।

कृतमित्यब्रवीत् सीता तपोबलसमन्विताम्॥ १६॥

उनका यह कथन सुनकर सीताको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तपोबलसम्पन्न अनसूयासे मन्द-मन्द मुसकराती हुई बोलीं—‘आपने अपने वचनोंद्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं है’॥

सा त्वेवमुक्ता धर्मज्ञा तया प्रीततराभवत्।

सफलं च प्रहर्षं ते हन्त सीते करोम्यहम्॥ १७॥

सीताके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ अनसूयाको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोलीं—‘सीते! तुम्हारी निर्लोभतासे जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुममें जो लोभहीनताके कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी॥ १७॥

इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च।

अङ्गरागं च वैदेहि महार्हमनुलेपनम्॥ १८॥

मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत्।

अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति॥ १९॥

‘यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ। विदेह-नन्दिनि सीते! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगी। ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं और सदा उपयोगमें लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी॥

अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे।

शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम्॥ २०॥

‘जनककिशोरी! इस दिव्य अङ्गरागको अङ्गोंमें लगाकर तुम अपने पतिको उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शोभा बढ़ाती है’॥

सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्रजस्तथा।

मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम्॥ २१॥

प्रतिगृह्य च तत् सीता प्रीतिदानं यशस्विनी।

श्लिष्टाञ्जलिपुटा धीरा समुपास्त तपोधनाम्॥ २२॥

अनसूयाकी आज्ञासे धीर स्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीताने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हारको उनकी प्रसन्नताका परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया। उस प्रेमोपहारको ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूयाकी सेवामें बैठी रहीं॥

तथा सीतामुपासीनामनसूया दृढव्रता।

वचनं प्रष्टुमारेभे कथां कांचिदनुप्रियाम्॥ २३॥

तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीतासे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अनसूयाने कोई परम प्रिय कथा सुनानेके लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ २३॥

स्वयंवरे किल प्राप्ता त्वमनेन यशस्विना।

राघवेणेति मे सीते कथा श्रुतिमुपागता॥ २४॥

‘सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्रने तुम्हें स्वयंवरमें प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है॥ २४॥

तां कथां श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण च मैथिलि।

यथाभूतं च कार्त्स्न्येन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ २५॥

‘मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहती हूँ। अत: जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूपसे मुझे बताओ’॥ २५॥

एवमुक्ता तु सा सीता तापसीं धर्मचारिणीम्।

श्रूयतामिति चोक्त्वा वै कथयामास तां कथाम्॥ २६॥

उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सीताने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूयासे कहा—‘माताजी! सुनिये।’ ऐसा कहकर उन्होंने उस कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

मिथिलाधिपतिर्वीरो जनको नाम धर्मवित्।

क्षत्रकर्मण्यभिरतो न्यायत: शास्ति मेदिनीम्॥ २७॥

‘मिथिला जनपदके वीर राजा ‘जनक’ नामसे प्रसिद्ध हैं। वे धर्मके ज्ञाता हैं, अत: क्षत्रियोचित कर्ममें तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हैं॥ २७॥

तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषत: क्षेत्रमण्डलम्।

अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपते: सुता॥ २८॥

‘एक समयकी बात है, वे यज्ञके योग्य क्षेत्रको हाथमें हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वीको फाड़कर प्रकट हुई। इतनेमात्रसे ही मैं राजा जनककी पुत्री हुई॥

स मां दृष्ट्वा नरपतिर्मुष्टिविक्षेपतत्पर:।

पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विस्मितो जनकोऽभवत्॥ २९॥

‘वे राजा उस क्षेत्रमें ओषधियोंको मुट्ठीमें लेकर बो रहे थे। इतनेहीमें उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गोंमें धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्थामें मुझे देखकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ॥ २९॥

अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम्।

ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातित:॥ ३०॥

‘उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोदमें ले लिया और ‘यह मेरी बेटी है’ ऐसा कहकर मुझपर अपने हृदयका सारा स्नेह उड़ेल दिया॥ ३०॥

अन्तरिक्षे च वागुक्ता प्रतिमामानुषी किल।

एवमेतन्नरपते धर्मेण तनया तव॥ ३१॥

‘इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपत: मानवी भाषामें कही गयी थी (अथवा मेरे विषयमें प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी—दिव्य थी)। उसने कहा—‘नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मत: तुम्हारी ही पुत्री है’॥

तत: प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिप:।

अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिप:॥ ३२॥

‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेशने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी॥ ३२॥

दत्ता चास्मीष्टवद्देव्यै ज्येष्ठायै पुण्यकर्मणे।

तया सम्भाविता चास्मि स्निग्धया मातृसौहृदात्॥ ३३॥

‘उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानीको, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया। उन स्नेहमयी महारानीने मातृसमुचित सौहार्दसे मेरा लालन-पालन किया॥ ३३॥

पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता।

चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधन:॥ ३४॥

‘जब पिताने देखा कि मेरी अवस्था विवाहके योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्तामें पड़े। जैसे कमाये हुए धनका नाश हो जानेसे निर्धन मनुष्यको बड़ा दु:ख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाहकी चिन्तासे बहुत दु:खी हो गये॥ ३४॥

सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता जनात्।

प्रधर्षणमवाप्नोति शक्रेणापि समो भुवि॥ ३५॥

‘संसारमें कन्याके पिताको, वह भूतलपर इन्द्रके ही तुल्य क्यों न हो, वरपक्षके लोगोंसे, वे अपने समान या अपनेसे छोटी हैसियतके ही क्यों न हों, प्राय: अपमान उठाना पड़ता है॥ ३५॥

तां धर्षणामदूरस्थां संदृश्यात्मनि पार्थिव:।

चिन्तार्णवगत: पारं नाससादाप्लवो यथा॥ ३६॥

‘वह अपमान सहन करनेकी घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ताके समुद्रमें डूब गये। जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ताका पार नहीं पा रहे थे॥

अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन्।

सदृशं चाभिरूपं च महीपाल: पतिं मम॥ ३७॥

‘मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पतिका विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ ३७॥

तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य संततम्।

स्वयंवरं तनूजाया: करिष्यामीति धर्मत:॥ ३८॥

‘सदा मेरे विवाहकी चिन्तामें पड़े रहनेवाले उन महाराजके मनमें एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मत: अपनी पुत्रीका स्वयंवर करूँगा॥ ३८॥

महायज्ञे तदा तस्य वरुणेन महात्मना।

दत्तं धनुर्वरं प्रीत्या तूणी चाक्षय्यसायकौ॥ ३९॥

‘उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञमें प्रसन्न होकर महात्मा वरुणने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दिये॥ ३९॥

असंचाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात्।

तन्न शक्ता नमयितुं स्वप्नेष्वपि नराधिपा:॥ ४०॥

‘वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न करनेपर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे। भूमण्डलके नरेश स्वप्नमें भी उस धनुषको झुकानेमें असमर्थ थे॥ ४०॥

तद्धनु: प्राप्य मे पित्रा व्याहृतं सत्यवादिना।

समवाये नरेन्द्राणां पूर्वमामन्त्र्य पार्थिवान्॥ ४१॥

‘उस धनुषको पाकर मेरे सत्यवादी पिताने पहले भूमण्डलके राजाओंको आमन्त्रित करके उन नरेशोंके समूहमें यह बात कही—॥ ४१॥

इदं च धनुरुद्यम्य सज्यं य: कुरुते नर:।

तस्य मे दुहिता भार्या भविष्यति न संशय:॥ ४२॥

‘जो मनुष्य इस धनुषको उठाकर इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसीकी पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है॥ ४२॥

तच्च दृष्ट्वा धनु:श्रेष्ठं गौरवाद् गिरिसंनिभम्।

अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने॥ ४३॥

‘अपने भारीपनके कारण पहाड़-जैसे प्रतीत होनेवाले उस श्रेष्ठ धनुषको देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठानेमें समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये॥

सुदीर्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युति:।

विश्वामित्रेण सहितो यज्ञं द्रष्टुं समागत:॥ ४४॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राम: सत्यपराक्रम:।

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा मम पित्रा सुपूजित:॥ ४५॥

‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुल-नन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्रजीके साथ मेरे पिताका यज्ञ देखनेके लिये मिथिलामें पधारे। उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिका बड़ा आदर-सत्कार किया॥ ४४-४५॥

प्रोवाच पितरं तत्र राघवौ रामलक्ष्मणौ।

सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शनकांक्षिणौ।

धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम्॥ ४६॥

‘तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पितासे बोले—‘राजन्! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुषका दर्शन करना चाहते हैं। आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीरामको दिखाइये’॥ ४६॥

इत्युक्तस्तेन विप्रेण तद् धनु: समुपानयत्।

तद् धनुर्दर्शयामास राजपुत्राय दैविकम्॥ ४७॥

‘विप्रवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर पिताजीने उस दिव्य धनुषको मँगवाया और राजकुमार श्रीरामको उसे दिखाया॥ ४७॥

निमेषान्तरमात्रेण तदानम्य महाबल:।

ज्यां समारोप्य झटिति पूरयामास वीर्यवान्॥ ४८॥

‘महाबली और परम पराक्रमी श्रीरामने पलक मारते-मारते उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कानतक खींचा॥ ४८॥

तेनापूरयता वेगान्मध्ये भग्नं द्विधा धनु:।

तस्य शब्दोऽभवद् भीम: पतितस्याशनेर्यथा॥ ४९॥

‘उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीचसे ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो॥ ४९॥

ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसंधिना।

उद्यता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम्॥ ५०॥

‘तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जलका उत्तम पात्र लेकर श्रीरामके हाथमें मुझे दे देनेका उद्योग किया॥ ५०॥

दीयमानां न तु तदा प्रतिजग्राह राघव:।

अविज्ञाय पितुश्छन्दमयोध्याधिपते: प्रभो:॥ ५१॥

‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथके अभिप्रायको जाने बिना श्रीरामने राजा जनकके देनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण किया॥ ५१॥

तत: श्वशुरमामन्त्र्य वृद्धं दशरथं नृपम्।

मम पित्रा त्वहं दत्तां रामाय विदितात्मने॥ ५२॥

‘तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथकी अनुमति लेकर पिताजीने आत्मज्ञानी श्रीरामको मेरा दान कर दिया॥ ५२॥

मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला शुभदर्शना।

भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम्॥ ५३॥

‘तत्पश्चात् पिताजीने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिलाको लक्ष्मणकी पत्नीरूपसे उनके हाथमें दे दिया॥ ५३॥

एवं दत्तास्मि रामाय तथा तस्मिन् स्वयंवरे।

अनुरक्तास्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम्॥ ५४॥

‘इस प्रकार उस स्वयंवरमें पिताजीने श्रीरामके हाथमें मुझको सौंपा था। मैं धर्मके अनुसार अपने पति बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीराममें सदा अनुरक्त रहती हूँ’॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८॥

 

एकोनविंशत्यधिकशततम: सर्ग:

अनसूयाकी आज्ञासे सीताका उनके दिये हुए वस्त्राभूषणोंको धारण करके श्रीरामजीके पास आना तथा श्रीराम आदिका रात्रिमें आश्रमपर रहकर प्रात:काल अन्यत्र जानेके लिये ऋषियोंसे विदा लेना

अनसूया तु धर्मज्ञा श्रुत्वा तां महतीं कथाम्।

पर्यष्वजत बाहुभ्यां शिरस्याघ्राय मैथिलीम्॥ १॥

धर्मको जाननेवाली अनसूयाने उस लंबी कथाको सुनकर मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे अङ्कमें भर लिया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—

व्यक्ताक्षरपदं चित्रं भाषितं मधुरं त्वया।

यथा स्वयंवरं वृत्तं तत् सर्वं च श्रुतं मया॥ २॥

‘बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षरवाले शब्दोंमें यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया। तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया॥ २॥

रमेयं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि।

रविरस्तं गत: श्रीमानुपोह्य रजनीं शुभाम्॥ ३॥

दिवसं परिकीर्णानामाहारार्थं पतत्त्रिणाम्।

संध्याकाले निलीनानां निद्रार्थं श्रूयते ध्वनि:॥ ४॥

‘मधुरभाषिणी सीते! तुम्हारी इस कथामें मेरा मन बहुत लग रहा है; तथापि तेजस्वी सूर्यदेव रजनीकी शुभ वेलाको निकट पहुँचाकर अस्त हो गये। जो दिनमें चारा चुगनेके लिये चारों ओर छिटके हुए थे, वे पक्षी अब संध्याकालमें नींद लेनेके लिये अपने घोंसलोंमें आकर छिप गये हैं; उनकी यह ध्वनि सुनायी दे रही है॥

एते चाप्यभिषेकार्द्रा मुनय: कलशोद्यता:।

सहिता उपवर्तन्ते सलिलाप्लुतवल्कला:॥ ५॥

‘ये जलसे भीगे हुए वल्कल धारण करनेवाले मुनि, जिनके शरीर स्नानके कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रमकी ओर लौट रहे हैं॥ ५॥

अग्निहोत्रे च ऋषिणा हुते च विधिपूर्वकम्।

कपोताङ्गारुणो धूमो दृश्यते पवनोद्धत:॥ ६॥

‘महर्षि (अत्रि) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र-सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अत: वायुके वेगसे ऊपरको उठा हुआ यह कबूतरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णका धूम दिखायी दे रहा है॥ ६॥

अल्पवर्णा हि तरवो घनीभूता: समन्तत:।

विप्रकृष्टेन्द्रिये देशे न प्रकाशन्ति वै दिश:॥ ७॥

‘अपनी इन्द्रियोंसे दूर देशमें चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होनेपर भी अन्धकारसे व्याप्त हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओंका भान नहीं हो रहा है॥ ७॥

रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्तत:।

तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते॥ ८॥

‘रातको विचरनेवाले प्राणी (उल्लू आदि) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवनके मृग पुण्यक्षेत्रस्वरूप आश्रमके वेदी आदि विभिन्न प्रदेशोंमें सो रहे हैं॥ ८॥

सम्प्रवृत्ता निशा सीते नक्षत्रसमलंकृता।

ज्योत्स्नाप्रावरणश्चन्द्रो दृश्यतेऽभ्युदितोऽम्बरे॥ ९॥

‘सीते! अब रात हो गयी, वह नक्षत्रोंसे सज गयी है। आकाशमें चन्द्रदेव चाँदनीकी चादर ओढ़े उदित दिखायी देते हैं॥ ९॥

गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव।

कथयन्त्या हि मधुरं त्वयाहमपि तोषिता॥ १०॥

‘अत: अब जाओ, मैं तुम्हें जानेकी आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातोंसे मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है॥ १०॥

अलंकुरु च तावत् त्वं प्रत्यक्षं मम मैथिलि।

प्रीतिं जनय मे वत्से दिव्यालंकारशोभिनी॥ ११॥

‘बेटी! मिथिलेशकुमारी! पहले मेरी आँखोंके सामने अपने-आपको अलंकृत करो। इन दिव्य वस्त्र और आभूषणोंको धारण करके इनसे सुशोभित हो मुझे प्रसन्न करो’॥

सा तदा समलंकृत्य सीता सुरसुतोपमा।

प्रणम्य शिरसा पादौ रामं त्वभिमुखी ययौ॥ १२॥

यह सुनकर देवकन्याके समान सुन्दरी सीताने उस समय उन वस्त्राभूषणोंसे अपना शृङ्गार किया और अनसूयाके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर वे श्रीरामके सम्मुख गयीं॥ १२॥

तथा तु भूषितां सीतां ददर्श वदतां वर:।

राघव: प्रीतिदानेन तपस्विन्या जहर्ष च॥ १३॥

श्रीरामने जब इस प्रकार सीताको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूयाके उस प्रेमोपहारके दर्शनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १३॥

न्यवेदयत् तत: सर्वं सीता रामाय मैथिली।

प्रीतिदानं तपस्विन्या वसनाभरणस्रजाम्॥ १४॥

उस समय मिथिलेशकुमारी सीताने तपस्विनी अनसूयाके हाथसे जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदिका प्रेमोपहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजीसे कह सुनाया॥ १४॥

प्रहृष्टस्त्वभवद् रामो लक्ष्मणश्च महारथ:।

मैथिल्या: सत्क्रियां दृष्ट्वा मानुषेषु सुदुर्लभाम्॥ १५॥

भगवान् श्रीराम और महारथी लक्ष्मण सीताका वह सत्कार, जो मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है, देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ १५॥

तत: स शर्वरीं प्रीत: पुण्यां शशिनिभाननाम्।

अर्चितस्तापसै: सर्वैरुवास रघुनन्दन:॥ १६॥

तदनन्तर समस्त तपस्विजनोंसे सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीरामने अनसूयाके दिये हुए पवित्र अलंकार आदिसे अलंकृत चन्द्रमुखी सीताको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया॥ १६॥

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामभिषिच्य हुताग्निकान्।

आपृच्छेतां नरव्याघ्रौ तापसान् वनगोचरान्॥ १७॥

वह रात बीतनेपर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणने उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी॥ १७॥

तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिण:।

वनस्य तस्य संचारं राक्षसै: समभिप्लुतम्॥ १८॥

रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव।

वसन्त्यस्मिन् महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशना:॥ १९॥

तब वे धर्मपरायण वनवासी तपस्वी उन दोनों भाइयोंसे इस प्रकार बोले—‘रघुनन्दन! इस वनका मार्ग राक्षसोंसे आक्रान्त है—यहाँ उनका उपद्रव होता रहता है। इस विशाल वनमें नानारूपधारी नरभक्षी राक्षस तथा रक्तभोजी हिंसक पशु निवास करते हैं॥ १८-१९॥

उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं ब्रह्मचारिणम्।

अदन्त्यस्मिन् महारण्ये तान् निवारय राघव॥ २०॥

‘राघवेन्द्र! जो तपस्वी और ब्रह्मचारी यहाँ अपवित्र अथवा असावधान अवस्थामें मिल जाता है, उसे वे राक्षस और हिंसक जन्तु इस महान् वनमें खा जाते हैं; अत: आप उन्हें रोकिये—यहाँसे मार भगाइये॥ २०॥

एष पन्था महर्षीणां फलान्याहरतां वने।

अनेन तु वनं दुर्गं गन्तुं राघव ते क्षमम्॥ २१॥

‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षिलोग वनके भीतर फल-मूल लेनेके लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्गसे इस दुर्गम वनमें प्रवेश करना चाहिये’॥ २१॥

इतीरित: प्राञ्जलिभिस्तपस्विभि-

र्द्विजै: कृतस्वस्त्ययन: परंतप:।

वनं सभार्य: प्रविवेश राघव:

सलक्ष्मण: सूर्य इवाभ्रमण्डलम्॥ २२॥

तपस्वी ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर जब ऐसी बातें कहीं और उनकी मङ्गलयात्राके लिये स्वस्तिवाचन किया, तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीरामने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ उस वनमें प्रवेश किया, मानो सूर्यदेव मेघोंकी घटाके भीतर घुस गये हों॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततम: सर्ग:॥ ११९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११९॥

 

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

प्रथम: सर्ग:

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका तापसोंके आश्रममण्डलमें सत्कार

प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।

रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥ १॥

दण्डकारण्य नामक महान् वनमें प्रवेश करके मनको वशमें रखनेवाले दुर्जय वीर श्रीरामने तपस्वी मुनियोंके बहुत-से आश्रम देखे॥ १॥

कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम्।

यथा प्रदीप्तं दुर्दर्शं गगने सूर्यमण्डलम्॥ २॥

वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रममण्डल ऋषियोंकी ब्रह्मविद्याके अभ्याससे प्रकट हुए विलक्षण तेजसे व्याप्त था, इसलिये आकाशमें प्रकाशित होनेवाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डलकी भाँति वह भूतलपर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदिके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था॥ २॥

शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा।

मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघै: समावृतम्॥ ३॥

वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारनेसे स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियोंके समुदाय भी उसे सब ओरसे घेरे रहते थे॥

पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणै:।

विशालैरग्निशरणै: स्रुग्भाण्डैरजिनै: कुशै:॥ ४॥

समिद्भिस्तोयकलशै: फलमूलैश्च शोभितम्।

आरण्यैश्च महावृक्षै: पुण्यै: स्वादुफलैर्वृतम्॥ ५॥

वहाँका प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थानके प्रति उनके मनमें बड़े आदरका भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ट फल देनेवाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था॥ ४-५॥

बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्।

पुष्पैश्चान्यै: परिक्षिप्तं पद्मिन्या च सपद्मया॥ ६॥

बलिवैश्वदेव और होमसे पूजित वह पवित्र आश्रमसमूह वेदमन्त्रोंके पाठकी ध्वनिसे गूँजता रहता था। कमलपुष्पोंसे सुशोभित पुष्करिणी उस स्थानकी शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत-से फूल सब ओर बिखरे हुए थे॥

फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरै: ।

सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम्॥ ७॥

उन आश्रमोंमें चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले तथा फल-मूलका आहार करके रहनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्निके तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे॥ ७॥

पुण्यैश्च नियताहारै: शोभितं परमर्षिभि:।

तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्॥ ८॥

नियमित आहार करनेवाले पवित्र महर्षियोंसे सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजीके धामकी भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनिसे निनादित था॥ ८॥

ब्रह्मविद्भिर्महाभागैर्ब्राह्मणैरुपशोभितम् ।

तद् दृष्ट्वा राघव: श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम्॥ ९॥

अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनु:।

अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमोंकी शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीरामने उस आश्रममण्डलको देखकर अपने महान् धनुषकी प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रमके भीतर गये॥ ९॥

दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षय:॥ १०॥

अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं च यशस्विनीम्।

श्रीराम तथा यशस्विनी सीताको देखकर वे दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके पास गये॥

ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम्॥ ११॥

लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं च यशस्विनीम्।

मङ्गलानि प्रयुञ्जाना: प्रत्यगृह्णन् दृढव्रता:॥ १२॥

दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महर्षि उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीरामको, लक्ष्मणको और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीताको भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने उन तीनोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें ग्रहण किया॥ ११-१२॥

रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम्।

ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिन:॥ १३॥

श्रीरामके रूप, शरीरकी गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेषको उन वनवासी मुनियोंने आश्चर्यचकित होकर देखा॥ १३॥

वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव।

आश्चर्यभूतान् ददृशु: सर्वे ते वनवासिन:॥ १४॥

वनमें निवास करनेवाले वे सभी मुनि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता—तीनोंको एकटक नेत्रोंसे देखने लगे। उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था॥ १४॥

अत्रैनं हि महाभागा: सर्वभूतहिते रता:।

अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन्॥ १५॥

समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले उन महाभाग महर्षियोंने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीरामको पर्णशालामें ले जाकर ठहराया॥ १५॥

ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमा:।

आजहृस्ते महाभागा: सलिलं धर्मचारिण:॥ १६॥

अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियोंने श्रीरामको विधिवत् सत्कारके साथ जल समर्पित किया॥ १६॥

मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युता:।

मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं च महात्मन:॥ १७॥

फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीरामको उन्होंने फल-मूल और फूल आदिके साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया॥

निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।

धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशा:॥ १८॥

पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरु:।

इन्द्रस्यैव चतुर्भाग: प्रजा रक्षति राघव॥ १९॥

राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृत:।

सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले—‘रघुनन्दन! दण्ड धारण करनेवाला राजा धर्मका पालक, महायशस्वी, इस जन-समुदायको शरण देनेवाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है। इस भूतलपर इन्द्र (आदि लोकपालों) का ही चौथा अंश होनेके कारण वह प्रजाकी रक्षा करता है, अत: राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगोंका उपभोग करता है। (जब साधारण राजाकी यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है। आप तो साक्षात् भगवान् हैं)॥ १८-१९॥

ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिन:।

नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वर:॥ २०॥

‘हम आपके राज्यमें निवास करते हैं, अत: आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये। आप नगरमें रहें या वनमें, हमलोगोंके राजा ही हैं। आप समस्त जनसमुदायके शासक एवं पालक हैं॥ २०॥

न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रिया:।

रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधना:॥ २१॥

‘राजन्! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है। अब तपस्या ही हमारा धन है। जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये’॥ २१॥

एवमुक्त्वा फलैर्मूलै: पुष्पैरन्यैश्च राघवम्।

वन्यैश्च विविधाहारै: सलक्ष्मणमपूजयन्॥ २२॥

ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियोंने वनमें उत्पन्न होनेवाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकारके आहारोंसे लक्ष्मण (और सीता) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका सत्कार किया॥ २२॥

तथान्ये तापसा: सिद्धा रामं वैश्वानरोपमा:।

न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम्॥ २३॥

इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताववाले सिद्ध तापसोंने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीरामको यथोचित रूपसे तृप्त किया॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रथम: सर्ग:॥ १॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १॥

 


द्वितीय: सर्ग:

वनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीतापर विराधका आक्रमण

कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति।

आमन्त्र्य स मुनीन् सर्वान् वनमेवान्वगाहत॥ १॥

रात्रिमें उन महर्षियोंका आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होनेपर समस्त मुनियोंसे विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुन: वनमें ही आगे बढ़ने लगे॥ १॥

नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम् ।

ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम्॥ २॥

निष्कूजमानशकुनिं झिल्लिकागणनादितम्।

लक्ष्मणानुचरो रामो वनमध्यं ददर्श ह॥ ३॥

जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीरामने वनके मध्यभागमें एक ऐसे स्थानको देखा, जो नाना प्रकारके मृगोंसे व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँके वृक्ष, लता और झाडि़याँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। उस वनप्रान्तमें किसी जलाशयका दर्शन होना कठिन था। वहाँके पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगुरोंकी झंकार गूँज रही थी॥ २-३॥

सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिन् घोरमृगायुते।

ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम्॥ ४॥

भयंकर जंगली पशुओंसे भरे हुए उस दुर्गम वनमें सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजीने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखरके समान ऊँचा था और उच्चस्वरसे गर्जना कर रहा था॥ ४॥

गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम्।

बीभत्सं विषमं दीर्घं विकृतं घोरदर्शनम्॥ ५॥

उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था। वह देखनेमें बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेशसे युक्त था॥ ५॥

वसानं चर्म वैयाघ्रं वसार्द्रं रुधिरोक्षितम्।

त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम्॥ ६॥

उसने खूनसे भीगा और चरबीसे गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियोंको त्रास पहुँचानेवाला वह राक्षस यमराजके समान मुँह बाये खड़ा था॥ ६॥

त्रीन् सिंहांश्चतुरो व्याघ्रान् द्वौ वृकौ पृषतान् दश।

सविषाणं वसादिग्धं गजस्य च शिरो महत्॥ ७॥

अवसज्यायसे शूले विनदन्तं महास्वनम्।

वह एक लोहेके शूलमें तीन सिंह, चार बाघ, दो भेडि़ये, दस चितकबरे हरिण और दाँतोंसहित एक बहुत बड़ा हाथीका मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथकर जोर-जोरसे दहाड़ रहा था॥ ७/

स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम्।

अभ्यधावत् सुसंक्रुद्ध: प्रजा: काल इवान्तक:॥ ८॥

स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम्॥ ९॥

श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीताको देखते ही वह क्रोधमें भरकर भैरवनाद करके पृथ्वीको कम्पित करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजाकी ओर अग्रसर होता है॥

अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य तदाब्रवीत्।

युवां जटाचीरधरौ सभार्यौ क्षीणजीवितौ॥ १०॥

प्रविष्टौ दण्डकारण्यं शरचापासिपाणिनौ।

वह विदेहनन्दिनी सीताको गोदमें ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर उन दोनों भाइयोंसे बोला—‘तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्रीके साथ रहते हो और हाथमें धनुष-बाण और तलवार लिये दण्डकवनमें घुस आये हो; अत: जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है॥ १०/

कथं तापसयोर्वां च वास: प्रमदया सह॥ ११॥

अधर्मचारिणौ पापौ कौ युवां मुनिदूषकौ।

‘तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्रीके साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदायको कलङ्कित करनेवाले तुम दोनों कौन हो?॥ ११/

अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षस:॥ १२॥

चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन्।

‘मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियोंके मांसका भक्षण करता हुआ हाथमें अस्त्र-शस्त्र लिये इस दुर्गम वनमें विचरता रहता हूँ॥ १२/

इयं नारी वरारोहा मम भार्या भविष्यति॥ १३॥

युवयो: पापयोश्चाहं पास्यामि रुधिरं मृधे।

‘यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अत: मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियोंका मैं युद्धस्थलमें रक्त पान करूँगा’॥

तस्यैवं ब्रुवतो दुष्टं विराधस्य दुरात्मन:॥ १४॥

श्रुत्वा सगर्वितं वाक्यं सम्भ्रान्ता जनकात्मजा।

सीता प्रवेपितोद्वेगात् प्रवाते कदली यथा॥ १५॥

दुरात्मा विराधकी ये दुष्टता और घमंडसे भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलनेपर केलेका वृक्ष जोर-जोरसे हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेगके कारण थरथर काँपने लगीं॥ १५॥

तां दृष्ट्वा राघव: सीतां विराधाङ्कगतां शुभाम्।

अब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥ १६॥

शुभलक्षणा सीताको सहसा विराधके चंगुलमें फँसी देख श्रीरामचन्द्रजी सूखते हुए मुँहसे लक्ष्मणको सम्बोधित करके बोले—॥ १६॥

पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम्।

मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम्॥ १७॥

‘सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनककी पुत्री और मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता विराधके अङ्कमें विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं॥ १७॥

अत्यन्तसुखसंवृद्धां राजपुत्रीं यशस्विनीम्।

यदभिप्रेतमस्मासु प्रियं वरवृतं च यत्॥ १८॥

कैकेय्यास्तु सुसंवृत्तं क्षिप्रमद्यैव लक्ष्मण।

या न तुष्यति राज्येन पुत्रार्थे दीर्घदर्शिनी॥ १९॥

‘अत्यन्त सुखमें पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीताकी यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वनमें हमारे लिये जिस दु:खकी प्राप्ति कैकेयीको अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्रके लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी॥ १८-१९॥

ययाहं सर्वभूतानां प्रिय: प्रस्थापितो वनम्।

अद्येदानीं सकामा सा या माता मध्यमा मम॥ २०॥

‘जिसने समस्त प्राणियोंके लिये प्रिय होनेपर भी मुझे वनमें भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है॥ २०॥

परस्पर्शात् तु वैदेह्या न दु:खतरमस्ति मे।

पितुर्विनाशात् सौमित्रे स्वराज्य हरणात् तथा॥ २१॥

‘विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दु:खकी बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजीकी मृत्यु तथा अपने राज्यके अपहरणसे भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है’॥ २१॥

इति ब्रुवति काकुत्स्थे बाष्पशोकपरिप्लुत:।

अब्रवील्लक्ष्मण: क्रुद्धो रुद्धो नाग इव श्वसन्॥ २२॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शोकके आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्रसे अवरुद्ध हुए सर्पकी भाँति फुफकारते हुए बोले—॥ २२॥

अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपम:।

मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे॥ २३॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्रके समान समस्त प्राणियोंके स्वामी एवं संरक्षक हैं। मुझ दासके रहते हुए आप किसलिये अनाथकी भाँति संतप्त हो रहे हैं?॥

शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षस:।

विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम्॥ २४॥

‘मैं अभी कुपित होकर अपने बाणसे इस राक्षसका वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराधका रक्त पीयेगी॥ २४॥

राज्यकामे मम क्रोधो भरते यो बभूव ह।

तं विराधे विमोक्ष्यामि वज्री वज्रमिवाचले॥ २५॥

‘राज्यकी इच्छा रखनेवाले भरतपर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराधपर छोडूँगा। जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वतपर अपना वज्र छोड़ते हैं॥ २५॥

मम भुजबलवेगवेगित:

पततु शरोऽस्य महान् महोरसि।

व्यपनयतु तनोश्च जीवितं

पततु ततश्च महीं विघूर्णित:॥ २६॥

‘मेरी भुजाओंके बलके वेगसे वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराधके विशाल वक्ष:स्थलपर गिरे। इसके शरीरसे प्राणोंको अलग करे। तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वीपर पड़ जाय’॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥ २॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥

 

तृतीय: सर्ग:

विराध और श्रीरामकी बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा विराधपर प्रहार तथा विराधका इन दोनों भाइयोंको साथ लेकर दूसरे वनमें जाना

अथोवाच पुनर्वाक्यं विराध: पूरयन् वनम्।

पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथ:॥ १॥

तदनन्तर विराधने उस वनको गुँजाते हुए कहा—‘अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे?’॥ १॥

तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम्।

पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मन:॥ २॥

क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ।

त्वां तु वेदितुमिच्छाव: कस्त्वं चरसि दण्डकान्॥ ३॥

तब महातेजस्वी श्रीरामने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुखवाले उस राक्षससे इस प्रकार कहा—‘तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकुका कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचारका पालन करनेवाले क्षत्रिय हैं और कारणवश इस समय वनमें निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तू कौन है, जो दण्डकवनमें स्वेच्छासे विचर रहा है?’॥ २-३॥

तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम्।

हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव॥ ४॥

यह सुनकर विराधने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— ‘रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषयमें सुनो॥ ४॥

पुत्र: किल जवस्याहं माता मम शतहृदा।

विराध इति मामाहु: पृथिव्यां सर्वराक्षसा:॥ ५॥

‘मैं ‘जव’ नामक राक्षसका पुत्र हूँ, मेरी माताका नाम ‘शतहृदा’ है। भूमण्डलके समस्त राक्षस मुझे विराधके नामसे पुकारते हैं॥ ५॥

तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो हि प्रसादजा।

शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च॥ ६॥

‘मैंने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्रसे मेरा वध न हो। मैं संसारमें अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ—कोई भी मेरे शरीरको छिन्न-भिन्न नहीं कर सके॥ ६॥

उत्सृज्य प्रमदामेनामनपेक्षौ यथागतम्।

त्वरमाणौ पलायेथां न वां जीवितमाददे॥ ७॥

‘अब तुम दोनों इस युवती स्त्रीको यहीं छोड़कर इसे पानेकी इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँसे भाग जाओ। मैं तुम दोनोंके प्राण नहीं लूँगा’॥ ७॥

तं राम: प्रत्युवाचेदं कोपसंरक्तलोचन:।

राक्षसं विकृताकारं विराधं पापचेतसम्॥ ८॥

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे पापपूर्ण विचार और विकट आकारवाले उस पापी राक्षस विराधसे इस प्रकार बोले—॥ ८॥

क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम्।

रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे॥ ९॥

‘नीच! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है। निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्धमें मिलेगी। ठहर, अब तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा’॥ ९॥

तत: सज्यं धनु: कृत्वा राम: सुनिशितान् शरान्।

सुशीघ्रमभिसंधाय राक्षसं निजघान ह॥ १०॥

यह कहकर भगवान् श्रीरामने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणोंका अनुसंधान करके उस राक्षसको बींधना आरम्भ किया॥ १०॥

धनुषा ज्यागुणवता सप्त बाणान् मुमोच ह।

रुक्मपुङ्खान् महावेगान् सुपर्णानिलतुल्यगान्॥ ११॥

उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुषके द्वारा विराधके ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान महान् वेगशाली थे और सोनेके पंखोंसे सुशोभित हो रहे थे॥ ११॥

ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा बर्हिणवासस:।

निपेतु: शोणितादिग्धा धरण्यां पावकोपमा:॥ १२॥

प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और मोरपंख लगे हुए वे बाण विराधके शरीरको छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १२॥

स विद्धो न्यस्य वैदेहीं शूलमुद्यम्य राक्षस:।

अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तदा रामं सलक्ष्मणम्॥ १३॥

घायल हो जानेपर उस राक्षसने विदेहकुमारी सीताको अलग रख दिया और स्वयं हाथमें शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मणपर तत्काल टूट पड़ा॥ १३॥

स विनद्य महानादं शूलं शक्रध्वजोपमम्।

प्रगृह्याशोभत तदा व्यात्तानन इवान्तक:॥ १४॥

वह बड़े जोरसे गर्जना करके इन्द्रध्वजके समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए कालके समान शोभा पा रहा था॥ १४॥

अथ तौ भ्रातरौ दीप्तं शरवर्षं ववर्षतु:।

विराधे राक्षसे तस्मिन् कालान्तकयमोपमे॥ १५॥

तब काल, अन्तक और यमराजके समान उस भयंकर राक्षस विराधके ऊपर उन दोनों भाइयोंने प्रज्वलित बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ १५॥

स प्रहस्य महारौद्र: स्थित्वाजृम्भत राक्षस:।

जृम्भमाणस्य ते बाणा: कायान्निष्पेतुराशुगा:॥ १६॥

‘यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जँभाईके साथ अँगड़ाई लेने लगा। उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीरसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १६॥

स्पर्शात् तु वरदानेन प्राणान् संरोध्य राक्षस:।

विराध: शूलमुद्यम्य राघवावभ्यधावत॥ १७॥

वरदानके सम्बन्धसे उस राक्षस विराधने प्राणोंको रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर आक्रमण किया॥ १७॥

तच्छूलं वज्रसंकाशं गगने ज्वलनोपमम्।

द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद राम: शस्त्रभृतां वर:॥ १८॥

उसका वह शूल आकाशमें वज्र और अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दो बाण मारकर उसे काट डाला॥ १८॥

तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि।

पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम्॥ १९॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे कटा हुआ विराधका वह शूल वज्रसे छिन्न-भिन्न हुए मेरुके शिलाखण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १९॥

तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ।

तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात्॥ २०॥

फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सर्पोंके समान दो तलवारें लेकर तुरंत उसपर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे॥ २०॥

स वध्यमान: सुभृशं भुजाभ्यां परिगृह्य तौ।

अप्रकम्प्यौ नरव्याघ्रौ रौद्र: प्रस्थातुमैच्छत॥ २१॥

उनके आघातसे अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षसने अपनी दोनों भुजाओंसे उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरोंको पकड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा की॥ २१॥

तस्याभिप्रायमाज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

वहत्वयमलं तावत् पथानेन तु राक्षस:॥ २२॥

यथा चेच्छति सौमित्रे तथा वहतु राक्षस:।

अयमेव हि न: पन्था येन याति निशाचर:॥ २३॥

उसके अभिप्रायको जानकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! यह राक्षस अपनी इच्छाके अनुसार हम लोगोंको इस मार्गसे ढोकर ले चले। यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले (इसमें बाधा डालनेकी आवश्यकता नहीं है)। जिस मार्गसे यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगोंके लिये आगे जानेका मार्ग है’॥ २२-२३॥

स तु स्वबलवीर्येण समुत्क्षिप्य निशाचर:।

बालाविव स्कन्धगतौ चकारातिबलोद्धत:॥ २४॥

अत्यन्त बलसे उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराधने अपने बल-पराक्रमसे उन दोनों भाइयोंको बालकोंकी तरह उठाकर अपने दोनों कंधोंपर बिठा लिया॥ २४॥

तावारोप्य तत: स्कन्धं राघवौ रजनीचर:।

विराधो विनदन् घोरं जगामाभिमुखो वनम्॥ २५॥

उन दोनों रघुवंशी वीरोंको कंधेपर चढ़ा लेनेके बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वनकी ओर चल दिया॥ २५॥

वनं महामेघनिभं प्रविष्टो

द्रुमैर्महद्भिर्विविधैरुपेतम् ।

नानाविधै: पक्षिकुलैर्विचित्रं

शिवायुतं व्यालमृगैर्विकीर्णम्॥ २६॥

तदनन्तर उसने एक ऐसे वनमें प्रवेश किया, जो महान् मेघोंकी घटाके समान घना और नीला था। नाना प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे। भाँति-भाँतिके पक्षियोंके समुदाय उसे विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे तृतीय: सर्ग:॥ ३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३॥

 

चतुर्थ: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा विराधका वध

ह्र‌ियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ।

उच्चै: स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ॥ १॥

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको राक्षस लिये जा रहा है—यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगीं—॥ १॥

एष दाशरथी राम: सत्यवाञ्छीलवान् शुचि:।

रक्षसा रौद्ररूपेण ह्र‌ियते सहलक्ष्मण:॥ २॥

‘हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार- विचारवाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणको यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है॥ २॥

मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा।

मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम॥ ३॥

‘राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वनमें रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरोंको छोड़ दो’॥ ३॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।

वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मन:॥ ४॥

विदेहनन्दिनी सीताकी यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षसका वध करनेमें शीघ्रता करने लगे॥ ४॥

तस्य रौद्रस्य सौमित्रि: सव्यं बाहुं बभञ्ज ह।

रामस्तु दक्षिणं बाहुं तरसा तस्य रक्षस:॥ ५॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसकी बायीं और श्रीरामने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेगसे तोड़ डाली॥ ५॥

स भग्नबाहु: संविग्न: पपाताशु विमूर्च्छित:।

धरण्यां मेघसंकाशो वज्रभिन्न इवाचल:॥ ६॥

भुजाओंके टूट जानेपर वह मेघके समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकर वज्रके द्वारा टूटे हुए पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६॥

मुष्टिभिर्बाहुभि: पद्भि: सूदयन्तौ तु राक्षसम्।

उद्यम्योद्यम्य चाप्येनं स्थण्डिले निष्पिपेषतु:॥ ७॥

तब श्रीराम और लक्ष्मण विराधको भुजाओं, मुक्कों और लातोंसे मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वीपर रगड़ने लगे॥ ७॥

स विद्धौ बहुभिर्बाणै: खड्गाभ्यां च परिक्षत:।

निष्पिष्टो बहुधा भूमौ न ममार स राक्षस:॥ ८॥

बहुसंख्यक बाणोंसे घायल और तलवारोंसे क्षत-विक्षत होनेपर तथा पृथ्वीपर बार-बार रगड़ा जानेपर भी वह राक्षस मरा नहीं॥ ८॥

तं प्रेक्ष्य राम: सुभृशमवध्यमचलोपमम्।

भयेष्वभयद: श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्॥ ९॥

अवध्य तथा पर्वतके समान अचल विराधको बारंबार देखकर भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले श्रीमान् रामने लक्ष्मणसे यह बात कही—॥ ९॥

तपसा पुरुषव्याघ्र राक्षसोऽयं न शक्यते।

शस्त्रेण युधि निर्जेतुं राक्षसं निखनावहे॥ १०॥

‘पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्यासे (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्रके द्वारा युद्धमें नहीं जीता जा सकता। इसलिये हमलोग निशाचर विराधको पराजित करनेके लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें॥ १०॥

कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।

वनेऽस्मिन् सुमहच्छ्वभ्रं खन्यतां रौद्रवर्चस:॥ ११॥

‘लक्ष्मण! हाथीके समान भयंकर तथा रौद्र तेजवाले इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’॥ ११॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं राम: प्रदर: खन्यतामिति।

तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्॥ १२॥

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेकी आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥ १२॥

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं राक्षस: प्रश्रितं वच:।

इदं प्रोवाच काकुत्स्थं विराध: पुरुषर्षभम्॥ १३॥

श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराधने पुरुषप्रवर श्रीरामसे यह विनययुक्त बात कही—॥ १३॥

हतोऽहं पुरुषव्याघ्र शक्रतुल्यबलेन वै।

मया तु पूर्वं त्वं मोहान्न ज्ञात: पुरुषर्षभ॥ १४॥

‘पुरुषसिंह! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्रके समान है। मैं आपके हाथसे मारा गया। मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका॥ १४॥

कौसल्या सुप्रजास्तात रामस्त्वं विदितो मया।

वैदेही च महाभागा लक्ष्मणश्च महायशा:॥ १५॥

‘तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतानवाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं॥ १५॥

अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम्।

तुम्बुरुर्नाम गन्धर्व: शप्तो वैश्रवणेन हि॥ १६॥

‘मुझे शापके कारण इस भयंकर राक्षसशरीरमें आना पड़ा था। मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेरने मुझे राक्षस होनेका शाप दिया था॥ १६॥

प्रसाद्यमानश्च मया सोऽब्रवीन्मां महायशा:।

यदा दाशरथी रामस्त्वां वधिष्यति संयुगे॥ १७॥

तदा प्रकृतिमापन्नो भवान् स्वर्गं गमिष्यति।

‘जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले—‘गन्धर्व! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्धमें तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूपको प्राप्त होकर स्वर्गलोकको जाओगे॥ १७/

अनुपस्थीयमानो मां स क्रुद्धो व्याजहार ह॥ १८॥

इति वैश्रवणो राजा रम्भासक्तमुवाच ह।

‘मैं रम्भा नामक अप्सरामें आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समयसे उनकी सेवामें उपस्थित न हो सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटनेकी अवधि बतायी थी॥ १८/

तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात् सुदारुणात्॥ १९॥

भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप।

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर! आज आपकी कृपासे मुझे उस भयंकर शापसे छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोकको जाऊँगा॥

इतो वसति धर्मात्मा शरभङ्ग: प्रतापवान्॥ २०॥

अध्यर्धयोजने तात महर्षि: सूर्यसंनिभ:।

तं क्षिप्रमभिगच्छ त्वं स ते श्रेयोऽभिधास्यति॥ २१॥

‘तात! यहाँसे डेढ़ योजनकी दूरीपर सूर्यके समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याणकी बात बतायेंगे॥ २०-२१॥

अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली व्रज।

रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्म: सनातन:॥ २२॥

‘श्रीराम! आप मेरे शरीरको गड्ढेमें गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसोंके शरीरको गड्ढेमें गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्पराप्राप्त) धर्म है॥ २२॥

अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोका: सनातना:।

एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं विराध: शरपीडित:॥ २३॥

बभूव स्वर्गसम्प्राप्तो न्यस्तदेहो महाबल:।

‘जो राक्षस गड्ढेमें गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है।’ श्रीरामसे ऐसा कहकर बाणोंसे पीडि़त हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढेमें डाला गया, तब) उस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकको चला गया॥ २३/

तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं लक्ष्मणं व्यादिदेश ह॥ २४॥

कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण।

वनेऽस्मिन्सुमहान् श्वभ्र: खन्यतां रौद्रकर्मण:॥ २५॥

(वह किस तरह गड्ढेमें डाला गया?—यह बात अब बतायी जाती है—) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणको आज्ञा दी—‘लक्ष्मण! भयंकर कर्म करनेवाले तथा हाथीके समान भयानक इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’॥ २४-२५॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं राम: प्रदर: खन्यतामिति।

तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्॥ २६॥

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेका आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥ २६॥

तत: खनित्रमादाय लक्ष्मण: श्वभ्रमुत्तमम्।

अखनत् पार्श्वतस्तस्य विराधस्य महात्मन:॥ २७॥

तब लक्ष्मणने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराधके पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया॥ २७॥

तं मुक्तकण्ठमुत्क्षिप्य शङ्कुकर्णं महास्वनम्।

विराधं प्राक्षिपच्छ्वभ्रे नदन्तं भैरवस्वनम्॥ २८॥

तब श्रीरामने उसके गलेको छोड़ दिया और लक्ष्मणने खूँटे-जैसे कानवाले उस विराधको उठाकर उस गड्ढेमें डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था॥ २८॥

तमाहवे दारुणमाशुविक्रमौ

स्थिरावुभौ संयति रामलक्ष्मणौ।

मुदान्वितौ चिक्षिपतुर्भयावहं

नदन्तमुत्क्षिप्य बलेन राक्षसम्॥ २९॥

युद्धमें स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने रणभूमिमें क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले उस भयंकर राक्षस विराधको बलपूर्वक उठाकर गड्ढेमें फेंक दिया। उस समय वह जोर-जोरसे चिल्ला रहा था। उसे गड्ढेमें डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए॥ २९॥

अवध्यतां प्रेक्ष्य महासुरस्य तौ

शितेन शस्त्रेण तदा नरर्षभौ।

समर्थ्य चात्यर्थविशारदावुभौ

बिले विराधस्य वधं प्रचक्रतु:॥ ३०॥

महान् असुर विराधका तीखे शस्त्रसे वध होनेवाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मणने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढेमें उसे डाल दिया और उसे मिट्टीसे पाटकर उस राक्षसका वध कर डाला॥ ३०॥

स्वयं विराधेन हि मृत्युमात्मन:

प्रसह्य रामेण यथार्थमीप्सित:।

निवेदित: काननचारिणा स्वयं

न मे वध: शस्त्रकृतो भवेदिति॥ ३१॥

वास्तवमें श्रीरामके हाथसे ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्युकी प्राप्तिके उद्देश्यसे स्वयं वनचारी विराधने ही श्रीरामको यह बता दिया था कि शस्त्रद्वारा मेरा वध नहीं हो सकता॥ ३१॥

तदेव रामेण निशम्य भाषितं

कृता मतिस्तस्य बिलप्रवेशने।

बिलं च तेनातिबलेन रक्षसा

प्रवेश्यमानेन वनं विनादितम्॥ ३२॥

उसकी कही हुई उसी बातको सुनकर श्रीरामने उसे गड्ढेमें गाड़ देनेका विचार किया था। जब वह गड्ढेमें डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षसने अपनी चिल्लाहटसे सारे वनप्रान्तको गुँजा दिया॥

प्रहृष्टरूपाविव रामलक्ष्मणौ

विराधमुर्व्यां प्रदरे निपात्य तम्।

ननन्दतुर्वीतभयौ महावने

शिलाभिरन्तर्दधतुश्च राक्षसम्॥ ३३॥

राक्षस विराधको पृथ्वीके अंदर गड्ढेमें गिराकर श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे ऊपरसे बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वनमें सानन्द विचरने लगे॥ ३३॥

ततस्तु तौ काञ्चनचित्रकार्मुकौ

निहत्य रक्ष: परिगृह्य मैथिलीम्।

विजहृतुस्तौ मुदितौ महावने

दिवि स्थितौ चन्द्रदिवाकराविव॥ ३४॥

इस प्रकार उस राक्षसका वध करके मिथिलेश-कुमारी सीताको साथ ले सोनेके विचित्र धनुषोंसे सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाशमें स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति उस महान् वनमें आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्थ: सर्ग:॥ ४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४॥

 


पञ्चम: सर्ग:

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर जाना, देवताओंका दर्शन करना और मुनिसे सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनिका ब्रह्मलोक-गमन

हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने।

तत: सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान्॥ १॥

अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्।

कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचरा:॥ २॥

अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम्।

आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह॥ ३॥

वनमें उस भयंकर बलशाली राक्षस विराधका वध करके पराक्रमी श्रीरामने सीताको हृदयसे लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेजवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—‘सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है। हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनोंमें नहीं रहे हैं (अत: यहाँके कष्टोंका न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है)। अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजीके पास चलें’—ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये॥ १—३॥

तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मन:।

समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम्॥ ४॥

देवताओंके तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्यासे शुद्ध अन्त:करणवाले (अथवा तपके द्वारा परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करनेवाले) शरभङ्ग मुनिके समीप जानेपर श्रीरामने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा॥ ४॥

विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्।

रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम्॥ ५॥

असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम्।

सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम्॥ ६॥

वहाँ उन्होंने आकाशमें एक श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए देवताओंके स्वामी इन्द्रदेवका दर्शन किया, जो पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होती थी। वे अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान हो रहे थे। उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे। उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था॥ ५-६॥

तद्विधैरेव बहुभि: पूज्यमानं महात्मभि:।

हरितैर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम्॥ ७॥

ददर्शादूरतस्तस्य तरुणादित्यसंनिभम्।

उन्हींके समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत-से महात्मा इन्द्रदेवकी पूजा (स्तुति-प्रशंसा) कर रहे थे। उनका रथ आकाशमें खड़ा था और उसमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे। श्रीरामने निकटसे उस रथको देखा। वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होता था॥ ७/

पाण्डुराभ्रघनप्रख्यं चन्द्रमण्डलसंनिभम्॥ ८॥

अपश्यद् विमलं छत्रं चित्रमाल्योपशोभितम्।

उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्रके मस्तकके ऊपर श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलोंकी मालाओंसे सुशोभित है॥ ८/

चामरव्यजने चाग्र्ये रुक्मदण्डे महाधने॥ ९॥

गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि।

श्रीरामने सुवर्णमय डंडेवाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराजके मस्तकपर हवा कर रही थीं॥ ९/

गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहव: परमर्षय:॥ १०॥

अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्र्याभिरैडयन्।

सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे॥ ११॥

दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम्॥ १२॥

उस समय बहुत-से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनोंद्वारा अन्तरिक्षमें विराजमान देवेन्द्रकी स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनिके साथ वार्तालाप कर रहे थे। वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्रका दर्शन करके श्रीरामने उनके अद्भुत रथकी ओर अँगुलीसे संकेत करते हुए उसे भाईको दिखाया और लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १०—१२॥

अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टमद्भुतं पश्य लक्ष्मण।

प्रतपन्तमिवादित्यमन्तरिक्षगतं रथम्॥ १३॥

‘लक्ष्मण! आकाशमें वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेजकी लपटें निकल रही हैं। वह सूर्यके समान तप रहा है। शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है॥ १३॥

ये हया: पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य न: श्रुता:।

अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम्॥ १४॥

‘हमलोगोंने पहले देवराज इन्द्रके जिन दिव्य घोडोंके विषयमें जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाशमें ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं॥ १४॥

इमे च पुरुषव्याघ्र ये तिष्ठन्त्यभितो दिशम्।

शतं शतं कुण्डलिनो युवान: खड्गपाणय:॥ १५॥

विस्तीर्णविपुलोरस्का: परिघायतबाहव:।

शोणांशुवसना: सर्वे व्याघ्रा इव दुरासदा:॥ १६॥

‘पुरुषसिंह! इस रथके दोनों ओर जो ये हाथोंमें खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ-सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्ष:स्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघोंके समान सुदृढ़ एवं बड़ी-बड़ी हैं। ये सब-के-सब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रोंके समान दुर्जय प्रतीत होते हैं॥ १५-१६॥

उरोदेशेषु सर्वेषां हारा ज्वलनसंनिभा:।

रूपं बिभ्रति सौमित्रे पञ्चविंशतिवार्षिकम्॥ १७॥

‘सुमित्रानन्दन! इन सबके हृदयदेशोंमें अग्निके समान तेजसे जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं। ये नवयुवक पच्चीस वर्षोंकी अवस्थाका रूप धारण करते हैं॥ १७॥

एतद्धि किल देवानां वयो भवति नित्यदा।

यथेमे पुरुषव्याघ्रा दृश्यन्ते प्रियदर्शना:॥ १८॥

‘कहते हैं, देवताओंकी सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुषप्रवर दिखायी देते हैं। इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है॥ १८॥

इहैव सह वैदेह्या मुहूर्तं तिष्ठ लक्ष्मण।

यावज्जानाम्यहं व्यक्तं क एष द्युतिमान् रथे॥ १९॥

‘लक्ष्मण! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथपर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीताके साथ एक मुहूर्ततक यहीं ठहरो’॥ १९॥

तमेवमुक्त्वा सौमित्रिमिहैव स्थीयतामिति।

अभिचक्राम काकुत्स्थ: शरभङ्गाश्रमं प्रति॥ २०॥

इस प्रकार सुमित्राकुमारको वहीं ठहरनेका आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये॥ २०॥

तत: समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपति:।

शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत्॥ २१॥

श्रीरामको आते देख शचीपति इन्द्रने शरभङ्ग मुनिसे विदा ले देवताओंसे इस प्रकार कहा—॥ २१॥

इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते।

निष्ठां नयत तावत् तु ततो माद्रष्टुमर्हति॥ २२॥

‘श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं। वे जबतक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुमलोग मुझे यहाँसे दूसरे स्थानमें ले चलो। इस समय श्रीरामसे मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये॥ २२॥

जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्।

कर्म ह्यनेन कर्तव्यं महदन्यै: सुदुष्करम्॥ २३॥

‘इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है। जब ये रावणपर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा’॥ २३॥

अथ वज्री तमामन्त्र्य मानयित्वा च तापसम्।

रथेन हययुक्तेन ययौ दिवमरिंदम:॥ २४॥

यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द्रने तपस्वी शरभङ्गका सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथके द्वारा स्वर्गलोकको चल दिये॥

प्रयाते तु सहस्राक्षे राघव: सपरिच्छद:।

अग्निहोत्रमुपासीनं शरभङ्गमुपागमत्॥ २५॥

सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाईके साथ शरभङ्ग मुनिके पास गये। उस समय वे अग्निके समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे॥ २५॥

तस्य पादौ च संगृह्य राम: सीता च लक्ष्मण:।

निषेदुस्तदनुज्ञाता लब्धवासा निमन्त्रिता:॥ २६॥

श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे वहाँ बैठ गये। शरभङ्गजीने उन्हें आतिथ्यके लिये निमन्त्रण दे ठहरनेके लिये स्थान दिया॥ २६॥

तत: शक्रोपयानं तु पर्यपृच्छत राघव:।

शरभङ्गश्च तत् सर्वं राघवाय न्यवेदयत्॥ २७॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे इन्द्रके आनेका कारण पूछा। तब शरभङ्ग मुनिने श्रीरघुनाथजीसे सब बातें निवेदन करते हुए कहा—॥ २७॥

मामेष वरदो राम ब्रह्मलोकं निनीषति।

जितमुग्रेण तपसा दुष्प्रापमकृतात्मभि:॥ २८॥

‘श्रीराम! ये वर देनेवाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोकमें ले जाना चाहते हैं। मैंने अपनी उग्र तपस्यासे उस लोकपर विजय पायी है। जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, उन पुरुषोंके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है॥ २८॥

अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरत:।

ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम्॥ २९॥

‘पुरुषसिंह! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रमके निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप-जैसे प्रिय अतिथिका दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोकको नहीं जाऊँगा॥ २९॥

त्वयाहं पुरुषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मना।

समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चावरं परम्॥ ३०॥

‘नरश्रेष्ठ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुषसे मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपरके ब्रह्मलोकको जाऊँगा॥ ३०॥

अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभा:।

ब्राह्म्याश्च नाकपृष्ठ्याश्च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्॥ ३१॥

‘पुरुषशिरोमणे! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकोंपर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकोंको आप ग्रहण करें’॥ ३१॥

एवमुक्तो नरव्याघ्र: सर्वशास्त्रविशारद:।

ऋषिणा शरभङ्गेन राघवो वाक्यमब्रवीत्॥ ३२॥

शरभङ्ग मुनिके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने यह बात कही—॥ ३२॥

अहमेवाहरिष्यामि सर्वांल्लोकान् महामुने।

आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥ ३३॥

‘महामुने! मैं ही आपको उन सब लोकोंकी प्राप्ति कराऊँगा। इस समय तो मैं इस वनमें आपके बताये हुए स्थानपर निवासमात्र करना चाहता हूँ’॥ ३३॥

राघवेणैवमुक्तस्तु शक्रतुल्यबलेन वै।

शरभङ्गो महाप्राज्ञ: पुनरेवाब्रवीद् वच:॥ ३४॥

इन्द्रके समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले—॥ ३४॥

इह राम महातेजा: सुतीक्ष्णो नाम धार्मिक:।

वसत्यरण्ये नियत: स ते श्रेयो विधास्यति॥ ३५॥

‘श्रीराम! इस वनमें थोड़ी ही दूरपर महातेजस्वी धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं। वे ही आपका कल्याण (आपके लिये स्थान आदिका प्रबन्ध) करेंगे॥ ३५॥

सुतीक्ष्णमभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपस्विनम्।

रमणीये वनोद्देशे स ते वासं विधास्यति॥ ३६॥

‘आप इस रमणीय वनप्रान्तके उस पवित्र स्थानमें तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनिके पास चले जाइये। वे आपके निवासस्थानकी व्यवस्था करेंगे॥ ३६॥

इमां मन्दाकिनीं राम प्रतिस्रोतामनुव्रज।

नदीं पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि॥ ३७॥

‘श्रीराम! आप फूलके समान छोटी-छोटी डोंगियोंसे पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौकाको बहानेवाली इस मन्दाकिनी नदीके स्रोतके विपरीत दिशामें इसीके किनारे-किनारे चले जाइये। इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा॥ ३७॥

एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम्।

यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरग:॥ ३८॥

‘नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है, परंतु तात! दो घड़ी यहीं ठहरिये और जबतक पुरानी केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गोंका त्याग न कर दूँ, तबतक मेरी ही ओर देखिये’॥ ३८॥

ततोऽग्निं स समाधाय हुत्वा चाज्येन मन्त्रवत्।

शरभङ्गो महातेजा: प्रविवेश हुताशनम्॥ ३९॥

यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनिने विधिवत् अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्निमें प्रविष्ट हो गये॥ ३९॥

तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वह्निर्महात्मन:।

जीर्णां त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितम्॥ ४०॥

उस समय अग्निने उन महात्माके रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया॥ ४०॥

स च पावकसंकाश: कुमार: समपद्यत।

उत्थायाग्निचयात् तस्माच्छरभङ्गो व्यरोचत॥ ४१॥

वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमारके रूपमें प्रकट हो गये और उस अग्निराशिसे ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ ४१॥

स लोकानाहिताग्नीनामृषीणां च महात्मनाम्।

देवानां च व्यतिक्रम्य ब्रह्मलोकं व्यरोहत॥ ४२॥

वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओंके भी लोकोंको लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे॥ ४२॥

स पुण्यकर्मा भुवने द्विजर्षभ:

पितामहं सानुचरं ददर्श ह।

पितामहश्चापि समीक्ष्य तं द्विजं

ननन्द सुस्वागतमित्युवाच ह॥ ४३॥

पुण्यकर्म करनेवाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्गने ब्रह्मलोकमें पार्षदोंसहित पितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया। ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले— ‘महामुने! तुम्हारा शुभ स्वागत है’॥ ४३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चम: सर्ग:॥ ५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५॥

 

षष्ठ: सर्ग:

वानप्रस्थ मुनियोंका राक्षसोंके अत्याचारसे अपनी रक्षाके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे प्रार्थना करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देना

शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घा: समागता:।

अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम्॥ १॥

शरभङ्ग मुनिके ब्रह्मलोक चले जानेपर प्रज्वलित तेजवाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीके पास बहुत-से मुनियोंके समुदाय पधारे॥ १॥

वैखानसा वालखिल्या: सम्प्रक्षाला मरीचिपा:।

अश्मकुट्टाश्च बहव: पत्राहाराश्च तापसा:॥ २॥

दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जका: परे।

गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिका:॥ ३॥

मुनय: सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे।

आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिन:॥ ४॥

तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवासस:।

सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विता:॥ ५॥

उनमें वैखानस81, वालखिल्य82, सम्प्रक्षाल83, मरीचिप84, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट85, पत्राहार86, दन्तोलूखली87, उन्मज्जक88, गात्रशय्य89, अशय्य90, अनवकाशिक91, सलिलाहार92, वायुभक्ष93, आकाशनिलय94, स्थण्डिलशायी95, ऊर्ध्ववासी96, दान्त97, आर्द्रपटवासा98, सजप99, तपोनिष्ठ100 और पञ्चाग्निसेवी101—इन सभी श्रेणियोंके तपस्वी मुनि थे॥ २—५॥

सर्वे ब्राह्म्या श्रिया युक्ता दृढयोगसमाहिता:।

शरभङ्गाश्रमे राममभिजग्मुश्च तापसा:॥ ६॥

वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे और सुदृढ़ योगके अभ्याससे उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था। वे सब-के-सब शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये॥ ६॥

अभिगम्य च धर्मज्ञा रामं धर्मभृतां वरम्।

ऊचु: परमधर्मज्ञमृषिसङ्घा: समागता:॥ ७॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर वे धर्मके ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले—॥ ७॥

त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्य पृथिव्याश्च महारथ:।

प्रधानश्चापि नाथश्च देवानां मघवानिव॥ ८॥

‘रघुनन्दन! आप इस इक्ष्वाकुवंशके साथ ही समस्त भूमण्डलके भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं। जैसे इन्द्र देवताओंके रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोककी रक्षा करनेवाले हैं॥ ८॥

विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु यशसा विक्रमेण च।

पितृव्रतत्वं सत्यं च त्वयि धर्मश्च पुष्कल:॥ ९॥

‘आप अपने यश और पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। आपमें पिताकी आज्ञाके पालनका व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं॥ ९॥

त्वामासाद्य महात्मानं धर्मज्ञं धर्मवत्सलम्।

अर्थित्वान्नाथ वक्ष्यामस्तच्च न: क्षन्तुमर्हसि॥ १०॥

‘नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं। हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थकी बात निवेदन करना चाहते हैं। आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये॥ १०॥

अधर्म: सुमहान् नाथ भवेत् तस्य तु भूपते:।

यो हरेद् बलिषड्भागं न च रक्षति पुत्रवत्॥ ११॥

‘स्वामिन्! जो राजा प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ले ले और पुत्रकी भाँति प्रजाकी रक्षा न करे, उसे महान् अधर्मका भागी होना पड़ता है॥ ११॥

युञ्जान: स्वानिव प्राणान् प्राणैरिष्टान् सुतानिव।

नित्ययुक्त: सदा रक्षन् सर्वान् विषयवासिन:॥ १२॥

प्राप्नोति शाश्वतीं राम कीर्तिं स बहुवार्षिकीम्।

ब्रह्मण: स्थानमासाद्य तत्र चापि महीयते॥ १३॥

‘श्रीराम! जो भूपाल प्रजाकी रक्षाके कार्यमें संलग्न हो अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंको प्राणोंके समान अथवा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय पुत्रोंके समान समझकर सदा सावधानीके साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्तमें ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँ भी विशेष सम्मानका भागी होता है॥ १२-१३॥

यत् करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशन:।

तत्र राज्ञश्चतुर्भाग: प्रजा धर्मेण रक्षत:॥ १४॥

‘राजाके राज्यमें मुनि फल-मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्मका अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेवाले उस राजाको प्राप्त हो जाता है॥ १४॥

सोऽयं ब्राह्मणभूयिष्ठो वानप्रस्थगणो महान्।

त्वन्नाथोऽनाथवद् राम राक्षसैर्हन्यते भृशम्॥ १५॥

‘श्रीराम! इस वनमें रहनेवाला वानप्रस्थ महात्माओंका यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणोंकी ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसोंके द्वारा अनाथकी तरह मारा जा रहा है—इस मुनि-समुदायका बहुत अधिक मात्रामें संहार हो रहा है॥ १५॥

एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम्।

हतानां राक्षसैर्घोरैर्बहूनां बहुधा वने॥ १६॥

‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसोंद्वारा बारम्बार अनेक प्रकारसे मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियोंके शरीर (शव या कंकाल) दिखायी देते हैं॥ १६॥

पम्पानदीनिवासानामनुमन्दाकिनीमपि ।

चित्रकूटालयानां च क्रियते कदनं महत्॥ १७॥

‘पम्पा सरोवर और उसके निकट बहनेवाली तुङ्गभद्रा नदीके तटपर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनीके किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूटपर्वतके किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियोंका राक्षसोंद्वारा महान् संहार किया जा रहा है॥ १७॥

एवं वयं न मृष्यामो विप्रकारं तपस्विनाम्।

क्रियमाणं वने घोरं रक्षोभिर्भीमकर्मभि:॥ १८॥

‘इन भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंने इस वनमें तपस्वी मुनियोंका जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगोंसे सहा नहीं जाता है॥ १८॥

ततस्त्वां शरणार्थं च शरण्यं समुपस्थिता:।

परिपालय नो राम वध्यमानान् निशाचरै:॥ १९॥

‘अत: इन राक्षसोंसे बचनेके लिये शरण लेनेके उद्देश्यसे हम आपके पास आये हैं। श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अत: इन निशाचरोंसे मारे जाते हुए हम मुनियोंकी रक्षा कीजिये॥ १९॥

परा त्वत्तो गतिर्वीर पृथिव्यां नोपपद्यते।

परिपालय न: सर्वान् राक्षसेभ्यो नृपात्मज॥ २०॥

‘वीर राजकुमार! इस भूमण्डलमें हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता। आप इन राक्षसोंसे हम सबको बचाइये’॥ २०॥

एतच्छ्रुत्वा तु काकुत्स्थस्तापसानां तपस्विनाम्।

इदं प्रोवाच धर्मात्मा सर्वानेव तपस्विन:॥ २१॥

तपस्यामें लगे रहनेवाले उन तपस्वी मुनियोंकी ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीरामने उन सबसे कहा—॥ २१॥

नैवमर्हथ मां वक्तुमाज्ञाप्योऽहं तपस्विनाम्।

केवलेन स्वकार्येण प्रवेष्टव्यं वनं मया॥ २२॥

‘मुनिवरो! आपलोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें। मैं तो तपस्वी महात्माओंका आज्ञापालक हूँ। मुझे केवल अपने ही कार्यसे वनमें तो प्रवेश करना ही है (इसके साथ ही आपलोगोंकी सेवाका सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा)॥ २२॥

विप्रकारमपाक्रष्टुं राक्षसैर्भवतामिमम्।

पितुस्तु निर्देशकर: प्रविष्टोऽहमिदं वनम्॥ २३॥

‘राक्षसोंके द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करनेके लिये ही मैं पिताके आदेशका पालन करता हुआ इस वनमें आया हूँ॥ २३॥

भवतामर्थसिद्ध्यर्थमागतोऽहं यदृच्छया।

तस्य मेऽयं वने वासो भविष्यति महाफल:॥ २४॥

‘आपलोगोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवाका अवसर मिलनेसे मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा॥ २४॥

तपस्विनां रणे शत्रून् हन्तुमिच्छामि राक्षसान्।

पश्यन्तु वीर्यमृषय: सभ्रातुर्मे तपोधना:॥ २५॥

‘तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियोंसे शत्रुता रखनेवाले उन राक्षसोंका युद्धमें संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाईसहित मेरा पराक्रम देखें’॥ २५॥

दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां

धर्मे धृतात्मा सह लक्ष्मणेन।

तपोधनैश्चापि सहार्यदत्त:

सुतीक्ष्णमेवाभिजगाम वीर:॥ २६॥

इस प्रकार उन तपोधनोंको वर देकर धर्ममें मन लगानेवाले तथा श्रेष्ठ दान देनेवाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्ठ: सर्ग:॥ ६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥

 

सप्तम: सर्ग:

सीता और भ्रातासहित श्रीरामका सुतीक्ष्णके आश्रमपर जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो रातमें वहीं ठहरना

रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया च परंतप:।

सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजै:॥ १॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणोंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रमकी ओर चले॥ १॥

स गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्त्वा बहूदका:।

ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम्॥ २॥

वे दूरतकका मार्ग तै करके अगाध जलसे भरी हुई बहुत-सी नदियोंको पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरिके समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था॥ २॥

ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्द्रुमै:।

काननं तौ विविशतु: सीतया सह राघवौ॥ ३॥

वहाँसे आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीताके साथ नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए एक वनमें पहुँचे॥ ३॥

प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम्।

ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम्॥ ४॥

उस घोर वनमें प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजीने एकान्त स्थानमें एक आश्रम देखा, जहाँके वृक्ष प्रचुर फल-फूलोंसे लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रोंके समुदाय उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४॥

तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम्।

राम: सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत॥ ५॥

वहाँ आन्तरिक मलकी शुद्धिके लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यानमग्न होकर बैठे थे। श्रीरामने उन तपोधन मुनिके पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा—॥ ५॥

रामोऽहमस्मि भगवन् भवन्तं द्रष्टुमागत:।

तन्माभिवद धर्मज्ञ महर्षे सत्यविक्रम॥ ६॥

‘सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे! भगवन्! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ, अत: आप मुझसे बात कीजिये’॥ ६॥

स निरीक्ष्य ततो धीरो रामं धर्मभृतां वरम्।

समाश्लिष्य च बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत्॥ ७॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीरामका दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा—॥ ७॥

स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ राम सत्यभृतां वर।

आश्रमोऽयं त्वयाऽऽक्रान्त: सनाथ इव साम्प्रतम्॥ ८॥

‘सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करनेसे यह आश्रम सनाथ हो गया॥ ८॥

प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायश:।

देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले॥ ९॥

‘महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षामें था, इसीलिये अबतक इस पृथ्वीपर अपने शरीरको त्यागकर मैं यहाँसे देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया॥ ९॥

चित्रकूटमुपादाय राज्यभ्रष्टोऽसि मे श्रुत:।

इहोपयात: काकुत्स्थ देवराज: शतक्रतु:॥ १०॥

‘मैंने सुना था कि आप राज्यसे भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वतपर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र आये थे॥ १०॥

उपागम्य च मे देवो महादेव: सुरेश्वर:।

सर्वांल्लोकाञ्जितानाह मम पुण्येन कर्मणा॥ ११॥

‘वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ‘तुमने अपने पुण्यकर्मके द्वारा समस्त शुभ लोकोंपर विजय पायी है’॥ ११॥

तेषु देवर्षिजुष्टेषु जितेषु तपसा मया।

मत्प्रसादात् सभार्यस्त्वं विहरस्व सलक्ष्मण:॥ १२॥

‘उनके कथनानुसार मैंने तपस्यासे जिन देवर्षिसेवित लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकोंमें आप सीता और लक्ष्मणके साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सारे लोक आपकी सेवामें समर्पित करता हूँ’॥

तमुग्रतपसं दीप्तं महर्षिं सत्यवादिनम्।

प्रत्युवाचात्मवान् रामो ब्रह्माणमिव वासव:॥ १३॥

जैसे इन्द्र ब्रह्माजीसे बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीरामने उन उग्र तपस्यावाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३॥

अहमेवाहरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने।

आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने॥ १४॥

‘महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वनमें अपने ठहरनेके लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ?॥ १४॥

भवान् सर्वत्र कुशल: सर्वभूतहिते रत:।

आख्यातं शरभङ्गेन गौतमेन महात्मना॥ १५॥

‘आप समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर तथा इहलोक और परलोककी सभी बातोंके ज्ञानमें निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्गने कही थी’॥ १५॥

एवमुक्तस्तु रामेण महर्षिर्लोकविश्रुत:।

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं हर्षेण महता युत:॥ १६॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन लोकविख्यात महर्षिने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा—॥ १६॥

अयमेवाश्रमो राम गुणवान् रम्यतामिति।

ऋषिसंघानुचरित: सदा मूलफलैर्युत:॥ १७॥

‘श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकारसे गुणवान् (सुविधाजनक) है, अत: आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियोंका समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल-मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं॥ १७॥

इममाश्रममागम्य मृगसंघा महीयस:।

अहत्वा प्रतिगच्छन्ति लोभयित्वाकुतोभया:॥ १८॥

‘इस आश्रमपर बड़े-बड़े मृगोंके झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गतिसे मनको लुभाकर किसीको कष्ट दिये बिना ही यहाँसे लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसीसे कोई भय नहीं प्राप्त होता है॥ १८॥

नान्यो दोषो भवेदत्र मृगेभ्योऽन्यत्र विद्धि वै।

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य महर्षेर्लक्ष्मणाग्रज:॥ १९॥

उवाच वचनं धीरो विगृह्य सशरं धनु:।

‘इस आश्रममें मृगोंके उपद्रवके सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चितरूपसे जान लें।’ महर्षिका यह वचन सुनकर लक्ष्मणके बड़े भाई धीर-वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष-बाण लेकर कहा—॥ १९/

तानहं सुमहाभाग मृगसंघान् समागतान्॥ २०॥

हन्यां निशितधारेण शरेणानतपर्वणा।

भवांस्तत्राभिषज्येत किं स्यात् कृच्छ्रतरं तत:॥ २१॥

‘महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहोंको यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धारवाले बाणसे मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्टकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है?॥ २०-२१॥

एतस्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु न समर्थये।

तमेवमुक्त्वोपरमं राम: संध्यामुपागमत्॥ २२॥

‘इसलिये मैं इस आश्रममें अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।’ मुनिसे ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करने चले गये॥ २२॥

अन्वास्य पश्चिमां संध्यां तत्र वासमकल्पयत्।

सुतीक्ष्णस्याश्रमे रम्ये सीतया लक्ष्मणेन च॥ २३॥

सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने सीता और लक्ष्मणके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके उस रमणीय आश्रममें निवास किया॥ २३॥

तत: शुभं तापसयोग्यमन्नं

स्वयं सुतीक्ष्ण: पुरुषर्षभाभ्याम्।

ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा

संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य॥ २४॥

संध्याका समय बीतनेपर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्णने स्वयं ही तपस्वी-जनोंके सेवन करने योग्य शुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओंको बड़े सत्कारके साथ अर्पित किया॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तम: सर्ग:॥ ७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥

 


अष्टम: सर्ग:

प्रात:काल सुतीक्ष्णसे विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीताका वहाँसे प्रस्थान

रामस्तु सहसौमित्रि: सुतीक्ष्णेनाभिपूजित:।

परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत॥ १॥

सुतीक्ष्णके द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रममें ही रात बिताकर प्रात:काल जाग उठे॥

उत्थाय च यथाकालं राघव: सह सीतया।

उपस्पृश्य सुशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना॥ २॥

अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ।

काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने॥ ३॥

उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषा:।

सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन्॥ ४॥

सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मणने ठीक समयसे उठकर कमलकी सुगन्धसे सुवासित परम शीतल जलके द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनोंने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओंकी प्रात:कालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनोंके आश्रयभूत वनमें उदित हुए सूर्यदेवका दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये और यह मधुर वचन बोले—॥ २—४॥

सुखोषिता: स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिता:।

आपृच्छाम: प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति न:॥ ५॥

‘भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगोंकी पूजा की है। हम आपके आश्रममें बड़े सुखसे रहे हैं। अब हम यहाँसे जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं॥ ५॥

त्वरामहे वयं द्रष्टुं कृत्स्नमाश्रममण्डलम्।

ऋषीणां पुण्यशीलानां दण्डकारण्यवासिनाम्॥ ६॥

‘हमलोग दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले पुण्यात्मा ऋषियोंके सम्पूर्ण आश्रममण्डलका दर्शन करनेके लिये उतावले हो रहे हैं॥ ६॥

अभ्यनुज्ञातुमिच्छाम: सहैभिर्मुनिपुंगवै:।

धर्मनित्यैस्तपोदान्तैर्विशिखैरिव पावकै:॥ ७॥

‘अत: हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ यहाँसे जानेके लिये हमें आज्ञा दें॥ ७॥

अविषह्यातपो यावत् सूर्यो नातिविराजते।

अमार्गेणागतां लक्ष्मीं प्राप्येवान्वयवर्जित:॥ ८॥

तावदिच्छामहे गन्तुमित्युक्त्वा चरणौ मुने:।

ववन्दे सहसौमित्रि: सीतया सह राघव:॥ ९॥

‘जैसे अन्यायसे आयी हुई सम्पत्तिको पाकर किसी नीच कुलके मनुष्यमें असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जबतक असह्य ताप देनेवाले होकर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँसे चल देना चाहते हैं।’ ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीरामने मुनिके चरणोंकी वन्दना की॥

तौ संस्पृशन्तौ चरणावुत्थाप्य मुनिपुंगव:।

गाढमाश्लिष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्॥ १०॥

अपने चरणोंका स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मणको उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्णने कसकर हृदयसे लगा लिया और बड़े स्नेहसे इस प्रकार कहा—॥ १०॥

अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह।

सीतया चानया सार्धं छाययेवानुवृत्तया॥ ११॥

‘श्रीराम! आप छायाकी भाँति अनुसरण करनेवाली इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न-बाधाओंसे रहित परम मङ्गलमय हो॥ ११॥

पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्यवासिनाम्।

एषां तपस्विनां वीर तपसा भावितात्मनाम्॥ १२॥

‘वीर! तपस्यासे शुद्ध अन्त:करणवाले दण्डकारण्य-वासी इन तपस्वी मुनियोंके रमणीय आश्रमोंका दर्शन कीजिये॥

सुप्राज्यफलमूलानि पुष्पितानि वनानि च।

प्रशस्तमृगयूथानि शान्तपक्षिगणानि च॥ १३॥

‘इस यात्रामें आप प्रचुर फल-मूलोंसे युक्त तथा फूलोंसे सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगोंके झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभावसे रहते होंगे॥ १३॥

फुल्लपङ्कजखण्डानि प्रसन्नसलिलानि च।

कारण्डवविकीर्णानि तटाकानि सरांसि च॥ १४॥

‘आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलोंके समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे॥ १४॥

द्रक्ष्यसे दृष्टिरम्याणि गिरिप्रस्रवणानि च।

रमणीयान्यरण्यानि मयूराभिरुतानि च॥ १५॥

‘नेत्रोंको रमणीय प्रतीत होनेवाले पहाड़ी झरनों और मोरोंकी मीठी बोलीसे गूँजती हुई सुरम्य वनस्थलियोंको भी आप देखेंगे॥ १५॥

गम्यतां वत्स सौमित्रे भवानपि च गच्छतु।

आगन्तव्यं च ते दृष्ट्वा पुनरेवाश्रमं प्रति॥ १६॥

‘श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्यके आश्रमोंका दर्शन करके आपलोगोंको फिर इसी आश्रममें आ जाना चाहिये’॥ १६॥

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा काकुत्स्थ: सहलक्ष्मण:।

प्रदक्षिणं मुनिं कृत्वा प्रस्थातुमुपचक्रमे॥ १७॥

उनके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुनिकी परिक्रमा की और वहाँसे प्रस्थान करनेकी तैयारी की॥ १७॥

तत: शुभतरे तूणी धनुषी चायतेक्षणा।

ददौ सीता तयोर्भ्रात्रो: खड्गौ च विमलौ तत:॥ १८॥

तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीताने उन दोनों भाइयोंके हाथमें दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये॥ १८॥

आबध्य च शुभे तूणी चापे चादाय सस्वने।

निष्क्रान्तावाश्रमाद् गन्तुमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ॥ १९॥

उन सुन्दर तूणीरोंको पीठपर बाँधकर टंकारते हुए धनुषोंको हाथमें ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रमसे बाहर निकले॥ १९॥

शीघ्रं तौ रूपसम्पन्नावनुज्ञातौ महर्षिणा।

प्रस्थितौ धृतचापासी सीतया सह राघवौ॥ २०॥

वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षिकी आज्ञा ले सीताके साथ शीघ्र ही वहाँसे प्रस्थान किया॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टम: सर्ग:॥ ८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८॥

नवम: सर्ग:

सीताका श्रीरामसे निरपराध प्राणियोंको न मारने और अहिंसा-धर्मका पालन करनेके लिये अनुरोध

सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम्।

हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत्॥ १॥

सुतीक्ष्णकी आज्ञा लेकर वनकी ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीरामसे सीताने स्नेहभरी मनोहर वाणीमें इस प्रकार कहा—॥ १॥

अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान्।

निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह॥ २॥

‘आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधिसे विचार करनेपर आप अधर्मको प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसनसे आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्मसे भी बच सकते हैं॥ २॥

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत।

मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ॥ ३॥

परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता।

मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव॥ ४॥

‘इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं—परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनन्दन! इनमेंसे मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही॥ ३-४॥

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम्।

तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन॥ ५॥

मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित्।

स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज॥ ६॥

धर्मिष्ठ: सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारक:।

त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ७॥

‘परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र! धर्मका नाश करनेवाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मनमें कभी हुई थी, न है और न भविष्यमें कभी होनेकी सम्भावना ही है। राजकुमार श्रीराम! यह दोष तो आपके मनमें भी कभी उदित नहीं हुआ है। (फिर वाणी और क्रियामें कैसे आ सकता है?) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नीमें अनुरक्त रहनेवाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं। आपमें धर्म और सत्य दोनोंकी स्थिति है। आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥ ५—७॥

तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियै:।

तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन॥ ८॥

‘महाबाहो! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्मको पूर्णरूपसे धारण कर सकते हैं। शुभदर्शी महापुरुष! आपकी जितेन्द्रियताको मैं अच्छी तरह जानती हूँ (इसीलिये मुझे विश्वास है कि आपमें पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते)॥ ८॥

तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम्।

निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम्॥ ९॥

‘परंतु दूसरोंके प्राणोंकी हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैर-विरोधके भी किया करते हैं। वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है॥ ९॥

प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम्।

ऋषीणां रक्षणार्थाय वध: संयति रक्षसाम्॥ १०॥

‘वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियोंकी रक्षाके लिये युद्धमें राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की है॥

एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम्।

प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासन:॥ ११॥

‘इसीके लिये आप भाईके साथ धनुष-बाण लेकर दण्डकारण्यके नामसे विख्यात वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं॥ ११॥

ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मन:।

त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्नि:श्रेयसं हितम्॥ १२॥

‘अत: आपको इस घोर कर्मके लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल हो उठा है। आपके प्रतिज्ञा-पालनरूप व्रतका विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो?॥ १२॥

नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति।

कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्या: श्रूयतां मम॥ १३॥

‘वीर! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्यमें जाना अच्छा नहीं लगता है। इसका क्या कारण है—यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँहसे सुनिये॥ १३॥

त्वं हि बाणधनुष्पाणिर्भ्रात्रा सह वनं गत:।

दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्या: शरव्ययम्॥ १४॥

‘आप हाथमें धनुष-बाण लेकर अपने भाईके साथ वनमें आये हैं। सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसोंको देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणोंका प्रयोग कर बैठें॥ १४॥

क्षत्रियाणामिह धनुर्हुताशस्येन्धनानि च।

समीपत: स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम्॥ १५॥

‘जैसे आगके समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बलको अत्यन्त उद्दीप्त कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियोंके पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रतापको उद्बोधित कर देता है॥ १५॥

पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचि:।

कस्म‌िंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे॥ १६॥

‘महाबाहो! पूर्वकालकी बात है, किसी पवित्र वनमें, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे रहते थे, एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे॥ १६॥

तस्यैव तपसो विघ्नं कर्तुमिन्द्र: शचीपति:।

खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक्॥ १७॥

‘उन्हींकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धाका रूप धारण करके हाथमें तलवार लिये एक दिन उनके आश्रमपर आये॥ १७॥

तस्म‌िंस्तदाश्रमपदे निहित: खड्ग उत्तम:।

स न्यासविधिना दत्त: पुण्ये तपसि तिष्ठत:॥ १८॥

‘उन्होंने मुनिके आश्रममें अपना उत्तम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्यामें लगे हुए मुनिको धरोहरके रूपमें वह खड्ग दे दिया॥ १८॥

स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्पर:।

वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मन:॥ १९॥

‘उस शस्त्रको पाकर मुनि उस धरोहरकी रक्षामें लग गये। वे अपने विश्वासकी रक्षाके लिये वनमें विचरते समय भी उसे साथ रखते थे॥ १९॥

यत्र गच्छत्युपादातुं मूलानि च फलानि च।

न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्पर:॥ २०॥

‘धरोहरकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले वे मुनि फल-मूल लानेके लिये जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्गको साथ लिये बिना नहीं जाते थे॥ २०॥

नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधन:।

चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम्॥ २१॥

‘तप ही जिनका धन था, उन मुनिने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहनेके कारण क्रमश: तपस्याका निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धिको क्रूरतापूर्ण बना लिया॥ २१॥

तत: स रौद्राभिरत: प्रमत्तोऽधर्मकर्षित:।

तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनि:॥ २२॥

‘फिर तो अधर्मने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रौद्र-कर्ममें तत्पर हो गये और उस शस्त्रके सहवाससे उन्हें नरकमें जाना पड़ा॥ २२॥

एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम्।

अग्निसंयोगवद्धेतु: शस्त्रसंयोग उच्यते॥ २३॥

‘इस प्रकार शस्त्रका संयोग होनेके कारण पूर्वकालमें उन तपस्वी मुनिको ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी। जैसे आगका संयोग ईंधनोंको जलानेका कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रोंका संयोग शस्त्रधारीके हृदयमें विकारका उत्पादक कहा गया है॥ २३॥

स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये।

न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया॥ २४॥

बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान्।

अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते॥ २५॥

‘मेरे मनमें आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटनाकी याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैरके ही दण्डकारण्यवासी राक्षसोंके वधका विचार नहीं करना चाहिये। वीरवर! बिना अपराधके ही किसीको मारना संसारके लोग अच्छा नहीं समझेंगे॥

क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम्।

धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम्॥ २६॥

‘अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले क्षत्रिय वीरोंके लिये वनमें धनुष धारण करनेका इतना ही प्रयोजन है कि वे संकटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करें॥ २६॥

क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तप: क्व च।

व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम्॥ २७॥

‘कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप—ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। अत: हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवनरूप देशमें निवास करते हैं, अत: यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है)॥ २७॥

कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात्।

पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि॥ २८॥

‘केवल शस्त्रका सेवन करनेसे मनुष्यकी बुद्धि कृपण पुरुषोंके समान कलुषित हो जाती है; अत: आप अयोध्यामें चलनेपर ही पुन: क्षात्रधर्मका अनुष्ठान कीजियेगा॥ २८॥

अक्षया तु भवेत् प्रीति: श्वश्रूश्वशुरयोर्मम।

यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनि:॥ २९॥

‘राज्य त्यागकर वनमें आ जानेपर यदि आप मुनिवृत्तिसे ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुरको अक्षय प्रसन्नता होगी॥ २९॥

धर्मादर्थ: प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।

धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥ ३०॥

‘धर्मसे अर्थ प्राप्त होता है, धर्मसे सुखका उदय होता है और धर्मसे ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसारमें धर्म ही सार है॥ ३०॥

आत्मानं नियमैस्तैस्तै: कर्षयित्वा प्रयत्नत:।

प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम्॥ ३१॥

‘चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है॥ ३१॥

नित्यं शुचिमति: सौम्य चर धर्मं तपोवने।

सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वत:॥ ३२॥

‘सौम्य! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवनमें धर्मका अनुष्ठान कीजिये। त्रिलोकीमें जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थरूपसे विदित ही है॥ ३२॥

स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे

धर्मं च वक्तुं तव क: समर्थ:।

विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन

यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण॥ ३३॥

‘मैंने नारीजातिकी स्वाभाविक चपलताके कारण ही आपकी सेवामें ये बातें निवेदन कर दी हैं। वास्तवमें आपको धर्मका उपदेश करनेमें कौन समर्थ है? आप इस विषयमें अपने छोटे भाईके साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें। फिर आपको जो ठीक जँचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे नवम: सर्ग:॥ ९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९॥

 

दशम: सर्ग:

श्रीरामका ऋषियोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंके वधके निमित्त की हुई प्रतिज्ञाके पालनपर दृढ़ रहनेका विचार प्रकट करना

वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया।

श्रुत्वा धर्मे स्थितो राम: प्रत्युवाचाथ जानकीम्॥ १॥

अपने स्वामीके प्रति भक्ति रखनेवाली विदेहकुमारी सीताकी कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने जानकीको इस प्रकार उत्तर दिया—

हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वच:।

कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे॥ २॥

‘देवि! धर्मको जाननेवाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हितकी बात कही है। क्षत्रियोंके कुलधर्मका उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है॥ २॥

किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वच:।

क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति॥ ३॥

‘देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रियलोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसीको दु:खी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दु:ख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय)॥ ३॥

ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनय: संशितव्रता:।

मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गता:॥ ४॥

‘सीते! दण्डकारण्यमें रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे मुनि बहुत दु:खी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए॥ ४॥

वसन्त: कालकालेषु वने मूलफलाशना:।

न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसै: क्रूरकर्मभि:॥ ५॥

भक्ष्यन्ते राक्षसैर्भीमैर्नरमांसोपजीविभि:।

‘भीरु! सदा ही वनमें रहकर फल-मूलका आहार करनेवाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसोंके कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्योंके मांससे जीवननिर्वाह करनेवाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं॥

ते भक्ष्यमाणा मुनयो दण्डकारण्यवासिन:॥ ६॥

अस्मानभ्यवपद्येति मामूचुर्द्विजसत्तमा:।

‘उन राक्षसोंके ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगोंके पास आकर मुझसे बोले—‘प्रभो! हमपर अनुग्रह कीजिये’॥ ६/

मया तु वचनं श्रुत्वा तेषामेवं मुखाच्च्युतम्॥ ७॥

कृत्वा वचनशुश्रूषां वाक्यमेतदुदाहृतम्।

‘उनके मुखसे निकली हुई इस प्रकार रक्षाकी पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालनरूपी सेवाका विचार मनमें लेकर मैंने उनसे यह बात कही॥ ७/

प्रसीदन्तु भवन्तो मे हृरेषा तु ममातुला॥ ८॥

यदीदृशैरहं विप्रैरुपस्थेयैरुपस्थित:।

किं करोमीति च मया व्याहृतं द्विजसंनिधौ॥ ९॥

‘महर्षियो! आप-जैसे ब्राह्मणोंकी सेवामें मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षाके लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जाकी बात है; अत: आप प्रसन्न हों। बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?’ यह बात मैंने उन ब्राह्मणोंके सामने कही॥ ८-९॥

सर्वैरेव समागम्य वागियं समुदाहृता।

राक्षसैर्दण्डकारण्ये बहुभि: कामरूपिभि:॥ १०॥

अर्दिता: स्म भृशं राम भवान् नस्तत्र रक्षतु।

‘तब उन सभीने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनोंमें प्रकट किया—‘श्रीराम! दण्डकारण्यमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत-से राक्षस रहते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अत: वहाँ उनके भयसे आप हमारी रक्षा करें॥ १०/

होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ॥ ११॥

धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसा: पिशिताशना:।

‘निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्रका समय आनेपर तथा पर्वके अवसरोंपर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं॥ ११/

राक्षसैर्धर्षितानां च तापसानां तपस्विनाम्॥ १२॥

गतिं मृगयमाणानां भवान् न: परमा गति:।

‘राक्षसोंद्वारा आक्रान्त होनेवाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अत: आप ही हमारे परम आश्रय हों॥ १२/

कामं तप:प्रभावेण शक्ता हन्तुं निशाचरान्॥ १३॥

चिरार्जितं न चेच्छामस्तप: खण्डयितुं वयम्।

बहुविघ्नं तपो नित्यं दुश्चरं चैव राघव॥ १४॥

‘रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्याके प्रभावसे इच्छानुसार इन राक्षसोंका वध करनेमें समर्थ हैं तथापि चिरकालसे उपार्जित किये हुए तपको खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तपमें सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है॥ १३-१४॥

तेन शापं न मुञ्चामो भक्ष्यमाणाश्च राक्षसै:।

तदर्द्यमानान् रक्षोभिर्दण्डकारण्यवासिभि:॥ १५॥

रक्ष नस्त्वं सह भ्रात्रा त्वन्नाथा हि वयं वने।

‘यही कारण है कि राक्षसोंके ग्रास बन जानेपर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरोंसे पीडि़त हुए हम तापसोंकी भाईसहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वनमें अब आप ही हमारे रक्षक हैं’॥ १५/

मया चैतद्वच: श्रुत्वा कार्त्स्न्येन परिपालनम्॥ १६॥

ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे।

‘जनकनन्दिनि! दण्डकारण्यमें ऋषियोंकी यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूपसे उनकी रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की है॥ १६/

संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमान: प्रतिश्रवम्॥ १७॥

मुनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा।

‘मुनियोंके सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी इस प्रतिज्ञाको मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्यका पालन मुझे सदा ही प्रिय है॥ १७/

अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्॥ १८॥

न तु प्रतिज्ञा संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषत:।

‘सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मणका भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञाको, विशेषत: ब्राह्मणोंके लिये की गयी प्रतिज्ञाको मैं कदापि नहीं तोड़ सकता॥ १८/

तदवश्यं मया कार्यमृषीणां परिपालनम्॥ १९॥

अनुक्तेनापि वैदेहि प्रतिज्ञाय कथं पुन:।

‘इसलिये ऋषियोंकी रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है। विदेहनन्दिनि! ऋषियोंके बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षासे कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ॥ १९/

मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वच:॥ २०॥

परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते।

‘सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता॥ २०/

सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने।

सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥ २१॥

‘शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुलके भी सर्वथा अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो’॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा

सीतां प्रियां मैथिलराजपुत्रीम्।

रामो धनुष्मान् सह लक्ष्मणेन

जगाम रम्याणि तपोवनानि॥ २२॥

महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीतासे ऐसा वचन कहकर हाथमें धनुष ले लक्ष्मणके साथ रमणीय तपोवनोंमें विचरण करने लगे॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे दशम: सर्ग:॥ १०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥

 


एकादश: सर्ग:

पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनिकी कथा, विभिन्न आश्रमोंमें घूमकर श्रीराम आदिका सुतीक्ष्णके आश्रममें आना, वहाँ कुछ कालतक रहकर उनकी आज्ञासे अगस्त्यके भाई तथा अगस्त्यके आश्रमपर जाना तथा अगस्त्यके प्रभावका वर्णन

अग्रत: प्रययौ राम: सीता मध्ये सुशोभना।

पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥ १॥

तदनन्तर आगे-आगे श्रीराम चले, बीचमें परम सुन्दरी सीता चल रही थीं और उनके पीछे हाथमें धनुष लिये लक्ष्मण चलने लगे॥ १॥

तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च।

नदीश्च विविधा रम्या जग्मतु: सह सीतया॥ २॥

सीताके साथ वे दोनों भाई भाँति-भाँतिके पर्वतीय शिखरों, वनों तथा नाना प्रकारकी रमणीय नदियोंको देखते हुए अग्रसर होने लगे॥ २॥

सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिण:।

सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजै: खगै:॥ ३॥

उन्होंने देखा, कहीं नदियोंके तटोंपर सारस और चक्रवाक विचर रहे हैं और कहीं खिले हुए कमलों और जलचर पक्षियोंसे युक्त सरोवर शोभा पाते हैं॥ ३॥

यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिन:।

महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिण:॥ ४॥

कहीं चितकबरे मृग यूथ बाँधे चले जा रहे थे, कहीं बड़े-बड़े सींगवाले मदमत्त भैंसे तथा बढ़े हुए दाँतवाले जंगली सूअर और वृक्षोंके वैरी दन्तार हाथी दिखायी देते थे॥ ४॥

ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।

ददृशु: सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्॥ ५॥

दूरतक यात्रा तै करनेके बाद जब सूर्य अस्ताचलको जाने लगे, तब उन तीनोंने एक साथ देखा—सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी जान पड़ती है॥ ५॥

पद्मपुष्करसम्बाधं गजयूथैरलंकृतम्।

सारसैर्हंसकादम्बै: संकुलं जलजातिभि:॥ ६॥

वह सरोवर लाल और श्वेत कमलोंसे भरा हुआ था। उसमें क्रीड़ा करते हुए झुंड-के-झुंड हाथी उसकी शोभा बढ़ाते थे। तथा सारस, राजहंस और कलहंस आदि पक्षियों एवं जलमें उत्पन्न होनेवाले मत्स्य आदि जन्तुओंसे वह व्याप्त दिखायी देता था॥ ६॥

प्रसन्नसलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे।

गीतवादित्रनिर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते॥ ७॥

स्वच्छ जलसे भरे हुए उस रमणीय सरोवरमें गाने-बजानेका शब्द सुनायी देता था, किंतु कोई दिखायी नहीं दे रहा था॥ ७॥

तत: कौतूहलाद् रामो लक्ष्मणश्च महारथ:।

मुनिं धर्मभृतं नाम प्रष्टुं समुपचक्रमे॥ ८॥

तब श्रीराम और महारथी लक्ष्मणने कौतूहलवश अपने साथ आये हुए धर्मभृत् नामक मुनिसे पूछना आरम्भ किया—॥ ८॥

इदमत्यद्भुतं श्रुत्वा सर्वेषां नो महामुने।

कौतूहलं महज्जातं किमिदं साधु कथ्यताम्॥ ९॥

‘महामुने! यह अत्यन्त अद्भुत संगीतकी ध्वनि सुनकर हम सब लोगोंको बड़ा कौतूहल हो रहा है। यह क्या है, इसे अच्छी तरह बताइये’॥ ९॥

तेनैवमुक्तो धर्मात्मा राघवेण मुनिस्तदा।

प्रभावं सरस: क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे॥ १०॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा धर्मभृत् नामक मुनिने तुरंत ही उस सरोवरके प्रभावका वर्णन आरम्भ किया—॥ १०॥

इदं पञ्चाप्सरो नाम तटाकं सार्वकालिकम्।

निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकर्णिना॥ ११॥

‘श्रीराम! यह पञ्चाप्सर नामक सरोवर है, जो सर्वदा अगाध जलसे भरा रहता है। माण्डकर्णि नामक मुनिने अपने तपके द्वारा इसका निर्माण किया था॥ ११॥

स हि तेपे तपस्तीव्रं माण्डकर्णिर्महामुनि:।

दशवर्षसहस्राणि वायुभक्षो जलाशये॥ १२॥

‘महामुनि माण्डकर्णिने एक जलाशयमें रहकर केवल वायुका आहार करते हुए दस सहस्र वर्षोंतक तीव्र तपस्या की थी॥ १२॥

तत: प्रव्यथिता: सर्वे देवा: साग्निपुरोगमा:।

अब्रुवन् वचनं सर्वे परस्परसमागता:॥ १३॥

‘उस समय अग्नि आदि सब देवता उनके तपसे अत्यन्त व्यथित हो उठे और आपसमें मिलकर वे सब-के-सब इस प्रकार कहने लगे॥ १३॥

अस्माकं कस्यचित् स्थानमेष प्रार्थयते मुनि:।

इति संविग्नमनस: सर्वे तत्र दिवौकस:॥ १४॥

‘जान पड़ता है, ये मुनि हमलोगोंमेंसे किसीके स्थानको लेना चाहते हैं, ऐसा सोचकर वे सब देवता वहाँ मन-ही-मन उद्विग्न हो उठे॥ १४॥

तत: कर्तुं तपोविघ्नं सर्वदेवैर्नियोजिता:।

प्रधानाप्सरस: पञ्च विद्युच्चलितवर्चस:॥ १५॥

‘तब उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये सम्पूर्ण देवताओंने पाँच प्रधान अप्सराओंको नियुक्त किया, जिनकी अङ्गकान्ति विद्युत्के समान चञ्चल थी॥ १५॥

अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावर: ।

नीतो मदनवश्यत्वं देवानां कार्यसिद्धये॥ १६॥

‘तदनन्तर जिन्होंने लौकिक एवं पारलौकिक धर्माधर्मका ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उन मुनिको उन पाँच अप्सराओंने देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये कामके अधीन कर दिया॥ १६॥

ताश्चैवाप्सरस: पञ्च मुने: पत्नीत्वमागता:।

तटाके निर्मितं तासां तस्मिन्नन्तर्हितं गृहम्॥ १७॥

‘मुनिकी पत्नी बनी हुई वे ही पाँच अप्सराएँ यहाँ रहती हैं। उनके रहनेके लिये इस तालाबके भीतर घर बना हुआ है, जो जलके अंदर छिपा हुआ है॥ १७॥

तत्रैवाप्सरस: पञ्च निवसन्त्यो यथासुखम्।

रमयन्ति तपोयोगान्मुनिं यौवनमास्थितम्॥ १८॥

‘उसी घरमें सुखपूर्वक रहती हुई पाँचों अप्सराएँ तपस्याके प्रभावसे युवावस्थाको प्राप्त हुए मुनिको अपनी सेवाओंसे संतुष्ट करती हैं॥ १८॥

तासां संक्रीडमानानामेष वादित्रनि:स्वन:।

श्रूयते भूषणोन्मिश्रो गीतशब्दो मनोहर:॥ १९॥

‘क्रीड़ा-विहारमें लगी हुई उन अप्सराओंके ही वाद्योंकी यह ध्वनि सुनायी देती है, जो भूषणोंकी झनकारके साथ मिली हुई है। साथ ही उनके गीतका भी मनोहर शब्द सुन पड़ता है’॥ १९॥

आश्चर्यमिति तस्यैतद् वचनं भावितात्मन:।

राघव: प्रतिजग्राह सह भ्रात्रा महायशा:॥ २०॥

अपने भाईके साथ महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने उन भावितात्मा महर्षिके इस कथनको ‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’ यों कहकर स्वीकार किया॥ २०॥

एवं कथयमान: स ददर्शाश्रममण्डलम्।

कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम्॥ २१॥

इस प्रकार कहते हुए श्रीरामचन्द्रजीको एक आश्रममण्डल दिखायी दिया, जहाँ सब ओर कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम ब्राह्मी लक्ष्मी (ब्रह्मतेज) से प्रकाशित होता था॥ २१॥

प्रविश्य सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च राघव:।

तदा तस्मिन् स काकुत्स्थ: श्रीमत्याश्रममण्डले॥ २२॥

उषित्वा स सुखं तत्र पूज्यमानो महर्षिभि:।

विदेहनन्दिनी सीता तथा लक्ष्मणके साथ उस तेजस्वी आश्रममण्डलमें प्रवेश करके ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने उस समय सुखपूर्वक निवास किया। वहाँके महर्षियोंने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया॥ २२/

जगाम चाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम्॥ २३॥

येषामुषितवान् पूर्वं सकाशे स महास्त्रवित्।

तदनन्तर महान् अस्त्रोंके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजी बारी-बारीसे उन सभी तपस्वी मुनियोंके आश्रमोंपर गये, जिनके यहाँ वे पहले रह चुके थे। उनके पास भी (उनकी भक्ति देख) दुबारा जाकर रहे॥ २३/

क्वचित् परिदशान् मासानेकसंवत्सरं क्वचित्॥ २४॥

क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्च षट् च परान् क्वचित्।

अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमधिकं क्वचित्॥ २५॥

त्रीन् मासानष्टमासांश्च राघवो न्यवसत् सुखम्।

कहीं दस महीने, कहीं साल भर, कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छ: महीने, कहीं इससे भी अधिक समय (अर्थात् सात महीने), कहीं उससे भी अधिक (आठ महीने), कहीं आधे मास अधिक अर्थात् साढ़े आठ महीने, कहीं तीन महीने और कहीं आठ और तीन अर्थात् ग्यारह महीनेतक श्रीरामचन्द्रजीने सुखपूर्वक निवास किया॥ २४-२५/

तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु वै॥ २६॥

रमतश्चानुकूल्येन ययु: संवत्सरा दश।

इस प्रकार मुनियोंके आश्रमोंपर रहते और अनुकूलता पाकर आनन्दका अनुभव करते हुए उनके दस वर्ष बीत गये॥ २६/

परिसृत्य च धर्मज्ञो राघव: सह सीतया॥ २७॥

सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं पुनरेवाजगाम ह।

इस प्रकार सब ओर घूम-फिरकर धर्मके ज्ञाता भगवान् श्रीराम सीताके साथ फिर सुतीक्ष्णके आश्रमपर ही लौट आये॥ २७/

स तमाश्रममागम्य मुनिभि: परिपूजित:॥ २८॥

तत्रापि न्यवसद् राम: किंचित् कालमरिंदम:।

शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीराम उस आश्रममें आकर वहाँ रहनेवाले मुनियोंद्वारा भलीभाँति सम्मानित हो वहाँ भी कुछ कालतक रहे॥ २८/

अथाश्रमस्थो विनयात् कदाचित् तं महामुनिम्॥ २९॥

उपासीन: स काकुत्स्थ: सुतीक्ष्णमिदमब्रवीत्।

उस आश्रममें रहते हुए श्रीरामने एक दिन महामुनि सुतीक्ष्णके पास बैठकर विनीतभावसे कहा—॥ २९/

अस्मिन्नरण्ये भगवन्नगस्त्यो मुनिसत्तम:॥ ३०॥

वसतीति मया नित्यं कथा: कथयतां श्रुतम्।

न तु जानामि तं देशं वनस्यास्य महत्तया॥ ३१॥

‘भगवन्! मैंने प्रतिदिन बातचीत करनेवाले लोगोंके मुँहसे सुना है कि इस वनमें कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी निवास करते हैं; किंतु इस वनकी विशालताके कारण मैं उस स्थानको नहीं जानता हूँ॥ ३०-३१॥

कुत्राश्रमपदं रम्यं महर्षेस्तस्य धीमत:।

प्रसादार्थं भगवत: सानुज: सह सीतया॥ ३२॥

अगस्त्यमधिगच्छेयमभिवादयितुं मुनिम्।

मनोरथो महानेष हृदि सम्परिवर्तते॥ ३३॥

‘उन बुद्धिमान् महर्षिका सुन्दर आश्रम कहाँ है? मैं लक्ष्मण और सीताके साथ भगवान् अगस्त्यको प्रसन्न करनेके लिये उन मुनीश्वरको प्रणाम करनेके उद्देश्यसे उनके आश्रमपर जाऊँ—यह महान् मनोरथ मेरे हृदयमें चक्कर लगा रहा है॥ ३२-३३॥

यदहं तं मुनिवरं शुश्रूषेयमपि स्वयम्।

इति रामस्य स मुनि: श्रुत्वा धर्मात्मनो वच:॥ ३४॥

सुतीक्ष्ण: प्रत्युवाचेदं प्रीतो दशरथात्मजम्।

‘मैं चाहता हूँ कि स्वयं भी मुनिवर अगस्त्यकी सेवा करूँ।’ धर्मात्मा श्रीरामका यह वचन सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दशरथनन्दनसे इस प्रकार बोले—॥ ३४/

अहमप्येतदेव त्वां वक्तुकाम: सलक्ष्मणम्॥ ३५॥

अगस्त्यमभिगच्छेति सीतया सह राघव।

दिष्ट्या त्विदानीमर्थेऽस्मिन् स्वयमेव ब्रवीषि माम्॥ ३६॥

‘रघुनन्दन! मैं भी लक्ष्मणसहित आपसे यही कहना चाहता था कि आप सीताके साथ महर्षि अगस्त्यके पास जायँ। सौभाग्यकी बात है कि इस समय आप स्वयं ही मुझसे वहाँ जानेके विषयमें पूछ रहे हैं॥ ३५-३६॥

अयमाख्यामि ते राम यत्रागस्त्यो महामुनि:।

योजनान्याश्रमात् तात याहि चत्वारि वै तत:।

दक्षिणेन महान् श्रीमानगस्त्यभ्रातुराश्रम:॥ ३७॥

‘श्रीराम! महामुनि अगस्त्य जहाँ रहते हैं, उस आश्रमका पता मैं अभी आपको बताये देता हूँ। तात! इस आश्रमसे चार योजन दक्षिण चले जाइये। वहाँ आपको अगस्त्यके भाईका बहुत बड़ा एवं सुन्दर आश्रम मिलेगा॥ ३७॥

स्थलीप्रायवनोद्देशे पिप्पलीवनशोभिते।

बहुपुष्पफले रम्ये नानाविहगनादिते॥ ३८॥

पद्मिन्यो विविधास्तत्र प्रसन्नसलिलाशया:।

हंसकारण्डवाकीर्णाश्चक्रवाकोपशोभिता: ॥ ३९॥

‘वहाँके वनकी भूमि प्राय: समतल है तथा पिप्पलीका वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ाता है। वहाँ फूलों और फलोंकी बहुतायत है। नाना प्रकारके पक्षियोंके कलरवोंसे गूँजते हुए उस रमणीय आश्रमके पास भाँति-भाँतिके कमलमण्डित सरोवर हैं, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उनमें सब ओर फैले हुए हैं तथा चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ३८-३९॥

तत्रैकां रजनीं व्युष्य प्रभाते राम गम्यताम्।

दक्षिणां दिशमास्थाय वनखण्डस्य पार्श्वत:॥ ४०॥

तत्रागस्त्याश्रमपदं गत्वा योजनमन्तरम्।

रमणीये वनोद्देशे बहुपादपशोभिते॥ ४१॥

‘श्रीराम! आप एक रात उस आश्रममें ठहरकर प्रात:काल उस वनखण्डके किनारे दक्षिण दिशाकी ओर जायँ। इस प्रकार एक योजन आगे जानेपर अनेकानेक वृक्षोंसे सुशोभित वनके रमणीय भागमें अगस्त्य मुनिका आश्रम मिलेगा॥ ४०-४१॥

रंस्यते तत्र वैदेही लक्ष्मणश्च त्वया सह।

स हि रम्यो वनोद्देशो बहुपादपसंयुत:॥ ४२॥

‘वहाँ विदेहनन्दिनी सीता और लक्ष्मण आपके साथ सानन्द विचरण करेंगे: क्योंकि बहुसंख्यक वृक्षोंसे सुशोभित वह वनप्रान्त बड़ा ही रमणीय है॥ ४२॥

यदि बुद्धि: कृता द्रष्टुमगस्त्यं तं महामुनिम्।

अद्यैव गमने बुद्धिं रोचयस्व महामते॥ ४३॥

‘महामते! यदि आपने महामुनि अगस्त्यके दर्शनका निश्चित विचार कर लिया है तो आज ही वहाँकी यात्रा करनेका भी निश्चय करें’॥ ४३॥

इति रामो मुने: श्रुत्वा सह भ्रात्राभिवाद्य च।

प्रतस्थेऽगस्त्यमुद्दिश्य सानुग: सह सीतया॥ ४४॥

मुनिका यह वचन सुनकर भाईसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम किया और सीता तथा लक्ष्मणके साथ अगस्त्यजीके आश्रमकी ओर चल दिये॥ ४४॥

पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान्।

सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान्॥ ४५॥

मार्गमें मिले हुए विचित्र-विचित्र वनों, मेघमालाके समान पर्वतमालाओं, सरोवरों और सरिताओंको देखते हुए वे आगे बढ़ते गये॥ ४५॥

सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम्।

इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥ ४६॥

इस प्रकार सुतीक्ष्णके बताये हुए मार्गसे सुखपूर्वक चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त हर्षमें भरकर लक्ष्मणसे यह बात कही—॥ ४६॥

एतदेवाश्रमपदं नूनं तस्य महात्मन:।

अगस्त्यस्य मुनेर्भ्रातुर्दृश्यते पुण्यकर्मण:॥ ४७॥

‘सुमित्रानन्दन! निश्चय ही यह पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले महात्मा अगस्त्यमुनिके भाईका आश्रम दिखायी दे रहा है॥ ४७॥

यथा हीमे वनस्यास्य ज्ञाता: पथि सहस्रश:।

संनता: फलभारेण पुष्पभारेण च द्रुमा:॥ ४८॥

‘क्योंकि सुतीक्ष्णजीने जैसा बतलाया था, उसके अनुसार इस वनके मार्गमें फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए सहस्रों परिचित वृक्ष शोभा पा रहे हैं॥ ४८॥

पिप्पलीनां च पक्वानां वनादस्मादुपागत:।

गन्धोऽयं पवनोत्क्षिप्त: सहसा कटुकोदय:॥ ४९॥

‘इस वनमें पकी हुई पीपलियोंकी यह गन्ध वायुसे प्रेरित होकर सहसा इधर आयी है, जिससे कटु रसका उदय हो रहा है॥ ४९॥

तत्र तत्र च दृश्यन्ते संक्षिप्ता: काष्ठसंचया:।

लूनाश्च परिदृश्यन्ते दर्भा वैदूर्यवर्चस:॥ ५०॥

‘जहाँ-तहाँ लकडि़योंके ढेर लगे दिखायी देते हैं और वैदूर्यमणिके समान रंगवाले कुश कटे हुए दृष्टिगोचर होते हैं॥ ५०॥

एतच्च वनमध्यस्थं कृष्णाभ्रशिखरोपमम्।

पावकस्याश्रमस्थस्य धूमाग्रं सम्प्रदृश्यते॥ ५१॥

‘यह देखो, जंगलके बीचमें आश्रमकी अग्निका धुआँ उठता दिखायी दे रहा है, जिसका अग्रभाग काले मेघोंके ऊपरी भाग-सा प्रतीत होता है॥ ५१॥

विविक्तेषु च तीर्थेषु कृतस्नाना द्विजातय:।

पुष्पोपहारं कुर्वन्ति कुसुमै: स्वयमर्जितै:॥ ५२॥

‘यहाँके एकान्त एवं पवित्र तीर्थोंमें स्नान करके आये हुए ब्राह्मण स्वयं चुनकर लाये हुए फूलोंसे देवताओंके लिये पुष्पोपहार अर्पित करते हैं॥ ५२॥

तत: सुतीक्ष्णवचनं यथा सौम्य मया श्रुतम्।

अगस्त्यस्याश्रमो भ्रातुर्नूनमेष भविष्यति॥ ५३॥

‘सौम्य! मैंने सुतीक्ष्णजीका कथन जैसा सुना था, उसके अनुसार यह निश्चय ही अगस्त्यजीके भाईका आश्रम होगा॥ ५३॥

निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।

यस्य भ्रात्रा कृतेयं दिक्शरण्या पुण्यकर्मणा॥ ५४॥

‘इन्हींके भाई पुण्यकर्मा अगस्त्यजीने समस्त लोकोंके हितकी कामनासे मृत्युस्वरूप वातापि और इल्वलका वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशाको शरण लेनेके योग्य बना दिया॥ ५४॥

इहैकदा किल क्रूरो वातापिरपि चेल्वल:।

भ्रातरौ सहितावास्तां ब्राह्मणघ्नौ महासुरौ॥ ५५॥

‘एक समयकी बात है, यहाँ क्रूर स्वभाववाला वातापि और इल्वल—ये दोनों भाई एक साथ रहते थे। ये दोनों महान् असुर ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले थे॥

धारयन् ब्राह्मणं रूपमिल्वल: संस्कृतं वदन्।

आमन्त्रयति विप्रान् स श्राद्धमुद्दिश्य निर्घृण:॥ ५६॥

भ्रातरं संस्कृतं कृत्वा ततस्तं मेषरूपिणम्।

तान् द्विजान् भोजयामास श्राद्धदृष्टेन कर्मणा॥ ५७॥

‘निर्दयी इल्वल ब्राह्मणका रूप धारण करके संस्कृत बोलता हुआ जाता और श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे आता था। फिर मेष (जीवशाक) का रूप धारण करनेवाले अपने भाई वातापिका संस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त विधिसे ब्राह्मणोंको खिला देता था॥ ५६-५७॥

ततो भुक्तवतां तेषां विप्राणामिल्वलोऽब्रवीत्।

वातापे निष्क्रमस्वेति स्वरेण महता वदन्॥ ५८॥

‘वे ब्राह्मण जब भोजन कर लेते, तब इल्वल उच्च स्वरसे बोलता—‘वातापे! निकलो’॥ ५८॥

ततो भ्रातुर्वच: श्रुत्वा वातापिर्मेषवन्नदन्।

भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि ब्राह्मणानां विनिष्पतत्॥ ५९॥

‘भाईकी बात सुनकर वातापि भेड़ेके समान ‘में-में’ करता हुआ उन ब्राह्मणोंके पेट फाड़-फाड़कर निकल आता था॥ ५९॥

ब्राह्मणानां सहस्राणि तैरेवं कामरूपिभि:।

विनाशितानि संहत्य नित्यश: पिशिताशनै:॥ ६०॥

‘इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन मांसभक्षी असुरोंने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणोंका विनाश कर डाला॥ ६०॥

अगस्त्येन तदा देवै: प्रार्थितेन महर्षिणा।

अनुभूय किल श्राद्धे भक्षित: स महासुर:॥ ६१॥

‘उस समय देवताओंकी प्रार्थनासे महर्षि अगस्त्यने श्राद्धमें शाकरूपधारी उस महान् असुरको जान-बूझकर भक्षण किया॥ ६१॥

तत: सम्पन्नमित्युक्त्वा दत्त्वा हस्तेऽवनेजनम्।

भ्रातरं निष्क्रमस्वेति चेल्वल: समभाषत॥ ६२॥

‘तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया। ऐसा कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें अवनेजनका जल दे इल्वलने भाईको सम्बोधित करके कहा, ‘निकलो’॥ ६२॥

स तदा भाषमाणं तु भ्रातरं विप्रघातिनम्।

अब्रवीत् प्रहसन् धीमानगस्त्यो मुनिसत्तम:॥ ६३॥

‘इस प्रकार भाईको पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुरसे बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने हँसकर कहा—

कुतो निष्क्रमितुं शक्तिर्मया जीर्णस्य रक्षस:।

भ्रातुस्तु मेषरूपस्य गतस्य यमसादनम्॥ ६४॥

‘जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भाई राक्षसको मैंने खाकर पचा लिया, वह तो यमलोकमें जा पहुँचा है। अब उसमें निकलनेकी शक्ति कहाँ है’॥ ६४॥

अथ तस्य वच: श्रुत्वा भ्रातुर्निधनसंश्रितम्।

प्रधर्षयितुमारेभे मुनिं क्रोधान्निशाचर:॥ ६५॥

‘भाईकी मृत्युको सूचित करनेवाले मुनिके इस वचनको सुनकर उस निशाचरने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालनेका उद्योग आरम्भ किया॥ ६५॥

सोऽभ्यद्रवद् द्विजेन्द्रं तं मुनिना दीप्ततेजसा।

चक्षुषानलकल्पेन निर्दग्धो निधनं गत:॥ ६६॥

‘उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्यपर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेजवाले उन मुनिने अपनी अग्नितुल्य दृष्टिसे उस राक्षसको दग्ध कर डाला। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी॥ ६६॥

तस्यायमाश्रमो भ्रातुस्तटाकवनशोभित:।

विप्रानुकम्पया येन कर्मेदं दुष्करं कृतम्॥ ६७॥

‘ब्राह्मणोंपर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्यके भाईका यह आश्रम है, जो सरोवर और वनसे सुशोभित हो रहा है’॥ ६७॥

एवं कथयमानस्य तस्य सौमित्रिणा सह।

रामस्यास्तं गत: सूर्य: संध्याकालोऽभ्यवर्तत॥ ६८॥

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे। इतनेमें ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्याका समय हो गया॥ ६८॥

उपास्य पश्चिमां संध्यां सह भ्रात्रा यथाविधि।

प्रविवेशाश्रमपदं तमृषिं चाभ्यवादयत्॥ ६९॥

तब भाईके साथ विधिपूर्वक सायं संध्योपासना करके श्रीरामने आश्रममें प्रवेश किया और उन महर्षिके चरणोंमें मस्तक झुकाया॥ ६९॥

सम्यक्प्रतिगृहीतस्तु मुनिना तेन राघव:।

न्यवसत् तां निशामेकां प्राश्य मूलफलानि च॥ ७०॥

मुनिने उनका यथावत् आदर-सत्कार किया। सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम वहाँ फल-मूल खाकर एक रात उस आश्रममें रहे॥ ७०॥

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते रविमण्डले।

भ्रातरं तमगस्त्यस्य आमन्त्रयत राघव:॥ ७१॥

वह रात बीतनेपर जब सूर्योदय हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यके भाईसे विदा माँगते हुए कहा—॥ ७१॥

अभिवादये त्वां भगवन् सुखमस्म्युषितो निशाम्।

आमन्त्रये त्वां गच्छामि गुरुं ते द्रष्टुमग्रजम्॥ ७२॥

‘भगवन्! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। यहाँ रातभर बड़े सुखसे रहा हूँ। अब आपके बड़े भाई मुनिवर अगस्त्यका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। इसके लिये आपसे आज्ञा चाहता हूँ’॥ ७२॥

गम्यतामिति तेनोक्तो जगाम रघुनन्दन:।

यथोद्दिष्टेन मार्गेण वनं तच्चावलोकयन्॥ ७३॥

तब महर्षिने कहा, ‘बहुत अच्छा, जाइये।’ इस प्रकार महर्षिसे आज्ञा पाकर भगवान् श्रीराम सुतीक्ष्णके बताये हुए मार्गसे वनकी शोभा देखते हुए आगे चले॥ ७३॥

नीवारान् पनसान् सालान् वञ्जुलांस्तिनिशांस्तथा।

चिरिबिल्वान् मधूकांश्च बिल्वानथ च तिन्दुकान्॥ ७४॥

पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिर्लताभिरुपशोभितान्।

ददर्श राम: शतशस्तत्र कान्तारपादपान्॥ ७५॥

हस्तिहस्तैर्विमृदितान् वानरैरुपशोभितान्।

मत्तै: शकुनिसङ्घैश्च शतश: प्रतिनादितान्॥ ७६॥

श्रीरामने वहाँ मार्गमें नीवार (जलकदम्ब), कटहल, साखू, अशोक, तिनिश, चिरिबिल्व, महुआ, बेल, तेंदू तथा और भी सैकड़ों जंगली वृक्ष देखे, जो फूलोंसे भरे थे तथा खिली हुई लताओंसे परिवेष्टित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उनमेंसे कई वृक्षोंको हाथियोंने अपनी सूड़ोंसे तोड़कर मसल डाला था और बहुत-से वृक्षोंपर बैठे हुए वानर उनकी शोभा बढ़ाते थे। सैकड़ों मतवाले पक्षी उनकी डालियोंपर चहक रहे थे॥ ७४—७६॥

ततोऽब्रवीत् समीपस्थं रामो राजीवलोचन:।

पृष्ठतोऽनुगतं वीरं लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ ७७॥

उस समय कमलनयन श्रीराम अपने पीछे-पीछे आते हुए शोभावर्धक वीर लक्ष्मणसे, जो उनके निकट ही थे, इस प्रकार बोले—॥ ७७॥

स्निग्धपत्रा यथा वृक्षा यथा क्षान्ता मृगद्विजा:।

आश्रमो नातिदूरस्थो महर्षेर्भावितात्मन:॥ ७८॥

‘यहाँके वृक्षोंके पत्ते जैसे सुने गये थे, वैसे ही चिकने दिखायी देते हैं तथा पशु और पक्षी क्षमाशील एवं शान्त हैं। इससे जान पड़ता है, उन भावितात्मा (शुद्ध अन्त:करणवाले) महर्षि अगस्त्यका आश्रम यहाँसे अधिक दूर नहीं है॥ ७८॥

अगस्त्य इति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।

आश्रमो दृश्यते तस्य परिश्रान्तश्रमापह:॥ ७९॥

‘जो अपने कर्मसे ही संसारमें अगस्त्य102 के नामसे विख्यात हुए हैं, उन्हींका यह आश्रम दिखायी देता है, जो थके-माँदे पथिकोंकी थकावटको दूर करनेवाला है॥

प्राज्यधूमाकुलवनश्चीरमालापरिष्कृत: ।

प्रशान्तमृगयूथश्च नानाशकुनिनादित:॥ ८०॥

‘इस आश्रमके वन यज्ञ-यागसम्बन्धी अधिक धूमोंसे व्याप्त हैं। चीरवस्त्रोंकी पंक्तियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँके मृगोंके झुंड सदा शान्त रहते हैं तथा इस आश्रममें नाना प्रकारके पक्षियोंके कलरव गूँजते रहते हैं॥ ८०॥

निगृह्य तरसा मृत्युं लोकानां हितकाम्यया।

दक्षिणा दिक् कृता येन शरण्या पुण्यकर्मणा॥ ८१॥

तस्येदमाश्रमपदं प्रभावाद् यस्य राक्षसै:।

दिगियं दक्षिणा त्रासाद् दृश्यते नोपभुज्यते॥ ८२॥

‘जिन पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्यने समस्त लोकोंकी हितकामनासे मृत्युस्वरूप राक्षसोंका वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशाको शरण लेनेके योग्य बना दिया तथा जिनके प्रभावसे राक्षस इस दक्षिण दिशाको केवल दूरसे भयभीत होकर देखते हैं, इसका उपभोग भी नहीं करते, उन्हींका यह आश्रम है॥ ८१-८२॥

यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा।

तदाप्रभृति निर्वैरा: प्रशान्ता रजनीचरा:॥ ८३॥

‘पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्यने जबसे इस दिशामें पदार्पण किया है, तबसे यहाँके निशाचर वैररहित और शान्त हो गये हैं॥ ८३॥

नाम्ना चेयं भगवतो दक्षिणा दिक्प्रदक्षिणा।

प्रथिता त्रिषु लोकेषु दुर्धर्षा क्रूरकर्मभि:॥ ८४॥

‘भगवान् अगस्त्यकी महिमासे इस आश्रमके आस-पास निर्वैरता आदि गुणोंके सम्पादनमें समर्थ तथा क्रूरकर्मा राक्षसोंके लिये दुर्जय होनेके कारण यह सम्पूर्ण दिशा नामसे भी तीनों लोकोंमें ‘दक्षिणा’ ही कहलायी, इसी नामसे विख्यात हुई तथा इसे ‘अगस्त्यकी दिशा’ भी कहते हैं॥ ८४॥

मार्गं निरोद्धुं सततं भास्करस्याचलोत्तम:।

संदेशं पालयंस्तस्य विन्ध्यशैलो न वर्धते॥ ८५॥

‘एक बार पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये बढ़ा था, किंतु महर्षि अगस्त्यके कहनेसे वह नम्र हो गया। तबसे आजतक निरन्तर उनके आदेशका पालन करता हुआ वह कभी नहीं बढ़ता॥ ८५॥

अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मण:।

अगस्त्यस्याश्रम: श्रीमान् विनीतमृगसेवित:॥ ८६॥

‘वे दीर्घायु महात्मा हैं। उनका कर्म (समुद्रशोषण आदि कार्य) तीनों लोकोंमें विख्यात है। उन्हीं अगस्त्यका यह शोभासम्पन्न आश्रम है, जो विनीत मृगोंसे सेवित है॥

एष लोकार्चित: साधुर्हिते नित्यं रत: सताम्।

अस्मानधिगतानेष श्रेयसा योजयिष्यति॥ ८७॥

‘ये महात्मा अगस्त्यजी सम्पूर्ण लोकोंके द्वारा पूजित तथा सदा सज्जनोंके हितमें लगे रहनेवाले हैं। अपने पास आये हुए हमलोगोंको वे अपने आशीर्वादसे कल्याणके भागी बनायँगे॥ ८७॥

आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यं तं महामुनिम्।

शेषं च वनवासस्य सौम्य वत्स्याम्यहं प्रभो॥ ८८॥

‘सेवा करनेमें समर्थ सौम्य लक्ष्मण! यहाँ रहकर मैं उन महामुनि अगस्त्यकी आराधना करूँगा और वनवासके शेष दिन यहीं रहकर बिताऊँगा॥ ८८॥

अत्र देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:।

अगस्त्यं नियताहारा: सततं पर्युपासते॥ ८९॥

‘देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि यहाँ नियमित आहार करते हुए सदा अगस्त्य मुनिकी उपासना करते हैं॥ ८९॥

नात्र जीवेन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठ:।

नृशंस: पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविध:॥ ९०॥

‘ये ऐसे प्रभावशाली मुनि हैं कि इनके आश्रममें कोई झूठ बोलनेवाला, क्रूर, शठ, नृशंस अथवा पापाचारी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता॥ ९०॥

अत्र देवाश्च यक्षाश्च नागाश्च पतगै: सह।

वसन्ति नियताहारा धर्ममाराधयिष्णव:॥ ९१॥

‘यहाँ धर्मकी आराधना करनेके लिये देवता, यक्ष, नाग और पक्षी नियमित आहार करते हुए निवास करते हैं॥ ९१॥

अत्र सिद्धा महात्मानो विमानै: सूर्यसंनिभै:।

त्यक्त्वा देहान् नवैर्देहै: स्वर्याता: परमर्षय:॥ ९२॥

‘इस आश्रमपर अपने शरीरोंको त्यागकर अनेकानेक सिद्ध, महात्मा, महर्षि नूतन शरीरोंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं॥ ९२॥

यक्षत्वममरत्वं च राज्यानि विविधानि च।

अत्र देवा: प्रयच्छन्ति भूतैराराधिता: शुभै:॥ ९३॥

‘यहाँ सत्कर्मपरायण प्राणियोंद्वारा आराधित हुए देवता उन्हें यक्षत्व, अमरत्व तथा नाना प्रकारके राज्य प्रदान करते हैं॥ ९३॥

आगता: स्माश्रमपदं सौमित्रे प्रविशाग्रत:।

निवेदयेह मां प्राप्तमृषये सह सीतया॥ ९४॥

‘सुमित्रानन्दन! अब हमलोग आश्रमपर आ पहुँचे। तुम पहले प्रवेश करो और महर्षियोंको सीताके साथ मेरे आगमनकी सूचना दो’॥ ९४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकादश: सर्ग:॥ ११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥

 


द्वादश: सर्ग:

श्रीराम आदिका अगस्त्यके आश्रममें प्रवेश, अतिथि-सत्कार तथामुनिकी ओरसे उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंकी प्राप्ति

स प्रविश्याश्रमपदं लक्ष्मणो राघवानुज:।

अगस्त्यशिष्यमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मणने आश्रममें प्रवेश करके अगस्त्यजीके शिष्यसे भेंट की और उनसे यह बात कही—॥ १॥

राजा दशरथो नाम ज्येष्ठस्तस्य सुतो बली।

राम: प्राप्तो मुनिं द्रष्टुं भार्यया सह सीतया॥ २॥

‘मुने! अयोध्यामें जो दशरथ नामसे प्रसिद्ध राजा थे, उन्हींके ज्येष्ठ पुत्र महाबली श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीताके साथ महर्षिका दर्शन करनेके लिये आये हैं॥

लक्ष्मणो नाम तस्याहं भ्राता त्ववरजो हित:।

अनुकूलश्च भक्तश्च यदि ते श्रोत्रमागत:॥ ३॥

‘मैं उनका छोटा भाई, हितैषी और अनुकूल चलनेवाला भक्त हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। सम्भव है यह नाम कभी आपके कानोंमें पड़ा हो॥ ३॥

ते वयं वनमत्युग्रं प्रविष्टा: पितृशासनात्।

द्रष्टुमिच्छामहे सर्वे भगवन्तं निवेद्यताम्॥ ४॥

‘हम सब लोग पिताकी आज्ञासे इस अत्यन्त भयंकर वनमें आये हैं और भगवान् अगस्त्य मुनिका दर्शन करना चाहते हैं। आप उनसे यह समाचार निवेदन कीजिये’॥ ४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य तपोधन:।

तथेत्युक्त्वाग्निशरणं प्रविवेश निवेदितुम्॥ ५॥

लक्ष्मणकी वह बात सुनकर उन तपोधनने ‘बहुत अच्छा’ कहकर महर्षिको समाचार देनेके लिये अग्निशालामें प्रवेश किया॥ ५॥

स प्रविश्य मुनिश्रेष्ठं तपसा दुष्प्रधर्षणम्।

कृताञ्जलिरुवाचेदं रामागमनमञ्जसा॥ ६॥

यथोक्तं लक्ष्मणेनैव शिष्योऽगस्त्यस्य सम्मत:।

अग्निशालामें प्रवेश करके अगस्त्यके उस प्रिय शिष्यने जो अपनी तपस्याके प्रभावसे दूसरोंके लिये दुर्जय थे, उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके पास जा हाथ जोड़ लक्ष्मणके कथनानुसार उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका समाचार शीघ्रतापूर्वक यों सुनाया—॥ ६/

पुत्रौ दशरथस्येमौ रामो लक्ष्मण एव च॥ ७॥

प्रविष्टावाश्रमपदं सीतया सह भार्यया।

द्रष्टुं भवन्तमायातौ शुश्रूषार्थमरिंदमौ॥ ८॥

यदत्रानन्तरं तत् त्वमाज्ञापयितुमर्हसि।

‘महामुने! राजा दशरथके ये दो पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण आश्रममें पधारे हैं। श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ हैं। वे दोनों शत्रुदमन वीर आपकी सेवाके उद्देश्यसे आपका दर्शन करनेके लिये आये हैं। अब इस विषयमें जो कुछ कहना या करना हो, इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें’॥ ७-८/

तत: शिष्यादुपश्रुत्य प्राप्तं रामं सलक्ष्मणम्॥ ९॥

वैदेहीं च महाभागामिदं वचनमब्रवीत्।

शिष्यसे लक्ष्मणसहित श्रीराम और महाभागा विदेहनन्दिनी सीताके शुभागमनका समाचार सुनकर महर्षिने इस प्रकार कहा—॥ ९/

दिष्ट्या रामश्चिरस्याद्य द्रष्टुं मां समुपागत:॥ १०॥

मनसा कांक्षितं ह्यस्य मयाप्यागमनं प्रति।

गम्यतां सत्कृतो राम: सभार्य: सहलक्ष्मण:॥ ११॥

प्रवेश्यतां समीपं मे किमसौ न प्रवेशित:।

‘सौभाग्यकी बात है कि आज चिरकालके बाद श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही मुझसे मिलनेके लिये आ गये। मेरे मनमें भी बहुत दिनोंसे यह अभिलाषा थी कि वे एक बार मेरे आश्रमपर पधारते। जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मणको सत्कारपूर्वक आश्रमके भीतर मेरे समीप ले आओ। तुम अबतक उन्हें ले क्यों नहीं आये?’॥

एवमुक्तस्तु मुनिना धर्मज्ञेन महात्मना॥ १२॥

अभिवाद्याब्रवीच्छिष्यस्तथेति नियताञ्जलि:।

धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनिके ऐसा कहनेपर शिष्यने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ’॥ १२/

तदा निष्क्रम्य सम्भ्रान्त: शिष्यो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १३॥

कोऽसौ रामो मुनिं द्रष्टुमेतु प्रविशतु स्वयम्।

इसके बाद वह शिष्य आश्रमसे निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मणके पास गया और बोला—‘श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं? वे स्वयं आश्रममें प्रवेश करें और मुनिका दर्शन करनेके लिये चलें’॥ १३/

ततो गत्वाऽऽश्रमपदं शिष्येण सह लक्ष्मण:॥ १४॥

दर्शयामास काकुत्स्थं सीतां च जनकात्मजाम्।

तब लक्ष्मणने शिष्यके साथ आश्रमके द्वारपर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीताका दर्शन कराया॥ १४/

तं शिष्य: प्रश्रितं वाक्यमगस्त्यवचनं ब्रुवन्॥ १५॥

प्रावेशयद् यथान्यायं सत्कारार्हं सुसत्कृतम्।

शिष्यने बड़ी विनयके साथ महर्षि अगस्त्यकी कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कारके योग्य थे, उन श्रीरामका यथोचित रीतिसे भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रममें ले गया॥ १५/

प्रविवेश ततो राम: सीतया सह लक्ष्मण:॥ १६॥

प्रशान्तहरिणाकीर्णमाश्रमं ह्यवलोकयन्।

स तत्र ब्रह्मण: स्थानमग्ने: स्थानं तथैव च॥ १७॥

उस समय श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ आश्रममें प्रवेश किया। वह आश्रम शान्तभावसे रहनेवाले हरिणोंसे भरा हुआ था। आश्रमकी शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजीका स्थान और अग्निदेवका स्थान देखा॥ १६-१७॥

विष्णो: स्थानं महेन्द्रस्य स्थानं चैव विवस्वत:।

सोमस्थानं भगस्थानं स्थानं कौबेरमेव च॥ १८॥

धातुर्विधातु: स्थानं च वायो: स्थानं तथैव च।

स्थानं च पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मन:॥ १९॥

स्थानं तथैव गायत्र्या वसूनां स्थानमेव च।

स्थानं च नागराजस्य गरुडस्थानमेव च॥ २०॥

कार्तिकेयस्य च स्थानं धर्मस्थानं च पश्यति।

फिर क्रमश: भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड़, कार्तिकेय तथा धर्मराजके पृथक्-पृथक् स्थानका निरीक्षण किया॥ १८—२०/

तत: शिष्यै: परिवृतो मुनिरप्यभिनिष्पतत्॥ २१॥

तं ददर्शाग्रतो रामो मुनीनां दीप्ततेजसाम्।

अब्रवीद् वचनं वीरो लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ २२॥

इतनेहीमें मुनिवर अगस्त्य भी शिष्योंसे घिरे हुए अग्निशालासे बाहर निकले। वीर श्रीरामने मुनियोंके आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजीका दर्शन किया और अपनी शोभाका विस्तार करनेवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ २१-२२॥

बहिर्लक्ष्मण निष्क्रामत्यगस्त्यो भगवानृषि:।

औदार्येणावगच्छामि निधानं तपसामिमम्॥ २३॥

‘लक्ष्मण! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रमसे बाहर निकल रहे हैं। ये तपस्याके निधि हैं। इनके विशिष्ट तेजके आधिक्यसे ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं’॥ २३॥

एवमुक्त्वा महाबाहुरगस्त्यं सूर्यवर्चसम्।

जग्राहापततस्तस्य पादौ च रघुनन्दन:॥ २४॥

सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्यके विषयमें ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दनने सामनेसे आते हुए उन मुनीश्वरके दोनों चरण पकड़ लिये॥ २४॥

अभिवाद्य तु धर्मात्मा तस्थौ राम: कृताञ्जलि:।

सीतया सह वैदेह्या तदा राम: सलक्ष्मण:॥ २५॥

जिनमें योगियोंका मन रमण करता है अथवा जो भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, वे धर्मात्मा श्रीराम उस समय विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मणके साथ महर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २५॥

प्रतिगृह्य च काकुत्स्थमर्चयित्वाऽऽसनोदकै:।

कुशलप्रश्नमुक्त्वा च आस्यतामिति सोऽब्रवीत्॥ २६॥

महर्षिने भगवान् श्रीरामको हृदयसे लगाया और आसन तथा जल (पाद्य, अर्घ्य आदि) देकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। फिर कुशल-समाचार पूछकर उन्हें बैठनेको कहा॥ २६॥

अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथीन् प्रतिपूज्य च।

वानप्रस्थेन धर्मेण स तेषां भोजनं ददौ॥ २७॥

अगस्त्यजीने पहले अग्निमें आहुति दी, फिर वानप्रस्थधर्मके अनुसार अर्घ्य दे अतिथियोंका भलीभाँति पूजन करके उनके लिये भोजन दिया॥ २७॥

प्रथमं चोपविश्याथ धर्मज्ञो मुनिपुंगव:।

उवाच राममासीनं प्राञ्जलिं धर्मकोविदम्॥ २८॥

अग्निं हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथिं प्रतिपूजयेत्।

अन्यथा खलु काकुत्स्थ तपस्वी समुदाचरन्।

दु:साक्षीव परे लोके स्वानि मांसानि भक्षयेत्॥ २९॥

धर्मके ज्ञाता मुनिवर अगस्त्यजी पहले स्वयं बैठे, फिर धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर आसनपर विराजमान हुए। इसके बाद महर्षिने उनसे कहा—‘काकुत्स्थ! वानप्रस्थको चाहिये कि वह पहले अग्निको आहुति दे। तदनन्तर अर्घ्य देकर अतिथिका पूजन करे। जो तपस्वी इसके विपरीत आचरण करता है, उसे झूठी गवाही देनेवालेकी भाँति परलोकमें अपने ही शरीरका मांस खाना पड़ता है॥ २८-२९॥

राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथ:।

पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्त: प्रियातिथि:॥ ३०॥

‘आप सम्पूर्ण लोकके राजा, महारथी और धर्मका आचरण करनेवाले हैं तथा मेरे प्रिय अतिथिके रूपमें इस आश्रमपर पधारे हैं, अतएव आप हमलोगोंके माननीय एवं पूजनीय हैं’॥ ३०॥

एवमुक्त्वा फलैर्मूलै: पुष्पैश्चान्यैश्च राघवम्।

पूजयित्वा यथाकामं ततोऽगस्त्यस्तमब्रवीत्॥ ३१॥

ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्यने फल, मूल, फूल तथा अन्य उपकरणोंसे इच्छानुसार भगवान् श्रीरामका पूजन किया। तत्पश्चात् अगस्त्यजी उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३१॥

इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम्।

वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा॥ ३२॥

अमोघ: सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्त: शरोत्तम:।

दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षय्यसायकौ॥ ३३॥

सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्ज्वलद्भिरिव पावकै:।

महाराजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषित: ॥ ३४॥

‘पुरुषसिंह! यह महान् दिव्य धनुष विश्वकर्माजीने बनाया है। इसमें सुवर्ण और हीरे जड़े हैं। यह भगवान् विष्णुका दिया हुआ है तथा यह जो सूर्यके समान देदीप्यमान अमोघ उत्तम बाण है, ब्रह्माजीका दिया हुआ है। इनके सिवा इन्द्रने ये दो तरकस दिये हैं, जो तीखे तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे सदा भरे रहते हैं। कभी खाली नहीं होते। साथ ही यह तलवार भी है जिसकी मूठमें सोना जड़ा हुआ है। इसकी म्यान भी सोनेकी ही बनी हुई है॥ ३२—३४॥

अनेन धनुषा राम हत्वा संख्ये महासुरान्।

आजहार श्रियं दीप्तां पुरा विष्णुर्दिवौकसाम्॥ ३५॥

तद्धनुस्तौ च तूणी च शरं खड्गं च मानद।

जयाय प्रतिगृह्णीष्व वज्रं वज्रधरो यथा॥ ३६॥

‘श्रीराम! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने इसी धनुषसे युद्धमें बड़े-बड़े असुरोंका संहार करके देवताओंकी उद्दीप्त लक्ष्मीको उनके अधिकारसे लौटाया था। मानद! आप यह धनुष, ये दोनों तरकस, ये बाण और यह तलवार (राक्षसोंपर) विजय पानेके लिये ग्रहण कीजिये। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र ग्रहण करते हैं’॥ ३५-३६॥

एवमुक्त्वा महातेजा: समस्तं तद्वरायुधम्।

दत्त्वा रामाय भगवानगस्त्य: पुनरब्रवीत्॥ ३७॥

ऐसा कहकर महान् तेजस्वी अगस्त्यने वे सभी श्रेष्ठ आयुध श्रीरामचन्द्रजीको सौंप दिये। तत्पश्चात् वे फिर बोले॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वादश: सर्ग:॥ १२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥

 

त्रयोदश: सर्ग:

महर्षि अगस्त्यका श्रीरामके प्रति अपनी प्रसन्नता प्रकट करके सीताकी प्रशंसा करना, श्रीरामके पूछनेपर उन्हें पञ्चवटीमें आश्रम बनाकर रहनेका आदेश देना तथा श्रीराम आदिका प्रस्थान

राम प्रीतोऽस्मि भद्रं ते परितुष्टोऽस्मि लक्ष्मण।

अभिवादयितुं यन्मां प्राप्तौ स्थ: सह सीतया॥ १॥

‘श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण! मैं तुमपर भी बहुत संतुष्ट हूँ। आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करनेके लिये जो सीताके साथ यहाँतक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १॥

अध्वश्रमेण वां खेदो बाधते प्रचुरश्रम:।

व्यक्तमुत्कण्ठते वापि मैथिली जनकात्मजा॥ २॥

‘रास्ता चलनेके परिश्रमसे आपलोगोंको बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनोंको पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करनेके लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है॥ २॥

एषा च सुकुमारी च खेदैश्च न विमानिता।

प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता॥ ३॥

‘यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दु:खोंका सामना नहीं करना पड़ा है। वनमें अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेमसे प्रेरित होकर यहाँ आयी है॥ ३॥

यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु।

दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती॥ ४॥

‘श्रीराम! जिस प्रकार सीताका यहाँ मन लगे—जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वनमें आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है॥ ४॥

एषा हि प्रकृति: स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन।

समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च॥ ५॥

‘रघुनन्दन! सृष्टिकालसे लेकर अबतक स्त्रियोंका प्राय: यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्थामें है अर्थात् धनधान्यसे सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्थामें पड़ जाता है—दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं॥ ५॥

शतहृदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां तथा।

गरुडानिलयो: शैघ्र्यमनुगच्छन्ति योषित:॥ ६॥

‘स्त्रियाँ विद्युत्की चपलता, शस्त्रोंकी तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायुकी तीव्र गतिका अनुसरण करती हैं॥

इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता।

श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवीष्वरुन्धती॥ ७॥

‘आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषोंसे रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओंमें उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियोंमें अरुन्धती॥ ७॥

अलंकृतोऽयं देशश्च यत्र सौमित्रिणा सह।

वैदेह्या चानया राम वत्स्यसि त्वमरिंदम॥ ८॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आजसे इस देशकी शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहनन्दिनी सीताके साथ आप निवास करेंगे’॥ ८॥

एवमुक्तस्तु मुनिना राघव: संयताञ्जलि:।

उवाच प्रश्रितं वाक्यमृषिं दीप्तमिवानलम्॥ ९॥

मुनिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उन महर्षिसे दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही—॥ ९॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव:।

गुणै: सभ्रातृभार्यस्य गुरुर्न: परितुष्यति॥ १०॥

‘भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणोंसे हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझपर मुनीश्वरका महान् अनुग्रह है॥

किं तु व्यादिश मे देशं सोदकं बहुकाननम्।

यत्राश्रमपदं कृत्वा वसेयं निरत: सुखम्॥ ११॥

‘परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत-से वन हों, जलकी भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ’॥ ११॥

ततोऽब्रवीन्मुनिश्रेष्ठ: श्रुत्वा रामस्य भाषितम्।

ध्यात्वा मुहूर्तं धर्मात्मा ततोवाच वच: शुभम्॥ १२॥

श्रीरामका यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्यने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले—॥ १२॥

इतो द्वियोजने तात बहुमूलफलोदक:।

देशो बहुमृग: श्रीमान् पञ्चवट्यभिविश्रुत:॥ १३॥

‘तात! यहाँसे दो योजनकी दूरीपर पञ्चवटी नामसे विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जलकी अधिक सुविधा है॥

तत्र गत्वाऽऽश्रमपदं कृत्वा सौमित्रिणा सह।

रमस्व त्वं पितुर्वाक्यं यथोक्तमनुपालयन्॥ १४॥

‘वहीं जाकर लक्ष्मणके साथ आप आश्रम बनाइये और पिताकी यथोक्त आज्ञाका पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये॥ १४॥

विदितो ह्येष वृत्तान्तो मम सर्वस्तवानघ।

तपसश्च प्रभावेण स्नेहाद् दशरथस्य च॥ १५॥

‘अनघ! आपका और राजा दशरथका यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपके प्रति स्नेह होनेके कारण अच्छी तरह विदित है॥ १५॥

हृदयस्थं च ते च्छन्दो विज्ञातं तपसा मया।

इह वासं प्रतिज्ञाय मया सह तपोवने॥ १६॥

‘आपने तपोवनमें मेरे साथ रहनेकी और वनवासका शेष समय यहीं बितानेकी अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँसे अन्यत्र रहने योग्य स्थानके विषयमें मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है? यह मैंने अपने तपोबलसे जान लिया है (आपने ऋषियोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंके वधकी प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञाका निर्वाह अन्यत्र रहनेसे ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसोंका आना-जाना नहीं होता)॥ १६॥

अतश्च त्वामहं ब्रूमि गच्छ पञ्चवटीमिति।

स हि रम्यो वनोद्देशो मैथिली तत्र रंस्यते॥ १७॥

‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटीमें जाइये। वहाँकी वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी॥

स देश: श्लाघनीयश्च नातिदूरे च राघव।

गोदावर्या: समीपे च मैथिली तत्र रंस्यते॥ १८॥

‘रघुनन्दन! वह स्पृहणीय स्थान यहाँसे अधिक दूर नहीं है। गोदावरीके पास (उसीके तटपर) है, अत: मैथिलीका मन वहाँ खूब लगेगा॥ १८॥

प्राज्यमूलफलैश्चैव नानाद्विजगणैर्युत:।

विविक्तश्च महाबाहो पुण्यो रम्यस्तथैव च॥ १९॥

‘महाबाहो! वह स्थान प्रचुर फल-मूलोंसे सम्पन्न, भाँति-भाँतिके विहङ्गमोंसे सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है॥ १९॥

भवानपि सदाचार: शक्तश्च परिरक्षणे।

अपि चात्र वसन् राम तापसान् पालयिष्यसि॥ २०॥

‘श्रीराम! आप भी सदाचारी और ऋषियोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। अत: वहाँ रहकर तपस्वी मुनियोंका पालन कीजियेगा॥ २०॥

एतदालक्ष्यते वीर मधूकानां महावनम्।

उत्तरेणास्य गन्तव्यं न्यग्रोधमपि गच्छता॥ २१॥

तत: स्थलमुपारुह्य पर्वतस्याविदूरत:।

ख्यात: पञ्चवटीत्येव नित्यपुष्पितकानन:॥ २२॥

‘वीर! यह जो महुओंका विशाल वन दिखायी देता है, इसके उत्तरसे होकर जाना चाहिये। उस मार्गसे जाते हुए आपको आगे एक बरगदका वृक्ष मिलेगा। उससे आगे कुछ दूरतक ऊँचा मैदान है, उसे पार करनेके बाद एक पर्वत दिखायी देगा। उस पर्वतसे थोड़ी ही दूरपर पञ्चवटी नामसे प्रसिद्ध सुन्दर वन है, जो सदा फूलोंसे सुशोभित रहता है’॥ २१-२२॥

अगस्त्येनैवमुक्तस्तु राम: सौमित्रिणा सह।

सत्कृत्यामन्त्रयामास तमृषिं सत्यवादिनम्॥ २३॥

महर्षि अगस्त्यके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उनका सत्कार करके उन सत्यवादी महर्षिसे वहाँ जानेकी आज्ञा माँगी॥ २३॥

तौ तु तेनाभ्यनुज्ञातौ कृतपादाभिवन्दनौ।

तमाश्रमं पञ्चवटीं जग्मतु: सह सीतया॥ २४॥

उनकी आज्ञा पाकर उन दोनों भाइयोंने उनके चरणोंकी वन्दना की और सीताके साथ वे पञ्चवटी नामक आश्रमकी ओर चले॥ २४॥

गृहीतचापौ तु नराधिपात्मजौ

विषक्ततूणी समरेष्वकातरौ।

यथोपदिष्टेन पथा महर्षिणा

प्रजग्मतु: पञ्चवटीं समाहितौ॥ २५॥

राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणने पीठपर तरकस बाँध हाथमें धनुष ले लिये। वे दोनों भाई समराङ्गणोंमें कातरता दिखानेवाले नहीं थे। वे दोनों बन्धु महर्षिके बताये हुए मार्गसे बड़ी सावधानीके साथ पञ्चवटीकी ओर प्रस्थित हुए॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोदश: सर्ग:॥ १३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥

 

चतुर्दश: सर्ग:

पञ्चवटीके मार्गमें जटायुका मिलना और श्रीरामको अपना विस्तृत परिचय देना

अथ पञ्चवटीं गच्छन्नन्तरा रघुनन्दन:।

आससाद महाकायं गृध्रं भीमपराक्रमम्॥ १॥

पञ्चवटी जाते समय बीचमें श्रीरामचन्द्रजीको एक विशालकाय गृध्र मिला, जो भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाला था॥ १॥

तं दृष्ट्वा तौ महाभागौ वनस्थं रामलक्ष्मणौ।

मेनाते राक्षसं पक्षिं ब्रुवाणौ को भवानिति॥ २॥

वनमें बैठे हुए उस विशाल पक्षीको देखकर महाभाग श्रीराम और लक्ष्मणने उसे राक्षस ही समझा और पूछा—‘आप कौन हैं?’॥ २॥

ततो मधुरया वाचा सौम्यया प्रीणयन्निव।

उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मन:॥ ३॥

तब उस पक्षीने बड़ी मधुर और कोमल वाणीमें उन्हें प्रसन्न करते हुए-से कहा—‘बेटा! मुझे अपने पिताका मित्र समझो’॥ ३॥

स तं पितृसखं मत्वा पूजयामास राघव:।

स तस्य कुलमव्यग्रमथ पप्रच्छ नाम च॥ ४॥

पिताका मित्र जानकर श्रीरामचन्द्रजीने गृध्रका आदर किया और शान्तभावसे उसका कुल एवं नाम पूछा॥ ४॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा कुलमात्मानमेव च।

आचचक्षे द्विजस्तस्मै सर्वभूतसमुद्भवम्॥ ५॥

श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर उस पक्षीने उन्हें अपने कुल और नामका परिचय देते हुए समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम ही बताना आरम्भ किया॥ ५॥

पूर्वकाले महाबाहो ये प्रजापतयोऽभवन्।

तान् मे निगदत: सर्वानादित: शृणु राघव॥ ६॥

‘महाबाहु रघुनन्दन! पूर्वकालमें जो-जो प्रजापति हो चुके हैं, उन सबका आदिसे ही वर्णन करता हूँ, सुनो॥ ६॥

कर्दम: प्रथमस्तेषां विकृतस्तदनन्तरम्।

शेषश्च संश्रयश्चैव बहुपुत्रश्च वीर्यवान्॥ ७॥

‘उन प्रजापतियोंमें सबसे प्रथम कर्दम हुए। तदनन्तर दूसरे प्रजापतिका नाम विकृत हुआ, तीसरे शेष, चौथे संश्रय और पाँचवें प्रजापति पराक्रमी बहुपुत्र हुए॥ ७॥

स्थाणुर्मरीचिरत्रिश्च क्रतुश्चैव महाबल:।

पुलस्त्यश्चाङ्गिराश्चैव प्रचेता: पुलहस्तथा॥ ८॥

‘छठे स्थाणु, सातवें मरीचि, आठवें अत्रि, नवें महान् शक्तिशाली क्रतु, दसवें पुलस्त्य, ग्यारहवें अङ्गिरा, बारहवें प्रचेता (वरुण) और तेरहवें प्रजापति पुलह हुए॥ ८॥

दक्षो विवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्च राघव।

कश्यपश्च महातेजास्तेषामासीच्च पश्चिम:॥ ९॥

‘चौदहवें दक्ष, पंद्रहवें विवस्वान्, सोलहवें अरिष्टनेमि और सत्रहवें प्रजापति महातेजस्वी कश्यप हुए। रघुनन्दन! यह कश्यपजी अन्तिम प्रजापति कहे गये हैं॥ ९॥

प्रजापतेस्तु दक्षस्य बभूवुरिति विश्रुता:।

षष्टिर्दुहितरो राम यशस्विन्यो महायश:॥ १०॥

‘महायशस्वी श्रीराम! प्रजापति दक्षके साठ यशस्विनी कन्याएँ हुईं, जो बहुत ही विख्यात थीं॥ १०॥

कश्यप: प्रतिजग्राह तासामष्टौ सुमध्यमा:।

अदितिं च दितिं चैव दनूमपि च कालकाम्॥ ११॥

ताम्रां क्रोधवशां चैव मनुं चाप्यनलामपि।

उनमेंसे आठ103 सुन्दरी कन्याओंको प्रजापति कश्यपने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। जिनके नाम इस प्रकार हैं— अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला॥ ११/

तास्तु कन्यास्तत: प्रीत: कश्यप: पुनरब्रवीत्॥ १२॥

पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तृन् वै जनयिष्यथ मत्समान्।

तदनन्तर उन कन्याओंसे प्रसन्न होकर कश्यपजीने फिर उनसे कहा—‘देवियो! तुमलोग ऐसे पुत्रोंको जन्म दोगी, जो तीनों लोकोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ और मेरे समान तेजस्वी होंगे’॥ १२/

अदितिस्तन्मना राम दितिश्च दनुरेव च॥ १३॥

कालका च महाबाहो शेषास्त्वमनसोऽभवन्।

‘महाबाहु श्रीराम! इनमेंसे अदिति, दिति, दनु और कालका—इन चारोंने कश्यपजीकी कही हुई बातको मनसे ग्रहण किया; परंतु शेष स्त्रियोंने उधर मन नहीं लगाया। उनके मनमें वैसा मनोरथ नहीं उत्पन्न हुआ॥

अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्र‌िंशदरिंदम॥ १४॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप।

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुवीर! अदितिके गर्भसे तैंतीस देवता उत्पन्न हुए—बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार। शत्रुओंको ताप देनेवाले श्रीराम! ये ही तैंतीस देवता हैं॥ १४/

दितिस्त्वजनयत् पुत्रान् दैत्यांस्तात यशस्विन:॥ १५॥

तेषामियं वसुमती पुराऽऽसीत् सवनार्णवा।

‘तात! दितिने दैत्य नामसे प्रसिद्ध यशस्वी पुत्रोंको जन्म दिया। पूर्वकालमें वन और समुद्रोंसहित सारी पृथिवी उन्हींके अधिकारमें थी॥ १५/

दनुस्त्वजनयत् पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम॥ १६॥

नरकं कालकं चैव कालकापि व्यजायत।

‘शत्रुदमन! दनुने अश्वग्रीव नामक पुत्रको उत्पन्न किया और कालकाने नरक एवं कालक नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया॥ १६/

क्रौञ्चीं भासीं तथा श्येनीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम्॥ १७॥

ताम्रा तु सुषुवे कन्या: पञ्चैता लोकविश्रुता:।

‘ताम्राने क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री तथा शुकी—इन पाँच विश्वविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १७/

उलूकाञ्जनयत् क्रौञ्ची भासी भासान् व्यजायत॥ १८॥

श्येनी श्येनांश्च गृध्रांश्च व्यजायत सुतेजस:।

धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसाश्च सर्वश:॥ १९॥

‘इनमेंसे क्रौञ्चीने उल्लुओंको, भासीने भास नामक पक्षियोंको, श्येनीने परम तेजस्वी श्येनों (बाजों) और गीधोंको तथा धृतराष्ट्रीने सब प्रकारके हंसों और कलहंसोंको जन्म दिया॥ १८-१९॥

चक्रवाकांश्च भद्रं ते विजज्ञे सापि भामिनी।

शुकी नतां विजज्ञे तु नतायां विनता सुता॥ २०॥

‘श्रीराम! आपका कल्याण हो, उसी भामिनी धृतराष्ट्रीने चक्रवाक नामक पक्षियोंको भी उत्पन्न किया था। ताम्राकी सबसे छोटी पुत्री शुकीने नता नामवाली कन्याको जन्म दिया। नतासे विनता नामवाली पुत्री उत्पन्न हुई॥ २०॥

दश क्रोधवशा राम विजज्ञेऽप्यात्मसंभवा:।

मृगीं च मृगमन्दां च हरीं भद्रमदामपि॥ २१॥

मातङ्गीमथ शार्दूलीं श्वेतां च सुरभीं तथा।

सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां कद्रुकामपि॥ २२॥

‘श्रीराम! क्रोधवशाने अपने पेटसे दस कन्याओंको जन्म दिया। जिनके नाम हैं—मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा और कद्रुका॥ २१-२२॥

अपत्यं तु मृगा: सर्वे मृग्या नरवरोत्तम।

ऋक्षाश्च मृगमन्दाया: सृमराश्चमरास्तथा॥ २३॥

‘नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! मृगीकी संतान सारे मृग हैं और मृगमन्दाके ऋक्ष, सृमर और चमर॥ २३॥

ततस्त्विरावतीं नाम जज्ञे भद्रमदा सुताम्।

तस्यास्त्वैरावत: पुत्रो लोकनाथो महागज:॥ २४॥

‘भद्रमदाने इरावती नामक कन्याको जन्म दिया, जिसका पुत्र है ऐरावत नामक महान् गजराज, जो समस्त लोकोंको अभीष्ट है॥ २४॥

हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तपस्विन:।

गोलाङ्गूलाश्च शार्दूली व्याघ्रांश्चाजनयत् सुतान्॥ २५॥

‘हरीकी संतानें हरि (सिंह) तथा तपस्वी (विचारशील) वानर तथा गोलांगूल (लंगूर) हैं। क्रोधवशाकी पुत्री शार्दूलीने व्याघ्र नामक पुत्र उत्पन्न किये॥ २५॥

मातङ्गॺास्त्वथ मातङ्गा अपत्यं मनुजर्षभ।

दिशागजं तु काकुत्स्थ श्वेता व्यजनयत् सुतम्॥ २६॥

‘नरश्रेष्ठ! मातङ्गीकी संतानें मातङ्ग (हाथी) हैं। काकुत्स्थ! श्वेताने अपने पुत्रके रूपमें एक दिग्गजको जन्म दिया॥ २६॥

ततो दुहितरौ राम सुरभिर्द्वे व्यजायत।

रोहिणीं नाम भद्रं ते गन्धर्वीं च यशस्विनीम्॥ २७॥

‘श्रीराम! आपका भला हो। क्रोधवशाकी पुत्री सुरभी देवीने दो कन्याएँ उत्पन्न कीं—रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी॥ २७॥

रोहिण्यजनयद् गावो गन्धर्वी वाजिन: सुतान्।

सुरसाजनयन्नागान् राम कद्रूश्च पन्नगान्॥ २८॥

‘रोहिणीने गौओंको जन्म दिया और गन्धर्वीने घोड़ोंको ही पुत्ररूपमें प्रकट किया। श्रीराम! सुरसाने नागोंको और कद्रूने पन्नगोंको जन्म दिया॥ २८॥

मनुर्मनुष्याञ्जनयत् कश्यपस्य महात्मन:।

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्च मनुजर्षभ॥ २९॥

‘नरश्रेष्ठ! महात्मा कश्यपकी पत्नी मनुने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिवाले मनुष्योंको जन्म दिया॥

मुखतो ब्राह्मणा जाता उरस: क्षत्रियास्तथा।

ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्या: पद‍्भ्यां शूद्रा इति श्रुति:॥ ३०॥

‘मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए और हृदयसे क्षत्रिय। दोनों ऊरुओंसे वैश्योंका जन्म हुआ और दोनों पैरोंसे शूद्रोंका—ऐसी प्रसिद्धि है॥ ३०॥

सर्वान् पुण्यफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत।

विनता च शुकीपौत्री कद्रूश्च सुरसास्वसा॥ ३१॥

‘(कश्यपपत्नी) अनलाने पवित्र फलवाले समस्त वृक्षोंको जन्म दिया। कश्यपपत्नी ताम्राकी पुत्री जो शुकी थी, उसकी पौत्री विनता थी तथा कद्रू सुरसाकी बहिन (एवं क्रोधवशाकी पुत्री) कही गयी है॥ ३१॥

कद्रूर्नागसहस्रं तु विजज्ञे धरणीधरान्।

द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु गरुडोऽरुण एव च॥ ३२॥

‘इनमेंसे कद्रूने एक सहस्र नागोंको उत्पन्न किया, जो इस पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं तथा विनताके दो पुत्र हुए—गरुड़ और अरुण॥ ३२॥

तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रज:।

जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम॥ ३३॥

‘उन्हीं विनतानन्दन अरुणसे मैं तथा मेरे बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए। शत्रुदमन रघुवीर! आप मेरा नाम जटायु समझें। मैं श्येनीका पुत्र हूँ (ताम्राकी पुत्री जो श्येनी बतायी गयी है, उसीकी परम्परामें उत्पन्न हुई एक श्येनी मेरी माता हुई)॥ ३३॥

सोऽहं वाससहायस्ते भविष्यामि यदीच्छसि।

इदं दुर्गं हि कान्तारं मृगराक्षससेवितम्।

सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे॥ ३४॥

‘तात! यदि आप चाहें तो मैं यहाँ आपके निवासमें सहायक होऊँगा। यह दुर्गम वन मृगों तथा राक्षसोंसे सेवित है। लक्ष्मणसहित आप यदि अपनी पर्णशालासे कभी बाहर चले जायँ तो उस अवसरपर मैं देवी सीताकी रक्षा करूँगा’॥ ३४॥

जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो

मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत्।

पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा-

ञ्जटायुषा संकथितं पुन: पुन:॥ ३५॥

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने जटायुका बड़ा सम्मान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके गले लगकर वे उनके सामने नतमस्तक हो गये। फिर पिताके साथ जिस प्रकार उनकी मित्रता हुई थी, वह प्रसङ्ग मनस्वी श्रीरामने जटायुके मुखसे बारंबार सुना॥ ३५॥

स तत्र सीतां परिदाय मैथिलीं

सहैव तेनातिबलेन पक्षिणा।

जगाम तां पञ्चवटीं सलक्ष्मणो

रिपून् दिधक्षन् शलभानिवानल:॥ ३६॥

तत्पश्चात् वे मिथिलेशकुमारी सीताको उनके संरक्षणमें सौंपकर लक्ष्मण और उन अत्यन्त बलशाली पक्षी जटायुके साथ ही पञ्चवटीकी ओर ही चल दिये। श्रीरामचन्द्रजी मुनिद्रोही राक्षसोंको शत्रु समझकर उन्हें उसी प्रकार दग्ध कर डालना चाहते थे, जैसे आग पतिङ्गोंको जलाकर भस्म कर देती है॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्दश: सर्ग:॥ १४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥

 

पञ्चदश: सर्ग:

पञ्चवटीके रमणीय प्रदेशमें श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा सुन्दर पर्णशालाका निर्माण तथा उसमें सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका निवास

तत: पञ्चवटीं गत्वा नानाव्यालमृगायुताम्।

उवाच लक्ष्मणं रामो भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥ १॥

नाना प्रकारके सर्पों, हिंसक जन्तुओं और मृगोंसे भरी हुई पञ्चवटीमें पहुँचकर श्रीरामने उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मणसे कहा—॥ १॥

आगता: स्म यथोद्दिष्टं यं देशं मुनिरब्रवीत्।

अयं पञ्चवटीदेश: सौम्य पुष्पितकानन:॥ २॥

‘सौम्य! मुनिवर अगस्त्यने हमें जिस स्थानका परिचय दिया था, उनके तथाकथित स्थानमें हमलोग आ पहुँचे। यही पञ्चवटीका प्रदेश है। यहाँका वनप्रान्त पुष्पोंसे कैसी शोभा पा रहा है॥ २॥

सर्वतश्चार्यतां दृष्टि: कानने निपुणो ह्यसि।

आश्रम: कतरस्मिन् नो देशे भवति सम्मत:॥ ३॥

‘लक्ष्मण! तुम इस वनमें चारों ओर दृष्टि डालो; क्योंकि इस कार्यमें निपुण हो। देखकर यह निश्चय करो कि किस स्थानपर आश्रम बनाना हमारे लिये अच्छा होगा॥ ३॥

रमते यत्र वैदेही त्वमहं चैव लक्ष्मण।

तादृशो दृश्यतां देश: संनिकृष्टजलाशय:॥ ४॥

वनरामण्यकं यत्र जलरामण्यकं तथा।

संनिकृष्टं च यस्ंिमस्तु समित्पुष्पकुशोदकम्॥ ५॥

‘लक्ष्मण! तुम किसी ऐसे स्थानको ढूँढ़ निकालो, जहाँसे जलाशय निकट हो, जहाँ विदेहकुमारी सीताका मन लगे, जहाँ तुम और हम भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें, जहाँ वन और जल दोनोंका रमणीय दृश्य हो तथा जिस स्थानके आस-पास ही समिधा, फूल, कुश और जल मिलनेकी सुविधा हो’॥ ४-५॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण: संयताञ्जलि:।

सीतासमक्षं काकुत्स्थमिदं वचनमब्रवीत्॥ ६॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर सीताके सामने ही उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ ६॥

परवानस्मि काकुत्स्थ त्वयि वर्षशतं स्थिते।

स्वयं तु रुचिरे देशे क्रियतामिति मां वद॥ ७॥

‘काकुत्स्थ! आपके रहते हुए मैं सदा पराधीन ही हूँ। मैं सैकड़ों या अनन्त वर्षोंतक आपकी आज्ञाके अधीन ही रहना चाहता हूँ; अत: आप स्वयं ही देखकर जो स्थान सुन्दर जान पड़े, वहाँ आश्रम बनानेके लिये मुझे आज्ञा दें—मुझसे कहें कि तुम अमुक स्थानपर आश्रम बनाओ’॥ ७॥

सुप्रीतस्तेन वाक्येन लक्ष्मणस्य महाद्युति:।

विमृशन् रोचयामास देशं सर्वगुणान्वितम्॥ ८॥

स तं रुचिरमाक्रम्य देशमाश्रमकर्मणि।

हस्ते गृहीत्वा हस्तेन राम: सौमित्रिमब्रवीत्॥ ९॥

लक्ष्मणके इस वचनसे अत्यन्त तेजस्वी भगवान् श्रीरामको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने स्वयं ही सोच-विचारकर एक ऐसा स्थान पसंद किया, जो सब प्रकारके उत्तम गुणोंसे सम्पन्न और आश्रम बनानेके योग्य था। उस सुन्दर स्थानपर आकर श्रीरामने लक्ष्मणका हाथ अपने हाथमें लेकर कहा—॥ ८-९॥

अयं देश: सम: श्रीमान् पुष्पितैस्तरुभिर्वृत:।

इहाश्रमपदं रम्यं यथावत् कर्तुमर्हसि॥ १०॥

‘सुमित्रानन्दन! यह स्थान समतल और सुन्दर है तथा फूले हुए वृक्षोंसे घिरा है। तुम्हें इसी स्थानपर यथोचित रूपसे एक रमणीय आश्रमका निर्माण करना चाहिये॥

इयमादित्यसंकाशै: पद्मै: सुरभिगन्धिभि:।

अदूरे दृश्यते रम्या पद्मिनी पद्मशोभिता॥ ११॥

‘यह पास ही सूर्यके समान उज्ज्वल कान्तिवाले मनोरम गन्धयुक्त कमलोंसे रमणीय प्रतीत होनेवाली तथा पद्मोंकी शोभासे सम्पन्न पुष्करिणी दिखायी देती है॥

यथाख्यातमगस्त्येन मुनिना भावितात्मना।

इयं गोदावरी रम्या पुष्पितैस्तरुभिर्वृता॥ १२॥

‘पवित्र अन्त:करणवाले अगस्त्य मुनिने जिसके विषयमें कहा था, वह विकसित वृक्षावलियोंसे घिरी हुई रमणीय गोदावरी नदी यही है॥ १२॥

हंसकारण्डवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता।

नातिदूरे न चासन्ने मृगयूथनिपीडिता॥ १३॥

‘इसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी विचर रहे हैं। चकवे इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा पानी पीनेके लिये आये हुए मृगोंके झुंड इसके तटपर छाये रहते हैं। यह नदी इस स्थानसे न तो अधिक दूर है और न अत्यन्त निकट ही॥ १३॥

मयूरनादिता रम्या: प्रांशवो बहुकन्दरा:।

दृश्यन्ते गिरय: सौम्य फुल्लैस्तरुभिरावृता:॥ १४॥

‘सौम्य! यहाँ बहुत-सी कन्दराओंसे युक्त ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखायी दे रहे हैं, जहाँ मयूरोंकी मीठी बोली गूँज रही है। ये रमणीय पर्वत खिले हुए वृक्षोंसे व्याप्त हैं॥ १४॥

सौवर्णै राजतैस्ताम्रैर्देशे देशे तथा शुभै:।

गवाक्षिता इवाभान्ति गजा: परमभक्तिभि:॥ १५॥

‘स्थान-स्थानपर सोने, चाँदी तथा ताँबेके समान रंगवाले सुन्दर गैरिक धातुओंसे उपलक्षित ये पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो झरोखेके आकारमें की गयी नीले, पीले और सफेद आदि रंगोंकी उत्तम शृङ्गाररचनाओंसे अलंकृत हाथी शोभा पा रहे हों॥ १५॥

सालैस्तालैस्तमालैश्च खर्जूरै: पनसैर्द्रुमै:।

नीवारैस्तिनिशैश्चैव पुन्नागैश्चोपशोभिता:॥ १६॥

चूतैरशोकैस्तिलकै: केतकैरपि चम्पकै:।

पुष्पगुल्मलतोपेतैस्तैस्तैस्तरुभिरावृता: ॥ १७॥

स्यन्दनैश्चन्दनैर्नीपै: पर्णासैर्लकुचैरपि।

धवाश्वकर्णखदिरै: शमीकिंशुकपाटलै:॥ १८॥

पुष्पों, गुल्मों तथा लता-वल्लरियोंसे युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जलकदम्ब, तिनिश, पुंनाग, आम, अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, स्यन्दन, चन्दन, कदम्ब, पर्णास, लकुच, धव, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलाश और पाटल (पाडर) आदि वृक्षोंसे घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा पा रहे हैं॥ १६—१८॥

इदं पुण्यमिदं रम्यमिदं बहुमृगद्विजम्।

इह वत्स्याम सौमित्रे सार्धमेतेन पक्षिणा॥ १९॥

‘सुमित्रानन्दन! यह बहुत ही पवित्र और बड़ा रमणीय स्थान है। यहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हैं। हमलोग भी यहीं इन पक्षिराज जटायुके साथ रहेंगे’॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण: परवीरहा।

अचिरेणाश्रमं भ्रातुश्चकार सुमहाबल:॥ २०॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली लक्ष्मणने भाईके लिये शीघ्र ही आश्रम बनाकर तैयार किया॥ २०॥

पर्णशालां सुविपुलां तत्र संघातमृत्तिकाम्।

सुस्तम्भां मस्करैर्दीर्घै: कृतवंशां सुशोभनाम्॥ २१॥

शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशिताम्।

कुशकाशशरै: पर्णै: सुपरिच्छादितां तथा॥ २२॥

समीकृततलां रम्यां चकार सुमहाबल:।

निवासं राघवस्यार्थे प्रेक्षणीयमनुत्तमम्॥ २३॥

वह आश्रम एक अत्यन्त विस्तृत पर्णशालाके रूपमें बनाया गया था। महाबली लक्ष्मणने पहले वहाँ मिट्टी एकत्र करके दीवार खड़ी की, फिर उसमें सुन्दर एवं सुदृढ़ खम्भे लगाये। खम्भोंके ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे। बाँसोंके रख दिये जानेपर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखायी देने लगी। फिर उन बाँसोंपर उन्होंने शमीवृक्षकी शाखाएँ फैला दीं और उन्हें मजबूत रस्सियोंसे कसकर बाँध दिया। इसके बाद ऊपरसे कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर उस पर्णशालाको भलीभाँति छा दिया तथा नीचेकी भूमिको बराबर करके उस कुटीको बड़ा रमणीय बना दिया। इस प्रकार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके लिये परम उत्तम निवासगृह बना दिया, जो देखने ही योग्य था॥ २१—२३॥

स गत्वा लक्ष्मण: श्रीमान् नदीं गोदावरीं तदा।

स्नात्वा पद्मानि चादाय सफल: पुनरागत:॥ २४॥

उसे तैयार करके श्रीमान् लक्ष्मणने गोदावरी नदीके तटपर जाकर तत्काल उसमें स्नान किया और कमलके फूल तथा फल लेकर वे फिर वहीं लौट आये॥ २४॥

तत: पुष्पबलिं कृत्वा शान्तिं च स यथाविधि।

दर्शयामास रामाय तदाश्रमपदं कृतम्॥ २५॥

तदनन्तर शास्त्रीय विधिके अनुसार देवताओंके लिये फूलोंकी बलि (उपहारसामग्री) अर्पित की तथा वास्तुशान्ति करके उन्होंने अपना बनाया हुआ आश्रम श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया॥ २५॥

स तं दृष्ट्वा कृतं सौम्यमाश्रमं सह सीतया।

राघव: पर्णशालायां हर्षमाहारयत् परम्॥ २६॥

भगवान् श्रीराम सीताके साथ उस नये बने हुए सुन्दर आश्रमको देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कुछ कालतक उसके भीतर खड़े रहे॥ २६॥

सुसंहृष्ट: परिष्वज्य बाहुभ्यां लक्ष्मणं तदा।

अतिस्निग्धं च गाढं च वचनं चेदमब्रवीत्॥ २७॥

तत्पश्चात् अत्यन्त हर्षमें भरकर उन्होंने दोनों भुजाओंसे लक्ष्मणको कसकर हृदयसे लगा लिया और बड़े स्नेहके साथ यह बात कही—॥ २७॥

प्रीतोऽस्मि ते महत् कर्म त्वया कृतमिदं प्रभो।

प्रदेयो यन्निमित्तं ते परिष्वङ्गो मया कृत:॥ २८॥

‘सामर्थ्यशाली लक्ष्मण! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने यह महान् कार्य किया है। उसके लिये और कोई समुचित पुरस्कार न होनेसे मैंने तुम्हें गाढ़ आलिङ्गन प्रदान किया है॥ २८॥

भावज्ञेन कृतज्ञेन धर्मज्ञेन च लक्ष्मण।

त्वया पुत्रेण धर्मात्मा न संवृत्त: पिता मम॥ २९॥

‘लक्ष्मण! तुम मेरे मनोभावको तत्काल समझ लेनेवाले, कृतज्ञ और धर्मज्ञ हो। तुम-जैसे पुत्रके कारण मेरे धर्मात्मा पिता अभी मरे नहीं हैं—तुम्हारे रूपमें वे अब भी जीवित ही हैं’॥ २९॥

एवं लक्ष्मणमुक्त्वा तु राघवो लक्ष्मिवर्धन:।

तस्मिन् देशे बहुफले न्यवसत् स सुखं सुखी॥ ३०॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर अपनी शोभाका विस्तार करनेवाले सुखी श्रीरामचन्द्रजी प्रचुर फलोंसे सम्पन्न उस पञ्चवटी-प्रदेशमें सबके साथ सुखपूर्वक रहने लगे॥ ३०॥

कञ्चित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च।

अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामर:॥ ३१॥

सीता और लक्ष्मणसे सेवित हो धर्मात्मा श्रीराम कुछ कालतक वहाँ उसी प्रकार रहे, जैसे स्वर्गलोकमें देवता निवास करते हैं॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चदश: सर्ग:॥ १५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥

 


षोडश: सर्ग:

लक्ष्मणके द्वारा हेमन्त ऋतुका वर्णन और भरतकी प्रशंसा तथा श्रीरामका उन दोनोंके साथ गोदावरी नदीमें स्नान

वसतस्तस्य तु सुखं राघवस्य महात्मन:।

शरद‍्व्यपाये हेमन्तऋतुरिष्ट: प्रवर्तत॥ १॥

महात्मा श्रीरामको उस आश्रममें रहते हुए शरद् ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्तका आरम्भ हुआ॥ १॥

स कदाचित् प्रभातायां शर्वर्यां रघुनन्दन:।

प्रययावभिषेकार्थं रम्यां गोदावरीं नदीम्॥ २॥

एक दिन प्रात:काल रघुकुलनन्दन श्रीराम स्नान करनेके लिये परम रमणीय गोदावरी नदीके तटपर गये॥ २॥

प्रह्व: कलशहस्तस्तु सीतया सह वीर्यवान्।

पृष्ठतोऽनुव्रजन् भ्राता सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥ ३॥

उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी, जो बड़े ही विनीत और पराक्रमी थे, सीताके साथ-साथ हाथमें घड़ा लिये उनके पीछे-पीछे गये। जाते-जाते वे श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—॥ ३॥

अयं स काल: सम्प्राप्त: प्रियो यस्ते प्रियंवद।

अलंकृत इवाभाति येन संवत्सर: शुभ:॥ ४॥

प्रिय वचन बोलनेवाले भैया श्रीराम! यह वही हेमन्तकाल आ पहुँचा है, जो आपको अधिक प्रिय है और जिससे यह शुभ संवत्सर अलंकृत-सा प्रतीत होता है॥ ४॥

नीहारपरुषो लोक: पृथिवी सस्यमालिनी।

जलान्यनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहन:॥ ५॥

‘इस ऋतुमें अधिक ठण्डक या पालेके कारण लोगोंका शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वीपर रबीकी खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होनेके कारण पीनेके योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है॥ ५॥

नवाग्रयणपूजाभिरभ्यर्च्य पितृदेवता:।

कृताग्रयणका: काले सन्तो विगतकल्मषा:॥ ६॥

‘नवसस्येष्टि’ कर्मके अनुष्ठानकी इस वेलामें नूतन अन्न ग्रहण करनेके लिये की गयी आग्रयणकर्मरूप पूजाओंद्वारा देवताओं तथा पितरोंको संतुष्ट करके उक्त आग्रयणकर्मका सम्पादन करनेवाले सत्पुरुष निष्पाप हो गये हैं॥ ६॥

प्राज्यकामा जनपदा: सम्पन्नतरगोरसा:।

विचरन्ति महीपाला यात्रार्थं विजिगीषव:॥ ७॥

‘इस ऋतुमें प्राय: सभी जनपदोंके निवासियोंकी अन्नप्राप्तिविषयक कामनाएँ प्रचुररूपसे पूर्ण हो जाती हैं। गोरसकी भी बहुतायत होती है तथा विजयकी इच्छा रखनेवाले भूपालगण युद्ध-यात्राके लिये विचरते रहते हैं॥

सेवमाने दृढं सूर्ये दिशमन्तकसेविताम्।

विहीनतिलकेव स्त्री नोत्तरा दिक् प्रकाशते॥ ८॥

‘सूर्यदेव इन दिनों यमसेवित दक्षिणदिशाका दृढ़तापूर्वक सेवन करने लगे हैं। इसलिये उत्तरदिशा सिंदूरविन्दुसे वञ्चित हुई नारीकी भाँति सुशोभित या प्रकाशित नहीं हो रही है॥ ८॥

प्रकृत्या हिमकोशाढ्यो दूरसूर्यश्च साम्प्रतम्।

यथार्थनामा सुव्यक्तं हिमवान् हिमवान् गिरि:॥ ९॥

‘हिमालयपर्वत तो स्वभावसे ही घनीभूत हिमके खजानेसे भरा-पूरा होता है, परंतु इस समय सूर्यदेव भी दक्षिणायनमें चले जानेके कारण उससे दूर हो गये हैं; अत: अब अधिक हिमके संचयसे सम्पन्न होकर हिमवान् गिरि स्पष्ट ही अपने नामको सार्थक कर रहा है॥ ९॥

अत्यन्तसुखसंचारा मध्याह्ने स्पर्शत: सुखा:।

दिवसा: सुभगादित्याश्छायासलिलदुर्भगा:॥ १०॥

‘मध्याह्नकालमें धूपका स्पर्श होनेसे हेमन्तके सुखमय दिन अत्यन्त सुखसे इधर-उधर विचरनेके योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होनेके कारण सूर्यदेव सौभाग्यशाली जान पड़ते हैं और सेवनके योग्य न होनेके कारण छाँह तथा जल अभागे प्रतीत होते हैं॥

मृदुसूर्या: सुनीहारा: पटुशीता: समारुता:।

शून्यारण्या हिमध्वस्ता दिवसा भान्ति साम्प्रतम्॥ ११॥

‘आजकलके दिन ऐसे हैं कि सूर्यकी किरणोंका स्पर्श कोमल (प्रिय) जान पड़ता है। कुहासे अधिक पड़ते हैं। सरदी सबल होती है, कड़ाकेका जाड़ा पड़ने लगता है। साथ ही ठण्डी हवा चलती रहती है। पाला पड़नेसे पत्तोंके झड़ जानेके कारण जंगल सूने दिखायी देते हैं और हिमके स्पर्शसे कमल गल जाते हैं॥ ११॥

निवृत्ताकाशशयना: पुष्यनीता हिमारुणा:।

शीतवृद्धतरायामास्त्रियामा यान्ति साम्प्रतम्॥ १२॥

‘इस हेमन्तकालमें रातें बड़ी होने लगती हैं। इनमें सरदी बहुत बढ़ जाती है। खुले आकाशमें कोई नहीं सोते हैं। पौषमासकी ये रातें हिमपातके कारण धूसर प्रतीत होती हैं॥ १२॥

रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डल: ।

नि:श्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते॥ १३॥

‘हेमन्तकालमें चन्द्रमाका सौभाग्य सूर्यदेवमें चला गया है (चन्द्रमा सरदीके कारण असेव्य और सूर्य मन्दरश्मि होनेके कारण सेव्य हो गये हैं)। चन्द्रमण्डल हिमकणोंसे आच्छन्न होकर धूमिल जान पड़ता है; अत: चन्द्रदेव नि:श्वासवायुसे मलिन हुए दर्पणकी भाँति प्रकाशित नहीं हो रहे हैं॥ १३॥

ज्योत्स्ना तुषारमलिना पौर्णमास्यां न राजते।

सीतेव चातपश्यामा लक्ष्यते न च शोभते॥ १४॥

‘इन दिनों पूर्णिमाकी चाँदनी रात भी तुहिन-बिन्दुओंसे मलिन दिखायी देती है—प्रकाशित नहीं होती है। ठीक उसी तरह, जैसे सीता अधिक धूप लगनेसे साँवली-सी दीखती है—पूर्ववत् शोभा नहीं पाती॥ १४॥

प्रकृत्या शीतलस्पर्शो हिमविद्धश्च साम्प्रतम्।

प्रवाति पश्चिमो वायु: काले द्विगुणशीतल:॥ १५॥

‘स्वभावसे ही जिसका स्पर्श शीतल है, वह पछुआ हवा इस समय हिमकणोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दूनी सरदी लेकर बड़े वेगसे बह रही है॥ १५॥

बाष्पच्छन्नान्यरण्यानि यवगोधूमवन्ति च।

शोभन्तेऽभ्युदिते सूर्ये नदद्भि: क्रौञ्चसारसै:॥ १६॥

‘जौ और गेहूँके खेतोंसे युक्त ये बहुसंख्यक वन भापसे ढँके हुए हैं तथा क्रौञ्च और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदयकालमें इन वनोंकी बड़ी शोभा हो रही है॥ १६॥

खर्जूरपुष्पाकृतिभि: शिरोभि: पूर्णतण्डुलै:।

शोभन्ते किंचिदालम्बा: शालय: कनकप्रभा:॥ १७॥

‘ये सुनहरे रंगके जड़हन धान खजूरके फूलके-से आकारवाली बालोंसे, जिनमें चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालोंके कारण इनकी बड़ी शोभा होती है॥ १७॥

मयूखैरुपसर्पद्भिर्हिमनीहारसंवृतै: ।

दूरमभ्युदित: सूर्य: शशाङ्क इव लक्ष्यते॥ १८॥

‘कुहासेसे ढकी और फैलती हुई किरणोंसे उपलक्षित होनेवाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमाके समान दिखायी देते हैं॥ १८॥

आग्राह्यवीर्य: पूर्वाह्णे मध्याह्ने स्पर्शत: सुख:।

संरक्त: किंचिदापाण्डुरातप: शोभते क्षितौ॥ १९॥

‘इस समय अधिक लाल और कुछ-कुछ श्वेत, पीत वर्णकी धूप पृथ्वीपर फैलकर शोभा पा रही है। पूर्वाह्णकालमें तो कुछ इसका बल जान ही नहीं पड़ता है, परंतु मध्याह्नकालमें इसके स्पर्शसे सुखका अनुभव होता है॥

अवश्यायनिपातेन किंचित्प्रक्लिन्नशाद्वला।

वनानां शोभते भूमिर्निविष्टतरुणातपा॥ २०॥

‘ओसकी बूँदें पड़नेसे जहाँकी घासें कुछ-कुछ भीगी हुई जान पड़ती हैं, वह वनभूमि नवोदित सूर्यकी धूपका प्रवेश होनेसे अद्भुत शोभा पा रही है॥ २०॥

स्पृशन् सुविपुलं शीतमुदकं द्विरद: सुखम्।

अत्यन्ततृषितो वन्य: प्रतिसंहरते करम्॥ २१॥

‘यह जंगली हाथी बहुत प्यासा हुआ है। यह सुखपूर्वक प्यास बुझानेके लिये अत्यन्त शीतल जलका स्पर्श तो करता है, किंतु उसकी ठंडक असह्य होनेके कारण अपनी सूँड़को तुरंत ही सिकोड़ लेता है॥ २१॥

एते हि समुपासीना विहगा जलचारिण:।

नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवाहवम्॥ २२॥

‘ये जलचर पक्षी जलके पास ही बैठे हैं; परंतु जैसे डरपोक मनुष्य युद्धभूमिमें प्रवेश नहीं करते हैं, उसी प्रकार ये पानीमें नहीं उतर रहे हैं॥ २२॥

अवश्यायतमोनद्धा नीहारतमसावृता:।

प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वनराजय:॥ २३॥

‘रातमें ओसविन्दुओं और अन्धकारसे आच्छादित तथा प्रात:काल कुहासेके अँधेरेसे ढकी हुई ये पुष्पहीन वनश्रेणियाँ सोयी हुई-सी दिखायी देती हैं॥ २३॥

बाष्पसंछन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसा:।

हिमार्द्रवालुकैस्तीरै: सरितो भान्ति साम्प्रतम्॥ २४॥

‘इस समय नदियोंके जल भापसे ढके हुए हैं। इनमें विचरनेवाले सारस केवल अपने कलरवोंसे पहचाने जाते हैं तथा ये सरिताएँ भी ओससे भीगी हुई बालूवाले अपने तटोंसे ही प्रकाशमें आती हैं (जलसे नहीं)॥ २४॥

तुषारपतनाच्चैव मृदुत्वाद् भास्करस्य च।

शैत्यादगाग्रस्थमपि प्रायेण रसवज्जलम्॥ २५॥

‘बर्फ पड़नेसे और सूर्यकी किरणोंके मन्द होनेसे अधिक सर्दीके कारण इन दिनों पर्वतके शिखरपर पड़ा हुआ जल भी प्राय: स्वादिष्ट प्रतीत होता है॥ २५॥

जराजर्जरितै: पत्रै: शीर्णकेसरकर्णिकै:।

नालशेषा हिमध्वस्ता न भान्ति कमलाकरा:॥ २६॥

‘जो पुराने पड़ जानेके कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलोंसे उपलक्षित होनेवाले कमलोंके समूह पाला पड़नेसे गल गये हैं। उनमें डंठलमात्र शेष रह गये हैं। इसीलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है॥ २६॥

अस्म‌िंस्तु पुरुषव्याघ्र काले दु:खसमन्वित:।

तपश्चरति धर्मात्मा त्वद्भक्त्या भरत: पुरे॥ २७॥

‘पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिये बहुत दु:खी हैं और आपमें भक्ति रखते हुए नगरमें ही तपस्या कर रहे हैं॥ २७॥

त्यक्त्वा राज्यं च मानं च भोगांश्च विविधान् बहून्।

तपस्वी नियताहार: शेते शीते महीतले॥ २८॥

‘वे राज्य, मान तथा नाना प्रकारके बहुसंख्यक भोगोंका परित्याग करके तपस्यामें संलग्न हैं एवं नियमित आहार करते हुए इस शीतल महीतलपर बिना विस्तरके ही शयन करते हैं॥ २८॥

सोऽपि वेलामिमां नूनमभिषेकार्थमुद्यत:।

वृत: प्रकृतिभिर्नित्यं प्रयाति सरयूं नदीम्॥ २९॥

‘निश्चय ही भरत भी इसी बेलामें स्नानके लिये उद्यत हो मन्त्री एवं प्रजाजनोंके साथ प्रतिदिन सरयू नदीके तटपर जाते होंगे॥ २९॥

अत्यन्तसुखसंवृद्ध: सुकुमारो हिमार्दित:।

कथं त्वपररात्रेषु सरयूमवगाहते॥ ३०॥

‘अत्यन्त सुखमें पले हुए सुकुमार भरत जाड़ेका कष्ट सहते हुए रातके पिछले पहरमें कैसे सरयूजीके जलमें डुबकी लगाते होंगे॥ ३०॥

पद्मपत्रेक्षण: श्याम: श्रीमान् निरुदरो महान्।

धर्मज्ञ: सत्यवादी च हृनिषेवी जितेन्द्रिय:॥ ३१॥

प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुररिंदम:।

संत्यज्य विविधान् सौख्यानार्यं सर्वात्मनाश्रित:॥ ३२॥

‘जिनके नेत्र कमलदलके समान शोभा पाते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है और जिनके उदरका कुछ पता ही नहीं लगता है, ऐसे महान् धर्मज्ञ, सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, प्रिय वचन बोलनेवाले, मृदुल स्वभाववाले महाबाहु शत्रुदमन श्रीमान् भरतने नाना प्रकारके सुखोंको त्यागकर सर्वथा आपका ही आश्रय ग्रहण किया है॥ ३१-३२॥

जित: स्वर्गस्तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना।

वनस्थमपि तापस्ये यस्त्वामनुविधीयते॥ ३३॥

‘आपके भाई महात्मा भरतने निश्चय ही स्वर्ग-लोकपर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि वे भी तपस्यामें स्थित होकर आपके वनवासी जीवनका अनुसरण कर रहे हैं॥ ३३॥

न पित्र्यमनुवर्तन्ते मातृकं द्विपदा इति।

ख्यातो लोकप्रवादोऽयं भरतेनान्यथा कृत:॥ ३४॥

‘मनुष्य प्राय: माताके गुणोंका ही अनुवर्तन करते हैं पिताके नहीं; इस लौकिक उक्तिको भरतने अपने बर्तावसे मिथ्या प्रमाणित कर दिया है॥ ३४॥

भर्ता दशरथो यस्या: साधुश्च भरत: सुत:।

कथं नु साम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी॥ ३५॥

‘महाराज दशरथ जिसके पति हैं और भरत-जैसा साधु जिसका पुत्र है, वह माता कैकेयी वैसी क्रूरतापूर्ण दृष्टिवाली कैसे हो गयी?’॥ ३५॥

इत्येवं लक्ष्मणे वाक्यं स्नेहाद् वदति धार्मिके।

परिवादं जनन्यास्तमसहन् राघवोऽब्रवीत्॥ ३६॥

धर्मपरायण लक्ष्मण जब स्नेहवश इस प्रकार कह रहे थे, उस समय श्रीरामचन्द्रजीसे माता कैकेयीकी निन्दा नहीं सही गयी। उन्होंने लक्ष्मणसे कहा—॥ ३६॥

न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन।

तामेवेक्ष्वाकुनाथस्य भरतस्य कथां कुरु॥ ३७॥

‘तात! तुम्हें मझली माता कैकेयीकी कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये। (यदि कुछ कहना हो तो) पहलेकी भाँति इक्ष्वाकुवंशके स्वामी भरतकी ही चर्चा करो॥ ३७॥

निश्चितैव हि मे बुद्धिर्वनवासे दृढव्रता।

भरतस्नेहसंतप्ता बालिशीक्रियते पुन:॥ ३८॥

‘यद्यपि मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए वनमें रहनेका अटल निश्चय कर चुकी है, तथापि भरतके स्नेहसे संतप्त होकर पुन: चञ्चल हो उठती है॥

संस्मराम्यस्य वाक्यानि प्रियाणि मधुराणि च।

हृद्यान्यमृतकल्पानि मन:प्रह्लादनानि च॥ ३९॥

‘मुझे भरतकी वे परम प्रिय, मधुर, मनको भानेवाली और अमृतके समान हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाली बातें याद आ रही हैं॥ ३९॥

कदा ह्यहं समेष्यामि भरतेन महात्मना।

शत्रुघ्नेन च वीरेण त्वया च रघुनन्दन॥ ४०॥

‘रघुकुलनन्दन लक्ष्मण! कब वह दिन आयेगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर महात्मा भरत और वीरवर शत्रुघ्नसे मिलूँगा’॥ ४०॥

इत्येवं विलपंस्तत्र प्राप्य गोदावरीं नदीम्।

चक्रेऽभिषेकं काकुत्स्थ: सानुज: सह सीतया॥ ४१॥

इस प्रकार विलाप करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ गोदावरी नदीके तटपर जाकर स्नान किया॥ ४१॥

तर्पयित्वाथ सलिलैस्तै: पितृन् दैवतानपि।

स्तुवन्ति स्मोदितं सूर्यं देवताश्च तथानघा:॥ ४२॥

वहाँ स्नान करके उन्होंने गोदावरीके जलसे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तदनन्तर जब सूर्योदय हुआ, तब वे तीनों निष्पाप व्यक्ति भगवान् सूर्यका उपस्थान करके अन्य देवताओंकी भी स्तुति करने लगे॥

कृताभिषेक: स रराज राम:

सीताद्वितीय: सह लक्ष्मणेन।

कृताभिषेकस्त्वगराजपुत्र्या

रुद्र: सनन्दिर्भगवानिवेश:॥ ४३॥

सीता और लक्ष्मणके साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे पर्वतराजपुत्री उमा और नन्दीके साथ गङ्गाजीमें अवगाहन करके भगवान् रुद्र सुशोभित होते हैं॥ ४३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षोडश: सर्ग:॥ १६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६॥

सप्तदश: सर्ग:

श्रीरामके आश्रममें शूर्पणखाका आना, उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर उनसे अपनेको भार्याके रूपमें ग्रहण करनेके लिये अनुरोध करना

कृताभिषेको रामस्तु सीता सौमित्रिरेव च।

तस्माद् गोदावरीतीरात् ततो जग्मु: स्वमाश्रमम्॥ १॥

स्नान करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही उस गोदावरीतटसे अपने आश्रममें लौट आये॥ १॥

आश्रमं तमुपागम्य राघव: सहलक्ष्मण:।

कृत्वा पौर्वाह्णिकं कर्म पर्णशालामुपागमत्॥ २॥

उस आश्रममें आकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने पूर्वाह्णकालके होम-पूजन आदि कार्य पूर्ण किये, फिर वे दोनों भाई पर्णशालामें आकर बैठे॥ २॥

उवास सुखितस्तत्र पूज्यमानो महर्षिभि:।

स राम: पर्णशालायामासीन: सह सीतया॥ ३॥

विरराज महाबाहुश्चित्रया चन्द्रमा इव।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चकार विविधा: कथा:॥ ४॥

वहाँ सीताके साथ वे सुखपूर्वक रहने लगे। उन दिनों बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आकर वहाँ उनका सत्कार करते थे। पर्णशालामें सीताके साथ बैठे हुए महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी चित्राके साथ विराजमान चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ वहाँ तरह-तरहकी बातें किया करते थे॥ ३-४॥

तदासीनस्य रामस्य कथासंसक्तचेतस:।

तं देशं राक्षसी काचिदाजगाम यदृच्छया॥ ५॥

सा तु शूर्पणखा नाम दशग्रीवस्य रक्षस:।

भगिनी राममासाद्य ददर्श त्रिदशोपमम्॥ ६॥

उस समय जब कि श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ बातचीतमें लगे हुए थे, एक राक्षसी अकस्मात् उस स्थानपर आ पहुँची। वह दशमुख राक्षस रावणकी बहिन शूर्पणखा थी। उसने वहाँ आकर देवताओंके समान मनोहर रूपवाले श्रीरामचन्द्रजीको देखा॥ ५-६॥

दीप्तास्यं च महाबाहुं पद्मपत्रायतेक्षणम्।

गजविक्रान्तगमनं जटामण्डलधारिणम्॥ ७॥

उनका मुख तेजस्वी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल एवं सुन्दर थे। वे हाथीके समान मन्द गतिसे चलते थे। उन्होंने मस्तकपर जटामण्डल धारण कर रखा था॥ ७॥

सुकुमारं महासत्त्वं पार्थिवव्यञ्जनान्वितम्।

राममिन्दीवरश्यामं कंदर्पसदृशप्रभम्॥ ८॥

बभूवेन्द्रोपमं दृष्ट्वा राक्षसी काममोहिता।

परम सुकुमार, महान् बलशाली, राजोचित लक्षणोंसे युक्त, नील कमलके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित, कामदेवके सदृश सौन्दर्यशाली तथा इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीरामको देखते ही वह राक्षसी कामसे मोहित हो गयी॥ ८॥

सुमुखं दुर्मुखी रामं वृत्तमध्यं महोदरी॥ ९॥

विशालाक्षं विरूपाक्षी सुकेशं ताम्रमूर्धजा।

प्रियरूपं विरूपा सा सुस्वरं भैरवस्वना॥ १०॥

श्रीरामका मुख सुन्दर था और शूर्पणखाका मुख बहुत ही भद्दा एवं कुरूप था। उनका मध्यभाग (कटिप्रदेश और उदर) क्षीण था; किंतु शूर्पणखा बेडौल लंबे पेटवाली थी। श्रीरामकी आँखें बड़ी-बड़ी होनेके कारण मनोहर थीं, परंतु उस राक्षसीके नेत्र कुरूप और डरावने थे। श्रीरघुनाथजीके केश चिकने और सुन्दर थे, परंतु उस निशाचरीके सिरके बाल ताँबे-जैसे लाल थे। श्रीरामका रूप बड़ा प्यारा लगता था, किंतु शूर्पणखाका रूप बीभत्स और विकराल था। श्रीराघवेन्द्र मधुर स्वरमें बोलते थे, किंतु वह राक्षसी भैरवनाद करनेवाली थी॥ ९-१०॥

तरुणं दारुणा वृद्धा दक्षिणं वामभाषिणी।

न्यायवृत्तं सुदुर्वृत्ता प्रियमप्रियदर्शना॥ ११॥

ये देखनेमें सौम्य और नित्य नूतन तरुण थे, किंतु वह निशाचरी क्रूर और हजारों वर्षोंकी बुढि़या थी। ये सरलतासे बात करनेवाले और उदार थे, किंतु उसकी बातोंमें कुटिलता भरी रहती थी। ये न्यायोचित सदाचारका पालन करनेवाले थे और वह अत्यन्त दुराचारिणी थी। श्रीराम देखनेमें प्यारे लगते थे और शूर्पणखाको देखते ही घृणा पैदा होती थी॥ ११॥

शरीरजसमाविष्टा राक्षसी राममब्रवीत्।

जटी तापसवेषेण सभार्य: शरचापधृक्॥ १२॥

आगतस्त्वमिमं देशं कथं राक्षससेवितम्।

किमागमनकृत्यं ते तत्त्वमाख्यातुमर्हसि॥ १३॥

तो वह राक्षसी कामभावसे आविष्ट हो (मनोहर रूप बनाकर) श्रीरामके पास आयी और बोली—‘तपस्वीके वेशमें मस्तकपर जटा धारण किये, साथमें स्त्रीको लिये और हाथमें धनुष-बाण ग्रहण किये, इस राक्षसोंके देशमें तुम कैसे चले आये? यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या प्रयोजन है? यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ’॥ १२-१३॥

एवमुक्तस्तु राक्षस्या शूर्पणख्या परंतप:।

ऋजुबुद्धितया सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥ १४॥

राक्षसी शूर्पणखाके इस प्रकार पूछनेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने अपने सरलस्वभावके कारण सब कुछ बताना आरम्भ किया—॥ १४॥

आसीद् दशरथो नाम राजा त्रिदशविक्रम:।

तस्याहमग्रज: पुत्रो रामो नाम जनै: श्रुत:॥ १५॥

‘देवि! दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो देवताओंके समान पराक्रमी थे। मैं उन्हींका ज्येष्ठ पुत्र हूँ और लोगोंमें राम नामसे विख्यात हूँ॥ १५॥

भ्रातायं लक्ष्मणो नाम यवीयान् मामनुव्रत:।

इयं भार्या च वैदेही मम सीतेति विश्रुता॥ १६॥

‘ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं, जो सदा मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं और ये मेरी पत्नी हैं, जो विदेहराज जनककी पुत्री तथा सीता नामसे प्रसिद्ध हैं॥ १६॥

नियोगात् तु नरेन्द्रस्य पितुर्मातुश्च यन्त्रित:।

धर्मार्थं धर्मकांक्षी च वनं वस्तुमिहागत:॥ १७॥

‘अपने पिता महाराज दशरथ और माता कैकेयीकी आज्ञासे प्रेरित होकर मैं धर्मपालनकी इच्छा रखकर धर्मरक्षाके ही उद्देश्यसे इस वनमें निवास करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १७॥

त्वां तु वेदितुमिच्छामि कस्य त्वं कासि कस्य वा।

त्वं हि तावन्मनोज्ञाङ्गी राक्षसी प्रतिभासि मे॥ १८॥

इह वा किंनिमित्तं त्वमागता ब्रूहि तत्त्वत:।

‘अब मैं तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम किसकी पुत्री हो? तुम्हारा नाम क्या है? और तुम किसकी पत्नी हो? तुम्हारे अङ्ग इतने मनोहर हैं कि तुम मुझे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली कोई राक्षसी प्रतीत होती हो। यहाँ किस लिये तुम आयी हो? यह ठीक-ठीक बताओ’॥ १८/

साब्रवीद् वचनं श्रुत्वा राक्षसी मदनार्दिता॥ १९॥

श्रूयतां राम तत्त्वार्थं वक्ष्यामि वचनं मम।

अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी॥ २०॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर वह राक्षसी कामसे पीडि़त होकर बोली—‘श्रीराम! मैं सब कुछ ठीक-ठीक बता रही हूँ। तुम मेरी बात सुनो। मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी हूँ॥

अरण्यं विचरामीदमेका सर्वभयंकरा।

रावणो नाम मे भ्राता यदि ते श्रोत्रमागत:॥ २१॥

‘मैं समस्त प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करती हुई इस वनमें अकेली विचरती हूँ। मेरे भाईका नाम रावण है। सम्भव है, उसका नाम तुम्हारे कानोंतक पहुँचा हो॥

वीरो विश्रवस: पुत्रो यदि ते श्रोत्रमागत:।

प्रवृद्धनिद्रश्च सदा कुम्भकर्णो महाबल:॥ २२॥

‘रावण विश्रवा मुनिका वीर पुत्र है, यह बात भी तुम्हारे सुननेमें आयी होगी। मेरा दूसरा भाई महाबली कुम्भकर्ण है, जिसकी निद्रा सदा ही बढ़ी रहती है॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा न तु राक्षसचेष्टित:।

प्रख्यातवीर्यौ च रणे भ्रातरौ खरदूषणौ॥ २३॥

‘मेरे तीसरे भाईका नाम विभीषण है, परंतु वह धर्मात्मा है, राक्षसोंके आचार-विचारका वह कभी पालन नहीं करता। युद्धमें जिनका पराक्रम विख्यात है, वे खर और दूषण भी मेरे भाई ही हैं॥ २३॥

तानहं समतिक्रान्तां राम त्वापूर्वदर्शनात्।

समुपेतास्मि भावेन भर्तारं पुरुषोत्तमम्॥ २४॥

‘श्रीराम! बल और पराक्रममें मैं अपने उन सभी भाइयोंसे बढ़कर हूँ। तुम्हारे प्रथम दर्शनसे ही मेरा मन तुममें आसक्त हो गया है। (अथवा तुम्हारा रूप-सौन्दर्य अपूर्व है। आजसे पहले देवताओंमें भी किसीका ऐसा रूप मेरे देखनेमें नहीं आया है, अत: इस अपूर्व रूपके दर्शनसे मैं तुम्हारे प्रति आकृष्ट हो गयी हूँ।) यही कारण है कि मैं तुम-जैसे पुरुषोत्तमके प्रति पतिकी भावना रखकर बड़े प्रेमसे पास आयी हूँ॥ २४॥

अहं प्रभावसम्पन्ना स्वच्छन्दबलगामिनी।

चिराय भव भर्ता मे सीतया किं करिष्यसि॥ २५॥

‘मैं प्रभाव (उत्कृष्ट भाव—अनुराग अथवा महान् बल-पराक्रम) से सम्पन्न हूँ और अपनी इच्छा तथा शक्तिसे समस्त लोकोंमें विचरण कर सकती हूँ, अत: अब तुम दीर्घकालके लिये मेरे पति बन जाओ। इस अबला सीताको लेकर क्या करोगे?॥ २५॥

विकृता च विरूपा च न सेयं सदृशी तव।

अहमेवानुरूपा ते भार्यारूपेण पश्य माम्॥ २६॥

‘यह विकारयुक्त और कुरूपा है, अत: तुम्हारे योग्य नहीं है। मैं ही तुम्हारे अनुरूप हूँ, अत: मुझे अपनी भार्याके रूपमें देखो॥ २६॥

इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।

अनेन सह ते भ्रात्रा भक्षयिष्यामि मानुषीम्॥ २७॥

‘यह सीता मेरी दृष्टिमें कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और मानवी है, मैं इसे तुम्हारे इस भाईके साथ ही खा जाऊँगी॥ २७॥

तत: पर्वतशृङ्गाणि वनानि विविधानि च।

पश्यन् सह मया कामी दण्डकान् विचरिष्यसि॥ २८॥

‘फिर तुम कामभावयुक्त हो मेरे साथ पर्वतीय शिखरों और नाना प्रकारके वनोंकी शोभा देखते हुए दण्डकवनमें विहार करना’॥ २८॥

इत्येवमुक्त: काकुत्स्थ: प्रहस्य मदिरेक्षणाम्।

इदं वचनमारेभे वक्तुं वाक्यविशारद:॥ २९॥

शूर्पणखाके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी जोर-जोरसे हँसने लगे, फिर उन्होंने उस मतवाले नेत्रोंवाली निशाचरीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तदश: सर्ग:॥ १७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७॥

 

अष्टादश: सर्ग:

श्रीरामके टाल देनेपर शूर्पणखाका लक्ष्मणसे प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालनेपर उसका सीतापर आक्रमण और लक्ष्मणका उसके नाक-कान काट लेना

तां तु शूर्पणखां राम: कामपाशावपाशिताम्।

स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामने कामपाशसे बँधी हुई उस शूर्पणखासे अपनी इच्छाके अनुसार मधुर वाणीमें मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—॥ १॥

कृतदारोऽस्मि भवति भार्येयं दयिता मम।

त्वद्विधानां तु नारीणां सुदु:खा ससपत्नता॥ २॥

‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियोंके लिये तो सौतका रहना अत्यन्त दु:खदायी ही होगा॥ २॥

अनुजस्त्वेष मे भ्राता शीलवान् प्रियदर्शन:।

श्रीमानकृतदारश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥ ३॥

अपूर्वी भार्यया चार्थी तरुण: प्रियदर्शन:।

अनुरूपश्च ते भर्ता रूपस्यास्य भविष्यति॥ ४॥

‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखनेमें प्रिय लगनेवाले और बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणोंसे सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखनेमें बड़ा मनोरम है। अत: यदि इन्हें भार्याकी चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य पति होंगे॥ ३-४॥

एनं भज विशालाक्षि भर्तारं भ्रातरं मम।

असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा॥ ५॥

‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्वतका सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मणको पतिके रूपमें अपनाकर सौतके भयसे रहित हो इनकी सेवा करो’॥ ५॥

इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काममोहिता।

विसृज्य रामं सहसा ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ ६॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वह कामसे मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मणके पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली—॥ ६॥

अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्याहं वरवर्णिनी।

मया सह सुखं सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि॥ ७॥

‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य मैं ही हूँ, अत: मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेनेपर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्यमें सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’॥ ७॥

एवमुक्तस्तु सौमित्री राक्षस्या वाक्यकोविद:।

तत: शूर्पनखीं स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तमब्रवीत्॥ ८॥

उस राक्षसीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरीसे यह युक्तियुक्त बात बोले—॥ ८॥

कथं दासस्य मे दासी भार्या भवितुमिच्छसि।

सोऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा कमलवर्णिनि॥ ९॥

‘लाल कमलके समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामके अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?॥ ९॥

समृद्धार्थस्य सिद्धार्था मुदितामलवर्णिनी।

आर्यस्य त्वं विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी॥ १०॥

‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हींकी छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हींके योग्य निर्मल हैं॥ १०॥

एतां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।

भार्यां वृद्धां परित्यज्य त्वामेवैष भजिष्यति॥ ११॥

‘कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्याको त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे104॥ ११॥

को हि रूपमिदं श्रेष्ठं संत्यज्य वरवर्णिनि।

मानुषीषु वरारोहे कुर्याद् भावं विचक्षण:॥ १२॥

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूपको छोड़कर मानवकन्याओंसे प्रेम करेगा?’॥ १२॥

इति सा लक्ष्मणेनोक्ता कराला निर्णतोदरी।

मन्यते तद्वच: सत्यं परिहासाविचक्षणा॥ १३॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर परिहासको न समझनेवाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसीने उनकी बातको सच्ची माना॥ १३॥

सा रामं पर्णशालायामुपविष्टं परंतपम्।

सीतया सह दुर्धर्षमब्रवीत् काममोहिता॥ १४॥

वह पर्णशालामें सीताके साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आयी और कामसे मोहित होकर बोली—॥ १४॥

इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्।

वृद्धां भार्यामवष्टभ्य न मां त्वं बहु मन्यसे॥ १५॥

‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धाका आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो॥ १५॥

अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्।

त्वया सह चरिष्यामि नि:सपत्ना यथासुखम्॥ १६॥

‘अत: आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषीको खा जाऊँगी और इस सौतके न रहनेपर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’॥ १६॥

इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा।

अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥ १७॥

ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारोंके समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोधमें भरकर मृगनयनी सीताकी ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारेपर टूट पड़ी हो॥ १७॥

तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबल:।

विगृह्य राम: कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १८॥

महाबली श्रीरामने मौतके फंदेकी तरह आती हुई उस राक्षसीको हुंकारसे रोककर कुपित हो लक्ष्मणसे कहा—॥ १८॥

क्रूरैरनार्यै: सौमित्रे परिहास: कथंचन।

न कार्य: पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम्॥ १९॥

‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करनेवाले अनार्योंसे किसी प्रकारका परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीताके प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किलसे बचे हैं॥ १९॥

इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम्।

राक्षसीं पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि॥ २०॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसीको कुरूप—किसी अङ्गसे हीन कर देना चाहिये’॥ २०॥

इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्या: क्रुद्धो रामस्य पश्यत:।

उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबल:॥ २१॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर क्रोधमें भरे हुए महाबली लक्ष्मणने उनके देखते-देखते म्यानसे तलवार खींच ली और शूर्पणखाके नाक-कान काट लिये॥ २१॥

निकृत्तकर्णनासा तु विस्वरं सा विनद्य च।

यथागतं प्रदुद्राव घोरा शूर्पणखा वनम्॥ २२॥

नाक और कान कट जानेपर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोरसे चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वनमें भाग गयी॥ २२॥

सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणितोक्षिता।

ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयद:॥ २३॥

खूनसे भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूपवाली निशाचरी नाना प्रकारके स्वरोंमें जोर-जोरसे चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकालमें मेघोंकी घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो॥ २३॥

सा विक्षरन्ती रुधिरं बहुधा घोरदर्शना।

प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम्॥ २४॥

वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। उसने अपने कटे हुए अङ्गोंसे बारंबार खूनकी धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वनके भीतर प्रवेश किया॥ २४॥

ततस्तु सा राक्षससङ्घसंवृतं

खरं जनस्थानगतं विरूपिता।

उपेत्य तं भ्रातरमुग्रतेजसं

पपात भूमौ गगनाद् यथाशनि:॥ २५॥

लक्ष्मणके द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँसे भागकर राक्षससमूहसे घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थान-निवासी भ्राता खरके पास गयी और जैसे आकाशसे बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वीपर गिर पड़ी॥

तत: सभार्यं भयमोहमूर्च्छिता

सलक्ष्मणं राघवमागतं वनम्।

विरूपणं चात्मनि शोणितोक्षिता

शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥ २६॥

खरकी वह बहन रक्तसे नहा गयी थी और भय तथा मोहसे अचेत-सी हो रही थी। उसने वनमें सीता और लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीके आने और अपने कुरूप किये जानेका सारा वृत्तान्त खरसे कह सुनाया॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टादश: सर्ग:॥ १८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८॥

 

एकोनविंश: सर्ग:

शूर्पणखाके मुखसे उसकी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनकर क्रोधमें भरे हुए खरकाश्रीराम आदिके वधके लिये चौदह राक्षसोंको भेजना

तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम्।

भगिनीं क्रोधसंतप्त: खर: पप्रच्छ राक्षस:॥ १॥

अपनी बहिनको इस प्रकार अङ्गहीन और रक्तसे भीगी हुई अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ी देख राक्षस खर क्रोधसे जल उठा और इस प्रकार पूछने लगा—॥ १॥

उत्तिष्ठ तावदाख्याहि प्रमोहं जहि सम्भ्रमम्।

व्यक्तमाख्याहि केन त्वमेवंरूपा विरूपिता॥ २॥

‘बहिन उठो और अपना हाल बताओ। मूर्च्छा और घबराहट छोड़ो तथा साफ-साफ कहो, किसने तुम्हें इस तरह रूपहीन बनाया है?॥ २॥

क: कृष्णसर्पमासीनमाशीविषमनागसम्।

तुदत्यभिसमापन्नमङ्गुल्यग्रेण लीलया॥ ३॥

‘कौन अपने सामने आकर चुपचाप बैठे हुए निरपराध एवं विषैले काले साँपको अपनी अँगुलियोंके अग्रभागसे खेल-खेलमें पीड़ा दे रहा है?॥ ३॥

कालपाशं समासज्य कण्ठे मोहान्न बुध्यते।

यस्त्वामद्य समासाद्य पीतवान् विषमुत्तमम्॥ ४॥

‘जिसने आज तुमपर आक्रमण करके तुम्हारे नाक-कान काटे हैं, उसने उच्चकोटिका विष पी लिया है तथा अपने गलेमें कालका फंदा डाल लिया है, फिर भी मोहवश वह इस बातको समझ नहीं रहा है॥ ४॥

बलविक्रमसम्पन्ना कामगा कामरूपिणी।

इमामवस्थां नीता त्वं केनान्तकसमागता॥ ५॥

‘तुम तो स्वयं ही दूसरे प्राणियोंके लिये यमराजके समान हो, बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो तथा इच्छानुसार सर्वत्र विचरने और अपनी रुचिके अनुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हो, फिर भी तुम्हें किसने इस दुरवस्थामें डाला है; जिससे दु:खी होकर तुम यहाँ आयी हो?॥ ५॥

देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।

कोऽयमेवं महावीर्यस्त्वां विरूपां चकार ह॥ ६॥

‘देवताओं, गन्धर्वों, भूतों तथा महात्मा ऋषियोंमें यह कौन ऐसा महान् बलशाली है, जिसने तुम्हें रूपहीन बना दिया?॥ ६॥

नहि पश्याम्यहं लोके य: कुर्यान्मम विप्रियम्।

अमरेषु सहस्राक्षं महेन्द्रं पाकशासनम्॥ ७॥

‘संसारमें तो मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो मेरा अप्रिय कर सके। देवताओंमें सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र भी ऐसा साहस कर सकें, यह मुझे नहीं दिखायी देता॥

अद्याहं मार्गणै: प्राणानादास्ये जीवितान्तगै:।

सलिले क्षीरमासक्तं निष्पिबन्निव सारस:॥ ८॥

‘जैसे हंस जलमें मिले हुए दूधको पी लेता है, उसी प्रकार मैं आज इन प्राणान्तकारी बाणोंसे तुम्हारे अपराधीके शरीरसे उसके प्राण ले लूँगा॥ ८॥

निहतस्य मया संख्ये शरसंकृत्तमर्मण:।

सफेनं रुधिरं कस्य मेदिनी पातुमिच्छति॥ ९॥

‘युद्धमें मेरे बाणोंसे जिसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो मेरे हाथों मारा गया है, ऐसे किस पुरुषके फेनसहित गरम-गरम रक्तको यह पृथ्वी पीना चाहती है?॥ ९॥

कस्य पत्ररथा: कायान्मांसमुत्कृत्य संगता:।

प्रहृष्टा भक्षयिष्यन्ति निहतस्य मया रणे॥ १०॥

‘रणभूमिमें मेरे द्वारा मारे गये किस व्यक्तिके शरीरसे मांस कुतर-कुतरकर ये हर्षमें भरे हुए झुंड-के-झुंड पक्षी खायँगे?॥ १०॥

तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा:।

मयापकृष्टं कृपणं शक्तास्त्रातुं महाहवे॥ ११॥

‘जिसे मैं महासमरमें खींच लूँ, उस दीन अपराधीको देवता, गन्धर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं बचा सकते॥

उपलभ्य शनै: संज्ञां तं मे शंसितुमर्हसि।

येन त्वं दुर्विनीतेन वने विक्रम्य निर्जिता॥ १२॥

‘धीरे-धीरे होशमें आकर तुम मुझे उसका नाम बताओ, जिस उद्दण्डने वनमें तुमपर बलपूर्वक आक्रमण करके तुम्हें परास्त किया है’॥ १२॥

इति भ्रातुर्वच: श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषत:।

तत: शूर्पणखा वाक्यं सबाष्पमिदमब्रवीत्॥ १३॥

भाईका विशेषत: क्रोधमें भरे हुए भाई खरका यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली—॥ १३॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।

पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥ १४॥

‘भैया! वनमें दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखनेमें बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं। उन दोनोंके बड़े-बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों। वे दोनों ही वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं॥ १४॥

फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।

पुत्रौ दशरथस्यास्तां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १५॥

‘फल और मूल ही उनका भोजन है। वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। दोनों ही राजा दशरथके पुत्र और आपसमें भाई-भाई हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं॥ १५॥

गन्धर्वराजप्रतिमौ पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।

देवौ वा दानवावेतौ न तर्कयितुमुत्सहे॥ १६॥

‘वे दो गन्धर्वराजोंके समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमानसे भी नहीं जान सकती॥ १६॥

तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता।

दृष्टा तत्र मया नारी तयोर्मध्ये सुमध्यमा॥ १७॥

‘उन दोनोंके बीचमें एक तरुण अवस्थावाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीरका मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है। वह सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित है॥

ताभ्यामुभाभ्यां सम्भूय प्रमदामधिकृत्य ताम्।

इमामवस्थां नीताहं यथानाथासती तथा॥ १८॥

‘उस स्त्रीके ही कारण उन दोनोंने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्रीकी भाँति ऐसी दुर्गति की है॥

तस्याश्चानृजुवृत्तायास्तयोश्च हतयोरहम्।

सफेनं पातुमिच्छामि रुधिरं रणमूर्धनि॥ १९॥

‘मैं युद्धमें उस कुटिल आचारवाली स्त्रीके और उन दोनों राजकुमारोंके भी मारे जानेपर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ॥ १९॥

एष मे प्रथम: काम: कृतस्तत्र त्वया भवेत्।

तस्यास्तयोश्च रुधिरं पिबेयमहमाहवे॥ २०॥

‘रणभूमिमें उस स्त्रीका और उन पुरुषोंका भी रक्त मैं पी सकूँ—यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये॥ २०॥

इति तस्यां ब्रुवाणायां चतुर्दश महाबलान्।

व्यादिदेश खर: क्रुद्धो राक्षसानन्तकोपमान्॥ २१॥

शूर्पणखाके ऐसा कहनेपर खरने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसोंको, जो यमराजके समान भयंकर थे, यह आदेश दिया—॥ २१॥

मानुषौ शस्त्रसम्पन्नौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।

प्रविष्टौ दण्डकारण्यं घोरं प्रमदया सह॥ २२॥

‘वीरो! इस भयंकर दण्डकारण्यके भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्रीके साथ घुस आये हैं॥ २२॥

तौ हत्वा तां च दुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ।

इयं च भगिनी तेषां रुधिरं मम पास्यति॥ २३॥

‘तुमलोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषोंको मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्रीके भी प्राण ले लो। मेरी यह बहिन उन तीनोंका रक्त पीयेगी॥ २३॥

मनोरथोऽयमिष्टोऽस्या भगिन्या मम राक्षसा:।

शीघ्रं सम्पाद्यतां गत्वा तौ प्रमथ्य स्वतेजसा॥ २४॥

‘राक्षसो! मेरी इस बहिनका यह प्रिय मनोरथ है। तुम वहाँ जाकर अपने प्रभावसे उन दोनों मनुष्योंको मार गिराओ और बहिनके इस मनोरथको शीघ्र पूरा करो॥

युष्माभिर्निहतौ दृष्ट्वा तावुभौ भ्रातरौ रणे।

इयं प्रहृष्टा मुदिता रुधिरं युधि पास्यति॥ २५॥

‘रणभूमिमें उन दोनों भाइयोंको तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्षसे खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्धस्थलमें उनका रक्त पान करेगी’॥ २५॥

इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसास्ते चतुर्दश।

तत्र जग्मुस्तया सार्धं घना वातेरिता इव॥ २६॥

खरकी ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदहों राक्षस हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान विवश हो शूर्पणखाके साथ पञ्चवटीको गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनविंश: सर्ग:॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥

 

विंश: सर्ग:

श्रीरामद्वारा खरके भेजे हुए चौदह राक्षसोंका वध

तत: शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता।

राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया॥ १॥

तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमपर आयी। उसने सीतासहित उन दोनों भाइयोंका उन राक्षसोंको परिचय दिया॥ १॥

ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम्।

ददृशु: सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम्॥ २॥

राक्षसोंने देखा—महाबली श्रीराम सीताके साथ पर्णशालामें बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवामें उपस्थित हैं॥ २॥

तां दृष्ट्वा राघव: श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान्।

अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥ ३॥

इधर श्रीमान् रघुनाथजीने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसोंको भी देखा। देखकर वे उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ ३॥

मुहूर्तं भव सौमित्रे सीताया: प्रत्यनन्तर:।

इमानस्या वधिष्यामि पदवीमागतानिह॥ ४॥

‘सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देरतक सीताके पास खड़े हो जाओ। मैं इस राक्षसीके सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरोंका यहाँ अभी वध कर डालूँगा’॥ ४॥

वाक्यमेतत् तत: श्रुत्वा रामस्य विदितात्मन:।

तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन्॥ ५॥

अपने स्वरूपको समझनेवाले श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥ ५॥

राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम्।

चकार सज्यं धर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत्॥ ६॥

तब धर्मात्मा रघुनाथजीने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसोंसे कहा—॥

पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम्॥ ७॥

फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।

वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ॥ ८॥

‘हम दोनों भाई राजा दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीताके साथ इस दुर्गम दण्डकारण्यमें आकर फल-मूलका आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हैं और ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डकवनमें निवास करनेवाले हम दोनों भाइयोंकी तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो?॥ ७-८॥

युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे।

ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्त: सशरासन:॥ ९॥

‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियोंका अपराध करनेवाले हो। उन ऋषि-मुनियोंकी आज्ञासे ही मैं धनुष-बाण लेकर महासमरमें तुम्हारा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ ९॥

तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ।

यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचरा:॥ १०॥

‘निशाचरो! यदि तुम्हें युद्धसे संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणोंका लोभ हो तो लौट जाओ (एक क्षणके लिये भी यहाँ न रुको)’॥ १०॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश।

ऊचुर्वाचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्ना: शूलपाणय:॥ ११॥

संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम्।

परुषा मधुराभाषं हृष्टा दृष्टपराक्रमम्॥ १२॥

श्रीरामकी यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे। ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले वे घोर निशाचर हाथोंमें शूल लिये क्रोधसे लाल आँखें करके कठोर वाणीमें हर्ष और उत्साहके साथ स्वभावत: लाल नेत्रोंवाले मधुरभाषी श्रीरामसे, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले—॥ ११-१२॥

क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तु: खरस्य सुमहात्मन:।

त्वमेव हास्यसे प्राणान् सद्योऽस्माभिर्हतो युधि॥ १३॥

‘अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खरको क्रोध दिलाया है; अत: हमलोगोंके हाथसे युद्धमें मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ १३॥

का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि।

अस्माकमग्रत: स्थातुं किं पुनर्योद्धुमाहवे॥ १४॥

‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है॥ १४॥

एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघै: शूलपट्टिशै:।

प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं च धनुश्च करपीडितम्॥ १५॥

‘हमारी भुजाओंद्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशोंकी मार खाकर तू अपने हाथमें दबाये हुए इस धनुषको, बल-पराक्रमके अभिमानको तथा अपने प्राणोंको भी एक साथ ही त्याग देगा’॥ १५॥

इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश।

उद्यतायुधनिस्त्र‌िंशा राममेवाभिदुद्रुवु:॥ १६॥

ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरहके आयुध और तलवारें लिये श्रीरामपर ही टूट पड़े॥ १६॥

चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम्।

तानि शूलानि काकुत्स्थ: समस्तानि चतुर्दश॥ १७॥

तावद्भिरेव चिच्छेद शरै: काञ्चनभूषितै:।

उन राक्षसोंने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्रपर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त चौदहों शूलोंको उतने ही सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा काट डाला॥ १७/

तत: पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान्॥ १८॥

जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान्।

गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान्॥ १९॥

मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतु:।

तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजीने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथमें लिये। फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणोंको रखा और कानतक खींचकर राक्षसोंको लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्रने वज्रोंका प्रहार किया हो॥ १८-१९/

ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुता:॥ २०॥

विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगा:।

वे बाण बड़े वेगसे उन राक्षसोंकी छाती छेदकर रुधिरमें डूबे हुए निकले और बाँबीसे बाहर आये हुए सर्पोंकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २०/

तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमा:॥ २१॥

निपेतु: शोणितस्नाता विकृता विगतासव:।

उन नाराचोंसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वे राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये। वे सब-के-सब खूनसे नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्थामें उनके प्राणपखेरू उड़ गये॥ २१/

तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्छिता॥ २२॥

उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता।

पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लरी॥ २३॥

उन सबको पृथ्वीपर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी और खरके पास जाकर पुन: आर्तभावसे गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकोंका खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लताके समान प्रतीत होती थी॥ २२-२३॥

भ्रातु: समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत्।

सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा॥ २४॥

भाईके निकट शोकसे पीडि़त हुई शूर्पणखा बड़े जोरसे आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी। उस समय उसके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी॥ २४॥

निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान्

प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्तत:।

वधं च तेषां निखिलेन रक्षसां

शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥ २५॥

रणभूमिमें उन राक्षसोंको मारा गया देख खरकी बहिन शूर्पणखा पुन: वहाँसे भागी हुई आयी। उसने उन समस्त राक्षसोंके वधका सारा समाचार भाईसे कह सुनाया॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥

 

एकविंश: सर्ग:

शूर्पणखाका खरके पास आकर उन राक्षसोंके वधका समाचार बताना और रामका भय दिखाकर उसे युद्धके लिये उत्तेजित करना

स पुन: पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुन:।

उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम्॥ १॥

शूर्पणखाको पुन: पृथ्वीपर पड़ी हुई देख अनर्थके लिये आयी हुई उस बहिनसे खरने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणीमें फिर कहा—॥ १॥

मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसा: पिशिताशना:।

त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टा: किमर्थं रुद्यते पुन:॥ २॥

‘बहिन! मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये उस समय बहुत-से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसोंको जानेकी आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो?॥ २॥

भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यश:।

हन्यमाना न हन्यन्ते न न कुर्युर्वचो मम॥ ३॥

‘मैंने जिन राक्षसोंको भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखनेवाले और सदा मेरा हित चाहनेवाले हैं। वे किसीके मारनेपर भी मर नहीं सकते। उनके द्वारा मेरी आज्ञाका पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है॥ ३॥

किमेतच्छ्रोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुन:।

हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ॥ ४॥

‘फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ‘हा नाथ’ की पुकार मचाती हुई साँपकी तरह धरतीपर लोट रही हो। मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥ ४॥

अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति॥ ५॥

‘मेरे-जैसे संरक्षकके रहते हुए तुम अनाथकी तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत। घबराहट छोड़ दो’॥ ५॥

इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता।

विमृज्य नयने सास्रे खरं भ्रातरमब्रवीत्॥ ६॥

खरके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर वह दुर्धर्ष राक्षसी अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर भाई खरसे बोली—॥

अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका।

शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया च परिसान्त्विता॥ ७॥

‘भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ—यह बताती हूँ, सुनो—मेरे नाक-कान कट गये और मैं खूनकी धारासे नहा उठी, उस अवस्थामें जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी॥ ७॥

प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश।

निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम्॥ ८॥

ते तु रामेण सामर्षा: शूलपट्टिशपाणय:।

समरे निहता: सर्वे सायकैर्मर्मभेदिभि:॥ ९॥

‘तत्पश्चात् मेरा प्रिय करनेके लिये लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके उद्देश्यसे तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्षमें भरकर हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु रामने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन सबको समराङ्गणमें मार गिराया॥ ८-९॥

तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान्।

रामस्य च महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम॥ १०॥

‘उन महान् वेगशाली निशाचरोंको क्षणभरमें ही धराशायी हुआ देख रामके उस महान् पराक्रमपर दृष्टिपात करके मेरे मनमें बड़ा भय उत्पन्न हो गया॥

सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा च निशाचर।

शरणं त्वां पुन: प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी॥ ११॥

‘निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ। मुझे सब ओर भय-ही-भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरणमें आयी हूँ॥ ११॥

विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि।

किं मां न त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे॥ १२॥

‘मैं शोकके उस विशाल समुद्रमें डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रासकी तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं। तुम उस शोकसागरसे मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो?॥ १२॥

एते च निहता भूमौ रामेण निशितै: शरै:।

ये च मे पदवीं प्राप्ता राक्षसा: पिशिताशना:॥ १३॥

‘जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के-सब रामके पैने बाणोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं॥

मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्ष:सु तेषु च।

रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर॥ १४॥

दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम्।

‘राक्षसराज! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसोंपर तुम्हें दया आती हो तथा यदि रामके साथ लोहा लेनेके लिये तुममें शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्यमें घर बनाकर रहनेवाले राम राक्षसोंके लिये कण्टक हैं॥ १४/

यदि रामममित्रघ्नं न त्वमद्य वधिष्यसि॥ १५॥

तव चैवाग्रत: प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा।

‘यदि तुम आज ही शत्रुघाती रामका वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है॥ १५॥

बुद्ध्याहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे॥ १६॥

स्थातुं प्रतिमुखे शक्त: सबलोऽपि महारणे।

‘मैं बुद्धिसे बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमरमें सबल होकर भी रामके सामने युद्धमें नहीं ठहर सकोगे॥ १६॥

शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रम:॥ १७॥

अपयाहि जनस्थानात् त्वरित: सहबान्धव:।

जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन॥ १८॥

‘तुम अपनेको शूरवीर मानते हो, किंतु तुममें शौर्य है ही नहीं। तुमने झूठे ही अपने-आपमें पराक्रमका आरोप कर लिया है। मूढ़! तुम समराङ्गणमें उन दोनोंको मार डालो अन्यथा अपने कुलमें कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओंके साथ तुरंत ही इस जनस्थानसे भाग जाओ॥ १७-१८॥

मानुषौ तौ न शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ।

नि:सत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह॥ १९॥

‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारनेकी तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे-जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षसका यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है?॥ १९॥

रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि।

स हि तेज:समायुक्तो रामो दशरथात्मज:॥ २०॥

भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता।

‘तुम रामके तेजसे पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं। उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक-कानसे हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया’॥ २०॥

एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी॥ २१॥

भ्रातु: समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह।

कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदु:खिता॥ २२॥

इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफाके समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोकसे आतुर हो अपने भाईके पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दु:खी हो दोनों हाथोंसे पेट पीटती हुई फूट-फूटकर रोने लगी॥ २१-२२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकविंश: सर्ग:॥ २१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१॥

 

द्वाविंश: सर्ग:

चौदह हजार राक्षसोंकी सेनाके साथ खर-दूषणकाजनस्थानसे पञ्चवटीकी ओर प्रस्थान

एवमाधर्षित: शूर: शूर्पणख्या खरस्तत:।

उवाच रक्षसां मध्ये खर: खरतरं वच:॥ १॥

शूर्पणखाद्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खरने राक्षसोंके बीच अत्यन्त कठोर वाणीमें कहा—॥ १॥

तवापमानप्रभव: क्रोधोऽयमतुलो मम।

न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम्॥ २॥

‘बहिन! तुम्हारे अपमानके कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमाको प्रचण्ड वेगसे बढ़े हुए खारे पानीके समुद्रके जलको (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घावपर नमकीन पानीका छिड़कना)॥ २॥

न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम्।

आत्मदुश्चरितै: प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते॥ ३॥

‘मैं पराक्रमकी दृष्टिसे रामको कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्यका जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मोंसे ही मारा जाकर आज प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ ३॥

बाष्प: संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम्।

अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम्॥ ४॥

‘तुम अपने आँसुओंको रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित रामको अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ॥ ४॥

परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले।

रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि॥ ५॥

‘राक्षसी! आज मेरे फरसेकी मारसे निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए रामका गरम-गरम रक्त तुम्हें पीनेको मिलेगा’॥ ५॥

सम्प्रहृष्टा वच: श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम्।

प्रशशंस पुनर्मौर्ख्याद् भ्रातरं रक्षसां वरम्॥ ६॥

खरके मुखसे निकली हुई इस बातको सुनकर शूर्पणखाको पड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसोंमें श्रेष्ठ भाई खरकी पुन: भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ६॥

तया परुषित: पूर्वं पुनरेव प्रशंसित:।

अब्रवीद् दूषणं नाम खर: सेनापतिं तदा॥ ७॥

उसने पहले जिसका कठोर वाणीद्वारा तिरस्कार किया और पुन: जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खरने उस समय अपने सेनापति दूषणसे कहा—॥ ७॥

चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम्।

रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम्॥ ८॥

नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम्।

सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय॥ ९॥

‘सौम्य! मेरे मनके अनुकूल चलनेवाले, युद्धके मैदानसे पीछे न हटनेवाले, भयंकर वेगशाली, मेघोंकी काली घटाके समान काले रंगवाले, लोगोंकी हिंसासे ही क्रीड़ा-विहार करनेवाले तथा युद्धमें उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र राक्षसोंको युद्धके लिये भेजनेकी पूरी तैयारी कराओ॥ ८-९॥

उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च।

शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधा: शिता:॥ १०॥

सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उसपर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्र-विचित्र खड्ग और नाना प्रकारकी तीखी शक्तियोंको भी रख दो॥ १०॥

अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम्।

वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद॥ ११॥

‘रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड रामका वध करनेके लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसोंके आगे-आगे जाना चाहता हूँ’॥ ११॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्णं महारथम्।

सदश्वै: शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषण:॥ १२॥

उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्यके समान प्रकाशमान और चितकबरे रंगके अच्छे घोड़ोंसे जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया। दूषणने खरको इसकी सूचना दी॥ १२॥

तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम्।

हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम्॥ १३॥

मत्स्यै: पुष्पैर्द्रुमै: शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनै:।

माङ्गल्यै: पक्षिसङ्घैश्च ताराभिश्च समावृतम्॥ १४॥

ध्वजनिस्त्र‌िंशसम्पन्नं किंकिणीवरभूषितम्।

सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा॥ १५॥

वह रथ मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोनेके बने हुए साज-बाजसे सजाया गया था, उसके पहियोंमें सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथके कूबर वैदूर्यमणिसे जड़े गये थे, उसकी सजावटके लिये सोनेके बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियोंके समुदाय तथा तारिकाओंसे वह रथ सुशोभित हो रहा था, उसपर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथके भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओंसे सजे और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए उस रथपर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिनके अपमानका स्मरण करके उसके मनमें बड़ा अमर्ष हो रहा था॥ १३—१५॥

खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम्।

निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषण: सर्वराक्षसान्॥ १६॥

रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजसे सम्पन्न उस विशाल सेनाकी ओर देखकर खर और दूषणने समस्त राक्षसोंसे कहा—‘निकलो, आगे बढ़ो’॥ १६॥

ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम्।

निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम्॥ १७॥

कूच करनेकी आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजासे युक्त वह विशाल राक्षस-सेना जोर-जोरसे गर्जना करती हुई जनस्थानसे बड़े वेगके साथ निकली॥ १७॥

मुद्गरै: पट्टिशै: शूलै: सुतीक्ष्णैश्च परश्वधै:।

खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानै: सतोमरै:॥ १८॥

शक्तिभि: परिघैर्घोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकै:।

गदासिमुसलैर्वज्रैर्गृहीतैर्भीमदर्शनै: ॥ १९॥

राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश।

निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम्॥ २०॥

सैनिकोंके हाथमें मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रोंसे उपलक्षित और खरके मनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थानसे युद्धके लिये चले॥ १८—२०॥

तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान्।

खरस्याथ रथ: किंचिज्जगाम तदनन्तरम्॥ २१॥

उन भयंकर दिखायी देनेवाले राक्षसोंको धावा करते देख खरका रथ भी कुछ देर सैनिकोंके निकलनेकी प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा॥ २१॥

ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान् ।

खरस्य मतमाज्ञाय सारथि: पर्यचोदयत्॥ २२॥

तदनन्तर खरका अभिप्राय जानकर उसके सारथिने तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित उन चितकबरे घोड़ोंको हाँका॥ २२॥

संचोदितो रथ: शीघ्रं खरस्य रिपुघातिन:।

शब्देनापूरयामास दिश: सप्रदिशस्तथा॥ २३॥

उसके हाँकनेपर शत्रुघाती खरका रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा॥ २३॥

प्रवृद्धमन्युस्तु खर: खरस्वरो

रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तक:।

अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुन-

र्महाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान्॥ २४॥

उस समय खरका क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रुके वधके लिये उतावला होकर यमराजके समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलोंकी वर्षा करनेवाला मेघ बड़े जोरसे गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खरने उच्चस्वरसे सिंहनाद करके पुन: सारथिको रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वाविंश: सर्ग:॥ २२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥

 

त्रयोविंश: सर्ग:

भयंकर उत्पातोंको देखकर भी खरका उनकी परवा नहीं करना तथा राक्षस-सेनाका श्रीरामके आश्रमके समीप पहुँचना

तत्प्रयातं बलं घोरमशिवं शोणितोदकम्।

अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमुलो गर्दभारुण:॥ १॥

उस सेनाके प्रस्थान करते समय आकाशमें गधेके समान धूसर रंगवाले बादलोंकी महाभयंकर घटा घिर आयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकोंके ऊपर घोर अमङ्गलसूचक रक्तमय जलकी वर्षा आरम्भ हो गयी॥ १॥

निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवा:।

समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया॥ २॥

खरके रथमें जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतलस्थानमें सड़कपर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े॥ २॥

श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम्।

अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम्॥ ३॥

सूर्यमण्डलके चारों ओर अलातचक्रके समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारेका रंग लाल था॥ ३॥

ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम्।

समाक्रम्य महाकायस्तस्थौ गृध्र: सुदारुण:॥ ४॥

तदनन्तर खरके रथकी सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजापर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था॥ ४॥

जनस्थानसमीपे च समाक्रम्य खरस्वना:।

विस्वरान् विविधान् नादान् मांसादा मृगपक्षिण:॥ ५॥

व्याजहृरभिदीप्तायां दिशि वै भैरवस्वनम्।

अशिवं यातुधानानां शिवा घोरा महास्वना:॥ ६॥

कठोर स्वरवाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थानके पास आकर विकृत स्वरमें अनेक प्रकारके विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित हुई दिशाओंमें जोर-जोरसे चीत्कार करनेवाले और मुँहसे आग उगलनेवाले भयंकर गीदड़ राक्षसोंके लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे॥ ५-६॥

प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिण: ।

आकाशं तदनाकाशं चक्रुर्भीमाम्बुवाहका:॥ ७॥

भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान दिखायी देते थे और जलकी जगह रक्त धारण किये हुए थे, तत्काल घिर आये। उन्होंने समूचे आकाशको ढक दिया। थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया॥ ७॥

बभूव तिमिरं घोरमुद्धतं रोमहर्षणम्।

दिशो वा प्रदिशो वापि सुव्यक्तं न चकाशिरे॥ ८॥

सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया। दिशाओं अथवा कोणोंका स्पष्टरूपसे भान नहीं हो पाता था॥ ८॥

क्षतजार्द्रसवर्णाभा संध्या कालं विना बभौ।

खरं चाभिमुखं नेदुस्तदा घोरा मृगा: खगा:॥ ९॥

बिना समयके ही खूनसे भीगे हुए वस्त्रके समान रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खरके सामने आकर गर्जना करने लगे॥ ९॥

कङ्कगोमायुगृध्राश्च चुक्रुशुर्भयशंसिन:।

नित्याशिवकरा युद्धे शिवा घोरनिदर्शना:॥ १०॥

नेदुर्बलस्याभिमुखं ज्वालोद्गारिभिराननै:।

भयकी सूचना देनेवाले कङ्क (सफेद चील), गीदड़ और गीध खरके सामने चीत्कार करने लगे। युद्धमें सदा अमङ्गल सूचित करनेवाली और भय दिखानेवाली गीदडि़याँ खरकी सेनाके सामने आकर आग उगलनेवाले मुखोंसे घोर शब्द करने लगीं॥ १०॥

कबन्ध: परिघाभासो दृश्यते भास्करान्तिके॥ ११॥

जग्राह सूर्यं स्वर्भानुरपर्वणि महाग्रह:।

प्रवाति मारुत: शीघ्रं निष्प्रभोऽभूद् दिवाकर:॥ १२॥

सूर्यके निकट परिघके समान कबन्ध (सिर कटा हुआ धड़) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्याके बिना ही सूर्यको ग्रसने लगा। हवा तीव्र गतिसे चलने लगी एवं सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी॥ ११-१२॥

उत्पेतुश्च विना रात्रिं तारा: खद्योतसप्रभा:।

संलीनमीनविहगा नलिन्य: शुष्कपङ्कजा:॥ १३॥

बिना रातके ही जुगनूके समान चमकनेवाले तारे आकाशमें उदित हो गये। सरोवरोंमें मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये॥ १३॥

तस्मिन् क्षणे बभूवुश्च विना पुष्पफलैर्द्रुमा:।

उद्धूतश्च विना वातं रेणुर्जलधरारुण:॥ १४॥

उस क्षणमें वृक्षोंके फूल और फल झड़ गये। बिना हवाके ही बादलोंके समान धूसर रंगकी धूल ऊपर उठकर आकाशमें छा गयी॥ १४॥

चीचीकूचीति वाश्यन्त्यो बभूवुस्तत्र सारिका:।

उल्काश्चापि सनिर्घोषा निपेतुर्घोरदर्शना:॥ १५॥

वहाँ वनकी सारिकाएँ चें-चें करने लगीं। भारी आवाजके साथ भयानक उल्काएँ आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगीं॥ १५॥

प्रचचाल मही चापि सशैलवनकानना।

खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमत:॥ १६॥

प्राकम्पत भुज: सव्य: स्वरश्चास्यावसज्जत।

सास्रा सम्पद्यते दृष्टि: पश्यमानस्य सर्वत:॥ १७॥

पर्वत, वन और काननोंसहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथपर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखोंमें आँसू आने लगे॥ १६-१७॥

ललाटे च रुजो जाता न च मोहान्न्यवर्तत।

तान् समीक्ष्य महोत्पातानुत्थितान् रोमहर्षणान्॥ १८॥

अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरस्तदा।

उसके सिरमें दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्धसे निवृत्त नहीं हुआ। उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातोंको देखकर खर जोर-जोरसे हँसने लगा और समस्त राक्षसोंसे बोला—॥ १८/

महोत्पातानिमान् सर्वानुत्थितान् घोरदर्शनान्॥ १९॥

न चिन्तयाम्यहं वीर्याद् बलवान् दुर्बलानिव।

तारा अपि शरैस्तीक्ष्णै: पातयेयं नभस्तलात्॥ २०॥

‘ये जो भयानक दिखायी देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बलके भरोसे कोई परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओंको कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशसे तारोंको भी गिरा सकता हूँ॥ १९-२०॥

मृत्युं मरणधर्मेण संक्रुद्धो योजयाम्यहम्।

राघवं तं बलोत्सिक्तं भ्रातरं चापि लक्ष्मणम्॥ २१॥

अहत्वा सायकैस्तीक्ष्णैर्नोपावर्तितुमुत्सहे।

‘यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्युको भी मौतके मुखमें डाल सकता हूँ। आज बलका घमंड रखनेवाले राम और उसके भाई लक्ष्मणको तीखे बाणोंसे मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता॥ २१/

यन्निमित्तं तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्यय:॥ २२॥

सकामा भगिनीमेऽस्तु पीत्वा तु रुधिरं तयो:।

‘जिसे दण्ड देनेके लिये राम और लक्ष्मणकी बुद्धिमें विपरीत विचार (क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके भाव) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफलमनोरथ हो जाय॥ २२/

न क्वचित् प्राप्तपूर्वो मे संयुगेषु पराजय:॥ २३॥

युष्माकमेतत् प्रत्यक्षं नानृतं कथयाम्यहम्।

‘आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमेंसे किसीमें भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुमलोगोंने प्रत्यक्ष देखा है। मैं झूठ नहीं कहता हूँ॥ २३/

देवराजमपि क्रुद्धो मत्तैरावतगामिनम्॥ २४॥

वज्रहस्तं रणे हन्यां किं पुनस्तौ च मानवौ।

‘मैं मतवाले ऐरावतपर चलनेवाले वज्रधारी देवराज इन्द्रको भी रणभूमिमें कुपित होकर कालके गालमें डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्योंकी तो बात ही क्या है?’॥ २४/

सा तस्य गर्जितं श्रुत्वा राक्षसानां महाचमू:॥ २५॥

प्रहर्षमतुलं लेभे मृत्युपाशावपाशिता।

खरकी यह गर्जना सुनकर राक्षसोंकी वह विशाल सेना, जो मौतके पाशसे बँधी हुई थी, अनुपम हर्षसे भर गयी॥ २५/

समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षिण:॥ २६॥

ऋषयो देवगन्धर्वा: सिद्धाश्च सह चारणै:।

समेत्य चोचु: सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मण:॥ २७॥

उस समय युद्ध देखनेकी इच्छावाले बहुत-से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये। एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरेसे कहने लगे—॥ २६-२७॥

स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकानां ये च सम्मता:।

जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥ २८॥

चक्रहस्तो यथा विष्णु: सर्वानसुरसत्तमान्।

‘गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याणके भागी हों। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुरशिरोमणियोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्धमें इन पुलस्त्यवंशी निशाचरोंको पराजित करें’॥ २८/

एतच्चान्यच्च बहुशो ब्रुवाणा: परमर्षय:॥ २९॥

जातकौतूहलास्तत्र विमानस्थाश्च देवता:।

ददृशुर्वाहिनीं तेषां राक्षसानां गतायुषाम्॥ ३०॥

ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामनासूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमानपर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको देखने लगे॥ २९-३०॥

रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्याग्राद् विनि:सृत:।

श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगम:॥ ३१॥

दुर्जय: करवीराक्ष: परुष: कालकार्मुक:।

हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशन:॥ ३२॥

द्वादशैते महावीर्या: प्रतस्थुरभित: खरम्।

खर रथके द्वारा बड़े वेगसे चलकर सारी सेनासे आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी राक्षस खरको दोनों ओरसे घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे॥ ३१-३२/

महाकपाल: स्थूलाक्ष: प्रमाथस्त्रिशिरास्तथा।

चत्वार एते सेनाग्रे दूषणं पृष्ठतोऽन्वयु:॥ ३३॥

महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा—ये चार राक्षस-वीर सेनाके आगे और सेनापति दूषणके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ ३३॥

सा भीमवेगा समराभिकांक्षिणी

सुदारुणा राक्षसवीरसेना।

तौ राजपुत्रौ सहसाभ्युपेता

माला ग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यौ॥ ३४॥

राक्षस वीरोंकी वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्धकी अभिलाषासे आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणके पास जा पहुँची, मानो ग्रहोंकी पंक्ति चन्द्रमा और सूर्यके समीप प्रकाशित हो रही हो॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग:॥ २३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३॥

 

चतुर्विंश: सर्ग:

श्रीरामका तात्कालिक शकुनोंद्वारा राक्षसोंके विनाश और अपनी विजयकी सम्भावना करके सीतासहित लक्ष्मणको पर्वतकी गुफामें भेजना और युद्धके लिये उद्यत होना

आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे।

तानेवौत्पातिकान् राम: सह भ्रात्रा ददर्श ह॥ १॥

प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीरामके आश्रमकी ओर चला, तब भाईसहित श्रीरामने भी उन्हीं उत्पात-सूचक लक्षणोंको देखा॥ १॥

तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षण:।

प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २॥

प्रजाके अहितकी सूचना देनेवाले उन महाभयंकर उत्पातोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंके उपद्रवका विचार करके अत्यन्त अमर्षमें भर गये और लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ २॥

इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिण:।

समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान्॥ ३॥

‘महाबाहो! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो। समस्त भूतोंके संहारकी सूचना देनेवाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसोंका संहार करनेके लिये उत्पन्न हुए हैं॥ ३॥

अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वना:।

व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणा:॥ ४॥

‘आकाशमें जो गधोंके समान धूसर वर्णवाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खूनकी धाराएँ बरसा रहे हैं॥ ४॥

सधूमाश्च शरा: सर्वे मम युद्धाभिनन्दिता:।

रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेष्टन्ते विचक्षण॥ ५॥

‘युद्धकुशल लक्ष्मण! मेरे सारे बाण उत्पातवश उठनेवाले धूमसे सम्बद्ध हो युद्धके लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभागमें सुवर्ण मढ़ा हुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चासे जुड़ जानेके लिये स्वयं ही चेष्टाशील जान पड़ते हैं॥ ५॥

यादृशा इह कूजन्ति पक्षिणो वनचारिण:।

अग्रतो नोऽभयं प्राप्तं संशयो जीवितस्य च॥ ६॥

‘यहाँ जैसे-जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्यमें अभयकी और राक्षसोंके लिये प्राणसंकटकी प्राप्ति सूचित हो रही है॥ ६॥

सम्प्रहारस्तु सुमहान् भविष्यति न संशय:।

अयमाख्याति मे बाहु: स्फुरमाणो मुहुर्मुहु:॥ ७॥

‘मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़ककर इस बातकी सूचना देती है कि कुछ ही देरमें बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है॥ ७॥

संनिकर्षे तु न: शूर जयं शत्रो: पराजयम्।

सुप्रभं च प्रसन्नं च तव वक्त्रं हि लक्ष्यते॥ ८॥

‘शूरवीर लक्ष्मण! परंतु निकटभविष्यमें ही हमारी विजय और शत्रुकी पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है॥ ८॥

उद्यतानां हि युद्धार्थं येषां भवति लक्ष्मण।

निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायु: परिक्षय:॥ ९॥

‘लक्ष्मण! युद्धके लिये उद्यत होनेपर जिनका मुख प्रभाहीन (उदास) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है॥

रक्षसां नर्दतां घोर: श्रूयतेऽयं महाध्वनि:।

आहतानां च भेरीणां राक्षसै: क्रूरकर्मभि:॥ १०॥

‘गरजते हुए राक्षसोंका यह घोर नाद सुनायी देता है, तथा क्रूरकर्मा राक्षसोंद्वारा बजायी गयी भेरियोंकी यह महाभयंकर ध्वनि कानोंमें पड़ रही है॥ १०॥

अनागतविधानं तु कर्तव्यं शुभमिच्छता।

आपदं शङ्कमानेन पुरुषेण विपश्चिता॥ ११॥

‘अपना कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि आपत्तिकी आशङ्का होनेपर पहलेसे ही उससे बचनेका उपाय कर ले॥ ११॥

तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धर:।

गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गां पादपसंकुलाम्॥ १२॥

‘इसलिये तुम धनुष-बाण धारण करके विदेहकुमारी सीताको साथ ले पर्वतकी उस गुफामें चले जाओ, जो वृक्षोंसे आच्छादित है॥ १२॥

प्रतिकूलितुमिच्छामि न हि वाक्यमिदं त्वया।

शापितो मम पादाभ्यां गम्यतां वत्स मा चिरम्॥ १३॥

‘वत्स! तुम मेरे इस वचनके प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता। अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ॥ १३॥

त्वं हि शूरश्च बलवान् हन्या एतान् न संशय:।

स्वयं निहन्तुमिच्छामि सर्वानेव निशाचरान्॥ १४॥

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसोंका वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरोंका संहार करना चाहता हूँ (इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीताको सुरक्षित रखनेके लिये इसे गुफामें ले जाओ)’॥ १४॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण: सह सीतया।

शरानादाय चापं च गुहां दुर्गां समाश्रयत्॥ १५॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीताके साथ पर्वतकी दुर्गम गुफामें चले गये॥

तस्मिन् प्रविष्टे तु गुहां लक्ष्मणे सह सीतया।

हन्त निर्युक्तमित्युक्त्वा राम: कवचमाविशत्॥ १६॥

सीतासहित लक्ष्मणके गुफाके भीतर चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने ‘हर्षकी बात है, लक्ष्मणने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीताकी रक्षाका समुचित प्रबन्ध हो गया’ ऐसा कहकर कवच धारण किया॥ १६॥

स तेनाग्निनिकाशेन कवचेन विभूषित:।

बभूव रामस्तिमिरे महानग्निरिवोत्थित:॥ १७॥

प्रज्वलित आगके समान प्रकाशित होनेवाले उस कवचसे विभूषित हो श्रीराम अन्धकारमें प्रकट हुए महान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगे॥ १७॥

स चापमुद्यम्य महच्छरानादाय वीर्यवान्।

सम्बभूवास्थितस्तत्र ज्यास्वनै: पूरयन् दिश:॥ १८॥

पराक्रमी श्रीराम महान् धनुष एवं बाण हाथमें लेकर युद्धके लिये डटकर खड़े हो गये और प्रत्यञ्चाकी टंकारसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाने लगे॥ १८॥

ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च सह चारणै:।

समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकांक्षया॥ १९॥

तदनन्तर श्रीराम और राक्षसोंका युद्ध देखनेकी इच्छासे देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण आदि महात्मा वहाँ एकत्र हो गये॥ १९॥

ऋषयश्च महात्मानो लोके ब्रह्मर्षिसत्तमा:।

समेत्य चोचु: सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मण:॥ २०॥

स्वस्ति गोब्राह्मणानां च लोकानां चेति संस्थिता:।

जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान्॥ २१॥

चक्रहस्तो यथा युद्धे सर्वानसुरपुंगवान्।

इनके सिवा, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि-शिरोमणि पुण्यकर्मा महात्मा ऋषि हैं, वे सभी वहाँ जुट गये और एक साथ खड़े हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—‘गौओं, ब्राह्मणों और समस्त लोकोंका कल्याण हो। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु युद्धमें समस्त श्रेष्ठ असुरोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस संग्राममें श्रीरामचन्द्रजी पुलस्त्यवंशी निशाचरोंपर विजय प्राप्त करें’॥ २०-२१॥

एवमुक्त्वा पुन: प्रोचुरालोक्य च परस्परम्॥ २२॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।

एकश्च रामो धर्मात्मा कथं युद्धं भविष्यति॥ २३॥

ऐसा कहकर वे पुन: एक-दूसरेकी ओर देखते हुए बोले—‘एक ओर भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षस हैं और दूसरी ओर अकेले धर्मात्मा श्रीराम हैं, फिर यह युद्ध कैसे होगा?’॥ २२-२३॥

इति राजर्षय: सिद्धा: सगणाश्च द्विजर्षभा:।

जातकौतूहलास्तस्थुर्विमानस्थाश्च देवता:॥ २४॥

ऐसी बातें करते हुए राजर्षि, सिद्ध, विद्याधर आदि देवयोनिगणसहित श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि तथा विमानपर स्थित हुए देवता कौतूहलवश वहाँ खड़े हो गये॥ २४॥

आविष्टं तेजसा रामं संग्रामशिरसि स्थितम्।

दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि भयाद् विव्यथिरे तदा॥ २५॥

युद्धके मुहानेपर वैष्णव तेजसे आविष्ट हुए श्रीरामको खड़ा देख उस समय सब प्राणी (उनके प्रभावको न जाननेके कारण) भयसे व्यथित हो उठे॥ २५॥

रूपमप्रतिमं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मण:।

बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव महात्मन:॥ २६॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तथा रोषमें भरे हुए महात्मा श्रीरामका वह रूप कुपित हुए रुद्रदेवके समान तुलनारहित प्रतीत होता था॥ २६॥

इति सम्भाष्यमाणे तु देवगन्धर्वचारणै:।

ततो गम्भीरनिर्हृदं घोरचर्मायुधध्वजम्॥ २७॥

अनीकं यातुधानानां समन्तात् प्रत्यपद्यत।

जब देवता, गन्धर्व और चारण पूर्वोक्तरूपसे श्रीरामकी मङ्गलकामना कर रहे थे, उसी समय भयंकर ढाल-तलवार आदि आयुधों और ध्वजाओंसे उपलक्षित होनेवाली निशाचरोंकी वह सेना गम्भीर गर्जना करती हुई चारों ओरसे श्रीरामजीके पास आ पहुँची॥ २७/

वीरालापान् विसृजतामन्योन्यमभिगच्छताम्॥ २८॥

चापानि विस्फारयतां जृम्भतां चाप्यभीक्ष्णश:।

विप्रघुष्टस्वनानां च दुन्दुभींश्चापि निघ्नताम्॥ २९॥

तेषां सुतुमुल: शब्द: पूरयामास तद् वनम्।

वे राक्षस-सैनिक वीरोचित वार्तालाप करते, युद्धका ढंग बतानेके लिये एक-दूसरेके सामने जाते, धनुषोंको खींचकर उनकी टंकार फैलाते, बारंबार मदमत्त होकर उछलते, जोर-जोरसे गर्जना करते और नगाड़े पीटते थे। उनका वह अत्यन्त तुमुल नाद उस वनमें सब ओर गूँजने लगा॥ २८-२९/

तेन शब्देन वित्रस्ता: श्वापदा वनचारिण:॥ ३०॥

दुद्रुवुर्यत्र नि:शब्दं पृष्ठतो नावलोकयन्।

उस शब्दसे डरे हुए वनचारी हिंसक जन्तु उस वनमें गये, जहाँ किसी प्रकारका कोलाहल नहीं सुनायी पड़ता था। वे वन्यजन्तु भयके मारे पीछे फिरकर देखते भी नहीं थे॥ ३०/

तच्चानीकं महावेगं रामं समनुवर्तत॥ ३१॥

धृतनानाप्रहरणं गम्भीरं सागरोपमम्।

वह सेना बड़े वेगसे श्रीरामकी ओर चली। उसमें नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले सैनिक थे। वह समुद्रके समान गम्भीर दिखायी देती थी॥ ३१/

रामोऽपि चारयंश्चक्षु: सर्वतो रणपण्डित:॥ ३२॥

ददर्श खरसैन्यं तद् युद्धायाभिमुखो गत:।

युद्धकलाके विद्वान् श्रीरामचन्द्रजीने भी चारों ओर दृष्टिपात करते हुए खरकी सेनाका निरीक्षण किया और वे युद्धके लिये उसके सामने बढ़ गये॥ ३२/

वितत्य च धनुर्भीमं तूण्याश्चोद्धृत्य सायकान्॥ ३३॥

क्रोधमाहारयत् तीव्रं वधार्थं सर्वरक्षसाम्।

दुष्प्रेक्ष्यश्चाभवत् क्रुद्धो युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥ ३४॥

फिर उन्होंने तरकससे अनेक बाण निकाले और अपने भयंकर धनुषको खींचकर सम्पूर्ण राक्षसोंका वध करनेके लिये तीव्र क्रोध प्रकट किया। कुपित होनेपर वे प्रलयकालिक अग्निके समान प्रज्वलित होने लगे। उस समय उनकी ओर देखना भी कठिन हो गया॥ ३३-३४॥

तं दृष्ट्वा तेजसाऽऽविष्टं प्राव्यथन् वनदेवता:।

तस्य रुष्टस्य रूपं तु रामस्य ददृशे तदा।

दक्षस्येव क्रतुं हन्तुमुद्यतस्य पिनाकिन:॥ ३५॥

तेजसे आविष्ट हुए श्रीरामको देखकर वनके देवता व्यथित हो उठे। उस समय रोषमें भरे हुए श्रीरामका रूप दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये उद्यत हुए पिनाकधारी महादेवजीके समान दिखायी देने लगा॥ ३५॥

तत्कार्मुकैराभरणै रथैश्च

तद्वर्मभिश्चाग्निसमानवर्णै: ।

बभूव सैन्यं पिशिताशनानां

सूर्योदये नीलमिवाभ्रजालम्॥ ३६॥

धनुषों, आभूषणों, रथों और अग्निके समान कान्तिवाले चमकीले कवचोंसे युक्त वह पिशाचोंकी सेना सूर्योदयकालमें नीले मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुर्विंश: सर्ग:॥ २४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४॥

 


पञ्चविंश: सर्ग:

राक्षसोंका श्रीरामपर आक्रमण और श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा राक्षसोंका संहार

अवष्टब्धधनुं रामं क्रुद्धं तं रिपुघातिनम्।

ददर्शाश्रममागम्य खर: सह पुर:सरै:॥ १॥

तं दृष्ट्वा सगुणं चापमुद्यम्य खरनि:स्वनम्।

रामस्याभिमुखं सूतं चोद्यतामित्यचोदयत्॥ २॥

खरने अपने अग्रगामी सैनिकोंके साथ आश्रमके पास पहुँचकर क्रोधमें भरे हुए शत्रुघाती श्रीरामको देखा, जो हाथमें धनुष लिये खड़े थे। उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करनेवाले प्रत्यञ्चासहित धनुषको उठाकर सूतको आज्ञा दी—‘मेरा रथ रामके सामने ले चलो’॥ १-२॥

स खरस्याज्ञया सूतस्तुरगान् समचोदयत्।

यत्र रामो महाबाहुरेको धुन्वन् धनु: स्थित:॥ ३॥

खरकी आज्ञासे सारथिने घोड़ोंको उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुषकी टंकार कर रहे थे॥ ३॥

तं तु निष्पतितं दृष्ट्वा सर्वतो रजनीचरा:।

मुञ्चमाना महानादं सचिवा: पर्यवारयन्॥ ४॥

खरको श्रीरामके समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोरसे सिंहनाद करके उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये॥ ४॥

स तेषां यातुधानानां मध्ये रथगत: खर:।

बभूव मध्ये ताराणां लोहिताङ्ग इवोदित:॥ ५॥

उन राक्षसोंके बीचमें रथपर बैठा हुआ खर तारोंके मध्यभागमें उगे हुए मङ्गलकी भाँति शोभा पा रहा था॥ ५॥

तत: शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।

अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खर:॥ ६॥

उस समय खरने समराङ्गणमें सहस्रों बाणोंद्वारा अप्रतिम बलशाली श्रीरामको पीडि़त-सा करके बड़े जोरसे गर्जना की॥ ६॥

ततस्तं भीमधन्वानं क्रुद्धा: सर्वे निशाचरा:।

रामं नानाविधै: शस्त्रैरभ्यवर्षन्त दुर्जयम्॥ ७॥

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए समस्त निशाचर भयंकर धनुष धारण करनेवाले दुर्जय वीर श्रीरामपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ ७॥

मुद्गरैरायसै: शूलै: प्रासै: खड्गै: परश्वधै:।

राक्षसा: समरे शूरं निजघ्नू रोषतत्परा:॥ ८॥

उस समराङ्गणमें रुष्ट हुए राक्षसोंने शूरवीर श्रीरामपर लोहेके मुद्गरों, शूलों, प्रासों, खड्गों और फरसोंद्वारा प्रहार किया॥ ८॥

ते बलाहकसंकाशा महाकाया महाबला:।

अभ्यधावन्त काकुत्स्थं रथैर्वाजिभिरेव च॥ ९॥

गजै: पर्वतकूटाभै रामं युद्धे जिघांसव:।

वे मेघोंके समान काले, विशालकाय और महाबली निशाचर रथों, घोड़ों और पर्वतशिखरके समान गजराजोंद्वारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामपर चारों ओरसे टूट पड़े। वे युद्धमें उन्हें मार डालना चाहते थे॥ ९/

ते रामे शरवर्षाणि व्यसृजन् रक्षसां गणा:॥ १०॥

शैलेन्द्रमिव धाराभिर्वर्षमाणा महाघना:।

जैसे बड़े-बड़े मेघ गिरिराजपर जलकी धाराएँ बरसा रहे हों, उसी प्रकार वे राक्षसगण श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि कर रहे थे॥ १०/

सर्वै: परिवृतो रामो राक्षसै: क्रूरदर्शनै:॥ ११॥

तिथिष्विव महादेवो वृत: पारिषदां गणै:।

क्रूरतापूर्ण दृष्टिसे देखनेवाले उन सभी राक्षसोंने श्रीरामको उसी प्रकार घेर रखा था, जैसे प्रदोषसंज्ञक तिथियोंमें भगवान् शिवके पार्षदगण उन्हें घेरे रहते हैं॥

तानि मुक्तानि शस्त्राणि यातुधानै: स राघव:॥ १२॥

प्रतिजग्राह विशिखैर्नद्योघानिव सागर:।

श्रीरघुनाथजीने राक्षसोंके छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रोंको अपने बाणोंद्वारा उसी तरह ग्रस लिया, जैसे समुद्र नदियोंके प्रवाहको आत्मसात् कर लेता है॥ १२/

स तै: प्रहरणैर्घोरैर्भिन्नगात्रो न विव्यथे॥ १३॥

राम: प्रदीप्तैर्बहुभिर्वज्रैरिव महाचल:।

उन राक्षसोंके घोर अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे यद्यपि श्रीरामका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी वे व्यथित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान् वज्रोंके आघात सहकर भी महान् पर्वत अडिग बना रहता है॥ १३/

स विद्ध: क्षतजादिग्ध: सर्वगात्रेषु राघव:॥ १४॥

बभूव राम: संध्याभ्रैर्दिवाकर इवावृत:।

श्रीरघुनाथजीके सारे अङ्गोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे घाव हो गया था। वे लहूलुहान हो रहे थे, अत: उस समय संध्याकालके बादलोंसे घिरे हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहे थे॥ १४/

विषेदुर्देवगन्धर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:॥ १५॥

एकं सहस्रैर्बहुभिस्तदा दृष्ट्वा समावृतम्।

श्रीराम अकेले थे। उस समय उन्हें अनेक सहस्र शत्रुओंसे घिरा हुआ देख देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि विषादमें डूब गये॥ १५/

ततो रामस्तु संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुक:॥ १६॥

ससर्ज निशितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रश:।

दुरावारान् दुर्विषहान् कालपाशोपमान् रणे॥ १७॥

तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुषको इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखायी देने लगा। फिर तो वे उस धनुषसे रणभूमिमें सैकड़ों, हजारों ऐसे पैने बाण छोड़ने लगे, जिन्हें रोकना सर्वथा कठिन था, जो दु:सह होनेके साथ ही कालपाशके समान भयंकर थे॥ १६-१७॥

मुमोच लीलया कङ्कपत्रान् काञ्चनभूषणान्।

ते शरा: शत्रुसैन्येषु मुक्ता रामेण लीलया॥ १८॥

आददू रक्षसां प्राणान् पाशा: कालकृता इव।

उन्होंने खेल-खेलमें ही चीलके परोंसे युक्त असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े। शत्रुके सैनिकोंपर श्रीरामद्वारा लीलापूर्वक छोड़े गये वे बाण कालपाशके समान राक्षसोंके प्राण लेने लगे॥ १८/

भित्त्वा राक्षसदेहांस्तांस्ते शरा रुधिराप्लुता:॥ १९॥

अन्तरिक्षगता रेजुर्दीप्ताग्निसमतेजस:।

राक्षसोंके शरीरोंको छेदकर खूनमें डूबे हुए वे बाण जब आकाशमें पहुँचते, तब प्रज्वलित अग्निके समान तेजसे प्रकाशित होने लगते थे॥ १९/

असंख्येयास्तु रामस्य सायकाश्चापमण्डलात्॥ २०॥

विनिष्पेतुरतीवोग्रा रक्ष:प्राणापहारिण:।

श्रीरामके मण्डलाकार धनुषसे अत्यन्त भयंकर और राक्षसोंके प्राण लेनेवाले असंख्य बाण छूटने लगे॥ २०/

तैर्धनूंषि ध्वजाग्राणि चर्माणि कवचानि च॥ २१॥

बाहून् सहस्ताभरणानूरून् करिकरोपमान्।

चिच्छेद राम: समरे शतशोऽथ सहस्रश:॥ २२॥

उन बाणोंद्वारा श्रीरामने समराङ्गणमें शत्रुओंके सैकड़ों-हजारों धनुष, ध्वजाओंके अग्रभाग, ढाल, कवच, आभूषणोंसहित भुजाएँ तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघें काट डालीं॥ २१-२२॥

हयान् काञ्चनसंनाहान् रथयुक्तान् ससारथीन्।

गजांश्च सगजारोहान् सहयान् सादिनस्तदा॥ २३॥

चिच्छिदुर्बिभिदुश्चैव रामबाणा गुणच्युता:।

पदातीन् समरे हत्वा ह्यनयद् यमसादनम्॥ २४॥

प्रत्यञ्चासे छूटे हुए श्रीरामके बाणोंने उस समय सोनेके साज-बाज एवं कवचसे सजे और रथोंमें जुते हुए घोड़ों, सारथियों, हाथियों, हाथीसवारों, घोड़ों और घुड़सवारोंको भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इसी प्रकार श्रीरामने समरभूमिमें पैदल सैनिकोंको भी मारकर यमलोक पहुँचा दिया॥ २३-२४॥

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभि:।

भीममार्तस्वरं चक्रुश्छिद्यमाना निशाचरा:॥ २५॥

उस समय उनके नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करने लगे॥ २५॥

तत्सैन्यं विविधैर्बाणैरर्दितं मर्मभेदिभि:।

न रामेण सुखं लेभे शुष्कं वनमिवाग्निना॥ २६॥

श्रीरामके चलाये हुए नाना प्रकारके मर्मभेदी बाणोंद्वारा पीडि़त हुई वह राक्षससेना आगसे जलते हुए सूखे वनकी भाँति सुख-शान्ति नहीं पाती थी॥ २६॥

केचिद् भीमबला: शूरा: प्रासान् शूलान् परश्वधान्।

चिक्षिपु: परमक्रुद्धा रामाय रजनीचरा:॥ २७॥

कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीरामपर प्रासों, शूलों और फरसोंका प्रहार करने लगे॥ २७॥

तेषां बाणैर्महाबाहु: शस्त्राण्यावार्य वीर्यवान्।

जहार समरे प्राणांश्चिच्छेद च शिरोधरान्॥ २८॥

परंतु पराक्रमी महाबाहु श्रीरामने रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा उनके उन अस्त्र-शस्त्रोंको रोककर उनके गले काट डाले और प्राण हर लिये॥ २८॥

ते छिन्नशिरस: पेतुश्छिन्नचर्मशरासना:।

सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा॥ २९॥

अवशिष्टाश्च ये तत्र विषण्णास्ते निशाचरा:।

खरमेवाभ्यधावन्त शरणार्थं शराहता:॥ ३०॥

सिर, ढाल और धनुषके कट जानेपर वे निशाचर गरुड़के पंखकी हवासे टूटकर गिरनेवाले नन्दनवनके वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये। जो बचे थे, वे राक्षस भी श्रीरामके बाणोंसे आहत हो विषादमें डूब गये और अपनी रक्षाके लिये खरके पास ही दौड़े गये॥ २९-३०॥

तान् सर्वान् धनुरादाय समाश्वास्य च दूषण:।

अभ्यधावत् सुसंक्रुद्ध: क्रुद्धं क्रुद्ध इवान्तक:॥ ३१॥

परंतु बीचमें दूषणने धनुष लेकर उन सबको आश्वासन दिया और अत्यन्त कुपित हो रोषमें भरे हुए यमराजकी भाँति वह क्रुद्ध होकर युद्धके लिये डटे हुए श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा॥ ३१॥

निवृत्तास्तु पुन: सर्वे दूषणाश्रयनिर्भया:।

राममेवाभ्यधावन्त सालतालशिलायुधा:॥ ३२॥

दूषणका सहारा मिल जानेसे निर्भय हो वे सब-के-सब फिर लौट आये और साखू, ताड़ आदिके वृक्ष तथा पत्थर लेकर पुन: श्रीरामपर ही टूट पड़े॥ ३२॥

शूलमुद्गरहस्ताश्च पाशहस्ता महाबला:।

सृजन्त: शरवर्षाणि शस्त्रवर्षाणि संयुगे॥ ३३॥

उस युद्धस्थलमें अपने हाथोंमें शूल, मुद्गर और पाश धारण किये वे महाबली निशाचर बाणों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ ३३॥

द्रुमवर्षाणि मुञ्चन्त: शिलावर्षाणि राक्षसा:।

तद् बभूवाद्भुतं युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्॥ ३४॥

रामस्यास्य महाघोरं पुनस्तेषां च रक्षसाम्।

कोई राक्षस वृक्षोंकी वर्षा करने लगे तो कोई पत्थरोंकी। उस समय इन श्रीराम और उन निशाचरोंमें पुन: बड़ा ही अद्भुत, महाभयंकर, घमासान और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा॥ ३४॥

ते समन्तादभिक्रुद्धा राघवं पुनरार्दयन्॥ ३५॥

तत: सर्वा दिशो दृष्ट्वा प्रदिशश्च समावृता:।

राक्षसै: सर्वत: प्राप्तै: शरवर्षाभिरावृत:॥ ३६॥

स कृत्वा भैरवं नादमस्त्रं परमभास्वरम्।

समयोजयद् गान्धर्वं राक्षसेषु महाबल:॥ ३७॥

वे राक्षस कुपित होकर चारों ओरसे पुन: श्रीरामचन्द्रजीको पीडि़त करने लगे। तब सब ओरसे आये हुए राक्षसोंसे सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको घिरी हुई देख बाण-वर्षासे आच्छादित हुए महाबली श्रीरामने भैरव-नाद करके उन राक्षसोंपर परम तेजस्वी गान्धर्व नामक अस्त्रका प्रयोग किया॥ ३५—३७॥

तत: शरसहस्राणि निर्ययुश्चापमण्डलात्।

सर्वा दश दिशो बाणैरापूर्यन्त समागतै:॥ ३८॥

फिर तो उनके मण्डलाकार धनुषसे सहस्रों बाण छूटने लगे। उन बाणोंसे दसों दिशाएँ पूर्णत: आच्छादित हो गयीं॥ ३८॥

नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं शरोत्तमान्।

विकर्षमाणं पश्यन्ति राक्षसास्ते शरार्दिता:॥ ३९॥

बाणोंसे पीडि़त राक्षस यह नहीं देख पाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी कब भयंकर बाण हाथमें लेते हैं और कब उन उत्तम बाणोंको छोड़ देते हैं। वे केवल उनको धनुष खींचते देखते थे॥ ३९॥

शरान्धकारमाकाशमावृणोत् सदिवाकरम्।

बभूवावस्थितो राम: प्रक्षिपन्निव तान् शरान्॥ ४०॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमुदायरूपी अन्धकारने सूर्यसहित सारे आकाशमण्डलको ढक दिया। उस समय श्रीराम उन बाणोंको लगातार छोड़ते हुए एक स्थानपर खड़े थे॥ ४०॥

युगपत्पतमानैश्च युगपच्च हतैर्भृशम्।

युगपत्पतितैश्चैव विकीर्णा वसुधाभवत्॥ ४१॥

एक ही समय बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो एक साथ ही गिरते और गिरे हुए बहुसंख्यक राक्षसोंकी लाशोंसे वहाँकी भूमि पट गयी॥ ४१॥

निहता: पतिता: क्षीणाश्छिन्ना भिन्ना विदारिता:।

तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते राक्षसास्ते सहस्रश:॥ ४२॥

जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती थी, वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे, गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए दिखायी देते थे॥ ४२॥

सोष्णीषैरुत्तमाङ्गैश्च साङ्गदैर्बाहुभिस्तथा।

ऊरुभिर्बाहुभिश्छिन्नैर्नानारूपैर्विभूषणै: ॥ ४३॥

हयैश्च द्विपमुख्यैश्च रथैर्भिन्नैरनेकश:।

चामरव्यजनैश्छत्रैर्ध्वजैर्नानाविधैरपि ॥ ४४॥

रामेण बाणाभिहतैर्विच्छिन्नै: शूलपट्टिशै:।

खड्गै: खण्डीकृतै: प्रासैर्विकीर्णैश्च परश्वधै:॥ ४५॥

चूर्णिताभि: शिलाभिश्च शरैश्चित्रैरनेकश:।

विच्छिन्नै: समरे भूमिर्विस्तीर्णाभूद् भयंकरा॥ ४६॥

वहाँ श्रीरामके बाणोंसे कटे हुए पगडि़यों-सहित मस्तकों, बाजूबंदसहित भुजाओं, जाँघों, बाँहों, भाँति-भाँतिके आभूषणों, घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों, टूटे-फूटे अनेकानेक रथों, चँवरों, व्यजनों, छत्रों, नाना प्रकारकी ध्वजाओं, छिन्न-भिन्न हुए शूलों, पट्टिशों, खण्डित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों, चूर-चूर हुई शिलाओं तथा टुकड़े-टुकड़े हुए बहुतेरे विचित्र बाणोंसे पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी॥ ४३—४६॥

तान् दृष्ट्वा निहतान् सर्वे राक्षसा: परमातुरा:।

न तत्र चलितुं शक्ता रामं परपुरंजयम्॥ ४७॥

उन सबको मारा गया देख शेष राक्षस अत्यन्त आतुर हो वहाँ शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामके सम्मुख जानेमें असमर्थ हो गये॥ ४७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चविंश: सर्ग:॥ २५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥

 

षड्विंश: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा दूषणसहित चौदह सहस्र राक्षसोंका वध

दूषणस्तु स्वकं सैन्यं हन्यमानं विलोक्य च।

संदिदेश महाबाहुर्भीमवेगान् दुरासदान्॥ १॥

राक्षसान् पञ्चसाहस्रान् समरेष्वनिवर्तिन:।

महाबाहु दूषणने जब देखा कि मेरी सेना बुरी तरहसे मारी जा रही है, तब उसने युद्धसे पीछे पैर न हटानेवाले भयंकर वेगशाली पाँच हजार राक्षसोंको, जिन्हें जीतना बड़ा ही कठिन था, आगे बढ़नेकी आज्ञा दी॥ १॥

ते शूलै: पट्टिशै: खड्गै: शिलावर्षैर्द्रुमैरपि॥ २॥

शरवर्षैरविच्छिन्नं ववर्षुस्तं समन्तत:।

वे श्रीरामपर चारों ओरसे शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे॥ २॥

तद् द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत्॥ ३॥

प्रतिजग्राह धर्मात्मा राघवस्तीक्ष्णसायकै:।

यह देख धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने वृक्षों और शिलाओंकी उस प्राणहारिणी महावृष्टिको अपने तीखे सायकोंद्वारा रोका॥ ३॥

प्रतिगृह्य च तद् वर्षं निमीलित इवर्षभ:॥ ४॥

राम: क्रोधं परं लेभे वधार्थं सर्वरक्षसाम्।

उस सारी वर्षाको रोककर आँख मूँदे हुए साँड़की भाँति अविचल भावसे खड़े हुए श्रीरामने समस्त राक्षसोंके वधके लिये महान् क्रोध धारण किया॥ ४॥

तत: क्रोधसमाविष्ट: प्रदीप्त इव तेजसा॥ ५॥

शरैरभ्यकिरत् सैन्यं सर्वत: सहदूषणम्।

क्रोधसे युक्त और तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीरामने दूषणसहित सारी राक्षस-सेनापर चारों ओरसे बाणकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ५॥

तत: सेनापति: क्रुद्धो दूषण: शत्रुदूषण:॥ ६॥

शरैरशनिकल्पैस्तं राघवं समवारयत्।

इससे शत्रुदूषण सेनापति दूषणको बड़ा क्रोध हुआ और उसने वज्रके समान बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीको रोका॥ ६॥

ततो राम: सुसंक्रुद्ध: क्षुरेणास्य महद् धनु:॥ ७॥

चिच्छेद समरे वीरश्चर्तुभिश्चतुरो हयान्।

हत्वा चाश्वान् शरैस्तीक्ष्णैरर्धचन्द्रेण सारथे:॥ ८॥

शिरो जहार तद्रक्षस्त्रिभिर्विव्याध वक्षसि।

तब अत्यन्त कुपित हुए वीर श्रीरामने समराङ्गणमें क्षुर नामक बाणसे दूषणके विशाल धनुषको काट डाला और चार तीखे सायकोंसे उसके चारों घोड़ोंको मौतके घाट उतारकर एक अर्धचन्द्राकार बाणसे सारथिका भी सिर उड़ा दिया तथा तीन बाणोंसे उस राक्षसकी भी छातीमें चोट पहुँचायी॥ ७-८॥

स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथि:॥ ९ ॥

जग्राह गिरिशृङ्गाभं परिघं रोमहर्षणम्।

वेष्टितं काञ्चनै: पट्टैर्देवसैन्याभिमर्दनम्॥ १०॥

धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए दूषणने पर्वतशिखरके समान एक रोमाञ्चकारी परिघ हाथमें लिया, जिसके ऊपर सोनेके पत्र मढ़े गये थे। वह परिघ देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था॥ ९-१०॥

आयसै: शङ्कुभिस्तीक्ष्णै: कीर्णं परवसोक्षितम्।

वज्राशनिसमस्पर्शं परगोपुरदारणम्॥ ११॥

उसपर चारों ओरसे लोहेकी तीखी कीलें लगी हुई थीं। वह शत्रुओंकी चर्बीसे लिपटा हुआ था। उसका स्पर्श हीरे तथा वज्रके समान कठोर एवं असह्य था। वह शत्रुओंके नगरद्वारको विदीर्ण कर डालनेमें समर्थ था॥

तं महोरगसंकाशं प्रगृह्य परिघं रणे।

दूषणोऽभ्यपतद् रामं क्रूरकर्मा निशाचर:॥ १२॥

रणभूमिमें बहुत बड़े सर्पके समान भयंकर उस परिघको हाथमें लेकर वह क्रूरकर्मा निशाचर दूषण श्रीरामपर टूट पड़ा॥ १२॥

तस्याभिपतमानस्य दूषणस्य च राघव:।

द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद सहस्ताभरणौ भुजौ॥ १३॥

उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजीने दो बाणोंसे आभूषणोंसहित उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥ १३॥

भ्रष्टस्तस्य महाकाय: पपात रणमूर्धनि।

परिघश्छिन्नहस्तस्य शक्रध्वज इवाग्रत:॥ १४॥

युद्धके मुहानेपर जिसकी दोनों भुजाएँ कट गयी थीं, उस दूषणके हाथसे खिसककर वह विशालकाय परिघ इन्द्रध्वजके समान सामने गिर पड़ा॥ १४॥

कराभ्यां च विकीर्णाभ्यां पपात भुवि दूषण:।

विषाणाभ्यां विशीर्णाभ्यां मनस्वीव महागज:॥ १५॥

जैसे दोनों दाँतोंके उखाड़ लिये जानेपर महान् मनस्वी गजराज उनके साथ ही धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार कटकर गिरी हुई अपनी भुजाओंके साथ ही दूषण भी पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १५॥

दृष्ट्वा तं पतितं भूमौ दूषणं निहतं रणे।

साधु साध्विति काकुत्स्थं सर्वभूतान्यपूजयन्॥ १६॥

रणभूमिमें मारे गये दूषणको धराशायी हुआ देख समस्त प्राणियोंने ‘साधु-साधु’ कहकर भगवान् श्रीरामकी प्रशंसा की॥ १६॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धास्त्रय: सेनाग्रयायिन:।

संहत्याभ्यद्रवन् रामं मृत्युपाशावपाशिता:॥ १७॥

महाकपाल: स्थूलाक्ष: प्रमाथी च महाबल:।

इसी समय सेनाके आगे चलनेवाले महाकपाल, स्थूलाक्ष और महाबली प्रमाथी—ये तीन राक्षस कुपित हो मौतके फंदेमें फँसकर संगठितरूपसे श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर टूट पड़े॥

महाकपालो विपुलं शूलमुद्यम्य राक्षस:॥ १८॥

स्थूलाक्ष: पट्टिशं गृह्य प्रमाथी च परश्वधम्।

राक्षस महाकपालने एक विशाल शूल उठाया, स्थूलाक्षने पट्टिश हाथमें लिया और प्रमाथीने फरसा सँभालकर आक्रमण किया॥ १८॥

दृष्ट्वैवापततस्तांस्तु राघव: सायकै: शितै:॥ १९॥

तीक्ष्णाग्रै: प्रतिजग्राह सम्प्राप्तानतिथीनिव।

उन तीनोंको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीरामने तीखे अग्रभागवाले पैने सायकोंद्वारा द्वारपर आये हुए अतिथियोंके समान उनका स्वागत किया॥

महाकपालस्य शिरश्चिच्छेद रघुनन्दन:॥ २०॥

असंख्येयैस्तु बाणौघै: प्रममाथ प्रमाथिनम्।

स्थूलाक्षस्याक्षिणी स्थूले पूरयामास सायकै:॥ २१॥

श्रीरघुनन्दनने महाकपालका सिर एवं कपाल उड़ा दिया। प्रमाथीको असंख्य बाणसमूहोंसे मथ डाला और स्थूलाक्षकी स्थूल आँखोंको सायकोंसे भर दिया॥

स पपात हतो भूमौ विटपीव महाद्रुम:।

दूषणस्यानुगान् पञ्चसाहस्रान् कुपित: क्षणात्॥ २२॥

हत्वा तु पञ्चसाहस्रैरनयद् यमसादनम्।

तीनों अग्रगामी सैनिकोंका वह समूह अनेक शाखावाले विशाल वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो दूषणके अनुयायी पाँच हजार राक्षसोंको उतने ही बाणोंका निशाना बनाकर क्षणभरमें यमलोक पहुँचा दिया॥ २२॥

दूषणं निहतं श्रुत्वा तस्य चैव पदानुगान्॥ २३॥

व्यादिदेश खर: क्रुद्ध: सेनाध्यक्षान् महाबलान्।

अयं विनिहत: संख्ये दूषण: सपदानुग:॥ २४॥

महत्या सेनया सार्धं युद‍्ध्वा रामं कुमानुषम्।

शस्त्रैर्नानाविधाकारैर्हनध्वं सर्वराक्षसा:॥ २५॥

दूषण और उसके अनुयायी मारे गये—यह सुनकर खरको बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने महाबली सेनापतियोंको आज्ञा दी—‘वीरो! यह दूषण अपने सेवकोंसहित युद्धमें मार डाला गया। अत: अब तुम सभी राक्षस बहुत बड़ी सेनाके साथ धावा करके इस दुष्ट मनुष्य रामके साथ युद्ध करो और नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा इसका वध कर डालो’॥ २३—२५॥

एवमुक्त्वा खर: क्रुद्धो राममेवाभिदुद्रुवे।

श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगम:॥ २६॥

दुर्जय: करवीराक्ष: परुष: कालकार्मुक:।

हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशन:॥ २७॥

द्वादशैते महावीर्या बलाध्यक्षा: ससैनिका:।

राममेवाभ्यधावन्त विसृजन्त: शरोत्तमान्॥ २८॥

ऐसा कहकर कुपित हुए खरने श्रीरामपर ही धावा किया। साथ ही श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी सेनापति भी उत्तम बाणोंकी वर्षा करते हुए अपने सैनिकोंके साथ श्रीरामपर ही टूट पड़े॥ २६—२८॥

तत: पावकसंकाशैर्हेमवज्रविभूषितै:।

जघान शेषं तेजस्वी तस्य सैन्यस्य सायकै:॥ २९॥

तब तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सोने और हीरोंसे विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी सायकोंद्वारा उस सेनाके बचे-खुचे सिपाहियोंका भी संहार कर डाला॥ २९॥

ते रुक्मपुङ्खा विशिखा: सधूमा इव पावका:।

निजघ्नुस्तानि रक्षांसि वज्रा इव महाद्रुमान्॥ ३०॥

जैसे वज्र बड़े-बड़े वृक्षोंको नष्ट कर डालते हैं, उसी प्रकार धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत होनेवाले उन सोनेकी पाँखवाले बाणोंने उन समस्त राक्षसोंका विनाश कर डाला॥ ३०॥

रक्षसां तु शतं राम: शतेनैकेन कर्णिना।

सहस्रं तु सहस्रेण जघान रणमूर्धनि॥ ३१॥

उस युद्धके मुहानेपर श्रीरामने कर्णिनामक सौ बाणोंसे सौ राक्षसोंका और सहस्र बाणोंसे सहस्र निशाचरोंका एक साथ ही संहार कर डाला॥ ३१॥

तैर्भिन्नवर्माभरणाश्छिन्नभिन्नशरासना: ।

निपेतु: शोणितादिग्धा धरण्यां रजनीचरा:॥ ३२॥

उन बाणोंसे निशाचरोंके कवच, आभूषण और धनुष छिन्न-भिन्न हो गये तथा वे खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३२॥

तैर्मुक्तकेशै: समरे पतितै: शोणितोक्षितै:।

विस्तीर्णा वसुधा कृत्स्ना महावेदि: कुशैरिव॥ ३३॥

कुशोंसे ढकी हुई विशाल वेदीके समान युद्धमें लहूलुहान होकर गिरे हुए खुले केशवाले राक्षसोंसे सारी रणभूमि पट गयी॥ ३३॥

तत्क्षणे तु महाघोरं वनं निहतराक्षसम्।

बभूव निरयप्रख्यं मांसशोणितकर्दमम्॥ ३४॥

राक्षसोंके मारे जानेसे उस समय वहाँ रक्त और मांसकी कीचड़ जम गयी; अत: वह महाभयंकर वन नरकके समान प्रतीत होने लगा॥ ३४॥

चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।

हतान्येकेन रामेण मानुषेण पदातिना॥ ३५॥

मानवरूपधारी श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको तत्काल मौतके घाट उतार दिया॥ ३५॥

तस्य सैन्यस्य सर्वस्य खर: शेषो महारथ:।

राक्षसस्त्रिशिराश्चैव रामश्च रिपुसूदन:॥ ३६॥

उस समूची सेनामें केवल महारथी खर और त्रिशिरा—ये दो ही राक्षस बच रहे। उधर शत्रुसंहारक भगवान् श्रीराम ज्यों-के-त्यों युद्धके लिये डटे रहे॥ ३६॥

शेषा हता महावीर्या राक्षसा रणमूर्धनि।

घोरा दुर्विषहा: सर्वे लक्ष्मणस्याग्रजेन ते॥ ३७॥

उपर्युक्त दो राक्षसोंको छोड़कर शेष सभी निशाचर, जो महान् पराक्रमी, भयंकर और दुर्धर्ष थे, युद्धके मुहानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामके हाथों मारे गये॥ ३७॥

ततस्तु तद्भीमबलं महाहवे

समीक्ष्य रामेण हतं बलीयसा।

रथेन रामं महता खरस्तत:

समाससादेन्द्र इवोद्यताशनि:॥ ३८॥

तदनन्तर महासमरमें महाबली श्रीरामके द्वारा अपनी भयंकर सेनाको मारी गयी देख खर एक विशाल रथके द्वारा श्रीरामका सामना करनेके लिये आया, मानो वज्रधारी इन्द्रने किसी शत्रुपर आक्रमण किया हो॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षड्विंश: सर्ग:॥ २६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥

 

सप्तविंश: सर्ग:

त्रिशिराका वध

खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपति:।

राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत्॥ १॥

खरको भगवान् श्रीरामके सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला—॥ १॥

मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्।

पश्य रामं महाबाहुं संयुगे विनिपातितम्॥ २॥

‘राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीरको इस युद्धमें लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्यसे अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु रामको युद्धमें मार गिराता हूँ॥

प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे।

यथा रामं वधिष्यामि वधार्हं सर्वरक्षसाम्॥ ३॥

‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसोंके लिये वधके योग्य हैं, उन रामका मैं अवश्य वध करूँगा॥ ३॥

अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम।

विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥ ४॥

‘इस युद्धमें या तो मैं इनकी मृत्यु बनूँगा, या ये ही समराङ्गणमें मेरी मृत्युका कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साहको रोककर एक मुहूर्तके लिये जय-पराजयका निर्णय करनेवाले साक्षी बन जाइये॥ ४॥

प्रहृष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि।

मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि॥ ५॥

‘यदि मेरे द्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थानको लौट जाइये अथवा यदि रामने ही मुझे मार दिया तो आप युद्धके लिये इनपर धावा बोल दीजियेगा’॥

खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादित:।

गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ॥ ६॥

भगवान्के हाथसे मृत्युका लोभ होनेके कारण जब त्रिशिराने इस प्रकार खरको राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी—‘अच्छा जाओ, युद्ध करो। आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजीकी ओर चला॥ ६॥

त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता।

अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वत:॥ ७॥

घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथके द्वारा त्रिशिराने रणभूमिमें श्रीरामपर आक्रमण किया। उस समय वह तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान जान पड़ता था॥ ७॥

शरधारासमूहान् स महामेघ इवोत्सृजन्।

व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभे:॥ ८॥

उसने आते ही बड़े भारी मेघकी भाँति बाणरूपी धाराओंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जलसे भीगे हुए नगाड़ेकी तरह विकट गर्जना करने लगा॥ ८॥

आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघव:।

धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकान् शितान्॥ ९॥

त्रिशिरा नामक राक्षसको आते देख श्रीरघुनाथजीने धनुषके द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वीके रूपमें ग्रहण किया (अथवा उसे आगे बढ़नेसे रोक दिया)॥ ९॥

स सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा।

सम्बभूवातिबलिनो: सिंहकुञ्जरयोरिव॥ १०॥

अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिराका वह संग्राम महाबली सिंह और गजराजके युद्धकी भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था॥ १०॥

ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभि:।

अमर्षी कुपितो राम: संरब्ध इदमब्रवीत्॥ ११॥

उस समय त्रिशिराने तीन बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके ललाटको बींध डाला। श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके। वे कुपित हो रोषावेशमें भरकर इस प्रकार बोले—॥ ११॥

अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम्।

पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षत:॥ १२॥

ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान्।

‘अहो! पराक्रम प्रकट करनेमें शूरवीर राक्षसका ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणोंद्वारा मेरे ललाटपर प्रहार किया है। अच्छा, अब धनुषकी डोरीसे छूटे हुए मेरे बाणोंको भी ग्रहण करो’॥ १२॥

एवमुक्त्वा सुसंरब्ध: शरानाशीविषोपमान्॥ १३॥

त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश।

ऐसा कहकर रोषमें भरे हुए श्रीरामने त्रिशिराकी छातीमें क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सर्पोंके समान भयंकर थे॥ १३॥

चतुर्भिस्तुरगानस्य शरै: संनतपर्वभि:॥ १४॥

न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिन:।

अष्टभि: सायकै: सूतं रथोपस्थे न्यपातयत्॥ १५॥

तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजीने झुकी गाँठवाले चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको मार गिराया। फिर आठ सायकोंद्वारा उसके सारथिको भी रथकी बैठकमें ही सुला दिया॥ १४-१५॥

रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम्।

ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम्॥ १६॥

चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जड:।

इसके बाद श्रीरामने एक बाणसे उसकी ध्वजा भी काट डाली। तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथसे कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्रने अनेक बाणोंद्वारा उस निशाचरकी छाती छेद डाली। फिर तो वह जडवत् हो गया॥ १६॥

सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षस:॥ १७॥

शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभि: शरै:।

इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीरामने अमर्षमें भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणोंद्वारा उस राक्षसके तीनों मस्तक काट गिराये॥ १७॥

स धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडित:॥ १८॥

न्यपतत् पतितै: पूर्वं समरस्थो निशाचर:।

समराङ्गणमें खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे पीडि़त हो अपने धड़से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकोंके साथ ही धराशायी हो गया॥ १८॥

हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसा: खरसंश्रया:॥ १९॥

द्रवन्ति स्म न तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव।

तत्पश्चात् खरकी सेवामें रहनेवाले राक्षस, जो मरनेसे बचे हुए थे, भाग खड़े हुए। वे व्याघ्रसे डरे हुए मृगोंके समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे॥

तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन्।

राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा॥ २०॥

उन्हें भागते देख रोषमें भरे हुए खरने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमापर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीरामपर ही धावा किया॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तविंश: सर्ग:॥ २७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥

 

अष्टाविंश: सर्ग:

खरके साथ श्रीरामका घोर युद्ध

निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह।

खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥ १॥

त्रिशिरासहित दूषणको रणभूमिमें मारा गया देख श्रीरामके पराक्रमपर दृष्टिपात करके खरको भी बड़ा भय हुआ॥ १॥

स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम्।

हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि॥ २॥

तद्बलं हतभूयिष्ठं विमना: प्रेक्ष्य राक्षस:।

आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा॥ ३॥

एकमात्र श्रीरामने महान् बलशाली और असह्य राक्षस-सेनाका वध कर डाला। दूषण और त्रिशिराको भी मार गिराया तथा मेरी सेनाके अधिकांश (चौदह हजार) प्रमुख वीरोंको कालके गालमें भेज दिया—यह सब देख और सोचकर राक्षस खर उदास हो गया। उसने श्रीरामपर उसी तरह आक्रमण किया, जैसे नमुचिने इन्द्रपर किया था॥ २-३॥

विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान्।

खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव॥ ४॥

खरने एक प्रबल धनुषको खींचकर श्रीरामके प्रति बहुत-से नाराच चलाये, जो रक्त पीनेवाले थे। वे समस्त नाराच रोषमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान प्रतीत होते थे॥ ४॥

ज्यां विधुन्वन् सुबहुश: शिक्षयास्त्राणि दर्शयन्।

चचार समरे मार्गान् शरै रथगत: खर:॥ ५॥

धनुर्विद्याके अभ्याससे प्रत्यञ्चाको हिलाता और नाना प्रकारके अस्त्रोंका प्रदर्शन करता हुआ रथारूढ़ खर समराङ्गणमें युद्धके अनेक पैंतरे दिखाता हुआ विचरने लगा॥ ५॥

स सर्वाश्च दिशो बाणै: प्रदिशश्च महारथ:।

पूरयामास तं दृष्ट्वा रामोऽपि सुमहद् धनु:॥ ६॥

उस महारथी वीरने अपने बाणोंसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया। उसे ऐसा करते देख श्रीरामने भी अपना विशाल धनुष उठाया और समस्त दिशाओंको बाणोंसे आच्छादित कर दिया॥ ६॥

स सायकैर्दुर्विषहैर्विस्फुलिङ्गैरिवाग्निभि:।

नभश्चकाराविवरं पर्जन्य इव वृष्टिभि:॥ ७॥

जैसे मेघ जलकी वर्षासे आकाशको ढक देता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीने भी आगकी चिनगारियोंके समान दु:सह सायकोंकी वर्षा करके आकाशको ठसाठस भर दिया। वहाँ थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं रहने दी॥

तद् बभूव शितैर्बाणै: खररामविसर्जितै:।

पर्याकाशमनाकाशं सर्वत: शरसंकुलम्॥ ८॥

खर और श्रीरामद्वारा छोड़े गये पैने बाणोंसे व्याप्त हो सब ओर फैला हुआ आकाश चारों ओरसे बाणोंद्वारा भर जानेके कारण अवकाशरहित हो गया॥ ८॥

शरजालावृत: सूर्यो न तदा स्म प्रकाशते।

अन्योन्यवधसंरम्भादुभयो: सम्प्रयुध्यतो:॥ ९॥

एक-दूसरेके वधके लिये रोषपूर्वक जूझते हुए उन दोनों वीरोंके बाणजालसे आच्छादित होकर सूर्यदेव प्रकाशित नहीं होते थे॥ ९॥

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभि:।

आजघान रणे रामं तोत्रैरिव महाद्विपम्॥ १०॥

तदनन्तर खरने रणभूमिमें श्रीरामपर नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णि नामक बाणोंद्वारा प्रहार किया, मानो किसी महान् गजराजको अङ्कुशोंद्वारा मारा गया हो॥ १०॥

तं रथस्थं धनुष्पाणिं राक्षसं पर्यवस्थितम्।

ददृशु: सर्वभूतानि पाशहस्तमिवान्तकम्॥ ११॥

उस समय हाथमें धनुष लेकर रथमें स्थिरतापूर्वक बैठे हुए राक्षस खरको समस्त प्राणियोंने पाशधारी यमराजके समान देखा॥ ११॥

हन्तारं सर्वसैन्यस्य पौरुषे पर्यवस्थितम्।

परिश्रान्तं महासत्त्वं मेने रामं खरस्तदा॥ १२॥

उस वेलामें समस्त सेनाओंका वध करनेवाले तथा पुरुषार्थपर डटे हुए महान् बलशाली श्रीरामको खरने थका हुआ समझा॥ १२॥

तं सिंहमिव विक्रान्तं सिंहविक्रान्तगामिनम्।

दृष्ट्वा नोद्विजते राम: सिंह: क्षुद्रमृगं यथा॥ १३॥

यद्यपि वह सिंहके समान चलता और सिंहके ही तुल्य पराक्रम प्रकट करता था तो भी उस खरको देखकर श्रीराम उसी तरह उद्विग्न नहीं होते थे, जैसे छोटे-से मृगको देखकर सिंह भयभीत नहीं होता है॥

तत: सूर्यनिकाशेन रथेन महता खर:।

आससादाथ तं रामं पतङ्ग इव पावकम्॥ १४॥

तत्पश्चात् जैसे पतिङ्गा आगके पास जाता है, उसी प्रकार खर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी विशाल रथके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके पास गया॥ १४॥

ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे महात्मन:।

खरश्चिच्छेद रामस्य दर्शयन् हस्तलाघवम्॥ १५॥

वहाँ जाकर उस राक्षस खरने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए महात्मा श्रीरामके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला॥ १५॥

स पुनस्त्वपरान् सप्त शरानादाय मर्मणि।

निजघान रणे क्रुद्ध: शक्राशनिसमप्रभान्॥ १६॥

फिर इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित होनेवाले दूसरे सात बाण लेकर रणभूमिमें कुपित हुए खरने उनके द्वारा श्रीरामके मर्मस्थलमें चोट पहुँचायी॥ १६॥

तत: शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम्।

अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खर:॥ १७॥

तदनन्तर अप्रतिम बलशाली श्रीरामको सहस्रों बाणोंसे पीडि़त करके निशाचर खर समरभूमिमें जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ १७॥

ततस्तत्प्रहतं बाणै: खरमुक्तै: सुपर्वभि:।

पपात कवचं भूमौ रामस्यादित्यवर्चसम्॥ १८॥

खरके छोड़े हुए उत्तम गाँठवाले बाणोंद्वारा कटकर श्रीरामका सूर्यतुल्य तेजस्वी कवच पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १८॥

स शरैरर्पित: क्रुद्ध: सर्वगात्रेषु राघव:।

रराज समरे रामो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्॥ १९॥

उनके सभी अङ्गोंमें खरके बाण धँस गये थे। उस समय कुपित हो समरभूमिमें खड़े हुए श्रीरघुनाथजी धूमरहित प्रज्वलित अग्निकी भाँति शोभा पा रहे थे॥ १९॥

ततो गम्भीरनिर्हृदं राम: शत्रुनिबर्हण:।

चकारान्ताय स रिपो: सज्यमन्यन्महद्धनु:॥ २०॥

तब शत्रुओंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीरामने अपने विपक्षीका विनाश करनेके लिये एक-दूसरे विशाल धनुषपर, जिसकी ध्वनि बहुत ही गम्भीर थी, प्रत्यञ्चा चढ़ायी॥ २०॥

सुमहद् वैष्णवं यत् तदतिसृष्टं महर्षिणा।

वरं तद् धनुरुद्यम्य खरं समभिधावत॥ २१॥

महर्षि अगस्त्यने जो महान् और उत्तम वैष्णव धनुष प्रदान किया था, उसीको लेकर उन्होंने खरपर धावा किया॥ २१॥

तत: कनकपुङ्खैस्तु शरै: संनतपर्वभि:।

चिच्छेद राम: संक्रुद्ध: खरस्य समरे ध्वजम्॥ २२॥

उस समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर श्रीरामने सोनेकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समराङ्गणमें खरकी ध्वजा काट डाली॥ २२॥

स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्न: काञ्चनो ध्वज:।

जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया॥ २३॥

वह दर्शनीय सुवर्णमय ध्वज अनेक टुकड़ोंमें कटकर धरतीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंकी आज्ञासे सूर्यदेव भूमिपर उतर आये हों॥ २३॥

तं चतुर्भि: खर: क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणै:।

विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरै:॥ २४॥

क्रोधमें भरे हुए खरको मर्मस्थानोंका ज्ञान था। उसने श्रीरामके अङ्गोंमें, विशेषत: उनकी छातीमें चार बाण मारे, मानो किसी महावतने गजराजपर तोमरोंसे प्रहार किया हो॥ २४॥

स रामो बहुभिर्बाणै: खरकार्मुकनि:सृतै:।

विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम्॥ २५॥

खरके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे घायल होकर श्रीरामका सारा शरीर लहूलुहान हो गया। इससे उनको बड़ा रोष हुआ॥ २५॥

स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठ: संगृह्य परमाहवे।

मुमोच परमेष्वास: षट् शरानभिलक्षितान्॥ २६॥

धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर श्रीरामने युद्धस्थलमें पूर्वोक्त श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर लक्ष्य निश्चित करके खरको छ: बाण मारे॥ २६॥

शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत्।

त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह॥ २७॥

उन्होंने एक बाण उसके मस्तकमें, दोसे उसकी भुजाओंमें और तीन अर्धचन्द्राकार बाणोंसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी॥ २७॥

तत: पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान्।

जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान्॥ २८॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर उस राक्षसको शानपर तेज किये हुए और सूर्यके समान चमकनेवाले तेरह बाण मारे॥ २८॥

रथस्य युगमेकेन चतुर्भि: शबलान् हयान्।

षष्ठेन च शिर: संख्ये चिच्छेद खरसारथे:॥ २९॥

एक बाणसे तो उसके रथका जूआ काट दिया, चार बाणोंसे चारों चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाणसे युद्धस्थलमें खरके सारथिका मस्तक काट गिराया॥ २९॥

त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबल:।

द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनु:॥ ३०॥

छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघव: प्रहसन्निव।

त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम्॥ ३१॥

तत्पश्चात् तीन बाणोंसे त्रिवेणु (जूएके आधारदण्ड) और दोसे रथके धुरेको खण्डित करके महान् शक्तिशाली और बलवान् श्रीरामने बारहवें बाणसे खरके बाणसहित धनुषके दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीराघवेन्द्रने हँसते-हँसते वज्रतुल्य तेरहवें बाणके द्वारा समराङ्गणमें खरको घायल कर दिया॥ ३०-३१॥

प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथि:।

गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा॥ ३२॥

धनुषके खण्डित होने, रथके टूटने, घोड़ोंके मारे जाने और सारथिके भी नष्ट हो जानेपर खर उस समय हाथमें गदा ले रथसे कूदकर धरतीपर खड़ा हो गया॥ ३२॥

तत् कर्म रामस्य महारथस्य

समेत्य देवाश्च महर्षयश्च।

अपूजयन् प्राञ्जलय: प्रहृष्टा-

स्तदा विमानाग्रगता: समेता:॥ ३३॥

उस अवसरपर विमानपर बैठे हुए देवता और महर्षि हर्षसे उत्फुल्ल हो परस्पर मिलकर हाथ जोड़ महारथी श्रीरामके उस कर्मकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टाविंश: सर्ग:॥ २८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २८॥

 

एकोनत्रिंश: सर्ग:

श्रीरामका खरको फटकारना तथा खरका भी उन्हें कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदाका प्रहार करना और श्रीरामद्वारा उस गदाका खण्डन

खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम्।

मृदुपूर्वं महातेजा: परुषं वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

खरको रथहीन होकर गदा हाथमें लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणीमें बोले—॥ १॥

गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता।

कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम्॥ २॥

उद्वेजनीयो भूतानां नृशंस: पापकर्मकृत्।

त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति॥ ३॥

कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर।

तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सर्पं दुष्टमिवागतम्॥ ४॥

‘निशाचर! हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई विशाल सेनाके बीचमें खड़े रहकर (असंख्य राक्षसोंके स्वामित्वका अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकोंद्वारा निन्दा हुई है। जो समस्त प्राणियोंको उद्वेगमें डालनेवाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकोंका ईश्वर हो तो भी अधिक कालतक टिक नहीं सकता। जो लोकविरोधी कठोर कर्म करनेवाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्पकी भाँति मारते हैं॥ २—४॥

लोभात् पापानि कुर्वाण: कामाद् वा यो न बुध्यते।

हृष्ट: पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव॥ ५॥

‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छाको ‘काम’ कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तुको अधिक-से-अधिक संख्यामें पानेकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है। जो काम अथवा लोभसे प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणामको नहीं समझता है, उलटे उस पापमें हर्षका अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षाके साथ गिरे हुए ओलेको खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नामवाली कीड़ी अपना विनाश देखती है 105॥ ५॥

वसतो दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिण:।

किं नु हत्वा महाभागान् फलं प्राप्स्यसि राक्षस॥ ६॥

‘राक्षस! दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले तपस्यामें संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियोंकी हत्या करके न जाने तू कौन-सा फल पायेगा?॥ ६॥

न चिरं पापकर्माण: क्रूरा लोकजुगुप्सिता:।

ऐश्वर्यं प्राप्य तिष्ठन्ति शीर्णमूला इव द्रुमा:॥ ७॥

‘जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक कालतक नहीं खड़े रह सकते, उसी प्रकार पापकर्म करनेवाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष (किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे) ऐश्वर्यको पाकर भी चिरकालतक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते (उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं)॥ ७॥

अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मण:।

घोरं पर्यागते काले द्रुम: पुष्पमिवार्तवम्॥ ८॥

‘जैसे समय आनेपर वृक्षमें ऋतुके अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करनेवाले पुरुषको समयानुसार अपने उस पापकर्मका भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है॥ ८॥

नचिरात् प्राप्यते लोके पापानां कर्मणां फलम्।

सविषाणामिवान्नानां भुक्तानां क्षणदाचर॥ ९॥

‘निशाचर! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्नका परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोकमें किये गये पापकर्मोंका फल शीघ्र ही प्राप्त होता है॥ ९॥

पापमाचरतां घोरं लोकस्याप्रियमिच्छताम्।

अहमासादितो राज्ञा प्राणान् हन्तुं निशाचर॥ १०॥

‘राक्षस! जो संसारका बुरा चाहते हुए घोर पापकर्ममें लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देनेके लिये मेरे पिता महाराज दशरथने मुझे यहाँ वनमें भेजा है॥ १०॥

अद्य भित्त्वा मया मुक्ता: शरा: काञ्चनभूषणा:।

विदार्यातिपतिष्यन्ति वल्मीकमिव पन्नगा:॥ ११॥

‘आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबीको छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीरको फाड़कर पृथ्वीको भी विदीर्ण करके पातालमें जाकर गिरेंगे॥ ११॥

ये त्वया दण्डकारण्ये भक्षिता धर्मचारिण:।

तानद्य निहत: संख्ये ससैन्योऽनुगमिष्यसि॥ १२॥

‘तूने दण्डकारण्यमें जिन धर्मपरायण ऋषियोंका भक्षण किया है, आज युद्धमें मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हींका अनुसरण करेगा॥ १२॥

अद्य त्वां निहतं बाणै: पश्यन्तु परमर्षय:।

निरयस्थं विमानस्था ये त्वया निहता: पुरा॥ १३॥

‘पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमानपर बैठकर आज तुझे मेरे बाणोंसे मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें॥ १३॥

प्रहरस्व यथाकामं कुरु यत्नं कुलाधम।

अद्य ते पातयिष्यामि शिरस्तालफलं यथा॥ १४॥

‘कुलाधम! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर। जितना सम्भव हो, मुझे परास्त करनेका प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तकको ताड़के फलकी भाँति अवश्य काट गिराऊँगा’॥ १४॥

एवमुक्तस्तु रामेण क्रुद्ध: संरक्तलोचन:।

प्रत्युवाच ततो रामं प्रहसन् क्रोधमूर्च्छित:॥ १५॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर खर कुपित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। वह क्रोधसे अचेत-सा होकर हँसता हुआ श्रीरामको इस प्रकार उत्तर देने लगा—॥ १५॥

प्राकृतान् राक्षसान् हत्वा युद्धे दशरथात्मज।

आत्मना कथमात्मानमप्रशस्यं प्रशंससि॥ १६॥

‘दशरथकुमार! तुम साधारण राक्षसोंको युद्धमें मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो? तुम प्रशंसाके योग्य कदापि नहीं हो॥ १६॥

विक्रान्ता बलवन्तो वा ये भवन्ति नरर्षभा:।

कथयन्ति न ते किंचित् तेजसा चातिगर्विता:॥ १७॥

‘जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रतापके कारण अधिक घमंडमें भरकर कोई बात नहीं कहते हैं (अपने विषयमें मौन ही रहते हैं)॥ १७॥

प्राकृतास्त्वकृतात्मानो लोके क्षत्रियपांसना:।

निरर्थकं विकत्थन्ते यथा राम विकत्थसे॥ १८॥

‘राम! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसारमें अपनी बड़ाईके लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम (अपने विषयमें) बढ़-बढ़कर बातें बना रहे हो॥ १८॥

कुलं व्यपदिशन् वीर: समरे कोऽभिधास्यति।

मृत्युकाले तु सम्प्राप्ते स्वयमप्रस्तवे स्तवम्॥ १९॥

‘जब कि मृत्युके समान युद्धका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें बिना किसी प्रस्तावके ही समराङ्गणमें कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा?॥ १९॥

सर्वथा तु लघुत्वं ते कत्थनेन विदर्शितम्।

सुवर्णप्रतिरूपेण तप्तेनेव कुशाग्निना॥ २०॥

‘जैसे पीतल सुवर्णशोधक आगमें तपाये जानेपर अपनी लघुता (कालेपन) को ही व्यक्त करता है, उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसाके द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपनका ही परिचय दिया है॥ २०॥

न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम्।

धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम्॥ २१॥

‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकारके धातुओंकी खानोंसे युक्त तथा पृथ्वीको धारण करनेवाले अविचल कुलपर्वतके समान यहाँ स्थिरभावसे तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ॥ २१॥

पर्याप्तोऽहं गदापाणिर्हन्तुं प्राणान् रणे तव।

त्रयाणामपि लोकानां पाशहस्त इवान्तक:॥ २२॥

‘मैं अकेला ही पाशधारी यमराजकी भाँति गदा हाथमें लेकर रणभूमिमें तुम्हारे और तीनों लोकोंके भी प्राण लेनेकी शक्ति रखता हूँ॥ २२॥

कामं बह्वपि वक्तव्यं त्वयि वक्ष्यामि न त्वहम्।

अस्तं प्राप्नोति सविता युद्धविघ्नस्ततो भवेत्॥ २३॥

‘यद्यपि तुम्हारे विषयमें मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं, अत: युद्धमें विघ्न पड़ जायगा॥ २३॥

चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां हतानि ते।

त्वद्विनाशात् करोम्यद्य तेषामश्रुप्रमार्जनम्॥ २४॥

‘तुमने चौदह हजार राक्षसोंका संहार किया है, अत: आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोछूँगा—उनकी मौतका बदला चुकाऊँगा’॥ २४॥

इत्युक्त्वा परमक्रुद्ध: स गदां परमाङ्गदाम्।

खरश्चिक्षेप रामाय प्रदीप्तामशनिं यथा॥ २५॥

ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए खरने उत्तम वलय (कड़े) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्रके समान भयंकर गदाको श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर चलाया॥ २५॥

खरबाहुप्रमुक्ता सा प्रदीप्ता महती गदा।

भस्म वृक्षांश्च गुल्मांश्च कृत्वागात् तत्समीपत:॥ २६॥

खरके हाथोंसे छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल गदा वृक्षों और लताओंको भस्म करके उनके समीप जा पहुँची॥ २६॥

तामापतन्तीं महतीं मृत्युपाशोपमां गदाम्।

अन्तरिक्षगतां रामश्चिच्छेद बहुधा शरै:॥ २७॥

मृत्युके पाशकी भाँति उस विशाल गदाको अपने ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजीने अनेक बाण मारकर आकाशमें ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ २७॥

सा विशीर्णा शरैर्भिन्ना पपात धरणीतले।

गदा मन्त्रौषधिबलैर्व्यालीव विनिपातिता॥ २८॥

बाणोंसे विदीर्ण एवं चूर-चूर होकर वह गदा पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ओषधियोंके बलसे गिरायी गयी हो॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनत्रिंश: सर्ग:॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९॥

 


त्रिंश: सर्ग:

श्रीरामके व्यङ्ग करनेपर खरका उन्हें फटकारकर उनके ऊपर सालवृक्षका प्रहार करना, श्रीरामका उस वृक्षको काटकर एक तेजस्वी बाणसे खरको मार गिराना तथा देवताओं और महर्षियोंद्वारा श्रीरामकी प्रशंसा

भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सल:।

स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत्॥ १॥

धर्मप्रेमी भगवान् श्रीरामने अपने बाणोंद्वारा खरकी उस गदाको विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही—॥ १॥

एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम।

शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि॥ २॥

‘राक्षसाधम! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदाके साथ दिखाया है। अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है, व्यर्थ ही अपने बलकी डींग हाँक रहा था॥ २॥

एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता।

अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी॥ ३॥

‘मेरे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वीपर पड़ी हुई है। तेरे मनमें जो यह विश्वास था कि मैं इस गदासे शत्रुका वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदाने ही कर दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनानेमें ढीठ है (तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता)॥ ३॥

यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम्।

राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वच:॥ ४॥

‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथसे मारे गये राक्षसोंका अभी आँसू पोछूँगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी॥ ४॥

नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षस:।

प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा॥ ५॥

‘तू नीच, क्षुद्रस्वभावसे युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है। मैं तेरे प्राणोंको उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ने देवताओंके यहाँसे अमृतका अपहरण किया था॥ ५॥

अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुद्बुदभूषितम्।

विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम्॥ ६॥

‘अब मैं अपने बाणोंसे तेरे शरीरको विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा। फिर यह पृथ्वी फेन और बुदबुदोंसे युक्त तेरे गरम-गरम रक्तका पान करेगी॥ ६॥

पांसुरूषितसर्वाङ्ग: स्रस्तन्यस्तभुजद्वय:।

स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव॥ ७॥

‘तेरे सारे अङ्ग धूलसे धूसर हो जायँगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीरसे अलग होकर पृथ्वीपर गिर जायँगी और उस दशामें तू दुर्लभ युवतीके समान इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके सदाके लिये सो जायगा॥ ७॥

प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने।

भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे॥ ८॥

‘तेरे-जैसे राक्षसकुलकलङ्कके सदाके लिये महानिद्रामें सो जानेपर ये दण्डकवनके प्रदेश शरणार्थियोंको शरण देनेवाले हो जायँगे॥ ८॥

जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छरै:।

निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने॥ ९॥

‘राक्षस! मेरे बाणोंसे जनस्थानमें बने हुए तेरे निवासस्थानके नष्ट हो जानेपर मुनिगण इस वनमें सब ओर निर्भय विचर सकेंगे॥ ९॥

अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवा:।

बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहा:॥ १०॥

‘जो अबतक दूसरोंको भय देती थीं, वे राक्षसियाँ आज अपने बान्धवजनोंके मारे जानेसे दीन हो आँसुओंसे भींगे मुँह लिये जनस्थानसे स्वयं ही भयके कारण भाग जायँगी॥ १०॥

अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिका:।

अनुरूपकुला: पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृश:॥ ११॥

‘जिनका तुझ-जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुलवाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जानेपर काम आदि पुरुषार्थोंसे वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाववाले करुणरसका अनुभव करनेवाली होंगी॥ ११॥

नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक।

त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभि: पात्यते हवि:॥ १२॥

‘क्रूरस्वभाववाले निशाचर! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारोंसे भरा रहता है। तू ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है। तेरे ही कारण मुनिलोग शङ्कित रहकर ही अग्निमें हविष्यकी आहुतियाँ डालते हैं’॥ १२॥

तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने।

खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वर:॥ १३॥

वनमें श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोधके कारण खरका भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा—॥ १३॥

दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भय:।

वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्योर्वश्यो न बुध्यसे॥ १४॥

‘अहो! निश्चय ही तुम बड़े घमंडी हो, भयके अवसरोंपर भी निर्भय बने हुए हो। जान पड़ता है कि तुम मृत्युके अधीन हो गये हो, इस कारणसे ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये?॥ १४॥

कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये।

कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रिया:॥ १५॥

‘जो पुरुष कालके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रह जाता है’॥ १५॥

एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भृकुटिं तत:।

स ददर्श महासालमविदूरे निशाचर:॥ १६॥

रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन्।

स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छदम्॥ १७॥

ऐसा कहकर उस निशाचरने एक बार श्रीरामकी ओर भौंहें टेंढ़ी करके देखा और रणभूमिमें उनपर प्रहार करनेके लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। इतनेमें ही उसे एक विशाल साखूका वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था। खरने अपने होठोंको दाँतोंसे दबाकर उस वृक्षको उखाड़ लिया॥ १६-१७॥

तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबल:।

राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत्॥ १८॥

फिर उस महाबली निशाचरने विकट गर्जना करके दोनों हाथोंसे उस वृक्षको उठा लिया और श्रीरामपर दे मारा। साथ ही यह भी कहा—‘लो, अब तुम मारे गये’॥ १८॥

तमापतन्तं बाणौघैश्छित्त्वा राम: प्रतापवान्।

रोषमाहारयत् तीव्रं निहन्तुं समरे खरम्॥ १९॥

परमप्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्षको बाण-समूहोंसे काट गिराया और उस समरभूमिमें खरको मार डालनेके लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया॥ १९॥

जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचन:।

निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम्॥ २०॥

उस समय श्रीरामके शरीरमें पसीना आ गया। उनके नेत्रप्रान्त रोषसे रक्तवर्णके हो गये। उन्होंने सहस्रों बाणोंका प्रहार करके समराङ्गणमें खरको क्षत-विक्षत कर दिया॥ २०॥

तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम्।

गिरे: प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रव:॥ २१॥

उनके बाणोंके आघातसे उस निशाचरके शरीरमें जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रामें फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वतके झरनेसे जलकी धाराएँ गिर रही हों॥ २१॥

विकल: स कृतो बाणै: खरो रामेण संयुगे।

मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम्॥ २२॥

श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी मारसे खरको व्याकुल कर दिया; तो भी (उसका साहस कम नहीं हुआ।) वह खूनकी गन्धसे उन्मत्त होकर बड़े वेगसे श्रीरामकी ओर ही दौड़ा॥ २२॥

तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम्।

अपासर्पद् द्वित्रिपदं किंचित्त्वरितविक्रम:॥ २३॥

अस्त्र-विद्याके ज्ञाता भगवान् श्रीरामने देखा कि यह राक्षस खूनसे लथपथ होनेपर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत चरणोंका संचालन करके दो-तीन पग पीछे हट गये (क्योंकि बहुत निकट होनेपर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था)॥ २३॥

तत: पावकसंकाशं वधाय समरे शरम्।

खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम्॥ २४॥

तदनन्तर श्रीरामने समराङ्गणमें खरका वध करनेके लिये एक अग्निके समान तेजस्वी बाण हाथमें लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्डके समान भयंकर था॥ २४॥

स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता।

संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति॥ २५॥

वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्रका दिया हुआ था। धर्मात्मा श्रीरामने उसे धनुषपर रखा और खरको लक्ष्य करके छोड़ दिया॥ २५॥

स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनि:स्वन:।

रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत्॥ २६॥

उस महाबाणके छूटते ही वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ। श्रीरामने अपने धनुषको कानतक खींचकर उसे छोड़ा था। वह खरकी छातीमें जा लगा॥ २६॥

स पपात खरो भूमौ दह्यमान: शराग्निना।

रुद्रेणेव विनिर्दग्ध: श्वेतारण्ये यथान्धक:॥ २७॥

जैसे श्वेतवनमें भगवान् रुद्रने अन्धकासुरको जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवनमें श्रीरामके उस बाणकी आगमें जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २७॥

स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा।

बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हत: खर:॥ २८॥

जैसे वज्रसे वृत्रासुर, फेनसे नमुचि और इन्द्रकी अशनिसे बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीरामके उस बाणसे आहत होकर खर धराशायी हो गया॥ २८॥

एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणै: सह संगता:।

दुन्दुभींश्चाभिनिघ्नन्त: पुष्पवर्षं समन्तत:॥ २९॥

रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा।

अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितै: शरै:॥ ३०॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम्।

खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे॥ ३१॥

इसी समय देवता चारणोंके साथ मिलकर आये और हर्षमें भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीरामके ऊपर चारों ओरसे फूलोंकी वर्षा करने लगे। उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीरामने अपने पैने बाणोंसे डेढ़ मुहूर्तमें ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले खर-दूषण आदि चौदह हजार राक्षसोंका इस महासमरमें संहार कर डाला॥ २९—३१॥

अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मन:।

अहो वीर्यमहो दार्ढ्यं विष्णोरिव हि दृश्यते॥ ३२॥

वे बोले—‘अहो! अपने स्वरूपको जाननेवाले भगवान् श्रीरामका यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल-पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णुकी भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है’॥ ३२॥

इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम्।

ततो राजर्षय: सर्वे संगता: परमर्षय:॥ ३३॥

सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन्।

ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तदनन्तर बहुत-से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामका सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३३/

एतदर्थं महातेजा महेन्द्र: पाकशासन:॥ ३४॥

शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदर:।

आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभि:॥ ३५॥

‘रघुनन्दन! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनिके पवित्र आश्रमपर आये थे और इसी कार्यकी सिद्धिके लिये महर्षियोंने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटीके इस प्रदेशमें पहुँचाया था॥ ३४-३५॥

एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम्।

तदिदं न: कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज॥ ३६॥

स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षय:।

‘मुनियोंके शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसोंके वधके लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था। दशरथनन्दन! आपने हमलोगोंका यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया। अब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दण्डकारण्यके विभिन्न प्रदेशोंमें निर्भय होकर अपने धर्मका अनुष्ठान करेंगे’॥ ३६/

एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मण: सह सीतया।

गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी॥ ३७॥

इसी बीचमें वीर लक्ष्मण भी सीताके साथ पर्वतकी कन्दरासे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रममें आ गये॥

ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभि:॥ ३८॥

प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजित:।

तत्पश्चात् महर्षियोंसे प्रशंसित और लक्ष्मणसे पूजित विजयी वीर श्रीरामने आश्रममें प्रवेश किया॥ ३८॥

तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम्॥ ३९॥

बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे।

मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान्।

रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा॥ ४०॥

महर्षियोंको सुख देनेवाले अपने शत्रुहन्ता पतिका दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने परमानन्दमें निमग्न होकर अपने स्वामीका आलिङ्गन किया। राक्षस-समूह मारे गये और श्रीरामको कोई क्षति नहीं पहुँची—यह देख और जानकर जानकीजीको बहुत संतोष हुआ॥ ३९-४०॥

ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं

सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभि:।

पुन: परिष्वज्य मुदान्वितानना

बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा॥ ४१॥

प्रसन्नतासे भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसोंके समुदायको कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ, श्रीरामका बारम्बार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ। उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिंश: सर्ग:॥ ३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३०॥

 

एकत्रिंश: सर्ग:

रावणका अकम्पनकी सलाहसे सीताका अपहरण करनेके लिये जाना और मारीचके कहनेसे लङ्काको लौट आना

त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पन:।

प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

तदनन्तर जनस्थानसे अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावलीके साथ लङ्काकी ओर गया और शीघ्र ही उस पुरीमें प्रवेश करके रावणसे इस प्रकार बोला—॥ १॥

जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हता:।

खरश्च निहत: संख्ये कथंचिदहमागत:॥ २॥

‘राजन्! जनस्थानमें जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये। खर युद्धमें मारा गया। मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ’॥ २॥

एवमुक्तो दशग्रीव: क्रुद्ध: संरक्तलोचन:।

अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा॥ ३॥

अकम्पनके ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोधसे जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा॥ ३॥

केन भीमं जनस्थानं हतं मम परासुना।

को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति॥ ४॥

वह बोला—‘कौन मौतके मुखमें जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थानका विनाश किया है? कौन वह दु:साहसी है, जिसे समस्त लोकोंमें कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलनेवाला है?॥ ४॥

न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम्।

प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना॥ ५॥

‘मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैनसे नहीं रह सकेंगे॥ ५॥

कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम्।

मृत्युं मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे॥ ६॥

‘मैं कालका भी काल हूँ, आगको भी जला सकता हूँ तथा मौतको भी मृत्युके मुखमें डाल सकता हूँ॥ ६॥

वातस्य तरसा वेगं निहन्तुमपि चोत्सहे।

दहेयमपि संक्रुद्धस्तेजसाऽऽदित्यपावकौ॥ ७॥

‘यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो अपने वेगसे वायुकी गतिको भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेजसे सूर्य और अग्निको भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ’॥ ७॥

तथा क्रुद्धं दशग्रीवं कृताञ्जलिरकम्पन:।

भयात् संदिग्धया वाचा रावणं याचतेऽभयम्॥ ८॥

रावणको इस प्रकार क्रोधसे भरा देख भयके मारे अकम्पनकी बोलती बंद हो गयी। उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणीमें रावणसे अभयकी याचना की॥ ८॥

दशग्रीवोऽभयं तस्मै प्रददौ रक्षसां वर:।

स विस्रब्धोऽब्रवीद् वाक्यमसंदिग्धमकम्पन:॥ ९॥

तब राक्षसोंमें श्रेष्ठ दशग्रीवने उसे अभयदान दिया। इससे अकम्पनको अपने प्राण बचनेका विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला—॥ ९॥

पुत्रो दशरथस्यास्ते सिंहसंहननो युवा।

रामो नाम महास्कन्धो वृत्तायतमहाभुज:॥ १०॥

श्याम: पृथुयशा: श्रीमानतुल्यबलविक्रम:।

हतस्तेन जनस्थाने खरश्च सहदूषण:॥ ११॥

‘राक्षसराज! राजा दशरथके नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटीमें रहते हैं। उनके शरीरकी गठन सिंहके समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लम्बी हैं, शरीरका रंग साँवला है। वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं। उनके बल और पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है। उन्होंने जनस्थानमें रहनेवाले खर और दूषण आदिका वध किया है’॥ १०-११॥

अकम्पनवच: श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिप:।

नागेन्द्र इव नि:श्वस्य इदं वचनमब्रवीत्॥ १२॥

अकम्पनकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणने नागराज (महान् सर्प) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा—॥ १२॥

स सुरेन्द्रेण संयुक्तो राम: सर्वामरै: सह।

उपयातो जनस्थानं ब्रूहि कच्चिदकम्पन॥ १३॥

अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्रके साथ जनस्थानमें आये हैं?’॥ १३॥

रावणस्य पुनर्वाक्यं निशम्य तदकम्पन:।

आचचक्षे बलं तस्य विक्रमं च महात्मन:॥ १४॥

रावणका यह प्रश्न सुनकर अकम्पनने महात्मा श्रीरामके बल और पराक्रमका पुन: इस प्रकार वर्णन किया—

रामो नाम महातेजा: श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्।

दिव्यास्त्रगुणसम्पन्न: परं धर्मं गतो युधि॥ १५॥

‘लङ्केश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रोंके प्रयोगका जो गुण है, उससे भी वे पूर्णत: सम्पन्न हैं। युद्धकी कलामें तो वे पराकाष्ठाको पहुँचे हुए हैं॥ १५॥

तस्यानुरूपो बलवान् रक्ताक्षो दुन्दुभिस्वन:।

कनीयाँल्लक्ष्मणो भ्राता राकाशशिनिभानन:॥ १६॥

‘श्रीरामके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हींके समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर है॥ १६॥

स तेन सह संयुक्त: पावकेनानिलो यथा।

श्रीमान् राजवरस्तेन जनस्थानं निपातितम्॥ १७॥

‘जैसे अग्निके साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाईके साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थानको उजाड़ डाला है॥ १७॥

नैव देवा महात्मानो नात्र कार्या विचारणा।

शरा रामेण तूत्सृष्टा रुक्मपुङ्खा: पतत्त्रिण:॥ १८॥

सर्पा: पञ्चानना भूत्वा भक्षयन्ति स्म राक्षसान्।

‘उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि। इस विषयमें आप कोई विचार न करें। श्रीरामके छोड़े हुए सोनेकी पाँखवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसोंको खा जाते थे॥ १८/

येन येन च गच्छन्ति राक्षसा भयकर्षिता:॥ १९॥

तेन तेन स्म पश्यन्ति राममेवाग्रत: स्थितम्।

इत्थं विनाशितं तेन जनस्थानं तवानघ॥ २०॥

‘भयसे कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्गसे भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीरामको ही अपने सामने खड़ा देखते थे। अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीरामने ही आपके जनस्थानका विनाश किया है’॥ १९-२०॥

अकम्पनवच: श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्।

गमिष्यामि जनस्थानं रामं हन्तुं सलक्ष्मणम्॥ २१॥

अकम्पनकी यह बात सुनकर रावणने कहा—‘मैं अभी लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके लिये जनस्थानको जाऊँगा’॥ २१॥

अथैवमुक्ते वचने प्रोवाचेदमकम्पन:।

शृणु राजन् यथावृत्तं रामस्य बलपौरुषम्॥ २२॥

उसके ऐसा कहनेपर अकम्पन बोला—‘राजन्! श्रीरामका बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये॥ २२॥

असाध्य: कुपितो रामो विक्रमेण महायशा:।

आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरै:॥ २३॥

सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत्।

‘महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रमके द्वारा कोई भी काबूमें नहीं कर सकता। वे अपने बाणोंसे भरी हुई नदीके वेगको भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डलको पीड़ा दे सकते हैं॥ २३/

असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम्॥ २४॥

भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभु:।

वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरै:॥ २५॥

‘वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्रमें डूबती हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकते हैं, महासागरकी मर्यादाका भेदन करके समस्त लोकोंको उसके जलसे आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणोंसे समुद्रके वेग अथवा वायुको भी नष्ट कर सकते हैं॥ २४-२५॥

संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशा:।

शक्त: श्रेष्ठ: स पुरुष: स्रष्टुं पुनरपि प्रजा:॥ २६॥

‘वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके पुन: नये सिरेसे प्रजाकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं॥ २६॥

नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया।

रक्षसां वापि लोकेन स्वर्ग: पापजनैरिव॥ २७॥

‘दशग्रीव! जैसे पापी पुरुष स्वर्गपर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस-जगत् भी युद्धमें श्रीरामको नहीं जीत सकते॥ २७॥

न तं वध्यमहं मन्ये सर्वैर्देवासुरैरपि।

अयं तस्य वधोपायस्तन्ममैकमना: शृणु॥ २८॥

‘मेरी समझमें सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते। उनके वधका यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुखसे एकचित्त होकर सुनिये॥ २८॥

भार्या तस्योत्तमा लोके सीता नाम सुमध्यमा।

श्यामा समविभक्ताङ्गी स्त्रीरत्नं रत्नभूषिता॥ २९॥

‘श्रीरामकी पत्नी सीता संसारकी सर्वोत्तम सुन्दरी है। उसने यौवनके मध्यमें पदार्पण किया है। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित रहती है। सीता सम्पूर्ण स्त्रियोंमें एक रत्न है॥ २९॥

नैव देवी न गन्धर्वी नाप्सरा न च पन्नगी।

तुल्या सीमन्तिनी तस्या मानुषी तु कुतो भवेत्॥ ३०॥

‘देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूपमें उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य-जातिकी दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है॥ ३०॥

तस्यापहर भार्यां त्वं तं प्रमथ्य महावने।

सीतया रहितो रामो न चैव हि भविष्यति॥ ३१॥

‘उस विशाल वनमें जिस किसी भी उपायसे श्रीरामको धोखेमें डालकर आप उनकी पत्नीका अपहरण कर लें। सीतासे बिछुड़ जानेपर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे’॥ ३१॥

अरोचयत तद्वाक्यं रावणो राक्षसाधिप:।

चिन्तयित्वा महाबाहुरकम्पनमुवाच ह॥ ३२॥

राक्षसराज रावणको अकम्पनकी वह बात पसंद आ गयी। उस महाबाहु दशग्रीवने कुछ सोचकर अकम्पनसे कहा—॥ ३२॥

बाढं कल्यं गमिष्यामि ह्येक: सारथिना सह।

आनेष्यामि च वैदेहीमिमां हृष्टो महापुरीम्॥ ३३॥

‘ठीक है, कल प्रात:काल सारथिके साथ मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीताको प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरीमें ले आऊँगा’॥ ३३॥

तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरयुक्तेन रावण:।

रथेनादित्यवर्णेन दिश: सर्वा: प्रकाशयन्॥ ३४॥

ऐसा कहकर रावण गधोंसे जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वहाँसे चला॥ ३४॥

स रथो राक्षसेन्द्रस्य नक्षत्रपथगो महान्।

चञ्चूर्यमाण: शुशुभे जलदे चन्द्रमा इव॥ ३५॥

नक्षत्रोंके मार्गपर विचरता हुआ राक्षसराजका वह विशाल रथ बादलोंकी आड़में प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था॥ ३५॥

स दूरे चाश्रमं गत्वा ताटकेयमुपागमत्।

मारीचेनार्चितो राजा भक्ष्यभोज्यैरमानुषै:॥ ३६॥

कुछ दूरपर स्थित एक आश्रममें जाकर वह ताटकापुत्र मारीचसे मिला। मारीचने अलौकिक भक्ष्य-भोज्य अर्पित करके राजा रावणका स्वागत-सत्कार किया॥ ३६॥

तं स्वयं पूजयित्वा तु आसनेनोदकेन च।

अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ३७॥

आसन और जल आदिके द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीचने अर्थयुक्त वाणीमें पूछा—॥ ३७॥

कच्चित् सकुशलं राजँल्लोकानां राक्षसाधिप।

आशङ्के नाधिजाने त्वं यतस्तूर्णमुपागत:॥ ३८॥

‘राक्षसराज! तुम्हारे राज्यमें लोगोंकी कुशल तो है न? तुम बड़ी उतावलीके साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मनमें कुछ खटका हुआ है। मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँका अच्छा हाल नहीं है’॥ ३८॥

एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावण:।

तत: पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविद:॥ ३९॥

मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीतकी कलाको जाननेवाले महातेजस्वी रावणने इस प्रकार कहा—॥ ३९॥

आरक्षो मे हतस्तात रामेणाक्लिष्टकारिणा।

जनस्थानमवध्यं तत् सर्वं युधि निपातितम्॥ ४०॥

‘तात! अनायास ही महान् पराक्रम दिखानेवाले श्रीरामने मेरे राज्यकी सीमाके रक्षक खर-दूषण आदिको मार डाला है तथा जो जनस्थान अवध्य समझा जाता था, वहाँके सारे राक्षसोंको उन्होंने युद्धमें मार गिराया है॥ ४०॥

तस्य मे कुरु साचिव्यं तस्य भार्यापहारणे।

राक्षसेन्द्रवच: श्रुत्वा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ४१॥

‘अत: इसका बदला लेनेके लिये मैं उनकी स्त्रीका अपहरण करना चाहता हूँ। इस कार्यमें तुम मेरी सहायता करो।’ राक्षसराज रावणका यह वचन सुनकर मारीच बोला—॥ ४१॥

आख्याता केन वा सीता मित्ररूपेण शत्रुणा।

त्वया राक्षसशार्दूल को न नन्दति नन्दित:॥ ४२॥

‘निशाचरशिरोमणे! मित्रके रूपमें तुम्हारा वह कौन-सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीताको हर लेनेकी सलाह दी है? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अत: तुम्हारी बुराई करना चाहता है?॥ ४२॥

सीतामिहानयस्वेति को ब्रवीति ब्रवीहि मे।

रक्षोलोकस्य सर्वस्य क: शृङ्गं छेत्तुमिच्छति॥ ४३॥

‘कौन कहता है कि तुम सीताको यहाँ हर ले आओ? मुझे उसका नाम बताओ। वह कौन है, जो समस्त राक्षस-जगत्का सींग काट लेना चाहता है?॥

प्रोत्साहयति यश्च त्वां स च शत्रुरसंशयम्।

आशीविषमुखाद् दंष्ट्रामुद्धर्तुं चेच्छति त्वया॥ ४४॥

‘जो इस कार्यमें तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्पके मुखसे उसके दाँत उखड़वाना चाहता है॥ ४४॥

कर्मणानेन केनासि कापथं प्रतिपादित:।

सुखसुप्तस्य ते राजन् प्रहृतं केन मूर्धनि॥ ४५॥

‘राजन्! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्गपर पहुँचाया है? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तकपर लात मारी है॥ ४५॥

विशुद्धवंशाभिजनाग्रहस्त-

तेजोमद: संस्थितदोर्विषाण:।

उदीक्षितुं रावण नेह युक्त:

स संयुगे राघवगन्धहस्ती॥ ४६॥

‘रावण! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सूँघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं। विशुद्ध कुलमें जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराजका शुण्डदण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं। युद्धस्थलमें उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझनेकी तो बात ही क्या है॥ ४६॥

असौ रणान्त:स्थितिसंधिवालो

विदग्धरक्षोमृगहा नृसिंह:।

सुप्तस्त्वया बोधयितुं न शक्य:

शराङ्गपूर्णो निशितासिदंष्ट्र:॥ ४७॥

‘वे श्रीराम मनुष्यके रूपमें एक सिंह हैं। रणभूमिके भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गोंकी संधियाँ तथा बाल हैं। वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगोंका वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गोंसे परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं। उस सोते हुए सिंहको तुम नहीं जगा सकते॥ ४७॥

चापापहारे भुजवेगपङ्के

शरोर्मिमाले सुमहाहवौघे।

न रामपातालमुखेऽतिघोरे

प्रस्कन्दितुं राक्षसराज युक्तम्॥ ४८॥

‘राक्षसराज! श्रीराम एक पातालतलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्रके भीतर रहनेवाला ग्राह है, भुजाओंका वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है। उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानलमें कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है॥ ४८॥

प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र

लङ्कां प्रसन्नो भव साधु गच्छ।

त्वं स्वेषु दारेषु रमस्व नित्यं

राम: सभार्यो रमतां वनेषु॥ ४९॥

‘लंकेश्वर! प्रसन्न होओ। राक्षसराज! सानन्द रहो और सकुशल लंकाको लौट जाओ। तुम सदा पुरीमें अपनी स्त्रियोंके साथ रमण करो और राम अपनी पत्नीके साथ वनमें विहार करें’॥ ४९॥

एवमुक्तो दशग्रीवो मारीचेन स रावण:।

न्यवर्तत पुरीं लङ्कां विवेश च गृहोत्तमम्॥ ५०॥

मारीचके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण लंकाको लौटा और अपने सुन्दर महलमें चला गया॥ ५०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग:॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥

द्वात्रिंश: सर्ग:

शूर्पणखाका लंकामें रावणके पास जाना

तत: शूर्पणखा दृष्ट्वा सहस्राणि चतुर्दश।

हतान्येकेन रामेण रक्षसां भीमकर्मणाम्॥ १॥

दूषणं च खरं चैव हतं त्रिशिरसं रणे।

दृष्ट्वा पुनर्महानादान् ननाद जलदोपमा॥ २॥

उधर शूर्पणखाने जब देखा कि श्रीरामने भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको अकेले ही मार गिराया तथा युद्धके मैदानमें दूषण, खर और त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया, तब वह शोकके कारण मेघ-गर्जनाके समान पुन: बड़े जोर-जोरसे घोर चीत्कार करने लगी॥ १-२॥

सा दृष्ट्वा कर्म रामस्य कृतमन्यै: सुदुष्करम्।

जगाम परमोद्विग्ना लङ्कां रावणपालिताम्॥ ३॥

श्रीरामने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वह अत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावणद्वारा सुरक्षित लंकापुरीको गयी॥ ३॥

सा ददर्श विमानाग्रे रावणं दीप्ततेजसम्।

उपोपविष्टं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम्॥ ४॥

वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान) के ऊपरी भागमें बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणोंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियोंसे घिरा है॥ ४॥

आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने।

रुक्मवेदिगतं प्राज्यं ज्वलन्तमिव पावकम्॥ ५॥

रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासनपर विराजमान था, वह सूर्यके समान जगमगा रहा था। जैसे सोनेकी ईंटोंसे बनी हुई वेदीपर स्थापित अग्निदेव घीकी अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासनपर रावण शोभा पा रहा था॥ ५॥

देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम्।

अजेयं समरे घोरं व्यात्ताननमिवान्तकम्॥ ६॥

देवासुरविमर्देषु वज्राशनिकृतव्रणम्।

ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम् ॥ ७॥

देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतनेमें असमर्थ थे। समरभूमिमें वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराजकी भाँति भयानक जान पड़ता था। देवताओं और असुरोंके संग्रामके अवसरोंपर उसके शरीरमें वज्र और अशनिके जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अबतक विद्यमान थे। उसकी छातीमें ऐरावत हाथीने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे॥

विंशद्भुजं दशग्रीवं दर्शनीयपरिच्छदम्।

विशालवक्षसं वीरं राजलक्षणलक्षितम्॥ ८॥

नद्धवैदूर्यसंकाशं तप्तकाञ्चनभूषणम्।

सुभुजं शुक्लदशनं महास्यं पर्वतोपमम्॥ ९॥

उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे। वक्ष:स्थल विशाल था। वह वीर राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न दिखायी देता था। वह अपने शरीरमें जो वैदूर्यमणि (नीलम) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीरकी कान्ति भी थी। उसने तपाये हुए सोनेके आभूषण भी पहन रखे थे। उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वतके समान विशाल था॥ ८-९॥

विष्णुचक्रनिपातैश्च शतशो देवसंयुगे।

अन्यै: शस्त्रै: प्रहारैश्च महायुद्धेषु ताडितम्॥ १०॥

देवताओंके साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गोंपर सैकड़ों बार भगवान् विष्णुके चक्रका प्रहार हुआ था। बड़े-बड़े युद्धोंमें अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रोंकी भी उसपर मार पड़ी थी (उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे)॥

अहताङ्गै: समस्तैस्तं देवप्रहरणैस्तदा।

अक्षोभ्याणां समुद्राणां क्षोभणं क्षिप्रकारिणम्॥ ११॥

देवताओंके समस्त आयुधोंके प्रहारोंसे भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गोंसे वह अक्षोभ्य समुद्रोंमें भी क्षोभ (हलचल) पैदा कर देता था। वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रतासे करता था॥ ११॥

क्षेप्तारं पर्वताग्राणां सुराणां च प्रमर्दनम्।

उच्छेत्तारं च धर्माणां परदाराभिमर्शनम्॥ १२॥

पर्वतशिखरोंको भी तोड़कर फेंक देता था, देवताओंको भी रौंद डालता था। धर्मकी तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियोंके सतीत्वका नाश करनेवाला था॥

सर्वदिव्यास्त्रयोक्तारं यज्ञविघ्नकरं सदा।

पुरीं भोगवतीं गत्वा पराजित्य च वासुकिम्॥ १३॥

तक्षकस्य प्रियां भार्यां पराजित्य जहार य:।

वह सब प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करनेवाला और सदा यज्ञोंमें विघ्न डालनेवाला था। एक समय पातालकी भोगवती पुरीमें जाकर नागराज वासुकिको परास्त करके तक्षकको भी हराकर उसकी प्यारी पत्नीको वह हर ले आया था॥ १३/

कैलासं पर्वतं गत्वा विजित्य नरवाहनम्॥ १४॥

विमानं पुष्पकं तस्य कामगं वै जहार य:।

इसी तरह कैलास पर्वतपर जाकर कुबेरको युद्धमें पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलनेवाले पुष्पकविमानको अपने अधिकारमें कर लिया॥ १४/

वनं चैत्ररथं दिव्यं नलिनीं नन्दनं वनम्॥ १५॥

विनाशयति य: क्रोधाद् देवोद्यानानि वीर्यवान्।

वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेरके दिव्य चैत्ररथ वनको, सौगन्धिक कमलोंसे युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणीको, इन्द्रके नन्दनवनको तथा देवताओंके दूसरे-दूसरे उद्यानोंको नष्ट करता रहता था॥ १५/

चन्द्रसूर्यौ महाभागावुत्तिष्ठन्तौ परंतपौ॥ १६॥

निवारयति बाहुभ्यां य: शैलशिखरोपम:।

वह पर्वत-शिखरके समान आकार धारण करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्यको उनके उदयकालमें अपने हाथोंसे रोक देता था॥ १६/

दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने॥ १७॥

पुरा स्वयंभुवे धीर: शिरांस्युपजहार य:।

उस धीर स्वभाववाले रावणने पूर्वकालमें एक विशाल वनके भीतर दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके ब्रह्माजीको अपने मस्तकोंकी बलि दे दी थी॥ १७/

देवदानवगन्धर्वपिशाचपतगोरगै: ॥ १८॥

अभयं यस्य संग्रामे मृत्युतो मानुषादृते।

उसके प्रभावसे उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्पोंसे भी संग्राममें अभय प्राप्त हो गया था। मनुष्यके सिवा और किसीके हाथसे उसे मृत्युका भय नहीं था॥ १८/

मन्त्रैरभिष्टुतं पुण्यमध्वरेषु द्विजातिभि:॥ १९॥

हविर्धानेषु य: सोममुपहन्ति महाबल:।

वह महाबली राक्षस सोमसवनकर्मविशिष्ट यज्ञोंमें द्विजातियोंद्वारा वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रोंसे ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरसको वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था॥ १९/

प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम्॥ २०॥

कर्कशं निरनुक्रोशं प्रजानामहिते रतम्।

समाप्तिके निकट पहुँचे हुए यज्ञोंका विध्वंस करनेवाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणोंकी हत्या तथा दूसरे-दूसरे क्रूर कर्म करता था। वह बड़े ही रूखे स्वभावका और निर्दय था। सदा प्रजाजनोंके अहितमें ही लगा रहता था॥ २०/

रावणं सर्वभूतानां सर्वलोकभयावहम्॥ २१॥

राक्षसी भ्रातरं क्रूरं सा ददर्श महाबलम्।

समस्त लोकोंको भय देनेवाले और सम्पूर्ण प्राणियोंको रुलानेवाले अपने इस महाबली क्रूर भाईको राक्षसी शूर्पणखाने उस समय देखा॥ २१/

तं दिव्यवस्त्राभरणं दिव्यमाल्योपशोभितम्॥ २२॥

आसने सूपविष्टं तं काले कालमिवोद्यतम्।

राक्षसेन्द्रं महाभागं पौलस्त्यकुलनन्दनम्॥ २३॥

वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था। दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सिंहासनपर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकालमें संहारके लिये उद्यत हुए महाकालके समान जान पड़ता था॥ २२-२३॥

उपगम्याब्रवीद् वाक्यं राक्षसी भयविह्वला।

रावणं शत्रुहन्तारं मन्त्रिभि: परिवारितम्॥ २४॥

मन्त्रियोंसे घिरे हुए शत्रुहन्ता भाई रावणके पास जाकर भयसे विह्वल हुई वह राक्षसी कुछ कहनेको उद्यत हुई॥ २४॥

तमब्रवीद् दीप्तविशाललोचनं

प्रदर्शयित्वा भयलोभमोहिता।

सुदारुणं वाक्यमभीतचारिणी

महात्मना शूर्पणखा विरूपिता॥ २५॥

महात्मा लक्ष्मणने नाक-कान काटकर जिसे कुरूप कर दिया था तथा जो निर्भय विचरनेवाली थी, वह भय और लोभसे मोहित हुई शूर्पणखा बड़े-बड़े चमकीले नेत्रोंवाले अत्यन्त क्रूर रावणको अपनी दुर्दशा दिखाकर उससे बोली॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥

त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:

शूर्पणखाका रावणको फटकारना

तत: शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम्।

अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

उस समय शूर्पणखा श्रीरामसे तिरस्कृत होनेके कारण बहुत दु:खी थी। उसने मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणीमें कहा—॥ १॥

प्रमत्त: कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कुश:।

समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे॥ २॥

‘राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कुश होकर विषय-भोगोंमें मतवाले हो रहे हो। तुम्हारे लिये घोर भय उत्पन्न हो गया है। तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषयमें कुछ नहीं जानते हो॥ २॥

सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम्।

लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजा:॥ ३॥

‘जो राजा निम्न श्रेणीके भोगोंमें आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघटकी आगके समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है॥ ३॥

स्वयं कार्याणि य: काले नानुतिष्ठति पार्थिव:।

स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति॥ ४॥

‘जो राजा ठीक समयपर स्वयं ही अपने कार्योंका सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्योंके साथ ही नष्ट हो जाता है॥ ४॥

अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम्।

वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपा:॥ ५॥

‘जो राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचरोंको नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनोंको जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगोंमें आसक्त होनेके कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजाको प्रजा दूरसे ही त्याग देती है। ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदीकी कीचड़से दूर ही रहते हैं॥ ५॥

ये न रक्षन्ति विषयमस्वाधीनं नराधिपा:।

ते न वृद्ध्या प्रकाशन्ते गिरय: सागरे यथा॥ ६॥

जो नरेश अपने राज्यके उस प्रान्तकी, जो अपनी ही असावधानीके कारण दूसरेके अधिकारमें चला गया हो, रक्षा नहीं करते—उसे पुन: अपने अधिकारमें नहीं लाते, वे समुद्रमें डूबे हुए पर्वतोंकी भाँति अपने अभ्युदयसे प्रकाशित नहीं होते हैं॥ ६॥

आत्मवद्भिर्विगृह्य त्वं देवगन्धर्वदानवै:।

अयुक्तचारश्चपल: कथं राजा भविष्यसि॥ ७॥

‘जो अपने मनको काबूमें रखनेवाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वों तथा दानवोंके साथ विरोध करके तुमने अपने राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशामें तुम-जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा?॥ ७॥

त्वं तु बालस्वभावश्च बुद्धिहीनश्च राक्षस।

ज्ञातव्यं तन्न जानीषे कथं राजा भविष्यसि॥ ८॥

‘राक्षस! तुम्हारा स्वभाव बालकों-जैसा है। तुम निरे बुद्धिहीन हो। तुम्हें जाननेयोग्य बातोंका भी ज्ञान नहीं है। ऐसी दशामें तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे?॥ ८॥

येषां चाराश्च कोशश्च नयश्च जयतां वर।

अस्वाधीना नरेन्द्राणां प्राकृतैस्ते जनै: समा:॥ ९॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशोंके गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगोंके ही समान हैं॥ ९॥

यस्मात् पश्यन्ति दूरस्थान् सर्वानर्थान् नराधिपा:।

चारेण तस्मादुच्यन्ते राजानो दीर्घचक्षुष:॥ १०॥

‘गुप्तचरोंकी सहायतासे राजालोग दूर-दूरके सारे कार्योंकी देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं॥ १०॥

अयुक्तचारं मन्ये त्वां प्राकृतै: सचिवैर्युत:।

स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे॥ ११॥

‘मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियोंसे घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्यके भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं। तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है॥ ११॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।

हतान्येकेन रामेण खरश्च सहदूषण:॥ १२॥

ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डका:।

धर्षितं च जनस्थानं रामेणाक्लिष्टकारिणा॥ १३॥

‘अकेले रामने, जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, भीमकर्मा राक्षसोंकी चौदह हजार सेनाको यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषणके भी प्राण ले लिये, ऋषियोंको भी अभयदान कर दिया तथा दण्डकारण्यमें राक्षसोंकी ओरसे जो विघ्न-बाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी। जनस्थानको तो उन्होंने चौपट ही कर डाला॥ १२-१३॥

त्वं तु लुब्ध: प्रमत्तश्च पराधीनश्च राक्षस।

विषये स्वे समुत्पन्नं यद् भयं नावबुध्यसे॥ १४॥

‘राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमादमें फँसकर पराधीन हो रहे हो, अत: अपने ही राज्यमें उत्पन्न हुए भयका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है॥ १४॥

तीक्ष्णमल्पप्रदातारं प्रमत्तं गर्वितं शठम्।

व्यसने सर्वभूतानि नाभिधावन्ति पार्थिवम्॥ १५॥

‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभावका परिचय देता है, सेवकोंको बहुत कम वेतन देता है, प्रमादमें पड़ा और गर्वमें भरा रहता है तथा स्वभावसे ही शठ होता है, उसके संकटमें पड़नेपर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं—उसकी सहायताके लिये आगे नहीं बढ़ते हैं॥

अतिमानिनमग्राह्यमात्मसम्भावितं नरम्।

क्रोधनं व्यसने हन्ति स्वजनोऽपि नराधिपम्॥ १६॥

‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनानेके अयोग्य, आप ही अपनेको बहुत बड़ा माननेवाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेशको संकटकालमें आत्मीय जन भी मार डालते हैं॥ १६॥

नानुतिष्ठति कार्याणि भयेषु न बिभेति च।

क्षिप्रं राज्याच्च्युतो दीनस्तृणैस्तुल्यो भवेदिह॥ १७॥

‘जो राजा अपने कर्तव्यका पालन अथवा करनेयोग्य कार्योंका सम्पादन नहीं करता तथा भयके अवसरोंपर भयभीत (एवं अपनी रक्षाके लिये सावधान) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतलपर तिनकोंके समान उपेक्षणीय हो जाता है॥ १७॥

शुष्ककाष्ठैर्भवेत् कार्यं लोष्ठैरपि च पांसुभि:।

न तु स्थानात् परिभ्रष्टै: कार्यं स्याद् वसुधाधिपै:॥ १८॥

‘लोगोंको सूखे काठोंसे, मिट्टीके ढेलों तथा धूलसे भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओंसे उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता॥ १८॥

उपभुक्तं यथा वास: स्रजो वा मृदिता यथा।

एवं राज्यात् परिभ्रष्ट: समर्थोऽपि निरर्थक:॥ १९॥

‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलोंकी माला दूसरोंके उपयोगमें आनेयोग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होनेपर भी दूसरोंके लिये निरर्थक है॥ १९॥

अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रिय:।

कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम्॥ २०॥

‘परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्यके समस्त कार्योंकी जानकारी रखता, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता, कृतज्ञ (दूसरोंके उपकारको माननेवाला) तथा स्वभावसे ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनोंतक राज्य करता है॥ २०॥

नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा।

व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनै:॥ २१॥

‘जो स्थूल आँखोंसे तो सोता है, परंतु नीतिकी आँखोंसे सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रहका फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजाकी लोग पूजा करते हैं॥ २१॥

त्वं तु रावण दुर्बुद्धिर्गुणैरेतैर्विवर्जित:।

यस्य तेऽविदितश्चारै रक्षसां सुमहान् वध:॥ २२॥

‘रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणोंसे वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरोंकी सहायतासे राक्षसोंके इस महान् संहारका समाचार ज्ञात नहीं हो सका था॥ २२॥

परावमन्ता विषयेषु सङ्गवान्

न देशकालप्रविभागतत्त्ववित्।

अयुक्तबुद्धिर्गुणदोषनिश्चये

विपन्नराज्यो न चिराद् विपत्स्यसे॥ २३॥

‘तुम दूसरोंका अनादर करनेवाले, विषयासक्त और देश-कालके विभागको यथार्थरूपसे न जाननेवाले हो, तुमने गुण और दोषके विचार एवं निश्चयमें कभी अपनी बुद्धिको नहीं लगाया है, अत: तुम्हारा राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्तिमें पड़ जाओगे’॥

इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तथा

समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वर:।

धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो

विचिन्तयामास चिरं स रावण:॥ २४॥

शूर्पणखाके द्वारा कहे गये अपने दोषोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बलसे सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देरतक सोच-विचार एवं चिन्तामें पड़ा रहा॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:॥ ३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

 

चतुस्त्र‌िंश: सर्ग:

रावणके पूछनेपर शूर्पणखाका उससे राम, लक्ष्मण और सीताका परिचय देते हुए सीताको भार्या बनानेके लिये उसे प्रेरित करना

तत: शूर्पणखां दृष्ट्वा ब्रुवन्तीं परुषं वच:।

अमात्यमध्ये संक्रुद्ध: परिपप्रच्छ रावण:॥ १॥

शूर्पणखाको इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—॥ १॥

कश्च राम: कथंवीर्य: किंरूप: किंपराक्रम:।

किमर्थं दण्डकारण्यं प्रविष्टश्च सुदुस्तरम्॥ २॥

‘राम कौन है? उसका बल कैसा है? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्यमें उसने किस लिये प्रवेश किया है?॥ २॥

आयुधं किं च रामस्य येन ते राक्षसा हता:।

खरश्च निहत: संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा॥ ३॥

‘रामके पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्धमें खर, दूषण और त्रिशिराका भी संहार हो गया॥ ३॥

तत्त्वं ब्रूहि मनोज्ञाङ्गि केन त्वं च विरूपिता।

इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता॥ ४॥

‘मनोहर अङ्गोंवाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?’ राक्षसराज रावणके इस प्रकार पूछनेपर वह राक्षसी क्रोधसे अचेत-सी हो उठी॥ ४॥

ततो रामं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।

दीर्घबाहुर्विशालाक्षश्चीरकृष्णाजिनाम्बर: ॥ ५॥

कन्दर्पसमरूपश्च रामो दशरथात्मज:।

तदनन्तर उसने श्रीरामका यथावत् परिचय देना आरम्भ किया—‘भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथके पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी-बड़ी और रूप कामदेवके समान है। वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं॥ ५॥

शक्रचापनिभं चापं विकृष्य कनकाङ्गदम्॥ ६॥

दीप्तान् क्षिपति नाराचान् सर्पानिव महाविषान्।

‘श्रीराम इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल धनुषको, जिसमें सोनेके छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पोंके समान तेजस्वी नाराचोंकी वर्षा करते हैं॥ ६॥

नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं महाबलम्॥ ७॥

न कार्मुकं विकर्षन्तं रामं पश्यामि संयुगे।

‘वे महाबली राम युद्धस्थलमें कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथमें लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं—यह मैं नहीं देख पाती थी॥ ७॥

हन्यमानं तु तत्सैन्यं पश्यामि शरवृष्टिभि:॥ ८॥

इन्द्रेणेवोत्तमं सस्यमाहतं त्वश्मवृष्टिभि:।

‘उनके बाणोंकी वर्षासे राक्षसोंकी सेना मर रही है— इतना ही मुझे दिखायी देता था। जैसे इन्द्र (मेघ) द्वारा बरसाये गये ओलोंकी वृष्टिसे अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार रामके बाणोंसे राक्षसोंका विनाश हो गया॥ ८॥

रक्षसां भीमवीर्याणां सहस्राणि चतुर्दश॥ ९ ॥

निहतानि शरैस्तीक्ष्णैस्तेनैकेन पदातिना।

अर्धाधिकमुहूर्तेन खरश्च सहदूषण:॥ १०॥

ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डका:॥ ११॥

‘श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त (तीन घड़ी) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसोंका तीखे बाणोंसे संहार कर डाला, ऋषियोंको अभय दे दिया और समस्त दण्डकवनको राक्षसोंकी विघ्न-बाधासे रहित कर दिया॥ ९—११॥

एका कथंचिन्मुक्ताहं परिभूय महात्मना।

स्त्रीवधं शङ्कमानेन रामेण विदितात्मना॥ १२॥

‘आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामने स्त्रीका वध हो जानेके भयसे एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया॥ १२॥

भ्राता चास्य महातेजा गुणतस्तुल्यविक्रम:।

अनुरक्तश्च भक्तश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥ १३॥

अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तो बुद्धिमान् बली।

रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चर:॥ १४॥

‘उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रममें उन्हींके समान है। उसका नाम है लक्ष्मण। वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाईका प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल-विक्रमसे सम्पन्न है। श्रीरामका वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरनेवाला प्राण है॥ १३-१४॥

रामस्य तु विशालाक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना।

धर्मपत्नी प्रिया नित्यं भर्तु: प्रियहिते रता॥ १५॥

‘श्रीरामकी धर्मपत्नी भी उनके साथ है। वह पतिको बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामीका प्रिय तथा हित करनेमें ही लगी रहती है। उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्रके समान मनोरम है॥ १५॥

सा सुकेशी सुनासोरू: सुरूपा च यशस्विनी।

देवतेव वनस्यास्य राजते श्रीरिवापरा॥ १६॥

‘उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं। वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डकवनकी देवी-सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मीके समान शोभा पाती है॥ १६॥

तप्तकाञ्चनवर्णाभा रक्ततुङ्गनखी शुभा।

सीता नाम वरारोहा वैदेही तनुमध्यमा॥ १७॥

‘उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्णकी कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं। वह शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है। वह विदेहराज जनककी कन्या है और सीता उसका नाम है॥ १७॥

नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी।

तथारूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले॥ १८॥

‘देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरोंकी स्त्रियोंमें भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है। इस भूतलपर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी॥ १८॥

यस्य सीता भवेद् भार्या यं च हृष्टा परिष्वजेत्।

अभिजीवेत् स सर्वेषु लोकेष्वपि पुरंदरात्॥ १९॥

‘सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्षमें भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकोंमें उसीका जीवन इन्द्रसे भी अधिक भाग्यशाली है॥ १९॥

सा सुशीला वपु:श्लाघ्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।

तवानुरूपा भार्या सा त्वं च तस्या: पतिर्वर:॥ २०॥

‘उसका शील-स्वभाव बड़ा ही उत्तम है। उसका एक-एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है। उसके रूपकी समानता करनेवाली भूमण्डलमें दूसरी कोई स्त्री नहीं है। वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे॥ २०॥

तां तु विस्तीर्णजघनां पीनोत्तुङ्गपयोधराम्।

भार्यार्थे तु तवानेतुमुद्यताहं वराननाम्॥ २१॥

विरूपितास्मि क्रूरेण लक्ष्मणेन महाभुज।

‘महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचोंवाली उस सुमुखी स्त्रीको जब मैं तुम्हारी भार्या बनानेके लिये ले आनेको उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मणने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया॥ २१॥

तां तु दृष्ट्वाद्य वैदेहीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥ २२॥

मन्मथस्य शराणां च त्वं विधेयो भविष्यसि।

‘पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीताको देखते ही तुम कामदेवके बाणोंके लक्ष्य बन जाओगे॥ २२॥

यदि तस्यामभिप्रायो भार्यात्वे तव जायते।

शीघ्रमुद्ध्रियतां पादो जयार्थमिह दक्षिण:॥ २३॥

‘यदि तुम्हें सीताको अपनी भार्या बनानेकी इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीरामको जीतनेके लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ॥ २३॥

रोचते यदि ते वाक्यं ममैतद् राक्षसेश्वर।

क्रियतां निर्विशङ्केन वचनं मम रावण॥ २४॥

‘राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो नि:शङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो॥ २४॥

विज्ञायैषामशक्तिं च क्रियतां च महाबल।

सीता तवानवद्याङ्गी भार्यात्वे राक्षसेश्वर॥ २५॥

‘महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदिकी असमर्थता और अपनी शक्तिका विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीताको अपनी भार्या बनानेका प्रयत्न करो (उसे हर लाओ)॥ २५॥

निशम्य रामेण शरैरजिह्मगै-

र्हताञ्जनस्थानगतान् निशाचरान्।

खरं च दृष्ट्वा निहतं च दूषणं

त्वमद्य कृत्यं प्रतिपत्तुमर्हसि॥ २६॥

‘श्रीरामने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरोंको मार डाला और खर तथा दूषणको भी मौतके घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये’॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुस्त्र‌िंश: सर्ग:॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥

 

पञ्चत्रिंश: सर्ग:

रावणका समुद्रतटवर्ती प्रान्तकी शोभा देखते हुए पुन: मारीचके पास जाना

तत: शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम्।

सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद‍्ध्वा जगाम ह॥ १॥

शूर्पणखाकी ये रोंगटें खड़ी कर देनेवाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियोंसे सलाह ले अपने कर्तव्यका निश्चय करके वहाँसे चल दिया॥ १॥

तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च।

दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ २॥

इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मन:।

स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह॥ ३॥

उसने पहले सीताहरणरूपी कार्यपर मन-ही-मन विचार किया। फिर उसके दोषों और गुणोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबलका निश्चय किया। अन्तमें यह स्थिर किया कि इस कामको करना ही चाहिये। जब इस बातपर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशालामें गया॥ २-३॥

यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिप:।

सूतं संचोदयामास रथ: संयुज्यतामिति॥ ४॥

गुप्तरूपसे रथशालामें जाकर राक्षसराज रावणने अपने सारथिको यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’॥ ४॥

एवमुक्त: क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रम:।

रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम्॥ ५॥

सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेमें कुशल था। रावणकी उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षणमें उसके मनके अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया॥ ५॥

कामगं रथमास्थाय काञ्चनं रत्नभूषितम्।

पिशाचवदनैर्युक्तं खरै: कनकभूषणै:॥ ६॥

वह रथ इच्छानुसार चलनेवाला तथा सुवर्णमय था। उसे रत्नोंसे विभूषित किया गया था। उसमें सोनेके साज-बाजोंसे सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचोंके समान था। रावण उसपर आरूढ़ होकर चला॥ ६॥

मेघप्रतिमनादेन स तेन धनदानुज:।

राक्षसाधिपति: श्रीमान् ययौ नदनदीपतिम्॥ ७॥

वह रथ मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घर-घर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था। उसके द्वारा वह कुबेरका छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्रके तटपर गया॥ ७॥

स श्वेतवालव्यजन: श्वेतच्छत्रो दशानन:।

स्निग्धवैदूर्यसंकाशस्तप्तकाञ्चनभूषण: ॥ ८॥

दशग्रीवो विंशतिभुजो दर्शनीयपरिच्छद:।

त्रिदशारिर्मुनीन्द्रघ्नो दशशीर्ष इवाद्रिराट्॥ ९॥

उस समय उसके लिये सफेद चँवरसे हवा की जा रही थी। सिरके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान नीली या काली थी। वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे विभूषित था। उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं। उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे। देवताओंका शत्रु और मुनीश्वरोंका हत्यारा वह निशाचर दस शिखरोंवाले पर्वतराजके समान प्रतीत होता था॥ ८-९॥

कामगं रथमास्थाय शुशुभे राक्षसाधिप:।

विद्युन्मण्डलवान् मेघ: सबलाक इवाम्बरे॥ १०॥

इच्छानुसार चलनेवाले उस रथपर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाशमें विद्युन्मण्डलसे घिरे हुए तथा वकपंक्तियोंसे सुशोभित मेघके समान शोभा पा रहा था॥ १०॥

सशैलसागरानूपं वीर्यवानवलोकयन्।

नानापुष्पफलैर्वृक्षैरनुकीर्णं सहस्रश:॥ ११॥

शीतमङ्गलतोयाभि: पद्मिनीभि: समन्तत:।

विशालैराश्रमपदैर्वेदिमद्भिरलंकृतम् ॥ १२॥

पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्रके तटपर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा। सागरका वह किनारा नाना प्रकारके फल-फूलवाले सहस्रों वृक्षोंसे व्याप्त था। चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जलसे भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओंसे मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतटकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११-१२॥

कदल्यटविसंशोभं नारिकेलोपशोभितम्।

सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितै:॥ १३॥

कहीं कदलीवन और कहीं नारियलके कुञ्ज शोभा दे रहे थे। साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलोंसे भरे हुए दूसरे-दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्तको अलंकृत कर रहे थे॥

अत्यन्तनियताहारै: शोभितं परमर्षिभि:।

नागै: सुपर्णैर्गन्धर्वै: किंनरैश्च सहस्रश:॥ १४॥

अत्यन्त नियमित आहार करनेवाले बड़े-बड़े महर्षियों, नागों, सुपर्णों (गरुड़ों), गन्धर्वों तथा सहस्रों किन्नरोंसे भी उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १४॥

जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम्।

आजैर्वैखानसैर्माषैर्वालखिल्यैर्मरीचिपै: ॥ १५॥

कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजीके पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्रमें उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले तपस्वीजनोंसे भी वह सागरका तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था॥ १५॥

दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम् ।

क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभि: सहस्रश:॥ १६॥

सेवितं देवपत्नीभि: श्रीमतीभिरुपासितम्।

देवदानवसङ्घैश्च चरितं त्वमृताशिभि:॥ १७॥

दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओंको धारण करनेवाली तथा क्रीड़ा-विहारकी विधिको जाननेवाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं। कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतटका सेवन करती हुई आस-पास बैठी थीं। देवताओं और दानवोंके समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे॥ १६-१७॥

हंसक्रौञ्चप्लवाकीर्णं सारसै: सम्प्रसादितम्।

वैदूर्यप्रस्तरं स्निग्धं सान्द्रं सागरतेजसा॥ १८॥

सिन्धुका वह तट समुद्रके तेजसे उसकी तरङ्गमालाओंके स्पर्शसे स्निग्ध एवं शीतल था। वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस तटपर वैदूर्यमणिके सदृश श्याम रंगके प्रस्तर दिखायी देते थे॥ १८॥

पाण्डुराणि विशालानि दिव्यमाल्ययुतानि च।

तूर्यगीताभिजुष्टानि विमानानि समन्तत:॥ १९॥

तपसा जितलोकानां कामगान्यभिसम्पतन्।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव ददर्श धनदानुज:॥ २०॥

आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए कुबेरके छोटे भाई रावणने रास्तेमें सब ओर बहुत-से श्वेत वर्णके विमानों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंको भी देखा। वे इच्छानुसार चलनेवाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा पुरुषोंके थे, जिन्होंने तपस्यासे पुण्यलोकोंपर विजय पायी थी। उन विमानोंको दिव्य पुष्पोंसे सजाया गया था और उनके भीतरसे गीत-वाद्यकी ध्वनि प्रकट हो रही थी॥ १९-२०॥

निर्यासरसमूलानां चन्दनानां सहस्रश:।

वनानि पश्यन् सौम्यानि घ्राणतृप्तिकराणि च॥ २१॥

आगे बढ़नेपर उसने, जिनकी जड़ोंसे गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनोंके सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्धसे नासिकाको तृप्त करनेवाले थे॥ २१॥

अगुरूणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च।

तक्कोलानां च जात्यानां फलिनां च सुगन्धिनाम्॥ २२॥

पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च।

मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरत:॥ २३॥

शैलानि प्रवरांश्चैव प्रवालनिचयांस्तथा।

काञ्चनानि च शृङ्गाणि राजतानि तथैव च॥ २४॥

प्रस्रवाणि मनोज्ञानि प्रसन्नान्यद्भुतानि च।

धनधान्योपपन्नानि स्त्रीरत्नैरावृतानि च॥ २५॥

हस्त्यश्वरथगाढानि नगराणि विलोकयन्।

कहीं श्रेष्ठ अगुरुके वन थे, कहीं उत्तम जातिके सुगन्धित फलवाले तक्कोलों (वृक्षविशेषों) के उपवन थे। कहीं तमालके फूल खिले हुए थे। कहीं गोल मिर्चकी झाडि़याँ शोभा पाती थीं और कहीं समुद्रके तटपर ढेर-के-ढेर मोती सूख रहे थे। कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूगोंकी राशियाँ, कहीं सोने-चाँदीके शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानीके झरने दिखायी देते थे। कहीं धन-धान्यसे सम्पन्न, स्त्री-रत्नोंसे भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे व्याप्त नगर दृष्टिगोचर होते थे। इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा॥ २२—२५/

तं समं सर्वत: स्निग्धं मृदुसंस्पर्शमारुतम्॥ २६॥

अनूपे सिन्धुराजस्य ददर्श त्रिदिवोपमम्।

फिर उसने सिंधुराजके तटपर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्गके समान मनोहर, सब ओरसे समतल और स्निग्ध था। वहाँ मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था॥ २६/

तत्रापश्यत् स मेघाभं न्यग्रोधं मुनिभिर्वृतम्॥ २७॥

समन्ताद् यस्य ता: शाखा: शतयोजनमायता:।

वहाँ सागरतटपर एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छायाके कारण मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होता था। उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे। उस वृक्षकी सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनोंतक फैली हुई थीं॥ २७/

यस्य हस्तिनमादाय महाकायं च कच्छपम्॥ २८॥

भक्षार्थं गरुड: शाखामाजगाम महाबल:।

यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखापर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुएको लेकर उन्हें खानेके लिये आ बैठे थे॥ २८/

तस्य तां सहसा शाखां भारेण पतगोत्तम:॥ २९॥

सुपर्ण: पर्णबहुलां बभञ्जाथ महाबल:।

पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली गरुड़ने बहुसंख्यक पत्तोंसे भरी हुई उस शाखाको सहसा अपने भारसे तोड़ डाला था॥ २९/

तत्र वैखानसा माषा वालखिल्या मरीचिपा:॥ ३०॥

आजा बभूवुर्धूम्राश्च संगता: परमर्षय:।

उस शाखाके नीचे बहुत-से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप (सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञावाले महर्षि एक साथ रहते थे॥ ३०/

तेषां दयार्थं गरुडस्तां शाखां शतयोजनाम्॥ ३१॥

भग्नामादाय वेगेन तौ चोभौ गजकच्छपौ।

एकपादेन धर्मात्मा भक्षयित्वा तदामिषम्॥ ३२॥

निषादविषयं हत्वा शाखया पतगोत्तम:।

प्रहर्षमतुलं लेभे मोक्षयित्वा महामुनीन्॥ ३३॥

उनपर दया करके उनके जीवनकी रक्षा करनेके लिये पक्षियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ने उस टूटी हुई सौ योजन लंबी शाखाको और उन दोनों हाथी तथा कछुएको भी वेगपूर्वक एक ही पंजेसे पकड़ लिया तथा आकाशमें ही उन दोनों जंतुओंके मांस खाकर फेंकी हुई उस डालीके द्वारा निषाद देशका संहार कर डाला। उस समय पूर्वोक्त महामुनियोंको मृत्युके संकटसे बचा लेनेसे गरुड़को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ ३१—३३॥

स तु तेन प्रहर्षेण द्विगुणीकृतविक्रम:।

अमृतानयनार्थं वै चकार मतिमान् मतिम्॥ ३४॥

उस महान् हर्षसे बुद्धिमान् गरुड़का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आनेके लिये पक्का निश्चय कर लिया॥ ३४॥

अयोजालानि निर्मथ्य भित्त्वा रत्नगृहं वरम्।

महेन्द्रभवनाद् गुप्तमाजहारामृतं तत:॥ ३५॥

तत्पश्चात् इन्द्रलोकमें जाकर उन्होंने इन्द्रभवनकी उन जालियोंको तोड़ डाला, जो लोहेकी सींकचोंसे बनी हुई थीं। फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनको नष्ट-भ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृतको वे महेन्द्रभवनसे हर लाये॥ ३५॥

तं महर्षिगणैर्जुष्टं सुपर्णकृतलक्षणम्।

नाम्ना सुभद्रं न्यग्रोधं ददर्श धनदानुज:॥ ३६॥

गरुड़के द्वारा तोड़ी हुई डालीका वह चिह्न उस बरगदमें उस समय भी मौजूद था। उस वृक्षका नाम था सुभद्रवट। बहुत-से महर्षि उस वृक्षकी छायामें निवास करते थे। कुबेरके छोटे भाई रावणने उस वटवृक्षको देखा॥ ३६॥

तं तु गत्वा परं पारं समुद्रस्य नदीपते:।

ददर्शाश्रममेकान्ते पुण्ये रम्ये वनान्तरे॥ ३७॥

नदियोंके स्वामी समुद्रके दूसरे तटपर जाकर उसने एक रमणीय वनके भीतर पवित्र एवं एकान्तस्थानमें एक आश्रमका दर्शन किया॥ ३७॥

तत्र कृष्णाजिनधरं जटामण्डलधारिणम्।

ददर्श नियताहारं मारीचं नाम राक्षसम्॥ ३८॥

वहाँ शरीरमें काला मृगचर्म और सिरपर जटाओंका समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था। रावण वहाँ जाकर उससे मिला॥ ३८॥

स रावण: समागम्य विधिवत् तेन रक्षसा।

मारीचेनार्चितो राजा सर्वकामैरमानुषै:॥ ३९॥

मिलनेपर उस राक्षस मारीचने सब प्रकारके अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावणका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया॥ ३९॥

तं स्वयं पूजयित्वा च भोजनेनोदकेन च।

अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत्॥ ४०॥

अन्न और जलसे स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीचने प्रयोजनकी बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा—॥ ४०॥

कच्चित्ते कुशलं राजन् लङ्कायां राक्षसेश्वर।

केनार्थेन पुनस्त्वं वै तूर्णमेव इहागत:॥ ४१॥

‘राजन्! तुम्हारी लङ्कामें कुशल तो है? राक्षसराज! तुम किस कामके लिये पुन: इतनी जल्दी यहाँ आये हो?॥

एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावण:।

तत: पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविद:॥ ४२॥

मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल महातेजस्वी रावणने उससे इस प्रकार कहा—॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग:॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

 


षट्त्रिंश: सर्ग:

रावणका मारीचसे श्रीरामके अपराध बताकर उनकी पत्नी सीताके अपहरणमें सहायताके लिये कहना

मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषत:।

आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गति:॥ १॥

‘तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दु:खी हूँ और इस दु:खकी अवस्थामें तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले हो॥ १॥

जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम।

दूषणश्च महाबाहु: स्वसा शूर्पणखा च मे॥ २॥

त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षस: पिशिताशन:।

अन्ये च बहव: शूरा लब्धलक्षा निशाचरा:॥ ३॥

‘तुम जनस्थानको जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेधमें कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे॥ २-३॥

वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसा:।

बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिण:॥ ४॥

‘वे सभी राक्षस मेरी आज्ञासे वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वनमें जो धर्माचरण करनेवाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे॥ ४॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।

शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम्॥ ५॥

‘वहाँ खरके मनका अनुसरण करनेवाले तथा युद्धविषयक उत्साहसे सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करनेवाले थे॥ ५॥

ते त्विदानीं जनस्थाने वसमाना महाबला:।

सङ्गता: परमायत्ता रामेण सह संयुगे॥ ६॥

‘जनस्थानमें निवास करनेवाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब-के-सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षेत्रमें रामके साथ जा भिड़े थे॥ ६॥

नानाशस्त्रप्रहरणा: खरप्रमुखराक्षसा:।

तेन संजातरोषेण रामेण रणमूर्धनि॥ ७॥

अनुक्त्वा परुषं किंचिच्छरैर्व्यापारितं धनु:।

‘वे खर आदि राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करनेमें कुशल थे, परंतु युद्धके मुहानेपर रोषमें भरे हुए श्रीरामने अपने मुँहसे कोई कड़वी बात न कहकर बाणोंके साथ धनुषका ही व्यापार आरम्भ किया॥ ७/

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसामुग्रतेजसाम्॥ ८॥

निहतानि शरैर्दीप्तैर्मानुषेण पदातिना।

खरश्च निहत: संख्ये दूषणश्च निपातित:॥ ९॥

हत्वा त्रिशिरसं चापि निर्भया दण्डका: कृता:।

‘पैदल और मनुष्य होकर भी रामने अपने दमकते हुए बाणोंसे भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला और उसी युद्धमें खरको भी मौतके घाट उतारकर दूषणको भी मार गिराया। साथ ही त्रिशिराका वध करके उसने दण्डकारण्यको दूसरोंके लिये निर्भय बना दिया॥ ८-९/

पित्रा निरस्त: क्रुद्धेन सभार्य: क्षीणजीवित:॥ १०॥

स हन्ता तस्य सैन्यस्य राम: क्षत्रियपांसन:।

‘उसके पिताने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घरसे निकाल दिया है। उसका जीवन क्षीण हो चला है। यह क्षत्रियकुल-कलङ्क राम ही उस राक्षस-सेनाका घातक है॥ १०/

अशील: कर्कशस्तीक्ष्णो मूर्खो लुब्धोऽजितेन्द्रिय:॥ ११॥

त्यक्तधर्मा त्वधर्मात्मा भूतानामहिते रत:।

येन वैरं विनारण्ये सत्त्वमास्थाय केवलम्॥ १२॥

कर्णनासापहारेण भगिनी मे विरूपिता।

अस्य भार्यां जनस्थानात् सीतां सुरसुतोपमाम्॥ १३॥

आनयिष्यामि विक्रम्य सहायस्तत्र मे भव।

‘वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाववाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियोंके अहितमें तत्पर रहनेवाला है। जिसने बिना किसी वैर-विरोधके केवल बलका आश्रय ले मेरी बहिनके नाक-कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेनेके लिये मैं भी उसकी देवकन्याके समान सुन्दरी पत्नी सीताको जनस्थानसे बलपूर्वक हर लाऊँगा। तुम उस कार्यमें मेरी सहायता करो॥ ११—१३/

त्वया ह्यहं सहायेन पार्श्वस्थेन महाबल॥ १४॥

भ्रातृभिश्च सुरान् सर्वान् नाहमत्राभिचिन्तये।

तत्सहायो भव त्वं मे समर्थो ह्यसि राक्षस॥ १५॥

‘महाबली राक्षस! तुम-जैसे पार्श्ववर्ती सहायकके और अपने भाइयोंके बलपर ही मैं समस्त देवताओंकी यहाँ कोई परवा नहीं करता, अत: तुम मेरे सहायक हो जाओ; क्योंकि तुम मेरी सहायता करनेमें समर्थ हो॥

वीर्ये युद्धे च दर्पे च न ह्यस्ति सदृशस्तव।

उपायतो महान् शूरो महामायाविशारद:॥ १६॥

‘पराक्रममें, युद्धमें और वीरोचित अभिमानमें तुम्हारे समान कोई नहीं है। नाना प्रकारके उपाय बतानेमें भी तुम बड़े बहादुर हो। बड़ी-बड़ी मायाओंका प्रयोग करनेमें भी विशेष कुशल हो॥ १६॥

एतदर्थमहं प्राप्तस्त्वत्समीपं निशाचर।

शृणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यं वचनान्मम॥ १७॥

‘निशाचर! इसीलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। सहायताके लिये मेरे कथनानुसार तुम्हें कौन-सा काम करना है, वह भी सुनो॥ १७॥

सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभि:।

आश्रमे तस्य रामस्य सीताया: प्रमुखे चर॥ १८॥

‘तुम सोनेके बने हुए मृग-जैसा रूप धारण करके रजतमय बिन्दुओंसे युक्त चितकबरे हो जाओ और रामके आश्रममें सीताके सामने विचरो॥ १८॥

त्वां तु नि:संशयं सीता दृष्ट्वा तु मृगरूपिणम्।

गृह्यतामिति भर्तारं लक्ष्मणं चाभिधास्यति॥ १९॥

‘विचित्र मृगके रूपमें तुम्हें देखकर सीता अवश्य ही अपने पति रामसे तथा लक्ष्मणसे भी कहेगी कि आपलोग इसे पकड़ लावें॥ १९॥

ततस्तयोरपाये तु शून्ये सीतां यथासुखम्।

निराबाधो हरिष्यामि राहुश्चन्द्रप्रभामिव॥ २०॥

‘जब वे दोनों तुम्हें पकड़नेके लिये दूर निकल जायँगे, तब मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके सूने आश्रमसे सीताको उसी तरह सुखपूर्वक हर लाऊँगा, जैसे राहु चन्द्रमाकी प्रभाका अपहरण कर लेता है॥ २०॥

तत: पश्चात् सुखं रामे भार्याहरणकर्शिते।

विश्रब्धं प्रहरिष्यामि कृतार्थेनान्तरात्मना॥ २१॥

‘उसके बाद स्त्रीका अपहरण हो जानेसे जब राम अत्यन्त दु:खी और दुर्बल हो जायगा, उस समय मैं निर्भय हो सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थचित्तसे प्रहार करूँगा’॥ २१॥

तस्य रामकथां श्रुत्वा मारीचस्य महात्मन:।

शुष्कं समभवद् वक्त्रं परित्रस्तो बभूव च॥ २२॥

रावणके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा सुनकर महात्मा मारीचका मुँह सूख गया। वह भयसे थर्रा उठा॥

ओष्ठौ परिलिहन् शुष्कौ नेत्रैरनिमिषैरिव।

मृतभूत इवार्तस्तु रावणं समुदैक्षत॥ २३॥

वह अपलक नेत्रोंसे देखता हुआ अपने सूखे ओठोंको चाटने लगा। उसे इतना दु:ख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने लगा। उसी अवस्थामें उसने रावणकी ओर देखा॥ २३॥

स रावणं त्रस्तविषण्णचेता

महावने रामपराक्रमज्ञ:।

कृताञ्जलिस्तत्त्वमुवाच वाक्यं

हितं च तस्मै हितमात्मनश्च॥ २४॥

उसे महान् वनमें श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत और दु:खी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावणसे यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावणके तथा अपने लिये भी हितकर थी॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्त्रिंश: सर्ग:॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥

 

सप्तत्रिंश: सर्ग:

मारीचका रावणको श्रीरामचन्द्रजीके गुण और प्रभाव बताकर सीताहरणके उद्योगसे रोकना

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारद:।

प्रत्युवाच महातेजा मारीचो राक्षसेश्वरम्॥ १॥

राक्षसराज रावणकी पूर्वोक्त बात सुनकर बातचीत करनेमें कुशल महातेजस्वी मारीचने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १॥

सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन:।

अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:॥ २॥

‘राजन्! सदा प्रिय वचन बोलनेवाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होनेपर भी हितकर हो, ऐसी बातके कहने और सुननेवाले दोनों ही दुर्लभ हैं॥ २॥

न नूनं बुध्यसे रामं महावीर्यगुणोन्नतम्।

अयुक्तचारश्चपलो महेन्द्रवरुणोपमम्॥ ३॥

‘तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा हृदय भी बहुत ही चञ्चल है; अत: निश्चय ही तुम श्रीरामचन्द्रजीको बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणोंमें बहुत बढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुणके समान हैं॥ ३॥

अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषामपि रक्षसाम्।

अपि रामो न संक्रुद्ध: कुर्याल्लोकानराक्षसान्॥ ४॥

‘तात! मैं तो यही चाहता हूँ कि समस्त राक्षसोंका कल्याण हो। कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकोंको राक्षसोंसे शून्य कर दें?॥ ४॥

अपि ते जीवितान्ताय नोत्पन्ना जनकात्मजा।

अपि सीतानिमित्तं च न भवेद् व्यसनं महत्॥ ५॥

‘जनकनन्दिनी सीता तुम्हारे जीवनका अन्त करनेके लिये तो नहीं उत्पन्न हुई है? कहीं ऐसा न हो कि सीताके कारण तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बड़ा सङ्कट आ जाय?॥ ५॥

अपि त्वामीश्वरं प्राप्य कामवृत्तं निरङ्कुशम्।

न विनश्येत् पुरी लङ्का त्वया सह सराक्षसा॥ ६॥

‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी और उच्छृङ्खल राजाको पाकर लङ्कापुरी तुम्हारे और राक्षसोंके साथ ही नष्ट न हो जाय?॥ ६॥

त्वद्विध: कामवृत्तो हि दु:शील: पापमन्त्रित:।

आत्मानं स्वजनं राष्ट्रं स राजा हन्ति दुर्मति:॥ ७॥

‘जो राजा तुम्हारे समान दुराचारी, स्वेच्छाचारी, पापपूर्ण विचार रखनेवाला और खोटी बुद्धिवाला होता है, वह अपना, अपने स्वजनोंका तथा समूचे राष्ट्रका भी विनाश कर डालता है॥ ७॥

न च पित्रा परित्यक्तो नामर्याद: कथंचन।

न लुब्धो न च दु:शीलो न च क्षत्रियपांसन:॥ ८॥

‘श्रीरामचन्द्रजी न तो पिताद्वारा त्यागे या निकाले गये हैं, न उन्होंने धर्मकी मर्यादाका किसी तरह त्याग किया है, न वे लोभी, न दूषित आचार-विचारवाले और न क्षत्रियकुल-कलङ्क ही हैं॥ ८॥

न च धर्मगुणैर्हीन: कौसल्यानन्दवर्धन:।

न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रत:॥ ९॥

‘कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम धर्मसम्बन्धी गुणोंसे हीन नहीं हुए हैं। उनका स्वभाव भी किसी प्राणीके प्रति तीखा नहीं है। वे सदा समस्त प्राणियोंके हितमें ही तत्पर रहते हैं॥ ९॥

वञ्चितं पितरं दृष्ट्वा कैकेय्या सत्यवादिनम्।

करिष्यामीति धर्मात्मा तत: प्रव्रजितो वनम्॥ १०॥

‘रानी कैकेयीने पिताको धोखेमें डालकर मेरे वनवासका वर माँग लिया—यह देखकर धर्मात्मा श्रीरामने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि मैं पिताको सत्यवादी बनाऊँगा (उनके दिये हुए वर या वचनको पूरा करूँगा); इस निश्चयके अनुसार वे स्वयं ही वनको चल दिये॥ १०॥

कैकेय्या: प्रियकामार्थं पितुर्दशरथस्य च।

हित्वा राज्यं च भोगांश्च प्रविष्टो दण्डकावनम्॥ ११॥

‘माता कैकेयी और पिता राजा दशरथका प्रिय करनेकी इच्छासे ही वे स्वयं राज्य और भोगोंका परित्याग करके दण्डकवनमें प्रविष्ट हुए हैं॥ ११॥

न राम: कर्कशस्तात नाविद्वान् नाजितेन्द्रिय:।

अनृतं न श्रुतं चैव नैव त्वं वक्तुमर्हसि॥ १२॥

‘तात! श्रीराम क्रूर नहीं हैं। वे मूर्ख और अजितेन्द्रिय भी नहीं हैं। श्रीराममें मिथ्याभाषणका दोष मैंने कभी नहीं सुना है; अत: उनके विषयमें तुम्हें ऐसी उलटी बातें कभी नहीं कहनी चाहिये॥ १२॥

रामो विग्रहवान् धर्म: साधु: सत्यपराक्रम:।

राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासव:॥ १३॥

‘श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे साधु और सत्यपराक्रमी हैं। जैसे इन्द्र समस्त देवताओंके अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम भी सम्पूर्ण जगत्के राजा हैं॥ १३॥

कथं नु तस्य वैदेहीं रक्षितां स्वेन तेजसा।

इच्छसे प्रसभं हर्तुं प्रभामिव विवस्वत:॥ १४॥

‘उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी सीता अपने ही पातिव्रत्यके तेजसे सुरक्षित हैं। जैसे सूर्यकी प्रभा उससे अलग नहीं की जा सकती, उसी तरह सीताको श्रीरामसे अलग करना असम्भव है। ऐसी दशामें तुम बलपूर्वक उनका अपहरण कैसे करना चाहते हो?॥ १४॥

शरार्चिषमनाधृष्यं चापखड्गेन्धनं रणे।

रामाग्निं सहसा दीप्तं न प्रवेष्टुं त्वमर्हसि॥ १५॥

‘श्रीराम प्रज्वलित अग्निके समान हैं। बाण ही उस अग्निकी ज्वाला है। धनुष और खड्ग ही उसके लिये ईंधनका काम करते हैं। तुम्हें युद्धके लिये सहसा उस अग्निमें प्रवेश नहीं करना चाहिये॥ १५॥

धनुर्व्यादितदीप्तास्यं शरार्चिषममर्षणम्।

चापबाणधरं तीक्ष्णं शत्रुसेनापहारिणम्॥ १६॥

राज्यं सुखं च संत्यज्य जीवितं चेष्टमात्मन:।

नात्यासादयितुं तात रामान्तकमिहार्हसि॥ १७॥

‘तात! धनुष ही जिसका फैला हुआ दीप्तिमान् मुख है और बाण ही प्रभा है, जो अमर्षमें भरा हुआ है, धनुष और बाण धारण किये खड़ा है, रोषवश तीखे स्वभावका परिचय देता है और शत्रुसेनाके प्राण लेनेमें समर्थ है, उस रामरूपी यमराजके पास तुम्हें यहाँ अपने राज्यसुख और प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर सहसा नहीं जाना चाहिये॥ १६-१७॥

अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा।

न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने॥ १८॥

‘जनककिशोरी सीता जिनकी धर्मपत्नी हैं, उनका तेज अप्रमेय है। श्रीरामचन्द्रजीका धनुष उनका आश्रय है, अत: तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि वनमें उनका अपहरण कर सको॥ १८॥

तस्य वै नरसिंहस्य सिंहोरस्कस्य भामिनी।

प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्या नित्यमनुव्रता॥ १९॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी हैं। उनका वक्ष:स्थल सिंहके समान उन्नत है। भामिनी सीता उनकी प्राणोंसे भी अधिक प्रियतमा पत्नी हैं। वे सदा अपने पतिका ही अनुसरण करती हैं॥ १९॥

न सा धर्षयितुं शक्या मैथिल्योजस्विन: प्रिया।

दीप्तस्येव हुताशस्य शिखा सीता सुमध्यमा॥ २०॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता ओजस्वी श्रीरामकी प्यारी पत्नी हैं। वे प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाके समान असह्य हैं, अत: उन सुन्दरी सीतापर बलात् नहीं किया जा सकता॥ २०॥

किमुद्यमं व्यर्थमिमं कृत्वा ते राक्षसाधिप।

दृष्टश्चेत् त्वं रणे तेन तदन्तमुपजीवितम्॥ २१॥

‘राक्षसराज! यह व्यर्थका उद्योग करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? जिस दिन युद्धमें तुम्हारे ऊपर श्रीरामकी दृष्टि पड़ जाय, उसी दिन तुम अपने जीवनका अन्त समझना॥ २१॥

जीवितं च सुखं चैव राज्यं चैव सुदुर्लभम्।

यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥ २२॥

‘यदि तुम अपने जीवनका, सुखका और परम दुर्लभ राज्यका चिरकालतक उपभोग करना चाहते हो तो श्रीरामका अपराध न करो॥ २२॥

स सर्वै: सचिवै: सार्धं विभीषणपुरस्कृतै:।

मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठै: कृत्वा निश्चयमात्मन:।

दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ २३॥

आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वत:।

हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि॥ २४॥

‘तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियोंके साथ सलाह करके अपने कर्तव्यका निश्चय करो। अपने और श्रीरामके दोषों तथा गुणोंके बलाबलपर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजीकी शक्तिको ठीक-ठीक समझ लो। फिर क्या करनेसे तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये॥ २३-२४॥

अहं तु मन्ये तव न क्षमं रणे

समागमं कोसलराजसूनुना।

इदं हि भूय: शृणु वाक्यमुत्तमं

क्षमं च युक्तं च निशाचराधिप॥ २५॥

‘निशाचरराज! मैं तो समझता हूँ कि कोसल-राजकुमार श्रीरामचन्द्रजीके साथ तुम्हारा युद्ध करना उचित नहीं है। अब पुन: मेरी एक बात और सुनो, यह तुम्हारे लिये बहुत ही उत्तम, उचित और उपयुक्त सिद्ध होगी’॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तत्रिंश: सर्ग:॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥

 

अष्टात्रिंश: सर्ग:

श्रीरामकी शक्तिके विषयमें अपना अनुभव बताकर मारीचका रावणको उनका अपराध करनेसे मना करना

कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।

बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपम:॥ १॥

‘एक समयकी बात है कि मैं अपने पराक्रमके अभिमानमें आकर पर्वतके समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था॥ १॥

नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डल: ।

भयं लोकस्य जनयन् किरीटी परिघायुध:॥ २॥

व्यचरन् दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन्।

‘मेरा शरीर नील मेघके समान काला था। मैंने कानोंमें पक्के सोनेके कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तकपर किरीट था और हाथमें परिघ। मैं ऋषियोंके मांस खाता और समस्त जगत्के मनमें भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्यमें विचर रहा था॥ २/

विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनि:॥ ३॥

स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत्।

‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रको मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथके पास गये और उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३/

अयं रक्षतु मां राम: पर्वकाले समाहित:॥ ४॥

मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर।

‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षससे घोर भय प्राप्त हुआ है, अत: ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्वके दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’॥ ४/

इत्येवमुक्तो धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा॥ ५॥

प्रत्युवाच महाभागं विश्वामित्रं महामुनिम्।

‘मुनिके ऐसा कहनेपर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथने महाभाग महामुनि विश्वामित्रको इस प्रकार उत्तर दिया—

ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघव:॥ ६॥

कामं तु मम तत् सैन्यं मया सह गमिष्यति।

बलेन चतुरङ्गेण स्वयमेत्य निशाचरम्॥ ७॥

वधिष्यामि मुनिश्रेष्ठ शत्रुं तव यथेप्सितम्।

‘मुनिश्रेष्ठ! रघुकुलनन्दन रामकी अवस्था अभी बारह106 वर्षसे भी कम है। इन्हें अस्त्र-शस्त्रोंके चलानेका पूरा अभ्यास भी नहीं है। आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेनाके साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छाके अनुसार उस शत्रुरूप निशाचरका वध करूँगा’॥ ६-७/

एवमुक्त: स तु मुनी राजानमिदमब्रवीत्॥ ८॥

रामान्नान्यद् बलं लोके पर्याप्तं तस्य रक्षस:।

‘राजाके ऐसा कहनेपर मुनि उनसे इस प्रकार बोले—‘उस राक्षसके लिये श्रीरामके सिवा दूसरी कोई शक्ति पर्याप्त नहीं है॥ ८/

देवतानामपि भवान् समरेष्वभिपालक:॥ ९॥

आसीत् तव कृतं कर्म त्रिलोकविदितं नृप।

‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमिमें देवताओंकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ९/

काममस्ति महत् सैन्यं तिष्ठत्विह परंतप॥ १०॥

बालोऽप्येष महातेजा: समर्थस्तस्य निग्रहे।

गमिष्ये राममादाय स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥ ११॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे (आप भी यहीं रहें।) महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षसका दमन करनेमें समर्थ हैं, अत: मैं श्रीरामको ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’॥ १०-११॥

इत्येवमुक्त्वा स मुनिस्तमादाय नृपात्मजम्।

जगाम परमप्रीतो विश्वामित्र: स्वमाश्रमम्॥ १२॥

‘ऐसा कहकर (लक्ष्मणसहित) राजकुमार श्रीरामको साथ ले महामुनि विश्वामित्र बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमको गये॥ १२॥

तं तथा दण्डकारण्ये यज्ञमुद्दिश्य दीक्षितम्।

बभूवोपस्थितो रामश्चित्रं विस्फारयन् धनु:॥ १३॥

‘इस प्रकार दण्डकारण्यमें जाकर उन्होंने यज्ञके लिये दीक्षा ग्रहण की और श्रीराम अपने अद्भुत धनुषकी टङ्कार करते हुए उनकी रक्षाके लिये पास ही खड़े हो गये॥

अजातव्यञ्जन: श्रीमान् बाल: श्याम: शुभेक्षण:।

एकवस्त्रधरो धन्वी शिखी कनकमालया॥ १४॥

‘उस समयतक श्रीराममें जवानीके चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। (उनकी किशोरावस्था थी।) वे एक शोभाशाली बालकके रूपमें दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्गका रंग साँवला और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे एक वस्त्र धारण किये, हाथोंमें धनुष लिये सुन्दर शिखा और सोनेके हारसे सुशोभित थे॥ १४॥

शोभयन् दण्डकारण्यं दीप्तेन स्वेन तेजसा।

अदृश्यत तदा रामो बालचन्द्र इवोदित:॥ १५॥

‘उस समय अपने उद्दीप्त तेजसे दण्डकारण्यकी शोभा बढ़ाते हुए श्रीरामचन्द्र नवोदित बालचन्द्रके समान दृष्टिगोचर होते थे॥ १५॥

ततोऽहं मेघसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डल:।

बली दत्तवरो दर्पादाजगामाश्रमान्तरम्॥ १६॥

‘इधर मैं भी मेघके समान काले शरीरसे बड़े घमंडके साथ उस आश्रमके भीतर घुसा। मेरे कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झलमला रहे थे। मैं बलवान् तो था ही, मुझे वरदान भी मिल चुका था कि देवता मुझे मार नहीं सकेंगे॥ १६॥

तेन दृष्ट: प्रविष्टोऽहं सहसैवोद्यतायुध:।

मां तु दृष्ट्वा धनु: सज्यमसम्भ्रान्तश्चकार ह॥ १७॥

‘भीतर प्रवेश करते ही श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टि मुझपर पड़ी। मुझे देखते ही उन्होंने सहसा धनुष उठा लिया और बिना किसी घबराहटके उसपर डोरी चढ़ा दी॥

अवजानन्नहं मोहाद् बालोऽयमिति राघवम्।

विश्वामित्रस्य तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वर:॥ १८॥

‘मैं मोहवश श्रीरामचन्द्रजीको ‘यह बालक है’ ऐसा समझकर उनकी अवहेलना करता हुआ बड़ी तेजीके साथ विश्वामित्रकी उस यज्ञवेदीकी ओर दौड़ा॥ १८॥

तेन मुक्तस्ततो बाण: शित: शत्रुनिबर्हण:।

तेनाहं ताडित: क्षिप्त: समुद्रे शतयोजने॥ १९॥

‘इतनेहीमें श्रीरामने एक ऐसा तीखा बाण छोड़ा, जो शत्रुका संहार करनेवाला था; परंतु उस बाणकी चोट खाकर (मैं मरा नहीं) सौ योजन दूर समुद्रमें आकर गिर पड़ा॥

नेच्छता तात मां हन्तुं तदा वीरेण रक्षित:।

रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतन:॥ २०॥

पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि।

प्राप्य संज्ञां चिरात् तात लङ्कां प्रति गत: पुरीम्॥ २१॥

‘तात! वीर श्रीरामचन्द्रजी उस समय मुझे मारना नहीं चाहते थे, इसीलिये मेरी जान बच गयी। उनके बाणके वेगसे मैं भ्रान्तचित्त होकर दूर फेंक दिया गया और समुद्रके गहरे जलमें गिरा दिया गया। तात! फिर दीर्घकालके पश्चात् जब मुझे चेत हुआ, तब मैं लंकापुरीमें गया॥ २०-२१॥

एवमस्मि तदा मुक्त: सहायास्ते निपातिता:।

अकृतास्त्रेण रामेण बालेनाक्लिष्टकर्मणा॥ २२॥

‘इस प्रकार उस समय मैं मरनेसे बचा। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम उन दिनों अभी बालक थे और उन्हें अस्त्र चलानेका पूरा अभ्यास भी नहीं था तो भी उन्होंने मेरे उन सभी सहायकोंको मार गिराया, जो मेरे साथ गये थे॥ २२॥

तन्मया वार्यमाणस्तु यदि रामेण विग्रहम्।

करिष्यस्यापदां घोरां क्षिप्रं प्राप्य न शिष्यसि॥ २३॥

‘इसलिये मेरे मना करनेपर भी यदि तुम श्रीरामके साथ विरोध करोगे तो शीघ्र ही घोर आपत्तिमें पड़ जाओगे और अन्तमें अपने जीवनसे भी हाथ धो बैठोगे॥

क्रीडारतिविधिज्ञानां समाजोत्सवदर्शिनाम्।

रक्षसां चैव संतापमनर्थं चाहरिष्यसि॥ २४॥

‘खेल-कूद और भोग-विलासके क्रमको जाननेवाले तथा सामाजिक उत्सवोंको ही देख-देखकर दिल बहलानेवाले राक्षसोंके लिये तुम संताप और अनर्थ (मौत) बुला लाओगे॥ २४॥

हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नविभूषिताम्।

द्रक्ष्यसि त्वं पुरीं लङ्कां विनष्टां मैथिलीकृते॥ २५॥

‘मिथिलेशकुमारी सीताके लिये तुम्हें धनियोंकी अट्टालिकाओं तथा राजभवनोंसे भरी हुई एवं नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित लंकापुरीका विनाश भी अपनी आँखों देखना पड़ेगा॥ २५॥

अकुर्वन्तोऽपि पापानि शुचय: पापसंश्रयात्।

परपापैर्विनश्यन्ति मत्स्या नागहृदे यथा॥ २६॥

‘जो लोग आचार-विचारसे शुद्ध हैं और पाप या अपराध नहीं करते हैं, वे भी यदि पापियोंके सम्पर्कमें चले जायँ तो दूसरोंके पापोंसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे साँपवाले सरोवरमें निवास करनेवाली मछलियाँ उस सर्पके साथ ही मारी जाती हैं॥ २६॥

दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गान् दिव्याभरणभूषितान्।

द्रक्ष्यस्यभिहतान् भूमौ तव दोषात् तु राक्षसान्॥ २७॥

‘तुम देखोगे कि जिनके अङ्ग दिव्य चन्दनसे चर्चित होते थे तथा जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित रहते थे, वे ही राक्षस तुम्हारे ही अपराधसे मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हुए हैं॥ २७॥

हृतदारान् सदारांश्च दश विद्रवतो दिश:।

हतशेषानशरणान् द्रक्ष्यसि त्वं निशाचरान्॥ २८॥

‘तुम्हें यह भी दिखायी देगा कि कितने ही निशाचरोंकी स्त्रियाँ हर ली गयी हैं और कुछकी स्त्रियाँ साथ हैं तथा वे युद्धमें मरनेसे बचकर असहाय अवस्थामें दसों दिशाओंकी ओर भाग रहे हैं॥ २८॥

शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम् ।

प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम्॥ २९॥

‘नि:संदेह तुम्हारे सामने वह दृश्य भी आयेगा कि लंकापुरीपर बाणोंका जाल-सा बिछ गया है। वह आगकी ज्वालाओंसे घिर गयी है और उसका एक-एक घर जलकर भस्म हो गया है॥ २९॥

परदाराभिमर्शात् तु नान्यत् पापतरं महत्।

प्रमदानां सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे॥ ३०॥

भव स्वदारनिरत: स्वकुलं रक्ष राक्षसान्।

मानं वृद्धिं च राज्यं च जीवितं चेष्टमात्मन:॥ ३१॥

‘राजन्! परायी स्त्रीके संसर्गसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है। तुम्हारे अन्त:पुरमें हजारों युवती स्त्रियाँ हैं, उन अपनी ही स्त्रियोंमें अनुराग रखो। अपने कुलकी रक्षा करो, राक्षसोंके प्राण बचाओ तथा अपनी मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्यारे जीवनको नष्ट न होने दो॥ ३०-३१॥

कलत्राणि च सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च।

यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥ ३२॥

‘यदि तुम अपनी सुन्दरी स्त्रियों तथा मित्रोंका सुख अधिक कालतक भोगना चाहते हो तो श्रीरामका अपराध न करो॥ ३२॥

निवार्यमाण: सुहृदा मया भृशं

प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि।

गमिष्यसि क्षीणबल: सबान्धवो

यमक्षयं रामशरास्तजीवित:॥ ३३॥

‘मैं तुम्हारा हितैषी सुहृद् हूँ। यदि मेरे बारंबार मना करनेपर भी तुम हठपूर्वक सीताका अपहरण करोगे तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जायगी और तुम श्रीरामके बाणोंसे अपने प्राण गँवाकर बन्धु-बान्धवोंके साथ यमलोककी यात्रा करोगे’॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥

 

एकोनचत्वारिंश: सर्ग:

मारीचका रावणको समझाना

एवमस्मि तदा मुक्त: कथंचित् तेन संयुगे।

इदानीमपि यद् वृत्तं तच्छृणुष्व यदुत्तरम्॥ १॥

‘इस प्रकार इस समय तो मैं किसी तरह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे जीवित बच गया। उसके बाद इन दिनों जो घटना घटित हुई है, उसे भी सुन लो॥ १॥

राक्षसाभ्यामहं द्वाभ्यामनिर्विण्णस्तथाकृत:।

सहितो मृगरूपाभ्यां प्रविष्टो दण्डकावने॥ २॥

‘श्रीरामने मेरी वैसी दुर्दशा कर दी थी, तो भी मैं उनके विरोधसे बाज नहीं आया। एक दिन मृगरूपधारी दो राक्षसोंके साथ मैं भी मृगका ही रूप धारण करके दण्डकवनमें गया॥ २॥

दीप्तजिह्वो महादंष्ट्रस्तीक्ष्णशृङ्गो महाबल:।

व्यचरन् दण्डकारण्यं मांसभक्षो महामृग:॥ ३॥

‘मैं महान् बलशाली तो था ही, मेरी जीभ आगके समान उद्दीप्त हो रही थी। दाढ़ें भी बहुत बड़ी थीं, सींग तीखे थे और मैं महान् मृगके रूपमें मांस खाता हुआ दण्डकारण्यमें विचरने लगा॥ ३॥

अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण।

अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्तान् प्रधर्षयन्॥ ४॥

‘रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये अग्निशालाओंमें, जलाशयोंके घाटोंपर तथा देववृक्षोंके नीचे बैठे हुए तपस्वीजनोंको तिरस्कृत करता हुआ सब ओर विचरण करने लगा॥ ४॥

निहत्य दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिण:।

रुधिराणि पिबंस्तेषां तन्मांसानि च भक्षयन्॥ ५॥

‘दण्डकारण्यके भीतर धर्मानुष्ठानमें लगे हुए तापसोंको मारकर उनका रक्त पीना और मांस खाना यही मेरा काम था॥ ५॥

ऋषिमांसाशन: क्रूरस्त्रासयन् वनगोचरान्।

तदा रुधिरमत्तोऽहं व्यचरं दण्डकावनम्॥ ६॥

‘मेरा स्वभाव तो क्रूर था ही, मैं ऋषियोंके मांस खाता और वनमें विचरनेवाले प्राणियोंको डराता हुआ रक्तपान करके मतवाला हो दण्डकवनमें घूमने लगा॥ ६॥

तदाहं दण्डकारण्ये विचरन् धर्मदूषक:।

आसादयं तदा रामं तापसं धर्ममाश्रितम्॥ ७॥

वैदेहीं च महाभागां लक्ष्मणं च महारथम्।

तापसं नियताहारं सर्वभूतहिते रतम्॥ ८॥

‘इस प्रकार उस समय दण्डकारण्यमें विचरता हुआ धर्मको कलङ्कित करनेवाला मैं मारीच तापस धर्मका आश्रय लेनेवाले श्रीराम, विदेहनन्दिनी महाभागा सीता तथा मिताहारी तपस्वीके रूपमें समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले महारथी लक्ष्मणके पास जा पहुँचा॥ ७-८॥

सोऽहं वनगतं रामं परिभूय महाबलम्।

तापसोऽयमिति ज्ञात्वा पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ ९॥

अभ्यधावं सुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृङ्गो मृगाकृति:।

जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तं प्रहारमनुस्मरन्॥ १०॥

‘वनमें आये हुए महाबली श्रीरामको ‘यह एक तपस्वी है’ ऐसा जानकर उनकी अवहेलना करके मैं आगे बढ़ा और पहलेके वैरका बारंबार स्मरण करके अत्यन्त कुपित हो उनकी ओर दौड़ा। उस समय मेरी आकृति मृगके ही समान थी। मेरे सींग बड़े तीखे थे। उनके पहलेके प्रहारको याद करके मैं उन्हें मार डालना चाहता था। मेरी बुद्धि शुद्ध न होनेके कारण मैं उनकी शक्ति और प्रभावको भूल-सा गया था॥ ९-१०॥

तेन त्यक्तास्त्रयो बाणा: शिता: शत्रुनिबर्हणा:।

विकृष्य सुमहच्चापं सुपर्णानिलतुल्यगा:॥ ११॥

‘हम तीनोंको आते देख श्रीरामने अपने विशाल धनुषको खींचकर तीन पैने बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान शीघ्रगामी तथा शत्रुके प्राण लेनेवाले थे॥ ११॥

ते बाणा वज्रसंकाशा: सुघोरा रक्तभोजना:।

आजग्मु: सहिता: सर्वे त्रय: संनतपर्वण:॥ १२॥

‘झुकी हुई गाँठवाले वे सब तीनों बाण, जो वज्रके समान दु:सह, अत्यन्त भयंकर तथा रक्त पीनेवाले थे, एक साथ ही हमारी ओर आये॥ १२॥

पराक्रमज्ञो रामस्य शठो दृष्टभय: पुरा।

समुत्क्रान्तस्ततो मुक्तस्तावुभौ राक्षसौ हतौ॥ १३॥

‘मैं तो श्रीरामके पराक्रमको जानता था और पहले एक बार उनके भयका सामना कर चुका था, इसलिये शठतापूर्वक उछलकर भाग निकला। भाग जानेसे मैं तो बच गया; किंतु मेरे वे दोनों साथी राक्षस मारे गये॥

शरेण मुक्तो रामस्य कथंचित् प्राप्य जीवितम्।

इह प्रव्राजितो युक्तस्तापसोऽहं समाहित:॥ १४॥

‘इस बार श्रीरामके बाणसे किसी तरह छुटकारा पाकर मुझे नया जीवन मिला और तभीसे संन्यास लेकर समस्त दुष्कर्मोंका परित्याग करके स्थिरचित्त हो योगाभ्यासमें तत्पर रहकर तपस्यामें लग गया॥ १४॥

वृक्षे वृक्षे हि पश्यामि चीरकृष्णाजिनाम्बरम्।

गृहीतधनुषं रामं पाशहस्तमिवान्तकम्॥ १५॥

‘अब मुझे एक-एक वृक्षमें चीर, काला मृगचर्म और धनुष धारण किये श्रीराम ही दिखायी देते हैं, जो मुझे पाशधारी यमराजके समान प्रतीत होते हैं॥ १५॥

अपि रामसहस्राणि भीत: पश्यामि रावण।

रामभूतमिदं सर्वमरण्यं प्रतिभाति मे॥ १६॥

‘रावण! मैं भयभीत होकर हजारों रामोंको अपने सामने खड़ा देखता हूँ। यह सारा वन ही मुझे राममय प्रतीत हो रहा है॥ १६॥

राममेव हि पश्यामि रहिते राक्षसेश्वर।

दृष्ट्वा स्वप्नगतं राममुद्भ्रमामि विचेतन:॥ १७॥

‘राक्षसराज! जब मैं एकान्तमें बैठता हूँ, तब मुझे श्रीरामके ही दर्शन होते हैं। सपनेमें श्रीरामको देखकर मैं उद्भ्रान्त और अचेत-सा हो उठता हूँ॥ १७॥

रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण।

रत्नानि च रथाश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे॥ १८॥

‘रावण! मैं रामसे इतना भयभीत हो गया हूँ कि रत्न और रथ आदि जितने भी रकारादि नाम हैं, वे मेरे कानोंमें पड़ते ही मनमें भारी भय उत्पन्न कर देते हैं॥

अहं तस्य प्रभावज्ञो न युद्धं तेन ते क्षमम्।

बलिं वा नमुचिं वापि हन्याद्धि रघुनन्दन:॥ १९॥

‘मैं उनके प्रभावको अच्छी तरह जानता हूँ। इसीलिये कहता हूँ कि श्रीरामके साथ तुम्हारा युद्ध करना कदापि उचित नहीं है। रघुकुलनन्दन श्रीराम राजा बलि अथवा नमुचिका भी वध कर सकते हैं॥ १९॥

रणे रामेण युद्धस्व क्षमां वा कुरु रावण।

न ते रामकथा कार्या यदि मां द्रष्टुमिच्छसि॥ २०॥

‘रावण! तुम्हारी इच्छा हो तो रणभूमिमें श्रीरामके साथ युद्ध करो अथवा उन्हें क्षमा कर दो, किंतु यदि मुझे जीवित देखना चाहते हो तो मेरे सामने श्रीरामकी चर्चा न करो॥ २०॥

बहव: साधवो लोके युक्ता धर्ममनुष्ठिता:।

परेषामपराधेन विनष्टा: सपरिच्छदा:॥ २१॥

‘लोकमें बहुत-से साधुपुरुष, जो योगयुक्त होकर केवल धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहते थे, दूसरोंके अपराधसे ही परिकरोंसहित नष्ट हो गये॥ २१॥

सोऽहं परापराधेन विनशेयं निशाचर।

कुरु यत् ते क्षमं तत्त्वमहं त्वां नानुयामि वै॥ २२॥

‘निशाचर! मैं भी किसी तरह दूसरोंके अपराधसे नष्ट हो सकता हूँ, अत: तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। मैं इस कार्यमें तुम्हारा साथ नहीं दे सकता॥ २२॥

रामश्च हि महातेजा महासत्त्वो महाबल:।

अपि राक्षसलोकस्य भवेदन्तकरोऽपि हि॥ २३॥

‘क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी बड़े तेजस्वी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न तथा अधिक बलशाली हैं। वे समस्त राक्षस-जगत्का भी संहार कर सकते हैं॥ २३॥

यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगत: खर:।

अतिवृत्तो हत: पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रम:॥ २४॥

‘यदि शूर्पणखाका बदला लेनेके लिये जनस्थाननिवासी खर पहले श्रीरामपर चढ़ाई करनेके लिये गया और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके हाथसे मारा गया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ, इसमें श्रीरामका क्या अपराध है?॥ २४॥

इदं वचो बन्धुहितार्थिना मया

यथोच्यमानं यदि नाभिपत्स्यसे।

सबान्धवस्त्यक्ष्यसि जीवितं रणे

हतोऽद्य रामेण शरैरजिह्मगै:॥ २५॥

‘तुम मेरे बन्धु हो। मैं तुम्हारा हित करनेकी इच्छासे ही ये बातें कह रहा हूँ। यदि नहीं मानोगे तो युद्धमें आज रामके सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा घायल होकर तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा’॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग:॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥

 

चत्वारिंश: सर्ग:

रावणका मारीचको फटकारना और सीताहरणके कार्यमें सहायता करनेकी आज्ञा देना

मारीचस्य तु तद् वाक्यं क्षमं युक्तं च रावण:।

उक्तो न प्रतिजग्राह मर्तुकाम इवौषधम्॥ १॥

मारीचका वह कथन उचित और माननेयोग्य था तो भी जैसे मरनेकी इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहनेपर भी रावणने उसकी बात नहीं मानी॥ १॥

तं पथ्यहितवक्तारं मारीचं राक्षसाधिप:।

अब्रवीत् परुषं वाक्यमयुक्तं कालचोदित:॥ २॥

कालसे प्रेरित हुए उस राक्षसराजने यथार्थ और हितकी बात बतानेवाले मारीचसे अनुचित और कठोर वाणीमें कहा—॥ २॥

दुष्कुलैतदयुक्तार्थं मारीच मयि कथ्यते।

वाक्यं निष्फलमत्यर्थं बीजमुप्तमिवोषरे॥ ३॥

‘दूषित कुलमें उत्पन्न मारीच! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसरमें बोये हुए बीजके समान अत्यन्त निष्फल हैं॥ ३॥

त्वद्वाक्यैर्न तु मां शक्यं भेत्तुं रामस्य संयुगे।

मूर्खस्य पापशीलस्य मानुषस्य विशेषत:॥ ४॥

‘तुम्हारे इन वचनोंद्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषत: मनुष्य रामके साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्रीका अपहरण करनेके निश्चयसे मुझे विचलित नहीं किया जा सकता॥ ४॥

यस्त्यक्त्वा सुहृदो राज्यं मातरं पितरं तथा।

स्त्रीवाक्यं प्राकृतं श्रुत्वा वनमेकपदे गत:॥ ५॥

अवश्यं तु मया तस्य संयुगे खरघातिन:।

प्राणै: प्रियतरा सीता हर्तव्या तव संनिधौ॥ ६॥

‘एक स्त्री (कैकेयी) के मूर्खतापूर्ण वचन सुनकर जो राज्य, मित्र, माता और पिताको छोड़कर सहसा जंगलमें चला आया है तथा जिसने युद्धमें खरका वध किया है, उस रामचन्द्रकी प्राणोंसे भी प्यारी भार्या सीताका मैं तुम्हारे निकट ही अवश्य हरण करूँगा॥

एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हृदि मारीच विद्यते।

न व्यावर्तयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरै:॥ ७॥

‘मारीच! ऐसा मेरे हृदयका निश्चित विचार है, इसे इन्द्र आदि देवता और सारे असुर मिलकर भी बदल नहीं सकते॥ ७॥

दोषं गुणं वा सम्पृष्टस्त्वमेवं वक्तुमर्हसि।

अपायं वा उपायं वा कार्यस्यास्य विनिश्चये॥ ८॥

‘यदि इस कार्यका निर्णय करनेके लिये तुमसे पूछा जाता ‘इसमें क्या दोष है, क्या गुण है, इसकी सिद्धिमें कौन-सा विघ्न है अथवा इस कार्यको सिद्ध करनेका कौन-सा उपाय है’ तो तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिये थीं॥ ८॥

सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता।

उद्यताञ्जलिना राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मन:॥ ९॥

‘जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्रीको उचित है कि वह राजासे उसके पूछनेपर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रताके साथ॥ ९॥

वाक्यमप्रतिकूलं तु मृदुपूर्वं शुभं हितम्।

उपचारेण वक्तव्यो युक्तं च वसुधाधिप:॥ १०॥

‘राजाके सामने ऐसी बात कहनी चाहिये, जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदरसे युक्त और उचित हो॥ १०॥

सावमर्दं तु यद्वाक्यमथवा हितमुच्यते।

नाभिनन्देत तद् राजा मानार्थी मानवर्जितम्॥ ११॥

‘राजा सम्मानका भूखा होता है। उसकी बातका खण्डन करके आक्षेपपूर्ण भाषामें यदि हितकर वचन भी कहा जाय तो उस अपमानपूर्ण वचनका वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता॥ ११॥

पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौजस:।

अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च॥ १२॥

औष्ण्यं तथा विक्रमं च सौम्यं दण्डं प्रसन्नताम्।

धारयन्ति महात्मानो राजान: क्षणदाचर॥ १३॥

‘निशाचर! अमित तेजस्वी महामनस्वी राजा अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण—इन पाँच देवताओंके स्वरूप धारण किये रहते हैं, इसीलिये वे अपनेमें इन पाँचोंके गुण-प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दण्ड और प्रसन्नता भी धारण करते हैं॥ १२-१३॥

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु मान्या: पूज्याश्च नित्यदा।

त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं मोहमाश्रित:॥ १४॥

अभ्यागतं तु दौरात्म्यात् परुषं वदसीदृशम्।

गुणदोषौ न पृच्छामि क्षेमं चात्मनि राक्षस॥ १५॥

‘अत: सभी अवस्थाओंमें सदा राजाओंका सम्मान और पूजन ही करना चाहिये। तुम तो अपने धर्मको न जानकर केवल मोहके वशीभूत हो रहे हो। मैं तुम्हारा अभ्यागत-अतिथि हूँ तो भी तुम दुष्टतावश मुझसे ऐसी कठोर बातें कह रहे हो। राक्षस! मैं तुमसे अपने कर्तव्यके गुण-दोष नहीं पूछता हूँ और न यही जानना चाहता हूँ कि मेरे लिये क्या उचित है॥ १४-१५॥

मयोक्तमपि चैतावत् त्वां प्रत्यमितविक्रम।

अस्म‌िंस्तु स भवान् कृत्ये साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १६॥

‘अमितपराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे इतना ही कहा था कि इस कार्यमें तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिये॥ १६॥

शृणु तत्कर्म साहाय्ये यत्कार्यं वचनान्मम।

सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभि:॥ १७॥

आश्रमे तस्य रामस्य सीताया: प्रमुखे चर।

प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि॥ १८॥

‘अच्छा, अब तुम्हें सहायताके लिये मेरे कथनानुसार जो कार्य करना है, उसे सुनो। तुम सुवर्णमय चर्मसे युक्त चितकबरे रंगके मृग हो जाओ। तुम्हारे सारे अङ्गमें चाँदीकी-सी सफेद बूँदें रहनी चाहिये। ऐसा रूप धारण करके तुम रामके आश्रममें सीताके सामने विचरो। एक बार विदेहकुमारीको लुभाकर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो उधर ही चले जाओ॥ १७-१८॥

त्वां हि मायामयं दृष्ट्वा काञ्चनं जातविस्मया।

आनयैनमिति क्षिप्रं रामं वक्ष्यति मैथिली॥ १९॥

‘तुम मायामय काञ्चन मृगको देखकर मिथिलेशकुमारी सीताको बड़ा आश्चर्य होगा और वह शीघ्र ही रामसे कहेगी कि आप इसे पकड़ लाइये॥ १९॥

अपक्रान्ते च काकुत्स्थे दूरं गत्वाप्युदाहर।

हा सीते लक्ष्मणेत्येवं रामवाक्यानुरूपकम्॥ २०॥

‘जब राम तुम्हें पकड़नेके लिये आश्रमसे दूर चले जायँ तो तुम भी दूरतक जाकर श्रीरामकी बोलीके अनुरूप ही—ठीक उन्हींके स्वरमें ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारना॥ २०॥

तच्छ्रुत्वा रामपदवीं सीतया च प्रचोदित:।

अनुगच्छति सम्भ्रान्त: सौमित्रिरपि सौहृदात्॥ २१॥

‘तुम्हारी उस पुकारको सुनकर सीताकी प्रेरणासे सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी स्नेहवश घबराये हुए अपने भाईके ही मार्गका अनुसरण करेंगे॥ २१॥

अपक्रान्ते च काकुत्स्थे लक्ष्मणे च यथासुखम्।

आहरिष्यामि वैदेहीं सहस्राक्ष: शचीमिव॥ २२॥

‘इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनोंके आश्रमसे दूर निकल जानेपर मैं सुखपूर्वक सीताको हर लाऊँगा, ठीक उसी तरह जैसे इन्द्र शचीको हर लाये थे॥ २२॥

एवं कृत्वा त्विदं कार्यं यथेष्टं गच्छ राक्षस।

राज्यस्यार्धं प्रदास्यामि मारीच तव सुव्रत॥ २३॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राक्षस मारीच! इस प्रकार इस कार्यको सम्पन्न करके जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाना। मैं इसके लिये तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा॥ २३॥

गच्छ सौम्य शिवं मार्गं कार्यस्यास्य विवृद्धये।

अहं त्वानुगमिष्यामि सरथो दण्डकावनम्॥ २४॥

‘सौम्य! अब इस कार्यकी सिद्धिके लिये प्रस्थान करो। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। मैं रथपर बैठकर दण्डकवनतक तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा॥ २४॥

प्राप्य सीतामयुद्धेन वञ्चयित्वा तु राघवम्।

लङ्कां प्रति गमिष्यामि कृतकार्य: सह त्वया॥ २५॥

‘रामको धोखा देकर बिना युद्ध किये ही सीताको अपने हाथमें करके कृतार्थ हो तुम्हारे साथ ही लंकाको लौट चलूँगा॥ २५॥

नो चेत् करोषि मारीच हन्मि त्वामहमद्य वै।

एतत् कार्यमवश्यं मे बलादपि करिष्यसि।

राज्ञो विप्रतिकूलस्थो न जातु सुखमेधते॥ २६॥

‘मारीच! यदि तुम इनकार करोगे तो तुम्हें अभी मार डालूँगा। मेरा यह कार्य तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा। मैं बलप्रयोग करके भी तुमसे यह काम कराऊँगा। राजाके प्रतिकूल चलनेवाला पुरुष कभी सुखी नहीं होता है॥ २६॥

आसाद्य तं जीवितसंशयस्ते

मृत्युर्ध्रुवो ह्यद्य मया विरुध्यत:।

एतद् यथावत् परिगण्य बुद्ध्या

यदत्र पथ्यं कुरु तत्तथा त्वम्॥ २७॥

‘रामके सामने जानेपर तुम्हारे प्राण जानेका संदेहमात्र है, परंतु मेरे साथ विरोध करनेपर तो आज ही तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इन बातोंपर बुद्धि लगाकर भलीभाँति विचार कर लो। उसके बाद यहाँ जो हितकर जान पड़े, उसे उसी प्रकार तुम करो’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥

 

एकचत्वारिंश: सर्ग:

मारीचका रावणको विनाशका भय दिखाकर पुन: समझाना

आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं च राजवत्।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं नि:शङ्को राक्षसाधिपम्॥ १॥

रावणने जब राजाकी भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीचने नि:शङ्क होकर उस राक्षसराजसे कठोर वाणीमें कहा—॥ १॥

केनायमुपदिष्टस्ते विनाश: पापकर्मणा।

सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर॥ २॥

‘निशाचर! किस पापीने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियोंसहित तुम्हारे विनाशका यह मार्ग बताया है?॥

कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत्।

केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायत:॥ ३॥

‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है? किसने युक्तिसे तुम्हें मौतके द्वारपर जानेकी यह सलाह दी है?॥ ३॥

शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्या निशाचर।

इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा॥ ४॥

‘निशाचर! आज यह बात स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान्से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं॥ ४॥

केनेदमुपदिष्टं ते क्षुद्रेणाहितबुद्धिना।

यस्त्वामिच्छति नश्यन्तं स्वकृतेन निशाचर॥ ५॥

‘राक्षसराज! तुम्हारे अहितका विचार रखनेवाले किस नीचने तुम्हें यह पाप करनेका उपदेश दिया है? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्मसे नष्ट होते देखना चाहता है॥ ५॥

वध्या: खलु न वध्यन्ते सचिवास्तव रावण।

ये त्वामुत्पथमारूढं न निगृह्णन्ति सर्वश:॥ ६॥

‘रावण! निश्चय ही वधके योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्गपर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजाको सब प्रकारसे रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो॥

अमात्यै: कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रित:।

निग्राह्य: सर्वथा सद्भि: स निग्राह्यो न गृह्यसे॥ ७॥

‘अच्छे मन्त्रियोंको चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्गपर चलने लगे, उसे सब प्रकारसे वे रोकें। तुम भी रोकनेके ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं॥ ७॥

धर्ममर्थं च कामं च यशश्च जयतां वर।

स्वामिप्रसादात् सचिवा: प्राप्नुवन्ति निशाचर॥ ८॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजाकी कृपासे ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं॥ ८॥

विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण।

व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जना:॥ ९॥

‘रावण! यदि स्वामीकी कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजाके दोषसे दूसरे लोगोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है॥ ९॥

राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर।

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपा:॥ १०॥

‘विजयशीलोंमें श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यशकी प्राप्तिका मूल कारण राजा ही है; अत: सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षा करनी चाहिये॥ १०॥

राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर।

न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस॥ ११॥

‘रात्रिमें विचरनेवाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनताके अत्यन्त प्रतिकूल चलनेवाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजासे राज्यकी रक्षा नहीं हो सकती॥ ११॥

ये तीक्ष्णमन्त्रा: सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै।

विषमेषु रथा: शीघ्रं मन्दसारथयो यथा॥ १२॥

‘जो मन्त्री तीखे उपायका उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह माननेवाले उस राजाके साथ ही दु:ख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमिमें जानेपर सारथियोंके साथ ही संकटमें पड़ जाते हैं॥ १२॥

बहव: साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिता:।

परेषामपराधेन विनष्टा: सपरिच्छदा:॥ १३॥

‘उपयुक्त धर्मका अनुष्ठान करनेवाले बहुत-से साधु-पुरुष इस जगत्में दूसरोंके अपराधसे परिवारसहित नष्ट हो गये हैं॥ १३॥

स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण।

रक्ष्यमाणा न वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा॥ १४॥

‘रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाववाले राजासे रक्षित होनेवाली प्रजा उसी तरह वृद्धिको नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेडि़येसे पालित होनेवाली भेड़ें॥ १४॥

अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसा:।

येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रिय:॥ १५॥

‘रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे॥ १५॥

तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया।

अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि॥ १६॥

‘काकतालीय न्यायके अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दु:ख प्राप्त हो गया। इस विषयमें मुझे तुम ही शोकके योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा॥ १६॥

मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति।

अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हत:॥ १७॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे। जब दोनों ही तरहसे मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीरामके हाथसे होनेवाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रुके द्वारा युद्धमें मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा (तुम-जैसे राजाके हाथसे बलपूर्वक प्राणदण्ड पानेका कष्ट नहीं भोगूँगा)॥ १७॥

दर्शनादेव रामस्य हतं मामवधारय।

आत्मानं च हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम्॥ १८॥

‘राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीरामके सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीताका हरण किया तो तुम अपनेको भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो॥ १८॥

आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया।

नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का न राक्षसा:॥ १९॥

‘यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीरामके आश्रमसे सीताका अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही। न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँके निवासी राक्षस ही॥ १९॥

निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा

न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर।

परेतकल्पा हि गतायुषो नरा

हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥ २०॥

‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्मसे रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है। सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं’॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥

 


द्विचत्वारिंश: सर्ग:

मारीचका सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीरामके आश्रमपर जाना और सीताका उसे देखना

एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं तत:।

गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद् रात्रिंचरप्रभो:॥ १॥

रावणसे इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचर-राजके भयसे दु:खी हुए मारीचने कहा—‘चलो चलें॥ १॥

दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा।

मद्वधोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं च मे॥ २॥

‘मेरे वधके लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवनका अन्त निश्चित है॥ २॥

नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते।

वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते॥ ३॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्डसे मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़नेकी बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्डके ही समान हैं॥ ३॥

किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि।

एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर॥ ४॥

‘परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ। लो, यह मैं चलता हूँ। तात निशाचर! तुम्हारा कल्याण हो’॥ ४॥

प्रहृष्टस्त्वभवत् तेन वचनेन स राक्षस:।

परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत्॥ ५॥

मारीचके उस वचनसे राक्षस रावणको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उसे कसकर हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ ५॥

एतच्छौटीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिन:।

इदानीमसि मारीच: पूर्वमन्यो हि राक्षस:॥ ६॥

‘यह तुमने वीरताकी बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छाके वशवर्ती हो गये हो। इस समय तुम वास्तवमें मारीच हो। पहले तुममें किसी दूसरे राक्षसका आवेश हो गया था॥ ६॥

आरुह्यतामयं शीघ्रं खगो रत्नविभूषित:।

मया सह रथो युक्त: पिशाचवदनै: खरै:॥ ७॥

‘यह रत्नोंसे विभूषित मेरा आकाशगामी रथ तैयार है, इसमें पिशाचोंके-से मुखवाले गधे जुते हुए हैं, इसपर मेरे साथ जल्दीसे बैठ जाओ॥ ७॥

प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि।

तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम्॥ ८॥

‘(तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है) विदेहकुमारी सीताके मनमें अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो। उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। आश्रम सूना हो जानेपर मैं मिथिलेशकुमारी सीताको जबरदस्ती उठा लाऊँगा’॥ ८॥

ततस्तथेत्युवाचैनं रावणं ताटकासुत:।

ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम्॥ ९॥

आरुह्याययतु: शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात्।

तब ताटकाकुमार मारीचने रावणसे कहा—‘तथास्तु’ ऐसा ही हो। तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस विमानाकार रथपर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डलसे चल दिये॥ ९/

तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च॥ १०॥

गिरींश्च सरित: सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च।

समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं तत:॥ ११॥

ददर्श सहमारीचो रावणो राक्षसाधिप:।

मार्गमें पहलेकी ही भाँति अनेकानेक पत्तनों, वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरोंको देखते हुए दोनोंने दण्डकारण्यमें प्रवेश किया और वहाँ मारीचसहित राक्षसराज रावणने श्रीरामचन्द्रजीका आश्रम देखा॥ १०-११/

अवतीर्य रथात् तस्मात् तत: काञ्चनभूषणात्॥ १२॥

हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत्।

तब उस सुवर्णभूषित रथसे उतरकर रावणने मारीचका हाथ अपने हाथमें ले उससे कहा—॥ १२/

एतद् रामाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम्॥ १३॥

क्रियतां तत् सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागता:।

‘सखे! यह केलोंसे घिरा हुआ रामका आश्रम दिखायी दे रहा है। अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हमलोग यहाँ आये हैं’॥ १३/

स रावणवच: श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा॥ १४॥

मृगो भूत्वाऽऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह।

रावणकी बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृगका रूप धारण करके श्रीरामके आश्रमके द्वारपर विचरने लगा॥

स तु रूपं समास्थाय महदद्भुतदर्शनम्॥ १५॥

मणिप्रवरशृङ्गाग्र: सितासितमुखाकृति:।

रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवा:॥ १६॥

किंचिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलनिभोदर:।

मधूकनिभपार्श्वश्च कञ्जकिञ्जल्कसंनिभ:॥ १७॥

उस समय उसने देखनेमें बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था। उसके सींगोंके ऊपरी भाग इन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणिके बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डलपर सफेद और काले रंगकी बूँदें थीं, मुखका रंग लाल कमलके समान था। उसके कान नीलकमलके तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदरका भाग इन्द्रनीलमणिकी कान्ति धारण कर रहा था। पार्श्वभाग महुएके फूलके समान श्वेतवर्णके थे, शरीरका सुनहरा रंग कमलके केसरकी भाँति सुशोभित होता था॥ १५—१७॥

वैदूर्यसंकाशखुरस्तनुजङ्घ: सुसंहत:।

इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजित:॥ १८॥

उसके खुर वैदूर्यमणिके समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपरसे इन्द्रधनुषके रंगकी थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था॥ १८॥

मनोहरस्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृत:।

क्षणेन राक्षसो जातो मृग: परमशोभन:॥ १९॥

उसकी देहकी कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी। वह नाना प्रकारकी रत्नमयी बुँदकियोंसे विभूषित दिखायी देता था। राक्षस मारीच क्षणभरमें ही परम शोभाशाली मृग बन गया॥ १९॥

वनं प्रज्वलयन् रम्यं रामाश्रमपदं च तत्।

मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षस:॥ २०॥

प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम्।

विचरन् गच्छते सम्यक् शाद्वलानि समन्तत:॥ २१॥

सीताको लुभानेके लिये विविध धातुओंसे चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीरामके उस आश्रमको प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासोंको चरने और विचरने लगा॥ २०-२१॥

रौप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रं भूत्वा च प्रियदर्शन:।

विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह॥ २२॥

सैकड़ों रजतमय विन्दुओंसे युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था। वह वृक्षोंके कोमल पल्लवोंको खाता हुआ इधर-उधर विचरने लगा॥ २२॥

कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्तत:।

समाश्रयन् मन्दगतिं सीतासंदर्शनं तत:॥ २३॥

केलेके बगीचेमें जाकर वह कनेरोंके कुञ्जमें जा पहुँचा। फिर जहाँ सीताकी दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थानमें जाकर मन्दगतिका आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा॥ २३॥

राजीवचित्रपृष्ठ: स विरराज महामृग:।

रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम्॥ २४॥

उसका पृष्ठभाग कमलके केसरकी भाँति सुनहरे रंगका होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृगकी बड़ी शोभा हो रही थी। श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके निकट ही वह अपनी मौजसे घूम रहा था॥ २४॥

पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तम:।

गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुन: प्रतिनिवर्तते॥ २५॥

वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था। दो घड़ीके लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावलीके साथ लौट आता था॥ २५॥

विक्रीडंश्च क्वचिद् भूमौ पुनरेव निषीदति।

आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति॥ २६॥

वह कहीं खेलता, कूदता और पुन: भूमिपर ही बैठ जाता था, फिर आश्रमके द्वारपर आकर मृगोंके झुंडके पीछे-पीछे चल देता॥ २६॥

मृगयूथैरनुगत: पुनरेव निवर्तते।

सीतादर्शनमाकांक्षन् राक्षसो मृगतां गत:॥ २७॥

तत्पश्चात् झुंड-के-झुंड मृगोंको साथ लिये फिर लौट आता था। उस मृगरूपधारी राक्षसके मनमें केवल यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीताकी दृष्टि मुझपर पड़ जाय॥ २७॥

परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन्।

समुद्वीक्ष्य च सर्वे तं मृगा येऽन्ये वनेचरा:॥ २८॥

उपगम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश।

सीताके समीप आते समय वह विचित्र मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था। उस वनमें विचरनेवाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूँघकर दसों दिशाओंमें भाग जाते थे॥

राक्षस: सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रत:॥ २९॥

प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन्।

राक्षस मारीच यद्यपि मृगोंके वधमें ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भावको छिपानेके लिये उन वन्य मृगोंका स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था॥ २९/

तस्मिन्नेव तत: काले वैदेही शुभलोचना॥ ३०॥

कुसुमापचये व्यग्रा पादपानत्यवर्तत।

कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा॥ ३१॥

उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुननेमें लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आमके वृक्षोंको लाँघती हुई उधर आ निकलीं॥

कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना।

अनर्हा वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम्॥ ३२॥

मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना।

फूलोंको चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं। उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था। वे वनवासका कष्ट भोगनेके योग्य नहीं थीं। परम सुन्दरी सीताने उस रत्नमय मृगको देखा, जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग मुक्तामणियोंसे चित्रित-सा जान पड़ता था॥ ३२/

तं वै रुचिरदन्तोष्ठं रूप्यधातुतनूरुहम्॥ ३३॥

विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत।

उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीरके रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओंके बने हुए जान पड़ते थे। उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजीकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं और वे बड़े स्नेहसे उसकी ओर निहारने लगीं॥ ३३/

स च तां रामदयितां पश्यन् मायामयो मृग:॥ ३४॥

विचचार ततस्तत्र दीपयन्निव तद् वनम्।

वह मायामय मृग भी श्रीरामकी प्राणवल्लभा सीताको देखता और उस वनको प्रकाशित-सा करता हुआ वहीं विचरने लगा॥ ३४/

अदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तं नानारत्नमयं मृगम्।

विस्मयं परमं सीता जगाम जनकात्मजा॥ ३५॥

सीताने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। वह नाना प्रकारके रत्नोंका ही बना जान पड़ता था। उसे देखकर जनककिशोरी सीताको बड़ा विस्मय हुआ॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥

 

त्रिचत्वारिंश: सर्ग:

कपटमृगको देखकर लक्ष्मणका संदेह, सीताका उस मृगको जीवित या मृत अवस्थामें भी ले आनेके लिये श्रीरामको प्रेरित करना तथा श्रीरामका लक्ष्मणको समझा-बुझाकर सीताकी रक्षाका भार सौंपकर उस मृगको मारनेके लिये जाना

सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती।

हेमराजतवर्णाभ्यां पार्श्वाभ्यामुपशोभितम्॥ १॥

प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी।

भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम्॥ २॥

वह मृग सोने और चाँदीके समान कान्तिवाले पार्श्व-भागोंसे सुशोभित था। शुद्ध सुवर्णके समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गोंवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते-चुनते ही उस मृगको देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मणको हथियार लेकर आनेके लिये पुकारने लगीं॥ १-२॥

आहूयाहूय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते।

आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज॥ ३॥

वे बार-बार उन्हें पुकारतीं और फिर उस मृगको अच्छी तरह देखने लगती थीं। वे बोलीं, ‘आर्यपुत्र! अपने भाईके साथ आइये, शीघ्र आइये’॥ ३॥

तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।

वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा ददृशतुर्मृगम्॥ ४॥

विदेहकुमारी सीताके द्वारा पुकारे जानेपर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थानपर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृगको देखा॥ ४॥

शङ्कमानस्तु तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्॥ ५॥

उसे देखकर लक्ष्मणके मनमें संदेह हुआ और वे बोले—‘भैया! मैं तो समझता हूँ कि इस मृगके रूपमें वह मारीच नामका राक्षस ही आया है॥ ५॥

चरन्तो मृगयां हृष्टा: पापेनोपाधिना वने।

अनेन निहता राम राजान: कामरूपिणा॥ ६॥

‘श्रीराम! स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले इस पापीने कपट-वेष बनाकर वनमें शिकार खेलनेके लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशोंका वध किया है॥

अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम्।

भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम्॥ ७॥

‘पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकारकी मायाएँ जानता है। इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूपमें परिणत हो गयी है। यह गन्धर्व-नगरके समान देखनेभरके लिये ही है (इसमें वास्तविकता नहीं है)॥

मृगो ह्येवंविधो रत्नविचित्रो नास्ति राघव।

जगत्यां जगतीनाथ मायैषा हि न संशय:॥ ८॥

‘रघुनन्दन! पृथ्वीनाथ! इस भूतलपर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अत: नि:संदेह यह माया ही है’॥ ८॥

एवं ब्रुवाणं काकुत्स्थं प्रतिवार्य शुचिस्मिता।

उवाच सीता संहृष्टा छद्मना हृतचेतना॥ ९॥

मारीचके छलसे जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकानवाली सीताने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मणको रोककर स्वयं ही बड़े हर्षके साथ कहा—

आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मन:।

आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थं नो भविष्यति॥ १०॥

‘आर्यपुत्र! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है। इसने मेरे मनको हर लिया है। महाबाहो! इसे ले आइये। यह हमलोगोंके मन-बहलावके लिये रहेगा॥ १०॥

इहाश्रमपदेऽस्माकं बहव: पुण्यदर्शना:।

मृगाश्चरन्ति सहिताश्चमरा: सृमरास्तथा॥ ११॥

ऋक्षा: पृषतसङ्घाश्च वानरा: किन्नरास्तथा।

विहरन्ति महाबाहो रूपश्रेष्ठा महाबला:॥ १२॥

न चान्य: सदृशो राजन् दृष्ट: पूर्वं मृगो मया।

तेजसा क्षमया दीप्त्या यथायं मृगसत्तम:॥ १३॥

‘राजन्! महाबाहो! यद्यपि हमारे इस आश्रमपर बहुत-से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर (काली पूँछवाली चवँरी गाय), चमर (सफेद पूँछवाली चवँरी गाय), रीछ, चितकबरे मृगोंके झुंड, वानर तथा सुन्दर रूपवाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आजके पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीप्तिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है॥ ११—१३॥

नानावर्णविचित्राङ्गो रत्नभूतो ममाग्रत:।

द्योतयन् वनमव्यग्रं शोभते शशिसंनिभ:॥ १४॥

‘नाना प्रकारके रंगोंसे युक्त होनेके कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गोंका ही बना हुआ हो। मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभावसे स्थित होकर इस वनको प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा है॥ १४॥

अहो रूपमहो लक्ष्मी: स्वरसम्पच्च शोभना।

मृगोऽद्भुतो विचित्राङ्गो हृदयं हरतीव मे॥ १५॥

‘इसका रूप अद्भुत है। इसकी शोभा अवर्णनीय है। इसकी स्वरसम्पत्ति (बोली) बड़ी सुन्दर है। विचित्र अङ्गोंसे सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मनको मोहे लेता है॥ १५॥

यदि ग्रहणमभ्येति जीवन्नेव मृगस्तव।

आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति॥ १६॥

‘यदि यह मृग जीते-जी ही आपकी पकड़में आ जाय तो एक आश्चर्यकी वस्तु होगा और सबके हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर देगा॥ १६॥

समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च न: पुन:।

अन्त:पुरे विभूषार्थो मृग एष भविष्यति॥ १७॥

‘जब हमारे वनवासकी अवधि पूरी हो जायगी और हम पुन: अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्त:पुरकी शोभा बढ़ायेगा॥ १७॥

भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां मम च प्रभो।

मृगरूपमिदं दिव्यं विस्मयं जनयिष्यति॥ १८॥

‘प्रभो! इस मृगका यह दिव्य रूप भरतके, आपके, मेरी सासुओंके और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा॥

जीवन्न यदि तेऽभ्येति ग्रहणं मृगसत्तम:।

अजिनं नरशार्दूल रुचिरं तु भविष्यति॥ १९॥

‘पुरुषसिंह! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते-जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत सुन्दर होगा॥ १९॥

निहतस्यास्य सत्त्वस्य जाम्बूनदमयत्वचि।

शष्पबृस्यां विनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम्॥ २०॥

‘घास-फूसकी बनी हुई चटाईपर इस मरे हुए मृगका सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इसपर आपके साथ बैठना चाहती हूँ॥ २०॥

कामवृत्तमिदं रौद्रं स्त्रीणामसदृशं मतम्।

वपुषा त्वस्य सत्त्वस्य विस्मयो जनितो मम॥ २१॥

‘यद्यपि स्वेच्छासे प्रेरित होकर अपने पतिको ऐसे काममें लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियोंके लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तुके शरीरने मेरे हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर दिया है (इसीलिये मैं इसको पकड़ लानेके लिये अनुरोध करती हूँ)’॥ २१॥

तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा।

तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा॥ २२॥

बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम्।

इति सीतावच: श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम्॥ २३॥

लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदित:।

उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वच:॥ २४॥

सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणिके समान सींग, उदयकालके सूर्यकी-सी कान्ति तथा नक्षत्रलोककी भाँति विन्दुयुक्त तेजसे सुशोभित उस मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मन भी विस्मित हो उठा। सीताकी पूर्वोक्त बातको सुनकर, उस मृगके अद्भुत रूपको देखकर, उसके उस रूपपर लुभाकर और सीतासे प्रेरित होकर हर्षसे भरे हुए श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मणसे कहा—॥ २२—२४॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या: स्पृहामुल्लसितामिमाम्।

रूपश्रेष्ठतया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति॥ २५॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, विदेहनन्दिनी सीताके मनमें इस मृगको पानेके लिये कितनी प्रबल इच्छा जाग उठी है? वास्तवमें इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर। अपने रूपकी इस श्रेष्ठताके कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा॥ २५॥

न वने नन्दनोद्देशे न चैत्ररथसंश्रये।

कुत: पृथिव्यां सौमित्रे योऽस्य कश्चित् समो मृग:॥ २६॥

‘सुमित्रानन्दन! देवराज इन्द्रके नन्दनवनमें और कुबेरके चैत्ररथवनमें भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके। फिर पृथ्वीपर तो हो ही कहाँसे सकता है॥ २६॥

प्रतिलोमानुलोमाश्च रुचिरा रोमराजय:।

शोभन्ते मृगमाश्रित्य चित्रा: कनकबिन्दुभि:॥ २७॥

‘टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृगके शरीरका आश्रय ले सुनहरे विन्दुओंसे चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं॥ २७॥

पश्यास्य जृम्भमाणस्य दीप्तामग्निशिखोपमाम्।

जिह्वां मुखान्नि:सरन्तीं मेघादिव शतहृदाम्॥ २८॥

‘देखो न, जब यह जँभाई लेता है, तब इसके मुखसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान दमकती हुई जिह्वा बाहर निकल आती है और मेघसे प्रकट हुई बिजलीके समान चमकने लगती है॥ २८॥

मसारगल्वर्कमुख: शङ्खमुक्तानिभोदर:।

कस्य नामानिरूप्योऽसौ न मनो लोभयेन्मृग:॥ २९॥

‘इसका मुख-सम्पुट इन्द्रनीलमणिके बने हुए चषक (पानपात्र) के समान जान पड़ता है, उदर शङ्ख और मोतीके समान सफेद है। यह अवर्णनीय मृग किसके मनको नहीं लुभा लेगा॥ २९॥

कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम्।

नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत्॥ ३०॥

‘नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूपको देखकर किसके मनमें विस्मय नहीं होगा॥

मांसहेतोरपि मृगान् विहारार्थं च धन्विन:।

घ्नन्ति लक्ष्मण राजानो मृगयायां महावने॥ ३१॥

‘लक्ष्मण! राजालोग बड़े-बड़े वनोंमें मृगया खेलते समय मांस (मृगचर्म) के लिये और शिकार खेलनेका शौक पूरा करनेके लिये भी धनुष हाथमें लेकर मृगोंको मारते हैं॥ ३१॥

धनानि व्यवसायेन विचीयन्ते महावने।

धातवो विविधाश्चापि मणिरत्नसुवर्णिन:॥ ३२॥

‘मृगयाके उद्योगसे ही राजालोग विशाल वनमें धनका भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्न और सुवर्ण आदिसे युक्त नाना प्रकारकी धातुएँ उपलब्ध होती हैं॥ ३२॥

तत् सारमखिलं नृणां धनं निचयवर्धनम्।

मनसा चिन्तितं सर्वं यथा शुक्रस्य लक्ष्मण॥ ३३॥

‘लक्ष्मण! कोशकी वृद्धि करनेवाला वह वन्य धन मनुष्योंके लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है। ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये मनके चिन्तनमात्रसे प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं॥ ३३॥

अर्थी येनार्थकृत्येन संव्रजत्यविचारयन्।

तमर्थमर्थशास्त्रज्ञा: प्राहुरर्थ्या: सुलक्ष्मण॥ ३४॥

‘लक्ष्मण! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ (प्रयोजन) का सम्पादन करनेके लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजनको ही अर्थसाधनमें चतुर एवं अर्थशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् ‘अर्थ’ कहते हैं॥ ३४॥

एतस्य मृगरत्नस्य परार्घ्ये काञ्चनत्वचि।

उपवेक्ष्यति वैदेही मया सह सुमध्यमा॥ ३५॥

‘इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृगके बहुमूल्य सुनहरे चमड़ेपर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी॥ ३५॥

न कादली न प्रियकी न प्रवेणी न चाविकी।

भवेदेतस्य सदृशी स्पर्शेऽनेनेति मे मति:॥ ३६॥

‘कदली (कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोमवाले मृगविशेष), प्रियक (कोमल ऊँचे चिकने और घने रोमवाले मृगविशेष), प्रवेण (विशेष प्रकारके बकरे) और अवि (भेड़) की त्वचा भी स्पर्श करनेमें इस काञ्चन मृगके छालेके समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है॥ ३६॥

एष चैव मृग: श्रीमान् यश्च दिव्यो नभश्चर:।

उभावेतौ मृगौ दिव्यौ तारामृगमहीमृगौ॥ ३७॥

‘यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी मृग (मृगशिरा नक्षत्र) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं। इनमेंसे एक तारामृग107 और दूसरा महीमृग108 है॥ ३७॥

यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण।

मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया॥ ३८॥

‘लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षसकी माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये॥ ३८॥

एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना।

वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवा:॥ ३९॥

‘क्योंकि अपवित्र (दुष्ट) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीचने वनमें विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियोंकी हत्या की है॥ ३९॥

उत्थाय बहवोऽनेन मृगयायां जनाधिपा:।

निहता: परमेष्वासास्तस्माद् वध्यस्त्वयं मृग:॥ ४०॥

‘इसने मृगयाके समय प्रकट होकर बहुत-से महाधनुर्धर नरेशोंका वध किया है, अत: इस मृगके रूपमें इसका भी वध अवश्य करनेयोग्य है॥ ४०॥

पुरस्तादिह वातापि: परिभूय तपस्विन:।

उदरस्थो द्विजान् हन्ति स्वगर्भोऽश्वतरीमिव॥ ४१॥

‘इसी वनमें पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओंका तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपायसे उनके पेटमें पहुँच जाता और जैसे खच्चरीको अपने ही गर्भका बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियोंको नष्ट कर देता था॥ ४१॥

स कदाचिच्चिराल्लोभादाससाद महामुनिम्।

अगस्त्यं तेजसा युक्तं भक्ष्यस्तस्य बभूव ह॥ ४२॥

‘वह वातापि एक दिन दीर्घकालके पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजीके पास जा पहुँचा और (श्राद्धकालमें) उनका आहार बन गया। उनके पेटमें पहुँच गया॥ ४२॥

समुत्थाने च तद्रूपं कर्तुकामं समीक्ष्य तम्।

उत्स्मयित्वा तु भगवान् वातापिमिदमब्रवीत्॥ ४३॥

‘श्राद्धके अन्तमें जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करनेकी इच्छा करने लगा—उनका पेट फाड़कर निकल आनेको उद्यत हुआ, तब उस वातापिको लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले—॥ ४३॥

त्वयाविगण्य वातापे परिभूताश्च तेजसा।

जीवलोके द्विजश्रेष्ठास्तस्मादसि जरां गत:॥ ४४॥

‘वातापे! तुमने बिना सोचे-विचारे इस जीव-जगत्में बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अपने तेजसे तिरस्कृत किया है, उसी पापसे अब तुम पच गये’॥ ४४॥

तद् रक्षो न भवेदेव वातापिरिव लक्ष्मण।

मद्विधं योऽतिमन्येत धर्मनित्यं जितेन्द्रियम्॥ ४५॥

‘लक्ष्मण! जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले मुझ-जैसे जितेन्द्रिय पुरुषका भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षसको भी वातापिके समान ही नष्ट हो जाना चाहिये॥ ४५॥

भवेद्धतोऽयं वातापिरगस्त्येनेव मा गत:।

इह त्वं भव संनद्धो यन्त्रितो रक्ष मैथिलीम्॥ ४६॥

‘जैसे वातापि अगस्त्यके द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही मारा जायगा। तुम अस्त्र और कवच आदिसे सुसज्जित हो जाओ और यहाँ सावधानीके साथ मिथिलेशकुमारीकी रक्षा करो॥ ४६॥

अस्यामायत्तमस्माकं यत् कृत्यं रघुनन्दन।

अहमेनं वधिष्यामि ग्रहीष्याम्यथवा मृगम्॥ ४७॥

‘रघुनन्दन! हमलोगोंका जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीताकी रक्षाके ही अधीन है। मैं इस मृगको मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा॥ ४७॥

यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम्।

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम्॥ ४८॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण! देखो, इस मृगका चर्म हस्तगत करनेके लिये विदेहनन्दिनीको कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृगको ले आनेके लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ॥ ४८॥

त्वचा प्रधानया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति।

अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन सीतया॥ ४९॥

यावत् पृषतमेकेन सायकेन निहन्म्यहम्।

हत्वैतच्चर्म चादाय शीघ्रमेष्यामि लक्ष्मण॥ ५०॥

‘इस मृगको मारनेका प्रधान हेतु है, इसके चमड़ेको प्राप्त करना। आज इसीके कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा। लक्ष्मण! तुम आश्रमपर रहकर सीताके साथ सावधान रहना—सावधानीके साथ तबतक इसकी रक्षा करना, जबतक कि मैं एक ही बाणसे इस चितकबरे मृगको मार नहीं डालता हूँ। मारनेके पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा॥ ४९-५०॥

प्रदक्षिणेनातिबलेन पक्षिणा

जटायुषा बुद्धिमता च लक्ष्मण।

भवाप्रमत्त: प्रतिगृह्य मैथिलीं

प्रतिक्षणं सर्वत एव शङ्कित:॥ ५१॥

‘लक्ष्मण! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना। मिथिलेशकुमारी सीताको अपने संरक्षणमें लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओंमें रहनेवाले राक्षसोंकी ओरसे चौकन्ने रहना’॥ ५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥

 

चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा मारीचका वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मणके पुकारनेका शब्द सुनकर श्रीरामकी चिन्ता

तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दन:।

बबन्धासिं महातेजा जाम्बूनदमयत्सरुम्॥ १॥

लक्ष्मणको इस प्रकार आदेश देकर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सोनेकी मूँठवाली तलवार कमरमें बाँध ली॥ १॥

ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम्।

आबध्य च कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रम:॥ २॥

तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानोंमें झुके हुए अपने आभूषणरूप धनुषको हाथमें ले पीठपर दो तरकस बाँधकर वहाँसे चल दिये॥ २॥

तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै।

बभूवान्तर्हितस्त्रासात् पुन: संदर्शनेऽभवत्॥ ३॥

राजाधिराज श्रीरामको आते देख वह वन्य मृगोंका राजा काञ्चनमृग भयके मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथमें आ गया॥ ३॥

बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृग:।

तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रत:॥ ४॥

अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने।

अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन॥ ५॥

शङ्कितं तु समुद्भ्रान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम्।

दृश्यमानमदृश्यं च वनोद्देशेषु केषुचित्॥ ६॥

छिन्नाभ्रैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम्।

मुहूर्तादेव ददृशे मुहुर्दूरात् प्रकाशते॥ ७॥

तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीरामने देखा, वह अपने रूपसे सामनेकी दिशाको प्रकाशित-सी कर रहा था। उस महान् वनमें वह पीछेकी ओर देख-देखकर आगेकी ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथसे पकड़ लेनेका लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाशमें उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वनके किन्हीं स्थानोंमें छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद्-ऋतुका चन्द्रमण्डल मेघखण्डोंसे आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्तमें वह निकट दिखायी देता और पुन: बहुत दूरके स्थानमें चमक उठता था॥ ४—७॥

दर्शनादर्शनेनैव सोऽपाकर्षत राघवम्।

स दूरमाश्रमस्यास्य मारीचो मृगतां गत:॥ ८॥

इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजीको उनके आश्रमसे बहुत दूर खींच ले गया॥ ८॥

आसीत् क्रुद्धस्तु काकुत्स्थो विवशस्तेन मोहित:।

अथावतस्थे सुश्रान्तश्छायामाश्रित्य शाद्वले॥ ९॥

उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थककर एक जगह छायाका आश्रय ले हरी-हरी घासवाली भूमिपर खड़े हो गये॥ ९॥

स तमुन्मादयामास मृगरूपो निशाचर:।

मृगै: परिवृतोऽथान्यैरदूरात् प्रत्यदृश्यत॥ १०॥

इस मृगरूपधारी निशाचरने उन्हें उन्मत्त-सा कर दिया था। थोड़ी ही देरमें वह दूसरे मृगोंसे घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया॥ १०॥

ग्रहीतुकामं दृष्ट्वा तं पुनरेवाभ्यधावत।

तत्क्षणादेव संत्रासात् पुनरन्तर्हितोऽभवत्॥ ११॥

श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भयके मारे पुन: तत्काल ही अदृश्य हो गया॥ ११॥

पुनरेव ततो दूराद् वृक्षखण्डाद् विनि:सृत:।

दृष्ट्वा रामो महातेजास्तं हन्तुं कृतनिश्चय:॥ १२॥

तदनन्तर वह पुन: दूरवर्ती वृक्ष-समूहसे होकर निकला। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीरामने मार डालनेका निश्चय किया॥ १२॥

भूयस्तु शरमुद्धृत्य कुपितस्तत्र राघव:।

सूर्यरश्मिप्रतीकाशं ज्वलन्तमरिमर्दनम्॥ १३॥

संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवद्बली।

तमेव मृगमुद्दिश्य श्वसन्तमिव पन्नगम्॥ १४॥

मुमोच ज्वलितं दीप्तमस्त्रं ब्रह्मविनिर्मितम्।

तब वहाँ क्रोधमें भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीरामने तरकससे सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु-संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ़ धनुषपर रखा और उस धनुषको जोरसे खींचकर उस मृगको ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्पके समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजीने बनाया था, छोड़ दिया॥ १३-१४/

शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तम:॥ १५॥

मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभ:।

वज्रके समान तेजस्वी उस उत्तम बाणने मृगरूपधारी मारीचके शरीरको चीरकर उसके हृदयको भी विदीर्ण कर दिया॥ १५/

तालमात्रमथोत्प्लुत्य न्यपतत् स भृशातुर:॥ १६॥

व्यनदद् भैरवं नादं धरण्यामल्पजीवित:।

‘उसकी चोटसे अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़के बराबर उछलकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसका जीवन समाप्त हो चला। वह पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा॥ १६/

म्रियमाणस्तु मारीचो जहौ तां कृत्रिमां तनुम्॥ १७॥

स्मृत्वा तद्वचनं रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम्।

इह प्रस्थापयेत् सीता तां शून्ये रावणो हरेत्॥ १८॥

मरते समय मारीचने अपने उस कृत्रिम शरीरको त्याग दिया। फिर रावणके वचनका स्मरण करके उस राक्षसने सोचा, किस उपायसे सीता लक्ष्मणको यहाँ भेज दे और सूने आश्रमसे रावण उसे हर ले जाय॥

स प्राप्तकालमाज्ञाय चकार च तत: स्वनम्।

सदृशं राघवस्येव हा सीते लक्ष्मणेति च॥ १९॥

रावणके बताये हुए उपायको काममें लानेका अवसर आ गया है—यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके ही समान स्वरमें ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारा॥

तेन मर्मणि निर्विद्धं शरेणानुपमेन हि।

मृगरूपं तु तत् त्यक्त्वा राक्षसं रूपमास्थित:॥ २०॥

श्रीरामके अनुपम बाणसे उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अत: उस मृगरूपको त्यागकर उसने राक्षसरूप धारण कर लिया॥ २०॥

चक्रे स सुमहाकायं मारीचो जीवितं त्यजन्।

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसं भीमदर्शनम्॥ २१॥

रामो रुधिरसिक्ताङ्गं चेष्टमानं महीतले।

जगाम मनसा सीतां लक्ष्मणस्य वच: स्मरन्॥ २२॥

प्राणत्याग करते समय मारीचने अपने शरीरको बहुत बड़ा बना लिया था। भयंकर दिखायी देनेवाले उस राक्षसको भूमिपर पड़कर खूनसे लथपथ हो धरतीपर लोटते और छटपटाते देख श्रीरामको लक्ष्मणकी कही हुई बात याद आ गयी और वे मन-ही-मन सीताकी चिन्ता करने लगे॥ २१-२२॥

मारीचस्य तु मायैषा पूर्वोक्तं लक्ष्मणेन तु।

तत् तथा ह्यभवच्चाद्य मारीचोऽयं मया हत:॥ २३॥

वे सोचने लगे, ‘अहो! जैसा लक्ष्मणने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तवमें मारीचकी माया ही थी। लक्ष्मणकी बात ठीक निकली। आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया॥ २३॥

हा सीते लक्ष्मणेत्येवमाक्रुश्य तु महास्वनम्।

ममार राक्षस: सोऽयं श्रुत्वा सीता कथं भवेत्॥ २४॥

लक्ष्मणश्च महाबाहु: कामवस्थां गमिष्यति।

‘परंतु यह राक्षस उच्च स्वरसे ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की पुकार करके मरा है। उसके उस शब्दको सुनकर सीताकी कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु लक्ष्मणकी भी क्या दशा होगी?’॥ २४/

इति संचिन्त्य धर्मात्मा रामो हृष्टतनूरुह:॥ २५॥

तत्र रामं भयं तीव्रमाविवेश विषादजम्।

राक्षसं मृगरूपं तं हत्वा श्रुत्वा च तत्स्वनम्॥ २६॥

ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीरामके रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षसको मारकर और उसके उस शब्दको सुनकर श्रीरामके मनमें विषादजनित तीव्र भय समा गया॥ २५-२६॥

निहत्य पृषतं चान्यं मांसमादाय राघव:।

त्वरमाणो जनस्थानं ससाराभिमुखं तदा॥ २७॥

उस लोकविलक्षण मृगका वध करके तपस्वीके उपभोगमें आनेयोग्य फल-मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थानके निकटवर्ती पञ्चवटीमें स्थित अपने आश्रमकी ओर बड़ी उतावलीके साथ चले॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

 

पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:

सीताके मार्मिक वचनोंसे प्रेरित होकर लक्ष्मणका श्रीरामके पास जाना

आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने।

उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम्॥ १॥

उस समय वनमें जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पतिके स्वरसे मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मणसे बोलीं—‘भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजीकी सुधि लो—उनका समाचार जानो॥ १॥

नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते।

क्रोशत: परमार्तस्य श्रुत: शब्दो मया भृशम्॥ २॥

‘उन्होंने बड़े आर्तस्वरसे हमलोगोंको पुकारा है। मैंने उनका वह शब्द सुना है। वह बहुत उच्च स्वरसे बोला गया था। उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थानपर नहीं रह गये हैं—मैं घबरा उठी हूँ॥ २॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि।

तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम्॥ ३॥

रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम्।

न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम्॥ ४॥

‘तुम्हारे भाई वनमें आर्तनाद कर रहे हैं। वे कोई शरण—रक्षाका सहारा चाहते हैं। तुम उन्हें बचाओ। जल्दी ही अपने भाईके पास दौड़े हुए जाओ। जैसे कोई साँड़ सिंहोंके पंजेमें फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसोंके वशमें पड़ गये हैं, अत: जाओ।’ सीताके ऐसा कहनेपर भी भाईके आदेशका विचार करके लक्ष्मण नहीं गये॥ ३-४॥

तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा।

सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत्॥ ५॥

यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे।

इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते॥ ६॥

उनके इस व्यवहारसे वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं—‘सुमित्राकुमार! तुम मित्ररूपमें अपने भाईके शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकटकी अवस्थामें भी भाईके पास नहीं पहुँच रहे हो। लक्ष्मण! मैं जानती हूँ, तुम मुझपर अधिकार करनेके लिये इस समय श्रीरामका विनाश ही चाहते हो॥ ५-६॥

लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम्।

व्यसनं ते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते॥ ७॥

‘मेरे लिये तुम्हारे मनमें लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजीके पीछे नहीं जा रहे हो। मैं समझती हूँ, श्रीरामका संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है। तुम्हारे मनमें अपने भाईके प्रति स्नेह नहीं है॥ ७॥

तेन तिष्ठसि विस्रब्धं तमपश्यन् महाद्युतिम्।

किं हि संशयमापन्ने तस्मिन्निह मया भवेत्॥ ८॥

कर्तव्यमिह तिष्ठन्त्या यत्प्रधानस्त्वमागत:।

‘यही कारण है कि तुम उन महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीको देखने न जाकर यहाँ निश्चिन्त खड़े हो। हाय! जो मुख्यत: तुम्हारे सेव्य हैं, जिनकी रक्षा और सेवाके लिये तुम यहाँ आये हो, यदि उन्हींके प्राण संकटमें पड़ गये तो यहाँ मेरी रक्षासे क्या होगा?’॥ ८/

एवं ब्रुवाणां वैदेहीं बाष्पशोकसमन्विताम्॥ ९॥

अब्रवील्लक्ष्मणस्त्रस्तां सीतां मृगवधूमिव।

‘विदेहकुमारी सीताजीकी दशा भयभीत हुई हरिणीके समान हो रही थी। उन्होंने शोकमग्न होकर आँसू बहाते हुए जब उपर्युक्त बातें कहीं, तब लक्ष्मण उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९/

पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसै: ॥ १०॥

अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशय:।

‘विदेहनन्दिनि! आप विश्वास करें, नाग, असुर, गन्धर्व, देवता, दानव तथा राक्षस—ये सब मिलकर भी आपके पतिको परास्त नहीं कर सकते, मेरे इस कथनमें संशय नहीं है॥ १०/

देवि देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु॥ ११॥

राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च।

दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने॥ १२॥

यो रामं प्रतियुध्येत समरे वासवोपमम्।

अवध्य: समरे रामो नैवं त्वं वक्तुमर्हसि॥ १३॥

‘देवि! शोभने! देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों तथा घोर दानवोंमें भी ऐसा कोई वीर नहीं है, जो समराङ्गणमें इन्द्रके समान पराक्रमी श्रीरामका सामना कर सके। भगवान् श्रीराम युद्धमें अवध्य हैं, अतएव आपको ऐसी बात ही नहीं कहनी चाहिये॥ ११—१३॥

न त्वामस्मिन् वने हातुमुत्सहे राघवं विना।

अनिवार्यं बलं तस्य बलैर्बलवतामपि॥ १४॥

त्रिभिर्लोकै: समुदितै: सेश्वरै: सामरैरपि।

हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु संतापस्त्यज्यतां तव॥ १५॥

‘श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें इस वनके भीतर मैं आपको अकेली नहीं छोड़ सकता। सैनिक-बलसे सम्पन्न बड़े-बड़े राजा अपनी सारी सेनाओंके द्वारा भी श्रीरामके बलको कुण्ठित नहीं कर सकते। देवताओं तथा इन्द्र आदिके साथ मिले हुए तीनों लोक भी यदि आक्रमण करें तो वे श्रीरामके बलका वेग नहीं रोक सकते; अत: आपका हृदय शान्त हो। आप संताप छोड़ दें॥ १४-१५॥

आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम्।

न स तस्य स्वरो व्यक्तं न कश्चिदपि दैवत:॥ १६॥

गन्धर्वनगरप्रख्या माया तस्य च रक्षस:।

‘आपके पतिदेव उस सुन्दर मृगको मारकर शीघ्र ही लौट आयँगे। वह शब्द जो आपने सुना था, अवश्य ही उनका नहीं था। किसी देवताने कोई शब्द प्रकट किया हो, ऐसी बात भी नहीं है। वह तो उस राक्षसकी गन्धर्वनगरके समान झूठी माया ही थी॥ १६/

न्यासभूतासि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना॥ १७॥

रामेण त्वं वरारोहे न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे।

‘सुन्दरि! विदेहनन्दिनि! महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने मुझपर आपकी रक्षाका भार सौंपा है। इस समय आप मेरे पास उनकी धरोहरके रूपमें हैं। अत: आपको मैं यहाँ अकेली नहीं छोड़ सकता॥ १७/

कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरै:॥ १८॥

खरस्य निधने देवि जनस्थानवधं प्रति।

‘कल्याणमयी देवि! जिस समय खरका वध किया गया, उस समय जनस्थाननिवासी दूसरे बहुत-से राक्षस भी मारे गये थे, इस कारण इन निशाचरोंने हमारे साथ वैर बाँध लिया है॥ १८/

राक्षसा विविधा वाचो व्याहरन्ति महावने॥ १९॥

हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि।

‘विदेहनन्दिनि! प्राणियोंकी हिंसा ही जिनका क्रीड़ा-विहार या मनोरञ्जन है, वे राक्षस ही इस विशाल वनमें नाना प्रकारकी बोलियाँ बोला करते हैं; अत: आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये’॥ १९/

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना॥ २०॥

अब्रवीत् परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवादिनम्।

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर सीताको बड़ा क्रोध हुआ, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे सत्यवादी लक्ष्मणसे कठोर बातें कहने लगीं—॥ २०/

अनार्याकरुणारम्भ नृशंस कुलपांसन॥ २१॥

अहं तव प्रियं मन्ये रामस्य व्यसनं महत्।

रामस्य व्यसनं दृष्ट्वा तेनैतानि प्रभाषसे॥ २२॥

‘अनार्य! निर्दयी! क्रूरकर्मा! कुलाङ्गार! मैं तुझे खूब समझती हूँ। श्रीराम किसी भारी विपत्तिमें पड़ जायँ, यही तुझे प्रिय है। इसीलिये तू रामपर संकट आया देखकर भी ऐसी बातें बना रहा है॥ २१-२२॥

नैव चित्रं सपत्नेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।

त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥ २३॥

‘लक्ष्मण! तेरे-जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओंके मनमें इस तरहका पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है॥ २३॥

सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि।

मम हेतो: प्रतिच्छन्न: प्रयुक्तो भरतेन वा॥ २४॥

‘तू बड़ा दुष्ट है, श्रीरामको अकेले वनमें आते देख मुझे प्राप्त करनेके लिये ही अपने भावको छिपाकर तू भी अकेला ही उनके पीछे-पीछे चला आया है, अथवा यह भी सम्भव है कि भरतने ही तुझे भेजा हो॥

तन्न सिध्यति सौमित्रे तवापि भरतस्य वा।

कथमिन्दीवरश्यामं रामं पद्मनिभेक्षणम्॥ २५॥

उपसंश्रित्य भर्तारं कामयेयं पृथग्जनम्।

‘परंतु सुमित्राकुमार! तेरा या भरतका वह मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता। नीलकमलके समान श्यामसुन्दर कमलनयन श्रीरामको पतिरूपमें पाकर मैं दूसरे किसी क्षुद्र पुरुषकी कामना कैसे कर सकती हूँ?॥ २५/

समक्षं तव सौमित्रे प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्॥ २६॥

रामं विना क्षणमपि नैव जीवामि भूतले।

‘सुमित्राकुमार! मैं तेरे सामने ही नि:संदेह अपने प्राण त्याग दूँगी, किंतु श्रीरामके बिना एक क्षण भी इस भूतलपर जीवित नहीं रह सकूँगी’॥ २६/

इत्युक्त: परुषं वाक्यं सीतया रोमहर्षणम्॥ २७॥

अब्रवील्लक्ष्मण: सीतां प्राञ्जलि: स जितेन्द्रिय:।

उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम॥ २८॥

सीताने जब इस प्रकार कठोर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाली बात कही, तब जितेन्द्रिय लक्ष्मण हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘देवि! मैं आपकी बातका जवाब नहीं दे सकता; क्योंकि आप मेरे लिये आराधनीया देवीके समान हैं॥ २७-२८॥

वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि।

स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु लोकेषु दृश्यते॥ २९॥

‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी अनुचित और प्रतिकूल बातें मुँहसे निकालना स्त्रियोंके लिये आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि इस संसारमें नारियोंका ऐसा स्वभाव बहुधा देखा जाता है॥ २९॥

विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकरा: स्त्रिय:।

न सहे हीदृशं वाक्यं वैदेहि जनकात्मजे॥ ३०॥

श्रोत्रयोरुभयोर्मध्ये तप्तनाराचसंनिभम्।

‘स्त्रियाँ प्राय: विनय आदि धर्मोंसे रहित, चञ्चल, कठोर तथा घरमें फूट डालनेवाली होती हैं। विदेहकुमारी जानकी! आपकी यह बात मेरे दोनों कानोंमें तपाये हुए लोहेके समान लगी है। मैं ऐसी बात सह नहीं सकता॥ ३०/

उपशृण्वन्तु मे सर्वे साक्षिणो हि वनेचरा:॥ ३१॥

न्यायवादी यथा वाक्यमुक्तोऽहं परुषं त्वया।

धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे॥ ३२॥

स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम्।

गच्छामि यत्र काकुत्स्थ: स्वस्ति तेऽस्तु वरानने॥ ३३॥

‘इस वनमें विचरनेवाले सभी प्राणी साक्षी होकर मेरा कथन सुनें। मैंने न्याययुक्त बात कही है तो भी आपने मेरे प्रति ऐसी कठोर बात अपने मुँहसे निकाली है। निश्चय ही आज आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप नष्ट होना चाहती हैं। धिक्कार है आपको, जो आप मुझपर ऐसा संदेह करती हैं। मैं बड़े भाईकी आज्ञाका पालन करनेमें दृढ़तापूर्वक तत्पर हूँ और आप केवल नारी होनेके कारण साधारण स्त्रियोंके दुष्ट स्वभावको अपनाकर मेरे प्रति ऐसी आशङ्का करती हैं। अच्छा अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ भैया श्रीराम गये हैं। सुमुखि! आपका कल्याण हो॥ ३१—३३॥

रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवता:।

निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे।

अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागत:॥ ३४॥

‘विशाललोचने! वनके सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें; क्योंकि इस समय मेरे सामने जो बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने मुझे संशयमें डाल दिया है। क्या मैं श्रीरामचन्द्रजीके साथ लौटकर पुन: आपको सकुशल देख सकूँगा?’॥ ३४॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु रुदती जनकात्मजा।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रबाष्पपरिप्लुता॥ ३५॥

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर जनककिशोरी सीता रोने लगीं। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी तीव्र धारा बह चली। वे उन्हें इस प्रकार उत्तर देती हुई बोलीं—॥ ३५॥

गोदावरीं प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण।

आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मन:॥ ३६॥

पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।

न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे॥ ३७॥

‘लक्ष्मण! मैं श्रीरामसे बिछुड़ जानेपर गोदावरी नदीमें समा जाऊँगी अथवा गलेमें फाँसी लगा लूँगी अथवा पर्वतके दुर्गम शिखरपर चढ़कर वहाँसे अपने शरीरको नीचे डाल दूँगी या तीव्र विष पान कर लूँगी अथवा जलती आगमें प्रवेश कर जाऊँगी, परंतु श्रीरघुनाथजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका कदापि स्पर्श नहीं करूँगी’॥ ३६-३७॥

इति लक्ष्मणमाश्रुत्य सीता शोकसमन्विता।

पाणिभ्यां रुदती दु:खादुदरं प्रजघान ह॥ ३८॥

लक्ष्मणके सामने यह प्रतिज्ञा करके शोकमग्न होकर रोती हुई सीता अधिक दु:खके कारण दोनों हाथोंसे अपने उदरपर आघात करने लगीं—छाती पीटने लगीं॥ ३८॥

तामार्तरूपां विमना रुदन्तीं

सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम्।

आश्वासयामास न चैव भर्तु-

स्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता॥ ३९॥

विशाललोचना सीताको आर्त होकर रोती देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मन-ही-मन उन्हें सान्त्वना दी, परंतु सीता उस समय अपने देवरसे कुछ नहीं बोलीं॥

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मण:

कृताञ्जलि: किंचिदभिप्रणम्य।

अवेक्षमाणो बहुश: स मैथिलीं

जगाम रामस्य समीपमात्मवान्॥ ४०॥

तब मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने दोनों हाथ जोड़ कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीताको प्रणाम किया और बारंबार उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजीके पास चल दिये॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥

 

षट्चत्वारिंश: सर्ग:

रावणका साधुवेषमें सीताके पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीताका आतिथ्यके लिये उसे आमन्त्रित करना

तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुज:।

स विकांक्षन् भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥ १॥

सीताके कठोर वचन कहनेपर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीरामसे मिलनेकी विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँसे चल दिये॥ १॥

तदासाद्य दशग्रीव: क्षिप्रमन्तरमास्थित:।

अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक्॥ २॥

लक्ष्मणके चले जानेपर रावणको मौका मिल गया, अत: वह संन्यासीका वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीताके समीप गया॥ २॥

श्लक्ष्णकाषायसंवीत: शिखी छत्री उपानही।

वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥ ३॥

वह शरीरपर साफ-सुथरा गेरुए रंगका वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तकपर शिखा, हाथमें छाता और पैरोंमें जूते थे। उसने बायें कंधेपर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था॥ ३॥

परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत।

तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥ ४॥

अत्यन्त बलवान् रावण उस वनमें परिव्राजकका रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओंसे रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीताके पास गया॥ ४॥

रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तम:।

तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्॥ ५॥

रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुण:।

जैसे सूर्य और चन्द्रमासे हीन हुई संध्याके पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीताके निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमासे रहित हुई रोहिणीपर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चरकी दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावणने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारीकी ओर देखा॥ ५/

तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमा:॥ ६॥

संदृश्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुत:।

शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्॥ ७॥

स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी।

उस भयंकर पापाचारीको आया देख जनस्थानके वृक्षोंने हिलना बंद कर दिया और हवाका वेग रुक गया। लाल नेत्रोंवाले रावणको अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गतिसे बहनेवाली गोदावरी नदी भयके मारे धीरे-धीरे बहने लगी॥ ६-७/

रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे॥ ८॥

उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावण:।

रामसे बदला लेनेका अवसर ढूँढ़नेवाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूपसे विदेहकुमारी सीताके पास पहुँचा॥ ८/

अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्॥ ९॥

अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चर:।

उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पतिके लिये शोक और चिन्तामें डूबी हुई थीं। उसी अवस्थामें अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्राके सामने जा पहुँचा हो॥

सहसा भव्यरूपेण तृणै: कूप इवावृत:॥ १०॥

अतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेहीं रामपत्नीं यशस्विनीम्।

जैसे कुआँ तिनकोंसे ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूपसे अपनी अभव्यताको छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुँचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेहीको देखकर खड़ा हो गया॥ १०/

तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नीं रामस्य रावण:॥ ११॥

शुभां रुचिरदन्तोष्ठीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।

आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥ १२॥

उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीताको देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको छीने लेता था। वे पर्णशालामें बैठी हुई शोकसे पीडि़त हो आँसू बहा रही थीं॥ ११-१२॥

स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्।

अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचर:॥ १३॥

वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बरसे सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारीके सामने गया॥

दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिप:॥ १४॥

उन्हें देखते ही कामदेवके बाणोंसे घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्रका उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थानमें विनीतभावसे उनसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ॥ १४॥

तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्।

विभ्राजमानां वपुषा रावण: प्रशशंस ह॥ १५॥

त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीरसे कमलसे रहित कमलालया लक्ष्मीकी भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला—॥ १५॥

रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।

कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती॥ १६॥

‘उत्तम सुवर्णकी-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलोंके समान हैं, अत: तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलोंकी सुन्दर-सी माला धारण करती हो॥ १६॥

ह्री: श्री: कीर्ति: शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।

भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥ १७॥

‘शुभानने! तुम श्री, हृ, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाली कामदेवकी पत्नी रति तो नहीं हो?॥ १७॥

समा: शिखरिण: स्निग्धा: पाण्डुरा दशनास्तव।

विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥ १८॥

विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।

तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्दकी कलियोंके समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटिका अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँधें हाथीकी सूँड़के समान शोभा पाती हैं॥ १८/

एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥ १९॥

पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ।

मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥ २०॥

‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फलके समान आकारवाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हैं॥ १९-२०॥

चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।

मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा॥ २१॥

‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्यसे मेरे मनको वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जलके द्वारा अपने तटका अपहरण करती है॥ २१॥

करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि।

नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी॥ २२॥

‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठीमें आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक-दूसरेसे सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जातिकी स्त्रियोंमें भी कोई तुम-जैसी नहीं है॥ २२॥

नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।

रूपमग्र्यं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥ २३॥

इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे।

सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि॥ २४॥

‘पृथ्वीपर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आजसे पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकोंमें सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वनमें निवास! ये सब बातें ध्यानमें आते ही मेरे मनको मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँसे चली जाओ। तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो॥

राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्।

प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च॥ २५॥

सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।

‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भयंकर राक्षसोंके रहनेकी जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनोंमें निवास करना और विचरना चाहिये॥ २५/

वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने॥ २६॥

भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।

‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोगमें आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसीको श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो॥ २६/

का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥ २७॥

वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।

‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओंसे सम्बन्ध रखनेवाली देवी जान पड़ती हो॥

नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नरा:॥ २८॥

राक्षसानामयं वास: कथं तु त्वमिहागता।

‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसोंका निवासस्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी॥ २८/

इह शाखामृगा: सिंहा द्वीपिव्याघ्रमृगा वृका:॥ २९॥

ऋक्षास्तरक्षव: कङ्का: कथं तेभ्यो न बिभ्यसे।

‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेडि़ये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है?॥ २९/

मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥ ३०॥

कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने।

‘वरानने! इस विशाल वनके भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजोंके बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो?॥ ३०/

कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान्॥ ३१॥

एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।

‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँसे आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्यमें अकेली विचरण करती हो?’॥ ३१/

इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥ ३२॥

द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्।

सर्वैरतिथिसत्कारै: पूजयामास मैथिली॥ ३३॥

वेशभूषासे महात्मा बनकर आये हुए रावणने जब विदेहकुमारी सीताकी इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मणवेषमें वहाँ पधारे हुए रावणको देखकर मैथिलीने अतिथि-सत्कारके लिये उपयोगी सभी सामग्रियोंद्वारा उसका पूजन किया॥ ३२-३३॥

उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।

अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥ ३४॥

पहले बैठनेके लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपरसे सौम्य दिखायी देनेवाले उस अतिथिको भोजनके लिये निमन्त्रण देते हुए कहा—‘ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये’॥

द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली

समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्।

अशक्यमुद्द्वेष्टुमुपायदर्शना-

न्न्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥ ३५॥

वह ब्राह्मणके वेषमें आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेषमें आये हुए अतिथिकी उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषामें ब्राह्मणत्वका निश्चय करानेवाले चिह्न दिखायी देते थे, अत: उस रूपमें आये हुए उस रावणको देखकर मैथिलीने ब्राह्मणके योग्य सत्कार करनेके लिये ही उसे निमन्त्रित किया॥ ३५॥

इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यता-

मिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति।

इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं

त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम् ॥ ३६॥

वे बोलीं—‘ब्राह्मण! यह चटाई है, इसपर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोनेके लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वनमें ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभावसे उसका उपभोग कीजिये’॥ ३६॥

निमन्त्र्यमाण: प्रतिपूर्णभाषिणीं

नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्।

प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मन:

समर्पयामास वधाय रावण:॥ ३७॥

‘अतिथिके लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर सीताने जब उसे भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब रावणने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहनेवाली राजरानी मैथिलीकी ओर देखा और अपने ही वधके लिये उसने हठपूर्वक सीताका हरण करनेके निमित्त मनमें दृढ़ निश्चय कर लिया॥ ३७॥

तत: सुवेषं मृगयागतं पतिं

प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा।

निरीक्षमाणा हरितं ददर्श त-

न्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥ ३८॥

तदनन्तर सीता शिकार खेलनेके लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥

 

 


सप्तचत्वारिंश: सर्ग:

सीताका रावणको अपना और पतिका परिचय देकर वनमें आनेका कारण बताना, रावणका उन्हें अपनी पटरानी बनानेकी इच्छा प्रकट करना और सीताका उसे फटकारना

रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।

परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना॥ १॥

सीताको हरनेकी इच्छासे परिव्राजक (संन्यासी)का रूप धारण करके आये हुए रावणने उस समय जब विदेहराजकुमारीसे इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥ १॥

ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।

इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्॥ २॥

वे दो घड़ीतक इस विचारमें पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बातका उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीताने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २॥

दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मन:।

सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया॥ ३॥

‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनककी पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है॥ ३॥

उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।

भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ ४॥

‘विवाहके बाद बारह वर्षोंतक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके महलमें रहकर मैंने अपने पतिके साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न रही हूँ॥ ४॥

तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभु:।

अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमन्त्रिभि:॥ ५॥

‘तेरहवें वर्षके प्रारम्भमें सामर्थ्यशाली महाराज दशरथने राजमन्त्रियोंसे मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजीका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय किया॥ ५॥

तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।

कैकेयी नाम भर्तारं ममार्या याचते वरम्॥ ६॥

‘जब श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेककी सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयीने अपने पतिसे वर माँगा॥ ६॥

परिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरं सुकृतेन मे।

मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्॥ ७॥

द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।

‘कैकेयीने मेरे श्वशुरको पुण्यकी शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरोमणिसे दो वर माँगे—मेरे पतिके लिये वनवास और भरतके लिये राज्याभिषेक॥ ७/

नाद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये न कदाचन॥ ८॥

एष मे जीवितस्यान्तो रामो यदभिषिच्यते।

‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं—यदि आज श्रीरामका अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही। यही मेरे जीवनका अन्त होगा॥ ८/

इति ब्रुवाणां कैकेयीं श्वशुरो मे स पार्थिव:॥ ९॥

अयाचतार्थैरन्वर्थैर्न च याच्ञां चकार सा।

‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयीसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न न डालो।’ किंतु कैकेयीने उनकी वह याचना सफल नहीं की॥

मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशक:॥ १०॥

अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।

‘उस समय मेरे महातेजस्वी पतिकी अवस्था पचीस सालसे ऊपरकी थी और मेरे जन्मकालसे लेकर वनगमनकालतक मेरी अवस्था वर्षगणनाके अनुसार अठारह सालकी हो गयी थी॥ १०/

रामेति प्रथितो लोके सत्यवान् शीलवान् शुचि:॥ ११॥

विशालाक्षो महाबाहु: सर्वभूतहिते रत:।

‘श्रीराम जगत्में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूपसे विख्यात हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं। वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं॥

कामार्तश्च महाराज: पिता दशरथ: स्वयम्॥ १२॥

कैकेय्या: प्रियकामार्थं तं रामं नाभ्यषेचयत्।

‘उनके पिता महाराज दशरथने स्वयं कामपीडि़त होनेके कारण कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरामका अभिषेक नहीं किया॥ १२/

अभिषेकाय तु पितु: समीपं राममागतम्॥ १३॥

कैकेयी मम भर्तारमित्युवाच द्रुतं वच:।

‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेकके लिये पिताके समीप आये, तब कैकेयीने मेरे उन पतिदेवसे तुरंत यह बात कही॥ १३/

तव पित्रा समाज्ञप्तं ममेदं शृणु राघव॥ १४॥

भरताय प्रदातव्यमिदं राज्यमकण्टकम्।

त्वया तु खलु वस्तव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥ १५॥

वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरं मोचयानृतात्।

‘रघुनन्दन! तुम्हारे पिताने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँहसे सुनो। यह निष्कण्टक राज्य भरतको दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षोंतक वनमें ही निवास करना होगा। काकुत्स्थ! तुम वनको जाओ और पिताको असत्यके बन्धनसे छुड़ाओ॥ १४-१५/

तथेत्युवाच तां राम: कैकेयीमकुतोभय:॥ १६॥

चकार तद्वच: श्रुत्वा भर्ता मम दृढव्रत:।

‘किसीसे भी भय न माननेवाले श्रीरामने कैकेयीकी वह बात सुनकर कहा—‘बहुत अच्छा’। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करनेवाले हैं॥ १६/

दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम्॥ १७॥

एतद् ब्राह्मण रामस्य व्रतं धृतमनुत्तमम्।

‘श्रीराम केवल देते हैं, किसीसे कुछ लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं। ब्राह्मण! यह श्रीरामचन्द्रजीका सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है॥ १७/

तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥ १८॥

रामस्य पुरुषव्याघ्र: सहाय: समरेऽरिहा।

स भ्राता लक्ष्मणो नाम ब्रह्मचारी दृढव्रत:॥ १९॥

‘श्रीरामके सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं। समरभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेवाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीरामके सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाले हैं॥ १८-१९॥

अन्वगच्छद् धनुष्पाणि: प्रव्रजन्तं मया सह।

जटी तापसरूपेण मया सह सहानुज:॥ २०॥

प्रविष्टो दण्डकारण्यं धर्मनित्यो दृढव्रत:।

‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब वनमें आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथमें धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये। इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाईके साथ श्रीराम इस दण्डकारण्यमें आये हैं। वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्य-निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वीके वेशमें यहाँ रहते हैं॥ २०/

ते वयं प्रच्युता राज्यात् कैकेय्यास्तु कृते त्रय:॥ २१॥

विचराम द्विजश्रेष्ठ वनं गम्भीरमोजसा।

समाश्वस मुहूर्तं तु शक्यं वस्तुमिह त्वया॥ २२॥

आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम्।

‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयीके कारण राज्यसे वञ्चित हो इस गम्भीर वनमें अपने ही बलके भरोसे विचरते हैं। आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें। अभी मेरे स्वामी प्रचुरमात्रामें जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे॥ २१-२२/

रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽऽदायामिषं बहु॥ २३॥

स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वत:।

एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थं चरसि द्विज॥ २४॥

‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओंका वध करके तपस्वी जनोंके उपभोगमें आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयँगे (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रह्मन्! अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुलका ठीक-ठीक परिचय दीजिये। आप अकेले इस दण्डकारण्यमें किसलिये विचरते हैं!’॥ २३-२४॥

एवं ब्रुवत्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबल:।

प्रत्युवाचोत्तरं तीव्रं रावणो राक्षसाधिप:॥ २५॥

श्रीरामपत्नी सीताके इस प्रकार पूछनेपर महाबली राक्षसराज रावणने अत्यन्त कठोर शब्दोंमें उत्तर दिया—

येन वित्रासिता लोका: सदेवासुरमानुषा:।

अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वर:॥ २६॥

‘सीते! जिसके नामसे देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसोंका राजा रावण हूँ॥ २६॥

त्वां तु काञ्चनवर्णाभां दृष्ट्वा कौशेयवासिनीम्।

रतिं स्वकेषु दारेषु नाधिगच्छाम्यनिन्दिते॥ २७॥

‘अनिन्द्यसुन्दरि! तुम्हारे अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है। तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियोंकी ओर नहीं जाता है॥ २७॥

बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्तत: ।

सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव॥ २८॥

‘मैं इधर-उधरसे बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंको हर लाया हूँ। उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो। तुम्हारा भला हो॥ २८॥

लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी।

सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि॥ २९॥

‘मेरी राजधानीका नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्रके बीचमें एक पर्वतके शिखरपर बसी हुई है। समुद्रने उसे चारों ओरसे घेर रखा है॥ २९॥

तत्र सीते मया सार्धं वनेषु विचरिष्यसि।

न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि॥ ३०॥

‘सीते! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकारके वनोंमें विचरण करोगी। भामिनि! फिर तुम्हारे मनमें इस वनवासकी इच्छा कभी नहीं होगी॥ ३०॥

पञ्च दास्य: सहस्राणि सर्वाभरणभूषिता:।

सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि॥ ३१॥

‘सीते! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’॥ ३१॥

रावणेनैवमुक्ता तु कुपिता जनकात्मजा।

प्रत्युवाचानवद्याङ्गी तमनादृत्य राक्षसम्॥ ३२॥

रावणके ऐसा कहनेपर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षसका तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं—॥ ३२॥

महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्द्रसदृशं पतिम्।

महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता॥ ३३॥

‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वतके समान अविचल हैं, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी हैं और महासागरके समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता। मैं तन-मन-प्राणसे उन्हींका अनुसरण करनेवाली तथा उन्हींकी अनुरागिणी हूँ॥ ३३॥

सर्वलक्षणसम्पन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम्।

सत्यसंधं महाभागमहं राममनुव्रता॥ ३४॥

‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, वटवृक्षकी भाँति सबको अपनी छायामें आश्रय देनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं। मैं उन्हींकी अनन्य अनुरागिणी हूँ॥ ३४॥

महाबाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम्।

नृसिंहं सिंहसंकाशमहं राममनुव्रता॥ ३५॥

‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। वे सिंहके समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्वके साथ चलते हैं और सिंहके ही समान पराक्रमी हैं। मैं उन पुरुषसिंह श्रीराममें ही अनन्य भक्ति रखनेवाली हूँ॥ ३५॥

पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्।

पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता॥ ३६॥

‘राजकुमार श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है। वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है। उन महाबाहु श्रीराममें ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है॥ ३६॥

त्वं पुनर्जम्बुक: सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।

नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रभा यथा॥ ३७॥

‘पापी निशाचर! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ। मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है। अरे! जैसे सूर्यकी प्रभापर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता॥ ३७॥

पादपान् काञ्चनान् नूनं बहून् पश्यसि मन्दभाक्।

राघवस्य प्रियां भार्यां यस्त्वमिच्छसि राक्षस॥ ३८॥

‘अभागे राक्षस! तेरा इतना साहस! तू श्रीरघुनाथजीकी प्यारी पत्नीका अपहरण करना चाहता है! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोनेके वृक्ष दिखायी देने लगे हैं—अब तू मौतके निकट जा पहुँचा है॥ ३८॥

क्षुधितस्य च सिंहस्य मृगशत्रोस्तरस्विन:।

आशीविषस्य वदनाद् दंष्ट्रामादातुमिच्छसि॥ ३९॥

मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं पाणिना हर्तुमिच्छसि।

कालकूटं विषं पीत्वा स्वस्तिमान् गन्तुमिच्छसि॥ ४०॥

अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम्।

राघवस्य प्रियां भार्यामधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥ ४१॥

‘तू श्रीरामकी प्यारी पत्नीको हस्तगत करना चाहता है। जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्पके मुखसे उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको हाथसे उठाकर ले जानेकी इच्छा करता है, कालकूट विषको पीकर कुशलपूर्वक लौट जानेकी अभिलाषा रखता है तथा आँखको सूईसे पोंछता और छुरेको जीभसे चाटता है॥

अवसज्य शिलां कण्ठे समुद्रं तर्तुमिच्छसि।

सूर्याचन्द्रमसौ चोभौ पाणिभ्यां हर्तुमिच्छसि॥ ४२॥

यो रामस्य प्रियां भार्यां प्रधर्षयितुमिच्छसि।

‘क्या तू अपने गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रको पार करना चाहता है? सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको अपने दोनों हाथोंसे हर लानेकी इच्छा करता है? जो श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नीपर बलात् करनेको उतारू हुआ है॥ ४२/

अग्निं प्रज्वलितं दृष्ट्वा वस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि॥ ४३॥

कल्याणवृत्तां यो भार्यां रामस्याहर्तुमिच्छसि।

‘यदि तू कल्याणमय आचारका पालन करनेवाली श्रीरामकी भार्याका अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आगको देखकर भी तू उसे कपड़ेमें बाँधकर ले जानेकी इच्छा करता है॥ ४३/

अयोमुखानां शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि।

रामस्य सदृशीं भार्यां योऽधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥ ४४॥

‘अरे तू श्रीरामकी भार्याको, जो सर्वथा उन्हींके योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलोंकी नोकपर चलनेकी अभिलाषा करता है॥ ४४॥

यदन्तरं सिंहसृगालयोर्वने

यदन्तरं स्यन्दनिकासमुद्रयो:।

सुराग्र्यसौवीरकयोर्यदन्तरं

तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥ ४५॥

‘वनमें रहनेवाले सिंह और सियारमें, समुद्र और छोटी नदीमें तथा अमृत और काँजीमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराममें और तुझमें है॥ ४५॥

यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयो-

र्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयो:।

यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने

तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥ ४६॥

‘सोने और सीसेमें, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़में तथा वनमें रहनेवाले हाथी और बिलावमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४६॥

यदन्तरं वायसवैनतेययो-

र्यदन्तरं मद्गुमयूरयोरपि।

यदन्तरं हंसकगृध्रयोर्वने

तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥ ४७॥

‘गरुड़ और कौएमें, मोर और जलकाकमें तथा वनवासी हंस और गीधमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४७॥

तस्मिन् सहस्राक्षसमप्रभावे

रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ।

हृतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये

आज्यं यथा मक्षिकयावगीर्णम्॥ ४८॥

‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथमें धनुष और बाण लेकर खड़े हो जायँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’॥ ४८॥

इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा

सुदुष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम्।

गात्रप्रकम्पाद् व्यथिता बभूव

वातोद्धता सा कदलीव तन्वी॥ ४९॥

सीताके मनमें कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षससे यह अत्यन्त दु:खजनक बात कहकर सीता रोषसे काँपने लगीं। शरीरके कम्पनसे कृशाङ्गी सीता हवासे हिलायी गयी कदलीके समान व्यथित हो उठीं॥ ४९॥

तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां

स रावणो मृत्युसमप्रभाव:।

कुलं बलं नाम च कर्म चात्मन:

समाचचक्षे भयकारणार्थम्॥ ५०॥

सीताको काँपती देख मौतके समान प्रभाव रखनेवाला रावण उनके मनमें भय उत्पन्न करनेके लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्मका परिचय देने लगा॥ ५०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥

 

अष्टचत्वारिंश: सर्ग:

रावणके द्वारा अपने पराक्रमका वर्णन और सीताद्वारा उसको कड़ी फटकार

एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्ध: परुषं वच:।

ललाटे भ्रुकुटिं कृत्वा रावण: प्रत्युवाच ह॥ १॥

सीताके ऐसा कहनेपर रावण रोषमें भर गया और ललाटमें भौंहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणीमें बोला—॥ १॥

भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि।

रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीव: प्रतापवान्॥ २॥

‘सुन्दरि! मैं कुबेरका सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो॥ २॥

यस्य देवा: सगन्धर्वा: पिशाचपतगोरगा:।

विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजा:॥ ३॥

येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्रा: कारणान्तरे।

द्वन्द्वमासादित: क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जित:॥ ४॥

‘जैसे प्रजा मौतके भयसे सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेरके साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमिमें उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ॥ ३-४॥

मद्भयार्त: परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।

कैलासं पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहन:॥ ५॥

‘मेरे ही भयसे पीडि़त हो नरवाहन कुबेरने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्काका परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलासकी शरण ली है॥ ५॥

यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्।

वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम्॥ ६॥

‘भद्रे! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छाके अनुसार चलनेवाला है, मैंने पराक्रमसे जीत लिया है और उसी विमानके द्वारा मैं आकाशमें विचरता हूँ॥ ६॥

मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि।

विद्रवन्ति परित्रस्ता: सुरा: शक्रपुरोगमा:॥ ७॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भयसे थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ७॥

यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कित:।

तीव्रांशु: शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि॥ ८॥

‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भयसे आकाशमें प्रचण्ड किरणोंवाला सूर्य भी चन्द्रमाके समान शीतल हो जाता है॥ ८॥

निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदका:।

भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि च चरामि च॥ ९॥

‘जिस स्थानपर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षोंके पत्तेतक नहीं हिलते और नदियोंका पानी स्थिर हो जाता है॥ ९॥

मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा।

सम्पूर्णा राक्षसैर्घोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥ १०॥

‘समुद्रके उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्रकी अमरावतीके समान मनोहर तथा घोर राक्षसोंसे भरी हुई है॥ १०॥

प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता।

हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा॥ ११॥

‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरीके महलोंके दालान, फर्श आदि सोनेके बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है॥ ११॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता।

सर्वकामफलैर्वृक्षै: संकुलोद्यानभूषिता॥ १२॥

‘हाथी, घोड़े और रथोंसे वहाँकी सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनि गूँजा करती है। सब प्रकारके मनोवाञ्छित फल देनेवाले वृक्षोंसे लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकारके उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ १२॥

तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह।

न स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि॥ १३॥

‘राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरीमें चलकर निवास करो। मनस्विनि! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियोंको भूल जाओगी॥ १३॥

भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि।

न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुष:॥ १४॥

‘सुन्दरि! लङ्कामें दिव्य और मानुष-भोगोंका उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य रामका कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है॥ १४॥

स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृप:।

मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठ: सुत: प्रस्थापितो वनम्॥ १५॥

तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा।

करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥ १६॥

‘विशाललोचने! राजा दशरथने अपने प्यारे पुत्रको राज्यपर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्रको वनमें भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्यामें लगे हुए तापस रामको लेकर क्या करोगी?॥ १५-१६॥

रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम्।

न मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि॥ १७॥

‘यह राक्षसोंका स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वारपर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मनसे चाहो। यह कामदेवके बाणोंसे पीडि़त है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है॥ १७॥

प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि।

चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमुर्वशी॥ १८॥

‘भीरु! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवाको लात मारकर उर्वशी पछतायी थी॥ १८॥

अङ्गुल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुष:।

तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि॥ १९॥

‘सुन्दरि! युद्धमें मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलिके बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्यसे मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो’॥ १९॥

एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम्॥ २०॥

रावणके ऐसा कहनेपर विदेहकुमारी सीताके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थानमें राक्षसराज रावणसे कठोर वाणीमें कहा—॥ २०॥

कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्।

भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि॥ २१॥

‘अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओंके वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है?॥ २१॥

अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसा:।

येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रिय:॥ २२॥

‘रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे॥ २२॥

अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम्।

नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत्॥ २३॥

‘इन्द्रकी पत्नी शचीका अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीताका हरण करके कोई कुशलसे नहीं रह सकता॥ २३॥

जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चा-

च्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम्।

न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा

पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्ष:॥ २४॥

‘राक्षस! वज्रधारी इन्द्रकी अनुपम रूपवती भार्या शचीका तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकालतक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्रीका अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

 

 


एकोनपञ्चाश: सर्ग:

रावणद्वारा सीताका अपहरण, सीताका विलाप और उनके द्वारा जटायुका दर्शन

सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीव: प्रतापवान्।

हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपु:॥ १॥

सीताके इस वचनको सुनकर प्रतापी दशमुख रावणने अपने हाथपर हाथ मारकर शरीरको बहुत बड़ा बना लिया॥

स मैथिलीं पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविद:।

नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥ २॥

वह बातचीत करनेकी कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीतासे फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—‘मेरी समझमें तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रमकी बातें अनसुनी कर दी हैं॥

उद्वहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थित:।

आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थित:॥ ३॥

‘अरी! मैं आकाशमें खड़ा हो इन दोनों भुजाओंसे ही सारी पृथ्वीको उठा ले जा सकता हूँ। समुद्रको पी जा सकता हूँ और युद्धमें स्थित हो मौतको भी मार सकता हूँ॥

अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्।

कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥ ४॥

‘काम तथा रूपसे उन्मत्त रहनेवाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणोंसे सूर्यको भी व्यथित कर दूँ और इस भूतलको भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हूँ। तुम मेरी ओर देखो’॥ ४॥

एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे।

क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतु:॥ ५॥

ऐसा कहते-कहते क्रोधसे भरे हुए रावणकी आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आगके समान लाल हो गयीं॥ ५॥

सद्य: सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं स रावण:।

स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुज:॥ ६॥

कुबेरके छोटे भाई रावणने तत्काल अपने सौम्य रूपको त्यागकर तीखा एवं कालके समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया॥ ६॥

संरक्तनयन: श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषण:।

क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभ:॥ ७॥

उस समय श्रीमान् रावणके सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे अलंकृत था और महान् क्रोधसे आविष्ट हो नीलमेघके समान काला दिखायी देने लगा॥ ७॥

दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचर:।

स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥ ८॥

वह विशालकाय निशाचर परिव्राजकके उस छद्मवेशको त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओंसे संयुक्त हो गया॥ ८॥

प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिप:।

रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥ ९॥

उस समय राक्षसराज रावणने अपने सहज रूपको ग्रहण कर लिया और लाल रंगके वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीताकी ओर देखता हुआ खड़ा हो गया॥ ९॥

स तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव।

वसनाभरणोपेतां मैथिलीं रावणोऽब्रवीत्॥ १०॥

काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सूर्यकी प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावणने उनसे कहा—॥ १०॥

त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि।

मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृश: पति:॥ ११॥

‘वरारोहे! यदि तुम तीनों लोकोंमें विख्यात पुरुषको अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ॥ ११॥

मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्य: पतिस्तव।

नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम्॥ १२॥

‘भद्रे! मुझे सुदीर्घकालके लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मनके प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा॥

त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भाव: प्रणीयताम्।

राज्याच्च्युतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम्॥ १३॥

कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि।

‘मनुष्य रामके विषयमें जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपनेको पण्डित (बुद्धिमती) माननेवाली मूढ़ नारी! जो राज्यसे भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राममें किन गुणोंके कारण तुम अनुरक्त हो॥ १३/

य: स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम्॥ १४॥

अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मति:।

‘जो एक स्त्रीके कहनेसे सुहृदोंसहित सारे राज्यका त्याग करके इस हिंसक जन्तुओंसे सेवित वनमें निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है? (वह सर्वथा मूढ़ है)’॥ १४/

इत्युक्त्वा मैथिलीं वाक्यं प्रियार्हां प्रियवादिनीम्॥ १५॥

अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षस: काममोहित:।

जग्राह रावण: सीतां बुध: खे रोहिणीमिव॥ १६॥

जो प्रिय वचन सुननेके योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलनेवाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीतासे ऐसा अप्रिय वचन कहकर कामसे मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावणने निकट जाकर (माताके समान आदरणीया) सीताको पकड़ लिया, मानो बुधने आकाशमें अपनी माता रोहिणीको पकड़नेका दुस्साहस किया हो109॥ १५-१६॥

वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण स:।

ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥ १७॥

उसने बायें हाथसे कमलनयनी सीताके केशोंसहित मस्तकको पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघोंके नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया॥ १७॥

तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम्।

प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवता:॥ १८॥

उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओंसे युक्त पर्वतशिखरके समान प्रतीत होनेवाले उस कालके समान विकराल राक्षसको देखकर वनके समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये॥ १८॥

स च मायामयो दिव्य: खरयुक्त: खरस्वन:।

प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथ:॥ १९॥

इतनेहीमें गधोंसे जुता हुआ और गधोंके समान ही शब्द करनेवाला रावणका वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया॥ १९॥

ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ज्य महास्वन:।

अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा॥ २०॥

रथके प्रकट होते ही जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले रावणने कठोर वचनोंद्वारा विदेहनन्दिनी सीताको डाँटा और पूर्वोक्त रूपसे गोदमें उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया॥ २०॥

सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी।

रामेति सीता दु:खार्ता रामं दूरं गतं वने॥ २१॥

रावणके द्वारा पकड़ी जानेपर यशस्विनी सीता दु:खसे व्याकुल हो गयीं और वनमें दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजीको ‘हे राम!’ कहकर जोर-जोरसे पुकारने लगीं॥ २१॥

तामकामां स कामार्त: पन्नगेन्द्रवधूमिव।

विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावण:॥ २२॥

सीताके मनमें रावणकी कामना नहीं थी—वे उसकी ओरसे सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैदसे अपनेको छुड़ानेके लिये चोट खायी हुई नागिनकी तरह उस रथपर छटपटा रही थीं। उसी अवस्थामें कामपीडि़त राक्षस उन्हें लेकर आकाशमें उड़ चला॥ २२॥

तत: सा राक्षसेन्द्रेण ह्र‌ियमाणा विहायसा।

भृशं चुक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा॥ २३॥

राक्षसराज जब सीताको हरकर आकाशमार्गसे ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा। वे पगली-सी हो गयीं और दु:खसे आतुर-सी होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगीं—॥ २३॥

हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक।

ह्र‌ियमाणां न जानीषे रक्षसा कामरूपिणा॥ २४॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है॥ २४॥

जीवितं सुखमर्थं च धर्महेतो: परित्यजन्।

ह्र‌ियमाणामधर्मेण मां राघव न पश्यसि॥ २५॥

‘हा रघुनन्दन! आपने धर्मके लिये प्राणोंका मोह, शरीरका सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं॥ २५॥

ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप।

कथमेवंविधं पापं न त्वं शाधि हि रावणम्॥ २६॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्गपर चलनेवाले उद्दण्ड पुरुषोंको दण्ड देकर उन्हें राहपर लानेवाले हैं, फिर ऐसे पापी रावणको क्यों नहीं दण्ड देते हैं॥ २६॥

न तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मण: फलम्।

कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये॥ २७॥

‘उद्दण्ड पुरुषके उद्दण्डतापूर्ण कर्मका फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेतीके पकनेके लिये तदनुकूल समयकी अपेक्षा होती है॥ २७॥

त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतन:।

जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि॥ २८॥

‘रावण! तेरे सिरपर काल नाच रहा है। उसीने तेरी विचारशक्तिको नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीरामसे वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणोंका अन्त कर डाले॥ २८॥

हन्तेदानीं सकामा तु कैकेयी बान्धवै: सह।

ह्र‌ियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विन:॥ २९॥

‘हाय! इस समय कैकेयी अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीरामकी धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ॥ २९॥

आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।

क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावण:॥ ३०॥

‘मैं जनस्थानमें खिले हुए कनेर वृक्षोंसे प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीरामसे कहना कि सीताको रावण हर ले जा रहा है॥ ३०॥

हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरीं नदीम्।

क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावण:॥ ३१॥

‘हंसों और सारसोंके कलरवोंसे मुखरित हुई गोदावरी नदीको मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीरामसे शीघ्र ही कह देना, सीताको रावण हर ले जा रहा है॥ ३१॥

दैवतानि च यान्यस्मिन् वने विविधपादपे।

नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तु: शंसत मां हृताम्॥ ३२॥

‘इस वनके विभिन्न वृक्षोंपर निवास करनेवाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामीको सूचना दे दें कि आपकी स्त्रीको राक्षस हर ले गया॥ ३२॥

यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च।

सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै॥ ३३॥

ह्र‌ियमाणां प्रियां भर्तु: प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।

विवशा ते हृता सीता रावणेनेति शंसत॥ ३४॥

‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकारके प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजीसे कहें कि जो आपको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीताको असहाय अवस्थामें रावण हर ले गया॥ ३३-३४॥

विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबल:।

आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहृतामपि॥ ३५॥

‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोकमें भी गयी हुई जान लें तो यमराजके द्वारा अपहृत होनेपर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँसे लौटा लायेंगे’॥ ३५॥

सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदु:खिता।

वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्शायतलोचना॥ ३६॥

उस समय अत्यन्त दु:खी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीताने एक वृक्षपर बैठे हुए गृध्रराज जटायुको देखा॥ ३६॥

सा तमुद्वीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता।

समाक्रन्दद् भयपरा दु:खोपहतया गिरा॥ ३७॥

रावणके वशमें पड़ जानेके कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायुको देखकर वे दु:खभरी वाणीमें करुण क्रन्दन करने लगीं—॥ ३७॥

जटायो पश्य मामार्य ह्र‌‌ियमाणामनाथवत्।

अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा॥ ३८॥

‘आर्य जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथकी भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है॥

नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचर:।

सत्ववाञ्जितकाशी च सायुधश्चैव दुर्मति:॥ ३९॥

‘परंतु आप इस क्रूर निशाचरको रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धोंमें विजय पानेके कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथोंमें हथियार है और इसके मनमें दुष्टता भी भरी हुई है॥

रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम।

लक्ष्मणाय च तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषत:॥ ४०॥

‘आर्य जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मणसे ज्यों-का-ज्यों पूर्णरूपसे बता दीजियेगा’॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनपञ्चाश: सर्ग:॥ ४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥

 

पञ्चाश: सर्ग:

जटायुका रावणको सीताहरणके दुष्कर्मसे निवृत्त होनेके लिये समझाना और अन्तमें युद्धके लिये ललकारना

तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।

निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श स:॥ १॥

जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्थामें उन्होंने सीताकी वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावणको देखा॥

तत: पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्ड: खगोत्तम:।

वनस्पतिगत: श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥ २॥

पक्षियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् जटायुका शरीर पर्वत-शिखरके समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़पर बैठे-ही-बैठे रावणको लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले—॥ २॥

दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रय:।

भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥ ३॥

जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबल:।

‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्ममें स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये॥ ३/

राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपम:॥ ४॥

लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मज:।

‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, इन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी तथा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहनेवाले हैं॥ ४/

तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी॥ ५॥

सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि।

‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीरामकी यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीरवाली देवीका नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो॥ ५/

कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत्॥ ६॥

रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल।

निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्॥ ७॥

‘अपने धर्ममें स्थित रहनेवाला कोई भी राजा भला परायी स्त्रीका स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओंकी स्त्रियोंकी तो सभीको विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्रीके स्पर्शसे जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने-आपसे दूर हटा दो॥

न तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत्।

यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात्॥ ८॥

‘धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषोंके स्पर्शसे अपनी स्त्रीकी रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरोंकी स्त्रियोंकी भी रक्षा करनी चाहिये॥ ८॥

अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टा: शास्त्रेष्वनागतम्।

व्यवस्यन्त्यनुराजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन॥ ९॥

‘पुलस्त्यकुलनन्दन! जिनकी शास्त्रोंमें चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा कामका भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजाकी देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अत: राजाको अनुचित या अशास्त्रीय कर्ममें प्रवृत्त नहीं होना चाहिये)॥ ९॥

राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधि:।

धर्म: शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते॥ १०॥

‘राजा धर्म और कामका प्रवर्तक तथा द्रव्योंकी उत्तम निधि है, अत: धर्म, सदाचार अथवा पाप—इनकी प्रवृत्तिका मूल कारण राजा ही है॥ १०॥

पापस्वभावश्चपल: कथं त्वं रक्षसां वर।

ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥ ११॥

‘राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापीको देवताओंके विमानकी भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया?॥

कामस्वभावो य:सोऽसौ न शक्यस्तं प्रमार्जितुम्।

नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम्॥ १२॥

‘जिसके स्वभावमें कामकी प्रधानता है, उसके उस स्वभावका परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओंके घरमें दीर्घकालके बाद भी पुण्यका आवास नहीं होता॥ १२॥

विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबल:।

नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि॥ १३॥

‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगरमें कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो?॥ १३॥

यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगत: खर:।

अतिवृत्तो हत: पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥ १४॥

अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रम:।

यस्य त्वं लोकनाथस्य हृत्वा भार्यां गमिष्यसि॥ १५॥

‘यदि पहले शूर्पणखाका बदला लेनेके लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खरका अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने वध किया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीरामका क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वरकी पत्नीको हर ले जाना चाहते हो?॥

क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा।

दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा॥ १६॥

‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीताको छोड़ दो, जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्निके समान भयंकर दृष्टिसे तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्रका वज्र वृत्रासुरका विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीरामकी रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी॥ १६॥

सर्पमाशीविषं बद‍्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे।

ग्रीवायां प्रतिमुक्तं च कालपाशं न पश्यसि॥ १७॥

‘तुमने अपने कपड़ेमें विषधर सर्पको बाँध लिया है, फिर भी इस बातको समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गलेमें मौतकी फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है॥ १७॥

स भार: सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्।

तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्॥ १८॥

‘सौम्य! पुरुषको उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेटमें जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे॥

यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्।

शरीरस्य भवेत् खेद: कस्तत् कर्म समाचरेत्॥ १९॥

‘जो कार्य करनेसे न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीरको खेद हो रहा हो, उस कर्मका अनुष्ठान कौन करेगा?॥ १९॥

षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।

पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठत:॥ २०॥

‘रावण! बाप-दादोंसे प्राप्त इस पक्षियोंके राज्यका विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्मसे लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये॥ २०॥

वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथ: कवची शरी।

न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥ २१॥

‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो। (मेरे पास कोई युद्धका साधन नहीं है, किंतु) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीताको लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे॥

न शक्तस्त्वं बलाद्धर्तुं वैदेहीं मम पश्यत:।

हेतुभिर्न्यायसंयुक्तैर्ध्रुवां वेदश्रुतीमिव॥ २२॥

‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीताका बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओंसे सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुतिको अपनी युक्तियोंके बलपर पलट नहीं सकता॥

युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।

शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा॥ २३॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदाके लिये सो जाओगे॥ २३॥

असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवा:।

न चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति॥ २४॥

‘जिन्होंने युद्धमें अनेक बार दैत्यों और दानवोंका वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमिमें विनाश करेंगे॥ २४॥

किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ।

क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भीतो न संशय:॥ २५॥

‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनोंसे भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखोंसे ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है॥ २५॥

नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम्।

सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥ २६॥

‘कमलके समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे॥ २६॥

अवश्यं तु मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मन:।

जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च॥ २७॥

‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथका प्रिय कार्य अवश्य करना होगा॥ २७॥

तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण।

वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात्।

युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर॥ २८॥

‘दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठलसे फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथसे नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्तिके अनुसार युद्धमें मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा—तुम्हें भलीभाँति भेंटपूजा दूँगा’॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चाश: सर्ग:॥ ५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥

 

एकपञ्चाश: सर्ग:

जटायु तथा रावणका घोर युद्ध और रावणके द्वारा जटायुका वध

इत्युक्त: क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डल:।

राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षण:॥ १॥

जटायुके ऐसा कहनेपर राक्षसराज रावण क्रोधसे आँखें लाल किये अमर्षमें भरकर उन पक्षिराजकी ओर दौड़ा। उस समय उसके कानोंमें तपाये हुए सोनेके कुण्डल झलमला रहे थे॥ १॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।

बभूव वातोद्धुतयोर्मेघयोर्गगने यथा॥ २॥

उस महासमरमें उन दोनोंका एक-दूसरेपर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाशमें वायुसे उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपसमें टकरा गये हों॥ २॥

तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।

सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव ॥ ३॥

उस समय गृध्र और राक्षसमें वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान्110 पर्वत एक-दूसरेसे भिड़ गये हों॥ ३॥

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभि:।

अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥ ४॥

रावणने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ४॥

स तानि शरजालानि गृध्र: पत्ररथेश्वर:।

जटायु: प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे॥ ५॥

पक्षिराज गृध्रजातीय जटायुने युद्धमें रावणके उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रोंका आघात सह लिया॥ ५॥

तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबल:।

चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तम:॥ ६॥

साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणिने अपने तीखे नखोंवाले पंजोंसे मार-मारकर रावणके शरीरमें बहुत-से घाव कर दिये॥ ६॥

अथ क्रोधाद् दशग्रीवो जग्राह दश मार्गणान्।

मृत्युदण्डनिभान् घोरान् शत्रोर्निधनकांक्षया॥ ७॥

तब दशग्रीवने क्रोधमें भरकर अपने शत्रुको मार डालनेकी इच्छासे दस बाण हाथमें लिये, जो कालदण्डके समान भयंकर थे॥ ७॥

स तैर्बाणैर्महावीर्य: पूर्णमुक्तैरजिह्मगै:।

बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गृध्रं घोरै: शिलीमुखै:॥ ८॥

महापराक्रमी रावणने धनुषको पूर्णत: खींचकर छोड़े गये उन सीधे जानेवाले तीखे, पैने और भयंकर बाणोंद्वारा, जिनके मुखपर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराजको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ८॥

स राक्षसरथे पश्यञ्जानकीं बाष्पलोचनाम्।

अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत्॥ ९॥

जटायुने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षसके रथपर बैठी हैं और नेत्रोंसे आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीरमें लगते हुए उन बाणोंकी परवा न करके सहसा उस राक्षसपर टूट पड़े॥ ९॥

ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।

चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तम:॥ १०॥

महातेजस्वी पक्षिराज जटायुने मोती-मणियोंसे विभूषित, बाणसहित रावणके धनुषको अपने दोनों पैरोंसे मारकर तोड़ दिया॥ १०॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय रावण: क्रोधमूर्च्छित:।

ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रश:॥ ११॥

फिर तो रावण क्रोधसे भर गया और दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणोंकी झड़ी लगा दी॥ ११॥

शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वर:।

कुलायमभिसम्प्राप्त: पक्षिवच्च बभौ तदा॥ १२॥

उस समय उस युद्धस्थलमें गृध्रराजके चारों ओर बाणोंका जाल-सा तन गया। वे उस समय घोंसलेमें बैठे हुए पक्षीके समान प्रतीत होने लगे॥ १२॥

स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।

चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनु:॥ १३॥

तब महातेजस्वी जटायुने अपने दोनों पंखोंसे ही उन बाणोंको उड़ा दिया और पंजोंकी मारसे पुन: उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ १३॥

तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम्।

पक्षाभ्यां च महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वर:॥ १४॥

रावणका कवच अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था। महातेजस्वी पक्षिराजने उसे भी पंखोंसे ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया॥ १४॥

काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान्।

तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली॥ १५॥

तत्पश्चात् उन बलवान् वीरने समराङ्गणमें पिशाचके-से मुखवाले उन वेगशाली गधोंको भी, जिनकी छातीपर सोनेके कवच बँधे हुए थे, मार डाला॥ १५॥

अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम्।

मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्॥ १६॥

तदनन्तर अग्निकी भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपानसे विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलनेवाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न111 विशाल रथको भी तोड़-फोड़ डाला॥ १६॥

पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं च व्यजनै: सह।

पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसै: सह॥ १७॥

सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन च महच्छिर:।

पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबल:॥ १८॥

इसके बाद पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित छत्र और चवँरको भी उन्हें धारण करनेवाले राक्षसोंके साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया। फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराजने बड़े वेगसे चोंच मारकर रावणके सारथिका विशाल मस्तक भी धड़से अलग कर दिया॥ १७-१८॥

स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथि:।

अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावण:॥ १९॥

इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी कालके गालमें चला गया, तब रावण सीताको गोदमें लिये-लिये पृथ्वीपर गिर पड़ा॥

दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम्।

साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन्॥ २०॥

रथ टूट जानेसे रावणको धरतीपर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराजकी प्रशंसा करने लगे॥

परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम्।

उत्पपात पुनर्हृष्टो मैथिलीं गृह्य रावण:॥ २१॥

वृद्धावस्थाके कारण पक्षिराजको थका हुआ देख रावणको बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिलीको लिये हुए फिर आकाशमें उड़ चला॥ २१॥

तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम्।

गच्छन्तं खड्गशेषं च प्रणष्टहतसाधनम्॥ २२॥

गृध्रराज: समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत्।

समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत्॥ २३॥

जनककिशोरीको गोदमें लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी। उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावणकी ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले—॥ २२-२३॥

वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण।

अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम्॥ २४॥

‘मन्दबुद्धि रावण! जिनके बाणोंका स्पर्श वज्रके समान है, उन श्रीरामकी इन धर्मपत्नी सीताको तुम अवश्य राक्षसोंके वधके लिये ही लिये जा रहे हो॥

समित्रबन्धु: सामात्य: सबल: सपरिच्छद:।

विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम्॥ २५॥

‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो॥ २५॥

अनुबन्धमजानन्त: कर्मणामविचक्षणा:।

शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि॥ २६॥

‘अपने कर्मोंका परिणाम न जाननेवाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाशके गर्तमें गिरोगे॥ २६॥

बद्धस्त्वं कालपाशेन क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे।

वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा॥ २७॥

‘तुम कालपाशमें बँध गये हो। कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे? जैसे जलमें उत्पन्न होनेवाला मत्स्य मांसयुक्त बंसीको अपने वधके लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौतके लिये ही सीताका अपहरण करते हो॥ २७॥

नहि जातु दुराधर्षौ काकुत्स्थौ तव रावण।

धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ॥ २८॥

‘रावण! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रमपर किये गये इस अपमानजनक अपराधको कभी क्षमा नहीं करेंगे॥ २८॥

यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम्।

तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवित:॥ २९॥

‘तुम कायर और डरपोक हो। तुमने जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरोंका मार्ग है। वीर पुरुष ऐसे मार्गका आश्रय नहीं लेते हैं॥ २९॥

युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।

शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा॥ ३०॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो। फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वीपर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था॥ ३०॥

परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते।

विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत्॥ ३१॥

‘विनाशके समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाशके लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्मको अपनाया है॥ ३१॥

पापानुबन्धो वै यस्य कर्मण: को नु तत् पुमान्।

कुर्वीत लोकाधिपति: स्वयंभूर्भगवानपि॥ ३२॥

‘जिस कर्मको करनेसे कर्ताका पापके फलसे सम्बन्ध होता है, उस कर्मको कौन पुरुष निश्चितरूपसे कर सकता है। लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’॥ ३२॥

एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षस:।

निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान्॥ ३३॥

तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्तत:।

अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम्॥ ३४॥

इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीवकी पीठपर बड़े वेगसे जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखोंद्वारा चारों ओरसे चीरने लगे। मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्ट हाथीके ऊपर सवार होकर उसे अंकुशसे छेद रहा हो॥ ३३-३४॥

विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन्।

केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुध:॥ ३५॥

नख, पाँख और चोंच—ये ही जटायुके हथियार थे। वे नखोंसे खरोंचते थे, पीठपर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे॥ ३५॥

स तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहुर्मुहु:।

अमर्षस्फुरितोष्ठ: सन् प्राकम्पत च राक्षस:॥ ३६॥

इस प्रकार जब गृध्रराजने बारंबार क्लेश पहुँचाया, तब राक्षस रावण काँप उठा। क्रोधके मारे उसके ओठ फड़कने लगे॥ ३६॥

सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावण:।

तलेनाभिजघानार्तो जटायुं क्रोधमूर्च्छित:॥ ३७॥

उस समय क्रोधसे भरे रावणने विदेहनन्दिनी सीताको बायीं गोदमें करके अत्यन्त पीडि़त हो जटायुपर तमाचेका प्रहार किया॥ ३७॥

जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिप:।

वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदम:॥ ३८॥

परंतु उस वारको बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायुने अपनी चोंचसे मार-मारकर रावणकी दसों बायीं भुजाओंको उखाड़ लिया॥ ३८॥

संछिन्नबाहो: सद्यो वै बाहव: सहसाभवन्।

विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगा:॥ ३९॥

उन बाँहोंके कट जानेपर बाँबीसे प्रकट होनेवाले विषकी ज्वाला-मालाओंसे युक्त सर्पोंकी भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं॥ ३९॥

तत: क्रोधाद् दशग्रीव: सीतामुत्सृज्य वीर्यवान्।

मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां च गृध्रराजमपोथयत्॥ ४०॥

तब पराक्रमी दशाननने सीताको तो छोड़ दिया और गृध्रराजको क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातोंसे मारना आरम्भ किया॥ ४०॥

ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययो:।

राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च॥ ४१॥

उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायुमें दो घड़ीतक घोर संग्राम होता रहा॥ ४१॥

तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे स रावण:।

पक्षौ पादौ च पार्श्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्॥ ४२॥

तदनन्तर रावणने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजीके लिये पराक्रम करनेवाले जटायुके दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले॥ ४२॥

स च्छिन्नपक्ष: सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा।

निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवित:॥ ४३॥

भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसके द्वारा सहसा पंख काट लिये जानेपर महागृध्र जटायु पृथ्वीपर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देरके मेहमान थे॥ ४३॥

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम्।

अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दु:खिता॥ ४४॥

अपने बान्धवके समान जटायुको खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख सीता दु:खसे व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ीं॥ ४४॥

तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं

सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम् ।

ददर्श लङ्काधिपति: पृथिव्यां

जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम्॥ ४५॥

जटायुके शरीरकी कान्ति नीले मेघके समान काली थी। उनकी छातीका रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानलके समान पृथ्वीपर पड़ गये। लङ्कापति रावणने उन्हें इस अवस्थामें देखा॥ ४५॥

ततस्तु तं पत्ररथं महीतले

निपातितं रावणवेगमर्दितम्।

पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना

रुरोद सीता जनकात्मजा तदा॥ ४६॥

तदनन्तर रावणके वेगसे रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायुको पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुन: उस समय वहाँ रोने लगीं॥ ४६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकपञ्चाश: सर्ग:॥ ५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥

 

 


द्विपञ्चाश: सर्ग:

रावणद्वारा सीताका अपहरण

सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्।

गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदु:खिता॥ १॥

रावणके द्वारा मारे गये गृध्रराजकी ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दु:खी होकर विलाप करने लगीं—॥ १॥

निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्।

अवश्यं सुखदु:खेषु नराणां परिदृश्यते॥ २॥

‘मनुष्योंको सुख-दु:खकी प्राप्तिके सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियोंके स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं॥ २॥

न नूनं राम जानासि महद‍्व्यसनमात्मन:।

धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिण:॥ ३॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरे अपहरणकी सूचना देनेके लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्गसे दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होनेपर भी अपने इस महान् संकटको अवश्य ही आप नहीं जानते हैं (क्योंकि जाननेपर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे)॥ ३॥

अयं हि कृपया राम मां त्रातुमिह संगत:।

शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगम:॥ ४॥

‘हा राम! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचानेके लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचरद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं॥

त्राहि मामद्य काकुत्स्थ लक्ष्मणेति वराङ्गना।

सुसंत्रस्ता समाक्रन्दच्छृण्वतां तु यथान्तिके॥ ५॥

‘हे राम! हे लक्ष्मण! अब आप ही दोनों मेरी रक्षा करें।’ यों कहकर अत्यन्त डरी हुई सुन्दरी सीता इस प्रकार क्रन्दन करने लगीं, जिससे निकटवर्ती देवता और मनुष्य सुन सकें॥ ५॥

तां क्लिष्टमाल्याभरणां विलपन्तीमनाथवत्।

अभ्यधावत वैदेहीं रावणो राक्षसाधिप:॥ ६॥

उनके पुष्पहार और आभूषण मसलकर छिन्न-भिन्न हो गये थे। वे अनाथकी भाँति विलाप कर रही थीं। उसी अवस्थामें राक्षसराज रावण उन विदेहकुमारी सीताकी ओर दौड़ा॥ ६॥

तां लतामिव वेष्टन्तीमालिङ्गन्तीं महाद्रुमान्।

मुञ्च मुञ्चेति बहुश: प्राप तां राक्षसाधिप:॥ ७॥

वे लिपटी हुई लताकी भाँति बड़े-बड़े वृक्षोंसे लिपट जातीं और बारंबार कहतीं—‘मुझे इस संकटसे छुड़ाओ, छुड़ाओ।’ इतनेहीमें वह निशाचरराज उनके पास जा पहुँचा॥ ७॥

क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने।

जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभ:॥ ८॥

प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम्।

जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम्॥ ९॥

वनमें श्रीरामसे रहित होकर सीताको राम-रामकी रट लगाती देख उस कालके समान विकराल राक्षसने अपने ही विनाशके लिये उनके केश पकड़ लिये। सीताका इस प्रकार तिरस्कार होनेपर समस्त चराचर जगत् मर्यादारहित तथा अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो गया॥

न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभूद् दिवाकर:।

दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा॥ १०॥

कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामह:।

वहाँ वायुकी गति रुक गयी और सूर्यकी भी प्रभा फीकी पड़ गयी। श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्य दृष्टिसे विदेहनन्दिनीका वह राक्षसके द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले—‘बस अब कार्य सिद्ध हो गया’॥ १०/

प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षय:॥ ११॥

दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिन:।

रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद‍्ध्वा यदृच्छया॥ १२॥

सीताके केशोंका खींचा जाना देखकर दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले वे सब महर्षि मन-ही-मन व्यथित हो उठे। साथ ही अकस्मात् रावणका विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ॥ ११-१२॥

स तु तां राम रामेति रुदतीं लक्ष्मणेति च।

जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वर:॥ १३॥

बेचारी सीता ‘हा राम! हा राम’ कहकर रो रही थीं। लक्ष्मणको भी पुकार रही थीं। उसी अवस्थामें राक्षसोंका राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्गसे चल दिया॥ १३॥

तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी।

रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा॥ १४॥

तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे उनका सारा अङ्ग विभूषित था। वे पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। अत: उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वतसे प्रकट हुई विद्युत्के समान प्रकाशित हो रही थीं॥ १४॥

उद्धूतेन च वस्त्रेण तस्या: पीतेन रावण:।

अधिकं परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना॥ १५॥

उनके फहराते हुए पीले वस्त्रसे उपलक्षित रावण दावानलसे उद्भासित होनेवाले पर्वतके समान अधिक शोभा पाने लगा॥ १५॥

तस्या: परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च।

पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम्॥ १६॥

उन परम कल्याणी विदेहकुमारीके अङ्गोंमें जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर-बिखरकर रावणपर गिरने लगे॥ १६॥

तस्या: कौशेयमुद्धूतमाकाशे कनकप्रभम्।

बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे॥ १७॥

आकाशमें उड़ता हुआ उनका सुवर्णके समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकालमें सूर्यकी किरणोंसे रँगे हुए ताम्रवर्णके मेघखण्डकी भाँति शोभा पाता था॥ १७॥

तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्।

न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम्॥ १८॥

आकाशमें रावणके अङ्कमें स्थित सीताका निर्मल मुख श्रीरामके बिना नालरहित कमलकी भाँति शोभित नहीं होता था॥ १८॥

बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदित:।

सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम्॥ १९॥

शुक्लै: सुविमलैर्दन्तै: प्रभावद्भिरलंकृतम्।

तस्या: सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्॥ २०॥

सुन्दर ललाट और मनोहर केशोंसे युक्त कमलके भीतरी भागके समान कान्तिमान्, चेचक आदिके दागसे रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान् दाँतोंसे अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित सीताका मुख आकाशमें रावणके अङ्कमें ऐसा जान पड़ता था मानो मेघोंकी काली घटाका भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो॥

रुदितं व्यपमृष्टास्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम्।

सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम्॥ २१॥

राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम्।

शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदित:॥ २२॥

चन्द्रमाके समान प्यारा दिखायी देनेवाला सीताका वह सुन्दर मुख तुरंतका रोया हुआ था। उसके आँसू पोंछ दिये गये थे। उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे-जैसे लाल-लाल मनोहर ओठ थे। आकाशमें वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराजके वेगपूर्वक चलनेसे उसमें कम्पन हो रहा था। इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीरामके बिना उस समय दिनमें उगे हुए चन्द्रमाके समान शोभाहीन प्रतीत होता था॥

सा हेमवर्णा नीलाङ्गं मैथिली राक्षसाधिपम्।

शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता॥ २३॥

मिथिलेशकुमारी सीताका श्रीअङ्ग सुवर्णके समान दीप्तिमान् था और राक्षसराज रावणका शरीर बिलकुल काला था। उसकी गोदमें वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथीको सोनेकी करधनी पहना दी गयी हो॥ २३॥

सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा।

विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा॥ २४॥

कमलके केसरकी भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोनेके आभूषण धारण किये रावणकी पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमालाका आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो॥ २४॥

तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वर:।

बभूव विमलो नील: सघोष इव तोयद:॥ २५॥

विदेहनन्दिनीके आभूषणोंकी झनकारसे राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघके समान प्रतीत होता था॥ २५॥

उत्तमाङ्गच्युता तस्या: पुष्पवृष्टि: समन्तत:।

सीताया ह्र‌ियमाणाया: पपात धरणीतले॥ २६॥

हरकर ले जायी जाती हुई सीताके सिरसे उनके केशोंमें गुँथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वीपर गिर रहे थे॥ २६॥

सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टि: समन्तत:।

समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत॥ २७॥

चारों ओर होनेवाली वह फूलोंकी वर्षा रावणके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशाननपर ही आकर पड़ती थी॥ २७॥

अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम्।

नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम्॥ २८॥

कुबेरके छोटे भाई रावणके ऊपर जब वह फूलोंकी धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वतपर उतरनेवाली निर्मल नक्षत्रमालाकी भाँति शोभा पाती थी॥ २८॥

चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम्।

विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले॥ २९॥

विदेहनन्दिनीका रत्नजटित नूपुर उनके एक चरणसे खिसककर विद्युन्मण्डलके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २९॥

तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम्।

प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी॥ ३०॥

वृक्षोंके नूतन पल्लवोंके समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले-कलूटे राक्षसराजको उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं, जैसे हाथीको कसनेवाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो॥ ३०॥

तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा।

जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुज:॥ ३१॥

आकाशमें अपने तेजसे बहुत बड़ी उल्काके समान प्रकाशित होनेवाली सीताको रावण आकाशमार्गका ही आश्रय ले हर ले गया॥ ३१॥

तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले।

सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात्॥ ३२॥

जानकीके शरीरपर अग्निके समान प्रकाशमान् आभूषण थे। वे उस समय खन-खनकी आवाज करते हुए एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाशसे ताराएँ टूट-टूटकर पृथ्वीपर गिर रही हों॥ ३२॥

तस्या: स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युति:।

वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता॥ ३३॥

उन विदेहनन्दिनी सीताके स्तनोंके बीचसे खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार गगनमण्डलसे उतरती हुई गङ्गाके समान प्रतीत हुआ॥ ३३॥

उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुता:।

मा भैरिति विधूताग्रा व्याजहृरिव पादपा:॥ ३४॥

रावणके वेगसे उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायुके झकोरोंसे हिलते हुए वृक्षोंपर नाना प्रकारके पक्षी कोलाहल कर रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरोंको हिला-हिलाकर संकेत करते हुए सीतासे कह रहे हैं कि ‘तुम डरो मत’॥ ३४॥

नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचरा:।

सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम्॥ ३५॥

जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीताको मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं॥ ३५॥

समन्तादभिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजा:।

अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिन:॥ ३६॥

उस सीताहरणके समय रावणपर रोष-सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओरसे सीताकी परछाहींका अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे॥ ३६॥

जलप्रपातास्रमुखा: शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभि:।

सीतायां ह्र‌ियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वता:॥ ३७॥

जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे थे॥ ३७॥

ह्र‌ियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकर:।

प्रविध्वस्तप्रभ: श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डल:॥ ३८॥

सीताका हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दु:खी हो गये। उनकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया॥ ३८॥

नास्ति धर्म: कुत: सत्यं नार्जवं नानृशंसता।

यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावण:॥ ३९॥

इति भूतानि सर्वाणि गणश: पर्यदेवयन्।

वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्मृगपोतका:॥ ४०॥

हाय! हाय! जब श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीताको रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ‘संसारमें धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है? सरलता और दयाका भी सर्वथा लोप हो गया है।’ इस प्रकार वहाँ झुंड-के-झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे। मृगोंके बच्चे भयभीत हो दीनमुखसे रो रहे थे॥ ३९-४०॥

उद्वीक्ष्योद्वीक्ष्य नयनैर्भयादिव विलक्षणै:।

सुप्रवेपितगात्राश्च बभूवुर्वनदेवता:॥ ४१॥

विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दु:खं तथा गताम्।

श्रीरामको जोर-जोरसे पुकारती और वैसे भारी दु:खमें पड़ी हुई सीताको अपनी विलक्षण आँखोंसे बारंबार देख-देखकर भयके मारे वनदेवताओंके अङ्ग थर-थर काँपने लगे॥ ४१॥

तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम्॥ ४२॥

अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम्।

स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम्।

जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम्॥ ४३॥

विदेहनन्दिनी मधुर स्वरमें ‘हा राम, हा लक्ष्मण’ की पुकार करती हुई बारंबार भूतलकी ओर देख रही थीं। उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाटकी बेंदी मिट गयी थी। वैसी अवस्थामें दशग्रीव रावण अपने ही विनाशके लिये मनस्विनी सीताको लिये जा रहा था॥ ४२-४३॥

ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता

विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली।

अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ

विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता॥ ४४॥

उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर भयके भारसे व्यथित हो उठीं। उनके मुखमण्डलकी कान्ति फीकी पड़ गयी॥ ४४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग:॥ ५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

 

त्रिपञ्चाश: सर्ग:

सीताका रावणको धिक्कारना

खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा।

दु:खिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी॥ १॥

रावणको आकाशमें उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दु:खमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भयमें पड़ गयी थीं॥ १॥

रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम्।

रुदती करुणं सीता ह्र‌ियमाणा तमब्रवीत्॥ २॥

रोष और रोदनके कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वरमें रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराजसे इस प्रकार बोलीं—

न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण।

ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥ ३॥

‘ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्मसे लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामीसे रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है?॥ ३॥

त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता।

ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया॥ ४॥

‘दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जानेकी इच्छासे तूने ही मायाद्वारा मृगरूपमें उपस्थित हो मेरे स्वामीको आश्रमसे दूर हटा दिया था॥

यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽप्ययं विनिपातित:।

गृध्रराज: पुराणोऽसौ श्वशुरस्य सखा मम॥ ५॥

‘मेरे श्वशुरके सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करनेके लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया॥

परमं खलु ते वीर्यं दृश्यते राक्षसाधम।

विश्राव्य नामधेयं हि युद्धे नास्मि जिता त्वया॥ ६॥

ईदृशं गर्हितं कर्म कथं कृत्वा न लज्जसे।

स्त्रियाश्चाहरणं नीच रहिते च परस्य च॥ ७॥

‘नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि—तू बूढ़े पक्षीको भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीराम-लक्ष्मणके साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो—ऐसे स्थानपर जाकर परायी स्त्रीके अपहरण-जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है?॥

कथयिष्यन्ति लोकेषु पुरुषा: कर्म कुत्सितम्।

सुनृशंसमधर्मिष्ठं तव शौटीर्यमानिन:॥ ८॥

‘तू तो अपनेको बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसारके सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्मको घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे॥ ८॥

धिक् ते शौर्यं च सत्त्वं च यत्त्वया कथितं तदा।

कुलाक्रोशकरं लोके धिक् ते चारित्रमीदृशम्॥ ९॥

‘तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े तावसे वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बलको धिक्कार है! कुलमें कलङ्क लगानेवाले तेरे ऐसे चरित्रको संसारमें सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा॥ ९॥

किं शक्यं कर्तुमेवं हि यज्जवेनैव धावसि।

मुहूर्तमपि तिष्ठ त्वं न जीवन् प्रतियास्यसि॥ १०॥

‘किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेगसे भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँसे जीवित नहीं लौट सकेगा॥

नहि चक्षु:पथं प्राप्य तयो: पार्थिवपुत्रयो:।

ससैन्योऽपि समर्थस्त्वं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥ ११॥

‘उन दोनों राजकुमारोंके दृष्टिपथमें आ जानेपर तू सेनाके साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता॥ ११॥

न त्वं तयो: शरस्पर्शं सोढुं शक्त: कथंचन।

वने प्रज्वलितस्येव स्पर्शमग्नेर्विहंगम:॥ १२॥

‘जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वनमें प्रज्वलित हुए दावानलका स्पर्श सहन करनेमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनोंके बाणोंका स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता॥ १२॥

साधु कृत्वाऽऽत्मन: पथ्यं साधु मां मुञ्च रावण।

मत्प्रधर्षणसंक्रुद्धो भ्रात्रा सह पतिर्मम॥ १३॥

विधास्यति विनाशाय त्वं मां यदि न मुञ्चसि।

‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कारसे कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाईके साथ चढ़ आयँगे और तेरे विनाशका उपाय करेंगे, अत: तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा॥ १३/

येन त्वं व्यवसायेन बलान्मां हर्तुमिच्छसि॥ १४॥

व्यवसायस्तु ते नीच भविष्यति निरर्थक:।

‘नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्रायसे बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा॥ १४/

नह्यहं तमपश्यन्ती भर्तारं विबुधोपमम्॥ १५॥

उत्सहे शत्रुवशगा प्राणान् धारयितुं चिरम्।

‘मैं अपने देवोपम पतिका दर्शन न पानेपर शत्रुके अधीनतामें अधिक कालतक अपने प्राणोंको नहीं धारण कर सकूँगी॥ १५/

न नूनं चात्मन: श्रेय: पथ्यं वा समवेक्षसे॥ १६॥

मृत्युकाले यथा मर्त्यो विपरीतानि सेवते।

मुमूर्षूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते॥ १७॥

‘निश्चय ही तू अपने कल्याण और हितका विचार नहीं करता है। जैसे मरनेके समय मनुष्य स्वास्थ्यके विरोधी पदार्थोंका सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्राय: सभी मरणासन्न मनुष्योंको पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है॥ १६-१७॥

पश्यामीह हि कण्ठे त्वां कालपाशावपाशितम्।

यथा चास्मिन् भयस्थाने न बिभेषि निशाचर॥ १८॥

‘निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गलेमें कालकी फाँसी पड़ चुकी है, इसीसे इस भयके स्थानपर भी तू निर्भय बना हुआ है॥ १८॥

व्यक्तं हिरण्मयांस्त्वं हि सम्पश्यसि महीरुहान्।

नदीं वैतरणीं घोरां रुधिरौघविवाहिनीम्॥ १९॥

खड्गपत्रवनं चैव भीमं पश्यसि रावण।

तप्तकाञ्चनपुष्पां च वैदूर्यप्रवरच्छदाम्॥ २०॥

द्रक्ष्यसे शाल्मलीं तीक्ष्णामायसै: कण्टकैश्चिताम्।

‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षोंको देख रहा है, रक्तका स्रोत बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदीका दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र-वनको भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्णके समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहेके काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा॥ १९-२०/

नहि त्वमीदृशं कृत्वा तस्यालीकं महात्मन:॥ २१॥

धारितुं शक्ष्यसि चिरं विषं पीत्वेव निर्घृण।

बद्धस्त्वं कालपाशेन दुर्निवारेण रावण॥ २२॥

‘निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीरामका ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्यकी भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण! तू अटल कालपाशसे बँध गया है॥ २१-२२॥

क्व गतो लप्स्यसे शर्म मम भर्तुर्महात्मन:।

निमेषान्तरमात्रेण विना भ्रातरमाहवे॥ २३॥

राक्षसा निहता येन सहस्राणि चतुर्दश।

कथं स राघवो वीर: सर्वास्त्रकुशलो बली॥ २४॥

न त्वां हन्याच्छरैस्तीक्ष्णैरिष्टभार्यापहारिणम्।

‘मेरे महात्मा पतिसे बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मणकी सहायता लिये बिना ही युद्धमें पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रोंका प्रयोग करनेमें कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नीका अपहरण करनेवाले तुझ-जैसे पापीको तीखे बाणोंद्वारा क्यों नहीं कालके गालमें भेज देंगे’॥ २३-२४/

एतच्चान्यच्च परुषं वैदेही रावणाङ्कगा।

भयशोकसमाविष्टा करुणं विललाप ह॥ २५॥

रावणके चंगुलमें फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोकसे व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत-से कठोर वचन सुनाकर करुण-स्वरमें विलाप करने लगीं॥ २५॥

तदा भृशार्तां बहु चैव भाषिणीं

विलापपूर्वं करुणं च भामिनीम्।

जहार पापस्तरुणीं विचेष्टतीं

नृपात्मजामागतगात्रवेपथु: ॥ २६॥

अत्यन्त दु:खसे आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटनेके लिये नाना प्रकारकी चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीताको वह पापी निशाचर हर ले गया। उस समय अधिक बोझके कारण उसका शरीर काँप रहा था॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिपञ्चाश: सर्ग:॥ ५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

 

चतुष्पञ्चाश: सर्ग:

सीताका पाँच वानरोंके बीच अपने भूषण और वस्त्रको गिराना, रावणका लङ्कामें पहुँचकर सीताको अन्त:पुरमें रखना तथा जनस्थानमें आठ राक्षसोंको गुप्तचरके रूपमें रहनेके लिये भेजना

ह्र‌ियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती।

ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥ १॥

रावणके द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीताको उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्गमें उन्होंने एक पर्वतके शिखरपर पाँच श्रेष्ठ वानरोंको बैठे देखा॥ १॥

तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्।

उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥ २॥

मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी।

वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥ ३॥

तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीताने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीरामको कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंगकी रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीचमें फेंक दिया॥ २-३॥

सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान्।

पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षीं नेत्रैरनिमिषैरिव॥ ४॥

विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमा:।

रावण बड़ी घबराहटमें था, इसलिये सीताके इस कार्यको वह न जान सका। वे भूरी आँखोंवाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वरसे विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीताकी ओर एकटक नेत्रोंसे देखने लगे॥ ४/

स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुख: पुरीम्॥ ५॥

जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वर:।

राक्षसराज रावण पम्पासरोवरको लाँघकर रोती हुई मैथिली सीताको साथ लिये लङ्कापुरीकी ओर चल दिया॥ ५/

तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मन:॥ ६॥

उत्सङ्गेनैव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रां महाविषाम्।

निशाचर रावण बड़े हर्षमें भरकर सीताके रूपमें अपनी मौतको ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेहीके रूपमें तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिनको ही अपनी गोदमें उठा रखा था॥ ६/

वनानि सरित: शैलान् सरांसि च विहायसा॥ ७॥

स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युत:।

वह धनुषसे छूटे हुए बाणकी तरह तीव्र गतिसे चलकर आकाशमार्गसे अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरोंको तुरंत लाँघ गया॥ ७/

तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम्॥ ८॥

सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम्।

उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकोंके निवासस्थान एवं वरुणके अक्षय गृह समुद्रको भी, जो समस्त नदियोंका आश्रय है, पार कर लिया॥ ८/

सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरग:॥ ९॥

वैदेह्यां ह्र‌ियमाणायां बभूव वरुणालय:।

विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकीका अपहरण होते समय वरुणालय समुद्रको बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतर रहनेवाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पोंकी गति रुक गयी॥ ९/

अन्तरिक्षगता वाच: ससृजुश्चारणास्तदा॥ १०॥

एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन्।

उस समय आकाशमें विचरनेवाले चारण यों बोले—‘अब दशग्रीव रावणका यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धोंने भी यही बात दुहरायी॥ १०/

स तु सीतां विचेष्टन्तीमङ्केनादाय रावण:॥ ११॥

प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मन:।

सीता छटपटा रही थीं। रावणने अपनी साकार मृत्युकी भाँति उन्हें अङ्कमें लेकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ११/

सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम्॥ १२॥

संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्त:पुरमाविशत्।

वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरीके द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरीका विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावणने अपने अन्त:पुरमें प्रवेश किया॥ १२/

तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्॥ १३॥

निदधे रावण: सीतां मयो मायामिवासुरीम्।

कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोहमें डूबी हुई थीं। रावणने उन्हें अन्त:पुरमें रख दिया, मानो मयासुरने मूर्तिमती आसुरी मायाको वहाँ स्थापित कर दिया हो112॥ १३/

अब्रवीच्च दशग्रीव: पिशाचीर्घोरदर्शना:॥ १४॥

यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मत:।

इसके बाद दशग्रीवने भयंकर आकारवाली पिशाचिनोंको बुलाकर कहा—‘(तुम सब सावधानीके साथ सीताकी रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञाके बिना सीताको देखने या इनसे मिलने न पाये॥ १४/

मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ १५॥

यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा।

‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है॥ १५/

या च वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम्॥ १६॥

अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम्।

‘तुमलोगोंमेंसे जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीतासे कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझूँगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’॥ १६/

तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्र: प्रतापवान्॥ १७॥

निष्क्रम्यान्त:पुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन्।

ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान्॥ १८॥

राक्षसियोंको वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्त:पुरसे बाहर निकला और कच्चे मांसका आहार करनेवाले आठ महापराक्रमी राक्षसोंसे तत्काल मिला॥

स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहित:।

उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यत:॥ १९॥

उनसे मिलकर ब्रह्माजीके वरदानसे मोहित हुए महापराक्रमी रावणने उनके बल और वीर्यकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १९॥

नानाप्रहरणा: क्षिप्रमितो गच्छत सत्वरा:।

जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम्॥ २०॥

‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थानको, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है॥ २०॥

तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे।

पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरत:॥ २१॥

‘वहाँके सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थानमें तुमलोग अपने ही बल-पौरुषका भरोसा करके भयको दूर हटाकर रहो॥ २१॥

बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम्।

सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकै:॥ २२॥

‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेनाके साथ महापराक्रमी खर और दूषणको बसा रखा था, किंतु वे सब-के-सब युद्धमें रामके बाणोंसे मारे गये॥ २२॥

तत: क्रोधो ममापूर्वो धैर्यस्योपरि वर्धते।

वैरं च सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम्॥ २३॥

‘इससे मेरे मनमें अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्यकी सीमासे ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये रामके साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है॥

निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपो:।

नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम्॥ २४॥

‘मैं अपने महान् शत्रुसे उस वैरका बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रुको संग्राममें मारे बिना मैं चैनसे सो नहीं सकूँगा॥ २४॥

तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषणघातिनम्।

रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धन:॥ २५॥

‘रामने खर और दूषणका वध किया है, अत: मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं रामका वध करके शान्ति पा सकूँगा॥ २५॥

जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता।

प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वत:॥ २६॥

‘जनस्थानमें रहकर तुमलोग रामचन्द्रका समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो॥ २६॥

अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरै:।

कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति॥ २७॥

‘तुम सभी निशाचर सावधानीके साथ वहाँ जाना और रामके वधके लिये सदा प्रयत्न करते रहना॥ २७॥

युष्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि।

अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिता:॥ २८॥

‘मुझे अनेक बार युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके बलका परिचय मिल चुका है; इसीलिये इस जनस्थानमें मैंने तुम्हीं लोगोंको रखनेका निश्चय किया है’॥ २८॥

तत: प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा

महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम्।

विहाय लङ्कां सहिता: प्रतस्थिरे

यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शना:॥ २९॥

रावणकी यह महान् प्रयोजनसे भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्काको छोड़कर जनस्थानकी ओर प्रस्थित हो गये॥ २९॥

ततस्तु सीतामुपलभ्य रावण:

सुसम्प्रहृष्ट: परिगृह्य मैथिलीम्।

प्रसज्य रामेण च वैरमुत्तमं

बभूव मोहान्मुदित: स रावण:॥ ३०॥

तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियोंकी देख-रेखमें सौंपकर रावणको बड़ा हर्ष हुआ। श्रीरामके साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥

 

पञ्चपञ्चाश: सर्ग:

रावणका सीताको अपने अन्त:पुरका दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जानेके लिये समझाना

संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्।

आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृत्कृत्यममन्यत॥ १॥

इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसोंको जनस्थानमें जानेकी आज्ञा दे रावणने विपरीत बुद्धिके कारण अपनेको कृतकृत्य माना॥ १॥

स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणै: प्रपीडित:।

प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टुमभित्वरन्॥ २॥

वह विदेहकुमारी सीताका स्मरण करके काम-बाणोंसे अत्यन्त पीडि़त हो रहा था; अत: उन्हें देखनेके लिये उसने बड़ी उतावलीके साथ अपने रमणीय अन्त:पुरमें प्रवेश किया॥ २॥

स प्रविश्य तु तद्वेश्म रावणो राक्षसाधिप:।

अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दु:खपरायणाम्॥ ३॥

अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्।

वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥ ४॥

मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगीं श्वभिरिवावृताम्।

उस भवनमें प्रवेश करके राक्षसोंके राजा रावणने देखा कि सीता राक्षसियोंके बीचमें बैठकर दु:खमें डूबी हुई हैं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और वे शोकके दुस्सह भारसे अत्यन्त पीडि़त एवं दीन हो वायुके वेगसे आक्रान्त हो समुद्रमें डूबती हुई नौकाके समान जान पड़ती हैं। मृगोंके यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंसे घिरी हुई अकेली हरिणीके समान दिखायी देती हैं॥ ३-४/

अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचर:॥ ५॥

तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिप:।

सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥ ६॥

शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीताके पास पहुँचकर राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृहके समान सुन्दर भवनका दर्शन कराया॥ ५-६॥

हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम्।

नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम्॥ ७॥

वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानोंसे भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जातिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकारके रत्न उस अन्त:पुरकी शोभा बढ़ाते थे॥ ७॥

दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा।

वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोरमै:॥ ८॥

उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटित होनेके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥ ८॥

दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम्।

सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह॥ ९॥

उस महलमें दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष होता रहता था। उस अन्त:पुरको तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे सजाया गया था। रावण सीताको साथ लेकर सोनेकी बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा॥ ९॥

दान्तका राजताश्चैव गवाक्षा: प्रियदर्शना:।

हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तय:॥ १०॥

वहाँ हाथीदाँत और चाँदीकी बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोनेकी जालियोंसे ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं॥ १०॥

सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वश:।

दशग्रीव: स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम्॥ ११॥

उस महलमें जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्खी-चूनाके पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीवने अपने महलकी वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं॥ ११॥

दीर्घिका: पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृता:।

रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम्॥ १२॥

रावणने बहुत-सी बावडि़याँ और भाँति-भाँतिके फूलोंसे आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीताको दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोकमें डूब गयीं॥ १२॥

दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम्।

उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया॥ १३॥

वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभानेकी इच्छासे इस प्रकार बोला—॥ १३॥

दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापरा:।

वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान्॥ १४॥

तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम्।

सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुर:सरम्॥ १५॥

‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरोंको छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करनेवाले इन सभी राक्षसोंका मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवामें एक हजार राक्षस रहते हैं॥ १४-१५॥

यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।

जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी॥ १६॥

‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुमपर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणोंमें समर्पित है)। तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो॥ १६॥

बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रह:।

तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये॥ १७॥

‘सीते! मेरा अन्त:पुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओंसे भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ॥ १७॥

साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम।

भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ १८॥

‘मेरे इस हितकर वचनको मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचारको मनमें लानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीडि़त हूँ, मुझपर कृपा करो॥ १८॥

परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना।

नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरै:॥ १९॥

‘समुद्रसे घिरी हुई इस लङ्काके राज्यका विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते॥ १९॥

न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु।

अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत्॥ २०॥

‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा ऋषियोंमें भी मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रममें मेरी समानता कर सके॥ २०॥

राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना।

किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा॥ २१॥

‘राम तो राज्यसे भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलनेवाले और मनुष्य होनेके कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी?॥ २१॥

भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव।

यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह॥ २२॥

‘सीते! मुझको ही अपनाओ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु! जवानी सदा रहनेवाली नहीं है, अत: यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो॥ २२॥

दर्शने मा कृथा बुंद्ध‌ि राघवस्य वरानने।

कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथै:॥ २३॥

‘वरानने! सीते! अब तुम रामके दर्शनका विचार छोड़ दो। इस राममें इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँतक आनेका मनोरथ भी कर सके॥ २३॥

न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धुं महाजव:।

दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमला: शिखा:॥ २४॥

‘आकाशमें महान् वेगसे बहनेवाली वायुको रस्सियोंमें नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्निकी निर्मल ज्वालाओंको हाथोंसे नहीं पकड़ा जा सकता॥ २४॥

त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने।

विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम्॥ २५॥

‘शोभने! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो मेरी भुजाओंसे सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँसे ले जा सके॥ २५॥

लङ्काया: सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय।

त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम्॥ २६॥

‘लङ्काके इस विशाल राज्यका तुम्हीं पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस,देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे॥ २६॥

अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च।

दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम्॥ २७॥

यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नुहि।

‘स्नानके जलसे आर्द्र (अथवा लङ्काके राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जलसे आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोदमें लगाओ। तुम्हारा पहलेका जो दुष्कर्म था, वह वनवासका कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो॥ २७/

इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि॥ २८॥

भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह।

‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकारके पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदिका सेवन करो॥ २८/

पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे॥ २९॥

विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे।

विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम्॥ ३०॥

तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम्।

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेरका था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मनके समान वेगसे चलनेवाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो॥ २९-३०/

वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम्॥ ३१॥

शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने।

‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमलके समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देनेवाला मुख शोकसे पीडि़त होनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है’॥ ३१/

एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना॥ ३२॥

पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत्।

जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमाके समान मनोहर अपने मुखको आँचलसे ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं॥ ३२/

ध्यायन्तीं तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम्॥ ३३॥

उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचर:।

सीता शोकसे अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्तासे उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान् रामका ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्थामें उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला—॥ ३३/

अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते॥ ३४॥

आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति।

‘विदेहनन्दिनि! अपने पतिके त्याग और परपुरुषके अङ्गीकारसे जो धर्मलोपकी आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद्वारा113 समर्थित है॥ ३४/

एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभि: परिपीडितौ॥ ३५॥

प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।

‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणोंपर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ॥ ३५/

इमा: शून्या मया वाच: शुष्यमाणेन भाषिता:॥ ३६॥

न चापि रावण: कांचिन्मूर्ध्ना स्त्रीं प्रणमेत ह।

‘मैंने कामाग्निसे संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्रीको सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’॥ ३६/

एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिलीं जनकात्मजाम्।

कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते॥ ३७॥

मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर कालके वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाश: सर्ग:॥ ५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥

 


षट्पञ्चाश: सर्ग:

सीताका श्रीरामके प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावणको फटकारना तथा रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका उन्हें अशोकवाटिकामें ले जाकर डराना

सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता।

तृणमन्तरत: कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत॥ १॥

रावणके ऐसा कहनेपर शोकसे कष्ट पाती हुई विदेह-राजकुमारी सीता बीचमें तिनकेकी ओट करके उस निशाचरसे निर्भय होकर बोलीं—॥ १॥

राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचल:।

सत्यसंध: परिज्ञातो यस्य पुत्र: स राघव:॥ २॥

रामो नाम स धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुत:।

दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं स पतिर्मम॥ ३॥

‘महाराज दशरथ धर्मके अचल सेतुके समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञताके लिये सर्वत्र विख्यात थे। उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापनके लिये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं॥ २-३॥

इक्ष्वाकूणां कुले जात: सिंहस्कन्धो महाद्युति:।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति॥ ४॥

‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है। उनके कंधे सिंहके समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ आकर तेरे प्राणोंका विनाश कर डालेंगे॥ ४॥

प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात्।

शयिता त्वं हत: संख्ये जनस्थाने यथा खर:॥ ५॥

‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खरकी तरह जनस्थानके युद्धस्थलमें ही मारा जाकर सदाके लिये सो जाता॥ ५॥

य एते राक्षसा: प्रोक्ता घोररूपा महाबला:।

राघवे निर्विषा: सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा॥ ६॥

‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसोंकी चर्चा की है, श्रीरामके पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़के पास सारे सर्प विषके प्रभावसे रहित हो जाते हैं॥ ६॥

तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शरा: काञ्चनभूषणा:।

शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मय:॥ ७॥

‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गाकी लहरें अपने कगारोंको काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके धनुषकी डोरीसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीरको छिन्न-भिन्न कर डालेंगे॥ ७॥

असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण।

उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य न मोक्ष्यसे॥ ८॥

‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओंसे यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीरामके साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा॥ ८॥

स ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली।

पशोर्यूपगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम्॥ ९॥

‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवनका अन्त कर डालेंगे। यूपमें बँधे हुए पशुकी भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा॥ ९॥

यदि पश्येत् स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा।

रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथ:॥ १०॥

‘राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टिसे तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्करने कामदेवको भस्म किया था॥ १०॥

यश्चन्द्रं नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा।

सागरं शोषयेद् वापि स सीतां मोचयेदिह॥ ११॥

‘जो चन्द्रमाको आकाशसे पृथ्वीपर गिराने या नष्ट करनेकी शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्रको भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीताको भी छुड़ा सकते हैं॥ ११॥

गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रिय:।

लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वत्कृतेन भविष्यति॥ १२॥

‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियोंका भी नाश हो गया तथा तेरे ही पापके कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी॥ १२॥

न ते पापमिदं कर्म सुखोदर्कं भविष्यति।

याहं नीता विनाभावं पतिपार्श्वात् त्वया बलात्॥ १३॥

‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्यमें सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पतिके पाससे दूर हटाया है॥ १३॥

स हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युति:।

निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके॥ १४॥

‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवरके साथ अपने ही पराक्रमका भरोसा करके सूने दण्डकारण्यमें निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं॥ १४॥

स ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं च तथाविधम्।

अपनेष्यति गात्रेभ्य: शरवर्षेण संयुगे॥ १५॥

‘वे युद्धमें बाणोंकी वर्षा करके तेरे शरीरसे बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरणको भी निकाल बाहर करेंगे॥ १५॥

यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदित:।

तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नरा: कालवशं गता:॥ १६॥

‘जब कालकी प्रेरणासे प्राणियोंका विनाश निकट आता है, उस समय मृत्युके अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्यमें प्रमाद करने लगते हैं॥ १६॥

मां प्रधृष्य स ते काल: प्राप्तोऽयं राक्षसाधम।

आत्मनो राक्षसानां च वधायान्त:पुरस्य च॥ १७॥

‘अधम निशाचर! मेरा अपहरण करनेके कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसोंके लिये तथा इस अन्त:पुरके लिये भी विनाशकी घड़ी निकट आ गयी है॥ १७॥

न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदि: स्रुग्भाण्डमण्डिता।

द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम्॥ १८॥

‘यज्ञशालाके बीचकी वेदीपर, जो द्विजातियोंके मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता॥ १८॥

तथाहं धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता।

त्वया स्प्रष्टुं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना॥ १९॥

‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीरामकी धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्मका पालन करती हूँ (अत: यज्ञवेदीके समान हूँ) और राक्षसाधम! तू महापापी है (अत: चाण्डालके तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता॥ १९॥

क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यश:।

हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम्॥ २०॥

‘जो सदा कमलके समूहोंमें राजहंसके साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणोंमें रहनेवाले जलकाककी ओर कैसे दृष्टिपात करेगी॥ २०॥

इदं शरीरं नि:संज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा।

नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस॥ २१॥

‘राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीरको बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवनको नहीं रखना चाहती॥ २१॥

न तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मन:।

एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वच:॥ २२॥

रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन।

‘मैं इस भूतलपर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देनेवाला कोई कार्य नहीं कर सकती।’ रावणसे क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं॥ २२/

सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम्॥ २३॥

प्रत्युवाच तत: सीतां भयसंदर्शनं वच:।

सीताका वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसे सुनकर रावणने उनसे भय दिखानेवाली बात कही—॥ २३/

शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि॥ २४॥

कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि।

ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशश:॥ २५॥

‘मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीनेका समय देता हूँ। इतने समयमें यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरेका कलेवा तैयार करनेके लिये तुम्हारे शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’॥

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावण: शत्रुरावण:।

राक्षसीश्च तत: क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥ २६॥

सीतासे ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओंको रुलानेवाला रावण कुपित हो राक्षसियोंसे इस प्रकार बोला—॥ २६॥

शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शना:।

दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजना:॥ २७॥

‘अपने विकराल रूपके कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त-मांसका आहार करनेवाली राक्षसियो! तुमलोग शीघ्र ही इस सीताका अहंकार दूर करो’॥ २७॥

वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शना:।

कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिलीं पर्यवारयन्॥ २८॥

रावणके इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देनेवाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिलीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥ २८॥

स ता: प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शना:।

प्रचल्य चरणोत्कर्षैर्दारयन्निव मेदिनीम्॥ २९॥

तब राजा रावण अपने पैरोंके धमाकेसे पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियोंसे बोला—॥ २९॥

अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति।

तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभि: परिवारिता॥ ३०॥

‘निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीताको अशोकवाटिकामें ले जाओ और चारों ओरसे घेरकर वहाँ गूढ़ भावसे इसकी रक्षा करती रहो॥ ३०॥

तत्रैनां तर्जनैर्घोरै: पुन: सान्त्वैश्च मैथिलीम्।

आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव॥ ३१॥

‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनोंसे समझा-बुझाकर जंगलकी हथिनीकी भाँति इस मिथिलेशकुमारीको तुम सब लोग वशमें लानेकी चेष्टा करना’॥ ३१॥

इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ता:।

अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिलीं परिगृह्य तु॥ ३२॥

रावणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षसियाँ मैथिलीको साथ लेकर अशोकवाटिकामें चली गयीं॥

सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम् ।

सर्वकालमदैश्चापि द्विजै: समुपसेविताम्॥ ३३॥

वह वाटिका समस्त कामनाओंको फलरूपमें प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँतिके फल-फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षोंसे भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहनेवाले पक्षी उसमें निवास करते थे॥ ३३॥

सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा।

राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा॥ ३४॥

परंतु वहाँ जानेपर मिथिलेशकुमारी जानकीके अङ्ग-अङ्गमें शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियोंके वशमें पड़कर उनकी दशा बाघिनोंके बीचमें घिरी हुई हरिणीके समान हो गयी थी॥ ३४॥

शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा।

न शर्म लभते भीरु: पाशबद्धा मृगी यथा॥ ३५॥

महान् शोकसे ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जालमें फँसी हुई मृगीके समान भयभीत हो क्षणभरके लिये भी चैन नहीं पाती थीं॥ ३५॥

न विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली

विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता।

पतिं स्मरन्ती दयितं च देवरं

विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता॥ ३६॥

विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियोंकी अत्यन्त डाँट-फटकार सुननेके कारण मिथिलेशकुमारी सीताको वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोकसे पीडि़त हो प्रियतम पति और देवरका स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं॥ ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥

 

प्रक्षिप्त: सर्ग:114

ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवराज इन्द्रका निद्रासहित लङ्कामें जाकर सीताको दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना

प्रवेशितायां सीतायां लङ्कां प्रति पितामह:।

तदा प्रोवाच देवेन्द्रं परितुष्टं शतक्रतुम्॥ १॥

जब सीताका लङ्कामें प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजीने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

त्रैलोक्यस्य हितार्थाय रक्षसामहिताय च।

लङ्कां प्रवेशिता सीता रावणेन दुरात्मना॥ २॥

‘देवराज! तीनों लोकोंके हित और राक्षसोंके विनाशके लिये दुरात्मा रावणने सीताको लङ्कामें पहुँचा दिया॥ २॥

पतिव्रता महाभागा नित्यं चैव सुखैधिता।

अपश्यन्ती च भर्तारं पश्यन्ती राक्षसीजनम्॥ ३॥

राक्षसीभि: परिवृता भर्तृदर्शनलालसा।

‘पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुखमें ही पली हैं। इस समय वे अपने पतिके दर्शनसे वंचित हो गयी हैं और राक्षसियोंसे घिरी रहनेके कारण सदा उन्हींको अपने सामने देखती हैं। उनके हृदयमें अपने पतिके दर्शनकी तीव्र लालसा बनी हुई है॥ ३/

निविष्टा हि पुरी लङ्का तीरे नदनदीपते:॥ ४॥

कथं ज्ञास्यति तां रामस्तत्रस्थां तामनिन्दिताम्।

‘लङ्कापुरी समुद्रके तटपर बसी हुई है। वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीताका पता श्रीरामचन्द्रजीको कैसे लगेगा॥ ४/

दु:खं संचिन्तयन्ती सा बहुश: परिदुर्लभा॥ ५॥

प्राणयात्रामकुर्वाणा प्राणांस्त्यक्ष्यत्यसंशयम्।

स भूय: संशयो जात: सीताया: प्राणसंक्षये॥ ६॥

‘सीता दु:खके साथ नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबी रहती हैं। पतिके लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं। प्राणयात्रा (भोजन) नहीं करती हैं; अत: ऐसी दशामें नि:संदेह वे अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगी। सीताके प्राणोंका क्षय हो जानेपर हमारे उद्देश्यकी सिद्धिमें पुन: पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा॥ ५-६॥

स त्वं शीघ्रमितो गत्वा सीतां पश्य शुभाननाम्।

प्रविश्य नगरीं लङ्कां प्रयच्छ हविरुत्तमम्॥ ७॥

‘अत: तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरीमें प्रवेश करके सुमुखी सीतासे मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो’॥ ७॥

एवमुक्तोऽथ देवेन्द्र: पुरीं रावणपालिताम्।

आगच्छन्निद्रया सार्धं भगवान् पाकशासन:॥ ८॥

ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्राको साथ लेकर रावणद्वारा पालित लङ्कापुरीमें आये॥ ८॥

निद्रां चोवाच गच्छ त्वं राक्षसान् सम्प्रमोहय।

सा तथोक्ता मघवता देवी परमहर्षिता॥ ९॥

देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं प्रामोहयत राक्षसान्।

वहाँ आकर इन्द्रने निद्रासे कहा—‘तुम राक्षसोंको मोहित करो।’ इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्होंने राक्षसोंको मोह (निद्रा) में डाल दिया॥ ९/

एतस्मिन्नन्तरे देव: सहस्राक्ष: शचीपति:॥ १०॥

आससाद वनस्थां तां वचनं चेदमब्रवीत्।

इसी बीचमें सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिकामें बैठी हुई सीताके पास गये और इस प्रकार बोले—॥ १०/

देवराजोऽस्मि भद्रं ते इह चास्मि शुचिस्मिते॥ ११॥

अहं त्वां कार्यसिद्ध्यर्थं राघवस्य महात्मन:।

साहाय्यं कल्पयिष्यामि मा शुचो जनकात्मजे॥ १२॥

‘पवित्र मुसकानवाली देवि! आपका भला हो। मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ। जनककिशोरी! मैं आपके उद्धारकार्यकी सिद्धिके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीकी सहायता करूँगा, अत: आप शोक न करें॥ ११-१२॥

मत्प्रसादात् समुद्रं स तरिष्यति बलै: सह।

मयैवेह च राक्षस्यो मायया मोहिता: शुभे॥ १३॥

‘वे मेरे प्रसादसे बड़ी भारी सेनाके साथ समुद्रको पार करेंगे। शुभे! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियोंको अपनी मायासे मोहित किया है॥ १३॥

तस्मादन्नमिदं सीते हविष्यान्नमहं स्वयम्।

स त्वां संगृह्य वैदेहि आगत: सह निद्रया॥ १४॥

‘विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन—यह हविष्यान्न लेकर निद्राके साथ तुम्हारे पास आया हूँ॥ १४॥

एतदत्स्यसि मद्धस्तान्न त्वां बाधिष्यते शुभे।

क्षुधा तृषा च रम्भोरु वर्षाणामयुतैरपि॥ १५॥

‘शुभे! रम्भोरु! यदि मेरे हाथसे इस हविष्यको लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षोंतक भूख और प्यास नहीं सतायेगी’॥ १५॥

एवमुक्ता तु देवेन्द्रमुवाच परिशङ्किता।

कथं जानामि देवेन्द्रं त्वामिहस्थं शचीपतिम्॥ १६॥

देवराजके ऐसा कहनेपर शङ्कित हुई सीताने उनसे कहा—‘मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं?॥ १६॥

देवलिङ्गानि दृष्टानि रामलक्ष्मणसंनिधौ।

तानि दर्शय देवेन्द्र यदि त्वं देवराट् स्वयम्॥ १७॥

‘देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप देवताओंके लक्षण अपनी आँखों देखे हैं। यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणोंको दिखाइये’॥ १७॥

सीताया वचनं श्रुत्वा तथा चक्रे शचीपति:।

पृथिवीं नास्पृशत् पद्भ्यामनिमेषेक्षणानि च॥ १८॥

अरजोऽम्बरधारी च न म्लानकुसुमस्तथा।

तं ज्ञात्वा लक्षणै: सीता वासवं परिहर्षिता॥ १९॥

सीताकी यह बात सुनकर शचीपति इन्द्रने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया—आकाशमें निराधार खड़े रहे। उनकी आँखोंकी पलकें नहीं गिरती थीं। उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उसपर धूलका स्पर्श नहीं होता था। उनके कण्ठमें जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणोंसे इन्द्रको पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं॥ १८-१९॥

उवाच वाक्यं रुदती भगवन् राघवं प्रति।

सह भ्रात्रा महाबाहुर्दिष्ट्या मे श्रुतिमागत:॥ २०॥

वे भगवान् श्रीरामके लिये रोती हुई बोलीं—‘भगवन्! सौभाग्यकी बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीरामका नाम मेरे कानोंमें पड़ा है॥ २०॥

यथा मे श्वशुरो राजा यथा च मिथिलाधिप:।

तथा त्वामद्य पश्यामि सनाथो मे पतिस्त्वया॥ २१॥

‘मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूपमें मैं आज आपको देखती हूँ। मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं॥ २१॥

तवाज्ञया च देवेन्द्र पयोभूतमिदं हवि:।

अशिष्यामि त्वया दत्तं रघूणां कुलवर्धनम्॥ २२॥

‘देवेन्द्र! आपकी आज्ञासे मैं यह पायसरूप हविष्य (दूधकी बनी हुई खीर), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी। यह रघुकुलकी वृद्धि करनेवाला हो’॥ २२॥

इन्द्रहस्ताद् गृहीत्वा तत् पायसं सा शुचिस्मिता।

न्यवेदयत भर्त्रे सा लक्ष्मणाय च मैथिली॥ २३॥

इन्द्रके हाथसे उस खीरको लेकर उन पवित्र मुसकानवाली मैथिलीने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मणको निवेदन किया और इस प्रकार कहा—॥ २३॥

यदि जीवति मे भर्ता सह भ्रात्रा महाबल:।

इदमस्तु तयोर्भक्त्या तदाश्नात् पायसं स्वयम्॥ २४॥

‘यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाईके साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभावसे उन दोनोंके लिये समर्पित है।’ इतना कहनेके पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीरको खाया॥ २४॥

इतीव तत् प्राश्य हविर्वरानना

जहौ क्षुधादु:खसमुद्भवं च तम्।

इन्द्रात् प्रवृत्तिम् उपलभ्य जानकी

काकुत्स्थयो: प्रीतमना बभूव॥ २५॥

इस प्रकार उस हविष्यको खाकर सुन्दर मुखवाली जानकीने भूख-प्यासके कष्टको त्याग दिया और इन्द्रके मुखसे श्रीराम तथा लक्ष्मणका समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं॥ २५॥

स चापि शक्रस्त्रिदिवालयं तदा

प्रीतो ययौ राघवकार्यसिद्धये।

आमन्त्र्य सीतां स ततो महात्मा

जगाम निद्रासहित: स्वमालयम्॥ २६॥

तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीतासे विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निवासस्थान देवलोकको चले गये॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रक्षिप्त: सर्ग:॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ॥

 

सप्तपञ्चाश: सर्ग:

श्रीरामका लौटना, मार्गमें अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मणसे मिलनेपर उन्हें उलाहना दे सीतापर सङ्कट आनेकी आशङ्का करना

राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम्।

निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत॥ १॥

इधर मृगरूपसे विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मारीचका वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रमके मार्गपर लौटे॥ १॥

तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टुकामस्य मैथिलीम्।

क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठत:॥ २॥

वे सीताको देखनेके लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतनेहीमें पीछेकी ओरसे एक सियारिन बड़े कठोर स्वरमें चीत्कार करने लगी॥ २॥

स तस्य स्वरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम्।

चिन्तयामास गोमायो: स्वरेण परिशङ्कित:॥ ३॥

गीदड़ीके उस स्वरसे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ३॥

अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा।

स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना॥ ४॥

वे मन-ही-मन कहने लगे—‘यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी। क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशलसे होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये?॥

मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम्।

विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मण: शृणुयाद् यदि॥ ५॥

‘मृगरूपधारी मारीचने जान-बूझकर मेरे स्वरका अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें॥ ५॥

स सौमित्रि: स्वरं श्रुत्वा तां च हित्वाथ मैथिलीम्।

तयैव प्रहित: क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति॥ ६॥

‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीताके ही भेजनेपर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचनेके लिये चल देंगे॥ ६॥

राक्षसै: सहितैर्नूनं सीताया ईप्सितो वध:।

काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम्॥ ७॥

दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहत:।

हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यद्वाक्यं व्याजहार ह॥ ८॥

‘राक्षसलोग तो सब-के-सब मिलकर सीताका वध अवश्य कर देना चाहते हैं। इसी उद्देश्यसे यह मारीच राक्षस सोनेका मृग बनकर मुझे आश्रमसे दूर हटा ले आया था और मेरे बाणोंसे आहत होनेपर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था॥ ७-८॥

अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने।

जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसै:॥ ९॥

‘वनमें हम दोनों भाइयोंके आश्रमसे अलग हो जानेपर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थानमें जो राक्षसोंका संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं॥ ९॥

निमित्तानि च घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च।

इत्येवं चिन्तयन् राम: श्रुत्वा गोमायुनि:स्वनम्॥ १०॥

निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान्।

‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं।’ सियारिनकी बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रमकी ओर चले॥ १०/

आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा॥ ११॥

आजगाम जनस्थानं राघव: परिशङ्कित:।

मृगरूपधारी राक्षसके द्वारा अपनेको आश्रमसे दूर हटानेकी घटनापर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कितहृदयसे जनस्थानको आये॥ ११/

तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिण:॥ १२॥

सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजु: स्वरान्।

उनका मन बहुत दु:खी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्थामें वनके मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वरमें अपनी बोली बोलने लगे॥

तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघव:।

न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मन:॥ १३॥

उन महाभयङ्कर अपशकुनोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेगसे अपने आश्रमकी ओर लौटे॥ १३॥

ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम्।

ततोऽविदूरे रामेण समीयाय स लक्ष्मण:॥ १४॥

इतनेहीमें उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देरमें निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीसे मिले॥ १४॥

विषण्ण: सन् विषण्णेन दु:खितो दु:खभागिना।

स जगर्हेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम्॥ १५॥

विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते।

दु:ख और विषादमें डूबे हुए लक्ष्मणने दु:खी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट की। उस समय राक्षसोंसे सेवित निर्जन वनमें सीताको अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मणको देख भाई श्रीरामने उनकी निन्दा की॥ १५/

गृहीत्वा च करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दन:॥ १६॥

उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत्।

लक्ष्मणका बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त-से हो गये और पहले कठोर तथा अन्तमें मधुर वाणीद्वारा इस प्रकार बोले—॥ १६/

अहो लक्ष्मण गर्ह्यं ते कृतं यत् त्वं विहाय ताम्॥ १७॥

सीतामिहागत: सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति।

‘अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीताको अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी?॥ १७/

न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा॥ १८॥

विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभि:।

‘वीर! मुझे इस बातमें संदेह नहीं है कि वनमें विचरनेवाले राक्षसोंने जनककुमारी सीताको या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे॥

अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे॥ १९॥

अपि लक्ष्मण सीताया: सामग्र्यं प्राप्नुयामहे।

जीवन्त्या: पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै॥ २०॥

‘क्योंकि मेरे आस-पास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण! क्या हमलोग जीती-जागती हुई जनकदुलारी सीताको पूर्णत: स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे?॥ १९-२०॥

यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम्।

वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम्।

अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल॥ २१॥

‘महाबली लक्ष्मण! ये मृगोंके झुंड (दाहिनी ओरसे आकर) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें पक्षी जिस तरहकी बोली बोल रहे हैं—इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशलसे हों॥ २१॥

इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं

प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम्।

हतं कथंचिन्महता श्रमेण

स राक्षसोऽभून्म्रियमाण एव॥ २२॥

‘यह राक्षस मृगके समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था। महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया॥

मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं

चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम्।

असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता

हृता मृता वा पथि वर्तते वा॥ २३॥

‘लक्ष्मण! अत: मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, नि:संदेह आश्रमपर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा (किसी राक्षसके साथ) मार्गमें होगी’॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

 

अष्टपञ्चाश: सर्ग:

मार्गमें अनेक प्रकारकी आशङ्का करते हुए लक्ष्मणसहित श्रीरामका आश्रममें आना और वहाँ सीताको न पाकर व्यथित होना

स दृष्ट्वा लक्ष्मणं दीनं शून्यं दशरथात्मज:।

पर्यपृच्छत धर्मात्मा वैदेहीमागतं विना॥ १॥

लक्ष्मणको दीन, संतोषशून्य तथा सीताको साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीरामने पूछा—॥ १॥

प्रस्थितं दण्डकारण्यं या मामनुजगाम ह।

क्व सा लक्ष्मण वैदेही यां हित्वा त्वमिहागत:॥ २॥

‘लक्ष्मण! जो दण्डकारण्यकी ओर प्रस्थित होनेपर अयोध्यासे मेरे पीछे-पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है?॥ २॥

राज्यभ्रष्टस्य दीनस्य दण्डकान् परिधावत:।

क्व सा दु:खसहाया मे वैदेही तनुमध्यमा॥ ३॥

‘मैं राज्यसे भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्यमें चक्कर लगा रहा हूँ। इस दु:खमें जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा (सूक्ष्मकटिप्रदेशवाली) विदेहराजकुमारी कहाँ है?॥ ३॥

यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम्।

क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा॥ ४॥

‘वीर! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणोंकी सहचरी है, वह देवकन्याके समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है?॥

पतित्वममराणां हि पृथिव्याश्चापि लक्ष्मण।

विना तां तपनीयाभां नेच्छेयं जनकात्मजाम्॥ ५॥

‘लक्ष्मण! तपाये हुए सोनेके समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीताके बिना मैं पृथ्वीका राज्य और देवताओंका आधिपत्य भी नहीं चाहता॥ ५॥

कच्चिज्जीवति वैदेही प्राणै: प्रियतरा मम।

कच्चित् प्रव्राजनं वीर न मे मिथ्या भविष्यति॥ ६॥

‘वीर! जो मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वनमें आना सीताको खो देनेके कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा?॥ ६॥

सीतानिमित्तं सौमित्रे मृते मयि गते त्वयि।

कच्चित् सकामा कैकेयी सुखिता सा भविष्यति॥ ७॥

‘सुमित्रानन्दन! सीताके नष्ट हो जानेके कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्याको लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफलमनोरथ एवं सुखी होगी?॥

सपुत्रराज्यां सिद्धार्थां मृतपुत्रा तपस्विनी।

उपस्थास्यति कौसल्या कच्चित् सौम्येन कैकयीम्॥ ८॥

‘जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौसल्या क्या पुत्र और राज्यसे सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई कैकेयीकी सेवामें विनीतभावसे उपस्थित होगी?॥ ८॥

यदि जीवति वैदेही गमिष्याम्याश्रमं पुन:।

संवृत्ता यदि वृत्ता सा प्राणांस्त्यक्ष्यामि लक्ष्मण॥ ९॥

‘लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रममें पैर रखूँगा। यदि सदाचार-परायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणोंका परित्याग कर दूँगा॥ ९॥

यदि मामाश्रमगतं वैदेही नाभिभाषते।

पुर: प्रहसिता सीता विनशिष्यामि लक्ष्मण॥ १०॥

‘लक्ष्मण! यदि आश्रममें जानेपर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुखसे सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा॥ १०॥

ब्रूहि लक्ष्मण वैदेही यदि जीवति वा न वा।

त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी॥ ११॥

‘लक्ष्मण! बोलो तो सही! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होनेके कारण राक्षस उस तपस्विनीको खा तो नहीं गये?॥ ११॥

सुकुमारी च बाला च नित्यं चादु:खभागिनी।

मद्वियोगेन वैदेही व्यक्तं शोचति दुर्मना:॥ १२॥

‘जो सुकुमारी है, बाला (भोली-भाली) है तथा जिसने वनवासके पहले दु:खका अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोगसे व्यथित-चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी॥ १२॥

सर्वथा रक्षसा तेन जिह्मेन सुदुरात्मना।

वदता लक्ष्मणेत्युच्चैस्तवापि जनितं भयम्॥ १३॥

‘उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षसने उच्च स्वरसे ‘हा लक्ष्मण!’ ऐसा पुकारकर तुम्हारे मनमें भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया॥ १३॥

श्रुतश्च मन्ये वैदेह्या स स्वर: सदृशो मम।

त्रस्तया प्रेषितस्त्वं च द्रष्टुं मां शीघ्रमागत:॥ १४॥

‘जान पड़ता है, वैदेहीने भी मेरे स्वरसे मिलता-जुलता उस राक्षसका स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखनेके लिये चले आये॥ १४॥

सर्वथा तु कृतं कष्टं सीतामुत्सृजता वने।

प्रतिकर्तुं नृशंसानां रक्षसां दत्तमन्तरम्॥ १५॥

‘जो भी हो—तुमने वनमें सीताको अकेली छोड़कर सर्वथा दु:खद कार्य कर डाला। क्रूर कर्म करनेवाले राक्षसोंको बदला लेनेका अवसर दे दिया॥ १५॥

दु:खिता: खरघातेन राक्षसा: पिशिताशना:।

तै: सीता निहता घोरैर्भविष्यति न संशय:॥ १६॥

‘मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खरके मारे जानेसे बहुत दु:खी थे। उन घोर राक्षसोंने सीताको मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है॥ १६॥

अहोऽस्मि व्यसने मग्न: सर्वथा रिपुनाशन।

किं त्विदानीं करिष्यामि शङ्के प्राप्तव्यमीदृशम्॥ १७॥

‘शत्रुनाशन! मैं सर्वथा संकटके समुद्रमें डूब गया हूँ। ऐसे दु:खका अवश्य ही अनुभव करना पड़ेगा—ऐसी शङ्का हो रही है। अत: अब मैं क्या करूँ?’॥ १७॥

इति सीतां वरारोहां चिन्तयन्नेव राघव:।

आजगाम जनस्थानं त्वरया सहलक्ष्मण:॥ १८॥

इस प्रकार सुन्दरी सीताके विषयमें चिन्ता करते हुए ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थानमें आये॥ १८॥

विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपं

क्षुधाश्रमेणैव पिपासया च।

विनि:श्वसन् शुष्कमुखो विषण्ण:

प्रतिश्रयं प्राप्य समीक्ष्य शून्यम्॥ १९॥

अपने दु:खी अनुज लक्ष्मणको कोसते एवं भूख-प्यास तथा परिश्रमसे लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रमके निकटवर्ती स्थानपर आकर उसे सूना देख विषादमें डूब गये॥ १९॥

स्वमाश्रमं स प्रविगाह्य वीरो

विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित्।

एतत्तदित्येव निवासभूमौ

प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव॥ २०॥

वीर श्रीरामने आश्रममें प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलोंमें अनुसंधान किया, जो सीताके विहारस्थान थे। उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ाभूमिमें यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकारकी क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे व्यथासे पीडि़त हो गये॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टपञ्चाश: सर्ग:॥ ५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८॥

 


एकोनषष्टितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत

अथाश्रमादुपावृत्तमन्तरा रघुनन्दन:।

परिपप्रच्छ सौमित्रिं रामो दु:खादिदं वच:॥ १॥

(आश्रममें आनेसे पहले मार्गमें श्रीराम और लक्ष्मणने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुन: विस्तारके साथ बता रहे हैं—) सीताके कथनानुसार आश्रमसे अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे मार्गमें भी रघुकुलनन्दन श्रीरामने बड़े दु:खसे यह बात पूछी—॥ १॥

तमुवाच किमर्थं त्वमागतोऽपास्य मैथिलीम्।

यदा सा तव विश्वासाद् वने विरहिता मया॥ २॥

‘लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वासपर ही वनमें सीताको छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये?॥ २॥

दृष्ट्वैवाभ्यागतं त्वां मे मैथिलीं त्यज्य लक्ष्मण।

शङ्कमानं महत् पापं यत्सत्यं व्यथितं मन:॥ ३॥

‘लक्ष्मण! मिथिलेशकुमारीको छोड़कर तुम जो मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्टकी आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है॥ ३॥

स्फुरते नयनं सव्यं बाहुश्च हृदयं च मे।

दृष्ट्वा लक्ष्मण दूरे त्वां सीताविरहितं पथि॥ ४॥

‘लक्ष्मण! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है। तुम्हें आश्रमसे दूर सीताके बिना ही मार्गपर आते देख मेरा हृदय भी धक-धक कर रहा है’॥ ४॥

एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्लक्ष्मण: शुभलक्षण:।

भूयो दु:खसमाविष्टो दु:खितं राममब्रवीत्॥ ५॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण अत्यन्त दु:खी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीरामसे बोले—॥ ५॥

न स्वयं कामकारेण तां त्यक्त्वाहमिहागत:।

प्रचोदितस्तयैवोग्रैस्त्वत्सकाशमिहागत: ॥ ६॥

‘भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छासे उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ। उन्हींके कठोर वचनोंसे प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है॥ ६॥

आर्येणेव परिक्रुष्टं लक्ष्मणेति सुविस्वरम्।

परित्राहीति यद्वाक्यं मैथिल्यास्तच्छ्रुतिं गतम्॥ ७॥

‘आपके ही समान स्वरमें किसीने जोरसे पुकारा, ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ।’ यह वाक्य मिथिलेशकुमारीके कानोंमें भी पड़ा॥ ७॥

सा तमार्तस्वरं श्रुत्वा तव स्नेहेन मैथिली।

गच्छ गच्छेति मामाशु रुदती भयविक्लवा॥ ८॥

‘उस आर्तनादको सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेहके कारण भयसे व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं—‘जाओ, जाओ’॥ ८॥

प्रचोद्यमानेन मया गच्छेति बहुशस्तया।

प्रत्युक्ता मैथिली वाक्यमिदं तत् प्रत्ययान्वितम्॥ ९॥

‘जब बारंबार उन्होंने ‘जाओ’ कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिलीसे यह बात कही—॥ ९॥

न तत् पश्याम्यहं रक्षो यदस्य भयमावहेत्।

निर्वृता भव नास्त्येतत् केनाप्येतदुदाहृतम्॥ १०॥

‘देवि! मैं ऐसे किसी राक्षसको नहीं देखता, जो भगवान् श्रीरामको भी भयमें डाल सके। आप शान्त रहें, यह भैयाकी आवाज नहीं है। किसी दूसरेने इस तरहकी पुकार की है॥ १०॥

विगर्हितं च नीचं च कथमार्योऽभिधास्यति।

त्राहीति वचनं सीते यस्त्रायेत् त्रिदशानपि॥ ११॥

‘सीते! जो देवताओंकी भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ‘मुझे बचाओ’ ऐसा निन्दित (कायरतापूर्ण) वचन कैसे कहेंगे?॥ ११॥

किंनिमित्तं तु केनापि भ्रातुरालम्ब्य मे स्वरम्।

विस्वरं व्याहृतं वाक्यं लक्ष्मण त्राहि मामिति॥ १२॥

‘किसी दूसरेने किसी बुरे उद्देश्यसे मेरे भैयाके स्वरकी नकल करके ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ’ यह बात जोरसे कही है॥ १२॥

राक्षसेनेरितं वाक्यं त्रासात् त्राहीति शोभने।

न भवत्या व्यथा कार्या कुनारीजनसेविता॥ १३॥

‘शोभने! उस राक्षसने ही भयके कारण (मुझे बचाओ) यह बात मुँहसे निकाली है। आपको व्यथित नहीं होना चाहिये। ऐसी व्यथाको नीच श्रेणीकी स्त्रियाँ ही अपने मनमें स्थान देती हैं॥ १३॥

अलं विक्लवतां गन्तुं स्वस्था भव निरुत्सुका।

न चास्ति त्रिषु लोकेषु पुमान् यो राघवं रणे॥ १४॥

जातो वा जायमानो वा संयुगे य: पराजयेत्।

अजेयो राघवो युद्धे देवै: शक्रपुरोगमै:॥ १५॥

‘तुम व्याकुल मत होओ, स्वस्थ हो जाओ, चिन्ता छोड़ो। तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पुरुष न तो उत्पन्न हुआ है, न हो रहा है और न होगा ही, जो युद्धमें श्रीरघुनाथजीको परास्त कर सके। संग्राममें इन्द्र आदि देवता भी श्रीरामको नहीं जीत सकते’॥ १४-१५॥

एवमुक्ता तु वैदेही परिमोहितचेतना।

उवाचाश्रूणि मुञ्चन्ती दारुणं मामिदं वच:॥ १६॥

मेरे ऐसा कहनेपर विदेहराजकुमारीकी चेतना मोहसे आच्छन्न हो गयी। वे आँसू बहाती हुई मुझसे अत्यन्त कठोर वचन बोलीं—॥ १६॥

भावो मयि तवात्यर्थं पाप एव निवेशित:।

विनष्टे भ्रातरि प्राप्तुं न च त्वं मामवाप्स्यसे॥ १७॥

‘लक्ष्मण! तेरे मनमें मेरे लिये अत्यन्त पापपूर्ण भाव भरा है। तू अपने भाईके मरनेपर मुझे प्राप्त करना चाहता है, परंतु मुझे पा नहीं सकेगा॥ १७॥

संकेताद् भरतेन त्वं रामं समनुगच्छसि।

क्रोशन्तं हि यथात्यर्थं नैनमभ्यवपद्यसे॥ १८॥

‘तू भरतके इशारेसे अपने स्वार्थके लिये श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे आया है। तभी तो वे जोर-जोरसे चिल्ला रहे हैं और तू उनके पास जातातक नहीं है॥

रिपु: प्रच्छन्नचारी त्वं मदर्थमनुगच्छसि।

राघवस्यान्तरं प्रेप्सुस्तथैनं नाभिपद्यसे॥ १९॥

‘तू अपने भाईका छिपा हुआ शत्रु है। मेरे लिये ही श्रीरामका अनुसरण करता है और श्रीरामके छिद्र ढूँढ़ रहा है तभी तो संकटके समय उनके पास जानेका नाम नहीं लेता है’॥ १९॥

एवमुक्तस्तु वैदेह्या संरब्धो रक्तलोचन:।

क्रोधात् प्रस्फुरमाणोष्ठ आश्रमादभिनिर्गत:॥ २०॥

‘विदेहकुमारीके ऐसा कहनेपर मैं रोषसे भर गया। मेरी आँखें लाल हो गयीं और क्रोधसे मेरे होंठ फड़कने लगे। इस अवस्थामें मैं आश्रमसे निकल आया’॥ २०॥

एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं राम: संतापमोहित:।

अब्रवीद् दुष्कृतं सौम्य तां विना त्वमिहागत:॥ २१॥

लक्ष्मणकी ऐसी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी संतापसे मोहित हो गये और उनसे बोले—‘सौम्य! तुमने बड़ा बुरा किया, जो तुम सीताको छोड़कर यहाँ चले आये॥ २१॥

जानन्नपि समर्थं मां रक्षसामपवारणे।

अनेन क्रोधवाक्येन मैथिल्या निर्गतो भवान्॥ २२॥

‘मैं राक्षसोंका निवारण करनेमें समर्थ हूँ, यह जानते हुए भी तुम मैथिलीके क्रोधयुक्त वचनसे उत्तेजित होकर निकल पड़े॥ २२॥

नहि ते परितुष्यामि त्यक्त्वा यदसि मैथिलीम्।

क्रुद्धाया: परुषं श्रुत्वा स्त्रिया यत् त्वमिहागत:॥ २३॥

‘क्रोधमें भरी हुई नारीके कठोर वचनको सुनकर जो तुम मिथिलेशकुमारीको छोड़कर यहाँ चले आये, इससे मैं तुम्हारे ऊपर संतुष्ट नहीं हूँ॥ २३॥

सर्वथा त्वपनीतं ते सीतया यत् प्रचोदित:।

क्रोधस्य वशमागम्य नाकरो: शासनं मम॥ २४॥

‘सीतासे प्रेरित होकर क्रोधके वशीभूत हो तुमने मेरे आदेशका पालन नहीं किया; यह सर्वथा तुम्हारा अन्याय है॥ २४॥

असौ हि राक्षस: शेते शरेणाभिहतो मया।

मृगरूपेण येनाहमाश्रमादपवाहित:॥ २५॥

‘जिसने मृगरूप धारण करके मुझे आश्रमसे दूर हटा दिया, वह राक्षस मेरे बाणोंसे घायल होकर सदाके लिये सो रहा है॥ २५॥

विकृष्य चापं परिधाय सायकं

सलीलबाणेन च ताडितो मया।

मार्गीं तनुं त्यज्य च विक्लवस्वरो

बभूव केयूरधर: स राक्षस:॥ २६॥

‘धनुष खींचकर उस बाणका संधान करके मैंने लीलापूर्वक चलाये हुए बाणोंसे ज्यों ही उस मृगको मारा, त्यों ही वह मृगके शरीरका परित्याग करके बाँहोंमें बाजूबंद धारण करनेवाला राक्षस बन गया। उसके स्वरमें बड़ी व्याकुलता आ गयी थी॥ २६॥

शराहतेनैव तदार्तया गिरा

स्वरं ममालम्ब्य सुदूरसुश्रवम्।

उदाहृतं तद् वचनं सुदारुणं

त्वमागतो येन विहाय मैथिलीम्॥ २७॥

‘बाणसे आहत होनेपर ही उसने आर्तवाणीमें मेरे स्वरकी नकल करके बहुत दूरतक सुनायी देनेवाला वह अत्यन्त दारुण वचन कहा था, जिससे तुम मिथिलेशकुमारी सीताको छोड़कर यहाँ चले आये हो’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनषष्टितम: सर्ग:॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

 

षष्टितम: सर्ग:

श्रीरामका विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओंसे सीताका पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना

भृशमाव्रजमानस्य तस्याधो वामलोचनम्।

प्रास्फुरच्चास्खलद् रामो वेपथुश्चास्य जायते॥ १॥

आश्रमकी ओर आते समय श्रीरामकी बायीं आँखकी नीचेवाली पलक जोर-जोरसे फड़कने लगी। श्रीराम चलते-चलते लड़खड़ा गये और उनके शरीरमें कम्प होने लगा॥ १॥

उपालक्ष्य निमित्तानि सोऽशुभानि मुहुर्मुहु:।

अपि क्षेमं तु सीताया इति वै व्याजहार ह॥ २॥

बारंबार इन अपशकुनोंको देखकर वे कहने लगे—क्या सीता सकुशल होगी?॥ २॥

त्वरमाणो जगामाथ सीतादर्शनलालस:।

शून्यमावसथं दृष्ट्वा बभूवोद्विग्नमानस:॥ ३॥

सीताको देखनेके लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी उतावलीके साथ आश्रमपर गये। वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा॥ ३॥

उद्भ्रमन्निव वेगेन विक्षिपन् रघुनन्दन:।

तत्र तत्रोटजस्थानमभिवीक्ष्य समन्तत:॥ ४॥

ददर्श पर्णशालां च सीतया रहितां तदा।

श्रिया विरहितां ध्वस्तां हेमन्ते पद्मिनीमिव॥ ५॥

रघुनन्दन बड़े वेगसे इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशालाको चारों ओरसे देख डाला, किंतु उस समय उसे सीतासे सूनी ही पाया। जैसे हेमन्त-ऋतुमें कमलिनी हिमसे ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी॥ ४-५॥

रुदन्तमिव वृक्षैश्च ग्लानपुष्पमृगद्विजम्।

श्रिया विहीनं विध्वस्तं संत्यक्तं वनदैवतै:॥ ६॥

वह स्थान वृक्षों (की सनसनाहट) के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे। वहाँकी सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी। सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी। वनके देवता भी उस स्थानको छोड़कर चले गये थे॥ ६॥

विप्रकीर्णाजिनकुशं विप्रविद्धबृसीकटम्।

दृष्ट्वा शून्योटजस्थानं विललाप पुन: पुन:॥ ७॥

सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। पर्णशालाको सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे—॥ ७॥

हृता मृता वा नष्टा वा भक्षिता वा भविष्यति।

निलीनाप्यथवा भीरुरथवा वनमाश्रिता॥ ८॥

‘हाय! सीताको किसीने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षसने उसे खा तो नहीं लिया। वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल-फूल लानेके लिये वनके भीतर तो नहीं चली गयी॥ ८॥

गता विचेतुं पुष्पाणि फलान्यपि च वा पुन:।

अथवा पद्मिनीं याता जलार्थं वा नदीं गता॥ ९॥

‘सम्भव है, फल-फूल लानेके लिये ही गयी हो या जल लानेके लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदीके तटपर गयी हो’॥ ९॥

यत्नान्मृगयमाणस्तु नाससाद वने प्रियाम्।

शोकरक्तेक्षण: श्रीमानुन्मत्त इव लक्ष्यते॥ १०॥

श्रीरामचन्द्रजीने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीताको वनमें चारों ओर ढूँढ़ा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा। शोकके कारण श्रीमान् रामकी आँखें लाल हो गयीं। वे उन्मत्तके समान दिखायी देने लगे॥ १०॥

वृक्षाद् वृक्षं प्रधावन् स गिरींश्चापि नदीनदम्।

बभ्राम विलपन् राम: शोकपङ्कार्णवप्लुत:॥ ११॥

एक वृक्षसे दूसरे वृक्षके पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदोंके किनारे घूमने लगे। शोकसे समुद्रमें डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षोंसे पूछने लगे—॥ ११॥

अस्ति कच्चित्त्वया दृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया।

कदम्ब यदि जानीषे शंस सीतां शुभाननाम्॥ १२॥

स्निग्धपल्लवसंकाशां पीतकौशेयवासिनीम्।

शंसस्व यदि सा दृष्टा बिल्व बिल्वोपमस्तनी॥ १३॥

‘कदम्ब! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्पसे बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीताका पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवोंके समान कोमल हैं तथा शरीरपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व! मेरी प्रियाके स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ॥ १२-१३॥

अथवार्जुन शंस त्वं प्रियां तामर्जुनप्रियाम्।

जनकस्य सुता तन्वी यदि जीवति वा न वा॥ १४॥

‘अथवा अर्जुन! तुम्हारे फूलोंपर मेरी प्रियाका विशेष अनुराग था, अत: तुम्हीं उसका कुछ समाचार बताओ। कृशाङ्गी जनककिशोरी जीवित है या नहीं॥

ककुभ: ककुभोरुं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम्।

लतापल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पति:॥ १५॥

भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्यसि।

एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम्॥ १६॥

‘यह ककुभ115 अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारीको अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलोंसे सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ! तुम सब वृक्षोंमें श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारोंद्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीताका पता बताओ, अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीताके विषयमें जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीताको भी तिलकसे प्रेम था॥ १५-१६॥

अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतनम्।

त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शनेन माम्॥ १७॥

‘अशोक! तुम शोक दूर करनेवाले हो। इधर मैं शोकसे अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमाका दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने-जैसे नामवाला बना दो—मुझे अशोक (शोकहीन) कर दो॥ १७॥

यदि ताल त्वया दृष्टा पक्वतालोपमस्तनी।

कथयस्व वरारोहां कारुण्यं यदि ते मयि॥ १८॥

‘ताल वृक्ष! तुम्हारे पके हुए फलके समान स्तनवाली सीताको यदि तुमने देखा हो तो बताओ। यदि मुझपर तुम्हें दया आती हो तो उस सुन्दरीके विषयमें अवश्य कुछ कहो॥ १८॥

यदि दृष्टा त्वया जम्बो जाम्बूनदसमप्रभा।

प्रियां यदि विजानासि नि:शङ्क कथयस्व मे॥ १९॥

‘जामुन! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टिमें पड़ी हो, यदि तुम उसके विषयमें कुछ जानते हो तो नि:शङ्क होकर मुझे बताओ॥ १९॥

अहो त्वं कर्णिकाराद्य पुष्पित: शोभसे भृशम्।

कर्णिकारप्रियां साध्वीं शंस दृष्टा यदि प्रिया॥ २०॥

‘कनेर! आज तो फूलोंके लगनेसे तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। अहो! मेरी प्रिया साध्वी सीताको तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे। यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो’॥ २०॥

चूतनीपमहासालान् पनसान् कुरवान् धवान्।

दाडिमानपि तान् गत्वा दृष्ट्वा रामो महायशा:॥ २१॥

बकुलानथ पुन्नागांश्चन्दनान् केतकांस्तथा।

पृच्छन् रामो वने भ्रान्त उन्मत्त इव लक्ष्यते॥ २२॥

इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षोंको भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और वकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदिके वृक्षोंसे भी पूछते फिरे। उस समय वे वनमें पागलकी तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थे॥ २१-२२॥

अथवा मृगशावाक्षीं मृग जानासि मैथिलीम्।

मृगविप्रेक्षणी कान्ता मृगीभि: सहिता भवेत्॥ २३॥

अपने सामने हरिणको देखकर वे बोले—‘मृग! अथवा तुम्हीं बताओ! मृगनयनी मैथिलीको जानते हो। मेरी प्रियाकी दृष्टि भी तुम हरिणोंकी-सी है, अत: सम्भव है, वह हरिणियोंके ही साथ हो॥ २३॥

गज सा गजनासोरुर्यदि दृष्टा त्वया भवेत्।

तां मन्ये विदितां तुभ्यमाख्याहि वरवारण॥ २४॥

‘श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सूँड़के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीताको सम्भवत: तुमने देखा होगा। मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अत: बताओ! वह कहाँ है?॥ २४॥

शार्दूल यदि सा दृष्टा प्रिया चन्द्रनिभानना।

मैथिली मम विस्रब्ध: कथयस्व न ते भयम्॥ २५॥

‘व्याघ्र! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिलीको देखा हो तो नि:शङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा’॥ २५॥

किं धावसि प्रिये नूनं दृष्टासि कमलेक्षणे।

वृक्षैराच्छाद्य चात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे॥ २६॥

(इतनेहीमें उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले—) ‘प्रिये! क्यों भागी जा रही हो। कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षोंकी ओटमें अपने-आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो?॥ २६॥

तिष्ठ तिष्ठ वरारोहे न तेऽस्ति करुणा मयि।

नात्यर्थं हास्यशीलासि किमर्थं मामुपेक्षसे॥ २७॥

‘वरारोहे! ठहरो, ठहरो। क्या तुम्हें मुझपर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करनेका तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो?॥ २७॥

पीतकौशेयकेनासि सूचिता वरवर्णिनि।

धावन्त्यपि मया दृष्टा तिष्ठ यद्यस्ति सौहृदम्॥ २८॥

‘सुन्दरि! पीली रेशमी साड़ीसे ही, तुम कहाँ हो—यह सूचना मिल जाती है। भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है। यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ’॥ २८॥

नैव सा नूनमथवा हिंसिता चारुहासिनी।

कृच्छ्रं प्राप्तं न मां नूनं यथोपेक्षितुमर्हति॥ २९॥

(फिर भ्रम दूर होनेपर बोले—) ‘अथवा निश्चय ही वह नहीं है। उस मनोहर मुसकानवाली सीताको राक्षसोंने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुएकी (मेरी) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी॥ २९॥

व्यक्तं सा भक्षिता बाला राक्षसै: पिशिताशनै:।

विभज्याङ्गानि सर्वाणि मया विरहिता प्रिया॥ ३०॥

‘स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसोंने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिलीको उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया॥ ३०॥

नूनं तच्छुभदन्तोष्ठं सुनासं शुभकुण्डलम्।

पूर्णचन्द्रनिभं ग्रस्तं मुखं निष्प्रभतां गतम्॥ ३१॥

‘सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिकासे युक्त तथा रुचिर कुण्डलोंसे अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमाके समान अभिराम मुख राक्षसोंका ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा॥ ३१॥

सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयकोचिता।

कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा॥ ३२॥

‘रोती-विलखती हुई प्रियतमा सीताकी वह चम्पाके समान वर्णवाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहननेके योग्य थी, निशाचरोंका आहार बन गयी॥ ३२॥

नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ।

भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ॥ ३३॥

‘वे नूतन पल्लवोंके समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथोंके आभूषण तथा बाजूबंदसहित निश्चय ही राक्षसोंके पेटमें चली गयीं॥ ३३॥

मया विरहिता बाला रक्षसां भक्षणाय वै।

सार्थेनेव परित्यक्ता भक्षिता बहुबान्धवा॥ ३४॥

‘मैंने राक्षसोंका भक्ष्य बननेके लिये ही उस बालाको अकेली छोड़ दिया। यद्यपि उसके बन्धु-बान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियोंके समुदायसे विलग हुई किसी अकेली स्त्रीकी भाँति निशाचरोंका ग्रास बन गयी॥ ३४॥

हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसे त्वं प्रियां क्वचित्।

हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुन: पुन:॥ ३५॥

इत्येवं विलपन् राम: परिधावन् वनाद् वनम्।

क्वचिदुद्भ्रमते वेगात् क्वचिद् विभ्रमते बलात्॥ ३६॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमाको देखते हो! हा प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी?’ इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वनसे दूसरे वनमें दौड़ने लगे। वे कहीं सीताकी समानता पाकर उद्भ्रान्त हो उठते (उछल पड़ते थे) और कहीं शोककी प्रबलताके कारण विभ्रान्त हो जाते (बवंडरकी भाँति चक्कर काटने लगते) थे॥ ३५-३६॥

क्वचिन्मत्त इवाभाति कान्तान्वेषणतत्पर:।

स वनानि नदी: शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च।

काननानि च वेगेन भ्रमत्यपरिसंस्थित:॥ ३७॥

अपनी प्रियतमाकी खोज करते हुए वे कभी-कभी पागलोंकी-सी चेष्टा करने लगते थे। उन्होंने बड़ी दौड़-धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननोंमें घूम-घूमकर अन्वेषण किया॥ ३७॥

तदा स गत्वा विपुलं महद् वनं

परीत्य सर्वं त्वथ मैथिलीं प्रति।

अनिष्ठिताश: स चकार मार्गणे

पुन: प्रियाया: परमं परिश्रमम्॥ ३८॥

उस समय मिथिलेशकुमारीको ढूँढ़नेके लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वनमें गये और सबमें चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए। उन्होंने पुन: अपनी प्रियतमाके अनुसंधानके लिये बड़ा भारी परिश्रम किया॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्टितम: सर्ग:॥ ६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६०॥

 

एकषष्टितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज और उनके न मिलनेसे श्रीरामकी व्याकुलता

दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं शून्यं रामो दशरथात्मज:।

रहितां पर्णशालां च प्रविद्धान्यासनानि च॥ १॥

अदृष्ट्वा तत्र वैदेहीं संनिरीक्ष्य च सर्वश:।

उवाच राम: प्राक्रुश्य प्रगृह्य रुचिरौ भुजौ॥ २॥

दशरथनन्दन श्रीरामने देखा कि आश्रमके सभी स्थान सीतासे सूने हैं तथा पर्णशालामें भी सीता नहीं हैं और बैठनेके आसन इधर-उधर फेंके पड़े हैं। तब उन्होंने पुन: वहाँके सभी स्थानोंका निरीक्षण किया और चारों ओर ढूँढ़नेपर भी जब विदेहकुमारीका कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीताका नाम ले जोर-जोरसे पुकार करके लक्ष्मणसे बोले—॥ १-२॥

क्व नु लक्ष्मण वैदेही कं वा देशमितो गता।

केनाहृता वा सौमित्रे भक्षिता केन वा प्रिया॥ ३॥

‘भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं? यहाँसे किस देशमें चली गयीं? सुमित्रानन्दन! मेरी प्रिया सीताको कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षसने खा डाला?॥ ३॥

वृक्षेणावार्य यदि मां सीते हसितुमिच्छसि।

अलं ते हसितेनाद्य मां भजस्व सुदु:खितम्॥ ४॥

(फिर वे सीताको सम्बोधित करके बोले—) ‘सीते! यदि तुम वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है। मैं बहुत दु:खी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ॥ ४॥

यै: परिक्रीडसे सीते विश्वस्तैर्मृगपोतकै:।

एते हीनास्त्वया सौम्ये ध्यायन्त्यस्राविलेक्षणा:॥ ५॥

‘सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनोंके साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दु:खी हो आँखोंमें आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं’॥ ५॥

सीतया रहितोऽहं वै नहि जीवामि लक्ष्मण।

वृतं शोकेन महता सीताहरणजेन माम्॥ ६॥

परलोके महाराजो नूनं द्रक्ष्यति मे पिता।

‘लक्ष्मण! सीतासे रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता। सीताहरणजनित महान् शोकने मुझे चारों ओरसे घेर लिया है। निश्चय ही अब परलोकमें मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे॥ ६/

कथं प्रतिज्ञां संश्रुत्य मया त्वमभियोजित:॥ ७॥

अपूरयित्वा तं कालं मत्सकाशमिहागत:।

वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे—‘मैंने तो तुम्हें वनवासके लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी। फिर उतने समयतक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये?॥ ७/

कामवृत्तमनार्यं वा मृषावादिनमेव च॥ ८॥

धिक् त्वामिति परे लोके व्यक्तं वक्ष्यति मे पिता।

‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादीको धिक्कार है। यह बात परलोकमें पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे’॥ ८/

विवशं शोकसंतप्तं दीनं भग्नमनोरथम्॥ ९॥

मामिहोत्सृज्य करुणं कीर्तिर्नरमिवानृजुम्।

क्व गच्छसि वरारोहे मा मोत्सृज सुमध्यमे॥ १०॥

‘वरारोहे! सुमध्यमे! सीते! मैं विवश, शोकसंतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणाजनक अवस्थामें पड़ गया हूँ। जैसे कुटिल मनुष्यको कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो॥ ९-१०॥

त्वया विरहितश्चाहं त्यक्ष्ये जीवितमात्मन:।

इतीव विलपन् राम: सीतादर्शनलालस:॥ ११॥

न ददर्श सुदु:खार्तो राघवो जनकात्मजाम्।

‘तुम्हारे वियोगमें मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।’ इस प्रकार अत्यन्त दु:खसे आतुर हो विलाप करते हुए रघुकुल-नन्दन श्रीराम सीताके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये, किंतु वे जनकनन्दिनी उन्हें दिखायी न पड़ीं॥

अनासादयमानं तं सीतां शोकपरायणम्॥ १२॥

पङ्कमासाद्य विपुलं सीदन्तमिव कुञ्जरम्।

लक्ष्मणो राममत्यर्थमुवाच हितकाम्यया॥ १३॥

जैसे कोई हाथी किसी बड़ी भारी दलदलमें फँसकर कष्ट पा रहा हो, उसी प्रकार सीताको न पाकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए श्रीरामसे उनके हितकी कामना रखकर लक्ष्मण यों बोले—॥ १२-१३॥

मा विषादं महाबुद्धे कुरु यत्नं मया सह।

इदं गिरिवरं वीर बहुकन्दरशोभितम्॥ १४॥

प्रियकाननसंचारा वनोन्मत्ता च मैथिली।

सा वनं वा प्रविष्टा स्यान्नलिनीं वा सुपुष्पिताम्॥ १५॥

सरितं वापि सम्प्राप्ता मीनवञ्जुलसेविताम्।

वित्रासयितुकामा वा लीना स्यात् कानने क्वचित्॥ १६॥

जिज्ञासमाना वैदेही त्वां मां च पुरुषर्षभ।

‘महामते! आप विषाद न करें; मेरे साथ जानकीको ढूँढ़नेका प्रयत्न करें। वीरवर! यह सामने जो ऊँचा पहाड़ दिखायी देता है, अनेक कन्दराओंसे सुशोभित है। मिथिलेशकुमारीको वनमें घूमना प्रिय लगता है, वे वनकी शोभा देखकर हर्षसे उन्मत्त हो उठती हैं; अत: वनमें गयी होंगी, अथवा सुन्दर कमलके फूलोंसे भरे हुए इस सरोवरके या मत्स्य तथा वेतसलतासे सुशोभित सरिताके तटपर जा पहुँची होंगी। अथवा पुरुषप्रवर! हमलोगोंको डरानेकी इच्छासे हम दोनों उन्हें खोज पाते हैं कि नहीं, इस जिज्ञासासे कहीं वनमें ही छिप गयी होंगी॥ १४—१६/

तस्या ह्यन्वेषणे श्रीमन् क्षिप्रमेव यतावहे॥ १७॥

वनं सर्वं विचिनुवो यत्र सा जनकात्मजा।

‘अत: श्रीमन्! वनमें जहाँ-जहाँ जानकीके होनेकी सम्भावना हो, उन सभी स्थानोंपर हम दोनों शीघ्र ही उनकी खोजके लिये प्रयत्न करें॥ १७/

मन्यसे यदि काकुत्स्थ मा स्म शोके मन: कृथा:॥ १८॥

एवमुक्त: स सौहार्दाल्लक्ष्मणेन समाहित:।

सह सौमित्रिणा रामो विचेतुमुपचक्रमे॥ १९॥

‘रघुनन्दन! यदि आपको मेरी यह बात ठीक लगे तो आप शोक छोड़ दें।’ लक्ष्मणके द्वारा इस प्रकार सौहार्दपूर्वक समझाये जानेपर श्रीरामचन्द्रजी सावधान हो गये और उन्होंने सुमित्राकुमारके साथ सीताको खोजना आरम्भ किया॥ १८-१९॥

तौ वनानि गिरींश्चैव सरितश्च सरांसि च।

निखिलेन विचिन्वन्तौ सीतां दशरथात्मजौ॥ २०॥

तस्य शैलस्य सानूनि शिलाश्च शिखराणि च।

निखिलेन विचिन्वन्तौ नैव तामभिजग्मतु:॥ २१॥

दशरथके वे दोनों पुत्र सीताकी खोज करते हुए वनोंमें, पर्वतोंपर, सरिताओं और सरोवरोंके किनारे घूम-घूमकर पूरी चेष्टाके साथ अनुसंधानमें लगे रहे। उस पर्वतकी चोटियों, शिलाओं और शिखरोंपर उन्होंने अच्छी तरह जानकीको ढूँढ़ा; किंतु कहीं भी उनका पता नहीं लगा॥ २०-२१॥

विचित्य सर्वत: शैलं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

नेह पश्यामि सौमित्रे वैदेहीं पर्वते शुभाम्॥ २२॥

पर्वतके चारों ओर खोजकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! इस पर्वतपर तो मैं सुन्दरी वैदेहीको नहीं देख पाता हूँ’॥ २२॥

ततो दु:खाभिसंतप्तो लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

विचरन् दण्डकारण्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥ २३॥

तब दु:खसे संतप्त हुए लक्ष्मणने दण्डकारण्यमें घूमते-घूमते अपने उद्दीप्त तेजस्वी भाईसे इस प्रकार कहा—

प्राप्स्यसे त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजाम्।

यथा विष्णुर्महाबाहुर्बलिं बद‍्ध्वा महीमिमाम्॥ २४॥

‘महामते! जैसे महाबाहु भगवान् विष्णुने राजा बलिको बाँधकर यह पृथ्वी प्राप्त कर ली थी, उसी प्रकार आप भी मिथिलेशकुमारी जानकीको पा जायँगे’॥

एवमुक्तस्तु वीरेण लक्ष्मणेन स राघव:।

उवाच दीनया वाचा दु:खाभिहतचेतन:॥ २५॥

वीर लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर दु:खसे व्याकुलचित्त हुए श्रीरघुनाथजीने दीन वाणीमें कहा—॥ २५॥

वनं सुविचितं सर्वं पद्मिन्य: फुल्लपङ्कजा:।

गिरिश्चायं महाप्राज्ञ बहुकन्दरनिर्झर:।

नहि पश्यामि वैदेहीं प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥ २६॥

‘महाप्राज्ञ लक्ष्मण! मैंने सारा वन खोज डाला। विकसित कमलोंसे भरे हुए सरोवर भी देख लिये तथा अनेक कन्दराओं और झरनोंसे सुशोभित इस पर्वतको भी सब ओरसे छान डाला; परंतु मुझे अपने प्राणोंसे भी प्यारी वैदेही कहीं दिखायी नहीं पड़ी’॥ २६॥

एवं स विलपन् राम: सीताहरणकर्षित:।

दीन: शोकसमाविष्टो मुहूर्तं विह्वलोऽभवत्॥ २७॥

इस प्रकार सीता-हरणके कष्टसे पीडि़त हो विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी दीन और शोकमग्न हो दो घड़ीतक अत्यन्त व्याकुलतामें पड़े रहे॥ २७॥

स विह्वलितसर्वाङ्गो गतबुद्धिर्विचेतन:।

निषसादातुरो दीनो नि:श्वस्याशीतमायतम्॥ २८॥

उनका सारा अङ्ग विह्वल (शिथिल) हो गया, बुद्धि काम नहीं दे रही थी, चेतना लुप्त-सी होती जा रही थी। वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए दीन और आतुर होकर विषादमें डूब गये॥ २८॥

बहुश: स तु नि:श्वस्य रामो राजीवलोचन:।

हा प्रियेति विचुक्रोश बहुशो बाष्पगद्गद:॥ २९॥

बारंबार उच्छ्वास लेकर कमलनयन श्रीराम आँसुओंसे गद्गद वाणीमें ‘हा प्रिये!’ कहकर बहुत रोने-विलखने लगे॥ २९॥

तं सान्त्वयामास ततो लक्ष्मण: प्रियबान्धवम्।

बहुप्रकारं शोकार्त: प्रश्रित: प्रश्रिताञ्जलि:॥ ३०॥

तब शोकसे पीडि़त हुए लक्ष्मणने विनीतभावसे हाथ जोड़कर अपने प्रिय भाईको अनेक प्रकारसे सान्त्वना दी॥

अनादृत्य तु तद् वाक्यं लक्ष्मणोष्ठपुटच्युतम्।

अपश्यंस्तां प्रियां सीतां प्राक्रोशत् स पुन: पुन:॥ ३१॥

लक्ष्मणके ओष्ठपुटोंसे निकली हुई इस बातका आदर न करके श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्यारी पत्नी सीताको न देखनेके कारण उन्हें बारंबार पुकारने और रोने लगे॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकषष्टितम: सर्ग:॥ ६१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥

 

द्विषष्टितम: सर्ग:

श्रीरामका विलाप

सीतामपश्यन् धर्मात्मा शोकोपहतचेतन:।

विललाप महाबाहू राम: कमललोचन:॥ १॥

सीताको न देखकर शोकसे व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे॥ १॥

पश्यन्निव च तां सीतामपश्यन्मन्मथार्दित:।

उवाच राघवो वाक्यं विलापाश्रयदुर्वचम्॥ २॥

रघुनाथजी सीताके प्रति अधिक प्रेमके कारण उनके वियोगमें कष्ट पा रहे थे। वे उन्हें न देखकर भी देखते हुएके समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलापका आश्रय होनेसे गद्गदकण्ठके कारण कठिनतासे बोली जा रही थी—॥ २॥

त्वमशोकस्य शाखाभि: पुष्पप्रियतरा प्रिये।

आवृणोषि शरीरं ते मम शोकविवर्धनी॥ ३॥

‘प्रिये! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोककी शाखाओंसे अपने शरीरको छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो॥ ३॥

कदलीकाण्डसदृशौ कदल्या संवृतावुभौ।

ऊरू पश्यामि ते देवि नासि शक्ता निगूहितुम्॥ ४॥

‘देवि! मैं केलेके तनोंके तुल्य और कदलीदलसे ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं (जाँघों) को देख रहा हूँ। तुम उन्हें छिपा नहीं सकती॥ ४॥

कर्णिकारवनं भद्रे हसन्ती देवि सेवसे।

अलं ते परिहासेन मम बाधावहेन वै॥ ५॥

‘भद्रे! देवि! तुम हँसती हुई कनेर-पुष्पोंकी वाटिकाका सेवन करती हो। बंद करो इस परिहासको, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है॥ ५॥

विशेषेणाश्रमस्थाने हासोऽयं न प्रशस्यते।

अवगच्छामि ते शीलं परिहासप्रियं प्रिये॥ ६॥

आगच्छ त्वं विशालाक्षि शून्योऽयमुटजस्तव।

‘विशेषत: आश्रमके स्थानमें यह हास-परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है। प्रिये! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है। विशाललोचने! आओ। तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है’॥ ६/

सुव्यक्तं राक्षसै: सीता भक्षिता वा हृतापि वा॥ ७॥

न हि सा विलपन्तं मामुपसम्प्रैति लक्ष्मण।

(फिर भ्रम दूर होनेपर वे सुमित्राकुमारसे बोले—) ‘लक्ष्मण! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि राक्षसोंने सीताको खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है॥ ७/

एतानि मृगयूथानि साश्रुनेत्राणि लक्ष्मण॥ ८॥

शंसन्तीव हि मे देवीं भक्षितां रजनीचरै:।

‘लक्ष्मण! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीताको निशाचर खा गये॥ ८/

हा ममार्ये क्व यातासि हा साध्वि वरवर्णिनि॥ ९॥

हा सकामाद्य कैकेयी देवि मेऽद्य भविष्यति।

‘हा मेरी आर्ये! (आदरणीये!) तुम कहाँ चली गयी? हा साध्वि! हा वरवर्णिनि! तुम कहाँ गयी? हा देवि! आज कैकेयी सफलमनोरथ हो जायगी॥ ९/

सीतया सह निर्यातो विना सीतामुपागत:॥ १०॥

कथं नाम प्रवेक्ष्यामि शून्यमन्त:पुरं मम।

‘सीताके साथ अयोध्यासे निकला था। यदि सीताके बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्त:पुरमें कैसे प्रवेश करूँगा॥ १०/

निर्वीर्य इति लोको मां निर्दयश्चेति वक्ष्यति॥ ११॥

कातरत्वं प्रकाशं हि सीतापनयनेन मे।

‘सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा। सीताके अपहरणसे मेरी कायरता ही प्रकाशमें आयेगी॥ ११/

निवृत्तवनवासश्च जनकं मिथिलाधिपम्॥ १२॥

कुशलं परिपृच्छन्तं कथं शक्ष्ये निरीक्षितुम्।

‘जब वनवाससे लौटनेपर मिथिलानरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा?॥ १२/

विदेहराजो नूनं मां दृष्ट्वा विरहितं तया॥ १३॥

सुताविनाशसंतप्तो मोहस्य वशमेष्यति।

‘मुझे सीतासे रहित देख विदेहराज जनक अपनी पुत्रीके विनाशसे संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे॥

अथवा न गमिष्यामि पुरीं भरतपालिताम्॥ १४॥

स्वर्गोऽपि हि तया हीन: शून्य एव मतो मम।

‘अथवा अब मैं भरतद्वारा पालित अयोध्यापुरीको नहीं जाऊँगा। जानकीके बिना मुझे स्वर्ग भी सूना ही जान पड़ेगा॥ १४/

तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम्॥ १५॥

न त्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंचन।

‘इसलिये अब तुम मुझे वनमें ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरीको लौट जाओ। मैं तो अब सीताके बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता॥ १५/

गाढमाश्लिष्य भरतो वाच्यो मद्वचनात् त्वया॥ १६॥

अनुज्ञातोऽसि रामेण पालयेति वसुंधराम्।

‘भरतका गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, ‘कैकेयीनन्दन! तुम सारी पृथ्वीका पालन करो, इसके लिये रामने तुम्हें आज्ञा दे दी है’॥ १६/

अम्बा च मम कैकेयी सुमित्रा च त्वया विभो॥ १७॥

कौसल्या च यथान्यायमभिवाद्या ममाज्ञया।

रक्षणीया प्रयत्नेन भवता सूक्तचारिणा॥ १८॥

‘विभो! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्राको प्रतिदिन यथोचित रीतिसे प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञाके अनुसार चलना,’ यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है॥ १७-१८॥

सीतायाश्च विनाशोऽयं मम चामित्रसूदन।

विस्तरेण जनन्या मे विनिवेद्यस्त्वया भवेत्॥ १९॥

‘शत्रुसूदन! मेरी माताके समक्ष सीताके विनाशका यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना’॥ १९॥

इति विलपति राघवे तु दीने

वनमुपगम्य तया विना सुकेश्या।

भयविकलमुखस्तु लक्ष्मणोऽपि

व्यथितमना भृशमातुरो बभूव॥ २०॥

सुन्दर केशवाली सीताके विरहमें भगवान् श्रीराम वनके भीतर जाकर जब इस तरह दीनभावसे विलाप करने लगे, तब लक्ष्मणके भी मुखपर भयजनित व्याकुलताके चिह्न दिखायी देने लगे। उनका मन व्यथित हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विषष्टितम: सर्ग:॥ ६२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥

 

त्रिषष्टितम: सर्ग:

श्रीरामका विलाप

स राजपुत्र: प्रियया विहीन:

शोकेन मोहेन च पीड्यमान:।

विषादयन् भ्रातरमार्तरूपो

भूयो विषादं प्रविवेश तीव्रम्॥ १॥

अपनी प्रिया सीतासे रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोहसे पीडि़त होने लगे। वे स्वयं तो पीडि़त थे ही, अपने भाई लक्ष्मणको भी विषादमें डालते हुए पुन: तीव्र शोकमें मग्न हो गये॥ १॥

स लक्ष्मणं शोकवशाभिपन्नं

शोके निमग्नो विपुले तु राम:।

उवाच वाक्यं व्यसनानुरूप-

मुष्णं विनि:श्वस्य रुदन् सशोकम्॥ २॥

लक्ष्मण शोकके अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोकमें डूबे हुए श्रीराम दु:खके साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकटके अनुरूप वचन बोले—॥ २॥

न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी

मन्ये द्वितीयोऽस्ति वसुंधरायाम्।

शोकानुशोको हि परम्पराया

मामेति भिन्दन् हृदयं मनश्च॥ ३॥

‘सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे-जैसा पापकर्म करनेवाला मनुष्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एकके बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मनको विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है॥ ३॥

पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि

पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि।

तत्रायमद्यापतितो विपाको

दु:खेन दु:खं यदहं विशामि॥ ४॥

‘निश्चय ही पूर्वजन्ममें मैंने अपनी इच्छाके अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हींमेंसे कुछ कर्मोंका यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दु:खसे दूसरे दु:खमें पड़ता जा रहा हूँ॥ ४॥

राज्यप्रणाश: स्वजनैर्वियोग:

पितुर्विनाशो जननीवियोग:।

सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेग-

मापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि॥ ५॥

‘पहले तो मैं राज्यसे वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनोंसे वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजीका परलोकवास हुआ, फिर मातासे भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोकके वेगको बढ़ा देती हैं॥ ५॥

सर्वं तु दु:खं मम लक्ष्मणेदं

शान्तं शरीरे वनमेत्य क्लेशम्।

सीतावियोगात् पुनरप्युदीर्णं

काष्ठैरिवाग्नि: सहसोपदीप्त:॥ ६ ॥

‘लक्ष्मण! वनमें आकर क्लेशका अनुभव करके भी यह सारा दु:ख सीताके समीप रहनेसे मेरे शरीरमें ही शान्त हो गया था, परंतु सीताके वियोगसे वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठका संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है॥ ६॥

सा नूनमार्या मम राक्षसेन

ह्यभ्याहृता खं समुपेत्य भीरु:।

अपस्वरं सुस्वरविप्रलापा

भयेन विक्रन्दितवत्यभीक्ष्णम्॥ ७ ॥

‘हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नीको अवश्य ही राक्षसने आकाशमार्गसे हर लिया। उस समय सुमधुर स्वरमें विलाप करनेवाली सीता भयके मारे बारंबार विकृत स्वरमें क्रन्दन करने लगी होगी॥ ७॥

तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य

सदोचितावुत्तमचन्दनस्य ।

वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ

नूनं प्रियाया मम नाभिपात:॥ ८ ॥

‘मेरी प्रियाके वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दनसे चर्चित होनेयोग्य थे, निश्चय ही रक्तकी कीचमें सन गये होंगे। हाय! इतनेपर भी मेरे शरीरका पतन नहीं होता॥ ८॥

तच्छ्लक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापं तस्या मुखं कुञ्चितकेशभारम्।

रक्षोवशं नूनमुपागताया न भ्राजते राहुमुखे यथेन्दु:॥ ९ ॥

‘राक्षसके वशमें पड़ी हुई मेरी प्रियाका वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करनेवाला तथा काले-काले घुँघराले केशोंके भारसे सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहुके मुखमें पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है॥ ९॥

तां हारपाशस्य सदोचितान्तां

ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रताया:।

रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति

शून्ये हि भित्त्वा रुधिराशनानि॥ १०॥

‘हाय! उत्तम व्रतका पालन करनेवाली मेरी प्रियतमाका कण्ठ हर समय हारसे सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसोंने सूने वनमें अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा॥ १०॥

मया विहीना विजने वने सा

रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा।

नूनं विनादं कुररीव दीना

सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा॥ ११॥

‘मेरे न रहनेके कारण निर्जन वनमें राक्षसोंने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभावसे कुररीकी भाँति विलाप करती रही होगी॥ ११॥

अस्मिन् मया सार्धमुदारशीला

शिलातले पूर्वमुपोपविष्टा।

कान्तस्मिता लक्ष्मण जातहासा

त्वामाह सीता बहुवाक्यजातम्॥ १२॥

‘लक्ष्मण! यह वही शिलातल है, जिसपर उदार स्वभाववाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी। उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस-हँसकर तुमसे भी बहुत-सी बातें कही थीं॥

गोदावरीयं सरितां वरिष्ठा

प्रिया प्रियाया मम नित्यकालम्।

अप्यत्र गच्छेदिति चिन्तयामि

नैकाकिनी याति हि सा कदाचित्॥ १३॥

‘सरिताओंमें श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमाको सदा ही प्रिय रही है। सोचता हूँ, शायद वह इसीके तटपर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी॥

पद्मानना पद्मपलाशनेत्रा

पद्मानि वानेतुमभिप्रयाता।

तदप्ययुक्तं नहि सा कदाचि-

न्मया विना गच्छति पङ्कजानि॥ १४॥

‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलोंके समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लानेके लिये ही गोदावरीतटपर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलोंके पास नहीं जाती थी॥ १४॥

कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं

नानाविधै: पक्षिगणैरुपेतम्।

वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्त-

मेकाकिनी सातिबिभेति भीरु:॥ १५॥

‘हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहोंसे युक्त और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सेवित वनमें भ्रमणके लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वनमें जानेसे बहुत डरती थी॥

आदित्य भो लोककृताकृतज्ञ

लोकस्य सत्यानृतकर्मसाक्षिन्।

मम प्रिया सा क्व गता हृता वा

शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम्॥ १६॥

‘सूर्यदेव! संसारमें किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगोंके सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मोंके तुम्हीं साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोकसे पीडि़त हूँ॥ १६॥

लोकेषु सर्वेषु न नास्ति किंचिद्

यत् ते न नित्यं विदितं भवेत् तत्।

शंसस्व वायो कुलपालिनीं तां

मृता हृता वा पथि वर्तते वा॥ १७॥

‘वायुदेव! समस्त विश्वमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो। वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्गमें ही है’॥ १७॥

इतीव तं शोकविधेयदेहं

रामं विसंज्ञं विलपन्तमेव।

उवाच सौमित्रिरदीनसत्त्वो

न्याय्ये स्थित: कालयुतं च वाक्यम्॥ १८॥

इस प्रकार शोकके अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्गपर स्थित रहनेवाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उनसे यह समयोचित बात कही—॥ १८॥

शोकं विसृज्याद्य धृतिं भजस्व

सोत्साहता चास्तु विमार्गणेऽस्या:।

उत्साहवन्तो हि नरा न लोके

सीदन्ति कर्मस्वतिदुष्करेषु॥ १९॥

‘आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीताकी खोजके लिये मनमें उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत्में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़नेपर भी कभी दु:खी नहीं होते हैं’॥ १९॥

इतीव सौमित्रिमुदग्रपौरुषं

ब्रुवन्तमार्तो रघुवंशवर्धन:।

न चिन्तयामास धृतिं विमुक्तवान्

पुनश्च दु:खं महदभ्युपागमत्॥ २०॥

बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकारकी बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुलकी वृद्धि करनेवाले श्रीरामने आर्त होकर उनके कथनके औचित्यपर कोई ध्यान नहीं दिया; उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुन: महान् दु:खमें पड़ गये॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग:॥ ६३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

 

चतु:षष्टितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज, श्रीरामका शोकोद्गार, मृगोंद्वारा संकेत पाकर दोनों भाइयोंका दक्षिण दिशाकी ओर जाना, पर्वतपर क्रोध, सीताके बिखरे हुए फूल,आभूषणोंके कण और युद्धके चिह्न देखकर श्रीरामका देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकीपर रोष प्रकट करना

स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्।

शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरीं नदीम्॥ १॥

अपि गोदावरीं सीता पद्मान्यानयितुं गता।

तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजीने दीन वाणीमें लक्ष्मणसे कहा—‘लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदीके तटपर जाकर पता लगाओ। सीता कमल लानेके लिये तो नहीं चली गयीं’॥ १/

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण: पुनरेव हि॥ २॥

नदीं गोदावरीं रम्यां जगाम लघुविक्रम:।

श्रीरामकी ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गतिसे पुन: रमणीय गोदावरी नदीके तटपर गये॥ २/

तां लक्ष्मणस्तीर्थवतीं विचित्वा राममब्रवीत्॥ ३॥

नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे।

अनेक तीर्थों (घाटों)-से युक्त गोदावरीके तटपर खोजकर लक्ष्मण पुन: लौट आये और श्रीरामसे बोले—‘भैया! मैं गोदावरीके घाटोंपर सीताको नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोरसे पुकारनेपर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं॥ ३/

कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी॥ ४॥

नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा।

‘श्रीराम! क्लेशोंका नाश करनेवाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देशमें चली गयीं। भैया श्रीराम! जहाँ कृशकटि-प्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थानको मैं नहीं जानता’॥ ४/

लक्ष्मणस्य वच: श्रुत्वा दीन: संतापमोहित:॥ ५॥

राम: समभिचक्राम स्वयं गोदावरीं नदीम्।

लक्ष्मणकी यह बात सुनकर दीन एवं संतापसे मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदीके तटपर गये॥ ५/

स तामुपस्थितो राम: क्व सीतेत्येवमब्रवीत्॥ ६॥

भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि।

न तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी॥ ७॥

वहाँ पहुँचकर श्रीरामने पूछा—‘सीता कहाँ है?’ परंतु वधके योग्य राक्षसराज रावणद्वारा हरी गयी सीताके विषयमें समस्त भूतोंमेंसे किसीने कुछ नहीं कहा। गोदावरी नदीने भी श्रीरामको कोई उत्तर नहीं दिया॥ ६-७॥

तत: प्रचोदिता भूतै: शंस चास्मै प्रियामिति।

न च सा ह्यवदत् सीतां पृष्टा रामेण शोचता॥ ८॥

तदनन्तर वनके समस्त प्राणियोंने उन्हें प्रेरित किया कि ‘तुम श्रीरामको उनकी प्रियाका पता बता दो!’ किंतु शोकमग्न श्रीरामके पूछनेपर भी गोदावरीने सीताका पता नहीं बताया॥ ८॥

रावणस्य च तद्रूपं कर्मापि च दुरात्मन:।

ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी न शशंस ह॥ ९॥

दुरात्मा रावणके उस रूप और कर्मको याद करके भयके मारे गोदावरी नदीने वैदेहीके विषयमें श्रीरामसे कुछ नहीं कहा॥ ९॥

निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृत:।

उवाच राम: सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शित:॥ १०॥

सीताके दर्शनके विषयमें जब नदीने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीताको न देखनेसे कष्टमें पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमारसे इस प्रकार बोले—॥ १०॥

एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते।

किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वच:॥ ११॥

मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम्।

‘सौम्य लक्ष्मण! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है। अब मैं राजा जनकसे मिलनेपर उन्हें क्या जवाब दूँगा? जानकीके बिना उसकी मातासे मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा?॥

या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवत:॥ १२॥

सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क्व नु सा गता।

‘राज्यहीन होकर वनमें जंगली फल-मूलोंसे निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दु:खोंको दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी?॥ १२/

ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यत:॥ १३॥

मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रत:।

‘बन्धु-बान्धवोंसे तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीताके दर्शनसे भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्तामें निरन्तर जागते रहनेके कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी॥ १३/

मन्दाकिनीं जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम्॥ १४॥

सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते।

‘मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वत—इन सभी स्थानोंपर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा। शायद वहाँ सीताका पता चल जाय॥ १४/

एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुन: पुन:॥ १५॥

वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये।

‘वीर लक्ष्मण! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं इनकी चेष्टाओंको समझ रहा हूँ’॥ १५/

तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघव: प्रत्युवाच ह॥ १६॥

क्व सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा।

एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगा: सहसोत्थिता:॥ १७॥

दक्षिणाभिमुखा: सर्वे दर्शयन्तो नभ:स्थलम्।

तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—‘बताओ, सीता कहाँ हैं?’ उन मृगोंकी ओर देखते हुए राजा श्रीरामने जब अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपरकी ओर देखकर आकाशमार्गकी ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशाकी ओर मुँह किये दौड़े॥ १६-१७/

मैथिली ह्र‌ियमाणा सा दिशं यामभ्यपद्यत॥ १८॥

तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्ते नराधिपम्।

मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशाकी ओर गयी थीं, उसी ओरके मार्गसे जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजीकी ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे॥ १८/

येन मार्गं च भूमिं च निरीक्षन्ते स्म ते मृगा:॥ १९॥

पुनर्नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेनोपलक्षिता:।

तेषां वचनसर्वस्वं लक्षयामास चेङ्गितम्॥ २०॥

वे मृग आकाशमार्ग और भूमि दोनोंकी ओर देखते और गर्जना करते हुए पुन: आगे बढ़ते थे। लक्ष्मणने उनकी इस चेष्टाको लक्ष्य किया। वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया॥ १९-२०॥

उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत्।

क्व सीतेति त्वया पृष्टा यथेमे सहसोत्थिता:॥ २१॥

दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां च दिशं मृगा:।

साधु गच्छावहे देव दिशमेतां च नैऋर्तीम्॥ २२॥

यदि तस्यागम: कश्चिदार्या वा साथ लक्ष्यते।

तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मणने आर्त-से होकर अपने बड़े भाईसे इस प्रकार कहा—‘आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिणकी ओर हमारा लक्ष्य कराने लगे हैं; अत: देव! यही अच्छा होगा कि हमलोग इस नैऋर्त्य दिशाकी ओर चलें। सम्भव है, इधर जानेसे सीताका कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ’॥ २१-२२/

बाढमित्येव काकुत्स्थ: प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्॥ २३॥

लक्ष्मणानुगत: श्रीमान् वीक्षमाणो वसुंधराम्।

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मणको साथ ले पृथ्वीकी ओर ध्यानसे देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये॥ २३/

एवं सम्भाषमाणौ तावन्योन्यं भ्रातरावुभौ॥ २४॥

वसुंधरायां पतितपुष्पमार्गमपश्यताम्।

वे दोनों भाई आपसमें इसी प्रकारकी बातें करते हुए ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जहाँ भूमिपर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे॥ २४/

पुष्पवृष्टिं निपतितां दृष्ट्वा रामो महीतले॥ २५॥

उवाच लक्ष्मणं वीरो दु:खितो दु:खितं वच:।

पृथ्वीपर फूलोंकी उस वर्षाको देखकर वीर श्रीरामने दु:खी हो लक्ष्मणसे यह दु:खभरा वचन कहा—॥ २५/

अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण॥॥२६

अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने।

‘लक्ष्मण! मैं इन फूलोंको पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वनमें मैंने विदेहनन्दिनीको दिया था और उन्होंने अपने केशोंमें लगा लिया था॥ २६/

मन्ये सूर्यश्च वायुश्च मेदिनी च यशस्विनी॥ २७॥

अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम्।

‘मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वीने मेरा प्रिय करनेके लिये ही इन फूलोंको सुरक्षित रखा है’॥ २७/

एवमुक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्॥ २८॥

उवाच रामो धर्मात्मा गिरिं प्रस्रवणाकुलम्।

पुरुषप्रवर लक्ष्मणसे ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीरामने झरनोंसे भरे हुए प्रस्रवण गिरिसे कहा—॥ २८/

कच्चित् क्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी॥ २९॥

रामा रम्ये वनोद्देशे मया विरहिता त्वया।

‘पर्वतराज! क्या तुमने इस वनके रमणीय प्रदेशमें मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीताको देखा है?’॥ २९/

क्रुद्धोऽब्रवीद् गिरिं तत्र सिंह: क्षुद्रमृगं यथा॥ ३०॥

तां हेमवर्णां हेमाङ्गीं सीतां दर्शय पर्वत।

यावत् सानूनि सर्वाणि न ते विध्वंसयाम्यहम्॥ ३१॥

तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगको देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वतसे बोले—‘पर्वत! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरोंका विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चनकी-सी काया-कान्तिवाली सीताका मुझे दर्शन करा दो’॥ ३०-३१॥

एवमुक्तस्तु रामेण पर्वतो मैथिलीं प्रति।

दर्शयन्निव तां सीतां नादर्शयत राघवे॥ ३२॥

श्रीरामके द्वारा मैथिलीके लिये ऐसा कहे जानेपर उस पर्वतने सीताको दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजीके समीप वह सीताको साक्षात् उपस्थित न कर सका॥ ३२॥

ततो दाशरथी राम उवाच च शिलोच्चयम्।

मम बाणाग्निनिर्दग्धो भस्मीभूतो भविष्यसि॥ ३३॥

असेव्य: सर्वतश्चैव निस्तृणद्रुमपल्लव:।

तब दशरथनन्दन श्रीरामने उस पर्वतसे कहा—‘अरे! तू मेरे बाणोंकी आगसे जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओरसे तू सेवनके योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे’॥

इमां वा सरितं चाद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण॥ ३४॥

यदि नाख्याति मे सीतामद्य चन्द्रनिभाननाम्।

(इसके बाद वे सुमित्राकुमारसे बोले—) ‘लक्ष्मण! यदि यह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीताका पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा’॥ ३४/

एवं प्ररुषितो रामो दिधक्षन्निव चक्षुषा॥ ३५॥

ददर्श भूमौ निष्क्रान्तं राक्षसस्य पदं महत्।

ऐसा कहकर रोषमें भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टिद्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतनेहीमें उस पर्वत और गोदावरीके समीपकी भूमिपर राक्षसका विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया॥ ३५/

त्रस्ताया रामकांक्षिण्या: प्रधावन्त्या इतस्तत:॥ ३६॥

राक्षसेनानुसृप्ताया वैदेह्याश्च पदानि तु।

साथ ही राक्षसने जिनका पीछा किया था और जो श्रीरामकी अभिलाषा रखकर रावणके भयसे संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीताके चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये॥ ३६/

स समीक्ष्य परिक्रान्तं सीताया राक्षसस्य च॥ ३७॥

भग्नं धनुश्च तूणी च विकीर्णं बहुधा रथम्।

सम्भ्रान्तहृदयो राम: शशंस भ्रातरं प्रियम्॥ ३८॥

सीता और राक्षसके पैरोंके निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ोंमें बिखरे हुए रथको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका हृदय घबरा उठा। वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमारसे बोले—॥ ३७-३८॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या कीर्णा: कनकबिन्दव:।

भूषणानां हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च॥ ३९॥

‘लक्ष्मण! देखो, ये सीताके आभूषणोंमें लगे हुए सोनेके घुँघुरू बिखरे पड़े हैं। सुमित्रानन्दन! उसके नाना प्रकारके हार भी टूटे पड़े हैं॥ ३९॥

तप्तबिन्दुनिकाशैश्च चित्रै: क्षतजबिन्दुभि:।

आवृतं पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणीतलम्॥ ४०॥

‘सुमित्राकुमार! देखो, यहाँकी भूमि सब ओरसे सुवर्णकी बूँदोंके समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओंसे रँगी दिखायी देती है॥ ४०॥

मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसै: कामरूपिभि:।

भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति॥ ४१॥

‘लक्ष्मण! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंने यहाँ सीताके टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपसमें बाँटा और खाया होगा॥

तस्या निमित्तं सीताया द्वयोर्विवदमानयो:।

बभूव युद्धं सौमित्रे घोरं राक्षसयोरिह॥ ४२॥

‘सुमित्रानन्दन! सीताके लिये परस्पर विवाद करनेवाले दो राक्षसोंमें यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है॥ ४२॥

मुक्तामणिचितं चेदं रमणीयं विभूषितम्।

धरण्यां पतितं सौम्य कस्य भग्नं महद् धनु:॥ ४३॥

‘सौम्य! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियोंसे जटित एवं विभूषित किसीका अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है?॥ ४३॥

राक्षसानामिदं वत्स सुराणामथवापि वा।

तरुणादित्यसंकाशं वैदूर्यगुलिकाचितम्॥ ४४॥

‘वत्स! पता नहीं, यह राक्षसोंका है या देवताओंका; यह प्रात:कालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि (नीलम) के टुकड़े जड़े हुए हैं॥ ४४॥

विशीर्णं पतितं भूमौ कवचं कस्य काञ्चनम्।

छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्॥ ४५॥

भग्नदण्डमिदं सौम्य भूमौ कस्य निपातितम्।

‘सौम्य! उधर पृथ्वीपर टूटा हुआ एक सोनेका कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है? दिव्य मालाओंसे सुशोभित यह सौ कमानियोंवाला छत्र किसका है? इसका डंडा टूट गया है और यह धरतीपर गिरा दिया गया है॥ ४५/

काञ्चनोरश्छदाश्चेमे पिशाचवदना: खरा:॥ ४६॥

भीमरूपा महाकाया: कस्य वा निहता रणे।

‘इधर ये पिशाचोंके समान मुखवाले भयंकर रूपधारी गधे मरे पड़े हैं। इनका शरीर बहुत ही विशाल रहा है; इन सबकी छातीमें सोनेके कवच बँधे हैं। ये युद्धमें मारे गये जान पड़ते हैं। पता नहीं ये किसके थे॥

दीप्तपावकसंकाशो द्युतिमान् समरध्वज:॥ ४७॥

अपविद्धश्च भग्नश्च कस्य साङ्ग्रामिको रथ:।

‘तथा संग्राममें काम देनेवाला यह किसका रथ पड़ा है? इसे किसीने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गणमें स्वामीको सूचित करनेवाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्निके समान दमक रहा है॥ ४७/

रथाक्षमात्रा विशिखास्तपनीयविभूषणा:॥ ४८॥

कस्येमे निहता बाणा: प्रकीर्णा घोरदर्शना:।

‘ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं? इनकी लंबाई और मोटाई रथके धुरेके समान प्रतीत होती है। इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्णसे विभूषित हैं॥ ४८/

शरावरौ शरै: पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण॥ ४९॥

प्रतोदाभीषुहस्तोऽयं कस्य वा सारथिर्हत:।

‘लक्ष्मण! उधर देखो, ये बाणोंसे भरे हुए दो तरकस पड़े हैं, जो नष्ट कर दिये गये हैं। यह किसका सारथि मरा पड़ा है, जिसके हाथमें चाबुक और लगाम अभीतक मौजूद हैं॥ ४९/

पदवी पुरुषस्यैषा व्यक्तं कस्यापि रक्षस:॥ ५०॥

वैरं शतगुणं पश्य मम तैर्जीवितान्तकम्।

सुघोरहृदयै: सौम्य राक्षसै: कामरूपिभि:॥ ५१॥

‘सौम्य! यह अवश्य ही किसी राक्षसका पदचिह्न दिखायी देता है। इन अत्यन्त क्रूर हृदयवाले कामरूपी राक्षसोंके साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा॥ ५०-५१॥

हृता मृता वा वैदेही भक्षिता वा तपस्विनी।

न धर्मस्त्रायते सीतां ह्र‌ियमाणां महावने॥ ५२॥

‘अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्युको प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसोंने उसे खा लिया। इस विशाल वनमें हरी जाती हुई सीताकी रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है॥ ५२॥

भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण।

के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ता: सौम्य ममेश्वरा:॥ ५३॥

‘सौम्य लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसोंका ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत्में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करनेमें समर्थ हों॥ ५३॥

कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम्।

अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण॥ ५४॥

‘लक्ष्मण! जो समस्त लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले ‘त्रिपुर-विजय’ आदि शौर्यसे सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभावके कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्यको न जाननेसे उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं॥ ५४॥

मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम्।

निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वरा:॥ ५५॥

‘मैं लोकहितमें तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवोंपर करुणा करनेवाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं (तभी तो इन्होंने सीताकी रक्षा नहीं की है)॥ ५५॥

मां प्राप्य हि गुणो दोष: संवृत्त: पश्य लक्ष्मण।

अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च॥ ५६॥

संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान् सूर्य इवोदित:।

संहृत्यैव गुणान् सर्वान् मम तेज: प्रकाशते॥ ५७॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया (तभी तो मुझे निर्बल मानकर मेरी स्त्रीका अपहरण किया गया है। अत: अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा)। जैसे प्रलयकालमें उदित हुआ महान् सूर्य चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना (चाँदनी) का संहार करके प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसोंका अन्त करनेके लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणोंको समेटकर प्रचण्डरूपमें प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो॥ ५६-५७॥

नैव यक्षा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा:।

किंनरा वा मनुष्या वा सुखं प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण॥ ५८॥

‘लक्ष्मण! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैनसे रहने पायेंगे॥ ५८॥

ममास्त्रबाणसम्पूर्णमाकाशं पश्य लक्ष्मण।

असम्पातं करिष्यामि ह्यद्य त्रैलोक्यचारिणाम्॥ ५९॥

‘सुमित्रानन्दन! देखना, थोड़ी ही देरमें आकाशको मैं अपने चलाये हुए बाणोंसे भर दूँगा और तीन लोकोंमें विचरनेवाले प्राणियोंको हिलने-डुलने भी न दूँगा॥ ५९॥

संनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम् ।

विप्रणष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम् ॥ ६०॥

विनिर्मथितशैलाग्रं शुष्यमाणजलाशयम्।

ध्वस्तद्रुमलतागुल्मं विप्रणाशितसागरम्॥ ६१॥

त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालकर्मणा।

‘ग्रहोंकी गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्यका तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न हो जायगा, पर्वतोंके शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय (नदी-सरोवर आदि) सूख जायँगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रोंका भी नाश कर दिया जायगा। इस तरह मैं सारी त्रिलोकीमें ही कालकी विनाशलीला आरम्भ कर दूँगा॥

न ते कुशलिनीं सीतां प्रदास्यन्ति ममेश्वरा:॥ ६२॥

अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम्।

‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्तमें मुझे सीता देवीको सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे॥ ६२/

नाकाशमुत्पतिष्यन्ति सर्वभूतानि लक्ष्मण॥ ६३॥

मम चापगुणोन्मुक्तैर्बाणजालैर्निरन्तरम्।

‘लक्ष्मण! मेरे धनुषकी प्रत्यञ्चासे छूटे हुए बाणसमूहोंद्वारा आकाशके ठसाठस भर जानेके कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे॥ ६३/

मर्दितं मम नाराचैर्ध्वस्तभ्रान्तमृगद्विजम्॥ ६४॥

समाकुलममर्यादं जगत् पश्याद्य लक्ष्मण।

‘सुमित्रानन्दन! देखो, आज मेरे नाराचोंसे रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादारहित हो जायगा। यहाँके मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भ्रान्त हो जायँगे॥ ६४/

आकर्णपूर्णैरिषुभिर्जीवलोकदुरावरै: ॥ ६५॥

करिष्ये मैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम्।

‘धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणोंको रोकना जीवजगत्के लिये बहुत कठिन होगा। मैं सीताके लिये उन बाणोंद्वारा इस जगत्के समस्त पिशाचों और राक्षसोंका संहार कर डालूँगा॥ ६५/

मम रोषप्रयुक्तानां विशिखानां बलं सुरा:॥ ६६॥

द्रक्ष्यन्त्यद्य विमुक्तानाममर्षाद् दूरगामिनाम्।

‘रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फलरहित दूरगामी बाणोंका बल आज देवतालोग देखेंगे॥ ६६/

नैव देवा न दैतेया न पिशाचा न राक्षसा:॥ ६७॥

भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते।

‘मेरे क्रोधसे त्रिलोकीका विनाश हो जानेपर न देवता रह जायँगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायँगे न राक्षस॥ ६७/

देवदानवयक्षाणां लोका ये रक्षसामपि॥ ६८॥

बहुधा निपतिष्यन्ति बाणौघै: शकलीकृता:।

‘देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसोंके जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहोंसे टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे॥ ६८/

निर्मर्यादानिमाँल्लोकान् करिष्याम्यद्य सायकै:॥ ६९॥

हृतां मृतां वा सौमित्रे न दास्यन्ति ममेश्वरा:।

‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीताको लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकोंकी मारसे इन तीनों लोकोंको मर्यादासे भ्रष्ट कर दूँगा॥ ६९/

तथारूपां हि वैदेहीं न दास्यन्ति यदि प्रियाम्॥ ७०॥

नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।

यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकै:॥ ७१॥

‘यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारीको मुझे उसी रूपमें वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीका नाश कर डालूँगा। जबतक सीताका दर्शन न होगा, तबतक मैं अपने सायकोंसे समस्त संसारको संतप्त करता रहूँगा’॥ ७०-७१॥

इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्ष: स्फुरमाणोष्ठसम्पुट:।

वल्कलाजिनमाबद्ध्य जटाभारमबन्धयत्॥ ७२॥

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, होठ फड़कने लगे। उन्होंने वल्कल और मृगचर्मको अच्छी तरह कसकर अपने जटाभारको भी बाँध लिया॥ ७२॥

तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथाभूतस्य धीमत:।

त्रिपुरं जघ्नुष: पूर्वं रुद्रस्येव बभौ तनु:॥ ७३॥

उस समय क्रोधमें भरकर उस तरह संहारके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीरामका शरीर पूर्वकालमें त्रिपुरका संहार करनेवाले रुद्रके समान प्रतीत होता था॥ ७३॥

लक्ष्मणादथ चादाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम्।

शरमादाय संदीप्तं घोरमाशीविषोपमम्॥ ७४॥

संदधे धनुषि श्रीमान् राम: परपुरञ्जय:।

युगान्ताग्निरिव क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥ ७५॥

उस समय लक्ष्मणके हाथसे धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजीने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्पके समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुषपर रखा। तत्पश्चात् शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम प्रलयाग्निके समान कुपित हो इस प्रकार बोले—॥ ७४-७५॥

यथा जरा यथा मृत्युर्यथा कालो यथा विधि:।

नित्यं न प्रतिहन्यन्ते सर्वभूतेषु लक्ष्मण।

तथाहं क्रोधसंयुक्तो न निवार्योऽस्म्यसंशयम्॥ ७६॥

‘लक्ष्मण! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियोंपर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोधमें भर जानेपर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता॥ ७६॥

पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां

दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम्।

सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं

जगत् सशैलं परिवर्तयाम्यहम्॥ ७७॥

‘यदि देवता आदि आज पहलेकी ही भाँति मनोहर दाँतोंवाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीताको मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतोंसहित सारे संसारको उलट दूँगा’॥ ७७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग:॥ ६४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

 


पञ्चषष्टितम: सर्ग:

लक्ष्मणका श्रीरामको समझा-बुझाकर शान्त करना

तप्यमानं तदा रामं सीताहरणकर्शितम्।

लोकानामभवे युक्तं सांवर्तकमिवानलम्॥ १॥

वीक्षमाणं धनु: सज्यं नि:श्वसन्तं पुन: पुन:।

दग्धुकामं जगत् सर्वं युगान्ते च यथा हरम्॥ २॥

अदृष्टपूर्वं संक्रुद्धं दृष्ट्वा रामं स लक्ष्मण:।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥ ३॥

सीताहरणके शोकसे पीडि़त हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्निके समान समस्त लोकोंका संहार करनेको उद्यत हो गये और धनुषकी डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकालमें रुद्रदेवकी भाँति समस्त संसारको दग्ध कर देनेकी इच्छा करने लगे, तब जिन्हें इस रूपमें पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीरामकी ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँहसे इस प्रकार बोले—॥ १—३॥

पुरा भूत्वा मृदुर्दान्त: सर्वभूतहिते रत:।

न क्रोधवशमापन्न: प्रकृतिं हातुमर्हसि॥ ४॥

‘आर्य! आप पहले कोमल स्वभावसे युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहे हैं। अब क्रोधके वशीभूत होकर अपनी प्रकृति (स्वभाव) का परित्याग न करें॥ ४॥

चन्द्रे लक्ष्मी: प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा।

एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यश:॥ ५॥

‘चन्द्रमामें शोभा, सूर्यमें प्रभा, वायुमें गति और पृथ्वीमें क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आपमें सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है॥ ५॥

एकस्य नापराधेन लोकान् हन्तुं त्वमर्हसि।

ननु जानामि कस्यायं भग्न: सांग्रामिको रथ:॥ ६॥

‘आप किसी एकके अपराधसे समस्त लोकोंका संहार न करें। मैं यह जाननेकी चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है॥ ६॥

केन वा कस्य वा हेतो: सयुग: सपरिच्छद:।

खुरनेमिक्षतश्चायं सिक्तो रुधिरबिन्दुभि:॥ ७॥

देशो निर्वृत्तसंग्राम: सुघोर: पार्थिवात्मज।

एकस्य तु विमर्दोऽयं न द्वयोर्वदतां वर॥ ८॥

नहि वृत्तं हि पश्यामि बलस्य महत: पदम्।

नैकस्य तु कृते लोकान् विनाशयितुमर्हसि॥ ९॥

‘अथवा किसने किस उद्देश्यसे जूए तथा अन्य उपकरणोंसहित इस रथको तोड़ा है? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार! यह स्थान घोड़ोंकी खुरों और थके पहियोंसे खुदा हुआ है; साथ ही खूनकी बूदोंसे सिंच उठा है। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथीका है, दोका नहीं। वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीराम! मैं यहाँ किसी विशाल सेनाका पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अत: किसी एकहीके अपराधके कारण आपको समस्त लोकोंका विनाश नहीं करना चाहिये॥ ७—९॥

युक्तदण्डा हि मृदव: प्रशान्ता वसुधाधिपा:।

सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्य: परमा गति:॥ १०॥

‘क्योंकि राजालोग अपराधके अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाववाले और शान्त होते हैं। आप तो सदा ही समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले तथा उनकी परम गति हैं॥ १०॥

को नु दारप्रणाशं ते साधु मन्येत राघव।

सरित: सागरा: शैला देवगन्धर्वदानवा:॥ ११॥

नालं ते विप्रियं कर्तुं दीक्षितस्येव साधव:।

‘रघुनन्दन! आपकी स्त्रीका विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा? जैसे यज्ञमें दीक्षित हुए पुरुषका साधुस्वभाववाले ऋत्विज् कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव—ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते॥ ११/

येन राजन् हृता सीता तमन्वेषितुमर्हसि॥ १२॥

मद्द्वितीयो धनुष्पाणि: सहायै: परमर्षिभि:।

‘राजन्! जिसने सीताका अपहरण किया है, उसीका अन्वेषण करना चाहिये। आप मेरे साथ धनुष हाथमें लेकर बड़े-बड़े ऋषियोंकी सहायतासे उसका पता लगावें॥ १२/

समुद्रं वा विचेष्याम: पर्वतांश्च वनानि च॥ १३॥

गुहाश्च विविधा घोरा: पद्मिन्यो विविधास्तथा।

देवगन्धर्वलोकांश्च विचेष्याम: समाहिता:॥ १४॥

यावन्नाधिगमिष्यामस्तव भार्यापहारिणम्।

न चेत् साम्ना प्रदास्यन्ति पत्नीं ते त्रिदशेश्वरा:।

कोसलेन्द्र तत: पश्चात् प्राप्तकालं करिष्यसि॥ १५॥

‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्रमें खोजेंगे, पर्वतों और वनोंमें ढूँढ़ेंगे, नाना प्रकारकी भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँतिके सरोवरोंको छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वोंके लोकोंमें भी तलाश करेंगे। जबतक आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले दुरात्माका पता नहीं लगा लेंगे, तबतक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे। कोसलनरेश! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्तावसे देवेश्वरगण आपकी पत्नीका पता नहीं देंगे तो उस अवसरके अनुरूप कार्य आप कीजियेगा॥

शीलेन साम्ना विनयेन सीतां

नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र।

तत: समुत्सादय हेमपुङ्खै-

र्महेन्द्रवज्रप्रतिमै: शरौघै:॥ १६॥

‘नरेन्द्र! यदि अच्छे शील-स्वभाव, सामनीति, विनय और न्यायके अनुसार प्रयत्न करनेपर भी आपको सीताका पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंखवाले महेन्द्रके वज्रतुल्य बाणसमूहोंसे समस्त लोकोंका संहार कर डालें’॥ १६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चषष्टितम: सर्ग:॥ ६५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥

 

षट्षष्टितम: सर्ग:

लक्ष्मणका श्रीरामको समझाना

तं तथा शोकसंतप्तं विलपन्तमनाथवत्।

मोहेन महता युक्तं परिद्यूनमचेतसम्॥ १॥

तत: सौमित्रिराश्वस्य मुहूर्तादिव लक्ष्मण:।

रामं सम्बोधयामास चरणौ चाभिपीडयन्॥ २॥

श्रीरामचन्द्रजी शोकसे संतप्त हो अनाथकी तरह विलाप करने लगे। वे महान् मोहसे युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनका चित्त स्वस्थ नहीं था। उन्हें इस अवस्थामें देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने दो घड़ीतक आश्वासन दिया; फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे—॥ १-२॥

महता तपसा चापि महता चापि कर्मणा।

राज्ञा दशरथेनासील्लब्धोऽमृतमिवामरै:॥ ३॥

‘भैया! हमारे पिता महाराज दशरथने बड़ी तपस्या और महान् कर्मका अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जैसे देवताओंने महान् प्रयाससे अमृत पा लिया था॥ ३॥

तव चैव गुणैर्बद्धस्त्वद्वियोगान्महीपति:।

राजा देवत्वमापन्नो भरतस्य यथा श्रुतम्॥ ४॥

‘आपने भरतके मुँहसे जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणोंसे बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होनेसे देवलोकको प्राप्त हुए॥ ४॥

यदि दु:खमिदं प्राप्तं काकुत्स्थ न सहिष्यसे।

प्राकृतश्चाल्पसत्त्वश्च इतर: क: सहिष्यति॥ ५॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दु:खको आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा?॥ ५॥

आश्वसिहि नरश्रेष्ठ प्राणिन: कस्य नापद:।

संस्पृशन्त्यग्निवद् राजन् क्षणेन व्यपयान्ति च॥ ६॥

‘नरश्रेष्ठ! आप धैर्य धारण करें। संसारमें किस प्राणीपर आपत्तियाँ नहीं आतीं। राजन्! आपत्तियाँ अग्निकी भाँति एक क्षणमें स्पर्श करतीं और दूसरे ही क्षणमें दूर हो जाती हैं॥ ६॥

दु:खितो हि भवाँल्लोकांस्तेजसा यदि धक्ष्यते।

आर्ता: प्रजा नरव्याघ्र क्व नु यास्यन्ति निर्वृतिम्॥ ७॥

‘पुरुषसिंह! यदि आप दु:खी होकर अपने तेजसे समस्त लोकोंको दग्ध कर डालेंगे तो पीडि़त हुई प्रजा किसकी शरणमें जाकर सुख और शान्ति पायेगी॥ ७॥

लोकस्वभाव एवैष ययातिर्नहुषात्मज:।

गत: शक्रेण सालोक्यमनयस्तं समस्पृशत्॥ ८॥

‘यह लोकका स्वभाव ही है कि यहाँ सबपर दु:ख-शोक आता-जाता रहता है। नहुषपुत्र ययाति इन्द्रके समान लोक (देवेन्द्रपद) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्यायमूलक दु:ख उनका स्पर्श किये बिना न रहा॥ ८॥

महर्षिर्यो वसिष्ठस्तु य: पितुर्न: पुरोहित:।

अह्ना पुत्रशतं जज्ञे तथैवास्य पुनर्हतम्॥ ९॥

‘हमारे पिताके पुरोहित जो महर्षि वसिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिनमें सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सब-के-सब विश्वामित्रके हाथसे मारे गये॥

या चेयं जगतो माता सर्वलोकनमस्कृता।

अस्याश्च चलनं भूमेर्दृश्यते कोसलेश्वर॥ १०॥

‘कोसलेश्वर! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है॥ १०॥

यौ धर्मौ जगतो नेत्रौ यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।

आदित्यचन्द्रौ ग्रहणमभ्युपेतौ महाबलौ॥ ११॥

‘जो धर्मके प्रवर्तक और संसारके नेत्र हैं, जिनके आधारपर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहुके द्वारा ग्रहणको प्राप्त होते हैं॥ ११॥

सुमहान्त्यपि भूतानि देवाश्च पुरुषर्षभ।

न दैवस्य प्रमुञ्चन्ति सर्वभूतानि देहिन:॥ १२॥

‘पुरुषप्रवर! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव (प्रारब्ध-कर्म) की अधीनतासे मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है॥ १२॥

शक्रादिष्वपि देवेषु वर्तमानौ नयानयौ।

श्रूयेते नरशार्दूल न त्वं शोचितुमर्हसि॥ १३॥

‘नरश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओंको भी नीति और अनीतिके कारण सुख और दु:खकी प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ १३॥

मृतायामपि वैदेह्यां नष्टायामपि राघव।

शोचितुं नार्हसे वीर यथान्य: प्राकृतस्तथा॥ १४॥

‘वीर रघुनन्दन! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्योंकी तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ १४॥

त्वद्विधा नहि शोचन्ति सततं सर्वदर्शना:।

सुमहत्स्वपि कृच्छ्रेषु रामानिर्विण्णदर्शना:॥ १५॥

‘श्रीराम! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आनेपर भी कभी शोक नहीं करते हैं। वे निर्वेद (खेद) रहित हो अपनी विचारशक्तिको नष्ट नहीं होने देते॥ १५॥

तत्त्वतो हि नरश्रेष्ठ बुद्ध्या समनुचिन्तय।

बुद्ध्या युक्ता महाप्राज्ञा विजानन्ति शुभाशुभे॥ १६॥

‘नरश्रेष्ठ! आप बुद्धिके द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये—क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित—इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं॥ १६॥

अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम्।

नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते॥ १७॥

‘जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं—फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मोंका शुभाशुभ फल उन्हें आचरणमें लाये बिना नहीं प्राप्त होता है॥ १७॥

मामेवं हि पुरा वीर त्वमेव बहुशोक्तवान्।

अनुशिष्याद्धि को नु त्वामपि साक्षाद् बृहस्पति:॥ १८॥

‘वीर! पहले आप ही अनेक बार इस तरहकी बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है। साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देनेकी शक्ति नहीं रखते हैं॥ १८॥

बुद्धिश्च ते महाप्राज्ञ देवैरपि दुरन्वया।

शोकेनाभिप्रसुप्तं ते ज्ञानं सम्बोधयाम्यहम्॥ १९॥

‘महाप्राज्ञ! देवताओंके लिये भी आपकी बुद्धिका पता पाना कठिन है। इस समय शोकके कारण आपका ज्ञान सोया—खोया-सा जान पड़ता है। इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ॥ १९॥

दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम्।

इक्ष्वाकुवृषभावेक्ष्य यतस्व द्विषतां वधे॥ २०॥

‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रमको देखकर उसका अवसरके अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओंके वधका प्रयत्न कीजिये॥ २०॥

किं ते सर्वविनाशेन कृतेन पुरुषर्षभ।

तमेव तु रिपुं पापं विज्ञायोद्धर्तुमर्हसि॥ २१॥

‘पुरुषप्रवर! समस्त संसारका विनाश करनेसे आपको क्या लाभ होगा? उस पापी शत्रुका पता लगाकर उसीको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करना चाहिये’॥ २१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्षष्टितम: सर्ग:॥ ६६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥

 

 


सप्तषष्टितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणकी पक्षिराज जटायुसे भेंट तथा श्रीरामका उन्हें गलेसे लगाकर रोना

पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम्।

सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघव:॥ १॥

भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओंका सार ग्रहण करनेवाले हैं। अवस्थामें बड़े होनेपर भी उन्होंने लक्ष्मणके कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनोंको सुनकर उन्हें स्वीकार किया॥ १॥

स निगृह्य महाबाहु: प्रवृद्धं रोषमात्मन:।

अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीरामने अपने बढ़े हुए रोषको रोका और उस विचित्र धनुषको उतारकर लक्ष्मणसे कहा—॥ २॥

किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण।

केनोपायेन पश्याव: सीतामिह विचिन्तय॥ ३॥

‘वत्स! अब हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ? लक्ष्मण! किस उपायसे हमें सीताका पता लगे? यहाँ इसका विचार करो’॥ ३॥

तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि॥ ४॥

तब लक्ष्मणने इस प्रकार संतापपीडि़त हुए श्रीरामसे कहा—‘भैया! आपको इस जनस्थानमें ही सीताकी खोज करनी चाहिये॥ ४॥

राक्षसैर्बहुभि: कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम्।

सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दरा: कन्दराणि च॥ ५॥

‘नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसोंसे भरा हुआ है। इसमें पर्वतके ऊपर बहुत-से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं॥ ५॥

गुहाश्च विविधा घोरा नानामृगगणाकुला:।

आवासा: किंनराणां च गन्धर्वभवनानि च॥ ६॥

‘वहाँ भाँति-भाँतिकी भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकारके मृगगणोंसे भरी रहती हैं। यहाँके पर्वतपर किन्नरोंके आवासस्थान और गन्धर्वोंके भवन भी हैं॥ ६॥

तानि युक्तो मया सार्धं समन्वेषितुमर्हसि।

त्वद्विधा बुद्धिसम्पन्ना महात्मानो नरर्षभा:॥ ७॥

आपत्सु न प्रकम्पन्ते वायुवेगैरिवाचला:।

‘मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानोंमें एकाग्रचित्त हो सीताकी खोज करें। जैसे पर्वत वायुके वेगसे कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियोंमें विचलित नहीं होते हैं’॥ ७/

इत्युक्तस्तद् वनं सर्वं विचचार सलक्ष्मण:॥ ८॥

क्रुद्धो राम: शरं घोरं संधाय धनुषि क्षुरम्।

उनके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुषपर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वनमें विचरण करने लगे॥ ८/

तत: पर्वतकूटाभं महाभागं द्विजोत्तमम्॥ ९ ॥

ददर्श पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम्।

तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १०॥

थोड़ी ही दूर आगे जानेपर उन्हें पर्वतशिखरके समान विशाल शरीरवाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े जो खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़े थे। पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होनेवाले उन गृध्रराजको देखकर श्रीराम लक्ष्मणसे बोले—॥ ९-१०॥

अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशय:।

गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥ ११॥

‘लक्ष्मण! यह गृध्रके रूपमें अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वनमें घूमता रहता है। नि:संदेह इसीने विदेहराजकुमारी सीताको खा लिया होगा॥ ११॥

भक्षयित्वा विशालाक्षीमास्ते सीतां यथासुखम्।

एनं वधिष्ये दीप्ताग्रै: शरैर्घोरैरजिह्मगै:॥ १२॥

‘विशाललोचना सीताको खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्रभागवाले तथा सीधे जानेवाले अपने भयंकर बाणोंसे इसका वध करूँगा’॥

इत्युक्त्वाभ्यपतद् द्रष्टुं संधाय धनुषि क्षुरम्।

क्रुद्धो राम: समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम्॥ १३॥

ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए श्रीराम धनुषपर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको कम्पित करते हुए उसे देखनेके लिये आगे बढ़े॥ १३॥

तं दीनदीनया वाचा सफेनं रुधिरं वमन्।

अभ्यभाषत पक्षी स रामं दशरथात्मजम्॥ १४॥

इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँहसे फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन-वाणीमें दशरथनन्दन श्रीरामसे बोले—॥ १४॥

यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने।

सा देवी मम च प्राणा रावणेनोभयं हृतम्॥ १५॥

‘आयुष्मन्! इस महान् वनमें तुम जिसे ओषधिके समान ढूँढ़ रहे हो, उस देवी सीताको तथा मेरे इन प्राणोंको भी रावणने हर लिया॥ १५॥

त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन च राघव।

ह्र‌ियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा॥ १६॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारे और लक्ष्मणके न रहनेपर महाबली रावण आया और देवी सीताको हरकर ले जाने लगा। उस समय मेरी दृष्टि सीतापर पड़ी॥ १६॥

सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो।

विध्वंसितरथच्छत्र: पतितो धरणीतले॥ १७॥

‘प्रभो! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीताकी सहायताके लिये दौड़ पड़ा। रावणके साथ मेरा युद्ध हुआ। मैंने उस युद्धमें रावणके रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १७॥

एतदस्य धनुर्भग्नमेते चास्य शरास्तथा।

अयमस्य रणे राम भग्न: सांग्रामिको रथ:॥ १८॥

‘श्रीराम! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्धमें मेरे द्वारा तोड़ डाला गया है॥ १८॥

अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि।

परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावण:॥ १९॥

सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम्।

रक्षसा निहतं पूर्वं मां न हन्तुं त्वमर्हसि॥ २०॥

‘यह रावणका सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखोंसे मार डाला था। जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावणने तलवारसे मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीताको लेकर आकाशमें उड़ गया। मैं उस राक्षसके हाथसे पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो’॥ १९-२०॥

रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम्।

गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनु:॥ २१॥

निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मण:।

द्विगुणीकृततापार्तो रामो धीरतरोऽपि सन्॥ २२॥

सीतासे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायुको गलेसे लगाकर वे शोकसे विवश हो पृथ्वीपर गिर पड़े और लक्ष्मणके साथ ही रोने लगे। अत्यन्त धीर होनेपर भी श्रीरामने उस समय दूने दु:खका अनुभव किया॥ २१-२२॥

एकमेकायने कृच्छ्रे नि:श्वसन्तं मुहुर्मुहु:।

समीक्ष्य दु:खितो राम: सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥ २३॥

असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वासकी संकटपूर्ण अवस्थामें पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायुकी ओर देखकर श्रीरामको बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने सुमित्राकुमारसे कहा—॥ २३॥

राज्यं भ्रष्टं वने वास: सीता नष्टा मृतो द्विज:।

ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्दहेदपि हि पावकम्॥ २४॥

‘लक्ष्मण! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला (पिताजीकी मृत्यु हुई), सीताका अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये। ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्निको भी जलाकर भस्म कर सकता है॥ २४॥

सम्पूर्णमपि चेदद्य प्रतरेयं महोदधिम्।

सोऽपि नूनं ममालक्ष्म्या विशुष्येत् सरितां पति:॥ २५॥

‘यदि आज मैं भरे हुए महासागरको तैरने लगूँ तो मेरे दुर्भाग्यकी आँचसे वह सरिताओंका स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा॥ २५॥

नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् स चराचरे।

येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा॥ २६॥

‘इस चराचर जगत्में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्यके कारण मुझे इस विपत्तिके बड़े भारी जालमें फँसना पड़ा है॥ २६॥

अयं पितुर्वयस्यो मे गृध्रराजो महाबल:।

शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्यविपर्ययात्॥ २७॥

‘ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजीके मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वीपर पड़े हैं’॥ २७॥

इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघव: सहलक्ष्मण:।

जटायुषं च पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन्॥ २८॥

इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने जटायुके शरीरपर हाथ फेरा और पिताके प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया॥ २८॥

निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं

तं गृध्रराजं परिगृह्य राघव:।

क्व मैथिली प्राणसमा गतेति

विमुच्य वाचं निपपात भूमौ॥ २९॥

पङ्ख कट जानेके कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे। उसी अवस्थामें उन्हें गलेसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने पूछा—‘तात! मेरी प्राणोंके समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी?’ इतनी ही बात मुँहसे निकालकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तषष्टितम: सर्ग:॥ ६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥

 

अष्टषष्टितम: सर्ग:

जटायुका प्राण-त्याग और श्रीरामद्वारा उनका दाह-संस्कार

राम: प्रेक्ष्य तु तं गृध्रं भुवि रौद्रेण पातितम्।

सौमित्रिं मित्रसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

भयंकर राक्षस रावणने जिसे पृथ्वीपर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायुकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुणसे सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले—॥ १॥

ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगम:।

राक्षसेन हत: संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते॥ २॥

‘भाई! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षसके द्वारा युद्धमें मारा गया। यह मेरे ही लिये अपने प्राणोंका परित्याग कर रहा है॥

अतिखिन्न: शरीरेऽस्मिन् प्राणो लक्ष्मण विद्यते।

तथा स्वरविहीनोऽयं विक्लवं समुदीक्षते॥ ३॥

‘लक्ष्मण! इस शरीरके भीतर इसके प्राणोंको बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है’॥

जटायो यदि शक्नोषि वाक्यं व्याहरितुं पुन:।

सीतामाख्याहि भद्रं ते वधमाख्याहि चात्मन:॥ ४॥

(लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षीसे बोले—) ‘जटायो! यदि आप पुन: बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीताकी क्या अवस्था है? और आपका वध किस प्रकार हुआ?॥ ४॥

किंनिमित्तो जहारार्यां रावणस्तस्य किं मया।

अपराधं तु यं दृष्ट्वा रावणेन हृता प्रिया॥ ५॥

‘जिस अपराधको देखकर रावणने मेरी प्रिय भार्याका अपहरण किया है, वह अपराध क्या है? और मैंने उसे कब किया? किस निमित्तको लेकर रावणने आर्या सीताका हरण किया है?॥ ५॥

कथं तच्चन्द्रसंकाशं मुखमासीन्मनोहरम्।

सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम॥ ६॥

‘पक्षिप्रवर! सीताका चन्द्रमाके समान मनोहर मुख कैसा हो गया था? तथा उस समय सीताने क्या-क्या बातें कही थीं?॥ ६॥

कथंवीर्य: कथंरूप: किंकर्मा स च राक्षस:।

क्व चास्य भवनं तात ब्रूहि मे परिपृच्छत:॥ ७॥

‘तात! उस राक्षसका बल-पराक्रम तथा रूप कैसा है? वह क्या काम करता है? और उसका घर कहाँ है? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, वह सब बताइये’॥ ७॥

तमुद्वीक्ष्य स धर्मात्मा विलपन्तमनाथवत्।

वाचा विक्लवया राममिदं वचनमब्रवीत्॥ ८॥

इस तरह अनाथकी भाँति विलाप करते हुए श्रीरामकी ओर देखकर धर्मात्मा जटायुने लड़खड़ाती जबानसे यों कहना आरम्भ किया—॥ ८॥

सा हृता राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना।

मायामास्थाय विपुलां वातदुर्दिनसंकुलाम्॥ ९॥

‘रघुनन्दन! दुरात्मा राक्षसराज रावणने विपुल मायाका आश्रय ले आँधी-पानीकी सृष्टि करके (घबराहटकी अवस्थामें) सीताका हरण किया था॥ ९॥

परिक्लान्तस्य मे तात पक्षौ छित्त्वा निशाचर:।

सीतामादाय वैदेहीं प्रयातो दक्षिणामुख:॥ १०॥

‘तात! जब मैं उससे लड़ता-लड़ता थक गया, उस अवस्थामें मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको साथ लिये यहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर गया था॥ १०॥

उपरुध्यन्ति मे प्राणा दृष्टिर्भ्रमति राघव।

पश्यामि वृक्षान् सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान्॥ ११॥

‘रघुनन्दन! अब मेरे प्राणोंकी गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंगके दिखायी देते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षोंपर खशके केश जमे हुए हैं॥ ११॥

येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावण:।

विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते॥ १२॥

विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत्।

त्वत्प्रियां जानकीं हृत्वा रावणो राक्षसेश्वर:।

झषवद् बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति॥ १३॥

‘रावण सीताको जिस मुहूर्तमें ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामीको मिल जाता है। काकुत्स्थ! वह ‘विन्द’ नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षसको इसका पता नहीं था। जैसे मछली मौतके लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीताको ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा॥ १२-१३॥

न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुतां प्रति।

वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रं हत्वा तं रणमूर्धनि॥ १४॥

‘अत: अब तुम जनकनन्दिनीके लिये अपने मनमें खेद न करो। संग्रामके मुहानेपर उस निशाचरका वध करके तुम शीघ्र ही पुन: विदेहराजकुमारीके साथ विहार करोगे’॥ १४॥

असम्मूढस्य गृध्रस्य रामं प्रत्यनुभाषत:।

आस्यात् सुस्राव रुधिरं म्रियमाणस्य सामिषम्॥ १५॥

गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मनपर मोह या भ्रम नहीं छाया था (उनके होश-हवास ठीक थे)। वे श्रीरामचन्द्रजीको उनकी बातका उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुखसे मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा॥ १५॥

पुत्रो विश्रवस: साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च।

इत्युक्त्वा दुर्लभान् प्राणान् मुमोच पतगेश्वर:॥ १६॥

वे बोले—‘रावण विश्रवाका पुत्र और कुबेरका सगा भाई है’ इतना कहकर उन पक्षिराजने दुर्लभ प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ १६॥

ब्रूहि ब्रूहीति रामस्य ब्रुवाणस्य कृताञ्जले:।

त्यक्त्वा शरीरं गृध्रस्य प्राणा जग्मुर्विहायसम्॥ १७॥

श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, ‘कहिये, कहिये, कुछ और कहिये!’ किंतु उस समय गृध्रराजके प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाशमें चले गये॥ १७॥

स निक्षिप्य शिरो भूमौ प्रसार्य चरणौ तथा।

विक्षिप्य च शरीरं स्वं पपात धरणीतले॥ १८॥

उन्होंने अपना मस्तक भूमिपर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीरको भी पृथ्वीपर ही डालते हुए वे धराशायी हो गये॥ १८॥

तं गृध्रं प्रेक्ष्य ताम्राक्षं गतासुमचलोपमम्।

राम: सुबहुभिर्दु:खैर्दीन: सौमित्रिमब्रवीत्॥ १९॥

गृध्रराज जटायुकी आँखें लाल दिखायी देती थीं। प्राण निकल जानेसे वे पर्वतके समान अविचल हो गये। उन्हें इस अवस्थामें देखकर बहुत-से दु:खोंसे दु:खी हुए श्रीरामचन्द्रजीने सुमित्राकुमारसे कहा—॥ १९॥

बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।

अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥ २०॥

‘लक्ष्मण! राक्षसोंके निवासस्थान इस दण्डकारण्यमें बहुत वर्षोंतक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराजने यहीं अपने शरीरका त्याग किया है॥ २०॥

अनेकवार्षिको यस्तु चिरकालसमुत्थित:।

सोऽयमद्य हत: शेते कालो हि दुरतिक्रम:॥ २१॥

‘इनकी अवस्था बहुत वर्षोंकी थी। इन्होंने सुदीर्घ कालतक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धावस्थामें उस राक्षसके द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वीपर सो रहे हैं; क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है॥ २१॥

पश्य लक्ष्मण गृध्रोऽयमुपकारी हतश्च मे।

सीतामभ्यवपन्नो हि रावणेन बलीयसा॥ २२॥

‘लक्ष्मण! देखो, ये जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये। सीताकी रक्षाके लिये युद्धमें प्रवृत्त होनेपर अत्यन्त बलवान् रावणके हाथसे इनका वध हुआ है॥ २२॥

गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत्।

मम हेतोरयं प्राणान् मुमोच पतगेश्वर:॥ २३॥

‘बाप-दादोंके द्वारा प्राप्त हुए गीधोंके विशाल राज्यका त्याग करके इन पक्षिराजने मेरे ही लिये अपने प्राणोंकी आहुति दी है॥ २३॥

सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिण:।

शूरा: शरण्या: सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि॥ २४॥

‘शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं। पशु-पक्षीकी योनियोंमें भी उनका अभाव नहीं है॥ २४॥

सीताहरणजं दु:खं न मे सौम्य तथागतम्।

यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥ २५॥

‘सौम्य! शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण! इस समय मुझे सीताके हरणका उतना दु:ख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राणत्याग करनेवाले जटायुकी मृत्युसे हो रहा है॥ २५॥

राजा दशरथ: श्रीमान् यथा मम महायशा:।

पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वर:॥ २६॥

‘महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं॥ २६॥

सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम्।

गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम्॥ २७॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्युको प्राप्त हुए इन गृध्रराजका दाह-संस्कार करूँगा॥ २७॥

नाथं पतगलोकस्य चितिमारोपयाम्यहम्।

इमं धक्ष्यामि सौमित्रे हतं रौद्रेण रक्षसा॥ २८॥

‘सुमित्राकुमार! उस भयंकर राक्षसके द्वारा मारे गये इन पक्षिराजको मैं चितापर चढ़ाऊँगा और इनका दाह-संस्कार करूँगा’॥ २८॥

या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्च या गति:।

अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम्॥ २९॥

मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान्।

गृध्रराज महासत्त्व संस्कृतश्च मया व्रज॥ ३०॥

(फिर वे जटायुको सम्बोधित करके बोले—) ‘महान् बलशाली गृध्रराज! यज्ञ करनेवाले, अग्निहोत्री, युद्धमें पीठ न दिखानेवाले और भूमिदान करनेवाले पुरुषोंको जिस गतिकी—जिन उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञासे उन्हीं सर्वोत्तम लोकोंमें तुम भी जाओ। मेरे द्वारा दाह-संस्कार किये जानेपर तुम्हारी सद्गति हो’॥

एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम्।

ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दु:खित:॥ ३१॥

ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दु:खित हो पक्षिराजके शरीरको चितापर रखा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धुकी भाँति उनका दाह-संस्कार किया॥

रामोऽथ सहसौमित्रिर्वनं गत्वा स वीर्यवान्।

स्थूलान् हत्वा महारोहीननुतस्तार तं द्विजम्॥ ३२॥

रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशीकृत्वा महायशा:।

शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशाद्वले॥ ३३॥

तदनन्तर लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीराम वनमें जाकर मोटे-मोटे महारोही (कन्दमूल विशेष) काट लाये और उन्हें जटायुके लिये अर्पित करनेके उद्देश्यसे उन्होंने पृथ्वीपर कुश बिछाये। महायशस्वी श्रीरामने रोहीके गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओंपर जटायुको पिण्डदान किया॥ ३२-३३॥

यत् तत् प्रेतस्य मर्त्यस्य कथयन्ति द्विजातय:।

तत् स्वर्गगमनं पित्र्यं तस्य रामो जजाप ह॥ ३४॥

ब्राह्मणलोग परलोकवासी मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रोंका जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीरामने जप किया॥ ३४॥

ततो गोदावरीं गत्वा नदीं नरवरात्मजौ।

उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ॥ ३५॥

तदनन्तर उन दोनों राजकुमारोंने गोदावरी नदीके तटपर जाकर उन गृध्रराजके लिये जलाञ्जलि दी॥ ३५॥

शास्त्रदृष्टेन विधिना जलं गृध्राय राघवौ।

स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा॥ ३६॥

रघुकुलके उन दोनों महापुरुषोंने गोदावरीमें नहाकर शास्त्रीय विधिसे उन गृध्रराजके लिये उस समय जलाञ्जलिका दान किया॥ ३६॥

स गृध्रराज: कृतवान् यशस्करं

सुदुष्करं कर्म रणे निपातित:।

महर्षिकल्पेन च संस्कृतस्तदा

जगाम पुण्यां गतिमात्मन: शुभाम्॥ ३७॥

महर्षितुल्य श्रीरामके द्वारा दाहसंस्कार होनेके कारण गृध्रराज जटायुको आत्माका कल्याण करनेवाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई। उन्होंने रणभूमिमें अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था। परंतु अन्तमें रावणने उन्हें मार गिराया॥ ३७॥

कृतोदकौ तावपि पक्षिसत्तमे

स्थिरां च बुद्धिं प्रणिधाय जग्मतु:।

प्रवेश्य सीताधिगमे ततो मनो

वनं सुरेन्द्राविव विष्णुवासवौ॥ ३८॥

तर्पण करनेके पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज जटायुमें पितृतुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीताकी खोजके कार्यमें मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्रकी भाँति वनमें आगे बढ़े॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टषष्टितम: सर्ग:॥ ६८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥

 

एकोनसप्ततितम: सर्ग:

लक्ष्मणका अयोमुखीको दण्ड देना तथा श्रीराम और लक्ष्मणका कबन्धके बाहुबन्धमें पड़कर चिन्तित होना

कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा।

अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतु: पश्चिमां दिशम्॥ १॥

इस प्रकार जटायुके लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए और वनमें सीताकी खोज करते हुए पश्चिम दिशा (नैऋर्त्य कोण) की ओर गये॥ १॥

तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ।

अविप्रहतमैक्ष्वाकौ पन्थानं प्रतिपेदतु:॥ २॥

धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण-पश्चिम दिशाकी ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जिसपर लोगोंका आना-जाना नहीं होता था॥ २॥

गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम्।

आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम्॥ ३॥

वह मार्ग बहुत-से वृक्षों, झाडि़यों और लता-बेलोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ था। वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखनेमें भयंकर था॥ ३॥

व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम्।

सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ॥ ४॥

उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वनसे आगे निकल गये॥ ४॥

तत: परं जनस्थानात् त्रिकोशं गम्य राघवौ।

क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तौ महौजसौ॥ ५॥

तदनन्तर जनस्थानसे तीन कोस दूर जाकर वे महाबली श्रीराम और लक्ष्मण क्रौञ्चारण्य नामसे प्रसिद्ध गहन वनके भीतर गये॥ ५॥

नानामेघघनप्रख्यं प्रहृष्टमिव सर्वत:।

नानावर्णै: शुभै: पुष्पैर्मृगपक्षिगणैर्युतम्॥ ६॥

वह वन अनेक मेघोंके समूहकी भाँति श्याम प्रतीत होता था। विविध रंगके सुन्दर फूलोंसे सुशोभित होनेके कारण वह सब ओरसे हर्षोत्फुल्ल-सा जान पड़ता था। उसके भीतर बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते थे॥ ६॥

दिदृक्षमाणौ वैदेहीं तद् वनं तौ विचिक्यतु:।

तत्र तत्रावतिष्ठन्तौ सीताहरणदु:खितौ॥ ७॥

सीताका पता लगानेकी इच्छासे वे दोनों उस वनमें उनकी खोज करने लगे। जहाँ-तहाँ थक जानेपर वे विश्रामके लिये ठहर जाते थे। विदेहनन्दिनीके अपहरणसे उन्हें बड़ा दु:ख हो रहा था॥ ७॥

तत: पूर्वेण तौ गत्वा त्रिक्रोशं भ्रातरौ तदा।

क्रौञ्चारण्यमतिक्रम्य मतङ्गाश्रममन्तरे॥ ८॥

तत्पश्चात् वे दोनों भाई तीन कोस पूर्व जाकर क्रौञ्चारण्यको पार करके मतङ्ग मुनिके आश्रमके पास गये॥ ८॥

दृष्ट्वा तु तद् वनं घोरं बहुभीममृगद्विजम्।

नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वं गहनपादपम्॥ ९॥

वह वन बड़ा भयंकर था। उसमें बहुत-से भयानक पशु और पक्षी निवास करते थे। अनेक प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त वह सारा वन गहन वृक्षावलियोंसे भरा था॥ ९॥

ददृशाते गिरौ तत्र दरीं दशरथात्मजौ।

पातालसमगम्भीरां तमसा नित्यसंवृताम्॥ १०॥

वहाँ पहुँचकर उन दशरथराजकुमारोंने वहाँके पर्वतपर एक गुफा देखी, जो पातालके समान गहरी थी। वह सदा अन्धकारसे आवृत रहती थी॥ १०॥

आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्याविदूरत:।

ददर्शतुर्महारूपां राक्षसीं विकृताननाम्॥ ११॥

उसके समीप जाकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने एक विशालकाय राक्षसी देखी, जिसका मुख बड़ा विकराल था॥

भयदामल्पसत्त्वानां बीभत्सां रौद्रदर्शनाम्।

लम्बोदरीं तीक्ष्णदंष्ट्रां करालीं परुषत्वचम्॥ १२॥

वह छोटे-छोटे जन्तुओंको भय देनेवाली तथा देखनेमें बड़ी भयंकर थी। उसकी सूरत देखकर घृणा होती थी। उसके लंबे पेट, तीखी दाढें और कठोर त्वचा थी। वह बड़ी विकराल दिखायी देती थी॥ १२॥

भक्षयन्तीं मृगान् भीमान् विकटां मुक्तमूर्धजाम्।

अवैक्षतां तु तौ तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १३॥

भयानक पशुओंको भी पकड़कर खा जाती थी। उसका आकार विकट था और बाल खुले हुए थे। उस कन्दराके समीप दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने उसे देखा॥ १३॥

सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तं भ्रातुरग्रत:।

एहि रंस्यावहेत्युक्त्वा समालम्भत लक्ष्मणम्॥ १४॥

वह राक्षसी उन दोनों वीरोंके पास आयी और अपने भाईके आगे-आगे चलते हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर बोली—‘आओ हम दोनों रमण करें।’ ऐसा कहकर उसने लक्ष्मणका हाथ पकड़ लिया॥ १४॥

उवाच चैनं वचनं सौमित्रिमुपगुह्य च।

अहं त्वयोमुखी नाम लाभस्ते त्वमसि प्रिय:॥ १५॥

इतना ही नहीं, उसने सुमित्राकुमारको अपनी भुजाओंमें कस लिया और इस प्रकार कहा—‘मेरा नाम अयोमुखी है। मैं तुम्हें भार्यारूपसे मिल गयी तो समझ लो, बहुत बड़ा लाभ हुआ और तुम मेरे प्यारे पति हो’॥ १५॥

नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च।

आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे॥ १६॥

‘प्राणनाथ! वीर! यह दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाकर तुम पर्वतकी दुर्गम कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर मेरे साथ सदा रमण करोगे’॥ १६॥

एवमुक्तस्तु कुपित: खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मण:।

कर्णनासस्तनं तस्या निचकर्तारिसूदन:॥ १७॥

राक्षसीके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन लक्ष्मण क्रोधसे जल उठे। उन्होंने तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन काट डाले॥ १७॥

कर्णनासे निकृत्ते तु विस्वरं विननाद सा।

यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी घोरदर्शना॥ १८॥

नाक और कानके कट जानेपर वह भयंकर राक्षसी जोर-जोरसे चिल्लाने लगी और जहाँसे आयी थी, उधर ही भाग गयी॥ १८॥

तस्यां गतायां गहनं व्रजन्तौ वनमोजसा।

आसेदतुरमित्रघ्नौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १९॥

उसके चले जानेपर वे दोनों भाई शक्तिशाली श्रीराम और लक्ष्मण बड़े वेगसे चलकर एक गहन वनमें जा पहुँचे॥ १९॥

लक्ष्मणस्तु महातेजा: सत्त्ववाञ्छीलवाञ्छुचि:।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम्॥ २०॥

उस समय महातेजस्वी, धैर्यवान्, सुशील एवं पवित्र आचार-विचारवाले लक्ष्मणने हाथ जोड़कर अपने तेजस्वी भ्राता श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ २०॥

स्पन्दते मे दृढं बाहुरुद्विग्नमिव मे मन:।

प्रायशश्चाप्यनिष्टानि निमित्तान्युपलक्षये॥ २१॥

तस्मात् सज्जीभवार्य त्वं कुरुष्व वचनं मम।

ममैव हि निमित्तानि सद्य: शंसन्ति सम्भ्रमम्॥ २२॥

‘आर्य! मेरी बायीं बाँह जोर-जोरसे फड़क रही है और मन उद्विग्न-सा हो रहा है। मुझे बार-बार बुरे शकुन दिखायी देते हैं, इसलिये आप भयका सामना करनेके लिये तैयार हो जाइये। मेरी बात मानिये। ये जो बुरे शकुन हैं, वे केवल मुझे ही तत्काल प्राप्त होनेवाले भयकी सूचना देते हैं॥ २१-२२॥

एष वञ्जुलको नाम पक्षी परमदारुण:।

आवयोर्विजयं युद्धे शंसन्निव विनर्दति॥ २३॥

‘(इसके साथ एक शुभ शकुन भी हो रहा है) यह जो वञ्जुल नामक अत्यन्त दारुण पक्षी है, यह युद्धमें हम दोनोंकी विजय सूचित करता हुआ-सा जोर-जोरसे बोल रहा है’॥ २३॥

तयोरन्वेषतोरेवं सर्वं तद् वनमोजसा।

संजज्ञे विपुल: शब्द: प्रभञ्जन्निव तद् वनम्॥ २४॥

इस प्रकार बलपूर्वक उस सारे वनमें वे दोनों भाई जब सीताकी खोज कर रहे थे, उसी समय वहाँ बड़े जोरका शब्द हुआ, जो उस वनका विध्वंस करता हुआ-सा प्रतीत होता था॥ २४॥

संवेष्टितमिवात्यर्थं गहनं मातरिश्वना।

वनस्य तस्य शब्दोऽभूद् वनमापूरयन्निव॥ २५॥

उस वनमें जोर-जोरसे आँधी चलने लगी। वह सारा वन उसकी लपेटमें आ गया। वनमें उस शब्दकी जो प्रतिध्वनि उठी, उससे वह सारा वनप्रान्त गूँज उठा॥ २५॥

तं शब्दं कांक्षमाणस्तु राम: खड्गी सहानुज:।

ददर्श सुमहाकायं राक्षसं विपुलोरसम्॥ २६॥

भाईके साथ तलवार हाथमें लिये भगवान् श्रीराम उस शब्दका पता लगाना ही चाहते थे कि एक चौड़ी छातीवाले विशालकाय राक्षसपर उनकी दृष्टि पड़ी॥ २६॥

आसेदतुश्च तद्रक्षस्तावुभौ प्रमुखे स्थितम्।

विवृद्धमशिरोग्रीवं कबन्धमुदरेमुखम्॥ २७॥

उन दोनों भाइयोंने उस राक्षसको अपने सामने खड़ा पाया। वह देखनेमें बहुत बड़ा था; किंतु उसके न मस्तक था न गला। कबन्ध (धड़मात्र) ही उसका स्वरूप था और उसके पेटमें ही मुँह बना हुआ था॥

रोमभिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम् ।

नीलमेघनिभं रौद्रं मेघस्तनितनि:स्वनम्॥ २८॥

उसके सारे शरीरमें पैने और तीखे रोयें थे। वह महान् पर्वतके समान ऊँचा था। उसकी आकृति बड़ी भयंकर थी। वह नील मेघके समान काला था और मेघके समान ही गम्भीर स्वरमें गर्जना करता था॥ २८॥

अग्निज्वालानिकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता।

महापक्षेण पिङ्गेन विपुलेनायतेन च॥ २९॥

एकेनोरसि घोरेण नयनेन सुदर्शिना।

महादंष्ट्रोपपन्नं तं लेलिहानं महामुखम्॥ ३०॥

उसकी छातीमें ही ललाट था और ललाटमें एक ही लंबी-चौड़ी तथा आगकी ज्वालाके समान दहकती हुई भयंकर आँख थी, जो अच्छी तरह देख सकती थी। उसकी पलक बहुत बड़ी थी और वह आँख भूरे रंगकी थी। उस राक्षसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभसे अपने विशाल मुखको बारंबार चाट रहा था॥ २९-३०॥

भक्षयन्तं महाघोरानृक्षसिंहमृगद्विजान्।

घोरौ भुजौ विकुर्वाणमुभौ योजनमायतौ॥ ३१॥

कराभ्यां विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षिगणान् मृगान्।

आकर्षन्तं विकर्षन्तमनेकान् मृगयूथपान्॥ ३२॥

अत्यन्त भयंकर रीछ, सिंह, हिंसक पशु और पक्षी—ये ही उसके भोजन थे। वह अपनी एक-एक योजन लंबी दोनों भयानक भुजाओंको दूरतक फैला देता और उन दोनों हाथोंसे नाना प्रकारके अनेकों भालू, पक्षी, पशु तथा मृगोंके यूथपतियोंको पकड़कर खींच लेता था। उनमेंसे जो उसे भोजनके लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओंको वह उन्हीं हाथोंसे पीछे ढकेल देता था॥ ३१-३२॥

स्थितमावृत्य पन्थानं तयोर्भ्रात्रो: प्रपन्नयो:।

अथ तं समतिक्रम्य क्रोशमात्रं ददर्शतु:॥ ३३॥

महान्तं दारुणं भीमं कबन्धं भुजसंवृतम्।

कबन्धमिव संस्थानादतिघोरप्रदर्शनम्॥ ३४॥

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौरसे उसे देखने लगे। उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा। उस राक्षसकी आकृति केवल कबन्ध (धड़) के ही रूपमें थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था। वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त था और देखनेमें अत्यन्त घोर प्रतीत होता था॥ ३३-३४॥

स महाबाहुरत्यर्थं प्रसार्य विपुलौ भुजौ।

जग्राह सहितावेव राघवौ पीडयन् बलात्॥ ३५॥

उस महाबाहु राक्षसने अपनी दोनों विशाल भुजाओंको फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया॥ ३५॥

खड्गिनौ दृढधन्वानौ तिग्मतेजौ महाभुजौ।

भ्रातरौ विवशं प्राप्तौ कृष्यमाणौ महाबलौ॥ ३६॥

दोनोंके हाथोंमें तलवारें थीं, दोनोंके पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओंसे युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षसके द्वारा खींचे जानेपर विवशताका अनुभव करने लगे॥ ३६॥

तत्र धैर्याच्च शूरस्तु राघवो नैव विव्यथे।

बाल्यादनाश्रयाच्चैव लक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे॥ ३७॥

उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्यके कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्यका आश्रय न लेनेके कारण लक्ष्मणके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ ३७॥

उवाच च विषण्ण: सन् राघवं राघवानुज:।

पश्य मां विवशं वीर राक्षसस्य वशंगतम्॥ ३८॥

तब श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीसे बोले—‘वीरवर! देखिये, मैं राक्षसके वशमें पड़कर विवश हो गया हूँ॥ ३८॥

मयैकेन तु निर्युक्त: परिमुच्यस्व राघव।

मां हि भूतबलिं दत्त्वा पलायस्व यथासुखम्॥ ३९॥

‘रघुनन्दन! एकमात्र मुझे ही इस राक्षसको भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धनसे मुक्त हो जाइये। इस भूतको मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँसे निकल भागिये॥ ३९॥

अधिगन्तासि वैदेहीमचिरेणेति मे मति:।

प्रतिलभ्य च काकुत्स्थ पितृपैतामहीं महीम्॥ ४०॥

तत्र मां राम राज्यस्थ: स्मर्तुमर्हसि सर्वदा।

‘मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेह-राजकुमारीको प्राप्त कर लेंगे। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! वनवाससे लौटनेपर पिता-पितामहोंकी भूमिको अपने अधिकारमें लेकर जब आप राज-सिंहासनपर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा’॥ ४०॥

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम: सौमित्रिमब्रवीत्॥ ४१॥

मा स्म त्रासं वृथा वीर नहि त्वादृग् विषीदति।

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामने उन सुमित्रा-कुमारसे कहा—‘वीर! तुम भयभीत न होओ। तुम्हारे-जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं’॥ ४१॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रूरो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ ४२॥

तावुवाच महाबाहु: कबन्धो दानवोत्तम:।

इसी बीचमें क्रूर हृदयवाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्धने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—॥ ४२॥

कौ युवां वृषभस्कन्धौ महाखड्गधनुर्धरौ॥ ४३॥

घोरं देशमिमं प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ।

वदतं कार्यमिह वां किमर्थं चागतौ युवाम्॥ ४४॥

‘तुम दोनों कौन हो? तुम्हारे कंधे बैलके समान ऊँचे हैं। तुमने बड़ी-बड़ी तलवारें और धनुष धारण कर रखे हैं। इस भयंकर देशमें तुम दोनों किसलिये आये हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है? बताओ। भाग्यसे ही तुम दोनों मेरी आँखोंके सामने पड़ गये॥ ४३-४४॥

इमं देशमनुप्राप्तौ क्षुधार्तस्येह तिष्ठत:।

सबाणचापखड्गौ च तीक्ष्णशृङ्गाविवर्षभौ॥ ४५॥

मां तूर्णमनुसम्प्राप्तौ दुर्लभं जीवितं हि वाम्।

‘मैं यहाँ भूखसे पीडि़त होकर खड़ा था और तुम स्वयं धनुष-बाण और खड्ग लिये तीखे सींगवाले दो बैलोंके समान तुरंत ही इस स्थानपर मेरे निकट आ पहुँचे। अत: अब तुम दोनोंका जीवित रहना कठिन है’॥ ४५/

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कबन्धस्य दुरात्मन:॥ ४६॥

उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता।

कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरं प्राप्य दारुणं सत्यविक्रम॥ ४७॥

व्यसनं जीवितान्ताय प्राप्तमप्राप्य तां प्रियाम्।

दुरात्मा कबन्धकी ये बातें सुनकर श्रीरामने सूखे मुखवाले लक्ष्मणसे कहा—‘सत्यपराक्रमी वीर! कठिन-से-कठिन असह्य दु:खको पाकर हम दु:खी थे ही, तबतक पुन: प्रियतमा सीताके प्राप्त होनेसे पहले ही हम दोनोंपर यह महान् संकट आ गया, जो जीवनका अन्त कर देनेवाला है॥ ४६-४७/

कालस्य सुमहद् वीर्यं सर्वभूतेषु लक्ष्मण॥ ४८॥

त्वां च मां च नरव्याघ्र व्यसनै: पश्य मोहितौ।

नहि भारोऽस्ति दैवस्य सर्वभूतेषु लक्ष्मण॥ ४९॥

‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! कालका महान् बल सभी प्राणियोंपर अपना प्रभाव डालता है। देखो न, तुम और मैं दोनों ही कालके दिये हुए अनेकानेक संकटोंसे मोहित हो रहे हैं। सुमित्रानन्दन! दैव अथवा कालके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करना भाररूप (कठिन) नहीं है॥ ४८-४९॥

शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च रणाजिरे।

कालाभिपन्ना: सीदन्ति यथा वालुकसेतव:॥ ५०॥

‘जैसे बालूके बने हुए पुल पानीके आघातसे ढह जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता पुरुष भी समराङ्गणमें कालके वशीभूत हो कष्टमें पड़ जाते हैं’॥ ५०॥

इति ब्रुवाणो दृढसत्यविक्रमो

महायशा दाशरथि: प्रतापवान्।

अवेक्ष्य सौमित्रिमुदग्रविक्रम:

स्थिरां तदा स्वां मतिमात्मनाकरोत्॥ ५१॥

ऐसा कहकर सुदृढ़ एवं सत्यपराक्रमवाले महान् बल-विक्रमसे सम्पन्न महायशस्वी प्रतापशाली दशरथनन्दन श्रीरामने सुमित्राकुमारकी ओर देखकर उस समय स्वयं ही अपनी बुद्धिको सुस्थिर कर लिया॥ ५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनसप्ततितम: सर्ग:॥ ६९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥

 

सप्ततितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणका परस्पर विचार करके कबन्धकी दोनों भुजाओंको
काट डालना तथा कबन्धके द्वारा उनका स्वागत

तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

अपने बाहुपाशसे घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणकी ओर देखकर कबन्धने कहा—॥ १॥

तिष्ठत: किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ।

आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ॥ २॥

‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूखसे पीडि़त देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँहमें चले आओ) क्योंकि दैवने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनोंकी बुद्धि मारी गयी है’॥ २॥

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा।

उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चय:॥ ३॥

यह सुनकर पीडि़त हुए लक्ष्मणने उस समय पराक्रमका ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही—॥ ३॥

त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधम:।

तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू॥ ४॥

‘भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँहमें ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारोंसे इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें॥ ४॥

भीषणोऽयं महाकायो राक्षसा भुजविक्रम:।

लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति॥ ५॥

‘यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है। इसकी भुजाओंमें ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है। यह समस्त संसारको सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगोंको भी यहाँ मार डालना चाहता है॥ ५॥

निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपते:।

क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव॥ ६॥

‘राजन्! रघुनन्दन! यज्ञमें लाये गये पशुओंके समान निश्चेष्ट प्राणियोंका वध राजाके लिये निन्दित बताया गया है (इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओंका ही उच्छेद कर देना चाहिये)’॥ ६॥

एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयो: क्रुद्धस्तु राक्षस:।

विदार्यास्यं ततो रौद्रं तौ भक्षयितुमारभत्॥ ७॥

उन दोनोंकी यह बातचीत सुनकर उस राक्षसको बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जानेको उद्यत हो गया॥ ७॥

ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ।

अच्छिन्दन्तां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशत:॥ ८॥

इतनेमें ही देश-काल (अवसर) का ज्ञान रखनेवाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंने अत्यन्त हर्षमें भरकर तलवारोंसे ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधोंसे काट गिरायीं॥ ८॥

दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना तत:।

चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मण:॥ ९॥

भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भागमें खड़े थे। उन्होंने अपनी तलवारसे उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावटके वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भागमें खड़े वीर लक्ष्मणने उसकी बायीं भुजाको तलवारसे उड़ा दिया॥ ९॥

स पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वन:।

खं च गां च दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा॥ १०॥

भुजाएँ कट जानेपर वह महाबाहु राक्षस मेघके समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओंको गुँजाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा॥ १०॥

स निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुत:।

दीन: पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानव:॥ ११॥

अपनी भुजाओंको कटी हुई देख खूनसे लथपथ हुए उस दानवने दीन वाणीमें पूछा—‘वीरो! तुम दोनों कौन हो?’॥ ११॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मण: शुभलक्षण:।

शशंस तस्य काकुस्त्थं कबन्धस्य महाबल:॥ १२॥

कबन्धके इस प्रकार पूछनेपर शुभ लक्षणोंवाले महाबली लक्ष्मणने उसे श्रीरामचन्द्रजीका परिचय देना आरम्भ किया—॥ १२॥

अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनै: श्रुत:।

तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां च लक्ष्मणम्॥ १३॥

‘ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके पुत्र हैं और लोगोंमें श्रीराम नामसे विख्यात हैं। मुझे इन्हींका छोटा भाई समझो। मेरा नाम लक्ष्मण है॥ १३॥

मात्रा प्रतिहते राज्ये राम: प्रव्राजितो वनम्।

मया सह चरत्येष भार्यया च महद् वनम्॥ १४॥

अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने।

रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ॥ १५॥

‘माता कैकेयीके द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिताकी आज्ञासे वनमें चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नीके साथ इस विशाल वनमें विचरण करने लगे। इस निर्जन वनमें रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजीकी पत्नीको किसी राक्षसने हर लिया है। उन्हींका पता लगानेकी इच्छासे हमलोग यहाँ आये हैं॥ १४-१५॥

त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने।

आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजङ्घो विचेष्टसे॥ १६॥

‘तुम कौन हो? और कबन्धके समान रूप धारण करके क्यों इस वनमें पड़े हो? छातीके नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा (पिण्डली) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो?’॥ १६॥

एवमुक्त: कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वच:।

उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन्॥ १७॥

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर कबन्धको इन्द्रकी कही हुई बातका स्मरण हो आया। अत: उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ लक्ष्मणको उनकी बातका उत्तर दिया—॥ १७॥

स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम्।

दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ॥ १८॥

‘पुरुषसिंह वीरो! आप दोनोंका स्वागत है। बड़े भाग्यसे मुझे आपलोगोंका दर्शन मिला है। ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं। सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंने इन्हें काट डाला॥ १८॥

विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा।

तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वत: शंसतस्तव॥ १९॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डताका फल है। यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। आप मुझसे सुनें’॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्ततितम: सर्ग:॥ ७०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥

 

एकसप्ततितम: सर्ग:

कबन्धकी आत्मकथा, अपने शरीरका दाह हो जानेपर उसका श्रीरामको सीताके अन्वेषणमें सहायता देनेका आश्वासन

पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम्।

रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १॥

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकालमें मेरा रूप महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकोंमें विख्यात था॥ १॥

यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपु:।

सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥ २॥

ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्तत:।

‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्रका शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होनेपर भी मैं लोगोंको भयभीत करनेवाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूपको धारण करके इधर-उधर घूमता और वनमें रहनेवाले ऋषियोंको डराया करता था॥ २/

तत: स्थूलशिरा नाम महर्षि: कोपितो मया॥ ३॥

स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षित:।

तेनाहमुक्त: प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना॥ ४॥

अपने इस बर्तावसे एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षिको कुपित कर दिया। वे नाना प्रकारके जंगली फल-मूल आदिका संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूपसे डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूपमें देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा—॥ ३-४॥

एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम्।

स मया याचित: क्रुद्ध: शापस्यान्तो भवेदिति॥ ५॥

अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वच:।

‘दुरात्मन्! आजसे सदाके लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षिसे प्रार्थना की—‘भगवन्! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शापका अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा—॥ ५/

यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने॥ ६॥

तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम्।

श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण॥ ७॥

‘जब श्रीराम (और लक्ष्मण) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वनमें जलायेंगे, तब तुम पुन: अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूपको प्राप्त कर लोगे।’ लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो॥ ६-७॥

इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे।

अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम्॥ ८॥

दीर्घमायु: स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत्।

दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्र: करिष्यति॥ ९॥

‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गणमें इन्द्रके क्रोधसे प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकालमें राक्षस होनेके पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होनेका वर दिया। इससे मेरी बुद्धिमें यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे?॥ ८-९॥

इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम्।

तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा॥ १०॥

सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम्।

‘ऐसे विचारका आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्धमें देवराजपर आक्रमण किया। उस समय इन्द्रने मुझपर सौ धारोंवाले वज्रका प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्रसे मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीरमें घुस गये॥ १०/

स मया याच्यमान: सन् नानयद् यमसादनम्॥ ११॥

पितामहवच: सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत्।

‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा—‘पितामह ब्रह्माजीने जो तुम्हें दीर्घजीवी होनेके लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’॥ ११/

अनाहार: कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुख:॥ १२॥

वज्रेणाभिहत: कालं सुदीर्घमपि जीवितुम्।

‘तब मैंने कहा—देवराज! आपने अपने वज्रकी मारसे मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा?॥

स एवमुक्त: शक्रो मे बाहू योजनमायतौ॥ १३॥

तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत्।

‘मेरे ऐसा कहनेपर इन्द्रने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेटमें तीखे दाढ़ोंवाला एक मुख बना दिया॥ १३/

सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान्॥ १४॥

सिंहद्वीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्तत:।

‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओंद्वारा वनमें रहनेवाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओंको सब ओरसे समेटकर खाया करता था॥ १४/

स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा राम: सलक्ष्मण:॥ १५॥

छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि।

‘इन्द्रने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्गमें जाओगे॥ १५/

अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥ १६॥

यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये।

‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीरसे इस वनके भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है॥ १६/

अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति॥ १७॥

इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रम:।

‘इन्द्र तथा मुनिके कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़में आ जायँगे। इसी विचारको सामने रखकर मैं इस शरीरको त्याग देनेके लिये प्रयत्नशील था॥ १७/

स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव॥ १८॥

शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा।

‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो। मैं आपके सिवा दूसरे किसीसे नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षिने ठीक ही कही थी॥ १८/

अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ॥ १९॥

मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना।

‘नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्निके द्वारा मेरा दाह-संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनोंके लिये एक अच्छे मित्रका पता बताऊँगा’॥ १९/

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघव:॥ २०॥

इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यत:।

उस दानवके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके सामने उससे यह बात कही—॥ २०/

रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी॥ २१॥

निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम्।

नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षस:॥ २२॥

‘कबन्ध! मेरी यशस्विनी भार्या सीताको रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक जनस्थानके बाहर चला गया था। मैं उस राक्षसका नाममात्र जानता हूँ। उसकी शकल-सूरतसे परिचित नहीं हूँ॥ २१-२२॥

निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे।

शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम्॥ २३॥

कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम्।

‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बातसे हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीताका शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करनेके लिये इस विषयमें हमारा कुछ उपकार करो॥ २३/

काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरै:॥ २४॥

धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते।

‘वीर! फिर हमलोग हाथियोंद्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढेमें तुम्हारे शरीरको रखकर जला देंगे॥ २४/

स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हृता॥ २५॥

कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वत:।

‘अत: अब तुम हमें सीताका पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीताका समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’॥ २५/

एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम्॥ २६॥

प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम्।

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें कुशल उस दानवने उन प्रवचनपटु रघुनाथजीसे यह परम उत्तम बात कही—॥ २६/

दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम्॥ २७॥

यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्ध: स्वं रूपमास्थित:।

योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम्॥ २८॥

‘श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीरका दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्तिका पता बता सकूँगा, जो सीताके विषयमें आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षसको भी जानता होगा, ऐसे पुरुषका आपको परिचय दूँगा॥ २७-२८॥

अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो।

राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव॥ २९॥

‘प्रभो! जबतक मेरे इस शरीरका दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जाननेकी शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीताका अपहरण किया है॥ २९॥

विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव।

स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम्॥ ३०॥

‘रघुनन्दन! शाप-दोषके कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूतसे मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है॥ ३०॥

किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहन:।

तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि॥ ३१॥

‘किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनोंके थक जानेपर अस्त नहीं हो जाते, तभीतक मुझे गड्ढेमें डालकर शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये॥ ३१॥

दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन।

वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम्॥ ३२॥

‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढेमें मेरे शरीरका दाह हो जानेपर मैं ऐसे महापुरुषका परिचय दूँगा, जो उस राक्षसको जानते होंगे॥ ३२॥

तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव।

कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम॥ ३३॥

‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचारवाले उन महापुरुषके साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे॥

नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव।

सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे॥ ३४॥

‘रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकोंमें चक्कर लगा चुके हैं’॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकसप्ततितम: सर्ग:॥ ७१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥

 

 


द्विसप्ततितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा चिताकी आगमें कबन्धका दाह तथा उसका दिव्य रूपमें प्रकट होकर उन्हें सुग्रीवसे मित्रता करनेके लिये कहना

एवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेश्वरौ।

गिरिप्रदरमासाद्य पावकं विससर्जतु:॥ १॥

कबन्धके ऐसा कहनेपर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मणने उसके शरीरको एक पर्वतके गड्ढेमें डालकर उसमें आग लगा दी॥ १॥

लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्ज्वलिताभि: समन्तत:।

चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वत:॥ २॥

लक्ष्मणने जलती हुई बड़ी-बड़ी लुकारियोंके द्वारा चारों ओरसे उसकी चितामें आग लगायी; फिर तो वह सब ओरसे प्रज्वलित हो उठी॥ २॥

तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमं महत्।

मेदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावक:॥ ३॥

चितामें जलते हुए कबन्धका विशाल शरीर चर्बियोंसे भरा होनेके कारण घीके लोदेके समान प्रतीत होता था। चिताकी आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी॥ ३॥

सविधूय चितामाशु विधूमोऽग्निरिवोत्थित:।

अरजे वाससी बिभ्रन्माल्यं दिव्यं महाबल:॥ ४॥

तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिताको हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पोंका हार धारण किये धूमरहित अग्निके समान उठ खड़ा हुआ॥ ४॥

ततश्चिताया वेगेन भास्वरो विरजाम्बर:।

उत्पपाताशु संहृष्ट: सर्वप्रत्यङ्गभूषण:॥ ५॥

विमाने भास्वरे तिष्ठन् हंसयुक्ते यशस्करे।

प्रभया च महातेजा दिशो दश विराजयन्॥ ६॥

सोऽन्तरिक्षगतो वाक्यं कबन्धो राममब्रवीत्।

फिर वेगपूर्वक चितासे ऊपरको उठा और शीघ्र ही एक तेजस्वी विमानपर जा बैठा। निर्मल वस्त्रोंसे विभूषित हो वह बड़ा तेजस्वी दिखायी देता था। उसके मनमें हर्ष भरा हुआ था तथा समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गमें दिव्य आभूषण शोभा दे रहे थे। हंसोंसे जुते हुए उस यशस्वी विमानपर बैठा हुआ महान् तेजस्वी कबन्ध अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगा और अन्तरिक्षमें स्थित हो श्रीरामसे इस प्रकार बोला—॥ ५-६/

शृणु राघव तत्त्वेन यथा सीतामवाप्स्यसि॥ ७॥

राम षड् युक्तयो लोके याभि: सर्वं विमृश्यते।

परिमृष्टो दशान्तेन दशाभागेन सेव्यते॥ ८॥

‘रघुनन्दन! आप जिस प्रकार सीताको पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये। श्रीराम! लोकमें छ: युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओंद्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है (उन युक्तियों तथा उपायोंके नाम हैं—संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय116)। जो मनुष्य दुर्दशासे ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुषसे ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है (यह नीति है)॥ ७-८॥

दशाभागगतो हीनस्त्वं हि राम सलक्ष्मण:।

यत्कृते व्यसनं प्राप्तं त्वया दारप्रधर्षणम्॥ ९॥

‘श्रीराम! लक्ष्मणसहित आप बुरी दशाके शिकार हो रहे हैं; इसीलिये आपलोग राज्यसे वञ्चित हैं तथा उस बुरी दशाके कारण ही आपको अपनी भार्याके अपहरणका महान् दु:ख प्राप्त हुआ है॥ ९॥

तदवश्यं त्वया कार्य: स सुहृत् सुहृदां वर।

अकृत्वा नहि ते सिद्धिमहं पश्यामि चिन्तयन्॥ १०॥

‘अत: सुहृदोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप अवश्य ही उस पुरुषको अपना सुहृद् बनाइये, जो आपकी ही भाँति दुर्दशामें पड़ा हुआ हो (इस प्रकार आप सुहृद्का आश्रय लेकर समाश्रय नीतिको अपनाइये)। मैं बहुत सोचनेपर भी ऐसा किये बिना आपकी सफलता नहीं देखता हूँ॥ १०॥

श्रूयतां राम वक्ष्यामि सुग्रीवो नाम वानर:।

भ्रात्रा निरस्त: क्रुद्धेन वालिना शक्रसूनुना॥ ११॥

‘श्रीराम! सुनिये, मैं ऐसे पुरुषका परिचय दे रहा हूँ, उनका नाम है सुग्रीव। वे जातिके वानर हैं। उन्हें उनके भाई इन्द्रकुमार वालीने कुपित होकर घरसे निकाल दिया है॥ ११॥

ऋष्यमूके गिरिवरे पम्पापर्यन्तशोभिते।

निवसत्यात्मवान् वीरश्चतुर्भि: सह वानरै:॥ १२॥

‘वे मनस्वी वीर सुग्रीव इस समय चार वानरोंके साथ उस गिरिवर ऋष्यमूकपर निवास करते हैं, जो पम्पासरोवरतक फैला हुआ है॥ १२॥

वानरेन्द्रो महावीर्यस्तेजोवानमितप्रभ:।

सत्यसंधो विनीतश्च धृतिमान् मतिमान् महान्॥ १३॥

दक्ष: प्रगल्भो द्युतिमान् महाबलपराक्रम:।

‘वे वानरोंके राजा महापराक्रमी सुग्रीव तेजस्वी, अत्यन्त कान्तिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, विनयशील, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, महापुरुष, कार्यदक्ष, निर्भीक, दीप्तिमान् तथा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं॥ १३/

भ्रात्रा विवासितो वीर राज्यहेतोर्महात्मना॥ १४॥

स ते सहायो मित्रं च सीताया: परिमार्गणे।

भविष्यति हि ते राम मा च शोके मन: कृथा:॥ १५॥

‘वीर श्रीराम! उनके महामना भाई वालीने सारे राज्यको अपने अधिकारमें कर लेनेके लिये उन्हें राज्यसे बाहर निकाल दिया है; अत: वे सीताकी खोजके लिये आपके सहायक और मित्र होंगे। इसलिये आप अपने मनको शोकमें न डालिये॥ १४-१५॥

भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा।

कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रम:॥ १६॥

‘इक्ष्वाकुवंशी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता। कालका विधान सभीके लिये दुर्लङ्‌घ्य होता है (अत: आपपर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्धका विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये)॥ १६॥

गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्।

वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव॥ १७॥

‘वीर रघुनाथजी! आप यहाँसे शीघ्र ही महाबली सुग्रीवके पास जाइये और जाकर तुरंत उन्हें अपना मित्र बना लीजिये॥ १७॥

अद्रोहाय समागम्य दीप्यमाने विभावसौ।

न च ते सोऽवमन्तव्य: सुग्रीवो वानराधिप:॥ १८॥

‘प्रज्वलित अग्निको साक्षी बनाकर परस्पर द्रोह न करनेके लिये मैत्री स्थापित कीजिये और ऐसा करनेके बाद आपको कभी उन वानरराज सुग्रीवका अपमान नहीं करना चाहिये॥ १८॥

कृतज्ञ: कामरूपी च सहायार्थी च वीर्यवान्।

शक्तौ ह्यद्य युवां कर्तुं कार्यं तस्य चिकीर्षितम्॥ १९॥

‘वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, पराक्रमी और कृतज्ञ हैं तथा इस समय स्वयं ही अपने लिये एक सहायक ढूँढ़ रहे हैं। उनका जो अभीष्ट कार्य है उसे सिद्ध करनेमें आप दोनों भाई समर्थ हैं॥ १९॥

कृतार्थो वाकृतार्थो वा तव कृत्यं करिष्यति।

स ऋक्षरजस: पुत्र: पम्पामटति शङ्कित:॥ २०॥

‘सुग्रीवका मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षरजाके क्षेत्रज पुत्र हैं और वालीसे शङ्कित रहकर पम्पासरोवरके तटपर भ्रमण करते हैं॥ २०॥

भास्करस्यौरस: पुत्रो वालिना कृतकिल्बिष:।

संनिधायायुधं क्षिप्रमृष्यमूकालयं कपिम्॥ २१॥

कुरु राघव सत्येन वयस्यं वनचारिणम्।

‘उन्हें सूर्यदेवका औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वालीका अपराध किया है (इसीलिये वे उससे डरते हैं)। रघुनन्दन! अग्निके समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्यकी शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीवको आप अपना मित्र बना लीजिये॥ २१/

स हि स्थानानि कार्त्स्न्येन सर्वाणि कपिकुञ्जर:॥ २२॥

नरमांसाशिनां लोके नैपुण्यादधिगच्छति।

‘कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसारमें नरमांसभक्षी राक्षसोंके जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूपसे निपुणतापूर्वक जानते हैं॥ २२/

न तस्याविदितं लोके किंचिदस्ति हि राघव॥ २३॥

यावत् सूर्य: प्रतपति सहस्रांशु: परंतप।

‘रघुनन्दन! शत्रुदमन! सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव जहाँतक तपते हैं, वहाँतक संसारमें कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीवके लिये अज्ञात हो॥ २३/

स नदीर्विपुलान् शैलान् गिरिदुर्गाणि कन्दरान्॥ २४॥

अन्विष्य वानरै: सार्धं पत्नीं तेऽधिगमिष्यति।

‘वे वानरोंके साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओंमें भी खोज कराकर आपकी पत्नीका पता लगा लेंगे॥ २४/

वानरांश्च महाकायान् प्रेषयिष्यति राघव॥ २५॥

दिशो विचेतुं तां सीतां त्वद्वियोगेन शोचतीम्।

अन्वेष्यति वरारोहां मैथिलीं रावणालये॥ २६॥

‘राघव! वे आपके वियोगमें शोक करती हुई सीताकी खोजके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें विशालकाय वानरोंको भेजेंगे, तथा रावणके घरसे भी सुन्दर अङ्गोंवाली मिथिलेशकुमारीको ढूँढ़ निकालेंगे॥ २५-२६॥

स मेरुशृङ्गाग्रगतामनिन्दितां

प्रविश्य पातालतलेऽपि वाश्रिताम्।

प्लवङ्गमानामृषभस्तव प्रियां

निहत्य रक्षांसि पुन: प्रदास्यति॥ २७॥

‘आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखरके अग्रभागपर पहुँचायी गयी हों या पातालमें प्रवेश करके रखी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसोंका वध करके उन्हें पुन: आपके पास ला देंगे’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विसप्ततितम: सर्ग:॥ ७२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२॥

 

त्रिसप्ततितम: सर्ग:

दिव्य रूपधारी कबन्धका श्रीराम और लक्ष्मणको ऋष्यमूक और पम्पासरोवरका मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनिके वन एवं आश्रमका परिचय देकर प्रस्थान करना

दर्शयित्वा तु रामाय सीताया: परिमार्गणे।

वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञ: कबन्ध: पुनरब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामको सीताकी खोजका उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्धने उनसे पुन: यह प्रयोजनयुक्त बात कही—॥ १॥

एष राम शिव: पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमा:।

प्रतीचीं दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमा:॥ २॥

‘श्रीराम! यहाँसे पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर जहाँ ये फूलोंसे भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है॥ २॥

जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुका:।

अश्वत्था: कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपा:॥ ३॥

धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालका:।

नीलाशोका: कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिता:॥ ४॥

अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ता: पारिभद्रका:।

तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात्॥ ५॥

फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथ:।

‘जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार—ये वृक्ष मार्गमें पड़ेंगे। आप दोनों भाई इनकी डालियोंको बलपूर्वक भूमिपर झुकाकर अथवा इन वृक्षोंपर चढ़कर इनके अमृततुल्य मधुर फलोंका आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा॥ ३—५/

तदतिक्रम्य काकुत्स्थ वनं पुष्पितपादपम्॥ ६॥

नन्दनप्रतिमं चान्यत् कुरवस्तूत्तरा इव।

सर्वकालफला यत्र पादपा मधुरस्रवा:॥ ७॥

‘काकुत्स्थ! खिले हुए वृक्षोंसे सुशोभित उस वनको लाँघकर आपलोग एक दूसरे वनमें प्रवेश कीजियेगा, जो नन्दनवनके समान मनोहर है। उस वनके वृक्ष उत्तर कुरुवर्षके वृक्षोंकी भाँति मधुकी धारा बहानेवाले हैं तथा उनमें सभी ऋतुओंमें सदा फल लगे रहते हैं॥ ६-७॥

सर्वे च ऋतवस्तत्र वने चैत्ररथे यथा।

फलभारनतास्तत्र महाविटपधारिण:॥ ८॥

‘चैत्ररथ वनकी भाँति उस मनोहर काननमें सभी ऋतुएँ निवास करती हैं। वहाँके वृक्ष बड़ी-बड़ी शाखा धारण करनेवाले तथा फलोंके भारसे झुके हुए हैं॥ ८॥

शोभन्ते सर्वतस्तत्र मेघपर्वतसंनिभा:।

तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वाथवा सुखम्॥ ९॥

फलान्यमृतकल्पानि लक्ष्मणस्ते प्रदास्यति।

‘वे वहाँ सब ओर मेघों और पर्वतोंके समान शोभा पाते हैं। लक्ष्मण उन वृक्षोंपर चढ़कर अथवा सुखपूर्वक उन्हें पृथ्वीपर झुकाकर उनके अमृततुल्य मधुर फल आपको देंगे॥ ९/

चङ्क्रमन्तौ वरान् शैलान् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥ १०॥

तत: पुष्करिणीं वीरौ पम्पां नाम गमिष्यथ:।

‘इस प्रकार सुन्दर पर्वतोंपर भ्रमण करते हुए आप दोनों भाई एक पहाड़से दूसरे पहाड़पर तथा एक वनसे दूसरे वनमें पहुँचेंगे और इस तरह अनेक पर्वतों तथा वनोंको लाँघते हुए आप दोनों वीर पम्पा नामक पुष्करिणीके तटपर पहुँच जायेंगे॥ १०/

अशर्करामविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम्॥ ११॥

राम संजातवालूकां कमलोत्पलशोभिताम्।

‘श्रीराम! वहाँ कंकड़का नाम नहीं है। उसके तटपर पैर फिसलने लायक कीचड़ आदि नहीं है। उसके घाटकी भूमि सब ओरसे बराबर है—ऊँची-नीची या ऊबड़-खाबड़ नहीं है। उस पुष्करिणीमें सेवारका सर्वथा अभाव है। उसके भीतरकी भूमि वालुकापूर्ण है। कमल और उत्पल उस सरोवरकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ११/

तत्र हंसा: प्लवा: क्रौञ्चा: कुरराश्चैव राघव॥ १२॥

वल्गुस्वरा निकूजन्ति पम्पासलिलगोचरा:।

नोद्विजन्ते नरान् दृष्ट्वा वधस्याकोविदा: शुभा:॥ १३॥

‘रघुनन्दन! वहाँ पम्पाके जलमें विचरनेवाले हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और कुरर सदा मधुर स्वरमें कूजते रहते हैं। वे मनुष्योंको देखकर उद्विग्न नहीं होते हैं। क्योंकि किसी मनुष्यके द्वारा किसी पक्षीका वध भी हो सकता है, ऐसे भयका उन्हें अनुभव नहीं है। ये सभी पक्षी बड़े सुन्दर हैं॥ १२-१३॥

घृतपिण्डोपमान् स्थूलांस्तान् द्विजान् भक्षयिष्यथ:।

रोहितान् वक्रतुण्डांश्च नलमीनांश्च राघव॥ १४॥

पम्पायामिषुभिर्मत्स्यांस्तत्र राम वरान् हतान्।

निस्त्वक्पक्षानयस्तप्तानकृशानैककण्टकान् ॥ १५॥

तव भक्त्या समायुक्तो लक्ष्मण: सम्प्रदास्यति।

‘बाणोंके अग्रभागसे जिनके छिलके छुड़ा दिये गये हैं, अतएव जिनमें एक भी काँटा नहीं रह गया है, जो घीके लोदेके समान चिकने तथा आर्द्र हैं—सूखे नहीं हैं, जिन्हें लोहमय बाणोंके अग्रभागमें गूँथकर आगमें सेका और पकाया गया है, ऐसे फल-मूलके ढेर वहाँ भक्ष्य पदार्थके रूपमें उपलब्ध होंगे। आपके प्रति भक्तिभावसे सम्पन्न लक्ष्मण आपको वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे। आप दोनों भाई उन पदार्थोंको लेकर उस सरोवरके मोटे-मोटे सुप्रसिद्ध जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ रोहित (रोहू), वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्योंको थोड़ा-थोड़ा करके खिलाइयेगा (इससे आपका मनोरञ्जन होगा)॥ १४-१५/

भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पाया: पुष्पसंचये॥ १६॥

पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम्।

उद्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम्॥ १७॥

अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मण: पाययिष्यति।

‘जिस समय आप पम्पासरोवरकी पुष्पराशिके समीप मछलियोंको भोजन करानेकी क्रीड़ामें अत्यन्त संलग्न होंगे, उस समय लक्ष्मण उस सरोवरका कमलकी गन्धसे सुवासित, कल्याणकारी, सुखद, शीतल, रोगनाशक, क्लेशहारी तथा चाँदी और स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जल कमलके पत्तेमें निकालकर लायेंगे और आपको पिलायेंगे॥ १६-१७/

स्थूलान् गिरिगुहाशय्यान् वानरान् वनचारिण:॥ १८॥

सायाह्ने विचरन् राम दर्शयिष्यति लक्ष्मण:।

‘श्रीराम! सायंकालमें आपके साथ विचरते हुए लक्ष्मण आपको उन मोटे-मोटे वनचारी वानरोंका दर्शन करायेंगे, जो पर्वतोंकी गुफाओंमें सोते और रहते हैं॥ १८/

अपां लोभादुपावृत्तान् वृषभानिव नर्दत:॥ १९॥

स्थूलान् पीतांश्च पम्पायां द्रक्ष्यसि त्वं नरोत्तम।

‘नरश्रेष्ठ! वे वानर पानी पीनेके लोभसे पम्पाके तटपर आकर साँड़ोंके समान गर्जते हैं। उनके शरीर मोटे और रंग पीले होते हैं। आप उन सबको वहाँ देखेंगे॥ १९/

सायाह्ने विचरन् राम विटपी माल्यधारिण:॥ २०॥

शिवोदकं च पम्पायां दृष्ट्वा शोकं विहास्यसि।

‘श्रीराम! सायंकालमें चलते समय आप बड़ी-बड़ी शाखावाले, पुष्पधारी वृक्षों तथा पम्पाके शीतल जलका दर्शन करके अपना शोक त्याग देंगे॥ २०/

सुमनोभिश्चितास्तत्र तिलका नक्तमालका:॥ २१॥

उत्पलानि च फुल्लानि पङ्कजानि च राघव।

‘रघुनन्दन! वहाँ फूलोंसे भरे हुए तिलक और नक्तमालके वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जलके भीतर उत्पल और कमल फूले हुए दिखायी देते हैं॥ २१/

न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नर:॥ २२॥

न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव।

‘रघुनन्दन! कोई भी मनुष्य वहाँ उन फूलोंको उतारकर धारण नहीं करता है। (क्योंकि वहाँतक किसीकी पहुँच ही नहीं हो पाती है) पम्पासरोवरके फूल न तो मुरझाते हैं और न झरते ही हैं॥ २२/

मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषय: सुसमाहिता:॥ २३॥

तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरो:।

ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दव:॥ २४॥

तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा।

स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव॥ २५॥

‘कहते हैं, वहाँ पहले मतंग मुनिके शिष्य ऋषिगण निवास करते थे, जिनका चित्त सदा एकाग्र एवं शान्त रहता था। वे अपने गुरु मतंग मुनिके लिये जब जंगली फल-मूल ले आते और उनके भारसे थक जाते, तब उनके शरीरसे पृथ्वीपर पसीनोंकी जो बूँदें गिरती थीं, वे ही उन मुनियोंकी तपस्याके प्रभावसे तत्काल फूलके रूपमें परिणत हो जाती थीं। राघव! पसीनोंकी बूँदोंसे उत्पन्न होनेके कारण वे फूल नष्ट नहीं होते हैं॥ २३—२५॥

तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी।

श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी॥ २६॥

त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम्।

दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति॥ २७॥

‘वे सब-के-सब ऋषि तो अब चले गये; किंतु उनकी सेवामें रहनेवाली तपस्विनी शबरी आज भी वहाँ दिखायी देती है। काकुत्स्थ! शबरी चिरजीवनी होकर सदा धर्मके अनुष्ठानमें लगी रहती है। श्रीराम! आप समस्त प्राणियोंके लिये नित्य वन्दनीय और देवताके तुल्य हैं। आपका दर्शन करके शबरी स्वर्गलोक (साकेतधाम) को चली जायगी॥ २६-२७॥

ततस्तद्राम पम्पायास्तीरमाश्रित्य पश्चिमम्।

आश्रमस्थानमतुलं गुह्यं काकुत्स्थ पश्यसि॥ २८॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तदनन्तर आप पम्पाके पश्चिम तटपर जाकर एक अनुपम आश्रम देखेंगे, जो (सर्वसाधारणकी पहुँचके बाहर होनेके कारण) गुप्त है॥ २८॥

न तत्राक्रमितुं नागा: शक्नुवन्ति तदाश्रमे।

ऋषेस्तस्य मतङ्गस्य विधानात् तच्च काननम्॥ २९॥

‘उस आश्रमपर तथा उस वनमें मतंग मुनिके प्रभावसे हाथी कभी आक्रमण नहीं कर सकते॥ २९॥

मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।

तस्मिन् नन्दनसंकाशे देवारण्योपमे वने॥ ३०॥

नानाविहगसंकीर्णे रंस्यसे राम निर्वृत:।

‘रघुनन्दन! वहाँका जंगल मतंगवनके नामसे प्रसिद्ध है। उस नन्दनतुल्य मनोहर और देववनके समान सुन्दर वनमें नाना प्रकारके पक्षी भरे रहते हैं। श्रीराम! आप वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ सानन्द विचरण करेंगे॥

ऋष्यमूकस्तु पम्पाया: पुरस्तात् पुष्पितद्रुम:॥ ३१॥

सुदु:खारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षित:।

उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मित:॥ ३२॥

‘पम्पासरोवरके पूर्वभागमें ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँके वृक्ष फूलोंसे सुशोभित दिखायी देते हैं। उसके ऊपर चढ़नेमें बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि वह छोटे-छोटे सर्पों अथवा हाथियोंके बच्चोंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित है। ऋष्यमूक पर्वत उदार (अभीष्ट फलको देनेवाला) है। पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उसका निर्माण किया और उसे औदार्य आदि गुणोंसे सम्पन्न बनाया॥ ३१-३२॥

शयान: पुरुषो राम तस्य शैलस्य मूर्धनि।

यत् स्वप्नं लभते वित्तं तत् प्रबुद्धोऽधिगच्छति॥ ३३॥

यस्त्वेनं विषमाचार: पापकर्माधिरोहति।

तत्रैव प्रहरन्त्येनं सुप्तमादाय राक्षसा:॥ ३४॥

‘श्रीराम! उस पर्वतके शिखरपर सोया हुआ पुरुष सपनेमें जिस सम्पत्तिको पाता है उसे जागनेपर भी प्राप्त कर लेता है। जो पापकर्मी तथा विषम बर्ताव करनेवाला पुरुष उस पर्वतपर चढ़ता है, उसे इस पर्वतशिखरपर ही सो जानेपर राक्षस लोग उठाकर उसके ऊपर प्रहार करते हैं॥ ३३-३४॥

तत्रापि शिशुनागानामाक्रन्द: श्रूयते महान्।

क्रीडतां राम पम्पायां मतङ्गाश्रमवासिनाम्॥ ३५॥

‘श्रीराम! मतंग मुनिके आश्रमके आस-पासके वनमें रहने और पम्पासरोवरमें क्रीडा करनेवाले छोटे-छोटे हाथियोंके चिग्घाड़नेका महान् शब्द उस पर्वतपर भी सुनायी देता है॥ ३५॥

सक्ता रुधिरधाराभि: संहत्य परमद्विपा:।

प्रचरन्ति पृथक्कीर्णा मेघवर्णास्तरस्विन:॥ ३६॥

ते तत्र पीत्वा पानीयं विमलं चारु शोभनम्।

अत्यन्तसुखसंस्पर्शं सर्वगन्धसमन्वितम्॥ ३७॥

निर्वृत्ता: संविगाहन्ते वनानि वनगोचरा:।

‘जिनके गण्डस्थलोंपर कुछ लाल रंगकी मदकी धाराएँ बहती हैं, वे वेगशाली और मेघके समान काले बड़े-बड़े गजराज झुंड-के-झुंड एक साथ होकर दूसरी जातिवाले हाथियोंसे पृथक् हो वहाँ विचरते रहते हैं। वनमें विचरनेवाले वे हाथी जब पम्पासरोवरका निर्मल, मनोहर, सुन्दर, छूनेमें अत्यन्त सुखद तथा सब प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित जल पीकर लौटते हैं, तब उन वनोंमें प्रवेश करते हैं॥ ३६-३७/

ऋक्षांश्च द्वीपिनश्चैव नीलकोमलकप्रभान्॥ ३८॥

रुरूनपेतानजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि।

‘रघुनन्दन! वहाँ रीछों, बाघों और नील कोमल कान्तिवाले मनुष्योंको देखकर भागनेवाले तथा दौड़ लगानेमें किसीसे पराजित न होनेवाले मृगोंको देखकर आप अपना सारा शोक भूल जायँगे॥ ३८/

राम तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा॥ ३९॥

शिलापिधाना काकुत्स्थ दु:खं चास्या: प्रवेशनम्।

‘श्रीराम! उस पर्वतके ऊपर एक बहुत बड़ी गुफा शोभा पाती है, जिसका द्वार पत्थरसे ढका है। उसके भीतर प्रवेश करनेमें बड़ा कष्ट होता है॥ ३९/

तस्या गुहाया: प्राग्द्वारे महान् शीतोदको हृद:॥॥४०

बहुमूलफलो रम्यो नानानगसमाकुल:।

‘उस गुफाके पूर्वद्वारपर शीतल जलसे भरा हुआ एक बहुत बड़ा कुण्ड है। उसके आस-पास बहुत-से फल और मूल सुलभ हैं तथा वह रमणीय हृद नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है॥ ४०/

तस्यां वसति धर्मात्मा सुग्रीव: सह वानरै:॥ ४१॥

कदाचिच्छिखरे तस्य पर्वतस्यापि तिष्ठति।

‘धर्मात्मा सुग्रीव वानरोंके साथ उसी गुफामें निवास करते हैं। वे कभी-कभी उस पर्वतके शिखरपर भी रहते हैं’॥ ४१/

कबन्धस्त्वनुशास्यैवं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥ ४२॥

स्रग्वी भास्करवर्णाभ: खे व्यरोचत वीर्यवान्।

इस प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको सब बातें बताकर सूर्यके समान तेजस्वी और पराक्रमी कबन्ध दिव्य पुष्पोंकी माला धारण किये आकाशमें प्रकाशित होने लगा॥ ४२/

तं तु खस्थं महाभागं तावुभौ रामलक्ष्मणौ॥ ४३॥

प्रस्थितौ त्वं व्रजस्वेति वाक्यमूचतुरन्तिके।

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँसे प्रस्थान करनेके लिये उद्यत हो आकाशमें खड़े हुए महाभाग कबन्धसे उसके निकट खड़े होकर बोले—‘अब तुम परम धामको जाओ’॥ ४३/

गम्यतां कार्यसिद्ध्यर्थमिति तावब्रवीत् स च॥ ४४॥

सुप्रीतौ तावनुज्ञाप्य कबन्ध: प्रस्थितस्तदा॥ ४५॥

कबन्धने भी उन दोनों भाइयोंसे कहा—‘आपलोग भी अपने कार्यकी सिद्धिके लिये यात्रा करें।’ ऐसा कहकर परम प्रसन्न हुए उन दोनों बन्धुओंसे आज्ञा ले कबन्धने तत्काल प्रस्थान किया॥ ४४-४५॥

स तत् कबन्ध: प्रतिपद्य रूपं

वृत: श्रिया भास्वरसर्वदेह:।

निदर्शयन् राममवेक्ष्य खस्थ:

सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच॥ ४६॥

कबन्ध अपने पहले रूपको पाकर अद्भुत शोभासे सम्पन्न हो गया। उसका सारा शरीर सूर्य-तुल्य प्रभासे प्रकाशित हो उठा। वह रामकी ओर देखकर उन्हें पम्पासरोवरका मार्ग दिखाता हुआ आकाशमें ही स्थित होकर बोला—‘आप सुग्रीवके साथ मित्रता अवश्य करें’॥६२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिसप्ततितम: सर्ग:॥ ७३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३॥

 

चतु:सप्ततितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणका पम्पासरोवरके तटपर मतङ्गवनमें शबरीके आश्रमपर जाना, उसका सत्कार ग्रहण करना और उसके साथ मतङ्गवनको देखना, शबरीका अपने शरीरकी आहुति दे दिव्यधामको प्रस्थान करना

तौ कबन्धेन तं मार्गं पम्पाया दर्शितं वने।

आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीचीं नृवरात्मजौ॥ १॥

तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्धके बताये हुए पम्पासरोवरके मार्गका आश्रय ले पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये॥ १॥

तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान्।

वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ॥ २॥

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतोंपर फैले हुए बहुत-से वृक्षोंको, जो फूल, फल और मधुसे सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीवसे मिलनेके लिये आगे बढ़े॥ २॥

कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ।

पम्पाया: पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतु:॥ ३॥

रातमें एक पर्वत-शिखरपर निवास करके रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवरके पश्चिम तटपर जा पहुँचे॥ ३॥

तौ पुष्करिण्या: पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम्।

अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम्॥ ४॥

पम्पानामक पुष्करिणीके पश्चिम तटपर पहुँचकर उन दोनों भाइयोंने वहाँ शबरीका रमणीय आश्रम देखा॥

तौ तमाश्रममासाद्य द्रुमैर्बहुभिरावृतम्।

सुरम्यमभिवीक्षन्तौ शबरीमभ्युपेयतु:॥ ५॥

उसकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई बहुसंख्यक वृक्षोंसे घिरे हुए उस सुरम्य आश्रमपर जाकर शबरीसे मिले॥ ५॥

तौ दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलि:।

पादौ जग्राह रामस्य लक्ष्मणस्य च धीमत:॥ ६॥

शबरी सिद्ध तपस्विनी थी। उन दोनों भाइयोंको आश्रमपर आया देख वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी तथा उसने बुद्धिमान् श्रीराम और लक्ष्मणके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ६॥

पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद् यथाविधि।

तामुवाच ततो राम: श्रमणीं धर्मसंस्थिताम्॥ ७॥

फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदि सब सामग्री समर्पित की और विधिवत् उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी उस धर्मपरायणा तपस्विनीसे बोले—॥ ७॥

कच्चित्ते निर्जिता विघ्ना: कच्चित्ते वर्धते तप:।

कच्चित्ते नियत: कोप आहारश्च तपोधने॥ ८॥

‘तपोधने! क्या तुमने सारे विघ्नोंपर विजय पा ली? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुमने क्रोध और आहारको काबूमें कर लिया है?॥ ८॥

कच्चित्ते नियमा: प्राप्ता: कच्चित्ते मनस: सुखम्।

कच्चित्ते गुरुशुश्रूषा सफला चारुभाषिणि॥ ९॥

‘तुमने जिन नियमोंको स्वीकार किया है, वे निभ तो जाते हैं न? तुम्हारे मनमें सुख और शान्ति है न? चारुभाषिणि! तुमने जो गुरुजनोंकी सेवा की है, वह पूर्णरूपसे सफल हो गयी है न?’॥ ९॥

रामेण तापसी पृष्टा सा सिद्धा सिद्धसम्मता।

शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रत्यवस्थिता॥ १०॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर वह सिद्ध तपस्विनी बूढ़ी शबरी, जो सिद्धोंके द्वारा सम्मानित थी, उनके सामने खड़ी होकर बोली—॥ १०॥

अद्य प्राप्ता तप:सिद्धिस्तव संदर्शनान्मया।

अद्य मे सफलं जन्म गुरवश्च सुपूजिता:॥ ११॥

‘रघुनन्दन! आज आपका दर्शन मिलनेसे ही मुझे अपनी तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और गुरुजनोंकी उत्तम पूजा भी सार्थक हो गयी॥ ११॥

अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति।

त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ॥ १२॥

‘पुरुषप्रवर श्रीराम! आप देवेश्वरका यहाँ सत्कार हुआ, इससे मेरी तपस्या सफल हो गयी और अब मुझे आपके दिव्य धामकी प्राप्ति भी होगी ही॥ १२॥

तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद।

गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिंदम ॥ १३॥

‘सौम्य! मानद! आपकी सौम्य दृष्टि पड़नेसे मैं परम पवित्र हो गयी। शत्रुदमन! आपके प्रसादसे ही अब मैं अक्षय लोकोंमें जाऊँगी॥ १३॥

चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभै:।

इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम्॥ १४॥

‘जब आप चित्रकूट पर्वतपर पधारे थे, उसी समय मेरे गुरुजन, जिनकी मैं सदा सेवा किया करती थी, अतुल कान्तिमान् विमानपर बैठकर यहाँसे दिव्य-लोकको चले गये॥ १४॥

तैश्चाहमुक्ता धर्मज्ञैर्महाभागैर्महर्षिभि:।

आगमिष्यति ते राम: सुपुण्यमिममाश्रमम्॥ १५॥

स ते प्रतिग्रहीतव्य: सौमित्रिसहितोऽतिथि:।

तं च दृष्ट्वा वरांल्लोकानक्षयांस्त्वं गमिष्यसि॥ १६॥

‘उन धर्मज्ञ महाभाग महर्षियोंने जाते समय मुझसे कहा था कि तेरे इस परम पवित्र आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजी पधारेंगे और लक्ष्मणके साथ तेरे अतिथि होंगे। तुम उनका यथावत् सत्कार करना। उनका दर्शन करके तू श्रेष्ठ एवं अक्षय लोकोंमें जायगी॥ १५-१६॥

एवमुक्ता महाभागैस्तदाहं पुरुषर्षभ।

मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ॥ १७॥

तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम्।

‘पुरुषप्रवर! उन महाभाग महात्माओंने मुझसे उस समय ऐसी बात कही थी। अत: पुरुषसिंह! मैंने आपके लिये पम्पातटपर उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके जंगली फल-मूलोंका संचय किया है’॥ १७/

एवमुक्त: स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम्॥ १८॥

राघव: प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम्।

शबरी (जातिसे वर्णबाह्य होनेपर भी) विज्ञानमें बहिष्कृत नहीं थी—उसे परमात्माके तत्त्वका नित्य ज्ञान प्राप्त था। उसकी पूर्वोक्त बातें सुनकर धर्मात्मा श्रीरामने उससे कहा—॥ १८/

दनो: सकाशात् तत्त्वेन प्रभावं ते महात्मनाम्॥ १९॥

श्रुतं प्रत्यक्षमिच्छामि संद्रष्टुं यदि मन्यसे।

‘तपोधने! मैंने कबन्धके मुखसे तुम्हारे महात्मा गुरुजनोंका यथार्थ प्रभाव सुना है। यदि तुम स्वीकार करो तो मैं उनके उस प्रभावको प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ’॥ १९/

एतत्तु वचनं श्रुत्वा रामवक्त्रविनि:सृतम्॥ २०॥

शबरी दर्शयामास तावुभौ तद्वनं महत्।

श्रीरामके मुखसे निकले हुए इस वचनको सुनकर शबरीने उन दोनों भाइयोंको उस महान् वनका दर्शन कराते हुए कहा—॥ २०/

पश्य मेघघनप्रख्यं मृगपक्षिसमाकुलम्॥ २१॥

मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन।

‘रघुनन्दन! मेघोंकी घटाके समान श्याम और नाना प्रकारके पशु-पक्षियोंसे भरे हुए इस वनकी ओर दृष्टिपात कीजिये। यह मतंगवनके नामसे ही विख्यात है॥ २१/

इह ते भावितात्मानो गुरवो मे महाद्युते।

जुहवांचक्रिरे नीडं मन्त्रवन्मन्त्रपूजितम्॥ २२॥

‘महातेजस्वी श्रीराम! यहीं वे मेरे भावितात्मा (शुद्ध अन्त:करणवाले एवं परमात्मचिन्तनपरायण) गुरुजन निवास करते थे। इसी स्थानपर उन्होंने गायत्रीमन्त्रके जपसे विशुद्ध हुए अपने देहरूपी पञ्जरको मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें होम दिया था॥ २२॥

इयं प्रत्यक्स्थली वेदी यत्र ते मे सुसत्कृता:।

पुष्पोपहारं कुर्वन्ति श्रमादुद्वेपिभि: करै:॥ २३॥

‘यह प्रत्यक्स्थली नामवाली वेदी है, जहाँ मेरे द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे महर्षि वृद्धावस्थाके कारण श्रमसे काँपते हुए हाथोंद्वारा देवताओंको फूलोंकी बलि चढ़ाया करते थे॥ २३॥

तेषां तप:प्रभावेण पश्याद्यापि रघूत्तम।

द्योतयन्ती दिश: सर्वा: श्रिया वेद्यतुलप्रभा॥ २४॥

‘रघुवंशशिरोमणे! देखिये, उनकी तपस्याके प्रभावसे आज भी यह वेदी अपने तेजके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रही है। इस समय भी इसकी प्रभा अतुलनीय है॥ २४॥

अशक्नुवद्भिस्तैर्गन्तुमुपवासश्रमालसै: ।

चिन्तितेनागतान् पश्य समेतान् सप्त सागरान्॥ २५॥

‘उपवास करनेसे दुर्बल होनेके कारण जब वे चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये, तब उनके चिन्तनमात्रसे वहाँ सात समुद्रोंका जल प्रकट हो गया। वह सप्तसागर तीर्थ आज भी मौजूद है। उसमें सातों समुद्रोंके जल मिले हुए हैं, उसे चलकर देखिये॥ २५॥

कृताभिषेकैस्तैर्न्यस्ता वल्कला: पादपेष्विह।

अद्यापि न विशुष्यन्ति प्रदेशे रघुनन्दन॥ २६॥

‘रघुनन्दन! उसमें स्नान करके उन्होंने वृक्षोंपर जो वल्कल वस्त्र फैला दिये थे, वे इस प्रदेशमें अबतक सूखे नहीं हैं॥ २६॥

देवकार्याणि कुर्वद्भिर्यानीमानि कृतानि वै।

पुष्पै: कुवलयै: सार्धं म्लानत्वं न तु यान्ति वै॥ २७॥

‘देवताओंकी पूजा करते हुए मेरे गुरुजनोंने कमलोंके साथ अन्य फूलोंकी जो मालाएँ बनायी थीं, वे आज भी मुरझायी नहीं हैं॥ २७॥

कृत्स्नं वनमिदं दृष्टं श्रोतव्यं च श्रुतं त्वया।

तदिच्छाम्यभ्यनुज्ञाता त्यक्ष्याम्येतत् कलेवरम्॥ २८॥

‘भगवन्! आपने सारा वन देख लिया और यहाँके सम्बन्धमें जो बातें सुननेयोग्य थीं, वे भी सुन लीं। अब मैं आपकी आज्ञा लेकर इस देहका परित्याग करना चाहती हूँ॥ २८॥

तेषामिच्छाम्यहं गन्तुं समीपं भावितात्मनाम्।

मुनीनामाश्रमो येषामहं च परिचारिणी॥ २९॥

‘जिनका यह आश्रम है और जिनके चरणोंकी मैं दासी रही हूँ, उन्हीं पवित्रात्मा महर्षियोंके समीप अब मैं जाना चाहती हूँ’॥ २९॥

धर्मिष्ठं तु वच: श्रुत्वा राघव: सहलक्ष्मण:।

प्रहर्षमतुलं लेभे आश्चर्यमिति चाब्रवीत्॥ ३०॥

शबरीके धर्मयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके मुँहसे निकल पड़ा, ‘आश्चर्य है!’॥ ३०॥

तामुवाच ततो राम: शबरीं संशितव्रताम्।

अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम्॥ ३१॥

तदनन्तर श्रीरामने कठोर व्रतका पालन करनेवाली शबरीसे कहा—‘भद्रे! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छाके अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोककी यात्रा करो’॥ ३१॥

इत्येवमुक्ता जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा।

अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वाऽऽत्मानं हुताशने॥ ३२॥

ज्वलत्पावकसंकाशा स्वर्गमेव जगाम ह।

दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना॥ ३३॥

दिव्याम्बरधरा तत्र बभूव प्रियदर्शना।

विराजयन्ती तं देशं विद्युत्सौदामनी यथा॥ ३४॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मस्तकपर जटा और शरीरपर चीर एवं काला मृगचर्म धारण करनेवाली शबरीने अपनेको आगमें होमकर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य फूलोंकी माला और दिव्य अनुलेपन धारण किये बड़ी मनोहर दिखायी देने लगी तथा सुदाम पर्वतपर प्रकट होने- वाली बिजलीके समान उस प्रदेशको प्रकाशित करती हुई स्वर्ग (साकेत) लोकको ही चली गयी॥ ३२—३४॥

यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षय:।

तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना॥ ३५॥

उसने अपने चित्तको एकाग्र करके उस पुण्यधामकी यात्रा की, जहाँ उसके वे गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतु:सप्ततितम: सर्ग:॥ ७४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥

 

 


पञ्चसप्ततितम: सर्ग:

श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत तथा उन दोनों भाइयोंका पम्पासरोवरके तटपर जाना

दिवं तु तस्यां यातायां शबर्यां स्वेन तेजसा।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघव:॥ १॥

चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम्।

हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत्॥ २॥

अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाली शबरीके दिव्यलोकमें चले जानेपर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने उन महात्मा महर्षियोंके प्रभावका चिन्तन किया। चिन्तन करके अपने हितमें संलग्न रहनेवाले एकाग्रचित्त लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ १-२॥

दृष्टो मयाऽऽश्रम: सौम्य बह्वाश्चर्य: कृतात्मनाम्।

विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवित:॥ ३॥

‘सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियोंका यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हरिण और बाघ एक-दूसरेपर विश्वास करते हैं। नाना प्रकारके पक्षी इस आश्रमका सेवन करते हैं॥ ३॥

सप्तानां च समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण।

उपस्पृष्टं च विधिवत् पितरश्चापि तर्पिता:॥ ४॥

प्रणष्टमशुभं यन्न: कल्याणं समुपस्थितम्।

तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति॥ ५॥

‘लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रोंके जलसे भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरोंका तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याणका समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मनमें अधिक प्रसन्नता हो रही है॥ ४-५॥

हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति।

तदागच्छ गमिष्याव: पम्पां तां प्रियदर्शनाम्॥ ६॥

‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदयमें कोई शुभ संकल्प उठनेवाला है। इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवरके तटपर चलें॥ ६॥

ऋष्यमूको गिरिर्यत्र नातिदूरे प्रकाशते।

यस्मिन् वसति धर्मात्मा सुग्रीवोंऽशुमत: सुत:॥ ७॥

‘वहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिसपर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं॥ ७॥

नित्यं वालिभयात् त्रस्तश्चतुर्भि: सह वानरै:।

अहं त्वरे च तं द्रष्टुं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥ ८॥

तदधीनं हि मे कार्यं सीताया: परिमार्गणम्।

‘वालीके भयसे सदा डरे रहनेके कारण वे चार वानरोंके साथ उस पर्वतपर रहते हैं। मैं वानरश्रेष्ठ सुग्रीवसे मिलनेके लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीताके अन्वेषणका कार्य उन्हींके अधीन है’॥ ८/

इति ब्रुवाणं तं वीरं सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥ ९॥

गच्छावस्त्वरितं तत्र ममापि त्वरते मन:।

इस प्रकारकी बात कहते हुए वीर श्रीरामसे सुमित्राकुमार लक्ष्मणने यों कहा—‘भैया! हम दोनोंको शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये। मेरा मन भी चलनेके लिये उतावला हो रहा है’॥ ९/

आश्रमात्तु ततस्तस्मान्निष्क्रम्य स विशाम्पति:॥ १०॥

आजगाम तत: पम्पां लक्ष्मणेन सह प्रभु:।

समीक्षमाण: पुष्पाढ्यं सर्वतो विपुलद्रुमम्॥ ११॥

तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मणके साथ उस आश्रमसे निकलकर सब ओर फूलोंसे लदे हुए नाना प्रकारके वृक्षोंकी शोभा निहारते हुए पम्पा-सरोवरके तटपर आये॥ १०-११॥

कोयष्टिभिश्चार्जुनकै: शतपत्रैश्च कीरकै:।

एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद् वनं महत्॥ १२॥

वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियोंके कलरवोंसे गूँज रहा था॥ १२॥

स रामो विविधान् वृक्षान् सरांसि विविधानि च।

पश्यन् कामाभिसंतप्तो जगाम परमं हृदम्॥ १३॥

श्रीरामके मनमें सीताजीसे मिलनेकी तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकारके वृक्षों और भाँति-भाँतिके सरोवरोंकी शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशयके पास गये॥ १३॥

स तामासाद्य वै रामो दूरात् पानीयवाहिनीम्।

मतङ्गसरसं नाम हृदं समवगाहत॥ १४॥

पम्पानामसे प्रसिद्ध वह सरोवर पीनेयोग्य स्वच्छ जल बहानेवाला था। श्रीराम दूर देशसे चलकर उसके तटपर आये। आकर उन्होंने मतंगसरस नामक कुण्डमें स्नान किया॥ १४॥

तत्र जग्मतुरव्यग्रौ राघवौ हि समाहितौ।

स तु शोकसमाविष्टो रामो दशरथात्मज:॥ १५॥

विवेश नलिनीं रम्यां पंकजैश्च समावृताम्।

वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे। सीताके शोकसे व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीरामने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पामें प्रवेश किया, जो कमलोंसे व्याप्त थी॥ १५/

तिलकाशोकपुंनागबकुलोद्दालकाशिनीम् ॥ १६॥

रम्योपवनसम्बाधां पद्मसम्पीडितोदकाम्।

स्फटिकोपमतोयां तां श्लक्ष्णवालुकसंतताम्॥ १७॥

मत्स्यकच्छपसम्बाधां तीरस्थद्रुमशोभिताम्।

सखीभिरिव संयुक्तां लताभिरनुवेष्टिताम्॥ १८॥

किंनरोरगगन्धर्वयक्षराक्षससेविताम् ।

नानाद्रुमलताकीर्णां शीतवारिनिधिं शुभाम्॥ १९॥

उसके तटपर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़ेके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। भाँति-भाँतिके रमणीय उपवनोंसे वह घिरी हुई थी। उसका जल कमलपुष्पोंसे आच्छादित था और स्फटिक मणिके समान स्वच्छ दिखायी देता था। जलके नीचे स्वच्छ वालुका फैली हुई थी। मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे। तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। सब ओर लताओंद्वारा आवेष्टित होनेके कारण वह सखियोंसे संयुक्त-सी प्रतीत होती थी। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे। भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताओंसे व्याप्त हुई पम्पा शीतल जलकी सुन्दर निधि प्रतीत होती थी॥ १६—१९॥

पद्मसौगन्धिकैस्ताम्रां शुक्लां कुमुदमण्डलै:।

नीलां कुवलयोद्घाटैर्बहुवर्णां कुथामिव॥ २०॥

अरुण कमलोंसे वह ताम्रवर्णकी, कुमुद-कुसुमोंके समूहसे शुक्लवर्णकी तथा नील कमलोंके समुदायसे नीलवर्णकी दिखायी देनेके कारण बहुरंगे कालीनके समान शोभा पाती थी॥ २०॥

अरविन्दोत्पलवतीं पद्मसौगन्धिकायुताम्।

पुष्पिताम्रवणोपेतां बर्हिणोद्घुष्टनादिताम्॥ २१॥

उस पुष्करिणीमें अरविन्द और उत्पल खिले थे। पद्म और सौगन्धिक जातिके पुष्प शोभा पाते थे। मौर लगी हुई अमराइयोंसे वह घिरी हुई थी तथा मयूरोंके केकानाद वहाँ गूँज रहे थे॥ २१॥

स तां दृष्ट्वा तत: पम्पां राम: सौमित्रिणा सह।

विललाप च तेजस्वी रामो दशरथात्मज:॥ २२॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित श्रीरामने जब उस मनोहर पम्पाको देखा, तब उनके हृदयमें सीताकी वियोग-व्यथा उद्दीप्त हो उठी; अत: वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे॥ २२॥

तिलकैर्बीजपूरैश्च वटै: शुक्लद्रुमैस्तथा।

पुष्पितै: करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितै:॥ २३॥

मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरैर्निचुलैस्तथा।

अशोकै: सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकै:॥ २४॥

अन्यैश्च विविधैर्वृक्षै: प्रमदामिव शोभिताम्।

अस्यास्तीरे तु पूर्वोक्त: पर्वतो धातुमण्डित:॥ २५॥

ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादप:।

तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर (बरगद), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँतिकी वस्त्रभूषाओंसे सजी हुई युवतीके समान जान पड़ती थी। उसीके तटपर विविध धातुओंसे मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नामसे विख्यात पर्वत सुशोभित था। उसके ऊपर फूलोंसे भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे॥ २३—२५/

हरिऋर्क्षरजोनाम्न: पुत्रस्तस्य महात्मन:॥ २६॥

अध्यास्ते तु महावीर्य: सुग्रीव इति विश्रुत:।

ऋक्षरजा नामक महात्मा वानरके पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे॥ २६/

सुग्रीवमभिगच्छ त्वं वानरेन्द्रं नरर्षभ॥ २७॥

इत्युवाच पुनर्वाक्यं लक्ष्मणं सत्यविक्रम:।

कथं मया विना सीतां शक्यं लक्ष्मण जीवितुम्॥ २८॥

उस समय सत्यपराक्रमी श्रीरामने पुन: लक्ष्मणसे कहा—‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम वानरराज सुग्रीवके पास चलो, मैं सीताके बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ’॥ २७-२८॥

इत्येवमुक्त्वा मदनाभिपीडित:

स लक्ष्मणं वाक्यमनन्यचेतन:।

विवेश पम्पां नलिनीमनोरमां

तमुत्तमं शोकमुदीरयाण:॥ २९॥

ऐसा कहकर सीताके दर्शनकी कामनासे पीडि़त तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाले श्रीराम उस महान् शोकको प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पामें उतरे॥ २९॥

क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन् वनं

ददर्श पम्पां शुभदर्शकाननाम्।

अनेकनानाविधपक्षिसंकुलां

विवेश राम: सह लक्ष्मणेन॥ ३०॥

वनकी शोभा देखते हुए क्रमश: वहाँ जाकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने पम्पाको देखा। उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे। अनेक प्रकारके झुंड-के-झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। भाईसहित श्रीरघुनाथजीने पम्पाके जलमें प्रवेश किया॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायाणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चसप्ततितम: सर्ग:॥ ७५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें
पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥

॥ अरण्यकाण्डं सम्पूर्णम्॥

 


॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नम:॥

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

किष्किन्धाकाण्डम्

प्रथम: सर्ग:

पम्पासरोवरके दर्शनसे श्रीरामकी व्याकुलता, श्रीरामका लक्ष्मणसे पम्पाकी शोभा तथा वहाँकी उद्दीपनसामग्रीका वर्णन करना, लक्ष्मणका श्रीरामको समझानातथा दोनों भाइयोंको ऋष्यमूककी ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरोंका भयभीत होना

स तां पुष्करिणीं गत्वा पद्मोत्पलझषाकुलाम्।

राम: सौमित्रिसहितो विललापाकुलेन्द्रिय:॥ १॥

कमल, उत्पल तथा मत्स्योंसे भरी हुई उस पम्पा नामक पुष्करिणीके पास पहुँचकर सीताकी सुधि आ जानेके कारण श्रीरामकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं। वे विलाप करने लगे। उस समय सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके साथ थे॥ १॥

तत्र दृष्ट्वैव तां हर्षादिन्द्रियाणि चकम्पिरे।

स कामवशमापन्न: सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥ २॥

वहाँ पम्पापर दृष्टि पड़ते ही (कमल-पुष्पोंमें सीताके नेत्रमुख आदिका किञ्चित् सादृश्य पाकर) हर्षोल्लाससे श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं। उनके मनमें सीताके दर्शनकी प्रबल इच्छा जाग उठी। उस इच्छाके अधीन-से होकर वे सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ २॥

सौमित्रे शोभते पम्पा वैदूर्यविमलोदका।

फुल्लपद्मोत्पलवती शोभिता विविधैर्द्रुमै:॥ ३॥

‘सुमित्रानन्दन! यह पम्पा कैसी शोभा पा रही है? इसका जल वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ एवं श्याम है। इसमें बहुत-से पद्म और उत्पल खिले हुए हैं। तटपर उत्पन्न हुए नाना प्रकारके वृक्षोंसे इसकी शोभा और भी बढ़ गयी है॥ ३॥

सौमित्रे पश्य पम्पाया: काननं शुभदर्शनम्।

यत्र राजन्ति शैला वा द्रुमा: सशिखरा इव॥ ४॥

‘सुमित्राकुमार! देखो तो सही, पम्पाके किनारेका वन कितना सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँके ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अपनी फैली हुई शाखाओंके कारण अनेक शिखरोंसे युक्त पर्वतोंके समान सुशोभित होते हैं॥ ४॥

मां तु शोकाभिसंतप्तमाधय: पीडयन्ति वै।

भरतस्य च दु:खेन वैदेह्या हरणेन च॥ ५॥

‘परंतु मैं इस समय भरतके दु:ख और सीताहरणकी चिन्ताके शोकसे संतप्त हो रहा हूँ। मानसिक वेदनाएँ मुझे बहुत कष्ट पहुँचा रही हैं॥ ५॥

शोकार्तस्यापि मे पम्पा शोभते चित्रकानना।

व्यवकीर्णा बहुविधै: पुष्पै: शीतोदका शिवा॥ ६॥

‘यद्यपि मैं शोकसे पीड़ित हूँ तो भी मुझे यह पम्पा बड़ी सुहावनी लग रही है। इसके निकटवर्ती वन बड़े विचित्र दिखायी देते हैं। यह नाना प्रकारके फूलोंसे व्याप्त है। इसका जल बहुत शीतल है और यह बहुत सुखदायिनी प्रतीत होती है॥ ६॥

नलिनैरपि संछन्ना ह्यत्यर्थशुभदर्शना।

सर्पव्यालानुचरिता मृगद्विजसमाकुला॥ ७॥

‘कमलोंसे यह सारी पुष्करिणी ढकी हुई है। इसलिये बड़ी सुन्दर दिखायी देती है। इसके आस-पास सर्प तथा हिंसक जन्तु विचर रहे हैं। मृग आदि पशु और पक्षी भी सब ओर छा रहे हैं॥ ७॥

अधिकं प्रविभात्येतन्नीलपीतं तु शाद्वलम्।

द्रुमाणां विविधै: पुष्पै: परिस्तोमैरिवार्पितम्॥ ८॥

‘नयी-नयी घासोंसे ढका हुआ यह स्थान अपनी नीली-पीली आभाके कारण अधिक शोभा पा रहा है। यहाँ वृक्षोंके नाना प्रकारके पुष्प सब ओर बिखरे हुए हैं। इससे ऐसा जान पड़ता है मानो यहाँ बहुत-से गलीचे बिछा दिये गये हों॥ ८॥

पुष्पभारसमृद्धानि शिखराणि समन्तत:।

लताभि: पुष्पिताग्राभिरुपगूढानि सर्वत:॥ ९॥

‘चारों ओर वृक्षोंके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे होनेके कारण समृद्धिशाली प्रतीत होते हैं। ऊपरसे खिली हुई लताएँ उनमें सब ओरसे लिपटी हुई हैं॥ ९॥

सुखानिलोऽयं सौमित्रे काल: प्रचुरमन्मथ:।

गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुम:॥ १०॥

‘सुमित्रानन्दन! इस समय मन्द-मन्द सुखदायिनी हवा चल रही है, जिससे कामनाका उद्दीपन हो रहा है (सीताको देखनेकी इच्छा प्रबल हो उठी है)। यह चैत्रका महीना है। वृक्षोंमें फूल और फल लग गये हैं और सब ओर मनोहर सुगन्ध छा रही है॥ १०॥

पश्य रूपाणि सौमित्रे वनानां पुष्पशालिनाम्।

सृजतां पुष्पवर्षाणि वर्षं तोयमुचामिव॥ ११॥

‘लक्ष्मण! फूलोंसे सुशोभित होनेवाले इन वनोंके रूप तो देखो। ये उसी तरह फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं जैसे मेघ जलकी वृष्टि करते हैं॥ ११॥

प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधा: काननद्रुमा:।

वायुवेगप्रचलिता: पुष्पैरवकिरन्ति गाम्॥ १२॥

‘वनके ये विविध वृक्ष वायुके वेगसे झूम-झूमकर रमणीय शिलाओंपर फूल बरसा रहे हैं और यहाँकी भूमिको ढक देते हैं॥ १२॥

पतितै: पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुत:।

कुसुमै: पश्य सौमित्रे क्रीडतीव समन्तत:॥ १३॥

‘सुमित्राकुमार! उधर तो देखो, जो वृक्षोंसे झड़ गये हैं, झड़ रहे हैं तथा जो अभी डालियोंमें ही लगे हुए हैं, उन सभी फूलोंके साथ सब ओर वायु खेल-सा कर रही है॥ १३॥

विक्षिपन् विविधा: शाखां नगानां कुसुमोत्कटा:।

मारुतश्चलितस्थानै: षट्पदैरनुगीयते॥ १४॥

‘फूलोंसे भरी हुई वृक्षोंकी विभिन्न शाखाओंको झकझोरती हुई वायु जब आगेको बढ़ती है, तब अपने-अपने स्थानसे विचलित हुए भ्रमर मानो उसका यशोगान करते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं॥ १४॥

मत्तकोकिलसंनादैर्नर्तयन्निव पादपान्।

शैलकंदर निष्क्रान्त: प्रगीत इव चानिल:॥ १५॥

‘पर्वतकी कन्दरासे विशेष ध्वनिके साथ निकली हुई वायु मानो उच्च स्वरसे गीत गा रही है। मतवाले कोकिलोंके कलनाद वाद्यका काम देते हैं और उन वाद्योंकी ध्वनिके साथ वह वायु इन झूमते हुए वृक्षोंको मानो नृत्यकी शिक्षा-सी दे रही है॥ १५॥

तेन विक्षिपतात्यर्थं पवनेन समन्तत:।

अमी संसक्तशाखाग्रा ग्रथिता इव पादपा:॥ १६॥

‘वायुके वेगपूर्वक हिलानेसे जिनकी शाखाओंके अग्रभाग सब ओरसे परस्पर सट गये हैं, वे वृक्ष एक-दूसरेसे गुँथे हुएकी भाँति जान पड़ते हैं॥ १६॥

स एव सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतल:।

गन्धमभ्यवहन् पुण्यं श्रमापनयनोऽनिल:॥ १७॥

‘मलयचन्दनका स्पर्श करके बहनेवाली यह शीतलवायु शरीरसे छू जानेपर कितनी सुखद जान पड़ती है। यह थकावट दूर करती हुई बह रही है और सर्वत्र पवित्र सुगन्ध फैला रही है॥ १७॥

अमी पवनविक्षिप्ता विनदन्तीव पादपा:।

षट्पदैरनुकूजद्भिर्वनेषु मधुगन्धिषु॥ १८॥

‘मधुर मकरन्द और सुगन्धसे भरे हुए इन वनोंमें गुनगुनाते हुए भ्रमरोंके व्याजसे ये वायुद्वारा हिलाये गये वृक्ष मानो नृत्यके साथ गान कर रहे हैं॥ १८॥

गिरिप्रस्थेषु रम्येषु पुष्पवद्भिर्मनोरमै:।

संसक्तशिखरा: शैला विराजन्ति महाद्रुमै:॥ १९॥

‘अपने रमणीय पृष्ठभागोंपर उत्पन्न फूलोंसे सम्पन्न तथा मनको लुभानेवाले विशाल वृक्षोंसे सटे हुए शिखरवाले पर्वत अद्भुत शोभा पा रहे हैं॥ १९॥

पुष्पसंछन्नशिखरा मारुतोत्क्षेपचञ्चला:।

अमी मधुकरोत्तंसा: प्रगीता इव पादपा:॥ २०॥

‘जिनकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे ढके हैं, जो वायुके झोंकेसे हिल रहे हैं तथा भ्रमरोंको पगड़ीके रूपमें सिरपर धारण किये हुए हैं, वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते हैं मानो इन्होंने नाचना-गाना आरम्भ कर दिया है॥ २०॥

सुपुष्पितांस्तु पश्यैतान् कर्णिकारान् समन्तत:।

हाटकप्रतिसंछन्नान् नरान् पीताम्बरानिव॥ २१॥

‘देखो, सब ओर सुन्दर फूलोंसे भरे हुए ये कनेर सोनेके आभूषणोंसे विभूषित पीताम्बरधारी मनुष्योंके समान शोभा पा रहे हैं॥ २१॥

अयं वसन्त: सौमित्रे नानाविहगनादित:।

सीतया विप्रहीणस्य शोकसंदीपनो मम॥ २२॥

‘सुमित्रानन्दन! नाना प्रकारके विहङ्गमोंके कलरवोंसे गूँजता हुआ यह वसन्तका समय सीतासे बिछुड़े हुए मेरे लिये शोकको बढ़ानेवाला हो गया है॥ २२॥

मां हि शोकसमाक्रान्तं संतापयति मन्मथ:।

हृष्टं प्रवदमानश्च समाह्वयति कोकिल:॥ २३॥

‘वियोगके शोकसे तो मैं पीड़ित हूँ ही, यह कामदेव (सीता-विषयक अनुराग) मुझे और भी संताप दे रहा है। कोकिल बड़े हर्षके साथ कलनाद करता हुआ मानो मुझे ललकार रहा है॥ २३॥

एष दात्यूहको हृष्टो रम्ये मां वननिर्झरे।

प्रणदन्मन्मथाविष्टं शोचयिष्यति लक्ष्मण॥ २४॥

‘लक्ष्मण! वनके रमणीय झरनेके निकट बड़े हर्षके साथ बोलता हुआ यह जलकुक्कुट सीतासे मिलनेकी इच्छावाले मुझ रामको शोकमग्न किये देता है॥ २४॥

श्रुत्वैतस्य पुरा शब्दमाश्रमस्था मम प्रिया।

मामाहूय प्रमुदिता: परमं प्रत्यनन्दत॥ २५॥

‘पहले मेरी प्रिया जब आश्रममें रहती थी, उन दिनों इसका शब्द सुनकर आनन्दमग्न हो जाती थी और मुझे भी निकट बुलाकर अत्यन्त आनन्दित कर देती थी॥ २५॥

एवं विचित्रा: पतगा नानारावविराविण:।

वृक्षगुल्मलता: पश्य सम्पतन्ति समन्तत:॥ २६॥

‘देखो, इस प्रकार भाँति-भाँतिकी बोली बोलनेवाले विचित्र पक्षी चारों ओर वृक्षों, झारियों और लताओंकी ओर उड़ रहे हैं॥ २६॥

विमिश्रा विहगा: पुंभिरात्मव्यूहाभिनन्दिता:।

भृङ्गराजप्रमुदिता: सौमित्रे मधुरस्वरा:॥ २७॥

‘सुमित्रानन्दन! देखो, ये पक्षिणियाँ नर पक्षियोंसे संयुक्त हो अपने झुंडमें आनन्दका अनुभव कर रही हैं, भौंरोंका गुञ्जारव सुनकर प्रसन्न हो रही हैं और स्वयं भी मीठी बोली बोल रही हैं॥ २७॥

अस्या: कूले प्रमुदिता: सङ्घश: शकुनास्त्विह।

दात्यूहरतिविक्रन्दै: पुंस्कोकिलरुतैरपि॥ २८॥

स्वनन्ति पादपाश्चेमे ममानङ्गप्रदीपका:।

‘इस पम्पाके तटपर यहाँ झुंड-के-झुंड पक्षी आनन्दमग्न होकर चहक रहे हैं। जलकुक्कुटोंके रतिसम्बन्धी कूजन तथा नर कोकिलोंके कलनादके व्याजसे मानो ये वृक्ष ही मधुर बोली बोलते हैं और मेरी अनङ्ग वेदनाको उद्दीप्त कर रहे हैं॥ २८/

अशोकस्तबकाङ्गार: षट्पदस्वननि:स्वन:॥ २९॥

मां हि पल्लवताम्रार्चिर्वसन्ताग्नि: प्रधक्ष्यति।

‘जान पड़ता है, यह वसन्तरूपी आग मुझे जलाकर भस्म कर देगी। अशोक पुष्पके लाल-लाल गुच्छे ही इस अग्निके अङ्गार हैं, नूतन पल्लव ही इसकी लाल-लाल लपटें हैं तथा भ्रमरोंका गुञ्जारव ही इस जलती आगका ‘चट-चट’ शब्द है॥ २९/

नहि तां सूक्ष्मपक्ष्माक्षीं सुकेशीं मृदुभाषिणीम्॥ ३०॥

अपश्यतो मे सौमित्रे जीवितेऽस्ति प्रयोजनम्।

‘सुमित्रानन्दन! यदि मैं सूक्ष्म बरौनियों और सुन्दर केशोंवाली मधुरभाषिणी सीताको न देख सका तो मुझे इस जीवनसे कोई प्रयोजन नहीं है॥ ३०/

अयं हि रुचिरस्तस्या: कालो रुचिरकानन:॥ ३१॥

कोकिलाकुलसीमान्तो दयिताया ममानघ।

‘निष्पाप लक्ष्मण! वसन्त ऋतुमें वनकी शोभा बड़ी मनोहर हो जाती है, इसकी सीमामें सब ओर कोयलकी मधुर कूक सुनायी पड़ती है। मेरी प्रिया सीताको यह समय बड़ा ही प्रिय लगता था॥ ३१/

मन्मथायाससम्भूतो वसन्तगुणवर्धित:॥ ३२॥

अयं मां धक्ष्यति क्षिप्रं शोकाग्निर्नचिरादिव।

‘अनङ्गवेदनासे उत्पन्न हुई शोकाग्नि वसन्तऋतुके गुणोंका117 ईंधन पाकर बढ़ गयी है; जान पड़ता है, यह मुझे शीघ्र ही अविलम्ब जला देगी॥ ३२/

अपश्यतस्तां वनितां पश्यतो रुचिरान् द्रुमान्॥ ३३॥

ममायमात्मप्रभवो भूयस्त्वमुपयास्यति।

‘अपनी उस प्रियतमा पत्नीको मैं नहीं देख पाता हूँ और इन मनोहर वृक्षोंको देख रहा हूँ, इसलिये मेरा यह अनङ्गज्वर अब और बढ़ जायगा॥ ३३/

अदृश्यमाना वैदेही शोकं वर्धयतीह मे॥ ३४॥

दृश्यमानो वसन्तश्च स्वेदसंसर्गदूषक:।

‘विदेहनन्दिनी सीता यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रही है, इसलिये मेरा शोक बढ़ाती है तथा मन्द मलयानिलके द्वारा स्वेदसंसर्गका निवारण करनेवाला यह वसन्त भी मेरे शोककी वृद्धि कर रहा है॥ ३४/

मां हि सा मृगशावाक्षी चिन्ताशोकबलात्कृतम्॥ ३५॥

संतापयति सौमित्रे क्रूरश्चैत्रवनानिल:।

‘सुमित्राकुमार! मृगनयनी सीता चिन्ता और शोकसे बलपूर्वक पीडित किये गये मुझ रामको और भी संताप दे रही है। साथ ही यह वनमें बहनेवाली चैत्रमासकी वायु भी मुझे पीड़ा दे रही है॥ ३५/

अमी मयूरा: शोभन्ते प्रनृत्यन्तस्ततस्तत:॥ ३६॥

स्वै: पक्षै: पवनोद्धूतैर्गवाक्षै: स्फाटिकैरिव।

‘ये मोर स्फटिकमणिके बने हुए गवाक्षों (झरोखों) के समान प्रतीत होनेवाले अपने फैले हुए पंखोंसे, जो वायुसे कम्पित हो रहे हैं, इधर-उधर नाचते हुए कैसी शोभा पा रहे हैं?॥ ३६/

शिखिनीभि: परिवृतास्त एते मदमूर्च्छिता:॥ ३७॥

मन्मथाभिपरीतस्य मम मन्मथवर्धना:।

‘मयूरियोंसे घिरे हुए ये मदमत्त मयूर अनङ्गवेदनासे संतप्त हुए मेरी इस कामपीड़ाको और भी बढ़ा रहे हैं॥

पश्य लक्ष्मण नृत्यन्तं मयूरमुपनृत्यति॥ ३८॥

शिखिनी मन्मथार्तैषा भर्तारं गिरिसानुनि।

‘लक्ष्मण! वह देखो, पर्वतशिखरपर नाचते हुए अपने स्वामी मयूरके साथ-साथ वह मोरनी भी कामपीड़ित होकर नाच रही है॥ ३८॥

तामेव मनसा रामां मयूरोऽप्यनुधावति॥ ३९॥

वितत्य रुचिरौ पक्षौ रुतैरुपहसन्निव।

‘मयूर भी अपने दोनों सुन्दर पंखोंको फैलाकर मन-ही-मन अपनी उसी रामा (प्रिया) का अनुसरण कर रहा है तथा अपने मधुर स्वरोंसे मेरा उपहास करता-सा जान पड़ता है॥ ३९/

मयूरस्य वने नूनं रक्षसा न हृता प्रिया॥ ४०॥

तस्मान्नृत्यति रम्येषु वनेषु सह कान्तया।

‘निश्चय ही वनमें किसी राक्षसने मोरकी प्रियाका अपहरण नहीं किया है, इसीलिये यह रमणीय वनोंमें अपनी वल्लभाके साथ नृत्य कर रहा है118॥ ४०/

मम त्वयं विना वास: पुष्पमासे सुदु:सह:॥ ४१॥

पश्य लक्ष्मण संरागस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि।

यदेषा शिखिनी कामाद् भर्तारमभिवर्तते॥ ४२॥

‘फूलोंसे भरे हुए इस चैत्रमासमें सीताके बिना यहाँ निवास करना मेरे लिये अत्यन्त दु:सह है। लक्ष्मण! देखो तो सही, तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियोंमें भी परस्पर कितना अधिक अनुराग है। इस समय यह मोरनी कामभावसे अपने स्वामीके सामने उपस्थित हुई है॥ ४१-४२॥

ममाप्येवं विशालाक्षी जानकी जातसम्भ्रमा।

मदनेनाभिवर्तेत यदि नापहृता भवेत्॥ ४३॥

‘यदि विशाल नेत्रोंवाली सीताका अपहरण न हुआ होता तो वह भी इसी प्रकार बड़े प्रेमसे वेगपूर्वक मेरे पास आती॥ ४३॥

पश्य लक्ष्मण पुष्पाणि निष्फलानि भवन्ति मे।

पुष्पभारसमृद्धानां वनानां शिशिरात्यये॥ ४४॥

‘लक्ष्मण! इस वसन्त ऋतुमें फूलोंके भारसे सम्पन्न हुए इन वनोंके ये सारे फूल मेरे लिये निष्फल हो रहे हैं। प्रिया सीताके यहाँ न होनेसे इनका मेरे लिये कोई प्रयोजन नहीं रह गया है॥ ४४॥

रुचिराण्यपि पुष्पाणि पादपानामतिश्रिया।

निष्फलानि महीं यान्ति समं मधुकरोत्करै:॥ ४५॥

‘अत्यन्त शोभासे मनोहर प्रतीत होनेवाले ये वृक्षोंके फूल भी निष्फल होकर भ्रमरसमूहोंके साथ ही पृथ्वीपर गिर जाते हैं॥ ४५॥

नदन्ति कामं शकुना मुदिता: सङ्घश: कलम्।

आह्वयन्त इवान्योन्यं कामोन्मादकरा मम॥ ४६॥

‘हर्षमें भरे हुए ये झुंड-के-झुंड पक्षी एक-दूसरेको बुलाते हुए-से इच्छानुसार कलरव कर रहे हैं और मेरे मनमें प्रेमोन्माद उत्पन्न किये देते हैं॥ ४६॥

वसन्तो यदि तत्रापि यत्र मे वसति प्रिया।

नूनं परवशा सीता सापि शोचत्यहं यथा॥ ४७॥

‘जहाँ मेरी प्रिया सीता निवास करती है, वहाँ भी यदि इसी तरह वसन्त छा रहा हो तो उसकी क्या दशा होगी? निश्चय ही वहाँ पराधीन हुई सीता मेरी ही तरह शोक कर रही होगी॥ ४७॥

नूनं न तु वसन्तस्तं देशं स्पृशति यत्र सा।

कथं ह्यसितपद्माक्षी वर्तयेत् सा मया विना॥ ४८॥

‘अवश्य ही जहाँ सीता है, उस एकान्त स्थानमें वसन्तका प्रवेश नहीं है तो भी मेरे बिना वह कजरारे नेत्रोंवाली कमलनयनी सीता कैसे जीवित रह सकेगी॥ ४८॥

अथवा वर्तते तत्र वसन्तो यत्र मे प्रिया।

किं करिष्यति सुश्रोणी सा तु निर्भर्त्सिता परै:॥ ४९॥

‘अथवा सम्भव है जहाँ मेरी प्रिया है वहाँ भी इसी तरह वसन्त छा रहा हो, परंतु उसे तो शत्रुओंकी डाँटफटकार सुननी पड़ती होगी; अत: वह बेचारी सुन्दरी सीता क्या कर सकेगी॥ ४९॥

श्यामा पद्मपलाशाक्षी मृदुभाषा च मे प्रिया।

नूनं वसन्तमासाद्य परित्यक्ष्यति जीवितम्॥ ५०॥

‘जिसकी अभी नयी-नयी अवस्था है और प्रफुल्ल कमलदलके समान मनोहर नेत्र हैं, वह मीठी बोली बोलनेवाली मेरी प्राणवल्लभा जानकी निश्चय ही इस वसन्त ऋतुको पाकर अपने प्राण त्याग देगी॥ ५०॥

दृढं हि हृदये बुद्धिर्मम सम्परिवर्तते।

नालं वर्तयितुं सीता साध्वी मद्विरहं गता॥ ५१॥

‘मेरे हृदयमें यह विचार दृढ़ होता जा रहा है कि साध्वी सीता मुझसे अलग होकर अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकती॥ ५१॥

मयि भावो हि वैदेह्यास्तत्त्वतो विनिवेशित:।

ममापि भाव: सीतायां सर्वथा विनिवेशित:॥ ५२॥

‘वास्तवमें विदेहकुमारीका हार्दिक अनुराग मुझमें और मेरा सम्पूर्ण प्रेम सर्वथा विदेहनन्दिनी सीतामें ही प्रतिष्ठित है॥ ५२॥

एष पुष्पवहो वायु: सुखस्पर्शो हिमावह:।

तां विचिन्तयत: कान्तां पावकप्रतिमो मम॥ ५३॥

‘फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहनेवाली यह शीतल वायु, जिसका स्पर्श बहुत ही सुखद है, प्राणवल्लभा सीताकी याद आनेपर मुझे आगकी भाँति तपाने लगती है॥ ५३॥

सदा सुखमहं मन्ये यं पुरा सह सीतया।

मारुत: स विना सीतां शोकसंजननो मम॥ ५४॥

‘पहले जानकीके साथ रहनेपर जो मुझे सदा सुखद जान पड़ती थी, वही वायु आज सीताके विरहमें मेरे लिये शोकजनक हो गयी है॥ ५४॥

तां विनाथ विहङ्गोऽसौ पक्षी प्रणदितस्तदा।

वायस: पादपगत: प्रहृष्टमभिकूजति॥ ५५॥

‘जब सीता मेरे साथ थी उन दिनों जो पक्षी कौआ आकाशमें जाकर काँव-काँव करता था, वह उसके भावी वियोगको सूचित करनेवाला था। अब सीताके वियोगकालमें वह कौआ वृक्षपर बैठकर बड़े हर्षके साथ अपनी बोली बोल रहा है (इससे सूचित हो रहा है कि सीताका संयोग शीघ्र ही सुलभ होगा)॥ ५५॥

एष वै तत्र वैदेह्या विहग: प्रतिहारक:।

पक्षी मां तु विशालाक्ष्या: समीपमुपनेष्यति॥ ५६॥

‘यही वह पक्षी है, जो आकाशमें स्थित होकर बोलनेपर वैदेहीके अपहरणका सूचक हुआ; किंतु आज यह जैसी बोली बोल रहा है, उससे जान पड़ता है कि यह मुझे विशाललोचना सीताके समीप ले जायगा॥ ५६॥

पश्य लक्ष्मण संनादं वने मदविवर्धनम्।

पुष्पिताग्रेषु वृक्षेषु द्विजानामवकूजताम्॥ ५७॥

‘लक्ष्मण! देखो, जिनकी ऊपरी डालियाँ फूलोंसे लदी हैं, वनमें उन वृक्षोंपर कलरव करनेवाले पक्षियोंका यह मधुर शब्द विरहीजनोंके मदनोन्मादको बढ़ानेवाला है॥

विक्षिप्तां पवनेनैतामसौ तिलकमञ्जरीम्।

षट्पद: सहसाभ्येति मदोद्धूतामिव प्रियाम्॥ ५८॥

‘वायुके द्वारा हिलायी जाती हुई उस तिलक वृक्षकी मंजरीपर भ्रमर सहसा जा बैठा है। मानो कोई प्रेमी काममदसे कम्पित हुई प्रेयसीसे मिल रहा हो॥ ५८॥

कामिनामयमत्यन्तमशोक: शोकवर्धन:।

स्तबकै: पवनोत्क्षिप्तैस्तर्जयन्निव मां स्थित:॥ ५९॥

‘यह अशोक प्रियाविरही कामी पुरुषोंके लिये अत्यन्त शोक बढ़ानेवाला है। यह वायुके झोंकेसे कम्पित हुए पुष्पगुच्छोंद्वारा मुझे डाँट बताता हुआ-सा खड़ा है॥ ५९॥

अमी लक्ष्मण दृश्यन्ते चूता: कुसुमशालिन:।

विभ्रमोत्सिक्तमनस: साङ्गरागा नरा इव॥ ६०॥

‘लक्ष्मण! ये मञ्जरियोंसे सुशोभित होनेवाले आमके वृक्ष शृङ्गार-विलाससे मदमत्तहृदय होकर चन्दन आदि अङ्गराग धारण करनेवाले मनुष्योंके समान दिखायी देते हैं॥ ६०॥

सौमित्रे पश्य पम्पायाश्चित्रासु वनराजिषु।

किंनरा नरशार्दूल विचरन्ति यतस्तत:॥ ६१॥

‘नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार! देखो, पम्पाकी विचित्र वन-श्रेणियोंमें इधर-उधर किन्नर विचर रहे हैं॥ ६१॥

इमानि शुभगन्धीनि पश्य लक्ष्मण सर्वश:।

नलिनानि प्रकाशन्ते जले तरुणसूर्यवत्॥ ६२॥

‘लक्ष्मण! देखो, पम्पाके जलमें सब ओर खिले हुए ये सुगन्धित कमल प्रात:कालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं॥ ६२॥

एषा प्रसन्नसलिला पद्मनीलोत्पलायुता।

हंसकारण्डवाकीर्णा पम्पा सौगन्धिकायुता॥ ६३॥

‘पम्पाका जल बड़ा ही स्वच्छ है। इसमें लाल कमल और नील कमल खिले हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं तथा सौगन्धिक कमल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ६३॥

जले तरुणसूर्याभै: षट्पदाहतकेसरै:।

पङ्कजै: शोभते पम्पा समन्तादभिसंवृता॥ ६४॥

‘जलमें प्रात:कालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले कमलोंके द्वारा सब ओरसे घिरी हुई पम्पा बड़ी शोभा पा रही है। उन कमलोंके केसरोंको भ्रमरोंने चूस लिया है॥ ६४॥

चक्रवाकयुता नित्यं चित्रप्रस्थवनान्तरा।

मातङ्गमृगयूथैश्च शोभते सलिलार्थिभि:॥ ६५॥

‘इसमें चक्रवाक सदा निवास करते हैं। यहाँके वनोंमें विचित्र-विचित्र स्थान हैं तथा पानी पीनेके लिये आये हुए हाथियों और मृगोंके समूहोंसे इस पम्पाकी शोभा और भी बढ़ जाती है॥ ६५॥

पवनाहतवेगाभिरूर्मिभिर्विमलेऽम्भसि ।

पङ्कजानि विराजन्ते ताड्यमानानि लक्ष्मण॥ ६६॥

‘लक्ष्मण! वायुके थपेड़ेसे जिनमें वेग पैदा होता है, उन लहरोंसे ताड़ित होनेवाले कमल पम्पाके निर्मल जलमें बड़ी शोभा पाते हैं॥ ६६॥

पद्मपत्रविशालाक्षीं सततं प्रियपङ्कजाम्।

अपश्यतो मे वैदेहीं जीवितं नाभिरोचते॥ ६७॥

‘प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी सीताको कमल सदा ही प्रिय रहे हैं। उसे न देखनेके कारण मुझे जीवित रहना अच्छा नहीं लगता है॥ ६७॥

अहो कामस्य वामत्वं यो गतामपि दुर्लभाम्।

स्मारयिष्यति कल्याणीं कल्याणतरवादिनीम्॥ ६८॥

‘अहो! काम कितना कुटिल है, जो अन्यत्र गयी हुई एवं परम दुर्लभ होनेपर भी कल्याणमय वचन बोलनेवाली उस कल्याणस्वरूपा सीताका बारंबार स्मरण दिला रहा है॥ ६८॥

शक्यो धारयितुं कामो भवेदभ्यागतो मया।

यदि भूयो वसन्तो मां न हन्यात् पुष्पितद्रुम:॥ ६९॥

‘यदि खिले हुए वृक्षोंवाला यह वसन्त मुझपर पुन: प्रहार न करे तो प्राप्त हुई कामवेदनाको मैं किसी तरह मनमें ही रोके रह सकता हूँ॥ ६९॥

यानि स्म रमणीयानि तया सह भवन्ति मे।

तान्येवारमणीयानि जायन्ते मे तया विना॥ ७०॥

‘सीताके साथ रहनेपर जो-जो वस्तुएँ मुझे रमणीय प्रतीत होती थीं, वे ही आज उसके बिना असुन्दर जान पड़ती हैं॥ ७०॥

पद्मकोशपलाशानि द्रष्टुं दृष्टिर्हि मन्यते।

सीताया नेत्रकोशाभ्यां सदृशानीति लक्ष्मण॥ ७१॥

‘लक्ष्मण! ये कमलकोशोंके दल सीताके नेत्रकोशोंके समान हैं। इसलिये मेरी आँखें इन्हें ही देखना चाहती हैं॥

पद्मकेसरसंसृष्टो वृक्षान्तरविनि:सृत:।

नि:श्वास इव सीताया वाति वायुर्मनोहर:॥ ७२॥

‘कमलकेसरोंका स्पर्श करके दूसरे वृक्षोंके बीचसे निकली हुई यह सौरभयुक्त मनोहर वायु सीताके नि:श्वासकी भाँति चल रही है॥ ७२॥

सौमित्रे पश्य पम्पाया दक्षिणे गिरिसानुषु।

पुष्पितां कर्णिकारस्य यष्टिं परमशोभिताम्॥ ७३॥

‘सुमित्रानन्दन! वह देखो, पम्पाके दक्षिण भागमें पर्वत-शिखरोंपर खिली हुई कनेरकी डाल कितनी अधिक शोभा पा रही है॥ ७३॥

अधिकं शैलराजोऽयं धातुभिस्तु विभूषित:।

विचित्रं सृजते रेणुं वायुवेगविघट्टितम्॥ ७४॥

‘विभिन्न धातुओंसे विभूषित हुआ यह पर्वतराज ऋष्यमूक वायुके वेगसे लायी हुई विचित्र धूलिकी सृष्टि कर रहा है॥ ७४॥

गिरिप्रस्थास्तु सौमित्रे सर्वत: सम्प्रपुष्पितै:।

निष्पत्रै: सर्वतो रम्यै: प्रदीप्ता इव किंशुकै:॥ ७५॥

‘सुमित्राकुमार! चारों ओर खिले हुए और सब ओरसे रमणीय प्रतीत होनेवाले पत्रहीन पलाश वृक्षोंसे उपलक्षित इस पर्वतके पृष्ठभाग आगमें जलते हुए-से जान पड़ते हैं॥ ७५॥

पम्पातीररुहाश्चेमे संसिक्ता मधुगन्धिन:।

मालतीमल्लिकापद्मकरवीराश्च पुष्पिता:॥ ७६॥

‘पम्पाके तटपर उत्पन्न हुए ये वृक्ष इसीके जलसे अभिषिक्त हो बढ़े हैं और मधुर मकरन्द एवं गन्धसे सम्पन्न हुए हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—मालती, मल्लिका, पद्म और करवीर। ये सब-के-सब फूलोंसे सुशोभित हैं॥ ७६॥

केतक्य: सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च सुपुष्पिता:।

माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च सर्वश:॥ ७७॥

‘केतकी (केवड़े), सिन्दुवार तथा वासन्ती लताएँ भी सुन्दर फूलोंसे भरी हुई हैं! गन्धभरी माधवी लता तथा कुन्द-कुसुमोंकी झाड़ियाँ सब ओर शोभा पा रही हैं॥ ७७॥

चिरिबिल्वा मधूकाश्च वञ्जुला बकुलास्तथा।

चम्पकास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिता:॥ ७८॥

‘चिरिबिल्व (चिलबिल), महुआ, बेंत, मौलसिरी, चम्पा, तिलक और नागकेसर भी खिले दिखायी देते हैं॥

पद्मकाश्चैव शोभन्ते नीलाशोकाश्च पुष्पिता:।

लोध्राश्च गिरिपृष्ठेषु सिंहकेसरपिञ्जरा:॥ ७९॥

‘पर्वतके पृष्ठभागोंपर पद्मक और खिले हुए नील अशोक भी शोभा पाते हैं। वहीं सिंहके अयालकी भाँति पिङ्गल वर्णवाले लोध्र भी सुशोभित हो रहे हैं॥ ७९॥

अङ्कोलाश्च कुरण्टाश्च चूर्णका: पारिभद्रका:।

चूता: पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिता:॥ ८०॥

मुचुकुन्दार्जुनाश्चैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु।

‘अङ्कोल, कुरंट, चूर्णक (सेमल), पारिभद्रक (नीम या मदार), आम, पाटलि, कोविदार, मुचुकुन्द (नारङ्ग) और अर्जुन नामक वृक्ष भी पर्वत-शिखरोंपर फूलोंसे लदे दिखायी देते हैं॥ ८०/

केतकोद्दालकाश्चैव शिरीषा: शिंशपा धवा:॥ ८१॥

शाल्मल्य: किंशुकाश्चैव रक्ता: कुरबकास्तथा।

तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दना: स्यन्दनास्तथा॥ ८२॥

हिन्तालास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिता:।

‘केतक, उद्दालक (लसोड़ा), शिरीष, शीशम, धव, सेमल, पलाश, लाल कुरबक, तिनिश, नक्तमाल, चन्दन, स्यन्दन, हिन्ताल, तिलक तथा नागकेसरके पेड़ भी फूलोंसे भरे दिखायी देते हैं॥ ८१-८२/

पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिर्लताभि: परिवेष्टितान्॥ ८३॥

द्रुमान् पश्येह सौमित्रे पम्पाया रुचिरान् बहून्।

सुमित्रानन्दन! जिनके अग्रभाग फूलोंसे भरे हुए हैं, उन लता-वल्लरियोंसे लिपटे हुए पम्पाके इन मनोहर और बहुसंख्यक वृक्षोंको तो देखो। वे सब-के-सब यहाँ फूलोंके भारसे लदे हुए हैं॥ ८३/

वातविक्षिप्तविटपान् यथासन्नान् द्रुमानिमान्॥ ८४॥

लता: समनुवर्तन्ते मत्ता इव वरस्त्रिय:।

‘हवाके झोंके खाकर जिनकी डालें हिल रही हैं, वे ये वृक्ष झुककर इतने निकट आ जाते हैं कि हाथसे इनकी डालियोंका स्पर्श किया जा सके। सलोनी लताएँ मदमत्त सुन्दरियोंकी भाँति इनका अनुसरण करती हैं॥ ८४/

पादपात् पादपं गच्छन् शैलाच्छैलं वनाद् वनम्॥ ८५॥

वाति नैकरसास्वादसम्मोदित इवानिल:।

‘एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर, एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर तथा एक वनसे दूसरे वनमें जाती हुई वायु अनेक रसोंके आस्वादनसे आनन्दित-सी होकर बह रही है॥ ८५/

केचित् पर्याप्तकुसुमा: पादपा मधुगन्धिन:॥ ८६॥

केचिन्मुकुलसंवीता: श्यामवर्णा इवाबभु:।

‘कुछ वृक्ष प्रचुर पुष्पोंसे भरे हुए हैं और मधु एवं सुगन्धसे सम्पन्न हैं। कुछ मुकुलोंसे आवेष्टित हो श्यामवर्ण-से प्रतीत हो रहे हैं॥ ८६/

इदं मृष्टमिदं स्वादु प्रफुल्लमिदमित्यपि॥ ८७॥

रागरक्तो मधुकर: कुसुमेष्वेव लीयते।

‘वह भ्रमर रागसे रँगा हुआ है और ‘यह मधुर है, यह स्वादिष्ट है तथा यह अधिक खिला हुआ है’ इत्यादि बातें सोचता हुआ फूलोंमें ही लीन हो रहा है॥ ८७/

निलीय पुनरुत्पत्य सहसान्यत्र गच्छति।

मधुलुब्धो मधुकर: पम्पातीरद्रुमेष्वसौ॥ ८८॥

‘पुष्पोंमें छिपकर फिर ऊपरको उड़ जाता है और सहसा अन्यत्र चल देता है। इस प्रकार मधुका लोभी भ्रमर पम्पातीरवर्ती वृक्षोंपर विचर रहा है॥ ८८॥

इयं कुसुमसंघातैरुपस्तीर्णा सुखाकृता।

स्वयं निपतितैर्भूमि: शयनप्रस्तरैरिव॥ ८९॥

‘स्वयं झड़कर गिरे हुए पुष्पसमूहोंसे आच्छादित हुई यह भूमि ऐसी सुखदायिनी हो गयी है, मानो इसपर शयन करनेके लिये मुलायम बिछौने बिछा दिये गये हों॥ ८९॥

विविधा विविधै: पुष्पैस्तैरेव नगसानुषु।

विस्तीर्णा: पीतरक्ताभा: सौमित्रे प्रस्तरा: कृता:॥ ९०॥

‘सुमित्रानन्दन! पर्वतके शिखरोंपर जो नाना प्रकारकी विशाल शिलाएँ हैं, उनपर झड़े हुए भाँति-भाँतिके फूलोंने उन्हें लाल-पीले रंगकी शय्याओंके समान बना दिया है॥ ९०॥

हिमान्ते पश्य सौमित्रे वृक्षाणां पुष्पसम्भवम्।

पुष्पमासे हि तरव: संघर्षादिव पुष्पिता:॥ ९१॥

‘सुमित्राकुमार! वसन्त ऋतुमें वृक्षोंके फूलोंका यह वैभव तो देखो। इस चैत्र मासमें ये वृक्ष मानो परस्पर होड़ लगाकर फूले हुए हैं॥ ९१॥

आह्वयन्त इवान्योन्यं नगा: षट्पदनादिता:।

कुसुमोत्तंसविटपा: शोभन्ते बहु लक्ष्मण॥ ९२॥

‘लक्ष्मण! वृक्ष अपनी ऊपरी डालियोंपर फूलोंका मुकुट धारण करके बड़ी शोभा पा रहे हैं तथा वे भ्रमरोंके गुञ्जारवसे इस तरह कोलाहलपूर्ण हो रहे हैं, मानो एक-दूसरेका आह्वान कर रहे हों॥ ९२॥

एष कारण्डव: पक्षी विगाह्य सलिलं शुभम्।

रमते कान्तया सार्धं काममुद्दीपयन्निव॥ ९३॥

‘यह कारण्डव पक्षी पम्पाके स्वच्छ जलमें प्रवेश करके अपनी प्रियतमाके साथ रमण करता हुआ कामका उद्दीपन-सा कर रहा है॥ ९३॥

मन्दाकिन्यास्तु यदिदं रूपमेतन्मनोरमम्।

स्थाने जगति विख्याता गुणास्तस्या मनोरमा:॥ ९४॥

‘मन्दाकिनीके समान प्रतीत होनेवाली इस पम्पाका जब ऐसा मनोरम रूप है, तब संसारमें उसके जो मनोरम गुण विख्यात हैं, वे उचित ही हैं॥ ९४॥

यदि दृश्येत सा साध्वी यदि चेह वसेमहि।

स्पृहयेयं न शक्राय नायोध्यायै रघूत्तम॥ ९५॥

‘रघुश्रेष्ठ लक्ष्मण! यदि साध्वी सीता दीख जाय और यदि उसके साथ हम यहाँ निवास करने लगें तो हमें न इन्द्रलोकमें जानेकी इच्छा होगी और न अयोध्यामें लौटनेकी ही॥ ९५॥

न ह्येवं रमणीयेषु शाद्वलेषु तया सह।

रमतो मे भवेच्चिन्ता न स्पृहान्येषु वा भवेत्॥ ९६॥

‘हरी-हरी घासोंसे सुशोभित ऐसे रमणीय प्रदेशोंमें सीताके साथ सानन्द विचरनेका अवसर मिले तो मुझे (अयोध्याका राज्य न मिलनेके कारण) कोई चिन्ता नहीं होगी और न दूसरे ही दिव्य भोगोंकी अभिलाषा हो सकेगी॥ ९६॥

अमी हि विविधै: पुष्पैस्तरवो विविधच्छदा:।

काननेऽस्मिन् विना कान्तां चिन्तामुत्पादयन्ति मे॥ ९७॥

‘इस वनमें भाँति-भाँतिके पल्लवोंसे सुशोभित और नाना प्रकारके फूलोंसे उपलक्षित ये वृक्ष प्राण-वल्लभा सीताके बिना मेरे मनमें चिन्ता उत्पन्न कर देते हैं॥

पश्य शीतजलां चेमां सौमित्रे पुष्करायुताम्।

चक्रवाकानुचरितां कारण्डवनिषेविताम्॥ ९८॥

प्लवै: क्रौञ्चैश्च सम्पूर्णां महामृगनिषेविताम्।

‘सुमित्राकुमार! देखो, इस पम्पाका जल कितना शीतल है। इसमें असंख्य कमल खिले हुए हैं। चकवे विचरते हैं और कारण्डव निवास करते हैं। इतना ही नहीं, जलकुक्कुट तथा क्रौञ्च भरे हुए हैं एवं बड़े-बड़े मृग इसका सेवन करते हैं॥ ९८/

अधिकं शोभते पम्पा विकूजद्भिर्विहंगमै:॥ ९९ ॥

दीपयन्तीव मे कामं विविधा मुदिता द्विजा:।

श्यामां चन्द्रमुखीं स्मृत्वा प्रियां पद्मनिभेक्षणाम्॥ १००॥

‘चहकते हुए पक्षियोंसे इस पम्पाकी बड़ी शोभा हो रही है। आनन्दमें निमग्न हुए ये नाना प्रकारके पक्षी मेरे सीताविषयक अनुरागको उद्दीप्त कर देते हैं; क्योंकि इनकी बोली सुनकर मुझे नूतन अवस्थावाली कमलनयनी चन्द्रमुखी प्रियतमा सीताका स्मरण हो आता है॥ ९९-१००॥

पश्य सानुषु चित्रेषु मृगीभि: सहितान् मृगान्।

मां पुनर्मृगशावाक्ष्या वैदेह्या विरहीकृतम्।

व्यथयन्तीव मे चित्तं संचरन्तस्ततस्तत:॥ १०१॥

‘लक्ष्मण! देखो, पर्वतके विचित्र शिखरोंपर ये हरिण अपनी हरिणियोंके साथ विचर रहे हैं और मैं मृगनयनी सीतासे बिछुड़ गया हूँ। इधर-उधर विचरते हुए ये मृग मेरे चित्तको व्यथित किये देते हैं॥ १०१॥

अस्मिन् सानुनि रम्ये हि मत्तद्विजगणाकुले।

पश्येयं यदि तां कान्तां तत: स्वस्ति भवेन्मम॥ १०२॥

‘मतवाले पक्षियोंसे भरे हुए इस पर्वतके रमणीय शिखरपर यदि प्राणवल्लभा सीताका दर्शन पा सकूँ तभी मेरा कल्याण होगा॥ १०२॥

जीवेयं खलु सौमित्रे मया सह सुमध्यमा।

सेवेत यदि वैदेही पम्पाया: पवनं शुभम्॥ १०३॥

‘सुमित्रानन्दन! यदि सुमध्यमा सीता मेरे साथ रहकर इस पम्पासरोवरके तटपर सुखद समीरका सेवन कर सके तो मैं निश्चय ही जीवित रह सकता हूँ॥ १०३॥

पद्मसौगन्धिकवहं शिवं शोकविनाशनम्।

धन्या लक्ष्मण सेवन्ते पम्पाया वनमारुतम्॥ १०४॥

‘लक्ष्मण! जो लोग अपनी प्रियतमाके साथ रहकर पद्म और सौगन्धिक कमलोंकी सुगन्ध लेकर बहनेवाली शीतल, मन्द एवं शोकनाशन पम्पा-वनकी वायुका सेवन करते हैं, वे धन्य हैं॥ १०४॥

श्यामा पद्मपलाशाक्षी प्रिया विरहिता मया।

कथं धारयति प्राणान् विवशा जनकात्मजा॥ १०५॥

‘हाय! वह नयी अवस्थावाली कमललोचना जनकनन्दिनी प्रिया सीता मुझसे बिछुड़कर बेबसीकी दशामें अपने प्राणोंको कैसे धारण करती होगी॥ १०५॥

किं नु वक्ष्यामि धर्मज्ञं राजानं सत्यवादिनम्।

जनकं पृष्टसीतं तं कुशलं जनसंसदि॥ १०६॥

‘लक्ष्मण! धर्मके जाननेवाले सत्यवादी राजा जनक जब जन-समुदायमें बैठकर मुझसे सीताका कुशल-समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा॥ १०६॥

या मामनुगता मन्दं पित्रा प्रस्थापितं वनम्।

सीता धर्मं समास्थाय क्व नु सा वर्तते प्रिया॥ १०७॥

‘हाय! पिताके द्वारा वनमें भेजे जानेपर जो धर्मका आश्रय ले मेरे पीछे-पीछे यहाँ चली आयी, वह मेरी प्रिया इस समय कहाँ है?॥ १०७॥

तया विहीन: कृपण: कथं लक्ष्मण धारये।

या मामनुगता राज्याद् भ्रष्टं विहतचेतसम्॥ १०८॥

‘लक्ष्मण! जिसने राज्यसे वञ्चित और हताश हो जानेपर भी मेरा साथ नहीं छोड़ा—मेरा ही अनुसरण किया, उसके बिना अत्यन्त दीन होकर मैं कैसे जीवन धारण करूँगा॥ १०८॥

तच्चार्वाञ्चितपद्माक्षं सुगन्धि शुभमव्रणम्।

अपश्यतो मुखं तस्या: सीदतीव मतिर्मम॥ १०९॥

‘जो कमलदलके समान सुन्दर, मनोहर एवं प्रशंसनीय नेत्रोंसे सुशोभित है, जिससे मीठी-मीठी सुगन्ध निकलती रहती है, जो निर्मल तथा चेचक आदिके चिह्नसे रहित है, जनककिशोरीके उस दर्शनीय मुखको देखे बिना मेरी सुध-बुध खोयी जा रही है॥ १०९॥

स्मितहास्यान्तरयुतं गुणवन्मधुरं हितम्।

वैदेह्या वाक्यमतुलं कदा श्रोष्यामि लक्ष्मण॥ ११०॥

‘लक्ष्मण! वैदेहीके द्वारा कभी हँसकर और कभी मुसकराकर कही हुई वे मधुर, हितकर एवं लाभदायक बातें जिनकी कहीं तुलना नहीं है, मुझे अब कब सुननेको मिलेंगी?॥ ११०॥

प्राप्य दु:खं वने श्यामा मां मन्मथविकर्शितम्।

नष्टदु:खेव हृष्टेव साध्वी साध्वभ्यभाषत॥ १११॥

‘सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली साध्वी सीता यद्यपि वनमें आकर कष्ट उठा रही थी, तथापि जब मुझे अनङ्गवेदना या मानसिक कष्टसे पीड़ित देखती, तब मानो उसका अपना सारा दु:ख नष्ट हो गया हो, इस प्रकार प्रसन्न-सी होकर मेरी पीड़ा दूर करनेके लिये अच्छी-अच्छी बातें करने लगती थी॥ १११॥

किं नु वक्ष्याम्ययोध्यायां कौसल्यां हि नृपात्मज।

क्व सा स्नुषेति पृच्छन्तीं कथं चापि मनस्विनीम्॥ ११२॥

‘राजकुमार! अयोध्यामें चलनेपर जब मनस्विनी माता कौसल्या पूछेंगी कि ‘मेरी बहूरानी कहाँ है?’ तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?॥ ११२॥

गच्छ लक्ष्मण पश्य त्वं भरतं भ्रातृवत्सलम्।

नह्यहं जीवितुं शक्तस्तामृते जनकात्मजाम्॥ ११३॥

इति रामं महात्मानं विलपन्तमनाथवत्।

उवाच लक्ष्मणो भ्राता वचनं युक्तमव्ययम्॥ ११४॥

‘लक्ष्मण! तुम जाओ, भ्रातृवत्सल भरतसे मिलो। मैं तो जनकनन्दिनी सीताके बिना जीवित नहीं रह सकता।’ इस प्रकार महात्मा श्रीरामको अनाथकी भाँति विलाप करते देख भाई लक्ष्मणने युक्तियुक्त एवं निर्दोष वाणीमें कहा—॥ ११२-११४॥

संस्तम्भ राम भद्रं ते मा शुच: पुरुषोत्तम।

नेदृशानां मतिर्मन्दा भवत्यकलुषात्मनाम्॥ ११५॥

‘पुरुषोत्तम श्रीराम! आपका भला हो। आप अपनेको सँभालिये। शोक न कीजिये। आप-जैसे पुण्यात्मा पुरुषोंकी बुद्धि उत्साहशून्य नहीं होती॥ ११५॥

स्मृत्वा वियोगजं दु:खं त्यज स्नेहं प्रिये जने।

अतिस्नेहपरिष्वङ्गाद् वर्तिरार्द्रापि दह्यते॥ ११६॥

‘स्वजनोंके अवश्यम्भावी वियोगका दु:ख सभीको सहना पड़ता है, इस बातको स्मरण करके अपने प्रिय जनोंके प्रति अधिक स्नेह (आसक्ति) को त्याग दीजिये; क्योंकि जल आदिसे भीगी हुई बत्ती भी अधिक स्नेह (तेल) में डुबो दी जानेपर जलने लगती है॥ ११६॥

यदि गच्छति पातालं ततोऽभ्यधिकमेव वा।

सर्वथा रावणस्तात न भविष्यति राघव॥ ११७॥

‘तात रघुनन्दन! यदि रावण पातालमें या उससे भी अधिक दूर चला जाय तो भी वह अब किसी तरह जीवित नहीं रह सकता॥ ११७॥

प्रवृत्तिर्लभ्यतां तावत् तस्य पापस्य रक्षस:।

ततो हास्यति वा सीतां निधनं वा गमिष्यति॥ ११८॥

‘पहले उस पापी राक्षसका पता लगाइये। फिर या तो वह सीताको वापस करेगा या अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ ११८॥

यदि याति दितेर्गर्भं रावणं सह सीतया।

तत्राप्येनं हनिष्यामि न चेद् दास्यति मैथिलीम्॥ ११९॥

‘रावण यदि सीताको साथ लेकर दितिके गर्भमें जाकर छिप जाय तो भी यदि मिथिलेशकुमारीको लौटा न देगा तो मैं वहाँ भी उसे मार डालूँगा॥ ११९॥

स्वास्थ्यं भद्रं भजस्वार्य त्यज्यतां कृपणा मति:।

अर्थो हि नष्टकार्यार्थैरयत्नेनाधिगम्यते॥ १२०॥

‘अत: आर्य! आप कल्याणकारी धैर्यको अपनाइये। वह दीनतापूर्ण विचार त्याग दीजिये। जिनका प्रयत्न और धन नष्ट हो गया है, वे पुरुष यदि उत्साहपूर्वक उद्योग न करें तो उन्हें उस अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती॥ १२०॥

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्।

सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥ १२१॥

‘भैया! उत्साह ही बलवान् होता है। उत्साहसे बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुषके लिये संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है॥ १२१॥

उत्साहवन्त: पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।

उत्साहमात्रमाश्रित्य प्रतिलप्स्याम जानकीम्॥ १२२॥

‘जिनके हृदयमें उत्साह होता है वे पुरुष कठिन-से-कठिन कार्य आ पड़नेपर हिम्मत नहीं हारते। हमलोग केवल उत्साहका आश्रय लेकर ही जनक-नन्दिनीको प्राप्त कर सकते हैं॥ १२२॥

त्यजतां कामवृत्तत्वं शोकं संन्यस्य पृष्ठत:।

महात्मानं कृतात्मानमात्मानं नावबुध्यसे॥ १२३॥

‘शोकको पीछे छोड़कर कामीके-से व्यवहारका त्याग कीजिये। आप महात्मा एवं कृतात्मा (पवित्र अन्त:करणवाले) हैं, किंतु इस समय अपने-आपको भूल गये हैं—अपने स्वरूपका स्मरण नहीं कर रहे हैं’॥ १२३॥

एवं सम्बोधितस्तेन शोकोपहतचेतन:।

त्यज्य शोकं च मोहं च रामो धैर्यमुपागमत्॥ १२४॥

लक्ष्मणके इस प्रकार समझानेपर शोकसे संतप्तचित्त हुए श्रीरामने शोक और मोहका परित्याग करके धैर्य धारण किया॥ १२४॥

सोऽभ्यतिक्रामदव्यग्रस्तामचिन्त्यपराक्रम: ।

राम: पम्पां सुरुचिरां रम्यां पारिप्लवद्रुमाम्॥ १२५॥

तदनन्तर व्यग्रतारहित (शान्तस्वरूप) अचिन्त्य-पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जिसके तटवर्ती वृक्ष वायुके झोंके खाकर झूम रहे थे, उस परम सुन्दर रमणीय पम्पासरोवरको लाँघकर आगे बढ़े॥ १२५॥

निरीक्षमाण: सहसा महात्मा

सर्वं वनं निर्झरकन्दरं च।

उद्विग्नचेता: सह लक्ष्मणेन

विचार्य दु:खोपहत: प्रतस्थे॥ १२६॥

सीताके स्मरणसे जिनका चित्त उद्विग्न हो गया था, अतएव जो दु:खमें डूबे हुए थे, वे महात्मा श्रीराम लक्ष्मणकी कही हुई बातोंपर विचार करके सहसा सावधान हो गये और झरनों तथा कन्दराओंसहित उस सम्पूर्ण वनका निरीक्षण करते हुए वहाँसे आगेको प्रस्थित हुए॥ १२६॥

तं मत्तमातङ्गविलासगामी

गच्छन्तमव्यग्रमना महात्मा।

स लक्ष्मणो राघवमिष्टचेष्टो

ररक्ष धर्मेण बलेन चैव॥ १२७॥

मतवाले हाथीके समान विलासपूर्ण गतिसे चलनेवाले शान्तचित्त महात्मा लक्ष्मण आगे-आगे चलते हुए श्रीरघुनाथजीकी उनके अनुकूल चेष्टा करते धर्म और बलके द्वारा रक्षा करने लगे॥ १२७॥

तावृष्यमूकस्य समीपचारी

चरन् ददर्शाद्भुतदर्शनीयौ।

शाखामृगाणामधिपस्तरस्वी

वितत्रसे नैव विचेष्ट चेष्टाम्॥ १२८॥

ऋष्यमूक पर्वतके समीप विचरनेवाले बलवान् वानरराज सुग्रीव पम्पाके निकट घूम रहे थे। उसी समय उन्होंने उन अद्भुत दर्शनीय वीर श्रीराम और लक्ष्मणको देखा। देखते ही उनके मनमें यह भय हो गया कि हो न हो इन्हें मेरे शत्रु वालीने ही भेजा होगा, फिर तो वे इतने डर गये कि खाने-पीने आदिकी भी चेष्टा न कर सके॥ १२८॥

स तौ महात्मा गजमन्दगामी

शाखामृगस्तत्र चरंश्चरन्तौ।

दृष्ट्वा विषादं परमं जगाम

चिन्तापरीतो भयभारभग्न:॥ १२९॥

हाथीके समान मन्दगतिसे चलनेवाले महामना वानरराज सुग्रीव जो वहाँ विचर रहे थे, उस समय एक साथ आगे बढ़ते हुए उन दोनों भाइयोंको देखकर चिन्तित हो उठे। भयके भारी भारसे उनका उत्साह नष्ट हो गया। वे महान् दु:खमें पड़ गये॥ १२९॥

तमाश्रमं पुण्यसुखं शरण्यं

सदैव शाखामृगसेवितान्तम्।

त्रस्ताश्च दृष्ट्वा हरयोऽभिजग्मु-

र्महौजसौ राघवलक्ष्मणौ तौ॥ १३०॥

मतङ्ग मुनिका वह आश्रम परम पवित्र एवं सुखदायक था। मुनिके शापसे उसमें वालीका प्रवेश होना कठिन था, इसलिये वह दूसरे वानरोंका आश्रय बना हुआ था। उस आश्रम या वनके भीतर सदा ही अनेकानेक शाखामृग निवास करते थे। उस दिन उन महातेजस्वी श्रीराम और लक्ष्मणको देखकर दूसरे-दूसरे वानर भी भयभीत हो आश्रमके भीतर चले गये॥ १३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे प्रथम: सर्ग:॥ १॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १॥

 


द्वितीय: सर्ग:

सुग्रीव तथा वानरोंकी आशङ्का, हनुमान्‌जीद्वारा उसका निवारण तथा सुग्रीवका हनुमान्‌जीको श्रीराम-लक्ष्मणके पास उनका भेद लेनेके लिये भेजना

तौ तु दृष्ट्वा महात्मानौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

वरायुधधरौ वीरौ सुग्रीव: शङ्कितोऽभवत्॥ १॥

महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको श्रेष्ठ आयुध धारण किये वीर वेशमें आते देख (ऋष्यमूक पर्वतपर बैठे हुए) सुग्रीवके मनमें बड़ी शङ्का हुई॥ १॥

उद्विग्नहृदय: सर्वा दिश: समवलोकयन्।

न व्यतिष्ठत कस्म‌िंश्चिद् देशे वानरपुंगव:॥ २॥

वे उद्विग्नचित्त होकर चारों दिशाओंकी ओर देखने लगे। उस समय वानरशिरोमणि सुग्रीव किसी एक स्थानपर स्थिर न रह सके॥ २॥

नैव चक्रे मन: स्थातुं वीक्षमाणौ महाबलौ।

कपे: परमभीतस्य चित्तं व्यवससाद ह॥ ३॥

महाबली श्रीराम और लक्ष्मणको देखते हुए सुग्रीव अपने मनको स्थिर न रख सके। उस समय अत्यन्त भयभीत हुए उन वानरराजका चित्त बहुत दु:खी हो गया॥ ३॥

चिन्तयित्वा स धर्मात्मा विमृश्य गुरुलाघवम्।

सुग्रीव: परमोद्विग्न: सर्वैस्तैर्वानरै: सह॥ ४॥

सुग्रीव धर्मात्मा थे—उन्हें राजधर्मका ज्ञान था। उन्होंने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपनी दुर्बलता और शत्रुपक्षकी प्रबलताका निश्चय किया। तत्पश्चात् वे समस्त वानरोंके साथ अत्यन्त उद्विग्न हो उठे॥ ४॥

तत: स सचिवेभ्यस्तु सुग्रीव: प्लवगाधिप:।

शशंस परमोद्विग्न: पश्यंस्तौ रामलक्ष्मणौ॥ ५॥

वानरराज सुग्रीवके हृदयमें बड़ा उद्वेग हो गया था। वे श्रीराम और लक्ष्मणकी ओर देखते हुए अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—॥ ५॥

एतौ वनमिदं दुर्गं वालिप्रणिहितौ ध्रुवम्।

छद्मना चीरवसनौ प्रचरन्ताविहागतौ॥ ६॥

‘निश्चय ही ये दोनों वीर वालीके भेजे हुए ही इस दुर्गम वनमें विचरते हुए यहाँ आये हैं। इन्होंने छलसे चीर वस्त्र धारण कर लिये हैं, जिससे हम इन्हें पहचान न सकें’॥ ६॥

तत: सुग्रीवसचिवा दृष्ट्वा परमधन्विनौ।

जग्मुर्गिरितटात् तस्मादन्यच्छिखरमुत्तमम्॥ ७॥

उधर सुग्रीवके सहायक दूसरे-दूसरे वानरोंने जब उन महाधनुर्धर श्रीराम और लक्ष्मणको देखा, तब वे उस पर्वततटसे भागकर दूसरे उत्तम शिखरपर जा पहुँचे॥ ७॥

ते क्षिप्रमभिगम्याथ यूथपा यूथपर्षभम्।

हरयो वानरश्रेष्ठं परिवार्योपतस्थिरे॥ ८॥

वे यूथपति वानर शीघ्रतापूर्वक जाकर यूथपतियोंके सरदार वानरशिरोमणि सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उनके पास खड़े हो गये॥ ८॥

एवमेकायनगता: प्लवमाना गिरेर्गिरिम्।

प्रकम्पयन्तो वेगेन गिरीणां शिखराणि च॥ ९ ॥

तत: शाखामृगा: सर्वे प्लवमाना महाबला:।

बभञ्जुश्च नगांस्तत्र पुष्पितान् दुर्गमाश्रितान्॥ १०॥

इस तरह एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर उछलते-कूदते और अपने वेगसे उन पर्वत-शिखरोंको प्रकम्पित करते हुए वे समस्त महाबली वानर एक मार्गपर आ गये। उन सबने उछल-कूदकर उस समय वहाँ दुर्गम स्थानोंमें स्थित हुए पुष्पशोभित बहुसंख्यक वृक्षोंको तोड़ डाला था॥ ९-१०॥

आप्लवन्तो हरिवरा: सर्वतस्तं महागिरिम्।

मृगमार्जारशार्दूलांस्त्रासयन्तो ययुस्तदा॥ ११॥

उस बेलामें चारों ओरसे उस महान् पर्वतपर उछलकर आते हुए वे श्रेष्ठ वानर वहाँ रहनेवाले मृगों, बिलावों तथा व्याघ्रोंको भयभीत करते हुए जा रहे थे॥

तत: सुग्रीवसचिवा: पर्वतेन्द्रे समाहिता:।

संगम्य कपिमुख्येन सर्वे प्राञ्जलय: स्थिता:॥ १२॥

इस प्रकार सुग्रीवके सभी सचिव पर्वतराज ऋष्यमूकपर आ पहुँचे और एकाग्रचित्त हो उन वानरराजसे मिलकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ १२॥

ततस्तु भयसंत्रस्तं वालिकिल्बिषशङ्कितम्।

उवाच हनुमान् वाक्यं सुग्रीवं वाक्यकोविद:॥ १३॥

तदनन्तर वालीसे बुराईकी आशङ्का करके सुग्रीवको भयभीत देख बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्जी बोले—

सम्भ्रमस्त्यज्यतामेष सर्वैर्वालिकृते महान्।

मलयोऽयं गिरिवरो भयं नेहास्ति वालिन:॥ १४॥

‘आप सब लोग वालीके कारण होनेवाली इस भारी घबराहटको छोड़ दीजिये। यह मलय नामक श्रेष्ठ पर्वत है। यहाँ वालीसे कोई भय नहीं है॥ १४॥

यस्मादुद्विग्नचेतास्त्वं विद्रुतो हरिपुङ्गव।

तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम्॥ १५॥

‘वानरशिरोमणे! जिससे उद्विग्नचित्त होकर आप भागे हैं, उस क्रूर दिखायी देनेवाले निर्दय वालीको मैं यहाँ नहीं देखता हूँ॥ १५॥

यस्मात् तव भयं सौम्य पूर्वजात् पापकर्मण:।

स नेह वाली दुष्टात्मा न ते पश्याम्यहं भयम्॥ १६॥

‘सौम्य! आपको अपने जिस पापाचारी बड़े भाईसे भय प्राप्त हुआ है, वह दुष्टात्मा वाली यहाँ नहीं आ सकता; अत: मुझे आपके भयका कोई कारण नहीं दिखायी देता॥

अहो शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम।

लघुचित्ततयाऽऽत्मानं न स्थापयसि यो मतौ॥ १७॥

‘आश्चर्य है कि इस समय आपने अपनी वानरोचित चपलताको ही प्रकट किया है। वानरप्रवर! आपका चित्त चञ्चल है। इसलिये आप अपनेको विचार-मार्गपर स्थिर नहीं रख पाते हैं॥ १७॥

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितै: सर्वमाचर।

नह्यबुद्ध‌िं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि॥ १८॥

‘बुद्धि और विज्ञानसे सम्पन्न होकर आप दूसरोंकी चेष्टाओंके द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसीके अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बलका आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’॥ १८॥

सुग्रीवस्तु शुभं वाक्यं श्रुत्वा सर्वं हनूमत:।

तत: शुभतरं वाक्यं हनूमन्तमुवाच ह॥ १९॥

हनुमान्‌जीके मुखसे निकले हुए इन सभी श्रेष्ठ वचनोंको सुनकर सुग्रीवने उनसे बहुत ही उत्तम बात कही—

दीर्घबाहू विशालाक्षौ शरचापासिधारिणौ।

कस्य न स्याद् भयं दृष्ट्वा ह्येतौ सुरसुतोपमौ॥ २०॥

‘इन दोनों वीरोंकी भुजाएँ लंबी और नेत्र बड़े-बड़े हैं। ये धनुष, बाण और तलवार धारण किये देवकुमारोंके समान शोभा पा रहे हैं। इन दोनोंको देखकर किसके मनमें भयका संचार न होगा॥ २०॥

वालिप्रणिहितावेव शङ्केऽहं पुरुषोत्तमौ।

राजानो बहुमित्राश्च विश्वासो नात्र हि क्षम:॥ २१॥

‘मेरे मनमें संदेह है कि ये दोनों श्रेष्ठ पुरुष वालीके ही भेजे हुए हैं; क्योंकि राजाओंके बहुत-से मित्र होते हैं। अत: उनपर विश्वास करना उचित नहीं है॥ २१॥

अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छद्मचारिण:।

विश्वस्तानामविश्वस्ताश्छिद्रेषु प्रहरन्त्यपि॥ २२॥

‘प्राणिमात्रको छद्मवेषमें विचरनेवाले शत्रुओंको विशेषरूपसे पहचाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि वे दूसरोंपर अपना विश्वास जमा लेते हैं, परंतु स्वयं किसीका विश्वास नहीं करते और अवसर पाते ही उन विश्वासी पुरुषोंपर ही प्रहार कर बैठते हैं॥ २२॥

कृत्येषु वाली मेधावी राजानो बहुदर्शिन:।

भवन्ति परहन्तारस्ते ज्ञेया: प्राकृतैर्नरै:॥ २३॥

‘वाली इन सब कार्योंमें बड़ा कुशल है। राजालोग बहुदर्शी होते हैं—वञ्चनाके अनेक उपाय जानते हैं, इसीलिये शत्रुओंका विध्वंस कर डालते हैं। ऐसे शत्रुभूत राजाओंको प्राकृत वेशभूषावाले मनुष्यों (गुप्तचरों) द्वारा जाननेका प्रयत्न करना चाहिये॥ २३॥

तौ त्वया प्राकृतेनेव गत्वा ज्ञेयौ प्लवंगम।

इङ्गितानां प्रकारैश्च रूपव्याभाषणेन च॥ २४॥

‘अत: कपिश्रेष्ठ! तुम भी एक साधारण पुरुषकी भाँति यहाँसे जाओ और उनकी चेष्टाओंसे, रूपसे तथा बातचीतके तौर-तरीकोंसे उन दोनोंका यथार्थ परिचय प्राप्त करो॥ २४॥

लक्षयस्व तयोर्भावं प्रहृष्टमनसौ यदि।

विश्वासयन् प्रशंसाभिरिङ्गितैश्च पुन: पुन:॥ २५॥

‘उनके मनोभावोंको समझो। यदि वे प्रसन्नचित्त जान पड़ें तो बारंबार मेरी प्रशंसा करके तथा मेरे अभिप्रायको सूचित करनेवाली चेष्टाओंद्वारा मेरे प्रति उनका विश्वास उत्पन्न करो॥ २५॥

ममैवाभिमुखं स्थित्वा पृच्छ त्वं हरिपुङ्गव।

प्रयोजनं प्रवेशस्य वनस्यास्य धनुर्धरौ॥ २६॥

‘वानरशिरोमणे! तुम मेरी ही ओर मुँह करके खड़ा होना और उन धनुर्धर वीरोंसे इस वनमें प्रवेश करनेका कारण पूछना॥ २६॥

शुद्धात्मानौ यदि त्वेतौ जानीहि त्वं प्लवङ्गम।

व्याभाषितैर्वा रूपैर्वा विज्ञेया दुष्टतानयो:॥ २७॥

‘यदि उनका हृदय शुद्ध जान पड़े तो भी तरह-तरहकी बातों और आकृतिके द्वारा यह जाननेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये कि वे दोनों कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं आये हैं’॥ २७॥

इत्येवं कपिराजेन संदिष्टो मारुतात्मज:।

चकार गमने बुद्ध‌िं यत्र तौ रामलक्ष्मणौ॥ २८॥

वानरराज सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनकुमार हनुमान् जी ने उस स्थानपर जानेका विचार किया, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे॥ २८॥

तथेति सम्पूज्य वचस्तु तस्य

कपे: सुभीतस्य दुरासदस्य।

महानुभावो हनुमान् ययौ तदा

स यत्र रामोऽतिबली सलक्ष्मण:॥ २९॥

अत्यन्त डरे हुए दुर्जय वानर सुग्रीवके उस वचनका आदर करके ‘बहुत अच्छा’ कहकर महानुभाव हनुमान्जी जहाँ अत्यन्त बलशाली श्रीराम और लक्ष्मण थे, उस स्थानके लिये तत्काल चल दिये॥ २९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥ २॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥

 

तृतीय: सर्ग:

हनुमान्‌जीका श्रीराम और लक्ष्मणसे वनमें आनेका कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीवका परिचय देना, श्रीरामका उनके वचनोंकी प्रशंसा करके लक्ष्मणकोअपनी ओरसे बात करनेकी आज्ञा देना तथा लक्ष्मणद्वारा अपनी प्रार्थना स्वीकृत होनेसे हनुमान्‌जीका प्रसन्न होना

वचो विज्ञाय हनुमान् सुग्रीवस्य महात्मन:।

पर्वतादृष्यमूकात् तु पुप्लुवे यत्र राघवौ॥ १॥

महात्मा सुग्रीवके कथनका तात्पर्य समझकर हनुमान्‌जी ऋष्यमूक पर्वतसे उस स्थानकी ओर उछलते हुए चले, जहाँ वे दोनों रघुवंशी बन्धु विराजमान थे॥

कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मज:।

भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपि:॥ २॥

पवनकुमार वानरवीर हनुमान् ने यह सोचकर कि मेरे इस कपिरूपपर किसीका विश्वास नहीं जम सकता, अपने उस रूपका परित्याग करके भिक्षु (सामान्य तपस्वी) का रूप धारण कर लिया॥ २॥

ततश्च हनुमान् वाचा श्लक्ष्णया सुमनोज्ञया।

विनीतवदुपागम्य राघवौ प्रणिपत्य च॥ ३॥

आबभाषे च तौ वीरौ यथावत् प्रशशंस च।

सम्पूज्य विधिवद् वीरौ हनुमान् वानरोत्तम:॥ ४॥

उवाच कामतो वाक्यं मृदु सत्यपराक्रमौ।

राजर्षिदेवप्रतिमौ तापसौ संशितव्रतौ॥ ५॥

तदनन्तर हनुमान् ने विनीतभावसे उन दोनों रघुवंशी वीरोंके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाली मधुर वाणीमें उनके साथ वार्तालाप आरम्भ किया। वानरशिरोमणि हनुमान् ने पहले तो उन दोनों वीरोंकी यथोचित प्रशंसा की। फिर विधिवत् उनका पूजन (आदर) करके स्वच्छन्द-रूपसे मधुर वाणीमें कहा—‘वीरो! आप दोनों सत्य-पराक्रमी, राजर्षियों और देवताओंके समान प्रभावशाली, तपस्वी तथा कठोर व्रतका पालन करनेवाले जान पड़ते हैं॥ ३—५॥

देशं कथमिमं प्राप्तौ भवन्तौ वरवर्णिनौ।

त्रासयन्तौ मृगगणानन्यांश्च वनचारिण:॥ ६॥

पम्पातीररुहान् वृक्षान् वीक्षमाणौ समन्तत:।

इमां नदीं शुभजलां शोभयन्तौ तरस्विनौ॥ ७॥

धैर्यवन्तौ सुवर्णाभौ कौ युवां चीरवाससौ।

नि:श्वसन्तौ वरभुजौ पीडयन्ताविमा: प्रजा:॥ ८॥

‘आपके शरीरकी कान्ति बड़ी सुन्दर है। आप दोनों इस वन्य प्रदेशमें किसलिये आये हैं। वनमें विचरनेवाले मृगसमूहों तथा अन्य जीवोंको भी त्रास देते पम्पासरोवरके तटवर्ती वृक्षोंको सब ओरसे देखते और इस सुन्दर जलवाली नदी-सरीखी पम्पाको सुशोभित करते हुए आप दोनों वेगशाली वीर कौन हैं? आपके अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके समान प्रकाशित होती है। आप दोनों बड़े धैर्यशाली दिखायी देते हैं। आप दोनोंके अङ्गोंपर चीर वस्त्र शोभा पाता है। आप दोनों लंबी साँस खींच रहे हैं। आपकी भुजाएँ विशाल हैं। आप अपने प्रभावसे इस वनके प्राणियोंको पीड़ा दे रहे हैं। बताइये, आपका क्या परिचय है?॥ ६—८॥

सिंहविप्रेक्षितौ वीरौ महाबलपराक्रमौ।

शक्रचापनिभे चापे गृहीत्वा शत्रुनाशनौ॥ ९॥

‘आप दोनों वीरोंकी दृष्टि सिंहके समान है। आपके बल और पराक्रम महान् हैं। इन्द्र-धनुषके समान महान् शरासन धारण करके आप शत्रुओंको नष्ट करनेकी शक्ति रखते हैं॥ ९॥

श्रीमन्तौ रूपसम्पन्नौ वृषभश्रेष्ठविक्रमौ।

हस्तिहस्तोपमभुजौ द्युतिमन्तौ नरर्षभौ॥ १०॥

‘आप कान्तिमान् तथा रूपवान् हैं। आप विशालकाय साँड़के समान मन्दगतिसे चलते हैं। आप दोनोंकी भुजाएँ हाथीकी सूँड़के समान जान पड़ती हैं। आप मनुष्योंमें श्रेष्ठ और परम तेजस्वी हैं॥ १०॥

प्रभया पर्वतेन्द्रोऽसौ युवयोरवभासित:।

राज्यार्हावमरप्रख्यौ कथं देशमिहागतौ॥ ११॥

‘आप दोनोंकी प्रभासे गिरिराज ऋष्यमूक जगमगा रहा है। आपलोग देवताओंके समान पराक्रमी और राज्य भोगनेके योग्य हैं। भला, इस दुर्गम वनप्रदेशमें आपका आगमन कैसे सम्भव हुआ॥ ११॥

पद्मपत्रेक्षणौ वीरौ जटामण्डलधारिणौ।

अन्योन्यसदृशौ वीरौ देवलोकादिहागतौ॥ १२॥

‘आपके नेत्र प्रफुल्ल कमल-दलके समान शोभा पाते हैं। आपमें वीरता भरी है। आप दोनों अपने मस्तकपर जटामण्डल धारण करते हैं और दोनों ही एक-दूसरेके समान हैं। वीरो! क्या आप देवलोकसे यहाँ पधारे हैं?॥

यदृच्छयेव सम्प्राप्तौ चन्द्रसूर्यौ वसुंधराम्।

विशालवक्षसौ वीरौ मानुषौ देवरूपिणौ॥ १३॥

‘आप दोनोंको देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा और सूर्य स्वेच्छासे ही इस भूतलपर उतर आये हैं। आपके वक्ष:स्थल विशाल हैं। मनुष्य होकर भी आपके रूप देवताओंके तुल्य हैं॥ १३॥

सिंहस्कन्धौ महोत्साहौ समदाविव गोवृषौ।

आयताश्च सुवृत्ताश्च बाहव: परिघोपमा:॥ १४॥

सर्वभूषणभूषार्हा: किमर्थं न विभूषिता:।

उभौ योग्यावहं मन्ये रक्षितुं पृथिवीमिमाम्॥ १५॥

ससागरवनां कृत्स्नां विन्ध्यमेरुविभूषिताम्।

‘आपके कंधे सिंहके समान हैं। आपमें महान् उत्साह भरा हुआ है। आप दोनों मदमत्त साँड़ोंके समान प्रतीत होते हैं। आपकी भुजाएँ विशाल, सुन्दर, गोल-गोल और परिघके समान सुदृढ़ हैं। ये समस्त आभूषणोंको धारण करनेके योग्य हैं तो भी आपने इन्हें विभूषित क्यों नहीं किया है? मैं तो समझता हूँ कि आप दोनों समुद्रों और वनोंसे युक्त तथा विन्ध्य और मेरु आदि पर्वतोंसे विभूषित इस सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेके योग्य हैं॥ १४-१५/

इमे च धनुषी चित्रे श्लक्ष्णे चित्रानुलेपने॥ १६॥

प्रकाशेते यथेन्द्रस्य वज्रे हेमविभूषिते।

‘आपके ये दोनों धनुष विचित्र, चिकने तथा अद्भुत अनुलेपनसे चित्रित हैं। इन्हें सुवर्णसे विभूषित किया गया है; अत: ये इन्द्रके वज्रके समान प्रकाशित हो रहे हैं॥ १६/

सम्पूर्णाश्च शितैर्बाणैस्तूणाश्च शुभदर्शना:॥ १७॥

जीवितान्तकरैर्घोरैर्ज्वलद्भिरिव पन्नगै:।

‘प्राणोंका अन्त कर देनेवाले सर्पोंके समान भयंकर तथा प्रकाशमान तीखे बाणोंसे भरे हुए आप दोनोंके तूणीर बड़े सुन्दर दिखायी देते हैं’॥ १७/

महाप्रमाणौ विपुलौ तप्तहाटकभूषणौ॥ १८॥

खड्गावेतौ विराजेते निर्मुक्तभुजगाविव।

‘आपके ये दोनों खड्ग बहुत बड़े और विस्तृत हैं। इन्हें पक्के सोनेसे विभूषित किया गया है। ये दोनों केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान शोभा पाते हैं॥

एवं मां परिभाषन्तं कस्माद् वै नाभिभाषत:॥ १९॥

सुग्रीवो नाम धर्मात्मा कश्चिद् वानरपुङ्गव:।

वीरो विनिकृतो भ्रात्रा जगद्भ्रमति दु:खित:॥ २०॥

‘वीरो! इस तरह मैं बारम्बार आपका परिचय पूछ रहा हूँ, आपलोग मुझे उत्तर क्यों नहीं दे रहे हैं? यहाँ सुग्रीव नामक एक श्रेष्ठ वानर रहते हैं, जो बड़े धर्मात्मा और वीर हैं। उनके भाई वालीने उन्हें घरसे निकाल दिया है; इसलिये वे अत्यन्त दु:खी होकर सारे जगत्में मारे-मारे फिरते हैं॥ २०॥

प्राप्तोऽहं प्रेषितस्तेन सुग्रीवेण महात्मना।

राज्ञा वानरमुख्यानां हनुमान् नाम वानर:॥ २१॥

‘उन्हीं वानरशिरोमणियोंके राजा महात्मा सुग्रीवके भेजनेसे मैं यहाँ आया हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं भी वानरजातिका ही हूँ॥ २१॥

युवाभ्यां स हि धर्मात्मा सुग्रीव: सख्यमिच्छति।

तस्य मां सचिवं वित्तं वानरं पवनात्मजम्॥ २२॥

भिक्षुरूपप्रतिच्छन्नं सुग्रीवप्रियकारणात्।

ऋष्यमूकादिह प्राप्तं कामगं कामचारिणम्॥ २३॥

‘धर्मात्मा सुग्रीव आप दोनोंसे मित्रता करना चाहते हैं। मुझे आपलोग उन्हींका मन्त्री समझें। मैं वायुदेवताका वानरजातीय पुत्र हूँ। मेरी जहाँ इच्छा हो, जा सकता हूँ और जैसा चाहूँ, रूप धारण कर सकता हूँ। इस समय सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये भिक्षुके रूपमें अपनेको छिपाकर मैं ऋष्यमूक पर्वतसे यहाँपर आया हूँ’॥

एवमुक्त्वा तु हनुमांस्तौ वीरौ रामलक्ष्मणौ।

वाक्यज्ञो वाक्यकुशल: पुनर्नोवाच किंचन॥ २४॥

उन दोनों भाई वीरवर श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर बातचीत करनेमें कुशल तथा बातका मर्म समझनेमें निपुण हनुमान् चुप हो गये; फिर कुछ न बोले॥ २४॥

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

प्रहृष्टवदन: श्रीमान् भ्रातरं पार्श्वत: स्थितम्॥ २५॥

उनकी यह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वे अपने बगलमें खड़े हुए छोटे भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार कहने लगे—॥ २५॥

सचिवोऽयं कपीन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मन:।

तमेव कांक्षमाणस्य ममान्तिकमिहागत:॥ २६॥

‘सुमित्रानन्दन! ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीवके सचिव हैं और उन्हींके हितकी इच्छासे यहाँ मेरे पास आये हैं॥ २६॥

तमभ्यभाष सौमित्रे सुग्रीवसचिवं कपिम्।

वाक्यज्ञं मधुरैर्वाक्यै: स्नेहयुक्तमरिंदमम्॥ २७॥

‘लक्ष्मण! इन शत्रुदमन सुग्रीवसचिव कपिवर हनुमान्से, जो बातके मर्मको समझनेवाले हैं, तुम स्नेहपूर्वक मीठी वाणीमें बातचीत करो॥ २७॥

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण:।

नासामवेदविदुष: शक्यमेवं विभाषितुम्॥ २८॥

‘जिसे ऋग्वेदकी शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेदका अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेदका विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषामें वार्तालाप नहीं कर सकता॥

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।

बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्॥ २९॥

‘निश्चय ही इन्होंने समूचे व्याकरणका कई बार स्वाध्याय किया है; क्योंकि बहुत-सी बातें बोल जानेपर भी इनके मुँहसे कोई अशुद्धि नहीं निकली॥ २९॥

न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा।

अन्येष्वपि च सर्वेषु दोष: संविदित: क्वचित्॥ ३०॥

‘सम्भाषणके समय इनके मुख, नेत्र, ललाट, भौंह तथा अन्य सब अङ्गोंसे भी कोई दोष प्रकट हुआ हो, ऐसा कहीं ज्ञात नहीं हुआ॥ ३०॥

अविस्तरमसंदिग्धमविलम्बितमव्यथम् ।

उर:स्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमस्वरम्॥ ३१॥

‘इन्होंने थोड़ेमें ही बड़ी स्पष्टताके साथ अपना अभिप्राय निवेदन किया है। उसे समझनेमें कहीं कोई संदेह नहीं हुआ है। रुक-रुककर अथवा शब्दों या अक्षरोंको तोड़-मरोड़कर किसी ऐसे वाक्यका उच्चारण नहीं किया है, जो सुननेमें कर्णकटु हो। इनकी वाणी हृदयमें मध्यमारूपसे स्थित है और कण्ठसे बैखरीरूपमें प्रकट होती है, अत: बोलते समय इनकी आवाज न बहुत धीमी रही है न बहुत ऊँची। मध्यम स्वरमें ही इन्होंने सब बातें कहीं हैं॥ ३१॥

संस्कारक्रमसम्पन्नामद्भुतामविलम्बिताम् ।

उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहर्षिणीम्॥ ३२॥

‘ये संस्कार119 और क्रमसे120 सम्पन्न, अद्भुत, अविलम्बित121 तथा हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाली कल्याणमयी वाणीका उच्चारण करते हैं॥ ३२॥

अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया।

कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि॥ ३३॥

‘हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीनों स्थानोंद्वारा स्पष्टरूपसे अभिव्यक्त होनेवाली इनकी इस विचित्र वाणीको सुनकर किसका चित्त प्रसन्न न होगा। वध करनेके लिये तलवार उठाये हुए शत्रुका हृदय भी इस अद्भुत वाणीसे बदल सकता है॥ ३३॥

एवंविधो यस्य दूतो न भवेत् पार्थिवस्य तु।

सिद्ध्यन्ति हि कथं तस्य कार्याणां गतयोऽनघ॥ ३४॥

‘निष्पाप लक्ष्मण! जिस राजाके पास इनके समान दूत न हो, उसके कार्योंकी सिद्धि कैसे हो सकती है॥

एवंगुणगणैर्युक्ता यस्य स्यु: कार्यसाधका:।

तस्य सिद्ध्यन्ति सर्वेऽर्था दूतवाक्यप्रचोदिता:॥ ३५॥

‘जिसके कार्यसाधक दूत ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त हों, उस राजाके सभी मनोरथ दूतोंकी बातचीतसे ही सिद्ध हो जाते हैं’॥ ३५॥

एवमुक्तस्तु सौमित्रि: सुग्रीवसचिवं कपिम्।

अभ्यभाषत वाक्यज्ञो वाक्यज्ञं पवनात्मजम्॥ ३६॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बातचीतकी कला जाननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण बातका मर्म समझनेवाले पवनकुमार सुग्रीवसचिव कपिवर हनुमान्से इस प्रकार बोले—॥ ३६॥

विदिता नौ गुणा विद्वन् सुग्रीवस्य महात्मन:।

तमेव चावां मार्गाव: सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्॥ ३७॥

‘विद्वन्! महामना सुग्रीवके गुण हमें ज्ञात हो चुके हैं। हम दोनों भाई वानरराज सुग्रीवकी ही खोजमें यहाँ आये हैं॥ ३७॥

यथा ब्रवीषि हनुमन् सुग्रीववचनादिह।

तत् तथा हि करिष्यावो वचनात् तव सत्तम॥ ३८॥

‘साधुशिरोमणि हनुमान्‌जी! आप सुग्रीवके कथनानुसार यहाँ आकर जो मैत्रीकी बात चला रहे हैं, वह हमें स्वीकार है। हम आपके कहनेसे ऐसा कर सकते हैं’॥ ३८॥

तत् तस्य वाक्यं निपुणं निशम्य

प्रहृष्टरूप: पवनात्मज: कपि:।

मन: समाधाय जयोपपत्तौ

सख्यं तदा कर्तुमियेष ताभ्याम्॥ ३९॥

लक्ष्मणके यह स्वीकृतिसूचक निपुणतायुक्त वचन सुनकर पवनकुमार कपिवर हनुमान् बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सुग्रीवकी विजयसिद्धिमें मन लगाकर उस समय उन दोनों भाइयोंके साथ उनकी मित्रता करनेकी इच्छा की॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे तृतीय: सर्ग:॥ ३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३॥

 


चतुर्थ: सर्ग:

लक्ष्मणका हनुमान्‌जीसे श्रीरामके वनमें आने और सीताजीके हरे जानेका वृत्तान्त बताना तथा इस कार्यमें सुग्रीवके सहयोगकी इच्छा प्रकट करना, हनुमान्‌जीका उन्हें आश्वासन देकर उन दोनों भाइयोंको अपने साथ ले जाना

तत: प्रहृष्टो हनुमान् कृत्यवानिति तद्वच:।

श्रुत्वा मधुरभावं च सुग्रीवं मनसा गत:॥ १॥

श्रीरामजीकी बात सुनकर तथा सुग्रीवके विषयमें उनका सौम्यभाव जानकर और साथ ही यह समझकर कि इन्हें भी सुग्रीवसे कोई आवश्यक काम है, हनुमान्‌जीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन-ही-मन सुग्रीवका स्मरण किया॥ १॥

भाव्यो राज्यागमस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मन:।

यदयं कृत्यवान् प्राप्त: कृत्यं चैतदुपागतम्॥ २॥

‘अब अवश्य ही महामना सुग्रीवको राज्यकी प्राप्ति होनेवाली है; क्योंकि ये महानुभाव किसी कार्य या प्रयोजनसे यहाँ आये हैं और यह कार्य सुग्रीवके ही द्वारा सिद्ध होनेवाला है॥ २॥

तत: परमसंहृष्टो हनूमान् प्लवगोत्तम:।

प्रत्युवाच ततो वाक्यं रामं वाक्यविशारद:॥ ३॥

तत्पश्चात् बातचीतमें कुशल वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जी अत्यन्त हर्षमें भरकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ३॥

किमर्थं त्वं वनं घोरं पम्पाकाननमण्डितम्।

आगत: सानुजो दुर्गं नानाव्यालमृगायुतम्॥ ४॥

‘पम्पा-तटवर्ती काननसे सुशोभित यह वन भयंकर और दुर्गम है। इसमें नाना प्रकारके हिंसक जन्तु निवास करते हैं। आप अपने छोटे भाईके साथ यहाँ किसलिये आये हैं?’॥ ४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणो रामचोदित:।

आचचक्षे महात्मानं रामं दशरथात्मजम्॥ ५॥

हनुमान्‌जीका यह वचन सुनकर श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणने दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामका इस प्रकार परिचय देना आरम्भ किया—॥ ५॥

राजा दशरथो नाम द्युतिमान् धर्मवत्सल:।

चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मेण नित्यमेवाभिपालयन्॥ ६॥

‘विद्वन्! इस पृथ्वीपर दशरथ नामसे प्रसिद्ध जो धर्मानुरागी तेजस्वी राजा थे, वे सदा ही अपने धर्मके अनुसार चारों वर्णोंकी प्रजाका पालन करते थे॥ ६॥

न द्वेष्टा विद्यते तस्य स तु द्वेष्टि न कंचन।

स तु सर्वेषु भूतेषु पितामह इवापर:॥ ७॥

‘इस भूतलपर उनसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था और वे भी किसीसे द्वेष नहीं रखते थे। वे समस्त प्राणियोंपर दूसरे ब्रह्माजीके समान स्नेह रखते थे॥ ७॥

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टवानाप्तदक्षिणै: ।

तस्यायं पूर्वज: पुत्रो रामो नाम जनै: श्रुत:॥ ८॥

‘उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। ये उन्हीं महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। लोग इन्हें श्रीराम कहते हैं॥ ८॥

शरण्य: सर्वभूतानां पितुर्निर्देशपारग:।

ज्येष्ठो दशरथस्यायं पुत्राणां गुणवत्तर:॥ ९॥

‘ये सब प्राणियोंको शरण देनेवाले और पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं। महाराज दशरथके चारों पुत्रोंमें ये सबसे अधिक गुणवान् हैं॥ ९॥

राजलक्षणसंयुक्त: संयुक्तो राज्यसम्पदा।

राज्याद् भ्रष्टो मया वस्तुं वने सार्धमिहागत:॥ १०॥

‘ये राजाके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। जब इन्हें राज्य-सम्पत्तिसे संयुक्त किया जा रहा था, उस समय कुछ ऐसा कारण आ पड़ा, जिससे ये राज्यसे वञ्चित हो गये और वनमें निवास करनेके लिये मेरे साथ यहाँ आ गये॥ १०॥

भार्यया च महाभाग सीतयानुगतो वशी।

दिनक्षये महातेजा: प्रभयेव दिवाकर:॥ ११॥

‘महाभाग! जैसे दिनका क्षय होनेपर सायंकाल महातेजस्वी सूर्य अपने प्रभाके साथ अस्ताचलको जाते हैं, उसी प्रकार ये जितेन्द्रिय श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी सीताके साथ वनमें आये थे॥ ११॥

अहमस्यावरो भ्राता गुणैर्दास्यमुपागत:।

कृतज्ञस्य बहुज्ञस्य लक्ष्मणो नाम नामत:॥ १२॥

‘मैं इनका छोटा भाई हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। मैं अपने कृतज्ञ और बहुज्ञ भाईके गुणोंसे आकृष्ट होकर इनका दास हो गया हूँ॥ १२॥

सुखार्हस्य महार्हस्य सर्वभूतहितात्मन:।

ऐश्वर्येण विहीनस्य वनवासे रतस्य च॥ १३॥

रक्षसापहृता भार्या रहिते कामरूपिणा।

तच्च न ज्ञायते रक्ष: पत्नी येनास्य वा हृता॥ १४॥

‘सम्पूर्ण भूतोंके हितमें मन लगानेवाले, सुख भोगनेके योग्य, महापुरुषोंद्वारा पूजनीय, ऐश्वर्यसे हीन तथा वनवासमें तत्पर मेरे भाईकी पत्नीको इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले एक राक्षसने सूने आश्रमसे हर लिया। जिसने इनकी पत्नीका हरण किया है, वह राक्षस कौन है और कहाँ रहता है? इत्यादि बातोंका ठीक-ठीक पता नहीं लग रहा है॥ १३-१४॥

दनुर्नाम दिते: पुत्र: शापाद् राक्षसतां गत:।

आख्यातस्तेन सुग्रीव: समर्थो वानराधिप:॥ १५॥

स ज्ञास्यति महावीर्यस्तव भार्यापहारिणम्।

एवमुक्त्वा दनु: स्वर्गं भ्राजमानो दिवं गत:॥ १६॥

‘दनु नामक एक दैत्य था, जो शापसे राक्षसभावको प्राप्त हुआ था। उसने सुग्रीवका नाम बताया और कहा— ‘वानरराज सुग्रीव सामर्थ्यशाली और महान् पराक्रमी हैं। वे आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले राक्षसका पता लगा देंगे।’ ऐसा कहकर तेजसे प्रकाशित होता हुआ दनु स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये आकाशमें उड़ गया॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं याथातथ्येन पृच्छत:।

अहं चैव च रामश्च सुग्रीवं शरणं गतौ॥ १७॥

‘आपके प्रश्नके अनुसार मैंने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। मैं और श्रीराम दोनों ही सुग्रीवकी शरणमें आये हैं॥

एष दत्त्वा च वित्तानि प्राप्य चानुत्तमं यश:।

लोकनाथ: पुरा भूत्वा सुग्रीवं नाथमिच्छति॥ १८॥

‘ये पहले बहुत-से धन-वैभवका दान करके परम उत्तम यश प्राप्त कर चुके हैं। जो पूर्वकालमें सम्पूर्ण जगत्के नाथ (संरक्षक) थे, वे आज सुग्रीवको अपना रक्षक बनाना चाहते हैं॥ १८॥

सीता यस्य स्नुषा चासीच्छरण्यो धर्मवत्सल:।

तस्य पुत्र: शरण्यश्च सुग्रीवं शरणं गत:॥ १९॥

‘सीता जिनकी पुत्रवधू है, जो शरणागतपालक और धर्मवत्सल रहे हैं, उन्हीं महाराज दशरथके पुत्र शरणदाता श्रीराम आज सुग्रीवकी शरणमें आये हैं॥ १९॥

सर्वलोकस्य धर्मात्मा शरण्य: शरणं पुरा।

गुरुर्मे राघव: सोऽयं सुग्रीवं शरणं गत:॥ २०॥

‘जो मेरे धर्मात्मा बड़े भाई श्रीरघुनाथजी पहले सम्पूर्ण जगत्को शरण देनेवाले तथा शरणागतवत्सल रहे हैं, वे इस समय सुग्रीवकी शरणमें आये हैं॥ २०॥

यस्य प्रसादे सततं प्रसीदेयुरिमा: प्रजा:।

स रामो वानरेन्द्रस्य प्रसादमभिकांक्षते॥ २१॥

‘जिनके प्रसन्न होनेपर सदा यह सारी प्रजा प्रसन्नतासे खिल उठती थी, वे ही श्रीराम आज वानरराज सुग्रीवकी प्रसन्नता चाहते हैं॥ २१॥

येन सर्वगुणोपेता: पृथिव्यां सर्वपार्थिवा:।

मानिता: सततं राज्ञा सदा दशरथेन वै॥ २२॥

तस्यायं पूर्वज: पुत्रस्त्रिषु लोकेषु विश्रुत:।

सुग्रीवं वानरेन्द्रं तु राम: शरणमागत:॥ २३॥

‘जिन राजा दशरथने सदा अपने यहाँ आये हुए भूमण्डलके सर्वसद्गुणसम्पन्न समस्त राजाओंका निरन्तर सम्मान किया, उन्हींके ये त्रिभुवनविख्यात ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम आज वानरराज सुग्रीवकी शरणमें आये हैं॥

शोकाभिभूते रामे तु शोकार्ते शरणं गते।

कर्तुमर्हति सुग्रीव: प्रसादं सह यूथपै:॥ २४॥

‘श्रीराम शोकसे अभिभूत और आर्त होकर शरणमें आये हैं। यूथपतियोंसहित सुग्रीवको इनपर कृपा करनी चाहिये॥’॥ २४॥

एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं करुणं साश्रुपातनम्।

हनूमान् प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारद:॥ २५॥

नेत्रोंसे आँसू बहाकर करुणाजनक स्वरमें ऐसी बातें कहते हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे कुशल वक्ता हनुमान् जी ने इस प्रकार कहा—॥ २५॥

ईदृशा बुद्धिसम्पन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रिया:।

द्रष्टव्या वानरेन्द्रेण दिष्ट्या दर्शनमागता:॥ २६॥

‘राजकुमारो! वानरराज सुग्रीवको आप-जैसे बुद्धिमान्, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय पुरुषोंसे मिलनेकी आवश्यकता थी। सौभाग्यकी बात है कि आपने स्वयं ही दर्शन दे दिया॥ २६॥

स हि राज्याश्च विभ्रष्ट: कृतवैरश्च वालिना।

हृतदारो वने त्रस्तो भ्रात्रा विनिकृतो भृशम्॥ २७॥

‘वे भी राज्यसे भ्रष्ट हैं। वालीके साथ उनकी शत्रुता हो गयी है। उनकी स्त्रीका भी वालीने ही अपहरण कर लिया है तथा उस दुष्ट भाईने उन्हें घरसे निकाल दिया है, इसलिये वे अत्यन्त भयभीत होकर वनमें निवास करते हैं॥ २७॥

करिष्यति स साहाय्यं युवयोर्भास्करात्मज:।

सुग्रीव: सह चास्माभि: सीताया: परिमार्गणे॥ २८॥

‘सूर्यनन्दन सुग्रीव सीताका पता लगानेमें हमारे साथ स्वयं रहकर आप दोनोंकी पूर्ण सहायता करेंगे’॥ २८॥

इत्येवमुक्त्वा हनुमान् श्लक्ष्णं मधुरया गिरा।

बभाषे साधु गच्छाम: सुग्रीवमिति राघवम्॥ २९॥

ऐसा कहकर हनुमान् जी ने श्रीरघुनाथजीसे स्निग्ध मधुर वाणीमें कहा—‘अच्छा, अब हमलोग सुग्रीवके पास चलें’॥ २९॥

एवं ब्रुवन्तं धर्मात्मा हनूमन्तं स लक्ष्मण:।

प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं प्रोवाच राघवम्॥ ३०॥

उस समय धर्मात्मा लक्ष्मणने उपर्युक्त बात कहनेवाले हनुमान्‌जीका यथोचित सम्मान किया और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ ३०॥

कपि: कथयते हृष्टो यथायं मारुतात्मज:।

कृत्यवान् सोऽपि सम्प्राप्त: कृतकृत्योऽसि राघव॥ ३१॥

‘भैया रघुनन्दन! ये वानरश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् अत्यन्त हर्षसे भरकर जैसी बात कह रहे हैं, उससे जान पड़ता है कि सुग्रीवको भी आपसे कुछ काम है। ऐसी दशामें आप अपना कार्य सिद्ध हुआ ही समझें॥ ३१॥

प्रसन्नमुखवर्णश्च व्यक्तं हृष्टश्च भाषते।

नानृतं वक्ष्यते वीरो हनूमान् मारुतात्मज:॥ ३२॥

‘इनके मुखकी कान्ति स्पष्टत: प्रसन्न दिखायी देती है और ये हर्षसे उत्फुल्ल होकर बातचीत करते हैं। अत: मेरा विश्वास है कि पवनपुत्र वीर हनुमान्‌जी झूठ नहीं बोलेंगे’॥ ३२॥

तत: स सुमहाप्राज्ञो हनूमान् मारुतात्मज:।

जगामादाय तौ वीरौ हरिराजाय राघवौ॥ ३३॥

तदनन्तर परम बुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान्‌जी उन दोनों रघुवंशी वीरोंको साथ ले सुग्रीवसे मिलनेके लिये चले॥ ३३॥

भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थित:।

पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जर:॥ ३४॥

कपिवर हनुमान् ने भिक्षुरूपको त्यागकर वानररूप धारण कर लिया। वे उन दोनों वीरोंको पीठपर बिठाकर वहाँसे चल दिये॥ ३४॥

स तु विपुलयशा: कपिप्रवीर:

पवनसुत: कृतकृत्यवत् प्रहृष्ट:।

गिरिवरमुरुविक्रम: प्रयात:

स शुभमति: सह रामलक्ष्मणाभ्याम्॥ ३५॥

महान् यशस्वी तथा शुभ विचारवाले महापराक्रमी वे कपिवीर पवनकुमार कृतकृत्य-से होकर अत्यन्त हर्षमें भर गये और श्रीराम-लक्ष्मणके साथ गिरिवर ऋष्यमूकपर जा पहुँचे॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थ: सर्ग:॥ ४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४॥

 

पञ्चम: सर्ग:

श्रीराम और सुग्रीवकी मैत्री तथा श्रीरामद्वारा वालिवधकी प्रतिज्ञा

ऋष्यमूकात् तु हनुमान् गत्वा तं मलयं गिरिम्।

आचचक्षे तदा वीरौ कपिराजाय राघवौ॥ १॥

श्रीराम और लक्ष्मणको ऋष्यमूक पर्वतपर सुग्रीवके वास-स्थानमें बिठाकर हनुमान्‌जी वहाँसे मलयपर्वतपर गये (जो ऋष्यमूकका ही एक शिखर है) और वहाँ वानरराज सुग्रीवको उन दोनों रघुवंशी वीरोंका परिचय देते हुए इस प्रकार बोले—॥ १॥

अयं रामो महाप्राज्ञ सम्प्राप्तो दृढविक्रम:।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामोऽयं सत्यविक्रम:॥ २॥

‘महाप्राज्ञ! जिनका पराक्रम अत्यन्त दृढ़ और अमोघ है, वे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मणके साथ पधारे हैं॥ २॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातो रामो दशरथात्मज:।

धर्मे निगदितश्चैव पितुर्निर्देशकारक:॥ ३॥

‘इन श्रीरामका आविर्भाव इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है। ये महाराज दशरथके पुत्र हैं और स्वधर्मपालनके लिये संसारमें विख्यात हैं। अपने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये इस वनमें इनका आगमन हुआ है॥ ३॥

राजसूयाश्वमेधैश्च वह्निर्येनाभितर्पित:।

दक्षिणाश्च तथोत्सृष्टा गाव: शतसहस्रश:॥ ४॥

तपसा सत्यवाक्येन वसुधा येन पालिता।

स्त्रीहेतोस्तस्य पुत्रोऽयं रामोऽरण्यं समागत:॥ ५॥

‘जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करके अग्निदेवको तृप्त किया था, ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणाएँ बाँटी थीं और लाखों गौएँ दानमें दी थीं। जिन्होंने सत्य-भाषणपूर्वक तपके द्वारा वसुधाका पालन किया था, उन्हीं महाराज दशरथके पुत्र ये श्रीराम पिताद्वारा अपनी पत्नी कैकेयीके लिये दिये हुए वरका पालन करनेके निमित्त इस वनमें आये हैं॥ ४-५॥

तस्यास्य वसतोऽरण्ये नियतस्य महात्मन:।

रावणेन हृता भार्या स त्वां शरणमागत:॥ ६॥

‘महात्मा श्रीराम मुनियोंकी भाँति नियमका पालन करते हुए दण्डकारण्यमें निवास करते थे। एक दिन रावणने आकर सूने आश्रमसे इनकी पत्नी सीताका अपहरण कर लिया। उन्हींकी खोजमें आपसे सहायता लेनेके लिये ये आपकी शरणमें आये हैं॥ ६॥

भवता सख्यकामौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

प्रगृह्य चार्चयस्वैतौ पूजनीयतमावुभौ॥ ७॥

‘ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आपसे मित्रता करना चाहते हैं। आप चलकर इन्हें अपनावें और इनका यथोचित सत्कार करें; क्योंकि ये दोनों ही वीर हमलोगोंके लिये परम पूजनीय हैं’॥ ७॥

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं सुग्रीवो वानराधिप:।

दर्शनीयतमो भूत्वा प्रीत्योवाच च राघवम्॥ ८॥

हनुमान्‌जीका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव स्वेच्छासे अत्यन्त दर्शनीय रूप धारण करके श्रीरघुनाथजीके पास आये और बड़े प्रेमसे बोले—॥ ८॥

भवान् धर्मविनीतश्च सुतपा: सर्ववत्सल:।

आख्याता वायुपुत्रेण तत्त्वतो मे भवद्गुणा:॥ ९॥

‘प्रभो! आप धर्मके विषयमें भलीभाँति सुशिक्षित, परम तपस्वी और सबपर दया करनेवाले हैं। पवनकुमार हनुमान् जी ने मुझसे आपके यथार्थ गुणोंका वर्णन किया है॥

तन्ममैवैष सत्कारो लाभश्चैवोत्तम: प्रभो।

यत्त्वमिच्छसि सौहार्दं वानरेण मया सह॥ १०॥

‘भगवन्! मैं वानर हूँ और आप नर। मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं, इसमें मेरा ही सत्कार है और मुझे ही उत्तम लाभ प्राप्त हो रहा है॥ १०॥

रोचते यदि मे सख्यं बाहुरेष प्रसारित:।

गृह्यतां पाणिना पाणिर्मर्यादा बध्यतां ध्रुवा॥ ११॥

‘यदि मेरी मैत्री आपको पसंद हो तो मेरा यह हाथ फैला हुआ है। आप इसे अपने हाथमें ले लें और परस्पर मैत्रीका अटूट सम्बन्ध बना रहे—इसके लिये स्थिर मर्यादा बाँध दें’॥ ११॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम्।

सम्प्रहृष्टमना हस्तं पीडयामास पाणिना॥ १२॥

हृष्ट: सौहृदमालम्ब्य पर्यष्वजत पीडितम्।

सुग्रीवका यह सुन्दर वचन सुनकर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपने हाथसे उनका हाथ पकड़कर दबाया और सौहार्दका आश्रय ले बड़े हर्षके साथ शोकपीड़ित सुग्रीवको छातीसे लगा लिया॥ १२/

ततो हनूमान् संत्यज्य भिक्षुरूपमरिंदम:॥ १३॥

काष्ठयो: स्वेन रूपेण जनयामास पावकम्।

(सुग्रीवके पास जानेसे पूर्व हनुमान् जी ने पुन: भिक्षुरूप धारण कर लिया था।) श्रीराम सुग्रीवकी मैत्रीके समय शत्रुदमन हनुमान् जी ने भिक्षुरूपको त्यागकर अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया और दो लकड़ियोंको रगड़कर आग पैदा की॥ १३/

दीप्यमानं ततो वह्निं पुष्पैरभ्यर्च्य सत्कृतम्॥ १४॥

तयोर्मध्ये तु सुप्रीतो निदधौ सुसमाहित:।

तत्पश्चात् उस अग्निको प्रज्वलित करके उन्होंने फूलोंद्वारा अग्निदेवका सादर पूजन किया; फिर एकाग्रचित्त हो श्रीराम और सुग्रीवके बीचमें साक्षीके रूपमें उस अग्निको प्रसन्नतापूर्वक स्थापित कर दिया॥ १४/

ततोऽग्निं दीप्यमानं तौ चक्रतुश्च प्रदक्षिणम्॥ १५॥

सुग्रीवो राघवश्चैव वयस्यत्वमुपागतौ।

इसके बाद सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजीने उस प्रज्वलित अग्निकी प्रदक्षिणा की और दोनों एक-दूसरेके मित्र बन गये॥ १५/

तत: सुप्रीतमनसौ तावुभौ हरिराघवौ॥ १६॥

अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ न तृप्तिमभिजग्मतु:।

इससे उन वानरराज तथा श्रीरघुनाथजी दोनोंके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए तृप्त नहीं होते थे॥ १६/

त्वं वयस्योऽसि हृद्यो मे ह्येकं दु:खं सुखं च नौ॥ १७॥

सुग्रीवो राघवं वाक्यमित्युवाच प्रहृष्टवत्।

उस समय सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आजसे हम दोनोंका दु:ख और सुख एक है’॥ १७/

तत: सुपर्णबहुलां भङ्क्त्वा शाखां सुपुष्पिताम्॥ १८॥

सालस्यास्तीर्य सुग्रीवो निषसाद सराघव:।

यह कहकर सुग्रीवने अधिक पत्ते और फूलोंवाली शाल वृक्षकी एक शाखा तोड़ी और उसे बिछाकर वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ उसपर बैठे॥ १८/

लक्ष्मणायाथ संहृष्टो हनुमान् मारुतात्मज:॥ १९॥

शाखां चन्दनवृक्षस्य ददौ परमपुष्पिताम्।

तदनन्तर पवनपुत्र हनुमान् ने अत्यन्त प्रसन्न हो चन्दन-वृक्षकी एक डाली, जिसमें बहुत-से फूल लगे हुए थे, तोड़कर लक्ष्मणको बैठनेके लिये दी॥ १९/

तत: प्रहृष्ट: सुग्रीव: श्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥ २०॥

प्रत्युवाच तदा रामं हर्षव्याकुललोचन:।

इसके बाद हर्षसे भरे हुए सुग्रीवने जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे, उस समय भगवान् श्रीरामसे स्निग्ध मधुर वाणीमें कहा—॥ २०/

अहं विनिकृतो राम चरामीह भयार्दित:॥ २१॥

हृतभार्यो वने त्रस्तो दुर्गमेतदुपाश्रित:।

‘श्रीराम! मैं घरसे निकाल दिया गया हूँ और भयसे पीड़ित होकर यहाँ विचरता हूँ। मेरी पत्नी भी मुझसे छीन ली गयी। मैंने आतङ्कित होकर वनमें इस दुर्गम पर्वतका आश्रय लिया है॥ २१/

सोऽहं त्रस्तो वने भीतो वसाम्युद्भ्रान्तचेतन:॥ २२॥

वालिना निकृतो भ्रात्रा कृतवैरश्च राघव।

‘रघुनन्दन! मेरे बड़े भाई वालीने मुझे घरसे निकालकर मेरे साथ वैर बाँध लिया है। उसीके त्रास और भयसे उद्भ्रान्तचित्त होकर मैं इस वनमें निवास करता हूँ॥ २२/

वालिनो मे महाभाग भयार्तस्याभयं कुरु॥ २३॥

कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ भयं मे न भवेद् यथा।

‘महाभाग! वालीके भयसे पीड़ित हुए मुझ सेवकको आप अभय-दान दीजिये। काकुत्स्थ! आपको ऐसा करना चाहिये, जिससे मेरे लिये किसी प्रकारका भय न रह जाय’॥ २३/

एवमुक्तस्तु तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मवत्सल:॥ २४॥

प्रत्यभाषत काकुत्स्थ: सुग्रीवं प्रहसन्निव।

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर धर्मके ज्ञाता, धर्मवत्सल, ककुत्स्थकुलभूषण तेजस्वी श्रीरामने हँसते हुए-से वहाँ सुग्रीवको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २४/

उपकारफलं मित्रं विदितं मे महाकपे॥ २५॥

वालिनं तं वधिष्यामि तव भार्यापहारिणम्।

‘महाकपे! मुझे मालूम है कि मित्र उपकाररूपी फल देनेवाला होता है। मैं तुम्हारी पत्नीका अपहरण करनेवाले वालीका वध कर दूँगा॥ २५/

अमोघा: सूर्यसंकाशा ममेमे निशिता: शरा:॥ २६॥

तस्मिन् वालिनि दुर्वृत्ते निपतिष्यन्ति वेगिता:।

कङ्कपत्रप्रतिच्छन्ना महेन्द्राशनिसंनिभा:॥ २७॥

तीक्ष्णाग्रा ऋजुपर्वाण: सरोषा भुजगा इव।

‘मेरे तूणीरमें संगृहीत हुए ये सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण अमोघ हैं—इनका वार खाली नहीं जाता। ये बड़े वेगशाली हैं। इनमें कंक पक्षीके परोंके पंख लगे हुए हैं, जिनसे ये आच्छादित हैं। इनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं और गाँठे भी सीधी हैं। ये रोषमें भरे हुए सर्पोंके समान छूटते हैं और इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर चोट करते हैं। उस दुराचारी वालीपर मेरे ये बाण अवश्य गिरेंगे॥ २६-२७/

तमद्य वालिनं पश्य तीक्ष्णैराशीविषोपमै:॥ २८॥

शरैर्विनिहतं भूमौ प्रकीर्णमिव पर्वतम्।

‘आज देखना, मैं अपने विषधर सर्पोंके समान तीखे बाणोंसे मारकर वालीको पृथ्वीपर गिरा दूँगा। वह इन्द्रके वज्रसे टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतके समान दिखायी देगा’॥

स तु तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्यात्मनो हितम्।

सुग्रीव: परमप्रीत: परमं वाक्यमब्रवीत्॥ २९॥

अपने लिये परम हितकर वह श्रीरघुनाथजीका वचन सुनकर सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम वाणीमें बोले—॥ २९॥

तव प्रसादेन नृसिंह वीर

प्रियां च राज्यं च समाप्नुयामहम्।

तथा कुरु त्वं नरदेव वैरिणं

यथा न हिंस्यात् स पुनर्ममाग्रजम्॥ ३०॥

‘वीर! पुरुषसिंह! मैं आपकी कृपासे अपनी प्यारी पत्नी तथा राज्यको प्राप्त कर सकूँ, ऐसा यत्न कीजिये। नरदेव! मेरा बड़ा भाई वैरी हो गया है। आप उसकी ऐसी अवस्था कर दें जिससे वह फिर मुझे मार न सके’॥ ३०॥

सीताकपीन्द्रक्षणदाचराणां

राजीवहेमज्वलनोपमानि ।

सुग्रीवरामप्रणयप्रसङ्गे

वामानि नेत्राणि समं स्फुरन्ति॥ ३१॥

सुग्रीव और श्रीरामकी इस प्रेमपूर्ण मैत्रीके प्रसङ्गमें सीताके प्रफुल्ल कमल-जैसे, कपिराज वालीके सुवर्ण-जैसे तथा निशाचरोंके प्रज्वलित अग्नि-जैसे बायें नेत्र एक साथ ही फड़कने लगे॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चम: सर्ग:॥ ५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५॥

 

षष्ठ: सर्ग:

सुग्रीवका श्रीरामको सीताजीके आभूषण दिखाना तथा श्रीरामका शोक एवं रोषपूर्ण वचन

पुनरेवाब्रवीत् प्रीतो राघवं रघुनन्दनम्।

अयमाख्याति ते राम सचिवो मन्त्रिसत्तम:॥ १॥

हनुमान् यन्निमित्तं त्वं निर्जनं वनमागत:।

सुग्रीवने पुन: प्रसन्नतापूर्वक रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘श्रीराम! मेरे मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ सचिव ये हनुमान्‌जी आपके विषयमें वह सारा वृत्तान्त बता चुके हैं, जिसके कारण आपको इस निर्जन वनमें आना पड़ा है॥ १/

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वसतश्च वने तव॥ २॥

रक्षसापहृता भार्या मैथिली जनकात्मजा।

त्वया वियुक्ता रुदती लक्ष्मणेन च धीमता॥ ३॥

अन्तरं प्रेप्सुना तेन हत्वा गृध्रं जटायुषम्।

भार्यावियोगजं दु:खं प्रापितस्तेन रक्षसा॥ ४॥

‘अपने भाई लक्ष्मणके साथ जब आप वनमें निवास करते थे, उस समय राक्षस रावणने आपकी पत्नी मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीताको हर लिया। उस वेलामें आप उनसे अलग थे और बुद्धिमान् लक्ष्मण भी उन्हें अकेली छोड़कर चले गये थे। राक्षस इसी अवसरकी प्रतीक्षामें था। उसने गीध जटायुका वध करके रोती हुई सीताका अपहरण किया है। इस प्रकार उस राक्षसने आपको पत्नी-वियोगके कष्टमें डाल दिया है॥ २—४॥

भार्यावियोगजं दु:खं नचिरात् त्वं विमोक्ष्यसे।

अहं तामानयिष्यामि नष्टां वेदश्रुतीमिव॥ ५॥

‘परंतु इस पत्नी-वियोगके दु:खसे आप शीघ्र ही मुक्त हो जायँगे। मैं राक्षसद्वारा हरी गयी वेदवाणीके समान आपकी पत्नीको वापस ला दूँगा॥ ५॥

रसातले वा वर्तन्तीं वर्तन्तीं वा नभस्तले।

अहमानीय दास्यामि तव भार्यामरिंदम॥ ६॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आपकी भार्या सीता पातालमें हों या आकाशमें, मैं उन्हें ढूँढ़ लाकर आपकी सेवामें समर्पित कर दूँगा॥ ६॥

इदं तथ्यं मम वचस्त्वमवेहि च राघव।

न शक्या सा जरयितुमपि सेन्द्रै: सुरासुरै:॥ ७॥

तव भार्या महाबाहो भक्ष्यं विषकृतं यथा।

त्यज शोकं महाबाहो तां कान्तामानयामि ते॥ ८॥

‘रघुनन्दन! आप मेरी इस बातको सत्य मानें। महाबाहो! आपकी पत्नी जहर मिलाये हुए भोजनकी भाँति दूसरोंके लिये अग्राह्य है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी उन्हें पचा नहीं सकते। आप शोक त्याग दीजिये। मैं आपकी प्राणवल्लभाको अवश्य ला दूँगा॥

अनुमानात् तु जानामि मैथिली सा न संशय:।

ह्र‌ियमाणा मया दृष्टा रक्षसा रौद्रकर्मणा॥ ९ ॥

क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च विस्वरम्।

स्फुरन्ती रावणस्याङ्के पन्नगेन्द्रवधूर्यथा॥ १०॥

‘एक दिन मैंने देखा, भयंकर कर्म करनेवाला कोई राक्षस किसी स्त्रीको लिये जा रहा है। मैं अनुमानसे समझता हूँ, वे मिथिलेशकुमारी सीता ही रही होंगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वे टूटे हुए स्वरमें ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!’ पुकारती हुई रो रही थीं तथा रावणकी गोदमें नागराजकी वधू (नागिन) की भाँति छटपटाती हुई प्रकाशित हो रही थीं॥

आत्मना पञ्चमं मां हि दृष्ट्वा शैलतले स्थितम्।

उत्तरीयं तया त्यक्तं शुभान्याभरणानि च॥ ११॥

‘चार मन्त्रियोंसहित पाँचवाँ मैं इस शैल-शिखरपर बैठा हुआ था। मुझे देखकर देवी सीताने अपनी चादर और कई सुन्दर आभूषण ऊपरसे गिराये॥ ११॥

तान्यस्माभिर्गृहीतानि निहितानि च राघव।

आनयिष्याम्यहं तानि प्रत्यभिज्ञातुमर्हसि॥ १२॥

‘रघुनन्दन! वे सब वस्तुएँ हमलोगोंने लेकर रख ली हैं। मैं अभी उन्हें लाता हूँ, आप उन्हें पहचान सकते हैं’॥

तमब्रवीत् ततो राम: सुग्रीवं प्रियवादिनम्।

आनयस्व सखे शीघ्रं किमर्थं प्रविलम्बसे॥ १३॥

तब श्रीरामने यह प्रिय संवाद सुनानेवाले सुग्रीवसे कहा—‘सखे! शीघ्र ले आओ, क्यों विलम्ब करते हो?’॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीव: शैलस्य गहनां गुहाम्।

प्रविवेश तत: शीघ्रं राघवप्रियकाम्यया॥ १४॥

उत्तरीयं गृहीत्वा तु स तान्याभरणानि च।

इदं पश्येति रामाय दर्शयामास वानर:॥ १५॥

उनके ऐसा कहनेपर सुग्रीव शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे पर्वतकी एक गहन गुफामें गये और चादर तथा वे आभूषण लेकर निकल आये। बाहर आकर वानरराजने ‘लीजिये, यह देखिये’ ऐसा कहकर श्रीरामको वे सारे आभूषण दिखाये॥ १४-१५॥

ततो गृहीत्वा वासस्तु शुभान्याभरणानि च।

अभवद् बाष्पसंरुद्धो नीहारेणेव चन्द्रमा:॥ १६॥

उन वस्त्र और सुन्दर आभूषणोंको लेकर श्रीरामचन्द्रजी कुहासेसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति आँसुओंसे अवरुद्ध हो गये॥ १६॥

सीतास्नेहप्रवृत्तेन स तु बाष्पेण दूषित:।

हा प्रियेति रुदन् धैर्यमुत्सृज्य न्यपतत् क्षितौ॥ १७॥

सीताके स्नेहवश बहते हुए आँसुओंसे उनका मुख और वक्ष:स्थल भीगने लगे। वे ‘हा प्रिये!’ ऐसा कहकर रोने लगे और धैर्य छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १७॥

हृदि कृत्वा स बहुशस्तमलंकारमुत्तमम्।

निशश्वास भृशं सर्पो बिलस्थ इव रोषित:॥ १८॥

उन उत्तम आभूषणोंको बारम्बार हृदयसे लगाकर वे बिलमें बैठे हुए रोषमें भरे सर्पकी भाँति जोर-जोरसे साँस लेने लगे॥ १८॥

अविच्छिन्नाश्रुवेगस्तु सौमित्रिं प्रेक्ष्य पार्श्वत:।

परिदेवयितुं दीनं राम: समुपचक्रमे॥ १९॥

उनके आँसुओंका वेग रुकता ही नहीं था। अपने पास खड़े हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणकी ओर देखकर श्रीराम दीनभावसे विलाप करते हुए बोले—॥ १९॥

पश्य लक्ष्मण वैदेह्या संत्यक्तं ह्र‌ियमाणया।

उत्तरीयमिदं भूमौ शरीराद् भूषणानि च॥ २०॥

‘लक्ष्मण! देखो, राक्षसके द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीताने यह चादर और ये गहने अपने शरीरसे उतारकर पृथ्वीपर डाल दिये थे॥ २०॥

शाद्वलिन्यां ध्रुवं भूम्यां सीतया ह्र‌ियमाणया।

उत्सृष्टं भूषणमिदं तथा रूपं हि दृश्यते॥ २१॥

‘निशाचरके द्वारा अपहृत होती हुई सीताके द्वारा त्यागे गये ये आभूषण निश्चय ही घासवाली भूमिपर गिरे होंगे; क्योंकि इनका रूप ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है—ये टूटे-फूटे नहीं हैं’॥ २१॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले॥ २२॥

नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्।

श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण बोले—‘भैया! मैं इन बाजूबंदोंको तो नहीं जानता और न इन कुण्डलोंको ही समझ पाता हूँ कि किसके हैं; परंतु प्रतिदिन भाभीके चरणोंमें प्रणाम करनेके कारण मैं इन दोनों नूपुरोंको अवश्य पहचानता हूँ’॥ २२/

ततस्तु राघवो वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत्॥ २३॥

ब्रूहि सुग्रीव कं देशं ह्र‌ियन्ती लक्षिता त्वया।

रक्षसा रौद्ररूपेण मम प्राणप्रिया हृता॥ २४॥

तब श्रीरघुनाथजी सुग्रीवसे इस प्रकार बोले—‘सुग्रीव! तुमने तो देखा है, वह भयंकर रूपधारी राक्षस मेरी प्राणप्यारी सीताको किस दिशाकी ओर ले गया है, यह बताओ॥ २३-२४॥

क्व वा वसति तद् रक्षो महद् व्यसनदं मम।

यन्निमित्तमहं सर्वान् नाशयिष्यामि राक्षसान्॥ २५॥

‘मुझे महान् संकट देनेवाला वह राक्षस कहाँ रहता है? मैं केवल उसीके अपराधके कारण समस्त राक्षसोंका विनाश कर डालूँगा॥ २५॥

हरता मैथिलीं येन मां च रोषयता ध्रुवम्।

आत्मनो जीवितान्ताय मृत्युद्वारमपावृतम्॥ २६॥

‘उस राक्षसने मैथिलीका अपहरण करके मेरा रोष बढ़ाकर निश्चय ही अपने जीवनका अन्त करनेके लिये मौतका दरवाजा खोल दिया है॥ २६॥

मम दयिततमा हृता वनाद्

रजनिचरेण विमथ्य येन सा।

कथय मम रिपुं तमद्य वै

प्लवगपते यमसंनिधिं नयामि॥ २७॥

‘वानरराज! जिस निशाचरने मुझे धोखेमें डालकर मेरा अपमान करके मेरी प्रियतमाका वनसे अपहरण किया है, वह मेरा घोर शत्रु है। तुम उसका पता बताओ। मैं अभी उसे यमराजके पास पहुँचाता हूँ’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षष्ठ: सर्ग:॥ ६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥

 

सप्तम: सर्ग:

सुग्रीवका श्रीरामको समझाना तथा श्रीरामका सुग्रीवको उनकी कार्यसिद्धिका विश्वास दिलाना

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामेणार्तेन वानर:।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं सबाष्पं बाष्पगद्गद:॥ १॥

श्रीरामने शोकसे पीड़ित होकर जब ऐसी बातें कहीं, तब वानरराज सुग्रीवकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे हाथ जोड़कर अश्रुगद्गद कण्ठसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

न जाने निलयं तस्य सर्वथा पापरक्षस:।

सामर्थ्यं विक्रमं वापि दौष्कुलेयस्य वा कुलम्॥ २॥

‘प्रभो! नीच कुलमें उत्पन्न हुए उस पापात्मा राक्षसका गुप्त निवासस्थान कहाँ है, उसमें कितनी शक्ति है, उसका पराक्रम कैसा है अथवा वह किस वंशका है—इन सब बातोंको मैं सर्वथा नहीं जानता॥ २॥

सत्यं तु प्रतिजानामि त्यज शोकमरिंदम।

करिष्यामि तथा यत्नं यथा प्राप्स्यसि मैथिलीम्॥ ३॥

‘परंतु आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं ऐसा यत्न करूँगा कि जिससे मिथिलेशकुमारी सीता आपको मिल जायँ, इसलिये शत्रुदमन वीर! आप शोकका त्याग करें॥ ३॥

रावणं सगणं हत्वा परितोष्यात्मपौरुषम्।

तथास्मि कर्ता नचिराद् यथा प्रीतो भविष्यसि॥ ४॥

‘मैं आपके संतोषके लिये सैनिकोंसहित रावणका वध करके अपना ऐसा पुरुषार्थ प्रकट करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायँगे॥ ४॥

अलं वैक्लव्यमालम्ब्य धैर्यमात्मगतं स्मर।

त्वद्विधानां न सदृशमीदृशं बुद्धिलाघवम्॥ ५॥

‘इस तरह मनमें व्याकुलता लाना व्यर्थ है। आपके हृदयमें स्वाभाविकरूपसे जो धैर्य है, उसका स्मरण कीजिये। इस तरह बुद्धि और विचारको हलका बना देना—उसकी सहज गम्भीरताको खो देना आप-जैसे महापुरुषोंके लिये उचित नहीं है॥ ५॥

मयापि व्यसनं प्राप्तं भार्याविरहजं महत्।

नाहमेवं हि शोचामि धैर्यं न च परित्यजे॥ ६॥

‘मुझे भी पत्नीके विरहका महान् कष्ट प्राप्त हुआ है, परंतु मैं इस तरह शोक नहीं करता और न धैर्यको ही छोड़ता हूँ॥ ६॥

नाहं तामनुशोचामि प्राकृतो वानरोऽपि सन्।

महात्मा च विनीतश्च किं पुनर्धृतिमान् महान्॥ ७॥

‘यद्यपि मैं एक साधारण वानर हूँ तथापि अपनी पत्नीके लिये निरन्तर शोक नहीं करता हूँ। फिर आप-जैसे महात्मा, सुशिक्षित और धैर्यवान् महापुरुष शोक न करें—इसके लिये तो कहना ही क्या है॥ ७॥

बाष्पमापतितं धैर्यान्निग्रहीतुं त्वमर्हसि।

मर्यादां सत्त्वयुक्तानां धृतिं नोत्स्रष्टुमर्हसि॥ ८॥

‘आपको चाहिये कि धैर्य धारण करके इन गिरते हुए आँसुओंको रोकें। सात्त्विक पुरुषोंकी मर्यादा और धैर्यका परित्याग न करें॥ ८॥

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगे।

विमृशंश्च स्वयाबुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥ ९॥

‘(आत्मीयजनोंके वियोग आदिसे होनेवाले) शोकमें, आर्थिक संकटमें अथवा प्राणान्तकारी भय उपस्थित होनेपर जो अपनी बुद्धिसे दु:ख-निवारणके उपायका विचार करते हुए धैर्य धारण करता है, वह कष्ट नहीं भोगता है॥ ९॥

बालिशस्तु नरो नित्यं वैक्लव्यं योऽनुवर्तते।

स मज्जत्यवश: शोके भाराक्रान्तेव नौर्जले॥ १०॥

‘जो मूढ़ मानव सदा घबराहटमें ही पड़ा रहता है, वह पानीमें भारसे दबी हुई नौकाके समान शोकमें विवश होकर डूब जाता है॥ १०॥

एषोऽञ्जलिर्मया बद्ध: प्रणयात् त्वां प्रसादये।

पौरुषं श्रय शोकस्य नान्तरं दातुमर्हसि॥ ११॥

‘मैं हाथ जोड़ता हूँ। प्रेमपूर्वक अनुरोध करता हूँ कि आप प्रसन्न हों और पुरुषार्थका आश्रय लें। शोकको अपने ऊपर प्रभाव डालनेका अवसर न दें॥ ११॥

ये शोकमनुवर्तन्ते न तेषां विद्यते सुखम्।

तेजश्च क्षीयते तेषां न त्वं शोचितुमर्हसि॥ १२॥

‘जो शोकका अनुसरण करते हैं, उन्हें सुख नहीं मिलता है और उनका तेज भी क्षीण हो जाता है; अत: आप शोक न करें॥ १२॥

शोकेनाभिप्रपन्नस्य जीविते चापि संशय:।

स शोकं त्यज राजेन्द्र धैर्यमाश्रय केवलम्॥ १३॥

‘राजेन्द्र! शोकसे आक्रान्त हुए मनुष्यके जीवनमें (उसके प्राणोंकी रक्षामें) भी संशय उपस्थित हो जाता है। इसलिये आप शोकको त्याग दें और केवल धैर्यका आश्रय लें॥ १३॥

हितं वयस्यभावेन ब्रूहि नोपदिशामि ते।

वयस्यतां पूजयन्मे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ १४॥

‘मैं मित्रताके नाते हितकी सलाह देता हूँ। आपको उपदेश नहीं दे रहा हूँ। आप मेरी मैत्रीका आदर करते हुए कदापि शोक न करें’॥ १४॥

मधुरं सान्त्वितस्तेन सुग्रीवेण स राघव:।

मुखमश्रुपरिक्लिन्नं वस्त्रान्तेन प्रमार्जयत्॥ १५॥

सुग्रीवने जब मधुर वाणीमें इस प्रकार सान्त्वना दी, तब श्रीरघुनाथजीने आँसुओंसे भीगे हुए अपने मुखको वस्त्रके छोरसे पोंछ लिया॥ १५॥

प्रकृतिस्थस्तु काकुत्स्थ: सुग्रीवचनात् प्रभु:।

सम्परिष्वज्य सुग्रीवमिदं वचनमब्रवीत्॥ १६॥

सुग्रीवके वचनसे शोकका परित्याग करके स्वस्थचित्त हो ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीरामने मित्रवर सुग्रीवको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ १६॥

कर्तव्यं यद् वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च।

अनुरूपं च युक्तं च कृतं सुग्रीव तत् त्वया॥ १७॥

‘सुग्रीव! एक स्नेही और हितैषी मित्रको जो कुछ करना चाहिये, वही तुमने किया है। तुम्हारा कार्य सर्वथा उचित और तुम्हारे योग्य है॥ १७॥

एष च प्रकृतिस्थोऽहमनुनीतस्त्वया सखे।

दुर्लभो हीदृशो बन्धुरस्मिन् काले विशेषत:॥ १८॥

‘सखे! तुम्हारे आश्वासनसे मेरी सारी चिन्ता जाती रही। अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। तुम्हारे-जैसे बन्धुका विशेषत: ऐसे संकटके समय मिलना कठिन होता है॥

किं तु यत्नस्त्वया कार्यो मैथिल्या: परिमार्गणे।

राक्षसस्य च रौद्रस्य रावणस्य दुरात्मन:॥ १९॥

‘परंतु तुम्हें मिथिलेशकुमारी सीता तथा रौद्ररूपधारी दुरात्मा राक्षस रावणका पता लगानेके लिये प्रयत्न करना चाहिये॥ १९॥

मया च यदनुष्ठेयं विस्रब्धेन तदुच्यताम्।

वर्षास्विव च सुक्षेत्रे सर्वं सम्पद्यते तव॥ २०॥

‘साथ ही मुझे भी इस समय तुम्हारे लिये जो कुछ करना आवश्यक हो, उसे बिना किसी सङ्कोचके बताओ। जैसे वर्षाकालमें अच्छे खेतमें बोया हुआ बीज अवश्य फल देता है, उसी प्रकार तुम्हारा सारा मनोरथ सफल होगा॥ २०॥

मया च यदिदं वाक्यमभिमानात् समीरितम्।

तत्त्वया हरिशार्दूल तत्त्वमित्युपधार्यताम्॥ २१॥

‘वानरश्रेष्ठ! मैंने जो अभिमानपूर्वक यह वालीके वध आदि करनेकी बात कही है, इसे तुम ठीक ही समझो॥ २१॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन।

एतत्ते प्रतिजानामि सत्येनैव शपाम्यहम्॥ २२॥

‘मैंने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है और भविष्यमें भी कभी असत्य नहीं बोलूँगा। इस समय जो कुछ कहा है, उसे पूर्ण करनेके लिये प्रतिज्ञा करता हूँ और तुम्हें विश्वास दिलानेके लिये सत्यकी ही शपथ खाता हूँ’॥ २२॥

तत: प्रहृष्ट: सुग्रीवो वानरै: सचिवै: सह।

राघवस्य वच: श्रुत्वा प्रतिज्ञातं विशेषत:॥ २३॥

श्रीरघुनाथजीकी बात, विशेषत: उनकी प्रतिज्ञा सुनकर अपने वानर-मन्त्रियोंसहित सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २३॥

एवमेकान्तसम्पृक्तौ ततस्तौ नरवानरौ।

उभावन्योन्यसदृशं सुखं दु:खमभाषताम्॥ २४॥

इस प्रकार एकान्तमें एक-दूसरेके निकट बैठे हुए वे दोनों नर और वानर (श्रीराम और सुग्रीव) ने परस्पर सुख और दु:खकी बातें कहीं, जो एक-दूसरेके लिये अनुरूप थीं॥ २४॥

महानुभावस्य वचो निशम्य

हरिर्नृपाणामधिपस्य तस्य।

कृतं स मेने हरिवीरमुख्य-

स्तदा च कार्यं हृदयेन विद्वान्॥ २५॥

राजाधिराज महाराज श्रीरघुनाथजीकी बात सुनकर वानर वीरोंके प्रधान विद्वान् सुग्रीवने उस समय मन-ही-मन अपने कार्यको सिद्ध हुआ ही माना॥ २५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तम: सर्ग:॥ ७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥

 

अष्टम: सर्ग:

सुग्रीवका श्रीरामसे अपना दु:ख निवेदन करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयोंमें वैर होनेका कारण पूछना

परितुष्टस्तु सुग्रीवस्तेन वाक्येन हर्षित:।

लक्ष्मणस्याग्रजं शूरमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीकी उस बातसे सुग्रीवको बड़ा संतोष हुआ। वे हर्षसे भरकर लक्ष्मणके बड़े भाई शूरवीर श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—॥ १॥

सर्वथाहमनुग्राह्यो देवतानां न संशय:।

उपपन्नो गुणोपेत: सखा यस्य भवान् मम॥ २॥

‘भगवन्! इसमें संदेह नहीं कि देवताओंकी मेरे ऊपर बड़ी कृपा है—मैं सर्वथा उनके अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि आप-जैसे गुणवान् महापुरुष मेरे सखा हो गये॥

शक्यं खलु भवेद् राम सहायेन त्वयानघ।

सुरराज्यमपि प्राप्तुं स्वराज्यं किमुत प्रभो॥ ३॥

‘प्रभो! निष्पाप श्रीराम! आप-जैसे सहायकके सहयोगसे तो देवताओंका राज्य भी अवश्य ही प्राप्त किया जा सकता है; फिर अपने खोये हुए राज्यको पाना कौन बड़ी बात है॥

सोऽहं सभाज्यो बन्धूनां सुहृदां चैव राघव।

यस्याग्निसाक्षिकं मित्रं लब्धं राघववंशजम्॥ ४॥

‘रघुनन्दन! अब मैं अपने बन्धुओं और सुहृदोंके विशेष सम्मानका पात्र हो गया; क्योंकि आज रघुवंशके राजकुमार आप अग्निको साक्षी बनाकर मुझे मित्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं॥

अहमप्यनुरूपस्ते वयस्यो ज्ञास्यसे शनै:।

न तु वक्तुं समर्थोऽहं त्वयि आत्मगतान् गुणान्॥ ५॥

‘मैं भी आपके योग्य मित्र हूँ। इसका ज्ञान आपको धीरे-धीरे हो जायगा। इस समय आपके सामने मैं अपने गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ५॥

महात्मनां तु भूयिष्ठं त्वद्विधानां कृतात्मनाम्।

निश्चला भवति प्रीतिर्धैर्यमात्मवतां वर॥ ६॥

‘आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आप-जैसे पुण्यात्मा महात्माओंका प्रेम और धैर्य अधिकाधिक बढ़ता और अविचल होता है॥ ६॥

रजतं वा सुवर्णं वा शुभान्याभरणानि च।

अविभक्तानि साधूनामवगच्छन्ति साधव:॥ ७॥

‘अच्छे स्वभाववाले मित्र अपने घरके सोने-चाँदी अथवा उत्तम आभूषणोंको अपने अच्छे मित्रोंके लिये अविभक्त ही मानते हैं—उन मित्रोंका अपने धनपर अपने ही समान अधिकार समझते हैं॥ ७॥

आढ्योवापि दरिद्रो वा दु:खित: सुखितोऽपि वा।

निर्दोषश्च सदोषश्च वयस्य: परमा गति:॥ ८॥

‘अतएव मित्र धनी हो या दरिद्र, सुखी हो या दु:खी अथवा निर्दोष हो या सदोष, वह मित्रके लिये सबसे बड़ा सहायक होता है॥ ८॥

धनत्याग: सुखत्यागो देशत्यागोऽपि वानघ।

वयस्यार्थे प्रवर्तन्ते स्नेहं दृष्ट्वा तथाविधम्॥ ९॥

‘अनघ! साधुपुरुष अपने मित्रका अत्यन्त उत्कृष्ट प्रेम देख आवश्यकता पड़नेपर उसके लिये धन, सुख और देशका भी परित्याग कर देते हैं’॥ ९॥

तत् तथेत्यब्रवीद् राम: सुग्रीवं प्रियवादिनम्।

लक्ष्मणस्याग्रतो लक्ष्म्या वासवस्येव धीमत:॥ १०॥

यह सुनकर लक्ष्मी (दिव्य कान्ति) से उपलक्षित श्रीरामचन्द्रजीने इन्द्रतुल्य तेजस्वी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सामने ही प्रिय वचन बोलनेवाले सुग्रीवसे कहा—‘सखे! तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है’॥ १०॥

ततो रामं स्थितं दृष्ट्वा लक्ष्मणं च महाबलम्।

सुग्रीव: सर्वतश्चक्षुर्वने लोलमपातयत्॥ ११॥

तदनन्तर (दूसरे दिन) महाबली श्रीराम और लक्ष्मणको खड़ा देख सुग्रीवने वनमें चारों ओर अपनी चञ्चल दृष्टि दौड़ायी॥ ११॥

स ददर्श तत: सालमविदूरे हरीश्वर:।

सुपुष्पमीषत्पत्राढ्यं भ्रमरैरुपशोभितम्॥ १२॥

उस समय वानरराजने पास ही एक सालका वृक्ष देखा, जिसमें थोड़ेसे ही सुन्दर पुष्प लगे हुए थे; परंतु उसमें पत्रोंकी बहुलता थी। उस वृक्षपर मँडराते हुए भौंरे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२॥

तस्यैकां पर्णबहुलां शाखां भङ्क्त्वा सुशोभिताम्।

रामस्यास्तीर्य सुग्रीवो निषसाद सराघव:॥ १३॥

उसकी एक डालीको जिसमें अधिक पत्ते थे और जो पुष्पोंसे सुशोभित थी, सुग्रीवने तोड़ डाला और उसे श्रीरामके लिये बिछाकर वे स्वयं भी उनके साथ ही उसपर बैठ गये॥ १३॥

तावासीनौ ततो दृष्ट्वा हनूमानपि लक्ष्मणम्।

शालशाखां समुत्पाट्य विनीतमुपवेशयत्॥ १४॥

उन दोनोंको आसनपर विराजमान देख हनुमान् जी ने भी सालकी एक डाल तोड़ डाली और उसपर विनयशील लक्ष्मणको बैठाया॥ १४॥

सुखोपविष्टं रामं तु प्रसन्नमुदधिं यथा।

सालपुष्पावसंकीर्णे तस्मिन् गिरिवरोत्तमे॥ १५॥

तत: प्रहृष्ट: सुग्रीव: श्लक्ष्णया शुभया गिरा।

उवाच प्रणयाद् रामं हर्षव्याकुलिताक्षरम्॥ १६॥

उस श्रेष्ठ पर्वतपर, जहाँ सब ओर सालके पुष्प बिखरे हुए थे, सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीराम शान्त समुद्रके समान प्रसन्न दिखायी देते थे। उन्हें देखकर अत्यन्त हर्षसे भरे हुए सुग्रीवने श्रीरामसे स्निग्ध एवं सुन्दर वाणीमें वार्तालाप आरम्भ किया। उस समय आनन्दातिरेकसे उनकी वाणी लड़खड़ा जाती थी—अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पाता था॥ १५-१६॥

अहं विनिकृतो भ्रात्रा चराम्येष भयार्दित:।

ऋष्यमूकं गिरिवरं हृतभार्य: सुदु:खित:॥ १७॥

‘प्रभो! मेरे भाईने मुझे घरसे निकालकर मेरी स्त्रीको भी छीन लिया है। मैं उसीके भयसे अत्यन्त पीड़ित एवं दु:खी होकर इस पर्वतश्रेष्ठ ऋष्यमूकपर विचरता रहता हूँ॥ १७॥

सोऽहं त्रस्तो भये मग्नो वने सम्भ्रान्तचेतन:।

वालिना निकृतो भ्रात्रा कृतवैरश्च राघव॥ १८॥

‘मुझे बराबर उसका त्रास बना रहता है। मैं भयमें डूबा रहकर भ्रान्तचित्त हो इस वनमें भटकता फिरता हूँ। रघुनन्दन! मेरे भाई वालीने मुझे घरसे निकालनेके बाद भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है॥ १८॥

वालिनो मे भयार्तस्य सर्वलोकाभयंकर।

ममापि त्वमनाथस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ १९॥

‘प्रभो! आप समस्त लोकोंको अभय देनेवाले हैं। मैं वालीके भयसे दु:खी और अनाथ हूँ, अत: आपको मुझपर भी कृपा करनी चाहिये’॥ १९॥

एवमुक्तस्तु तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मवत्सल:।

प्रत्युवाच स काकुत्स्थ: सुग्रीवं प्रहसन्निव॥ २०॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर तेजस्वी, धर्मज्ञ एवं धर्मवत्सल भगवान् श्रीरामने उन्हें हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २०॥

उपकारफलं मित्रमपकारोऽरिलक्षणम्।

अद्यैव तं वधिष्यामि तव भार्यापहारिणम्॥ २१॥

‘सखे! उपकार ही मित्रताका फल है और अपकार शत्रुताका लक्षण है; अत: मैं आज ही तुम्हारी स्त्रीका अपहरण करनेवाले उस वालीका वध करूँगा॥ २१॥

इमे हि मे महाभाग पत्रिणस्तिग्मतेजस:।

कार्तिकेयवनोद्भूता: शरा हेमविभूषिता:॥ २२॥

‘महाभाग! मेरे इन बाणोंका तेज प्रचण्ड है। सुवर्ण-भूषित ये शर कार्तिकेयकी उत्पत्तिके स्थानभूत शरोंके वनमें उत्पन्न हुए हैं। (इसलिये अभेद्य हैं)॥ २२॥

कङ्कपत्रपरिच्छन्ना महेन्द्राशनिसंनिभा:।

सुपर्वाण: सुतीक्ष्णाग्रा: सरोषा भुजगा इव॥ २३॥

‘ये कंकपक्षीके परोंसे युक्त हैं और इन्द्रके वज्रकी भाँति अमोघ हैं। इनकी गाँठें सुन्दर और अग्रभाग तीखे हैं। ये रोषमें भरे भुजङ्गोंकी भाँति भयंकर हैं॥ २३॥

वालिसंज्ञममित्रं ते भ्रातरं कृतकिल्बिषम्।

शरैर्विनिहतं पश्य विकीर्णमिव पर्वतम्॥ २४॥

‘इन बाणोंसे तुम अपने वाली नामक शत्रुको, जो भाई होकर भी तुम्हारी बुराई कर रहा है, विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति मरकर पृथ्वीपर पड़ा देखोगे’॥ २४॥

राघवस्य वच: श्रुत्वा सुग्रीवो वाहिनीपति:।

प्रहर्षमतुलं लेभे साधु साध्विति चाब्रवीत्॥ २५॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वानरसेनापति सुग्रीवको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे उन्हें बारंबार साधुवाद देते हुए बोले—॥ २५॥

राम शोकाभिभूतोऽहं शोकार्तानां भवान् गति:।

वयस्य इति कृत्वा हि त्वय्यहं परिदेवये॥ २६॥

‘श्रीराम! मैं शोकसे पीड़ित हूँ और आप शोकाकुल प्राणियोंकी परमगति हैं। मित्र समझकर मैं आपसे अपना दु:ख निवेदन करता हूँ॥ २६॥

त्वं हि पाणिप्रदानेन वयस्यो मेऽग्निसाक्षिकम्।

कृत: प्राणैर्बहुमत: सत्येन च शपाम्यहम्॥ २७॥

‘मैंने आपके हाथमें हाथ देकर अग्निदेवके सामने आपको अपना मित्र बनाया है। इसलिये आप मुझे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यह बात मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ॥

वयस्य इति कृत्वा च विस्रब्ध: प्रवदाम्यहम्।

दु:खमन्तर्गतं तन्मे मनो हरति नित्यश:॥ २८॥

‘आप मेरे मित्र हैं, इसलिये आपपर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने भीतरका दु:ख, जो सदा मेरे मनको व्याकुल किये रहता है, आपको बता रहा हूँ’॥ २८॥

एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पदूषितलोचन:।

बाष्पदूषितया वाचा नोच्चै: शक्नोति भाषितुम्॥ २९॥

इतनी बात कहते-कहते सुग्रीवके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उनकी वाणी अश्रुगद्गद हो गयी। इसलिये वे उच्च स्वरसे बोलनेमें समर्थ न हो सके॥ २९॥

बाष्पवेगं तु सहसा नदीवेगमिवागतम्।

धारयामास धैर्येण सुग्रीवो रामसंनिधौ॥ ३०॥

तत्पश्चात् सुग्रीवने सहसा बढ़े हुए नदीके वेगके समान उमड़े हुए आँसुओंके वेगको श्रीरामके समीप धैर्यपूवर्क रोका॥ ३०॥

स निगृह्य तु तं बाष्पं प्रमृज्य नयने शुभे।

विनि:श्वस्य च तेजस्वी राघवं पुनरूचिवान्॥ ३१॥

आँसुओंको रोककर अपने दोनों सुन्दर नेत्रोंको पोंछनेके पश्चात् तेजस्वी सुग्रीव पुन: लंबी साँस खींचकर श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ ३१॥

पुराहं वालिना राम राज्यात् स्वादवरोपित:।

परुषाणि च संश्राव्य निर्धूतोऽस्मि बलीयसा॥ ३२॥

‘श्रीराम! पहलेकी बात है, बलिष्ठ वालीने कटुवचन सुनाकर बलपूर्वक मेरा तिरस्कार किया और अपने राज्य (युवराजपद) से नीचे उतार दिया॥ ३२॥

हृता भार्या च मे तेन प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।

सुहृदश्च मदीया ये संयता बन्धनेषु ते॥ ३३॥

‘इतना ही नहीं, मेरी स्त्रीको भी, जो मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है; उसने छीन लिया और जितने मेरे सुहृद् थे, उन सबको कैदमें डाल दिया॥ ३३॥

यत्नवांश्च स दुष्टात्मा मद्विनाशाय राघव।

बहुशस्तप्रयुक्ताश्च वानरा निहता मया॥ ३४॥

‘रघुनन्दन! इसके बाद भी वह दुरात्मा वाली मेरे विनाशके लिये यत्न करता रहता है। उसके भेजे हुए बहुत-से वानरोंका मैं वध कर चुका हूँ॥ ३४॥

शङ्कया त्वेतयाहं च दृष्ट्वा त्वामपि राघव।

नोपसर्पाम्यहं भीतो भये सर्वे हि बिभ्यति॥ ३५॥

‘रघुनाथजी! आपको भी देखकर मेरे मनमें ऐसा ही संदेह हुआ था, इसीलिये डर जानेके कारण मैं पहले आपके पास न आ सका; क्योंकि भयका अवसर आनेपर प्राय: सभी डर जाते हैं॥ ३५॥

केवलं हि सहाया मे हनुमत्प्रमुखास्त्विमे।

अतोऽहं धारयाम्यद्य प्राणान् कृच्छ्रगतोऽपि सन्॥ ३६॥

‘केवल ये हनुमान् आदि वानर ही मेरे सहायक हैं; अतएव महान् संकटमें पड़कर भी मैं अबतक प्राण धारण करता हूँ॥ ३६॥

एते हि कपय: स्निग्धा मां रक्षन्ति समन्तत:।

सह गच्छन्ति गन्तव्ये नित्यं तिष्ठन्ति चास्थिते॥ ३७॥

‘इन लोगोंका मुझपर स्नेह है, अत: ये सभी वानर सब ओरसे सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं। जहाँ जाना होता है वहाँ साथ-साथ जाते हैं और जब कहीं मैं ठहर जाता हूँ वहाँ ये नित्य मेरे साथ रहते हैं॥ ३७॥

संक्षेपस्त्वेष मे राम किमुक्त्वा विस्तरं हि ते।

स मे ज्येष्ठो रिपुर्भ्राता वाली विश्रुतपौरुष:॥ ३८॥

‘रघुनन्दन! यह मैंने संक्षेपसे अपनी हालत बतलायी है। आपके सामने विस्तारपूर्वक कहनेसे क्या लाभ? वाली मेरा ज्येष्ठ भाई है, फिर भी इस समय मेरा शत्रु हो गया है। उसका पराक्रम सर्वत्र विख्यात है॥ ३८॥

तद्विनाशेऽपि मे दु:खं प्रमृष्टं स्यादनन्तरम्।

सुखं मे जीवितं चैव तद्विनाशनिबन्धनम्॥ ३९॥

‘(यद्यपि भाईका नाश भी दु:खका ही कारण है, तथापि) इस समय जो मेरा दु:ख है, वह उसका नाश होनेपर ही मिट सकता है। मेरा सुख और जीवन उसके विनाशपर ही निर्भर है॥ ३९॥

एष मे राम शोकान्त: शोकार्तेन निवेदित:।

दु:खित: सुखितो वापि सख्युर्नित्यं सखा गति:॥ ४०॥

‘श्रीराम! यही मेरे शोकके नाशका उपाय है। मैंने शोकसे पीड़ित होनेके कारण आपसे यह बात निवेदन की है; क्योंकि मित्र दु:खमें हो या सुखमें, वह अपने मित्रकी सदा ही सहायता करता है’॥ ४०॥

श्रुत्वैतच्च वचो राम: सुग्रीवमिदमब्रवीत्।

किं निमित्तमभूद् वैरं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥ ४१॥

यह सुनकर श्रीरामने सुग्रीवसे कहा—‘तुम दोनों भाइयोंमें वैर पड़नेका क्या कारण है, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ॥ ४१॥

सुखं हि कारणं श्रुत्वा वैरस्य तव वानर।

आनन्तर्याद् विधास्यामि सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ ४२॥

‘वानरराज! तुमलोगोंकी शत्रुताका कारण सुनकर तुम दोनोंकी प्रबलता और निर्बलताका निश्चय करके फिर तत्काल ही तुम्हें सुखी बनानेवाला उपाय करूँगा॥ ४२॥

बलवान् हि ममामर्ष: श्रुत्वा त्वामवमानितम्।

वर्धते हृदयोत्कम्पी प्रावृड्वेग इवाम्भस:॥ ४३॥

‘जैसे वर्षाकालमें नदी आदिका वेग बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे अपमानित होनेकी बात सुनकर मेरा प्रबल रोष बढ़ता जा रहा है और मेरे हृदयको कम्पित किये देता है॥ ४३॥

हृष्ट: कथय विस्रब्धो यावदारोप्यते धनु:।

सृष्टश्च हि मया बाणो निरस्तश्च रिपुस्तव॥ ४४॥

‘मेरे धनुष चढ़ानेके पहले ही तुम अपनी सब बातें प्रसन्नतापूर्वक कह डालो; क्योंकि ज्यों ही मैंने बाण छोड़ा, तुम्हारा शत्रु तत्काल कालके गालमें चला जायगा’॥ ४४॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीव: काकुत्स्थेन महात्मना।

प्रहर्षमतुलं लेभे चतुर्भि: सह वानरै:॥ ४५॥

महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवको अपने चारों वानरोंके साथ अपार हर्ष हुआ॥ ४५॥

तत: प्रहृष्टवदन: सुग्रीवो लक्ष्मणाग्रजे।

वैरस्य कारणं तत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥ ४६॥

तदनन्तर सुग्रीवके मुखपर प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने श्रीरामको वालीके साथ वैर होनेका यथार्थ कारण बताना आरम्भ किया॥ ४६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टम: सर्ग:॥ ८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८॥

 

नवम: सर्ग:

सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको वालीके साथ अपने वैर होनेका कारण बताना

वाली नाम मम भ्राता ज्येष्ठ: शत्रुनिषूदन:।

पितुर्बहुमतो नित्यं मम चापि तथा पुरा॥ १॥

‘रघुनन्दन! वाली मेरे बड़े भाई हैं। उनमें शत्रुओंका संहार करनेकी शक्ति है। मेरे पिता ऋक्षरजा उनको बहुत मानते थे। वैरसे पहले मेरे मनमें भी उनके प्रति आदरका भाव था॥ १॥

पितर्युपरते तस्मिन् ज्येष्ठोऽयमिति मन्त्रिभि:।

कपीनामीश्वरो राज्ये कृत: परमसम्मत:॥ २॥

‘पिताकी मृत्युके पश्चात् मन्त्रियोंने उन्हें ज्येष्ठ समझकर वानरोंका राजा बनाया। वे सबको बड़े प्रिय थे, इसीलिये किष्किन्धाके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये थे॥

राज्यं प्रशासतस्तस्य पितृपैतामहं महत्।

अहं सर्वेषु कालेषु प्रणत: प्रेष्यवत् स्थित:॥ ३॥

‘वे पिता-पितामहोंके विशाल राज्यका शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभावसे दासकी भाँति उनकी सेवामें रहने लगा॥ ३॥

मायावी नाम तेजस्वी पूर्वजो दुन्दुभे: सुत:।

तेन तस्य महद्वैरं वालिन: स्त्रीकृतं पुरा॥ ४॥

‘उन दिनों मायावी नामक एक तेजस्वी दानव रहता था, जो मय दानवका पुत्र और दुन्दुभिका बड़ा भाई था। उसके साथ वालीका स्त्रीके कारण बहुत बड़ा वैर हो गया था॥ ४॥

स तु सुप्ते जने रात्रौ किष्किन्धाद्वारमागत:।

नर्दति स्म सुसंरब्धो वालिनं चाह्वयद् रणे॥ ५॥

‘एक दिन आधी रातके समय जब सब लोग सो गये, मायावी किष्किन्धापुरीके दरवाजेपर आया और क्रोधसे भरकर गर्जने तथा वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा॥ ५॥

प्रसुप्तस्तु मम भ्राता नर्दतो भैरवस्वनम्।

श्रुत्वा न ममृषे वाली निष्पपात जवात् तदा॥ ६॥

‘उस समय मेरे भाई सो रहे थे। उसका भैरवनाद सुनकर उनकी नींद खुल गयी। उनसे उस राक्षसकी ललकार सही नहीं गयी; अत: वे तत्काल वेगपूर्वक घरसे निकले॥

स तु वै नि:सृत: क्रोधात् तं हन्तुमसुरोत्तमम्।

वार्यमाणस्तत: स्त्रीभिर्मया च प्रणतात्मना॥ ७॥

‘जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुरको मारनेके लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्त:पुरकी स्त्रियोंने पैरों पड़कर उन्हें जानेसे रोका॥ ७॥

स तु निर्धूय सर्वान् नो निर्जगाम महाबल:।

ततोऽहमपि सौहार्दान्नि:सृतो वालिना सह॥ ८॥

‘परंतु महाबली वाली हम सबको हटाकर निकल पड़े, तब मैं भी स्नेहवश वालीके साथ ही बाहर निकला॥

स तु मे भ्रातरं दृष्ट्वा मां च दूरादवस्थितम्।

असुरो जातसंत्रास: प्रदुद्राव तदा भृशम्॥ ९॥

‘उस असुरने मेरे भाईको देखा तथा कुछ दूरपर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भयसे थर्रा उठा और बड़े जोरसे भागा॥ ९॥

तस्मिन् द्रवति संत्रस्ते ह्यावां द्रुततरं गतौ।

प्रकाशोऽपि कृतो मार्गश्चन्द्रेणोद्गच्छता तदा॥ १०॥

‘उसके भयभीत होकर भागनेपर हम दोनों भाइयोंने बड़ी तेजीके साथ उसका पीछा किया। उस समय उदित हुए चन्द्रमाने हमारे मार्गको भी प्रकाशित कर दिया था॥ १०॥

स तृणैरावृतं दुर्गं धरण्या विवरं महत्।

प्रविवेशासुरो वेगादावामासाद्य विष्ठितौ॥ ११॥

‘आगे जानेपर धरतीमें एक बहुत बड़ा बिल था, जो घास-फूससे ढका हुआ था। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था। वह असुर बड़े वेगसे उस बिलमें जा घुसा। वहाँ पहुँचकर हम दोनों ठहर गये॥ ११॥

तं प्रविष्टं रिपुं दृष्ट्वा बिलं रोषवशं गत:।

मामुवाच ततो वाली वचनं क्षुभितेन्द्रिय:॥ १२॥

‘शत्रुको बिलके अंदर घुसा देख वालीके क्रोधकी सीमा न रही। उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं और वे मुझसे इस प्रकार बोले—॥ १२॥

इह तिष्ठाद्य सुग्रीव बिलद्वारि समाहित:।

यावदत्र प्रविश्याहं निहन्मि समरे रिपुम्॥ १३॥

‘सुग्रीव! जबतक मैं इस बिलके भीतर प्रवेश करके युद्धमें शत्रुको मारता हूँ, तबतक तुम आज इसके दरवाजेपर सावधानीसे खड़े रहो’॥ १३॥

मया त्वेतद् वच: श्रुत्वा याचित: स परंतप:।

शापयित्वा च मां पद‍्भ्यां प्रविवेश बिलं तत:॥ १४॥

‘यह बात सुनकर मैंने शत्रुओंको संताप देनेवाले वालीसे स्वयं भी साथ चलनेके लिये प्रार्थना की, किंतु वे अपने चरणोंकी सौगन्ध दिलाकर अकेले ही बिलमें घुसे॥ १४॥

तस्य प्रविष्टस्य बिलं साग्र: संवत्सरो गत:।

स्थितस्य च बिलद्वारि स कालो व्यत्यवर्तत॥ १५॥

‘बिलके भीतर गये हुए उन्हें एक सालसे अधिक समय बीत गया और बिलके दरवाजेपर खड़े-खड़े मेरा भी उतना ही समय निकल गया॥ १५॥

अहं तु नष्टं तं ज्ञात्वा स्नेहादागतसम्भ्रम:।

भ्रातरं न प्रपश्यामि पापशङ्कि च मे मन:॥ १६॥

‘जब इतने दिनोंतक मुझे भाईका दर्शन नहीं हुआ, तब मैंने समझा कि मेरे भाई इस गुफामें ही कहीं खो गये। उस समय भ्रातृस्नेहके कारण मेरा हृदय व्याकुल हो उठा। मेरे मनमें उनके मारे जानेकी शङ्का होने लगी॥

अथ दीर्घस्य कालस्य बिलात् तस्माद् विनि:सृतम्।

सफेनं रुधिरं दृष्ट्वा ततोऽहं भृशदु:खित:॥ १७॥

‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उस बिलसे सहसा फेनसहित खूनकी धारा निकली। उसे देखकर मैं बहुत दु:खी हो गया॥ १७॥

नर्दतामसुराणां च ध्वनिर्मे श्रोत्रमागत:।

न रतस्य च संग्रामे क्रोशतोऽपि स्वनो गुरो:॥ १८॥

‘इतनेहीमें गरजते हुए असुरोंकी आवाज भी मेरे कानोंमें पड़ी। युद्धमें लगे हुए मेरे बड़े भाई भी गरजना कर रहे थे, किंतु उनकी आवाज मैं नहीं सुन सका॥

अहं त्ववगतो बुद्ध्या चिह्नैस्तैर्भ्रातरं हतम्।

पिधाय च बिलद्वारं शिलया गिरिमात्रया॥ १९॥

शोकार्तश्चोदकं कृत्वा किष्किन्धामागत: सखे।

गूहमानस्य मे तत् त्वं यत्नतो मन्त्रिभि: श्रुतम्॥ २०॥

‘इन सब चिह्नोंको देखकर बुद्धिद्वारा विचार करनेपर मैं इस निश्चयपर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये। फिर तो उस गुफाके दरवाजेपर मैंने पर्वतके समान एक पत्थरकी चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाईको जलाञ्जलि दे शोकसे व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया। सखे! यद्यपि मैं इस यथार्थ बातको छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियोंने यत्न करके सुन लिया॥ १९-२०॥

ततोऽहं तै: समागम्य समेतैरभिषेचित:।

राज्यं प्रशासतस्तस्य न्यायतो मम राघव॥ २१॥

आजगाम रिपुं हत्वा दानवं स तु वानर:।

अभिषिक्तं तु मां दृष्ट्वा क्रोधात् संरक्तलोचन:॥ २२॥

‘तब उन सबने मिलकर मुझे राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। रघुनन्दन! मैं न्यायपूर्वक राज्यका संचालन करने लगा। इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानवको मारकर वानरराज वाली घर लौटे। लौटनेपर मुझे राज्यपर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं॥ २१-२२॥

मदीयान् मन्त्रिणो बद‍्ध्वा परुषं वाक्यमब्रवीत्।

निग्रहे च समर्थस्य तं पापं प्रति राघव॥ २३॥

न प्रावर्तत मे बुद्धिर्भ्रातृगौरवयन्त्रिता।

‘मेरे मन्त्रियोंको उन्होंने कैद कर लिया और उन्हें कठोर बातें सुनायीं। रघुवीर! यद्यपि मैं स्वयं भी उस पापीको कैद करनेमें समर्थ था तो भी भाईके प्रति गुरुभाव होनेके कारण मेरी बुद्धिमें ऐसा विचार नहीं हुआ॥ २३/

हत्वा शत्रुं स मे भ्राता प्रविवेश पुरं तदा॥ २४॥

मानयंस्तं महात्मानं यथावच्चाभिवादयम्।

उक्ताश्च नाशिषस्तेन प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ २५॥

‘इस प्रकार शत्रुका वध करके मेरे भाईने उस समय नगरमें प्रवेश किया। उन महात्माका सम्मान करते हुए मैंने यथोचितरूपसे उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया तो भी उन्होंने प्रसन्नचित्तसे मुझे आशीर्वाद नहीं दिया॥ २४-२५॥

नत्वा पादावहं तस्य मुकुटेनास्पृशं प्रभो।

अपि वाली मम क्रोधान्न प्रसादं चकार स:॥ २६॥

‘प्रभो! मैंने भाईके सामने झुककर अपने मस्तकके मुकुटसे उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया तो भी क्रोधके कारण वाली मुझपर प्रसन्न नहीं हुए’॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे नवम: सर्ग:॥ ९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९॥

 

दशम: सर्ग:

भाईके साथ वैरका कारण बतानेके प्रसङ्गमें सुग्रीवका वालीको मनाने और वालीद्वारा अपने निष्कासित होनेका वृत्तान्त सुनाना

तत: क्रोधसमाविष्टं संरब्धं तमुपागतम्।

अहं प्रसादयांचक्रे भ्रातरं हितकाम्यया॥ १॥

(सुग्रीव कहते हैं—) ‘तदनन्तर क्रोधसे आविष्ट तथा विक्षुब्ध होकर आये हुए अपने बड़े भाईको उनके हितकी कामनासे मैं पुन: प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा॥ १॥

दिष्ट्यासि कुशली प्राप्तो निहतश्च त्वया रिपु:।

अनाथस्य हि मे नाथस्त्वमेकोऽनाथनन्दन॥ २॥

‘मैंने कहा—‘अनाथनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि आप सकुशल लौट आये और वह शत्रु आपके हाथसे मारा गया। मैं आपके बिना अनाथ हो रहा था। अब एकमात्र आप ही मेरे नाथ हैं॥ २॥

इदं बहुशलाकं ते पूर्णचन्द्रमिवोदितम्।

छत्रं सवालव्यजनं प्रतीच्छस्व मया धृतम्॥ ३॥

‘‘यह बहुत-सी तीलियोंसे युक्त तथा उदित हुए पूर्ण चन्द्रमाके समान श्वेत छत्र मैं आपके मस्तकपर लगाता और चँवर डुलाता हूँ। आप इन्हें स्वीकार करें॥

आर्तस्तत्र बिलद्वारि स्थित: संवत्सरं नृप।

दृष्ट्वा च शोणितं द्वारि बिलाच्चापि समुत्थितम्॥ ४॥

शोकसंविग्नहृदयो भृशं व्याकुलितेन्द्रिय:।

‘‘वानरराज! मैं बहुत दु:खी होकर एक वर्षतक उस बिलके दरवाजेपर खड़ा रहा। उसके बाद बिलके भीतरसे खूनकी धारा निकली। द्वारपर वह रक्त देखकर मेरा हृदय शोकसे उद्विग्न हो उठा और मेरी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयीं॥ ४/

अपिधाय बिलद्वारं शैलशृङ्गेण तत् तदा॥ ५॥

तस्माद् देशादपाक्रम्य किष्किन्धां प्राविशं पुन:।

‘‘तब उस बिलके द्वारको एक पर्वत-शिखरसे ढककर मैं उस स्थानसे हट गया और पुन: किष्किन्धापुरीमें चला आया॥ ५/

विषादात्त्विह मां दृष्ट्वा पौरैर्मन्त्रिभिरेव च॥ ६॥

अभिषिक्तो न कामेन तन्मे क्षन्तुं त्वमर्हसि।

‘‘यहाँ विषादपूर्वक मुझे अकेला लौटा देख पुरवासियों और मन्त्रियोंने ही इस राज्यपर मेरा अभिषेक कर दिया। मैंने स्वेच्छासे इस राज्यको नहीं ग्रहण किया है। अत: अज्ञानवश होनेवाले मेरे इस अपराधको आप क्षमा करें॥ ६/

त्वमेव राजा मानार्ह: सदा चाहं यथा पुरा॥ ७॥

राजभावे नियोगोऽयं मम त्वद्विरहात् कृत:।

‘‘आप ही यहाँके सम्माननीय राजा हैं और मैं सदा आपका पूर्ववत् सेवक हूँ। आपके वियोगसे ही राजाके पदपर मेरी यह नियुक्ति की गयी॥ ७/

सामात्यपौरनगरं स्थितं निहतकण्टकम्॥ ८॥

न्यासभूतमिदं राज्यं तव निर्यातयाम्यहम्।

‘‘मन्त्रियों, पुरवासियों तथा नगरसहित आपका यह सारा अकंटक राज्य मेरे पास धरोहरके रूपमें रखा था। अब इसे मैं आपकी सेवामें लौटा रहा हूँ॥ ८/

मा च रोषं कृथा: सौम्य मम शत्रुनिषूदन॥ ९॥

याचे त्वां शिरसा राजन् मया बद्धोऽयमञ्जलि:।

‘‘सौम्य! शत्रुसूदन! आप मुझपर क्रोध न करें। ‘राजन्! मैं इसके लिये मस्तक झुकाकर प्रार्थना करता हूँ और हाथ जोड़ता हूँ॥ ९/

बलादस्मिन् समागम्य मन्त्रिभि: पुरवासिभि:॥ १०॥

राजभावे नियुक्तोऽहं शून्यदेशजिगीषया।

‘‘मन्त्रियों तथा पुरवासियोंने मिलकर जबर्दस्ती मुझे इस राज्यपर बिठाया है। वह भी इसलिये कि राजासे रहित राज्य देखकर कोई शत्रु इसे जीतनेकी इच्छासे आक्रमण न कर बैठे’’॥ १०/

स्निग्धमेवं ब्रुवाणं मां स विनिर्भर्त्स्य वानर:॥ ११॥

धिक्त्वामिति च मामुक्त्वा बहु तत्तदुवाच ह।

‘मैंने ये सारी बातें बड़े प्रेमसे कही थीं, किंतु उस वानरने मुझे डाँटकर कहा—‘तुझे धिक्कार है’। यों कहकर उसने मुझे और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनायीं॥ ११/

प्रकृतीश्च समानीय मन्त्रिणश्चैव सम्मतान्॥ १२॥

मामाह सुहृदां मध्ये वाक्यं परमगर्हितम्।

‘तत्पश्चात् उसने प्रजाजनों और सम्मान्य मन्त्रियोंको बुलाया तथा सुहृदोंके बीचमें मेरे प्रति अत्यन्त निन्दित वचन कहा॥ १२/

विदितं वो मया रात्रौ मायावी स महासुर:॥ १३॥

मां समाह्वयत क्रुद्धो युद्धाकांक्षी तदा पुरा।

‘वह बोला—‘आपलोगोंको मालूम होगा कि एक दिन रातमें मेरे साथ युद्ध करनेकी इच्छासे मायावी नामक महान् असुर यहाँ आया था। उसने क्रोधमें भरकर पहले मुझे युद्धके लिये ललकारा॥ १३/

तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा नि:सृतोऽहं नृपालयात्॥ १४॥

अनुयातश्च मां तूर्णमयं भ्राता सुदारुण:।

‘‘उसकी वह ललकार सुनकर मैं राजभवनसे निकल पड़ा। उस समय यह क्रूर स्वभाववाला मेरा भाई भी तुरंत ही मेरे पीछे-पीछे आया॥ १४/

स तु दृष्ट्वैव मां रात्रौ सद्वितीयं महाबल:॥ १५॥

प्राद्रवद् भयसंत्रस्तो वीक्ष्यावां समुपागतौ।

अभिद्रुतस्तु वेगेन विवेश स महाबिलम्॥ १६॥

‘‘यद्यपि वह असुर बड़ा बलवान् था तथापि मुझे एक दूसरे सहायकके साथ देखते ही भयभीत हो उस रातमें भाग चला। हम दोनों भाइयोंको आते देख वह बड़े वेगसे दौड़ा और एक विशाल गुफामें घुस गया॥

तं प्रविष्टं विदित्वा तु सुघोरं सुमहद्बिलम्।

अयमुक्तोऽथ मे भ्राता मया तु क्रूरदर्शन:॥ १७॥

‘‘उस अत्यन्त भयंकर विशाल गुफामें उस असुरको घुसा हुआ जानकर मैंने अपने इस क्रूरदर्शी भाईसे कहा—॥ १७॥

अहत्वा नास्ति मे शक्ति: प्रतिगन्तुमित: पुरीम्।

बिलद्वारि प्रतीक्ष त्वं यावदेनं निहन्म्यहम्॥ १८॥

‘‘सुग्रीव! इस शत्रुको मारे बिना मैं यहाँसे किष्किन्धापुरीको लौट चलनेमें असमर्थ हूँ; अत: जबतक मैं इस असुरको मारकर लौटता हूँ, तबतक तुम इस गुफाके दरवाजेपर रहकर मेरी प्रतीक्षा करो’॥ १८॥

स्थितोऽयमिति मत्वाहं प्रविष्टस्तु दुरासदम्।

तं मे मार्गयतस्तत्र गत: संवत्सरस्तदा॥ १९॥

‘‘ऐसा कहकर और ‘यह तो यहाँ खड़ा है ही’ ऐसा विश्वास करके मैं उस अत्यन्त दुर्गम गुफाके भीतर प्रविष्ट हुआ। भीतर जाकर मैं उस दानवकी खोज करने लगा और इसीमें मेरा वहाँ एक वर्षका समय व्यतीत हो गया॥ १९॥

स तु दृष्टो मया शत्रुरनिर्वेदाद् भयावह:।

निहतश्च मया सद्य: स सर्वै: सह बन्धुभि:॥ २०॥

‘‘इसके बाद मैंने उस भयंकर शत्रुको देखा। इतने दिनोंतक उसके न मिलनेसे मेरे मनमें कोई क्लेश या उदासीनता नहीं हुई थी। मैंने उसे उसके समस्त बन्धु-बान्धवोंसहित तत्काल कालके गालमें डाल दिया॥ २०॥

तस्यास्यात्तु प्रवृत्तेन रुधिरौघेण तद्बिलम्।

पूर्णमासीद् दुराक्रामं स्तनतस्तस्य भूतले॥ २१॥

‘‘उसके मुखसे और छातीसे भी भूतलपर रक्तका ऐसा प्रवाह जारी हुआ, जिससे वह सारी दुर्गम गुफा भर गयी॥ २१॥

सूदयित्वा तु तं शत्रुं विक्रान्तं तमहं सुखम्।

निष्क्रामं नैव पश्यामि बिलस्य पिहितं मुखम्॥ २२॥

‘‘इस तरह उस पराक्रमी शत्रुका सुखपूर्वक वध करके जब मैं लौटा, तब मुझे निकलनेका कोई मार्ग ही नहीं दिखायी देता था; क्योंकि बिलका दरवाजा बंद कर दिया गया था॥ २२॥

विक्रोशमानस्य तु मे सुग्रीवेति पुन: पुन:।

यत: प्रतिवचो नास्ति ततोऽहं भृशदु:खित:॥ २३॥

‘‘मैंने ‘सुग्रीव! सुग्रीव! कहकर बारंबार पुकारा, किंतु कोई उत्तर नहीं मिला। इससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ॥ २३॥

पादप्रहारैस्तु मया बहुभि: परिपातितम्।

ततोऽहं तेन निष्क्रम्य पथा पुरमुपागत:॥ २४॥

‘‘मैंने बारंबार लात मारकर किसी तरह उस पत्थरको पीछेकी ओर ढकेला। इसके बाद गुफाद्वारसे निकलकर यहाँकी राह पकड़े मैं इस नगरमें लौटा हूँ॥ २४॥

तत्रानेनास्मि संरुद्धो राज्यं मृगयताऽऽत्मन:।

सुग्रीवेण नृशंसेन विस्मृत्य भ्रातृसौहृदम्॥ २५॥

‘‘यह सुग्रीव ऐसा क्रूर और निर्दयी है कि इसने भ्रातृ-प्रेमको भुला दिया और सारा राज्य अपने हाथमें कर लेनेके लिये मुझे उस गुफाके अंदर बंद कर दिया था’॥

एवमुक्त्वा तु मां तत्र वस्त्रेणैकेन वानर:।

तदा निर्वासयामास वाली विगतसाध्वस:॥ २६॥

‘ऐसा कहकर वानरराज वालीने निर्भयतापूर्वक मुझे घरसे निकाल दिया। उस समय मेरे शरीरपर एक ही वस्त्र रह गया था॥ २६॥

तेनाहमपविद्धश्च हृतदारश्च राघव।

तद्भयाच्च महीं सर्वां क्रान्तवान् सवनार्णवाम्॥ २७॥

ऋष्यमूकं गिरिवरं भार्याहरणदु:खित:।

प्रविष्टोऽस्मि दुराधर्षं वालिन: कारणान्तरे॥ २८॥

‘रघुनन्दन! उसने मुझे घरसे तो निकाल ही दिया, मेरी स्त्रीको भी छीन लिया। उसके भयसे मैं वनों और समुद्रोंसहित सारी पृथ्वीपर मारा-मारा फिरता रहा। अन्ततोगत्वा मैं भार्याहरणके दु:खसे दु:खी हो इस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूकपर चला आया; क्योंकि एक विशेष कारणवश वालीके लिये इस स्थानपर आक्रमण करना बहुत कठिन है॥ २७-२८॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं वैरानुकथनं महत्।

अनागसा मया प्राप्तं व्यसनं पश्य राघव॥ २९॥

‘रघुनाथजी! यही वालीके साथ मेरे वैर पड़नेकी विस्तृत कथा है। यह सब मैंने आपको सुना दी। देखिये, बिना अपराधके ही मुझे यह सब संकट भोगना पड़ता है॥ २९॥

वालिनश्च भयात् तस्य सर्वलोकभयापह।

कर्तुमर्हसि मे वीर प्रसादं तस्य निग्रहात्॥ ३०॥

‘वीरवर! आप सम्पूर्ण जगत्का भय दूर करनेवाले हैं। मुझपर कृपा कीजिये और वालीका दमन करके मुझे उसके भयसे बचाइये’॥ ३०॥

एवमुक्त: स तेजस्वी धर्मज्ञो धर्मसंहितम्।

वचनं वक्तुमारेभे सुग्रीवं प्रहसन्निव॥ ३१॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर धर्मके ज्ञाता परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हँसते हुए-से यह धर्मयुक्त वचन कहना आरम्भ किया—॥ ३१॥

अमोघा: सूर्यसंकाशा निशिता मे शरा इमे।

तस्मिन् वालिनि दुर्वृत्ते पतिष्यन्ति रुषान्विता:॥ ३२॥

‘मित्र! ये मेरे सूर्यके समान तेजस्वी तीखे बाण अमोघ हैं, जो दुराचारी वालीपर रोषपूर्वक पड़ेंगे॥ ३२॥

यावत् तं नहि पश्येयं तव भार्यापहारिणम्।

तावत् स जीवेत् पापात्मा वाली चारित्रदूषक:॥ ३३॥

‘जबतक तुम्हारी भार्याका अपहरण करनेवाले उस वानरको मैं अपने सामने नहीं देखता हूँ तबतक सदाचारको कलंकित करनेवाला वह पापात्मा वाली जीवन धारण कर ले॥ ३३॥

आत्मानुमानात् पश्यामि मग्नस्त्वं शोकसागरे।

त्वामहं तारयिष्यामि बाढं प्राप्स्यसि पुष्कलम्॥ ३४॥

‘मैं अपने ही अनुमानसे समझता हूँ कि तुम शोकके समुद्रमें डूबे हुए हो। मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा विशाल राज्यको भी अवश्य प्राप्त कर लोगे’॥ ३४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हर्षपौरुषवर्धनम्।

सुग्रीव: परमप्रीत: सुमहद्वाक्यमब्रवीत्॥ ३५॥

श्रीरामका यह वचन हर्ष और पुरुषार्थको बढ़ानेवाला था। उसे सुनकर सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर वे बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कहने लगे॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे दशम: सर्ग:॥ १०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥

 

एकादश: सर्ग:

सुग्रीवके द्वारा वालीके पराक्रमका वर्णन— वालीका दुन्दुभि दैत्यको मारकर उसकी लाशको मतङ्गवनमें फेंकना, मतङ्गमुनिका वालीको शाप देना, श्रीरामका दुन्दुभिके अस्थिसमूहको दूर फेंकना और सुग्रीवका उनसे साल-भेदनके लिये आग्रह करना

रामस्य वचनं श्रुत्वा हर्षपौरुषवर्धनम्।

सुग्रीव: पूजयांचक्रे राघवं प्रशशंस च॥ १॥

श्रीरामचन्द्रजीका वचन हर्ष और पुरुषार्थको बढ़ानेवाला था, उसे सुनकर सुग्रीवने उसके प्रति अपना आदर प्रकट किया और श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार प्रशंसा की—॥ १॥

असंशयं प्रज्वलितैस्तीक्ष्णैर्मर्मातिगै: शरै:।

त्वं दहे: कुपितो लोकान् युगान्त इव भास्कर:॥ २॥

‘प्रभो! आपके बाण प्रज्वलित, तीक्ष्ण एवं मर्मभेदी हैं। यदि आप कुपित हो जायँ तो इनके द्वारा प्रलयकालके सूर्यकी भाँति समस्त लोकोंको भस्म कर सकते हैं। इसमें संशयकी बात नहीं है॥ २॥

वालिन: पौरुषं यत्तद् यच्च वीर्यं धृतिश्च या।

तन्ममैकमना: श्रुत्वा विधत्स्व यदनन्तरम्॥ ३॥

‘परंतु वालीका जैसा पुरुषार्थ है, जो बल है और जैसा धैर्य है, वह सब एकचित्त होकर सुन लीजिये। उसके बाद जैसा उचित हो, कीजियेगा॥ ३॥

समुद्रात् पश्चिमात् पूर्वं दक्षिणादपि चोत्तरम्।

क्रामत्यनुदिते सूर्ये वाली व्यपगतक्लम:॥ ४॥

‘वाली सूर्योदयके पहले ही पश्चिम समुद्रसे पूर्व समुद्रतक और दक्षिण सागरसे उत्तरतक घूम आता है; फिर भी वह थकता नहीं है॥ ४॥

अग्राण्यारुह्य शैलानां शिखराणि महान्त्यपि।

ऊर्ध्वमुत्पात्य तरसा प्रतिगृह्णाति वीर्यवान्॥ ५॥

‘पराक्रमी वाली पर्वतोंकी चोटियोंपर चढ़कर बड़े-बड़े शिखरोंको बलपूर्वक उठा लेता और ऊपरको उछालकर फिर उन्हें हाथोंसे थाम लेता है॥ ५॥

बहव: सारवन्तश्च वनेषु विविधा द्रुमा:।

वालिना तरसा भग्ना बलं प्रथयताऽऽत्मन:॥ ६॥

‘वनोंमें नाना प्रकारके जो बहुत-से सुदृढ़ वृक्ष थे, उन्हें अपने बलको प्रकट करते हुए वालीने वेगपूर्वक तोड़ डाला है॥ ६॥

महिषो दुन्दुभिर्नाम कैलासशिखरप्रभ:।

बलं नागसहस्रस्य धारयामास वीर्यवान्॥ ७॥

‘पहलेकी बात है यहाँ एक दुन्दुभि नामका असुर रहता था, जो भैंसेके रूपमें दिखायी देता था। वह ऊँचाईमें कैलास पर्वतके समान जान पड़ता था। पराक्रमी दुन्दुभि अपने शरीरमें एक हजार हाथियोंका बल रखता था॥

स वीर्योत्सेकदुष्टात्मा वरदानेन मोहित:।

जगाम स महाकाय: समुद्रं सरितां पतिम्॥ ८॥

‘बलके घमंडमें भरा हुआ वह विशालकाय दुष्टात्मा दानव अपनेको मिले हुए वरदानसे मोहित हो सरिताओंके स्वामी समुद्रके पास गया॥ ८॥

ऊर्मिमन्तमतिक्रम्य सागरं रत्नसंचयम्।

मम युद्धं प्रयच्छेति तमुवाच महार्णवम्॥ ९॥

‘जिसमें उत्ताल तरङ्गें उठ रही थीं तथा जो रत्नोंकी निधि हैं, उस महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको लाँघकर—उसे कुछ भी न समझकर दुन्दुभिने उसके अधिष्ठाता देवतासे कहा—‘मुझे अपने साथ युद्धका अवसर दो’॥ ९॥

तत: समुद्रो धर्मात्मा समुत्थाय महाबल:।

अब्रवीद् वचनं राजन्नसुरं कालचोदितम्॥ १०॥

‘राजन्! उस समय महान् बलशाली धर्मात्मा समुद्र उस कालप्रेरित असुरसे इस प्रकार बोला—॥ १०॥

समर्थो नास्मि ते दातुं युद्धं युद्धविशारद।

श्रूयतां त्वभिधास्यामि यस्ते युद्धं प्रदास्यति॥ ११॥

‘‘युद्धविशारद वीर! मैं तुम्हें युद्धका अवसर देने— तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें असमर्थ हूँ। जो तुम्हें युद्ध प्रदान करेगा, उसका नाम बतलाता हूँ, सुनो॥ ११॥

शैलराजो महारण्ये तपस्विशरणं परम्।

शंकरश्वशुरो नाम्ना हिमवानिति विश्रुत:॥ १२॥

महाप्रस्रवणोपेतो बहुकन्दरनिर्झर:।

स समर्थस्तव प्रीतिमतुलां कर्तुमर्हति॥ १३॥

‘विशाल वनमें जो पर्वतोंका राजा और भगवान् शंकरका श्वशुर है, तपस्वी जनोंका सबसे बड़ा आश्रय और संसारमें हिमवान् नामसे विख्यात है, जहाँसे जलके बड़े-बड़े स्रोत प्रकट हुए हैं। तथा जहाँ बहुत-सी कन्दराएँ और झरने हैं, वह गिरिराज हिमालय ही तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें समर्थ है। वह तुम्हें अनुपम प्रीति प्रदान कर सकता है॥ १२-१३॥

तं भीतमिति विज्ञाय समुद्रमसुरोत्तम:।

हिमवद्वनमागम्य शरश्चापादिव च्युत:॥ १४॥

ततस्तस्य गिरे: श्वेता गजेन्द्रप्रतिमा: शिला:।

चिक्षेप बहुधा भूमौ दुन्दुभिर्विननाद च॥ १५॥

‘यह सुनकर असुरशिरोमणि दुन्दुभि समुद्रको डरा हुआ जान धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति तुरंत हिमालयके वनमें जा पहुँचा और उस पर्वतकी गजराजोंके समान विशाल श्वेत शिलाओंको बारंबार भूमिपर फेंकने और गर्जना करने लगा॥ १४-१५॥

तत: श्वेताम्बुदाकार: सौम्य: प्रीतिकराकृति:।

हिमवानब्रवीद् वाक्यं स्व एव शिखरे स्थित:॥ १६॥

‘तब श्वेत बादलके समान आकार धारण किये सौम्य स्वभाववाले हिमवान् वहाँ प्रकट हुए। उनकी आकृति प्रसन्नताको बढ़ानेवाली थी। वे अपने ही शिखरपर खड़े होकर बोले—॥ १६॥

क्लेष्टुमर्हसि मां न त्वं दुन्दुभे धर्मवत्सल।

रणकर्मस्वकुशलस्तपस्विशरणो ह्यहम्॥ १७॥

‘‘धर्मवत्सल दुन्दुभे! तुम मुझे क्लेश न दो। मैं युद्धकर्ममें कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वी जनोंका निवासस्थान हूँ’॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा गिरिराजस्य धीमत:।

उवाच दुन्दुभिर्वाक्यं क्रोधात् संरक्तलोचन:॥ १८॥

‘बुद्धिमान् गिरिराज हिमालयकी यह बात सुनकर दुन्दुभिके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह इस प्रकार बोला—॥ १८॥

यदि युद्धेऽसमर्थस्त्वं मद्भयाद् वा निरुद्यम:।

तमाचक्ष्व प्रदद्यान्मे यो हि युद्धं युयुत्सत:॥ १९॥

‘यदि तुम युद्ध करनेमें असमर्थ हो अथवा मेरे भयसे ही युद्धकी चेष्टासे विरत हो गये हो तो मुझे उस वीरका नाम बताओ, जो युद्धकी इच्छा रखनेवाले मुझको अपने साथ युद्ध करनेका अवसर दे’॥ १९॥

हिमवानब्रवीद् वाक्यं श्रुत्वा वाक्यविशारद:।

अनुक्तपूर्वं धर्मात्मा क्रोधात् तमसुरोत्तमम्॥ २०॥

‘उसकी यह बात सुनकर बातचीतमें कुशल धर्मात्मा हिमवान्ने श्रेष्ठ असुरसे, जिसके लिये पहले किसीने किसी प्रतिद्वन्द्वी योद्धाका नाम नहीं बताया था, क्रोधपूर्वक कहा—॥ २०॥

वाली नाम महाप्राज्ञ शक्रपुत्र: प्रतापवान्।

अध्यास्ते वानर: श्रीमान् किष्किन्धामतुलप्रभाम्॥ २१॥

‘‘महाप्राज्ञ दानवराज! वाली नामसे प्रसिद्ध एक परम तेजस्वी और प्रतापी वानर हैं, जो देवराज इन्द्रके पुत्र हैं और अनुपम शोभासे पूर्ण किष्किन्धा नामक पुरीमें निवास करते हैं॥ २१॥

स समर्थो महाप्राज्ञस्तव युद्धविशारद:।

द्वन्द्वयुद्धं स दातुं ते नमुचेरिव वासव:॥ २२॥

‘‘वे बड़े बुद्धिमान् और युद्धकी कलामें निपुण हैं। वे ही तुमसे जूझनेमें समर्थ हैं। जैसे इन्द्रने नमुचिको युद्धका अवसर दिया था, उसी प्रकार वाली तुम्हें द्वन्द्वयुद्ध प्रदान कर सकते हैं॥ २२॥

तं शीघ्रमभिगच्छ त्वं यदि युद्धमिहेच्छसि।

स हि दुर्मर्षणो नित्यं शूर: समरकर्मणि॥ २३॥

‘‘यदि तुम यहाँ युद्ध चाहते हो तो शीघ्र चले जाओ; क्योंकि वालीके लिये किसी शत्रुकी ललकारको सह सकना बहुत कठिन है। वे युद्धकर्ममें सदा शूरता प्रकट करनेवाले हैं’॥ २३॥

श्रुत्वा हिमवतो वाक्यं कोपाविष्ट: स दुन्दुभि:।

जगाम तां पुरीं तस्य किष्किन्धां वालिनस्तदा॥ २४॥

‘हिमवान्की बात सुनकर क्रोधसे भरा हुआ दुन्दुभि तत्काल वालीकी किष्किन्धापुरीमें जा पहुँचा॥ २४॥

धारयन् माहिषं रूपं तीक्ष्णशृङ्गो भयावह:।

प्रावृषीव महामेघस्तोयपूर्णो नभस्तले॥ २५॥

‘उसने भैंसेका-सा रूप धारण कर रखा था। उसके सींग बड़े तीखे थे। वह बड़ा भयंकर था और वर्षाकालके आकाशमें छाये हुए जलसे भरे महान् मेघके समान जान पड़ता था॥ २५॥

ततस्तु द्वारमागम्य किष्किन्धाया महाबल:।

ननर्द कम्पयन् भूमिं दुन्दुभिर्दुन्दुभिर्यथा॥ २६॥

‘वह महाबली दुन्दुभि किष्किन्धापुरीके द्वारपर आकर भूमिको कँपाता हुआ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा, मानो दुन्दुभिका गम्भीर नाद हो रहा हो॥ २६॥

समीपजान् द्रुमान् भञ्जन् वसुधां दारयन् खुरै:।

विषाणेनोल्लिखन् दर्पात् तद्द्वारं द्विरदो यथा॥ २७॥

‘वह आसपासके वृक्षोंको तोड़ता, धरतीको खुरोंसे खोदता और घमंडमें आकर पुरीके दरवाजेको सींगोंसे खरोंचता हुआ युद्धके लिये डट गया॥ २७॥

अन्त:पुरगतो वाली श्रुत्वा शब्दममर्षण:।

निष्पपात सह स्त्रीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमा॥ २८॥

‘वाली उस समय अन्त:पुरमें था। उस दानवकी गर्जना सुनकर वह अमर्षसे भर गया और तारोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति स्त्रियोंसे घिरा हुआ नगरके बाहर निकल आया॥ २८॥

मितं व्यक्ताक्षरपदं तमुवाच स दुन्दुभिम्।

हरीणामीश्वरो वाली सर्वेषां वनचारिणाम्॥ २९॥

‘समस्त वनचारी वानरोंके राजा वालीने वहाँ सुस्पष्ट अक्षरों तथा पदोंसे युक्त परिमित वाणीमें उस दुन्दुभिसे कहा—॥ २९॥

किमर्थं नगरद्वारमिदं रुद‍्ध्वा विनर्दसे।

दुन्दुभे विदितो मेऽसि रक्ष प्राणान् महाबल॥ ३०॥

‘‘महाबली दुन्दुभे! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम इस नगरद्वारको रोककर क्यों गरज रहे हो? अपने प्राणोंकी रक्षा करो’॥ ३०॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वानरेन्द्रस्य धीमत:।

उवाच दुन्दुभिर्वाक्यं क्रोधात् संरक्तलोचन:॥ ३१॥

‘बुद्धिमान् वानरराज वालीका यह वचन सुनकर दुन्दुभिकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उससे इस प्रकार बोला—॥ ३१॥

न त्वं स्त्रीसंनिधौ वीर वचनं वक्तुमर्हसि।

मम युद्धं प्रयच्छाद्य ततो ज्ञास्यामि ते बलम्॥ ३२॥

‘‘वीर तुम्हें स्त्रियोंके समीप ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मुझे युद्धका अवसर दो, तब मैं तुम्हारा बल समझूँगा॥ ३२॥

अथवा धारयिष्यामि क्रोधमद्य निशामिमाम्।

गृह्यतामुदय: स्वैरं कामभोगेषु वानर॥ ३३॥

‘‘अथवा वानर! मैं आजकी रातमें अपने क्रोधको रोके रहूँगा। तुम स्वेच्छानुसार कामभोगके लिये सूर्योदयतक समय मुझसे ले लो॥ ३३॥

दीयतां सम्प्रदानं च परिष्वज्य च वानरान्।

सर्वशाखामृगेन्द्रस्त्वं संसादय सुहृज्जनम्॥ ३४॥

‘‘वानरोंको हृदयसे लगाकर जिसे जो कुछ देना हो दे दो; तुम समस्त कपियोंके राजा हो न! अपने सुहृदोंसे मिल लो, सलाह कर लो॥ ३४॥

सुदृष्टां कुरु किष्किन्धां कुरुष्वात्मसमं पुरे।

क्रीडस्व च समं स्त्रीभिरहं ते दर्पशासन:॥ ३५॥

‘‘किष्किन्धापुरीको अच्छी तरह देख लो। अपने समान पुत्र आदिको इस नगरीके राज्यपर अभिषिक्त कर दो और स्त्रियोंके साथ आज जीभरकर क्रीडा कर लो। इसके बाद मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूँगा॥ ३५॥

यो हि मत्तं प्रमत्तं वा भग्नं वा रहितं कृशम्।

हन्यात् स भ्रूणहा लोके त्वद्विधं मदमोहितम्॥ ३६॥

‘‘जो मधुपानसे मत्त, प्रमत्त (असावधान), युद्धसे भगे हुए, अस्त्ररहित, दुर्बल, तुम्हारे-जैसे स्त्रियोंसे घिरे हुए तथा मदमोहित पुरुषका वध करता है, वह जगत्में गर्भ-हत्यारा कहा जाता है’॥ ३६॥

स प्रहस्याब्रवीन्मन्दं क्रोधात् तमसुरेश्वरम्।

विसृज्य ता: स्त्रिय: सर्वास्ताराप्रभृतिकास्तदा॥ ३७॥

‘यह सुनकर वाली मन्द-मन्द मुसकराकर उन तारा आदि सब स्त्रियोंको दूर हटा उस असुरराजसे क्रोधपूर्वक बोला—॥ ३७॥

मत्तोऽयमिति मा मंस्था यद्यभीतोऽसि संयुगे।

मदोऽयं सम्प्रहारेऽस्मिन् वीरपानं समर्थ्यताम्॥ ३८॥

‘‘यदि तुम युद्धके लिये निर्भय होकर खड़े हो तो यह न समझो कि यह वाली मधु पीकर मतवाला हो गया है। मेरे इस मदको तुम युद्धस्थलमें उत्साहवृद्धिके लिये वीरोंद्वारा किया जानेवाला औषधविशेषका पान समझो’॥

तमेवमुक्त्वा संक्रुद्धो मालामुत्क्षिप्य काञ्चनीम्।

पित्रा दत्तां महेन्द्रेण युद्धाय व्यवतिष्ठत॥ ३९॥

‘उससे ऐसा कहकर पिता इन्द्रकी दी हुई विजयदायिनी सुवर्णमालाको गलेमें डालकर वाली कुपित हो युद्धके लिये खड़ा हो गया॥ ३९॥

विषाणयोर्गृहीत्वा तं दुन्दुभिं गिरिसंनिभम्।

आविध्यत तथा वाली विनदन् कपिकुञ्जर:॥ ४०॥

‘कपिश्रेष्ठ वालीने पर्वताकार दुन्दुभिके दोनों सींग पकड़कर उस समय गर्जना करते हुए उसे बारंबार घुमाया॥

बलाद् व्यापादयांचक्रे ननर्द च महास्वनम्।

श्रोत्राभ्यामथ रक्तं तु तस्य सुस्राव पात्यत:॥ ४१॥

‘फिर बलपूर्वक उसे धरतीपर दे मारा और बड़े जोरसे सिंहनाद किया। पृथ्वीपर गिराये जाते समय उसके दोनों कानोंसे खूनकी धाराएँ बहने लगीं॥ ४१॥

तयोस्तु क्रोधसंरम्भात् परस्परजयैषिणो:।

युद्धं समभवद् घोरं दुन्दुभेर्वालिनस्तथा॥ ४२॥

‘क्रोधके आवेशसे युक्त हो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले उन दोनों दुन्दुभि और वालीमें घोर युद्ध होने लगा॥ ४२॥

अयुध्यत तदा वाली शक्रतुल्यपराक्रम:।

मुष्टिभिर्जानुभि: पद्भि: शिलाभि: पादपैस्तथा॥ ४३॥

‘उस समय इन्द्रके तुल्य पराक्रमी वाली दुन्दुभिपर मुक्कों, लातों, घुटनों, शिलाओं तथा वृक्षोंसे प्रहार करने लगा॥

परस्परं घ्नतोस्तत्र वानरासुरयोस्तदा।

आसीद्धीनोऽसुरो युद्धे शक्रसूनुर्व्यवर्धत॥ ४४॥

‘उस युद्धस्थलमें परस्पर प्रहार करते हुए वानर और असुर दोनों योद्धाओंमेंसे असुरकी शक्ति तो घटने लगी और इन्द्रकुमार वालीका बल बढ़ने लगा॥ ४४॥

तं तु दुन्दुभिमुद्यम्य धरण्यामभ्यपातयत्।

युद्धे प्राणहरे तस्मिन्निष्पिष्टो दुन्दुभिस्तदा॥ ४५॥

‘उन दोनोंमें वहाँ प्राणान्तकारी युद्ध छिड़ गया। उस समय वालीने दुन्दुभिको उठाकर पृथ्वीपर दे मारा, साथ ही अपने शरीरसे उसको दबा दिया, जिससे दुन्दुभि पिस गया॥

स्रोतोभ्यो बहु रक्तं तु तस्य सुस्राव पात्यत:।

पपात च महाबाहु: क्षितौ पञ्चत्वमागत:॥ ४६॥

‘गिरते समय उसके शरीरके समस्त छिद्रोंसे बहुत-सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु असुर पृथ्वीपर गिरा और मर गया॥ ४६॥

तं तोलयित्वा बाहुभ्यां गतसत्त्वमचेतनम्।

चिक्षेप वेगवान् वाली वेगेनैकेन योजनम्॥ ४७॥

‘जब उसके प्राण निकल गये और चेतना लुप्त हो गयी, तब वेगवान् वालीने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर एक साधारण वेगसे एक योजन दूर फेंक दिया॥ ४७॥

तस्य वेगप्रविद्धस्य वक्त्रात् क्षतजबिन्दव:।

प्रपेतुर्मारुतोत्क्षिप्ता मतङ्गस्याश्रमं प्रति॥ ४८॥

‘वेगपूर्वक फेंके गये उस असुरके मुखसे निकली हुई रक्तकी बहुत-सी बूँदें हवाके साथ उड़कर मतंगमुनिके आश्रममें पड़ गयीं॥ ४८॥

तान् दृष्ट्वा पतितांस्तत्र मुनि: शोणितविप्रुष:।

क्रुद्धस्तस्य महाभाग चिन्तयामास को न्वयम्॥ ४९॥

‘महाभाग! वहाँ पड़े हुए उन रक्त-बिन्दुओंको देखकर मतंगमुनि कुपित हो उठे और इस विचारमें पड़ गये कि ‘यह कौन है, जो यहाँ रक्तके छींटे डाल गया है?॥ ४९॥

येनाहं सहसा स्पृष्ट: शोणितेन दुरात्मना।

कोऽयं दुरात्मा दुर्बुद्धिरकृतात्मा च बालिश:॥ ५०॥

‘‘जिस दुष्टने सहसा मेरे शरीरसे रक्तका स्पर्श करा दिया, यह दुरात्मा दुर्बुद्धि, अजितात्मा और मूर्ख कौन है?’॥

इत्युक्त्वा स विनिष्क्रम्य ददृशे मुनिसत्तम:।

महिषं पर्वताकारं गतासुं पतितं भुवि॥ ५१॥

‘ऐसा कहकर मुनिवर मतंगने बाहर निकलकर देखा तो उन्हें एक पर्वताकार भैंसा पृथ्वीपर प्राणहीन होकर पड़ा दिखायी दिया॥ ५१॥

स तु विज्ञाय तपसा वानरेण कृतं हि तत्।

उत्ससर्ज महाशापं क्षेप्तारं वानरं प्रति॥ ५२॥

‘उन्होंने अपने तपोबलसे यह जान लिया कि यह एक वानरकी करतूत है। अत: उस लाशको फेंकनेवाले वानरके प्रति उन्होंने बड़ा भारी शाप दिया—॥ ५२॥

इह तेनाप्रवेष्टव्यं प्रविष्टस्य वधो भवेत्।

वनं मत्संश्रयं येन दूषितं रुधिरस्रवै:॥ ५३॥

‘‘जिसने खूनके छींटे डालकर मेरे निवासस्थान इस वनको अपवित्र कर दिया है, वह आजसे इस वनमें प्रवेश न करे। यदि इसमें प्रवेश करेगा तो उसका वध हो जायगा॥ ५३॥

क्षिपता पादपाश्चेमे सम्भग्नाश्चासुरीं तनुम्।

समन्तादाश्रमं पूर्णं योजनं मामकं यदि॥ ५४॥

आगमिष्यति दुर्बुद्धिर्व्यक्तं स न भविष्यति।

‘‘इस असुरके शरीरको इधर फेंककर जिसने इन वृक्षोंको तोड़ डाला है, वह दुर्बुद्धि यदि मेरे आश्रमके चारों ओर पूरे एक योजनतककी भूमिमें पैर रखेगा तो अवश्य ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ ५४/

ये चास्य सचिवा: केचित् संश्रिता मामकं वनम्॥ ५५॥

न च तैरिह वस्तव्यं श्रुत्वा यान्तु यथासुखम्।

तेऽपि वा यदि तिष्ठन्ति शपिष्ये तानपि ध्रुवम्॥ ५६॥

‘‘उस वालीके जो कोई सचिव भी मेरे इस वनमें रहते हों, उन्हें अब यहाँका निवास त्याग देना चाहिये। वे मेरी आज्ञा सुनकर सुखपूर्वक यहाँसे चले जायँ। यदि वे रहेंगे तो उन्हें भी निश्चय ही शाप दे दूँगा॥ ५५-५६॥

वनेऽस्मिन् मामके नित्यं पुत्रवत् परिरक्षिते।

पत्राङ्कुरविनाशाय फलमूलाभवाय च॥ ५७॥

‘‘मैंने अपने इस वनकी सदा पुत्रकी भाँति रक्षा की है। जो इसके पत्र और अङ्कुरका विनाश तथा फल-मूलका अभाव करनेके लिये यहाँ रहेंगे, वे अवश्य शापके भागी होंगे॥ ५७॥

दिवसश्चाद्य मर्यादा यं द्रष्टा श्वोऽस्मि वानरम्।

बहुवर्षसहस्राणि स वै शैलो भविष्यति॥ ५८॥

‘‘आजका दिन उन सबके आने-जाने या रहनेकी अन्तिम अवधि है—आजभरके लिये मैं उन सबको छुट्टी देता हूँ। कलसे जो कोई वानर यहाँ मेरी दृष्टिमें पड़ जायगा, वह कई हजार वर्षोंके लिये पत्थर हो जायगा’॥

ततस्ते वानरा: श्रुत्वा गिरं मुनिसमीरिताम्।

निश्चक्रमुर्वनात् तस्मात् तान् दृष्ट्वा वालिरब्रवीत्॥ ५९॥

‘मुनिके इस वचनको सुनकर वे सभी वानर मतंगवनसे निकल गये। उन्हें देखकर वालीने पूछा—॥

किं भवन्त: समस्ताश्च मतङ्गवनवासिन:।

मत्समीपमनुप्राप्ता अपि स्वस्ति वनौकसाम्॥ ६०॥

‘‘मतंगवनमें निवास करनेवाले आप सभी वानर मेरे पास क्यों चले आये? वनवासियोंकी कुशल तो है न?’’॥

ततस्ते कारणं सर्वं तथा शापं च वालिन:।

शशंसुर्वानरा: सर्वे वालिने हेममालिने॥ ६१॥

‘तब उन सभी वानरोंने सुवर्णमालाधारी वालीसे अपने आनेका सब कारण बताया तथा जो वालीको शाप हुआ था, उसे भी कह सुनाया॥ ६१॥

एतच्छ्रुत्वा तदा वाली वचनं वानरेरितम्।

स महर्षिं समासाद्य याचते स्म कृताञ्जलि:॥ ६२॥

‘वानरोंकी कही हुई यह बात सुनकर वाली महर्षि मतंगके पास गया और हाथ जोड़कर क्षमा-याचना करने लगा॥ ६२॥

महर्षिस्तमनादृत्य प्रविवेशाश्रमं प्रति।

शापधारणभीतस्तु वाली विह्वलतां गत:॥ ६३॥

‘किंतु महर्षिने उसका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रममें चले गये। इधर वाली शाप प्राप्त होनेसे भयभीत हो बहुत ही व्याकुल हो गया॥ ६३॥

तत: शापभयाद् भीतो ऋष्यमूकं महागिरिम्।

प्रवेष्टुं नेच्छति हरिर्द्रष्टुं वापि नरेश्वर॥ ६४॥

‘नरेश्वर! तबसे उस शापके भयसे डरा हुआ वाली इस महान् पर्वत ऋष्यमूकके स्थानोंमें न तो कभी प्रवेश करना चाहता है और न इस पर्वतको देखना ही चाहता है॥

तस्याप्रवेशं ज्ञात्वाहमिदं राम महावनम्।

विचरामि सहामात्यो विषादेन विवर्जित:॥ ६५॥

‘श्रीराम! यहाँ उसका प्रवेश होना असम्भव है, यह जानकर मैं अपने मन्त्रियोंके साथ इस महान् वनमें विषाद-शून्य होकर विचरता हूँ॥ ६५॥

एषोऽस्थिनिचयस्तस्य दुन्दुभे: सम्प्रकाशते।

वीर्योत्सेकान्निरस्तस्य गिरिकूटनिभो महान्॥ ६६॥

‘यह रहा दुन्दुभिकी हड्डियोंका ढेर, जो एक महान् पर्वतशिखरके समान जान पड़ता है। वालीने अपने बलके घमंडमें आकर दुन्दुभिके शरीरको इतनी दूर फेंका था॥ ६६॥

इमे च विपुला: साला: सप्त शाखावलम्बिन:।

यत्रैकं घटते वाली निष्पत्रयितुमोजसा॥ ६७॥

‘ये सात सालके विशाल एवं मोटे वृक्ष हैं, जो अनेक उत्तम शाखाओंसे सुशोभित होते हैं। वाली इनमेंसे एक-एकको बलपूर्वक हिलाकर पत्रहीन कर सकता है॥ ६७॥

एतदस्यासमं वीर्यं मया राम प्रकाशितम्।

कथं तं वालिनं हन्तुं समरे शक्ष्यसे नृप॥ ६८॥

‘श्रीराम! यह मैंने वालीके अनुपम पराक्रमको प्रकाशित किया है। नरेश्वर! आप उस वालीको समराङ्गणमें कैसे मार सकेंगे’॥ ६८॥

तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं प्रहसँल्लक्ष्मणोऽब्रवीत्।

कस्मिन् कर्मणि निर्वृत्ते श्रद्दध्या वालिनो वधम्॥ ६९॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणको बड़ी हँसी आयी। वे हँसते हुए ही बोले—‘कौन-सा काम कर देनेपर तुम्हें विश्वास होगा कि श्रीरामचन्द्रजी वालीका वध कर सकेंगे’॥

तमुवाचाथ सुग्रीव: सप्त सालानिमान् पुरा।

एवमेकैकशो वाली विव्याधाथ स चासकृत्॥ ७०॥

रामो निर्दारयेदेषां बाणेनैकेन च द्रुमम्।

वालिनं निहतं मन्ये दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥ ७१॥

तब सुग्रीवने उनसे कहा— ‘पूर्वकालमें वालीने सालके इन सातों वृक्षोंको एक-एक करके कई बार बींध डाला है। अत: श्रीरामचन्द्रजी भी यदि इनमेंसे किसी एक वृक्षको एक ही बाणसे छेद डालेंगे तो इनका पराक्रम देखकर मुझे वालीके मारे जानेका विश्वास हो जायगा॥ ७०-७१॥

हतस्य महिषस्यास्थि पादेनैकेन लक्ष्मण।

उद्यम्य प्रक्षिपेच्चापि तरसा द्वे धनु:शते॥ ७२॥

‘लक्ष्मण! यदि इस महिषरूपधारी दुन्दुभिकी हड्डीको एक ही पैरसे उठाकर बलपूर्वक दो सौ धनुषकी दूरीपर फेंक सकें तो भी मैं यह मान लूँगा कि इनके हाथसे वालीका वध हो सकता है’॥ ७२॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवो रामं रक्तान्तलोचनम्।

ध्यात्वा मुहूर्तं काकुत्स्थं पुनरेव वचोऽब्रवीत्॥ ७३॥

जिनके नेत्रप्रान्त कुछ-कुछ लाल थे, उन श्रीरामसे ऐसा कहकर सुग्रीव दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारमें पड़े रहे। इसके बाद वे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे फिर बोले—

शूरश्च शूरमानी च प्रख्यातबलपौरुष:।

बलवान् वानरो वाली संयुगेष्वपराजित:॥ ७४॥

‘वाली शूर है और स्वयं भी उसे अपने शौर्यपर अभिमान है। उसके बल और पुरुषार्थ विख्यात हैं। वह बलवान् वानर अबतकके युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुआ है॥ ७४॥

दृश्यन्ते चास्य कर्माणि दुष्कराणि सुरैरपि।

यानि संचिन्त्य भीतोऽहमृष्यमूकमुपाश्रित:॥ ७५॥

‘इसके ऐसे-ऐसे कर्म देखे जाते हैं, जो देवताओंके लिये दुष्कर हैं और जिनका चिन्तन करके भयभीत हो मैंने इस ऋष्यमूक पर्वतकी शरण ली है॥ ७५॥

तमजय्यमधृष्यं च वानरेन्द्रममर्षणम्।

विचिन्तयन्न मुञ्चापि ऋष्यमूकममुं त्वहम्॥ ७६॥

‘वानरराज वालीको जीतना दूसरोंके लिये असम्भव है। उसपर आक्रमण अथवा उसका तिरस्कार भी नहीं किया जा सकता। वह शत्रुकी ललकारको नहीं सह सकता। जब मैं उसके प्रभावका चिन्तन करता हूँ, तब इस ऋष्यमूक पर्वतको एक क्षणके लिये भी छोड़ नहीं पाता हूँ॥ ७६॥

उद्विग्न: शङ्कितश्चाहं विचरामि महावने।

अनुरक्तै: सहामात्यैर्हनुमत्प्रमुखैर्वरै:॥ ७७॥

‘ये हनुमान् आदि मेरे श्रेष्ठ सचिव मुझमें अनुराग रखनेवाले हैं। इनके साथ रहकर भी मैं इस विशाल वनमें वालीसे उद्विग्न और शङ्कित होकर ही विचरता हूँ॥ ७७॥

उपलब्धं च मे श्लाघ्यं सन्मित्रं मित्रवत्सल।

त्वामहं पुरुषव्याघ्र हिमवन्तमिवाश्रित:॥ ७८॥

‘मित्रवत्सल! आप मुझे परम स्पृहणीय श्रेष्ठ मित्र मिल गये हैं। पुरुषसिंह! आप मेरे लिये हिमालयके समान हैं और मैं आपका आश्रय ले चुका हूँ। (इसलिये अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिये)॥ ७८॥

किं तु तस्य बलज्ञोऽहं दुर्भ्रातुर्बलशालिन:।

अप्रत्यक्षं तु मे वीर्यं समरे तव राघव॥ ७९॥

‘किंतु रघुनन्दन! मैं उस बलशाली दुष्ट भ्राताके बल-पराक्रमको जानता हूँ और समरभूमिमें आपका पराक्रम मैंने प्रत्यक्ष नहीं देखा है॥ ७९॥

न खल्वहं त्वां तुलये नावमन्ये न भीषये।

कर्मभिस्तस्य भीमैश्च कातर्यं जनितं मम॥ ८०॥

‘प्रभो! अवश्य ही मैं वालीसे आपकी तुलना नहीं करता हूँ। न तो आपको डराता हूँ और न आपका अपमान ही करता हूँ। वालीके भयानक कर्मोंने ही मेरे हृदयमें कातरता उत्पन्न कर दी है॥ ८०॥

कामं राघव ते वाणी प्रमाणं धैर्यमाकृति:।

सूचयन्ति परं तेजो भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ ८१॥

‘रघुनन्दन! निश्चय ही आपकी वाणी मेरे लिये प्रमाणभूत है—विश्वसनीय है; क्योंकि आपका धैर्य और आपकी यह दिव्य आकृति आदि गुण राखसे ढकी हुई आगके समान आपके उत्कृष्ट तेजको सूचित कर रहे हैं’॥ ८१॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य महात्मन:।

स्मितपूर्वमथो राम: प्रत्युवाच हरिं प्रति॥ ८२॥

महात्मा सुग्रीवकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीराम पहले तो मुसकराये। फिर उस वानरकी बातका उत्तर देते हुए उससे बोले—॥ ८२॥

यदि न प्रत्ययोऽस्मासु विक्रमे तव वानर।

प्रत्ययं समरे श्लाघ्यमहमुत्पादयामि ते॥ ८३॥

‘वानर! यदि तुम्हें इस समय पराक्रमके विषयमें हम लोगोंपर विश्वास नहीं होता तो युद्धके समय हम तुम्हें उसका उत्तम विश्वास करा देंगे’॥ ८३॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सान्त्वयँल्लक्ष्मणाग्रज:।

राघवो दुन्दुभे: कायं पादाङ्गुष्ठेन लीलया॥ ८४॥

तोलयित्वा महाबाहुश्चिक्षेप दशयोजनम्।

असुरस्य तनुं शुष्कां पादाङ्गुष्ठेन वीर्यवान्॥ ८५॥

ऐसा कहकर सुग्रीवको सान्त्वना देते हुए लक्ष्मणके बड़े भाई महाबाहु बलवान् श्रीरघुनाथजीने खिलवाड़में ही दुन्दुभिके शरीरको अपने पैरके अँगूठेसे टाँग लिया और उस असुरके उस सूखे हुए कङ्कालको पैरके अँगूठेसे ही दस योजन दूर फेंक दिया॥ ८४-८५॥

क्षिप्तं दृष्ट्वा तत: कायं सुग्रीव: पुनरब्रवीत्।

लक्ष्मणस्याग्रतो रामं तपन्तमिव भास्करम्।

हरीणामग्रतो वीरमिदं वचनमर्थवत्॥ ८६॥

उसके शररीको फेंका गया देख सुग्रीवने लक्ष्मण और वानरोंके सामने ही तपते हुए सूर्यके समान तेजस्वी वीर श्रीरामचन्द्रजीसे पुन: यह अर्थभरी बात कही—॥ ८६॥

आर्द्र: समांस: प्रत्यग्र: क्षिप्त: काय: पुरा सखे।

परिश्रान्तेन मत्तेन भ्रात्रा मे वालिना तदा॥ ८७॥

‘सखे! मेरा भाई वाली उस समय मदमत्त और युद्धसे थका हुआ था और दुन्दुभिका यह शरीर खूनसे भीगा हुआ, मांसयुक्त तथा नया था। इस दशामें उसने इस शरीरको पूर्वकालमें दूर फेंका था॥ ८७॥

लघु: सम्प्रति निर्मांसस्तृणभूतश्च राघव।

क्षिप्त एवं प्रहर्षेण भवता रघुनन्दन॥ ८८॥

‘परंतु रघुनन्दन! इस समय यह मांसहीन होनेके कारण तिनकेके समान हलका हो गया है और आपने हर्ष एवं उत्साहसे युक्त होकर इसे फेंका है॥ ८८॥

नात्र शक्यं बलं ज्ञातुं तव वा तस्य वाधिकम्।

आर्द्रं शुष्कमिति ह्येतत् सुमहद् राघवान्तरम्॥ ८९॥

‘अत: श्रीराम! इस लाशको फेंकनेपर भी यह नहीं जाना जा सकता कि आपका बल अधिक है या उसका; क्योंकि वह गीला था और यह सूखा। यह इन दोनों अवस्थाओंमें महान् अन्तर है॥ ८९॥

स एव संशयस्तात तव तस्य च यद्बलम्।

सालमेकं विनिर्भिद्य भवेद् व्यक्तिर्बलाबले॥ ९०॥

‘‘तात! आपके और उसके बलमें वही संशय अबतक बना रह गया। अब इस एक सालवृक्षको विदीर्ण कर देनेपर दोनोंके बलाबलका स्पष्टीकरण हो जायगा॥ ९०॥

कृत्वैतत् कार्मुकं सज्यं हस्तिहस्तमिवाततम्।

आकर्णपूर्णमायम्य विसृजस्व महाशरम्॥ ९१॥

‘आपका यह धनुष हाथीकी फैली हुई सूँड़के समान विशाल है। आप इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाइये और इसे कानतक खींचकर सालवृक्षको लक्ष्य करके एक विशाल बाण छोड़िये॥

इमं हि सालं प्रहितस्त्वया शरो

न संशयोऽत्रास्ति विदारयिष्यति।

अलं विमर्शेन मम प्रियं ध्रुवं

कुरुष्व राजन् प्रतिशापितो मया॥ ९२॥

‘इसमें संदेह नहीं कि आपका छोड़ा हुआ बाण इस सालवृक्षको विदीर्ण कर देगा। राजन्! अब विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपनी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मेरा यह प्रिय कार्य अवश्य कीजिये॥ ९२॥

यथा हि तेज:सु वर: सदारवि-

र्यथा हि शैलो हिमवान् महाद्रिषु।

यथा चतुष्पात्सु च केसरी वर-

स्तथा नराणामसि विक्रमे वर:॥ ९३॥

‘जैसे सम्पूर्ण तेजोंमें सदा सूर्यदेव ही श्रेष्ठ हैं, जैसे बड़े-बड़े पर्वतोंमें गिरिराज हिमवान् श्रेष्ठ हैं और जैसे चौपायोंमें सिंह श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पराक्रमके विषयमें सब मनुष्योंमें आप ही श्रेष्ठ हैं’॥ ९३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकादश: सर्ग:॥ ११॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११॥

 


द्वादश: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा सात साल-वृक्षोंका भेदन, श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका किष्किन्धामें आकर वालीको ललकारना और युद्धमें उससे पराजित होकर मतंगवनमें भाग जाना, वहाँ श्रीरामका उन्हें आश्वासन देना और गलेमें पहचानके लिये गजपुष्पीलता डालकर उन्हें पुन: युद्धके लिये भेजना

एतच्च वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम्।

प्रत्ययार्थं महातेजा रामो जग्राह कार्मुकम्॥ १॥

सुग्रीवके सुन्दर ढंगसे कहे हुए इस वचनको सुनकर महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें विश्वास दिलानेके लिये धनुष हाथमें लिया॥ १॥

स गृहीत्वा धनुर्घोरं शरमेकं च मानद:।

सालमुद्दिश्य चिक्षेप पूरयन् स रवैर्दिश:॥ २॥

दूसरोंको मान देनेवाले श्रीरघुनाथजीने वह भयंकर धनुष और एक बाण लेकर धनुषकी टंकारसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए उस बाणको सालवृक्षकी ओर छोड़ दिया॥ २॥

स विसृष्टो बलवता बाण: स्वर्णपरिष्कृत:।

भित्त्वा सालान् गिरिप्रस्थं सप्तं भूमिं विवेश ह॥ ३॥

उन बलवान् वीरशिरोमणिके द्वारा छोड़ा गया वह सुवर्णभूषित बाण उन सातों सालवृक्षोंको एक ही साथ बींधकर पर्वत तथा पृथ्वीके सातों तलोंको छेदता हुआ पातालमें चला गया॥ ३॥

सायकस्तु मुहूर्तेन सालान् भित्त्वा महाजव:।

निष्पत्य च पुनस्तूणं तमेव प्रविवेश ह॥ ४॥

इस प्रकार एक ही मुहूर्तमें उन सबका भेदन करके वह महान् वेगशाली बाण पुन: वहाँसे निकलकर उनके तरकसमें ही प्रविष्ट हो गया॥ ४॥

तान् दृष्ट्वा सप्त निर्भिन्नान् सालान् वानरपुङ्गव:।

रामस्य शरवेगेन विस्मयं परमं गत:॥ ५॥

श्रीरामके बाणके वेगसे उन सातों सालवृक्षोंको विदीर्ण हुआ देख वानरशिरोमणि सुग्रीवको बड़ा विस्मय हुआ॥ ५॥

स मूर्ध्ना न्यपतद् भूमौ प्रलम्बीकृतभूषण:।

सुग्रीव: परमप्रीतो राघवाय कृताञ्जलि:॥ ६॥

साथ ही उन्हें मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। सुग्रीवने हाथ जोड़कर धरतीपर माथा टेक दिया और श्रीरघुनाथजीको साष्टाङ्ग प्रणाम किया। प्रणामके लिये झुकते समय उनके कण्ठहारादि भूषण लटकते हुए दिखायी देते थे॥ ६॥

इदं चोवाच धर्मज्ञं कर्मणा तेन हर्षित:।

रामं सर्वास्त्रविदुषां श्रेष्ठं शूरमवस्थितम्॥ ७॥

श्रीरामके उस महान् कर्मसे अत्यन्त प्रसन्न हो उन्होंने सामने खड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्र-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ, शूरवीर श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहा—॥ ७॥

सेन्द्रानपि सुरान् सर्वांस्त्वं बाणै: पुरुषर्षभ।

समर्थ: समरे हन्तुं किं पुनर्वालिनं प्रभो॥ ८॥

‘पुरुषप्रवर! भगवन्! आप तो अपने बाणोंसे समराङ्गणमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंका वध भी करनेमें समर्थ हैं। फिर वालीको मारना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ ८॥

येन सप्त महासाला गिरिर्भूमिश्च दारिता:।

बाणेनैकेन काकुत्स्थ स्थाता ते को रणाग्रत:॥ ९॥

‘काकुत्स्थ! जिन्होंने सात बड़े-बड़े सालवृक्ष, पर्वत और पृथ्वीको भी एक ही बाणसे विदीर्ण कर डाला, उन्हीं आपके समक्ष युद्धके मुहानेपर कौन ठहर सकता है॥ ९॥

अद्य मे विगत: शोक: प्रीतिरद्य परा मम।

सुहृदं त्वां समासाद्य महेन्द्रवरुणोपमम्॥ १०॥

‘महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी आपको सुहृद्के रूपमें पाकर आज मेरा सारा शोक दूर हो गया। आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १०॥

तमद्यैव प्रियार्थं मे वैरिणं भ्रातृरूपिणम्।

वालिनं जहि काकुत्स्थ मया बद्धोऽयमञ्जलि:॥ ११॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! मैं हाथ जोड़ता हूँ। आप आज ही मेरा प्रिय करनेके लिये उस वालीका, जो भाईके रूपमें मेरा शत्रु है, वध कर डालिये’॥ ११॥

ततो राम: परिष्वज्य सुग्रीवं प्रियदर्शनम्।

प्रत्युवाच महाप्राज्ञो लक्ष्मणानुगतं वच:॥ १२॥

सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्मणके समान प्रिय हो गये थे। उनकी बात सुनकर महाप्राज्ञ श्रीरामने अपने उस प्रिय सुहृद्को हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १२॥

अस्माद्गच्छाम किष्किन्धां क्षिप्रं गच्छ त्वमग्रत:।

गत्वा चाह्वय सुग्रीव वालिनं भ्रातृगन्धिनम्॥ १३॥

‘सुग्रीव! हमलोग शीघ्र ही इस स्थानसे किष्किन्धाको चलते हैं। तुम आगे जाओ और जाकर व्यर्थ ही भाई कहलानेवाले वालीको युद्धके लिये ललकारो’॥ १३॥

सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिन: पुरीम्।

वृक्षैरात्मानमावृत्य ह्यतिष्ठन् गहने वने॥ १४॥

तदनन्तर वे सब लोग वालीकी राजधानी किष्किन्धापुरीमें गये और वहाँ गहन वनके भीतर वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपाकर खड़े हो गये॥ १४॥

सुग्रीवोऽप्यनदद् घोरं वालिनो ह्वानकारणात्।

गाढं परिहितो वेगान्नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम्॥ १५॥

सुग्रीवने लँगोटसे अपनी कमर खूब कस ली और वालीको बुलानेके लिये भयंकर गर्जना की। वेगपूर्वक किये हुए उस सिंहनादसे मानो वे आकाशको फाड़े डालते थे॥ १५॥

तं श्रुत्वा निनदं भ्रातु: क्रुद्धो वाली महाबल:।

निष्पपात सुसंरब्धो भास्करोऽस्ततटादिव॥ १६॥

भाईका सिंहनाद सुनकर महाबली वालीको बड़ा क्रोध हुआ। वह अमर्षमें भरकर अस्ताचलसे नीचे जानेवाले सूर्यके समान बड़े वेगसे घरसे निकला॥ १६॥

तत: सुतुमुलं युद्धं वालिसुग्रीवयोरभूत्।

गगने ग्रहयोर्घोरं बुधाङ्गारकयोरिव॥ १७॥

फिर तो वाली और सुग्रीवमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, मानो आकाशमें बुध और मंगल इन दोनों ग्रहोंमें घोर संग्राम हो रहा हो॥ १७॥

तलैरशनिकल्पैश्च वज्रकल्पैश्च मुष्टिभि:।

जघ्नतु: समरेऽन्योन्यं भ्रातरौ क्रोधमूर्च्छितौ॥ १८॥

वे दोनों भाई क्रोधसे मूर्च्छित हो एक-दूसरेपर वज्र और अशनिके समान तमाचों और घूँसोंका प्रहार करने लगे॥

ततो रामो धनुष्पाणिस्तावुभौ समुदैक्षत।

अन्योन्यसदृशौ वीरावुभौ देवाविवाश्विनौ॥ १९॥

उसी समय श्रीरामचन्द्रजीने धनुष हाथमें लिया और उन दोनोंकी ओर देखा। वे दोनों वीर अश्विनीकुमारोंकी भाँति परस्पर मिलते-जुलते दिखायी दिये॥ १९॥

यन्नावगच्छत् सुग्रीवं वालिनं वापि राघव:।

ततो न कृतवान् बुद्ध‌िं मोक्तुमन्तकरं शरम्॥ २०॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह पता न चला कि इनमें कौन सुग्रीव है और कौन वाली; इसलिये उन्होंने अपना वह प्राणान्तकारी बाण छोड़नेका विचार स्थगित कर दिया॥

एतस्मिन्नन्तरे भग्न: सुग्रीवस्तेन वालिना।

अपश्यन् राघवं नाथमृष्यमूकं प्रदुद्रुवे॥ २१॥

इसी बीचमें वालीने सुग्रीवके पाँव उखाड़ दिये। वे अपने रक्षक श्रीरघुनाथजीको न देखकर ऋष्यमूक पर्वतकी ओर भागे॥ २१॥

क्लान्तो रुधिरसिक्ताङ्ग: प्रहारैर्जर्जरीकृत:।

वालिनाभिद्रुत: क्रोधात् प्रविवेश महावनम्॥ २२॥

वे बहुत थक गये थे। उनका सारा शरीर लहूलुहान और प्रहारोंसे जर्जर हो रहा था। इतनेपर भी वालीने क्रोधपूर्वक उनका पीछा किया। किंतु वे मतंगमुनिके महान् वनमें घुस गये॥ २२॥

तं प्रविष्टं वनं दृष्ट्वा वाली शापभयात् तत:।

मुक्तो ह्यसि त्वमित्युक्त्वा स निवृत्तो महाबल:॥ २३॥

सुग्रीवको उस वनमें प्रविष्ट हुआ देख महाबली वाली शापके भयसे वहाँ नहीं गया और ‘जाओ तुम बच गये’ ऐसा कहकर वहाँसे लौट आया॥ २३॥

राघवोऽपि सह भ्रात्रा सह चैव हनूमता।

तदेव वनमागच्छत् सुग्रीवो यत्र वानर:॥ २४॥

इधर श्रीरघुनाथजी भी अपने भाई लक्ष्मण तथा श्रीहनुमान्‌जीके साथ उसी समय वनमें आ गये, जहाँ वानर सुग्रीव विद्यमान थे॥ २४॥

तं समीक्ष्यागतं रामं सुग्रीव: सहलक्ष्मणम्।

हृमान् दीनमुवाचेदं वसुधामवलोकयन्॥ २५॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामको आया देख सुग्रीवको बड़ी लज्जा हुई और वे पृथ्वीकी ओर देखते हुए दीन वाणीमें उनसे बोले—॥ २५॥

आह्वयस्वेति मामुक्त्वा दर्शयित्वा च विक्रमम्।

वैरिणा घातयित्वा च किमिदानीं त्वया कृतम्॥ २६॥

तामेव वेलां वक्तव्यं त्वया राघव तत्त्वत:।

वालिनं न निहन्मीति ततो नाहमितो व्रजे॥ २७॥

‘रघुनन्दन! आपने अपना पराक्रम दिखाया और मुझे यह कहकर भेज दिया कि जाओ, वालीको युद्धके लिये ललकारो, यह सब हो जानेपर आपने शत्रुसे पिटवाया और स्वयं छिप गये। बताइये, इस समय आपने ऐसा क्यों किया? आपको उसी समय सच-सच बता देना चाहिये था कि मैं वालीको नहीं मारूँगा। ऐसी दशामें मैं यहाँसे उसके पास जाता ही नहीं’॥ २६-२७॥

तस्य चैवं ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मन:।

करुणं दीनया वाचा राघव: पुनरब्रवीत्॥ २८॥

महामना सुग्रीव जब दीन वाणीद्वारा इस प्रकार करुणा जनक बात कहने लगे, तब श्रीराम फिर उनसे बोले—॥ २८॥

सुग्रीव श्रूयतां तात क्रोधश्च व्यपनीयताम्।

कारणं येन बाणोऽयं स मया न विसर्जित:॥ २९॥

‘तात सुग्रीव! मेरी बात सुनो, क्रोधको अपने मनसे निकाल दो। मैंने क्यों नहीं बाण चलाया, इसका कारण बतलाता हूँ॥ २९॥

अलंकारेण वेषेण प्रमाणेन गतेन च।

त्वं च सुग्रीव वाली च सदृशौ स्थ: परस्परम्॥ ३०॥

सुग्रीव! वेशभूषा, कद और चाल-ढालमें तुम और वाली दोनों एक-दूसरेसे मिलते-जुलते हो॥ ३०॥

स्वरेण वर्चसा चैव प्रेक्षितेन च वानर।

विक्रमेण च वाक्यैश्च व्यक्तिं वां नोपलक्षये॥ ३१॥

‘स्वर, कान्ति, दृष्टि, पराक्रम और बोलचालके द्वारा भी मुझे तुम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता॥ ३१॥’

ततोऽहं रूपसादृश्यान्मोहितो वानरोत्तम।

नोत्सृजामि महावेगं शरं शत्रुनिबर्हणम्॥ ३२॥

‘वानरश्रेष्ठ! तुम दोनोंके रूपकी इतनी समानता देखकर मैं मोहमें पड़ गया—तुम्हें पहचान न सका; इसलिये मैंने अपना महान् वेगशाली शत्रुसंहारक बाण नहीं छोड़ा॥ ३२॥’

जीवितान्तकरं घोरं सादृश्यात् तु विशङ्कित:।

मूलघातो न नौ स्याद्धि द्वयोरिति कृतो मया॥ ३३॥

‘मेरा वह भयंकर बाण शत्रुके प्राण लेनेवाला था, इसलिये तुम दोनोंकी समानतासे संदेहमें पड़कर मैंने उस बाणको नहीं छोड़ा। सोचा, कहीं ऐसा न हो कि हम दोनोंके मूल उद्देश्यका ही विनाश हो जाय॥ ३३॥’

त्वयि वीर विपन्ने हि अज्ञानाल्लाघवान्मया।

मौढ्यं च मम बाल्यं च ख्यापितं स्यात् कपीश्वर॥ ३४॥

‘वीर! वानरराज! यदि अनजानमें या जल्दबाजीके कारण मेरे बाणसे तुम्हीं मारे जाते तो मेरी बालोचित चपलता और मूढ़ता ही सिद्ध होती॥ ३४॥’

दत्ताभयवधो नाम पातकं महदद्भुतम्।

अहं च लक्ष्मणश्चैव सीता च वरवर्णिनी॥ ३५॥

त्वदधीना वयं सर्वे वनेऽस्मिन् शरणं भवान्।

तस्माद् युध्यस्व भूयस्त्वं मा माशङ्कीश्च वानर॥ ३६॥

‘जिसको अभय दान दे दिया गया हो, उसका वध करनेसे बड़ा भारी पाप होता है; यह एक अद्भुत पातक है। इस समय मैं, लक्ष्मण और सुन्दरी सीता सब तुम्हारे अधीन हैं। इस वनमें तुम्हीं हमलोगोंके आश्रय हो; इसलिये वानरराज! शङ्का न करो; पुन: चलकर युद्ध प्रारम्भ करो॥ ३५-३६॥

एतन्मुहूर्ते तु मया पश्य वालिनमाहवे।

निरस्तमिषुणैकेन चेष्टमानं महीतले॥ ३७॥

‘तुम इसी मुहूर्तमें वालीको मेरे एक ही बाणका निशाना बनकर धरतीपर लोटता देखोगे॥ ३७॥

अभिज्ञानं कुरुष्व त्वमात्मनो वानरेश्वर।

येन त्वामभिजानीयां द्वन्द्वयुद्धमुपागतम्॥ ३८॥

‘वानरेश्वर! अपनी पहचानके लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो, जिससे द्वन्द्वयुद्धमें प्रवृत्त होनेपर मैं तुम्हें पहचान सकूँ’॥ ३८॥

गजपुष्पीमिमां फुल्लामुत्पाट्य शुभलक्षणाम्।

कुरु लक्ष्मण कण्ठेऽस्य सुग्रीवस्य महात्मन:॥ ३९॥

(सुग्रीवसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे बोले—) ‘लक्ष्मण! यह उत्तम लक्षणोंसे युक्त गजपुष्पी लता फूल रही है। इसे उखाड़कर तुम महामना सुग्रीवके गलेमें पहना दो’॥ ३९॥

ततो गिरितटे जातामुत्पाट्य कुसुमायुताम्।

लक्ष्मणो गजपुष्पीं तां तस्य कण्ठे व्यसर्जयत्॥ ४०॥

यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने पर्वतके किनारे उत्पन्न हुई फूलोंसे भरी वह गजपुष्पी लता उखाड़कर सुग्रीवके गलेमें डाल दिया॥ ४०॥

स तया शुशुभे श्रीमाल्ँलतया कण्ठसक्तया।

मालयेव बलाकानां ससंध्य इव तोयद:॥ ४१॥

गलेमें पड़ी हुई उस लतासे श्रीमान् सुग्रीव वकपंक्तिसे अलंकृत संध्याकालके मेघकी भाँति शोभा पाने लगे॥ ४१॥

विभ्राजमानो वपुषा रामवाक्यसमाहित:।

जगाम सह रामेण किष्किन्धां पुनराप स:॥ ४२॥

श्रीरामके वचनसे आश्वासन पाकर अपने सुन्दर शरीरसे शोभा पानेवाले सुग्रीव श्रीरघुनाथजीके साथ फिर किष्किन्धापुरीमें जा पहुँचे॥ ४२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वादश: सर्ग:॥ १२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥

 

त्रयोदश: सर्ग:

श्रीराम आदिका मार्गमें वृक्षों, विविध जन्तुओं, जलाशयों तथा सप्तजन आश्रमका दूरसे दर्शन करते हुए पुन: किष्किन्धापुरीमें पहुँचना

ऋष्यमूकात् स धर्मात्मा किष्किन्धां लक्ष्मणाग्रज:।

जगाम सह सुग्रीवो वालिविक्रमपालिताम्॥ १॥

लक्ष्मणके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम सुग्रीवको साथ लेकर पुन: ऋष्यमूकसे उस किष्किन्धापुरीकी ओर चले, जो वालीके पराक्रमसे सुरक्षित थी॥ १॥

समुद्यम्य महच्चापं राम: काञ्चनभूषितम्।

शरांश्चादित्यसंकाशान् गृहीत्वा रणसाधकान्॥ २॥

अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको उठाकर और युद्धमें सफलता दिखानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंको लेकर श्रीराम वहाँसे प्रस्थित हुए॥ २॥

अग्रतस्तु ययौ तस्य राघवस्य महात्मन:।

सुग्रीव: संहतग्रीवो लक्ष्मणश्च महाबल:॥ ३॥

महात्मा रघुनाथजीके आगे-आगे सुगठित ग्रीवावाले सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण चल रहे थे॥ ३॥

पृष्ठतो हनुमान् वीरो नलो नीलश्च वीर्यवान्।

तारश्चैव महातेजा हरियूथपयूथप:॥ ४॥

और उनके पीछे वीर हनुमान्, नल, पराक्रमी नील तथा वानर-यूथपोंके भी यूथपति महातेजस्वी तार चल रहे थे॥

ते वीक्षमाणा वृक्षांश्च पुष्पभारावलम्बिन:।

प्रसन्नाम्बुवहाश्चैव सरित: सागरंगमा:॥ ५॥

कन्दराणि च शैलांश्च निर्दराणि गुहास्तथा।

शिखराणि च मुख्यानि दरीश्च प्रियदर्शना:॥ ६॥

वे सब लोग फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षों, स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदियों, कन्दराओं, पर्वतों, शिला-विवरों, गुफाओं, मुख्य-मुख्य शिखरों और सुन्दर दिखायी देनेवाली गहन गुफाओंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे॥

वैदूर्यविमलैस्तोयै: पद्मैश्चाकोशकुड्मलै:।

शोभितान् सजलान् मार्गे तटाकांश्चावलोकयन्॥ ७॥

उन्होंने मार्गमें ऐसे सजल सरोवरोंको भी देखा, जो वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, निर्मल जल तथा कम खिले हुए मुकुलयुक्त कमलोंसे सुशोभित थे॥ ७॥

कारण्डै: सारसैर्हंसैर्वञ्जुलैर्जलकुक्कुटै:।

चक्रवाकैस्तथा चान्यै: शकुनै: प्रतिनादितान्॥ ८॥

कारण्डव, सारस, हंस, वञ्जुल, जलमुर्ग, चक्रवाक तथा अन्य पक्षी उन सरोवरोंमें चहचहा रहे थे। उन सबकी प्रतिध्वनि वहाँ गूँज रही थी॥ ८॥

मृदुशष्पाङ्कुराहारान्निर्भयान् वनगोचरान्।

चरत: सर्वत: पश्यन् स्थलीषु हरिणान् स्थितान्॥ ९॥

स्थलोंमें सब ओर हरी-हरी कोमल घासके अङ्कुरोंका आहार करनेवाले वनचारी हरिण कहीं निर्भय होकर चरते थे और कहीं खड़े दिखायी देते थे (इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि किष्किन्धाकी ओर जा रहे थे)॥ ९॥

तटाकवैरिणश्चापि शुक्लदन्तविभूषितान्।

घोरानेकचरान् वन्यान् द्विरदान् कूलघातिन:॥ १०॥

मत्तान् गिरितटोत्कृष्टान् पर्वतानिव जङ्गमान्।

वानरान् द्विरदप्रख्यान् महीरेणुसमुक्षितान्॥ ११॥

वने वनचरांश्चान्यान् खेचरांश्च विहंगमान्।

पश्यन्तस्त्वरिता जग्मु: सुग्रीववशवर्तिन:॥ १२॥

जो सफेद दाँतोंसे सुशोभित थे, देखनेमें भयंकर थे, अकेले विचरते थे और किनारोंको खोदकर नष्ट कर देनेके कारण सरोवरोंके शत्रु समझे जाते थे, ऐसे दो दाँतोंवाले मदमत्त जङ्गली हाथी चलते-फिरते पर्वतोंके समान जाते दिखायी देते थे। उन्होंने अपने दाँतोंसे पर्वतके तटप्रान्तको विदीर्ण कर दिया था। कहीं हाथी-जैसे विशालकाय वानर दृष्टिगोचर होते थे, जो धरतीकी धूलसे नहा उठे थे। इनके सिवा उस वनमें और भी बहुत-से जंगली जीव-जन्तु तथा आकाशचारी पक्षी विचरते देखे जाते थे। इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि सब लोग सुग्रीवके वशवर्ती हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे॥ १०—१२॥

तेषां तु गच्छतां तत्र त्वरितं रघुनन्दन:।

द्रुमषण्डवनं दृष्ट्वा राम: सुग्रीवमब्रवीत्॥ १३॥

उन यात्रा करनेवाले लोगोंमें वहाँ रघुकुलनन्दन श्रीरामने वृक्षसमूहोंसे सघन वनको देखकर सुग्रीवसे पूछा—॥ १३॥

एष मेघ इवाकाशे वृक्षषण्ड: प्रकाशते।

मेघसंघातविपुल: पर्यन्तकदलीवृत:॥ १४॥

‘वानरराज! आकाशमें मेघकी भाँति जो यह वृक्षोंका समूह प्रकाशित हो रहा है, क्या है? यह इतना विस्तृत है कि मेघोंकी घटाके समान छा रहा है। इसके किनारे-किनारे केलेके वृक्ष लगे हुए हैं, जिनसे वह सारा वृक्षसमूह घिर गया है॥ १४॥

किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम।

कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया॥ १५॥

‘सखे! यह कौन-सा वन है, यह मैं जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे द्वारा मेरे इस कौतूहलका निवारण हो’॥ १५॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मन:।

गच्छन्नेवाचचक्षेऽथ सुग्रीवस्तन्महद् वनम्॥ १६॥

महात्मा रघुनाथजीकी यह बात सुनकर सुग्रीवने चलते-चलते ही उस विशाल वनके विषयमें बताना आरम्भ किया॥

एतद् राघव विस्तीर्णमाश्रमं श्रमनाशनम्।

उद्यानवनसम्पन्नं स्वादुमूलफलोदकम्॥ १७॥

‘रघुनन्दन! यह एक विस्तृत आश्रम है, जो सबके श्रमका निवारण करनेवाला है। यह उद्यानों और उपवनोंसे युक्त है। यहाँ स्वादिष्ट फल-मूल और जल सुलभ होते हैं॥

अत्र सप्तजना नाम मुनय: संशितव्रता:।

सप्तैवासन्नध:शीर्षा नियतं जलशायिन:॥ १८॥

‘इस आश्रममें सप्तजन नामसे प्रसिद्ध सात ही मुनि रहते थे, जो कठोर व्रतके पालनमें तत्पर थे। वे नीचे सिर करके तपस्या करते थे। नियमपूर्वक रहकर जलमें शयन करनेवाले थे॥ १८॥

सप्तरात्रे कृताहारा वायुनाचलवासिन:।

दिवं वर्षशतैर्याता: सप्तभि: सकलेवरा:॥ १९॥

‘सात दिन और सात रात व्यतीत करके वे केवल वायुका आहार करते थे तथा एक स्थानपर निश्चल भावसे रहते थे। इस प्रकार सात सौ वर्षोंतक तपस्या करके वे सशरीर स्वर्गलोकको चले गये॥ १९॥

तेषामेतत्प्रभावेण द्रुमप्राकारसंवृतम्।

आश्रमं सुदुराधर्षमपि सेन्द्रै: सुरासुरै:॥ २०॥

‘उन्हींके प्रभावसे सघन वृक्षोंकी चहारदीवारीसे घिरा हुआ यह आश्रम इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्धर्ष बना हुआ है॥ २०॥

पक्षिणो वर्जयन्त्येतत् तथान्ये वनचारिण:।

विशन्ति मोहाद् येऽप्यत्र न निवर्तन्ति ते पुन:॥ २१॥

‘पक्षी तथा दूसरे वनचर जीव इसे दूरसे ही त्याग देते हैं। जो मोहवश इसके भीतर प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी नहीं लौटते हैं॥ २१॥

विभूषणरवाश्चात्र श्रूयन्ते सकलाक्षरा:।

तूर्यगीतस्वनश्चापि गन्धो दिव्यश्च राघव॥ २२॥

‘रघुनन्दन! यहाँ मधुर अक्षरवाली वाणीके साथ-साथ आभूषणोंकी झनकारें भी सुनी जाती हैं। वाद्य और गीतकी मधुर ध्वनि भी कानोंमें पड़ती है और दिव्य सुगन्धका भी अनुभव होता है॥ २२॥

त्रेताग्नयोऽपि दीप्यन्ते धूमो ह्येष प्रदृश्यते।

वेष्टयन्निव वृक्षाग्रान् कपोताङ्गारुणो घन:॥ २३॥

‘यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं। यह कबूतरके अंगोंकी भाँति धूसर रंगवाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षोंकी शिखाओंको आवेष्टित-सा कर रहा है॥ २३॥

एते वृक्षा: प्रकाशन्ते धूमसंसक्तमस्तका:।

मेघजालप्रतिच्छन्ना वैडूर्यगिरयो यथा॥ २४॥

‘जिनके शिखाओंपर होम-धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहोंसे आच्छादित हुए नीलमके पर्वतोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं॥ २४॥

कुरु प्रणामं धर्मात्मंस्तेषामुद्दिश्य राघव।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रयत: संहताञ्जलि:॥ २५॥

‘धर्मात्मा रघुनन्दन! आप मनको एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मणके साथ उन मुनियोंके उद्देश्यसे प्रणाम कीजिये॥ २५॥

प्रणमन्ति हि ये तेषामृषीणां भावितात्मनाम्।

न तेषामशुभं किंचिच्छरीरे राम विद्यते॥ २६॥

‘श्रीराम! जो उन पवित्र अन्त:करणवाले ऋषियोंको प्रणाम करते हैं, उनके शरीरमें किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है’॥ २६॥

ततो राम: सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन कृताञ्जलि:।

समुद्दिश्य महात्मानस्तानृषीनभ्यवादयत्॥ २७॥

तब भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियोंके उद्देश्यसे प्रणाम किया॥ २७॥

अभिवाद्य च धर्मात्मा रामो भ्राता च लक्ष्मण:।

सुग्रीवो वानराश्चैव जम्मु: संहृष्टमानसा:॥ २८॥

धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियोंको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े॥ २८॥

ते गत्वा दूरमध्वानं तस्मात् सप्तजनाश्रमात्।

ददृशुस्तां दुराधर्षां किष्किन्धां वालिपालिताम्॥ २९॥

उस सप्तजनाश्रमसे दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके पश्चात् उन सबने वालीद्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीको देखा॥

ततस्तु रामानुजरामवानरा:

प्रगृह्य शस्त्राण्युदितोग्रतेजस:।

पुरीं सुरेशात्मजवीर्यपालितां

वधाय शत्रो: पुनरागतास्त्विह॥ ३०॥

तदनन्तर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा वानर, जिनका उग्रतेज उदित हुआ था, हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर इन्द्रकुमार वालीके पराक्रमसे पालित किष्किन्धापुरीमें शत्रुवधके निमित्त पुन: आ पहुँचे॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोदश: सर्ग:॥ १३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामयाण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १३॥

 


चतुर्दश: सर्ग:

वाली-वधके लिये श्रीरामका आश्वासन पाकर सुग्रीवकी विकट गर्जना

सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिन: पुरीम्।

वृक्षैरात्मानमावृत्य व्यतिष्ठन् गहने वने॥ १॥

वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वालीकी किष्किन्धापुरीमें पहुँचकर एक गहन वनमें वृक्षोंकी ओटमें अपने-आपको छिपाकर खड़े हो गये॥ १॥

विसार्य सर्वतो दृष्टिं कानने काननप्रिय:।

सुग्रीवो विपुलग्रीव: क्रोधमाहारयद् भृशम्॥ २॥

वनके प्रेमी विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने उस वनमें चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मनमें अत्यन्त क्रोधका संचय किया॥ २॥

ततस्तु निनदं घोरं कृत्वा युद्धाय चाह्वयत्।

परिवारै: परिवृतो नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम्॥ ३॥

तदनन्तर अपने सहायकोंसे घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनादसे आकाशको फाड़ते हुए-से घोर गर्जना की और वालीको युद्धके लिये ललकारा॥ ३॥

गर्जन्निव महामेघो वायुवेगपुर:सर:।

अथ बालार्कसदृशो दृप्तसिंहगतिस्तत:॥ ४॥

उस समय सुग्रीव वायुके वेगके साथ गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ते थे। अपनी अङ्गकान्ति और प्रतापके द्वारा प्रात:कालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते थे। उनकी चाल दर्पभरे सिंहके समान प्रतीत होती थी॥ ४॥

दृष्ट्वा रामं क्रियादक्षं सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्।

हरिवागुरया व्याप्तां तप्तकाञ्चनतोरणाम्॥ ५॥

प्राप्ता: स्म ध्वजयन्त्राढ्यां किष्किन्धां वालिन: पुरीम्।

प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वालिवधे पुरा॥ ६॥

सफलां कुरु तां क्षिप्रं लतां काल इवागत:।

कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर सुग्रीवने कहा—‘भगवन्! वालीकी यह किष्किन्धापुरी तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित नगरद्वारसे सुशोभित है। इसमें सब ओर वानरोंका जाल-सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रोंसे सम्पन्न है। हम सब लोग इस पुरीमें आ पहुँचे हैं। वीर! आपने पहले वाली-वधके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये। ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लताको फल-फूलसे सम्पन्न कर देता है’॥ ५-६/

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सुग्रीवेण स राघव:॥ ७॥

तमेवोवाच वचनं सुग्रीवं शत्रुसूदन:।

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने फिर अपनी पूर्वोक्त बातको दुहराते हुए ही सुग्रीवसे कहा—॥ ७/

कृताभिज्ञानचिह्नस्त्वमनया गजसाह्वया॥ ८॥

लक्ष्मणेन समुत्पाट्य एषा कण्ठे कृता तव।

शोभसेऽप्यधिकं वीर लतया कण्ठसक्तया॥ ९॥

विपरीत इवाकाशे सूर्यो नक्षत्रमालया।

‘वीर! अब तो इस गजपुष्पी लताके द्वारा तुमने अपनी पहचानके लिये चिह्न धारण कर ही लिया है। लक्ष्मणने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठमें पहना ही दिया है। तुम कण्ठमें धारण की हुई इस लताके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो। जिस प्रकार सूर्यमंडल आकाशमें नक्षत्रमालासे घिरकर सुशोभित होता है उसी प्रकार इस कण्ठ-लम्बिनी लतासे सुशोभित होनेवाले तुम्हारी उस सूर्यसे तुलना हो सकती है॥ ८-९/

अद्य वालिसमुत्थं ते भयं वैरं च वानर॥ १०॥

एकेनाहं प्रमोक्ष्यामि बाणमोक्षेण संयुगे।

‘वानरराज! आज मैं वालीसे उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनोंको युद्धस्थलमें एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूँगा॥ १०/

मम दर्शय सुग्रीव वैरिणं भ्रातृरूपिणम्॥ ११॥

वाली विनिहतो यावद्वने पांसुषु चेष्टते।

‘सुग्रीव! तुम मुझे अपने उस भ्रातारूपी शत्रुको दिखा तो दो। फिर वाली मारा जाकर वनके भीतर धूलमें लोटता दिखायी देगा॥ ११/

यदि दृष्टिपथं प्राप्तो जीवन् स विनिवर्तते॥ १२॥

ततो दोषेण मागच्छेत् सद्यो गर्हेच्च मां भवान्।

‘यदि मेरी दृष्टिमें पड़ जानेपर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना॥ १२/

प्रत्यक्षं सप्त ते साला मया बाणेन दारिता:॥ १३॥

तेनावेहि बलेनाद्य वालिनं निहतं रणे।

‘तुम्हारी आँखोंके सामने मैंने अपने एक ही बाणसे सात सालके वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बलसे आज समराङ्गणमें (एक बाणसे ही) तुम वालीको मारा गया समझो॥ १३/

अनृतं नोक्तपूर्वं मे चिरं कृच्छ्रेऽपि तिष्ठता॥ १४॥

धर्मलोभपरीतेन न च वक्ष्ये कथंचन।

सफलां च करिष्यामि प्रतिज्ञां जहि संभ्रमम्॥ १५॥

‘बहुत समयसे संकट झेलते रहनेपर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ। मेरे मनमें धर्मका लोभ है। इसलिये किसी तरह मैं झूठ तो बोलूँगा ही नहीं। साथ ही अपनी प्रतिज्ञाको भी अवश्य सफल करूँगा। अत: तुम भय और घबराहटको अपने हृदयसे निकाल दो॥ १४-१५॥

प्रसूतं कलमक्षेत्रं वर्षेणेव शतक्रतु:।

तदाह्वाननिमित्तं च वालिनो हेममालिन:॥ १६॥

सुग्रीव कुरु तं शब्दं निष्पतेद् येन वानर:।

‘जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए धानके खेतको फलसे सम्पन्न करते हैं, उसी तरह मैं भी बाणका प्रयोग करके वालीके वधद्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा। इसलिये सुग्रीव! तुम सुवर्णमालाधारी वालीको बुलानेके लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करनेके लिये वह वानर नगरसे बाहर निकल आये॥ १६/

जितकाशी जयश्लाघी त्वया चाधर्षित: पुरात्॥ १७॥

निष्पतिष्यत्यसङ्गेन वाली स प्रियसंयुग:।

‘वह अनेक युद्धोंमें विजय पाकर विजयश्रीसे सुशोभित हुआ है। सबपर विजय पानेकी इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है। इसके अलावे युद्धसे उसका बड़ा प्रेम है, अत: वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगरके बाहर अवश्य निकलेगा॥

रिपूणां धर्षितं श्रुत्वा मर्षयन्ति न संयुगे॥ १८॥

जानन्तस्तु स्वकं वीर्यं स्त्रीसमक्षं विशेषत:।

‘क्योंकि अपने पराक्रमको जाननेवाले वीर पुरुष, विशेषत: स्त्रियोंके सामने, युद्धके लिये शत्रुओंके तिरस्कारपूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते हैं’॥

स तु रामवच: श्रुत्वा सुग्रीवो हेमपिङ्गल:॥ १९॥

ननर्द क्रूरनादेन विनिर्भिन्दन्निवाम्बरम्।

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सुवर्णके समान पिङ्गलवर्णवाले सुग्रीवने आकाशको विदीर्ण-सा करते हुए कठोर स्वरमें बड़ी भयंकर गर्जना की॥ १९/

तत्र शब्देन वित्रस्ता गावो यान्ति हतप्रभा:॥ २०॥

राजदोषपरामृष्टा: कुलस्त्रिय इवाकुला:।

उस सिंहनादसे भयभीत हो बड़े-बड़े बैल शक्तिहीन हो राजाके दोषसे परपुरुषोंद्वारा पकड़ी जानेवाली कुलाङ्गनाओंके समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले॥

द्रवन्ति च मृगा: शीघ्रं भग्ना इव रणे हया:।

पतन्ति च खगा भूमौ क्षीणपुण्या इव ग्रहा:॥ २१॥

मृग युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट खाकर भागे हुए घोड़ोंके समान तीव्र गतिसे भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहोंके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे॥ २१॥

तत: स जीमूतकृतप्रणादो

नादं ह्यमुञ्चत् त्वरया प्रतीत:।

सूर्यात्मज: शौर्यविवृद्धतेजा:

सरित्पतिर्वाऽनिलचञ्चलोर्मि:॥ २२॥

तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर था और शौर्यके द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावलीके साथ बारंबार गर्जना करने लगे, मानो वायुके वेगसे चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्ग-मालाओंसे सुशोभित सरिताओंका स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्दश: सर्ग:॥ १४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥

 

 


पञ्चदश: सर्ग:

सुग्रीवकी गर्जना सुनकर वालीका युद्धके लिये निकलना और ताराका उसे रोककर सुग्रीव और श्रीरामके साथ मैत्री कर लेनेके लिये समझाना

अथ तस्य निनादं तं सुग्रीवस्य महात्मन:।

शुश्रावान्त:पुरगतो वाली भ्रातुरमर्षण:॥ १॥

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्त:पुरमें था। उसने अपने भाई महामना सुग्रीवका वह सिंहनाद वहींसे सुना॥ १॥

श्रुत्वा तु तस्य निनदं सर्वभूतप्रकम्पनम्।

मदश्चैकपदे नष्ट: क्रोधश्चापादितो महान्॥ २॥

समस्त प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ॥ २॥

ततो रोषपरीताङ्गो वाली स कनकप्रभ:।

उपरक्त इवादित्य: सद्यो निष्प्रभतां गत:॥ ३॥

फिर तो सुवर्णके समान पीले रंगवाले वालीका सारा शरीर क्रोधसे तमतमा उठा। वह राहुग्रस्त सूर्यके समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा॥ ३॥

वाली दंष्ट्राकरालस्तु क्रोधाद् दीप्ताग्निलोचन:।

भात्युत्पतितपद्माभ: समृणाल इव हृद:॥ ४॥

वालीकी दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोधके कारण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे। वह उस तालाबके समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पोंकी शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों॥

शब्दं दुर्मर्षणं श्रुत्वा निष्पपात ततो हरि:।

वेगेन च पदन्यासैर्दारयन्निव मेदिनीम्॥ ५॥

वह दु:सह शब्द सुनकर वाली अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको विदीर्ण-सी करता हुआ बड़े वेगसे निकला॥ ५॥

तं तु तारा परिष्वज्य स्नेहाद् दर्शितसौहृदा।

उवाच त्रस्तसम्भ्रान्ता हितोदर्कमिदं वच:॥ ६॥

उस समय वालीकी पत्नी तारा भयभीत हो घबरा उठी। उसने वालीको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया और स्नेहसे सौहार्दका परिचय देते हुए परिणाममें हित करनेवाली यह बात कही—॥ ६॥

साधु क्रोधमिमं वीर नदीवेगमिवागतम्।

शयनादुत्थित: काल्यं त्यज भुक्तामिव स्रजम्॥ ७॥

‘वीर! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदीके वेगकी भाँति इस बढ़े हुए क्रोधको त्याग दीजिये। जैसे प्रात:काल शय्यासे उठा हुआ पुरुष रातको उपभोगमें लायी गयी पुष्पमालाका त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोधका परित्याग कीजिये॥ ७॥

काल्यमेतेन संग्रामं करिष्यसि च वानर।

वीर ते शत्रुबाहुल्यं फल्गुता वा न विद्यते॥ ८॥

सहसा तव निष्क्रामो मम तावन्न रोचते।

श्रूयतामभिधास्यामि यन्निमित्तं निवार्यते॥ ९॥

‘वानरवीर! कल प्रात:काल सुग्रीवके साथ युद्ध कीजियेगा (इस समय रुक जाइये) यद्यपि युद्धमें कोई शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसीसे छोटे नहीं हैं। तथापि इस समय सहसा आपका घरसे बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकनेका एक विशेष कारण भी है। उसे बताती हूँ, सुनिये॥ ८-९॥

पूर्वमापतित: क्रोधात् स त्वामाह्वयते युधि।

निष्पत्य च निरस्तस्ते हन्यमानो दिशो गत:॥ १०॥

‘सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्धके लिये ललकारा था। उस समय आपने नगरसे निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागते हुए मतङ्ग वनमें चले गये थे॥ १०॥

त्वया तस्य निरस्तस्य पीडितस्य विशेषत:।

इहैत्य पुनराह्वानं शङ्कां जनयतीव मे॥ ११॥

‘इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होनेपर भी वे पुन: यहाँ आकर आपको युद्धके लिये ललकार रहे हैं। उनका यह पुनरागमन मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है॥ ११॥

दर्पश्च व्यवसायश्च यादृशस्तस्य नर्दत:।

निनादस्य च संरम्भो नैतदल्पं हि कारणम्॥ १२॥

‘इस समय गर्जते हुए सुग्रीवका दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जनामें जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये॥ १२॥

नासहायमहं मन्ये सुग्रीवं तमिहागतम्।

अवष्टब्धसहायश्च यमाश्रित्यैष गर्जति॥ १३॥

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायकके बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं। किसी सबल सहायकको साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बलपर ये इस तरह गरज रहे हैं॥ १३॥

प्रकृत्या निपुणश्चैव बुद्धिमांश्चैव वानर:।

नापरीक्षितवीर्येण सुग्रीव: सख्यमेष्यति॥ १४॥

‘वानर सुग्रीव स्वभावसे ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं। वे किसी ऐसे पुरुषके साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रमको अच्छी तरह परख न लिया हो॥ १४॥

पूर्वमेव मया वीर श्रुतं कथयतो वच:।

अङ्गदस्य कुमारस्य वक्ष्याम्यद्य हितं वच:॥ १५॥

‘वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गदके मुँहसे यह बात सुन ली है। इसलिये आज मैं आपके हितकी बात बताती हूँ॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं वनान्तमुपनिर्गत:।

प्रवृत्तिस्तेन कथिता चारैरासीन्निवेदिता॥ १६॥

‘एक दिन कुमार अङ्गद वनमें गये थे। वहाँ गुप्तचरोंने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था॥ १६॥

अयोध्याधिपते: पुत्रौ शूरौ समरदुर्जयौ।

इक्ष्वाकूणां कुले जातौ प्रथितौ रामलक्ष्मणौ॥ १७॥

‘वह समाचार इस प्रकार है—अयोध्यानरेशके दो शूर-वीर पुत्र, जिन्हें युद्धमें जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मणके नामसे प्रसिद्ध हैं, यहाँ वनमें आये हुए हैं॥ १७॥

सुग्रीवप्रियकामार्थं प्राप्तौ तत्र दुरासदौ।

स ते भ्रातुर्हि विख्यात: सहायो रणकर्मणि॥ १८॥

राम: परबलामर्दी युगान्ताग्निरिवोत्थित:।

निवासवृक्ष: साधूनामापन्नानां परा गति:॥ १९॥

‘वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये उनके पास पहुँच गये हैं। उन दोनोंमेंसे जो आपके भाईके युद्ध-कर्ममें सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेनाका संहार करनेवाले तथा प्रलयकालमें प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी हैं। वे साधु पुरुषोंके आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके लिये सबसे बड़ा सहारा हैं॥ १८-१९॥

आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम्।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो निदेशे निरत: पितु:॥ २०॥

‘आर्त पुरुषोंके आश्रय, यशके एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा पिताकी आज्ञामें स्थित रहनेवाले हैं॥ २०॥

धातूनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान्।

तत् क्षमो न विरोधस्ते सह तेन महात्मना॥ २१॥

दुर्जयेनाप्रमेयेण रामेण रणकर्मसु।

‘जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओंकी खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणोंके बहुत बड़े भंडार हैं। अत: उन महात्मा रामके साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है। क्योंकि वे युद्धकी कलामें अपना सानी नहीं रखते हैं। उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥ २१/

शूर वक्ष्यामि ते किंचिन्न चेच्छाम्यभ्यसूयितुम्॥ २२॥

श्रूयतां क्रियतां चैव तव वक्ष्यामि यद्धितम्।

‘शूरवीर! मैं आपके गुणोंमें दोष देखना नहीं चाहती। अत: आपसे कुछ कहती हूँ। आपके लिये जो हितकर है, वही बता रही हूँ। आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये॥

यौवराज्येन सुग्रीवं तूर्णं साध्वभिषेचय॥ २३॥

विग्रहं मा कृथा वीर भ्रात्रा राजन् यवीयसा।

‘अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीवका शीघ्र ही युवराजके पदपर अभिषेक कर दीजिये। वीर वानरराज! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये॥

अहं हि ते क्षमं मन्ये तेन रामेण सौहृदम्॥ २४॥

सुग्रीवेण च सम्प्रीतिं वैरमुत्सृज्य दूरत:।

‘मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभावको दूर हटाकर श्रीरामके साथ सौहार्द और सुग्रीवके साथ प्रेमका सम्बन्ध स्थापित कीजिये॥ २४/

लालनीयो हि ते भ्राता यवीयानेष वानर:॥ २५॥

तत्र वा सन्निहस्थो वा सर्वथा बन्धुरेव ते।

नहि तेन समं बन्धुं भुवि पश्यामि कंचन॥ २६॥

‘वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं। अत: आपका लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं। वे ऋष्यमूकपर रहें या किष्किन्धामें—सर्वथा आपके बन्धु ही हैं। मैं इस भूतलपर उनके समान बन्धु और किसीको नहीं देखती हूँ॥

दानमानादिसत्कारै: कुरुष्व प्रत्यनन्तरम्।

वैरमेतत् समुत्सृज्य तव पार्श्वे स तिष्ठतु॥ २७॥

‘आप दान-मान आदि सत्कारोंके द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभावको छोड़कर आपके पास रह सकें॥ २७॥

सुग्रीवो विपुलग्रीवो महाबन्धुर्मतस्तव।

भ्रातृसौहृदमालम्ब्य नान्या गतिरिहास्ति ते॥ २८॥

‘पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है। इस समय भ्रातृप्रेमका सहारा लेनेके सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है॥ २८॥

यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि चावैषि मां हिताम्।

याच्यमान: प्रियत्वेन साधु वाक्यं कुरुष्व मे॥ २९॥

‘यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये॥ २९॥

प्रसीद पथ्यं शृणु जल्पितं हि मे

न रोषमेवानुविधातुमर्हसि।

क्षमो हि ते कोशलराजसूनुना

न विग्रह: शक्रसमानतेजसा॥ ३०॥

‘स्वामिन्! आप प्रसन्न होइये। मैं आपके हितकी बात कहती हूँ। आप इसे ध्यान देकर सुनिये। केवल रोषका ही अनुसरण न कीजिये। कोसलराजकुमार श्रीराम इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है’॥

तदा हि तारा हितमेव वाक्यं

तं वालिनं पथ्यमिदं बभाषे।

न रोचते तद् वचनं हि तस्य

कालाभिपन्नस्य विनाशकाले॥ ३१॥

उस समय ताराने वालीसे उसके हितकी ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी। किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची। क्योंकि उसके विनाशका समय निकट था और वह कालके पाशमें बँध चुका था॥ ३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चदश: सर्ग:॥ १५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥

 

षोडश: सर्ग:

वालीका ताराको डाँटकर लौटाना और सुग्रीवसे जूझना तथाश्रीरामके बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर गिरना

तामेवं ब्रुवतीं तारां ताराधिपनिभाननाम्।

वाली निर्भर्त्सयामास वचनं चेदमब्रवीत्॥ १॥

तारापति चन्द्रमाके समान मुखवाली ताराको ऐसी बातें करती देख वालीने उसे फटकारा और इस प्रकार कहा—

गर्जतोऽस्य सुसंरब्धं भ्रातु: शत्रोर्विशेषत:।

मर्षयिष्यामि केनापि कारणेन वरानने॥ २॥

‘वरानने! इस गर्जते हुए भाईकी, जो विशेषत: मेरा शत्रु है, यह उत्तेजनापूर्ण चेष्टा मैं किस कारणसे सहन करूँगा॥ २॥

अधर्षितानां शूराणां समरेष्वनिवर्तिनाम्।

धर्षणामर्षणं भीरु मरणादतिरिच्यते॥ ३॥

‘भीरु! जो कभी परास्त नहीं हुए और जिन्होंने युद्धके अवसरोंपर कभी पीठ नहीं दिखायी, उन शूरवीरोंके लिये शत्रुकी ललकार सह लेना मृत्युसे भी बढ़कर दु:खदायी होता है॥ ३॥

सोढुं न च समर्थोऽहं युद्धकामस्य संयुगे।

सुग्रीवस्य च संरम्भं हीनग्रीवस्य गर्जितम्॥ ४॥

‘यह हीन ग्रीवावाला सुग्रीव संग्रामभूमिमें मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखता है। मैं इसके रोषावेश और गर्जन-तर्जनको सहन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ४॥

न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते।

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति॥ ५॥

‘श्रीरामचन्द्रजीकी बात सोचकर भी तुम्हें मेरे लिये विषाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि वे धर्मके ज्ञाता तथा कर्तव्याकर्तव्यको समझनेवाले हैं। अत: पाप कैसे करेंगे॥

निवर्तस्व सह स्त्रीभि: कथं भूयोऽनुगच्छसि।

सौहृदं दर्शितं तावन्मयि भक्तिस्त्वया कृता॥ ६॥

प्रतियोत्स्याम्यहं गत्वा सुग्रीवं जहि सम्भ्रमम्।

दर्पं चास्य विनेष्यामि न च प्राणैर्वियोक्ष्यते॥ ७॥

‘तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ। क्यों मेरे पीछे बार-बार आ रही हो। तुमने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया। भक्तिका भी परिचय दे दिया। अब जाओ, घबराहट छोड़ो। मैं आगे बढ़कर सुग्रीवका सामना करूँगा। उसके घमण्डको चूर-चूर कर डालूँगा। किंतु प्राण नहीं लूँगा॥ ६-७॥

अहं ह्याजिस्थितस्यास्य करिष्यामि यदीप्सितम्।

वृक्षैर्मुष्टिप्रहारैश्च पीडित: प्रतियास्यति॥ ८॥

‘युद्धके मैदानमें खड़े हुए सुग्रीवकी जो-जो इच्छा है, उसे मैं पूर्ण करूँगा। वृक्षों और मुक्कोंकी मारसे पीड़ित होकर वह स्वयं ही भाग जायगा॥ ८॥

न मे गर्वितमायस्तं सहिष्यति दुरात्मवान्।

कृतं तारे सहायत्वं दर्शितं सौहृदं मयि॥ ९॥

‘तारे! दुरात्मा सुग्रीव मेरे युद्धविषयक दर्प और आयास (उद्योग) को नहीं सह सकेगा। तुमने मेरी बौद्धिक सहायता अच्छी तरह कर दी और मेरे प्रति अपना सौहार्द भी दिखा दिया॥ ९॥

शापितासि मम प्राणैर्निवर्तस्व जनेन च।

अलं जित्वा निवर्तिष्ये तमहं भ्रातरं रणे॥ १०॥

‘अब मैं प्राणोंकी सौगन्ध दिलाकर कहता हूँ कि अब तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ। अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं युद्धमें अपने उस भाईको जीतकर लौट आऊँगा’॥ १०॥

तं तु तारा परिष्वज्य वालिनं प्रियवादिनी।

चकार रुदती मन्दं दक्षिणा सा प्रदक्षिणम्॥ ११॥

यह सुनकर अत्यन्त उदार स्वभाववाली ताराने वालीका आलिङ्गन करके मन्द स्वरमें रोते-रोते उसकी परिक्रमा की॥ ११॥

तत: स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी।

अन्त:पुरं सह स्त्रीभि: प्रविष्टा शोकमोहिता॥ १२॥

वह पतिकी विजय चाहती थी और उसे मन्त्रका भी ज्ञान था। इसलिये उसने वालीकी मङ्गल-कामनासे स्वस्तिवाचन किया और शोकसे मोहित हो वह अन्य स्त्रियोंके साथ अन्त:पुरको चली गयी॥ १२॥

प्रविष्टायां तु तारायां सह स्त्रीभि: स्वमालयम्।

नगर्या निर्ययौ क्रुद्धो महासर्प इव श्वसन्॥ १३॥

स्त्रियोंसहित ताराके अपने महलमें चले जानेपर वाली क्रोधसे भरे हुए महान् सर्पकी भाँति लम्बी साँस खींचता हुआ नगरसे बाहर निकला॥ १३॥

स नि:श्वस्य महारोषो वाली परमवेगवान्।

सर्वतश्चारयन् दृष्टिं शत्रुदर्शनकांक्षया॥ १४॥

महान् रोषसे युक्त और अत्यन्त वेगशाली वाली लम्बी साँस छोड़कर शत्रुको देखनेकी इच्छासे चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाने लगा॥ १४॥

स ददर्श तत: श्रीमान् सुग्रीवं हेमपिङ्गलम्।

सुसंवीतमवष्टब्धं दीप्यमानमिवानलम्॥ १५॥

इतनेहीमें श्रीमान् वालीने सुवर्णके समान पिङ्गल वर्णवाले सुग्रीवको देखा, जो लँगोट बाँधकर युद्धके लिये डटकर खड़े थे और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ १५॥

तं स दृष्ट्वा महाबाहु: सुग्रीवं पर्यवस्थितम्।

गाढं परिदधे वासो वाली परमकोपन:॥ १६॥

सुग्रीवको खड़ा देख महाबाहु वाली अत्यन्त कुपित हो उठा। उसने अपना लँगोट भी दृढ़ताके साथ बाँध लिया॥

स वाली गाढसंवीतो मुष्टिमुद्यम्य वीर्यवान्।

सुग्रीवमेवाभिमुखो ययौ योद्धुं कृतक्षण:॥ १७॥

लँगोटको मजबूतीके साथ कसकर पराक्रमी वाली प्रहारका अवसर देखता हुआ मुक्का तानकर सुग्रीवकी ओर चला॥ १७॥

श्लिष्टं मुष्टिं समुद्यम्य संरब्धतरमागत:।

सुग्रीवोऽपि समुद्दिश्य वालिनं हेममालिनम्॥ १८॥

सुग्रीव भी सुवर्णमालाधारी वालीके उद्देश्यसे बँधा हुआ मुक्का ताने बड़े आवेशके साथ उसकी ओर बढ़े॥

तं वाली क्रोधताम्राक्ष: सुग्रीवं रणकोविदम्।

आपतन्तं महावेगमिदं वचनमब्रवीत्॥ १९॥

युद्धकलाके पण्डित महावेगशाली सुग्रीवको अपनी ओर आते देख वालीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और वह इस प्रकार बोला—॥ १९॥

एष मुष्टिर्महान् बद्धो गाढ: सुनियताङ्गुलि:।

मया वेगविमुक्तस्ते प्राणानादाय यास्यति॥ २०॥

‘सुग्रीव! देख ले। यह बड़ा भारी मुक्का खूब कसकर बँधा हुआ है। इसमें सारी अङ्गुलियाँ सुनियन्त्रितरूपसे परस्पर सटी हुई हैं। मेरे द्वारा वेगपूर्वक चलाया हुआ यह मुक्का तेरे प्राण लेकर ही जायगा’॥ २०॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीव: क्रुद्धो वालिनमब्रवीत्।

तव चैष हरन् प्राणान् मुष्टि: पततु मूर्धनि॥ २१॥

वालीके ऐसा कहनेपर सुग्रीव क्रोधपूर्वक उससे बोले—‘मेरा यह मुक्का भी तेरे प्राण लेनेके लिये तेरे मस्तकपर गिरे’॥ २१॥

ताडितस्तेन तं क्रुद्ध: समभिक्रम्य वेगत:।

अभवच्छोणितोद्गारी सापीड इव पर्वत:॥ २२॥

इतनेहीमें वालीने वेगपूर्वक आक्रमण करके सुग्रीवपर मुक्केका प्रहार किया। उस चोटसे घायल एवं कुपित हुए सुग्रीव झरनोंसे युक्त पर्वतकी भाँति मुँहसे रक्त वमन करने लगे॥ २२॥

सुग्रीवेण तु नि:शङ्कं सालमुत्पाट्य तेजसा।

गात्रेष्वभिहतो वाली वज्रेणेव महागिरि:॥ २३॥

तत्पश्चात् सुग्रीवने भी नि:शङ्क होकर बलपूर्वक एक सालवृक्षको उखाड़ लिया और उसे वालीके शरीरपर दे मारा, मानो इन्द्रने किसी विशाल पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो॥ २३॥

स तु वृक्षेण निर्भग्न: सालताडनविह्वल:।

गुरुभारभराक्रान्ता नौ: ससार्थेव सागरे॥ २४॥

उस वृक्षकी चोटसे वालीके शरीरमें घाव हो गया। उस आघातसे विह्वल हुआ वाली व्यापारियोंके समूहके चढ़नेसे भारी भारके द्वारा दबकर समुद्रमें डगमगाती हुई नौकाके समान काँपने लगा॥ २४॥

तौ भीमबलविक्रान्तौ सुपर्णसमवेगितौ।

प्रवृद्धौ घोरवपुषौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे॥ २५॥

उन दोनों भाइयोंका बल और पराक्रम भयंकर था। दोनोंके ही वेग गरुड़के समान थे। वे दोनों भयंकर रूप धारण करके बड़े जोरसे जूझ रहे थे और पूर्णिमाके आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यके समान दिखायी देते थे॥

परस्परममित्रघ्नौ छिद्रान्वेषणतत्परौ।

ततोऽवर्धत वाली तु बलवीर्यसमन्वित:॥ २६॥

सूर्यपुत्रो महावीर्य: सुग्रीव: परिहीयत।

वे शत्रुसूदन वीर अपने विपक्षीको मार डालनेकी इच्छासे एक-दूसरेकी दुर्बलता ढूँढ़ रहे थे; परंतु उस युद्धमें बल-विक्रमसम्पन्न वाली बढ़ने लगा और महापराक्रमी सूर्यपुत्र सुग्रीवकी शक्ति क्षीण होने लगी॥

वालिना भग्नदर्पस्तु सुग्रीवो मन्दविक्रम:॥ २७॥

वालिनं प्रति सामर्षो दर्शयामास राघवम्।

वालीने सुग्रीवका घमण्ड चूर्ण कर दिया। उनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा। तब वालीके प्रति अमर्षमें भरे हुए सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको अपनी अवस्थाका लक्ष्य कराया॥ २७/

वृक्षै: सशाखै: शिखरैर्वज्रकोटिनिभैर्नखै:॥ २८॥

मुष्टिभिर्जानुभि: पद्भिर्बाहुभिश्च पुन: पुन:।

तयोर्युद्धमभूद्घोरं वृत्रवासवयोरिव॥ २९॥

इसके बाद डालियोंसहित वृक्षों, पर्वतके शिखरों, वज्रके समान भयंकर नखों, मुक्कों, घुटनों, लातों और हाथोंकी मारसे उन दोनोंमें इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति भयंकर संग्राम होने लगा॥ २९॥

तौ शोणिताक्तौ युध्येतां वानरौ वनचारिणौ।

मेघाविव महाशब्दैस्तर्जमानौ परस्परम्॥ ३०॥

वे दोनों वनचारी वानर लहूलुहान होकर लड़ रहे थे और दो बादलोंकी तरह अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए एक-दूसरेको डाँट रहे थे॥ ३०॥

हीयमानमथापश्यत् सुग्रीवं वानरेश्वरम्।

प्रेक्षमाणं दिशश्चैव राघव: स मुहुर्मुहु:॥ ३१॥

श्रीरघुनाथजीने देखा, वानरराज सुग्रीव कमजोर पड़ रहे हैं और बारंबार इधर-उधर दृष्टि दौड़ा रहे हैं॥ ३१॥

ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम्।

स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकांक्षया॥ ३२॥

वानरराजको पीड़ित देख महातेजस्वी श्रीरामने वालीके वधकी इच्छासे अपने बाणपर दृष्टिपात किया॥

ततो धनुषि संधाय शरमाशीविषोपमम्।

पूरयामास तच्चापं कालचक्रमिवान्तक:॥ ३३॥

उन्होंने अपने धनुषपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण रखा और उसे जोरसे खींचा, मानो यमराजने कालचक्र उठा लिया हो॥ ३३॥

तस्य ज्यातलघोषेण त्रस्ता: पत्ररथेश्वरा:।

प्रदुद्रुवुर्मृगाश्चैव युगान्त इव मोहिता:॥ ३४॥

उसकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारध्वनिसे भयभीत हो बड़े-बड़े पक्षी और मृग भाग खड़े हुए। वे प्रलयकालके समय मोहित हुए जीवोंके समान किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये॥ ३४॥

मुक्तस्तु वज्रनिर्घोष: प्रदीप्ताशनिसंनिभ:।

राघवेण महाबाणो वालिवक्षसि पातित:॥ ३५॥

श्रीरघुनाथजीने वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट और प्रज्वलित अशनिकी भाँति प्रकाश पैदा करनेवाला वह महान् बाण छोड़ दिया तथा उसके द्वारा वालीके वक्ष:स्थलपर चोट पहुँचायी॥ ३५॥

ततस्तेन महातेजा वीर्ययुक्त: कपीश्वर:।

वेगेनाभिहतो वाली निपपात महीतले॥ ३६॥

उस बाणसे वेगपूर्वक आहत हो महातेजस्वी पराक्रमी वानरराज वाली तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३६॥

इन्द्रध्वज इवोद्धूत: पौर्णमास्यां महीतले।

आश्वयुक्समये मासि गतश्रीको विचेतन:।

बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली चार्तस्वर: शनै:॥ ३७॥

आश्विनकी पूर्णिमाके दिन इन्द्रध्वजोत्सवके अन्तमें ऊपर फेंका गया इन्द्रध्वज जैसे पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार वाली ग्रीष्मऋतुके अन्तमें श्रीहीन, अचेत और आँसुओंसे गद्गदकण्ठ हो धराशायी हो गया और धीरे-धीरे आर्तनाद करने लगा॥ ३७॥

नरोत्तम: कालयुगान्तकोपमं

शरोत्तमं काञ्चनरूप्यभूषितम्।

ससर्ज दीप्तं तममित्रमर्दनं

सधूममग्निं मुखतो यथा हर:॥ ३८॥

श्रीरामका वह उत्तम बाण युगान्तकालके समान भयंकर तथा सोने-चाँदीसे विभूषित था। पूर्वकालमें महादेवजीने जैसे अपने मुखसे (मुख-मण्डलके अन्तर्गत ललाटवर्ती नेत्रसे) शत्रुभूत कामदेवका नाश करनेके लिये धूमयुक्त अग्निकी सृष्टि की थी, उसी प्रकार पुरुषोत्तम श्रीरामने सुग्रीवशत्रु वालीका मर्दन करनेके लिये उस प्रज्वलित बाणको छोड़ा था॥ ३८॥

अथोक्षित: शोणिततोयविस्रवै:

सुपुष्पिताशोक इवानिलोद्धत:।

विचेतनो वासवसूनुराहवे

प्रभ्रंशितेन्द्रध्वजवत् क्षितिं गत:॥ ३९॥

इन्द्रकुमार वालीके शरीरसे पानीके समान रक्तकी धारा बहने लगी। वह उससे नहा गया और अचेत हो वायुके उखाड़े हुए पुष्पित अशोकवृक्ष एवं आकाशसे नीचे गिरे हुए इन्द्रध्वजके समान समराङ्गणमें पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षोडश: सर्ग:॥ १६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६॥

 

सप्तदश: सर्ग:

वालीका श्रीरामचन्द्रजीको फटकारना

तत: शरेणाभिहतो रामेण रणकर्कश:।

पपात सहसा वाली निकृत्त इव पादप:॥ १॥

युद्धमें कठोरता दिखानेवाला वाली श्रीरामके बाणसे घायल हो कटे वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥

स भूमौ न्यस्तसर्वाङ्गस्तप्तकाञ्चनभूषण:।

अपतद् देवराजस्य मुक्तरश्मिरिव ध्वज:॥ २॥

उसका सारा शरीर पृथ्वीपर पड़ा हुआ था। तपाये हुए सुवर्णके आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह देवराज इन्द्रके बन्धनरहित ध्वजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा था॥ २॥

अस्मिन् निपतिते भूमौ हर्यृक्षाणां गणेश्वरे।

नष्टचन्द्रमिव व्योम न व्यराजत मेदिनी॥ ३॥

वानरों और भालुओंके यूथपति वालीके धराशायी हो जानेपर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी॥ ३॥

भूमौ निपतितस्यापि तस्य देहं महात्मन:।

न श्रीर्जहाति न प्राणा न तेजो न पराक्रम:॥ ४॥

पृथ्वीपर पड़े होनेपर भी महामना वालीके शरीरको शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे॥ ४॥

शक्रदत्ता वरा माला काञ्चनी रत्नभूषिता।

दधार हरिमुख्यस्य प्राणांस्तेज: श्रियं च सा॥ ५॥

इन्द्रकी दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराजके प्राण, तेज और शोभाको धारण किये हुए थी॥

स तया मालया वीरो हैमया हरियूथप:।

संध्यानुगतपर्यन्त: पयोधर इवाभवत्॥ ६॥

उस सुवर्णमालासे विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्याकी लालीसे रँगे हुए प्रान्त भागवाले मेघखण्डके समान शोभा पा रहा था॥ ६॥

तस्य माला च देहश्च मर्मघाती च य: शर:।

त्रिधेव रचिता लक्ष्मी: पतितस्यापि शोभते॥ ७॥

पृथ्वीपर गिरे होनेपर भी वालीकी वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाला वह बाण—ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन भागोंमें विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मीके समान शोभा पा रहे थे॥ ७॥

तदस्त्रं तस्य वीरस्य स्वर्गमार्गप्रभावनम्।

रामबाणासनक्षिप्तमावहत् परमां गतिम्॥ ८॥

वीरवर श्रीरामके धनुषसे चलाये गये उस अस्त्रने वालीके लिये स्वर्गका मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपदको पहुँचा दिया॥ ८॥

तं तथा पतितं संख्ये गतार्चिषमिवानलम्।

ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकादिह च्युतम्॥ ९ ॥

आदित्यमिव कालेन युगान्ते भुवि पातितम्।

महेन्द्रमिव दुर्धर्षमुपेन्द्रमिव दु:सहम्॥ १०॥

महेन्द्रपुत्रं पतितं वालिनं हेममालिनम्।

व्यूढोरस्कं महाबाहुं दीप्तास्यं हरिलोचनम्॥ ११॥

इस प्रकार युद्धस्थलमें गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वालारहित अग्निके समान, पुण्योंका क्षय होनेपर पुण्यलोकसे इस पृथ्वीपर गिरे हुए राजा ययातिके समान तथा महाप्रलयके समय कालद्वारा पृथ्वीपर गिराये गये सूर्यके समान जान पड़ता था। उसके गलेमें सोनेकी माला शोभा दे रही थी। वह महेन्द्रके समान दुर्जय और भगवान् विष्णुके समान दुस्सह था। उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्णके थे॥ ९—११॥

लक्ष्मणानुचरो रामो ददर्शोपससर्प च।

तं तथा पतितं वीरं गतार्चिषमिवानलम्॥ १२॥

बहुमान्य च तं वीरं वीक्षमाणं शनैरिव।

उपयातौ महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १३॥

लक्ष्मणको साथ लिये श्रीरामने वालीको इस अवस्थामें देखा और वे उसके समीप गये। इस प्रकार ज्वालारहित अग्निकी भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे-धीरे देख रहा था। महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीरका विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये॥ १२-१३॥

तं दृष्ट्वा राघवं वाली लक्ष्मणं च महाबलम्।

अब्रवीत् परुषं वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्॥ १४॥

उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको देखकर वाली धर्म और विनयसे युक्त कठोर वाणीमें बोला—॥ १४॥

स भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतन:।

अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम्॥ १५॥

अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रामें ही रह गये थे। वह बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उसने युद्धमें गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करनेवाले गर्वीले श्रीरामसे कठोर वाणीमें इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १५॥

त्वं नराधिपते: पुत्र: प्रथित: प्रियदर्शन:।

पराङ्मुखवधं कृत्वा कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुण:।

यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गत:॥ १६॥

रघुनन्दन! आप राजा दशरथके सुविख्यात पुत्र हैं। आपका दर्शन सबको प्रिय है। मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था। मैं तो दूसरेके साथ युद्धमें उलझा हुआ था। उस दशामें आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है—किस महान् यशका उपार्जन किया है? क्योंकि मैं युद्धके लिये दूसरेपर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ॥ १६॥

कुलीन: सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रत:।

राम: करुणवेदी च प्रजानां च हिते रत:॥ १७॥

सानुक्रोशो महोत्साह: समयज्ञो दृढव्रत:।

इत्येतत् सर्वभूतानि कथयन्ति यशो भुवि॥ १८॥

इस भूतलपर सब प्राणी आपके यशका वर्णन करते हुए कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले, करुणाका अनुभव करनेवाले, प्रजाके हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचारके ज्ञाता और दृढ़प्रतिज्ञ हैं॥ १७-१८॥

दम: शम: क्षमा धर्मो धृति: सत्यं पराक्रम:।

पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ १९॥

‘राजन्! इन्द्रियनिग्रह, मनका संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियोंको दण्ड देना—ये राजाके गुण हैं॥ १९॥

तान् गुणान् सम्प्रधार्याहमग्र्यं चाभिजनं तव।

तारया प्रतिषिद्ध: सन् सुग्रीवेण समागत:॥ २०॥

‘मैं आपमें इन सभी सद्गुणोंका विश्वास करके आपके उत्तम कुलको यादकर ताराके मना करनेपर भी सुग्रीवके साथ लड़ने आ गया॥ २०॥

न मामन्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि।

इति मे बुद्धिरुत्पन्ना बभूवादर्शने तव॥ २१॥

जबतक मैंने आपको नहीं देखा था, तबतक मेरे मनमें यही विचार उठता था कि दूसरेके साथ रोषपूर्वक जूझते हुए मुझको आप असावधान अवस्थामें अपने बाणसे बेधना उचित नहीं समझेंगे॥ २१॥

स त्वां विनिहतात्मानं धर्मध्वजमधार्मिकम्।

जाने पापसमाचारं तृणै: कूपमिवावृतम्॥ २२॥

‘परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप धर्मध्वजी हैं। दिखावेके लिये धर्मका चोला पहने हुए हैं। वास्तवमें अधर्मी हैं। आपका आचार-व्यवहार पापपूर्ण है। आप घास-फूससे ढके हुए कूपके समान धोखा देनेवाले हैं॥ २२॥

सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम्।

नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम्॥ २३॥

‘आपने साधु पुरुषोंका-सा वेश धारण कर रखा है; परंतु हैं पापी। राखसे ढकी हुई आगके समान आपका असली रूप साधु-वेषमें छिप गया है। मैं नहीं जानता था कि आपने लोगोंको छलनेके लिये ही धर्मकी आड़ ली है॥ २३॥

विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम्।

न च त्वामवजानेऽहं कस्मात् तं हंस्यकिल्बिषम्॥ २४॥

‘जब मैं आपके राज्य या नगरमें कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराधको क्यों मारा?॥ २४॥

फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम्।

मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम्॥ २५॥

‘मैं सदा फल-मूलका भोजन करनेवाला और वनमें ही विचरनेवाला वानर हूँ। मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरेके साथ मेरी लड़ाई हो रही थी। फिर बिना अपराधके आपने मुझे क्यों मारा?॥ २५॥

त्वं नराधिपते: पुत्र: प्रतीत: प्रियदर्शन:।

लिङ्गमप्यस्ति ते राजन् दृश्यते धर्मसंहितम्॥ २६॥

‘राजन्! आप एक सम्माननीय नरेशके पुत्र हैं। विश्वासके योग्य हैं और देखनेमें भी प्रिय हैं। आपमें धर्मका साधनभूत चिह्न (जटा) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है॥ २६॥

क: क्षत्रियकुले जात: श्रुतवान् नष्टसंशय:।

धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्न: क्रूरं कर्म समाचरेत्॥ २७॥

‘क्षत्रियकुलमें उत्पन्न शास्त्रका ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषासे आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है॥ २७॥

त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुत:।

अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे॥ २८॥

‘महाराज! रघुके कुलमें आपका प्रादुर्भाव हुआ है। आप धर्मात्माके रूपमें प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपरसे भव्य (विनीत एवं दयालु) साधु पुरुषका-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते-फिरते हैं?॥ २८॥

साम दानं क्षमा धर्म: सत्यं धृतिपराक्रमौ।

पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥ २९॥

‘राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियोंको दण्ड देना—ये भूपालोंके गुण हैं॥ २९॥

वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिन:।

एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर॥ ३०॥

‘नरेश्वर राम! हम फल-मूल खानेवाले वनचारी मृग हैं। यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष (मनुष्य) हैं (अत: हमारे और आपमें वैरका कोई कारण नहीं है)॥ ३०॥

भूमिर्हिरण्यं रूपं च विग्रहे कारणानि च।

तत्र कस्ते वने लोभो मदीयेषु फलेषु वा॥ ३१॥

‘पृथ्वी, सोना और चाँदी—इन्हीं वस्तुओंके लिये राजाओंमें परस्पर युद्ध होते हैं। ये ही तीन कलहके मूल कारण हैं। परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं। इस दिशामें इस वनमें या हमारे फलोंमें आपका क्या लोभ हो सकता है॥ ३१॥

नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि।

राजवृत्तिरसंकीर्णा न नृपा: कामवृत्तय:॥ ३२॥

‘नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह—ये राजधर्म हैं, किंतु इनके उपयोगके भिन्न-भिन्न अवसर हैं (इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं है)। राजाओंको स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये॥ ३२॥

त्वं तु कामप्रधानश्च कोपनश्चानवस्थित:।

राजवृत्तेषु संकीर्ण: शरासनपरायण:॥ ३३॥

‘परंतु आप तो कामके गुलाम, क्रोधी और मर्यादामें स्थित न रहनेवाले—चञ्चल हैं। नय-विनय आदि जो राजाओंके धर्म हैं, उनके अवसरका विचार किये बिना ही किसीका कहीं भी प्रयोग कर देते हैं। जहाँ कहीं भी बाण चलाते-फिरते हैं॥ ३३॥

न तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता।

इन्द्रियै: कामवृत्त: सन् कृष्यसे मनुजेश्वर॥ ३४॥

‘आपका धर्मके विषयमें आदर नहीं है और न अर्थसाधनमें ही आपकी बुद्धि स्थिर है। नरेश्वर! आप स्वेच्छाचारी हैं। इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं॥ ३४॥

हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम्।

किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम्॥ ३५॥

‘काकुत्स्थ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ मुझे बाणसे मारनेका घृणित कर्म करके सत्पुरुषोंके बीचमें आप क्या कहेंगे॥ ३५॥

राजहा ब्रह्महा गोघ्नश्चोर: प्राणिवधे रत:।

नास्तिक: परिवेत्ता च सर्वे निरयगामिन:॥ ३६॥

‘राजाका वध करनेवाला, ब्रह्म-हत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, नास्तिक और परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते अपना विवाह करनेवाला छोटा भाई) ये सब-के-सब नरकगामी होते हैं॥ ३६॥

सूचकश्च कदर्यश्च मित्रघ्नो गुरुतल्पग:।

लोकं पापात्मनामेते गच्छन्ते नात्र संशय:॥ ३७॥

‘चुगली खानेवाला, लोभी, मित्र-हत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी—ये पापात्माओंके लोकमें जाते हैं—इसमें संशय नहीं है॥ ३७॥

अधार्यं चर्म मे सद्भी रोमाण्यस्थि च वर्जितम्।

अभक्ष्याणि च मांसानि त्वद्विधैर्धर्मचारिभि:॥ ३८॥

‘हम वानरोंका चमड़ा भी तो सत्पुरुषोंके धारण करने-योग्य नहीं होता। हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं (छूने-योग्य नहीं हैं। आप-जैसे धर्माचारी पुरुषोंके लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभसे आपने मुझ वानरको अपने बाणोंका शिकार बनाया है?)॥ ३८॥

पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव।

शल्यक: श्वाविधो गोधा शश: कूर्मश्च पञ्चम:॥ ३९॥

‘रघुनन्दन! त्रैवर्णिकोंमें जिनकी किसी कारणसे मांसाहार (जैसे निन्दनीय कर्म) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नखवाले जीवोंमेंसे पाँच ही भक्षणके योग्य बताये गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ॥ ३९॥

चर्म चास्थि च मे राम न स्पृशन्ति मनीषिण:।

अभक्ष्याणि च मांसानि सोऽहं पञ्चनखो हत:॥ ४०॥

‘श्रीराम! मनीषी पुरुष मेरे (वानरके) चमड़े और हड्डीका स्पर्श नहीं करते हैं। वानरके मांस भी सभीके लिये अभक्ष्य होते हैं। इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नखवाला मैं आज आपके हाथसे मारा गया हूँ॥ ४०॥

तारया वाक्यमुक्तोऽहं सत्यं सर्वज्ञया हितम्।

तदतिक्रम्य मोहेन कालस्य वशमागत:॥ ४१॥

‘मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है। उसने मुझे सत्य और हितकी बात बतायी थी। किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं कालके अधीन हो गया॥ ४१॥

त्वया नाथेन काकुत्स्थ न सनाथा वसुंधरा।

प्रमदा शीलसम्पूर्णा पत्येव च विधर्मणा॥ ४२॥

‘काकुत्स्थ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पतिसे सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप-जैसे स्वामीको पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती॥ ४२॥

शठो नैकृतिक: क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानस:।

कथं दशरथेन त्वं जात: पापो महात्मना॥ ४३॥

‘आप शठ (छिपे रहकर दूसरोंका अप्रिय करनेवाले), अपकारी, क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने रहनेवाले हैं। महात्मा राजा दशरथने आप-जैसे पापीको कैसे उत्पन्न किया॥ ४३॥

छिन्नचारित्र्यकक्ष्येण सतां धर्मातिवर्तिना।

त्यक्तधर्माङ्कुशेनाहं निहतो रामहस्तिना॥ ४४॥

‘हाय! जिसने सदाचारका रस्सा तोड़ डाला है, सत्पुरुषोंके धर्म एवं मर्यादाका उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कुशकी भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथीके द्वारा आज मैं मारा गया॥ ४४॥

अशुभं चाप्ययुक्तं च सतां चैव विगर्हितम्।

वक्ष्यसे चेदृशं कृत्वा सद्भि: सह समागत:॥ ४५॥

‘ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषोंसे मिलनेपर उनके सामने क्या कहेंगे॥ ४५॥

उदासीनेषु योऽस्मासु विक्रमोऽयं प्रकाशित:।

अपकारिषु ते राम नैवं पश्यामि विक्रमम्॥ ४६॥

‘श्रीराम! हम उदासीन प्राणियोंपर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल-पराक्रम आप अपना अपकार करनेवालोंपर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता॥ ४६॥

दृश्यमानस्तु युध्येथा मया युधि नृपात्मज।

अद्य वैवस्वतं देवं पश्येस्त्वं निहतो मया॥ ४७॥

‘राजकुमार! यदि आप युद्धस्थलमें मेरी दृष्टिके सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवताका दर्शन करते होते॥ ४७॥

त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासद:।

प्रसुप्त: पन्नगेनैव नर: पापवशं गत:॥ ४८॥

‘जैसे किसी सोये हुए पुरुषको साँप आकर डँस ले और वह मर जाय उसी प्रकार रणभूमिमें मुझ दुर्जय वीरको आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पापके भागी हुए हैं॥ ४८॥

सुग्रीवप्रियकामेन यदहं निहतस्त्वया।

मामेव यदि पूर्वं त्वमेतदर्थमचोदय:।

मैथिलीमहमेकाह्ना तव चानीतवान् भवे:॥ ४९॥

‘जिस उद्देश्यको लेकर सुग्रीवका प्रिय करनेकी कामनासे आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकीको एक ही दिनमें ढूँढ़कर आपके पास ला देता॥ ४९॥

राक्षसं च दुरात्मानं तव भार्यापहारिणम्।

कण्ठे बद‍्ध्वा प्रदद्यां तेऽनिहतं रावणं रणे॥ ५०॥

‘आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावणको मैं युद्धमें मारे बिना ही उसके गलेमें रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता॥

न्यस्तां सागरतोये वा पाताले वापि मैथिलीम्।

आनयेयं तवादेशाच्छ्वेतामश्वतरीमिव॥ ५१॥

‘जैसे मधुकैटभद्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुतिका भगवान् हयग्रीवने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेशसे मिथिलेशकुमारी सीताको यदि वे समुद्रके जलमें या पातालमें रखी गयी होती तो भी वहाँसे ला देता॥ ५१॥

युक्तं यत्प्राप्नुयाद् राज्यं सुग्रीव: स्वर्गते मयि।

अयुक्तं यदधर्मेण त्वयाहं निहतो रणे॥ ५२॥

‘मेरे स्वर्गवासी हो जानेपर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है। अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारा है॥ ५२॥

काममेवंविधो लोक: कालेन विनियुज्यते।

क्षमं चेद्भवता प्राप्तमुत्तरं साधु चिन्त्यताम्॥ ५३॥

‘यह जगत् कभी-न-कभी कालके अधीन होता ही है। इसका ऐसा स्वभाव ही है। अत: भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, इसके लिये मुझे खेद नहीं है। परंतु मेरे इस तरह मारे जानेका यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच-विचारकर कहिये’॥ ५३॥

इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्र:

शराभिघाताद् व्यथितो महात्मा।

समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं

तूष्णीं बभौ वानरराजसूनु:॥ ५४॥

ऐसा कहकर महामनस्वी वानरराजकुमार वाली सूर्यके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर चुप हो गया। उसका मुँह सूख गया था और बाणके आघातसे उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तदश: सर्ग:॥ १७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १७॥

 

अष्टादश: सर्ग:

श्रीरामका वालीकी बातका उत्तर देते हुए उसे दिये गये दण्डका औचित्य बताना, वालीका निरुत्तर होकर भगवान्से अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए अङ्गदकीरक्षाके लिये प्रार्थना करना और श्रीरामका उसे आश्वासन देना

इत्युक्त: प्रश्रितं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम्।

परुषं वालिना रामो निहतेन विचेतसा॥ १॥

तं निष्प्रभमिवादित्यं मुक्ततोयमिवाम्बुदम्।

उक्तवाक्यं हरिश्रेष्ठमुपशान्तमिवानलम्॥ २॥

धर्मार्थगुणसम्पन्नं हरीश्वरमनुत्तमम्।

अधिक्षिप्तस्तदा राम: पश्चाद् वालिनमब्रवीत्॥ ३॥

वहाँ मारे जाकर अचेत हुए वालीने जब इस प्रकार विनयाभास, धर्माभास, अर्थाभास और हिताभाससे युक्त कठोर बातें कहीं, आक्षेप किया, तब उन बातोंको कहकर मौन हुए वानरश्रेष्ठ वालीसे श्रीरामचन्द्रजीने धर्म, अर्थ और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त परम उत्तम बात कही। उस समय वाली प्रभाहीन सूर्य, जलहीन बादल और बुझी हुई आगके समान श्रीहीन प्रतीत होता था॥ १—३॥

धर्ममर्थं च कामं च समयं चापि लौकिकम्।

अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे॥ ४॥

(श्रीराम बोले—) ‘वानर! धर्म, अर्थ, काम और लौकिक सदाचारको तो तुम स्वयं ही नहीं जानते हो। फिर बालोचित अविवेकके कारण आज यहाँ मेरी निन्दा क्यों करते हो?॥ ४॥

अपृष्ट्वा बुद्धिसम्पन्नान् वृद्धानाचार्यसम्मतान्।

सौम्य वानरचापल्यात् त्वं मां वक्तुमिहेच्छसि॥ ५॥

‘सौम्य! तुम आचार्योंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् वृद्ध पुरुषोंसे पूछे बिना ही—उनसे धर्मके स्वरूपको ठीक-ठीक समझे बिना ही वानरोचित चपलतावश मुझे यहाँ उपदेश देना चाहते हो? अथवा मुझपर आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हो॥ ५॥

इक्ष्वाकूणामियं भूमि: सशैलवनकानना।

मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि॥ ६॥

‘पर्वत, वन और काननोंसे युक्त यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी है; अत: वे यहाँके पशु-पक्षी और मनुष्योंपर दया करने और उन्हें दण्ड देनेके भी अधिकारी हैं॥ ६॥

तां पालयति धर्मात्मा भरत: सत्यवानृजु:।

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रत:॥ ७॥

‘धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वीका पालन करते हैं। वे सत्यवादी, सरल तथा धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अत: दुष्टोंके निग्रह तथा साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रह करनेमें तत्पर रहते हैं॥ ७॥

नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम्।

विक्रमश्च यथा दृष्ट: स राजा देशकालवित्॥ ८॥

‘जिसमें नीति, विनय, सत्य और पराक्रम आदि सभी राजोचित गुण यथावत्-रूपसे स्थित देखे जायँ, वही देश-काल-तत्त्वको जाननेवाला राजा होता है (भरतमें ये सभी गुण विद्यमान हैं)॥ ८॥

तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवा:।

चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छव:॥ ९॥

‘भरतकी ओरसे हमें तथा दूसरे राजाओंको यह आदेश प्राप्त है कि जगत्में धर्मके पालन और प्रसारके लिये यत्न किया जाय। इसलिये हमलोग धर्मका प्रचार करनेकी इच्छासे सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं॥ ९॥

तस्मिन् नृपतिशार्दूले भरते धर्मवत्सले।

पालयत्यखिलां पृथ्वीं कश्चरेद् धर्मविप्रियम्॥ १०॥

‘राजाओंमें श्रेष्ठ भरत धर्मपर अनुराग रखनेवाले हैं। वे समूची पृथ्वीका पालन कर रहे हैं। उनके रहते हुए इस पृथ्वीपर कौन प्राणी धर्मके विरुद्ध आचरण कर सकता है?॥ १०॥

ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिता:।

भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि॥ ११॥

‘हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर भरतकी आज्ञाको सामने रखते हुए धर्ममार्गसे भ्रष्ट पुरुषको विधिपूर्वक दण्ड देते हैं॥ ११॥

त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हित:।

कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि॥ १२॥

‘तुमने अपने जीवनमें कामको ही प्रधानता दे रखी थी। राजोचित मार्गपर तुम कभी स्थिर नहीं रहे। तुमने सदा ही धर्मको बाधा पहुँचायी और बुरे कर्मोंके कारण सत्पुरुषोंद्वारा सदा तुम्हारी निन्दा की गयी॥ १२॥

ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति।

त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिन:॥ १३॥

‘बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु—ये तीनों धर्ममार्गपर स्थित रहनेवाले पुरुषोंके लिये पिताके तुल्य माननीय हैं, ऐसा समझना चाहिये॥ १३॥

यवीयानात्मन: पुत्र: शिष्यश्चापि गुणोदित:।

पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम्॥ १४॥

‘इसी प्रकार छोटा भाई, पुत्र और गुणवान् शिष्य—ये तीन पुत्रके तुल्य समझे जाने योग्य हैं। उनके प्रति ऐसा भाव रखनेमें धर्म ही कारण है॥ १४॥

सूक्ष्म: परमदुर्ज्ञेय: सतां धर्म: प्लवङ्गम।

हृदिस्थ: सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम्॥ १५॥

‘वानर! सज्जनोंका धर्म सूक्ष्म होता है, वह परम दुर्ज्ञेय है—उसे समझना अत्यन्त कठिन है। समस्त प्राणियोंके अन्त:करणमें विराजमान जो परमात्मा हैं, वे ही सबके शुभ और अशुभको जानते हैं॥ १५॥

चपलश्चपलै: सार्धं वानरैरकृतात्मभि:।

जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम्॥ १६॥

‘तुम स्वयं भी चपल हो और चञ्चल चित्तवाले अजितात्मा वानरोंके साथ रहते हो; अत: जैसे कोई जन्मान्ध पुरुष जन्मान्धोंसे ही रास्ता पूछे, उसी प्रकार तुम उन चपल वानरोंके साथ परामर्श करते हो, फिर तुम धर्मका विचार क्या कर सकते हो?—उसके स्वरूपको कैसे समझ सकते हो?॥ १६॥

अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते।

नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि॥ १७॥

‘मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, उसका अभिप्राय तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। तुम्हें केवल रोषवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ १७॥

तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हत:।

भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्॥ १८॥

‘मैंने तुम्हें क्यों मारा है? उसका कारण सुनो और समझो। तुम सनातन धर्मका त्याग करके अपने छोटे भाईकी स्त्रीसे सहवास करते हो॥ १८॥

अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मन:।

रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत्॥ १९॥

‘इस महामना सुग्रीवके जीते-जी इसकी पत्नी रुमाका, जो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है, कामवश उपभोग करते हो। अत: पापाचारी हो॥ १९॥

तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर।

भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादित:॥ २०॥

‘वानर! इस तरह तुम धर्मसे भ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी हो गये हो और अपने भाईकी स्त्रीको गले लगाते हो। तुम्हारे इसी अपराधके कारण तुम्हें यह दण्ड दिया गया है॥

नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुष:।

दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप॥ २१॥

‘वानरराज! जो लोकाचारसे भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने या राहपर लानेके लिये मैं दण्डके सिवा और कोई उपाय नहीं देखता॥ २१॥

न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद्गत:।

औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य य:॥ २२॥

प्रचरेत नर: कामात् तस्य दण्डो वध: स्मृत:।

‘मैं उत्तम कुलमें उत्पन्न क्षत्रिय हूँ; अत: मैं तुम्हारे पापको क्षमा नहीं कर सकता। जो पुरुष अपनी कन्या, बहिन अथवा छोटे भाईकी स्त्रीके पास काम-बुद्धिसे जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है॥ २२/

भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिन:॥ २३॥

त्वं च धर्मादतिक्रान्त: कथं शक्यमुपेक्षितुम्।

‘हमारे राजा भरत हैं। हमलोग तो केवल उनके आदेशका पालन करनेवाले हैं। तुम धर्मसे गिर गये हो; अत: तुम्हारी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी॥ २३/

गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्॥ २४॥

भरत: कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थित:।

‘विद्वान् राजा भरत महान् धर्मसे भ्रष्ट हुए पुरुषको दण्ड देते और धर्मात्मा पुरुषका धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषोंके निग्रहमें तत्पर रहते हैं॥

वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर।

त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिता:॥ २५॥

‘हरीश्वर! हमलोग तो भरतकी आज्ञाको ही प्रमाण मानकर धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारे-जैसे लोगोंको दण्ड देनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं॥ २५॥

सुग्रीवेण च मे सख्यं लक्ष्मणेन यथा तथा।

दारराज्यनिमित्तं च नि:श्रेयस्कर: स मे॥ २६॥

प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसंनिधौ।

प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम्॥ २७॥

सुग्रीवके साथ मेरी मित्रता हो चुकी है। उनके प्रति मेरा वही भाव है, जो लक्ष्मणके प्रति है। वे अपनी स्त्री और राज्यकी प्राप्तिके लिये मेरी भलाई करनेके लिये भी कटिबद्ध हैं। मैंने वानरोंके समीप इन्हें स्त्री और राज्य दिलानेके लिये प्रतिज्ञा भी कर ली है। ऐसी दशामें मेरे-जैसा मनुष्य अपनी प्रतिज्ञाकी ओरसे कैसे दृष्टि हटा सकता है॥ २६-२७॥

तदेभि: कारणै: सर्वैर्महद्भिर्धर्मसंश्रितै:।

शासनं तव यद् युक्तं तद् भवाननुमन्यताम्॥ २८॥

ये सभी धर्मानुकूल महान् कारण एक साथ उपस्थित हो गये, जिनसे विवश होकर तुम्हें उचित दण्ड देना पड़ा है। तुम भी इसका अनुमोदन करो॥ २८॥

सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रह:।

वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता॥ २९॥

‘धर्मपर दृष्टि रखनेवाले मनुष्यके लिये मित्रका उपकार करना धर्म ही माना गया है; अत: तुम्हें जो यह दण्ड दिया गया है, वह धर्मके अनुकूल है। ऐसा ही तुम्हें समझना चाहिये॥ २९॥

शक्यं त्वयापि तत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता।

श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ।

गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया॥ ३०॥

‘यदि राजा होकर तुम धर्मका अनुसरण करते तो तुम्हें भी वही काम करना पड़ता, जो मैंने किया है। मनुने राजोचित सदाचारका प्रतिपादन करनेवाले दो श्लोक कहे हैं, जो स्मृतियोंमें सुने जाते हैं और जिन्हें धर्मपालनमें कुशल पुरुषोंने सादर स्वीकार किया। उन्हींके अनुसार इस समय यह मेरा बर्ताव हुआ है (वे श्लोक इस प्रकार हैं—)॥ ३०॥

राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवा:।

निर्मला: स्वर्गमायान्ति सन्त: सुकृतिनो यथा॥ ३१॥

शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेन: पापात् प्रमुच्यते।

राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम्॥ ३२॥

‘मनुष्य पाप करके यदि राजाके दिये हुए दण्डको भोग लेते हैं तो वे शुद्ध होकर पुण्यात्मा साधु पुरुषोंकी भाँति स्वर्गलोकमें जाते हैं। (चोर आदि पापी जब राजाके सामने उपस्थित हों उस समय उन्हें) राजा दण्ड दे अथवा दया करके छोड़ दे। चोर आदि पापी पुरुष अपने पापसे मुक्त हो जाता है; किंतु यदि राजा पापीको उचित दण्ड नहीं देता तो उसे स्वयं उसके पापका फल भोगना पड़ता है122

आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम्।

श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया॥ ३३॥

‘तुमने जैसा पाप किया है, वैसा ही पाप प्राचीन कालमें एक श्रमणने किया था। उसे मेरे पूर्वज महाराज मान्धाताने बड़ा कठोर दण्ड दिया था, जो शास्त्रके अनुसार अभीष्ट था॥ ३३॥

अन्यैरपि कृतं पापं प्रमत्तैर्वसुधाधिपै:।

प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रज:॥ ३४॥

‘यदि राजा दण्ड देनेमें प्रमाद कर जायँ तो उन्हें दूसरोंके किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं तथा उसके लिये जब वे प्रायश्चित्त करते हैं तभी उनका दोष शान्त होता है॥ ३४॥

तदलं परितापेन धर्मत: परिकल्पित:।

वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिता:॥ ३५॥

‘अत: वानरश्रेष्ठ! पश्चात्ताप करनेसे कोई लाभ नहीं है। सर्वथा धर्मके अनुसार ही तुम्हारा वध किया गया है; क्योंकि हमलोग अपने वशमें नहीं हैं (शास्त्रके ही अधीन हैं)॥ ३५॥

शृणु चाप्यपरं भूय: कारणं हरिपुंगव।

तच्छ्रुत्वा हि महद् वीर न मन्युं कर्तुमर्हसि॥ ३६॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारे वधका जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लो। वीर! उस महान् कारणको सुनकर तुम्हें मेरे प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये॥ ३६॥

न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव।

वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नरा:॥ ३७॥

प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान्।

प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्रब्धानतिविष्ठितान्॥ ३८॥

‘वानरश्रेष्ठ! इस कार्यके लिये मेरे मनमें न तो संताप होता है और न खेद ही। मनुष्य (राजा आदि) बड़े-बड़े जाल बिछाकर फंदे फैलाकर और नाना प्रकारके कूट उपाय (गुप्त गड्ढोंके निर्माण आदि) करके छिपे रहकर सामने आकर बहुत-से मृगोंको पकड़ लेते हैं; भले ही वे भयभीत होकर भागते हों या विश्वस्त होकर अत्यन्त निकट बैठे हों॥ ३८॥

प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम्।

विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते॥ ३९॥

‘मांसाहारी मनुष्य (क्षत्रिय) सावधान, असावधान अथवा विमुख होकर भागनेवाले पशुओंको भी अत्यन्त घायल कर देते हैं; किंतु उनके लिये इस मृगयामें दोष नहीं होता॥ ३९॥

यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदा:।

तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर।

अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि॥ ४०॥

‘वानर! धर्मज्ञ राजर्षि भी इस जगत्में मृगयाके लिये जाते हैं और विविध जन्तुओंका वध करते हैं। इसलिये मैंने तुम्हें युद्धमें अपने बाणका निशाना बनाया है। तुम मुझसे युद्ध करते थे या नहीं करते थे, तुम्हारी वध्यतामें कोई अन्तर नहीं आता; क्योंकि तुम शाखामृग हो (और मृगया करनेका क्षत्रियको अधिकार है)॥ ४०॥

दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च।

राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशय:॥ ४१॥

‘वानरश्रेष्ठ! राजालोग दुर्लभ धर्म, जीवन और लौकिक अभ्युदयके देनेवाले होते हैं; इसमें संशय नहीं है॥ ४१॥

तान् न हिंस्यान्न चाक्रोशेन्नाक्षिपेन्नाप्रियं वदेत्।

देवा मानुषरूपेण चरन्त्येते महीतले॥ ४२॥

‘अत: उनकी हिंसा न करे, उनकी निन्दा न करे, उनके प्रति आक्षेप भी न करे और न उनसे अप्रिय वचन ही बोले; क्योंकि वे वास्तवमें देवता हैं, जो मनुष्यरूपसे इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं॥ ४२॥

त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थित:।

विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम्॥ ४३॥

‘तुम तो धर्मके स्वरूपको न समझकर केवल रोषके वशीभूत हो गये हो, इसलिये पिता-पितामहोंके धर्मपर स्थित रहनेवाले मेरी निन्दा कर रहे हो’॥ ४३॥

एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम्।

न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चय:॥ ४४॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर वालीके मनमें बड़ी व्यथा हुई। इसे धर्मके तत्त्वका निश्चय हो गया। उसने श्रीरामचन्द्रजीके दोषका चिन्तन त्याग दिया॥ ४४॥

प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वर:।

यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशय:॥ ४५॥

इसके बाद वानरराज वालीने श्रीरामचन्द्रजीसे हाथ जोड़कर कहा—‘नरश्रेष्ठ! आप जो कुछ कहते हैं, बिलकुल ठीक है; इसमें संशय नहीं है॥ ४५॥

प्रतिवक्तुं प्रकृष्टे हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात्।

यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम्॥ ४६॥

तत्रापि खलु मे दोषं कर्तुं नार्हसि राघव।

त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञ: प्रजानां च हिते रत:।

कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया॥ ४७॥

‘आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुषको मुझ-जैसा निम्न श्रेणीका प्राणी उचित उत्तर नहीं दे सकता; अत: मैंने प्रमादवश पहले जो अनुचित बात कह डाली है, उसमें भी आपको मेरा अपराध नहीं मानना चाहिये। रघुनन्दन! आप परमार्थतत्त्वके यथार्थ ज्ञाता और प्रजाजनोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। आपकी बुद्धि कार्य-कारणके निश्चयमें निर्भ्रान्त एवं निर्मल है॥

मामप्यवगतं धर्माद् व्यतिक्रान्तपुरस्कृतम्।

धर्मसंहितया वाचा धर्मज्ञ परिपालय॥ ४८॥

‘धर्मज्ञ! मैं धर्मभ्रष्ट प्राणियोंमें अग्रगण्य हूँ और इसी रूपमें मेरी सर्वत्र प्रसिद्धि है तो भी आज आपकी शरणमें आया हूँ। अपनी धर्मतत्त्वकी वाणीसे आज मेरी भी रक्षा कीजिये’॥ ४८॥

बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली सार्तरव: शनै:।

उवाच रामं सम्प्रेक्ष्य पङ्कलग्न इव द्विप:॥ ४९॥

इतना कहते-कहते आँसुओंसे वालीका गला भर आया और वह कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह आर्तनाद करके श्रीरामकी ओर देखता हुआ धीरे-धीरे बोला॥ ४९॥

न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान्।

यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम्॥ ५०॥

‘भगवन्! मुझे अपने लिये, ताराके लिये तथा बन्धु-बान्धवोंके लिये भी उतना शोक नहीं होता है, जितना सुवर्णका अङ्गद धारण करनेवाले श्रेष्ठ गुणसम्पन्न पुत्र अङ्गदके लिये हो रहा है॥ ५०॥

स ममादर्शनाद् दीनो बाल्यात् प्रभृति लालित:।

तटाक इव पीताम्बुरुपशोषं गमिष्यति॥ ५१॥

‘मैंने बचपनसे ही उसका बड़ा दुलार किया है; अब मुझे न देखकर वह बहुत दु:खी होगा और जिसका जल पी लिया गया हो, उस तालाबकी तरह सूख जायगा॥

बालश्चाकृतबुद्धिश्च एकपुत्रश्च मे प्रिय:।

तारेयो राम भवता रक्षणीयो महाबल:॥ ५२॥

‘श्रीराम! वह अभी बालक है। उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है। मेरा इकलौता बेटा होनेके कारण ताराकुमार अङ्गद मुझे बड़ा प्रिय है। आप मेरे उस महाबली पुत्रकी रक्षा कीजियेगा॥ ५२॥

सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम्।

त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थित:॥ ५३॥

‘सुग्रीव और अङ्गद दोनोंके प्रति आप सद्भाव रखें। अब आप ही इन लोगोंके रक्षक तथा इन्हें कर्तव्य-अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाले हैं॥ ५३॥

या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या।

सुग्रीवे चाङ्गदे राजंस्तां चिन्तयितुमर्हसि॥ ५४॥

‘राजन्! नरेश्वर! भरत और लक्ष्मणके प्रति आपका जैसा बर्ताव है, वही सुग्रीव तथा अङ्गदके प्रति भी होना चाहिये। आप उसी भावसे इन दोनोंका स्मरण करें॥ ५४॥

मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम्।

सुग्रीवो नावमन्येत तथावस्थातुमर्हसि॥ ५५॥

‘बेचारी ताराकी बड़ी शोचनीय अवस्था हो गयी है। मेरे ही अपराधसे उसे भी अपराधिनी समझकर सुग्रीव उसका तिरस्कार न करे, इस बातकी भी व्यवस्था कीजियेगा॥

त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम्।

त्वद्वशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना॥ ५६॥

शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम्।

‘सुग्रीव आपका कृपापात्र होकर ही इस राज्यका यथार्थ रूपसे पालन कर सकता है। आपके अधीन होकर आपके चित्तका अनुसरण करनेवाला पुरुष स्वर्ग और पृथ्वीका भी राज्य पा सकता और उसका अच्छी तरह पालन कर सकता है॥ ५६/

त्वत्तोऽहं वधमाकांक्षन् वार्यमाणोऽपि तारया॥ ५७॥

सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागत:।

‘मैं चाहता था कि आपके हाथसे मेरा वध हो; इसीलिये ताराके मना करनेपर भी मैं अपने भाई सुग्रीवके साथ द्वन्द्वयुद्ध करनेके लिये चला आया’॥ ५७/

इत्युक्त्वा वानरो रामं विरराम हरीश्वर:॥ ५८॥

स तमाश्वासयद् रामो वालिनं व्यक्तदर्शनम्।

साधुसम्मतया वाचा धर्मतत्त्वार्थयुक्तया॥ ५९॥

न संतापस्त्वया कार्य एतदर्थं प्लवङ्गम।

न वयं भवता चिन्त्या नाप्यात्मा हरिसत्तम।

वयं भवद्विशेषेण धर्मत: कृतनिश्चया:॥ ६०॥

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर वानरराज वाली चुप हो गया। उस समय उसकी ज्ञानशक्तिका विकास हो गया था। श्रीरामचन्द्रजीने धर्मके यथार्थ स्वरूपको प्रकट करनेवाली साधु पुरुषोंद्वारा प्रशंसित वाणीमें उससे कहा—‘वानरश्रेष्ठ! तुम्हें इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये। कपिप्रवर! तुम्हें हमारे और अपने लिये भी चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हमलोग तुम्हारी अपेक्षा विशेषज्ञ हैं, इसलिये हमने धर्मानुकूल कार्य करनेका ही निश्चय कर रखा है॥

दण्ड्ये य: पातयेद् दण्डं दण्ड्यो यश्चापि दण्ड्यते।

कार्यकारणसिद्धार्थावुभौ तौ नावसीदत:॥ ६१॥

‘जो दण्डनीय पुरुषको दण्ड देता है तथा जो दण्डका अधिकारी होकर दण्ड भोगता है, उनमेंसे दण्डनीय व्यक्ति अपने अपराधके फलरूपमें शासकका दिया हुआ दण्ड भोगकर तथा दण्ड देनेवाला शासक उसके उस फलभोगमें कारण—निमित्त बनकर कृतार्थ हो जाते हैं—अपना-अपना कर्तव्य पूरा कर लेनेके कारण कर्मरूप ऋणसे मुक्त हो जाते हैं। अत: वे दु:खी नहीं होते॥ ६१॥

तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद् विगतकल्मष:।

गत: स्वां प्रकृतिं धर्म्यां दण्डदिष्टेन वर्त्मना॥ ६२॥

‘तुम इस दण्डको पाकर पापरहित हुए और इस दण्डका विधान करनेवाले शास्त्रद्वारा कथित दण्डग्रहणरूप मार्गसे ही चलकर तुम्हें धर्मानुकूल शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी॥ ६२॥

त्यज शोकं च मोहं च भयं च हृदये स्थितम्।

त्वया विधानं हर्यग्र्य न शक्यमतिवर्तितुम्॥ ६३॥

‘अब तुम अपने हृदयमें स्थित शोक, मोह और भयका त्याग कर दो। वानरश्रेष्ठ! तुम दैवके विधानको नहीं लाँघ सकते॥ ६३॥

यथा त्वय्यङ्गदो नित्यं वर्तते वानरेश्वर।

तथा वर्तेत सुग्रीवे मयि चापि न संशय:॥ ६४॥

‘वानरेश्वर! कुमार अङ्गद तुम्हारे जीवित रहनेपर जैसा था, उसी प्रकार सुग्रीवके और मेरे पास भी सुखसे रहेगा, इसमें संशय नहीं है’॥ ६४॥

स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मन:

समाहितं धर्मपथानुवर्तितम्।

निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो

वच: सुयुक्तं निजगाद वानर:॥ ६५॥

युद्धमें शत्रुका मानमर्दन करनेवाले महात्मा श्रीरामचन्द्रजीका धर्ममार्गके अनुकूल और मानसिक शङ्काओंका समाधान करनेवाला मधुर वचन सुनकर वानर वालीने यह सुन्दर युक्तियुक्त वचन कहा—॥ ६५॥

शराभितप्तेन विचेतसा मया

प्रभाषितस्त्वं यदजानता विभो।

इदं महेन्द्रोपमभीमविक्रम

प्रसादितस्त्वं क्षम मे नरेश्वर॥ ६६॥

‘प्रभो! देवराज इन्द्रके समान भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेश्वर! मैं आपके बाणसे पीड़ित होनेके कारण अचेत हो गया था। इसलिये अनजानमें मैंने जो आपके प्रति कठोर बात कह डाली है, उसे आप क्षमा कीजियेगा। इसके लिये मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ’॥ ६६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टादश: सर्ग:॥ १८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८॥

 


एकोनविंश: सर्ग:

अङ्गदसहित ताराका भागे हुए वानरोंसे बात करके वालीकेसमीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना

स वानरमहाराज: शयान: शरपीडित:।

प्रत्युक्तो हेतुमद्वाक्यैर्नोत्तरं प्रत्यपद्यत॥ १॥

वानरोंका महाराज वाली बाणसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ा था। श्रीरामचन्द्रजीके युक्तियुक्त वचनोंद्वारा अपनी बातका उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा॥ १॥

अश्मभि: परिभिन्नाङ्ग: पादपैराहतो भृशम्।

रामबाणेन चाक्रान्तो जीवितान्ते मुमोह स:॥ २॥

पत्थरोंकी मार पड़नेसे उसके अङ्ग टूट-फूट गये थे। वृक्षोंके आघातसे भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीरामके बाणसे आक्रान्त होकर तो वह जीवनके अन्तकालमें ही पहुँच गया था। उस समय वह मूर्च्छित हो गया॥ २॥

तं भार्या बाणमोक्षेण रामदत्तेन संयुगे।

हतं प्लवगशार्दूलं तारा शुश्राव वालिनम्॥ ३॥

उसकी पत्नी ताराने सुना कि युद्धस्थलमें वानरश्रेष्ठ वाली श्रीरामके चलाये हुए बाणसे मारे गये॥ ३॥

सा सपुत्राप्रियं श्रुत्वा वधं भर्तु: सुदारुणम्।

निष्पपात भृशं तस्मादुद्विग्ना गिरिकन्दरात्॥ ४॥

अपने स्वामीके वधका अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गदको साथ ले उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली॥ ४॥

ये त्वङ्गदपरीवारा वानरा हि महाबला:।

ते सकार्मुकमालोक्य रामं त्रस्ता: प्रदुद्रुवु:॥ ५॥

अङ्गदको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करनेवाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजीको धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले॥ ५॥

सा ददर्श ततस्त्रस्तान् हरीनापततो द्रुतम्।

यूथादेव परिभ्रष्टान् मृगान् निहतयूथपान्॥ ६॥

ताराने वेगसे भागकर आते हुए उन भयभीत वानरोंको देखा। वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगोंके समान जान पड़ते थे॥ ६॥

तानुवाच समासाद्य दु:खितान् दु:खिता सती।

रामवित्रासितान् सर्वाननुबद्धानिवेषुभि:॥ ७॥

वे सब वानर श्रीरामसे इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों। उन दु:खी वानरोंके पास पहुँचकर सती-साध्वी तारा और भी दु:खी हो गयी तथा उनसे इस प्रकार बोली—॥ ७॥

वानरा राजसिंहस्य यस्य यूयं पुर:सरा:।

तं विहाय सुवित्रस्ता: कस्माद् द्रवत दुर्गता:॥ ८॥

‘वानरो! तुम तो उन राजसिंह वालीके आगे-आगे चलनेवाले थे। अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गतिमें पड़कर क्यों भागे जा रहे हो?॥ ८॥

राज्यहेतो: स चेद् भ्राता भ्रात्रा क्रूरेण पातित:।

रामेण प्रहितैर्दूरान्मार्गणैर्दूरपातिभि:॥ ९॥

‘यदि राज्यके लोभसे उस क्रूर भाई सुग्रीवने श्रीरामको प्रेरित करके उनके द्वारा दूरसे चलाये हुए और दूरतक जानेवाले बाणोंद्वारा अपने भाईको मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो?’॥ ९॥

कपिपत्न्या वच: श्रुत्वा कपय: कामरूपिण:।

प्राप्तकालमविश्लिष्टमूचुर्वचनमङ्गनाम् ॥ १०॥

वालीकी पत्नीका वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरोंने कल्याणमयी तारा देवीको सम्बोधित करके सर्वसम्मतिसे स्पष्ट शब्दोंमें यह समयोचित बात कही—॥ १०॥

जीवपुत्रे निवर्तस्व पुत्रं रक्षस्व चाङ्गदम्।

अन्तको रामरूपेण हत्वा नयति वालिनम्॥ ११॥

‘देवि! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है। तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गदकी रक्षा करो। श्रीरामका रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वालीको मारकर अपने साथ ले जा रहा है॥ ११॥

क्षिप्तान् वृक्षान् समाविध्य विपुलाश्च तथा शिला:।

वाली वज्रसमैर्बाणैर्वज्रेणेव निपातित:॥ १२॥

‘वालीके चलाये हुए वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओंको अपने वज्रतुल्य बाणोंसे विदीर्ण करके श्रीरामने वालीको मार गिराया है। मानो वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके द्वारा किसी महान् पर्वतको धराशायी कर दिया हो॥ १२॥

अभिभूतमिदं सर्वं विद्रुतं वानरं बलम्।

अस्मिन् प्लवगशार्दूले हते शक्रसमप्रभे॥ १३॥

‘इन्द्रके समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेपर यह सारी वानर-सेना श्रीरामसे पराजित-सी होकर भाग खड़ी हुई है॥ १३॥

रक्ष्यतां नगरी शूरैरङ्गदश्चाभिषिच्यताम्।

पदस्थं वालिन: पुत्रं भजिष्यन्ति प्लवंगमा:॥ १४॥

‘तुम शूरवीरोंद्वारा इस नगरीकी रक्षा करो। कुमार अङ्गदका किष्किन्धाके राज्यपर अभिषेक कर दो। राजसिंहासनपर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गदकी सभी वानर सेवा करेंगे॥ १४॥

अथवारुचितं स्थानमिह ते रुचिरानने।

आविशन्ति च दुर्गाणि क्षिप्रमद्यैव वानरा:॥ १५॥

अभार्या: सहभार्याश्च सन्त्यत्र वनचारिण:।

लुब्धेभ्यो विप्रलब्धेभ्यस्तेभ्यो न: सुमहद्भयम्॥ १६॥

‘अथवा सुमुखि! अब इस नगरमें तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धाके दुर्गम स्थानोंमें अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे। यहाँ बहुत-से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमेंसे कुछ तो अपनी स्त्रियोंके साथ हैं और कुछ स्त्रियोंसे बिछुड़े हुए हैं। उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगोंके द्वारा राज्य-सुखसे वञ्चित किये गये हैं। अत: इस समय उन सबसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है’॥ १५-१६॥

अल्पान्तरगतानां तु श्रुत्वा वचनमङ्गना।

आत्मन: प्रतिरूपं सा बभाषे चारुहासिनी॥ १७॥

अभी थोड़ी ही दूरतक आये हुए उन वानरोंकी यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी ताराने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया—॥ १७॥

पुत्रेण मम किं कार्यं राज्येनापि किमात्मना।

कपिसिंहे महाभागे तस्मिन् भर्तरि नश्यति॥ १८॥

‘वानरो! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्रसे, राज्यसे तथा अपने इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है?॥ १८॥

पादमूलं गमिष्यामि तस्यैवाहं महात्मन:।

योऽसौ रामप्रयुक्तेन शरेण विनिपातित:॥ १९॥

‘मैं तो, जिन्हें श्रीरामके चलाये हुए बाणने मार गिराया है, उन महात्मा वालीके चरणोंके समीप ही जाऊँगी’॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव रुदती शोकमूर्च्छिता।

शिरश्चोरश्च बाहुभ्यां दु:खेन समभिघ्नती॥ २०॥

ऐसा कहकर शोकसे व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथोंसे दु:खपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोरसे दौड़ी॥ २०॥

सा व्रजन्ती ददर्शाथ पतिं निपतितं भुवि।

हन्तारं दानवेन्द्राणां समरेष्वनिवर्तिनाम्॥ २१॥

आगे बढ़ती हुई ताराने देखा, जो युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले दानवराजोंका भी वध करनेमें समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वीपर पड़े हुए हैं॥ २१॥

क्षेप्तारं पर्वतेन्द्राणां वज्राणामिव वासवम्।

महावातसमाविष्टं महामेघौघनि:स्वनम्॥ २२॥

शक्रतुल्यपराक्रान्तं वृष्ट्वेवोपरतं घनम्।

नर्दन्तं नर्दतां भीमं शूरं शूरेण पातितम्।

शार्दूलेनामिषस्यार्थे मृगराजमिवाहतम्॥ २३॥

वज्र चलानेवाले इन्द्रके समान जो रणभूमिमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उठाकर फेंकते थे, जिनके वेगमें प्रचण्ड आँधीका समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादलके समान चेष्टासे विरत हो गये हैं। जो स्वयं गर्जना करके गर्जनेवाले वीरोंके मनमें भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीरके द्वारा मार गिराये गये हैं। जैसे मांसके लिये एक सिंहने दूसरे सिंहको मार डाला हो, उसी प्रकार राज्यके लिये अपने भाईके द्वारा ही इनका वध किया गया है॥ २२-२३॥

अर्चितं सर्वलोकस्य सपताकं सवेदिकम्।

नागहेतो: सुपर्णेन चैत्यमुन्मथितं यथा॥ २४॥

जो सब लोगोंके द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवताकी वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालयको वहाँ छिपे हुए किसी नागको पकड़नेके लिये यदि गरुड़ने मथ डाला हो—नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है, वैसी ही दशा आज वालीकी हो रही है (यह सब ताराने देखा)॥

अवष्टभ्यावतिष्ठन्तं ददर्श धनुरूर्जितम्।

रामं रामानुजं चैव भर्तुश्चैव तथानुजम्॥ २५॥

आगे जानेपर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुषको धरतीपर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं। साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पतिके छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं॥ २५॥

तानतीत्य समासाद्य भर्तारं निहतं रणे।

समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सम्भ्रान्ता निपपात ह॥ २६॥

उन सबको पार करके वह रणभूमिमें घायल पड़े हुए अपने पतिके पास पहुँची। उन्हें देखकर उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ २६॥

सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति वादिनी।

रुरोद सा पतिं दृष्ट्वा संवीतं मृत्युदामभि:॥ २७॥

फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ‘हा आर्यपुत्र!’ कहकर मृत्युपाशसे बँधे हुए पतिकी ओर देखती हुई रोने लगी॥ २७॥

तामवेक्ष्य तु सुग्रीव: क्रोशन्तीं कुररीमिव।

विषादमगमत् कष्टं दृष्ट्वा चाङ्गदमागतम्॥ २८॥

उस समय कुररीके समान करुण क्रन्दन करती हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गदको देखकर सुग्रीवको बड़ा कष्ट हुआ। वे विषादमें डूब गये॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनविंश: सर्ग:॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥

 

विंश: सर्ग:

ताराका विलाप

रामचापविसृष्टेन शरेणान्तकरेण तम्।

दृष्ट्वा विनिहतं भूमौ तारा ताराधिपानना॥ १॥

सा समासाद्य भर्तारं पर्यष्वजत भामिनी।

इषुणाभिहतं दृष्ट्वा वालिनं कुञ्जरोपमम्॥ २॥

वानरं पर्वतेन्द्राभं शोकसंतप्तमानसा।

तारा तरुमिवोन्मूलं पर्यदेवयतातुरा॥ ३॥

चन्द्रमुखी ताराने देखा, मेरे स्वामी वानरराज वाली श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए प्राणान्तकारी बाणसे घायल होकर धरतीपर पड़े हैं, उस अवस्थामें उनके पास पहुँचकर वह भामिनी उनके शरीरसे लिपट गयी। जो अपने शरीरसे गजराज और गिरिराजको भी मात करते थे, उन्हीं वानरराजको बाणसे आहत होकर जड़से उखड़े हुए वृक्षकी भाँति धराशायी हुआ देख ताराका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा और वह आतुर होकर विलाप करने लगी—॥ १—३॥

रणे दारुणविक्रान्त प्रवीर प्लवतां वर।

किमिदानीं पुरोभागामद्य त्वं नाभिभाषसे॥ ४॥

‘रणमें भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले महान् वीर वानरराज! आज इस समय मुझे अपने सामने पाकर भी आप बोलते क्यों नहीं हैं?॥ ४॥

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल भजस्व शयनोत्तमम्।

नैवंविधा: शेरते हि भूमौ नृपतिसत्तमा:॥ ५॥

कपिश्रेष्ठ! उठिये और उत्तम शय्याका आश्रय लीजिये। आप-जैसे श्रेष्ठ भूपाल पृथ्वीपर नहीं सोते हैं॥ ५॥

अतीव खलु ते कान्ता वसुधा वसुधाधिप।

गतासुरपि तां गात्रैर्मां विहाय निषेवसे॥ ६॥

‘पृथ्वीनाथ! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको अत्यन्त प्यारी है, तभी तो निष्प्राण होनेपर भी आप आज मुझे छोड़कर अपने अङ्गोंसे इस वसुधाका ही आलिङ्गन किये सो रहे हैं॥

व्यक्तमद्य त्वया वीर धर्मत: सम्प्रवर्तता।

किष्किन्धेव पुरी रम्या स्वर्गमार्गे विनिर्मिता॥ ७॥

‘वीरवर! आपने धर्मयुक्त युद्ध करके स्वर्गके मार्गमें भी अवश्य ही किष्किन्धाकी भाँति कोई रमणीय पुरी बना ली है, यह बात आज स्पष्ट हो गयी (अन्यथा आप किष्किन्धाको छोड़कर यहाँ क्यों सोते)॥ ७॥

यान्यस्माभिस्त्वया सार्धं वनेषु मधुगन्धिषु।

विहृतानि त्वया काले तेषामुपरम: कृत:॥ ८॥

‘आपके साथ मधुर सुगन्धयुक्त वनोंमें हमने जो-जो विहार किये हैं, उन सबको इस समय आपने सदाके लिये समाप्त कर दिया॥ ८॥

निरानन्दा निराशाहं निमग्ना शोकसागरे।

त्वयि पञ्चत्वमापन्ने महायूथपयूथपे॥ ९॥

‘नाथ! आप बड़े-बड़े यूथपतियोंके भी स्वामी थे। आज आपके मारे जानेसे मेरा सारा आनन्द लुट गया। मैं सब प्रकारसे निराश होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हूँ॥

हृदयं सुस्थितं मह्यं दृष्ट्वा निपतितं भुवि।

यन्न शोकाभिसंतप्तं स्फुटतेऽद्य सहस्रधा॥ १०॥

‘निश्चय ही मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो आज आपको पृथ्वीपर पड़ा देखकर भी शोकसे संतप्त हो फट नहीं जाता—इसके हजारों टुकड़े नहीं हो जाते॥ १०॥

सुग्रीवस्य त्वया भार्या हृता स च विवासित:।

यत् तत् तस्य त्वया व्युष्टि: प्राप्तेयं प्लवगाधिप॥ ११॥

‘वानरराज! आपने जो सुग्रीवकी स्त्री छीन ली और उन्हें घरसे बाहर निकाल दिया, उसीका यह फल आपको प्राप्त हुआ है॥ ११॥

नि:श्रेयसपरा मोहात् त्वया चाहं विगर्हिता।

यैषाब्रुवं हितं वाक्यं वानरेन्द्र हितैषिणी॥ १२॥

‘वानरेन्द्र! मैं आपका हित चाहती थी और आपके कल्याण-साधनमें ही लगी रहती थी तो भी मैंने आपसे जो हितकर बात कही थी, उसे मोहवश आपने नहीं माना और उलटे मेरी ही निन्दा की॥ १२॥

रूपयौवनदृप्तानां दक्षिणानां च मानद।

नूनमप्सरसामार्य चित्तानि प्रमथिष्यसि॥ १३॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले आर्यपुत्र! निश्चय ही आप स्वर्गमें जाकर रूप और यौवनके अभिमानसे मत्त रहनेवाली केलिकलामें निपुण अप्सराओंके मनको अपने दिव्य सौन्दर्यसे मथ डालेंगे॥ १३॥

कालो नि:संशयो नूनं जीवितान्तकरस्तव।

बलाद् येनावपन्नोऽसि सुग्रीवस्यावशो वशम्॥ १४॥

‘निश्चय ही आज आपके जीवनका अन्त कर देनेवाला संशयरहित काल यहाँ आ पहुँचा था, जिसने किसीके भी वशमें न आनेवाले आपको बलपूर्वक सुग्रीवके वशमें डाल दिया’॥ १४॥

अस्थाने वालिनं हत्वा युध्यमानं परेण च।

न संतप्यति काकुत्स्थ: कृत्वा कर्मसुगर्हितम्॥ १५॥

(अब श्रीरामको सुनाकर बोली)—‘ककुत्स्थ-कुलमें अवतीर्ण हुए श्रीरामचन्द्रजीने दूसरेके साथ युद्ध करते हुए वालीको मारकर अत्यन्त निन्दित कर्म किया है। इस कुत्सित कर्मको करके भी जो ये संतप्त नहीं हो रहे हैं, यह सर्वथा अनुचित है’॥ १५॥

वैधव्यं शोकसंतापं कृपणाकृपणा सती।

अदु:खोपचिता पूर्वं वर्तयिष्याम्यनाथवत्॥ १६॥

(फिर वालीसे बोली—)‘मैंने कभी दीनतापूर्ण जीवन नहीं बिताया था, ऐसे महान् दु:खका सामना नहीं किया था; परंतु आज आपके बिना मैं दीन हो गयी, अब मुझे अनाथकी भाँति शोक-संतापसे पूर्ण वैधव्य जीवन व्यतीत करना होगा॥ १६॥

लालितश्चाङ्गदो वीर: सुकुमार: सुखोचित:।

वत्स्यते कामवस्थां मे पितृव्ये क्रोधमूर्च्छिते॥ १७॥

‘नाथ! आपने अपने वीरपुत्र अङ्गदको, जो सुख भोगने योग्य और सुकुमार है, बड़ा लाड़-प्यार किया था। अब क्रोधसे पागल हुए चाचाके वशमें पड़कर मेरे बेटेकी क्या दशा होगी?॥ १७॥

कुरुष्व पितरं पुत्र सुदृष्टं धर्मवत्सलम्।

दुर्लभं दर्शनं तस्य तव वत्स भविष्यति॥ १८॥

‘बेटा अङ्गद! अपने धर्मप्रेमी पिताको अच्छी तरह देख लो। अब तुम्हारे लिये उनका दर्शन दुर्लभ हो जायगा॥ १८॥

समाश्वासय पुत्रं त्वं संदेशं संदिशस्व मे।

मूर्ध्न्नि चैनं समाघ्राय प्रवासं प्रस्थितो ह्यसि॥ १९॥

‘प्राणनाथ! आप दूसरे देशको जा रहे हैं। अपने पुत्रका मस्तक सूँघकर इसे धैर्य बँधाइये और मेरे लिये भी कुछ संदेश दीजिये॥ १९॥

रामेण हि महत् कर्म कृतं त्वामभिनिघ्नता।

आनृण्यं तु गतं तस्य सुग्रीवस्य प्रतिश्रवे॥ २०॥

श्रीरामने आपको मारकर बहुत बड़ा कर्म किया है। उन्होंने सुग्रीवसे जो प्रतिज्ञा की थी, उसके ऋणको उतार दिया’॥

सकामो भव सुग्रीव रुमां त्वं प्रतिपत्स्यसे।

भुङ्क्ष्व राज्यमनुद्विग्न: शस्तो भ्राता रिपुस्तव॥ २१॥

(अब सुग्रीवको सुनाकर कहने लगी—)‘सुग्रीव! तुम्हारा मनोरथ सफल हो। तुम्हारे भाई, जिन्हें तुम अपना शत्रु समझते थे, मारे गये। अब बेखटके राज्य भोगो। रुमाको भी प्राप्त कर लोगे’॥ २१॥

किं मामेवं प्रलपतीं प्रियां त्वं नाभिभाषसे।

इमा: पश्य वरा बाह्व्यो भार्यास्ते वानरेश्वर॥ २२॥

(फिर वालीसे बोली—)‘वानरेश्वर! मैं आपकी प्यारी पत्नी हूँ और इस तरह रोती-कलपती हूँ, फिर भी आप मुझसे बोलते क्यों नहीं हैं? देखिये, आपकी ये बहुत-सी सुन्दरी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं’॥ २२॥

तस्या विलपितं श्रुत्वा वानर्य: सर्वतश्च ता:।

परिगृह्याङ्गदं दीना दु:खार्ता: प्रतिचुक्रुशु:॥ २३॥

ताराका विलाप सुनकर अन्य वानर-पत्नियाँ भी सब ओरसे अङ्गदको पकड़कर दीन एवं दु:खसे व्याकुल हो जोर-जोरसे क्रन्दन करने लगीं॥ २३॥

किमङ्गदं साङ्गदवीरबाहो

विहाय यातोऽसि चिरं प्रवासम्।

न युक्तमेवं गुणसंनिकृष्टं

विहाय पुत्रं प्रियचारुवेषम्॥ २४॥

(तदनन्तर ताराने फिर कहा—) ‘बाजूबन्दसे विभूषित वीर भुजाओंवाले वानरराज! आप अङ्गदको छोड़कर दीर्घकालके लिये दूसरे देशमें क्यों जा रहे हैं? जो गुणोंमें आपके सर्वथा निकट है—जो आपके समान ही गुणवान् है तथा जिसका प्रिय एवं मनोहर वेश है, ऐसे प्रिय पुत्रको त्यागकर इस प्रकार चला जाना आपके लिये कदापि उचित नहीं है॥ २४॥

यद्यप्रियं किंचिदसम्प्रधार्य

कृतं मया स्यात् तव दीर्घबाहो।

क्षमस्व मे तद्धरिवंशनाथ

व्रजामि मूर्ध्ना तव वीर पादौ॥ २५॥

‘महाबाहो! यदि नासमझीके कारण मैंने आपका कोई अपराध किया हो तो आप उसे क्षमा कर दें। वानरवंशके स्वामी वीर आर्यपुत्र! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह प्रार्थना करती हूँ’॥ २५॥

तथा तु तारा करुणं रुदन्ती

भर्तु: समीपे सह वानरीभि:।

व्यवस्यत प्रायमनिन्द्यवर्णा

उपोपवेष्टुं भुवि यत्र वाली॥ २६॥

इस प्रकार अन्य वानर-पत्नियोंके साथ पतिके समीप करुण विलाप करती हुई अनिन्द्य सुन्दरी ताराने जहाँ वाली पृथ्वीपर पड़ा था, वहीं उसके समीप बैठकर आमरण अनशन करनेका निश्चय किया॥ २६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥

 


एकविंश: सर्ग:

हनुमान्‌जीका ताराको समझाना और ताराका पतिके अनुगमनका ही निश्चय करना

ततो निपतितां तारां च्युतां तारामिवाम्बरात्।

शनैराश्वासयामास हनुमान् हरियूथप:॥ १॥

ताराको आकाशसे टूटकर गिरी हुई तारिकाके समान पृथ्वीपर पड़ी देख वानरयूथपति हनुमान् ने धीरे-धीरे समझाना आरम्भ किया—॥ १॥

गुणदोषकृतं जन्तु: स्वकर्म फलहेतुकम्।

अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम्॥ २॥

‘देवि! जीवके द्वारा गुणबुद्धिसे अथवा दोषबुद्धिसे किये हुए जो अपने कर्म हैं, वे ही सुख-दु:खरूप फलकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। परलोकमें जाकर प्रत्येक जीव शान्तभावसे रहकर अपने शुभ और अशुभ—सभी कर्मोंका फल भोगता है॥ २॥

शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनानुकम्पसे।

कश्च कस्यानुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुद्बुदोपमे॥ ३॥

‘तुम स्वयं शोचनीया हो; फिर दूसरे किसको शोचनीय समझकर शोक कर रही हो? स्वयं दीन होकर दूसरे किस दीनपर दया करती हो? पानीके बुलबुलेके समान इस शरीरमें रहकर कौन जीव किस जीवके लिये शोचनीय है?॥ ३॥

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं द्रष्टव्यो जीवपुत्रया।

आयत्यां च विधेयानि समर्थान्यस्य चिन्तय॥ ४॥

‘तुम्हारे पुत्र कुमार अङ्गद जीवित हैं। अब तुम्हें इन्हींकी ओर देखना चाहिये और इनके लिये भविष्यमें जो उन्नतिके साधक श्रेष्ठ कार्य हों, उनका विचार करना चाहिये॥ ४॥

जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम्।

तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम्॥ ५॥

देवि! तुम विदुषी हो, अत: जानती ही हो कि प्राणियोंके जन्म और मृत्युका कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये शुभ (परलोकके लिये सुखद) कर्म ही करना चाहिये। अधिक रोना-धोना आदि जो लौकिक कर्म (व्यवहार) है, उसे नहीं करना चाहिये॥ ५॥

यस्मिन् हरिसहस्राणि शतानि नियुतानि च।

वर्तयन्ति कृताशानि सोऽयं दिष्टान्तमागत:॥ ६॥

‘सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर जिनपर आशा लगाये जीवन-निर्वाह करते थे, वे ही ये वानरराज आज अपनी प्रारब्धनिर्मित आयुकी अवधि पूरी कर चुके॥ ६॥

यदयं न्यायदृष्टार्थ: सामदानक्षमापर:।

गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि॥ ७॥

‘इन्होंने नीतिशास्त्रके अनुसार अर्थका साधन—राज्य-कार्यका संचालन किया है। ये उपयुक्त समयपर साम, दान और क्षमाका व्यवहार करते आये हैं। अत: धर्मानुसार प्राप्त होनेवाले लोकमें गये हैं। इनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये॥ ७॥

सर्वे च हरिशार्दूला: पुत्रश्चायं तवाङ्गद:।

हर्यृक्षपतिराज्यं च त्वत्सनाथमनिन्दिते॥ ८॥

‘सती साध्वी देवि! ये सभी श्रेष्ठ वानर, ये तुम्हारे पुत्र अङ्गद तथा वानर और भालुओंका यह राज्य—सब तुमसे ही सनाथ हैं—तुम्हीं इन सबकी स्वामिनी हो॥ ८॥

ताविमौ शोकसंतप्तौ शनै: प्रेरय भामिनि।

त्वया परिगृहीतोऽयमङ्गद: शास्तु मेदिनीम्॥ ९॥

‘भामिनि! ये अङ्गद और सुग्रीव दोनों ही शोकसे संतप्त हो रहे हैं। तुम इन्हें भावी कार्यके लिये प्रेरित करो। तुम्हारे अधीन रहकर अङ्गद इस पृथ्वीका शासन करें॥ ९॥

संततिश्च यथा दृष्टा कृत्यं यच्चापि साम्प्रतम्।

राज्ञस्तत् क्रियतां सर्वमेष कालस्य निश्चय:॥ १०॥

‘शास्त्रमें संतान होनेका जो प्रयोजन बतलाया गया है तथा इस समय राजा वालीके पारलौकिक कल्याणके लिये जो कुछ कर्तव्य है, वही करो—यही समयकी निश्चित प्रेरणा है॥ १०॥

संस्कार्यो हरिराजस्तु अङ्गदश्चाभिषिच्यताम्।

सिंहासनगतं पुत्रं पश्यन्ती शान्तिमेष्यसि॥ ११॥

‘वानरराजका अन्त्येष्टि-संस्कार और कुमार अङ्गदका राज्याभिषेक किया जाय। बेटेको राजसिंहासनपर बैठा देखकर तुम्हें शान्ति मिलेगी’॥ ११॥

सा तस्य वचनं श्रुत्वा भर्तृव्यसनपीडिता।

अब्रवीदुत्तरं तारा हनूमन्तमवस्थितम्॥ १२॥

तारा अपने स्वामीके विरह-शोकसे पीड़ित थी। वह उपर्युक्त वचन सुनकर सामने खड़े हुए हनुमान्‌जीसे बोली—

अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकत: शतम्।

हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम्॥ १३॥

‘अङ्गदके समान सौ पुत्र एक ओर और मरे होनेपर भी इस वीरवर स्वामीका आलिङ्गन करके सती होना दूसरी ओर—इन दोनोंमेंसे अपने वीर पतिके शरीरका आलिङ्गन ही मुझे श्रेष्ठ जान पड़ता है॥ १३॥

न चाहं हरिराज्यस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा।

पितृव्यस्तस्य सुग्रीव: सर्वकार्येष्वनन्तर:॥ १४॥

‘मैं न तो वानरोंके राज्यकी स्वामिनी हूँ और न मुझे अङ्गदके लिये ही कुछ करनेका अधिकार है। इसके चाचा सुग्रीव ही समस्त कार्योंके लिये समर्थ हैं और वे ही मेरी अपेक्षा इसके निकटवर्ती भी हैं॥ १४॥

नह्येषा बुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति।

पिता हि बन्धु: पुत्रस्य न माता हरिसत्तम॥ १५॥

‘कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जी! अङ्गदके विषयमें आपकी यह सलाह मेरे लिये काममें लाने योग्य नहीं है। आपको यह समझना चाहिये कि पुत्रके वास्तविक बन्धु (सहायक) पिता और चाचा ही हैं। माता नहीं॥ १५॥

नहि मम हरिराजसंश्रयात्

क्षमतरमस्ति परत्र चेह वा।

अभिमुखहतवीरसेवितं

शयनमिदं मम सेवितुं क्षमम्॥ १६॥

मेरे लिये वानरराज वालीका अनुगमन करनेसे बढ़कर इस लोक या परलोकमें कोई भी कार्य उचित नहीं है। युद्धमें शत्रुसे जूझकर मरे हुए अपने वीर स्वामीके द्वारा सेवित चिता आदिकी शय्यापर शयन करना ही मेरे लिये सर्वथा योग्य है’॥ १६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकविंश: सर्ग:॥ २१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१॥

 

 


द्वाविंश: सर्ग:

वालीका सुग्रीव और अङ्गदसे अपने मनकी बात कहकर प्राणोंको त्याग देना

वीक्षमाणस्तु मन्दासु: सर्वतो मन्दमुच्छ्वसन्।

आदावेव तु सुग्रीवं ददर्शानुजमग्रत:॥ १॥

वालीके प्राणोंकी गति शिथिल पड़ गयी थी। वह धीरे-धीरे ऊर्ध्व साँस लेता हुआ सब ओर देखने लगा। सबसे पहले उसने अपने सामने खड़े हुए छोटे भाई सुग्रीवको देखा॥ १॥

तं प्राप्तविजयं वाली सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्।

आभाष्य व्यक्तया वाचा सस्नेहमिदमब्रवीत्॥ २॥

युद्धमें जिन्हें विजय प्राप्त हुई थी, उन वानरराज सुग्रीवको सम्बोधित करके वालीने बड़े स्नेहके साथ स्पष्ट वाणीमें कहा—॥ २॥

सुग्रीव दोषेण न मां गन्तुमर्हसि किल्बिषात्।

कृष्यमाणं भविष्येण बुद्धिमोहेन मां बलात्॥ ३॥

‘सुग्रीव! पूर्वजन्मके किसी पापसे अवश्यम्भावी बुद्धिमोहने मुझे बलपूर्वक आकृष्ट कर लिया था, इसीलिये मैं तुम्हें शत्रु समझने लगा था और इस कारण मेरे द्वारा जो तुम्हारे प्रति अपराध हुए, उसके लिये तुम्हें मेरे प्रति दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये॥ ३॥

युगपद् विहितं तात न मन्ये सुखमावयो:।

सौहार्दं भ्रातृयुक्तं हि तदिदं जातमन्यथा॥ ४॥

‘तात! मैं समझता हूँ हम दोनोंके लिये एक साथ रहकर सुख भोगना नहीं बदा था, इसीलिये दो भाइयोंमें जो प्रेम होना चाहिये, वह न होकर हमलोगोंमें उसके विपरीत वैरभाव उत्पन्न हो गया॥ ४॥

प्रतिपद्य त्वमद्यैव राज्यमेषां वनौकसाम्।

मामप्यद्यैव गच्छन्तं विद्धि वैवस्वतक्षयम्॥ ५॥

‘भाई! तुम आज ही यह वानरोंका राज्य स्वीकार करो तथा मुझे अभी यमराजके घर जानेको तैयार समझो॥

जीवितं च हि राज्यं च श्रियं च विपुलां तथा।

प्रजहाम्येष वै तूर्णमहं चागर्हितं यश:॥ ६॥

‘मैं अपने जीवन, राज्य, विपुल सम्पत्ति और प्रशंसित यशका भी तुरंत ही त्याग कर रहा हूँ॥ ६॥

अस्यां त्वहमवस्थायां वीर वक्ष्यामि यद् वच:।

यद्यप्यसुकरं राजन् कर्तुमेव त्वमर्हसि॥ ७॥

‘वीर! राजन्! इस अवस्थामें मैं जो कुछ कहूँगा, वह यद्यपि करनेमें कठिन है, तथापि तुम उसे अवश्य करना॥ ७॥

सुखार्हं सुखसंवृद्धं बालमेनमबालिशम्।

बाष्पपूर्णमुखं पश्य भूमौ पतितमङ्गदम्॥ ८॥

‘देखो, मेरा बेटा अङ्गद धरतीपर पड़ा है। इसका मुँह आँसुओंसे भीगा है। यह सुखमें पला है और सुख भोगनेके ही योग्य है। बालक होनेपर भी यह मूढ़ नहीं है॥ ८॥

मम प्राणै: प्रियतरं पुत्रं पुत्रमिवौरसम्।

मया हीनमहीनार्थं सर्वत: परिपालय॥ ९॥

‘यह मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है। मेरे न रहनेपर तुम इसे सगे पुत्रकी भाँति मानना। इसके लिये किसी भी सुख-सुविधाकी कमी न होने देना और सदा सब जगह इसकी रक्षा करते रहना॥ ९॥

त्वमप्यस्य पिता दाता परित्राता च सर्वश:।

भयेष्वभयदश्चैव यथाहं प्लवगेश्वर॥ १०॥

‘वानरराज! मेरे ही समान तुम भी इसके पिता, दाता, सब प्रकारसे रक्षक और भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले हो॥ १०॥

एष तारात्मज: श्रीमांस्त्वया तुल्यपराक्रम:।

रक्षसां च वधे तेषामग्रतस्ते भविष्यति॥ ११॥

‘ताराका यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है। उन राक्षसोंके वधके समय यह सदा तुम्हारे आगे रहेगा॥

अनुरूपाणि कर्माणि विक्रम्य बलवान् रणे।

करिष्यत्येष तारेयस्तेजस्वी तरुणोऽङ्गद:॥ १२॥

‘यह बलवान् तेजस्वी तरुण ताराकुमार अङ्गद रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करते हुए अपने योग्य कर्म करेगा॥ १२॥

सुषेणदुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये।

औत्पातिके च विविधे सर्वत: परिनिष्ठिता॥ १३॥

‘सुषेणकी पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयोंके निर्णय करने तथा नाना प्रकारके उत्पातोंके चिह्नोंको समझनेमें सर्वथा निपुण है॥ १३॥

यदेषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम्।

नहि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते॥ १३॥

‘जिस कार्यको अच्छा बताये, उसे संदेहरहित होकर करना। ताराकी किसी भी सम्मतिका परिणाम उलटा नहीं होता॥ १४॥

राघवस्य च ते कार्यं कर्तव्यमविशङ्कया।

स्यादधर्मो ह्यकरणे त्वां च हिंस्यादमानित:॥ १५॥

‘श्रीरामचन्द्रजीका काम तुम्हें नि:शङ्क होकर करना चाहिये। उसको न करनेसे तुम्हें पाप लगेगा और अपमानित होनेपर श्रीरामचन्द्रजी तुझे मार डालेंगे॥ १५॥

इमां च मालामाधत्स्व दिव्यां सुग्रीव काञ्चनीम्।

उदारा श्री: स्थिता ह्यस्यां सम्प्रजह्यान्मृते मयि॥ १६॥

‘सुग्रीव! मेरी यह सोनेकी दिव्यमाला तुम धारण कर लो। इसमें उदार लक्ष्मीका वास है। मेरे मर जानेपर इसकी श्री नष्ट हो जायगी। अत: अभीसे पहन लो’॥ १६॥

इत्येवमुक्त: सुग्रीवो वालिना भ्रातृसौहृदात्।

हर्षं त्यक्त्वा पुनर्दीनो ग्रहग्रस्त इवोडुराट्॥ १७॥

वालीने भ्रातृस्नेहके कारण जब ऐसी बातें कहीं, तब उसके वधके कारण जो हर्ष हुआ था, उसे त्यागकर सुग्रीव फिर दु:खी हो गये, मानो चन्द्रमापर ग्रहण लग गया हो॥ १७॥

तद्वालिवचनाच्छान्त: कुर्वन् युक्तमतन्द्रित:।

जग्राह सोऽभ्यनुज्ञातो मालां तां चैव काञ्चनीम्॥ १८॥

वालीके उस वचनसे सुग्रीवका वैरभाव शान्त हो गया। वे सावधान होकर उचित बर्ताव करने लगे। उन्होंने भाईकी आज्ञासे वह सोनेकी माला ग्रहण कर ली॥ १८॥

तां मालां काञ्चनीं दत्त्वा दृष्ट्वा चैवात्मजं स्थितम्।

संसिद्ध: प्रेत्यभावाय स्नेहादङ्गदमब्रवीत्॥ १९॥

सुग्रीवको वह सुवर्णमयी माला देनेके पश्चात् वालीने मरनेका निश्चय कर लिया। फिर अपने सामने खड़े हुए पुत्र अङ्गदकी ओर देखकर स्नेहके साथ कहा—॥ १९॥

देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाण: प्रियाप्रिये।

सुखदु:खसह: काले सुग्रीववशगो भव॥ २०॥

‘बेटा! अब देश-कालको समझो—कब और कहाँ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इसका निश्चय करके वैसा ही आचरण करो। समयानुसार प्रिय-अप्रिय, सुख-दु:ख—जो कुछ आ पड़े उसको सहो। अपने हृदयमें क्षमाभाव रखो और सदा सुग्रीवकी आज्ञाके अधीन रहो॥ २०॥

यथा हि त्वं महाबाहो लालित: सततं मया।

न तथा वर्तमानं त्वां सुग्रीवो बहु मन्यते॥ २१॥

‘महाबाहो! सदा मेरा दुलार पाकर जिस प्रकार तुम रहते आये हो, यदि वैसा ही बर्ताव अब भी करोगे तो सुग्रीव तुम्हारा विशेष आदर नहीं करेंगे॥ २१॥

नास्यामित्रैर्गतं गच्छेर्मा शत्रुभिररिंदम।

भर्तुरर्थपरो दान्त: सुग्रीववशगो भव॥ २२॥

‘शत्रुदमन अङ्गद! तुम इनके शत्रुओंका साथ मत दो। जो इनके मित्र न हों, उनसे भी न मिलो और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा अपने स्वामी सुग्रीवके कार्य-साधनमें संलग्न रहते हुए उन्हींके अधीन रहो॥ २२॥

न चातिप्रणय: कार्य: कर्तव्योऽप्रणयश्च ते।

उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव॥ २३॥

‘किसीके साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेमका सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं। अत: मध्यम स्थितिपर ही दृष्टि रखो’॥ २३॥

इत्युक्त्वाथ विवृत्ताक्ष: शरसम्पीडितो भृशम्।

विवृतैर्दशनैर्भीमैर्बभूवोत्क्रान्तजीवित: ॥ २४॥

ऐसा कहकर बाणके आघातसे अत्यन्त घायल हुए वालीकी आँखें घूमने लगीं। उसके भयंकर दाँत खुल गये और प्राण-पखेरू उड़ गये॥ २४॥

ततो विचुक्रुशुस्तत्र वानरा हतयूथपा:।

परिदेवयमानास्ते सर्वे प्लवगसत्तमा:॥ २५॥

उस समय अपने यूथपतिकी मृत्यु हो जानेसे सभी श्रेष्ठ वानर जोर-जोरसे रोने और विलाप करने लगे—॥ २५॥

किष्किन्धा ह्यद्य शून्या च स्वर्गते वानरेश्वरे।

उद्यानानि च शून्यानि पर्वता: काननानि च॥ २६॥

‘हाय! आज वानरराज वालीके स्वर्गलोक चले जानेसे सारी किष्किन्धापुरी सूनी हो गयी। उद्यान, पर्वत और वन भी सूने हो गये॥ २६॥

हते प्लवगशार्दूले निष्प्रभा वानरा: कृता:।

यस्य वेगेन महता काननानि वनानि च॥ २७॥

पुष्पौघेणानुबद्ध्यन्ते करिष्यति तदद्य क:।

‘वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेसे सारे वानर श्रीहीन हो गये। जिनके महान् वेग (प्रताप) से समस्त कानन और वन पुष्पसमूहोंसे सदा संयुक्त बने रहते थे, आज उनके न रहनेसे कौन ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य करेगा?॥

येन दत्तं महद् युद्धं गन्धर्वस्य महात्मन:॥ २८॥

गोलभस्य महाबाहोर्दश वर्षाणि पञ्च च।

नैव रात्रौ न दिवसे तद् युद्धमुपशाम्यति॥ २९॥

‘उन्होंने महामना महाबाहु गोलभ नामक गन्धर्वको महान् युद्धका अवसर दिया था। वह युद्ध पंद्रह वर्षोंतक लगातार चलता रहा। न दिनमें बंद होता था, न रातमें॥ २९॥

तत: षोडशमे वर्षे गोलभो विनिपातित:।

तं हत्वा दुर्विनीतं तु वाली दंष्ट्राकरालवान्।

सर्वाभयंकरोऽस्माकं कथमेष निपातित:॥ ३०॥

‘तदनन्तर सोलहवाँ वर्ष आरम्भ होनेपर गोलभ वालीके हाथसे मारा गया। उस दुष्ट गन्धर्वका वध करके जिन विकराल दाढ़ोंवाले वालीने हम सबको अभय दान दिया था, वे ही ये हमारे स्वामी वानरराज स्वयं कैसे मार गिराये गये?’॥ ३०॥

हते तु वीरे प्लवगाधिपे तदा

प्लवङ्गमास्तत्र न शर्म लेभिरे।

वनेचरा: सिंहयुते महावने

यथा हि गावो निहते गवां पतौ॥ ३१॥

उस समय वीर वानरराज वालीके मारे जानेपर वनोंमें विचरनेवाले वानर वहाँ चैन न पा सके। जैसे सिंहसे युक्त विशाल वनमें साँड़के मारे जानेपर गौएँ दु:खी हो जाती हैं, वही दशा उन वानरोंकी हुई॥ ३१॥

ततस्तु तारा व्यसनार्णवप्लुता

मृतस्य भर्तुर्वदनं समीक्ष्य सा।

जगाम भूमिं परिरभ्य वालिनं

महाद्रुमं छिन्नमिवाश्रिता लता॥ ३२॥

तदनन्तर शोकके समुद्रमें डूबी हुई ताराने जब अपने मरे हुए स्वामीकी ओर दृष्टिपात किया, तब वह वालीका आलिङ्गन करके कटे हुए महान् वृक्षसे लिपटी हुई लताकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ३२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वाविंश: सर्ग:॥ २२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥

त्रयोविंश: सर्ग:

ताराका विलाप

तत: समुपजिघ्रन्ती कपिराजस्य तन्मुखम्।

पतिं लोकश्रुता तारा मृतं वचनमब्रवीत्॥ १॥

उस समय वानरराजका मुख सूँघती हुई लोकविख्यात ताराने रोकर अपने मृत पतिसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

शेषे त्वं विषमे दु:खमकृत्वा वचनं मम।

उपलोपचिते वीर सुदु:खे वसुधातले॥ २॥

‘वीर! दु:खकी बात है कि आपने मेरी बात नहीं मानी और अब आप प्रस्तरसे पूर्ण अत्यन्त दु:खदायक और ऊँचे-नीचे भूतलपर शयन कर रहे हैं॥ २॥

मत्त: प्रियतरा नूनं वानरेन्द्र मही तव।

शेषे हि तां परिष्वज्य मां च न प्रतिभाषसे॥ ३॥

‘वानरराज! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको मुझसे भी बढ़कर प्रिय है, तभी तो आप इसका आलिङ्गन करके सो रहे हैं और मुझसे बाततक नहीं करते॥ ३॥

सुग्रीवस्य वशं प्राप्तो विधिरेष भवत्यहो।

सुग्रीव एव विक्रान्तो वीर साहसिकप्रिय॥ ४॥

‘वीर! साहसपूर्ण कार्योंसे प्रेम रखनेवाले वानरराज! यह श्रीरामरूपी विधाता सुग्रीवके वशमें हो गया है (—आपके नहीं) यह बड़े आश्चर्यकी बात है, अत: अब इस राज्यपर सुग्रीव ही पराक्रमी राजाके रूपमें आसीन होंगे॥ ४॥

ऋक्षवानरमुख्यास्त्वां बलिनं पर्युपासते।

तेषां विलपितं कृच्छ्रमङ्गदस्य च शोचत:॥ ५॥

मम चेमा गिर: श्रुत्वा किं त्वं न प्रतिबुध्यसे।

‘प्राणनाथ! प्रधान-प्रधान भालू और वानर जो आप महावीरकी सेवामें रहा करते थे, इस समय बड़े दु:खसे विलाप कर रहे हैं। बेटा अङ्गद भी शोकमें पड़ा है। उन वानरोंका दु:खमय विलाप, अङ्गदका शोकोद्गार तथा मेरी यह अनुनय-विनयभरी वाणी सुनकर भी आप जागते क्यों नहीं हैं?॥ ५/

इदं तद् वीरशयनं तत्र शेषे हतो युधि॥ ६॥

शायिता निहता यत्र त्वयैव रिपव: पुरा।

‘यही वह वीर-शय्या है, जिसपर पूर्वकालमें आपने ही बहुत-से शत्रुओंको मारकर सुलाया था, किंतु आज स्वयं ही युद्धमें मारे जाकर आप इसपर शयन कर रहे हैं॥

विशुद्धसत्त्वाभिजन प्रिययुद्ध मम प्रिय॥ ७॥

मामनाथां विहायैकां गतस्त्वमसि मानद।

‘विशुद्ध बलशाली कुलमें उत्पन्न युद्धप्रेमी तथा दूसरोंको मान देनेवाले मेरे प्रियतम! तुम मुझ अनाथाको अकेली छोड़कर कहाँ चले गये?॥ ७/

शूराय न प्रदातव्या कन्या खलु विपश्चिता॥ ८॥

शूरभार्यां हतां पश्य सद्यो मां विधवां कृताम्।

‘निश्चय ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपनी कन्या किसी शूरवीरके हाथमें न दे। देखो, मैं शूरवीरकी पत्नी होनेके कारण तत्काल विधवा बना दी गयी और इस प्रकार सर्वथा मारी गयी॥ ८/

अवभग्नश्च मे मानो भग्ना मे शाश्वती गति:॥ ९॥

अगाधे च निमग्नास्मि विपुले शोकसागरे।

‘राजरानी होनेका जो मेरा अभिमान था, वह भङ्ग हो गया। नित्य-निरन्तर सुख पानेकी मेरी आशा नष्ट हो गयी तथा मैं अगाध एवं विशाल शोकसमुद्रमें डूब गयी हूँ॥ ९/

अश्मसारमयं नूनमिदं मे हृदयं दृढम्॥ १०॥

भर्तारं निहतं दृष्ट्वा यन्नाद्य शतधा कृतम्।

‘निश्चय ही यह मेरा कठोर हृदय लोहेका बना हुआ है। तभी तो अपने स्वामीको मारा गया देखकर इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते॥ १०/

सुहृच्चैव च भर्ता च प्रकृत्या च मम प्रिय:॥ ११॥

प्रहारे च पराक्रान्त: शूर: पञ्चत्वमागत:।

‘हाय! जो मेरे सुहृद्, स्वामी और स्वभावसे ही प्रिय थे तथा संग्राममें महान् पराक्रम प्रकट करनेवाले शूरवीर थे, वे संसारसे चल बसे॥ ११/

पतिहीना तु या नारी कामं भवतु पुत्रिणी॥ १२॥

धनधान्यसमृद्धापि विधवेत्युच्यते जनै:।

‘पतिहीन नारी भले ही पुत्रवती एवं धन-धान्यसे समृद्ध भी हो, किन्तु लोग उसे विधवा ही कहते हैं॥ १२/

स्वगात्रप्रभवे वीर शेषे रुधिरमण्डले॥ १३॥

कृमिरागपरिस्तोमे स्वकीये शयने यथा।

‘वीर! अपने ही शरीरसे प्रकट हुई रक्तराशिमें आप उसी तरह शयन करते हैं, जैसे पहले इन्द्रगोप नामक कीड़ेके-से रंगवाले बिछौनेसे युक्त अपने पलंगपर सोया करते थे॥ १३/

रेणुशोणितसंवीतं गात्रं तव समन्तत:॥ १४॥

परिरब्धुं न शक्नोमि भुजाभ्यां प्लवगर्षभ।

‘वानरश्रेष्ठ! आपका सारा शरीर धूल और रक्तसे लथपथ हो रहा है; इसलिये मैं अपनी दोनों भुजाओंसे आपका आलिङ्गन नहीं कर पाती॥ १४/

कृतकृत्योऽद्य सुग्रीवो वैरेऽस्मिन्नतिदारुणे॥ १५॥

यस्य रामविमुक्तेन हृतमेकेषुणा भयम्।

‘इस अत्यन्त भयंकर वैरमें आज सुग्रीव कृतकृत्य हो गये। श्रीरामके छोड़े हुए एक ही बाणने उनका सारा भय हर लिया॥ १५/

शरेण हृदि लग्नेन गात्रसंस्पर्शने तव॥ १६॥

वार्यामि त्वां निरीक्षन्ती त्वयि पञ्चत्वमागते।

‘आपकी छातीमें जो बाण धँसा हुआ है; वह मुझे आपके शरीरका आलिङ्गन करनेसे रोक रहा है, इस कारण आपकी मृत्यु हो जानेपर भी मैं चुपचाप देख रही हूँ (आपको हृदयसे लगा नहीं पाती)’॥ १६/

उद्बबर्ह शरं नीलस्तस्य गात्रगतं तदा॥ १७॥

गिरिगह्वरसंलीनं दीप्तमाशीविषं यथा।

उस समय नीलने वालीके शरीरमें धँसे हुए उस बाणको निकाला, मानो पर्वतकी कन्दरामें छिपे हुए प्रज्वलित मुखवाले विषधर सर्पको वहाँसे निकाला गया हो॥ १७/

तस्य निष्कृष्यमाणस्य बाणस्यापि बभौ द्युति:॥ १८॥

अस्तमस्तकसंरुद्धरश्मेर्दिनकरादिव ।

वालीके शरीरसे निकाले जाते हुए उस बाणकी कान्ति अस्ताचलके शिखरपर अवरुद्ध किरणोंवाले सूर्यकी प्रभाके समान जान पड़ती थी॥ १८/

पेतु: क्षतजधारास्तु व्रणेभ्यस्तस्य सर्वश:॥ १९॥

ताम्रगैरिकसम्पृक्ता धारा इव धराधरात्।

बाणके निकाल लिये जानेपर वालीके शरीरके सभी घावोंसे खूनकी धाराएँ गिरने लगीं, मानो किसी पर्वतसे लाल गेरूमिश्रित जलकी धाराएँ बह रही हों॥ १९/

अवकीर्णं विमार्जन्ती भर्तारं रणरेणुना॥ २०॥

अस्रैर्नयनजै: शूरं सिषेचास्त्रसमाहतम्।

वालीका शरीर रणभूमिकी धूलसे भर गया था। उस समय तारा बाणसे आहत हुए अपने शूरवीर स्वामीके उस शरीरको पोंछती हुई उन्हें नेत्रोंके अश्रुजलसे सींचने लगी॥ २०/

रुधिरोक्षितसर्वाङ्गं दृष्ट्वा विनिहतं पतिम्॥ २१॥

उवाच तारा पिङ्गाक्षं पुत्रमङ्गदमङ्गना।

अपने मारे गये पतिके सारे अङ्गोंको रक्तसे भीगा हुआ देख वालि-पत्नी ताराने अपने भूरे नेत्रोंवाले पुत्र अङ्गदसे कहा—॥ २१/

अवस्थां पश्चिमां पश्य पितु: पुत्र सुदारुणाम्॥ २२॥

सम्प्रसक्तस्य वैरस्य गतोऽन्त: पापकर्मणा।

‘बेटा! देखो, तुम्हारे पिताकी अन्तिम अवस्था कितनी भयंकर है। ये इस समय पूर्व पापके कारण प्राप्त हुए वैरसे पार हो चुके हैं॥ २२/

बालसूर्योज्ज्वलतनुं प्रयातं यमसादनम्॥ २३॥

अभिवादय राजानं पितरं पुत्र मानदम्।

‘वत्स! प्रात:कालके सूर्यकी भाँति अरुण गौर शरीरवाले तुम्हारे पिता राजा वाली अब यमलोकको जा पहुँचे। ये तुम्हें बड़ा आदर देते थे। तुम इनके चरणोंमें प्रणाम करो’॥

एवमुक्त: समुत्थाय जग्राह चरणौ पितु:॥ २४॥

भुजाभ्यां पीनवृत्ताभ्यामङ्गदोऽहमिति ब्रुवन्।

माताके ऐसा कहनेपर अङ्गदने उठकर अपनी मोटी और गोलाकार भुजाओंद्वारा पिताके दोनों पैर पकड़ लिये और प्रणाम करते हुए कहा—‘पिताजी! मैं अङ्गद हूँ’॥

अभिवादयमानं त्वामङ्गदं त्वं यथा पुरा॥ २५॥

दीर्घायुर्भव पुत्रेति किमर्थं नाभिभाषसे।

तब तारा फिर कहने लगी— ‘प्राणनाथ! कुमार अङ्गद पहलेकी ही भाँति आज भी आपके चरणोंमें प्रणाम करता है, किंतु आप इसे ‘चिरंजीवी रहो बेटा’ ऐसा कहकर आशीर्वाद क्यों नहीं देते हैं?॥ २५/

अहं पुत्रसहाया त्वामुपासे गतचेतनम्।

सिंहेन पातितं सद्यो गौ: सवत्सेव गोवृषम्॥ २६॥

‘जैसे कोई बछड़ेसहित गाय सिंहके द्वारा तत्काल मार गिराये हुए साँड़के पास खड़ी हो, उसी प्रकार पुत्रसहित मैं प्राणहीन हुए आपकी सेवामें बैठी हूँ॥ २६॥

इष्ट्वा संग्रामयज्ञेन रामप्रहरणाम्भसा।

तस्मिन्नवभृथे स्नात: कथं पत्न्या मया विना॥ २७॥

‘आपने युद्धरूपी यज्ञका अनुष्ठान करके श्रीरामके बाणरूपी जलसे मुझ पत्नीके बिना अकेले ही अवभृथस्नान कैसे कर लिया?॥ २७॥

या दत्ता देवराजेन तव तुष्टेन संयुगे।

शातकौम्भीं प्रियां मालां तां ते पश्यामि नेह किम्॥ २८॥

‘युद्धमें आपसे संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रने आपको जो सोनेकी प्रिय माला दे रखी थी, उसे मैं इस समय आपके गलेमें क्यों नहीं देखती हूँ?॥ २८॥

राज्यश्रीर्न जहाति त्वां गतासुमपि मानद।

सूर्यस्यावर्तमानस्य शैलराजमिव प्रभा॥ २९॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले वानरराज! प्राणहीन हो जानेपर भी आपको राज्यलक्ष्मी उसी प्रकार नहीं छोड़ रही है, जैसे चारों ओर चक्कर लगानेवाले सूर्यदेवकी प्रभा गिरिराज मेरुको कभी नहीं छोड़ती है॥ २९॥

न मे वच: पथ्यमिदं त्वया कृतं

न चास्मि शक्ता हि निवारणे तव।

हता सपुत्रास्मि हतेन संयुगे

सह त्वया श्रीर्विजहाति मामपि॥ ३०॥

‘मैंने आपके हितकी बात कही थी; परंतु आपने उसे नहीं स्वीकार किया। मैं भी आपको रोक रखनेमें समर्थ न हो सकी। इसका फल यह हुआ कि आप युद्धमें मारे गये। आपके मारे जानेसे मैं भी अपने पुत्रसहित मारी गयी। अब लक्ष्मी आपके साथ ही मुझे और मेरे पुत्रको भी छोड़ रही है’॥ ३०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग:॥ २३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३॥

 


चतुर्विंश: सर्ग:

सुग्रीवका शोकमग्न होकर श्रीरामसे प्राणत्यागके लिये आज्ञा माँगना, ताराका श्रीरामसे अपने वधके लिये प्रार्थना करना और श्रीरामका उसे समझाना

तामाशु वेगेन दुरासदेन त्वभिप्लुतां शोकमहार्णवेन।

पश्यंस्तदा वाल्यनुजस्तरस्वी भ्रातुर्वधेनाप्रतिमेन तेपे॥ १ ॥

अत्यन्त वेगशाली और दु:सह शोकसमुद्रमें डूबी हुई ताराकी ओर दृष्टिपात करके वालीके छोटे भाई वेगवान् सुग्रीवको उस समय अपने भाईके वधसे बड़ा संताप हुआ॥

स बाष्पपूर्णेन मुखेन पश्यन् क्षणेन निर्विण्णमना मनस्वी।

जगाम रामस्य शनै: समीपं भृत्यैर्वृत: सम्परिदूयमान:॥ २ ॥

उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। उनका मन खिन्न हो गया और वे भीतर-ही-भीतर कष्टका अनुभव करते हुए अपने भृत्योंके साथ धीरे-धीरे श्रीरामचन्द्रजीके पास गये॥ २॥

स तं समासाद्य गृहीतचापमुदात्तमाशीविषतुल्यबाणम् ।

यशस्विनं लक्षणलक्षिताङ्गमवस्थितं राघवमित्युवाच॥ ३ ॥

जिन्होंने धनुष ले रखा था, जिनमें धीरोदात्त नायकका स्वभाव विद्यमान था, जिनके बाण विषधर सर्पके समान भयंकर थे, जिनका प्रत्येक अङ्ग सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार उत्तम लक्षणोंसे लक्षित था तथा जो परम यशस्वी थे, वहाँ खड़े हुए उन श्रीरघुनाथजीके पास जाकर सुग्रीव इस प्रकार बोले—॥ ३॥

यथा प्रतिज्ञातमिदं नरेन्द्र कृतं त्वया दृष्टफलं च कर्म।

ममाद्य भोगेषु नरेन्द्रसूनो मनो निवृत्तं हतजीवितेन॥ ४ ॥

‘नरेन्द्र! आपने जैसी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार यह काम कर दिखाया। इस कर्मका राज्य-लाभरूप फल भी प्रत्यक्ष ही है। किंतु राजकुमार! इससे मेरा जीवन निन्दनीय हो गया है। अत: अब मेरा मन सभी भोगोंसे निवृत्त हो गया॥ ४॥

अस्यां महिष्यां तु भृशं रुदत्यां पुरेऽतिविक्रोशति दु:खतप्ते।

हते नृपे संशयितेऽङ्गदे च न राम राज्ये रमते मनो मे॥ ५ ॥

‘श्रीराम! राजा वालीके मारे जानेसे ये महारानी तारा अत्यन्त विलाप कर रही हैं। सारा नगर दु:खसे संतप्त होकर चीख रहा है तथा कुमार अङ्गदका जीवन भी संशयमें पड़ गया है। इन सब कारणोंसे अब राज्यमें मेरा मन नहीं लगता है॥ ५॥

क्रोधादमर्षादतिविप्रधर्षाद् भ्रातुर्वधो मेऽनुमत: पुरस्तात्।

हते त्विदानीं हरियूथपेऽस्मिन् सुतीक्ष्णमिक्ष्वाकुवर प्रतप्स्ये॥ ६ ॥

‘इक्ष्वाकुकुलके गौरव श्रीरघुनाथजी! भाईने मेरा बहुत अधिक तिरस्कार किया था, इसलिये क्रोध और अमर्षके कारण पहले मैंने उसके वधके लिये अनुमति दे दी थी; परंतु अब वानर-यूथपति वालीके मारे जानेपर मुझे बड़ा संताप हो रहा है। सम्भवत: जीवनभर यह संताप बना ही रहेगा॥ ६॥

श्रेयोऽद्य मन्ये मम शैलमुख्ये

तस्मिन् हि वासश्चिरमृष्यमूके।

यथा तथा वर्तयत: स्ववृत्त्या

नेमं निहत्य त्रिदिवस्य लाभ:॥ ७॥

‘अपनी जातीय वृत्तिके अनुसार जैसे-तैसे जीवन-निर्वाह करते हुए उस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूकपर चिरकालतक रहना ही आज मैं अपने लिये कल्याणकारी समझता हूँ; किंतु अपने इस भाईका वध कराकर अब मुझे स्वर्गका भी राज्य मिल जाय तो मैं उसे अपने लिये श्रेयस्कर नहीं मानता हूँ॥ ७॥

न त्वा जिघांसामि चरेति यन्मा-

मयं महात्मा मतिमानुवाच।

तस्यैव तद् राम वचोऽनुरूप-

मिदं वच: कर्म च मेऽनुरूपम्॥ ८ ॥

‘बुद्धिमान् महात्मा वालीने युद्धके समय मुझसे कहा था कि ‘तुम चले जाओ, मैं तुम्हारे प्राण लेना नहीं चाहता’। श्रीराम! उनकी यह बात उन्हींके योग्य थी और मैंने जो आपसे कहकर उनका वध कराया, मेरा वह क्रूरतापूर्ण वचन और कर्म मेरे ही अनुरूप है॥ ८॥

भ्राता कथं नाम महागुणस्य

भ्रातुर्वधं राम विरोचयेत।

राज्यस्य दु:खस्य च वीर सारं

विचिन्तयन् कामपुरस्कृतोऽपि॥ ९ ॥

‘वीर रघुनन्दन! कोई कितना ही स्वार्थी क्यों न हो? यदि राज्यके सुख तथा भ्रातृ-वधसे होनेवाले दु:खकी प्रबलतापर विचार करेगा तो वह भाई होकर अपने महान् गुणवान् भाईका वध कैसे अच्छा समझेगा?॥ ९॥

वधो हि मे मतो नासीत् स्वमाहात्म्यव्यतिक्रमात्।

ममासीद् बुद्धिदौरात्म्यात् प्राणहारी व्यतिक्रम:॥ १०॥

‘वालीके मनमें मेरे वधका विचार नहीं था; क्योंकि इससे उन्हें अपनी मान-प्रतिष्ठामें बट्टा लगनेका डर था। मेरी ही बुद्धिमें दुष्टता भरी थी, जिसके कारण मैंने अपने भाईके प्रति ऐसा अपराध कर डाला, जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ॥ १०॥

द्रुमशाखावभग्नोऽहं मुहूर्तं परिनिष्टनन्।

सान्त्वयित्वा त्वनेनोक्तो न पुन: कर्तुमर्हसि॥ ११॥

‘जब वालीने मुझे एक वृक्षकी शाखासे घायल कर दिया और मैं दो घड़ीतक कराहता रहा, तब उन्होंने मुझे सान्त्वना देकर कहा—‘जाओ, फिर मेरे साथ युद्ध करनेकी इच्छा न करना’॥ ११॥

भ्रातृत्वमार्यभावश्च धर्मश्चानेन रक्षित:।

मया क्रोधश्च कामश्च कपित्वं च प्रदर्शितम्॥ १२॥

‘उन्होंने भ्रातृभाव, आर्यभाव और धर्मकी भी रक्षा की है; परंतु मैंने केवल काम, क्रोध और वानरोचित चपलताका ही परिचय दिया है॥ १२॥

अचिन्तनीयं परिवर्जनीय-

मनीप्सनीयं स्वनवेक्षणीयम्।

प्राप्तोऽस्मि पाप्मानमिदं वयस्य

भ्रातुर्वधात् त्वाष्ट्रवधादिवेन्द्र:॥ १३॥

‘मित्र! जैसे वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्र पापके भागी हुए थे, उसी प्रकार मैं भाईका वध कराकर ऐसे पापका भागी हुआ हूँ, जिसको करना तो दूर रहा, सोचना भी अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये जो सर्वथा त्याज्य, अवाञ्छनीय तथा देखनेके भी अयोग्य है॥ १३॥

पाप्मानमिन्द्रस्य मही जलं च

वृक्षाश्च कामं जगृहु: स्त्रियश्च।

को नाम पाप्मानमिमं सहेत

शाखामृगस्य प्रतिपत्तुमिच्छेत्॥ १४॥

‘इन्द्रके पापको तो पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियोंने स्वेच्छासे ग्रहण कर लिया था; परंतु मुझ-जैसे वानरके इस पापको कौन लेना चाहेगा? अथवा कौन ले सकेगा?॥ १४॥

नार्हामि सम्मानमिमं प्रजानां

न यौवराज्यं कुत एव राज्यम्।

अधर्मयुक्तं कुलनाशयुक्त-

मेवंविधं राघव कर्म कृत्वा॥ १५॥

‘रघुनाथजी! अपने कुलका नाश करनेवाला ऐसा पापपूर्ण कर्म करके मैं प्रजाके सम्मानका पात्र नहीं रहा। राज्य पाना तो दूरकी बात है, मुझमें युवराज होनेकी भी योग्यता नहीं है॥ १५॥

पापस्य कर्तास्मि विगर्हितस्य

क्षुद्रस्य लोकापकृतस्य लोके।

शोको महान् मामभिवर्ततेऽयं

वृष्टेर्यथा निम्नमिवाम्बुवेग:॥ १६॥

‘मैंने वह लोकनिन्दित पापकर्म किया है, जो नीच पुरुषोंके योग्य तथा सम्पूर्ण जगत्को हानि पहुँचानेवाला है। जैसे वर्षाके जलका वेग नीची भूमिकी ओर जाता है, उसी प्रकार यह भ्रातृ-वधजनित महान् शोक सब ओरसे मुझपर ही आक्रमण कर रहा है॥ १६॥

सोदर्यघातापरगात्रवाल:

संतापहस्ताक्षिशिरोविषाण: ।

एनोमयो मामभिहन्ति हस्ती

दृप्तो नदीकूलमिव प्रवृद्ध:॥ १७॥

‘भाईका वध ही जिसके शरीरका पिछला भाग और पुच्छ है तथा उससे होनेवाला संताप ही जिसकी सूँड, नेत्र, मस्तक और दाँत हैं, वह पापरूपी महान् मदमत्त गजराज नदीतटकी भाँति मुझपर ही आघात कर रहा है॥ १७॥

अंहो बतेदं नृवराविषह्यं

निवर्तते मे हृदि साधुवृत्तम्।

अग्नौ विवर्णं परितप्यमानं

किट्टं यथा राघव जातरूपम्॥ १८॥

‘नरेश्वर! रघुनन्दन! मैंने जो दु:सह पाप किया है, यह मेरे हृदयस्थित सदाचारको भी नष्ट कर रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे आगमें तपाया जानेवाला मलिन सुवर्ण अपने भीतरके मलको नष्ट कर देता है॥ १८॥

महाबलानां हरियूथपाना-

मिदं कुलं राघव मन्निमित्तम्।

अस्याङ्गदस्यापि च शोकतापा-

दर्धस्थितप्राणमितीव मन्ये॥ १९॥

‘रघुनाथजी! मेरे ही कारण वालीका वध हुआ, जिससे इस अङ्गदका भी शोक-संताप बढ़ गया और इसीलिये इन महाबली वानर-यूथपतियोंका समुदाय अधमरा-सा जान पड़ता है॥ १९॥

सुत: सुलभ्य: सुजन: सुवश्य:

कुतस्तु पुत्र: सदृशोऽङ्गदेन।

न चापि विद्येत स वीर देशो

यस्मिन् भवेत् सोदरसंनिकर्ष:॥ २०॥

‘वीरवर! सुजन और वशमें रहनेवाला पुत्र तो मिल सकता है, परंतु अङ्गदके समान बेटा कहाँ मिलेगा? तथा ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ मुझे अपने भाईका सामीप्य मिल सके॥ २०॥

अद्याङ्गदो वीरवरो न जीवे-

ज्जीवेत माता परिपालनार्थम्।

विना तु पुत्रं परितापदीना

सा नैव जीवेदिति निश्चितं मे॥ २१॥

‘अब वीरवर अङ्गद भी जीवित नहीं रह सकता। यदि जी सकता तो उसकी रक्षाके लिये उसकी माता भी जीवन धारण करती। वह बेचारी तो यों ही संतापसे दीन हो रही है, यदि पुत्र भी न रहा तो उसके जीवनका अन्त हो जायगा-यह बिलकुल निश्चित बात है॥ २१॥

सोऽहं प्रवेक्ष्याम्यतिदीप्तमग्निं

भ्रात्रा च पुत्रेण च सख्यमिच्छन्।

इमे विचेष्यन्ति हरिप्रवीरा:

सीतां निदेशे परिवर्तमाना:॥ २२॥

‘अत: मैं अपने भाई और पुत्रका साथ देनेकी इच्छासे प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगा। ये वानर वीर आपकी आज्ञामें रहकर सीताकी खोज करेंगे॥ २२॥

कृत्स्नं तु ते सेत्स्यति कार्यमेत-

न्मय्यप्यतीते मनुजेन्द्रपुत्र।

कुलस्य हन्तारमजीवनार्हं

रामानुजानीहि कृतागसं माम्॥ २३॥

‘राजकुमार! मेरी मृत्यु हो जानेपर भी आपका सारा कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं कुलकी हत्या करनेवाला और अपराधी हूँ। अत: संसारमें जीवन धारण करनेके योग्य नहीं हूँ। इसलिये श्रीराम! मुझे प्राणत्याग करनेकी आज्ञा दीजिये’॥ २३॥

इत्येवमार्तस्य रघुप्रवीर:

श्रुत्वा वचो वालिजघन्यजस्य।

संजातबाष्प: परवीरहन्ता

रामो मुहूर्तं विमना बभूव॥ २४॥

दु:खसे आतुर हुए सुग्रीवके, जो वालीके छोटे भाई थे, ऐसे वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ, रघुकुलके वीर भगवान् श्रीरामके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। वे दो घड़ीतक मन-ही-मन दु:खका अनुभव करते रहे॥ २४॥

तस्मिन् क्षणेऽभीक्ष्णमवेक्षमाण:

क्षितिक्षमावान् भुवनस्य गोप्ता।

रामो रुदन्तीं व्यसने निमग्नां

समुत्सुक: सोऽथ ददर्श ताराम्॥ २५॥

श्रीरघुनाथजी पृथ्वीके समान क्षमाशील और सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले हैं। उन्होंने उस समय अधिक उत्सुक होकर जब इधर-उधर बारंबार दृष्टि दौड़ायी, तब शोकमग्ना तारा उन्हें दिखायी दी, जो अपने स्वामीके लिये रो रही थी॥ २५॥

तां चारुनेत्रां कपिसिंहनाथां

पतिं समाश्लिष्य तदा शयानाम्।

उत्थापयामासुरदीनसत्त्वां

मन्त्रिप्रधाना: कपिराजपत्नीम्॥ २६॥

कपियोंमें सिंहके समान वीर वाली जिसके स्वामी एवं संरक्षक थे, जो वानरराज वालीकी रानी थी, जिसका हृदय उदार और नेत्र मनोहर थे, वह तारा उस समय अपने मृत पतिका आलिङ्गन करके पड़ी थी। श्रीरामको आते देख प्रधान-प्रधान मन्त्रियोंने ताराको वहाँसे उठाया॥

सा विस्फुरन्ती परिरभ्यमाणा

भर्तु: समीपादपनीयमाना।

ददर्श रामं शरचापपांण‌ि

स्वतेजसा सूर्यमिव ज्वलन्तम्॥ २७॥

तारा जब पतिके समीपसे हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपनेको छुड़ाने और छटपटाने लगी। इतनेहीमें उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीरामको खड़ा देखा, जो अपने तेजसे सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ २७॥

सुसंवृतं पार्थिवलक्षणैश्च

तं चारुनेत्रं मृगशावनेत्रा।

अदृष्टपूर्वं पुरुषप्रधान-

मयं स काकुत्स्थ इति प्रजज्ञे॥ २८॥

वे राजोचित शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। उनके नेत्र बड़े मनोहर थे। उन पुरुषप्रवर श्रीरामको, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा समझ गयी कि ये ही ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम हैं॥

तस्येन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य

महानुभावस्य समीपमार्या।

आर्तातितूर्णं व्यसनं प्रपन्ना

जगाम तारा परिविह्वलन्ती॥ २९॥

उस समय घोर संकटमें पड़ी हुई शोकपीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती-पड़ती तीव्र गतिसे महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीरामके समीप गयी॥ २९॥

तं सा समासाद्य विशुद्धसत्त्वं

शोकेन सम्भ्रान्तशरीरभावा।

मनस्विनी वाक्यमुवाच तारा

रामं रणोत्कर्षणलब्धलक्ष्यम्॥ ३०॥

शोकके कारण वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध खो बैठी थी। भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्त:करणवाले तथा युद्धस्थलमें सबसे अधिक निपुणताके कारण लक्ष्य बेधनेमें अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली—॥ ३०॥

त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च

जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च।

अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च

क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्ष:॥ ३१॥

‘रघुनन्दन! आप अप्रमेय (देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित) हैं। आपको पाना बहुत कठिन है। आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्मका पालन करनेवाले हैं। आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती। आप दूरदर्शी एवं पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं। आपकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं॥ ३१॥

त्वमात्तबाणासनबाणपाणि-

र्महाबल: संहननोपपन्न:।

मनुष्यदेहाभ्युदयं विहाय

दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्त:॥ ३२॥

‘आपके हाथमें धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं। आपका बल महान् है। आप सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हैं और मनुष्य-शरीरसे प्राप्त होनेवाले लौकिक सुखका परित्याग करके भी दिव्य शरीरके ऐश्वर्यसे युक्त हैं॥ ३२॥

येनैव बाणेन हत: प्रियो मे

तेनैव बाणेन हि मां जहीहि।

हता गमिष्यामि समीपमस्य

न मां विना वीर रमेत वाली॥ ३३॥

(‘अत: मैं प्रार्थना करती हूँ कि) आपने जिस बाणसे मेरे प्रियतम पतिका वध किया है, उसी बाणसे आप मुझे भी मार डालिये। मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी। वीर! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे॥ ३३॥

स्वर्गेऽपि पद्मामलपत्रनेत्र

समेत्य सम्प्रेक्ष्य च मामपश्यन्।

न ह्येष उच्चावचताम्रचूडा

विचित्रवेषाप्सरसोऽभजिष्यत् ॥ ३३॥

‘अमलकमलदललोचन राम! स्वर्गमें जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालनेपर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकारके लाल फूलोंसे विभूषित चोटी धारण करनेवाली तथा विचित्र वेशभूषासे मनोहर प्रतीत होनेवाली स्वर्गकी अप्सराओंको वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे॥ ३४॥

स्वर्गेऽपि शोकं च विवर्णतां च

मया विना प्राप्स्यति वीर वाली।

रम्ये नगेन्द्रस्य तटावकाशे

विदेहकन्यारहितो यथा त्वम्॥ ३५॥

‘वीरवर! स्वर्गमें भी वाली मेरे बिना शोकका अनुभव करेंगे और उनके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जायगी। वे उसी तरह दु:खी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूकके सुरम्य तट-प्रान्तमें विदेहनन्दिनी सीताके बिना आप कष्टका अनुभव करते हैं॥ ३५॥

त्वं वेत्थ तावद् वनिताविहीन:

प्राप्नोति दु:खं पुरुष: कुमार:।

तत् त्वं प्रजानञ्जहि मां न वाली

दु:खं ममादर्शनजं भजेत॥ ३६॥

‘स्त्रीके बिना युवा पुरुषको जो दु:ख उठाना पड़ता है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं। इस तत्त्वको समझकर आप मेरा वध करिये, जिससे वालीको मेरे विरहका दु:ख न भोगना पड़े॥ ३६॥

यच्चापि मन्येत भवान् महात्मा

स्त्रीघातदोषस्तु भवेन्न मह्यम्।

आत्मेयमस्येति हि मां जहि त्वं

न स्त्रीवध: स्यान्मनुजेन्द्रपुत्र॥ ३७॥

‘महाराजकुमार! आप महात्मा हैं, इसलिये यदि ऐसा चाहते हों कि मुझे स्त्री-हत्याका पाप न लगे तो ‘यह वालीकी आत्मा है’ ऐसा समझकर मेरा वध कीजिये। इससे आपको स्त्री-हत्याका पाप नहीं लगेगा॥ ३७॥

शास्त्रप्रयोगाद् विविधाश्च वेदा-

दनन्यरूपा: पुरुषस्य दारा:।

दारप्रदानाद्धि न दानमन्यत्

प्रदृश्यते ज्ञानवतां हि लोके॥ ३८॥

‘शास्त्रोक्त यज्ञ-यागादि कर्मोंमें पति और पत्नी दोनोंका संयुक्त अधिकार होता है—पत्नीको साथ लिये बिना पुरुष यज्ञकर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता। इसके सिवा नाना प्रकारकी वैदिक श्रुतियाँ भी पत्नीको पतिका आधा शरीर बतलाती हैं। दूसरे स्त्रियोंका अपने पतिसे अभिन्न होना सिद्ध होता है। (अत: मुझे मारनेसे आपको स्त्रीवधका दोष नहीं लग सकता और वालीको स्त्रीकी प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि) संसारमें ज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें स्त्रीदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है॥ ३८॥

त्वं चापि मां तस्य मम प्रियस्य

प्रदास्यसे धर्ममवेक्ष्य वीर।

अनेन दानेन न लप्स्यसे त्व-

मधर्मयोगं मम वीर घातात्॥ ३९॥

‘वीरशिरोमणे! यदि धर्मकी ओर दृष्टि रखते हुए आप भी मुझे मेरे प्रियतम वालीको समर्पित कर देंगे तो इस दानके प्रभावसे मेरी हत्या करनेपर भी आपको पाप नहीं लगेगा॥ ३९॥

आर्तामनाथामपनीयमाना-

मेवंगतां नार्हसि मामहन्तुम्।

अहं हि मातङ्गविलासगामिना

प्लवंगमानामृषभेण धीमता।

विना वरार्होत्तमहेममालिना

चिरं न शक्ष्यामि नरेन्द्र जीवितुम्॥ ४०॥

‘मैं दु:खिनी और अनाथा हूँ। पतिसे दूर कर दी गयी हूँ। ऐसी दशामें मुझे जीवित छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है। नरेन्द्र! मैं सुन्दर एवं बहुमूल्य श्रेष्ठ सुवर्णमालासे अलंकृत तथा गजराजके समान विलासयुक्त गतिसे चलनेवाले बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ वालीके बिना अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकूँगी’॥ ४०॥

इत्येवमुक्तस्तु विभुर्महात्मा

तारां समाश्वास्य हितं बभाषे।

मा वीरभार्ये विमतिं कुरुष्व

लोको हि सर्वो विहितो विधात्रा॥ ४१॥

ताराके ऐसा कहनेपर महात्मा भगवान् श्रीरामने उसे आश्वासन देकर हितकी बात कही—‘वीरपत्नी! तुम मृत्यु-विषयक विपरीत विचारका त्याग करो; क्योंकि विधाताने इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है॥ ४१॥

तं चैव सर्वं सुखदु:खयोगं

लोकोऽब्रवीत् तेन कृतं विधात्रा।

त्रयोऽपि लोका विहितं विधानं

नातिक्रमन्ते वशगा हि तस्य॥ ४२॥

‘विधाताने ही इस सारे जगत्को सुख-दु:खसे संयुक्त किया है। यह बात साधारणलोग भी कहते और जानते हैं। तीनों लोकोंके प्राणी विधाताके विधानका उल्लङ्घन नहीं कर सकते; क्योंकि सभी उसके अधीन हैं॥ ४२॥

प्रीतिं परां प्राप्स्यसि तां तथैव

पुत्रश्च ते प्राप्स्यति यौवराज्यम्।

धात्रा विधानं विहितं तथैव

न शूरपत्न्य: परिदेवयन्ति॥ ४३॥

‘तुम्हें पहलेकी ही भाँति अत्यन्त सुख एवं आनन्दकी प्राप्ति होगी तथा तुम्हारा पुत्र युवराजपद प्राप्त करेगा। विधाताका ऐसा ही विधान है। शूरवीरोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप नहीं करती हैं। (अत: तुम भी शोक छोड़कर शान्त हो जाओ)’॥

आश्वासिता तेन महात्मना तु

प्रभावयुक्तेन परंतपेन।

सा वीरपत्नी ध्वनता मुखेन

सुवेषरूपा विरराम तारा॥ ४४॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले परम प्रभावशाली महात्मा श्रीरामके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर सुन्दर वेश और रूपवाली वीरपत्नी तारा, जिसके मुखसे विलापकी ध्वनि निकलती रहती थी, चुप हो गयी—उसने रोना-धोना छोड़ दिया॥ ४४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्विंश: सर्ग:॥ २४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४॥

 

 


पञ्चविंश: सर्ग:

लक्ष्मणसहित श्रीरामका सुग्रीव, तारा और अङ्गदको समझाना तथा वालीके दाह-संस्कारके लिये आज्ञा प्रदान करना, फिर तारा आदिसहित सब वानरोंका वालीके शवको श्मशानभूमिमें ले जाकर अङ्गदके द्वारा उसकादाह-संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना

स सुग्रीवं च तारां च साङ्गदां सहलक्ष्मण:।

समानशोक: काकुत्स्थ: सान्त्वयन्निदमब्रवीत्॥ १॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदिके शोकसे उनके समान ही दु:खी थे। उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और ताराको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—॥ १॥

न शोकपरितापेन श्रेयसा युज्यते मृत:।

यदत्रानन्तरं कार्यं तत् समाधातुमर्हथ॥ २॥

‘शोक-संताप करनेसे मरे हुए जीवकी कोई भलाई नहीं होती। अत: अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये॥ २॥

लोकवृत्तमनुष्ठेयं कृतं वो बाष्पमोक्षणम्।

न कालादुत्तरं किंचित् कर्मशक्यमुपासितुम्॥ ३॥

‘तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके। अब उसकी आवश्यकता नहीं है। लोकाचारका भी पालन होना चाहिये। समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता (क्योंकि उचित समयपर न किया जाय तो उस कर्मका कोई फल नहीं होता)॥ ३॥

नियति: कारणं लोके नियति: कर्मसाधनम्।

नियति: सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम्॥ ४॥

‘जगत्में नियति (काल) ही सबका कारण है। वही समस्त कर्मोंका साधन है और काल ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कर्मोंमें नियुक्त करनेका कारण है (क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है)॥ ४॥

न कर्ता कस्यचित् कश्चिन्नियोगे नापि चेश्वर:।

स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य काल: परायणम्॥ ५॥

‘कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी कामको कर सकता है और न किसी दूसरेको ही उसमें लगानेकी शक्ति रखता है। सारा जगत् स्वभावके अधीन है और स्वभावका आधार काल है॥ ५॥

न काल: कालमत्येति न काल: परिहीयते।

स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते॥ ६॥

‘काल भी कालका (अपनी की हुई व्यवस्थाका) उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल कभी क्षीण नहीं होता। स्वभाव (प्रारब्धकर्म) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता॥ ६॥

न कालस्यास्ति बन्धुत्वं न हेतुर्न पराक्रम:।

न मित्रज्ञातिसम्बन्ध: कारणं नात्मनो वश:॥ ७॥

‘कालका किसीके साथ भाई-चारेका, मित्रताका अथवा जाति-बिरादरीका सम्बन्ध नहीं है। उसको वशमें करनेका कोई उपाय नहीं है तथा उसपर किसीका पराक्रम नहीं चल सकता। कारणस्वरूप भगवान् काल जीवके भी वशमें नहीं है॥

किं तु कालपरीणामो द्रष्टव्य: साधु पश्यता।

धर्मश्चार्थश्च कामश्च कालक्रमसमाहिता:॥ ८॥

‘अत: साधुदर्शी विवेकी पुरुषको सब कुछ कालका ही परिणाम समझना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम भी कालक्रमसे ही प्राप्त होते हैं॥ ८॥

इत: स्वां प्रकृतिं वाली गत: प्राप्त: क्रियाफलम्।

सामदानार्थसंयोगै: पवित्रं प्लवगेश्वर:॥ ९॥

‘(मेरे द्वारा मारे जानेके कारण) वानरराज वाली शरीरसे मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए हैं। नीतिशास्त्रके अनुकूल साम, दान और अर्थके समुचित प्रयोगसे मिलनेवाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये॥ ९॥

स्वधर्मस्य च संयोगाज्जितस्तेन महात्मना।

स्वर्ग: परिगृहीतश्च प्राणानपरिरक्षता॥ १०॥

‘महात्मा वालीने पहले अपने धर्मके संयोगसे जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्गको इस समय युद्धमें प्राणोंकी रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथमें कर लिया है॥ १०॥

एषा वै नियति: श्रेष्ठा यां गतो हरियूथप:।

तदलं परितापेन प्राप्तकालमुपास्यताम्॥ ११॥

‘यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरोंके सरदार वालीने प्राप्त किया है। अत: अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो’॥ ११॥

वचनान्ते तु रामस्य लक्ष्मण: परवीरहा।

अवदत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं गतचेतसम्॥ १२॥

श्रीरामचन्द्रजीकी बात समाप्त होनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीवसे नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा—॥

कुरु त्वमस्य सुग्रीव प्रेतकार्यमनन्तरम्।

ताराङ्गदाभ्यां सहितो वालिनो दहनं प्रति॥ १३॥

‘सुग्रीव! अब तुम अङ्गद और ताराके साथ रहकर वालीके दाह-संस्कार-सम्बन्धी प्रेतकार्य करो॥ १३॥

समाज्ञापय काष्ठानि शुष्काणि च बहूनि च।

चन्दनानि च दिव्यानि वालिसंस्कारकारणात्॥ १४॥

‘सेवकोंको आज्ञा दो—वे वालीके दाह-संस्कारके निमित्त प्रचुर मात्रामें सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें॥

समाश्वासय दीनं त्वमङ्गदं दीनचेतसम्।

मा भूर्बालिशबुद्धिस्त्वं त्वदधीनमिदं पुरम्॥ १५॥

‘अङ्गदका चित्त बहुत दु:खी हो गया है। इन्हें धैर्य बँधाओ। तुम अपने मनमें मूढ़ता न लाओ—किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है॥ १५॥

अङ्गदस्त्वानयेन्माल्यं वस्त्राणि विविधानि च।

घृतं तैलमथो गन्धान् यच्चात्र समनन्तरम्॥ १६॥

‘अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकारके वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें॥ १६॥

त्वं तार शिबिकां शीघ्रमादायागच्छ सम्भ्रमात्।

त्वरा गुणवती युक्ता ह्यस्मिन् काले विशेषत:॥ १७॥

‘तार! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक फुर्ती दिखानी चाहिये। ऐसे अवसरपर वही लाभदायक होती है॥ १७॥

सज्जीभवन्तु प्लवगा: शिबिकावाहनोचिता:।

समर्था बलिनश्चैव निर्हरिष्यन्ति वालिनम्॥ १८॥

‘पालकीको उठाकर ले चलनेके योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ। वे ही वालीको यहाँसे श्मशानभूमिमें ले चलेंगे’॥ १८॥

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सुमित्रानन्दवर्धन:।

तस्थौ भ्रातृसमीपस्थो लक्ष्मण: परवीरहा॥ १९॥

सुग्रीवसे ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाईके पास जाकर खड़े हो गये॥

लक्ष्मणस्य वच: श्रुत्वा तार: सम्भ्रान्तमानस:।

प्रविवेश गुहां शीघ्रं शिबिकासक्तमानस:॥ २०॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी। वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया॥ २०॥

आदाय शिबिकां तार: स तु पर्यापतत् पुन:।

वानरैरुह्यमानां तां शूरैरुद्वहनोचितै:॥ २१॥

वहाँसे शिबिका ढोनेके योग्य शूरवीर वानरोंद्वारा कंधोंपर उठायी हुई उस शिबिकाको साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया॥ २१॥

दिव्यां भद्रासनयुतां शिबिकां स्यन्दनोपमाम्।

पक्षिकर्मभिराचित्रां द्रुमकर्मविभूषिताम्॥ २२॥

वह दिव्य पालकी रथके समान बनी हुई थी। उसके बीचमें राजाके बैठने योग्य उत्तम आसन था। उसमें शिल्पियोंद्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकीको विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे॥ २२॥

आचितां चित्रपत्तीभि: सुनिविष्टां समन्तत:।

विमानमिव सिद्धानां जालवातायनायुताम्॥ २३॥

वह शिबिका चित्रके रूपमें बने हुए पैदल सिपाहियोंसे भरी प्रतीत होती थी। उसकी निर्माणकला सब ओरसे बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। देखनेमें वह सिद्धोंके विमान-सी प्रतीत होती थी। उसमें कई खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं॥ २३॥

सुनियुक्तां विशालां च सुकृतां शिल्पिभि: कृताम्।

दारुपर्वतकोपेतां चारुकर्मपरिष्कृताम्॥ २४॥

कारीगरोंने उस पालकीको बहुत सुन्दर बनानेका प्रयत्न किया था। उसका एक-एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था। आकारमें वह बहुत बड़ी थी। उसमें लकड़ियोंके क्रीडा-पर्वत बने हुए थे। वह मनोहर शिल्प-कर्मसे सुशोभित थी॥ २४॥

वराभरणहारैश्च चित्रमाल्योपशोभिताम्।

गुहागहनसंछन्नां रक्तचन्दनभूषिताम्॥ २५॥

सुन्दर आभूषण और हारोंसे उसको सजाया गया था। विचित्र फूलोंसे उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी। शिल्पियोंद्वारा निर्मित गुफा और वनसे वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दनद्वारा उसे विभूषित किया गया था॥ २५॥

पुष्पौघै: समभिच्छन्नां पद्ममालाभिरेव च।

तरुणादित्यवर्णाभिर्भ्राजमानाभिरावृताम् ॥ २६॥

नाना प्रकारके पुष्पसमूहोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित थी तथा प्रात:कालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्ममालाओंसे अलंकृत थी॥ २६॥

ईदृशीं शिबिकां दृष्ट्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।

क्षिप्रं विनीयतां वाली प्रेतकार्यं विधीयताम्॥ २७॥

ऐसी पालकीका अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणकी ओर देखते हुए कहा—‘अब वालीको शीघ्र ही यहाँसे श्मशानभूमिमें ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय’॥ २७॥

ततो वालिनमुद्यम्य सुग्रीव: शिबिकां तदा।

आरोपयत विक्रोशन्नङ्गदेन सहैव तु॥ २८॥

तब अङ्गदके साथ करुण-क्रन्दन करते हुए सुग्रीवने वालीके शवको उठाकर उस शिबिकामें रखा॥ २८॥

आरोप्य शिबिकां चैव वालिनं गतजीवितम्।

अलंकारैश्च विविधैर्माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषितम्॥ २९॥

मृत वालीको शिबिकामें चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकारके अलंकारों, फूलोंके गजरों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंसे विभूषित किया॥ २९॥

आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीव: प्लवगेश्वर:।

और्ध्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलत:॥ ३०॥

तदनन्तर वानरोंके स्वामी राजा सुग्रीवने आज्ञा दी कि ‘मेरे बड़े भाईका और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधिसे सम्पन्न किया जाय॥ ३०॥

विश्राणयन्तो रत्नानि विविधानि बहूनि च।

अग्रत: प्लवगा यान्तु शिबिका तदनन्तरम्॥ ३१॥

‘आगे-आगे बहुत-से वानर नाना प्रकारके बहुसंख्यक रत्न लुटाते हुए चलें। उनके पीछे शिबिका चले॥ ३१॥

राज्ञामृद्धिविशेषा हि दृश्यन्ते भुवि यादृशा:।

तादृशैरिह कुर्वन्तु वानरा भर्तृसत्क्रियाम्॥ ३२॥

‘इस भूतलपर राजाओंके और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी बढ़ी हुई समृद्धिके अनुसार जैसे धूमधामसे होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वालीका अन्त्येष्टि-संस्कार करें’॥ ३२॥

तादृशं वालिन: क्षिप्रं प्राकुर्वन्नौर्ध्वदेहिकम्।

अङ्गदं परिरभ्याशु तारप्रभृतयस्तदा॥ ३३॥

क्रोशन्त: प्रययु: सर्वे वानरा हतबान्धवा:।

तब तार आदि वानरोंने वालीके और्ध्वदेहिक संस्कारका शीघ्र वैसा ही आयोजन किया। जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब-के-सब वानर अङ्गदको हृदयसे लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे रोते हुए शवके साथ चले॥ ३३/

तत: प्रणिहिता: सर्वा वानर्योऽस्य वशानुगा:॥ ३४॥

चुक्रुशुर्वीरवीरेति भूय: क्रोशन्ति ता: प्रियम्।

उनके पीछे वालीके अधीन रहनेवाली सभी वानर-पत्नियाँ समीप आकर ‘हा वीर, हा वीर’ कहती हुई अपने प्रियतमको पुकार-पुकारकर बारंबार रोने-चिल्लाने लगीं॥

ताराप्रभृतय: सर्वा वानर्यो हतबान्धवा:॥ ३५॥

अनुजग्मुश्च भर्तारं क्रोशन्त्य: करुणस्वना:।

जिनके जीवनधनका वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वरसे विलाप करती हुई अपने स्वामीके पीछे-पीछे चलने लगीं॥ ३५/

तासां रुदितशब्देन वानरीणां वनान्तरे॥ ३६॥

वनानि गिरयश्चैव विक्रोशन्तीव सर्वत:।

वनके भीतर रोती हुई उन वानर वधुओंके रोदन-शब्दसे गूँजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे॥ ३६/

पुलिने गिरिनद्यास्तु विविक्ते जलसंवृते॥ ३७॥

चितां चक्रु: सुबहवो वानरा वनचारिण:।

पहाड़ी123 नदी तुङ्गभद्राके एकान्त तटपर जो जलसे घिरा था, पहुँचकर बहुत-से वनचारी वानरोंने एक चिता तैयार की॥ ३७/

अवरोप्य तत: स्कन्धाच्छिबिकां वानरोत्तमा:॥ ३८॥

तस्थुरेकान्तमाश्रित्य सर्वे शोकपरायणा:।

तदनन्तर पालकी ढोनेवाले श्रेष्ठ वानरोंने उसे अपने कंधेसे उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थानमें जा बैठे॥ ३८/

ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम्॥ ३९॥

आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदु:खिता।

तत्पश्चात् ताराने शिबिकामें सुलाये हुए अपने पतिके शवको देखकर उनके मस्तकको अपनी गोदमें ले लिया और अत्यन्त दु:खी होकर वह विलाप करने लगी॥ ३९/

हा वानरमहाराज हा नाथ मम वत्सल॥ ४०॥

हा महार्ह महाबाहो हा मम प्रिय पश्य माम्।

जनं न पश्यसीमं त्वं कस्माच्छोकाभिपीडितम्॥ ४१॥

‘हा वानरोंके महाराज! हा मेरे दयालु प्राणनाथ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर! हा मेरे प्रियतम! एक बार मेरी ओर देखो तो सही। इस शोकपीड़ित दासीकी ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो?॥ ४०-४१॥

प्रहृष्टमिह ते वक्त्रं गतासोरपि मानद।

अस्तार्कसमवर्णं च दृश्यते जीवतो यथा॥ ४२॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले प्राणवल्लभ! प्राणोंके निकल जानेपर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्थाकी भाँति अस्ताचलवर्ती सूर्यके समान अरुण प्रभासे युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है॥ ४२॥

एष त्वां रामरूपेण काल: कर्षति वानर।

येन स्म विधवा: सर्वा: कृता एकेषुणा रणे॥ ४३॥

‘वानरराज! श्रीरामके रूपमें यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्धके मैदानमें एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया॥ ४३॥

इमास्तास्तव राजेन्द्र वानर्योऽप्लवगास्तव।

पादैर्विकृष्टमध्वानमागता: किं न बुध्यसे॥ ४४॥

‘महाराज! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरोंकी भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे-पीछे बहुत दूरके मार्गपर पैदल ही चली आयी हैं। इस बातको क्या तुम नहीं जानते?॥ ४४॥

तवेष्टा ननु चैवेमा भार्याश्चन्द्रनिभानना:।

इदानीं नेक्षसे कस्मात् सुग्रीवं प्लवगेश्वर॥ ४५॥

‘वानरराज! जो तुम्हें परम प्रिय थीं वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं। तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीवको भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो?॥

एते हि सचिवा राजंस्तारप्रभृतयस्तव।

पुरवासिजनश्चायं परिवार्य विषीदति॥ ४६॥

‘राजन्! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासीजन तुम्हें चारों ओरसे घेरकर दु:खी हो रहे हैं॥

विसर्जयैनान् सचिवान् यथापुरमरिंदम।

तत: क्रीडामहे सर्वा वनेषु मदनोत्कटा:॥ ४७॥

‘शत्रुदमन! आप पहलेकी भाँति इन मन्त्रियोंको बिदा कर दीजिये। फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन वनोंमें आपके साथ क्रीडा करेंगी’॥ ४७॥

एवं विलपतीं तारां पतिशोकपरीवृताम्।

उत्थापयन्ति स्म तदा वानर्य: शोककर्शिता:॥ ४८॥

पतिके शोकमें डूबी हुई ताराको इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोकसे दुर्बल हुई अन्य वानरियोंने उसे उठाया॥ ४८॥

सुग्रीवेण तत: सार्धं सोऽङ्गद: पितरं रुदन्।

चितामारोपयामास शोकेनाभिप्लुतेन्द्रिय:॥ ४९॥

इसके बाद संतापपीड़ित इन्द्रियोंवाले अङ्गदने रोते-रोते सुग्रीवकी सहायतासे पिताको चितापर रखा॥ ४९॥

ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह।

पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रिय:॥ ५०॥

फिर शास्त्रीय विधिके अनुसार उसमें आग लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की। इसके बाद यह सोचकर कि ‘मेरे पिता लंबी यात्राके लिये प्रस्थित हुए हैं’ अङ्गदकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं॥ ५०॥

संस्कृत्य वालिनं तं तु विधिवत् प्लवगर्षभा:।

आजग्मुरुदकं कर्तुं नदीं शुभजलां शिवाम्॥ ५१॥

इस प्रकार विधिवत् वालीका दाह-संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देनेके लिये पवित्र जलसे भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदीके तटपर आये॥ ५१॥

ततस्ते सहितास्तत्र ह्यङ्गदं स्थाप्य चाग्रत:।

सुग्रीवतारासहिता: सिषिचुर्वालिने जलम्॥ ५२॥

वहाँ अङ्गदको आगे रखकर सुग्रीव और तारासहित सभी वानरोंने वालीके लिये एक साथ जलाञ्जलि दी॥ ५२॥

सुग्रीवेणैव दीनेन दीनो भूत्वा महाबल:।

समानशोक: काकुत्स्थ: प्रेतकार्याण्यकारयत्॥ ५३॥

दु:खी हुए सुग्रीवके साथ ही उन्हींके समान शोकग्रस्त एवं दु:खी हो महाबली श्रीरामने वालीके समस्त प्रेतकार्य करवाये॥ ५३॥

ततोऽथ तं वालिनमग्र्यपौरुषं

प्रकाशमिक्ष्वाकुवरेषुणा हतम्।

प्रदीप्य दीप्ताग्निसमौजसं तदा

सलक्ष्मणं राममुपेयिवान् हरि:॥ ५४॥

इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामके बाणसे मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुविख्यात वालीका दाह-संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मणसहित श्रीरामके पास आये॥ ५४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चविंश: सर्ग:॥ २५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥

 


षड्विंश: सर्ग:

हनुमान्‌जीका सुग्रीवके अभिषेकके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे किष्किन्धामें पधारनेकी प्रार्थना, श्रीरामका पुरीमें न जाकर केवल अनुमति देना, तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गदका अभिषेक

तत: शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम्।

शाखामृगमहामात्रा: परिवार्योपतस्थिरे॥ १॥

अभिगम्य महाबाहुं राममक्लिष्टकारिणम्।

स्थिता: प्राञ्जलय: सर्वे पितामहमिवर्षय:॥ २॥

तदनन्तर वानरसेनाके प्रधान-प्रधान वीर (हनुमान् आदि) भीगे वस्त्रवाले शोक-संतप्त सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाबाहु श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए। श्रीरामके पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजीके सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं॥

तत: काञ्चनशैलाभस्तरुणार्कनिभानन:।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मज:॥ ३॥

तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले वायुपुत्र हनुमान्‌जी, जिनका मुख प्रात:कालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले—॥ ३॥

भवत्प्रसादात् काकुत्स्थ पितृपैतामहं महत्।

वानराणां सुदंष्ट्राणां सम्पन्नबलशालिनाम्॥ ४॥

महात्मनां सुदुष्प्रापं प्राप्तं राज्यमिदं प्रभो।

भवता समनुज्ञात: प्रविश्य नगरं शुभम्॥ ५॥

संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृद्गण:।

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! आपकी कृपासे सुग्रीवको सुन्दर दाढ़वाले पूर्णबलशाली और महामनस्वी वानरोंका यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके बाप-दादोंके समयसे चला आ रहा है। प्रभो! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसादसे यह इन्हें सुलभ हो गया। अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगरमें प्रवेश करके सुहृदोंके साथ अपना सब राजकार्य सँभालें॥

स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि॥ ६॥

अर्चयिष्यति माल्यैश्च रत्नैश्च त्वां विशेषत:।

इमां गिरिगुहां रम्यामभिगन्तुं त्वमर्हसि॥ ७॥

कुरुष्व स्वामिसम्बन्धं वानरान् सम्प्रहर्षय।

‘ये शास्त्रविधिके अनुसार नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थों और ओषधियोंसहित जलसे राज्यपर अभिषिक्त होकर मालाओं तथा रत्नोंद्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे। अत: आप इस रमणीय पर्वत-गुफा किष्किन्धामें पधारनेकी कृपा करें और इन्हें इस राज्यका स्वामी बनाकर वानरोंका हर्ष बढ़ावें’॥ ६-७/

एवमुक्तो हनुमता राघव: परवीरहा॥ ८॥

प्रत्युवाच हनूमन्तं बुद्धिमान् वाक्यकोविद:।

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले तथा बातचीतमें कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने उन्हें यों उत्तर दिया—॥ ८/

चतुर्दश समा: सौम्य ग्रामं वा यदि वा पुरम्॥ ९॥

न प्रवेक्ष्यामि हनुमन् पितुर्निर्देशपालक:।

‘हनुमन्! सौम्य! मैं पिताकी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ, अत: चौदह वर्षोंके पूर्ण होनेतक किसी ग्राम या नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा॥ ९/

सुसमृद्धां गुहां दिव्यां सुग्रीवो वानरर्षभ:॥ १०॥

प्रविष्टो विधिवद् वीर: क्षिप्रं राज्येऽभिषिच्यताम्।

‘वानरश्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफामें प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय’॥ १०/

एवमुक्त्वा हनूमन्तं राम: सुग्रीवमब्रवीत्॥ ११॥

वृत्तज्ञो वृत्तसम्पन्नमुदारबलविक्रमम्।

इममप्यङ्गदं वीरं यौवराज्येऽभिषेचय॥ १२॥

हनुमान्से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवसे बोले— ‘मित्र! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते हो। कुमार अङ्गद सदाचारसम्पन्न तथा महान् बल-पराक्रमसे परिपूर्ण हैं। इनमें वीरता कूट-कूटकर भरी है, अत: तुम इनको भी युवराजके पदपर अभिषिक्त करो॥ ११-१२॥

ज्येष्ठस्य हि सुतो ज्येष्ठ: सदृशो विक्रमेण च।

अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम्॥ १३॥

‘ये तुम्हारे बड़े भाईके ज्येष्ठ पुत्र हैं। पराक्रममें भी उन्हींके समान हैं तथा इनका हृदय उदार है। अत: अङ्गद युवराजपदके सर्वथा अधिकारी हैं॥ १३॥

पूर्वोऽयं वार्षिको मास: श्रावण: सलिलागम:।

प्रवृत्ता: सौम्य चत्वारो मासा वार्षिक संज्ञिता:॥ १४॥

‘सौम्य! वर्षा कहलानेवाले चार मास या चौमासे आ गये। इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जलकी प्राप्ति करानेवाला है, आरम्भ हो गया॥ १४॥

नायमुद्योगसमय: प्रविश त्वं पुरीं शुभाम्।

अस्मिन् वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सहलक्ष्मण:॥ १५॥

‘सौम्य! यह किसीपर चढ़ाई करनेका समय नहीं है। इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरीमें जाओ। मैं लक्ष्मणके साथ इस पर्वतपर निवास करूँगा॥ १५॥

इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता।

प्रभूतसलिला सौम्य प्रभूतकमलोत्पला॥ १६॥

‘सौम्य सुग्रीव! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है। इसमें आवश्यकताके अनुरूप हवा भी मिल जाती है। यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं॥ १६॥

कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत।

एष न: समय: सौम्य प्रविश त्वं स्वमालयम्॥ १७॥

अभिषिञ्चस्व राज्ये च सुहृद: सम्प्रहर्षय।

‘सखे! कार्तिक आनेपर तुम रावणके वधके लिये प्रयत्न करना। यही हमलोगोंका निश्चय रहा। अब तुम अपने महलमें प्रवेश करो और राज्यपर अभिषिक्त होकर सुहृदोंको आनन्दित करो’॥ १७/

इति रामाभ्यनुज्ञात: सुग्रीवो वानरर्षभ:॥ १८॥

प्रविवेश पुरीं रम्यां किष्किन्धां वालिपालिताम्।

श्रीरामचन्द्रजीकी यह आज्ञा पाकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरीमें गये, जिसकी रक्षा वालीने की थी॥ १८/

तं वानरसहस्राणि प्रविष्टं वानरेश्वरम्॥ १९॥

अभिवार्य प्रविष्टानि सर्वत: प्लवगेश्वरम्।

उस समय गुफामें प्रविष्ट हुए उन वानरराजको चारों ओरसे घेरकर हजारों वानर उनके साथ ही गुहामें घुसे॥ १९/

तत: प्रकृतय: सर्वा दृष्ट्वा हरिगणेश्वरम्॥ २०॥

प्रणम्य मूर्ध्ना पतिता वसुधायं समाहिता:।

वानरराजको देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंने एकाग्रचित्त हो पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया॥

सुग्रीव: प्रकृती: सर्वा: सम्भाष्योत्थाप्य वीर्यवान्॥ २१॥

भ्रातुरन्त:पुरं सौम्यं प्रविवेश महाबल:।

महाबली पराक्रमी सुग्रीवने उन सबको उठनेकी आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भाईके सौम्य अन्त:पुरमें प्रविष्ट हुए॥ २१/

प्रविष्टं भीमविक्रान्तं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥ २२॥

अभ्यषिञ्चन्त सुहृद: सहस्राक्षमिवामरा:।

भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीवको अन्त:पुरमें आया देख उनके सुहृदोंने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओंने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रका किया था॥ २२/

तस्य पाण्डुरमाजहृश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्॥ २३॥

शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।

तथा रत्नानि सर्वाणि सर्वबीजौषधानि च॥ २४॥

सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान् कुसुमानि च।

शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्॥ २५॥

सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।

चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान् बहून्॥ २६॥

अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुं मधुसर्पिषी।

दधि चर्म च वैयाघ्रं परार्घ्यौ चाप्युपानहौ॥ २७॥

समालम्भनमादाय गोरोचनमन:शिलाम्।

आजग्मुस्तत्र मुदिता वरा: कन्याश्च षोडश॥ २८॥

पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोनेकी डाँड़ीवाले दो सफेद चँवर, सब प्रकारके रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूधवाले वृक्षोंकी नीचे लटकनेवाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थलमें होनेवाले सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकारके बहुत-से सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्गु (कगनी) मधु, घी, दही, व्याघ्रचर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्षसे भरी हुई सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीवके पास आयीं॥ २३—२८॥

ततस्ते वानरश्रेष्ठमभिषेक्तुं यथाविधि।

रत्नैर्वस्त्रैश्च भक्ष्यैश्च तोषयित्वा द्विजर्षभान्॥ २९॥

तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थोंसे संतुष्ट करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीवका विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य आरम्भ किया॥ २९॥

तत: कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम्।

मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदो जना:॥ ३०॥

मन्त्रवेत्ता पुरुषोंने वेदीपर अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्निवेदीके चारों ओर कुश बिछाये। फिर अग्निका संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्यके द्वारा प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी॥ ३०॥

ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।

प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते॥ ३१॥

प्राङ्मुखं विधिवन्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।

तत्पश्चात् रंग-बिरंगी पुष्पमालाओंसे सुशोभित रमणीय अट्टालिकापर एक सोनेका सिंहासन रखा गया और उसपर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीवको पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया॥ ३१/

नदीनदेभ्य: संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्तत:॥ ३२॥

आहृत्य च समुद्रेभ्य: सर्वेभ्यो वानरर्षभा:।

अप: कनककुम्भेषु निधाय विमलं जलम्॥ ३३॥

शुभैऋर्षभशृङ्गैश्च कलशैश्चैव काञ्चनै:।

शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च॥ ३४॥

गजो गवाक्षो गवय: शरभो गन्धमादन:।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा॥ ३५॥

अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।

सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा॥ ३६॥

इसके बाद श्रेष्ठ वानरोंने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओंके तीर्थों और समस्त समुद्रोंसे लाये हुए निर्मल जलको एकत्र करके उसे सोनेके कलशोंमें रखा। फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान्ने महर्षियोंकी बतायी हुई शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जलसे साँडके सींगोंद्वारा सुग्रीवका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओंने इन्द्रका अभिषेक किया था॥

अभिषिक्ते तु सुग्रीवे सर्वे वानरपुङ्गवा:।

प्रचुक्रुशुर्महात्मानो हृष्टा: शतसहस्रश:॥ ३७॥

सुग्रीवका अभिषेक हो जानेपर वहाँ लाखोंकी संख्यामें एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर जयघोष करने लगे॥ ३७॥

रामस्य तु वच: कुर्वन् सुग्रीवो वानरेश्वर:।

अङ्गदं सम्परिष्वज्य यौवराज्येऽभ्यषेचयत्॥ ३८॥

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करते हुए वानरराज सुग्रीवने अङ्गदको हृदयसे लगाकर उन्हें भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया॥ ३८॥

अङ्गदे चाभिषिक्ते तु सानुक्रोशा: प्लवंगमा:।

साधु साध्विति सुग्रीवं महात्मानो ह्यपूजयन्॥ ३९॥

अङ्गदका अभिषेक हो जानेपर महामनस्वी दयालु वानर ‘साधु-साधु’ कहकर सुग्रीवकी सराहना करने लगे॥

रामं चैव महात्मानं लक्ष्मणं च पुन: पुन:।

प्रीताश्च तुष्टुवु: सर्वे तादृशे तत्र वर्तिनि॥ ४०॥

इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धामें सुग्रीव और अङ्गदके विराजमान होनेपर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणकी बारंबार स्तुति करने लगे॥ ४०॥

हृष्टपुष्टजनाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता।

बभूव नगरी रम्या किष्किन्धा गिरिगह्वरे॥ ४१॥

उस समय पर्वतकी गुफामें बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट-पुष्ट पुरवासियोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होनेके कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी॥

निवेद्य रामाय तदा महात्मने

महाभिषेकं कपिवाहिनीपति:।

रुमां च भार्यामुपलभ्य वीर्यवा-

नवाप राज्यं त्रिदशाधिपो यथा॥ ४२॥

वानरसेनाके स्वामी पराक्रमी सुग्रीवने महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर अपने महाभिषेकका समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमाको पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरोंका साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्रने त्रिलोकीका॥ ४२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षड्विंश: सर्ग:॥ २६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥

 


सप्तविंश: सर्ग:

प्रस्रवणगिरिपर श्रीराम और लक्ष्मणकी परस्पर बातचीत

अभिषिक्ते तु सुग्रीवे प्रविष्टे वानरे गुहाम्।

आजगाम सह भ्रात्रा राम: प्रस्रवणं गिरिम्॥ १॥

जब वानर सुग्रीवका राज्याभिषेक हो गया और वे किष्किन्धामें जाकर रहने लगे, उस समय अपने भाई लक्ष्मणके साथ श्रीरामजी प्रस्रवणगिरिपर चले गये॥ १॥

शार्दूलमृगसंघुष्टं सिंहैर्भीमरवैर्वृतम्।

नानागुल्मलतागूढं बहुपादपसंकुलम्॥ २॥

वहाँ चीतों और मृगोंकी आवाज गूँजती रहती थी। भयंकर गर्जना करनेवाले सिंहोंसे वह स्थान भरा था। नाना प्रकारकी झाड़ियाँ और लताएँ उस पर्वतको आच्छादित किये हुए थीं और घने वृक्षोंके द्वारा वह सब ओरसे व्याप्त था॥

ऋक्षवानरगोपुच्छैर्मार्जारैश्च निषेवितम्।

मेघराशिनिभं शैलं नित्यं शुचिकरं शिवम्॥ ३॥

रीछ, वानर, लंगूर और बिलाव आदि जन्तु वहाँ निवास करते थे। वह पर्वत मेघोंके समूह-सा जान पड़ता था। दर्शन करनेवाले लोगोंके लिये वह सदा ही मङ्गलमय और पवित्र-कारक था॥ ३॥

तस्य शैलस्य शिखरे महतीमायतां गुहाम्।

प्रत्यगृह्णीत वासार्थं राम: सौमित्रिणा सह॥ ४॥

उस पर्वतके शिखरपर एक बहुत बड़ी और विस्तृत गुफा थी। लक्ष्मणसहित श्रीरामने उसीका अपने रहनेके लिये आश्रय लिया॥ ४॥

कृत्वा च समयं राम: सुग्रीवेण सहानघ:।

कालयुक्तं महद्वाक्यमुवाच रघुनन्दन:॥ ५॥

विनीतं भ्रातरं भ्राता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्।

रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी वर्षाका अन्त होनेपर सुग्रीवके साथ रावणपर चढ़ाई करनेका निश्चय करके वहाँ आये थे। उन्होंने लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाले अपने विनययुक्त भ्राता लक्ष्मणसे यह समयोचित बात कही—॥ ५/

इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता॥ ६॥

अस्यां वत्स्याम सौमित्रे वर्षरात्रमरिंदम।

‘शत्रुदमन सुमित्राकुमार! यह पर्वतकी गुफा बड़ी ही सुन्दर और विशाल है। यहाँ हवाके आने-जानेका भी मार्ग है। हमलोग वर्षाकी रातमें इसी गुफाके भीतर निवास करेंगे॥ ६/

गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुत्तमं पार्थिवात्मज॥ ७॥

श्वेताभि: कृष्णताम्राभि: शिलाभिरुपशोभितम्।

‘राजकुमार! पर्वतका यह शिखर बहुत ही उत्तम और रमणीय है। सफेद, काले और लाल हर तरहके प्रस्तर-खण्ड इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ७/

नानाधातुसमाकीर्णं नदीदर्दुरसंयुतम्॥ ८॥

विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।

नानाविहगसंघुष्टं मयूरवरनादितम्॥ ९॥

‘यहाँ नाना प्रकारके धातुओंकी खानें हैं। पास ही नदी बहती है। उसमें रहनेवाले मेढक यहाँ भी उछलते-कूदते चले आते हैं। नाना प्रकारके वृक्ष-समूह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। सुन्दर और विचित्र लताओंसे यह शैल-शिखर हरा-भरा दिखायी देता है। भाँति-भाँतिके पक्षी यहाँ चहक रहे हैं तथा सुन्दर मोरोंकी मीठी बोली गूँज रही है॥ ८-९॥

मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्दुवारै: शिरीषकै:।

कदम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितैरुपशोभितम्॥ १०॥

‘मालती और कुन्दकी झाड़ियाँ, सिन्दुवार, शिरीष, कदम्ब, अर्जुन और सर्जके फूले हुए वृक्ष इस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ १०॥

इयं च नलिनी रम्या फुल्लपङ्कजमण्डिता।

नातिदूरे गुहाया नौ भविष्यति नृपात्मज॥ ११॥

‘राजकुमार! यह पुष्करिणी खिले हुए कमलोंसे अलंकृत हो बड़ी रमणीय दिखायी देती है। यह हमलोगोंकी गुफासे अधिक दूर नहीं होगी॥ ११॥

प्रागुदक्प्रवणे देशे गुहा साधु भविष्यति।

पश्चाच्चैवोन्नता सौम्य निवातेयं भविष्यति॥ १२॥

‘सौम्य! यहाँका स्थान ईशानकोणकी ओरसे नीचा है, अत: यहाँ यह गुफा हमारे निवासके लिये बहुत अच्छी रहेगी। पश्चिम-दक्षिणके कोणकी ओरसे ऊँची यह गुफा हवा और वर्षासे बचानेके लिये अच्छी होगी124॥ १२॥

गुहाद्वारे च सौमित्रे शिला समतला शिवा।

कृष्णा चैवायता चैव भिन्नाञ्जनचयोपमा॥ १३॥

‘सुमित्रानन्दन! इस गुफाके द्वारपर समतल शिला है, जो बाहर बैठनेके लिये सुविधाजनक होनेके कारण सुखदायिनी है। यह लंबी-चौड़ी होनेके साथ ही खानसे काटकर निकाले हुए कोयलोंकी राशिके समान काली है॥ १३॥

गिरिशृङ्गमिदं तात पश्य चोत्तरत: शुभम्।

भिन्नाञ्जनचयाकारमम्भोधरमिवोदितम् ॥ १४॥

‘तात! देखो, यह सुन्दर पर्वत-शिखर उत्तरकी ओरसे कटे हुए कोयलोंकी राशि तथा घुमड़े हुए मेघोंकी घटाके समान काला दिखायी देता है॥ १४॥

दक्षिणस्यामपि दिशि स्थितं श्वेतमिवाम्बरम्।

कैलासशिखरप्रख्यं नानाधातुविराजितम्॥ १५॥

‘इसी तरह दक्षिण दिशामें भी इसका जो शिखर है, वह श्वेत वस्त्र और कैलास-शृङ्गके समान श्वेत दिखायी देता है। नाना प्रकारकी धातुएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं॥ १५॥

प्राचीनवाहिनीं चैव नदीं भृशमकर्दमाम्।

गुहाया: परत: पश्य त्रिकूटे जाह्नवीमिव॥ १६॥

‘वह देखो, इस गुफाके दूसरी ओर त्रिकूट पर्वतके समीप बहनेवाली मन्दाकिनीके समान तुङ्गभद्रा नदी बह रही है। उसकी धारा पश्चिमसे पूर्वकी ओर जा रही है। उसमें कीचड़का नाम भी नहीं है॥ १६॥

चन्दनैस्तिलकै: सालैस्तमालैरतिमुक्तकै:।

पद्मकै: सरलैश्चैव अशोकैश्चैव शोभिताम्॥ १७॥

‘चन्दन, तिलक, साल, तमाल, अतिमुक्तक, पद्मक, सरल और शोक आदि नाना प्रकारके वृक्षोंसे उस नदीकी कैसी शोभा हो रही है?॥ १७॥

वानीरैस्तिमिदैश्चैव बकुलै: केतकैरपि।

हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेतसै: कृतमालकै:॥ १८॥

तीरजै: शोभिता भाति नानारूपैस्ततस्तत:।

वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलंकृता॥ १९॥

‘जलबेंत, तिमिद, बकुल, केतक, हिन्ताल, तिनिश, नीप, स्थलबेंत, कृतमाल (अमिलतास) आदि भाँति-भाँतिके तटवर्ती वृक्षोंसे जहाँ-तहाँ सुशोभित हुई यह नदी वस्त्राभूषणोंसे विभूषित शृङ्गारसज्जित युवती स्त्रीके समान जान पड़ती है॥ १८-१९॥

शतश: पक्षिसङ्घैश्च नानानादविनादिता।

एकैकमनुरक्तैश्च चक्रवाकैरलंकृता॥ २०॥

‘सैकड़ों पक्षिसमूहोंसे संयुक्त हुई यह नदी उनके नाना प्रकारके कलरवोंसे गूँजती रहती है। परस्पर अनुरक्त हुए चक्रवाक इस सरिताकी शोभा बढ़ाते हैं॥

पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेविता।

प्रहसन्त्येव भात्येषा नानारत्नसमन्विता॥ २१॥

‘अत्यन्त रमणीय तटोंसे अलंकृत, नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न तथा हंस और सारसोंसे सेवित यह नदी अपनी हास्यच्छटा बिखेरती हुई-सी जान पड़ती है॥ २१॥

क्वचिन्नीलोत्पलैश्छन्ना भातिरक्तोत्पलै: क्वचित्।

क्वचिदाभाति शुक्लैश्च दिव्यै: कुमुदकुड्मलै:॥ २२॥

‘कहीं तो यह नील कमलोंसे ढकी हुई है, कहीं लाल कमलोंसे सुशोभित होती है और कहीं श्वेत एवं दिव्य कुमुदकलिकाओंसे शोभा पाती है॥ २२॥

पारिप्लवशतैर्जुष्टा बर्हिक्रौञ्चविनादिता।

रमणीया नदी सौम्य मुनिसङ्घनिषेविता॥ २३॥

‘सैकड़ों जल-पक्षियोंसे सेवित तथा मोर एवं क्रौञ्चके कलरवोंसे मुखरित हुई यह सौम्य नदी बड़ी रमणीय प्रतीत होती है। मुनियोंके समुदाय इसके जलका सेवन करते हैं॥ २३॥

पश्य चन्दनवृक्षाणां पङ्क्ती: सुरुचिरा इव।

ककुभानां च दृश्यन्ते मनसैवोदिता: समम्॥ २४॥

‘वह देखो, अर्जुन और चन्दन वृक्षोंकी पंक्तियाँ कितनी सुन्दर दिखायी देती हैं। मालूम होता है ये मनके संकल्पके साथ ही प्रकट हो गयी हैं॥ २४॥

अहो सुरमणीयोऽयं देश: शत्रुनिषूदन।

दृढं रंस्याव सौमित्रे साध्वत्र निवसावहे॥ २५॥

‘शत्रुसूदन सुमित्राकुमार! यह स्थान अत्यन्त रमणीय और अद्भुत है। यहाँ हमलोगोंका मन खूब लगेगा। अत: यहीं रहना ठीक होगा॥ २५॥

इतश्च नातिदूरे सा किष्किन्धा चित्रकानना।

सुग्रीवस्य पुरी रम्या भविष्यति नृपात्मज॥ २६॥

‘राजकुमार! विचित्र काननोंसे सुशोभित सुग्रीवकी रमणीय किष्किन्धापुरी भी यहाँसे अधिक दूर नहीं होगी॥

गीतवादित्रनिर्घोष: श्रूयते जयतां वर।

नदतां वानराणां च मृदङ्गाडम्बरै: सह॥ २७॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मण! मृदङ्गकी मधुर ध्वनिके साथ गर्जते हुए वानरोंके गीत और वाद्यका गम्भीर घोष यहाँसे सुनायी देता है॥ २७॥

लब्ध्वा भार्यां कपिवर: प्राप्य राज्यं सुहृद्वृत:।

ध्रुवं नन्दति सुग्रीव: सम्प्राप्य महतीं श्रियम्॥ २८॥

‘निश्चय ही कपिश्रेष्ठ सुग्रीव अपनी पत्नीको पाकर, राज्यको हस्तगत करके और बड़ी भारी लक्ष्मीपर अधिकार प्राप्त करके सुहृदोंके साथ आनन्दोत्सव मना रहे हैं’॥ २८॥

इत्युक्त्वा न्यवसत् तत्र राघव: सहलक्ष्मण:।

बहुदृश्यदरीकुञ्जे तस्मिन् प्रस्रवणे गिरौ॥ २९॥

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवण पर्वतपर जहाँ बहुत-सी कन्दराओं और कुञ्जोंके दर्शन होते थे, निवास करने लगे॥ २९॥

सुसुखे हि बहुद्रव्ये तस्मिन् हि धरणीधरे।

वसतस्तस्य रामस्य रतिरल्पापि नाभवत्॥ ३०॥

हृतां हि भार्यां स्मरत: प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।

यद्यपि उस पर्वतपर परम सुख प्रदान करनेवाले बहुत-से फल-फूल आदि आवश्यक पदार्थ थे, तथापि राक्षसद्वारा हरी गयी प्राणोंसे भी बढ़कर आदरणीय सीताका स्मरण करते हुए भगवान् श्रीरामको वहाँ तनिक भी सुख नहीं मिलता था॥ ३०/

उदयाभ्युदितं दृष्ट्वा शशाङ्कं च विशेषत:॥ ३१॥

आविवेश न तं निद्रा निशासु शयनं गतम्।

विशेषत: उदयाचलपर उदित हुए चन्द्रदेवका दर्शन करके रातमें शय्यापर लेट जानेपर भी उन्हें नींद नहीं आती थी॥ ३१/

तत्समुत्थेन शोकेन बाष्पोपहतचेतनम्॥ ३२॥

तं शोचमानं काकुत्स्थं नित्यं शोकपरायणम्।

तुल्यदु:खोऽब्रवीद्भ्राता लक्ष्मणोऽनुनयं वच:॥ ३३॥

सीताके वियोगजनित शोकसे आँसू बहाते हुए वे अचेत हो जाते थे। श्रीरामको निरन्तर शोकमग्न रहकर चिन्ता करते देख उनके दु:खमें समानरूपसे भाग लेनेवाले भाई लक्ष्मणने उनसे विनयपूर्वक कहा—॥ ३२-३३॥

अलं वीर व्यथां गत्वा न त्वं शोचितुमर्हसि।

शोचतो ह्यवसीदन्ति सर्वार्था विदितं हि ते॥ ३४॥

‘वीर! इस प्रकार व्यथित होनेसे कोई लाभ नहीं है। अत: आपको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक करनेवाले पुरुषके सभी मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, यह बात आपसे छिपी नहीं है॥ ३४॥

भवान् क्रियापरो लोके भवान् देवपरायण:।

आस्तिको धर्मशीलश्च व्यवसायी च राघव॥ ३५॥

‘रघुनन्दन! आप जगत्में कर्मठ-वीर तथा देवताओंका समादर करनेवाले हैं। आस्तिक, धर्मात्मा और उद्योगी हैं॥ ३५॥

न ह्यव्यवसित: शत्रुं राक्षसं तं विशेषत:।

समर्थस्त्वं रणे हन्तुं विक्रमे जिह्मकारिणम्॥ ३६॥

‘यदि आप शोकवश उद्यम छोड़ बैठते हैं तो पराक्रमके स्थानस्वरूप समराङ्गणमें कुटिल कर्म करनेवाले उस शत्रुका, जो विशेषत: राक्षस है, वध करनेमें समर्थ न हो सकेंगे॥ ३६॥

समुन्मूलय शोकं त्वं व्यवसायं स्थिरीकुरु।

तत: सपरिवारं तं राक्षसं हन्तुमर्हसि॥ ३७॥

‘अत: आप अपने शोकको जड़से उखाड़ फेंकिये और उद्योगके विचारको सुस्थिर कीजिये। तभी आप परिवारसहित उस राक्षसका विनाश कर सकते हैं॥ ३७॥

पृथिवीमपि काकुत्स्थ ससागरवनाचलाम्।

परिवर्तयितुं शक्त: किं पुनस्तं हि रावणम्॥ ३८॥

‘काकुत्स्थ! आप तो समुद्र, वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको भी उलट सकते हैं; फिर उस रावणका संहार करना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ ३८॥

शरत्कालं प्रतीक्षस्व प्रावृट्कालोऽयमागत:।

तत: सराष्ट्रं सगणं रावणं तं वधिष्यसि॥ ३९॥

‘यह वर्षाकाल आ गया है। अब शरद्-ऋतुकी प्रतीक्षा कीजिये। फिर राज्य और सेनासहित रावणका वध कीजियेगा॥ ३९॥

अहं तु खलु ते वीर्यं प्रसुप्तं प्रतिबोधये।

दीप्तैराहुतिभि: काले भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ ४०॥

‘जैसे राखमें छिपी हुई आगको हवनकालमें आहुतियोंद्वारा प्रज्वलित किया जाता है, उसी प्रकार मैं आपके सोये हुए पराक्रमको जगा रहा हूँ—भूले हुए बल-विक्रमकी याद दिला रहा हूँ’॥ ४०॥

लक्ष्मणस्य हि तद् वाक्यं प्रतिपूज्य हितं शुभम्।

राघव: सुहृदं स्निग्धमिदं वचनमब्रवीत्॥ ४१॥

लक्ष्मणके इस शुभ एवं हितकर वचनकी सराहना करके श्रीरघुनाथजीने अपने स्नेही सुहृत् सुमित्राकुमारसे इस प्रकार कहा—॥ ४१॥

वाच्यं यदनुरक्तेन स्निग्धेन च हितेन च।

सत्यविक्रमयुक्तेन तदुक्तं लक्ष्मण त्वया॥ ४२॥

‘लक्ष्मण! अनुरागी, स्नेही, हितैषी और सत्यपराक्रमी वीरको जैसी बात कहनी चाहिये वैसी ही तुमने कही है॥ ४२॥

एष शोक: परित्यक्त: सर्वकार्यावसादक:।

विक्रमेष्वप्रतिहतं तेज: प्रोत्साहयाम्यहम्॥ ४३॥

‘लो, सब तरहके काम बिगाड़नेवाले शोकको मैंने त्याग दिया। अब मैं पराक्रमविषयक दुर्धर्ष तेजको प्रोत्साहित करता हूँ (बढ़ाता हूँ)॥ ४३॥

शरत्कालं प्रतीक्षिष्ये स्थितोऽस्मि वचने तव।

सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमनुपालयन्॥ ४४॥

‘तुम्हारी बात मान लेता हूँ। सुग्रीवके प्रसन्न होकर सहायता करने और नदियोंके जलके स्वच्छ होनेकी बाट देखता हुआ मैं शरत्-कालकी प्रतीक्षा करूँगा॥ ४४॥

उपकारेण वीरस्तु प्रतिकारेण युज्यते।

अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मन:॥ ४५॥

‘जो वीर पुरुष किसीके उपकारसे उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है, किंतु यदि कोई उपकारको न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकारसे मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषोंके मनको ठेस पहुँचाता है॥ ४५॥

तदेव युक्तं प्रणिधाय लक्ष्मण:

कृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम्।

उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं

प्रदर्शयन् दर्शनमात्मन: शुभम्॥ ४६॥

‘श्रीरामजीके उस कथनको ही युक्तियुक्त मानकर लक्ष्मणने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टिका परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ ४६॥

यथोक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं

नरेन्द्र कर्ता नचिरात् तु वानर:।

शरत्प्रतीक्ष: क्षमतामिमं भवान्

जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृत:॥ ४७॥

‘नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अत: आप शत्रुके संहार करनेका दृढ़ निश्चय लिये शरत्कालकी प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकालके विलम्बको सहन कीजिये॥ ४७॥

नियम्य कोपं परिपाल्यतां शरत्

क्षमस्व मासांश्चतुरो मया सह।

वसाचलेऽस्मिन् मृगराजसेविते

संवर्तयन् शत्रुवधे समर्थ:॥ ४८॥

‘क्रोधको काबूमें रखकर शरत्कालकी राह देखिये। बरसातके चार महीनोंतक जो भी कष्ट हो, उसे सहन कीजिये तथा शत्रुवधमें समर्थ होनेपर भी इस वर्षाकालको व्यतीत करते हुए मेरे साथ इस सिंहसेवित पर्वतपर निवास कीजिये’॥ ४८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तविंश: सर्ग:॥ २७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥

 


अष्टाविंश: सर्ग:

श्रीरामके द्वारा वर्षा-ऋतुका वर्णन

स तदा वालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषिच्य च।

वसन् माल्यवत: पृष्ठे रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १॥

इस प्रकार वालीका वध और सुग्रीवका राज्याभिषेक करनेके अनन्तर माल्यवान् पर्वतके पृष्ठभागमें निवास करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे कहने लगे—॥ १॥

अयं स काल: सम्प्राप्त: समयोऽद्य जलागम:।

सम्पश्य त्वं नभो मेघै: संवृतं गिरिसंनिभै:॥ २॥

‘सुमित्रानन्दन! अब यह जलकी प्राप्ति करानेवाला वह प्रसिद्ध वर्षाकाल आ गया। देखो, पर्वतके समान प्रतीत होनेवाले मेघोंसे आकाशमण्डल आच्छन्न हो गया है॥ २॥

नवमासधृतं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभि:।

पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौ: प्रसूते रसायनम्॥ ३॥

‘यह आकाशस्वरूपा तरुणी सूर्यकी किरणोंद्वारा समुद्रोंका रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासोंतक धारण किये हुए गर्भके रूपमें जलरूपी रसायनको जन्म दे रही है॥ ३॥

शक्यमम्बरमारुह्य125 मेघसोपानपंक्तिभि:।

कुटजार्जुनमालाभिरलंकर्तुं दिवाकर:॥ ४॥

‘इस समय मेघरूपी सोपानपंक्तियों (सीढ़ियों) द्वारा आकाशमें चढ़कर गिरिमल्लिका और अर्जुनपुष्पकी मालाओंसे सूर्यदेवको अलंकृत करना सरल-सा हो गया है॥ ४॥

संध्यारागोत्थितैस्ताम्रैरन्तेष्वपि च पाण्डुभि:।

स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम् ॥ ५॥

‘संध्याकालकी लाली प्रकट होनेसे बीचमें लाल तथा किनारेके भागोंमें श्वेत एवं स्निग्ध प्रतीत होनेवाले मेघखण्डोंसे आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसने अपने घावमें रक्तरञ्जित सफेद कपड़ोंकी पट्टी बाँध रखी हो॥ ५॥

मन्दमारुतिनि:श्वासं संध्याचन्दनरञ्जितम्।

आपाण्डुजलदं भाति कामातुरमिवाम्बरम्॥ ६॥

‘मन्द-मन्द हवा नि:श्वास-सी प्रतीत होती है, संध्याकालकी लाली लाल चन्दन बनकर ललाट आदि अङ्गोंको अनुरञ्जित कर रही है तथा मेघरूपी कपोल कुछ-कुछ पाण्डुवर्णका प्रतीत होता है। इस तरह यह आकाश कामातुर पुरुषके समान जान पड़ता है॥ ६॥

एषा घर्मपरिक्लिष्टा नववारिपरिप्लुता।

सीतेव शोकसंतप्ता मही बाष्पं विमुञ्चति॥ ७॥

‘जो ग्रीष्म-ऋतुमें घामसे तप गयी थी, वह पृथ्वी वर्षाकालमें नूतन जलसे भीगकर (सूर्य-किरणोंसे तपी और आँसुओंसे भीगी हुई) शोकसंतप्त सीताकी भाँति बाष्प विमोचन (उष्णताका त्याग अथवा अश्रुपात) कर रही है॥ ७॥

मेघोदरविनिर्मुक्ता: कर्पूरदलशीतला:।

शक्यमञ्जलिभि:126 पातुं वाता: केतकगन्धिन:॥ ८॥

‘मेघके उदरसे निकली, कपूरकी डलीके समान ठंडी तथा केवड़ेकी सुगन्धसे भरी हुई इस बरसाती वायुको मानो अञ्जलियोंमें भरकर पीया जा सकता है॥

एष फुल्लार्जुन: शैल: केतकैरभिवासित:।

सुग्रीव इव शान्तारिर्धाराभिरभिषिच्यते॥ ९॥

‘यह पर्वत, जिसपर अर्जुनके वृक्ष खिले हुए हैं तथा जो केवड़ोंसे सुवासित हो रहा है, शान्त हुए शत्रुवाले सुग्रीवकी भाँति जलकी धाराओंसे अभिषिक्त हो रहा है॥ ९॥

मेघकृष्णाजिनधरा धारायज्ञोपवीतिन:।

मारुतापूरितगुहा: प्राधीता इव पर्वता:॥ १०॥

मेघरूपी काले मृगचर्म तथा वर्षाकी धारारूप यज्ञोपवीत धारण किये वायुसे पूरित गुफा (या हृदय) वाले ये पर्वत ब्रह्मचारियोंकी भाँति मानो वेदाध्ययन आरम्भ कर रहे हैं॥ १०॥

कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम्।

अन्त:स्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम्॥ ११॥

‘ये बिजलियाँ सोनेके बने हुए कोड़ोंके समान जान पड़ती हैं। इनकी मार खाकर मानो व्यथित हुआ आकाश अपने भीतर व्यक्त हुई मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके रूपमें आर्तनाद-सा कर रहा है॥ ११॥

नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।

स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी॥ १२॥

‘नील मेघका आश्रय लेकर प्रकाशित होती हुई यह विद्युत् मुझे रावणके अङ्कमें छटपटाती हुई तपस्विनी सीताके समान प्रतीत होती है॥ १२॥

इमास्ता मन्मथवतां हिता: प्रतिहता दिश:।

अनुलिप्ता इव घनैर्नष्टग्रहनिशाकरा:॥ १३॥

‘बादलोंका लेप लग जानेसे जिनमें ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा अदृश्य हो गये हैं, अतएव जो नष्ट-सी हो गयी है—जिनके पूर्व, पश्चिम आदि भेदोंका विवेक लुप्त-सा हो गया है, वे दिशाएँ, उन कामियोंको, जिन्हें प्रेयसीका संयोगसुख सुलभ है, हितकर प्रतीत होती हैं॥ १३॥

क्वचिद् बाष्पाभिसंरुद्धान् वर्षागमसमुत्सुकान्।

कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।

मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान्॥ १४॥

‘सुमित्रानन्दन! देखो, इस पर्वतके शिखरोंपर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं? कहीं तो पहली बार वर्षा होनेपर भूमिसे निकले हुए भापसे ये व्याप्त हो रहे हैं और कहीं वर्षाके आगमनसे अत्यन्त उत्सुक (हर्षोत्फुल्ल) दिखायी देते हैं। मैं तो प्रिया-विरहके शोकसे पीड़ित हूँ और ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्निको उद्दीप्त कर रहे हैं॥ १४॥

रज: प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायु-

र्निदाघदोषप्रसरा: प्रशान्ता:।

स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां

प्रवासिनो यान्ति नरा: स्वदेशान्॥ १५॥

‘धरतीकी धूल शान्त हो गयी। अब वायुमें शीतलता आ गयी। गर्मीके दोषोंका प्रसार बंद हो गया। भूपालोंकी युद्धयात्रा रुक गयी और परदेशी मनुष्य अपने-अपने देशको लौट रहे हैं॥ १५॥

सम्प्रस्थिता मानसवासलुब्धा:

प्रियान्विता: सम्प्रति चक्रवाका:।

अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु

यानानि मार्गेषु न सम्पतन्ति॥ १६॥

‘मानसरोवरमें निवासके लोभी हंस वहाँके लिये प्रस्थित हो गये। इस समय चकवे अपनी प्रियाओंसे मिल रहे हैं। निरन्तर होनेवाली वर्षाके जलसे मार्ग टूट-फूट गये हैं, इसलिये उनपर रथ आदि नहीं चल रहे हैं॥ १६॥

क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं

नभ: प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति।

क्वचित् क्वचित् पर्वतसंनिरुद्धं

रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य॥ १७॥

‘आकाशमें सब ओर बादल छिटके हुए हैं। कहीं तो उन बादलोंसे ढक जानेके कारण आकाश दिखायी नहीं देता है और कहीं उनके फट जानेपर वह स्पष्ट दिखायी देने लगता है। ठीक उसी तरह जैसे जिसकी तरङ्गमालाएँ शान्त हो गयी हों, उस महासागरका रूप कहीं तो पर्वतमालाओंसे छिप जानेके कारण नहीं दिखायी देता है और कहीं पर्वतोंका आवरण न होनेसे दिखायी देता है॥ १७॥

व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पै-

र्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम्।

मयूरकेकाभिरनुप्रयातं

शैलापगा: शीघ्रतरं वहन्ति॥ १८॥

‘इस समय पहाड़ी नदियाँ वर्षाके नूतन जलको बड़े वेगसे बहा रही हैं। वह जल सर्ज और कदम्बके फूलोंसे मिश्रित है, पर्वतके गेरू आदि धातुओंसे लाल रंगका हो गया है तथा मयूरोंकी केकाध्वनि उस जलके कलकलनादका अनुसरण कर रही है॥ १८॥

रसाकुलं षट्पदसंनिकाशं

प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम्।

अनेकवर्णं पवनावधूतं

भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम्॥ १९॥

‘काले-काले भौंरोंके समान प्रतीत होनेवाले जामुनके सरस फल आजकल लोग जी भरकर खाते हैं और हवाके वेगसे हिले हुए आमके पके हुए बहुरंगी फल पृथ्वीपर गिरते रहते है॥ १९॥

विद्युत्पताका: सबलाकमाला:

शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशा: ।

गर्जन्ति मेघा: समुदीर्णनादा

मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्था:॥ २०॥

‘जैसे युद्धस्थलमें खड़े हुए मतवाले गजराज उच्चस्वरसे चिग्घाड़ते हैं, उसी प्रकार गिरिराजके शिखरोंकी-सी आकृतिवाले मेघ जोर-जोरसे गर्जना कर रहे हैं। चमकती हुई बिजलियाँ इन मेघरूपी गजराजोंपर पताकाओंके समान फहरा रही हैं और बगुलोंकी पंक्तियाँ मालाके समान शोभा देती हैं॥ २०॥

वर्षोदकाप्यायितशाद्वलानि

प्रवृत्तनृत्तोत्सवबर्हिणानि ।

वनानि निर्वृष्टबलाहकानि

पश्यापराह्णेष्वधिकं विभान्ति॥ २१॥

‘देखो, अपराह्णकालमें इन वनोंकी शोभा अधिक बढ़ जाती है। वर्षाके जलसे इनमें हरी-हरी घासें बढ़ गयी हैं। झुंड-के-झुंड मोरोंने अपना नृत्योत्सव आरम्भ कर दिया है और मेघोंने इनमें निरन्तर जल बरसाया है॥

समुद्वहन्त: सलिलातिभारं

बलाकिनो वारिधरा नदन्त:।

महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां

विश्रम्य विश्रम्य पुन: प्रयान्ति॥ २२॥

‘बक-पंक्तियोंसे सुशोभित ये जलधर मेघ जलका अधिक भार ढोते और गर्जते हुए बड़े-बड़े पर्वतशिखरोंपर मानो विश्राम ले-लेकर आगे बढ़ते हैं॥ २२॥

मेघाभिकामा परिसम्पतन्ती

सम्मोदिता भाति बलाकपंक्ति:।

वातावधूता वरपौण्डरीकी

लम्बेव माला रुचिराम्बरस्य॥ २३॥

‘गर्भ धारणके लिये मेघोंकी कामना रखकर आकाशमें उड़ती हुई आनन्दमग्न बलाकाओंकी पंक्ति ऐसी जान पड़ती है, मानो आकाशके गलेमें हवासे हिलती हुई श्वेत कमलोंकी सुन्दर माला लटक रही हो॥ २३॥

बालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन

विभाति भूमिर्नवशाद्वलेन।

गात्रानुपृक्तेन शुकप्रभेण

नारीव लाक्षोक्षितकम्बलेन॥ २४॥

‘छोटे-छोटे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ोंसे बीच-बीचमें चित्रित हुई नूतन घाससे आच्छादित भूमि उस नारीके समान शोभा पाती है, जिसने अपने अङ्गोंपर तोतेके समान रंगवाला एक ऐसा कम्बल ओढ रखा हो, जिसको बीच-बीचमें महावरके रंगसे रँगकर विचित्र शोभासे सम्पन्न कर दिया गया हो॥ २४॥

निद्रा शनै: केशवमभ्युपैति

द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति।

हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति

कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति॥ २५॥

‘चौमासेके इस आरम्भकालमें निद्रा धीरे-धीरे भगवान् केशवके समीप जा रही है। नदी तीव्र वेगसे समुद्रके निकट पहुँच रही है। हर्षभरी बलाका उड़कर मेघकी ओर जा रही है और प्रियतमा सकामभावसे अपने प्रियतमकी सेवामें उपस्थित हो रही है॥ २५॥

जाता वनान्ता: शिखिसुप्रनृत्ता

जाता: कदम्बा: सकदम्बशाखा:।

जाता वृषा गोषु समानकामा

जाता मही सस्यवनाभिरामा॥ २६॥

‘वनप्रान्त मोरोंके सुन्दर नृत्यसे सुशोभित हो गये हैं। कदम्बवृक्ष फूलों और शाखाओंसे सम्पन्न हो गये हैं। साँड़ गौओंके प्रति उन्हींके समान कामभावसे आसक्त हैं और पृथ्वी हरी-हरी खेती तथा हरे-भरे वनोंसे अत्यन्त रमणीय प्रतीत होने लगी है॥ २६॥

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति

ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति।

नद्यो घना मत्तगजा वनान्ता:

प्रियाविहीना: शिखिन: प्लवंगमा:॥ २७॥

‘नदियाँ बह रही हैं, बादल पानी बरसा रहे हैं, मतवाले हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, वनप्रान्त शोभा पा रहे हैं, प्रियतमाके संयोगसे वञ्चित हुए वियोगी प्राणी चिन्तामग्न हो रहे हैं, मोर नाच रहे हैं और वानर निश्चिन्त एवं सुखी हो रहे हैं॥ २७॥

प्रहर्षिता: केतकिपुष्पगन्ध-

माघ्राय मत्ता वननिर्झरेषु।

प्रपातशब्दाकुलिता गजेन्द्रा:

सार्धं मयूरै: समदा नदन्ति॥ २८॥

‘वनके झरनोंके समीप क्रीडासे उल्लसित हुए मदवर्षी गजराज केवड़ेके फूलकी सुगन्धको सूँघकर मतवाले हो उठे हैं और झरनेके जलके गिरनेसे जो शब्द होता है, उससे आकुल हो ये मोरोंके बोलनेके साथ-साथ स्वयं भी गर्जना करते हैं॥ २८॥

धारानिपातैरभिहन्यमाना:

कदम्बशाखासु विलम्बमाना:।

क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं

शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति॥ २९॥

‘जलकी धारा गिरनेसे आहत होते और कदम्बकी डालियोंपर लटकते हुए भ्रमर तत्काल ग्रहण किये पुष्परससे उत्पन्न गाढ़ मदको धीरे-धीरे त्याग रहे हैं॥

अङ्गारचूर्णोत्करसंनिकाशै:

फलै: सुपर्याप्तरसै: समृद्धै:।

जम्बूद्रुमाणां प्रविभान्ति शाखा

निपीयमाना इव षट्पदौघै:॥ ३०॥

‘कोयलोंकी चूर्णराशिके समान काले और प्रचुर रससे भरे हुए बड़े-बड़े फलोंसे लदी हुई जामुन-वृक्षकी शाखाएँ ऐसी जान पड़ती हैं, मानो भ्रमरोंके समुदाय उनमें सटकर उनके रस पी रहे हैं॥ ३०॥

तडित्पताकाभिरलंकृताना-

मुदीर्णगम्भीरमहारवाणाम् ।

विभान्ति रूपाणि बलाहकानां

रणोत्सुकानामिव वारणानाम्॥ ३१॥

‘विद्युत्-रूपी पताकाओंसे अलंकृत एवं जोर-जोरसे गम्भीर गर्जना करनेवाले इन बादलोंके रूप युद्धके लिये उत्सुक हुए गजराजोंके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥

मार्गानुग: शैलवनानुसारी

सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य।

युद्धाभिकाम: प्रतिनादशङ्की

मत्तो गजेन्द्र: प्रतिसंनिवृत्त:॥ ३२॥

‘पर्वतीय वनोंमें विचरण करनेवाला तथा अपने प्रतिद्वन्द्वीके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाला मदमत्त गजराज, जो अपने मार्गका अनुसरण करके आगे बढ़ा जा रहा था, पीछेसे मेघकी गर्जना सुनकर प्रतिपक्षी हाथीके गर्जनेकी आशङ्का करके सहसा पीछेको लौट पड़ा॥ ३२॥

क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघै:

क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठै:।

क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रै-

र्विभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ता:॥ ३३॥

‘कहीं भ्रमरोंके समूह गीत गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं गजराज मदमत्त होकर विचर रहे हैं। इस प्रकार ये वनप्रान्त अनेक भावोंके आश्रय बनकर शोभा पा रहे हैं॥ ३३॥

कदम्बसर्जार्जुनकन्दलाढ्या

वनान्तभूमिर्मधुवारिपूर्णा ।

मयूरमत्ताभिरुतप्रनृत्तै-

रापानभूमिप्रतिमा विभाति॥ ३४॥

‘कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और स्थल-कमलसे सम्पन्न वनके भीतरकी भूमि मधु-जलसे परिपूर्ण हो मोरोंके मदयुक्त कलरवों और नृत्योंसे उपलक्षित होकर आपानभूमि (मधुशाला) के समान प्रतीत होती है॥ ३४॥

मुक्तासमाभं सलिलं पतद् वै

सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम्।

हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगा:

सुरेन्द्रदत्तं तृषिता: पिबन्ति॥ ३५॥

‘आकाशसे गिरता हुआ मोतीके समान स्वच्छ एवं निर्मल जल पत्तोंके दोनोंमें संचित हुआ देख प्यासे पक्षी पपीहे हर्षसे भरकर देवराज इन्द्रके दिये हुए उस जलको पीते हैं। वर्षासे भीग जानेके कारण उनकी पाँखें विविध रंगकी दिखायी देती हैं॥ ३५॥

षट्पादतन्त्रीमधुराभिधानं

प्लवंगमोदीरितकण्ठतालम् ।

आविष्कृतं मेघमृदङ्गनादै-

र्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्॥ ३६॥

‘भ्रमररूप वीणाकी मधुर झंकार हो रही है। मेढकोंकी आवाज कण्ठताल-सी जान पड़ती है। मेघोंकी गर्जनाके रूपमें मृदङ्ग बज रहे हैं। इस प्रकार वनोंमें संगीतोत्सवका आरम्भ-सा हो रहा है॥ ३६॥

क्वचित् प्रनृत्तै: क्वचिदुन्नदद्भि:

क्वचिच्च वृक्षाग्रनिषण्णकायै:।

व्यालम्बबर्हाभरणैर्मयूरै-

र्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम्॥ ३७॥

‘विशाल पंखरूपी आभूषणोंसे विभूषित मोर वनोंमें कहीं नाच रहे हैं, कहीं जोर-जोरसे मीठी बोली बोल रहे हैं और कहीं वृक्षोंकी शाखाओंपर अपने सारे शरीरका बोझ डालकर बैठे हुए हैं। इस प्रकार उन्होंने संगीत (नाच-गान) का आयोजन-सा कर रखा है॥ ३७॥

स्वनैर्घनानां प्लवगा: प्रबुद्धा

विहाय निद्रां चिरसंनिरुद्धाम्।

अनेकरूपाकृतिवर्णनादा

नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति॥ ३८॥

‘मेघोंकी गर्जना सुनकर चिरकालसे रोकी हुई निद्राको त्यागकर जागे हुए अनेक प्रकारके रूप, आकार, वर्ण और बोलीवाले मेढक नूतन जलकी धारासे अभिहत होकर जोर-जोरसे बोल रहे हैं॥ ३८॥

नद्य: समुद्वाहितचक्रवाका-

स्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा।

दृप्ता नवप्रावृतपूर्णभोगा-

दृतं स्वभर्तारमुपोपयान्ति॥ ३९॥

(कामातुर युवतियोंकी भाँति) दर्पभरी नदियाँ अपने वक्षपर (उरोजोंके स्थानमें) चक्रवाकोंको वहन करती हैं और मर्यादामें रखनेवाले जीर्ण-शीर्ण कूलकगारोंको तोड़-फोड़ एवं दूर बहाकर नूतन पुष्प आदिके उपहारसे पूर्ण भोगके लिये सादर स्वीकृत अपने स्वामी समुद्रके समीप वेगपूर्वक चली जा रही हैं॥ ३९॥

नीलेषु नीला नववारिपूर्णा

मेघेषु मेघा: प्रतिभान्ति सक्ता:।

दवाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धा:

शैलेषु शैला इव बद्धमूला:॥ ४०॥

‘नीले मेघोंमें सटे हुए नूतन जलसे परिपूर्ण नील मेघ ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो दावानलसे जले हुए पर्वतोंमें दावानलसे दग्ध हुए दूसरे पर्वत बद्धमूल होकर सट गये हों॥ ४०॥

प्रमत्तसंनादितबर्हिणानि

सशक्रगोपाकुलशाद्वलानि ।

चरन्ति नीपार्जुनवासितानि

गजा: सुरम्याणि वनान्तराणि॥ ४१॥

‘जहाँ मतवाले मोर कलनाद कर रहे हैं, जहाँकी हरी-हरी घासें वीरबहूटियोंके समुदायसे व्याप्त हो रही हैं तथा जो नीप और अर्जुन-वृक्षोंके फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित हैं, उन परम रमणीय वनप्रान्तोंमें बहुत-से हाथी विचरा करते हैं॥ ४१॥

नवाम्बुधाराहतकेसराणि

द्रुतं परित्यज्य सरोरुहाणि।

कदम्बपुष्पाणि सकेसराणि

नवानि हृष्टा भ्रमरा: पिबन्ति॥ ४२॥

‘भ्रमरोंके समुदाय नूतन जलकी धारासे नष्ट हुए केसरवाले कमल-पुष्पोंको तुरंत त्यागकर केसर-शोभित नवीन कदम्ब-पुष्पोंका रस बड़े हर्षके साथ पी रहे हैं॥ ४२॥

मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रा

वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्रा:।

रम्या नगेन्द्रा: निभृता नरेन्द्रा:

प्रक्रीडितो वारिधरै: सुरेन्द्र:॥ ४३॥

‘गजेन्द्र (हाथी) मतवाले हो रहे हैं। गवेन्द्र (वृषभ) आनन्दमें मग्न हैं, मृगेन्द्र (सिंह) वनोंमें अत्यन्त पराक्रम प्रकट करते हैं, नगेन्द्र (बड़े-बड़े पर्वत) रमणीय दिखायी देते हैं, नरेन्द्र (राजालोग) मौन हैं—युद्धविषयक उत्साह छोड़ बैठे हैं और सुरेन्द्र (इन्द्रदेव) जलधरोंके साथ क्रीडा कर रहे हैं॥ ४३॥

मेघा: समुद्भूतसमुद्रनादा

महाजलौघैर्गगनावलम्बा: ।

नदीस्तटाकानि सरांसि वापी-

र्महीं च कृत्स्नामपवाहयन्ति॥ ४४॥

‘आकाशमें लटके हुए ये मेघ अपनी गर्जनासे समुद्रके कोलाहलको तिरस्कृत करके अपने जलके महान् प्रवाहसे नदी, तालाब, सरोवर, बावली तथा समूची पृथ्वीको आप्लावित कर रहे हैं॥ ४४॥

वर्षप्रवेगा विपुला: पतन्ति

प्रवान्ति वाता: समुदीर्णवेगा:।

प्रणष्टकूला: प्रवहन्ति शीघ्रं

नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गा:॥ ४५॥

‘बड़े वेगसे वर्षा हो रही है, जोरोंकी हवा चल रही है और नदियाँ अपने कगारोंको काटकर अत्यन्त तीव्र गतिसे जल बहा रही हैं। उन्होंने मार्ग रोक दिये हैं॥

नरैर्नरेन्द्रा इव पर्वतेन्द्रा:

सुरेन्द्रदत्तै: पवनोपनीतै:।

घनाम्बुकुम्भैरभिषिच्यमाना

रूपं श्रियं स्वामिव दर्शयन्ति॥ ४६॥

‘जैसे मनुष्य जलके कलशोंसे नरेशोंका अभिषेक करते हैं, उसी प्रकार इन्द्रके दिये और वायुदेवके द्वारा लाये गये मेघरूपी जल-कलशोंसे जिनका अभिषेक हो रहा है, वे पर्वतराज अपने निर्मल रूप तथा शोभा सम्पत्तिका दर्शन-सा करा रहे हैं॥ ४६॥

घनोपगूढं गगनं न तारा

न भास्करो दर्शनमभ्युपैति।

नवैर्जलौघैर्धरणी वितृप्ता

तमोविलिप्ता न दिश: प्रकाशा:॥ ४७॥

‘मेघोंकी घटासे समस्त आकाश आच्छादित हो गया है। न रातमें तारे दिखायी देते हैं, न दिनमें सूर्य। नूतन जलराशि पाकर पृथ्वी पूर्ण तृप्त हो गयी है। दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो रही हैं, अतएव प्रकाशित नहीं होती हैं—उनका स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है॥ ४७॥

महान्ति कूटानि महीधराणां

धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति।

महाप्रमाणैर्विपुलै: प्रपातै-

र्मुक्ताकलापैरिव लम्बमानै:॥ ४८॥

‘जलकी धाराओंसे घुले हुए पर्वतोंके विशाल शिखर मोतियोंके लटकते हुए हारोंकी भाँति एवं बहुसंख्यक झरनोंके कारण अधिक शोभा पाते हैं॥ ४८॥

शैलोपलप्रस्खलमानवेगा:

शैलोत्तमानां विपुला: प्रपाता:।

गुहासु संनादितबर्हिणासु

हारा विकीर्यन्त इवावभान्ति॥ ४९॥

‘पर्वतीय प्रस्तरखण्डोंपर गिरनेसे जिनका वेग टूट गया है, वे श्रेष्ठ पर्वतोंके बहुतेरे झरने मयूरोंकी बोलीसे गूँजती हुई गुफाओंमें टूटकर बिखरते हुए मोतियोंके हारोंके समान प्रतीत होते हैं॥ ४९॥

शीघ्रप्रवेगा विपुला: प्रपाता

निर्धौतशृङ्गोपतला गिरीणाम्।

मुक्ताकलापप्रतिमा: पतन्तो

महागुहोत्सङ्गतलैर्ध्रियन्ते ॥ ५०॥

‘जिनके वेग शीघ्रगामी हैं, जिनकी संख्या अधिक है, जिन्होंने पर्वतीय शिखरोंके निम्न प्रदेशोंको धोकर स्वच्छ बना दिया है तथा जो देखनेमें मुक्तामालाओंके समान प्रतीत होते हैं, पर्वतोंके उन झरते हुए झरनोंको बड़ी-बड़ी गुफाएँ अपनी गोदमें धारण कर लेती हैं॥

सुरतामर्दविच्छिन्ना: स्वर्गस्त्रीहारमौक्तिका:।

पतन्ति चातुला दिक्षु तोयधारा: समन्तत:॥ ५१॥

‘सुरत-क्रीडाके समय होनेवाले अङ्गोंके आमर्दनसे टूटे हुए देवाङ्गनाओंके मौक्तिक हारोंके समान प्रतीत होनेवाली जलकी अनुपम धाराएँ सम्पूर्ण दिशाओंमें सब ओर गिर रही हैं॥ ५१॥

विलीयमानैर्विहगैर्निमीलद्भिश्च पङ्कजै:।

विकसन्त्या च मालत्या गतोऽस्तं ज्ञायते रवि:॥ ५२॥

‘पक्षी अपने घोसलोंमें छिप रहे हैं, कमल संकुचित हो रहे हैं और मालती खिलने लगी है; इससे जान पड़ता है कि सूर्यदेव अस्त हो गये॥ ५२॥

वृत्ता यात्रा नरेन्द्राणां सेना पथ्येव वर्तते।

वैराणि चैव मार्गाश्च सलिलेन समीकृता:॥ ५३॥

‘राजाओंकी युद्ध-यात्रा रुक गयी। प्रस्थित हुई सेना भी रास्तेमें ही पड़ाव डाले पड़ी है। वर्षाके जलने राजाओंके वैर शान्त कर दिये हैं और मार्ग भी रोक दिये हैं। इस प्रकार वैर और मार्ग दोनोंकी एक-सी अवस्था कर दी है॥ ५३॥

मासि प्रौष्ठपदे ब्रह्म ब्राह्मणानां विवक्षताम्।

अयमध्यायसमय: सामगानामुपस्थित:॥ ५४॥

‘भादोंका महीना आ गया। यह वेदोंके स्वाध्यायकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मणोंके लिये उपाकर्मका समय उपस्थित हुआ है। सामगान करनेवाले विद्वानोंके स्वाध्यायका भी यही समय है॥ ५४॥

निवृत्तकर्मायतनो नूनं संचितसंचय:।

आषाढीमभ्युपगतो भरत: कोसलाधिप:॥ ५५॥

‘कोसलदेशके राजा भरतने चार महीनेके लिये आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करके गत आषाढकी पूर्णिमाको निश्चय ही किसी उत्तम व्रतकी दीक्षा ली होगी॥ ५५॥

नूनमापूर्यमाणाया: सरय्वा वर्धते रय:।

मां समीक्ष्य समायान्तमयोध्याया इव स्वन:॥ ५६॥

‘मुझे वनकी ओर आते देख जिस प्रकार अयोध्यापुरीके लोगोंका आर्तनाद बढ़ गया था, उसी प्रकार इस समय वर्षाके जलसे परिपूर्ण होती हुई सरयू नदीका वेग अवश्य ही बढ़ रहा होगा॥ ५६॥

इमा: स्फीतगुणा वर्षा: सुग्रीव: सुखमश्नुते।

विजितारि: सदारश्च राज्ये महति च स्थित:॥ ५७॥

‘यह वर्षा अनेक गुणोंसे सम्पन्न है। इस समय सुग्रीव अपने शत्रुको परास्त करके विशाल वानर-राज्यपर प्रतिष्ठित हैं और अपनी स्त्रीके साथ रहकर सुख भोग रहे हैं॥ ५७॥

अहं तु हृतदारश्च राज्याच्च महतश्च्युत:।

नदीकूलमिव क्लिन्नमवसीदामि लक्ष्मण॥ ५८॥

‘किंतु लक्ष्मण! मैं अपने महान् राज्यसे तो भ्रष्ट हो ही गया हूँ, मेरी स्त्री भी हर ली गयी है; इसलिये पानीसे गले हुए नदीके तटकी भाँति कष्ट पा रहा हूँ॥

शोकश्च मम विस्तीर्णो वर्षाश्च भृशदुर्गमा:।

रावणश्च महाञ्छत्रुरपार: प्रतिभाति मे॥ ५९॥

‘मेरा शोक बढ़ गया है। मेरे लिये वर्षाके दिनोंको बिताना अत्यन्त कठिन हो गया है और मेरा महान् शत्रु रावण भी मुझे अजेय-सा प्रतीत होता है॥ ५९॥

अयात्रां चैव दृष्ट्वेमां मार्गांश्च भृशदुर्गमान्।

प्रणते चैव सुग्रीवे न मया किंचिदीरितम्॥ ६०॥

‘एक तो यह यात्राका समय नहीं है, दूसरे मार्ग भी अत्यन्त दुर्गम है। इसलिये सुग्रीवके नतमस्तक होनेपर भी मैंने उनसे कुछ कहा नहीं है॥ ६०॥

अपि चापि परिक्लिष्टं चिराद् दारै: समागतम्।

आत्मकार्यगरीयस्त्वाद् वक्तुं नेच्छामि वानरम्॥ ६१॥

‘वानर सुग्रीव बहुत दिनोंसे कष्ट भोगते थे और दीर्घकालके पश्चात् अब अपनी पत्नीसे मिले हैं। इधर मेरा कार्य बड़ा भारी है (थोड़े दिनोंमें सिद्ध होनेवाला नहीं है); इसलिये मैं इस समय उससे कुछ कहना नहीं चाहता हूँ॥

स्वयमेव हि विश्रम्य ज्ञात्वा कालमुपागतम्।

उपकारं च सुग्रीवो वेत्स्यते नात्र संशय:॥ ६२॥

‘कुछ दिनोंतक विश्राम करके उपयुक्त समय आया हुआ जान वे स्वयं ही मेरे उपकारको समझेंगे; इसमें संशय नहीं है॥ ६२॥

तस्मात् कालप्रतीक्षोऽहं स्थितोऽस्मि शुभलक्षण।

सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमभिकांक्षयन्॥ ६३॥

‘अत: शुभलक्षण लक्ष्मण! मैं सुग्रीवकी प्रसन्नता और नदियोंके जलकी स्वच्छता चाहता हुआ शरत्कालकी प्रतीक्षामें चुपचाप बैठा हुआ हूँ॥ ६३॥

उपकारेण वीरो हि प्रतीकारेण युज्यते।

अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मन:॥ ६४॥

‘जो वीर पुरुष किसीके उपकारसे उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है; किंतु यदि कोई उपकारको न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकारसे मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषोंके मनको ठेस पहुँचाता है’॥ ६४॥

अथैवमुक्त: प्रणिधाय लक्ष्मण:

कृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम्।

उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं

प्रदर्शयन् दर्शनमात्मन: शुभम्॥ ६५॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणने सोच-विचारकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टिका परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीरामसे इस प्रकार बोले॥ ६५॥

यदुक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं

नरेन्द्र कर्ता नचिराद्धरीश्वर:।

शरत्प्रतीक्ष: क्षमतामिमं भवान्

जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृत:॥ ६६॥

‘नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अत: आप शत्रुके संहार करनेका दृढ़ निश्चय लिये शरत्कालकी प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकालके विलम्बको सहन कीजिये’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टाविंश: सर्ग:॥ २८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २८॥

 

एकोनत्रिंश: सर्ग:

हनुमान्‌जीके समझानेसे सुग्रीवका नीलको वानर-सैनिकोंको एकत्र करनेका आदेश देना

समीक्ष्य विमलं व्योम गतविद्युद्बलाहकम्।

सारसाकुलसंघुष्टं रम्यज्योत्स्नानुलेपनम्॥ १॥

समृद्धार्थं च सुग्रीवं मन्दधर्मार्थसंग्रहम्।

अत्यर्थं चासतां मार्गमेकान्तगतमानसम्॥ २॥

निवृत्तकार्यं सिद्धार्थं प्रमदाभिरतं सदा।

प्राप्तवन्तमभिप्रेतान् सर्वानेव मनोरथान्॥ ३॥

स्वां च पत्नीमभिप्रेतां तारां चापि समीप्सिताम्।

विहरन्तमहोरात्रं कृतार्थं विगतज्वरम्॥ ४॥

क्रीडन्तमिव देवेशं गन्धर्वाप्सरसां गणै:।

मन्त्रिषु न्यस्तकार्यं च मन्त्रिणामनवेक्षकम्॥ ५॥

उच्छिन्नराज्यसंदेहं कामवृत्तमिव स्थितम्।

निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञ: कालधर्मविशेषवित्॥ ६॥

प्रसाद्य वाक्यैर्विविधैर्हेतुमद्भिर्मनोरमै:।

वाक्यविद् वाक्यतत्त्वज्ञं हरीशं मारुतात्मज:॥ ७॥

हितं तथ्यं च पथ्यं च सामधर्मार्थनीतिमत्।

प्रणयप्रीतिसंयुक्तं विश्वासकृतनिश्चयम्॥ ८॥

हरीश्वरमुपागम्य हनूमान् वाक्यमब्रवीत्।

पवनकुमार हनुमान् शास्त्रके निश्चित सिद्धान्तको जाननेवाले थे। क्या करना चाहिये और क्या नहीं—इन सभी बातोंका उन्हें यथार्थ ज्ञान था। किस समय किस विशेष धर्मका पालन करना चाहिये—इसको भी वे ठीक-ठीक समझते थे। उन्हें बातचीत करनेकी कलाका भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने देखा, आकाश निर्मल हो गया है। अब उसमें न तो बिजली चमकती है और न बादल ही दिखायी देते हैं। अन्तरिक्षमें सब ओर सारस उड़ रहे हैं और उनकी बोली सुनायी देती है। (चन्द्रोदय होनेपर) आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसपर श्वेत चन्दनसदृश रमणीय चाँदनीका लेप चढ़ा दिया गया हो। सुग्रीवका प्रयोजन सिद्ध हो जानेके कारण अब वे धर्म और अर्थके संग्रहमें शिथिलता दिखाने लगे हैं। असाधु पुरुषोंके मार्ग (कामसेवन) का ही अधिक आश्रय ले रहे हैं। एकान्तमें ही (जहाँ स्त्रियोंके सङ्गमें कोई बाधा न पड़े) उनका मन लगता है। उनका काम पूरा हो गया है। उनके अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धि हो चुकी है। अब वे सदा युवती स्त्रियोंके साथ क्रीडा-विलासमें ही लगे रहते हैं। उन्होंने अपने सारे अभिलषित मनोरथोंको प्राप्त कर लिया है। अपनी मनोवाञ्छित पत्नी रुमा तथा अभीष्ट सुन्दरी ताराको भी प्राप्त करके अब वे कृतकृत्य एवं निश्चिन्त होकर दिन-रात भोग-विलासमें लगे रहते हैं। जैसे देवराज इन्द्र गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदायके साथ क्रीडामें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार सुग्रीव भी अपने मन्त्रियोंपर राजकार्यका भार रखकर क्रीडा-विहारमें तत्पर हैं। मन्त्रियोंके कार्योंकी देखभाल वे कभी नहीं करते हैं। मन्त्रियोंकी सज्जनताके कारण यद्यपि राज्यको किसी प्रकारकी हानि पहुँचनेका संदेह नहीं है, तथापि स्वयं सुग्रीव ही स्वेच्छाचारी-से हो रहे हैं। यह सब सोचकर हनुमान्‌जी वानरराज सुग्रीवके पास गये और उन्हें युक्तियुक्त विविध एवं मनोरम वचनोंके द्वारा प्रसन्न करके बातचीतका मर्म समझनेवाले उन सुग्रीवसे हितकर, सत्य, लाभदायक, साम, धर्म और अर्थ-नीतिसे युक्त, शास्त्रविश्वासी पुरुषोंके सुदृढ़ निश्चयसे सम्पन्न तथा प्रेम और प्रसन्नतासे भरे वचन बोले॥ १—८/

राज्यं प्राप्तं यशश्चैव कौली श्रीरभिवर्धिता॥ ९॥

मित्राणां संग्रह: शेषस्तद् भवान् कर्तुमर्हति।

‘राजन्! आपने राज्य और यश प्राप्त कर लिया तथा कुलपरम्परासे आयी हुई लक्ष्मीको भी बढ़ाया; किंतु अभी मित्रोंको अपनानेका कार्य शेष रह गया है, उसे आपको इस समय पूर्ण करना चाहिये॥ ९/

यो हि मित्रेषु कालज्ञ: सततं साधु वर्तते॥ १०॥

तस्य राज्यं च कीर्तिश्च प्रतापश्चापि वर्धते।

‘जो राजा ‘कब प्रत्युपकार करना चाहिये’ इस बातको जानकर मित्रोंके प्रति सदा साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसके राज्य, यश और प्रतापकी वृद्धि होती है॥

यस्य कोशश्च दण्डश्च मित्राण्यात्मा च भूमिप।

समान्येतानि सर्वाणि स राज्यं महदश्नुते॥ ११॥

‘पृथ्वीनाथ! जिस राजाका कोश, दण्ड (सेना), मित्र और अपना शरीर—ये सब-के-सब समान रूपसे उसके वशमें रहते हैं, वह विशाल राज्यका पालन एवं उपभोग करता है॥ ११॥

तद् भवान् वृत्तसम्पन्न: स्थित: पथि निरत्यये।

मित्रार्थमभिनीतार्थं यथावत् कर्तुमर्हति॥ १२॥

‘आप सदाचारसे सम्पन्न और नित्य सनातन धर्मके मार्गपर स्थित हैं; अत: मित्रके कार्यको सफल बनानेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचितरूपसे पूर्ण कीजिये॥

संत्यज्य सर्वकर्माणि मित्रार्थे यो न वर्तते।

सम्भ्रमाद् विकृतोत्साह: सोऽनर्थैर्नावरुध्यते॥ १३॥

‘जो अपने सब कार्योंको छोड़कर मित्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये विशेष उत्साहपूर्वक शीघ्रताके साथ नहीं लग जाता है, उसे अनर्थका भागी होना पड़ता है॥

यो हि कालव्यतीतेषु मित्रकार्येषु वर्तते।

स कृत्वा महतोऽप्यर्थान्न मित्रार्थेन युज्यते॥ १४॥

‘कार्यसाधनका उपयुक्त अवसर बीत जानेके बाद जो मित्रके कार्योंमें लगता है, वह बड़े-से-बड़े कार्योंको सिद्ध करके भी मित्रके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला नहीं माना जाता है॥ १४॥

तदिदं मित्रकार्यं न: कालातीतमरिंदम।

क्रियतां राघवस्यैतद् वैदेह्या: परिमार्गणम्॥ १५॥

‘शत्रुदमन! भगवान् श्रीराम हमारे परम सुहृद् हैं। उनके इस कार्यका समय बीता जा रहा है; अत: विदेहकुमारी सीताकी खोज आरम्भ कर देनी चाहिये॥

न च कालमतीतं ते निवेदयति कालवित्।

त्वरमाणोऽपि स प्राज्ञस्तव राजन् वशानुग:॥ १६॥

‘राजन्! परम बुद्धिमान् श्रीराम समयका ज्ञान रखते हैं और उन्हें अपने कार्यकी सिद्धिके लिये जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन बने हुए हैं। संकोचवश आपसे नहीं कहते कि मेरे कार्यका समय बीत रहा है॥ १६॥

कुलस्य हेतु: स्फीतस्य दीर्घबन्धुश्च राघव:।

अप्रमेयप्रभावश्च स्वयं चाप्रतिमो गुणै:॥ १७॥

तस्य त्वं कुरु वै कार्यं पूर्वं तेन कृतं तव।

हरीश्वर कपिश्रेष्ठानाज्ञापयितुमर्हसि॥ १८॥

‘वानरराज! भगवान् श्रीराम चिरकालतक मित्रता निभानेवाले हैं। वे आपके समृद्धिशाली कुलके अभ्युदयके हेतु हैं। उनका प्रभाव अतुलनीय है। वे गुणोंमें अपना शानी नहीं रखते हैं। अब आप उनका कार्य सिद्ध कीजिये; क्योंकि उन्होंने आपका काम पहले ही सिद्ध कर दिया है। आप प्रधान-प्रधान वानरोंको इस कार्यके लिये आज्ञा दीजिये॥ १७-१८॥

नहि तावद् भवेत् कालो व्यतीतश्चोदनादृते।

चोदितस्य हि कार्यस्य भवेत् कालव्यतिक्रम:॥ १९॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके कहनेके पहले ही यदि हमलोग कार्य प्रारम्भ कर दें तो समय बीता हुआ नहीं माना जायगा; किंतु यदि उन्हें इसके लिये प्रेरणा करनी पड़ी तो यही समझा जायगा कि हमने समय बिता दिया है— उनके कार्यमें बहुत विलम्ब कर दिया है॥ १९॥

अकर्तुरपि कार्यस्य भवान् कर्ता हरीश्वर।

किं पुन: प्रतिकर्तुस्ते राज्येन च वधेन च॥ २०॥

‘वानरराज! जिसने आपका कोई उपकार नहीं किया हो, उसका कार्य भी आप सिद्ध करनेवाले हैं। फिर जिन्होंने वालीका वध तथा राज्य प्रदान करके आपका उपकार किया है, उनका कार्य आप शीघ्र सिद्ध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है॥ २०॥

शक्तिमानतिविक्रान्तो वानरर्क्षगणेश्वर।

कर्तुं दाशरथे: प्रीतिमाज्ञायां किं नु सज्जसे॥ २१॥

‘वानर और भालू-समुदायके स्वामी सुग्रीव! आप शक्तिमान् और अत्यन्त पराक्रमी हैं; फिर भी दशरथनन्दन श्रीरामका प्रिय कार्य करनेके लिये वानरोंको आज्ञा देनेमें क्यों विलम्ब करते हैं?॥ २१॥

कामं खलु शरै: शक्त: सुरासुरमहोरगान्।

वशे दाशरथि: कर्तुं त्वत्प्रतिज्ञामवेक्षते॥ २२॥

‘इसमें संदेह नहीं कि दशरथकुमार भगवान् श्रीराम अपने बाणोंसे समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागोंको भी अपने वशमें कर सकते हैं, तथापि आपने जो उनके कार्यको सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की है, उसीकी वे राह देख रहे हैं॥ २२॥

प्राणत्यागाविशंकेन कृतं तेन महत् प्रियम्।

तस्य मार्गाम वैदेहीं पृथिव्यामपि चाम्बरे॥ २३॥

‘उन्हें आपके लिये वालीके प्राणतक लेनेमें हिचक नहीं हुई। वे आपका बहुत बड़ा प्रिय कार्य कर चुके हैं; अत: अब हमलोग उनकी पत्नी विदेहकुमारी सीताका इस भूतलपर और आकाशमें भी पता लगावें॥

देवदानवगन्धर्वा असुरा: समरुद्गणा:।

न च यक्षा भयं तस्य कुर्यु: किमिव राक्षसा:॥ २४॥

‘देवता, दानव, गन्धर्व, असुर, मरुद्गण तथा यक्ष भी श्रीरामको भय नहीं पहुँचा सकते; फिर राक्षसोंकी तो बिसात ही क्या है॥ २४॥

तदेवं शक्तियुक्तस्य पूर्वं प्रतिकृतस्तथा।

रामस्यार्हसि पिङ्गेश कर्तुं सर्वात्मना प्रियम्॥ २५॥

‘वानरराज! ऐसे शक्तिशाली तथा पहले ही उपकार करनेवाले भगवान् श्रीरामका प्रिय कार्य आपको अपनी सारी शक्ति लगाकर करना चाहिये॥ २५॥

नाधस्तादवनौ नाप्सु गतिर्नोपरि चाम्बरे।

कस्यचित् सज्जतेऽस्माकं कपीश्वर तवाज्ञया॥ २६॥

‘कपीश्वर! आपकी आज्ञा हो जाय तो जलमें, थलमें, नीचे (पातालमें) तथा ऊपर आकाशमें—कहीं भी हम लोगोंकी गति रुक नहीं सकती॥ २६॥

तदाज्ञापय क: किं ते कुतो वापि व्यवस्यतु।

हरयो ह्यप्रधृष्यास्ते सन्ति कोट्यग्रतोऽनघ॥ २७॥

‘निष्पाप कपिराज! अत: आप आज्ञा दीजिये कि कौन कहाँसे आपकी किस आज्ञाका पालन करनेके लिये उद्योग करे। आपके अधीन करोड़ोंसे भी अधिक ऐसे वानर मौजूद हैं, जिन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता’॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा काले साधु निरूपितम्।

सुग्रीव: सत्त्वसम्पन्नश्चकार मतिमुत्तमाम्॥ २८॥

सुग्रीव सत्त्वगुणसे सम्पन्न थे। उन्होंने हनुमान्‌जीके द्वारा ठीक समयपर अच्छे ढंगसे कही हुई उपर्युक्तबातें सुनकर भगवान् श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये अत्यन्त उत्तम निश्चय किया॥ २८॥

संदिदेशातिमतिमान् नीलं नित्यकृतोद्यमम्।

दिक्षु सर्वासु सर्वेषां सैन्यानामुपसंग्रहे॥ २९॥

यथा सेना समग्रा मे यूथपालाश्च सर्वश:।

समागच्छन्त्यसङ्गेन सेनाग्र्येण तथा कुरु॥ ३०॥

वे परम बुद्धिमान् थे। अत: नित्य उद्यमशील नील नामक वानरको उन्होंने समस्त दिशाओंसे सम्पूर्ण वानर-सेनाओंको एकत्र करनेके लिये आज्ञा दी और कहा—‘तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मेरी सारी सेना यहाँ इकट्ठी हो जाय और सभी यूथपति अपनी सेना एवं सेनापतियोंके साथ अविलम्ब उपस्थित हो जायँ॥ २९-३०॥

ये त्वन्तपाला: प्लवगा: शीघ्रगा व्यवसायिन:।

समानयन्तु ते शीघ्रं त्वरिता: शासनान्मम।

स्वयं चानन्तरं कार्यं भवानेवानुपश्यतु॥ ३१॥

‘राज्य-सीमाकी रक्षा करनेवाले जो-जो उद्योगी और शीघ्रगामी वानर हैं, वे सब मेरी आज्ञासे शीघ्र यहाँ आ जायँ। उसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, उसपर तुम स्वयं ही ध्यान दो॥ ३१॥

त्रिपञ्चरात्रादूर्ध्वं य: प्राप्नुयादिह वानर:।

तस्य प्राणान्तिको दण्डो नात्र कार्या विचारणा॥ ३२॥

‘जो वानर पंद्रह दिनोंके बाद यहाँ पहुँचेगा, उसे प्राणान्त दण्ड दिया जायगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ३२॥

हरींश्च वृद्धानुपयातु साङ्गदो

भवान् ममाज्ञामधिकृत्य निश्चितम्।

इति व्यवस्थां हरिपुङ्गवेश्वरो

विधाय वेश्म प्रविवेश वीर्यवान्॥ ३३॥

‘यह मेरी निश्चित आज्ञा है। इसके अनुसार इस व्यवस्थाका अधिकार लेकर अङ्गदके साथ तुम स्वयं बड़े-बूढ़े वानरोंके पास जाओ।’ ऐसा प्रबन्ध करके महाबली वानरराज सुग्रीव अपने महलमें चले गये॥ ३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनत्रिंश: सर्ग:॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९॥

 


त्रिंश: सर्ग:

शरद्-ऋतुका वर्णन तथा श्रीरामका लक्ष्मणको सुग्रीवके पास जानेका आदेश देना

गृहं प्रविष्टे सुग्रीवे विमुक्ते गगने घनै:।

वर्षरात्रे स्थितो राम: कामशोकाभिपीडित:॥ १॥

पूर्वोक्त आदेश देकर सुग्रीव तो अपने महलमें चले गये और उधर श्रीरामचन्द्रजी, जो वर्षाकी रातोंमें प्रस्रवणगिरिपर निवास करते थे, आकाशके मेघोंसे मुक्त एवं निर्मल हो जानेपर सीतासे मिलनेकी उत्कण्ठा लिये उनके विरहजन्य शोकसे अत्यन्त पीड़ाका अनुभव करने लगे॥ १॥

पाण्डुरं गगनं दृष्ट्वा विमलं चन्द्रमण्डलम्।

शारदीं रजनीं चैव दृष्ट्वा ज्योत्स्नानुलेपनाम्॥ २॥

उन्होंने देखा, आकाश श्वेत वर्णका हो रहा है, चन्द्रमण्डल स्वच्छ दिखायी देता है तथा शरद्-ऋतुकी रजनीके अङ्गोंपर चाँदनीका अङ्गराग लगा हुआ है। यह सब देखकर वे सीतासे मिलनेके लिये व्याकुल हो उठे॥

कामवृत्तं च सुग्रीवं नष्टां च जनकात्मजाम्।

दृष्ट्वा कालमतीतं च मुमोह परमातुर:॥ ३॥

उन्होंने सोचा ‘सुग्रीव काममें आसक्त हो रहा है, जनककुमारी सीताका अबतक कुछ पता नहीं लगा है और रावणपर चढ़ाई करनेका समय भी बीता जा रहा है।’ यह सब देखकर अत्यन्त आतुर हुए श्रीरामका हृदय व्याकुल हो उठा॥ ३॥

स तु संज्ञामुपागम्य मुहूर्तान्मतिमान् नृप:।

मन:स्थामपि वैदेहीं चिन्तयामास राघव:॥ ४॥

दो घड़ीके बाद जब उनका मन कुछ स्वस्थ हुआ, तब वे बुद्धिमान् नरेश श्रीरघुनाथजी अपने मनमें बसी हुई विदेहनन्दिनी सीताका चिन्तन करने लगे॥ ४॥

दृष्ट्वा च विमलं व्योम गतविद्युद्बलाहकम्।

सारसारावसंघुष्टं विललापार्तया गिरा॥ ५॥

उन्होंने देखा, आकाश निर्मल है। न कहीं बिजलीकी गड़गड़ाहट है न मेघोंकी घटा। वहाँ सब ओर सारसोंकी बोली सुनायी देती है। यह सब देखकर वे आर्तवाणीमें विलाप करने लगे॥ ५॥

आसीन: पर्वतस्याग्रे हेमधातुविभूषिते।

शारदं गगनं दृष्ट्वा जगाम मनसा प्रियाम्॥ ६॥

सुनहरे रंगकी धातुओंसे विभूषित पर्वतशिखरपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी शरत्कालके स्वच्छ आकाशकी ओर दृष्टिपात करके मन-ही-मन अपनी प्यारी पत्नी सीताका ध्यान करने लगे॥ ६॥

सारसारावसंनादै: सारसारावनादिनी।

याऽऽश्रमे रमते बाला साद्य मे रमते कथम्॥ ७॥

वे बोले—‘जिसकी बोली सारसोंकी आवाजके समान मीठी थी तथा जो मेरे आश्रमपर सारसोंद्वारा परस्पर एक-दूसरेको बुलानेके लिये किये गये मधुर शब्दोंसे मन बहलाती थी, वह मेरी भोलीभाली स्त्री सीता आज किस तरह मनोरञ्जन करती होगी?॥ ७॥

पुष्पितांश्चासनान् दृष्ट्वा काञ्चनानिव निर्मलान्।

कथं सा रमते बाला पश्यन्ती मामपश्यती॥ ८॥

‘सुवर्णमय वृक्षोंके समान निर्मल और खिले हुए असन नामक वृक्षोंको देखकर बार-बार उन्हें निहारती हुई भोली-भाली सीता जब मुझे अपने पास नहीं देखती होगी, तब कैसे उसका मन लगता होगा?॥ ८॥

या पुरा कलहंसानां कलेन कलभाषिणी।

बुध्यते चारुसर्वाङ्गी साद्य मे रमते कथम्॥ ९॥

‘जिसके सभी अङ्ग मनोहर हैं तथा जो स्वभावसे ही मधुर भाषण करनेवाली है, वह सीता पहले कलहंसोंके मधुर शब्दसे जागा करती थी; किंतु आज वह मेरी प्रिया वहाँ कैसे प्रसन्न रहती होगी?॥ ९॥

नि:स्वनं चक्रवाकानां निशम्य सहचारिणाम्।

पुण्डरीकविशालाक्षी कथमेषा भविष्यति॥ १०॥

‘जिसके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान शोभा पाते हैं, वह मेरी प्रिया जब साथ विचरनेवाले चकवोंकी बोली सुनती होगी, तब उसकी कैसी दशा हो जाती होगी?॥ १०॥

सरांसि सरितो वापी: काननानि वनानि च।

तां विना मृगशावाक्षीं चरन्नाद्य सुखं लभे॥ ११॥

‘हाय! मैं नदी, तालाब, बावली, कानन और वन सब जगह घूमता हूँ; परंतु कहीं भी उस मृगशावकनयनी सीताके बिना अब मुझे सुख नहीं मिलता है॥ ११॥

अपि तां मद्वियोगाच्च सौकुमार्याच्च भामिनीम्।

सुदूरं पीडयेत् काम: शरद्गुणनिरन्तर:॥ १२॥

‘कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि शरद्-ऋतुके गुणोंसे निरन्तर वृद्धिको प्राप्त होनेवाला काम भामिनी सीताको अत्यन्त पीड़ित कर दे; क्योंकि ऐसी सम्भावनाके दो कारण हैं—एक तो उसे मेरे वियोगका कष्ट है, दूसरे वह अत्यन्त सुकुमारी होनेके कारण इस कष्टको सहन नहीं कर पाती होगी’॥ १२॥

एवमादि नरश्रेष्ठो विललाप नृपात्मज:।

विहंग इव सारङ्ग: सलिलं त्रिदशेश्वरात्॥ १३॥

इन्द्रसे पानीकी याचना करनेवाले प्यासे पपीहेकी भाँति नरश्रेष्ठ नरेन्द्रकुमार श्रीरामने इस तरहकी बहुत-सी बातें कहकर विलाप किया॥ १३॥

ततश्चञ्चूर्य रम्येषु फलार्थी गिरिसानुषु।

ददर्श पर्युपावृत्तो लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणोऽग्रजम्॥ १४॥

उस समय शोभाशाली लक्ष्मण फल लेनेके लिये गये थे। वे पर्वतके रमणीय शिखरोंपर घूम-फिरकर जब लौटे तब उन्होंने अपने बड़े भाईकी अवस्थापर दृष्टिपात किया॥ १४॥

स चिन्तया दुस्सहया परीतं

विसंज्ञमेकं विजने मनस्वी।

भ्रातुर्विषादात् त्वरितोऽतिदीन:

समीक्ष्य सौमित्रिरुवाच दीनम्॥ १५॥

वे दुस्सह चिन्तामें मग्न होकर अचेत-से हो गये थे और एकान्तमें अकेले ही दु:खी होकर बैठे थे। उस समय मनस्वी सुमित्राकुमार लक्ष्मणने जब उन्हें देखा तब वे तुरंत ही भाईके विषादसे अत्यन्त दु:खी हो गये और उनसे इस प्रकार बोले—॥ १५॥

किमार्य कामस्य वशंगतेन

किमात्मपौरुष्यपराभवेन ।

अयं ह्र‌िया संह्र‌ियते समाधि:

किमत्र योगेन निवर्तते न॥ १६॥

‘आर्य! इस प्रकार कामके अधीन होकर अपने पौरुषका तिरस्कार करनेसे—पराक्रमको भूल जानेसे क्या लाभ होगा? इस लज्जाजनक शोकके कारण आपके चित्तकी एकाग्रता नष्ट हो रही है। क्या इस समय योगका सहारा लेनेसे—मनको एकाग्र करनेसे यह सारी चिन्ता दूर नहीं हो सकती?॥ १६॥

क्रियाभियोगं मनस: प्रसादं

समाधियोगानुगतं च कालम्।

सहायसामर्थ्यमदीनसत्त्व:

स्वकर्महेतुं च कुरुष्व तात॥ १७॥

‘तात! आप आवश्यक कर्मोंके अनुष्ठानमें पूर्णरूपसे लग जाइये, मनको प्रसन्न कीजिये और हर समय चित्तकी एकाग्रता बनाये रखिये। साथ ही, अन्त:करणमें दीनताको स्थान न देते हुए अपने पराक्रमकी वृद्धिके लिये सहायता और शक्तिको बढ़ानेका प्रयत्न कीजिये॥

न जानकी मानववंशनाथ

त्वया सनाथा सुलभा परेण।

न चाग्निचूडां ज्वलितामुपेत्य

न दह्यते वीर वरार्ह कश्चित्॥ १८॥

‘मानववंशके नाथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके भी पूजनीय वीर रघुनन्दन! जिनके स्वामी आप हैं, वे जनकनन्दिनी सीता किसी भी दूसरे पुरुषके लिये सुलभ नहीं हैं; क्योंकि जलती हुई आगकी लपटके पास जाकर कोई भी दग्ध हुए बिना नहीं रह सकता’॥ १८॥

सलक्षणं लक्ष्मणमप्रधृष्यं

स्वभावजं वाक्यमुवाच राम:।

हितं च पथ्यं च नयप्रसक्तं

ससामधर्मार्थसमाहितं च॥ १९॥

निस्संशयं कार्यमवेक्षितव्यं

क्रियाविशेषोऽप्यनुवर्तितव्य: ।

न तु प्रवृद्धस्य दुरासदस्य

कुमार वीर्यस्य फलं च चिन्त्यम्॥ २०॥

लक्ष्मण उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था। भगवान् श्रीरामने उनसे यह स्वाभाविक बात कही—‘कुमार! तुमने जो बात कही है, वह वर्तमान समयमें हितकर, भविष्यमें भी सुख पहुँचानेवाली, राजनीतिके सर्वथा अनुकूल तथा सामके साथ-साथ धर्म और अर्थसे भी संयुक्त है। निश्चय ही सीताके अनुसंधान कार्यपर ध्यान देना चाहिये तथा उसके लिये विशेष कार्य या उपायका भी अनुसरण करना चाहिये; किंतु प्रयत्न छोड़कर पूर्णरूपसे बढ़े हुए दुर्लभ एवं बलवान् कर्मके फलपर ही दृष्टि रखना उचित नहीं है’॥ १९-२०॥

अथ पद्मपलाशाक्षीं मैथिलीमनुचिन्तयन्।

उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता॥ २१॥

तदनन्तर प्रफुल्ल कमलदलके समान नेत्रवाली मिथिलेशकुमारी सीताका बार-बार चिन्तन करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणको सम्बोधित करके सूखे हुए (उदास) मुँहसे बोले—॥ २१॥

तर्पयित्वा सहस्राक्ष: सलिलेन वसुंधराम्।

निर्वर्तयित्वा सस्यानि कृतकर्मा व्यवस्थित:॥ २२॥

‘सुमित्रानन्दन! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र इस पृथ्वीको जलसे तृप्त करके यहाँके अनाजोंको पकाकर अब कृतकृत्य हो गये हैं॥ २२॥

दीर्घगम्भीरनिर्घोषा: शैलद्रुमपुरोगमा:।

विसृज्य सलिलं मेघा: परिशान्ता नृपात्मज॥ २३॥

‘राजकुमार! देखो, जो अत्यन्त गम्भीर स्वरसे गर्जना किया करते और पर्वतों, नगरों तथा वृक्षोंके ऊपरसे होकर निकलते थे, वे मेघ अपना सारा जल बरसाकर शान्त हो गये हैं॥ २३॥

नीलोत्पलदलश्यामा: श्यामीकृत्वा दिशो दश।

विमदा इव मातङ्गा: शान्तवेगा: पयोधरा:॥ २४॥

‘नील कमलदलके समान श्यामवर्णवाले मेघ दसों दिशाओंको श्याम बनाकर मदरहित गजराजोंके समान वेगशून्य हो गये हैं; उनका वेग शान्त हो गया है॥ २४॥

जलगर्भा महावेगा: कुटजार्जुनगन्धिन:।

चरित्वा विरता: सौम्य वृष्टिवाता: समुद्यता:॥ २५॥

‘सौम्य! जिनके भीतर जल विद्यमान था तथा जिनमें कुटज और अर्जुनके फूलोंकी सुगन्ध भरी हुई थी, वे अत्यन्त वेगशाली झंझावात उमड़-घुमड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरण करके अब शान्त हो गये हैं॥

घनानां वारणानां च मयूराणां च लक्ष्मण।

नाद: प्रस्रवणानां च प्रशान्त: सहसानघ॥ २६॥

‘निष्पाप लक्ष्मण! बादलों, हाथियों, मोरों और झरनोंके शब्द इस समय सहसा शान्त हो गये हैं॥ २६॥

अभिवृष्टा महामेघैर्निर्मलाश्चित्रसानव:।

अनुलिप्ता इवाभान्ति गिरयश्चन्द्ररश्मिभि:॥ २७॥

‘महान् मेघोंद्वारा बरसाये हुए जलसे घुल जानेके कारण ये विचित्र शिखरोंवाले पर्वत अत्यन्त निर्मल हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाकी किरणोंद्वारा इनके ऊपर सफेदी कर दी गयी है॥ २७॥

शाखासु सप्तच्छदपादपानां

प्रभासु तारार्कनिशाकराणाम्।

लीलासु चैवोत्तमवारणानां

श्रियं विभज्याद्य शरत्प्रवृत्ता॥ २८॥

‘आज शरद्-ऋतु सप्तच्छद (छितवन) की डालियोंमें, सूर्य, चन्द्रमा और तारोंकी प्रभामें तथा श्रेष्ठ गजराजोंकी लीलाओंमें अपनी शोभा बाँटकर आयी है॥ २८॥

सम्प्रत्यनेकाश्रयचित्रशोभा

लक्ष्मी: शरत्कालगुणोपपन्ना।

सूर्याग्रहस्तप्रतिबोधितेषु

पद्माकरेष्वभ्यधिकं विभाति॥ २९॥

‘इस समय शरत्कालके गुणोंसे सम्पन्न हुई लक्ष्मी यद्यपि अनेक आश्रयोंमें विभक्त होकर विचित्र शोभा धारण करती हैं, तथापि सूर्यकी प्रथम किरणोंसे विकसित हुए कमल-वनोंमें वे सबसे अधिक सुशोभित होती हैं॥

सप्तच्छदानां कुसुमोपगन्धी

षट्पादवृन्दैरनुगीयमान: ।

मत्तद्विपानां पवनानुसारी

दर्पं विनेष्यन्नधिकं विभाति॥ ३०॥

‘छितवनके फूलोंकी सुगन्ध धारण करनेवाला शरत्काल स्वभावत: वायुका अनुसरण कर रहा है। भ्रमरोंके समूह उसके गुणगान कर रहे हैं। वह मार्गके जलको सोखता और मतवाले हाथियोंके दर्पको बढ़ाता हुआ अधिक शोभा पा रहा है॥ ३०॥

अभ्यागतैश्चारुविशालपक्षै:

स्मरप्रियै: पद्मरजोऽवकीर्णै:।

महानदीनां पुलिनोपयातै:

क्रीडन्ति हंसा: सह चक्रवाकै:॥ ३१॥

‘जिनके पंख सुन्दर और विशाल हैं, जिन्हें कामक्रीडा अधिक प्रिय है, जिनके ऊपर कमलोंके पराग बिखरे हुए हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियोंके तटोंपर उतरे हैं और मानसरोवरसे साथ ही आये हैं, उन चक्रवाकोंके साथ हंस क्रीडा कर रहे हैं॥ ३१॥

मदप्रगल्भेषु च वारणेषु

गवां समूहेषु च दर्पितेषु।

प्रसन्नतोयासु च निम्नगासु

विभाति लक्ष्मीर्बहुधा विभक्ता॥ ३२॥

‘मदमत्त गजराजोंमें, दर्प-भरे वृषभोंके समूहोंमें तथा स्वच्छ जलवाली सरिताओंमें नाना रूपोंमें विभक्त हुई लक्ष्मी विशेष शोभा पा रही है॥ ३२॥

नभ: समीक्ष्याम्बुधरैर्विमुक्तं

विमुक्तबर्हाभरणा वनेषु।

प्रियास्वरक्ता विनिवृत्तशोभा

गतोत्सवा ध्यानपरा मयूरा:॥ ३३॥

‘आकाशको बादलोंसे शून्य हुआ देख वनोंमें पंखरूपी आभूषणोंका परित्याग करनेवाले मोर अपनी प्रियतमाओंसे विरक्त हो गये हैं। उनकी शोभा नष्ट हो गयी है और वे आनन्दशून्य हो ध्यानमग्न होकर बैठे हैं॥

मनोज्ञगन्धै: प्रियकैरनल्पै:

पुष्पातिभारावनताग्रशाखै: ।

सुवर्णगौरैर्नयनाभिरामै-

रुद्योतितानीव वनान्तराणि॥ ३४॥

‘वनके भीतर बहुत-से असन नामक वृक्ष खड़े हैं, जिनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंके अधिक भारसे झुक गये हैं। उनपर मनोहर सुगन्ध छा रही है। वे सभी वृक्ष सुवर्णके समान गौर तथा नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। उनके द्वारा वनप्रान्त प्रकाशित-से हो रहे हैं॥ ३४॥

प्रियान्वितानां नलिनीप्रियाणां

वने प्रियाणां कुसुमोद्गतानाम्।

मदोत्कटानां मदलालसानां

गजोत्तमानां गतयोऽद्य मन्दा:॥ ३५॥

‘जो अपनी प्रियतमाओंके साथ विचरते हैं, जिन्हें कमलके पुष्प तथा वन अधिक प्रिय हैं, जो छितवनके फूलोंको सूँघकर उन्मत्त हो उठे हैं, जिनमें अधिक मद है तथा जिन्हें मदजनित कामभोगकी लालसा बनी हुई है, उन गजराजोंकी गति आज मन्द हो गयी है॥ ३५॥

व्यक्तं नभ: शस्त्रविधौतवर्णं

कृशप्रवाहानि नदीजलानि।

कह्लारशीता: पवना: प्रवान्ति

तमो विमुक्ताश्च दिश: प्रकाशा:॥ ३६॥

‘इस समय आकाशका रंग शानपर चढ़े हुए शस्त्रकी धारके समान स्वच्छ दिखायी देता है, नदियोंके जल मन्दगतिसे प्रवाहित हो रहे हैं, श्वेत कमलकी सुगन्ध लेकर शीतल मन्द वायु चल रही है, दिशाओंका अन्धकार दूर हो गया है और अब उनमें पूर्ण प्रकाश छा रहा है॥ ३६॥

सूर्यातपक्रामणनष्टपङ्का

भूमिश्चिरोद्घाटितसान्द्ररेणु: ।

अन्योन्यवैरेण समायुताना-

मुद्योगकालोऽद्य नराधिपानाम्॥ ३७॥

‘घाम लगनेसे धरतीका कीचड़ सूख गया है। अब उसपर बहुत दिनोंके बाद घनी धूल प्रकट हुई है। परस्पर वैर रखनेवाले राजाओंके लिये युद्धके निमित्त उद्योग करनेका समय अब आ गया है॥ ३७॥

शरद्गुणाप्यायितरूपशोभा:

प्रहर्षिता: पांसुसमुत्थिताङ्गा:।

मदोत्कटा: सम्प्रति युद्धलुब्धा

वृषा गवां मध्यगता नदन्ति॥ ३८॥

‘शरद्-ऋतुके गुणोंने जिनके रूप और शोभाको बढ़ा दिया है, जिनके सारे अङ्गोंपर धूल छा रही है, जिनके मदकी अधिक वृद्धि हुई है तथा जो युद्धके लिये लुभाये हुए हैं, वे साँड़ इस समय गौओंके बीचमें खड़े होकर अत्यन्त हर्षपूर्वक हँकड़ रहे हैं॥ ३८॥

समन्मथा तीव्रतरानुरागा

कुलान्विता मन्दगति: करेणु:।

मदान्वितं सम्परिवार्य यान्तं

वनेषु भर्तारमनुप्रयाति॥ ३९॥

‘जिसमें कामभावका उदय हुआ है, इसीलिये जो अत्यन्त तीव्र अनुरागसे युक्त है और अच्छे कुलमें उत्पन्न हुई है, वह मन्दगतिसे चलनेवाली हथिनी वनोंमें जाते हुए अपने मदमत्त स्वामीको घेरकर उसका अनुगमन करती है॥ ३९॥

त्यक्त्वा वराण्यात्मविभूषितानि

बर्हाणि तीरोपगता नदीनाम्।

निर्भर्त्स्यमाना इव सारसौघै:

प्रयान्ति दीना विमना मयूरा:॥ ४०॥

‘अपने आभूषणरूप श्रेष्ठ पंखोंको त्यागकर नदियोंके तटोंपर आये हुए मोर मानो सारस-समूहोंकी फटकार सुनकर दु:खी और खिन्नचित्त हो पीछे लौट जाते हैं॥

वित्रास्य कारण्डवचक्रवाकान्

महारवैर्भिन्नकटा गजेन्द्रा:।

सरस्सुबद्धाम्बुजभूषणेषु

विक्षोभ्य विक्षोभ्य जलं पिबन्ति॥ ४१॥

‘जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही है, वे गजराज अपनी महती गर्जनासे कारण्डवों तथा चक्रवाकोंको भयभीत करके विकसित कमलोंसे विभूषित सरोवरोंमें जलको हिलोर-हिलोरकर पी रहे हैं॥ ४१॥

व्यपेतपङ्कासु सवालुकासु

प्रसन्नतोयासु सगोकुलासु।

ससारसारावविनादितासु

नदीषु हंसा निपतन्ति हृष्टा:॥ ४२॥

‘जिनके कीचड़ दूर हो गये हैं। जो बालुकाओंसे सुशोभित हैं, जिनका जल बहुत ही स्वच्छ है तथा गौओंके समुदाय जिनके जलका सेवन करते हैं, सारसोंके कलरवोंसे गूँजती हुई उन सरिताओंमें हंस बड़े हर्षके साथ उतर रहे हैं॥ ४२॥

नदीघनप्रस्रवणोदकाना-

मतिप्रवृद्धानिलबर्हिणानाम्।

प्लवंगमानां च गतोत्सवानां

ध्रुवं रवा: सम्प्रति सम्प्रणष्टा:॥ ४३॥

‘नदी, मेघ, झरनोंके जल, प्रचण्ड वायु, मोर और हर्षरहित मेढकोंके शब्द निश्चय ही इस समय शान्त हो गये हैं॥ ४३॥

अनेकवर्णा: सुविनष्टकाया

नवोदितेष्वम्बुधरेषु नष्टा:।

क्षुधार्दिता घोरविषा बिलेभ्य-

श्चिरोषिता विप्रसरन्ति सर्पा:॥ ४४॥

‘नूतन मेघोंके उदित होनेपर जो चिरकालसे बिलोंमें छिपे बैठे थे, जिनकी शरीरयात्रा नष्टप्राय हो गयी थी और इस प्रकार जो मृतवत् हो रहे थे, वे भयंकर विषवाले बहुरंगे सर्प भूखसे पीड़ित होकर अब बिलोंसे बाहर निकल रहे हैं॥ ४४॥

चञ्चच्चन्द्रकरस्पर्शहर्षोन्मीलिततारका ।

अहो रागवती संध्या जहाति स्वयमम्बरम्॥ ४५॥

‘शोभाशाली चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे होनेवाले हर्षके कारण जिसके तारे किंचित् प्रकाशित हो रहे हैं (अथवा प्रियतमके करस्पर्शजनित हर्षसे जिसके नेत्रोंकी पुतली किंचित् खिल उठी है) वह रागयुक्त संध्या (अथवा अनुरागभरी नायिका) स्वयं ही अम्बर (आकाश अथवा वस्त्र) का त्याग कर रही है, यह कैसे आश्चर्यकी बात है!127॥ ४५॥

रात्रि: शशाङ्कोदितसौम्यवक्त्रा

तारागणोन्मीलितचारुनेत्रा ।

ज्योत्स्नांशुकप्रावरणा विभाति

नारीव शुक्लांशुकसंवृताङ्गी॥ ४६॥

‘चाँदनीकी चादर ओढ़े हुए शरत्कालकी यह रात्रि श्वेत साड़ीसे ढके हुए अङ्गवाली एक सुन्दरी नारीके समान शोभा पाती है। उदित हुआ चन्द्रमा ही उसका सौम्य मुख है और तारे ही उसकी खुली हुई मनोहर आँखें हैं॥ ४६॥

विपक्वशालिप्रसवानि भुक्त्वा

प्रहर्षिता सारसचारुपङ्क्ति:।

नभ: समाक्रामति शीघ्रवेगा

वातावधूता ग्रथितेव माला॥ ४७॥

‘पके हुए धानकी बालोंको खाकर हर्षसे भरी हुई और तीव्र वेगसे चलनेवाली सारसोंकी वह सुन्दर पंक्ति वायुकम्पित गुँथी हुई पुष्पमालाकी भाँति आकाशमें उड़ रही है॥ ४७॥

सुप्तैकहंसं कुमुदैरुपेतं

महाहृदस्थं सलिलं विभाति।

घनैर्विमुक्तं निशि पूर्णचन्द्रं

तारागणाकीर्णमिवान्तरिक्षम् ॥ ४८॥

‘कुमुदके फूलोंसे भरा हुआ उस महान् तालाबका जल जिसमें एक हंस सोया हुआ है, ऐसा जान पड़ता है मानो रातके समय बादलोंके आवरणसे रहित आकाश सब ओर छिटके हुए तारोंसे व्याप्त होकर पूर्ण चन्द्रमाके साथ शोभा पा रहा हो॥ ४८॥

प्रकीर्णहंसाकुलमेखलानां

प्रबुद्धपद्मोत्पलमालिनीनाम् ।

वाप्युत्तमानामधिकाद्य लक्ष्मी-

र्वराङ्गनानामिव भूषितानाम्॥ ४९॥

‘सब ओर बिखरे हुए हंस ही जिनकी फैली हुई मेखला (करधनी) हैं, जो खिले हुए कमलों और उत्पलोंकी मालाएँ धारण करती हैं। उन उत्तम बावड़ियोंकी शोभा आज वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दरी वनिताओंके समान हो रही है॥ ४९॥

वेणुस्वरव्यञ्जिततूर्यमिश्र:

प्रत्यूषकालेऽनिलसम्प्रवृत्त: ।

सम्मूर्छितो गर्गरगोवृषाणा-

मन्योन्यमापूरयतीव शब्द:॥ ५०॥

‘वेणुके स्वरके रूपमें व्यक्त हुए वाद्यघोषसे मिश्रित और प्रात:कालकी वायुसे वृद्धिको प्राप्त होकर सब ओर फैला हुआ दही मथनेके बड़े-बड़े भाण्डों और साँड़ोंका शब्द, मानो एक-दूसरेका पूरक हो रहा है॥ ५०॥

नवैर्नदीनां कुसुमप्रहासै-

र्व्याधूयमानैर्मृदुमारुतेन ।

धौतामलक्षौमपटप्रकाशै:

कूलानि काशैरुपशोभितानि॥ ५१॥

‘नदियोंके तट मन्द-मन्द वायुसे कम्पित, पुष्परूपी हाससे सुशोभित और धुले हुए निर्मल रेशमी वस्त्रोंके समान प्रकाशित होनेवाले नूतन कासोंसे बड़ी शोभा पा रहे हैं॥ ५१॥

वनप्रचण्डा मधुपानशौण्डा:

प्रियान्विता: षट्चरणा: प्रहृष्टा:।

वनेषु मत्ता: पवनानुयात्रां

कुर्वन्ति पद्मासनरेणुगौरा:॥ ५२॥

‘वनमें ढिठाईके साथ घूमनेवाले तथा कमल और असनके परागोंसे गौरवर्णको प्राप्त हुए मतवाले भ्रमर, जो पुष्पोंके मकरन्दका पान करनेमें बड़े चतुर हैं, अपनी प्रियाओंके साथ हर्षमें भरकर वनोंमें (गन्धके लोभसे) वायुके पीछे-पीछे जा रहे हैं॥ ५२॥

जलं प्रसन्नं कुसुमप्रहासं

क्रौञ्चस्वनं शालिवनं विपक्वम्।

मृदुश्च वायुर्विमलश्च चन्द्र:

शंसन्ति वर्षव्यपनीतकालम्॥ ५३॥

‘जल स्वच्छ हो गया है, धानकी खेती पक गयी है, वायु मन्दगतिसे चलने लगी है और चन्द्रमा अत्यन्त निर्मल दिखायी देता है—ये सब लक्षण उस शरत्कालके आगमनकी सूचना देते हैं। जिसमें वर्षाकी समाप्ति हो जाती है, क्रौञ्च पक्षी बोलने लगते हैं और फूल उस ऋतुके हासकी भाँति खिल उठते हैं॥ ५३॥

मीनोपसंदर्शितमेखलानां

नदीवधूनां गतयोऽद्य मन्दा:।

कान्तोपभुक्तालसगामिनीनां

प्रभातकालेष्विव कामिनीनाम्॥ ५४॥

‘रातको प्रियतमके उपभोगमें आकर प्रात:काल अलसायी गतिसे चलनेवाली कामिनियोंकी भाँति उन नदीस्वरूपा वधुओंकी गति भी आज मन्द हो गयी है, जो मछलियोंकी मेखला-सी धारण किये हुए हैं॥ ५४॥

सचक्रवाकानि सशैवलानि

काशैर्दुकूलैरिव संवृतानि।

सपत्ररेखाणि सरोचनानि

वधूमुखानीव नदीमुखानि॥ ५५॥

‘नदियोंके मुख नव वधुओंके मुँहके समान शोभा पाते हैं। उनमें जो चक्रवाक हैं, वे गोरोचनद्वारा निर्मित तिलकके समान प्रतीत होते हैं, जो सेवार हैं, वे वधूके मुखपर बनी हुई पत्रभङ्गीके समान जान पड़ते हैं तथा जो काश हैं, वे ही मानो श्वेत दुकूल बनकर नदीरूपिणी वधूके मुँहको ढके हुए हैं॥ ५५॥

प्रफुल्लबाणासनचित्रितेषु

प्रहृष्टषट्पादनिकूजितेषु ।

गृहीतचापोद्यतदण्डचण्ड:

प्रचण्डचापोऽद्य वनेषु काम:॥ ५६॥

‘फूले हुए सरकण्डों और असनके वृक्षोंसे जिनकी विचित्र शोभा हो रही है तथा जिनमें हर्षभरे भ्रमरोंकी आवाज गूँजती रहती है, उन वनोंमें आज प्रचण्ड धनुर्धर कामदेव प्रकट हुआ है, जो धनुष हाथमें लेकर विरही जनोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हो अत्यन्त कोपका परिचय दे रहा है॥ ५६॥

लोकं सुवृष्ट्या परितोषयित्वा

नदीस्तटाकानि च पूरयित्वा।

निष्पन्नसस्यां वसुधां च कृत्वा

त्यक्त्वा नभस्तोयधरा: प्रणष्टा:॥ ५७॥

‘अच्छी वर्षासे लोगोंको संतुष्ट करके नदियों और तालाबोंको पानीसे भरकर तथा भूतलको परिपक्व धानकी खेतीसे सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये॥ ५७॥

दर्शयन्ति शरन्नद्य: पुलिनानि शनै: शनै:।

नवसंगमसव्रीडा जघनानीव योषित:॥ ५८॥

‘शरद्-ऋतुकी नदियाँ धीरे-धीरे जलके हटनेसे अपने नग्न तटोंको दिखा रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे प्रथम समागमके समय लजीली युवतियाँ शनै:-शनै: अपने जघन-स्थलको दिखानेके लिये विवश होती हैं॥

प्रसन्नसलिला: सौम्य कुरराभिविनादिता:।

चक्रवाकगणाकीर्णा विभान्ति सलिलाशया:॥ ५९॥

‘सौम्य! सभी जलाशयोंके जल स्वच्छ हो गये हैं। वहाँ कुरर पक्षियोंके कलनाद गूँज रहे हैं और चक्रवाकोंके समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं। इस प्रकार उन जलाशयोंकी बड़ी शोभा हो रही है॥ ५९॥

अन्योन्यबद्धवैराणां जिगीषूणां नृपात्मज।

उद्योगसमय: सौम्य पार्थिवानामुपस्थित:॥ ६०॥

‘सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते हैं, उन भूमिपालोंके लिये यह युद्धके निमित्त उद्योग करनेका समय उपस्थित हुआ है॥ ६०॥

इयं सा प्रथमा यात्रा पार्थिवानां नृपात्मज।

न च पश्यामि सुग्रीवमुद्योगं च तथाविधम्॥ ६१॥

‘नरेशनन्दन! राजाओंकी विजय-यात्राका यह प्रथम अवसर है, किंतु न तो मैं सुग्रीवको यहाँ उपस्थित देखता हूँ और न उनका कोई वैसा उद्योग ही दृष्टिगोचर होता है॥ ६१॥

असना: सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिता:।

दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु॥ ६२॥

‘पर्वतके शिखरोंपर असन, छितवन, कोविदार, बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं॥ ६२॥

हंससारसचक्राह्वै: कुररैश्च समन्तत:।

पुलिनान्यवकीर्णानि नदीनां पश्य लक्ष्मण॥ ६३॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, नदियोंके तटोंपर सब ओर हंस, सारस, चक्रवाक और कुरर नामक पक्षी फैले हुए हैं॥ ६३॥

चत्वारो वार्षिका मासा गता वर्षशतोपमा:।

मम शोकाभितप्तस्य तथा सीतामपश्यत:॥ ६४॥

‘मैं सीताको न देखनेके कारण शोकसे संतप्त हो रहा हूँ; अत: ये वर्षाके चार महीने मेरे लिये सौ वर्षोंके समान बीते हैं॥ ६४॥

चक्रवाकीव भर्तारं पृष्ठतोऽनुगता वनम्।

विषमं दण्डकारण्यमुद्यानमिव चाङ्गना॥ ६५॥

‘जैसे चकवी अपने स्वामीका अनुसरण करती है, उसी प्रकार कल्याणी सीता इस भयंकर एवं दुर्गम दण्डकारण्यको उद्यान-सा समझकर मेरे पीछे यहाँतक चली आयी थी॥ ६५॥

प्रियाविहीने दु:खार्ते हृतराज्ये विवासिते।

कृपां न कुरुते राजा सुग्रीवो मयि लक्ष्मण॥ ६६॥

‘लक्ष्मण! मैं अपनी प्रियतमासे बिछुड़ा हुआ हूँ। मेरा राज्य छीन लिया गया है और मैं देशसे निकाल दिया गया हूँ। इस अवस्थामें भी राजा सुग्रीव मुझपर कृपा नहीं कर रहा है॥ ६६॥

अनाथो हृतराज्योऽहं रावणेन च धर्षित:।

दीनो दूरगृह: कामी मां चैव शरणं गत:॥ ६७॥

इत्येतै: कारणै: सौम्य सुग्रीवस्य दुरात्मन:।

अहं वानरराजस्य परिभूत: परंतप:॥ ६८॥

‘सौम्यलक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ। राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ। रावणने मेरा तिरस्कार किया है। मैं दीन हूँ। मेरा घर यहाँसे बहुत दूर है। मैं कामना लेकर यहाँ आया हूँ तथा सुग्रीव यह भी समझता है कि राम मेरी शरणमें आये हैं। इन्हीं सब कारणोंसे वानरोंका राजा दुरात्मा सुग्रीव मेरा तिरस्कार कर रहा है; किंतु उसे पता नहीं है कि मैं सदा शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हूँ॥ ६७-६८॥

स कालं परिसंख्याय सीताया: परिमार्गणे।

कृतार्थ: समयं कृत्वा दुर्मतिर्नाववुध्यते॥ ६९॥

‘उसने सीताकी खोजके लिये समय निश्चित कर दिया था; किंतु उसका तो अब काम निकल गया है, इसीलिये वह दुर्बुद्धि वानर प्रतिज्ञा करके भी उसका कुछ खयाल नहीं कर रहा है॥ ६९॥

स किष्किन्धां प्रविश्य त्वं ब्रूहि वानरपुङ्गवम्।

मूर्खं ग्राम्यसुखे सक्तं सुग्रीवं वचनान्मम॥ ७०॥

‘अत: लक्ष्मण! तुम मेरी आज्ञासे किष्किन्धापुरीमें जाओ और विषयभोगमें फँसे हुए मूर्ख वानरराज सुग्रीवसे इस प्रकार कहो—॥ ७०॥

अर्थिनामुपपन्नानां पूर्वं चाप्युपकारिणाम्।

आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधम:॥ ७१॥

‘जो बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करनेवाले कार्यार्थी पुरुषोंको प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसारके सभी पुरुषोंमें नीच है॥ ७१॥

शुभं वा यदि वा पापं यो हि वाक्यमुदीरितम्।

सत्येन परिगृह्णाति स वीर: पुरुषोत्तम:॥ ७२॥

‘जो अपने मुखसे प्रतिज्ञाके रूपमें निकले हुए भले या बुरे सभी तरहके वचनोंको अवश्य पालनीय समझकर सत्यकी रक्षाके उद्देश्यसे उनका पालन करता है, वह वीर समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ माना जाता है॥ ७२॥

कृतार्था ह्यकृतार्थानां मित्राणां न भवन्ति ये।

तान् मृतानपि क्रव्यादा: कृतघ्नान् नोपभुञ्जते॥ ७३॥

‘जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जानेपर, जिनके कार्य नहीं पूरे हुए हैं। उन मित्रोंके सहायक नहीं होते—उनके कार्यको सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करते, उन कृतघ्न पुरुषोंके मरनेपर मांसाहारी जन्तु भी उनका मांस नहीं खाते हैं॥

नूनं काञ्चनपृष्ठस्य विकृष्टस्य मया रणे।

द्रष्टुमिच्छसि चापस्य रूपं विद्युद्गणोपमम्॥ ७४॥

‘सुग्रीव! निश्चय ही तुम युद्धमें मेरे द्वारा खींचे गये सोनेकी पीठवाले धनुषका कौंधती हुई बिजलीके समान रूप देखना चाहते हो॥ ७४॥

घोरं ज्यातलनिर्घोषं क्रुद्धस्य मम संयुगे।

निर्घोषमिव वज्रस्य पुन: संश्रोतुमिच्छसि॥ ७५॥

‘संग्राममें कुपित होकर मेरे द्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चाकी भयंकर टङ्कारको, जो वज्रकी गड़गड़ाहटको भी मात करनेवाली है, अब फिर तुम्हें सुननेकी इच्छा हो रही है॥ ७५॥

काममेवंगतेऽप्यस्य परिज्ञाते पराक्रमे।

त्वत्सहायस्य मे वीर न चिन्ता स्यान्नृपात्मज॥ ७६॥

‘वीर राजकुमार! सुग्रीवको तुम-जैसे सहायकके साथ रहनेवाले मेरे पराक्रमका ज्ञान हो चुका है, ऐसी दशामें भी यदि उसे यह चिन्ता न हो कि ये वालीकी भाँति मुझे मार सकते हैं तो यह आश्चर्यकी ही बात है!॥

यदर्थमयमारम्भ: कृत: परपुरंजय।

समयं नाभिजानाति कृतार्थ: प्लवगेश्वर:॥ ७७॥

‘शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले लक्ष्मण! जिसके लिये यह मित्रता आदिका सारा आयोजन किया गया, सीताकी खोजविषयक उस प्रतिज्ञाको इस समय वानरराज सुग्रीव भूल गया है—उसे याद नहीं कर रहा है; क्योंकि उसका अपना काम सिद्ध हो चुका॥ ७७॥

वर्षा: समयकालं तु प्रतिज्ञाय हरीश्वर:।

व्यतीतांश्चतुरो मासान् विहरन् नावबुध्यते॥ ७८॥

‘सुग्रीवने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षाका अन्त होते ही सीताकी खोज आरम्भ कर दी जायगी, किंतु वह क्रीड़ा-विहारमें इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनोंका उसे कुछ पता ही नहीं है॥ ७८॥

सामात्यपरिषत्क्रीडन् पानमेवोपसेवते।

शोकदीनेषु नास्मासु सुग्रीव: कुरुते दयाम्॥ ७९॥

‘सुग्रीव मन्त्रियों तथा परिजनोंसहित क्रीडाजनित आमोद-प्रमोदमें फँसकर विविध पेय पदार्थोंका ही सेवन कर रहा है। हमलोग शोकसे व्याकुल हो रहे हैं। तो भी वह हमपर दया नहीं करता है॥ ७९॥

उच्यतां गच्छ सुग्रीवस्त्वया वीर महाबल।

मम रोषस्य यद्रूपं ब्रूयाश्चैनमिदं वच:॥ ८०॥

‘महाबली वीर लक्ष्मण! तुम जाओ। सुग्रीवसे बात करो। मेरे रोषका जो स्वरूप है, वह उसे बताओ और मेरा यह संदेश भी कह सुनाओ॥ ८०॥

न स संकुचित: पन्था येन वाली हतो गत:।

समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगा:॥ ८१॥

सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्तेसे गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहो। वालीके मार्गका अनुसरण न करो॥ ८१॥

एक एव रणे वाली शरेण निहतो मया।

त्वां तु सत्यादतिक्रान्तं हनिष्यामि सबान्धवम्॥ ८२॥

‘वाली तो रणक्षेत्रमें अकेला ही मेरे बाणसे मारा गया था, परंतु यदि तुम सत्यसे विचलित हुए तो मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित कालके गालमें डाल दूँगा॥ ८२॥

यदेवं विहिते कार्ये यद्धितं पुरुषर्षभ।

तत् तद् ब्रूहि नरश्रेष्ठ त्वर कालव्यतिक्रम:॥ ८३॥

‘पुरुषप्रवर! नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! जब इस तरह कार्य बिगड़ने लगे, ऐसे अवसरपर और भी जो-जो बातें कहनी उचित हों— जिनके कहनेसे अपना हित होता हो, वे सब बातें कहना। जल्दी करो; क्योंकि कार्य आरम्भ करनेका समय बीता जा रहा है॥ ८३॥

कुरुष्व सत्यं मम वानरेश्वर

प्रतिश्रुतं धर्ममवेक्ष्य शाश्वतम्।

मा वालिनं प्रेतगतो यमक्षये

त्वमद्य पश्येर्मम चोदित: शरै:॥ ८४॥

‘सुग्रीवसे कहो—‘वानरराज! तुम सनातन धर्मपर दृष्टि रखकर अपनी की हुई प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि तुम्हें आज ही मेरे बाणोंसे प्रेरित हो प्रेतभावको प्राप्त होकर यमलोकमें वालीका दर्शन करना पड़े’॥ ८४॥

स पूर्वजं तीव्रविवृद्धकोपं

लालप्यमानं प्रसमीक्ष्य दीनम्।

चकार तीव्रां मतिमुग्रतेजा

हरीश्वरे मानववंशवर्धन:॥ ८५॥

मानव-वंशकी वृद्धि करनेवाले उग्र तेजस्वी लक्ष्मणने जब अपने बड़े भाईको दु:खी, बढ़े हुए तीव्र रोषसे युक्त तथा अधिक बोलते देखा, तब वानरराज सुग्रीवके प्रति कठोर भाव धारण कर लिया॥ ८५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिंश: सर्ग:॥ ३०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३०॥

 


एकत्रिंश: सर्ग:

सुग्रीवपर लक्ष्मणका रोष, श्रीरामका उन्हें समझाना, लक्ष्मणका किष्किन्धाके द्वारपर जाकर अङ्गदको सुग्रीवके पास भेजना, वानरोंका भय तथा प्लक्ष और प्रभावका सुग्रीवको कर्तव्यका उपदेश देना

स कामिनं दीनमदीनसत्त्वं

शोकाभिपन्नं समुदीर्णकोपम्।

नरेन्द्रसूनुर्नरदेवपुत्रं

रामानुज: पूर्वजमित्युवाच॥ १॥

श्रीरामके छोटे भाई नरेन्द्रकुमार लक्ष्मणने उस समय सीताकी कामनासे युक्त, दु:खी, उदारहृदय, शोकग्रस्त तथा बढ़े हुए रोषवाले ज्येष्ठ भ्राता महाराजपुत्र श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

न वानर: स्थास्यति साधुवृत्ते

न मन्यते कर्मफलानुषङ्गान्।

न भोक्ष्यते वानरराज्यलक्ष्मीं

तथा हि नातिक्रमतेऽस्य बुद्धि:॥ २ ॥

‘आर्य! सुग्रीव वानर है, वह श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उचित सदाचारपर स्थिर नहीं रह सकेगा। सुग्रीव इस बातको भी नहीं मानता है कि अग्निको साक्षी देकर श्रीरघुनाथजीके साथ मित्रता-स्थापनरूप जो सत्-कर्म किया गया है, उसीके फलसे मुझे निष्कण्टक राज्यभोग प्राप्त हुए हैं। अत: वह वानरोंकी राज्य-लक्ष्मीका पालन एवं उपभोग नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि मित्रधर्मके पालनके लिये अधिक आगे नहीं बढ़ रही है॥ २॥

मतिक्षयाद् ग्राम्यसुखेषु सक्त-

स्तव प्रसादात् प्रतिकारबुद्धि:।

हतोऽग्रजं पश्यतु वीरवालिनं

न राज्यमेवं विगुणस्य देयम्॥ ३ ॥

‘सुग्रीवकी बुद्धि मारी गयी है, इसलिये वह विषयभोगोंमें आसक्त हो गया है। आपकी कृपासे जो उसे राज्य आदिका लाभ हुआ है, उस उपकारका बदला चुकानेकी उसकी नीयत नहीं है। अत: अब वह भी मारा जाकर अपने बड़े भाई वीरवर वालीका दर्शन करे। ऐसे गुणहीन पुरुषको राज्य नहीं देना चाहिये॥ ३॥

न धारये कोपमुदीर्णवेगं

निहन्मि सुग्रीवमसत्यमद्य।

हरिप्रवीरै: सह वालिपुत्रो

नरेन्द्रपुत्र्या विचयं करोतु॥ ४ ॥

‘मेरे क्रोधका वेग बढ़ा हुआ है। मैं इसे रोक नहीं सकता। असत्यवादी सुग्रीवको आज ही मारे डालता हूँ। अब वालिकुमार अङ्गद ही राजा होकर प्रधान वानर-वीरोंके साथ राजकुमारी सीताकी खोज करे’॥ ४॥

तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं

निवेदितार्थं रणचण्डकोपम्।

उवाच राम: परवीरहन्ता

स्ववीक्षितं सानुनयं च वाक्यम्॥ ५ ॥

यों कहकर लक्ष्मण धनुष-बाण हाथमें ले बड़े वेगसे चल पड़े। उन्होंने अपने जानेका प्रयोजन स्पष्ट शब्दोंमें निवेदन कर दिया था। युद्धके लिये उनका प्रचण्ड कोप बढ़ा हुआ था तथा वे क्या करने जा रहे हैं, इसपर उन्होंने अच्छी तरह विचार नहीं किया था। उस समय विपक्षी वीरोंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें शान्त करनेके लिये यह अनुनययुक्त बात कही—॥ ५॥

नहि वै त्वद्विधो लोके पापमेवं समाचरेत्।

कोपमार्येण यो हन्ति स वीर: पुरुषोत्तम:॥ ६॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुषको संसारमें ऐसा (मित्रवधरूप) निषिद्ध आचरण नहीं करना चाहिये। जो उत्तम विवेकके द्वारा अपने क्रोधको मार देता है, वह वीर समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ है॥ ६॥

नेदमत्र त्वया ग्राह्यं साधुवृत्तेन लक्ष्मण।

तां प्रीतिमनुवर्तस्व पूर्ववृत्तं च संगतम्॥ ७॥

‘लक्ष्मण! तुम सदाचारी हो। तुम्हें इस प्रकार सुग्रीवके मारनेका निश्चय नहीं करना चाहिये। उसके प्रति जो तुम्हारा प्रेम था, उसीका अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रता की गयी है, उसे निबाहो॥ ७॥

सामोपहितया वाचा रूक्षाणि परिवर्जयन्।

वक्तुमर्हसि सुग्रीवं व्यतीतं कालपर्यये॥ ८॥

‘तुम्हें सान्त्वनापूर्ण वाणीद्वारा कटु वचनोंका परित्याग करते हुए सुग्रीवसे इतना ही कहना चाहिये कि तुमने सीताकी खोजके लिये जो समय नियत किया था, वह बीत गया (फिर भी चुप क्यों बैठे हो)’॥ ८॥

सोऽग्रजेनानुशिष्टार्थो यथावत् पुरुषर्षभ:।

प्रविवेश पुरीं वीरो लक्ष्मण: परवीरहा॥ ९॥

अपने बड़े भाईके इस प्रकार यथोचित रूपसे समझानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुरुषप्रवर वीर लक्ष्मणने किष्किन्धापुरीमें प्रवेश (करनेका विचार) किया॥

तत: शुभमति: प्राज्ञो भ्रातु: प्रियहिते रत:।

लक्ष्मण: प्रतिसंरब्धो जगाम भवनं कपे:॥ १०॥

भाईके प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाले शुभ बुद्धिसे युक्त बुद्धिमान् लक्ष्मण रोषमें भरे हुए ही वानरराज सुग्रीवके भवनकी ओर चले॥ १०॥

शक्रबाणासनप्रख्यं धनु: कालान्तकोपमम्।

प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभं मन्दर: सानुमानिव॥ ११॥

उस समय वे इन्द्रधनुषके समान तेजस्वी, काल और अन्तकके समान भयंकर तथा पर्वत-शिखरके समान विशाल धनुषको हाथमें लेकर शृङ्गसहित मन्दराचलके समान जान पड़ते थे॥ ११॥

यथोक्तकारी वचनमुत्तरं चैव सोत्तरम्।

बृहस्पतिसमो बुद्ध्या मत्वा रामानुजस्तदा॥ १२॥

श्रीरामके अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाईकी आज्ञाका यथोक्तरूपसे पालन करनेवाले तथा बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे। वे सुग्रीवसे जो बात कहते, सुग्रीव उसका जो कुछ उत्तर देते और उस उत्तरका भी ये जो कुछ उत्तर देते, उन सबको अच्छी तरह समझ-बूझकर वहाँसे प्रस्थित हुए थे॥ १२॥

कामक्रोधसमुत्थेन भ्रातु: क्रोधाग्निना वृत:।

प्रभञ्जन इवाप्रीत: प्रययौ लक्ष्मणस्तत:॥ १३॥

सीताकी खोजविषयक जो श्रीरामकी कामना थी और सुग्रीवकी असावधानीके कारण उसमें बाधा पड़नेसे जो उन्हें क्रोध हुआ था, उन दोनोंके कारण लक्ष्मणकी भी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। उस क्रोधाग्निसे घिरे हुए लक्ष्मण सुग्रीवके प्रति प्रसन्न नहीं थे। वे उसी अवस्थामें वायुके समान वेगसे चले॥ १३॥

सालतालाश्वकर्णांश्च तरसा पातयन् बलात्।

पर्यस्यन् गिरिकूटानि द्रुमानन्यांश्च वेगित:॥ १४॥

उनका वेग ऐसा बढ़ा हुआ था कि वे मार्गमें मिलनेवाले साल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंको उसी वेगसे बलपूर्वक गिराते तथा पर्वतशिखरों एवं अन्य वृक्षोंको उठा-उठाकर दूर फेंकते जाते थे॥ १४॥

शिलाश्च शकलीकुर्वन् पद‍्भ्यां गज इवाशुग:।

दूरमेकपदं त्यक्त्वा ययौ कार्यवशाद् द्रुतम्॥ १५॥

शीघ्रगामी हाथीके समान अपने पैरोंकी ठोकरसे शिलाओंको चूर-चूर करते और लंबी-लंबी डगें भरते हुए वे कार्यवश बड़ी तेजीके साथ चले॥ १५॥

तामपश्यद् बलाकीर्णां हरिराजमहापुरीम्।

दुर्गामिक्ष्वाकुशार्दूल: किष्किन्धां गिरिसंकटे॥ १६॥

इक्ष्वाकुकुलके सिंह लक्ष्मणने निकट जाकर वानरराज सुग्रीवकी विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ोंके बीचमें बसी हुई थी। वानरसेनासे व्याप्त होनेके कारण वह पुरी दूसरोंके लिये दुर्गम थी॥ १६॥

रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठ: सुग्रीवं प्रति लक्ष्मण:।

ददर्श वानरान् भीमान् किष्किन्धायां बहिश्चरान्॥ १७॥

उस समय लक्ष्मणके ओष्ठ सुग्रीवके प्रति रोषसे फड़क रहे थे। उन्होंने किष्किन्धाके पास बहुतेरे भयंकर वानरोंको देखा जो नगरके बाहर विचर रहे थे॥ १७॥

तं दृष्ट्वा वानरा: सर्वे लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्।

शैलशृङ्गाणि शतश: प्रवृद्धांश्च महीरुहान्।

जगृहु: कुञ्जरप्रख्या वानरा: पर्वतान्तरे॥ १८॥

उन वानरोंके शरीर हाथियोंके समान विशाल थे। उन समस्त वानरोंने पुरुषप्रवर लक्ष्मणको देखते ही पर्वतके अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये॥ १८॥

तान् गृहीतप्रहरणान् सर्वान् दृष्ट्वा तु लक्ष्मण:।

बभूव द्विगुणं क्रुद्धो बह्विन्धन इवानल:॥ १९॥

उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोधसे जल उठे, मानो जलती आगमें बहुत-सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों॥ १९॥

तं ते भयपरीताङ्गा क्षुब्धं दृष्ट्वा प्लवंगमा:।

कालमृत्युयुगान्ताभं शतशो विद्रुता दिश:॥ २०॥

क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल, मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर दिखायी देने लगे। उन्हें देखकर उन वानरोंके शरीर भयसे काँपने लगे और वे सैकड़ोंकी संख्यामें चारों दिशाओंमें भाग गये॥ २०॥

तत: सुग्रीवभवनं प्रविश्य हरिपुंगवा:।

क्रोधमागमनं चैव लक्ष्मणस्य न्यवेदयन्॥ २१॥

तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरोंने सुग्रीवके महलमें जाकर लक्ष्मणके आगमन और क्रोधका समाचार निवेदन किया॥

तारया सहित: कामी सक्त: कपिवृषस्तदा।

न तेषां कपिसिंहानां शुश्राव वचनं तदा॥ २२॥

उस समय कामके अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो ताराके साथ थे। इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरोंकी बातें नहीं सुनीं॥ २२॥

तत: सचिवसंदिष्टा हरयो रोमहर्षणा:।

गिरिकुञ्जरमेघाभा नगरान्निर्ययुस्तदा॥ २३॥

तब सचिवकी आज्ञासे पर्वत, हाथी और मेघके समान विशालकाय वानर जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे, नगरसे बाहर निकले॥ २३॥

नखदंष्ट्रायुधा: सर्वे वीरा विकृतदर्शना:।

सर्वे शार्दूलदंष्ट्राश्च सर्वे विवृतदर्शना:॥ २४॥

वे सब-के-सब वीर थे। नख और दाँत ही उनके आयुध थे। वे बड़े विकराल दिखायी देते थे। उन सबकी दाढ़ें व्याघ्रोंकी दाढ़ोंके समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे (अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था—कोई छिपे नहीं थे)॥ २४॥

दशनागबला: केचित् केचिद् दशगुणोत्तरा:।

केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यवर्चस:॥ २५॥

किन्हींमें दस हाथियोंके बराबर बल था तो कोई सौ हाथियोंके समान बलशाली थे तथा किन्हीं-किन्हींका तेज (बल और पराक्रम) एक हजार हाथियोंके तुल्य था॥ २५॥

ततस्तै: कपिभिर्व्याप्तां द्रुमहस्तैर्महाबलै:।

अपश्यल्लक्ष्मण: क्रुद्ध: किष्किन्धां तां दुरासदाम्॥ २६॥

हाथमें वृक्ष लिये उन महाबली वानरोंसे व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी। लक्ष्मणने कुपित होकर उस पुरीकी ओर देखा॥ २६॥

ततस्ते हरय: सर्वे प्राकारपरिखान्तरात्।

निष्क्रम्योदग्रसत्त्वास्तु तस्थुराविष्कृतं तदा॥ २७॥

तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरीकी चहारदीवारी और खाईंके भीतरसे निकलकर प्रकटरूपसे सामने आकर खड़े हो गये॥ २७॥

सुग्रीवस्य प्रमादं च पूर्वजस्यार्थमात्मवान्।

दृष्ट्वा क्रोधवशं वीर: पुनरेव जगाम स:॥ २८॥

आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीवके प्रमाद तथा अपने बड़े भाईके महत्त्वपूर्ण कार्यपर दृष्टिपात करके पुन: वानरराजके प्रति क्रोधके वशीभूत हो गये॥ २८॥

स दीर्घोष्णमहोच्छ्वास: कोपसंरक्तलोचन:।

बभूव नरशार्दूल: सधूम इव पावक:॥ २९॥

वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे। उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे॥ २९॥

बाणशल्यस्फुरज्जिह्व: सायकासनभोगवान्।

स्वतेजोविषसम्भूत: पञ्चास्य इव पन्नग:॥ ३०॥

इतना ही नहीं, वे पाँच मुखवाले सर्पके समान दिखायी देने लगे। बाणका फल ही उस सर्पकी लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विषसे व्याप्त हो रहे थे॥ ३०॥

तं दीप्तमिव कालाग्निं नागेन्द्रमिव कोपितम्।

समासाद्याङ्गदस्त्रासाद् विषादमगमत् परम्॥ ३१॥

उस अवसरपर कुमार अङ्गद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोधमें भरे हुए नागराज शेषकी भाँति दृष्टिगोचर होनेवाले लक्ष्मणके पास डरते-डरते गये। वे अत्यन्त विषादमें पड़ गये थे॥ ३१॥

सोऽङ्गदं रोषताम्राक्ष: संदिदेश महायशा:।

सुग्रीव: कथ्यतां वत्स ममागमनमित्युत॥ ३२॥

एष रामानुज: प्राप्तस्त्वत्सकाशमरिंदम।

भ्रातुर्व्यसनसंतप्तो द्वारि तिष्ठति लक्ष्मण:॥ ३३॥

तस्य वाक्यं यदि रुचि: क्रियतां साधु वानर।

इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ वत्स वाक्यमरिंदम॥ ३४॥

महायशस्वी लक्ष्मणने क्रोधसे लाल आँखें करके अङ्गदको आदेश दिया—‘बेटा! सुग्रीवको मेरे आनेकी सूचना दो। उनसे कहना—शत्रुदमन वीर! श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मण अपने भ्राताके दु:खसे दु:खी होकर आपके पास आये हैं और नगर-द्वारपर खड़े हैं। वानरराज! यदि आपकी इच्छा हो तो उनकी आज्ञाका अच्छी तरह पालन कीजिये। शत्रुदमन वत्स अङ्गद! बस, इतना ही कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट आओ’॥ ३२—३४॥

लक्ष्मणस्य वच: श्रुत्वा शोकाविष्टोऽङ्गदोऽब्रवीत्।

पितु: समीपमागम्य सौमित्रिरयमागत:॥ ३५॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर शोकाकुल अङ्गदने पिता सुग्रीवके समीप आकर कहा—‘तात! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं’॥ ३५॥

अथाङ्गदस्तस्य सुतीव्रवाचा

सम्भ्रान्तभाव: परिदीनवक्त्र:।

निर्गत्य पूर्वं नृपतेस्तरस्वी

ततो रुमायाश्चरणौ ववन्दे॥ ३६॥

(अब इसी बातको कुछ विस्तारके साथ कहते हैं—) लक्ष्मणकी कठोर वाणीसे अङ्गदके मनमें बड़ी घबराहट हुई। उनके मुखपर अत्यन्त दीनता छा गयी। उन वेगशाली कुमारने वहाँसे निकलकर पहले वानरराज सुग्रीवके, फिर तारा तथा रुमाके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ३६॥

संगृह्य पादौ पितुरुग्रतेजा

जग्राह मातु: पुनरेव पादौ।

पादौ रुमायाश्च निपीडयित्वा

निवेदयामास ततस्तदर्थम्॥ ३७॥

उग्र तेजवाले अङ्गदने पहले तो पिताके दोनों पैर पकड़े फिर अपनी माता ताराके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। तदनन्तर रुमाके दोनों पैर दबाये। इसके बाद पूर्वोक्त बात कही॥ ३७॥

स निद्राक्लान्तसंवीतो वानरो न विबुद्धवान्।

बभूव मदमत्तश्च मदनेन च मोहित:॥ ३८॥

किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं कामसे मोहित होकर पड़े थे। निद्राने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था। इसलिये वे जाग न सके॥ ३८॥

तत: किलकिलां चक्रुर्लक्ष्मणं प्रेक्ष्य वानरा:।

प्रसादयन्तस्तं क्रुद्धं भयमोहितचेतस:॥ ३९॥

इतनेमें बाहर क्रोधमें भरे हुए लक्ष्मणको देखकर भयसे मोहितचित्त हुए वानर उन्हें प्रसन्न करनेके लिये दीनतासूचक वाणीमें किलकिलाने लगे॥ ३९॥

ते महौघनिभं दृष्ट्वा वज्राशनिसमस्वनम्।

सिंहनादं समं चक्रुर्लक्ष्मणस्य समीपत:॥ ४०॥

लक्ष्मणपर दृष्टि पड़ते ही उन वानरोंने सुग्रीवके निकटवर्ती स्थानमें एक साथ ही महान् जलप्रवाह तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जोर-जोरसे सिंहनाद किया (जिससे सुग्रीव जाग उठें)॥ ४०॥

तेन शब्देन महता प्रत्यबुध्यत वानर:।

मदविह्वलताम्राक्षो व्याकुल: स्रग्विभूषण:॥ ४१॥

वानरोंकी उस भयंकर गर्जनासे कपिराज सुग्रीवकी नींद खुल गयी। उस समय उनके नेत्र मदसे चञ्चल और लाल हो रहे थे। मन भी स्वस्थ नहीं था। उनके गलेमें सुन्दर पुष्पमाला शोभा दे रही थी॥ ४१॥

अथाङ्गदवच: श्रुत्वा तेनैव च समागतौ।

मन्त्रिणौ वानरेन्द्रस्य सम्मतोदारदर्शनौ॥ ४२॥

प्लक्षश्चैव प्रभावश्च मन्त्रिणावर्थधर्मयो:।

वक्तुमुच्चावचं प्राप्तं लक्ष्मणं तौ शशंसतु:॥ ४३॥

अङ्गदकी पूर्वोक्त बात सुनकर उन्हींके साथ आये हुए दो मन्त्री प्लक्ष और प्रभावने भी, जो वानरराजके सम्मानपात्र और उदार दृष्टिवाले थे तथा राजाको अर्थ और धर्मके विषयमें ऊँच-नीच समझानेके लिये नियुक्त थे, लक्ष्मणके आगमनकी सूचना दी॥ ४२-४३॥

प्रसादयित्वा सुग्रीवं वचनै: सार्थनिश्चितै:।

आसीनं पर्युपासीनौ यथा शक्रं मरुत्पतिम्॥ ४४॥

सत्यसंधौ महाभागौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

मनुष्यभावं सम्प्राप्तौ राज्यार्हौ राज्यदायिनौ॥ ४५॥

राजाके निकट खड़े हुए उन दोनों मन्त्रियोंने देवराज इन्द्रके समान बैठे हुए सुग्रीवको खूब सोच-विचार कर निश्चित किये हुए सार्थक वचनोंद्वारा प्रसन्न किया और इस प्रकार कहा—‘राजन्! महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण—दोनों भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं। (वे वास्तवमें भगवत्स्वरूप हैं) उन्होंने स्वेच्छासे मनुष्य-शरीर धारण किया है। वे दोनों समस्त त्रिलोकीका राज्य चलानेके योग्य हैं। वे ही आपके राज्यदाता हैं॥ ४४-४५॥

तयोरेको धनुष्पाणिर्द्वारि तिष्ठति लक्ष्मण:।

यस्य भीता: प्रवेपन्तो नादान् मुञ्चन्ति वानरा:॥ ४६॥

‘उनमेंसे एक वीर लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये किष्किन्धाके दरवाजेपर खड़े हैं, जिनके भयसे काँपते हुए वानर जोर-जोरसे चीख रहे हैं॥ ४६॥

स एष राघवभ्राता लक्ष्मणो वाक्यसारथि:।

व्यवसायरथ: प्राप्तस्तस्य रामस्य शासनात्॥ ४७॥

‘श्रीरामका आदेशवाक्य ही जिनका सारथि और कर्तव्यका निश्चय ही जिनका रथ है, वे लक्ष्मण श्रीरामकी आज्ञासे यहाँ पधारे हैं॥ ४७॥

अयं च तनयो राजंस्ताराया दयितोऽङ्गद:।

लक्ष्मणेन सकाशं ते प्रेषितस्त्वरयानघ॥ ४८॥

‘राजन्! निष्पाप वानरराज! लक्ष्मणने तारादेवीके इन प्रिय पुत्र अङ्गदको आपके निकट बड़ी उतावलीके साथ भेजा है॥ ४८॥

सोऽयं रोषपरीताक्षो द्वारि तिष्ठति वीर्यवान्।

वानरान् वानरपते चक्षुषा निर्दहन्निव॥ ४९॥

‘वानरपते! पराक्रमी लक्ष्मण क्रोधसे लाल आँखें किये नगरद्वारपर उपस्थित हैं और वानरोंकी ओर इस तरह देख रहे हैं, मानो वे अपनी नेत्राग्निसे उन्हें दग्ध कर डालेंगे॥ ४९॥

तस्य मूर्ध्ना प्रणामं त्वं सपुत्र: सहबान्धव:।

गच्छ शीघ्रं महाराज रोषो ह्यद्योपशाम्यताम्॥ ५०॥

‘महाराज! आप शीघ्र चलें तथा पुत्र और बन्धु- बान्धवोंके साथ उनके चरणोंमें मस्तक नवावें और इस प्रकार आज उनका रोष शान्त करें॥ ५०॥

यथा हि रामो धर्मात्मा तत्कुरुष्व समाहित:।

राजंस्तिष्ठ स्वसमये भव सत्यप्रतिश्रव:॥ ५१॥

‘राजन्! धर्मात्मा श्रीराम जैसा कहते हैं, सावधानीके साथ उसका पालन कीजिये। आप अपनी दी हुई बातपर अटल रहिये और सत्यप्रतिज्ञ बनिये’॥ ५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग:॥ ३१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥

 

द्वात्रिंश: सर्ग:

हनुमान्‌जीका चिन्तित हुए सुग्रीवको समझाना

अङ्गदस्य वच: श्रुत्वा सुग्रीव: सचिवै: सह।

लक्ष्मणं कुपितं श्रुत्वा मुमोचासनमात्मवान्॥ १॥

मन्त्रियोंसहित अङ्गदका वचन सुनकर और लक्ष्मणके कुपित होनेका समाचार पाकर मनको वशमें रखनेवाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये॥ १॥

स च तानब्रवीद् वाक्यं निश्चित्य गुरुलाघवम्।

मन्त्रज्ञान् मन्त्रकुशलो मन्त्रेषु परिनिष्ठित:॥ २॥

वे मन्त्रणा (कर्तव्यविषयक विचार) के परिनिष्ठित विद्वान् होनेके कारण मन्त्रप्रयोगमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी महत्ता और अपनी लघुताका विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियोंसे कहा—॥ २॥

न मे दुर्व्याहृतं किंचिन्नापि मे दुरनुष्ठितम्।

लक्ष्मणो राघवभ्राता क्रुद्ध: किमिति चिन्तये॥ ३॥

‘मैंने न तो कोई अनुचित बात मुँहसे निकाली है और न कोई बुरा काम ही किया है। फिर श्रीरघुनाथजीके भ्राता लक्ष्मण मुझपर कुपित क्यों हुए हैं? इस बातपर मैं बारंबार विचार करता हूँ॥ ३॥

असुहृद्भिर्ममामित्रैर्नित्यमन्तरदर्शिभि: ।

मम दोषानसम्भूतान् श्रावितो राघवानुज:॥ ४॥

‘जो सदा मेरे छिद्र देखनेवाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओंने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मणसे मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे॥ ४॥

अत्र तावद् यथाबुद्धि: सर्वैरेव यथाविधि।

भावस्य निश्चयस्तावद् विज्ञेयो निपुणं शनै:॥ ५॥

‘लक्ष्मणके कोपके विषयमें पहले तुम सब लोगोंको धीरे-धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभावका विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोपके कारणका यथार्थ रूपसे ज्ञान हो जाय॥ ५॥

न खल्वस्ति मम त्रासो लक्ष्मणान्नापि राघवात्।

मित्रं स्वस्थानकुपितं जनयत्येव सम्भ्रमम्॥ ६॥

‘अवश्य ही मुझे लक्ष्मणसे तथा श्रीरघुनाथजीसे कोई भय नहीं है, तथापि बिना अपराधके कुपित हुआ मित्र हृदयमें घबराहट उत्पन्न कर ही देता है॥ ६॥

सर्वथा सुकरं मित्रं दुष्करं प्रतिपालनम्।

अनित्यत्वात् तु चित्तानां प्रीतिरल्पेऽपि भिद्यते॥ ७॥

‘किसीको मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्रीको पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मनका भाव सदा एक-सा नहीं रहता। किसीके द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जानेपर प्रेममें अन्तर आ जाता है॥

अतो निमित्तं त्रस्तोऽहं रामेण तु महात्मना।

यन्ममोपकृतं शक्यं प्रतिकर्तुं न तन्मया॥ ८॥

‘इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीरामने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकानेकी मुझमें शक्ति नहीं है’॥ ८॥

सुग्रीवेणैवमुक्ते तु हनूमान् हरिपुंगव:।

उवाच स्वेन तर्केण मध्ये वानरमन्त्रिणाम्॥ ९॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्‌जी अपनी युक्तिका सहारा लेकर वानरमन्त्रियोंके बीचमें बोले—॥ ९॥

सर्वथा नैतदाश्चर्यं यत् त्वं हरिगणेश्वर।

न विस्मरसि सुस्निग्धमुपकारं कृतं शुभम्॥ १०॥

‘कपिराज! मित्रके द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकारको जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्यकी बात नहीं है (क्योंकि अच्छे पुरुषोंका ऐसा स्वभाव ही होता है)॥ १०॥

राघवेण तु वीरेण भयमुत्सृज्य दूरत:।

त्वत्प्रियार्थं हतो वाली शक्रतुल्यपराक्रम:॥ ११॥

सर्वथा प्रणयात् क्रुद्धो राघवो नात्र संशय:।

भ्रातरं सम्प्रहितवाँल्लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ १२॥

‘वीरवर श्रीरघुनाथजीने तो लोकापवादके भयको दूर हटाकर आपका प्रिय करनेके लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वालीका वध किया है; अत: वे नि:संदेह आपपर कुपित नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजीने शोभा-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणको जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है॥ ११-१२॥

त्वं प्रमत्तो न जानीषे कालं कालविदां वर।

फुल्लसप्तच्छदश्यामा प्रवृत्ता तु शरच्छुभा॥ १३॥

‘समयका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिराज! आपने सीताकी खोज करनेके लिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमादमें पड़ जानेके कारण भूल गये हैं। देखिये न, यह सुन्दर शरद्-ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवनके फूलोंसे श्यामवर्णकी प्रतीत होती है॥ १३॥

निर्मलग्रहनक्षत्रा द्यौ: प्रणष्टबलाहका।

प्रसन्नाश्च दिश: सर्वा: सरितश्च सरांसि च॥ १४॥

‘आकाशमें अब बादल नहीं रहे। ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं। सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरोंके जल पूर्णत: स्वच्छ हो गये हैं॥

प्राप्तमुद्योगकालं तु नावैषि हरिपुंगव।

त्वं प्रमत्त इति व्यक्तं लक्ष्मणोऽयमिहागत:॥ १५॥

‘वानरराज! राजाओंके लिये विजय-यात्राकी तैयारी करनेका समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमादमें पड़ गये हैं। इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं॥ १५॥

आर्तस्य हृतदारस्य परुषं पुरुषान्तरात्।

वचनं मर्षणीयं ते राघवस्य महात्मन:॥ १६॥

‘महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नीका अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दु:खी हैं। अत: यदि लक्ष्मणके मुखसे उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये॥ १६॥

कृतापराधस्य हि ते नान्यत् पश्याम्यहं क्षमम्।

अन्तरेणाञ्जलिं बद‍्ध्वा लक्ष्मणस्य प्रसादनात्॥ १७॥

‘आपकी ओरसे अपराध हुआ है। अत: हाथ जोड़कर लक्ष्मणको प्रसन्न करनेके सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता॥ १७॥

नियुक्तैर्मन्त्रिभिर्वाच्यो ह्यवश्यं पार्थिवो हितम्।

इत एव भयं त्यक्त्वा ब्रवीम्यवधृतं वच:॥ १८॥

‘राज्यकी भलाईके कामपर नियुक्त हुए मन्त्रियोंका यह कर्तव्य है कि राजाको उसके हितकी बात अवश्य बतावें। अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ॥ १८॥

अभिक्रुद्ध: समर्थो हि चापमुद्यम्य राघव:।

सदेवासुरगन्धर्वं वशे स्थापयितुं जगत्॥ १९॥

‘भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथमें ले लें तो देवता-असुर-गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकते हैं॥ १९॥

न स क्षम: कोपयितुं य: प्रसाद्य: पुनर्भवेत्।

पूर्वोपकारं स्मरता कृतज्ञेन विशेषत:॥ २०॥

‘जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुषको क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है। विशेषत: वह पुरुष जो मित्रके किये हुए पहले उपकारको याद रखता हो और कृतज्ञ हो, इस बातका अधिक ध्यान रखे॥ २०॥

तस्य मूर्ध्ना प्रणम्य त्वं सपुत्र: ससुहृज्जन:।

राजंस्तिष्ठ स्वसमये भर्तुर्भार्येव तद्वशे॥ २१॥

‘राजन्! इसलिये आप पुत्र और मित्रोंके साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहिये। जैसे पत्नी अपने पतिके वशमें रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजीके अधीन रहिये॥ २१॥

न रामरामानुजशासनं त्वया

कपीन्द्र युक्तं मनसाप्यपोहितुम्।

मनो हि ते ज्ञास्यति मानुषं बलं

सराघवस्यास्य सुरेन्द्रवर्चस:॥ २२॥

‘वानरराज! श्रीराम और लक्ष्मणके आदेशकी आपको मनसे भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीके अलौकिक बलका ज्ञान तो आपके मनको है ही’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥

 

त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:

लक्ष्मणका किष्किन्धापुरीकी शोभा देखते हुए सुग्रीवके महलमें प्रवेश करके क्रोधपूर्वक धनुषको टंकारना, भयभीत सुग्रीवका ताराको उन्हें शान्त करनेके लिये भेजना तथा ताराका समझा-बुझाकर उन्हें अन्त:पुरमें ले आना

अथ प्रतिसमादिष्टो लक्ष्मण: परवीरहा।

प्रविवेश गुहां रम्यां किष्किन्धां रामशासनात्॥ १॥

इधर गुफामें प्रवेश करनेके लिये अङ्गदके प्रार्थना करनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नामक रमणीय गुफामें प्रवेश किया॥ १॥

द्वारस्था हरयस्तत्र महाकाया महाबला:।

बभूवुर्लक्ष्मणं दृष्ट्वा सर्वे प्राञ्जलय: स्थिता:॥ २॥

किष्किन्धाके द्वारपर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मणको देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ २॥

नि:श्वसन्तं तु तं दृष्ट्वा क्रुद्धं दशरथात्मजम्।

बभूवुर्हरयस्त्रस्ता न चैनं पर्यवारयन्॥ ३॥

दशरथनन्दन लक्ष्मणको क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। इसलिये वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके साथ-साथ नहीं चल सके॥ ३॥

स तां रत्नमयीं दिव्यां श्रीमान् पुष्पितकाननाम्।

रम्यां रत्नसमाकीर्णां ददर्श महतीं गुहाम्॥ ४॥

श्रीमान् लक्ष्मणने द्वारके भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धापुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफाके रूपमें बसी हुई है। वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी होनेके कारण दिव्य शोभासे सम्पन्न है। वहाँके वन-उपवन फूलोंसे सुशोभित दिखायी दिये॥ ४॥

हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नोपशोभिताम्।

सर्वकामफलैर्वृक्षै: पुष्पितैरुपशोभिताम्॥ ५॥

हर्म्यों (धनियोंकी अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्त घनी दिखायी देती थी। नाना प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त खिले हुए वृक्षोंसे वह पुरी सुशोभित थी॥ ५॥

देवगन्धर्वपुत्रैश्च वानरै: कामरूपिभि:।

दिव्यमाल्याम्बरधरै: शोभितां प्रियदर्शनै:॥ ६॥

वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निवास करते हुए उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे॥ ६॥

चन्दनागुरुपद्मानां गन्धै: सुरभिगन्धिताम्।

मैरेयाणां मधूनां च सम्मोदितमहापथाम्॥ ७॥

वहाँ चन्दन, अगर और कमलोंकी मनोहर सुगन्ध छा रही थी। उस पुरीकी लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधुके आमोदसे महक रही थीं॥ ७॥

विन्ध्यमेरुगिरिप्रख्यै: प्रासादैर्नैकभूमिभि:।

ददर्श गिरिनद्यश्च विमलास्तत्र राघव:॥ ८॥

उस पुरीमें विन्ध्याचल तथा मेरुके समान ऊँचे-ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे। लक्ष्मणने उस गुफाके निकट ही निर्मल जलसे भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं॥ ८॥

अङ्गदस्य गृहं रम्यं मैन्दस्य द्विविदस्य च।

गवयस्य गवाक्षस्य गजस्य शरभस्य च॥ ९ ॥

विद्युन्मालेश्च सम्पाते: सूर्याक्षस्य हनूमत:।

वीरबाहो: सुबाहोश्च नलस्य च महात्मन:॥ १०॥

कुमुदस्य सुषेणस्य तारजाम्बवतोस्तथा।

दधिवक्त्रस्य नीलस्य सुपाटलसुनेत्रयो:॥ ११॥

एतेषां कपिमुख्यानां राजमार्गे महात्मनाम्।

ददर्श गृहमुख्यानि महासाराणि लक्ष्मण:॥ १२॥

उन्होंने राजमार्गपर अङ्गदका रमणीय भवन देखा। साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख, नील, सुपाटल और सुनेत्र—इन महामनस्वी वानरशिरोमणियोंके भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मणको दृष्टिगोचर हुए। वे सब-के-सब राजमार्गपर ही बने हुए थे॥ ९—१२॥

पाण्डुराभ्रप्रकाशानि गन्धमाल्ययुतानि च।

प्रभूतधनधान्यानि स्त्रीरत्नै: शोभितानि च॥ १३॥

वे सभी भवन श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओंसे सजाया गया था। वे प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियोंसे सुशोभित थे॥ १३॥

पाण्डुरेण तु शैलेन परिक्षिप्तं दुरासदम्।

वानरेन्द्रगृहं रम्यं महेन्द्रसदनोपमम्॥ १४॥

वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वतकी चहार-दीवारीसे घिरा हुआ था॥ १४॥

शुक्लै: प्रासादशिखरै: कैलासशिखरोपमै:।

सर्वकामफलैर्वृक्षै: पुष्पितैरुपशोभितम्॥ १५॥

कैलास-शिखरके समान श्वेत प्रासाद-शिखर तथा समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे॥ १५॥

महेन्द्रदत्तै: श्रीमद्भिर्नीलजीमूतसंनिभै:।

दिव्यपुष्पफलैर्वृक्षै: शीतच्छायैर्मनोरमै:॥ १६॥

वहाँ इन्द्रके दिये हुए दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघके समान श्याम तथा शीतल छायासे युक्त थे॥ १६॥

हरिभि: संवृतद्वारं बलिभि: शस्त्रपाणिभि:।

दिव्यमाल्यावृतं शुभ्रं तप्तकाञ्चनतोरणम्॥ १७॥

अनेक बलवान् वानर हाथोंमें हथियार लिये उसकी ड्योढ़ीपर पहरा दे रहे थे। वह सुन्दर महल दिव्य मालाओंसे अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोनेका बना हुआ था॥ १७॥

सुग्रीवस्य गृहं रम्यं प्रविवेश महाबल:।

अवार्यमाण: सौमित्रिर्महाभ्रमिव भास्कर:॥ १८॥

महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सुग्रीवके उस रमणीय भवनमें प्रवेश किया। मानो सूर्यदेव महान् मेघके भीतर प्रविष्ट हुए हों। उस समय किसीने रोक-टोक नहीं की॥ १८॥

स सप्त कक्ष्या धर्मात्मा यानासनसमावृता:।

ददर्श सुमहद्गुप्तं ददर्शान्त:पुरं महत्॥ १९॥

धर्मात्मा लक्ष्मणने सवारियों तथा विविध आसनोंसे सुशोभित उस भवनकी सात ड्योढ़ियोंको पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्त:पुरको देखा॥ १९॥

हैमराजतपर्यङ्कैर्बहुभिश्च वरासनै:।

महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्र समावृतम्॥ २०॥

उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोनेके बहुत-से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सबपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे। उन सबसे वह अन्त:पुर सुसज्जित दिखायी देता था॥ २०॥

प्रविशन्नेव सततं शुश्राव मधुरस्वनम्।

तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालपदाक्षरम्॥ २१॥

उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मणके कानोंमें संगीतकी मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूँज रही थी। वीणाके लयपर कोई कोमल कण्ठसे गा रहा था। प्रत्येक पद और अक्षरका उच्चारण सम128 तालका प्रदर्शन करते हुए हो रहा था॥ २१॥

बह्वीश्च विविधाकारा रूपयौवनगर्विता:।

स्त्रिय: सुग्रीवभवने ददर्श स महाबल:॥ २२॥

महाबली लक्ष्मणने सुग्रीवके उस अन्त:पुरमें अनेक रूपरंगकी बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रूप और यौवनके गर्वसे भरी हुई थीं॥ २२॥

दृष्ट्वाभिजनसम्पन्नास्तत्र माल्यकृतस्रज:।

वरमाल्यकृतव्यग्रा भूषणोत्तमभूषिता:॥ २३॥

नातृप्तान् नाति चाव्यग्रान् नानुदात्तपरिच्छदान्।

सुग्रीवानुचरांश्चापि लक्षयामास लक्ष्मण:॥ २४॥

वे सब-की-सब उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई थीं, फूलोंके गजरोंसे अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारोंके निर्माणमें लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामीके कार्य सिद्ध करनेके लिये अत्यन्त फुर्तीकी भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणीके नहीं थे॥ २३-२४॥

कूजितं नूपुराणां च काञ्चीनां नि:स्वनं तथा।

स निशम्य तत: श्रीमान् सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत्॥ २५॥

नूपुरोंकी झनकार और करधनीकी खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये (परायी स्त्रियोंपर दृष्टि पड़नेके कारण उन्हें स्वभावत: संकोच हुआ)॥ २५॥

रोषवेगप्रकुपित: श्रुत्वा चाभरणस्वनम्।

चकार ज्यास्वनं वीरो दिश: शब्देन पूरयन्॥ २६॥

तत्पश्चात् पुन: आभूषणोंकी झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोषके आवेगसे और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुषपर टंकार दी, जिसकी ध्वनिसे समस्त दिशाएँ गूँज उठीं॥ २६॥

चारित्रेण महाबाहुरपकृष्ट: स लक्ष्मण:।

तस्थावेकान्तमाश्रित्य रामकोपसमन्वित:॥ २७॥

रघुकुलोचित सदाचारका खयाल करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्तमें जाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे॥ २७॥

तेन चापस्वनेनाथ सुग्रीव: प्लवगाधिप:।

विज्ञायागमनं त्रस्त: स चचाल वरासनात्॥ २८॥

धनुषकी टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँतक आ पहुँचे हैं। फिर तो वे भयसे संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये॥ २८॥

अङ्गदेन यथा मह्यं पुरस्तात् प्रतिवेदितम्।

सुव्यक्तमेष सम्प्राप्त: सौमित्रिर्भ्रातृवत्सल:॥ २९॥

वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गदने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये॥ २९॥

अङ्गदेन समाख्यातो ज्यास्वनेन च वानर:।

बुबुधे लक्ष्मणं प्राप्तं मुखं चास्य व्यशुष्यत॥ ३०॥

अङ्गदके द्वारा उनके आगमनका समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था। अब धनुषकी टंकारसे वानर सुग्रीवको इस बातका प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मणने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है। फिर तो उनका मुख सूख गया॥ ३०॥

ततस्तारां हरिश्रेष्ठ: सुग्रीव: प्रियदर्शनाम्।

उवाच हितमव्यग्रस्त्राससम्भ्रान्तमानस:॥ ३१॥

भयके कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे। (लक्ष्मणके सामने जानेका उन्हें साहस न हुआ।) तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारासे हितकी बात बोले—॥ ३१॥

किं नु रुट्कारणं सुभ्रु प्रकृत्या मृदुमानस:।

सरोष इव सम्प्राप्तो येनायं राघवानुज:॥ ३२॥

‘सुन्दरि! इनके रोषका क्या कारण हो सकता है? जिससे स्वभावत: कोमल चित्त होनेपर भी ये श्रीरघुनाथजीके छोटे भाई रुष्ट-से होकर यहाँ पधारे हैं॥ ३२॥

किं पश्यसि कुमारस्य रोषस्थानमनिन्दिते।

न खल्वकारणे कोपमाहरेन्नरपुङ्गव:॥ ३३॥

‘अनिन्दिते! तुम्हारे देखनेमें कुमार लक्ष्मणके रोषका आधार क्या है? ये मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं। अत: बिना किसी कारणके निश्चय ही क्रोध नहीं कर सकते॥ ३३॥

यद्यस्य कृतमस्माभिर्बुध्यसे किंचिदप्रियम्।

तद्बुद्ध्या सम्प्रधार्याशु क्षिप्रमेवाभिधीयताम्॥ ३४॥

‘यदि हमलोगोंने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धिसे विचारकर शीघ्र ही बताओ॥ ३४॥

अथवा स्वयमेवैनं द्रष्टुमर्हसि भामिनि।

वचनै: सान्त्वयुक्तैश्च प्रसादयितुमर्हसि॥ ३५॥

‘अथवा भामिनि! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मणको देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करो॥ ३५॥

त्वद्दर्शने विशुद्धात्मा न स्म कोपं करिष्यति।

नहि स्त्रीषु महात्मान: क्वचित् कुर्वन्ति दारुणम्॥ ३६॥

‘उनका हृदय शुद्ध है। तुम्हारे सामने वे क्रोध नहीं करेंगे; क्योंकि महात्मा पुरुष स्त्रियोंके प्रति कभी कठोर बर्ताव नहीं करते हैं॥ ३६॥

त्वया सान्त्वैरुपक्रान्तं प्रसन्नेन्द्रियमानसम्।

तत: कमलपत्राक्षं द्रक्ष्याम्यहमरिंदमम्॥ ३७॥

‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनोंसे उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मणका दर्शन करूँगा’॥ ३७॥

सा प्रस्खलन्ती मदविह्वलाक्षी

प्रलम्बकाञ्चीगुणहेमसूत्रा ।

सलक्षणा लक्ष्मणसंनिधानं

जगाम तारा नमिताङ्गयष्टि:॥ ३८॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मणके पास गयी। उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनयसे झुका हुआ था। उसके नेत्र मदसे चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनीके सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे॥ ३८॥

स तां समीक्ष्यैव हरीशपत्नीं

तस्थावुदासीनतया महात्मा।

अवाङ्मुखोऽभून्मनुजेन्द्रपुत्र:

स्त्रीसंनिकर्षाद् विनिवृत्तकोप:॥ ३९॥

वानरराजकी पत्नी तारापर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भावसे खड़े हो गये। स्त्रीके समीप होनेसे उनका क्रोध दूर हो गया॥ ३९॥

सा पानयोगाच्च निवृत्तलज्जा

दृष्टिप्रसादाच्च नरेन्द्रसूनो:।

उवाच तारा प्रणयप्रगल्भं

वाक्यं महार्थं परिसान्त्वरूपम्॥ ४०॥

मधुपानके कारण ताराकी नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी। उसे राजकुमार लक्ष्मणकी दृष्टिमें कुछ प्रसन्नताका आभास मिला। इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकताके साथ महान् अर्थसे युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही—॥ ४०॥

किं कोपमूलं मनुजेन्द्रपुत्र

कस्ते न संतिष्ठति वाङ्निदेशे।

क: शुष्कवृक्षं वनमापतन्तं

दावाग्निमासीदति निर्विशङ्क:॥ ४१॥

‘राजकुमार! आपके क्रोधका क्या कारण है? कौन आपकी आज्ञाके अधीन नहीं है? कौन निडर होकर सूखे वृक्षोंसे भरे हुए वनके भीतर चारों ओर फैलते हुए दावानलमें प्रवेश कर रहा है?’॥ ४१॥

स तस्या वचनं श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमशङ्कित:।

भूय: प्रणयदृष्टार्थं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्॥ ४२॥

ताराके इस वचनमें सान्त्वना भरी थी। उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदयका भाव प्रकट किया गया था। उसे सुनकर लक्ष्मणके हृदयकी आशङ्का जाती रही। वे कहने लगे—॥ ४२॥

किमयं कामवृत्तस्ते लुप्तधर्मार्थसंग्रह:।

भर्ता भर्तृहिते युक्ते न चैनमवबुध्यसे॥ ४३॥

‘अपने स्वामीके हितमें संलग्न रहनेवाली तारा! तुम्हारा यह पति विषय-भोगमें आसक्त होकर धर्म और अर्थके संग्रहका लोप कर रहा है। क्या तुम्हें इसकी इस अवस्थाका पता नहीं है? तुम इसे समझाती क्यों नहीं?॥

न चिन्तयति राज्यार्थं सोऽस्मान् शोकपरायणान्।

सामात्यपरिषत् तारे काममेवोपसेवते॥ ४४॥

‘तारे! सुग्रीव अपने राज्यकी स्थिरताके लिये ही प्रयास करता है। हमलोग शोकमें डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभाके सदस्योंसहित केवल विषय-भोगोंका ही सेवन कर रहा है॥ ४४॥

स मासांश्चतुर: कृत्वा प्रमाणं प्लवगेश्वर:।

व्यतीतांस्तान् मदोदग्रो विहरन् नावबुध्यते॥ ४५॥

‘वानरराज सुग्रीवने चार महीनोंकी अवधि निश्चित की थी। वे कभी बीत गये, परंतु वह मधुपानके मदसे अत्यन्त उन्मत्त होकर स्त्रियोंके साथ क्रीडा-विहार कर रहा है। उसे बीते हुए समयका पता ही नहीं है॥ ४५॥

नहि धर्मार्थसिद्ध्यर्थं पानमेवं प्रशस्यते।

पानादर्थश्च कामश्च धर्मश्च परिहीयते॥ ४६॥

‘धर्म और अर्थकी सिद्धिके निमित्त प्रयत्न करनेवाले पुरुषके लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपानसे अर्थ, धर्म और काम तीनोंका नाश होता है॥ ४६॥

धर्मलोपो महांस्तावत् कृते ह्यप्रतिकुर्वत:।

अर्थलोपश्च मित्रस्य नाशे गुणवतो महान्॥ ४७॥

‘मित्रके किये हुए उपकारका यदि अवसर आनेपर भी बदला न चुकाया जाय तो धर्मकी हानि तो होती ही है। गुणवान् मित्रके साथ मित्रताका नाता टूट जानेपर अपने अर्थकी भी बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है॥

मित्रं ह्यर्थगुणश्रेष्ठं सत्यधर्मपरायणम्।

तद्द्वयं तु परित्यक्तं न तु धर्मे व्यवस्थितम्॥ ४८॥

‘मित्र दो प्रकारके होते हैं—एक तो अपने मित्रके अर्थसाधनमें तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्मके ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामीने मित्रके दोनों ही गुणोंका परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्रका कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्ममें स्थित है॥ ४८॥

तदेवं प्रस्तुते कार्ये कार्यमस्माभिरुत्तरम्।

तत् कार्यं कार्यतत्त्वज्ञे त्वमुदाहर्तुमर्हसि॥ ४९॥

‘ऐसी स्थितिमें प्रस्तुत कार्यकी सिद्धिके लिये हमलोगोंको भविष्यमें क्या करना चाहिये? हमारे लिये जो समुचित कर्तव्य हो, उसे तुम्हीं बताओ; क्योंकि तुम कार्यके तत्त्वको जानती हो’॥ ४९॥

सा तस्य धर्मार्थसमाधियुक्तं

निशम्य वाक्यं मधुरस्वभावम्।

तारा गतार्थे मनुजेन्द्रकार्ये

विश्वासयुक्तं तमुवाच भूय:॥ ५०॥

लक्ष्मणका वचन धर्म और अर्थके निश्चयसे संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभावका परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके विषयमें, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुन: लक्ष्मणसे विश्वासके योग्य बात बोली—॥ ५०॥

न कोपकाल: क्षितिपालपुत्र

न चापि कोप: स्वजने विधेय:।

त्वदर्थकामस्य जनस्य तस्य

प्रमादमप्यर्हसि वीर सोढुम्॥ ५१॥

‘वीर राजकुमार! यह क्रोध करनेका समय नहीं है। आत्मीय जनोंपर क्रोध करना भी नहीं चाहिये। सुग्रीवके मनमें सदा आपका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छा बनी रहती है। अत: यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये॥ ५१॥

कोपं कथं नाम गुणप्रकृष्ट:

कुमार कुर्यादपकृष्टसत्त्वे।

कस्त्वद्विध: कोपवशं हि गच्छेत्

सत्त्वावरुद्धस्तपस: प्रसूति:॥ ५२॥

‘कुमार! गुणोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन गुणवाले प्राणीपर क्रोध कैसे कर सकता है? जो सत्त्वगुणसे अवरुद्ध होनेके कारण शास्त्र-विपरीत व्यापारमें लग नहीं सकता, अतएव जो सद्विचारको जन्म देनेवाला है, वह आप-जैसा कौन पुरुष क्रोधके वशीभूत हो सकता है?॥ ५२॥

जानामि कोपं हरिवीरबन्धो-

र्जानामि कार्यस्य च कालसङ्गम्।

जानामि कार्यं त्वयि यत्कृतं न-

स्तच्चापि जानामि यदत्र कार्यम्॥ ५३॥

‘वानरवीर सुग्रीवके मित्र भगवान् श्रीरामके क्रोधका कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्यमें जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीवका जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगोंने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषयमें हमलोगोंका क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है॥ ५३॥

तच्चापि जानामि तथाविषह्यं

बलं नरश्रेष्ठ शरीरजस्य।

जानामि यस्म‌िंश्च जनेऽवबद्धं

कामेन सुग्रीवमसक्तमद्य॥ ५४॥

‘नरश्रेष्ठ! इस शरीरमें उत्पन्न हुए कामका जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस कामद्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है। साथ ही इस बातसे भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्तिके कारण ही इन दिनों सुग्रीवका मन दूसरे किसी काममें नहीं लगता॥ ५४॥

न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति

त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्न:।

न देशकालौ हि यथार्थधर्मा-

ववेक्षते कामरतिर्मनुष्य:॥ ५५॥

‘आप जो क्रोधके वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि कामके अधीन हुए पुरुषकी स्थितिका आपको बिलकुल ज्ञान नहीं है, वानरकी तो बात ही क्या है? कामासक्त मनुष्यको भी देश, काल, अर्थ और धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता—उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है॥ ५५॥

तं कामवृत्तं मम संनिकृष्टं

कामाभियोगाच्च विमुक्तलज्जम्।

क्षमस्व तावत् परवीरहन्त-

स्त्वद्भ्रातरं वानरवंशनाथम्॥ ५६॥

‘विपक्षी वीरोंका विनाश करनेवाले राजकुमार ! वानरराज सुग्रीव विषय-भोगमें आसक्त होकर इस समय मेरे ही पास थे। कामके आवेशमें उन्होंने अपनी लज्जाका परित्याग कर दिया है, तो भी उन्हें अपना भाई समझकर क्षमा कीजिये॥ ५६॥

महर्षयो धर्मतपोऽभिरामा:

कामानुकामा: प्रतिबद्धमोहा:।

अयं प्रकृत्या चपल: कपिस्तु

कथं न सज्जेत सुखेषु राजा॥ ५७॥

‘जो निरन्तर धर्म और तपस्यामें ही संलग्न रहते हैं, जिन्होंने मोहको अवरुद्ध कर दिया है—अविवेकको दूर भगा दिया है, वे महर्षि भी कभी-कभी विषयाभिलाषी हो जाते हैं; फिर जो स्वभावसे ही चञ्चल वानर हैं, वह राजा सुग्रीव सुख-भोगमें क्यों न आसक्त हों?’॥ ५७॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं

सा वानरी लक्ष्मणमप्रमेयम्।

पुन: सखेदं मदविह्वलाक्षी

भर्तुर्हितं वाक्यमिदं बभाषे॥ ५८॥

अप्रमेय शक्तिशाली लक्ष्मणसे इस प्रकार महान् अर्थसे युक्त बात कहकर मदसे चञ्चल नेत्रवाली वानरपत्नी ताराने पुन: खेदपूर्वक स्वामीके लिये यह हितकर वचन कहा—॥ ५८॥

उद्योगस्तु चिराज्ञप्त: सुग्रीवेण नरोत्तम।

कामस्यापि विधेयेन तवार्थप्रतिसाधने॥ ५९॥

‘नरश्रेष्ठ! यद्यपि सुग्रीव इस समय कामके गुलाम हो रहे हैं, तथापि इन्होंने आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये बहुत पहलेसे ही उद्योग आरम्भ करनेकी आज्ञा दे रखी है॥ ५९॥

आगता हि महावीर्या हरय: कामरूपिण:।

कोटी: शतसहस्राणि नानानगनिवासिन:॥ ६०॥

‘इसके फलस्वरूप इस समय विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले लाखों और करोड़ों वानर, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ एवं महान् पराक्रमी हैं, यहाँ उपस्थित हुए हैं॥ ६०॥

तदागच्छ महाबाहो चारित्रं रक्षितं त्वया।

अच्छलं मित्रभावेन सतां दारावलोकनम्॥ ६१॥

‘महाबाहो! (दूसरेकी स्त्रियोंको देखना अनुचित समझकर जो आप भीतर नहीं आये, बाहर ही खड़े रह गये—इसके द्वारा) आपने सदाचारकी रक्षा की है; अत: अब भीतर आइये। मित्रभावसे स्त्रियोंकी ओर देखना (उनके प्रति माता-बहन आदिका भाव रखकर दृष्टि डालना) सत्पुरुषोंके लिये अधर्म नहीं है’॥ ६१॥

तारया चाभ्यनुज्ञातस्त्वरया वापि चोदित:।

प्रविवेश महाबाहुरभ्यन्तरमरिंदम:॥ ६२॥

ताराके आग्रह और कार्यकी जल्दीसे प्रेरित होकर शत्रुदमन महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीवके महलके भीतर गये॥

तत: सुग्रीवमासीनं काञ्चने परमासने।

महार्हास्तरणोपेते ददर्शादित्यसंनिभम्॥ ६३॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा, एक सोनेके सिंहासनपर बहुमूल्य बिछौना बिछा है और वानरराज सुग्रीव सूर्यतुल्य तेजस्वी रूप धारण किये उसके ऊपर विराजमान हैं॥ ६३॥

दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपं यशस्विनम्।

दिव्यमाल्याम्बरधरं महेन्द्रमिव दुर्जयम्॥ ६४॥

उस समय दिव्य आभूषणोंके कारण उनके शरीरकी विचित्र शोभा हो रही थी। दिव्यरूपधारी यशस्वी सुग्रीव दिव्य मालाएँ और दिव्य वस्त्र धारण करके दुर्जय वीर देवराज इन्द्रके समान दिखायी दे रहे थे॥ ६४॥

दिव्याभरणमाल्याभि: प्रमदाभि: समावृतम्।

संरब्धतररक्ताक्षो बभूवान्तकसंनिभ:॥ ६५॥

दिव्य आभूषणों और मालाओंसे अलंकृत युवती स्त्रियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं। उन्हें इस अवस्थामें देख लक्ष्मणके नेत्र रोषावेशके कारण लाल हो गये। वे उस समय यमराजके समान भयंकर प्रतीत होने लगे॥ ६५॥

रुमां तु वीर: परिरभ्य गाढं

वरासनस्थो वरहेमवर्ण:।

ददर्श सौमित्रिमदीनसत्त्वं

विशालनेत्र: स विशालनेत्रम्॥ ६६॥

सुन्दर सुवर्णके समान कान्ति और विशाल नेत्रवाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रुमाको गाढ आलिङ्गनपाशमें बाँधे हुए एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। उसी अवस्थामें उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्रवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको देखा॥ ६६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्र‌िंश: सर्ग:॥ ३३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

 

चतुस्त्रिंश: सर्ग:

सुग्रीवका लक्ष्मणके पास जाना और लक्ष्मणका उन्हें फटकारना

तमप्रतिहतं क्रुद्धं प्रविष्टं पुरुषर्षभम्।

सुग्रीवो लक्ष्मणं दृष्ट्वा बभूव व्यथितेन्द्रिय:॥ १॥

लक्ष्मण बेरोक-टोक भीतर घुस आये थे। उन पुरुषशिरोमणिको क्रोधसे भरा देख सुग्रीवकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं॥ १॥

क्रुद्धं नि:श्वसमानं तं प्रदीप्तमिव तेजसा।

भ्रातुर्व्यसनसंतप्तं दृष्ट्वा दशरथात्मजम्॥ २॥

उत्पपात हरिश्रेष्ठो हित्वा सौवर्णमासनम्।

महान् महेन्द्रस्य यथा स्वलंकृत इव ध्वज:॥ ३॥

दशरथपुत्र लक्ष्मण रोषपूर्वक लंबी साँस खींच रहे थे और तेजसे प्रज्वलित-से जान पड़ते थे। अपने भाईके कष्टसे उनके मनमें बड़ा संताप था। उन्हें सामने आया देख वानरश्रेष्ठ सुग्रीव सुवर्णका सिंहासन छोड़कर कूद पड़े, मानो देवराज इन्द्रका भलीभाँति सजाया हुआ महान् ध्वज आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया हो॥ २-३॥

उत्पतन्तमनूत्पेतू रुमाप्रभृतय: स्त्रिय:।

सुग्रीवं गगने पूर्णं चन्द्रं तारागणा इव॥ ४॥

सुग्रीवके उतरते ही रुमा आदि स्त्रियाँ भी उनके पीछे उस सिंहासनसे उतरकर खड़ी हो गयीं। जैसे आकाशमें पूर्ण चन्द्रमाका उदय होनेपर तारोंके समुदाय भी उदित हो गये हों॥ ४॥

संरक्तनयन: श्रीमान् संचचार कृताञ्जलि:।

बभूवावस्थितस्तत्र कल्पवृक्षो महानिव॥ ५॥

श्रीमान् सुग्रीवके नेत्र मदसे लाल हो रहे थे। वे टहलते हुए लक्ष्मणके पास आये और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। लक्ष्मण वहाँ महान् कल्पवृक्षके समान स्थित थे॥

रुमाद्वितीयं सुग्रीवं नारीमध्यगतं स्थितम्।

अब्रवील्लक्ष्मण: क्रुद्ध: सतारं शशिनं यथा॥ ६॥

सुग्रीवके साथ उनकी पत्नी रुमा भी थी। वे स्त्रियोंके बीचमें खड़े होकर तारिकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे। उन्हें देखकर लक्ष्मणने क्रोधपूर्वक कहा—॥ ६॥

सत्त्वाभिजनसम्पन्न: सानुक्रोशो जितेन्द्रिय:।

कृतज्ञ: सत्यवादी च राजा लोके महीयते॥ ७॥

‘वानरराज! धैर्यवान्, कुलीन, दयालु, जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजाका ही संसारमें आदर होता है॥

यस्तु राजा स्थितोऽधर्मे मित्राणामुपकारिणाम्।

मिथ्या प्रतिज्ञां कुरुते को नृशंसतरस्तत:॥ ८॥

‘जो राजा अधर्ममें स्थित होकर उपकारी मित्रोंके सामने की हुई अपनी प्रतिज्ञाको झूठी कर देता है, उससे बढ़कर अत्यन्त क्रूर कौन होगा?॥ ८॥

शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं तु गवानृते।

आत्मानं स्वजनं हन्ति पुरुष: पुरुषानृते॥ ९॥

‘अश्वदानकी प्रतिज्ञा करके उसकी पूर्ति न करनेपर ‘अश्वानृत’ (अश्वविषयक असत्य) नामक पाप होता है। यह पाप बन जानेपर मनुष्य सौ अश्वोंकी हत्याके पापका भागी होता है। इसी प्रकार गोदानविषयक प्रतिज्ञाको मिथ्या कर देनेपर सहस्र गौओंके वधका पाप लगता है तथा किसी पुरुषके समक्ष उसका कार्य पूर्ण कर देनेकी प्रतिज्ञा करके जो उसकी पूर्ति नहीं करता है, वह पुरुष आत्मघात और स्वजन-वधके पापका भागी होता है (फिर जो परम पुरुष श्रीरामके समक्ष की हुई प्रतिज्ञाको मिथ्या करता है, उसके पापकी कोई इयत्ता नहीं हो सकती)॥ ९॥

पूर्वं कृतार्थो मित्राणां न तत्प्रतिकरोति य:।

कृतघ्न: सर्वभूतानां स वध्य: प्लवगेश्वर॥ १०॥

‘वानरराज! जो पहले मित्रोंके द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदलेमें उन मित्रोंका कोई उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियोंके लिये वध्य है॥ १०॥

गीतोऽयं ब्रह्मणा श्लोक: सर्वलोकनमस्कृत:।

दृष्ट्वा कृतघ्नं क्रुद्धेन तन्निबोध प्लवंगम॥ ११॥

‘कपिराज! किसी कृतघ्नको देखकर कुपित हुए ब्रह्माजीने सब लोगोंके लिये आदरणीय यह एक श्लोक कहा है, इसे सुनो—॥ ११॥

गोघ्ने चैव सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।

निष्कृतिर्विहिता सद्भि: कृतघ्ने नास्ति निष्कृति:॥ १२॥

‘गोहत्यारे, शराबी, चोर और व्रत-भंग करनेवाले पुरुषके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्तका विधान किया है; किंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है॥ १२॥

अनार्यस्त्वं कृतघ्नश्च मिथ्यावादी च वानर।

पूर्वं कृतार्थो रामस्य न तत्प्रतिकरोषि यत्॥ १३॥

‘वानर! तुम अनार्य, कृतघ्न और मिथ्यावादी हो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीकी सहायतासे तुमने पहले अपना काम तो बना लिया, किंतु जब उनके लिये सहायता करनेका अवसर आया, तब तुम कुछ नहीं करते॥ १३॥

ननु नाम कृतार्थेन त्वया रामस्य वानर।

सीताया मार्गणे यत्न: कर्तव्य: कृतमिच्छता॥ १४॥

‘वानर! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो चुका है; अत: अब तुम्हें प्रत्युपकारकी इच्छासे श्रीरामकी पत्नी सीताकी खोजके लिये प्रयत्न करना चाहिये॥ १४॥

स त्वं ग्राम्येषु भोगेषु सक्तो मिथ्याप्रतिश्रव:।

न त्वां रामो विजानीते सर्पं मण्डूकराविणम्॥ १५॥

‘परंतु तुम्हारी दशा यह है कि अपनी प्रतिज्ञाको झूठी करके ग्राम्यभोगोंमें आसक्त हो रहे हो। श्रीरामचन्द्रजी यह नहीं जानते हैं कि तुम मेढककी-सी बोली बोलनेवाले सर्प हो (जैसे साँप अपने मुँहमें किसी मेढकको जब दबा लेता है, तब केवल मेढक ही बोलता है, दूरके लोग उसे मेढक ही समझते हैं; परंतु वह वास्तवमें सर्प होता है। वही दशा तुम्हारी है। तुम्हारी बातें कुछ और हैं और स्वरूप कुछ और)॥ १५॥

महाभागेन रामेण पाप: करुणवेदिना।

हरीणां प्रापितो राज्यं त्वं दुरात्मा महात्मना॥ १६॥

‘महाभाग श्रीरामचन्द्रजी परम महात्मा तथा दयासे द्रवित हो जानेवाले हैं; अतएव उन्होंने तुम-जैसे पापी और दुरात्माको भी वानरोंके राज्यपर बिठा दिया॥ १६॥

कृतं चेन्नातिजानीषे राघवस्य महात्मन:।

सद्यस्त्वं निशितैर्बाणैर्हतो द्रक्ष्यसि वालिनम्॥ १७॥

‘यदि तुम महात्मा रघुनाथजीके किये हुए उपकारको नहीं समझोगे तो शीघ्र ही उनके तीखे बाणोंसे मारे जाकर वालीका दर्शन करोगे॥ १७॥

न स संकुचित: पन्था येन वाली हतो गत:।

समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगा:॥ १८॥

‘सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्तेसे गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहो। वालीके मार्गका अनुसरण न करो॥

न नूनमिक्ष्वाकुवरस्य कार्मुका-

च्छरांश्च तान् पश्यसि वज्रसंनिभान्।

तत: सुखं नाम विषेवसे सुखी

न रामकार्यं मनसाप्यवेक्षसे॥ १९॥

‘इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए उन वज्रतुल्य बाणोंकी ओर निश्चय ही तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है। इसीलिये तुम ग्राम्य सुखका सेवन कर रहे हो और उसीमें सुख मानकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यका मनसे भी विचार नहीं करते हो’॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुस्त्र‌िंश: सर्ग:॥ ३४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥

 

पञ्चत्रिंश: सर्ग:

ताराका लक्ष्मणको युक्तियुक्त वचनोंद्वारा शान्त करना

तथा ब्रूवाणं सौमित्रिं प्रदीप्तमिव तेजसा।

अब्रवील्लक्ष्मणं तारा ताराधिपनिभानना॥ १॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मण अपने तेजके कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे। वे जब उपर्युक्त बात कह चुके, तब चन्द्रमुखी तारा उनसे बोली—॥ १॥

नैवं लक्ष्मण वक्तव्यो नायं परुषमर्हति।

हरीणामीश्वर: श्रोतुं तव वक्त्राद् विशेषत:॥ २॥

‘कुमार लक्ष्मण! आपको सुग्रीवसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। ये वानरोंके राजा हैं; अत: इनके प्रति कठोर वचन बोलना उचित नहीं है। विशेषत: आप-जैसे सुहृद्के मुखसे तो ये कदापि कटु वचन सुननेके अधिकारी नहीं हैं॥ २॥

नैवाकृतज्ञ: सुग्रीवो न शठो नापि दारुण:।

नैवानृतकथो वीर न जिह्मश्च कपीश्वर:॥ ३॥

‘वीर! कपिराज सुग्रीव न कृतघ्न हैं, न शठ हैं, न क्रूर हैं, न असत्यवादी हैं और न कुटिल ही हैं॥ ३॥

उपकारं कृतं वीरो नाप्ययं विस्मृत: कपि:।

रामेण वीर सुग्रीवो यदन्यैर्दुष्करं रणे॥ ४॥

‘वीर लक्ष्मण! श्रीरामचन्द्रजीने इनका जो उपकार किया है, वह युद्धमें दूसरोंके लिये दुष्कर है। उसे इन वीर कपिराजने कभी भुलाया नहीं है॥ ४॥

रामप्रसादात् कीर्तिं च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

प्राप्तवानिह सुग्रीवो रुमां मां च परंतप॥ ५॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्रानन्दन! श्रीरामचन्द्रजीके कृपाप्रसादसे ही सुग्रीवने वानरोंके अक्षय राज्यको, यशको, रुमाको तथा मुझको भी प्राप्त किया है॥

सुदु:खशयित: पूर्वं प्राप्येदं सुखमुत्तमम्।

प्राप्तकालं न जानीते विश्वामित्रो यथा मुनि:॥ ६॥

‘पहले इन्होंने बड़ा दु:ख उठाया है। अब इस उत्तम सुखको पाकर ये इसमें ऐसे रम गये कि इन्हें प्राप्त हुए समयका ज्ञान ही नहीं रहा। ठीक उसी तरह, जैसे विश्वामित्र मुनिको मेनकामें आसक्त हो जानेके कारण समयकी सुध-बुध नहीं रह गयी थी129॥ ६॥

घृताच्यां किल संसक्तो दश वर्षाणि लक्ष्मण।

अहोऽमन्यत धर्मात्मा विश्वामित्रो महामुनि:॥ ७॥

‘लक्ष्मण! कहते हैं, धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रने घृताची (मेनका) नामक अप्सरामें आसक्त होनेके कारण दस वर्षके समयको एक दिन ही माना था॥ ७॥

स हि प्राप्तं न जानीते कालं कालविदां वर:।

विश्वामित्रो महातेजा: किं पुनर्य: पृथग्जन:॥ ८॥

‘कालका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी विश्वामित्रको भी जब भोगासक्त होनेपर कालका ज्ञान नहीं रह गया, तब फिर दूसरे साधारण प्राणीको कैसे रह सकता है?॥ ८॥

देहधर्मगतस्यास्य परिश्रान्तस्य लक्ष्मण।

अवितृप्तस्य कामेषु राम: क्षन्तुमिहार्हति॥ ९॥

‘कुमार लक्ष्मण! आहार, निद्रा और मैथुन आदि जो देहके धर्म हैं, (जो पशुओंमें भी समानरूपसे पाये जाते हैं) उनमें स्थित हुए ये सुग्रीव पहले तो चिरकालतक दु:ख भोगनेके कारण थके-माँदे एवं खिन्न थे। अब भगवान् श्रीरामकी कृपासे इन्हें जो काम-भोग प्राप्त हुए हैं, उनसे अभीतक इनकी तृप्ति नहीं हुई (इसीलिये इनसे कुछ असावधानी हो गयी); अत: परम कृपालु श्रीरघुनाथजीको यहाँ इनका अपराध क्षमा करना चाहिये॥ ९॥

न च रोषवशं तात गन्तुमर्हसि लक्ष्मण।

निश्चयार्थमविज्ञाय सहसा प्राकृतो यथा॥ १०॥

‘तात लक्ष्मण! आपको यथार्थ बात जाने बिना साधारण मनुष्यकी भाँति सहसा क्रोधके अधीन नहीं होना चाहिये॥ १०॥

सत्त्वयुक्ता हि पुरुषास्त्वद्विधा: पुरुषर्षभ।

अविमृश्य न रोषस्य सहसा यान्ति वश्यताम्॥ ११॥

‘पुरुषप्रवर! आप-जैसे सत्त्वगुणसम्पन्न पुरुष विचार किये बिना ही सहसा रोषके वशीभूत नहीं होते हैं॥ ११॥

प्रसादये त्वां धर्मज्ञ सुग्रीवार्थं समाहिता।

महान् रोषसमुत्पन्न: संरम्भस्त्यज्यतामयम्॥ १२॥

‘धर्मज्ञ! मैं एकाग्र हृदयसे सुग्रीवके लिये आपसे कृपाकी याचना करती हूँ। आप क्रोधसे उत्पन्न हुए इस महान् क्षोभका परित्याग कीजिये॥ १२॥

रुमां मां चाङ्गदं राज्यं धनधान्यपशूनि च।

रामप्रियार्थं सुग्रीवस्त्यजेदिति मतिर्मम॥ १३॥

‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये रुमाका, मेरा, कुमार अङ्गदका तथा धन-धान्य और पशुओंसहित सम्पूर्ण राज्यका भी परित्याग कर सकते हैं॥ १३॥

समानेष्यति सुग्रीव: सीतया सह राघवम्।

शशाङ्कमिव रोहिण्या हत्वा तं राक्षसाधमम्॥ १४॥

‘सुग्रीव उस अधम राक्षसका वध करके श्रीरामको सीतासे उसी तरह मिलायेंगे, जैसे चन्द्रमाका रोहिणीके साथ संयोग हुआ हो॥ १४॥

शतकोटिसहस्राणि लङ्कायां किल रक्षसाम्।

अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च॥ १५॥

‘कहते हैं कि लङ्कामें सौ हजार करोड़, छत्तीस अयुत, छत्तीस हजार और छत्तीस सौ राक्षस रहते हैं130

अहत्वा तांश्च दुर्धर्षान् राक्षसान् कामरूपिण:।

न शक्यो रावणो हन्तुं येन सा मैथिली हृता॥ १६॥

‘वे सब-के-सब राक्षस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा दुर्जय हैं। उन सबका संहार किये बिना रावणका, जिसने मिथिलेशकुमारी सीताका अपहरण किया है, वध नहीं हो सकता॥ १६॥

ते न शक्या रणे हन्तुमसहायेन लक्ष्मण।

रावण: क्रूरकर्मा च सुग्रीवेण विशेषत:॥ १७॥

‘लक्ष्मण! किसीकी सहायता लिये बिना अकेले किसी वीरके द्वारा न तो उन राक्षसोंका संग्राममें वध किया जा सकता है और न क्रूरकर्मा रावणका ही। इसलिये सुग्रीवसे सहायता लेनेकी विशेष आवश्यकता है॥ १७॥

एवमाख्यातवान् वाली स ह्यभिज्ञो हरीश्वर:।

आगमस्तु न मे व्यक्त: श्रवात् तस्य ब्रवीम्यहम्॥ १८॥

‘वानरराज वाली लङ्काके राक्षसोंकी इस संख्यासे परिचित थे, उन्हींने मुझे उनकी इस तरह गणना बतायी थी। रावणने इतनी सेनाका संग्रह कैसे किया? यह तो मुझे नहीं मालूम है। किंतु इस संख्याको मैंने उनके मुँहसे सुना था। वह इस समय मैं आपको बता रही हूँ॥ १८॥

त्वत्सहायनिमित्तं हि प्रेषिता हरिपुङ्गवा:।

आनेतुं वानरान् युद्धे सुबहून् हरिपुङ्गवान्॥ १९॥

‘आपकी सहायताके लिये सुग्रीवने बहुतेरे श्रेष्ठ वानरोंको युद्धके निमित्त असंख्य वानर वीरोंकी सेना एकत्र करनेके लिये भेज रखा है॥ १९॥

तांश्च प्रतीक्षमाणोऽयं विक्रान्तान् सुमहाबलान्।

राघवस्यार्थसिद्ध्यर्थं न निर्याति हरीश्वर:॥ २०॥

‘वानरराज सुग्रीव उन महाबली और पराक्रमी वीरोंके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अतएव भगवान् श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये अभी नगरसे बाहर नहीं निकल सके हैं॥ २०॥

कृता सुसंस्था सौमित्रे सुग्रीवेण पुरा यथा।

अद्य तैर्वानरै: सर्वैरागन्तव्यं महाबलै:॥ २१॥

‘सुमित्रानन्दन! सुग्रीवने उन सबके एकत्र होनेके लिये पहलेसे ही जो अवधि निश्चित कर रखी है, उसके अनुसार उन समस्त महाबली वानरोंको आज ही यहाँ उपस्थित हो जाना चाहिये॥ २१॥

ऋक्षकोटिसहस्राणि गोलाङ्गूलशतानि च।

अद्य त्वामुपयास्यन्ति जहि कोपमरिंदम।

कोट्योऽनेकास्तु काकुत्स्थ कपीनां दीप्ततेजसाम्॥ २२॥

‘शत्रुदमन लक्ष्मण! आज आपकी सेवामें कोटि सहस्र (दस अरब) रीछ, सौ करोड़ (एक अरब) लंगूर तथा और भी बढ़े हुए तेजवाले कई करोड़ वानर उपस्थित होंगे। इसलिये आप क्रोधको त्याग दीजिये॥ २२॥

तव हि मुखमिदं निरीक्ष्य कोपात्

क्षतजसमे नयने निरीक्षमाणा:।

हरिवरवनिता न यान्ति शान्तिं

प्रथमभयस्य हि शङ्किता: स्म सर्वा:॥ २३॥

‘आपका मुख क्रोधसे तमतमा उठा है और आँखें रोषसे लाल हो गयी हैं। यह सब देखकर हम वानरराजकी स्त्रियोंको शान्ति नहीं मिल रही है। हम सबको प्रथम भय (वालिवध) के समान ही किसी अनिष्टकी आशङ्का हो रही है’॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग:॥ ३५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

 

षट्त्रिंश: सर्ग:

सुग्रीवका अपनी लघुता तथा श्रीरामकी महत्ता बताते हुए लक्ष्मणसे क्षमा माँगना और लक्ष्मणका उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलनेके लिये कहना

इत्युक्तस्तारया वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्।

मृदुस्वभाव: सौमित्रि: प्रतिजग्राह तद्वच:॥ १॥

ताराने जब इस प्रकार धर्मके अनुकूल विनययुक्त बात कही, तब कोमल स्वभाववाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उसे मान लिया (क्रोध को त्याग दिया)॥ १॥

तस्मिन् प्रतिगृहीते तु वाक्ये हरिगणेश्वर:।

लक्ष्मणात् सुमहत् त्रासं वस्त्रं क्लिन्नमिवात्यजत्॥ २॥

उनके द्वारा ताराकी बात मान ली जानेपर वानरयूथपति सुग्रीवने लक्ष्मणसे प्राप्त होनेवाले महान् भयको भीगे हुए वस्त्रकी भाँति त्याग दिया॥ २॥

तत: कण्ठगतं माल्यं चित्रं बहुगुणं महत्।

चिच्छेद विमदश्चासीत् सुग्रीवो वानरेश्वर:॥ ३॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवने अपने कण्ठमें पड़ी हुई फूलोंकी विचित्र, विशाल एवं बहुगुणसम्पन्न माला तोड़ डाली और वे मदसे रहित हो गये॥ ३॥

स लक्ष्मणं भीमबलं सर्ववानरसत्तम:।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीव: सम्प्रहर्षयन्॥ ४॥

फिर समस्त वानरोंमें शिरोमणि सुग्रीवने भयंकर बलशाली लक्ष्मणका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनययुक्त बात कही—॥ ४॥

प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चाप्तमिदं मया॥ ५॥

‘सुमित्राकुमार! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदासे चला आता हुआ वानरोंका राज्य—ये सब नष्ट हो चुके थे। भगवान् श्रीरामकी कृपासे ही मुझे पुन: इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ ५॥

क: शक्तस्तस्य देवस्य ख्यातस्य स्वेन कर्मणा।

तादृशं प्रतिकुर्वीत अंशेनापि नृपात्मज॥ ६॥

‘राजकुमार! वे भगवान् श्रीराम अपने कर्मोंसे ही सर्वत्र विख्यात हैं। उनके उपकारका वैसा ही बदला अंशमात्रसे भी कौन चुका सकता है?॥ ६॥

सीतां प्राप्स्यति धर्मात्मा वधिष्यति च रावणम्।

सहायमात्रेण मया राघव: स्वेन तेजसा॥ ७॥

‘धर्मात्मा श्रीराम अपने ही तेजसे रावणका वध करेंगे और सीताको प्राप्त कर लेंगे। मैं तो उनका एक तुच्छ सहायकमात्र रहूँगा॥ ७॥

सहायकृत्यं किं तस्य येन सप्त महाद्रुमा:।

गिरिश्च वसुधा चैव बाणेनैकेन दारिता:॥ ८॥

‘जिन्होंने एक ही बाणसे सात बड़े-बड़े ताल वृक्ष, पर्वत, पृथ्वी, पाताल और वहाँ रहनेवाले दैत्योंको भी विदीर्ण कर दिया था, उनको दूसरे किसी सहायककी आवश्यकता भी क्या है?॥ ८॥

धनुर्विस्फारमाणस्य यस्य शब्देन लक्ष्मण।

सशैला कम्पिता भूमि: सहायै: किं नु तस्य वै॥ ९॥

‘लक्ष्मण! जिनके धनुष खींचते समय उसकी टंकारसे पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप उठी थी, उन्हें सहायकोंसे क्या लेना है?॥ ९॥

अनुयात्रां नरेन्द्रस्य करिष्येऽहं नरर्षभ।

गच्छतो रावणं हन्तुं वैरिणं सपुरस्सरम्॥ १०॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तो वैरी रावणका वध करनेके लिये अग्रगामी सैनिकोंसहित यात्रा करनेवाले महाराज श्रीरामके पीछे-पीछे चलूँगा॥ १०॥

यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात् प्रणयेन वा।

प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्नापराध्यति॥ ११॥

‘विश्वास अथवा प्रेमके कारण यदि कोई अपराध बन गया हो तो मुझ दासके उस अपराधको क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जिससे कभी कोई अपराध होता ही न हो’॥ ११॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मन:।

अभवल्लक्ष्मण: प्रीत: प्रेम्णा चेदमुवाच ह॥ १२॥

महात्मा सुग्रीवके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण प्रसन्न हो गये और बड़े प्रेमसे इस प्रकार बोले—॥ १२॥

सर्वथा हि मम भ्राता सनाथो वानरेश्वर।

त्वया नाथेन सुग्रीव प्रश्रितेन विशेषत:॥ १३॥

‘वानरराज सुग्रीव! विशेषत: तुम-जैसे विनयशील सहायकको पाकर मेरे भाई श्रीराम सर्वथा सनाथ हैं॥

यस्ते प्रभाव: सुग्रीव यच्च ते शौचमीदृशम्।

अर्हस्त्वं कपिराज्यस्य श्रियं भोक्तुमनुत्तमाम्॥ १४॥

‘सुग्रीव! तुम्हारा जो प्रभाव है और तुम्हारे हृदयमें जो इतना शुद्ध भाव है, इससे तुम वानरराज्यकी परम उत्तम लक्ष्मीका सदा ही उपभोग करनेके अधिकारी हो॥

सहायेन च सुग्रीव त्वया राम: प्रतापवान्।

वधिष्यति रणे शत्रूनचिरान्नात्र संशय:॥ १५॥

‘सुग्रीव! तुम्हें सहायकके रूपमें पाकर प्रतापी श्रीराम रणभूमिमें अपने शत्रुओंका शीघ्र ही वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ १५॥

धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य संग्रामेष्वनिवर्तिन:।

उपपन्नं च युक्तं च सुग्रीव तव भाषितम्॥ १६॥

‘सुग्रीव! तुम धर्मज्ञ, कृतज्ञ तथा युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले हो। तुम्हारा यह भाषण सर्वथा युक्तिसंगत और उचित है॥ १६॥

दोषज्ञ: सति सामर्थ्ये कोऽन्यो भाषितुमर्हति।

वर्जयित्वा मम ज्येष्ठं त्वां च वानरसत्तम॥ १७॥

‘वानरशिरोमणे! तुमको और मेरे बड़े भाईको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा विद्वान् है, जो अपनेमें सामर्थ्य होते हुए भी ऐसा नम्रतापूर्ण वचन कह सके॥ १७॥

सदृशश्चासि रामेण विक्रमेण बलेन च।

सहायो दैवतैर्दत्तश्चिराय हरिपुंगव॥ १८॥

‘कपिराज! तुम बल और पराक्रममें भगवान् श्रीरामके बराबर हो। देवताओंने ही हमें दीर्घकालके लिये तुम-जैसा सहायक प्रदान किया है॥ १८॥

किं तु शीघ्रमितो वीर निष्क्रम त्वं मया सह।

सान्त्वयस्व वयस्यं च भार्याहरणदु:खितम्॥ १९॥

‘किंतु वीर! अब तुम शीघ्र ही मेरे साथ इस पुरीसे बाहर निकलो। तुम्हारे मित्र अपनी पत्नीके अपहरणसे बहुत दु:खी हैं। उन्हें चलकर सान्त्वना दो॥ १९॥

यच्च शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषितम्।

मया त्वं परुषाण्युक्तस्तत् क्षमस्व सखे मम॥ २०॥

‘सखे! शोकमग्न श्रीरामके वचनोंको सुनकर जो मैंने तुम्हारे प्रति कठोर बातें कह दी हैं, उनके लिये मुझे क्षमा करो’॥ २०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्त्रिंश: सर्ग:॥ ३६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥

 


सप्तत्रिंश: सर्ग:

सुग्रीवका हनुमान्‌जीको वानरसेनाके संग्रहके लिये दोबारा दूत भेजनेकी आज्ञा देना, उन दूतोंसे राजाकी आज्ञा सुनकर समस्त वानरोंका किष्किन्धाके लिये प्रस्थान और दूतोंका लौटकर सुग्रीवको भेंट देनेके साथ ही वानरोंके आगमनका समाचार सुनाना

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना।

हनूमन्तं स्थितं पार्श्वे वचनं चेदमब्रवीत्॥ १॥

महात्मा लक्ष्मणने जब ऐसा कहा, तब सुग्रीव अपने पास ही खड़े हुए हनुमान्‌जीसे यों बोले—॥ १॥

महेन्द्रहिमवद्विन्ध्यकैलासशिखरेषु च।

मन्दरे पाण्डुशिखरे पञ्चशैलेषु ये स्थिता:॥ २॥

तरुणादित्यवर्णेषु भ्राजमानेषु नित्यश:।

पर्वतेषु समुद्रान्ते पश्चिमस्यां तु ये दिशि॥ ३॥

आदित्यभवने चैव गिरौ संध्याभ्रसंनिभे।

पद्माचलवनं भीमा: संश्रिता हरिपुंगवा:॥ ४॥

अञ्जनाम्बुदसंकाशा: कुञ्जरेन्द्रमहौजस:।

अञ्जने पर्वते चैव ये वसन्ति प्लवंगमा:॥ ५॥

महाशैलगुहावासा वानरा: कनकप्रभा:।

मेरुपार्श्वगताश्चैव ये च धूम्रगिरिं श्रिता:॥ ६॥

तरुणादित्यवर्णाश्च पर्वते ये महारुणे।

पिबन्तो मधु मैरेयं भीमवेगा: प्लवंगमा:॥ ७॥

वनेषु च सुरम्येषु सुगन्धिषु महत्सु च।

तापसाश्रमरम्येषु वनान्तेषु समन्तत:॥ ८॥

तांस्तांस्त्वमानय क्षिप्रं पृथिव्यां सर्ववानरान्।

सामदानादिभि: कल्पैर्वानरैर्वेगवत्तरै:॥ ९॥

‘महेन्द्र, हिमवान्, विन्ध्य, कैलास तथा श्वेत शिखरवाले मन्दराचल—इन पाँच पर्वतोंके शिखरोंपर जो श्रेष्ठ वानर रहते हैं, पश्चिम दिशामें समुद्रके परवर्ती तटपर प्रात:कालिक सूर्यके समान कान्तिमान् और नित्य प्रकाशमान पर्वतोंपर जिन वानरोंका निवास है, भगवान् सूर्यके निवासस्थान तथा संध्याकालिक मेघसमूहके समान अरुण वर्णवाले उदयाचल एवं अस्ताचलपर जो वानर वास करते हैं, पद्माचलवर्ती वनका आश्रय लेकर जो भयानक पराक्रमी वानर-शिरोमणि निवास करते हैं, अञ्जनपर्वतपर जो काजल और मेघके समान काले तथा गजराजके समान महाबली वानर रहते हैं, बड़े-बड़े पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करनेवाले तथा मेरुपर्वतके आस-पास रहनेवाले जो सुवर्णकी-सी कान्तिवाले वानर हैं, जो धूम्रगिरिका आश्रय लेकर रहते हैं, मैरेय मधुका पान करते हुए जो महारुण पर्वतपर प्रात:कालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके भयानक वेगशाली वानर निवास करते हैं तथा सुगन्धसे परिपूर्ण एवं तपस्वियोंके आश्रमोंसे सुशोभित बड़े-बड़े रमणीय वनों और वनान्तोंमें चारों ओर जो वानर रहते हैं, भूमण्डलके उन सभी वानरोंको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ। शक्तिशाली तथा अत्यन्त वेगवान् वानरोंको भेजकर उनके द्वारा साम, दान आदि उपायोंका प्रयोग करके उन सबको यहाँ बुलवाओ॥ २—९॥

प्रेषिता: प्रथमं ये च मयाऽऽज्ञाता महाजवा:।

त्वरणार्थं तु भूयस्त्वं सम्प्रेषय हरीश्वरान्॥ १०॥

‘मेरी आज्ञासे पहले जो महान् वेगशाली वानर भेजे गये हैं, उनको जल्दी करनेके लिये प्रेरणा देनेके निमित्त तुम पुन: दूसरे श्रेष्ठ वानरोंको भेजो॥ १०॥

ये प्रसक्ताश्च कामेषु दीर्घसूत्राश्च वानरा:।

इहानयस्व तान् शीघ्रं सर्वानेव कपीश्वरान्॥ ११॥

‘जो वानर कामभोगमें फँसे हुए हों तथा जो दीर्घसूत्री (प्रत्येक कार्यको विलम्बसे करनेवाले) हों, उन सभी कपीश्वरोंको शीघ्र यहाँ ले आओ॥ ११॥

अहोभिर्दशभिर्ये च नागच्छन्ति ममाज्ञया।

हन्तव्यास्ते दुरात्मानो राजशासनदूषका:॥ १२॥

‘जो मेरी आज्ञासे दस दिनके भीतर यहाँ न आ जायँ, राजाज्ञाको कलङ्कित करनेवाले उन दुरात्मा वानरोंको मार डालना चाहिये॥ १२॥

शतान्यथ सहस्राणि कोट्यश्च मम शासनात्।

प्रयान्तु कपिसिंहानां निदेशे मम ये स्थिता:॥ १३॥

‘जो मेरी आज्ञाके अधीन रहते हों, ऐसे सैकड़ों, हजारों तथा करोड़ों वानरसिंह मेरे आदेशसे जायँ॥ १३॥

मेघपर्वतसंकाशाश्छादयन्त इवाम्बरम्।

घोररूपा: कपिश्रेष्ठा यान्तु मच्छासनादित:॥ १४॥

‘जो मेघ और पर्वतके समान अपने विशाल शरीरसे आकाशको आच्छादित-सा कर लेते हैं, वे घोर रूपधारी श्रेष्ठ वानर मेरा आदेश मानकर यहाँसे यात्रा करें॥ १४॥

ते गतिज्ञा गतिं गत्वा पृथिव्यां सर्ववानरा:।

आनयन्तु हरीन् सर्वांस्त्वरिता: शासनान्मम॥ १५॥

‘वानरोंके निवासस्थानोंको जाननेवाले सभी वानर तीव्र गतिसे भूमण्डलमें चारों ओर जाकर मेरे आदेशसे उन-उन स्थानोंके सम्पूर्ण वानरगणोंको तुरंत यहाँ ले आवें’॥

तस्य वानरराजस्य श्रुत्वा वायुसुतो वच:।

दिक्षु सर्वासु विक्रान्तान् प्रेषयामास वानरान्॥ १६॥

वानरराज सुग्रीवकी बात सुनकर वायुपुत्र हनुमान् जी ने सम्पूर्ण दिशाओंमें बहुत-से पराक्रमी वानरोंको भेजा॥ १६॥

ते पदं विष्णुविक्रान्तं पतत्त्रिज्योतिरध्वगा:।

प्रयाता: प्रहिता राज्ञा हरयस्तु क्षणेन वै॥ १७॥

राजाकी आज्ञा पाकर वे सब वानर तत्काल आकाशमें पक्षियों और नक्षत्रोंके मार्गसे चल दिये॥ १७॥

ते समुद्रेषु गिरिषु वनेषु च सरस्सु च।

वानरा वानरान् सर्वान् रामहेतोरचोदयन्॥ १८॥

उन वानरोंने समुद्रोंके किनारे, पर्वतोंपर, वनोंमें और सरोवरोंके तटोंपर रहनेवाले समस्त वानरोंको श्रीरामचन्द्रजीका कार्य करनेके लिये चलनेको कहा॥ १८॥

मृत्युकालोपमस्याज्ञां राजराजस्य वानरा:।

सुग्रीवस्याययु: श्रुत्वा सुग्रीवभयशङ्किता:॥ १९॥

अपने सम्राट् सुग्रीवका, जो मृत्यु एवं कालके समान भयानक दण्ड देनेवाले थे, आदेश सुनकर वे सभी वानर उनके भयसे थर्रा उठे और तुरंत ही किष्किन्धाकी ओर प्रस्थित हुए॥ १९॥

ततस्तेऽञ्जनसंकाशा गिरेस्तस्मान्महाबला:।

तिस्र: कोट्य: प्लवंगानां निर्ययुर्यत्र राघव:॥ २०॥

तदनन्तर कज्जल गिरिसे काजलके ही समान काले और महान् बलवान् तीन करोड़ वानर उस स्थानपर जानेके लिये निकले, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे॥ २०॥

अस्तं गच्छति यत्रार्कस्तस्मिन् गिरिवरे रता:।

संतप्तहेमवर्णाभास्तस्मात् कोट्यो दश च्युता:॥ २१॥

जहाँ सूर्यदेव अस्त होते हैं, उस श्रेष्ठ पर्वतपर रहनेवाले दस करोड़ वानर, जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी, वहाँसे किष्किन्धाके लिये चले॥

कैलासशिखरेभ्यश्च सिंहकेसरवर्चसाम्।

तत: कोटिसहस्राणि वानराणां समागमन्॥ २२॥

कैलासके शिखरोंसे सिंहके अयालकी-सी श्वेत कान्तिवाले दस अरब वानर आये॥ २२॥

फलमूलेन जीवन्तो हिमवन्तमुपाश्रिता:।

तेषां कोटिसहस्राणां सहस्रं समवर्तत॥ २३॥

जो हिमालयपर रहकर फल-मूलसे जीवननिर्वाह करते थे, वे वानर एक नीलकी संख्यामें वहाँ आये॥ २३॥

अङ्गारकसमानानां भीमानां भीमकर्मणाम्।

विन्ध्याद् वानरकोटीनां सहस्राण्यपतन् द्रुतम्॥ २४॥

विन्ध्याचल पर्वतसे मङ्गलके समान लाल रंगवाले भयानक पराक्रमी भयंकर रूपधारी वानरोंकी दस अरब सेना बड़े वेगसे किष्किन्धामें आयी॥ २४॥

क्षीरोदवेलानिलयास्तमालवनवासिन: ।

नारिकेलाशनाश्चैव तेषां संख्या न विद्यते॥ २५॥

क्षीरसमुद्रके किनारे और तमालवनमें नारियल खाकर रहनेवाले वानर इतनी अधिक संख्यामें आये कि उनकी गणना नहीं हो सकती थी॥ २५॥

वनेभ्यो गह्वरेभ्यश्च सरिद्भ्यश्च महाबला:।

आगच्छद् वानरी सेना पिबन्तीव दिवाकरम्॥ २६॥

वनोंसे, गुफाओंसे और नदियोंके किनारोंसे असंख्य महाबली वानर एकत्र हुए। वानरोंकी वह सारी सेना सूर्यदेवको पीती (आच्छादित करती) हुई-सी आयी॥ २६॥

ये तु त्वरयितुं याता वानरा: सर्ववानरान्।

ते वीरा हिमवच्छैले ददृशुस्तं महाद्रुमम्॥ २७॥

जो वानर समस्त वानरोंको शीघ्र आनेके लिये प्रेरित करनेके निमित्त किष्किन्धासे दुबारा भेजे गये थे, उन वीरोंने हिमालय पर्वतपर उस प्रसिद्ध विशाल वृक्षको देखा (जो भगवान् शंकरकी यज्ञशालामें स्थित था)॥ २७॥

तस्मिन् गिरिवरे पुण्ये यज्ञो माहेश्वर: पुरा।

सर्वदेवमनस्तोषो बभूव सुमनोरम:॥ २८॥

उस पवित्र एवं श्रेष्ठ पर्वतपर पूर्वकालमें भगवान् शंकरका यज्ञ हुआ था, जो सम्पूर्ण देवताओंके मनको संतोष देनेवाला और अत्यन्त मनोरम था॥ २८॥

अन्ननिस्यन्दजातानि मूलानि च फलानि च।

अमृतस्वादुकल्पानि ददृशुस्तत्र वानरा:॥ २९॥

उस पर्वतपर खीर आदि अन्न (होमद्रव्य) से घृत आदिका स्राव हुआ था, उससे वहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट फल और मूल उत्पन्न हुए थे। उन फलोंको उन वानरोंने देखा॥ २९॥

तदन्नसम्भवं दिव्यं फलमूलं मनोहरम्।

य: कश्चित् सकृदश्नाति मासं भवति तर्पित:॥ ३०॥

उक्त अन्नसे उत्पन्न हुए उस दिव्य एवं मनोहर फल-मूलको जो कोई एक बार खा लेता था, वह एक मासतक उससे तृप्त बना रहता था॥ ३०॥

तानि मूलानि दिव्यानि फलानि च फलाशना:।

औषधानि च दिव्यानि जगृहुर्हरिपुंगवा:॥ ३१॥

फलाहार करनेवाले उन वानरशिरोमणियोंने उन दिव्य मूल-फलों और दिव्य औषधोंको अपने साथ ले लिया॥

तस्माच्च यज्ञायतनात् पुष्पाणि सुरभीणि च।

आनिन्युर्वानरा गत्वा सुग्रीवप्रियकारणात्॥ ३२॥

वहाँ जाकर उस यज्ञ-मण्डपसे वे सब वानर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये सुगन्धित पुष्प भी लेते आये॥ ३२॥

ते तु सर्वे हरिवरा: पृथिव्यां सर्ववानरान्।

संचोदयित्वा त्वरितं यूथानां जग्मुरग्रत:॥ ३३॥

वे समस्त श्रेष्ठ वानर भूमण्डलके सम्पूर्ण वानरोंको तुरंत चलनेका आदेश देकर उनके यूथोंके पहुँचनेके पहले ही सुग्रीवके पास आ गये॥ ३३॥

ते तु तेन मुहूर्तेन कपय: शीघ्रचारिण:।

किष्किन्धां त्वरया प्राप्ता: सुग्रीवो यत्र वानर:॥ ३४॥

वे शीघ्रगामी वानर उसी मुहूर्तमें चलकर बड़ी उतावलीके साथ किष्किन्धापुरीमें जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, जा पहुँचे॥ ३४॥

ते गृहीत्वौषधी: सर्वा: फलमूलं च वानरा:।

तं प्रतिग्राहयामासुर्वचनं चेदमब्रुवन्॥ ३५॥

उस सम्पूर्ण ओषधियों और फल-मूलोंको लेकर उन वानरोंने सुग्रीवकी सेवामें अर्पित कर दिया और इस प्रकार कहा—॥ ३५॥

सर्वे परिसृता: शैला: सरितश्च वनानि च।

पृथिव्यां वानरा: सर्वे शासनादुपयान्ति ते॥ ३६॥

‘महाराज! हमलोग सभी पर्वतों, नदियों और वनोंमें घूम आये। भूमण्डलके समस्त वानर आपकी आज्ञासे यहाँ आ रहे हैं’॥ ३६॥

एवं श्रुत्वा ततो हृष्ट: सुग्रीव: प्लवगाधिप:।

प्रतिजग्राह च प्रीतस्तेषां सर्वमुपायनम्॥ ३७॥

यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उनकी दी हुई सारी भेंट-सामग्री सानन्द ग्रहण की॥ ३७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तत्रिंश: सर्ग:॥ ३७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥

अष्टात्रिंश: सर्ग:

लक्ष्मणसहित सुग्रीवका भगवान् श्रीरामके पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करना, श्रीरामका उन्हें समझाना, सुग्रीवका अपने किये हुए सैन्यसंग्रहविषयक उद्योगको बताना और उसे सुनकर श्रीरामका प्रसन्न होना

प्रतिगृह्य च तत् सर्वमुपायनमुपाहृतम्।

वानरान् सान्त्वयित्वा च सर्वानेव व्यसर्जयत्॥ १॥

उनके लाये हुए उन समस्त उपहारोंको ग्रहण करके सुग्रीवने सम्पूर्ण वानरोंको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना दी। फिर सबको विदा कर दिया॥ १॥

विसर्जयित्वा स हरीन् सहस्रान् कृतकर्मण:।

मेने कृतार्थमात्मानं राघवं च महाबलम्॥ २॥

कार्य पूरा करके लौटे हुए उन सहस्रों वानरोंको विदा करके सुग्रीवने अपने-आपको कृतार्थ माना और महाबली श्रीरघुनाथजीका भी कार्य सिद्ध हुआ ही समझा॥ २॥

स लक्ष्मणो भीमबलं सर्ववानरसत्तमम्।

अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं सम्प्रहर्षयन्॥ ३॥

तत्पश्चात् लक्ष्मण समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ भयंकर बलशाली सुग्रीवका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनीत वचन बोले—॥ ३॥

किष्किन्धाया विनिष्क्राम यदि ते सौम्य रोचते।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य सुभाषितम्॥ ४॥

सुग्रीव: परमप्रीतो वाक्यमेतदुवाच ह।

‘सौम्य! यदि तुम्हारी रुचि हो तो अब किष्किन्धासे बाहर निकलो।’ लक्ष्मणकी यह सुन्दर बात सुनकर सुग्रीव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—॥ ४/

एवं भवतु गच्छाम स्थेयं त्वच्छासने मया॥ ५॥

तमेवमुक्त्वा सुग्रीवो लक्ष्मणं शुभलक्षणम्।

विसर्जयामास तदा ताराद्याश्चैव योषित:॥ ६॥

‘अच्छा, ऐसा ही हो। चलिये, चलें। मुझे तो आपकी आज्ञाका पालन करना है।’ शुभ लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुग्रीवने तारा आदि सब स्त्रियोंको तत्काल विदा कर दिया॥ ५-६॥

एहीत्युच्चैर्हरिवरान् सुग्रीव: समुदाहरत्।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरय: शीघ्रमाययु:॥ ७॥

बद्धाञ्जलिपुटा: सर्वे ये स्यु: स्त्रीदर्शनक्षमा:।

इसके बाद सुग्रीवने शेष वानरोंको ‘आओ, आओ’ कहकर उच्च स्वरसे पुकारा। उनकी वह पुकार सुनकर सब वानर, जो अन्त:पुरकी स्त्रियोंको देखनेके अधिकारी थे, दोनों हाथ जोड़े शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये॥ ७/

तानुवाच तत: प्राप्तान् राजार्कसदृशप्रभ:॥ ८॥

उपस्थापयत क्षिप्रं शिबिकां मम वानरा:।

पास आये हुए उन वानरोंसे सूर्यतुल्य तेजस्वी राजा सुग्रीवने कहा—‘वानरो! तुमलोग शीघ्र मेरी शिबिकाको यहाँ ले आओ’॥ ८/

श्रुत्वा तु वचनं तस्य हरय: शीघ्रविक्रमा:॥ ९॥

समुपस्थापयामासु: शिबिकां प्रियदर्शनाम्।

उनकी बात सुनकर शीघ्रगामी वानरोंने एक सुन्दर शिबिका (पालकी) वहाँ उपस्थित कर दी॥ ९/

तामुपस्थापितां दृष्ट्वा शिबिकां वानराधिप:॥ १०॥

लक्ष्मणारुह्यतां शीघ्रमिति सौमित्रिमब्रवीत्।

पालकीको वहाँ उपस्थित देख वानरराज सुग्रीवने सुमित्राकुमारसे कहा—‘कुमार लक्ष्मण! आप शीघ्र इसपर आरूढ़ हो जायँ’॥ १०/

इत्युक्त्वा काञ्चनं यानं सुग्रीव: सूर्यसंनिभम्॥ ११॥

बहुभिर्हरिभिर्युक्तमारुरोह सलक्ष्मण:।

ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव उस सूर्यकी-सी प्रभावाली सुवर्णमयी पालकीपर, जिसे ढोनेके लिये बहुत-से वानर लगे थे, आरूढ़ हुए॥ ११/

पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि॥ १२॥

शुक्लैश्च वालव्यजनैर्धूयमानै: समन्तत:।

शंखभेरीनिनादैश्च बन्दिभिश्चाभिनन्दित:॥ १३॥

निर्ययौ प्राप्य सुग्रीवो राज्यश्रियमनुत्तमाम्।

उस समय सुग्रीवके ऊपर श्वेत छत्र लगाया गया और सब ओरसे सफेद चँवर डुलाये जाने लगे। शङ्ख और भेरीकी ध्वनिके साथ वन्दीजनोंका अभिनन्दन सुनते हुए राजा सुग्रीव परम उत्तम राजलक्ष्मीको पाकर किष्किन्धापुरीसे बाहर निकले॥ १२-१३/

स वानरशतैस्तीक्ष्णैर्बहुभि: शस्त्रपाणिभि:॥ १४॥

परिकीर्णो ययौ तत्र यत्र रामो व्यवस्थित:।

हाथमें शस्त्र लिये तीक्ष्ण स्वभाववाले कई सौ वानरोंसे घिरे हुए राजा सुग्रीव उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीराम निवास करते थे॥ १४/

स तं देशमनुप्राप्य श्रेष्ठं रामनिषेवितम्॥ १५॥

अवातरन्महातेजा: शिबिकाया: सलक्ष्मण:।

आसाद्य च ततो रामं कृताञ्जलिपुटोऽभवत्॥ १६॥

श्रीरामचन्द्रजीसे सेवित उस श्रेष्ठ स्थानमें पहुँचकर लक्ष्मणसहित महातेजस्वी सुग्रीव पालकीसे उतरे और श्रीरामके पास जा हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ १५-१६॥

कृताञ्जलौ स्थिते तस्मिन् वानराश्चाभवंस्तथा।

तटाकमिव तं दृष्ट्वा राम: कुड्मलपङ्कजम्॥ १७॥

वानराणां महत् सैन्यं सुग्रीवे प्रीतिमानभूत्।

वानरराजके हाथ जोड़कर खड़े होनेपर उनके अनुयायी वानर भी उन्हींकी भाँति अञ्जलि बाँधे खड़े हो गये। मुकुलित कमलोंसे भरे हुए विशाल सरोवरकी भाँति वानरोंकी उस बड़ी भारी सेनाको देखकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवपर बहुत प्रसन्न हुए॥ १७/

पादयो: पतितं मूर्ध्ना तमुत्थाप्य हरीश्वरम्॥ १८॥

प्रेम्णा च बहुमानाच्च राघव: परिषस्वजे।

वानरराजको चरणोंमें मस्तक रखकर पड़ा हुआ देख श्रीरघुनाथजीने हाथसे पकड़कर उठाया और बड़े आदर तथा प्रेमके साथ उन्हें हृदयसे लगाया॥ १८/

परिष्वज्य च धर्मात्मा निषीदेति ततोऽब्रवीत्॥ १९॥

निषण्णं तं ततो दृष्ट्वा क्षितौ रामोऽब्रवीत् तत:।

हृदयसे लगाकर धर्मात्मा श्रीरामने उनसे कहा—‘बैठो’। उन्हें पृथ्वीपर बैठा देख श्रीराम बोले—॥

धर्ममर्थं च कामं च काले यस्तु निषेवते॥ २०॥

विभज्य सततं वीर स राजा हरिसत्तम।

हित्वा धर्मं तथार्थं च कामं यस्तु निषेवते॥ २१॥

स वृक्षाग्रे यथा सुप्त: पतित: प्रतिबुध्यते।

‘वीर! वानरशिरोमणे! जो धर्म, अर्थ और कामके लिये समयका विभाग करके सदा उचित समयपर उनका (न्याययुक्त) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है। किंतु जो धर्म-अर्थका त्याग करके केवल कामका ही सेवन करता है, वह वृक्षकी अगली शाखापर सोये हुए मनुष्यके समान है। गिरनेपर ही उसकी आँख खुलती है॥ २०-२१/

अमित्राणां वधे युक्तो मित्राणां संग्रहे रत:॥ २२॥

त्रिवर्गफलभोक्ता च राजा धर्मेण युज्यते।

‘जो राजा शत्रुओंके वध और मित्रोंके संग्रहमें संलग्न रहकर योग्य समयपर धर्म, अर्थ और कामका (न्याययुक्त) सेवन करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है॥ २२/

उद्योगसमयस्त्वेष प्राप्त: शत्रुनिषूदन॥ २३॥

संचिन्त्यतां हि पिङ्गेश हरिभि: सह मन्त्रिभि:।

‘शत्रुसूदन! यह हमलोगोंके लिये उद्योगका समय आया है। वानरराज! तुम इस विषयमें इन वानरों और मन्त्रियोंके साथ विचार करो’॥ २३॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामं वचनमब्रवीत्॥ २४॥

प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।

त्वत्प्रसादान्महाबाहो पुन: प्राप्तमिदं मया॥ २५॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनसे कहा— ‘महाबाहो! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदासे चला आनेवाला वानरोंका राज्य—ये सब नष्ट हो चुके थे। आपकी कृपासे ही मुझे पुन: इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ २४-२५॥

तव देव प्रसादाच्च भ्रातुश्च जयतां वर।

कृतं न प्रतिकुर्याद् य: पुरुषाणां हि दूषक:॥ २६॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ देव! आप और आपके भाईकी कृपासे ही मैं वानर-राज्यपर पुन: प्रतिष्ठित हुआ हूँ। जो किये हुए उपकारका बदला नहीं चुकाता है, वह पुरुषोंमें धर्मको कलङ्कित करनेवाला माना गया है॥ २६॥

एते वानरमुख्याश्च शतश: शत्रुसूदन।

प्राप्ताश्चादाय बलिन: पृथिव्यां सर्ववानरान्॥ २७॥

‘शत्रुसूदन! ये सैकड़ों बलवान् और मुख्य वानर भूमण्डलके सभी बलशाली वानरोंको साथ लेकर यहाँ आये हैं॥ २७॥

ऋक्षाश्च वानरा: शूरा गोलाङ्गूलाश्च राघव।

कान्तारवनदुर्गाणामभिज्ञा घोरदर्शना:॥ २८॥

‘रघुनन्दन! इनमें रीछ हैं, वानर हैं और शौर्य-सम्पन्न गोलाङ्गूल (लङ्गूर) हैं। ये सब-के-सब देखनेमें बड़े भयंकर हैं और बीहड़ वनों तथा दुर्गम स्थानोंके जानकार हैं॥ २८॥

देवगन्धर्वपुत्राश्च वानरा: कामरूपिण:।

स्वै: स्वै: परिवृता: सैन्यैर्वर्तन्ते पथि राघव॥ २९॥

‘रघुनाथजी! जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र हैं और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, वे श्रेष्ठ वानर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ चल पड़े हैं और इस समय मार्गमें हैं॥ २९॥

शतै: शतसहस्रैश्च वर्तन्ते कोटिभिस्तथा।

अयुतैश्चावृता वीर शङ्कुभिश्च परंतप॥ ३०॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! इनमेंसे किसीके साथ सौ, किसीके साथ लाख, किसीके साथ करोड़, किसीके साथ अयुत (दस हजार) और किसीके साथ एक शंकु वानर हैं॥ ३०॥

अर्बुदैरर्बुदशतैर्मध्यैश्चान्त्यैश्च वानरा:।

समुद्राश्च परार्धाश्च हरयो हरियूथपा:॥ ३१॥

‘कितने ही वानर अर्बुद (दस करोड़), सौ अर्बुद (दस अरब), मध्य (दस पद्म) तथा अन्त्य (एक पद्म) वानर-सैनिकोंके साथ आ रहे हैं। कितने ही वानरों तथा वानर-यूथपतियोंकी संख्या समुद्र (दस नील) तथा परार्ध (शंख) तक पहुँच गयी है131॥ ३१॥

आगमिष्यन्ति ते राजन् महेन्द्रसमविक्रमा:।

मेघपर्वतसंकाशा मेरुविन्ध्यकृतालया:॥ ३२॥

‘राजन्! वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी तथा मेघों और पर्वतोंके समान विशालकाय वानर, जो मेरु और विन्ध्याचलमें निवास करते हैं, यहाँ शीघ्र ही उपस्थित होंगे॥ ३२॥

ते त्वामभिगमिष्यन्ति राक्षसं योद्धुमाहवे।

निहत्य रावणं युद्धे ह्यानयिष्यन्ति मैथिलीम्॥ ३३॥

‘जो युद्धमें रावणका वध करके मिथिलेश-कुमारी सीताको लङ्कासे ला देंगे, वे महान् शक्तिशाली वानर संग्राममें उस राक्षससे युद्ध करनेके लिये अवश्य आपके पास आयेंगे’॥ ३३॥

तत: समुद्योगमवेक्ष्य वीर्यवान्

हरिप्रवीरस्य निदेशवर्तिन:।

बभूव हर्षाद् वसुधाधिपात्मज:

प्रबुद्धनीलोत्पलतुल्यदर्शन: ॥ ३४॥

यह सुनकर परम पराक्रमी राजकुमार श्रीराम अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले वानरोंके प्रमुख वीर सुग्रीवका यह सैन्य-विषयक उद्योग देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे और प्रफुल्ल नील कमलके समान दिखायी देने लगे॥ ३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥

 

एकोनचत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामचन्द्रजीका सुग्रीवके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानर-यूथपतियोंका अपनी सेनाओंके साथ आगमन

इति ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो धर्मभृतां वर:।

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य प्रत्युवाच कृताञ्जलिम्॥ १॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और हाथ जोड़कर खड़े हुए उनसे इस प्रकार कहा—॥ १॥

यदिन्द्रो वर्षते वर्षं न तच्चित्रं भविष्यति।

आदित्योऽसौ सहस्रांशु: कुर्याद् वितिमिरं नभ:॥ २॥

चन्द्रमा रजनीं कुर्यात् प्रभया सौम्य निर्मलाम्।

त्वद्विधो वापि मित्राणां प्रीतिं कुर्यात् परंतप॥ ३॥

‘सखे! इन्द्र जो जलकी वर्षा करते हैं, सहस्रों किरणोंसे शोभा पानेवाले सूर्यदेव जो आकाशका अन्धकार दूर कर देते हैं तथा सौम्य! चन्द्रमा अपनी प्रभासे जो अँधेरी रातको भी उज्ज्वल कर देते हैं, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि यह उनका स्वाभाविक गुण है। शत्रुओंको संताप देनेवाले सुग्रीव! इसी तरह तुम्हारे समान पुरुष भी यदि अपने मित्रोंका उपकार करके उन्हें प्रसन्न कर दें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये॥ २-३॥

एवं त्वयि न तच्चित्रं भवेद् यत् सौम्य शोभनम्।

जानाम्यहं त्वां सुग्रीव सततं प्रियवादिनम्॥ ४॥

‘सौम्य सुग्रीव! इसी प्रकार तुममें जो मित्रोंका हितसाधनरूप कल्याणकारी गुण है, वह आश्चर्यका विषय नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम सदा प्रिय बोलनेवाले हो—यह तुम्हारा स्वाभाविक गुण है॥ ४॥

त्वत्सनाथ: सखे संख्ये जेतास्मि सकलानरीन्।

त्वमेव मे सुहृन्मित्रं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ५॥

‘सखे! तुम्हारी सहायतासे सनाथ होकर मैं युद्धमें समस्त शत्रुओंको जीत लूँगा। तुम्हीं मेरे हितैषी मित्र हो और मेरी सहायता कर सकते हो॥ ५॥

जहारात्मविनाशाय मैथिलीं राक्षसाधम:।

वञ्चयित्वा तु पौलोमीमनुह्लादो यथा शचीम्॥ ६॥

‘राक्षसाधम रावणने अपना नाश करनेके लिये ही मिथिलेशकुमारीको धोखा देकर उसका अपहरण किया है। ठीक उसी तरह, जैसे अनुह्लादने अपने विनाशके लिये ही पुलोमपुत्री शचीको छलपूर्वक हर लिया था132॥ ६॥

नचिरात् तं वधिष्यामि रावणं निशितै: शरै:।

पौलोम्या: पितरं दृप्तं शतक्रतुरिवारिहा॥ ७॥

‘जैसे शत्रुहन्ता इन्द्रने शचीके घमंडी पिताको मार डाला था, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रावणका वध कर डालूँगा’॥ ७॥

एतस्मिन्नन्तरे चैव रज: समभिवर्तत।

उष्णतीव्रां सहस्रांशोश्छादयद् गगने प्रभाम्॥ ८॥

श्रीराम और सुग्रीवमें जब इस प्रकार बातें हो रही थीं, उसी समय बड़े जोरकी धूल उठी, जिसने आकाशमें फैलकर सूर्यकी प्रचण्ड प्रभाको ढक दिया॥ ८॥

दिश: पर्याकुलाश्चासंस्तमसा तेन दूषिता:।

चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना॥ ८॥

फिर तो उस धूलजनित अन्धकारसे सम्पूर्ण दिशाएँ दूषित एवं व्याप्त हो गयीं तथा पर्वत, वन और काननोंके साथ समूची पृथ्वी डगमग होने लगी॥ ९॥

ततो नगेन्द्रसंकाशैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाबलै:।

कृत्स्ना संछादिता भूमिरसंख्येयै: प्लवंगमै:॥ १०॥

तदनन्तर पर्वतराजके समान शरीर और तीखी दाढ़वाले असंख्य महाबली वानरोंसे वहाँकी सारी भूमि आच्छादित हो गयी॥ १०॥

निमेषान्तरमात्रेण ततस्तैर्हरियूथपै:।

कोटीशतपरीवारैर्वानरैर्हरियूथपै: ॥ ११॥

पलक मारते-मारते अरबों वानरोंसे घिरे हुए अनेकानेक यूथपतियोंने वहाँ आकर सारी भूमिको ढक लिया॥ ११॥

नादेयै: पार्वतेयैश्च सामुद्रैश्च महाबलै:।

हरिभिर्मेघनिर्हृदैरन्यैश्च वनवासिभि:॥ १२॥

नदी, पर्वत, वन और समुद्र सभी स्थानोंके निवासी महाबली वानर जुट गये, जो मेघोंकी गर्जनाके समान उच्च स्वरसे सिंहनाद करते थे॥ १२॥

तरुणादित्यवर्णैश्च शशिगौरैश्च वानरै:।

पद्मकेसरवर्णैश्च श्वेतैर्हेमकृतालयै:॥ १३॥

कोई बालसूर्यके समान लाल रंगके थे तो कोई चन्द्रमाके समान गौर वर्णके। कितने ही वानर कमलके केसरोंके समान पीले रंगके थे और कितने ही हिमाचलवासी वानर सफेद दिखायी देते थे॥ १३॥

कोटीसहस्रैर्दशभि: श्रीमान् परिवृतस्तदा।

वीर: शतबलिर्नाम वानर: प्रत्यदृश्यत॥ १४॥

उस समय परम कान्तिमान् शतबलि नामक वीर वानर दस अरब वानरोंके साथ दृष्टिगोचर हुआ॥ १४॥

तत: काञ्चनशैलाभस्ताराया वीर्यवान् पिता।

अनेकैर्बहुसाहस्रै: कोटिभि: प्रत्यदृश्यत॥ १५॥

तत्पश्चात् सुवर्णशैलके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले ताराके महाबली पिता कई सहस्र कोटि वानरोंके साथ वहाँ उपस्थित देखे गये॥ १५॥

तथापरेण कोटीनां सहस्रेण समन्वित:।

पिता रुमाया: सम्प्राप्त: सुग्रीवश्वशुरो विभु:॥ १६॥

इसी प्रकार रुमाके पिता और सुग्रीवके श्वशुर, जो बड़े वैभवशाली थे, वहाँ उपस्थित हुए। उनके साथ भी दस अरब वानर थे॥ १६॥

पद्मकेसरसंकाशस्तरुणार्कनिभानन: ।

बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ: सर्ववानरसत्तम:॥ १७॥

अनेकैर्बहुसाहस्रैर्वानराणां समन्वित:।

पिता हनुमत: श्रीमान् केसरी प्रत्यदृश्यत॥ १८॥

तदनन्तर हनुमान्‌जीके पिता कपिश्रेष्ठ श्रीमान् केसरी दिखायी दिये। उनके शरीरका रंग कमलके केसरोंकी भाँति पीला और मुख प्रात:कालके सूर्यके समान लाल था। वे बड़े बुद्धिमान् और समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ थे। वे कई सहस्र वानरोंसे घिरे हुए थे॥ १७-१८॥

गोलाङ्गूलमहाराजो गवाक्षो भीमविक्रम:।

वृत: कोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यत॥ १९॥

फिर लंगूर-जातिवाले वानरोंके महाराज भयंकर पराक्रमी गवाक्षका दर्शन हुआ। उनके साथ दस अरब वानरोंकी सेना थी॥ १९॥

ऋक्षाणां भीमवेगानां धूम्र: शत्रुनिबर्हण:।

वृत: कोटिसहस्राभ्यां द्वाभ्यां समभिवर्तत॥ २०॥

शत्रुओंका संहार करनेवाले धूम्र भयंकर वेगशाली बीस अरब रीछोंकी सेना लेकर आये॥ २०॥

महाचलनिभैर्घोरै: पनसो नाम यूथप:।

आजगाम महावीर्यस्तिसृभि: कोटिभिर्वृत:॥ २१॥

महापराक्रमी यूथपति पनस तीन करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए। वे सब-के-सब बड़े भयंकर तथा महान् पर्वताकार दिखायी देते थे॥ २१॥

नीलाञ्जनचयाकारो नीलो नामैष यूथप:।

अदृश्यत महाकाय: कोटिभिर्दशभिर्वृत:॥ २२॥

यूथपति नीलका शरीर भी बड़ा विशाल था। वे नीले कज्जल गिरिके समान नीलवर्णके थे और दस करोड़ कपियोंसे घिरे हुए थे॥ २२॥

तत: काञ्चनशैलाभो गवयो नाम यूथप:।

आजगाम महावीर्य: कोटिभि: पञ्चभिर्वृत:॥ २३॥

तदनन्तर यूथपति गवय, जो सुवर्णमय पर्वत मेरुके समान कान्तिमान् और महापराक्रमी थे, पाँच करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए॥ २३॥

दरीमुखश्च बलवान् यूथपोऽभ्याययौ तदा।

वृत: कोटिसहस्रेण सुग्रीवं समवस्थित:॥ २४॥

उसी समय वानरोंके बलवान् सरदार दरीमुख भी आ पहुँचे। वे दस अरब वानरोंके साथ सुग्रीवकी सेवामें उपस्थित हुए थे॥ २४॥

मैन्दश्च द्विविदश्चोभावश्विपुत्रौ महाबलौ।

कोटिकोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यताम्॥ २५॥

अश्विनीकुमारोंके महाबली पुत्र मैन्द और द्विविद, ये दोनों भाई भी दस-दस अरब वानरोंकी सेनाके साथ वहाँ दिखायी दिये॥ २५॥

गजश्च बलवान् वीरस्तिसृभि: कोटिभिर्वृत:।

आजगाम महातेजा: सुग्रीवस्य समीपत:॥ २६॥

तदनन्तर महातेजस्वी बलवान् वीर गज तीन करोड़ वानरोंके साथ सुग्रीवके पास आया॥ २६॥

ऋक्षराजो महातेजा जाम्बवान्नाम नामत:।

कोटिभिर्दशभिर्व्याप्त: सुग्रीवस्य वशे स्थित:॥ २७॥

रीछोंके राजा जाम्बवान् बड़े तेजस्वी थे। वे दस करोड़ रीछोंसे घिरे हुए आये और सुग्रीवके अधीन होकर खड़े हुए॥ २७॥

रुमणो नाम तेजस्वी विक्रान्तैर्वानरैर्वृत:।

आगतो बलवांस्तूर्णं कोटीशतसमावृत:॥ २८॥

रुमण (रुमण्वान्) नामक तेजस्वी और बलवान् वानर एक अरब पराक्रमी वानरोंको साथ लिये बड़ी तीव्र गतिसे वहाँ आया॥ २८॥

तत: कोटिसहस्राणां सहस्रेण शतेन च।

पृष्ठतोऽनुगत: प्राप्तो हरिभिर्गन्धमादन:॥ २९॥

इसके बाद यूथपति गन्धमादन उपस्थित हुए। उनके पीछे एक पद्म वानरोंकी सेना आयी थी॥ २९॥

तत: पद्मसहस्रेण वृत: शङ्कुशतेन च।

युवराजोऽङ्गद: प्राप्त: पितुस्तुल्यपराक्रम:॥ ३०॥

तत्पश्चात् युवराज अङ्गद आये। ये अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे। इनके साथ एक सहस्र पद्म और सौ शंकु (एक पद्म) वानरोंकी सेना थी (इनके सैनिकोंकी कुल संख्या दस शंख एक पद्म थी)॥ ३०॥

ततस्ताराद्युतिस्तारो हरिभिर्भीमविक्रमै:।

पञ्चभिर्हरिकोटीभिर्दूरत: पर्यदृश्यत॥ ३१॥

तदनन्तर तारोंके समान कान्तिमान् तार नामक वानर पाँच करोड़ भयंकर पराक्रमी वानर वीरोंके साथ दूरसे आता दिखायी दिया॥ ३१॥

इन्द्रजानु: कविर्वीरो यूथप: प्रत्यदृश्यत।

एकादशानां कोटीनामीश्वरस्तैश्च संवृत:॥ ३२॥

इन्द्रजानु (इन्द्रभानु) नामक वीर यूथपति, जो बड़ा ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् था, ग्यारह करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित देखा गया। वह उन सबका स्वामी था॥ ३२॥

ततो रम्भस्त्वनुप्राप्तस्तरुणादित्यसंनिभ:।

अयुतेन वृतश्चैव सहस्रेण शतेन च॥ ३३॥

इसके बाद रम्भ नामक वानर उपस्थित हुआ, जो प्रात:कालके सूर्यकी भाँति लाल रंगका था। उसके साथ ग्यारह हजार एक सौ वानरोंकी सेना थी॥ ३३॥

ततो यूथपतिर्वीरो दुर्मुखो नाम वानर:।

प्रत्यदृश्यत कोटीभ्यां द्वाभ्यां परिवृतो बली॥ ३४॥

तत्पश्चात् वीर यूथपति दुर्मुख नामक बलवान् वानर उपस्थित देखा गया, जो दो करोड़ वानर सैनिकोंसे घिरा हुआ था॥ ३४॥

कैलासशिखराकारैर्वानरैर्भीमविक्रमै: ।

वृत: कोटिसहस्रेण हनुमान् प्रत्यदृश्यत॥ ३५॥

इसके बाद हनुमान् जी ने दर्शन दिया। उनके साथ कैलासशिखरके समान श्वेत शरीरवाले भयंकर पराक्रमी वानर दस अरबकी संख्यामें मौजूद थे॥ ३५॥

नलश्चापि महावीर्य: संवृतो द्रुमवासिभि:।

कोटीशतेन सम्प्राप्त: सहस्रेण शतेन च॥ ३६॥

फिर महापराक्रमी नल उपस्थित हुए, जो एक अरब एक हजार एक सौ द्रुमवासी वानरोंसे घिरे हुए थे॥

ततो दधिमुख: श्रीमान् कोटिभिर्दशभिर्वृत:।

सम्प्राप्तोऽभिनदंस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मन:॥ ३७॥

तदनन्तर श्रीमान् दधिमुख दस करोड़ वानरोंके साथ गर्जना करते हुए किष्किन्धामें महात्मा सुग्रीवके पास आये॥ ३७॥

शरभ: कुमुदो वह्निर्वानरो रंह एव च।

एते चान्ये च बहवो वानरा: कामरूपिण:॥ ३८॥

आवृत्य पृथिवीं सर्वां पर्वतांश्च वनानि च।

यूथपा: समनुप्राप्ता येषां संख्या न विद्यते॥ ३९॥

इनके सिवा शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह—ये और दूसरे भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरयूथपति सारी पृथ्वी, पर्वत और वनोंको आवृत करके वहाँ उपस्थित हुए, जिनकी कोई गणना नहीं की जा सकती॥ ३८-३९॥

आगताश्च निविष्टाश्च पृथिव्यां सर्ववानरा:।

आप्लवन्त: प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमा:।

अभ्यवर्तन्त सुग्रीवं सूर्यमभ्रगणा इव॥ ४०॥

वहाँ आये हुए सभी वानर पृथ्वीपर बैठे। वे सब-के-सब उछलते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ सुग्रीवके चारों ओर जमा हो गये। जैसे सूर्यको सब ओरसे घेरकर बादलोंके समूह छा रहे हों॥ ४०॥

कुर्वाणा बहुशब्दांश्च प्रकृष्टा बाहुशालिन:।

शिरोभिर्वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयन्॥ ४१॥

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले बहुतेरे श्रेष्ठ वानरोंने (जो भीड़के कारण सुग्रीवके पासतक न पहुँच सके थे) अनेक प्रकारकी बोली बोलकर तथा मस्तक झुकाकर वानरराज सुग्रीवको अपने आगमनकी सूचना दी॥ ४१॥

अपरे वानरश्रेष्ठा: संगम्य च यथोचितम्।

सुग्रीवेण समागम्य स्थिता: प्राञ्जलयस्तदा॥ ४२॥

बहुत-से श्रेष्ठ वानर उनके पास गये और यथोचितरूपसे मिलकर लौटे तथा कितने ही वानर सुग्रीवसे मिलनेके बाद उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥ ४२॥

सुग्रीवस्त्वरितो रामे सर्वांस्तान् वानरर्षभान्।

निवेदयित्वा धर्मज्ञ: स्थित: प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ ४३॥

धर्मके ज्ञाता वानरराज सुग्रीवने वहाँ आये हुए उन सब वानरशिरोमणियोंका समाचार निवेदन करके श्रीरामचन्द्रजीको शीघ्रतापूर्वक उनका परिचय दिया, फिर हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये॥ ४३॥

यथासुखं पर्वतनिर्झरेषु

वनेषु सर्वेषु च वानरेन्द्रा:।

निवेशयित्वा विधिवद् बलानि

बलं बलज्ञ: प्रतिपत्तुमीष्टे॥ ४४॥

उन वानर-यूथपतियोंने वहाँके पर्वतीय झरनोंके आस-पास तथा समस्त वनोंमें अपनी सेनाओंको यथोचितरूपसे सुखपूर्वक ठहरा दिया। तत्पश्चात् सब सेनाओंके ज्ञाता सुग्रीव उनका पूर्णत: ज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ हो सके॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग:॥ ३९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥

 

चत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामकी आज्ञासे सुग्रीवका सीताकी खोजके लिये पूर्व दिशामें वानरोंको भेजना और वहाँके स्थानोंका वर्णन करना

अथ राजा समृद्धार्थ: सुग्रीव: प्लवगेश्वर:।

उवाच नरशार्दूलं रामं परबलार्दनम्॥ १॥

तदनन्तर बल-वैभवसे सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे बोले—॥ १॥

आगता विनिविष्टाश्च बलिन: कामरूपिण:।

वानरेन्द्रा महेन्द्राभा ये मद्विषयवासिन:॥ २॥

‘भगवन्! जो मेरे राज्यमें निवास करते हैं, वे महेन्द्रके समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् वानर-यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं॥

त इमे बहुविक्रान्तैर्बलिभिर्भीमविक्रमै:।

आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभा:॥ ३॥

‘ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओंको ले आये हैं, जो बहुत-से युद्धस्थलोंमें अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखानेवाले हैं। यहाँ ऐसे-ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवोंके समान भयानक हैं॥ ३॥

ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्लमा:।

पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमा:॥ ४॥

‘अनेक युद्धोंमें इन वानर वीरोंकी शूर-वीरताका परिचय मिल चुका है। ये बलके भण्डार हैं, युद्धसे थकते नहीं हैं—इन्होंने थकावटको जीत लिया है। ये अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध और उद्योग करनेमें श्रेष्ठ हैं॥

पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिन:।

कोट्योघाश्च इमे प्राप्ता वानरास्तव किंकरा:॥ ५॥

‘श्रीराम! यहाँ आये हुए ये वानरोंके करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले हैं। जल और थल—दोनोंमें समानरूपसे चलनेकी शक्ति रखते हैं। ये सब-के-सब आपके किंकर (आज्ञापालक) हैं॥ ५॥

निदेशवर्तिन: सर्वे सर्वे गुरुहिते स्थिता:।

अभिप्रेतमनुष्ठातुं तव शक्ष्यन्त्यरिंदम॥ ६॥

‘शत्रुदमन! ये सभी आपकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं। आप इनके गुरु—स्वामी हैं। ये आपके हितसाधनमें तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर सकेंगे॥ ६॥

त इमे बहुसाहस्रैरनीकैर्भीमविक्रमै:।

आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभा:॥ ७॥

‘दैत्यों और दानवोंके समान घोर रूपधारी ये सभी वानर-यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करनेवाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं॥ ७॥

यन्मन्यसे नरव्याघ्र प्राप्तकालं तदुच्यताम्।

त्वत्सैन्यं त्वद्वशे युक्तमाज्ञापयितुमर्हसि॥ ८॥

‘पुरुषसिंह! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये। आपकी यह सेना आपके वशमें है। आप इसे यथोचित कार्यके लिये आज्ञा प्रदान करें॥ ८॥

काममेषामिदं कार्यं विदितं मम तत्त्वत:।

तथापि तु यथायुक्तमाज्ञापयितुमर्हसि॥ ९॥

‘यद्यपि सीताजीके अन्वेषणका यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्यके लिये हमें आज्ञा दें’॥ ९॥

तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो दशरथात्मज:।

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत्॥ १०॥

जब सुग्रीवने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीरामने दोनों भुजाओंसे पकड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ १०॥

ज्ञायतां सौम्य वैदेही यदि जीवति वा न वा।

स च देशो महाप्राज्ञ यस्मिन् वसति रावण:॥ ११॥

‘सौम्य! महाप्राज्ञ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है?॥ ११॥

अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

प्राप्तकालं विधास्यामि तस्मिन् काले सह त्वया॥ १२॥

‘जब सीताके जीवित होनेका और रावणके निवासस्थानका निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा॥ १२॥

नाहमस्मिन् प्रभु: कार्ये वानरेन्द्र न लक्ष्मण:।

त्वमस्य हेतु: कार्यस्य प्रभुश्च प्लवगेश्वर॥ १३॥

‘वानरराज! इस कार्यको सिद्ध करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही। कपीश्वर! इस कार्यकी सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है। तुम्हीं इसे पूर्ण करनेमें समर्थ हो॥ १३॥

त्वमेवाज्ञापय विभो मम कार्यविनिश्चयम्।

त्वं हि जानासि मे कार्यं मम वीर न संशय:॥ १४॥

‘प्रभो! मेरे कार्यका भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरोंको उचित आज्ञा दो। वीर! मेरा कार्य क्या है? इसे तुम्हीं ठीक-ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है॥ १४॥

सुहृद्द्वितीयो विक्रान्त: प्राज्ञ: कालविशेषवित्।

भवानस्मद्धिते युक्त: सुहृदाप्तोऽर्थवित्तम:॥ १५॥

‘लक्ष्मणके बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो। तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता, हितमें संलग्न रहनेवाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजनको अच्छी तरह समझनेवाले हो’॥ १५॥

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो विनतं नाम यूथपम्।

अब्रवीद् रामसांनिध्ये लक्ष्मणस्य च धीमत:॥ १६॥

शैलाभं मेघनिर्घोषमूर्जितं प्लवगेश्वरम्।

सोमसूर्यनिभै: सार्धं वानरैर्वानरोत्तम॥ १७॥

देशकालनयैर्युक्तो विज्ञ: कार्यविनिश्चये।

वृत: शतसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्॥ १८॥

अधिगच्छ दिशं पूर्वां सशैलवनकाननाम्।

तत्र सीतां च वैदेहीं निलयं रावणस्य च॥ १९॥

मार्गध्वं गिरिदुर्गेषु वनेषु च नदीषु च।

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मणके समीप ही विनत नामक यूथपतिसे, जो पर्वतके समान विशालकाय, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले, बलवान् तथा वानरोंके शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्यके समान कान्तिवाले वानरोंके साथ उपस्थित हुए थे, कहा—‘वानरशिरोमणे! तुम देश और कालके अनुसार नीतिका प्रयोग करनेवाले तथा कार्यका निश्चय करनेमें चतुर हो। तुम एक लाख वेगवान् वानरोंके साथ पर्वत, वन और काननोंसहित पूर्व दिशाकी ओर जाओ और वहाँ पहाड़ोंके दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओंमें विदेहकुमारी सीता एवं रावणके निवास-स्थानकी खोज करो॥ १६—१९/

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा॥ २०॥

कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।

सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्॥ २१॥

महीं कालमहीं चापि शैलकाननशोभिताम्।

‘भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य कलिन्दनन्दिनी यमुना, महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणिके समान निर्मल जलवाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनोंसे सुशोभित कालमही आदि नदियोंके किनारे ढूँढ़ो॥ २०-२१/

ब्रह्ममालान् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान्॥ २२॥

मागधांश्च महाग्रामान् पुण्ड्रांस्त्वङ्गांस्तथैव च।

‘ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देशके बड़े-बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदोंमें छानबीन करो॥ २२/

भूमिं च कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्॥ २३॥

सर्वं च तद् विचेतव्यं मार्गयद्भिस्ततस्तत:।

रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम्॥ २४॥

‘रेशमके कीड़ोंकी उत्पत्तिके स्थानों और चाँदीके खानोंमें भी खोज करनी चाहिये। इधर-उधर ढूँढ़ते हुए तुम सब लोगोंको इन सभी स्थानोंमें राजा दशरथकी पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका अन्वेषण करना चाहिये॥ २३-२४॥

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान् पत्तनानि च।

मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिता: केचिदालया:॥ २५॥

‘समुद्रके भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतोंपर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपोंके विभिन्न नगरोंमें तथा मन्दराचलकी चोटीपर जो कोई गाँव बसे हैं, उन सबमें सीताका अनुसंधान करो॥ २५॥

कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णका:।

घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादका:॥ २६॥

अक्षया बलवन्तश्च तथैव पुरुषादका:।

किरातास्तीक्ष्णचूडाश्च हेमाभा: प्रियदर्शना:॥ २७॥

आममीनाशनाश्चापि किराता द्वीपवासिन:।

अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति स्मृता:॥ २८॥

एतेषामाश्रया: सर्वे विचेया: काननौकस:।

‘जो कर्णप्रावरण (वस्त्रकी भाँति पैरतक लटके हुए कानवाले), ओष्ठकर्णक (ओठतक फैले हुए कानवाले) तथा घोरलोहमुख (लोहेके समान काले एवं भयंकर मुखवाले) हैं, जो एक ही पैरके होते हुए भी वेगपूर्वक चलनेवाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूचीके अग्रभागकी भाँति तीखी चोटीवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन (सुन्दर), कच्ची मछली खानेवाले, द्वीपवासी तथा जलके भीतर विचरनेवाले किरात हैं, जिनके नीचेका आकार मनुष्य-जैसा और ऊपरकी आकृति व्याघ्रके समान है, ऐसे जो भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो! इन सबके निवासस्थानोंमें जाकर तुम्हें सीता तथा रावणकी खोज करनी चाहिये॥ २६—२८/

गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च॥ २९॥

‘जिन द्वीपोंमें पर्वतोंपर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्रको तैरकर या नाव आदिके द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानोंमें सीताको ढूँढ़ना चाहिये॥ २९॥

यत्नवन्तो यवद्वीपं सप्तराजोपशोभितम्।

सुवर्णरूप्यकद्वीपं सुवर्णाकरमण्डितम्॥ ३०॥

‘इसके सिवा तुमलोग यत्नशील होकर सात राज्योंसे सुशोभित यवद्वीप (जावा), सुवर्णद्वीप (सुमात्रा) तथा रूप्यकद्वीपमें भी जो सुवर्णकी खानोंसे सुशोभित हैं, ढूँढ़नेका प्रयत्न करो॥ ३०॥

यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वत:।

दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवित:॥ ३१॥

‘यवद्वीपको लाँघकर आगे जानेपर एक शिशिर नामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं। वह पर्वत अपने उच्च शिखरसे स्वर्गलोकका स्पर्श करता-सा जान पड़ता है॥ ३१॥

एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च।

मार्गध्वं सहिता: सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम्॥ ३२॥

‘इन सब द्वीपोंके पर्वतों तथा शिशिर पर्वतके दुर्गम प्रदेशोंमें, झरनोंके आस-पास और जंगलोंमें तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीताका अन्वेषण करो॥ ३२॥

ततो रक्तजलं प्राप्य शोणाख्यं शीघ्रवाहिनम्।

गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम्॥ ३३॥

तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ ३४॥

‘तदनन्तर समुद्रके उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जलसे भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होनेवाले शोण नामक नदके तटपर पहुँच जाओगे। उसके तटवर्ती रमणीय तीर्थों और विचित्र वनोंमें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीताके साथ रावणकी खोज करना॥ ३३-३४॥

पर्वतप्रभवा नद्य: सुभीमबहुनिष्कुटा:।

मार्गितव्या दरीमन्त: पर्वताश्च वनानि च॥ ३५॥

‘पर्वतोंसे निकली हुई बहुत-सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटोंपर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे। साथ ही वहाँ बहुत-सी गुफाओंवाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे। उन सबमें सीताका पता लगाना चाहिये॥ ३५॥

तत: समुद्रद्वीपांश्च सुभीमान् द्रष्टुमर्हथ।

ऊर्मिमन्तं महारौद्रं क्रोशन्तमनिलोद्धतम्॥ ३६॥

‘तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशोंसे परे जाकर तुम इक्षुरससे परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपोंको देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं। इक्षुरसका वह समुद्र महाभयंकर है। उसमें हवाके वेगसे उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ-सा जान पड़ता है॥ ३६॥

तत्रासुरा महाकायाश्छायां गृह्णन्ति नित्यश:।

ब्रह्मणा समनुज्ञाता दीर्घकालं बुभुक्षिता:॥ ३७॥

‘उस समुद्रमें बहुत-से विशालकाय असुर निवास करते हैं। वे बहुत दिनोंके भूखे होते हैं और छाया पकड़कर ही प्राणियोंको अपने पास खींच लेते हैं। यही उनका नित्यका आहार है। इसके लिये उन्हें ब्रह्माजीसे अनुमति मिल चुकी है॥ ३७॥

तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम्।

अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम्॥ ३८॥

ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम्।

गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम्॥ ३९॥

‘इक्षुरसका वह समुद्र काले मेघके समान श्याम दिखायी देता है। बड़े-बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं। उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है। विशेष उपायोंसे उस महासागरके पार जाकर तुम लाल रंगके जलसे भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्रके तटपर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीपके चिह्नभूत कूटशाल्मली नामक विशाल वृक्षका दर्शन करोगे॥ ३८-३९॥

गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम्।

तत्र कैलाससंकाशं विहितं विश्वकर्मणा॥ ४०॥

‘उसके पास ही विश्वकर्माका बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल एवं विशाल है॥ ४०॥

तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसा:।

शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहा:॥ ४१॥

‘उस द्वीपमें पर्वतके समान शरीरवाले भयंकर मंदेह नामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरासमुद्रके मध्यवर्ती शैल-शिखरोंपर लटकते रहते हैं। वे अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा भयदायक हैं॥ ४१॥

ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं प्रति।

अभितप्ता: स्म सूर्येण लम्बन्ते स्म पुन: पुन:॥ ४२॥

निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसा:।

‘प्रतिदिन सूर्योदयके समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्यसे जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डलके तापसे संतप्त तथा ब्रह्मतेजसे निहत हो सुरा-समुद्रके जलमें गिर पड़ते हैं। वहाँसे फिर जीवित हो उन्हीं शैल-शिखरोंपर लटक जाते हैं। उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है॥ ४२/

तत: पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ४३॥

‘शाल्मलिद्वीप एवं सुरा-समुद्रसे आगे बढ़नेपर (क्रमश: घृत और दधिके समुद्र प्राप्त होंगे। वहाँ सीताकी खोज करनेके पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब) सफेद बादलोंकी-सी आभावाले क्षीरसमुद्रका दर्शन करोगे॥ ४३॥

गत्वा द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभि:।

तस्य मध्ये महान् श्वेतो ऋषभो नाम पर्वत:॥ ४४॥

‘दुर्धर्ष वानरो! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरोंसे युक्त क्षीरसागरको इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियोंके हार पहन रखे हों। उस सागरके बीचमें ऋषभ नामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्णका है॥

दिव्यगन्धै: कुसुमितैराचितैश्च नगैर्वृत:।

सरश्च राजतै: पद्मैर्ज्वलितैर्हेमकेसरै:॥ ४५॥

नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसै: समाकुलम्।

‘उस पर्वतपर सब ओर बहुत-से वृक्ष भरे हुए हैं, जो फूलोंसे सुशोभित तथा दिव्य गन्धसे सुवासित हैं। उसके ऊपर सुदर्शन नामका एक सरोवर है, जिसमें चाँदीके समान श्वेत रंगवाले कमल खिले हुए हैं। उन कमलोंके केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीप्तिसे दमकते रहते हैं। वह सरोवर राजहंसोंसे भरा रहता है॥ ४५/

विबुधाश्चारणा यक्षा: किंनराश्चाप्सरोगणा:॥ ४६॥

हृष्टा: समधिगच्छन्ति नलिनीं तां रिरंसव:।

‘देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ जल-विहार करनेके लिये वहाँ आया करती हैं॥ ४६/

क्षीरोदं समतिक्रम्य तदा द्रक्ष्यथ वानरा:॥ ४७॥

जलोदं सागरं शीघ्रं सर्वभूतभयावहम्।

तत्र तत्कोपजं तेज: कृतं हयमुखं महत्॥ ४८॥

‘वानरो! क्षीरसागर लाँघकर जब तुमलोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जलसे भरे हुए समुद्रको देखोगे। वह महासागर समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला है। उसमें ब्रह्मर्षि और्वके कोपसे प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है॥ ४७-४८॥

अस्याहुस्तन्महावेगमोदनं सचराचरम्।

तत्र विक्रोशतां नादो भूतानां सागरौकसाम्।

श्रूयते चासमर्थानां दृष्ट्वाभूद् वडवामुखम्॥ ४९॥

‘उस समुद्रमें जो चराचर प्राणियोंसहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्निका आहार बताया जाता है। वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतनके भयसे चीखते-चिल्लाते हुए समुद्रनिवासी असमर्थ प्राणियोंका आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है॥ ४९॥

स्वादूदस्योत्तरे तीरे योजनानि त्रयोदश।

जातरूपशिलो नाम सुमहान् कनकप्रभ:॥ ५०॥

‘स्वादिष्ट जलसे भरे हुए उस समुद्रके उत्तर तेरह योजनकी दूरीपर सुवर्णमयी शिलाओंसे सुशोभित, कनककी कमनीय कान्ति धारण करनेवाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है॥ ५०॥

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्।

पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानरा:॥ ५१॥

आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वदेवनमस्कृतम्।

सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम्॥ ५२॥

‘वानरो! उसके शिखरपर इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त बैठे दिखायी देंगे। उनका श्रीविग्रह चन्द्रमाके समान गौरवर्णका है। वे सर्प जातिके हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओंके तुल्य है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान हैं और शरीर नील वस्त्रसे आच्छादित है। उन अनन्तदेवके सहस्र मस्तक हैं॥

त्रिशिरा: काञ्चन: केतुस्तालस्तस्य महात्मन:।

स्थापित: पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिक:॥ ५३॥

‘पर्वतके ऊपर उन महात्माकी ताड़के चिह्नसे युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है। उस ध्वजाकी तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधारभूमिपर वेदी बनी हुई है। इस तरह उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती है॥ ५३॥

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरै:।

तत: परं हेममय: श्रीमानुदयपर्वत:॥ ५४॥

‘यही तालध्वज पूर्व दिशाकी सीमाके सूचक-चिह्नके रूपमें देवताओंद्वारा स्थापित किया गया है। उसके बाद सुवर्णमय उदयपर्वत है, जो दिव्य शोभासे सम्पन्न है॥ ५४॥

तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता।

जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका॥ ५५॥

‘उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है। उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है। उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है॥ ५५॥

सालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितै:।

जातरूपमयैर्दिव्यै: शोभते सूर्यसंनिभै:॥ ५६॥

‘वहाँके साल, ताल, तमाल और फूलोंसे लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षोंसे उदयगिरिकी बड़ी शोभा होती है॥ ५६॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्।

शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम्॥ ५७॥

‘उस सौ योजन लंबे उदयगिरिके शिखरपर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है॥ ५७॥

तत्र पूर्वं पदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे।

द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तम:॥ ५८॥

‘पूर्वकालमें वामन अवतारके समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखरपर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वतके शिखरपर रखा था॥ ५८॥

उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपं दिवाकर:।

दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम्॥ ५९॥

‘सूर्यदेव उत्तरसे घूमकर जम्बूद्वीपकी परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे ‘सौमनस’ नामक शिखरपर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीपनिवासियोंको उनका अधिक स्पष्टताके साथ दर्शन होता है॥ ५९॥

तत्र वैखानसा नाम वालखिल्या महर्षय:।

प्रकाशमाना दृश्यन्ते सूर्यवर्णास्तपस्विन:॥ ६०॥

‘उस सौमनस नामक शिखरपर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्यके समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं॥ ६०॥

अयं सुदर्शनो द्वीप: पुरो यस्य प्रकाशते।

तस्म‌िंस्तेजश्च चक्षुश्च सर्वप्राणभृतामपि॥ ६१॥

‘यह उदयगिरिके सौमनस शिखरके सामनेका द्वीप सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखरपर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीपके समस्त प्राणियोंका तेजसे सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रोंको प्रकाश प्राप्त होता है (यही इस द्वीपके ‘सुदर्शन’ नाम होनेका कारण है)॥ ६१॥

शैलस्य तस्य पृष्ठेषु कन्दरेषु वनेषु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ ६२॥

‘उदयाचलके पृष्ठभागोंमें, कन्दराओंमें तथा वनोंमें भी तुम्हें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीतासहित रावणका पता लगाना चाहिये॥ ६२॥

काञ्चनस्य च शैलस्य सूर्यस्य च महात्मन:।

आविष्टा तेजसा संध्या पूर्वा रक्ता प्रकाशते॥ ६३॥

‘उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेवके तेजसे व्याप्त हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्णकी प्रभासे प्रकाशित होती है॥ ६३॥

पूर्वमेतत् कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च।

सूर्यस्योदयनं चैव पूर्वा ह्येषा दिगुच्यते॥ ६४॥

‘सूर्यके उदयका यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजीने बनाया है; अत: यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोकका द्वार है (ऊपरके लोकोंमें रहनेवाले प्राणी इसी द्वारसे भूलोकमें प्रवेश करते हैं तथा भूलोकके प्राणी इसी द्वारसे ब्रह्मलोकमें जाते हैं)। पहले इसी दिशामें इस द्वारका निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं॥ ६४॥

तस्य शैलस्य पृष्ठेषु निर्झरेषु गुहासु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ ६५॥

‘उदयाचलकी घाटियों, झरनों और गुफाओंमें यत्र-तत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणका अन्वेषण करना चाहिये॥ ६५॥

तत: परमगम्या स्याद् दिक्पूर्वा त्रिदशावृता।

रहिता चन्द्रसूर्याभ्यामदृश्या तमसावृता॥ ६६॥

‘इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है। उधर देवता रहते हैं। उस ओर चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश न होनेसे वहाँकी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न एवं अदृश्य है॥ ६६॥

शैलेषु तेषु सर्वेषु कन्दरेषु नदीषु च।

ये च नोक्ता मयोद्देशा विचेया तेषु जानकी॥ ६७॥

‘उदयाचलके आस-पासके जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानोंका मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकीकी खोज करनी चाहिये॥ ६७॥

एतावद् वानरै: शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवा:।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्तत: परम्॥ ६८॥

‘वानरशिरोमणियो! केवल उदयगिरितक ही वानरोंकी पहुँच हो सकती है। इससे आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न देश आदिकी कोई सीमा ही है। अत: आगेकी भूमिके बारेमें मुझे कुछ भी मालूम नहीं है॥ ६८॥

अभिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

मासे पूर्णे निवर्तध्वमुदयं प्राप्य पर्वतम्॥ ६९॥

‘तुमलोग उदयाचलतक जाकर सीता और रावणके स्थानका पता लगाना और एक मास पूरा होते-होतेतक लौट आना॥ ६९॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम।

सिद्धार्था: संनिवर्तध्वमधिगम्य च मैथिलीम्॥ ७०॥

‘एक महीनेसे अधिक न ठहरना। जो अधिक कालतक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा। मिथिलेशकुमारीका पता लगाकर अन्वेषणका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर अवश्य लौट आना॥ ७०॥

महेन्द्रकान्तां वनषण्डमण्डितां

दिशं चरित्वा निपुणेन वानरा:।

अवाप्य सीतां रघुवंशजप्रियां

ततो निवृत्ता: सुखिनो भविष्यथ॥ ७१॥

‘वानरो! वनसमूहसे अलंकृत पूर्व दिशामें अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका समाचार जानकर तुम वहाँसे लौट आओ। इससे तुम सुखी होओगे’॥ ७१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४०॥

 

एकचत्वारिंश: सर्ग:

सुग्रीवका दक्षिण दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरोंको भेजना

तत: प्रस्थाप्य सुग्रीवस्तन्महद्वानरं बलम्।

दक्षिणां प्रेषयामास वानरानभिलक्षितान्॥ १॥

इस प्रकार वानरोंकी बहुत बड़ी सेनाको पूर्व दिशामें प्रस्थापित करके सुग्रीवने दक्षिण दिशाकी ओर चुने हुए वानरोंको, जो भलीभाँति परख लिये गये थे, भेजा॥ १॥

नीलमग्निसुतं चैव हनूमन्तं च वानरम्।

पितामहसुतं चैव जाम्बवन्तं महौजसम्॥ २॥

सुहोत्रं च शरारिं च शरगुल्मं तथैव च।

गजं गवाक्षं गवयं सुषेणं वृषभं तथा॥ ३॥

मैन्दं च द्विविदं चैव सुषेणं गन्धमादनम्।

उल्कामुखमनङ्गं च हुताशनसुतावुभौ॥ ४॥

अङ्गदप्रमुखान् वीरान् वीर: कपिगणेश्वर:।

वेगविक्रमसम्पन्नान् संदिदेश विशेषवित्॥ ५॥

अग्निपुत्र नील, कपिवर हनुमान्‌जी, ब्रह्माजीके महाबली पुत्र जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारि, शरगुल्म, गज, गवाक्ष, गवय, सुषेण* (प्रथम), वृषभ, मैन्द, द्विविद, सुषेण (द्वितीय), गन्धमादन, हुताशनके दो पुत्र उल्कामुख और अनङ्ग (असङ्ग) तथा अङ्गद आदि प्रधान-प्रधान वीरोंको, जो महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न थे, विशेषज्ञ वानरराज सुग्रीवने दक्षिणकी ओर जानेकी आज्ञा दी॥ २—५॥

तेषामग्रेसरं चैव बृहद्बलमथाङ्गदम्।

विधाय हरिवीराणामादिशद् दक्षिणां दिशम्॥ ६॥

महान् बलशाली अङ्गदको उन समस्त वानर वीरोंका अगुआ बनाकर उन्हें दक्षिण दिशामें सीताकी खोजका भार सौंपा॥ ६॥

ये केचन समुद्देशास्तस्यां दिशि सुदुर्गमा:।

कपीश: कपिमुख्यानां स तेषां समुदाहरत्॥ ७॥

उस दिशामें जो कोई भी स्थान अत्यन्त दुर्गम थे, उनका भी कपिराज सुग्रीवने उन श्रेष्ठ वानरोंको परिचय दिया133॥ ७॥

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलतायुतम्।

नर्मदां च नदीं रम्यां महोरगनिषेविताम्॥ ८॥

ततो गोदावरीं रम्यां कृष्णवेणीं महानदीम्।

वरदां च महाभागां महोरगनिषेविताम्।

मेखलानुत्कलांश्चैव दशार्णनगराण्यपि॥ ९॥

आब्रवन्तीमवन्तीं च सर्वमेवानुपश्यत।

वे बोले—‘वानरो! तुमलोग भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित सहस्रों शिखरोंवाले विन्ध्यपर्वत, बड़े-बड़े नागोंसे सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े-बड़े नागोंसे सेवित महाभागा वरदा आदि नदियोंके तटोंपर और मेखल (मेकल), उत्कल एवं दशार्ण देशके नगरोंमें तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरीमें भी सब जगह सीताकी खोज करो॥ ८-९/

विदर्भानृष्टिकांश्चैव रम्यान् माहिषकानपि॥ १०॥

तथा वङ्गान् कलिङ्गांश्च कौशिकांश्च समन्तत:।

अन्वीक्ष्य दण्डकारण्यं सपर्वतनदीगुहम्॥ ११॥

नदीं गोदावरीं चैव सर्वमेवानुपश्यत।

तथैवान्ध्रांश्च पुण्ड्रांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च केरलान्॥ १२॥

‘इसी प्रकार विदर्भ, ऋष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग134, कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशोंमें सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओंसहित समूचे दण्डकारण्यमें छानबीन करना। वहाँ जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना। इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशोंमें भी ढूँढ़ना॥

अयोमुखश्च गन्तव्य: पर्वतो धातुमण्डित:।

विचित्रशिखर: श्रीमांश्चित्रपुष्पितकानन:॥ १३॥

सुचन्दनवनोद्देशो मार्गितव्यो महागिरि:।

‘तदनन्तर अनेक धातुओंसे अलंकृत अयोमुख135 (मलय) पर्वतपर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं। वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननोंसे युक्त है। उसके सभी स्थानोंमें सुन्दर चन्दनके वन हैं। उस महापर्वत मलयपर सीताकी अच्छी तरह खोज करना॥

ततस्तामापगां दिव्यां प्रसन्नसलिलाशयाम्॥ १४॥

तत्र द्रक्ष्यथ कावेरीं विहृतामप्सरोगणै:।

‘तत्पश्चात् स्वच्छ जलवाली दिव्य नदी कावेरीको देखना, जहाँ अप्सराएँ विहार करती हैं॥ १४/

तस्यासीनं नगस्याग्रे मलयस्य महौजसम्॥ १५॥

द्रक्ष्यथादित्यसंकाशमगस्त्यमृषिसत्तमम् ।

‘उस प्रसिद्ध मलयपर्वतके शिखरपर बैठे हुए सूर्यके समान महान् तेजसे सम्पन्न मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यका136 दर्शन करना॥ १५/

ततस्तेनाभ्यनुज्ञाता: प्रसन्नेन महात्मना॥ १६॥

ताम्रपर्णीं ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम्।

‘इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मासे आज्ञा लेकर ग्राहोंसे सेवित महानदी ताम्रपर्णीको पार करना॥ १६/

सा चन्दनवनैश्चित्रै: प्रच्छन्नद्वीपवारिणी॥ १७॥

कान्तेव युवती कान्तं समुद्रमवगाहते।

‘उसके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आच्छादित हैं; अत: वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है॥ १७/

ततो हेममयं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम्॥ १८॥

युक्तं कवाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानरा:।

‘वानरो! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुमलोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर137 लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियोंसे विभूषित एवं दिव्य है॥

तत: समुद्रमासाद्य सम्प्रधार्यार्थनिश्चयम्॥ १९॥

अगस्त्येनान्तरे तत्र सागरे विनिवेशित:।

चित्रसानुनग: श्रीमान् महेन्द्र: पर्वतोत्तम:॥ २०॥

जातरूपमय: श्रीमानवगाढो महार्णवम्।

‘तत्पश्चात् समुद्रके तटपर जाकर उसे पार करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका भलीभाँति निश्चय करके उसका पालन करना। महर्षि अगस्त्यने समुद्रके भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वतको स्थापित किया है, जो महेन्द्रगिरिके नामसे विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँके वृक्ष विचित्र शोभासे सम्पन्न हैं। वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्रके भीतर गहराईतक घुसा हुआ है॥

नानाविधैर्नगै: फुल्लैर्लताभिश्चोपशोभितम्॥ २१॥

देवर्षियक्षप्रवरैरप्सरोभिश्च शोभितम्।

सिद्धचारणसङ्घैश्च प्रकीर्णं सुमनोरमम्॥ २२॥

तमुपैति सहस्राक्ष: सदा पर्वसु पर्वसु।

‘नाना प्रकारके खिले हुए वृक्ष और लताएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती हैं। देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओंकी उपस्थितिसे उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है। सिद्धों और चारणोंके समुदाय वहाँ सब ओर फैले रहते हैं। इन सबके कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रत्येक पर्वके दिन उस पर्वतपर पदार्पण करते हैं॥ २१-२२/

द्वीपस्तस्यापरे पारे शतयोजनविस्तृत:॥ २३॥

अगम्यो मानुषैर्दीप्तस्तं मार्गध्वं समन्तत:।

तत्र सर्वात्मना सीता मार्गितव्या विशेषत:॥ २४॥

‘उस समुद्रके उस पार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है। वहाँ मनुष्योंकी पहुँच नहीं है। वह जो दीप्तिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीताकी विशेषरूपसे खोज करनी चाहिये॥

स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मन:।

राक्षसाधिपतेर्वास: सहस्राक्षसमद्युते:॥ २५॥

‘वही देश इन्द्रके समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावणका, जो हमारा वध्य है, निवासस्थान है॥ २५॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य मध्ये तस्य तु राक्षसी।

अङ्गारकेति विख्याता छायामाक्षिप्य भोजिनी॥ २६॥

‘उस दक्षिण समुद्रके बीचमें अङ्गारका नामसे प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़कर ही प्राणियोंको खींच लेती और उन्हें खा जाती है॥ २६॥

एवं नि:संशयान् कृत्वा संशयान्नष्टसंशया:।

मृगयध्वं नरेन्द्रस्य पत्नीममिततेजस:॥ २७॥

‘उस लङ्काद्वीपमें जो संदिग्ध स्थान हैं, उन सबमें इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेहरहित समझ लो और तुम्हारे मनका संशय निकल जाय, तब तुम लङ्काद्वीपको भी लाँघकर आगे बढ़ जाना और अमिततेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका अन्वेषण करना॥ २७॥

तमतिक्रम्य लक्ष्मीवान् समुद्रे शतयोजने।

गिरि: पुष्पितको नाम सिद्धचारणसेवित:॥ २८॥

‘लङ्काको लाँघकर आगे बढ़नेपर सौ योजन विस्तृत समुद्रमें एक पुष्पितक नामका पर्वत है, जो परम शोभासे सम्पन्न तथा सिद्धों और चारणोंसे सेवित है॥

चन्द्रसूर्यांशुसंकाश: सागराम्बुसमाश्रय:।

भ्राजते विपुलै: शृङ्गैरम्बरं विलिखन्निव॥ २९॥

‘वह चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान है तथा समुद्रके जलमें गहराईतक घुसा हुआ है। वह अपने विस्तृत शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है॥ २९॥

तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकर:।

श्वेतं राजतमेकं च सेवते यन्निशाकर:।

न तं कृतघ्ना: पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिका:॥ ३०॥

‘उस पर्वतका एक सुवर्णमय शिखर है, जिसका प्रतिदिन सूर्यदेव सेवन करते हैं। उसी प्रकार इसका एक रजतमय श्वेत-शिखर है, जिसका चन्द्रमा सेवन करते हैं। कृतघ्न, नृशंस और नास्तिक पुरुष उस पर्वत-शिखरको नहीं देख पाते हैं॥ ३०॥

प्रणम्य शिरसा शैलं तं विमार्गथ वानरा:।

तमतिक्रम्य दुर्धर्षं सूर्यवान्नाम पर्वत:॥ ३१॥

‘वानरो! तुमलोग मस्तक झुकाकर उस पर्वतको प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीताको ढूँढ़ना। उस दुर्धर्ष पर्वतको लाँघकर आगे बढ़नेपर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा॥

अध्वना दुर्विगाहेन योजनानि चतुर्दश।

ततस्तमप्यतिक्रम्य वैद्युतो नाम पर्वत:॥ ३२॥

‘वहाँ जानेका मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितकसे चौदह योजन दूर है। सूर्यवान्को लाँघकर जब तुमलोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ‘वैद्युत’ नामक पर्वत मिलेगा॥

सर्वकामफलैर्वृक्षै: सर्वकालमनोहरै:।

तत्र भुक्त्वा वरार्हाणि मूलानि च फलानि च॥ ३३॥

मधूनि पीत्वा जुष्टानि परं गच्छत वानरा:।

‘वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे युक्त और सभी ऋतुओंमें मनोहर शोभासे सम्पन्न हैं। वानरो! उनसे सुशोभित वैद्युत पर्वतपर उत्तम फल-मूल खाकर और सेवन करने योग्य मधु पीकर तुमलोग आगे जाना॥

तत्र नेत्रमन:कान्त: कुञ्जरो नाम पर्वत:॥ ३४॥

अगस्त्यभवनं यत्र निर्मितं विश्वकर्मणा।

‘फिर कुञ्जर नामक पर्वत दिखायी देगा, जो नेत्रों और मनको भी अत्यन्त प्रिय लगनेवाला है। उसके ऊपर विश्वकर्माका बनाया हुआ महर्षि अगस्त्यका138 एक सुन्दर भवन है॥ ३४॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्॥ ३५॥

शरणं काञ्चनं दिव्यं नानारत्नविभूषितम्।

‘कुञ्जर पर्वतपर बना हुआ अगस्त्यका वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित है। उसका विस्तार एक योजनका और ऊँचाई दस योजनकी है॥ ३५॥

तत्र भोगवती नाम सर्पाणामालय: पुरी॥ ३६॥

विशालरथ्या दुर्धर्षा सर्वत: परिरक्षिता।

रक्षिता पन्नगैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषै:॥ ३७॥

‘उसी पर्वतपर सर्पोंकी निवासभूता एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है (यह पातालकी भोगवती पुरीसे भिन्न है)। यह पुरी दुर्जय है। उसकी सड़कें बहुत बड़ी और विस्तृत हैं। वह सब ओरसे सुरक्षित है। तीखी दाढ़वाले महाविषैले भयंकर सर्प उसकी रक्षा करते हैं॥ ३६-३७॥

सर्पराजो महाघोरो यस्यां वसति वासुकि:।

निर्याय मार्गितव्या च सा च भोगवती पुरी॥ ३८॥

‘उस भोगवती पुरीमें महाभयंकर सर्पराज वासुकि निवास करते हैं (ये योगशक्तिसे अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियोंमें एक साथ रह सकते हैं)। तुम्हें विशेषरूपसे उस भोगवती पुरीमें प्रवेश करके वहाँ सीताकी खोज करनी चाहिये॥ ३८॥

तत्र चानन्तरोद्देशा ये केचन समावृता:।

तं च देशमतिक्रम्य महानृषभसंस्थिति:॥ ३९॥

‘उस पुरीमें जो गुप्त एवं व्यवधानरहित स्थान हों, उन सबमें सीताका अन्वेषण करना चाहिये। उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर तुम्हें ऋषभ नामक महान् पर्वत मिलेगा॥ ३९॥

सर्वरत्नमय: श्रीमानृषभो नाम पर्वत:।

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम्॥ ४०॥

दिव्यमुत्पद्यते यत्र तच्चैवाग्निसमप्रभम्।

न तु तच्चन्दनं दृष्ट्वा स्प्रष्टव्यं तु कदाचन॥ ४१॥

‘वह शोभाशाली ऋषभ पर्वत सम्पूर्ण रत्नोंसे भरा हुआ है। वहाँ गोशीर्षक, पद्मक, हरिश्याम आदि नामोंवाला दिव्य चन्दन उत्पन्न होता है। वह चन्दनवृक्ष अग्निके समान प्रज्वलित होता रहता है। उस चन्दनको देखकर कदापि तुम्हें उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये॥

रोहिता नाम गन्धर्वा घोरं रक्षन्ति तद्वनम्।

तत्र गन्धर्वपतय: पञ्च सूर्यसमप्रभा:॥ ४२॥

‘क्योंकि ‘रोहित’ नामवाले गन्धर्व उस घोर वनकी रक्षा करते हैं। वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् पाँच गन्धर्वराज रहते हैं॥ ४२॥

शैलूषो ग्रामणी: शिक्ष: शुको बभ्रुस्तथैव च।

रविसोमाग्निवपुषां निवास: पुण्यकर्मणाम्॥ ४३॥

अन्ते पृथिव्या दुर्धर्षास्तत: स्वर्गजित: स्थिता:।

‘उनके नाम ये हैं—शैलूष, ग्रामणी, शिक्ष (शिग्रु), शुक और बभ्रु। उस ऋषभसे आगे पृथिवीकी अन्तिम सीमापर सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी पुण्यकर्मा पुरुषोंका निवास-स्थान है। अत: वहाँ दुर्धर्ष स्वर्गविजयी (स्वर्गके अधिकारी) पुरुष ही वास करते हैं॥ ४३/

तत: परं न व: सेव्य: पितृलोक: सुदारुण:॥ ४४॥

राजधानी यमस्यैषा कष्टेन तमसाऽऽवृता।

‘उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; वहाँ तुम लोगोंको नहीं जाना चाहिये। यह भूमि यमराजकी राजधानी है, जो कष्टप्रद अन्धकारसे आच्छादित है॥

एतावदेव युष्माभिर्वीरा वानरपुंगवा:।

शक्यं विचेतुं गन्तुं वा नातो गतिमतां गति:॥ ४५॥

‘वीर वानरपुङ्गवो! बस, दक्षिण दिशामें इतनी ही दूरतक तुम्हें जाना और खोजना है। उससे आगे पहुँचना असम्भव है; क्योंकि उधर जंगम प्राणियोंकी गति नहीं है॥

सर्वमेतत् समालोक्य यच्चान्यदपि दृश्यते।

गतिं विदित्वा वैदेह्या: संनिवर्तितुमर्हथ॥ ४६॥

‘इन सब स्थानोंमें अच्छी तरह देख-भाल करके और भी जो स्थान अन्वेषणके योग्य दिखायी दे, वहाँ भी विदेहकुमारीका पता लगाना; तदनन्तर तुम सबको लौट आना चाहिये॥ ४६॥

यश्च मासान्निवृत्तोऽग्रे दृष्टा सीतेति वक्ष्यति।

मत्तुल्यविभवो भोगै: सुखं स विहरिष्यति॥ ४७॥

‘जो एक मास पूर्ण होनेपर सबसे पहले यहाँ आकर यह कहेगा कि ‘मैंने सीताजीका दर्शन किया है’ वह मेरे समान वैभवसे सम्पन्न हो भोग्य-पदार्थोंका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक विहार करेगा॥ ४७॥

तत: प्रियतरो नास्ति मम प्राणाद् विशेषत:।

कृतापराधो बहुशो मम बन्धुर्भविष्यति॥ ४८॥

‘उससे बढ़कर प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं होगा। वह मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारा होगा तथा अनेक बार अपराध किया हो तो भी वह मेरा बन्धु होकर रहेगा॥ ४८॥

अमितबलपराक्रमा भवन्तो

विपुलगुणेषु कुलेषु च प्रसूता:।

मनुजपतिसुतां यथा लभध्वं

तदधिगुणं पुरुषार्थमारभध्वम्॥ ४९॥

‘तुम सबके बल और पराक्रम असीम हैं। तुम विशेष गुणशाली उत्तम कुलोंमें उत्पन्न हुए हो। राजकुमारी सीताका जिस प्रकार भी पता मिल सके, उसके अनुरूप उच्च कोटिका पुरुषार्थ आरम्भ करो’॥ ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१॥

 

द्विचत्वारिंश: सर्ग:

सुग्रीवका पश्चिम दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरोंको वहाँ भेजना

अथ प्रस्थाप्य स हरीन् सुग्रीवो दक्षिणां दिशम्।

अब्रवीन्मेघसंकाशं सुषेणं नाम वानरम्॥ १॥

ताराया: पितरं राजा श्वशुरं भीमविक्रमम्।

अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमभिगम्य प्रणम्य च॥ २॥

महर्षिपुत्रं मारीचमर्चिष्मन्तं महाकपिम्।

वृतं कपिवरै: शूरैर्महेन्द्रसदृशद्युतिम्॥ ३॥

बुद्धिविक्रमसम्पन्नं वैनतेयसमद्युतिम्।

मरीचिपुत्रान् मारीचानर्चिर्माल्यान् महाबलान्॥ ४॥

ऋषिपुत्रांश्च तान् सर्वान् प्रतीचीमादिशद् दिशम्।

द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां कपीनां कपिसत्तमा:॥ ५॥

सुषेणप्रमुखा यूयं वैदेहीं परिमार्गथ।

दक्षिण दिशाकी ओर वानरोंको भेजनेके पश्चात् राजा सुग्रीवने ताराके पिता और अपने श्वशुर ‘सुषेण’ नामक वानरके पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया। सुषेण मेघके समान काले और भयंकर पराक्रमी थे। उनके सिवा, महर्षि मरीचिके पुत्र महाकपि अर्चिष्मान् भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे हुए थे। उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़के समान थी। वे बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके अतिरिक्त मरीचिके पुत्र मारीच नामवाले वानर भी थे, जो महाबली और ‘अर्चिर्माल्य’ नामसे प्रसिद्ध थे। इनके सिवा और भी बहुत-से ऋषिकुमार थे, जो वानररूपमें वहाँ विराजमान थे। सुषेणके साथ उन सबको सुग्रीवने पश्चिम दिशाकी ओर जानेकी आज्ञा दी और कहा—‘कपिवरो! आप सब लोग दो लाख वानरोंको साथ ले सुषेणजीकी प्रधानतामें पश्चिमको जाइये और विदेहनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये॥ १—५/

सौराष्ट्रान् सहबाह्लीकांश्चन्द्रचित्रांस्तथैव च॥ ६॥

स्फीताञ्जनपदान् रम्यान् विपुलानि पुराणि च।

पुंनागगहनं कुक्षिं बकुलोद्दालकाकुलम्॥ ७॥

तथा केतकषण्डांश्च मार्गध्वं हरिपुङ्गवा:।

‘श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बाह्लीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े-बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षोंसे भरे हुए कुक्षिदेशमें एवं केवड़ेके वनोंमें सीताकी खोज करो॥ ६-७/

प्रत्यक्स्रोतोवहाश्चैव नद्य: शीतजला: शिवा:॥ ८॥

तापसानामरण्यानि कान्तारगिरयश्च ये।

‘पश्चिमकी ओर बहनेवाली शीतल जलसे सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनोंके वनों तथा दुर्गम पर्वतोंमें भी विदेहकुमारीका पता लगाओ॥ ८/

तत्र स्थलीर्मरुप्राया अत्युच्चशिशिरा: शिला:॥ ९ ॥

गिरिजालावृतां दुर्गां मार्गित्वा पश्चिमां दिशम्।

तत: पश्चिममागम्य समुद्रं द्रष्टुमर्हथ॥ १०॥

तिमिनक्राकुलजलं गत्वा द्रक्ष्यथ वानरा:।

‘पश्चिम दिशामें प्राय: मरुभूमि है। अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओंसे घिरे हुए बहुत-से दुर्गम प्रदेश हैं। उन सभी स्थानोंमें सीताकी खोज करते हुए क्रमश: आगे बढ़कर पश्चिम समुद्रतक जाना और वहाँके प्रत्येक स्थानका निरीक्षण करना। वानरो! समुद्रका जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहोंसे भरा हुआ है। वहाँ सब ओर देख-भाल करना॥ ९-१०/

तत: केतकषण्डेषु तमालगहनेषु च॥ ११॥

कपयो विहरिष्यन्ति नारिकेलवनेषु च।

तत्र सीतां च मार्गध्वं निलयं रावणस्य च॥ १२॥

‘समुद्रके तटपर केवड़ोंके कुञ्जोंमें, तमालके काननोंमें तथा नारियलके वनोंमें तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे। वहाँ तुमलोग सीताको खोजना और रावणके निवास-स्थानका पता लगाना॥

वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च।

मुरवीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम्॥ १३॥

अवन्तीमङ्गलेपां च तथा चालक्षितं वनम्।

राष्ट्राणि च विशालानि पत्तनानि ततस्तत:॥ १४॥

समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनोंमें भी उन्हें ढूँढ़ना चाहिये। मुरवीपत्तन (मोरवी) तथा रमणीय जटापुरमें, अवन्ती139 तथा अङ्गलेपापुरीमें, अलक्षित वनमें और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरोंमें जहाँ-तहाँ घूमकर पता लगाना॥

सिन्धुसागरयोश्चैव संगमे तत्र पर्वत:।

महान् सोमगिरिर्नाम शतशृङ्गो महाद्रुम:॥ १५॥

तत्र प्रस्थेषु रम्येषु सिंहा: पक्षगमा: स्थिता:।

तिमिमत्स्यगजांश्चैव नीडान्यारोपयन्ति ते॥ १६॥

‘सिंधु-नद और समुद्रके संगमपर सोमगिरि नामक एक महान् पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं। वह पर्वत ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंसे भरा है। उसकी रमणीय चोटियोंपर सिंह नामक पक्षी रहते हैं। जो तिमि नामवाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियोंको भी अपने घोंसलोंमें उठा लाते हैं॥

तानि नीडानि सिंहानां गिरिशृङ्गगताश्च ये।

दृप्तास्तृप्ताश्च मातङ्गास्तोयदस्वननि:स्वना:॥ १७॥

विचरन्ति विशालेऽस्मॣंस्तोयपूर्णे समन्तत:।

‘सिंह नामक पक्षियोंके उन घोंसलोंमें पहुँचकर उस पर्वत-शिखरपर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंहसे सम्मानित होनेके कारण गर्वका अनुभव करते और मन-ही-मन संतुष्ट होते हैं। इसीलिये मेघोंकी गर्जनाके समान शब्द करते हुए उस पर्वतके जलपूर्ण विशाल शिखरपर चारों ओर विचरते रहते हैं॥

तस्य शृङ्गं दिवस्पर्शं काञ्चनं चित्रपादपम्॥ १८॥

सर्वमाशु विचेतव्यं कपिभि: कामरूपिभि:।

‘सोमगिरिका गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है। उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं। इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरोंको चाहिये कि वहाँके सब स्थानोंको शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें॥ १८/

कोटिं तत्र समुद्रस्य काञ्चनीं शतयोजनाम्॥ १९॥

दुर्दर्शां पारियात्रस्य गत्वा द्रक्ष्यथ वानरा:।

‘वहाँसे आगे समुद्रके बीचमें पारियात्र पर्वतका सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है। वानरो! उसका दर्शन दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वहाँ जाकर तुम्हें सीताकी खोज करनी चाहिये॥

कोट्यस्तत्र चतुर्विंशद् गन्धर्वाणां तरस्विनाम्॥ २०॥

वसन्त्यग्निनिकाशानां घोराणां कामरूपिणाम्।

पावकार्चि:प्रतीकाशा: समवेता: समन्तत:॥ २१॥

‘पारियात्र पर्वतके शिखरपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं। वे सब-के-सब अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान हैं और सब ओरसे आकर उस पर्वतपर एकत्र हुए हैं॥ २०-२१॥

नात्यासादयितव्यास्ते वानरैर्भीमविक्रमै:।

नादेयं च फलं तस्माद् देशात् किंचित् प्लवङ्गमै:॥ २२॥

‘भयंकर पराक्रमी वानरोंको चाहिये कि वे उन गन्धर्वोंके अधिक निकट न जायँ—उनका कोई अपराध न करें और उस पर्वतशिखरसे कोई फल न लें॥ २२॥

दुरासदा हि ते वीरा: सत्त्ववन्तो महाबला:।

फलमूलानि ते तत्र रक्षन्ते भीमविक्रमा:॥ २३॥

‘क्योंकि वे भयंकर बल-विक्रमसे सम्पन्न धैर्यवान् महाबली वीर गन्धर्व वहाँके फल-मूलोंकी रक्षा करते हैं। उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन है॥ २३॥

तत्र यत्नश्च कर्तव्यो मार्गितव्या च जानकी।

नहि तेभ्यो भयं किंचित् कपित्वमनुवर्तताम्॥ २४॥

‘वहाँ भी जानकीकी खोज करनी चाहिये और उनका पता लगानेके लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये। प्राकृत वानरके स्वभावका अनुसरण करनेवाले तुम्हारी सेनाके वीरोंको उन गन्धर्वोंसे कोई भय नहीं है॥ २४॥

तत्र वैदूर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थित:।

नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरि:॥ २५॥

‘पारियात्र पर्वतके पास ही समुद्रमें वज्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त दिखायी देता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणिके समान नील वर्णका है। वह कठोरतामें वज्रमणि (हीरे) के समान है॥ २५॥

श्रीमान् समुदितस्तत्र योजनानां शतं समम्।

गुहास्तत्र विचेतव्या: प्रयत्नेन प्लवङ्गमा:॥ २६॥

‘वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजनके घेरेमें प्रतिष्ठित है। उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं। वानरो! उस पर्वतपर बहुत-सी गुफाएँ हैं। उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीताका अनुसंधान करना चाहिये॥ २६॥

चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान् नाम पर्वत:।

तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २७॥

‘समुद्रके चतुर्थ भागमें चक्रवान् नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्माने सहस्रार140 चक्रका निर्माण किया था॥ २७॥

तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम्।

आजहार ततश्चक्रं शङ्खं च पुरुषोत्तम:॥ २८॥

‘वहींसे पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवोंका वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे॥ २८॥

तस्य सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ २९॥

‘चक्रवान् पर्वतके रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओंमें भी इधर-उधर वैदेहीसहित रावणका पता लगाना चाहिये॥ २९॥

योजनानि चतु:षष्टिर्वराहो नाम पर्वत:।

सुवर्णशृङ्ग: सुमहानगाधे वरुणालये॥ ३०॥

‘उससे आगे समुद्रकी अगाध जलराशिमें सुवर्णमय शिखरोंवाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजनकी दूरीमें है॥ ३०॥

तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम्।

यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानव:॥ ३१॥

‘वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है॥ ३१॥

तत्र सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ ३२॥

‘उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर तथा वहाँकी विशाल गुफाओंमें सीतासहित रावणकी तलाश करनी चाहिये॥ ३२॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं काञ्चनान्तरदर्शनम्।

पर्वत: सर्वसौवर्णो धाराप्रस्रवणायुत:॥ ३३॥

‘जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराहको लाँघकर आगे बढ़नेपर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं॥ ३३॥

तं गजाश्च वराहाश्च सिंहा व्याघ्राश्च सर्वत:।

अभिगर्जन्ति सततं तेन शब्देन दर्पिता:॥ ३४॥

‘उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जनाकी प्रतिध्वनिके शब्दसे दर्पमें भरकर पुन: दहाड़ने लगते हैं॥ ३४॥

यस्मिन् हरिहय: श्रीमान् महेन्द्र: पाकशासन:।

अभिषिक्त: सुरै राजा मेघो नाम स पर्वत:॥ ३५॥

‘उस पर्वतका नाम है मेघगिरि। जिसपर देवताओंने हरित रंगके अश्ववाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया था॥ ३५॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं महेन्द्रपरिपालितम्।

षष्टिं गिरिसहस्राणि काञ्चनानि गमिष्यथ॥ ३६॥

तरुणादित्यवर्णानि भ्राजमानानि सर्वत:।

जातरूपमयैर्वृक्षै: शोभितानि सुपुष्पितै:॥ ३७॥

‘देवराज इन्द्रद्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघको लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोनेके साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओरसे सूर्यके समान कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलोंसे भरे हुए सुवर्णमय वृक्षोंसे सुशोभित हैं॥ ३७॥

तेषां मध्ये स्थितो राजा मेरुरुत्तमपर्वत:।

आदित्येन प्रसन्नेन शैलो दत्तवर: पुरा॥ ३८॥

तेनैवमुक्त: शैलेन्द्र: सर्व एव त्वदाश्रया:।

मत्प्रसादाद् भविष्यन्ति दिवा रात्रौ च काञ्चना:॥ ३९॥

त्वयि ये चापि वत्स्यन्ति देवगन्धर्वदानवा:।

ते भविष्यन्ति भक्ताश्च प्रभया काञ्चनप्रभा:॥ ४०॥

‘उनके मध्यभागमें पर्वतोंका राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकालमें सूर्यदेवने प्रसन्न होकर वर दिया था। उन्होंने उस शैलराजसे कहा था कि ‘जो दिन-रात तुम्हारे आश्रयमें रहेंगे, वे मेरी कृपासे सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्णके समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जायँगे’॥ ३८—४०॥

विश्वेदेवाश्च वसवो मरुतश्च दिवौकस:।

आगत्य पश्चिमां संध्यां मेरुमुत्तमपर्वतम्॥ ४१॥

आदित्यमुपतिष्ठन्ति तैश्च सूर्योऽभिपूजित:।

अदृश्य: सर्वभूतानामस्तं गच्छति पर्वतम्॥ ४२॥

‘विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकालमें उत्तम पर्वत मेरुपर आकर सूर्यदेवका उपस्थान करते हैं। उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान् सूर्य सब प्राणियोंकी आँखोंसे ओझल होकर अस्ताचलको चले जाते हैं॥ ४१-४२॥

योजनानां सहस्राणि दश तानि दिवाकर:।

मुहूर्तार्धेन तं शीघ्रमभियाति शिलोच्चयम्॥ ४३॥

‘मेरुसे अस्ताचल दस हजार योजनकी दूरीपर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्तमें ही वहाँ पहुँच जाते हैं॥ ४३॥

शृङ्गे तस्य महद्दिव्यं भवनं सूर्यसंनिभम्।

प्रासादगणसम्बाधं विहितं विश्वकर्मणा॥ ४४॥

‘उसके शिखरपर विश्वकर्माका बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देता है। वह अनेक प्रासादोंसे भरा हुआ है॥

शोभितं तरुभिश्चित्रैर्नानापक्षिसमाकुलै:।

निकेतं पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मन:॥ ४५॥

‘नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्त विचित्र-विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह पाशधारी महात्मा वरुणका निवास-स्थान है॥ ४५॥

अन्तरा मेरुमस्तं च तालो दशशिरा महान्।

जातरूपमय: श्रीमान् भ्राजते चित्रवेदिक:॥ ४६॥

‘मेरु और अस्ताचलके बीच एक स्वर्णमय ताड़का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है। उसके दस स्कन्ध (बड़ी शाखाएँ) हैं। उसके नीचेकी वेदी बड़ी विचित्र है। इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है॥ ४६॥

तेषु सर्वेषु दुर्गेषु सरस्सु च सरित्सु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ ४७॥

‘वहाँके उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और सरिताओंमें इधर-उधर सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये॥ ४७॥

यत्र तिष्ठति धर्मज्ञस्तपसा स्वेन भावित:।

मेरुसावर्णिरित्येष ख्यातो वै ब्रह्मणा सम:॥ ४८॥

‘मेरुगिरिपर धर्मके ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्यासे ऊँची स्थितिको प्राप्त हुए हैं। वे प्रजापतिके समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं॥

प्रष्टव्यो मेरुसावर्णिर्महर्षि: सूर्यसंनिभ:।

प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रवृत्तिं मैथिलीं प्रति॥ ४९॥

‘सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णिके चरणोंमें पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम करनेके अनन्तर तुमलोग उनसे मिथिलेशकुमारीका समाचार पूछना॥ ४९॥

एतावज्जीवलोकस्य भास्करो रजनीक्षये।

कृत्वा वितिमिरं सर्वमस्तं गच्छति पर्वतम्॥ ५०॥

‘रात्रिके अन्तमें (प्रात:काल) उदित हुए भगवान् सूर्य जीव-जगत्के इन सभी स्थानोंको अन्धकाररहित (एवं प्रकाशपूर्ण) करके अन्तमें अस्ताचलको चले जाते हैं॥ ५०॥

एतावद् वानरै: शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवा:।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्तत: परम्॥ ५१॥

‘वानरशिरोमणियो! पश्चिम दिशामें इतनी ही दूरतक वानर जा सकते हैं। उसके आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही। अत: वहाँसे आगेकी भूमिके विषयमें मुझे कोई जानकारी नहीं है॥

अवगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।

अस्तं पर्वतमासाद्य पूर्णे मासे निवर्तत॥ ५२॥

‘अस्ताचलतक जाकर रावणके स्थान और सीताका पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ॥

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम।

सहैव शूरो युष्माभि: श्वशुरो मे गमिष्यति॥ ५३॥

‘एक महीनेसे अधिक न ठहरना। जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथसे प्राणदण्ड मिलेगा। तुमलोगोंके साथ मेरे पूजनीय श्वशुरजी भी जायँगे॥ ५३॥

श्रोतव्यं सर्वमेतस्य भवद्भिर्दिष्टकारिभि:।

गुरुरेष महाबाहु: श्वशुरो मे महाबल:॥ ५४॥

‘तुम सब लोग इनकी आज्ञाके अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यानसे सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेणजी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं (अत: तुम्हारे लिये भी गुरुकी भाँति ही आदरणीय हैं)॥ ५४॥

भवन्तश्चापि विक्रान्ता: प्रमाणं सर्व एव हि।

प्रमाणमेनं संस्थाप्य पश्यध्वं पश्चिमां दिशम्॥ ५५॥

‘तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें प्रमाणभूत (विश्वसनीय) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशाकी देखभाल आरम्भ करो॥

दृष्टायां तु नरेन्द्रस्य पत्न्याममिततेजस:।

कृतकृत्या भविष्याम: कृतस्य प्रतिकर्मणा॥ ५६॥

‘अमित तेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका पता लग जानेपर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुक सकेगा॥

अतोऽन्यदपि यत्कार्यं कार्यस्यास्य प्रियं भवेत्।

सम्प्रधार्य भवद्भिश्च देशकालार्थसंहितम्॥ ५७॥

‘अत: इस कार्यके अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजनसे सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आपलोग उसे भी करें’॥ ५७॥

तत: सुषेणप्रमुखा: प्लवङ्गा:

सुग्रीववाक्यं निपुणं निशम्य।

आमन्त्र्य सर्वे प्लवगाधिपं ते

जग्मुर्दिशं तां वरुणाभिगुप्ताम्॥ ५८॥

सुग्रीवकी बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराजकी अनुमति ले वरुणद्वारा सुरक्षित पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये॥ ५८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥

 

त्रिचत्वारिंश: सर्ग:

सुग्रीवका उत्तर दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए शतबलि आदि वानरोंको वहाँ भेजना

तत: संदिश्य सुग्रीव: श्वशुरं पश्चिमां दिशम्।

वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वर:॥ १॥

उवाच राजा सर्वज्ञ: सर्ववानरसत्तम:।

वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा॥ २॥

इस प्रकार अपने श्वशुरको पश्चिम दिशाकी ओर जानेका संदेश दे सर्वज्ञ, सर्व-वानर-शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानरसे श्रीरामचन्द्रजीके हितकी बात बोले—॥ १-२॥

वृत: शतसहस्रेण त्वद्विधानां वनौकसाम्।

वैवस्वतसुतै: सार्धं प्रविष्ट: सर्वमन्त्रिभि:॥ ३॥

दिशं ह्युदीचीं विक्रान्तां हिमशैलावतंसिकाम्।

सर्वत: परिमार्गध्वं रामपत्नीं यशस्विनीम्॥ ४॥

‘पराक्रमी वीर! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरोंको जो यमराजके बेटे हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियोंसहित उस उत्तर दिशामें प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणोंसे विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताका अन्वेषण करो॥ ३-४॥

अस्मिन् कार्ये विनिर्वृत्ते कृते दाशरथे: प्रिये।

ऋणान्मुक्ता भविष्याम: कृतार्थार्थविदां वरा:॥ ५॥

‘अपने मुख्य प्रयोजनको समझनेवाले वीरोंमें श्रेष्ठ वानरो! यदि हमलोगोंके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकारके ऋणसे मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे॥ ५॥

कृतं हि प्रियमस्माकं राघवेण महात्मना।

तस्य चेत्प्रतिकारोऽस्ति सफलं जीवितं भवेत्॥ ६॥

‘महात्मा श्रीरघुनाथजीने हमलोगोंका प्रिय कार्य किया है। उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय॥ ६॥

अर्थिन: कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत्।

तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुन: पूर्वकारिण:॥ ७॥

‘जिसने कोई उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्यके लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्यको सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है। फिर जिसने पहलेके उपकारीके कार्यको सिद्ध किया हो, उसके जीवनकी सफलताके विषयमें तो कहना ही क्या है॥ ७॥

एतां बुद्धिं समास्थाय दृश्यते जानकी यथा।

तथा भवद्भि: कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभि:॥ ८॥

‘इसी विचारका आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहनेवाले तुम सब वानरोंको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीताका पता लग जाय॥ ८॥

अयं हि सर्वभूतानां मान्यस्तु नरसत्तम:।

अस्मासु च गत: प्रीतिं राम: परपुरंजय:॥ ९॥

‘शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियोंके लिये माननीय हैं। हमलोगोंपर भी इनका बहुत प्रेम है॥ ९॥

इमानि बहुदुर्गाणि नद्य: शैलान्तराणि च।

भवन्त: परिमार्गन्तु बुद्धिविक्रमसम्पदा॥ १०॥

‘तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रमके द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियोंके तटोंपर जा-जाकर सीताकी खोज करो॥ १०॥

तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्च शूरसेनांस्तथैव च।

प्रस्थलान् भरतांश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकै:॥ ११॥

काम्बोजयवनांश्चैव शकानां पत्तनानि च।

अन्वीक्ष्य दरदांश्चैव हिमवन्तं विचिन्वथ॥ १२॥

‘उत्तरमें म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुरके आस-पासके प्रान्त), कुरु (दक्षिण कुरु—कुरुक्षेत्रके आस-पासकी भूमि), मद्र, काम्बोज, यवन, शकोंके देशों एवं नगरोंमें भलीभाँति अनुसंधान करके दरद देशमें और हिमालय पर्वतपर ढूँढ़ो॥

लोध्रपद्मकषण्डेषु देवदारुवनेषु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ १३॥

‘वहाँ लोध्र और पद्मककी झाड़ियोंमें तथा देवदारुके जंगलोंमें वैदेहीसहित रावणकी खोज करनी चाहिये॥ १३॥

तत: सोमाश्रमं गत्वा देवगन्धर्वसेवितम्।

कालं नाम महासानुं पर्वतं तं गमिष्यथ॥ १४॥

‘फिर देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित सोमाश्रममें होते हुए ऊँचे शिखरवाले काल नामक पर्वतपर जाओ॥

महत्सु तस्य शैलेषु पर्वतेषु गुहासु च।

विचिन्वत महाभागां रामपत्नीमनिन्दिताम्॥ १५॥

‘उस पर्वतकी शाखाभूत अन्य छोटे-बड़े पर्वतों और उन सबकी गुफाओंमें सती-साध्वी श्रीरामपत्नी महाभागा सीताका अन्वेषण करो॥ १५॥

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं हेमगर्भं महागिरिम्।

तत: सुदर्शनं नाम पर्वतं गन्तुमर्हथ॥ १६॥

‘जिसके भीतर सुवर्णकी खान हैं, उस गिरिराज कालको लाँघकर तुम्हें सुदर्शन नामक महान् पर्वतपर जाना चाहिये॥ १६॥

ततो देवसखो नाम पर्वत: पतगालय:।

नानापक्षिसमाकीर्णो विविधद्रुमभूषित:॥ १७॥

‘उससे आगे बढ़नेपर देवसख नामवाला पहाड़ मिलेगा, जो पक्षियोंका निवासस्थान है। वह भाँति-भाँतिके विहंगमोंसे व्याप्त तथा नाना प्रकारके वृक्षोंसे विभूषित है॥ १७॥

तस्य काननषण्डेषु निर्झरेषु गुहासु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ १८॥

‘उसके वनसमूहों, निर्झरों और गुफाओंमें तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणकी खोज करनी चाहिये॥

तमतिक्रम्य चाकाशं सर्वत: शतयोजनम्।

अपर्वतनदीवृक्षं सर्वसत्त्वविवर्जितम्॥ १९॥

‘वहाँसे आगे बढ़नेपर एक सुनसान मैदान मिलेगा, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत है। वहाँ नदी, पर्वत, वृक्ष और सब प्रकारके जीव-जन्तुओंका अभाव है॥ १९॥

तत्तु शीघ्रमतिक्रम्य कान्तारं रोमहर्षणम्।

कैलासं पाण्डुरं प्राप्य हृष्टा यूयं भविष्यथ॥ २०॥

‘रोंगटे खड़े कर देनेवाले उस दुर्गम प्रान्तको शीघ्रता-पूर्वक लाँघ जानेपर तुम्हें श्वेतवर्णका कैलास पर्वत मिलेगा। वहाँ पहुँचनेपर तुम सब लोग हर्षसे खिल उठोगे॥

तत्र पाण्डुरमेघाभं जाम्बूनदपरिष्कृतम्।

कुबेरभवनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २१॥

‘वहीं विश्वकर्माका बनाया हुआ कुबेरका रमणीय भवन है, जो श्वेत बादलोंके समान प्रतीत होता है। उस भवनको जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित किया गया है॥

विशाला नलिनी यत्र प्रभूतकमलोत्पला।

हंसकारण्डवाकीर्णा अप्सरोगणसेविता॥ २२॥

‘उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है, जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रामें पाये जाते हैं। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल-क्रीड़ा करती हैं॥ २२॥

तत्र वैश्रवणो राजा सर्वलोकनमस्कृत:।

धनदो रमते श्रीमान् गुह्यकै: सह यक्षराट्॥ २३॥

‘वहाँ यक्षोंके स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्वके लिये वन्दनीय और धन देनेवाले हैं, गुह्यकोंके साथ विहार करते हैं॥ २३॥

तस्य चन्द्रनिकाशेषु पर्वतेषु गुहासु च।

रावण: सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्तत:॥ २४॥

‘उस कैलासके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल शाखा-पर्वतोंपर तथा उनकी गुफाओंमें सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये॥ २४॥

क्रौञ्चं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम्।

अप्रमत्तै: प्रवेष्टव्यं दुष्प्रवेशं हि तत् स्मृतम्॥ २५॥

‘इसके बाद क्रौञ्चगिरिपर जाकर वहाँकी अत्यन्त दुर्गम विवररूप गुफामें (जो स्कन्दकी शक्तिसे पर्वतके विदीर्ण होनेके कारण बन गयी है) तुम्हें सावधानीके साथ प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है॥ २५॥

वसन्ति हि महात्मानस्तत्र सूर्यसमप्रभा:।

देवैरभ्यर्थिता: सम्यग् देवरूपा महर्षय:॥ २६॥

‘उस गुफामें सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं। उन देवस्वरूप महर्षियोंकी देवतालोग भी अभ्यर्थना करते हैं॥ २६॥

क्रौञ्चस्य तु गुहाश्चान्या: सानूनि शिखराणि च।

निर्दराश्च नितम्बाश्च विचेतव्यास्ततस्तत:॥ २७॥

क्रौञ्च पर्वतकी और भी बहुत-सी गुफाएँ, अनेकानेक चोटियाँ, शिखर, कन्दराएँ तथा नितम्ब (ढालू प्रदेश) हैं; उन सबमें सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीता और रावणका पता लगाना चाहिये॥ २७॥

अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम्।

न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम्॥ २८॥

‘वहाँसे आगे वृक्षोंसे रहित मानस नामक शिखर है, जहाँ शून्य होनेके कारण कभी पक्षीतक नहीं जाते हैं। कामदेवकी तपस्याका स्थान होनेके कारण वह क्रौञ्चशिखर कामशैलके नामसे विख्यात है। वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसोंका भी कभी जाना नहीं होता है॥ २८॥

स च सर्वैर्विचेतव्य: ससानुप्रस्थभूधर:।

क्रौञ्चं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वत:॥ २९॥

‘शिखरों, घाटियों और शाखापर्वतोंसहित समूचे क्रौञ्चपर्वतकी तुमलोग छानबीन करना। क्रौञ्चगिरिको लाँघकर आगे बढ़नेपर मैनाक पर्वत मिलेगा॥ २९॥

मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयंकृतम्।

मैनाकस्तु विचेतव्य: ससानुप्रस्थकन्दर:॥ ३०॥

‘वहाँ मयदानवका घर है, जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है। तुमलोगोंको शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओंसहित मैनाक पर्वतपर भलीभाँति सीताजीकी खोज करनी चाहिये॥ ३०॥

स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु।

तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम्॥ ३१॥

‘वहाँ यत्र-तत्र घोड़ेके-से मुँहवाली किन्नरियोंके निवासस्थान हैं। उस प्रदेशको लाँघ जानेपर सिद्धसेवित आश्रम मिलेगा॥ ३१॥

सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसा:।

वन्दितव्यास्तत: सिद्धास्तपसा वीतकल्मषा:॥ ३२॥

प्रष्टव्या चापि सीताया: प्रवृत्तिर्विनयान्वितै:।

‘उसमें सिद्ध, वैखानख तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं। तपस्यासे उनके पाप धुल गये हैं। उन सिद्धोंको तुमलोग प्रणाम करना और विनीतभावसे सीताका समाचार पूछना॥ ३२/

हेमपुष्करसंछन्नं तत्र वैखानसं सर:॥ ३३॥

तरुणादित्यसंकाशैर्हंसैर्विचरितं शुभै:।

‘उस आश्रमके पास ‘वैखानस सर’ के नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है, जिसका जल सुवर्णमय कमलोंसे आच्छादित रहता है। उसमें प्रात:कालिक सूर्यके समान सुनहरे एवं अरुणवर्णवाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं॥

औपवाह्य: कुबेरस्य सार्वभौम इति स्मृत:॥ ३४॥

गज: पर्येति तं देशं सदा सह करेणुभि:।

‘कुबेरकी सवारीमें काम आनेवाला सार्वभौम-नामक गजराज अपनी हथिनियोंके साथ उस देशमें सदा घूमता रहता है॥ ३४/

तत् सर: समतिक्रम्य नष्टचन्द्रदिवाकरम्।

अनक्षत्रगणं व्योम निष्पयोदमनादितम्॥ ३५॥

‘उस सरोवरको लाँघकर आगे जानेपर सूना आकाश दिखायी देगा। उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारोंके दर्शन नहीं होंगे। वहाँ न तो मेघोंकी घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी॥ ३५॥

गभस्तिभिरिवार्कस्य स तु देश: प्रकाश्यते।

विश्राम्यद्भिस्तप:सिद्धैर्देवकल्पै: स्वयंप्रभै:॥ ३६॥

‘तथापि उस देशमें ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्यकी किरणोंसे ही वह प्रकाशित हो रहा है। वहाँ अपनी ही प्रभासे प्रकाशित तप:सिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं। उन्हींकी अङ्गप्रभासे उस देशमें उजाला छाया रहता है॥ ३६॥

तं तु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निम्नगा।

उभयोस्तीरयोस्तस्या: कीचका नाम वेणव:॥ ३७॥

‘उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर ‘शैलोदा’ नामवाली नदीका दर्शन होगा। उसके दोनों तटोंपर कीचक (वंशीकी-सी ध्वनि करनेवाले) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है॥ ३७॥

ते नयन्ति परं तीरं सिद्धान् प्रत्यानयन्ति च।

उत्तरा: कुरवस्तत्र कृतपुण्यप्रतिश्रया:॥ ३८॥

‘वे बाँस ही (साधन बनकर) सिद्ध पुरुषोंको शैलोदाके उस पार ले जाते और वहाँसे इस पार ले आते हैं। जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषोंका वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदाके तटपर ही है॥ ३८॥

तत: काञ्चनपद्माभि: पद्मिनीभि: कृतोदका:।

नीलवैदूर्यपत्राढ्या नद्यस्तत्र सहस्रश:॥ ३९॥

‘उत्तर कुरुदेशमें नील वैदूर्यमणिके समान हरे-हरे कमलोंके पत्तोंसे सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं, जिनके जल सुवर्णमय पद्मोंसे अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियोंसे मिले हुए हैं॥ ३९॥

रक्तोत्पलवनैश्चात्र मण्डिताश्च हिरण्मयै:।

तरुणादित्यसंकाशा भान्ति तत्र जलाशया:॥ ४०॥

‘वहाँके जलाशय लाल और सुनहरे कमल-समूहोंसे मण्डित होकर प्रात:काल उदित हुए सूर्यके समान शोभा पाते हैं॥ ४०॥

महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरै:।

नीलोत्पलवनैश्चित्रै: स देश: सर्वतो वृत:॥ ४१॥

‘बहुमूल्य मणियोंके समान पत्तों और सुवर्णके समान कान्तिमान् केसरोंवाले विचित्र-विचित्र नील कमलोंके द्वारा वहाँका प्रदेश सब ओरसे सुशोभित होता है॥ ४१॥

निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनै:।

उद्धूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगा:॥ ४२॥

सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमै:।

जातरूपमयैश्चापि हुताशनसमप्रभै:॥ ४३॥

‘वहाँकी नदियोंके तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णोंसे सम्पन्न हैं। इतना ही नहीं, उन नदियोंके किनारे सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त विचित्र-विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जलके भीतरतक घुसे हुए हैं। उन पर्वतोंमेंसे कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्निके समान प्रकाश फैलता रहता है॥ ४२-४३॥

नित्यपुष्पफलास्तत्र नगा: पत्ररथाकुला:।

दिव्यगन्धरसस्पर्शा: सर्वकामान् स्रवन्ति च॥ ४४॥

‘वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उनपर पक्षी चहकते रहते हैं। वे वृक्ष दिव्य गन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियोंकी सारी मनचाही वस्तुओंकी वर्षा करते रहते हैं॥ ४४॥

नानाकाराणि वासांसि फलन्त्यन्ये नगोत्तमा:।

मुक्तावैदूर्यचित्राणि भूषणानि तथैव च।

स्त्रीणां यान्यनुरूपाणि पुरुषाणां तथैव च॥ ४५॥

‘इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलोंके रूपमें नाना प्रकारके वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणिसे जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषोंके भी उपयोगमें आने योग्य होते हैं॥ ४५॥

सर्वर्तुसुखसेव्यानि फलन्त्यन्ये नगोत्तमा:।

महार्हमणिचित्राणि फलन्त्यन्ये नगोत्तमा:॥ ४६॥

‘दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं। अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियोंके समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं॥ ४६॥

शयनानि प्रसूयन्ते चित्रास्तरणवन्ति च।

मन:कान्तानि माल्यानि फलन्त्यत्रापरे द्रुमा:॥ ४७॥

पानानि च महार्हाणि भक्ष्याणि विविधानि च।

स्त्रियश्च गुणसम्पन्ना रूपयौवनलक्षिता:॥ ४८॥

‘कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनोंसे युक्त शय्याओंको ही फलोंके रूपमें प्रकट करते हैं, मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँतिके भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवनसे प्रकाशित होनेवाली सद्गुणवती युवतियोंको भी जन्म देते हैं॥ ४७-४८॥

गन्धर्वा: किन्नरा: सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा।

रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभा:॥ ४९॥

‘वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियोंके साथ क्रीडा-विहार करते हैं॥ ४९॥

सर्वे सुकृतकर्माण: सर्वे रतिपरायणा:।

सर्वे कामार्थसहिता वसन्ति सह योषित:॥ ५०॥

‘वहाँके सब लोग पुण्यकर्मा हैं, सभी अर्थ और कामसे सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम-क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियोंके साथ निवास करते हैं॥ ५०॥

गीतवादित्रनिर्घोष: सोत्कृष्टहसितस्वन:।

श्रूयते सततं तत्र सर्वभूतमनोरम:॥ ५१॥

‘वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास-परिहासकी ध्वनिसे युक्त गीतवाद्यका मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियोंके मनको आनन्द प्रदान करनेवाला है॥ ५१॥

तत्र नामुदित: कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रिय:।

अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमा:॥ ५२॥

‘वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता। किसीकी भी बुरे कामोंमें प्रीति नहीं होती। वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है॥ ५२॥

समतिक्रम्य तं देशमुत्तर: पयसां निधि:।

तत्र सोमगिरिर्नाम मध्ये हेममयो महान्॥ ५३॥

‘उस देशको लाँघकर आगे जानेपर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा। उस समुद्रके मध्यभागमें सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है॥ ५३॥

इन्द्रलोकगता ये च ब्रह्मलोकगताश्च ये।

देवास्तं समवेक्षन्ते गिरिराजं दिवं गता:॥ ५४॥

‘जो लोग स्वर्गलोकमें गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोकमें रहनेवाले देवता उस गिरिराज सोमगिरिका दर्शन करते हैं॥ ५४॥

स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते।

सूर्यलक्ष्म्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता॥ ५५॥

‘वह देश सूर्यसे रहित है तो भी सोमगिरिकी प्रभासे सदा प्रकाशित होता रहता है। तपते हुए सूर्यकी प्रभासे जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हींकी भाँति उसे सूर्यदेवकी शोभासे सम्पन्न-सा जानना चाहिये॥ ५५॥

भगवांस्तत्र विश्वात्मा शम्भुरेकादशात्मक:।

ब्रह्मा वसति देवेशो ब्रह्मर्षिपरिवारित:॥ ५६॥

‘वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रोंके रूपमें प्रकट होनेवाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियोंसे घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्माजी निवास करते हैं॥ ५६॥

न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण व:।

अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गति:॥ ५७॥

‘तुमलोग उत्तर कुरुके मार्गसे सोमगिरितक जाकर उसकी सीमासे आगे किसी तरह न बढ़ना। तुम्हारी तरह दूसरे प्राणियोंकी भी वहाँ गति नहीं है॥ ५७॥

स हि सोमगिरिर्नाम देवानामपि दुर्गम:।

तमालोक्य तत: क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ॥ ५८॥

‘वह सोमगिरि देवताओंके लिये भी दुर्गम है। अत: उसका दर्शनमात्र करके तुमलोग शीघ्र लौट आना॥ ५८॥

एतावद् वानरै: शक्यं गन्तुं वानरपुंगवा:।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्तत: परम्॥ ५९॥

‘श्रेष्ठ वानरो! बस, उत्तर दिशामें इतनी ही दूरतक तुम सब वानर जा सकते हो। उसके आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही। अत: आगेकी भूमिके सम्बन्धमें मैं कुछ नहीं जानता॥ ५९॥

सर्वमेतद् विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम्।

यदन्यदपि नोक्तं च तत्रापि क्रियतां मति:॥ ६०॥

‘मैंने जो-जो स्थान बताये हैं, उन सबमें सीताकी खोज करना और जिन स्थानोंका नाम नहीं लिया है, वहाँ भी ढूँढ़नेका ही निश्चित विचार रखना॥ ६०॥

तत: कृतं दाशरथेर्महत्प्रियं

महत्प्रियं चापि ततो मम प्रियम्।

कृतं भविष्यत्यनिलानलोपमा

विदेहजादर्शनजेन कर्मणा॥ ६१॥

‘अग्नि और वायुके समान तेजस्वी तथा बलशाली वानरो! विदेहनन्दिनी सीताके दर्शनके लिये तुम जो-जो कार्य या प्रयास करोगे, उन सबके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका महान् प्रिय कार्य सम्पन्न होगा तथा उसीसे मेरा भी प्रिय कार्य पूर्ण हो जायगा॥ ६१॥

तत: कृतार्था: सहिता: सबान्धवा

मयार्चिता: सर्वगुणैर्मनोरमै:।

चरिष्यथोर्वीं प्रति शान्तशत्रव:

सहप्रिया भूतधरा: प्लवंगमा:॥ ६२॥

‘वानरो! श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय कार्य करके जब तुम लौटोगे, तब मैं सर्वगुणसम्पन्न एवं मनोऽनुकूल पदार्थोंके द्वारा तुम सब लोगोंका सत्कार करूँगा। तत्पश्चात् तुमलोग शत्रुहीन होकर अपने हितैषियों और बन्धु-बान्धवोंसहित कृतार्थ एवं समस्त प्राणियोंके आश्रयदाता होकर अपनी प्रियतमाओंके साथ सारी पृथ्वीपर सानन्द विचरण करोगे’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४३॥

 

 


चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:

श्रीरामका हनुमान्‌जीको अँगूठी देकर भेजना

विशेषेण तु सुग्रीवो हनूमत्यर्थमुक्तवान्।

स हि तस्मिन् हरिश्रेष्ठे निश्चितार्थोऽर्थसाधने॥ १॥

सुग्रीवने हनुमान्‌जीके समक्ष विशेषरूपसे सीताके अन्वेषणरूप प्रयोजनको उपस्थित किया; क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जी इस कार्यको सिद्ध कर सकेंगे॥ १॥

अब्रवीच्च हनूमन्तं विक्रान्तमनिलात्मजम्।

सुग्रीव: परमप्रीत: प्रभु: सर्ववनौकसाम्॥ २॥

समस्त वानरोंके स्वामी सुग्रीवने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान्से इस प्रकार कहा—॥ २॥

न भूमौ नान्तरिक्षे वा नाम्बरे नामरालये।

नाप्सु वा गतिसङ्गं ते पश्यामि हरिपुंगव॥ ३॥

‘कपिश्रेष्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जलमें भी तुम्हारी गतिका अवरोध मैं कभी नहीं देखता हूँ॥ ३॥

सासुरा: सहगन्धर्वा: सनागनरदेवता:।

विदिता: सर्वलोकास्ते ससागरधराधरा:॥ ४॥

‘असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका तुम्हें ज्ञान है॥ ४॥

गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे।

पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजस:॥ ५॥

‘वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती—ये सभी सद्गुण तुममें अपने महापराक्रमी पिता वायुके ही समान हैं॥ ५॥

तेजसा वापि ते भूतं न समं भुवि विद्यते।

तद् यथा लभ्यते सीता तत्त्वमेवानुचिन्तय॥ ६॥

‘इस भूमण्डलमें कोई भी प्राणी तुम्हारे तेजकी समानता करनेवाला नहीं है; अत: जिस प्रकार सीताकी उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो॥ ६॥

त्वय्येव हनुमन्नस्ति बलं बुद्धि: पराक्रम:।

देशकालानुवृत्तिश्च नयश्च नयपण्डित॥ ७॥

‘हनुमन्! तुम नीतिशास्त्रके पण्डित हो। एकमात्र तुम्हींमें बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-कालका अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं’॥ ७॥

तत: कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति।

विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघव:॥ ८॥

सुग्रीवकी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको यह ज्ञात हुआ कि इस कार्यकी सिद्धिका सम्बन्ध—इसे पूर्ण करनेका सारा भार हनुमान्पर ही है। उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्यको सफल करनेमें समर्थ हैं। फिर वे इस प्रकार मन-ही-मन विचार करने लगे—॥ ८॥

सर्वथा निश्चितार्थोऽयं हनूमति हरीश्वर:।

निश्चितार्थतरश्चापि हनूमान् कार्यसाधने॥ ९॥

‘वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान्पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चितरूपसे हमारे इस प्रयोजनको सिद्ध कर सकते हैं। स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चितरूपसे इस कार्यको सिद्ध करनेका विश्वास रखते हैं॥ ९॥

तदेवं प्रस्थितस्यास्य परिज्ञातस्य कर्मभि:।

भर्त्रा परिगृहीतस्य ध्रुव: कार्यफलोदय:॥ १०॥

‘इस प्रकार कार्योंद्वारा जिनकी परीक्षा कर ली गयी है तथा जो सबसे श्रेष्ठ समझे गये हैं, वे हनुमान् अपने स्वामी सुग्रीवके द्वारा सीताकी खोजके लिये भेजे जा रहे हैं। इनके द्वारा इस कार्यके फलका उदय (सीताका दर्शन) होना निश्चित है’॥ १०॥

तं समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरं हरिम्।

कृतार्थ इव संहृष्ट: प्रहृष्टेन्द्रियमानस:॥ ११॥

ऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधनके उद्योगमें सर्वश्रेष्ठ हनुमान्‌जीकी ओर दृष्टिपात करके अपनेको कृतार्थ-सा मानते हुए प्रसन्न हो गये। उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्षसे खिल उठे॥

ददौ तस्य तत: प्रीत: स्वनामाङ्कोपशोभितम्।

अङ्गुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्या: परंतप:॥ १२॥

तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामने प्रसन्नतापूर्वक अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित एक अँगूठी हनुमान्‌जीके हाथमें दी, जो राजकुमारी सीताको पहचानके रूपमें अर्पण करनेके लिये थी॥ १२॥

अनेन त्वां हरिश्रेष्ठ चिह्नेन जनकात्मजा।

मत्सकाशादनुप्राप्तमनुद्विग्नानुपश्यति ॥ १३॥

अँगूठी देकर वे बोले—‘कपिश्रेष्ठ! इस चिह्नके द्वारा जनककिशोरी सीताको यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पाससे ही गये हो। इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी॥ १३॥

व्यवसायश्च ते वीर सत्त्वयुक्तश्च विक्रम:।

सुग्रीवस्य च संदेश: सिद्धिं कथयतीव मे॥ १४॥

‘वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीवका संदेश—ये सब मुझे इस बातकी सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्यकी सिद्धि अवश्य होगी’॥ १४॥

स तद् गृह्य हरिश्रेष्ठ: कृत्वा मूर्ध्नि कृताञ्जलि:।

वन्दित्वा चरणौ चैव प्रस्थित: प्लवगर्षभ:॥ १५॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तकपर रखा और फिर हाथ जोड़कर श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँसे प्रस्थित हुए॥ १५॥

स तत् प्रकर्षन् हरिणां महद् बलं

बभूव वीर: पवनात्मज: कपि:।

गताम्बुदे व्योम्नि विशुद्धमण्डल:

शशीव नक्षत्रगणोपशोभित:॥ १६॥

उस समय वीर-वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरोंकी उस विशाल सेनाको ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाशमें विशुद्ध (निर्मल) मण्डलसे उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्र-समूहोंके साथ सुशोभित होता है॥ १६॥

अतिबल बलमाश्रितस्तवाहं

हरिवर विक्रम विक्रमैरनल्पै:।

पवनसुत यथाधिगम्यते सा

जनकसुता हनुमंस्तथा कुरुष्व॥ १७॥

जाते हुए हनुमान्को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीने फिर कहा—‘अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे बलका आश्रय लिया है। पवनकुमार हनुमान्! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल-विक्रमसे वैसा ही प्रयत्न करो। अच्छा, अब जाओ’॥ १७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुश्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥

 


पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:

विभिन्न दिशाओंमें जाते हुए वानरोंका सुग्रीवके समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना

सर्वांश्चाहूय सुग्रीव: प्लवगान् प्लवगर्षभ:।

समस्तांश्चाब्रवीद् राजा रामकार्यार्थसिद्धये॥ १॥

तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरोंको बुलाकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये उन सबसे बोले—॥ १॥

एवमेतद् विचेतव्यं भवद्भिर्वानरोत्तमै:।

तदुग्रशासनं भर्तुर्विज्ञाय हरिपुंगवा:॥ २॥

शलभा इव संछाद्य मेदिनीं सम्प्रतस्थिरे।

‘कपिवरो! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरोंको इस जगत्में सीताकी खोज करनी चाहिये।’ स्वामीकी उस कठोर आज्ञाको भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियोंके दलकी भाँति पृथ्वीको आच्छादित करके वहाँसे प्रस्थित हुए॥ २/

राम: प्रस्रवणे तस्मिन् न्यवसत् सहलक्ष्मण:॥ ३॥

प्रतीक्षमाणस्तं मासं सीताधिगमने कृत:।

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवणगिरिपर ही ठहरे रहे और सीताका समाचार लानेके लिये जो एक मासकी अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ३/

उत्तरां तु दिशं रम्यां गिरिराजसमावृताम्॥ ४॥

प्रतस्थे सहसा वीरो हरि: शतबलिस्तदा।

उस समय वीर वानर शतबलिने गिरिराज हिमालयसे घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशाकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥ ४/

पूर्वां दिशं प्रतिययौ विनतो हरियूथप:॥ ५॥

ताराङ्गदादिसहित: प्लवग: पवनात्मज:।

अगस्त्याचरितामाशां दक्षिणां हरियूथप:॥ ६॥

पश्चिमां च दिशं घोरां सुषेण: प्लवगेश्वर:।

प्रतस्थे हरिशार्दूलो दिशं वरुणपालिताम्॥ ७॥

वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशाकी ओर गये। कपिगणोंके अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान्‌जी तार और अङ्गद आदिके साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेणने वरुणद्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशाकी यात्रा की॥ ५—७॥

तत: सर्वा दिशो राजा चोदयित्वा यथातथम्।

कपिसेनापतिर्वीरो मुमोद सुखित: सुखम्॥ ८॥

वानर-सेनाके स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओंमें यथायोग्य वानरोंको भेजकर बहुत सुखी हुए और मन-ही-मन हर्षका अनुभव करने लगे॥ ८॥

एवं संचोदिता: सर्वे राज्ञा वानरयूथपा:।

स्वां स्वां दिशमभिप्रेत्य त्वरिता: सम्प्रतस्थिरे॥ ९॥

इस तरह राजाकी आज्ञा पाकर समस्त वानर-यूथपति बड़ी उतावलीके साथ अपनी-अपनी दिशाकी ओर प्रस्थित हुए॥ ९॥

नदन्तश्चोन्नदन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमा:।

क्ष्वेडन्तो धावमानाश्च विनदन्तो महाबला:॥ १०॥

एवं संचोदिता: सर्वे राज्ञा वानरयूथपा:।

आनयिष्यामहे सीतां हनिष्यामश्च रावणम्॥ ११॥

अहमेको वधिष्यामि प्राप्तं रावणमाहवे।

ततश्चोन्मथ्य सहसा हरिष्ये जनकात्मजाम्॥ १२॥

वेपमानां श्रमेणाद्य भवद्भि: स्थीयतामिति।

एक एवाहरिष्यामि पातालादपि जानकीम्॥ १३॥

विधमिष्याम्यहं वृक्षान् दारयिष्याम्यहं गिरीन्।

धरणीं दारयिष्यामि क्षोभयिष्यामि सागरान्॥ १४॥

अहं योजनसंख्याया: प्लवेयं नात्र संशय:।

शतयोजनसंख्याया: शतं समधिकं ह्यहम्॥ १५॥

भूतले सागरे वापि शैलेषु च वनेषु च।

पातालस्यापि वा मध्ये न ममाच्छिद्यते गति:॥ १६॥

वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजाके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँतिके शब्द करते, उच्च स्वरसे गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—‘राजन्! हम सीताको साथ लायेंगे और रावणका वध कर डालेंगे। युद्धमें यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेनाको मथकर कष्ट एवं भयसे काँपती हुई जानकीजीको सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आपलोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पातालसे भी जनककिशोरीको निकाल लाऊँगा, वृक्षोंको उखाड़ फेकूँगा, पर्वतोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रोंको भी विक्षुब्ध कर डालूँगा। मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजनसे भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ। पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पातालमें भी मेरी गति नहीं रुकती’॥ १०—१६॥

इत्येकैकस्तदा तत्र वानरा बलदर्पिता:।

ऊचुश्च वचनं तस्य हरिराजस्य संनिधौ॥ १७॥

इस तरह वहाँ वानरराज सुग्रीवके समीप बलके घमंडमें भरे हुए वानर उस समय एक-एक करके आते और उनके सामने उपर्युक्त बातें कहते थे॥ १७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥

 

षट्चत्वारिंश: सर्ग:

सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको अपने भूमण्डल-भ्रमणका वृत्तान्त बताना

गतेषु वानरेन्द्रेषु राम: सुग्रीवमब्रवीत्।

कथं भवान् विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुव:॥ १॥

उन समस्त वानरयूथपतियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे पूछा—‘सखे! तुम समस्त भूमण्डलके स्थानोंका परिचय कैसे जानते हो?’॥ १॥

सुग्रीवश्च ततो राममुवाच प्रणतात्मवान्।

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण वचो मम॥ २॥

तब सुग्रीवने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘भगवन्! मैं सब कुछ विस्तारके साथ बता रहा हूँ। मेरी बातें सुनिये॥ २॥

यदा तु दुन्दुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम्।

प्रतिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम्॥ ३॥

तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति।

विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया॥ ४॥

‘जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि141 (उसके पुत्र मायावी) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वतकी ओर भागा और उस पर्वतकी कन्दरामें घुस गया। यह देख वालीने उसके वधकी इच्छासे उस गुफाके भीतर भी प्रवेश किया॥ ३-४॥

ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत्।

न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते॥ ५॥

‘उस समय मैं विनीतभावसे उस गुफाके द्वारपर खड़ा रहा; क्योंकि वालीने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर भी वाली उसके भीतरसे नहीं निकले॥ ५॥

तत: क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम्।

तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातु: शोकविषार्दित:॥ ६॥

‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्तकी धारासे उस समय वह सारी गुफा भर गयी। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाईके शोकसे व्यथित हो उठा॥ ६॥

अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरु:।

शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता॥ ७॥

‘फिर मेरी बुद्धिमें यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये। यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफाके द्वारपर एक पहाड़-जैसी चट्टान रख दी॥

अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति।

ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते॥ ८॥

‘सोचा—इस शिलासे द्वार बंद हो जानेपर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाईके जीवनसे निराश होकर मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया॥ ८॥

राज्यं च सुमहत् प्राप्य तारां च रुमया सह।

मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वर:॥ ९॥

‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित ताराको पाकर मित्रोंके साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा॥ ९॥

आजगाम ततो वाली हत्वा तं वानरर्षभ:।

ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद् भययन्त्रित:॥ १०॥

‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानवका वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भाईके गौरवसे भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया॥ १०॥

स मां जिघांसुर्दुष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रिय:।

परिकालयते वाली धावन्तं सचिवै: सह॥ ११॥

‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारनेके लिये ही गुफाका द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा॥ ११॥

ततोऽहं वालिना तेन सोऽनुबद्ध: प्रधावित:।

नदीश्च विविधा: पश्यन् वनानि नगराणि च॥ १२॥

आदर्शतलसंकाशा ततो वै पृथिवी मया।

अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत् कृता॥ १३॥

‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोरको भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरोंको देखते हुए सारी पृथ्वीको गायकी खुरीकी भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्रके समान दिखायी दी॥ १२-१३॥

पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान्।

पर्वतान् सदरीन् रम्यान् सरांसि विविधानि च॥ १४॥

‘तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर मैंने नाना प्रकारके वृक्ष, कन्दराओंसहित रमणीय पर्वत और भाँति-भाँतिके सरोवर देखे॥ १४॥

उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातुमण्डितम्।

क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम्॥ १५॥

‘वहीं नाना प्रकारके धातुओंसे मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओंके नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागरका भी मैंने दर्शन किया॥ १५॥

परिकाल्यमानस्तु तदा वालिनाभिद्रुतो ह्यहम्।

पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो॥ १६॥

‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा। प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वालीके डरसे पुन: सहसा मुझे भागना पड़ा॥ १६॥

दिशस्तस्यास्ततो भूय: प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्।

विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम्॥ १७॥

‘उस दिशाको छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकारके वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दनके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ १७॥

द्रुमशैलान्तरे पश्यन् भूयो दक्षिणतोऽपराम्।

अपरां च दिशं प्राप्तो वालिना समभिद्रुत:॥ १८॥

‘वृक्षों और पर्वतोंकी ओटमें बारंबार वालीको देखकर मैंने दक्षिण दिशाको छोड़ दिया तथा वालीके खदेड़नेपर पश्चिम दिशाकी शरण ली॥ १८॥

स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम्।

प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावित:॥ १९॥

‘वहाँ नाना प्रकारके देशोंको देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलतक जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुन: उत्तर दिशाकी ओर भागा॥ १९॥

हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम्।

यदा न विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुत:॥ २०॥

ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत्।

‘हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्रतक पहुँचकर भी जब वालीके पीछा करनेके कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमान् जी ने मुझसे यह बात कही—॥ २०/

इदानीं मे स्मृतं राजन् यथा वाली हरीश्वर:॥ २१॥

मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले।

प्रविशेद् यदि वै वाली मूर्धास्य शतधा भवेत्॥ २२॥

‘‘राजन्! इस समय मुझे उस घटनाका स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनिने उन दिनों वानरराज वालीको शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रम-मण्डलमें प्रवेश करेगा तो उसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे’॥ २१-२२॥

तत्र वास: सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति।

तत: पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज॥ २३॥

न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा।

‘‘अत: वहीं निवास करना हमलोगोंके लिये सुखद और निर्भय होगा’। राजकुमार! इस निश्चयके अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वतपर आकर रहने लगे। उस समय मतङ्ग ऋषिके भयसे वालीने वहाँ प्रवेश नहीं किया॥

एवं मया तदा राजन् प्रत्यक्षमुपलक्षितम्।

पृथिवीमण्डलं सर्वं गुहामस्म्यागतस्तत:॥ २४॥

‘राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डलको प्रत्यक्ष देखा था। उसके बाद ऋष्यमूककी गुफामें आया था’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥

 

सप्तचत्वारिंश: सर्ग:

पूर्व आदि तीन दिशाओंमें गये हुए वानरोंका निराश होकर लौट आना

दर्शनार्थं तु वैदेह्या: सर्वत: कपिकुञ्जरा:।

व्यादिष्टा: कपिराजेन यथोक्तं जग्मुरञ्जसा॥ १॥

वानरराजके द्वारा समस्त दिशाओंकी ओर जानेकी आज्ञा पाकर वे सभी श्रेष्ठ वानर, जिनके लिये जिस ओर जानेका आदेश मिला था उसी ओर विदेहकुमारी सीताका पता लगानेके लिये उत्साहपूर्वक चल दिये॥ १॥

ते सरांसि सरित्कक्षानाकाशं नगराणि च।

नदीदुर्गांस्तथा देशान् विचिन्वन्ति समन्तत:॥ २॥

वे सरोवरों, सरिताओं, लतामण्डपों, खुले स्थानों और नगरोंमें तथा नदियोंके कारण दुर्गम प्रदेशोंमें सब ओर घूम-फिरकर सीताकी खोज करने लगे॥ २॥

सुग्रीवेण समाख्याता: सर्वे वानरयूथपा:।

तत्र देशान् विचिन्वन्ति सशैलवनकाननान्॥ ३॥

सुग्रीवने जिन्हें आज्ञा दी थी, वे सभी वानरयूथपति अपनी-अपनी दिशाओंके पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण देशोंकी छानबीन करने लगे॥ ३॥

विचित्य दिवसं सर्वे सीताधिगमने धृता:।

समायान्ति स्म मेदिन्यां निशाकालेषु वानरा:॥ ४॥

सीताजीका पता लगानेकी निश्चित इच्छा मनमें लिये वे सब वानर दिनभर इधर-उधर अन्वेषण करते और रातके समय किसी नियत स्थानपर एकत्र हो जाते थे॥

सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानरा: सफलद्रुमान्।

आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रु: सर्वेष्वह:सु ते॥ ५॥

सारे दिन भिन्न-भिन्न देशोंमें घूम-फिरकर वे वानर सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले वृक्षोंके पास जाकर रातको वहीं सोया अथवा विश्राम किया करते थे॥ ५॥

तदह: प्रथमं कृत्वा मासे प्रस्रवणं गता:।

कपिराजेन संगम्य निराशा: कपिकुञ्जरा:॥ ६॥

जानेके दिनको पहला दिन मानकर एक मास पूर्ण होनेतक वे श्रेष्ठ वानर निराश हो लौट आये और कपिराज सुग्रीवसे मिलकर प्रस्रवणगिरिपर ठहर गये॥ ६॥

विचित्य तु दिशं पूर्वां यथोक्तां सचिवै: सह।

अदृष्ट्वा विनत: सीतामाजगाम महाबल:॥ ७॥

महाबली विनत अपने मन्त्रियोंके साथ पहले बताये अनुसार पूर्व दिशामें खोज करके वहाँ सीताको न पाकर किष्किन्धा लौट आये॥ ७॥

दिशमप्युत्तरां सर्वां विविच्य स महाकपि:।

आगत: सह सैन्येन भीत: शतबलिस्तदा॥ ८॥

महाकपि शतबलि सारी उत्तर दिशाकी छानबीन करके भयभीत हो तत्काल सेनासहित किष्किन्धा आ गये॥

सुषेण: पश्चिमामाशां विविच्य सह वानरै:।

समेत्य मासे पूर्णे तु सुग्रीवमुपचक्रमे॥ ९॥

वानरोंसहित सुषेण भी पश्चिम दिशाका अनुसंधान करके वहाँ सीताको न पाकर एक मास पूर्ण होनेपर सुग्रीवके पास चले आये॥ ९॥

तं प्रस्रवणपृष्ठस्थं समासाद्याभिवाद्य च।

आसीनं सह रामेण सुग्रीवमिदमब्रुवन्॥ १०॥

प्रस्रवणगिरिपर श्रीरामचन्द्रजीके साथ बैठे हुए सुग्रीवके पास आकर सब वानरोंने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १०॥

विचिता: पर्वता: सर्वे वनानि गहनानि च।

निम्नगा: सागरान्ताश्च सर्वे जनपदाश्च ये॥ ११॥

गुहाश्च विचिता: सर्वा याश्च ते परिकीर्तिता:।

विचिताश्च महागुल्मा लताविततसंतता:॥ १२॥

‘राजन्! हमने समस्त पर्वत, घने जंगल, समुद्रपर्यन्त नदियाँ, सम्पूर्ण देश, आपकी बतायी हुई सारी गुफाएँ तथा लतावितानसे व्याप्त हुई झाड़ियाँ भी खोज डालीं॥

गहनेषु च देशेषु दुर्गेषु विषमेषु च।

सत्त्वान्यतिप्रमाणानि विचितानि हतानि च।

ये चैव गहना देशा विचितास्ते पुन: पुन:॥ १३॥

‘घने वनों, विभिन्न देशों, दुर्गम स्थानों और ऊँची-ऊँची भूमियोंमें भी ढूँढ़ा है। बड़े-बड़े प्राणियोंकी भी तलाशी ली और उन्हें मार डाला। जो-जो प्रदेश घने और दुर्गम जान पड़े, वहाँ बारंबार खोज की (किंतु कहीं भी सीताजीका पता न लगा)॥ १३॥

उदारसत्त्वाभिजनो हनूमान्

स मैथिलीं ज्ञास्यति वानरेन्द्र।

दिशं तु यामेव गता तु सीता

तामास्थितो वायुसुतो हनूमान्॥ १४॥

‘वानरराज! वायुपुत्र हनुमान् परम शक्तिमान् और कुलीन हैं। वे ही मिथिलेशकुमारीका पता लगा सकेंगे; क्योंकि वे उसी दिशामें गये हैं, जिधर सीता गयी हैं’॥ १४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥

 

 


अष्टचत्वारिंश: सर्ग:

दक्षिण दिशामें गये हुए वानरोंका सीताकी खोज आरम्भ करना

सह ताराङ्गदाभ्यां तु सहसा हनुमान् कपि:।

सुग्रीवेण यथोद्दिष्टं गन्तुं देशं प्रचक्रमे॥ १॥

उधर तार और अङ्गदके साथ हनुमान्‌जी सहसा सुग्रीवके बताये हुए दक्षिण दिशाके देशोंकी ओर चले॥

स तु दूरमुपागम्य सर्वैस्तै: कपिसत्तमै:।

ततो विचित्य विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च॥ २॥

पर्वताग्रनदीदुर्गान् सरांसि विपुलद्रुमान्।

वृक्षषण्डांश्च विविधान् पर्वतान् वनपादपान्॥ ३॥

अन्वेषमाणास्ते सर्वे वानरा: सर्वतो दिशम्।

न सीतां ददृशुर्वीरा मैथिलीं जनकात्मजाम्॥ ४॥

उन सभी श्रेष्ठ वानरोंके साथ बहुत दूरका रास्ता तै करके वे विन्ध्याचलपर गये और वहाँकी गुफाओं, जंगलों, पर्वतशिखरों, नदियों, दुर्गम स्थानों, सरोवरों, बड़े-बड़े वृक्षों, झाड़ियों और भाँति-भाँतिके पर्वतों एवं वन्य वृक्षोंमें सब ओर ढूँढ़ते फिरे; परंतु वहाँ उन समस्त वीर वानरोंने मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीताको कहीं नहीं देखा॥ २—४॥

ते भक्षयन्तो मूलानि फलानि विविधान्यपि।

अन्वेषमाणा दुर्धर्षा न्यवसंस्तत्र तत्र ह॥ ५॥

वे सभी दुर्धर्ष वीर नाना प्रकारके फल-मूलका भोजन करते हुए सीताको खोजते और जहाँ-तहाँ ठहर जाया करते थे॥

स तु देशो दुरन्वेषो गुहागहनवान् महान्।

निर्जलं निर्जनं शून्यं गहनं घोरदर्शनम्॥ ६॥

विन्ध्यपर्वतके आस-पासका महान् देश बहुत-सी गुफाओं तथा घने जंगलोंसे भरा था। इससे वहाँ जानकीको ढूँढ़नेमें बड़ी कठिनाई होती थी। भयंकर दिखायी देनेवाले वहाँके सुनसान जंगलमें न तो पानी मिलता था और न कोई मनुष्य ही दिखायी देता था॥

तादृशान्यप्यरण्यानि विचित्य भृशपीडिता:।

स देशश्च दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान्॥ ७॥

वैसे जंगलोंमें भी खोज करते समय उन वानरोंको अत्यन्त कष्ट सहन करना पड़ा। वह विशाल प्रदेश अनेक गुहाओं और सघन वनोंसे व्याप्त था। अत: वहाँ अन्वेषणका कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता था॥ ७॥

त्यक्त्वा तु तं ततो देशं सर्वे वै हरियूथपा:।

देशमन्यं दुराधर्षं विविशुश्चाकुतोभया:॥ ८॥

तदनन्तर वे समस्त वानर-यूथपति उस देशको छोड़कर दूसरे प्रदेशमें घुसे, जहाँ जाना और भी कठिन था तो भी उन्हें कहीं किसीसे भय नहीं होता था॥ ८॥

यत्र वन्ध्यफला वृक्षा विपुष्पा: पर्णवर्जिता:।

निस्तोया: सरितो यत्र मूलं यत्र सुदुर्लभम्॥ ९॥

वहाँके वृक्ष कभी फल नहीं देते थे। उनमें फूल भी नहीं लगते थे और उनकी डालियोंमें पत्ते भी नहीं थे। वहाँकी नदियोंमें पानीका नाम नहीं था। कन्द-मूल आदि तो वहाँ सर्वथा दुर्लभ थे॥ ९॥

न सन्ति महिषा यत्र न मृगा न च हस्तिन:।

शार्दूला: पक्षिणो वापि ये चान्ये वनगोचरा:॥ १०॥

उस प्रदेशमें न भैंसे थे न हिरन और हाथी, न बाघ थे न पक्षी तथा वनमें विचरनेवाले अन्य प्राणियोंका भी वहाँ अभाव था॥ १०॥

न चात्र वृक्षा नौषध्यो न वल्ल्यो नापि वीरुध:।

स्निग्धपत्रा: स्थले यत्र पद्मिन्य: फुल्लपङ्कजा:॥ ११॥

प्रेक्षणीया: सुगन्धाश्च भ्रमरैश्च विवर्जिता:।

वहाँ न पेड़ थे न पौधे, न ओषधियाँ थीं न लता-बेलें। उस देशकी पोखरियोंमें चिकने पत्तों और खिले हुए फूलोंसे युक्त कमल भी नहीं थे। इसीलिये न तो वे देखने योग्य थीं, न उनमें सुगन्ध छा रही थी और न वहाँ भौंरे ही गुंजार करते थे॥ ११/

कण्डुर्नाम महाभाग: सत्यवादी तपोधन:॥ १२॥

महर्षि: परमामर्षी नियमैर्दुष्प्रधर्षण:।

पहले वहाँ कण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाभाग सत्यवादी और तपस्याके धनी महर्षि रहते थे, जो बड़े अमर्षशील थे—अपने प्रति किये गये अपराधको सहन नहीं करते थे। शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करनेके कारण उन महर्षिको कोई तिरस्कृत या पराजित नहीं कर सकता था॥ १२/

तस्य तस्मिन् वने पुत्रो बालको दशवार्षिक:॥ १३॥

प्रणष्टो जीवितान्ताय क्रुद्धस्तेन महामुनि:।

उस वनमें उनका एक बालक पुत्र, जिसकी अवस्था दस वर्षकी थी, किसी कारणसे मर गया। इससे कुपित होकर वे महामुनि उस वनके जीवनका अन्त करनेके लिये उद्यत हो गये॥ १३/

तेन धर्मात्मना शप्तं कृत्स्नं तत्र महद्वनम्॥ १४॥

अशरण्यं दुराधर्षं मृगपक्षिविवर्जितम्।

उन धर्मात्मा महर्षिने उस समूचे विशाल वनको वहाँ शाप दे दिया, जिससे वह आश्रयहीन, दुर्गम तथा पशु-पक्षियोंसे शून्य हो गया॥ १४/

तस्य ते काननान्तांस्तु गिरीणां कन्दराणि च॥ १५॥

प्रभवाणि नदीनां च विचिन्वन्ति समाहिता:।

तत्र चापि महात्मानो नापश्यञ्जनकात्मजाम्॥ १६॥

हर्तारं रावणं वापि सुग्रीवप्रियकारिण:।

वहाँ सुग्रीवका प्रिय करनेवाले उन महामनस्वी वानरोंने उस वनके सभी प्रदेशों, पर्वतोंकी कन्दराओं तथा नदियोंके उद्गमस्थानोंमें एकाग्रचित्त होकर अनुसंधान किया; परंतु वहाँ भी उन्हें जनकनन्दिनी सीता अथवा उनका अपहरण करनेवाले रावणका कुछ पता नहीं चला॥

ते प्रविश्य तु तं भीमं लतागुल्मसमावृतम्॥ १७॥

ददृशुर्भीमकर्माणमसुरं सुरनिर्भयम्।

तत्पश्चात् लताओं और झाड़ियोंसे व्याप्त हुए दूसरे किसी भयंकर वनमें प्रवेश करके उन हनुमान् आदि वानरोंने भयानक कर्म करनेवाले एक असुरको देखा, जिसे देवताओंसे कोई भय नहीं था॥ १७/

तं दृष्ट्वा वानरा घोरं स्थितं शैलमिवासुरम्॥ १८॥

गाढं परिहिता: सर्वे दृष्ट्वा तं पर्वतोपमम्।

उस घोर निशाचरको पहाड़के समान सामने खड़ा देख सभी वानरोंने अपने ढीले-ढाले वस्त्रोंको अच्छी तरह कस लिया और सब-के-सब उस पर्वताकार असुरसे भिड़नेको तैयार हो गये॥ १८/

सोऽपि तान् वानरान् सर्वान् नष्टा: स्थेत्यब्रवीद् बली॥ १९॥

अभ्यधावत संक्रुद्धो मुष्टिमुद्यम्य संगतम्।

उधर वह बलवान् असुर भी उन सब वानरोंको देखकर बोला—‘अरे, आज तुम सभी मारे गये।’ इतना कहकर वह अत्यन्त कुपित हो बँधा हुआ मुक्का तानकर उनकी ओर दौड़ा॥ १९/

तमापतन्तं सहसा वालिपुत्रोऽङ्गदस्तदा॥ २०॥

रावणोऽयमिति ज्ञात्वा तलेनाभिजघान ह।

उसे सहसा आक्रमण करते देख वालिपुत्र अङ्गदने समझा कि यही रावण है; अत: उन्होंने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया॥ २०/

स वालिपुत्राभिहतो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन्॥ २१॥

असुरो न्यपतद् भूमौ पर्यस्त इव पर्वत:।

ते तु तस्मिन् निरुच्छ्वासे वानरा जितकाशिन:॥ २२॥

व्यचिन्वन् प्रायशस्तत्र सर्वं ते गिरिगह्वरम्।

वालिपुत्रके मारनेपर वह असुर मुँहसे रक्त वमन करता हुआ फटकर गिरे हुए पहाड़की भाँति पृथ्वीपर जा पड़ा और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। तत्पश्चात् विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानर प्राय: वहाँकी सारी पर्वतीय गुफाओंमें अनुसंधान करने लगे॥ २१-२२/

विचितं तु तत: सर्वं सर्वे ते काननौकस:॥ २३॥

अन्यदेवापरं घोरं विविशुर्गिरिगह्वरम्।

जब वहाँके सारे प्रदेशमें खोज कर ली गयी, तब उन समस्त वनवासी वानरोंने किसी दूसरी पर्वतीय कन्दरामें प्रवेश किया, जो पहलेकी अपेक्षा भी भयानक थी॥ २३/

ते विचित्य पुन: खिन्ना विनिष्पत्य समागता:।

एकान्ते वृक्षमूले तु निषेदुर्दीनमानसा:॥ २४॥

उसमें भी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे थक गये और निराश होकर निकल आये। फिर सब-के-सब एकान्त स्थानमें एक वृक्षके नीचे खिन्नचित्त होकर बैठ गये॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डेऽष्टचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥

 

 


एकोनपञ्चाश: सर्ग:

अङ्गद और गन्धमादनके आश्वासन देनेपर वानरोंका पुन:उत्साहपूर्वक अन्वेषण-कार्यमें प्रवृत्त होना

अथाङ्गदस्तदा सर्वान् वानरानिदमब्रवीत्।

परिश्रान्तो महाप्राज्ञ: समाश्वास्य शनैर्वच:॥ १॥

तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए महाबुद्धिमान् अङ्गद सम्पूर्ण वानरोंको आश्वासन देकर धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगे—॥ १॥

वनानि गिरयो नद्यो दुर्गाणि गहनानि च।

दरी गिरिगुहाश्चैव विचिता: सर्वमन्तत:॥ २॥

तत्र तत्र सहास्माभिर्जानकी न च दृश्यते।

तथा रक्षोऽपहर्ता च सीतायाश्चैव दुष्कृती॥ ३॥

‘हमलोगोंने वन, पर्वत, नदियाँ, दुर्गम स्थान, घने जंगल, कन्दरा और गुफाएँ भीतर प्रवेश करके अच्छी तरह देख डालीं; परंतु उन स्थानोंमें हमें न तो जानकीके दर्शन हुए और न उनका अपहरण करनेवाला वह पापी राक्षस ही मिला॥ २-३॥

कालश्च नो महान् यात: सुग्रीवश्चोग्रशासन:।

तस्माद् भवन्त: सहिता विचिन्वन्तु समन्तत:॥ ४॥

‘हमारा समय भी बहुत बीत गया। राजा सुग्रीवका शासन बड़ा भयंकर है। अत: आपलोग मिलकर पुन: सब ओर सीताकी खोज आरम्भ करें॥ ४॥

विहाय तन्द्रीं शोकं च निद्रां चैव समुत्थिताम्।

विचिनुध्वं तथा सीतां पश्यामो जनकात्मजाम्॥ ५॥

‘आलस्य, शोक और आयी हुई निद्राका परित्याग करके इस प्रकार ढूँढ़ें, जिससे हमें जनककुमारी सीताका दर्शन हो सके॥ ५॥

अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्।

कार्यसिद्धिकराण्याहुस्तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ६॥

‘उत्साह, सामर्थ्य और मनमें हिम्मत न हारना—ये कार्यकी सिद्धि करानेवाले सद्गुण कहे गये हैं; इसीलिये मैं आपलोगोंसे यह बात कह रहा हूँ॥ ६॥

अद्यापीदं वनं दुर्गं विचिन्वन्तु वनौकस:।

खेदं त्यक्त्वा पुन: सर्वं वनमेव विचिन्वताम्॥ ७॥

‘आज भी सारे वानर खेद छोड़कर इस दुर्गम वनमें खोज आरम्भ करें और सारे वनको ही छान डालें॥ ७॥

अवश्यं कुर्वतां तस्य दृश्यते कर्मण: फलम्।

परं निर्वेदमागम्य नहि नोन्मीलनं क्षमम्॥ ८॥

‘कर्ममें लगे रहनेवाले लोगोंको उस कर्मका फल अवश्य होता दिखायी देता है; अत: अत्यन्त खिन्न होकर उद्योगको छोड़ बैठना कदापि उचित नहीं है॥

सुग्रीव: क्रोधनो राजा तीक्ष्णदण्डश्च वानरा:।

भेतव्यं तस्य सततं रामस्य च महात्मन:॥ ९॥

‘सुग्रीव क्रोधी राजा हैं। उनका दण्ड भी बड़ा कठोर होता है। वानरो! उनसे तथा महात्मा श्रीरामसे आपलोगोंको सदा डरते रहना चाहिये॥ ९॥

हितार्थमेतदुक्तं व: क्रियतां यदि रोचते।

उच्यतां हि क्षमं यत् तत् सर्वेषामेव वानरा:॥ १०॥

‘आपलोगोंकी भलाईके लिये ही मैंने ये बातें कही हैं। यदि अच्छी लगें तो आप इन्हें स्वीकार करें। अथवा वानरो! जो सबके लिये उचित हो, वह कार्य आप ही लोग बतावें’॥ १०॥

अङ्गदस्य वच: श्रुत्वा वचनं गन्धमादन:।

उवाच व्यक्तया वाचा पिपासाश्रमखिन्नया॥ ११॥

अङ्गदकी यह बात सुनकर गन्धमादनने प्यास और थकावटसे शिथिल हुई स्पष्ट वाणीमें कहा—॥ ११॥

सदृशं खलु वो वाक्यमङ्गदो यदुवाच ह।

हितं चैवानुकूलं च क्रियतामस्य भाषितम्॥ १२॥

‘वानरो! युवराज अङ्गदने जो बात कही है, वह आपलोगोंके योग्य, हितकर और अनुकूल है; अत: सब लोग इनके कथनानुसार कार्य करें॥ १२॥

पुनर्मार्गामहे शैलान् कन्दरांश्च शिलांस्तथा।

काननानि च शून्यानि गिरिप्रस्रवणानि च॥ १३॥

‘हमलोग पुन: पर्वतों, कन्दराओं, शिलाओं, निर्जन वनों और पर्वतीय झरनोंकी खोज करें॥ १३॥

यथोद्दिष्टानि सर्वाणि सुग्रीवेण महात्मना।

विचिन्वन्तु वनं सर्वे गिरिदुर्गाणि संगता:॥ १४॥

‘महात्मा सुग्रीवने जिन स्थानोंकी चर्चा की थी, उन सबमें वन और पर्वतीय दुर्गम प्रदेशोंमें सब वानर एक साथ होकर खोज आरम्भ करें’॥ १४॥

तत: समुत्थाय पुनर्वानरास्ते महाबला:।

विन्ध्यकाननसंकीर्णां विचेरुर्दक्षिणां दिशम्॥ १५॥

यह सुनकर वे महाबली वानर उठकर खड़े हो गये और विन्ध्य पर्वतके काननोंसे व्याप्त दक्षिण दिशामें विचरने लगे॥ १५॥

ते शारदाभ्रप्रतिमं श्रीमद्रजतपर्वतम्।

शृङ्गवन्तं दरीवन्तमधिरुह्य च वानरा:॥ १६॥

सामने शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभाशाली रजत पर्वत दिखायी दिया, जिसमें अनेक शिखर और कन्दराएँ थीं। वे सब वानर उसपर चढ़कर खोजने लगे॥ १६॥

तत्र लोध्रवनं रम्यं सप्तपर्णवनानि च।

विचिन्वन्तो हरिवरा: सीतादर्शनकांक्षिण:॥ १७॥

सीताके दर्शनकी इच्छा रखनेवाले वे सभी श्रेष्ठ वानर वहाँके रमणीय लोध्रवनमें और सप्तपर्ण (छितवन) के जंगलोंमें उनकी खोज करने लगे॥ १७॥

तस्याग्रमधिरूढास्ते श्रान्ता विपुलविक्रमा:।

न पश्यन्ति स्म वैदेहीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥ १८॥

उस पर्वतके शिखरपर चढ़े हुए वे महापराक्रमी वानर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये, परंतु श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी रानी सीताका दर्शन न पा सके॥ १८॥

ते तु दृष्टिगतं दृष्ट्वा तं शैलं बहुकन्दरम्।

अध्यारोहन्त हरयो वीक्षमाणा: समन्तत:॥ १९॥

अनेक कन्दराओंवाले उस पर्वतका अच्छी तरह निरीक्षण करके सब ओर दृष्टिपात करनेवाले वे वानर उससे नीचे उतर गये॥ १९॥

अवरुह्य ततो भूमिं श्रान्ता विगतचेतस:।

स्थिता मुहूर्तं तत्राथ वृक्षमूलमुपाश्रिता:॥ २०॥

पृथ्वीपर उतरकर अधिक थक जानेके कारण अचेत हुए वे सभी वानर वहाँ एक वृक्षके नीचे गये और दो घड़ीतक वहाँ बैठे रहे॥ २०॥

ते मुहूर्तं समाश्वस्ता: किंचिद्भग्नपरिश्रमा:।

पुनरेवोद्यता: कृत्स्नां मार्गितुं दक्षिणां दिशम्॥ २१॥

एक मुहूर्ततक सुस्ता लेनेपर जब उनकी थकावट कुछ कम हो गयी तब वे पुन: सम्पूर्ण दक्षिण दिशामें खोजके लिये उद्यत हो गये॥ २१॥

हनुमत्प्रमुखास्तावत् प्रस्थिता: प्लवगर्षभा:।

विन्ध्यमेवादित: कृत्वा विचेरुश्च समन्तत:॥ २२॥

हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर सीताके अन्वेषणके लिये प्रस्थित हो पहले विन्ध्य पर्वतके ही चारों ओर विचरने लगे॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनपञ्चाश: सर्ग:॥ ४९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥

 

पञ्चाश: सर्ग:

भूखे-प्यासे वानरोंका एक गुफामें घुसकर वहाँ दिव्य वृक्ष, दिव्य सरोवर, दिव्य भवन तथा एक वृद्धा तपस्विनीको देखना और हनुमान्‌जीका उससे उसका परिचय पूछना

सह ताराङ्गदाभ्यां तु संगम्य हनुमान् कपि:।

विचिनोति च विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च॥ १॥

हनुमान्‌जी तार और अङ्गदके साथ मिलकर विन्ध्यगिरिकी गुफाओं और घने जंगलोंमें सीताजीको ढूँढ़ने लगे॥ १॥

सिंहशार्दूलजुष्टाश्च गुहाश्च परितस्तदा।

विषमेषु नगेन्द्रस्य महाप्रस्रवणेषु च॥ २॥

उन्होंने सिंह और बाघोंसे भरी हुई कन्दराओं तथा उसके आस-पासकी भूमिको भी छान डाला। गिरिराज विन्ध्यपर जो बड़े-बड़े झरने और दुर्गम स्थान थे, वहाँ भी अन्वेषण किया॥ २॥

आसेदुस्तस्य शैलस्य कोटिं दक्षिणपश्चिमाम्।

तेषां तत्रैव वसतां स कालो व्यत्यवर्तत॥ ३॥

घूमते-फिरते वे तीनों वानर उस पर्वतके नैऋर्त्य-कोणवाले शिखरपर जा पहुँचे। वहीं रहते हुए उनका वह समय, जो सुग्रीवने निश्चित किया था, बीत गया॥ ३॥

स हि देशो दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान्।

तत्र वायुसुत: सर्वं विचिनोति स्म पर्वतम्॥ ४॥

गुफाओं और जंगलोंसे भरे हुए उस महान् प्रदेशमें सीताको ढूँढ़नेका काम बहुत ही कठिन था तो भी वहाँ वायुपुत्र हनुमान्‌जी सारे पर्वतकी छानबीन करने लगे॥ ४॥

परस्परेण रहिता अन्योन्यस्याविदूरत:।

गजो गवाक्षो गवय: शरभो गन्धमादन:॥ ५॥

मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमान् जाम्बवानपि।

अङ्गदो युवराजश्च तारश्च वनगोचर:॥ ६॥

गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम्।

विचिन्वन्तस्ततस्तत्र ददृशुर्विवृतं बिलम्॥ ७॥

फिर अलग-अलग एक-दूसरेसे थोड़ी ही दूरपर रहकर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान्, जाम्बवान्, युवराज अङ्गद तथा वनवासी वानर तार—ये दक्षिण दिशाके देशोंमें जो पर्वतमालाओंसे घिरे हुए थे, सीताकी खोज करने लगे। खोजते-खोजते उन्हें वहाँ एक गुफा दिखायी दी, जिसका द्वार बंद नहीं था॥ ५—७॥

दुर्गमृक्षबिलं नाम दानवेनाभिरक्षितम्।

क्षुत्पिपासापरीतास्तु श्रान्तास्तु सलिलार्थिन:॥ ८॥

उसमें प्रवेश करना बहुत कठिन था। वह गुफा ऋक्षबिल नामसे विख्यात थी और एक दानव उसकी रक्षामें रहता था। वानरोंको भूख-प्यास सता रही थी। वे बहुत थक गये थे और पानी पीना चाहते थे॥ ८॥

अवकीर्णं लतावृक्षैर्ददृशुस्ते महाबिलम्।

तत्र क्रौञ्चाश्च हंसाश्च सारसाश्चापि निष्क्रमन्॥ ९॥

जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च रक्ताङ्गा: पद्मरेणुभि:।

अत: लता और वृक्षोंसे आच्छादित विशाल गुफाकी ओर वे देखने लगे। इतनेमें उसके भीतरसे क्रौञ्च, हंस, सारस तथा जलसे भीगे हुए चक्रवाक पक्षी, जिनके अङ्ग कमलोंके परागसे रक्तवर्णके हो रहे थे, बाहर निकले॥

ततस्तद् बिलमासाद्य सुगन्धि दुरतिक्रमम्॥ १०॥

विस्मयव्यग्रमनसो बभूवुर्वानरर्षभा:।

संजातपरिशङ्कास्ते तद् बिलं प्लवगोत्तमा:॥ ११॥

तब उस सुगन्धित एवं दुर्लङ्‌घ्य गुफाके पास जाकर उन सभी श्रेष्ठ वानरोंका मन आश्चर्यसे चकित हो उठा। उस बिलके अंदर उन्हें जल होनेका संदेह हुआ॥

अभ्यपद्यन्त संहृष्टास्तेजोवन्तो महाबला:।

नानासत्त्वसमाकीर्णं दैत्येन्द्रनिलयोपमम्॥ १२॥

दुर्दर्शमिव घोरं च दुर्विगाह्यं च सर्वश:।

वे महाबली और तेजस्वी वानर बड़े हर्षमें भरकर उस गुफाके पास आये, जो नाना प्रकारके जन्तुओंसे भरी हुई तथा दैत्यराजोंके निवासस्थान पातालके समान भयंकर प्रतीत होती थी। वह इतनी भयानक थी कि उसकी ओर देखना कठिन जान पड़ता था। उसके भीतर घुसना सर्वथा कष्टसाध्य था॥ १२/

तत: पर्वतकूटाभो हनूमान् मारुतात्मज:॥ १३॥

अब्रवीद् वानरान् घोरान् कान्तारवनकोविद:।

उस समय पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होनेवाले पवनपुत्र हनुमान्‌जी, जो दुर्गम वनके ज्ञाता थे, उन घोर वानरोंसे बोले—॥ १३/

गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम्॥ १४॥

वयं सर्वे परिश्रान्ता न च पश्याम मैथिलीम्।

‘बन्धुओ! दक्षिण दिशाके देश प्राय: पर्वतमालाओंसे घिरे हुए हैं। इनमें मिथिलेशकुमारी सीताको खोजते-खोजते हम सब लोग बहुत थक गये; किंतु कहीं भी हमें उनके दर्शन नहीं हुए॥ १४/

अस्माच्चापि बिलाद्धंसा: क्रौञ्चाश्च सह सारसै:॥ १५॥

जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च निष्पतन्ति स्म सर्वश:।

नूनं सलिलवानत्र कूपो वा यदि वा हृद:॥ १६॥

तथा चेमे बिलद्वारे स्निग्धास्तिष्ठन्ति पादपा:।

‘सामनेकी इस गुफासे हंस, क्रौञ्च, सारस और जलसे भीगे हुए चकवे सब ओर निकल रहे हैं। अत: निश्चय ही इसमें पानीका कुआँ अथवा और कोई जलाशय होना चाहिये। तभी इस गुफाके द्वारवर्ती वृक्ष हरे-भरे हैं’॥

इत्युक्तास्तद् बिलं सर्वे विविशुस्तिमिरावृतम्॥ १७॥

अचन्द्रसूर्यं हरयो ददृशू रोमहर्षणम्।

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर वे सभी वानर अन्धकारसे भरी हुई गुफामें, जहाँ चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं, घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह गुफा रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी॥ १७/

निशाम्य तस्मात् सिंहांश्च तांस्तांश्च मृगपक्षिण:॥ १८॥

प्रविष्टा हरिशार्दूला बिलं तिमिरसंवृतम्।

उस बिलसे निकलते हुए उन-उन सिंहों, मृगों और पक्षियोंको देखकर वे श्रेष्ठ वानर अन्धकारसे आच्छादित हुई उस गुफामें प्रवेश करने लगे॥ १८/

न तेषां सज्जते दृष्टिर्न तेजो न पराक्रम:॥ १९॥

वायोरिव गतिस्तेषां दृष्टिस्तमसि वर्तते।

उनकी दृष्टि कहीं अटकती नहीं थी। उनका तेज और पराक्रम भी अवरुद्ध नहीं होता था। उनकी गति वायुके समान थी। अन्धकारमें भी उनकी दृष्टि काम कर रही थी॥ १९/

ते प्रविष्टास्तु वेगेन तद् बिलं कपिकुञ्जरा:॥ २०॥

प्रकाशं चाभिरामं च ददृशुर्देशमुत्तमम्।

वे श्रेष्ठ वानर उस बिलमें वेगपूर्वक घुस गये। भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह स्थान बहुत ही उत्तम, प्रकाशमान और मनोहर था॥ २०/

ततस्तस्मिन् बिले भीमे नानापादपसंकुले॥ २१॥

अन्योन्यं सम्परिष्वज्य जग्मुर्योजनमन्तरम्।

नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरी हुई उस भयंकर गुफामें वे एक योजनतक एक-दूसरेको पकड़े हुए गये॥ २१/

ते नष्टसंज्ञास्तृषिता: सम्भ्रान्ता: सलिलार्थिन:॥ २२॥

परिपेतुर्बिले तस्मिन् कंचित् कालमतन्द्रिता:।

प्यासके मारे उनकी चेतना लुप्त-सी हो रही थी। वे जल पीनेके लिये उत्सुक होकर घबरा गये थे और कुछ कालतक आलस्यरहित हो उस बिलमें लगातार आगे बढ़ते गये॥ २२/

ते कृशा दीनवदना: परिश्रान्ता: प्लवङ्गमा:॥ २३॥

आलोकं ददृशुर्वीरा निराशा जीविते यदा।

वे वानरवीर जब दुर्बल, खिन्नवदन और श्रान्त होकर जीवनसे निराश हो गये, तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखायी दिया॥ २३/

ततस्तं देशमागम्य सौम्या वितिमिरं वनम्॥ २४॥

ददृशु: काञ्चनान् वृक्षान् दीप्तवैश्वानरप्रभान्।

तदनन्तर उस अन्धकारसे प्रकाशपूर्ण देशमें आकर उन सौम्य वानरोंने वहाँ अन्धकाररहित वन देखा, जहाँके सभी वृक्ष सुवर्णमय थे और उनसे अग्निके समान प्रभा निकल रही थी॥ २४/

सालांस्तालांस्तमालांश्च पुंनागान् वञ्जुलान् धवान्॥ २५॥

चम्पकान् नागवृक्षांश्च कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।

साल, ताल, तमाल, नागकेसर, अशोक, धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर—ये सभी वृक्ष फूलोंसे भरे हुए थे॥

स्तबकै: काञ्चनैश्चित्रै रक्तै: किसलयैस्तथा॥ २६॥

आपीडैश्च लताभिश्च हेमाभरणभूषितान्।

विचित्र सुवर्णमय गुच्छे और लाल-लाल पल्लव मानो उन वृक्षोंके मुकुट थे। उनमें लताएँ लिपटी हुई थीं तथा वे अपने फलस्वरूप सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित थे॥ २६/

तरुणादित्यसंकाशान् वैदूर्यमयवेदिकान्॥ २७॥

बिभ्राजमानान् वपुषा पादपांश्च हिरण्मयान्।

वे देखनेमें प्रात:कालिक सूर्यके समान जान पड़ते थे। उनके नीचे वैदूर्यमणिकी वेदी बनी थी। वे सुवर्णमय वृक्ष अपने दीप्तिमान् स्वरूपसे ही प्रकाशित हो रहे थे॥

नीलवैदूर्यवर्णाश्च पद्मिनी: पतगैर्वृता:॥ २८॥

महद्भि: काञ्चनैर्वृक्षैर्वृता बालार्कसंनिभै:।

जातरूपमयैर्मत्स्यैर्महद्भिश्चाथ पङ्कजै:॥ २९॥

नलिनीस्तत्र ददृशु: प्रसन्नसलिलायुता:।

वहाँ नील वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाली पद्मलताएँ दिखायी देती थीं, जो पक्षियोंसे आवृत थीं। कई ऐसे सरोवर भी देखनेमें आये, जो बाल सूर्यकी-सी आभावाले विशाल काञ्चनवृक्षोंसे घिरे हुए थे। उनके भीतर सुनहरे रंगके बड़े-बड़े मत्स्य शोभा पाते थे। वे सरोवर सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित तथा स्वच्छ जलसे भरे हुए थे॥ २८-२९/

काञ्चनानि विमानानि राजतानि तथैव च॥ ३०॥

तपनीयगवाक्षाणि मुक्ताजालावृतानि च।

हैमराजतभौमानि वैदूर्यमणिमन्ति च॥ ३१॥

ददृशुस्तत्र हरयो गृहमुख्यानि सर्वश:।

वानरोंने वहाँ सब ओर सोने-चाँदीके बने हुए बहुत-से श्रेष्ठ भवन देखे, जिनकी खिड़कियाँ मोतीकी जालियोंसे ढकी थीं। उन भवनोंमें सोनेके जँगले लगे हुए थे। सोने-चाँदीके ही विमान भी थे। कोई घर सोनेके बने थे तो कोई चाँदीके। कितने ही गृह पार्थिव वस्तुओं (ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि-) से निर्मित हुए थे। उनमें वैदूर्यमणियाँ भी जड़ी गयी थीं॥ ३०-३१/

पुष्पितान् फलिनो वृक्षान् प्रवालमणिसंनिभान्॥ ३२॥

काञ्चनभ्रमरांश्चैव मधूनि च समन्तत:।

मणिकाञ्चनचित्राणि शयनान्यासनानि च॥ ३३॥

विविधानि विशालानि ददृशुस्ते समन्तत:।

हैमराजतकांस्यानां भाजनानां च राशय:॥ ३४॥

अगुरूणां च दिव्यानां चन्दनानां च संचयान्।

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च॥ ३५॥

महार्हाणि च यानानि मधूनि रसवन्ति च।

दिव्यानामम्बराणां च महार्हाणां च संचयान्॥ ३६॥

कम्बलानां च चित्राणामजिनानां च संचयान्।

तत्र तत्र च विन्यस्तान् दीप्तान् वैश्वानरप्रभान्॥ ३७॥

ददृशुर्वानरा: शुभ्राञ्जातरूपस्य संचयान्।

वहाँके वृक्षोंमें फूल और फल लगे थे। वे वृक्ष मूँगे और मणियोंके समान चमकीले थे। उनपर सुनहरे रंगके भौंरे मड़रा रहे थे। वहाँके घरोंमें सब ओर मधु संचित थे। मणि और सुवर्णसे जटित विचित्र पलंग तथा आसन सब ओर सजाकर रखे गये थे, जो अनेक प्रकारके और विशाल थे। वानरोंने उन्हें भी देखा। वहाँ ढेर-के-ढेर सोने, चाँदी और कांस-(फूल-) के पात्र रखे गये थे। अगुरु तथा दिव्य चन्दनकी राशियाँ सुरक्षित थीं। पवित्र भोजनके सामान तथा फल-मूल भी विद्यमान थे। बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, महामूल्यवान् दिव्य वस्त्रोंके ढेर, विचित्र कम्बल एवं कालीनोंकी राशियाँ तथा मृगचर्मोंके समूह जहाँ-तहाँ रखे हुए थे। वे सब अग्निके समान प्रभासे उद्दीप्त हो रहे थे। वानरोंने वहाँ चमकीले सुवर्णके ढेर भी देखे॥ ३२—३७/

तत्र तत्र विचिन्वन्तो बिले तत्र महाप्रभा:॥ ३८॥

ददृशुर्वानरा: शूरा: स्त्रियं कांचिददूरत:।

तां च ते ददृशुस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम्॥ ३९॥

तापसीं नियताहारां ज्वलन्तीमिव तेजसा।

विस्मिता हरयस्तत्र व्यवतिष्ठन्त सर्वश:।

पप्रच्छ हनुमांस्तत्र कासि त्वं कस्य वा बिलम्॥ ४०॥

उस गुफामें जहाँ-तहाँ खोज करते हुए उन महातेजस्वी शूरवीर वानरोंने थोड़ी ही दूरपर किसी स्त्रीको भी देखा, जो वल्कल और काला मृगचर्म पहनकर नियमित आहार करती तपस्यामें संलग्न थी और अपने तेजसे दिप रही थी। वानरोंने वहाँ उसे बड़े ध्यानसे देखा और आश्चर्यचकित होकर सब ओर खड़े रहे। उस समय हनुमान् जी ने उससे पूछा—‘देवि! तुम कौन हो और यह किसकी गुफा है?’॥

ततो हनूमान् गिरिसंनिकाश:

कृताञ्जलिस्तामभिवाद्य वृद्धाम्।

पप्रच्छ का त्वं भवनं बिलं च

रत्नानि चेमानि वदस्व कस्य॥ ४१॥

पर्वतके समान विशालकाय हनुमान् जी ने हाथ जोड़कर उस वृद्धा तपस्विनीको प्रणाम किया और पूछा—‘देवि! तुम कौन हो? यह गुफा, ये भवन तथा ये रत्न किसके हैं? यह हमें बताओ’॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाश: सर्ग:॥ ५०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥

 

एकपञ्चाश: सर्ग:

हनुमान्‌जीके पूछनेपर वृद्धा तापसीका अपना तथा उस दिव्य स्थानका परिचय देकर सब वानरोंको भोजनके लिये कहना

इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम्।

अब्रवीत् तां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्॥ १॥

इस तरह पूछकर हनुमान्‌जी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करनेवाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनीसे वहाँ फिर बोले॥ १॥

इदं प्रविष्टा: सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।

क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता: परिखिन्नाश्च सर्वश:॥ २॥

महद् धरण्या विवरं प्रविष्टा: स्म पिपासिता:।

इमांस्त्वेवंविधान् भावान् विविधानद्भुतोपमान्॥ ३॥

दृष्ट्वा वयं प्रव्यथिता: सम्भ्रान्ता नष्टचेतस:।

कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसंनिभा:॥ ४॥

‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावटसे कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफामें घुस आये। भूतलका यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्याससे पीड़ित होनेके कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँके इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थोंको देखकर हमारे मनमें बड़ी व्यथा हुई है—हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरोंकी माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मनमें घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्यके समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं?॥ २—४॥

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च।

काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च॥ ५॥

तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।

पुष्पिता: फलवन्तश्च पुण्या: सुरभिगन्धय:॥ ६॥

इमे जाम्बूनदमया: पादपा: कस्य तेजसा।

‘ये भोजनकी पवित्र वस्तुएँ, फल-मूल, सोनेके विमान, चाँदीके घर, मणियोंकी जालीसे ढकी हुई सोनेकी खिड़कियाँ तथा पवित्र सुगन्धसे युक्त एवं फल-फूलोंसे लदे हुए ये सुवर्णमय पावन वृक्ष किसके तेजसे प्रकट हुए हैं?॥

काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले॥ ७॥

कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपै:।

आत्मनस्त्वनुभावाद् वा कस्य चैतत्तपोबलम्॥ ८॥

अजानतां न: सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।

‘यहाँके निर्मल जलमें सोनेके कमल कैसे उत्पन्न हुए? इन सरोवरोंके मत्स्य और कछुए सुवर्णमय कैसे दिखायी देते हैं? यह सब तुम्हारे अपने प्रभावसे हुआ है या और किसीके? यह किसके तपोबलका प्रभाव है? हम सब अनजान हैं; इसलिये पूछते हैं। तुम हमें सारी बातें बतानेकी कृपा करो’॥ ७-८/

एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी॥ ९॥

प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता।

हनुमान्‌जीके इस प्रकार पूछनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उस धर्मपरायणा तापसीने उत्तर दिया—॥ ९/

मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभ॥ १०॥

तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम्।

‘वानरश्रेष्ठ! मायाविशारद महातेजस्वी मयका नाम तुमने सुना होगा। उसीने अपनी मायाके प्रभावसे इस समूचे स्वर्णमय वनका निर्माण किया था॥ १०/

पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह॥ ११॥

येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम्।

‘मयासुर पहले दानव-शिरोमणियोंका विश्वकर्मा था, जिसने इस दिव्य सुवर्णमय उत्तम भवनको बनाया है॥ १९/

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महद्वने॥ १२॥

पितामहाद् वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम्।

‘उसने एक सहस्र वर्षोंतक वनमे घोर तपस्या करके ब्रह्माजी-से वरदानके रूपमें शुक्राचार्यका सारा शिल्प-वैभव प्राप्त किया था॥ १२/

विधाय सर्वं बलवान् सर्वकामेश्वरस्तदा॥ १३॥

उवास सुखित: कालं कंचिदस्मिन् महावने।

‘सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी बलवान् मयासुरने यहाँकी सारी वस्तुओंका निर्माण करके इस महान् वनमें कुछ कालतक सुखपूर्वक निवास किया था॥ १३/

तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम्॥ १४॥

विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेश: पुरंदर:।

‘आगे चलकर उस दानवराजका हेमा नामकी अप्सराके साथ सम्पर्क हो गया। यह जानकर देवेश्वर इन्द्रने हाथमें वज्र ले उसके साथ युद्ध करके उसे मार भगाया॥ १४/

इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम्॥ १५॥

शाश्वत: कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम्।

‘तत्पश्चात् ब्रह्माजीने यह उत्तम वन, यहाँका अक्षय काम-भोग तथा यह सोनेका भवन हेमाको दे दिया॥

दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्या: स्वयंप्रभा॥ १६॥

इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम।

‘मैं मेरुसावर्णिकी कन्या हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। वानरश्रेष्ठ! मैं उस हेमाके इस भवनकी रक्षा करती हूँ॥

मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा॥ १७॥

तयादत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनं महत्।

‘नृत्य और गीतकी कलामें चतुर हेमा मेरी प्यारी सखी है। उसने मुझसे अपने भवनकी रक्षाके लिये प्रार्थना की थी, इसलिये मैं इस विशाल भवनका संरक्षण करती हूँ॥ १७/

किं कार्यं कस्य वा हेतो: कान्ताराणि प्रपद्यथ॥ १८॥

कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम्।

‘तुमलोगोंका यहाँ क्या काम है? किस उद्देश्यसे तुम इन दुर्गम स्थानोंमें विचरते हो? इस वनमें आना तो बहुत कठिन है। तुमने कैसे इसे देख लिया?॥ १८/

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च।

भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हसि॥ १९॥

‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं। इन्हें खाकर पानी पी लो। फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकपञ्चाश: सर्ग:॥ ५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥

 

द्विपञ्चाश: सर्ग:

तापसी स्वयंप्रभाके पूछनेपर वानरोंका उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभावसे गुफाके बाहर निकलकर समुद्रतटपर पहुँचना

अथ तानब्रवीत् सर्वान् विश्रान्तान् हरियूथपान्।

इदं वचनमेकाग्रा तापसी धर्मचारिणी॥ १॥

तत्पश्चात् जब सब वानर-यूथपति खा-पीकर विश्राम कर चुके, तब धर्मका आचरण करनेवाली वह एकाग्रहृदया तपस्विनी उन सबसे इस प्रकार बोली—॥ १॥

वानरा यदि व: खेद: प्रणष्ट: फलभक्षणात्।

यदि चैतन्मया श्राव्यं श्रोतुमिच्छामि तां कथाम्॥ २॥

‘वानरो! यदि फल खानेसे तुम्हारी थकावट दूर हो गयी हो और यदि तुम्हारा वृत्तान्त मेरे सुनने योग्य हो तो मैं उसे सुनना चाहती हूँ’॥ २॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मज:।

आर्जवेन यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे॥ ३॥

उसकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान्जी बड़ी सरलताके साथ यथार्थ बात कहने लगे—॥ ३॥

राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपम:।

रामो दाशरथि: श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम्॥ ४॥

‘देवि! सम्पूर्ण जगत्के राजा दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम, जो देवराज इन्द्र और वरुणके समान तेजस्वी हैं, दण्डकारण्यमें पधारे थे॥ ४॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया।

तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात्॥ ५॥

‘उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता भी थीं। जनस्थानमें आकर रावणने उनकी स्त्रीका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ५॥

वीरस्तस्य सखा राज्ञ: सुग्रीवो नाम वानर:।

राजा वानरमुख्यानां येन प्रस्थापिता वयम्॥ ६॥

अगस्त्यचरितामाशां दक्षिणां यमरक्षिताम्।

सहैभिर्वानरैर्मुख्यैरङ्गदप्रमुखैर्वयम् ॥ ७॥

‘श्रेष्ठ वानरोंके राजा वानरजातीय वीरवर सुग्रीव महाराज श्रीरामचन्द्रजीके मित्र हैं, जिन्होंने इन अङ्गद आदि प्रधान वीरोंके साथ हमलोगोंको सीताकी खोज करनेके लिये अगस्त्यसेवित और यमराजद्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें भेजा है॥ ६-७॥

रावणं सहिता: सर्वे राक्षसं कामरूपिणम्।

सीतया सह वैदेह्या मार्गध्वमिति चोदिता:॥ ८॥

‘उन्होंने आज्ञा दी थी कि तुम सब लोग एक साथ रहकर विदेहकुमारी सीतासहित उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसराज रावणका पता लगाना॥ ८॥

विचित्य तु वनं सर्वं समुद्रं दक्षिणां दिशम्।

वयं बुभुक्षिता: सर्वे वृक्षमूलमुपाश्रिता:॥ ९॥

‘हमने यहाँका सारा जंगल छान डाला। अब दक्षिण दिशामें समुद्रके भीतर उनका अन्वेषण करना है। अबतक सीताका कुछ पता नहीं लगा और हमलोग भूख-प्याससे पीड़ित हो गये। अन्तमें हम सब-के-सब एक वृक्षके नीचे थककर बैठ गये॥ ९॥

विवर्णवदना: सर्वे सर्वे ध्यानपरायणा:।

नाधिगच्छामहे पारं मग्नाश्चिन्तामहार्णवे॥ १०॥

‘हमारे मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। हम सभी चिन्तामें मग्न हो गये। चिन्ताके महासागरमें डूबकर हम उसका पार नहीं पा रहे थे॥ १०॥

चारयन्तस्ततश्चक्षुर्दृष्टवन्तो महद् बिलम्।

लतापादपसंछन्नं तिमिरेण समावृतम्॥ ११॥

‘इसी समय चारों ओर दृष्टि दौड़ानेपर हमको यह विशाल गुफा दिखायी पड़ी, जो लता और वृक्षोंसे ढकी हुई तथा अन्धकारसे आच्छन्न थी॥ ११॥

अस्माद्धंसा जलक्लिन्ना: पक्षै: सलिलरेणुभि:।

कुररा: सारसाश्चैव निष्पतन्ति पतत्त्रिण:॥ १२॥

‘थोड़ी ही देरमें इस गुफासे हंस, कुरर और सारस आदि पक्षी निकले, जिनके पंख जलसे भीगे थे और उनमें कीचड़ लगी हुई थी॥ १२॥

साध्वत्र प्रविशामेति मया तूक्ता: प्लवङ्गमा:।

तेषामपि हि सर्वेषामनुमानमुपागतम्॥ १३॥

‘तब मैंने वानरोंसे कहा, ‘अच्छा होगा कि हमलोग इसके भीतर प्रवेश करें’। इन सब वानरोंको भी यह अनुमान हो गया कि गुफाके भीतर पानी है॥ १३॥

अस्मिन् निपतिता: सर्वेऽप्यथ कार्यत्वरान्विता:।

ततो गाढं निपतिता गृह्य हस्तै: परस्परम्॥ १४॥

‘हम सब लोग अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उतावले थे ही, अत: इस गुफामें कूद पड़े। अपने हाथोंसे एक-दूसरेको दृढ़तापूर्वक पकड़कर हम गुफामें आगे बढ़ने लगे॥ १४॥

इदं प्रविष्टा: सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।

एतन्न: कार्यमेतेन कृत्येन वयमागता:॥ १५॥

‘इस तरह सहसा हमलोगोंने इस अँधेरी गुफामें प्रवेश किया। यही हमारा कार्य है और इसी कार्यसे हम इधर आये हैं॥ १५॥

त्वां चैवोपगता: सर्वे परिद्यूना बुभुक्षिता:।

आतिथ्यधर्मदत्तानि मूलानि च फलानि च॥ १६॥

अस्माभिरुपयुक्तानि बुभुक्षापरिपीडितै:।

‘भूखसे व्याकुल एवं दुर्बल होनेके कारण हम सबने तुम्हारी शरण ली। तुमने आतिथ्य-धर्मके अनुसार हमें फल और मूल अर्पित किये और हमने भी भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भरपेट खाया॥ १६/

यत् त्वया रक्षिता: सर्वे म्रियमाणा बुभुक्षया॥ १७॥

ब्रूहि प्रत्युपकारार्थं किं ते कुर्वन्तु वानरा:।

‘देवि! हम भूखसे मर रहे थे। तुमने हम सब लोगोंके प्राण बचा लिये। अत: बताओ ये वानर तुम्हारे उपकारका बदला चुकानेके लिये क्या सेवा करें’॥ १७/

एवमुक्ता तु सर्वज्ञा वानरैस्तै: स्वयंप्रभा॥ १८॥

प्रत्युवाच तत: सर्वानिदं वानरयूथपान्।

स्वयंप्रभा सर्वज्ञ थी। उन वानरोंके ऐसा कहनेपर उसने उन सभी यूथपतियोंको इस प्रकार उत्तर दिया’—

सर्वेषां परितुष्टास्मि वानराणां तरस्विनाम्॥ १९॥

चरन्त्या मम धर्मेण न कार्यमिह केनचित्।

‘मैं तुम सभी वेगशाली वानरोंपर यों ही बहुत संतुष्ट हूँ। धर्मानुष्ठानमें लगी रहनेके कारण मुझे किसीसे कोई प्रयोजन नहीं रह गया है’॥ १९/

एवमुक्त: शुभं वाक्यं तापस्या धर्मसंहितम्॥ २०॥

उवाच हनुमान् वाक्यं तामनिन्दितलोचनाम्।

उस तपस्विनीने जब इस प्रकार धर्मयुक्त उत्तम बात कही, तब हनुमान् जी ने निर्दोष दृष्टिवाली उस देवीसे यों कहा—॥ २०/

शरणं त्वां प्रपन्ना: स्म: सर्वे वै धर्मचारिणीम्॥ २१॥

य: कृत: समयोऽस्मासु सुग्रीवेण महात्मना।

स तु कालो व्यतिक्रान्तो बिले च परिवर्तताम्॥ २२॥

‘देवि! तुम धर्माचरणमें लगी हुई हो। अत: हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं। महात्मा सुग्रीवने हमलोगोंके लौटनेके लिये जो समय निश्चित किया था, वह इस गुफाके भीतर घूमनेमें ही बीत गया॥ २१-२२॥

सा त्वमस्माद् बिलादस्मानुत्तारयितुमर्हसि।

तस्मात् सुग्रीववचनादतिक्रान्तान् गतायुष:॥ २३॥

त्रातुमर्हसि न: सर्वान् सुग्रीवभयशङ्कितान्।

‘अब तुम कृपा करके हमें इस बिलसे बाहर निकाल दो। सुग्रीवके बताये हुए समयको हम लाँघ चुके हैं, इसलिये अब हमारी आयु पूरी हो चुकी है। हम सबके-सब सुग्रीवके भयसे डरे हुए हैं। अत: तुम हमारा उद्धार करो॥ २३/

महच्च कार्यमस्माभि: कर्तव्यं धर्मचारिणि॥ २४॥

तच्चापि न कृतं कार्यमस्माभिरिह वासिभि:।

‘धर्मचारिणि! हमें जो महान् कार्य करना है, उसे भी हम इस गुफामें रहनेके कारण नहीं कर सके हैं’॥

एवमुक्ता हनुमता तापसी वाक्यमब्रवीत्॥ २५॥

जीवता दुष्करं मन्ये प्रविष्टेन निवर्तितुम्।

तपस: सुप्रभावेण नियमोपार्जितेन च॥ २६॥

सर्वानेव बिलादस्मात् तारयिष्यामि वानरान्।

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर तापसी बोली—‘मैं समझती हूँ जो एक बार इस गुफामें चला आता है, उसका जीते-जी यहाँसे लौटना बहुत कठिन हो जाता है। तथापि नियमोंके पालन और तपस्याके उत्तम प्रभावसे मैं तुम सभी वानरोंको इस गुफासे बाहर निकाल दूँगी॥

निमीलयत चक्षूंषि सर्वे वानरपुङ्गवा:॥ २७॥

नहि निष्क्रमितुं शक्यमनिमीलितलोचनै:।

‘श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग अपनी-अपनी आँखें बंद कर लो। आँख बंद किये बिना यहाँसे निकलना असम्भव है’॥ २७/

ततो निमीलिता: सर्वे सुकुमाराङ्गुलै: करै:॥ २८॥

सहसा पिदधुर्दृष्टिं हृष्टा गमनकांक्षया।

यह सुनकर सबने सुकुमार अङ्गुलिवाले हाथोंसे आँखें मूँद लीं। गुफासे बाहर निकलनेकी इच्छासे प्रसन्न होकर उन सबने सहसा नेत्र बंद कर लिये॥ २८/

वानरास्तु महात्मानो हस्तरुद्धमुखास्तदा॥ २९॥

निमेषान्तरमात्रेण बिलादुत्तारितास्तया।

इस प्रकार उस समय हाथोंसे मुँह ढक लेनेके कारण उन महात्मा वानरोंको स्वयंप्रभाने पलक मारते-मारते बिलसे बाहर निकाल दिया॥ २९/

उवाच सर्वांस्तांस्तत्र तापसी धर्मचारिणी॥ ३०॥

नि:सृतान् विषमात् तस्मात् समाश्वास्येदमब्रवीत्।

तत्पश्चात् वहाँ उस धर्मपरायणा तापसीने उस विषम गुफासे बाहर निकले हुए समस्त वानरोंको आश्वासन देकर इस प्रकार कहा—॥ ३०/

एष विन्ध्यो गिरि: श्रीमान् नानाद्रुमलतायुत:॥ ३१॥

एष प्रस्रवण: शैल: सागरोऽयं महोदधि:।

स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभा:।

इत्युक्त्वा तद् बिलं श्रीमत् प्रविवेश स्वयंप्रभा॥ ३२॥

‘श्रेष्ठ वानरो! यह रहा नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त शोभाशाली विन्ध्यगिरि। इधर यह प्रस्रवणगिरि है और सामने यह महासागर लहरा रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने स्थानपर जाती हूँ।’ ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफामें चली गयी॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग:॥ ५२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

 

त्रिपञ्चाश: सर्ग:

लौटनेकी अवधि बीत जानेपर भी कार्य सिद्ध न होनेके कारण सुग्रीवके कठोर दण्डसे डरनेवाले अङ्गद आदि वानरोंका उपवास करके प्राण त्याग देनेका निश्चय

ततस्ते ददृशुर्घोरं सागरं वरुणालयम्।

अपारमभिगर्जन्तं घोरैरूर्मिभिराकुलम्॥ १॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ वानरोंने वरुणकी निवासभूमि भयंकर महासागरको देखा, जिसका कहीं पार नहीं था और जो भयानक लहरोंसे व्याप्त होकर निरन्तर गर्जना कर रहा था॥ १॥

मयस्य मायाविहितं गिरिदुर्गं विचिन्वताम्।

तेषां मासो व्यतिक्रान्तो यो राज्ञा समय: कृत:॥ २॥

मयासुरके अपनी मायाद्वारा बनाये हुए पर्वतकी दुर्गम गुफामें सीताकी खोज करते हुए उन वानरोंका वह एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीवने लौटनेका समय निश्चित किया था॥ २॥

विन्ध्यस्य तु गिरे: पादे सम्प्रपुष्पितपादपे।

उपविश्य महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तदा॥ ३॥

विन्ध्यगिरिके पार्श्ववर्ती पर्वतपर, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे थे, बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे॥ ३॥

तत: पुष्पातिभाराग्राँल्लताशतसमावृतान्।

द्रुमान् वासन्तिकान् दृष्ट्वा बभूवुर्भयशङ्किता:॥ ४॥

जो वसन्त-ऋतुमें फलते हैं, उन आम आदि वृक्षोंकी डालियोंको मञ्जरी एवं फूलोंके अधिक भारसे झुकी हुई तथा सैकड़ों लता-वेलोंसे व्याप्त देख वे सभी सुग्रीवके भयसे थर्रा उठे (वे शरद्-ऋतुमें चले थे और शिशिर-ऋतु आ गयी थी। इसीलिये उनका भय बढ़ गया था)॥

ते वसन्तमनुप्राप्तं प्रतिवेद्य परस्परम्।

नष्टसंदेशकालार्था निपेतुर्धरणीतले॥ ५॥

वे एक-दूसरेको यह बताकर कि अब वसन्तका समय आना चाहता है, राजाके आदेशके अनुसार एक मासके भीतर जो काम कर लेना चाहिये था, वह न कर सकने या उसे नष्ट कर देनेके कारण भयके मारे पृथ्वीपर गिर पड़े॥

ततस्तान् कपिवृद्धांश्च शिष्टांश्चैव वनौकस:।

वाचा मधुरयाऽऽभाष्य यथावदनुमान्य च॥ ६॥

स तु सिंहवृषस्कन्ध: पीनायतभुज: कपि:।

युवराजो महाप्राज्ञ अङ्गदो वाक्यमब्रवीत्॥ ७॥

तब जिनके कंधे सिंह और बैलके समान मांसल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और मोटी थीं तथा जो बड़े बुद्धिमान् थे, वे युवराज अङ्गद उन श्रेष्ठ वानरों तथा अन्य वनवासी कपियोंको यथावत् सम्मान देते हुए मधुर वाणीसे सम्बोधित करके बोले—॥ ६-७॥

शासनात् कपिराजस्य वयं सर्वे विनिर्गता:।

मास: पूर्णो बिलस्थानां हरय: किं न बुध्यत॥ ८॥

वयमाश्वयुजे मासि कालसंख्याव्यवस्थिता:।

प्रस्थिता: सोऽपि चातीत: किमत: कार्यमुत्तरम्॥ ९॥

‘वानरो! हम सब लोग वानरराजकी आज्ञासे आश्विन मास बीतते-बीतते एक मासकी निश्चित अवधि स्वीकार करके सीताकी खोजके लिये निकले थे, किंतु हमारा वह एक मास उस गुफामें ही पूरा हो गया, क्या आपलोग इस बातको नहीं जानते? हम जब चले थे, तबसे लौटनेके लिये जो मास निर्धारित हुआ था, वह भी बीत गया; अत: अब आगे क्या करना चाहिये?॥

भवन्त: प्रत्ययं प्राप्ता नीतिमार्गविशारदा:।

हितेष्वभिरता भर्तुर्निसृष्टा: सर्वकर्मसु॥ १०॥

‘आपलोगोंको राजाका विश्वास प्राप्त है। आप नीतिमार्गमें निपुण हैं और स्वामीके हितमें तत्पर रहते हैं। इसीलिये आपलोग यथासमय सब कार्योंमें नियुक्त किये जाते हैं॥ १०॥

कर्मस्वप्रतिमा: सर्वे दिक्षु विश्रुतपौरुषा:।

मां पुरस्कृत्य निर्याता: पिङ्गाक्षप्रतिचोदिता:॥ ११॥

इदानीमकृतार्थानां मर्तव्यं नात्र संशय:।

हरिराजस्य संदेशमकृत्वा क: सुखी भवेत्॥ १२॥

कार्य सिद्ध करनेमें आपलोगोंकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। आप सभी अपने पुरुषार्थके लिये सभी दिशाओंमें विख्यात हैं। इस समय वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे मुझे आगे करके आपलोग जिस कार्यके लिये निकले थे, उसमें आप और हम सफल न हो सके। ऐसी दशामें हमलोगोंको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है। भला वानरराजके आदेशका पालन न करके कौन सुखी रह सकता है?॥ ११-१२॥

अस्मिन्नतीते काले तु सुग्रीवेण कृते स्वयम्।

प्रायोपवेशनं युक्तं सर्वेषां च वनौकसाम्॥ १३॥

‘स्वयं सुग्रीवने जो समय निश्चित किया था, उसके बीत जानेपर हम सब वानरोंके लिये उपवास करके प्राण त्याग देना ही ठीक जान पड़ता है॥ १३॥

तीक्ष्ण: प्रकृत्या सुग्रीव: स्वामिभावे व्यवस्थित:।

न क्षमिष्यति न: सर्वानपराधकृतो गतान्॥ १४॥

‘सुग्रीव स्वभावसे ही कठोर हैं। फिर इस समय तो वे हमारे राजाके पदपर स्थित हैं। जब हम अपराध करके उनके पास जायँगे, तब वे कभी हमें क्षमा नहीं करेंगे॥ १४॥

अप्रवृत्तौ च सीताया: पापमेव करिष्यति।

तस्मात् क्षममिहाद्यैव गन्तुं प्रायोपवेशनम्॥ १५॥

त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च धनानि च गृहाणि च।

‘उलटे सीताका समाचार न पानेपर हमारा वध ही कर डालेंगे, अत: हमें आज ही यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति और घर-द्वारका मोह छोड़कर मरणान्त उपवास आरम्भ कर देना चाहिये॥ १५/

ध्रुवं नो हिंसते राजा सर्वान् प्रतिगतानित:॥ १६॥

वधेनाप्रतिरूपेण श्रेयान् मृत्युरिहैव न:।

‘यहाँसे लौटनेपर राजा सुग्रीव निश्चय ही हम सबका वध कर डालेंगे। अनुचित वधकी अपेक्षा यहीं मर जाना हमलोगोंके लिये श्रेयस्कर है॥ १६/

न चाहं यौवराज्येन सुग्रीवेणाभिषेचित:॥ १७॥

नरेन्द्रेणाभिषिक्तोऽस्मि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

‘सुग्रीवने युवराजपदपर मेरा अभिषेक नहीं किया है। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाराज श्रीरामने ही उस पदपर मेरा अभिषेक किया है॥ १७/

स पूर्वं बद्धवैरो मां राजा दृष्ट्वा व्यतिक्रमम्॥ १८॥

घातयिष्यति दण्डेन तीक्ष्णेन कृतनिश्चय:।

‘राजा सुग्रीवने तो पहलेसे ही मेरे प्रति वैर बाँध रखा है। इस समय आज्ञा-लङ्घनरूप मेरे अपराधको देखकर पूर्वोक्त निश्चयके अनुसार तीखे दण्डद्वारा मुझे मरवा डालेंगे॥

किं मे सुहृद्भिर्व्यसनं पश्यद्भिर्जीवितान्तरे।

इहैव प्रायमासिष्ये पुण्ये सागररोधसि॥ १९॥

‘जीवन-कालमें मेरा व्यसन (राजाके हाथसे मेरा मरण) देखनेवाले सुहृदोंसे मुझे क्या काम है? यहीं समुद्रके पावन तटपर मैं मरणान्त उपवास करूँगा’॥ १९॥

एतच्छ्रुत्वा कुमारेण युवराजेन भाषितम्।

सर्वे ते वानरश्रेष्ठा: करुणं वाक्यमब्रुवन्॥ २०॥

युवराज वालिकुमार अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर करुणस्वरमें बोले—॥ २०॥

तीक्ष्ण: प्रकृत्या सुग्रीव: प्रियारक्तश्च राघव:।

समीक्ष्याकृतकार्यांस्तु तस्म‌िंश्च समये गते॥ २१॥

अदृष्टायां च वैदेह्यां दृष्ट्वा चैव समागतान्।

राघवप्रियकामाय घातयिष्यत्यसंशयम्॥ २२॥

‘सचमुच सुग्रीवका स्वभाव बड़ा कठोर है। उधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिय पत्नी सीताके प्रति अनुरक्त हैं। सीताको खोजकर लौटनेके लिये जो अवधि निश्चित की गयी थी, वह समय व्यतीत हो जानेपर भी यदि हम कार्य किये बिना ही वहाँ उपस्थित होंगे तो उस अवस्थामें हमें देखकर और विदेहकुमारीका दर्शन किये बिना ही हमें लौटा हुआ जानकर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे, इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२॥

न क्षमं चापराद्धानां गमनं स्वामिपार्श्वत:।

प्रधानभूताश्च वयं सुग्रीवस्य समागता:॥ २३॥

‘अत: अपराधी पुरुषोंका स्वामीके पास लौटकर जाना कदापि उचित नहीं है। हम सुग्रीवके प्रधान सहयोगी या सेवक होनेके कारण इधर उनके भेजनेसे आये थे॥ २३॥

इहैव सीतामन्वीक्ष्य प्रवृत्तिमुपलभ्य वा।

नो चेद् गच्छाम तं वीरं गमिष्यामो यमक्षयम्॥ २४॥

‘यदि यहीं सीताका दर्शन करके अथवा उनका समाचार जानकर वीर सुग्रीवके पास नहीं जायँगे तो अवश्य ही हमें यमलोकमें जाना पड़ेगा’॥ २४॥

प्लवङ्गमानां तु भयार्दितानां

श्रुत्वा वचस्तार इदं बभाषे।

अलं विषादेन बिलं प्रविश्य

वसाम सर्वे यदि रोचते व:॥ २५॥

भयसे पीड़ित हुए उन वानरोंका यह वचन सुनकर तारने कहा—‘यहाँ बैठकर विषाद करनेसे कोई लाभ नहीं है। यदि आपलोगोंको ठीक जँचे तो हम सब लोग स्वयंप्रभाकी उस गुफामें ही प्रवेश करके निवास करें॥ २५॥

इदं हि मायाविहितं सुदुर्गमं

प्रभूतपुष्पोदकभोज्यपेयम् ।

इहास्ति नो नैव भयं पुरंदरा-

न्न राघवाद् वानरराजतोऽपि वा॥ २६॥

‘यह गुफा मायासे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त दुर्गम है। यहाँ फल-फूल, जल और खाने-पीनेकी दूसरी वस्तुएँ भी प्रचुर मात्रामें उपलब्ध हैं। अत: उसमें हमें न तो देवराज इन्द्रसे, न श्रीरामचन्द्रजीसे और न वानरराज सुग्रीवसे ही भय है’॥ २६॥

श्रुत्वाङ्गदस्यापि वचोऽनुकूल-

मूचुश्च सर्वे हरय: प्रतीता:।

यथा न हन्येम तथा विधान-

मसक्तमद्यैव विधीयतां न:॥ २७॥

तारकी कही हुई पूर्वोक्त बात, जो अङ्गदके भी अनुकूल थी, सुनकर सभी वानरोंको उसपर विश्वास हो गया। वे सब-के-सब बोल उठे—‘बन्धुओ! हमें वैसा कार्य आज ही अविलम्ब करना चाहिये, जिससे हम मारे न जायँ’॥ २७॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिपञ्चाश: सर्ग:॥ ५३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

 

चतु:पञ्चाश: सर्ग:

हनुमान्‌जीका भेदनीतिके द्वारा वानरोंको अपने पक्षमें करकेअङ्गदको अपने साथ चलनेके लिये समझाना

तथा ब्रुवति तारे तु ताराधिपतिवर्चसि।

अथ मेने हृतं राज्यं हनूमानङ्गदेन तत्॥ १॥

तारापति चन्द्रमाके समान तेजस्वी तारके ऐसा कहनेपर हनुमान् जी ने यह माना कि अब अङ्गदने वह राज्य (जो अबतक सुग्रीवके अधिकारमें था) हर लिया (इस तरह वानरोंमें फूट पड़नेसे बहुत-से वानर अङ्गदका साथ देंगे और बलवान् अङ्गद सुग्रीवको राज्यसे वञ्चित कर देंगे—ऐसी सम्भावनाका हनुमान्‌जीके मनमें उदय हो गया)॥ १॥

बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं चतुर्बलसमन्वितम्।

चतुर्दशगुणं मेने हनूमान् वालिन: सुतम्॥ २॥

हनुमान्‌जी यह अच्छी तरह जानते थे कि वालिकुमार अङ्गद आठ142 गुणवाली बुद्धिसे, चार143 प्रकारके बलसे और चौदह144 गुणोंसे सम्पन्न हैं॥ २॥

आपूर्यमाणं शश्वच्च तेजोबलपराक्रमै:।

शशिनं शुक्लपक्षादौ वर्धमानमिव श्रिया॥ ३॥

वे तेज, बल और पराक्रमसे सदा परिपूर्ण हो रहे हैं। शुक्ल पक्षके आरम्भमें चन्द्रमाके समान राजकुमार अङ्गदकी श्री दिनोदिन बढ़ रही है॥ ३॥

बृहस्पतिसमं बुद्ध्या विक्रमे सदृशं पितु:।

शुश्रूषमाणं तारस्य शुक्रस्येव पुरंदरम्॥ ४॥

ये बुद्धिमें बृहस्पतिके समान और पराक्रममें अपने पिता वालीके तुल्य हैं। जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिके मुखसे नीतिकी बातें सुनते हैं, उसी प्रकार ये अङ्गद तारकी बातें सुनते हैं॥ ४॥

भर्तुरर्थे परिश्रान्तं सर्वशास्त्रविशारद:।

अभिसंधातुमारेभे हनूमानङ्गदं तत:॥ ५॥

अपने स्वामी सुग्रीवका कार्य सिद्ध करनेमें ये परिश्रम (थकावट या शिथिलता) का अनुभव करते हैं। ऐसा विचारकर सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हनुमान् जी ने अङ्गदको तार आदि वानरोंकी ओरसे फोड़नेका प्रयत्न आरम्भ किया॥ ५॥

स चतुर्णामुपायानां तृतीयमुपवर्णयन्।

भेदयामास तान् सर्वान् वानरान् वाक्यसम्पदा॥ ६॥

वे साम, दाम, भेद और दण्ड—इन चार उपायोंमेंसे तीसरेका वर्णन करते हुए अपने युक्तियुक्त वाक्य-वैभवके द्वारा उन सभी वानरोंको फोड़ने लगे॥ ६॥

तेषु सर्वेषु भिन्नेषु ततोऽभीषयदङ्गदम्।

भीषणैर्विविधैर्वाक्यै: कोपोपायसमन्वितै:॥ ७॥

जब वे सब वानर फूट गये, तब उन्होंने दण्डरूप चौथे उपायसे युक्त नाना प्रकारके भयदायक वचनोंद्वारा अङ्गदको डराना आरम्भ किया—॥ ७॥

त्वं समर्थतर: पित्रा युद्धे तारेय वै ध्रुवम्।

दृढं धारयितुं शक्त: कपिराज्यं यथा पिता॥ ८॥

‘तारानन्दन! तुम युद्धमें अपने पिताके समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो—यह निश्चितरूपसे सबको विदित है। जैसे तुम्हारे पिता वानरोंका राज्य सँभालते थे, उसी प्रकार तुम भी उसे दृढ़तापूर्वक धारण करनेमें समर्थ हो॥

नित्यमस्थिरचित्ता हि कपयो हरिपुंगव।

नाज्ञाप्यं विषहिष्यन्ति पुत्रदारं विना त्वया॥ ९॥

‘किंतु वानरशिरोमणे! ये कपिलोग सदा ही चञ्चलचित्त होते हैं। अपने स्त्री-पुत्रोंसे अलग रहकर तुम्हारी आज्ञाका पालन करना इनके लिये सह्य नहीं होगा॥

त्वां नैते ह्यनुरञ्जेयु: प्रत्यक्षं प्रवदामि ते।

यथायं जाम्बवान् नील: सुहोत्रश्च महाकपि:॥ १०॥

नह्यहं ते इमे सर्वे सामदानादिभिर्गुणै:।

दण्डेन न त्वया शक्या: सुग्रीवादपकर्षितुम्॥ ११॥

‘मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ, ये कोई भी वानर सुग्रीवसे विरोध करके तुम्हारे प्रति अनुरक्त नहीं हो सकते। जैसे ये जाम्बवान्, नील और महाकपि सुहोत्र हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तथा ये सब लोग साम, दान आदि उपायोंद्वारा सुग्रीवसे अलग नहीं किये जा सकते। तुम दण्डके द्वारा भी हम सबको वानरराजसे दूर कर सको, यह भी सम्भव नहीं है (अत: सुग्रीव तुम्हारी अपेक्षा प्रबल हैं)॥

विगृह्यासनमप्याहुर्दुर्बलेन बलीयसा।

आत्मरक्षाकरस्तस्मान्न विगृह्णीत दुर्बल:॥ १२॥

‘दुर्बलके साथ विरोध करके बलवान् पुरुष चुपचाप बैठा रहे, यह तो सम्भव है। परंतु किसी बलवान्से वैर बाँधकर कोई दुर्बल पुरुष कहीं भी सुखसे नहीं रह सकता; अत: अपनी रक्षा चाहनेवाले दुर्बल पुरुषको बलवान्के साथ विग्रह नहीं करना चाहिये—यह नीतिज्ञ पुरुषोंका कथन है॥ १२॥

यां चेमां मन्यसे धात्रीमेतद् बिलमिति श्रुतम्।

एतल्लक्ष्मणबाणानामीषत् कार्यं विदारणम्॥ १३॥

‘तुम जो ऐसा मानने लगे हो कि यह गुफा हमें माताके समान अपनी गोदमें छिपा लेगी, इसलिये हमारी रक्षा हो जायगी तथा इस बिलकी अभेद्यताके विषयमें जो तुमने तारके मुँहसे कुछ सुना है, यह सब व्यर्थ है; क्योंकि इस गुफाको विदीर्ण कर देना लक्ष्मणके बाणोंके लिये बायें हाथका खेल है (अत्यन्त तुच्छ कार्य है)॥ १३॥

स्वल्पं हि कृतमिन्द्रेण क्षिपता ह्यशनिं पुरा।

लक्ष्मणो निशितैर्बाणैर्भिन्द्यात् पत्रपुटं यथा॥ १४॥

‘पूर्वकालमें यहाँ वज्रका प्रहार करके इन्द्रने तो इस गुफाको बहुत थोड़ी हानि पहुँचायी थी; परंतु लक्ष्मण अपने पैने बाणोंद्वारा इसे पत्तेके दोनेकी भाँति विदीर्ण कर डालेंगे॥ १४॥

लक्ष्मणस्य च नाराचा बहव: सन्ति तद्विधा:।

वज्राशनिसमस्पर्शा गिरीणामपि दारका:॥ १५॥

‘लक्ष्मणके पास ऐसे बहुत-से नाराच हैं, जिनका हलका-सा स्पर्श भी वज्र और अशनिके समान चोट पहुँचानेवाला है। वे नाराच पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकते हैं॥ १५॥

अवस्थानं यदैव त्वमासिष्यसि परंतप।

तदैव हरय: सर्वे त्यक्ष्यन्ति कृतनिश्चया:॥ १६॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! ज्यों ही तुम इस गुफामें रहना आरम्भ करोगे, त्यों ही ये सब वानर तुम्हें त्याग देंगे; क्योंकि इन्होंने ऐसा करनेका निश्चय कर लिया है॥ १६॥

स्मरन्त: पुत्रदाराणां नित्योद्विग्ना बुभुक्षिता:।

खेदिता दु:खशय्याभिस्त्वां करिष्यन्ति पृष्ठत:॥ १७॥

‘ये अपने बाल-बच्चोंको याद करके सदा उद्विग्न रहेंगे। जब यहाँ इन्हें भूखका कष्ट सहना पड़ेगा और दु:खद शय्यापर सोने या दुरवस्थामें रहनेके कारण इनके मनमें खेद होगा, तब ये तुम्हें पीछे छोड़कर चल देंगे॥ १७॥

स त्वं हीन: सुहृद्भिश्च हितकामैश्च बन्धुभि:।

तृणादपि भृशोद्विग्न: स्पन्दमानाद् भविष्यसि॥ १८॥

‘ऐसी दशामें तुम हितैषी बन्धुओं और सुहृदोंके सहयोगसे वञ्चित हो उड़ते हुए तिनकेसे भी तुच्छ हो जाओगे और सदा अधिक डरते रहोगे (अथवा हिलते हुए तिनके-से अत्यन्त भयभीत होते रहोगे)॥ १८॥

न च जातु न हिंस्युस्त्वां घोरा लक्ष्मणसायका:।

अपवृत्तं जिघांसन्तो महावेगा दुरासदा:॥ १९॥

‘लक्ष्मणके बाण घोर, महान् वेगशाली और दुर्जय हैं। श्रीरामके कार्यसे विमुख होनेपर तुम्हें कदापि मारे बिना नहीं रहेंगे॥ १९॥

अस्माभिस्तु गतं सार्धं विनीतवदुपस्थितम्।

आनुपूर्व्यात्तु सुग्रीवो राज्ये त्वां स्थापयिष्यति॥ २०॥

‘हमारे साथ चलकर जब तुम विनीत पुरुषकी भाँति उनकी सेवामें उपस्थित होगे, तब सुग्रीव क्रमश: अपने बाद तुम्हींको राज्यपर बिठायेंगे॥ २०॥

धर्मराज: पितृव्यस्ते प्रीतिकामो दृढव्रत:।

शुचि: सत्यप्रतिज्ञश्च स त्वां जातु न नाशयेत्॥ २१॥

‘तुम्हारे चाचा सुग्रीव धर्मके मार्गपर चलनेवाले राजा हैं। वे सदा तुम्हारी प्रसन्नता चाहनेवाले, दृढ़व्रत, पवित्र और सत्यप्रतिज्ञ हैं। अत: कदापि तुम्हारा नाश नहीं कर सकते॥ २१॥

प्रियकामश्च ते मातुस्तदर्थं चास्य जीवितम्।

तस्यापत्यं च नास्त्यन्यत् तस्मादङ्गद गम्यताम्॥ २२॥

‘अङ्गद! उनके मनमें सदा तुम्हारी माताका प्रिय करनेकी इच्छा रहती है। उनकी प्रसन्नताके लिये ही वे जीवन धारण करते हैं। सुग्रीवके तुम्हारे सिवा कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है, इसलिये तुम्हें उनके पास चलना चाहिये’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतु:पञ्चाश: सर्ग:॥ ५४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥

 


पञ्चपञ्चाश: सर्ग:

अङ्गदसहित वानरोंका प्रायोपवेशन

श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्।

स्वामिसत्कारसंयुक्तमङ्गदो वाक्यमब्रवीत्॥ १॥

हनुमान्‌जीका वचन विनययुक्त, धर्मानुकूल और स्वामीके प्रति सम्मानसे युक्त था। उसे सुनकर अङ्गदने कहा—॥ १॥

स्थैर्यमात्ममन:शौचमानृशंस्यमथार्जवम् ।

विक्रमश्चैव धैर्यं च सुग्रीवे नोपपद्यते॥ २॥

‘कपिश्रेष्ठ! राजा सुग्रीवमें स्थिरता, शरीर और मनकी पवित्रता, क्रूरताका अभाव, सरलता, पराक्रम और धैर्य है—यह मान्यता ठीक नहीं जान पड़ती॥ २॥

भ्रातुर्ज्येष्ठस्य यो भार्यां जीवतो महिषीं प्रियाम्।

धर्मेण मातरं यस्तु स्वीकरोति जुगुप्सित:॥ ३॥

कथं स धर्मं जानीते येन भ्रात्रा दुरात्मना।

युद्धायाभिनियुक्तेन बिलस्य पिहितं मुखम्॥ ४॥

‘जिसने अपने बड़े भाईके जीते-जी उनकी प्यारी महारानीको, जो धर्मत: उसकी माताके समान थी, कुत्सित भावनासे ग्रहण कर लिया था, वह धर्मको जानता है, यह कैसे कहा जा सकता है? जिस दुरात्माने युद्धके लिये जाते हुए भाईके द्वारा बिलकी रक्षाके कार्यमें नियुक्त होनेपर भी पत्थरसे उसका मुँह बंद कर दिया, वह कैसे धर्मज्ञ माना जा सकता है?॥ ३-४॥

सत्यात् पाणिगृहीतश्च कृतकर्मा महायशा:।

विस्मृतो राघवो येन स कस्य सुकृतं स्मरेत्॥ ५॥

‘जिन्होंने सत्यको साक्षी देकर उसका हाथ पकड़ा और पहले ही उसका कार्य सिद्ध कर दिया, उन महायशस्वी भगवान् श्रीरामको ही जब उसने भुला दिया, तब दूसरे किसके उपकारको वह याद रख सकता है?॥ ५॥

लक्ष्मणस्य भयेनेह नाधर्मभयभीरुणा।

आदिष्टा मार्गितुं सीता धर्मस्तस्मिन् कथं भवेत्॥ ६॥

‘जिसने अधर्मके भयसे डरकर नहीं, लक्ष्मणके ही भयसे भीत हो हमलोगोंको सीताकी खोजके लिये भेजा है, उसमें धर्मकी सम्भावना कैसे हो सकती है?॥ ६॥

तस्मिन् पापे कृतघ्ने तु स्मृतिभिन्ने चलात्मनि।

आर्य: को विश्वसेज्जातु तत्कुलीनो विशेषत:॥ ७॥

‘उस पापी, कृतघ्न, स्मरण-शक्तिसे हीन और चञ्चलचित्त सुग्रीवपर कोई श्रेष्ठ पुरुष, विशेषत: जो उसके कुलमें उत्पन्न हुआ हो, कभी भी किस तरह विश्वास कर सकता है?॥ ७॥

राज्ये पुत्र: प्रतिष्ठाप्य: सगुणो निर्गुणोऽपि वा।

कथं शत्रुकुलीनं मां सुग्रीवो जीवयिष्यति॥ ८॥

‘अपना पुत्र गुणवान् हो या गुणहीन, उसीको राज्यपर बिठाना चाहिये, ऐसी धारणा रखनेवाला सुग्रीव मुझ शत्रुकुलमें उत्पन्न हुए बालकको कैसे जीवित रहने देगा?॥ ८॥

भिन्नमन्त्रोऽपराद्धश्च भिन्नशक्ति: कथं ह्यहम्।

किष्किन्धां प्राप्य जीवेयमनाथ इव दुर्बल:॥ ९॥

‘सुग्रीवसे अलग रहनेका जो मेरा गूढ़ विचार था, वह आज प्रकट हो गया। साथ ही, उसकी आज्ञाका पालन न करनेके कारण मैं अपराधी भी हूँ। इतना ही नहीं, मेरी शक्ति क्षीण हो गयी है। मैं अनाथके समान दुर्बल हूँ। ऐसी दशामें किष्किन्धामें जाकर कैसे जीवित रह सकूँगा?॥ ९॥

उपांशुदण्डेन हि मां बन्धनेनोपपादयेत्।

शठ: क्रूरो नृशंसश्च सुग्रीवो राज्यकारणात्॥ १०॥

‘सुग्रीव शठ, क्रूर और निर्दयी है। वह राज्यके लिये मुझे गुप्तरूपसे दण्ड देगा अथवा सदाके लिये मुझे बन्धनमें डाल देगा॥ १०॥

बन्धनाच्चावसादान्मे श्रेय: प्रायोपवेशनम्।

अनुजानन्तु मां सर्वे गृहं गच्छन्तु वानरा:॥ ११॥

‘इस प्रकार बन्धनजनित कष्ट भोगनेकी अपेक्षा उपवास करके प्राण दे देना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। अत: सब वानर मुझे यहीं रहनेकी आज्ञा दें और अपने-अपने घरको चले जायँ॥ ११॥

अहं व: प्रतिजानामि न गमिष्याम्यहं पुरीम्।

इहैव प्रायमासिष्ये श्रेयो मरणमेव मे॥ १२॥

‘मैं आपलोगोंसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं किष्किन्धापुरीको नहीं जाऊँगा। यहीं मरणान्त उपवास करूँगा। मेरा मर जाना ही अच्छा है॥ १२॥

अभिवादनपूर्वं तु राजा कुशलमेव च।

अभिवादनपूर्वं तु राघवौ बलशालिनौ॥ १३॥

‘आपलोग राजा सुग्रीवको प्रणाम करके उनसे मेरा कुशल-समाचार कहियेगा। अपने बलके कारण शोभा पानेवाले दोनों रघुवंशी बन्धुओंसे भी मेरा सादर प्रणाम निवेदन करते हुए कुशल-समाचार कह दीजियेगा॥ १३॥

वाच्यस्तातो यवीयान् मे सुग्रीवो वानरेश्वर:।

आरोग्यपूर्वं कुशलं वाच्या माता रुमा च मे॥ १४॥

‘मेरे छोटे पिता वानरराज सुग्रीव और माता रुमासे भी मेरा आरोग्यपूर्वक कुशल-समाचार बताइयेगा॥ १४॥

मातरं चैव मे तारामाश्वासयितुमर्हथ।

प्रकृत्या प्रियपुत्रा सा सानुक्रोशा तपस्विनी॥ १५॥

‘मेरी माता ताराको भी धैर्य बँधाइयेगा। वह बेचारी स्वभावसे ही दयालु और पुत्रपर प्रेम रखनेवाली है॥ १५॥

विनष्टमिह मां श्रुत्वा व्यक्तं हास्यति जीवितम्।

एतावदुक्त्वा वचनं वृद्धांस्तानभिवाद्य च॥ १६॥

विवेश चाङ्गदो भूमौ रुदन् दर्भेषु दुर्मना:।

‘यहाँ मेरे नष्ट होनेका समाचार सुनकर वह निश्चय ही अपने प्राण त्याग देगी।’ इतना कहकर अङ्गदने उन सभी बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम किया और धरतीपर कुश बिछाकर उदास मुँहसे रोते-रोते वे मरणान्त उपवासके लिये बैठ गये॥ १६/

तस्य संविशतस्तत्र रुदन्तो वानरर्षभा:॥ १७॥

नयनेभ्य: प्रमुमुचुरुष्णं वै वारि दु:खिता:।

सुग्रीवं चैव निन्दन्त: प्रशंसन्तश्च वालिनम्॥ १८॥

परिवार्याङ्गदं सर्वे व्यवसन् प्रायमासितुम्।

उनके इस प्रकार बैठनेपर सभी श्रेष्ठ वानर रोने लगे और दु:खी हो नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे। सुग्रीवकी निन्दा और वालीकी प्रशंसा करते हुए उन सबने अङ्गदको सब ओरसे घेरकर आमरण उपवास करनेका निश्चय किया॥ १७-१८/

तद् वाक्यं वालिपुत्रस्य विज्ञाय प्लवगर्षभा:॥ १९॥

उपस्पृश्योदकं सर्वे प्राङ्मुखा: समुपाविशन्।

दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु उदक्तीरं समाश्रिता:॥ २०॥

मुमूर्षवो हरिश्रेष्ठा एतत् क्षममिति स्म ह।

वालिकुमारके वचनोंपर विचार करके उन वानरशिरोमणियोंने मरना ही उचित समझा और मृत्युकी इच्छासे आचमन करके समुद्रके उत्तर तटपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर वे सब-के-सब पूर्वाभिमुख हो बैठ गये॥

रामस्य वनवासं च क्षयं दशरथस्य च॥ २१॥

जनस्थानवधं चैव वधं चैव जटायुष:।

हरणं चैव वैदेह्या वालिनश्च वधं तथा।

रामकोपं च वदतां हरीणां भयमागतम्॥ २२॥

श्रीरामके वनवास, राजा दशरथकी मृत्यु, जन-स्थानवासी राक्षसोंके संहार, विदेहकुमारी सीताके अपहरण, जटायुके मरण, वालीके वध और श्रीरामके क्रोधकी चर्चा करते हुए उन वानरोंपर एक दूसरा ही भय आ पहुँचा॥ २१-२२॥

स संविशद्भिर्बहुभिर्महीधरो

महाद्रिकूटप्रतिमै: प्लवंगमै:।

बभूव संनादितनिर्दरान्तरो

भृशं नदद्भिर्जलदैरिवाम्बरम्॥ २३॥

महान् पर्वत-शिखरोंके समान शरीरवाले वहाँ बैठे हुए बहुसंख्यक वानर भयके मारे जोर-जोरसे शब्द करने लगे, जिससे उस पर्वतकी कन्दराओंका भीतरी भाग प्रतिध्वनित हो उठा और गर्जते हुए मेघोंसे युक्त आकाशके समान प्रतीत होने लगा॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चपञ्चाश: सर्ग:॥ ५५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥

 

 


षट्पञ्चाश: सर्ग:

सम्पातिसे वानरोंको भय, उनके मुखसे जटायुके वधकी बात सुनकर सम्पातिका दु:खी होना और अपनेको नीचे उतारनेके लिये वानरोंसे अनुरोध करना

उपविष्टास्तु ते सर्वे यस्मिन् प्रायं गिरिस्थले।

हरयो गृध्रराजश्च तं देशमुपचक्रमे॥ १॥

सम्पातिर्नाम नाम्ना तु चिरजीवी विहंगम:।

भ्राता जटायुष: श्रीमान् विख्यातबलपौरुष:॥ २॥

पर्वतके जिस स्थानपर वे सब वानर आमरण उपवासके लिये बैठे थे, उस प्रदेशमें चिरंजीवी पक्षी श्रीमान् गृध्रराज सम्पाति आये। वे जटायुके भाई थे और अपने बल तथा पुरुषार्थके लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे॥ १-२॥

कन्दरादभिनिष्क्रम्य स विन्ध्यस्य महागिरे:।

उपविष्टान् हरीन् दृष्ट्वा हृष्टात्मा गिरमब्रवीत्॥ ३॥

महागिरि विन्ध्यकी कन्दरासे निकलकर सम्पातिने जब वहाँ बैठे हुए वानरोंको देखा, तब उनका हृदय हर्षसे खिल उठा और वे इस प्रकार बोले—॥ ३॥

विधि: किल नरं लोके विधानेनानुवर्तते।

यथायं विहितो भक्ष्यश्चिरान्मह्यमुपागत:॥ ४॥

परम्पराणां भक्षिष्ये वानराणां मृतं मृतम्।

उवाचैतद् वच: पक्षी तान् निरीक्ष्य प्लवंगमान्॥ ५॥

‘जैसे लोकमें पूर्वजन्मके कर्मानुसार मनुष्यको उसके कियेका फल स्वत: प्राप्त होता है, उसी प्रकार आज दीर्घकालके पश्चात् यह भोजन स्वत: मेरे लिये प्राप्त हो गया। अवश्य ही यह मेरे किसी कर्मका फल है। इन वानरोंमेंसे जो-जो मरता जायगा, उसको मैं क्रमश: भक्षण करता जाऊँगा’ यह बात उस पक्षीने उन सब वानरोंको देखकर कहा॥ ४-५॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भक्ष्यलुब्धस्य पक्षिण:।

अङ्गद: परमायस्तो हनूमन्तमथाब्रवीत्॥ ६॥

भोजनपर लुभाये हुए उस पक्षीका यह वचन सुनकर अङ्गदको बड़ा दु:ख हुआ और वे हनुमान्‌जीसे बोले—

पश्य सीतापदेशेन साक्षाद् वैवस्वतो यम:।

इमं देशमनुप्राप्तो वानराणां विपत्तये॥ ७॥

‘देखिये, सीताके निमित्तसे वानरोंको विपत्तिमें डालनेके लिये साक्षात् सूर्यपुत्र यम इस देशमें आ पहुँचे॥

रामस्य न कृतं कार्यं न कृतं राजशासनम्।

हरीणामियमज्ञाता विपत्ति: सहसाऽऽगता॥ ८॥

‘हमलोगोंने न तो श्रीरामचन्द्रजीका कार्य किया और न राजाकी आज्ञाका पालन ही। इसी बीच वानरोंपर यह सहसा अज्ञात विपत्ति आ पड़ी॥ ८॥

वैदेह्या: प्रियकामेन कृतं कर्म जटायुषा।

गृध्रराजेन यत् तत्र श्रुतं वस्तदशेषत:॥ ९॥

‘विदेहकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे गृध्रराज जटायुने जो साहसपूर्ण कार्य किया था, वह सब आपलोगोंने सुना ही होगा॥ ९॥

तथा सर्वाणि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि।

प्रियं कुर्वन्ति रामस्य त्यक्त्वा प्राणान् यथा वयम्॥ १०॥

‘समस्त प्राणी, वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, हमारी तरह प्राण देकर भी श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय कार्य करते हैं॥ १०॥

अन्योन्यमुपकुर्वन्ति स्नेहकारुण्ययन्त्रिता:।

ततस्तस्योपकारार्थं त्यजतात्मानमात्मना॥ ११॥

‘शिष्ट पुरुष स्नेह और करुणाके वशीभूत हो एक-दूसरेका उपकार करते हैं, अत: आपलोग भी श्रीरामके उपकारके लिये स्वयं ही अपने शरीरका परित्याग करें॥ ११॥

प्रियं कृतं हि रामस्य धर्मज्ञेन जटायुषा।

राघवार्थे परिश्रान्ता वयं संत्यक्तजीविता:॥ १२॥

कान्ताराणि प्रपन्ना: स्म न च पश्याम मैथिलीम्।

‘धर्मज्ञ जटायुने ही श्रीरामका प्रिय किया है। हमलोग श्रीरघुनाथजीके लिये अपने जीवनका मोह छोड़कर परिश्रम करते हुए इस दुर्गम वनमें आये, किंतु मिथिलेशकुमारीका दर्शन न कर सके॥ १२/

स सुखी गृध्रराजस्तु रावणेन हतो रणे।

मुक्तश्च सुग्रीवभयाद् गतश्च परमां गतिम्॥ १३॥

‘गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं, जो युद्धमें रावणके हाथसे मारे गये और परमगतिको प्राप्त हुए। वे सुग्रीवके भयसे मुक्त हैं॥ १३॥

जटायुषो विनाशेन राज्ञो दशरथस्य च।

हरणेन च वैदेह्या: संशयं हरयो गता:॥ १४॥

‘राजा दशरथकी मृत्यु, जटायुका विनाश और विदेहकुमारी सीताका अपहरण—इन घटनाओंसे इस समय वानरोंका जीवन संशयमें पड़ गया है॥ १४॥

रामलक्ष्मणयोर्वासमरण्ये सह सीतया।

राघवस्य च बाणेन वालिनश्च तथा वध:॥ १५॥

रामकोपादशेषाणां रक्षसां च तथा वधम्।

कैकेय्या वरदानेन इदं च विकृतं कृतम्॥ १६॥

‘श्रीराम और लक्ष्मणको सीताके साथ वनमें निवास करना पड़ा, श्रीरघुनाथजीके बाणसे वालीका वध हुआ और अब श्रीरामके कोपसे समस्त राक्षसोंका संहार होगा—ये सारी बुराइयाँ कैकेयीको दिये गये वरदानसे ही पैदा हुई हैं’॥

तदसुखमनुकीर्तितं वचो

भुवि पतितांश्च निरीक्ष्य वानरान्।

भृशचकितमतिर्महामति:

कृपणमुदाहृतवान् स गृध्रराज:॥ १७॥

वानरोंके द्वारा बारम्बार कहे गये इन दु:खमय वचनोंको सुनकर और उन सबको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर परम बुद्धिमान् सम्पातिका हृदय अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और वे दीन वाणीमें बोलनेको उद्यत हुए॥ १७॥

तत् तु श्रुत्वा तथा वाक्यमङ्गदस्य मुखोद्गतम्।

अब्रवीद् वचनं गृध्रस्तीक्ष्णतुण्डो महास्वन:॥ १८॥

अङ्गदके मुखसे निकले हुए उस वचनको सुनकर तीखी चोंचवाले उस गीधने उच्च स्वरसे इस प्रकार पूछा—॥ १८॥

कोऽयं गिरा घोषयति प्राणै: प्रियतरस्य मे।

जटायुषो वधं भ्रातु: कम्पयन्निव मे मन:॥ १९॥

‘यह कौन है, जो मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भाई जटायुके वधकी बात कह रहा है। इसे सुनकर मेरा हृदय कम्पित-सा होने लगा है॥ १९॥

कथमासीज्जनस्थाने युद्धं राक्षसगृध्रयो:।

नामधेयमिदं भ्रातुश्चिरस्याद्य मया श्रुतम्॥ २०॥

‘जनस्थानमें राक्षसका गृध्रके साथ किस प्रकार युद्ध हुआ था? अपने भाईका प्यारा नाम आज बहुत दिनोंके बाद मेरे कानमें पड़ा है॥ २०॥

इच्छेयं गिरिदुर्गाच्च भवद्भिरवतारितुम्।

यवीयसो गुणज्ञस्य श्लाघनीयस्य विक्रमै:॥ २१॥

अतिदीर्घस्य कालस्य परितुष्टोऽस्मि कीर्तनात्।

तदिच्छेयमहं श्रोतुं विनाशं वानरर्षभा:॥ २२॥

‘जटायु मुझसे छोटा, गुणज्ञ और पराक्रमके कारण अत्यन्त प्रशंसाके योग्य था। दीर्घकालके पश्चात् आज उसका नाम सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं चाहता हूँ कि पर्वतके इस दुर्गम स्थानसे आपलोग मुझे नीचे उतार दें। श्रेष्ठ वानरो! मुझे अपने भाईके विनाशका वृत्तान्त सुननेकी इच्छा है॥ २१-२२॥

भ्रातुर्जटायुषस्तस्य जनस्थाननिवासिन:।

तस्यैव च मम भ्रातु: सखा दशरथ: कथम्॥ २३॥

यस्य राम: प्रिय: पुत्रो ज्येष्ठो गुरुजनप्रिय:।

‘मेरा भाई जटायु तो जनस्थानमें रहता था। गुरुजनोंके प्रेमी श्रीरामचन्द्रजी जिनके ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्र हैं, वे महाराज दशरथ मेरे भाईके मित्र कैसे हुए?॥ २३/

सूर्यांशुदग्धपक्षत्वान्न शक्नोमि विसर्पितुम्।

इच्छेयं पर्वतादस्मादवतर्तुमरिंदमा:॥ २४॥

‘शत्रुदमन वीरो! मेरे पंख सूर्यकी किरणोंसे जल गये हैं, इसलिये मैं उड़ नहीं सकता; किंतु इस पर्वतसे नीचे उतरना चाहता हूँ’॥ २४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग:॥ ५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥

 


सप्तपञ्चाश: सर्ग:

अङ्गदका सम्पातिको पर्वत-शिखरसे नीचे उतारकर उन्हें जटायुके मारे जानेका वृत्तान्त बताना तथा राम-सुग्रीवकी मित्रता एवं वालिवधका प्रसंगसुनाकर अपने आमरण उपवासका कारण निवेदन करना

शोकाद् भ्रष्टस्वरमपि श्रुत्वा वानरयूथपा:।

श्रद्दधुर्नैव तद्वाक्यं कर्मणा तस्य शङ्किता:॥ १॥

शोकके कारण सम्पातिका स्वर विकृत हो गया था। उनकी कही हुई बात सुनकर भी वानर-यूथपतियोंने उसपर विश्वास नहीं किया; क्योंकि वे उनके कर्मसे शङ्कित थे॥ १॥

ते प्रायमुपविष्टास्तु दृष्ट्वा गृध्रं प्लवंगमा:।

चक्रुर्बुद्धिं तदा रौद्रां सर्वान् नो भक्षयिष्यति॥ २॥

आमरण उपवासके लिये बैठे हुए उन वानरोंने उस समय गीधको देखकर यह भयंकर बात सोची, ‘यह हम सबको खा तो नहीं जायगा॥ २॥

सर्वथा प्रायमासीनान् यदि नो भक्षयिष्यति।

कृतकृत्या भविष्याम: क्षिप्रं सिद्धिमितो गता:॥ ३॥

‘अच्छा, हम तो सब प्रकारसे मरणान्त उपवासका व्रत लेकर बैठे ही थे। यदि यह पक्षी हमें खा लेगा तो हमारा काम ही बन जायगा। हमें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जायगी’॥ ३॥

एतां बुद्धिं ततश्चक्रु: सर्वे ते हरियूथपा:।

अवतार्य गिरे: शृङ्गाद् गृध्रमाहाङ्गदस्तदा॥ ४॥

फिर तो उन समस्त वानर-यूथपतियोंने यही निश्चय किया। उस समय गीधको उस पर्वत-शिखरसे उतारकर अङ्गदने कहा—॥ ४॥

बभूवर्क्षरजो नाम वानरेन्द्र: प्रतापवान्।

ममार्य: पार्थिव: पक्षिन् धार्मिकौ तस्य चात्मजौ॥ ५॥

सुग्रीवश्चैव वाली च पुत्रौ घनबलावुभौ।

लोके विश्रुतकर्माभूद् राजा वाली पिता मम॥ ६॥

‘पक्षिराज! पहले एक प्रतापी वानरराज हो गये हैं, जिनका नाम था ऋक्षरजा! राजा ऋक्षरजा मेरे पितामह लगते थे। उनके दो धर्मात्मा पुत्र हुए—सुग्रीव और वाली। दोनों ही बड़े बलवान् हुए। उनमेंसे राजा वाली मेरे पिता थे। संसारमें अपने पराक्रमके कारण उनकी बड़ी ख्याति थी॥ ५-६॥

राजा कृत्स्नस्य जगत इक्ष्वाकूणां महारथ:।

रामो दाशरथि: श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम्॥ ७॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया।

पितुर्निदेशनिरतो धर्मं पन्थानमाश्रित:॥ ८॥

‘आजसे कुछ वर्ष पहले इक्ष्वाकुवंशके महारथी वीर दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजी, जो सम्पूर्ण जगत्के राजा हैं, पिताकी आज्ञाके पालनमें तत्पर हो धर्म-मार्गका आश्रय ले दण्डकारण्यमें आये थे। उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहकुमारी सीता भी थीं॥ ८॥

तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात्।

रामस्य तु पितुर्मित्रं जटायुर्नाम गृध्रराट्॥ ९ ॥

ददर्श सीतां वैदेहीं ह्र‌ियमाणां विहायसा।

रावणं विरथं कृत्वा स्थापयित्वा च मैथिलीम्।

परिश्रान्तश्च वृद्धश्च रावणेन हतो रणे॥ १०॥

‘जनस्थानमें आनेपर उनकी पत्नी सीताको रावणने बलपूर्वक हर लिया। उस समय गृध्रराज जटायुने, जो उनके पिताके मित्र थे, देखा—रावण आकाशमार्गसे विदेहकुमारीको लिये जा रहा है। देखते ही वे रावणपर टूट पड़े और उसके रथको नष्ट-भ्रष्ट करके उन्होंने मिथिलेशकुमारीको सुरक्षितरूपसे भूमिपर खड़ा कर दिया। किंतु वे वृद्ध तो थे ही। युद्ध करते-करते थक गये और अन्ततोगत्वा रणक्षेत्रमें रावणके हाथसे मारे गये॥ ९-१०॥

एवं गृध्रो हतस्तेन रावणेन बलीयसा।

संस्कृतश्चापि रामेण जगाम गतिमुत्तमाम्॥ ११॥

‘इस प्रकार महाबली रावणके द्वारा जटायुका वध हुआ। स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और वे उत्तम गति (साकेतधामको) प्राप्त हुए॥ ११॥

ततो मम पितृव्येण सुग्रीवेण महात्मना।

चकार राघव: सख्यं सोऽवधीत् पितरं मम॥ १२॥

‘तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने मेरे चाचा महात्मा सुग्रीवसे मित्रता की और उनके कहनेसे उन्होंने मेरे पिताका वध कर दिया॥ १२॥

मम पित्रा निरुद्धो हि सुग्रीव: सचिवै: सह।

निहत्य वालिनं रामस्ततस्तमभिषेचयत्॥ १३॥

‘मेरे पिताने मन्त्रियोंसहित सुग्रीवको राज्य-सुखसे वञ्चित कर दिया था। इसलिये श्रीरामचन्द्रजीने मेरे पिता वालीको मारकर सुग्रीवका अभिषेक करवाया॥ १३॥

स राज्ये स्थापितस्तेन सुग्रीवो वानरेश्वर:।

राजा वानरमुख्यानां तेन प्रस्थापिता वयम्॥ १४॥

‘उन्होंने ही सुग्रीवको वालीके राज्यपर स्थापित किया। अब सुग्रीव वानरोंके स्वामी हैं। मुख्य-मुख्य वानरोंके भी राजा हैं। उन्होंने हमें सीताकी खोजके लिये भेजा है॥ १४॥

एवं रामप्रयुक्तास्तु मार्गमाणास्ततस्तत:।

वैदेहीं नाधिगच्छामो रात्रौ सूर्यप्रभामिव॥ १५॥

‘इस तरह श्रीरामसे प्रेरित होकर हमलोग इधर-उधर विदेहकुमारी सीताको खोजते-फिरते हैं, किंतु अबतक उनका पता नहीं लगा। जैसे रातमें सूर्यकी प्रभाका दर्शन नहीं होता, उसी प्रकार हमें इस वनमें जानकीका दर्शन नहीं हुआ॥ १५॥

ते वयं दण्डकारण्यं विचित्य सुसमाहिता:।

अज्ञानात् तु प्रविष्टा: स्म धरण्या विवृतं बिलम्॥ १६॥

‘हमलोग अपने मनको एकाग्र करके दण्डकारण्यमें भलीभाँति खोज करते हुए अज्ञानवश पृथ्वीके एक खुले हुए विवरमें घुस गये॥ १६॥

मयस्य मायाविहितं तद् बिलं च विचिन्वताम्।

व्यतीतस्तत्र नो मासो यो राज्ञा समय: कृत:॥ १७॥

‘वह विवर मयासुरकी मायासे निर्मित हुआ है। उसमें खोजते-खोजते हमारा एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीवने हमारे लौटनेके लिये अवधि निश्चित किया था॥ १७॥

ते वयं कपिराजस्य सर्वे वचनकारिण:।

कृतां संस्थामतिक्रान्ता भयात् प्रायमुपासिता:॥ १८॥

‘हम सब लोग कपिराज सुग्रीवके आज्ञाकारी हैं, किंतु उनके द्वारा नियत की हुई अवधिको लाँघ गये हैं। अत: उन्हींके भयसे हम यहाँ आमरण उपवास कर रहे हैं॥ १८॥

क्रुद्धे तस्म‌िंस्तु काकुत्स्थे सुग्रीवे च सलक्ष्मणे।

गतानामपि सर्वेषां तत्र नो नास्ति जीवितम्॥ १९॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव तीनों हमपर कुपित होंगे। उस दशामें वहाँ लौट जानेके बाद भी हम सबके प्राण नहीं बच सकते’॥ १९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तपञ्चाश: सर्ग:॥ ५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

 

अष्टपञ्चाश: सर्ग:

सम्पातिका अपने पंख जलनेकी कथा सुनाना, सीता और रावणका पता बताना तथा वानरोंकी सहायतासे समुद्र-तटपर जाकर भाईको जलाञ्जलि देना

इत्युक्त: करुणं वाक्यं वानरैस्त्यक्तजीवितै:।

सबाष्पो वानरान् गृध्र: प्रत्युवाच महास्वन:॥ १॥

जीवनकी आशा त्यागकर बैठे हुए वानरोंके मुखसे यह करुणाजनक बात सुनकर सम्पातिके नेत्रोंमें आँसू आ गये। उन्होंने उच्च स्वरसे उत्तर दिया—॥ १॥

यवीयान् स मम भ्राता जटायुर्नाम वानरा:।

यमाख्यात हतं युद्धे रावणेन बलीयसा॥ २॥

‘वानरो! तुम जिसे महाबली रावणके द्वारा युद्धमें मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था॥

वृद्धभावादपक्षत्वाच्छृण्वंस्तदपि मर्षये।

नहि मे शक्तिरस्त्यद्य भ्रातुर्वैरविमोक्षणे॥ ३॥

‘मैं बूढ़ा हुआ। मेरे पंख जल गये। इसलिये अब मुझमें अपने भाईके वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सहे लेता हूँ॥ ३॥

पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ।

आदित्यमुपयातौ स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्॥ ४॥

आवृत्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गतौ भृशम्।

मध्यं प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति॥ ५॥

‘पहलेकी बात है जब इन्द्रके द्वारा वृत्रासुरका वध हो गया, तब इन्द्रको प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतनेकी इच्छासे पहले आकाशमार्गके द्वारा बड़े वेगसे स्वर्गलोकमें गये। इन्द्रको जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्गको प्रकाशित करनेवाले अंशुमाली सूर्यके पास आये। हममेंसे जटायु सूर्यके मध्याह्नकालमें उनके तेजसे शिथिल होने लगा॥ ४-५॥

तमहं भ्रातरं दृष्ट्वा सूर्यरश्मिभिरर्दितम्।

पक्षाभ्यां छादयामास स्नेहात् परमविह्वलम्॥ ६॥

‘भाईको सूर्यकी किरणोंसे पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखोंसे उसे ढक लिया॥ ६॥

निर्दग्धपत्र: पतितो विन्ध्येऽहं वानरर्षभा:।

अहमस्मिन् वसन् भ्रातु: प्रवृत्तिं नोपलक्षये॥ ७॥

‘वानरशिरोमणियो! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वतपर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाईका समाचार न पा सका (आज पहले-पहल तुमलोगोंके मुखसे उसके मारे जानेकी बात मालूम हुई है)’॥ ७॥

जटायुषस्त्वेवमुक्तो भ्रात्रा सम्पातिना तदा।

युवराजो महाप्रज्ञ: प्रत्युवाचाङ्गदस्तदा॥ ८॥

जटायुके भाई सम्पातिके उस समय ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गदने उनसे इस प्रकार कहा—

जटायुषो यदि भ्राता श्रुतं ते गदितं मया।

आख्याहि यदि जानासि निलयं तस्य रक्षस:॥ ९॥

‘गृध्रराज! यदि आप जटायुके भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षसका निवासस्थान जानते हैं तो हमें बताइये॥ ९॥

अदीर्घदर्शिनं तं वै रावणं राक्षसाधमम्।

अन्तिके यदि वा दूरे यदि जानासि शंस न:॥ १०॥

‘वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँसे निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें’॥

ततोऽब्रवीन्महातेजा भ्राता ज्येष्ठो जटायुष:।

आत्मानुरूपं वचनं वानरान् सम्प्रहर्षयन्॥ ११॥

तब जटायुके बड़े भाई महातेजस्वी सम्पातिने वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही—॥ ११॥

निर्दग्धपक्षो गृध्रोऽहं गतवीर्य: प्लवङ्गमा:।

वाङ्मात्रेण तु रामस्य करिष्ये साह्यमुत्तमम्॥ १२॥

‘वानरो! मेरे पंख जल गये। अब मैं बेपरका गीध हूँ। मेरी शक्ति जाती रही (अत: मैं शरीरसे तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि) वचनमात्रसे भगवान् श्रीरामकी उत्तम सहायता अवश्य करूँगा॥ १२॥

जानामि वारुणाँल्लोकान् विष्णोस्त्रैविक्रमानपि।

देवासुरविमर्दांश्च ह्यमृतस्य विमन्थनम्॥ १३॥

‘मैं वरुणके लोकोंको जानता हूँ। वामनावतारके समय भगवान् विष्णुने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रखे थे, उन स्थानोंका भी मुझे ज्ञान है। अमृत-मन्थन तथा देवासुरसंग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं॥

रामस्य यदिदं कार्यं कर्तव्यं प्रथमं मया।

जरया च हृतं तेज: प्राणाश्च शिथिला मम॥ १४॥

‘यद्यपि वृद्धावस्थाने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजीका यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है॥ १४॥

तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता।

ह्र‌ियमाणा मया दृष्टा रावणेन दुरात्मना॥ १५॥

‘एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकारके गहनोंसे सजी हुई एक रूपवती युवतीको हरकर लिये जा रहा था॥ १५॥

क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च भामिनी।

भूषणान्यपविध्यन्ती गात्राणि च विधुन्वती॥ १६॥

‘वह मानिनी देवी ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण’ की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीरके अवयवोंको कम्पित करती हुई छटपटा रही थी॥ १६॥

सूर्यप्रभेव शैलाग्रे तस्या: कौशेयमुत्तमम्।

असिते राक्षसे भाति यथा वा तडिदम्बुदे॥ १७॥

‘उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचलके शिखरपर फैली हुई सूर्यकी प्रभाके समान सुशोभित होता था। वह उस काले राक्षसके समीप बादलोंमें चमकती हुई बिजलीके समान प्रकाशित हो रही थी॥ १७॥

तां तु सीतामहं मन्ये रामस्य परिकीर्तनात्।

श्रूयतां मे कथयतो निलयं तस्य रक्षस:॥ १८॥

‘श्रीरामका नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षसके घरका पता बताता हूँ, सुनो॥ १८॥

पुत्रो विश्रवस: साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च।

अध्यास्ते नगरीं लङ्कां रावणो नाम राक्षस:॥ १९॥

‘रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवाका पुत्र और साक्षात् कुबेरका भाई है। वह लङ्का नामवाली नगरीमें निवास करता है॥ १९॥

इतो द्वीपे समुद्रस्य सम्पूर्णे शतयोजने।

तस्मिँल्लङ्का पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा॥ २०॥

‘यहाँसे पूरे चार सौ कोसके अन्तरपर समुद्रमें एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्माने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरीका निर्माण किया है॥ २०॥

जाम्बूनदमयैर्द्वारैश्चित्रै: काञ्चनवेदिकै:।

प्रासादैर्हेमवर्णैश्च महद्भि: सुसमाकृता॥ २१॥

‘उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्णके बने हुए हैं। उनके भीतर सोनेके चबूतरे या वेदियाँ हैं॥ २१॥

प्राकारेणार्कवर्णेन महता च समन्विता।

तस्यां वसति वैदेही दीना कौशेयवासिनी॥ २२॥

‘उस नगरीकी चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्यकी भाँति चमकती रहती है। उसीके भीतर पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दु:खसे निवास करती हैं॥ २२॥

रावणान्त:पुरे रुद्धा राक्षसीभि: सुरक्षिता।

जनकस्यात्मजां राज्ञस्तस्यां द्रक्ष्यथ मैथिलीम्॥ २३॥

‘रावणके अन्त:पुरमें नजरबंद हैं। बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरेपर तैनात हैं। वहाँ पहुँचनेपर तुमलोग राजा जनककी कन्या मैथिली सीताको देख सकोगे॥ २३॥

लङ्कायामथ गुप्तायां सागरेण समन्तत:।

सम्प्राप्य सागरस्यान्तं सम्पूर्णं शतयोजनम्॥ २४॥

आसाद्य दक्षिणं तीरं ततो द्रक्ष्यथ रावणम्।

तत्रैव त्वरिता: क्षिप्रं विक्रमध्वं प्लवङ्गमा:॥ २५॥

‘लङ्का चारों ओरसे समुद्रके द्वारा सुरक्षित है। पूरे सौ योजन समुद्रको पार करके उसके दक्षिण तटपर पहुँचनेपर तुमलोग रावणको देख सकोगे। अत: वानरो! समुद्रको पार करनेमें ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रमका परिचय दो॥

ज्ञानेन खलु पश्यामि दृष्ट्वा प्रत्यागमिष्यथ।

आद्य: पन्था: कुलिङ्गानां ये चान्ये धान्यजीविन:॥ २६॥

‘निश्चय ही मैं ज्ञानदृष्टिसे देखता हूँ। तुमलोग सीताका दर्शन करके लौट आओगे। आकाशका पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खानेवाले कबूतर आदि पक्षियोंका है॥ २६॥

द्वितीयो बलिभोजानां ये च वृक्षफलाशना:।

भासास्तृतीयं गच्छन्ति क्रौञ्चाश्च कुररै: सह॥ २७॥

‘उससे ऊपरका दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षोंके फल खाकर रहनेवाले दूसरे-दूसरे पक्षियोंका है। उससे भी ऊँचा जो आकाशका तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं॥ २७॥

श्येनाश्चतुर्थं गच्छन्ति गृध्रा गच्छन्ति पञ्चमम्।

बलवीर्योपपन्नानां रूपयौवनशालिनाम्॥ २८॥

षष्ठस्तु पन्था हंसानां वैनतेयगति: परा।

वैनतेयाच्च नो जन्म सर्वेषां वानरर्षभा:॥ २९॥

‘बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्गसे उड़ते हैं। रूप, बल और पराक्रमसे सम्पन्न तथा यौवनसे सुशोभित होनेवाले हंसोंका छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़की है। वानरशिरोमणियो! हम सबका जन्म गरुड़से ही हुआ है॥

गर्हितं तु कृतं कर्म येन स्म पिशिताशिन:।

प्रतिकार्यं च मे तस्य वैरं भ्रातृकृतं भवेत्॥ ३०॥

‘परंतु पूर्वजन्ममें हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है। तुमलोगोंकी सहायता करके मुझे रावणसे अपने भाईके वैरका बदला लेना है॥ ३०॥

इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकीं तथा।

अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा॥ ३१॥

‘मैं यहींसे रावण और जानकीको देखता हूँ। हमलोगोंमें भी गरुड़की भाँति दूरतक देखनेकी दिव्य शक्ति है॥ ३१॥

तस्मादाहारवीर्येण निसर्गेण च वानरा:।

आयोजनशतात् साग्राद् वयं पश्याम नित्यश:॥ ३२॥

‘इसलिये वानरो! हम भोजनजनित बलसे तथा स्वाभाविक शक्तिसे भी सदा सौ योजन और उससे आगेतक भी देख सकते हैं॥ ३२॥

अस्माकं विहिता वृत्तिर्निसर्गेण च दूरत:।

विहिता वृक्षमूले तु वृत्तिश्चरणयोधिनाम्॥ ३३॥

‘जातीय स्वभावके अनुसार हमलोगोंकी जीविका-वृत्ति दूरसे देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेषके द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्षकी जड़तक ही सीमित है—वे वहींतक उपलब्ध होनेवाली वस्तुसे जीवन-निर्वाह करते हैं॥ ३३॥

उपायो दृश्यतां कश्चिल्लङ्घने लवणाम्भस:।

अभिगम्य तु वैदेहीं समृद्धार्था गमिष्यथ॥ ३४॥

‘अब तुम इस खारे पानीके समुद्रको लाँघनेका कोई उपाय सोचो। विदेहकुमारी सीताके पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरीको लौटोगे॥ ३४॥

समुद्रं नेतुमिच्छामि भवद्भिर्वरुणालयम्।

प्रदास्याम्युदकं भ्रातु: स्वर्गतस्य महात्मन:॥ ३५॥

‘अब मैं तुम्हारी सहायतासे समुद्रके किनारे चलना चाहता हूँ। वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायुको जलाञ्जलि प्रदान करूँगा’॥ ३५॥

ततो नीत्वा तु तं देशं तीरे नदनदीपते:।

निर्दग्धपक्षं सम्पातिं वानरा: सुमहौजस:॥ ३६॥

तं पुन: प्रापयित्वा च तं देशं पतगेश्वरम्।

बभूवुर्वानरा हृष्टा: प्रवृत्तिमुपलभ्य ते॥ ३७॥

यह सुनकर महापराक्रमी वानरोंने जले पंखवाले पक्षिराज सम्पातिको उठाकर समुद्रके किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देनेके पश्चात् वे पुन: उनको वहाँसे उठाकर उनके रहनेके स्थानपर ले आये। उनके मुखसे सीताका समाचार जानकर उन सभी वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायाणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टपञ्चाश: सर्ग:॥ ५८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८॥

 


एकोनषष्टितम: सर्ग:

सम्पातिका अपने पुत्र सुपार्श्वके मुखसे सुनी हुई सीता और रावणको देखनेकी घटनाका वृत्तान्त बताना

ततस्तदमृतास्वादं गृध्रराजेन भाषितम्।

निशम्य वदता हृष्टास्ते वच: प्लवगर्षभा:॥ १॥

उस समय वार्तालाप करते हुए गृध्रराजके द्वारा कहे गये उस अमृतके समान स्वादिष्ट मधुर वचनको सुनकर सब वानरश्रेष्ठ हर्षसे खिल उठे॥ १॥

जाम्बवान् वानरश्रेष्ठ: सह सर्वै: प्लवङ्गमै:।

भूतलात् सहसोत्थाय गृध्रराजानमब्रवीत्॥ २॥

वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान् सब वानरोंके साथ सहसा भूतलसे उठकर खड़े हो गये और गृध्रराजसे इस प्रकार पूछने लगे—॥ २॥

क्व सीता केन वा दृष्टा को वा हरति मैथिलीम्।

तदाख्यातु भवान् सर्वं गतिर्भव वनौकसाम्॥ ३॥

‘पक्षिराज! सीता कहाँ हैं? किसने उन्हें देखा है? और कौन उन मिथिलेशकुमारीको हरकर ले गया है? ये सब बातें बताइये और हम सब वनवासी वानरोंके आश्रयदाता होइये॥ ३॥

को दाशरथिबाणानां वज्रवेगनिपातिनाम्।

स्वयं लक्ष्मणमुक्तानां न चिन्तयति विक्रमम्॥ ४॥

‘कौन ऐसा धृष्ट है, जो वज्रके समान वेगपूर्वक चोट करनेवाले दशरथनन्दन श्रीरामके बाणों तथा स्वयं लक्ष्मणके चलाये हुए सायकोंके पराक्रमको कुछ नहीं समझता है?’॥ ४॥

स हरीन् प्रतिसम्मुक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान्।

पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत्॥ ५॥

उस समय उपवास छोड़कर बैठे और सीताजीका वृत्तान्त सुननेके लिये एकाग्र हुए वानरोंको प्रसन्नता-पूर्वक पुन: आश्वासन देते हुए सम्पातिने उनसे यह बात कही—॥ ५॥

श्रूयतामिह वैदेह्या यथा मे हरणं श्रुतम्।

येन चापि ममाख्यातं यत्र चायतलोचना॥ ६॥

‘वानरो! विदेहकुमारी सीताका जिस प्रकार अपहरण हुआ है, विशाललोचना सीता इस समय जहाँ है और जिसने मुझसे यह सब वृत्तान्त कहा है एवं जिस तरह मैंने सुना है, वह सब बताता हूँ, सुनो—॥ ६॥

अहमस्मिन् गिरौ दुर्गे बहुयोजनमायते।

चिरान्निपतितो वृद्ध: क्षीणप्राणपराक्रम:॥ ७॥

‘यह दुर्गम पर्वत कई योजनोंतक फैला है। दीर्घकाल हुआ, जब मैं इस पर्वतपर गिरा था। मेरी प्राणशक्ति क्षीण हो गयी थी और मैं वृद्ध था॥ ७॥

तं मामेवंगतं पुत्र: सुपार्श्वो नाम नामत:।

आहारेण यथाकालं बिभर्ति पततां वर:॥ ८॥

‘इस अवस्थामें मेरा पुत्र पक्षिप्रवर सुपार्श्व ही यथासमय आहार देकर प्रतिदिन मेरा भरण-पोषण करता है॥ ८॥

तीक्ष्णकामास्तु गन्धर्वास्तीक्ष्णकोपा भुजङ्गमा:।

मृगाणां तु भयं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णक्षुधा वयम्॥ ९॥

‘जैसे गन्धर्वोंका कामभाव तीव्र होता है, सर्पोंका क्रोध तेज होता है और मृगोंको भय अधिक होता है, उसी प्रकार हमारी जातिके लोगोंकी भूख बड़ी तीव्र होती है॥ ९॥

स कदाचित् क्षुधार्तस्य ममाहाराभिकांक्षिण:।

गतसूर्येऽहनि प्राप्तो मम पुत्रो ह्यनामिष:॥ १०॥

‘एक दिनकी बात है मैं भूखसे पीड़ित होकर आहार प्राप्त करना चाहता था। मेरा पुत्र मेरे लिये भोजनकी तलाशमें निकला था, किंतु सूर्यास्त होनेके बाद वह खाली हाथ लौट आया, उसे कहीं मांस नहीं मिला॥ १०॥

स मयाऽऽहारसंरोधात् पीडित: प्रीतिवर्धन:।

अनुमान्य यथातत्त्वमिदं वचनमब्रवीत्॥ ११॥

‘भोजन न मिलनेसे मैंने कठोर बातें सुनाकर अपनी प्रीति बढ़ानेवाले उस पुत्रको बहुत पीड़ा दी, किंतु उसने नम्रतापूर्वक मुझे आदर देते हुए यह यथार्थ बात कही—॥ ११॥

अहं तात यथाकालमामिषार्थी खमाप्लुत:।

महेन्द्रस्य गिरेर्द्वारमावृत्य सुसमाश्रित:॥ १२॥

‘तात! मैं यथासमय मांस प्राप्त करनेकी इच्छासे आकाशमें उड़ा और महेन्द्र पर्वतके द्वारको रोककर खड़ा हो गया॥ १२॥

तत्र सत्त्वसहस्राणां सागरान्तरचारिणाम्।

पन्थानमेकोऽध्यवसं संनिरोद्धुमवाङ्मुख:॥ १३॥

‘वहाँ अपनी चोंच नीची करके मैं समुद्रके भीतर विचरनेवाले सहस्रों जन्तुओंके मार्गको रोकनेके लिये अकेला ठहर गया॥ १३॥

तत्र कश्चिन्मया दृष्ट: सूर्योदयसमप्रभाम्।

स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपम:॥ १४॥

‘उस समय मैंने देखा खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी राशिके समान काला कोई पुरुष एक स्त्रीको लेकर जा रहा है। उस स्त्रीकी कान्ति सूर्योदयकालकी प्रभाके समान प्रकाशित हो रही थी॥ १४॥

सोऽहमभ्यवहारार्थं तौ दृष्ट्वा कृतनिश्चय:।

तेन साम्ना विनीतेन पन्थानमनुयाचित:॥ १५॥

‘उस स्त्री और उस पुरुषको देखकर मैंने उन्हें आपके आहारके लिये लानेका निश्चय किया, किंतु उस पुरुषने नम्रतापूर्वक मधुर वाणीमें मुझसे मार्गकी याचना की॥

नहि सामोपपन्नानां प्रहर्ता विद्यते भुवि।

नीचेष्वपि जन: कश्चित् किमङ्ग बत मद्विध:॥ १६॥

‘पिताजी! भूतलपर नीच पुरुषोंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो विनयपूर्वक मीठे वचन बोलनेवालोंपर प्रहार करे। फिर मुझ-जैसा कुलीन पुरुष कैसे कर सकता है?॥

स यातस्तेजसा व्योम संक्षिपन्निव वेगित:।

अथाहं खेचरैर्भूतैरभिगम्य सभाजित:॥ १७॥

‘फिर तो वह तेजसे आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा वेगपूर्वक चला गया। उसके चले जानेपर आकाशचारी प्राणी सिद्ध-चारण आदिने आकर मेरा बड़ा सम्मान किया॥

दिष्ट्या जीवति सीतेति ह्यब्रुवन् मां महर्षय:।

कथंचित् सकलत्रोऽसौ गतस्ते स्वस्त्यसंशयम्॥ १८॥

‘वे महर्षि मुझसे बोले—‘सौभाग्यकी बात है कि सीता जीवित हैं। तुम्हारी दृष्टि पड़नेपर भी स्त्रीके साथ आया हुआ वह पुरुष किसी तरह सकुशल बच गया; अत: अवश्य तुम्हारा कल्याण हो’॥ १८॥

एवमुक्तस्ततोऽहं तै: सिद्धै: परमशोभनै:।

स च मे रावणो राजा रक्षसां प्रतिवेदित:॥ १९॥

‘उन परम शोभायमान सिद्ध पुरुषोंने मुझसे ऐसा कहा, तत्पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि ‘वह काला पुरुष राक्षसोंका राजा रावण था’॥ १९॥

पश्यन् दाशरथेर्भार्यां रामस्य जनकात्मजाम्।

भ्रष्टाभरणकौशेयां शोकवेगपराजिताम्॥ २०॥

रामलक्ष्मणयोर्नाम क्रोशन्तीं मुक्तमूर्धजाम्।

एष कालात्ययस्तात इति वाक्यविदां वर:॥ २१॥

एतदर्थं समग्रं मे सुपार्श्व: प्रत्यवेदयत्।

तच्छ्रुत्वापि हि मे बुद्धिर्नासीत् काचित् पराक्रमे॥ २२॥

‘तात! दशरथनन्दन श्रीरामकी पत्नी जनककिशोरी सीता शोकके वेगसे पराजित हो गयी थीं। उनके आभूषण गिर रहे थे और रेशमी वस्त्र भी सिरसे खिसक गया था। उनके केश खुले हुए थे और वे श्रीराम तथा लक्ष्मणका नाम ले-लेकर उन्हें पुकार रही थीं। मैं उनकी इस दयनीय दशाको देखता रह गया। यही मेरे विलम्बसे आनेका कारण है।’ इस प्रकार बातचीतकी कला जाननेवालोंमें श्रेष्ठ सुपार्श्वने मेरे सामने इन सारी बातोंका वर्णन किया। यह सब सुनकर भी मेरे हृदयमें पराक्रम कर दिखानेका कोई विचार नहीं उठा॥ २०—२२॥

अपक्षो हि कथं पक्षी कर्म किंचित् समारभेत्।

यत् तु शक्यं मया कर्तुं वाग्बुद्धिगुणवर्तिना॥ २३॥

श्रूयतां तत्र वक्ष्यामि भवतां पौरुषाश्रयम्।

‘बिना पंखका पक्षी कैसे कोई पराक्रम कर सकता है? अपनी वाणी और बुद्धिके द्वारा साध्य जो उपकाररूप गुण है, उसे करना मेरा स्वभाव बन गया है। ऐसे स्वभावसे मैं जो कुछ कर सकता हूँ, वह कार्य तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। वह कार्य तुमलोगोंके पुरुषार्थसे ही सिद्ध होनेवाला है॥ २३/

वाङ्मतिभ्यां हि सर्वेषां करिष्यामि प्रियं हि व:॥ २४॥

यद्धि दाशरथे: कार्यं मम तन्नात्र संशय:।

‘मैं वाणी और बुद्धिके द्वारा तुम सब लोगोंका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीरामका जो कार्य है, वह मेरा ही है—इसमें संशय नहीं है॥ २४/

तद् भवन्तो मतिश्रेष्ठा बलवन्तो मनस्विन:॥ २५॥

प्रहिता: कपिराजेन देवैरपि दुरासदा:।

‘तुमलोग भी उत्तम बुद्धिसे युक्त, बलवान्, मनस्वी तथा देवताओंके लिये भी दुर्जय हो। इसीलिये वानरराज सुग्रीवने तुम्हें इस कार्यके लिये भेजा है॥ २५/

रामलक्ष्मणबाणाश्च विहिता: कङ्कपत्रिण:॥ २६॥

त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्तास्त्राणनिग्रहे।

‘श्रीराम और लक्ष्मणके कङ्कपत्रसे युक्त जो बाण हैं, वे साक्षात् विधाताके बनाये हुए हैं। वे तीनों लोकोंका संरक्षण और दमन करनेके लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं॥

कामं खलु दशग्रीवस्तेजोबलसमन्वित:।

भवतां तु समर्थानां न किंचिदपि दुष्करम्॥ २७॥

‘तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किंतु तुम-जैसे सामर्थ्यशाली वीरोंके लिये उसे परास्त करना आदि कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है॥

तदलं कालसङ्गेन क्रियतां बुद्धिनिश्चय:।

नहि कर्मसु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधा:॥ २८॥

‘अत: अब अधिक समय बितानेकी आवश्यकता नहीं है। अपनी बुद्धिके द्वारा दृढ निश्चय करके सीताके दर्शनके लिये उद्योग करो; क्योंकि तुम-जैसे बुद्धिमान् लोग कार्योंकी सिद्धिमें विलम्ब नहीं करते हैं’॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनषष्टितम: सर्ग:॥ ५९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

 

षष्टितम: सर्ग:

सम्पातिकी आत्मकथा

तत: कृतोदकं स्नातं तं गृध्रं हरियूथपा:।

उपविष्टा गिरौ रम्ये परिवार्य समन्तत:॥ १॥

गृध्रराज सम्पाति अपने भाईको जलाञ्जलि देकर जब स्नान कर चुके, तब उस रमणीय पर्वतपर वे समस्त वानरयूथपति उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गये॥ १॥

तमङ्गदमुपासीनं तै: सर्वैर्हरिभिर्वृतम्।

जनितप्रत्ययो हर्षात् सम्पाति: पुनरब्रवीत्॥ २॥

उन समस्त वानरोंसे घिरे हुए अङ्गद उनके पास बैठे थे। सम्पातिने सबके हृदयमें अपनी ओरसे विश्वास पैदा कर दिया था। वे हर्षोत्फुल्ल होकर फिर इस प्रकार कहने लगे—॥ २॥

कृत्वा नि:शब्दमेकाग्रा: शृण्वन्तु हरयो मम।

तथ्यं संकीर्तयिष्यामि यथा जानामि मैथिलीम्॥ ३॥

‘सब वानर एकाग्रचित्त एवं मौन होकर मेरी बात सुनो। मैं मिथिलेशकुमारीको जिस प्रकार जानता हूँ, वह सारा प्रसङ्ग ठीक-ठीक बता रहा हूँ॥ ३॥

अस्य विन्ध्यस्य शिखरे पतितोऽस्मि पुरानघ।

सूर्यतापपरीताङ्गो निर्दग्ध: सूर्यरश्मिभि:॥ ४॥

‘निष्पाप अङ्गद! प्राचीन कालमें मैं सूर्यकी किरणोंसे झुलसकर इस विन्ध्यपर्वतके शिखरपर गिरा था। उस समय मेरे सारे अङ्ग सूर्यके प्रचण्ड तापसे संतप्त हो रहे थे॥

लब्धसंज्ञस्तु षड्रात्राद् विवशो विह्वलन्निव।

वीक्षमाणो दिश: सर्वा नाभिजानामि किंचन॥ ५॥

‘छ: रातें बीतनेपर जब मुझे होश हुआ और मैं विवश एवं विह्वल-सा होकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगा, तब सहसा किसी भी वस्तुको मैं पहचान न सका॥ ५॥

ततस्तु सागरान् शैलान् नदी: सर्वा: सरांसि च।

वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता॥ ६॥

‘तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र, पर्वत, समस्त नदी, सरोवर, वन और यहाँके विभिन्न प्रदेशोंपर दृष्टि डाली, तब मेरी स्मरण-शक्ति लौटी॥ ६॥

हृष्टपक्षिगणाकीर्ण: कन्दरोदरकूटवान्।

दक्षिणस्योदधेस्तीरे विन्ध्योऽयमिति निश्चित:॥ ७॥

‘फिर मैंने निश्चय किया कि यह दक्षिण समुद्रके तटपर स्थित विन्ध्यपर्वत है, जो हर्षोत्फुल्ल विहंगमोंके समुदायसे व्याप्त है। यहाँ बहुत-सी कन्दराएँ, गुफाएँ और शिखर हैं॥ ७॥

आसीच्चात्राश्रमं पुण्यं सुरैरपि सुपूजितम्।

ऋषिर्निशाकरो नाम यस्मिन्नुग्रतपाऽभवत्॥ ८॥

‘पूर्वकालमें यहाँ एक पवित्र आश्रम था, जिसका देवता भी बड़ा सम्मान करते थे। उस आश्रममें निशाकर (चन्द्रमा) नामधारी एक ऋषि रहते थे, जो बड़े ही उग्र तपस्वी थे॥

अष्टौ वर्षसहस्राणि तेनास्मिन्नृषिणा गिरौ।

वसतो मम धर्मज्ञे स्वर्गते तु निशाकरे॥ ९॥

‘वे धर्मज्ञ निशाकर मुनि अब स्वर्गवासी हो चुके हैं। उन महर्षिके बिना इस पर्वतपर रहते हुए मेरे आठ हजार वर्ष बीत गये॥ ९॥

अवतीर्य च विन्ध्याग्रात् कृच्छ्रेण विषमाच्छनै:।

तीक्ष्णदर्भां वसुमतीं दु:खेन पुनरागत:॥ १०॥

‘होशमें आनेके बाद मैं इस पर्वतके नीचे-ऊँचे शिखरसे धीरे-धीरे बड़े कष्टके साथ भूमिपर उतरा, उस समय ऐसे स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ तीखे कुश उगे हुए थे। फिर वहाँसे भी कष्ट सहन करता हुआ आगे बढ़ा॥ १०॥

तमृषिं द्रष्टुकामोऽस्मि दु:खेनाभ्यागतो भृशम्।

जटायुषा मया चैव बहुशोऽधिगतो हि स:॥ ११॥

‘मैं उन महर्षिका दर्शन करना चाहता था, इसीलिये अत्यन्त कष्ट उठाकर वहाँ गया था। इसके पहले मैं और जटायु दोनों कई बार उनसे मिल चुके थे॥ ११॥

तस्याश्रमपदाभ्याशे ववुर्वाता: सुगन्धिन:।

वृक्षो नापुष्पित: कश्चिदफलो वा न दृश्यते॥ १२॥

‘उनके आश्रमके समीप सदा सुगन्धित वायु चलती थी। वहाँका कोई भी वृक्ष फल अथवा फूलसे रहित नहीं देखा जाता था॥ १२॥

उपेत्य चाश्रमं पुण्यं वृक्षमूलमुपाश्रित:।

द्रष्टुकाम: प्रतीक्षे च भगवन्तं निशाकरम्॥ १३॥

‘उस पवित्र आश्रमपर पहुँचकर मैं एक वृक्षके नीचे ठहर गया और भगवान् निशाकरके दर्शनकी इच्छासे उनके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा॥ १३॥

अथ पश्यामि दूरस्थमृषिं ज्वलिततेजसम्।

कृताभिषेकं दुर्धर्षमुपावृत्तमुदङ्मुखम्॥ १४॥

‘थोड़ी ही देरमें महर्षि मुझे दूरसे आते दिखायी दिये। वे अपने तेजसे दिप रहे थे और स्नान करके उत्तरकी ओर लौटे आ रहे थे। उनका तिरस्कार करना किसीके लिये भी कठिन था॥ १४॥

तमृक्षा: सृमरा व्याघ्रा: सिंहा नानासरीसृपा:।

परिवार्योपगच्छन्ति दातारं प्राणिनो यथा॥ १५॥

‘अनेकानेक रीछ, हरिन, सिंह, बाघ और नाना प्रकारके सर्प उन्हें इस प्रकार घेरे आ रहे थे, जैसे याचना करनेवाले प्राणी दाताको घेरकर चलते हैं॥ १५॥

तत: प्राप्तमृषिं ज्ञात्वा तानि सत्त्वानि वै ययु:।

प्रविष्टे राजनि यथा सर्वं सामात्यकं बलम्॥ १६॥

‘ऋषिको आश्रमपर आया जान वे सभी प्राणी लौट गये। ठीक उसी तरह, जैसे राजाके अपने महलमें चले जानेपर मन्त्रीसहित सारी सेना अपने-अपने विश्रामस्थानको लौट जाती है॥ १६॥

ऋषिस्तु दृष्ट्वा मां तुष्ट: प्रविष्टश्चाश्रमं पुन:।

मुहूर्तमात्रान्निर्गम्य तत: कार्यमपृच्छत॥ १७॥

‘ऋषि मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने आश्रममें प्रवेश करके पुन: दो ही घड़ीमें बाहर निकल आये। फिर पास आकर उन्होंने मेरे आनेका प्रयोजन पूछा—॥ १७॥

सौम्य वैकल्यतां दृष्ट्वा रोम्णां ते नावगम्यते।

अग्निदग्धाविमौ पक्षौ प्राणाश्चापि शरीरके॥ १८॥

‘वे बोले—‘सौम्य! तुम्हारे रोएँ गिर गये और दोनों पंख जल गये हैं। इसका कारण नहीं जान पड़ता। इतनेपर भी तुम्हारे शरीरमें प्राण टिके हुए हैं॥ १८॥

गृध्रौ द्वौ दृष्टपूर्वौ मे मातरिश्वसमौ जवे।

गृध्राणां चैव राजानौ भ्रातरौ कामरूपिणौ॥ १९॥

‘मैंने पहले वायुके समान वेगशाली दो गीधोंको देखा है। वे दोनों परस्पर भाई और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। साथ ही वे गीधोंके राजा भी थे॥ १९॥

ज्येष्ठोऽवितस्त्वं सम्पाते जटायुरनुजस्तव।

मानुषं रूपमास्थाय गृह्णीतां चरणौ मम॥ २०॥

‘सम्पाते! मैं तुम्हें पहचान गया। तुम उन दो भाइयोंमेंसे बड़े हो। जटायु तुम्हारा छोटा भाई था। तुम दोनों मनुष्यरूप धारण करके मेरा चरण-स्पर्श किया करते थे॥ २०॥

किं ते व्याधिसमुत्थानं पक्षयो: पतनं कथम्।

दण्डो वायं धृत: केन सर्वमाख्याहि पृच्छत:॥ २१॥

‘यह तुम्हें कौन-सा रोग लग गया है। तुम्हारे दोनों पंख कैसे गिर गये? किसीने दण्ड तो नहीं दिया है? मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब तुम स्पष्टरूपसे कहो’॥ २१॥

इत्यार्षे श्रीमद्राणायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षष्टितम: सर्ग:॥ ६०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६०॥

 

एकषष्टितम: सर्ग:

सम्पातिका निशाकर मुनिको अपने पंखके जलनेका कारण बताना

ततस्तद् दारुणं कर्म दुष्करं सहसा कृतम्।

आचचक्षे मुने: सर्वं सूर्यानुगमनं तथा॥ १॥

‘उनके इस प्रकार पूछनेपर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्यका अनुगमनरूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया॥ १॥

भगवन् व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रिय:।

परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनं परिभाषितुम्॥ २॥

‘मैंने कहा—‘भगवन्! मेरे शरीरमें घाव हो गया है तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जासे व्याकुल हैं, इसलिये अधिक कष्ट पानेके कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता॥

अहं चैव जटायुश्च संघर्षाद् गर्वमोहितौ।

आकाशं पतितौ दूराज्जिज्ञासन्तौ पराक्रमम्॥ ३॥

‘मैं और जटायु दोनों ही गर्वसे मोहित हो रहे थे; अत: अपने पराक्रमकी थाह लगानेके लिये हम दोनों दूरतक पहुँचनेके उद्देश्यसे उड़ने लगे॥ ३॥

कैलासशिखरे बद‍्ध्वा मुनीनामग्रत: पणम्।

रवि: स्यादनुयातव्यो यावदस्तं महागिरिम्॥ ४॥

‘कैलास पर्वतके शिखरपर मुनियोंके सामने हम दोनोंने यह शर्त बदी थी कि सूर्य जबतक अस्ताचलपर जायँ, उसके पहले ही हम दोनोंको उनके पास पहुँच जाना चाहिये॥

अप्यावां युगपत् प्राप्तावपश्याव महीतले।

रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक् पृथक्॥ ५॥

‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाशमें जा पहुँचे। वहाँसे पृथ्वीके भिन्न-भिन्न नगरमें हम रथके पहियेके बराबर दिखायी देते थे॥ ५॥

क्वचिद् वादित्रघोषश्च क्वचिद् भूषणनि:स्वन:।

गायन्ती: स्माङ्गना बह्वी: पश्यावो रक्तवासस:॥ ६॥

‘ऊपरके लोकोंमें कहीं वाद्योंका मधुर घोष हो रहा था, कहीं आभूषणोंकी झनकारें सुनायी पड़ती थीं और कहीं लाल रंगकी साड़ी पहने बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत गा रही थीं, जिन्हें हम दोनोंने अपनी आँखों देखा था॥

तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपदमास्थितौ।

आवामालोकयावस्तद् वनं शाद्वलसंस्थितम्॥ ७॥

‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे। वहाँसे नीचे दृष्टि डालकर जब दोनोंने देखा, तब यहाँके जंगल हरी-हरी घासकी तरह दिखायी देते थे॥ ७॥

उपलैरिव संछन्ना दृश्यते भू: शिलोच्चयै:।

आपगाभिश्च संवीता सूत्रैरिव वसुंधरा॥ ८॥

‘पर्वतोंके कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी, मानो इसपर पत्थर बिछाये गये हों और नदियोंसे ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूतके धागे लपेटे गये हों॥ ८॥

हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहागिरि:।

भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये॥ ९ ॥

तीव्र: स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत् तदावयो:।

समाविशत मोहश्च ततो मूर्च्छा च दारुणा॥ १०॥

‘भूतलपर हिमालय, मेरु और विन्ध्य आदि बड़े-बड़े पर्वत तालाबमें खड़े हुए हाथियोंके समान प्रतीत होते थे। उस समय हम दोनों भाइयोंके शरीरसे बहुत पसीना निकलने लगा। हमें बड़ी थकावट मालूम हुई। फिर तो हमारे ऊपर भय, मोह और भयानक मूर्च्छाने अधिकार जमा लिया॥

न च दिग् ज्ञायते याम्या न चाग्नेयी न वारुणी।

युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना॥ ११॥

‘उस समय न दक्षिण दिशाका ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशाका ही। यद्यपि यह जगत् नियमितरूपसे स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकालमें अग्निसे दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था॥ ११॥

मनश्च मे हतं भूयश्चक्षु: प्राप्य तु संश्रयम्।

यत्नेन महता ह्यस्मिन् मन: संधाय चक्षुषी॥ १२॥

यत्नेन महता भूयो भास्कर: प्रतिलोकित:।

तुल्यपृथ्वीप्रमाणेन भास्कर: प्रतिभाति नौ॥ १३॥

‘मेरा मन नेत्ररूपी आश्रयको पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया—सूर्यके तेजसे उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी। तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुन: मन और नेत्रोंको सूर्यदेवमें लगाया। इस प्रकार विशेष प्रयत्न करनेपर फिर सूर्यदेवका दर्शन हुआ। वे हमें पृथ्वीके बराबर ही जान पड़ते थे॥ १२-१३॥

जटायुर्मामनापृच्छ्य निपपात महीं तत:।

तं दृष्ट्वा तूर्णमाकाशादात्मानं मुक्तवानहम्॥ १४॥

‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वीपर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाशसे नीचेकी ओर छोड़ दिया॥ १४॥

पक्षाभ्यां च मया गुप्तो जटायुर्न प्रदह्यत।

प्रमादात् तत्र निर्दग्ध: पतन् वायुपथादहम्॥ १५॥

आशङ्के तं निपतितं जनस्थाने जटायुषम्।

अहं तु पतितो विन्ध्ये दग्धपक्षो जडीकृत:॥ १६॥

‘मैंने अपने दोनों पंखोंसे जटायुको ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानीके कारण वहाँ जल गया। वायुके पथसे नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थानमें गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वतपर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया॥ १५-१६॥

राज्याच्च हीनो भ्रात्रा च पक्षाभ्यां विक्रमेण च।

सर्वथा मर्तुमेवेच्छन् पतिष्ये शिखराद् गिरे:॥ १७॥

‘राज्यसे भ्रष्ट हुआ, भाईसे बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रमसे भी हाथ धो बैठा। अब मैं सर्वथा मरनेकी ही इच्छासे इस पर्वतशिखरसे नीचे गिरूँगा’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितम: सर्ग:॥ ६१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥

 

द्विषष्टितम: सर्ग:

निशाकर मुनिका सम्पातिको सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजीके कार्यमें सहायता देनेके लिये जीवित रहनेका आदेश देना

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठमरुदं भृशदु:खित:।

अथ ध्यात्वा मुहूर्तं च भगवानिदमब्रवीत्॥ १॥

‘वानरो! उन मुनिश्रेष्ठसे ऐसा कहकर मैं बहुत दु:खी हो विलाप करने लगा। मेरी बात सुनकर थोड़ी देरतक ध्यान करनेके बाद महर्षि भगवान् निशाकर बोले—॥ १॥

पक्षौ च ते प्रपक्षौ च पुनरन्यौ भविष्यत:।

चक्षुषी चैव प्राणाश्च विक्रमश्च बलं च ते॥ २॥

‘सम्पाते! चिन्ता न करो। तुम्हारे छोटे और बड़े दोनों तरहके पंख फिर नये निकल आयेंगे। आँखें भी ठीक हो जायँगी तथा खोयी हुई प्राणशक्ति, बल और पराक्रम—सब लौट आयेंगे॥ २॥

पुराणे सुमहत्कार्यं भविष्यं हि मया श्रुतम्।

दृष्टं मे तपसा चैव श्रुत्वा च विदितं मम॥ ३॥

‘मैंने पुराणमें आगे होनेवाले अनेक बड़े-बड़े कार्योंकी बात सुनी है। सुनकर तपस्याके द्वारा भी मैंने उन सब बातोंको प्रत्यक्ष किया और जाना है॥ ३॥

राजा दशरथो नाम कश्चिदिक्ष्वाकुवर्धन:।

तस्य पुत्रो महातेजा रामो नाम भविष्यति॥ ४॥

‘इक्ष्वाकुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले कोई दशरथ नामसे प्रसिद्ध राजा होंगे। उनके एक महातेजस्वी पुत्र होंगे, जिनकी श्रीरामके नामसे प्रसिद्धि होगी॥ ४॥

अरण्यं च सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन गमिष्यति।

तस्मिन्नर्थे नियुक्त: सन् पित्रा सत्यपराक्रम:॥ ५॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें जायँगे; इसके लिये उन्हें पिताकी ओरसे आज्ञा प्राप्त होगी॥ ५॥

नैऋर्तो रावणो नाम तस्य भार्यां हरिष्यति।

राक्षसेन्द्रो जनस्थाने अवध्य: सुरदानवै:॥ ६॥

‘वनवास-कालमें जनस्थानमें रहते समय उनकी पत्नी सीताको राक्षसोंका राजा रावण नामक असुर हर ले जायगा। वह देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य होगा॥ ६॥

सा च कामै: प्रलोभ्यन्ती भक्ष्यैर्भोज्यैश्च मैथिली।

न भोक्ष्यति महाभागा दु:खमग्ना यशस्विनी॥ ७॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता बड़ी ही यशस्विनी और सौभाग्यवती होगी। यद्यपि राक्षसराजकी ओरसे उसको तरह-तरहके भोगों और भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंका प्रलोभन दिया जायगा, तथापि वह उन्हें स्वीकार नहीं करेगी और निरन्तर अपने पतिके लिये चिन्तित होकर दु:खमें डूबी रहेगी॥ ७॥

परमान्नं च वैदेह्या ज्ञात्वा दास्यति वासव:।

यदन्नममृतप्रख्यं सुराणामपि दुर्लभम्॥ ८॥

‘सीता राक्षसका अन्न नहीं ग्रहण करती—यह मालूम होनेपर देवराज इन्द्र उसके लिये अमृतके समान खीर, जो देवताओंको दुर्लभ है, निवेदन करेंगे॥ ८॥

तदन्नं मैथिली प्राप्य विज्ञायेन्द्रादिदं त्विति।

अग्रमुद्धृत्य रामाय भूतले निर्वपिष्यति॥ ९॥

‘उस अन्नको इन्द्रका दिया हुआ जानकर जानकी उसे स्वीकार कर लेगी और सबसे पहले उसमेंसे अग्रभाग निकालकर श्रीरामचन्द्रजीके उद्देश्यसे पृथ्वीपर रखकर अर्पण करेगी॥ ९॥

यदि जीवति मे भर्ता लक्ष्मणो वापि देवर:।

देवत्वं गच्छतोर्वापि तयोरन्नमिदं त्विति॥ १०॥

‘उस समय वह इस प्रकार कहेगी—‘मेरे पति भगवान् श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण यदि जीवित हों अथवा देवभावको प्राप्त हो गये हों, यह अन्न उनके लिये समर्पित है’॥ १०॥

एष्यन्ति प्रेषितास्तत्र रामदूता: प्लवङ्गमा:।

आख्येया राममहिषी त्वया तेभ्यो विहङ्गम॥ ११॥

‘सम्पाते! रघुनाथजीके भेजे हुए उनके दूत वानर यहाँ सीताका पता लगाते हुए आयेंगे। उन्हें तुम श्रीरामकी महारानी सीताका पता बताना॥ ११॥

सर्वथा तु न गन्तव्यमीदृश: क्व गमिष्यसि।

देशकालौ प्रतीक्षस्व पक्षौ त्वं प्रतिपत्स्यसे॥ १२॥

‘यहाँसे किसी तरह कभी दूसरी जगह न जाना। ऐसी दशामें तुम जाओगे भी कहाँ। देश और कालकी प्रतीक्षा करो। तुम्हें फिर नये पंख प्राप्त हो जायँगे॥ १२॥

उत्सहेयमहं कर्तुमद्यैव त्वां सपक्षकम्।

इहस्थस्त्वं हि लोकानां हितं कार्यं करिष्यसि॥ १३॥

‘यद्यपि मैं आज ही तुम्हें पंखयुक्त कर सकता हूँ; फिर भी इसलिये ऐसा नहीं करता कि यहाँ रहनेपर तुम संसारके लिये हितकर कार्य कर सकोगे॥ १३॥

त्वयापि खलु तत् कार्यं तयोश्च नृपपुत्रयो:।

ब्राह्मणानां गुरूणां च मुनीनां वासवस्य च॥ १४॥

‘तुम भी उन दोनों राजकुमारोंके कार्यमें सहायता करना। वह कार्य केवल उन्हींका नहीं, समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, मुनियों और देवराज इन्द्रका भी है॥ १४॥

इच्छाम्यहमपि द्रष्टुं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।

नेच्छे चिरं धारयितुं प्राणांस्त्यक्ष्ये कलेवरम्।

महर्षिस्त्वब्रवीदेवं दृष्टतत्त्वार्थदर्शन:॥ १५॥

‘यद्यपि मैं भी उन दोनों भाइयोंका दर्शन करना चाहता हूँ; परंतु अधिक कालतक इन प्राणोंको धारण करनेकी इच्छा नहीं है। अत: वह समय आनेसे पहले ही मैं प्राणोंको त्याग दूँगा’ ऐसा उन तत्त्वदर्शी महर्षिने मुझे कहा था’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विषष्टितम: सर्ग:॥ ६२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥

 


त्रिषष्टितम: सर्ग:

सम्पातिका पंखयुक्त होकर वानरोंको उत्साहित करके उड़ जाना और वानरोंका वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करना

एतैरन्यैश्च बहुभिर्वाक्यैर्वाक्यविशारद:।

मां प्रशस्याभ्यनुज्ञाप्य प्रविष्ट: स स्वमालयम्॥ १॥

‘बातचीतकी कलामें चतुर महर्षि निशाकरने ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर मुझे समझाया और श्रीरामकार्यमें सहायक बननेके कारण मेरे सौभाग्यकी सराहना की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रमके भीतर चले गये॥ १॥

कन्दरात् तु विसर्पित्वा पर्वतस्य शनै: शनै:।

अहं विन्ध्यं समारुह्य भवत: प्रतिपालये॥ २॥

‘तदनन्तर कन्दरासे धीरे-धीरे निकलकर मैं विन्ध्य पर्वतके शिखरपर चढ़ आया और तबसे तुम लोगोंके आनेकी बाट देख रहा हूँ॥ २॥

अद्य त्वेतस्य कालस्य वर्षं साग्रशतं गतम्।

देशकालप्रतीक्षोऽस्मि हृदि कृत्वा मुनेर्वच:॥ ३॥

‘मुनिसे बातचीतके बाद आजतक जो समय बीता है, इसमें आठ145 हजारसे अधिक वर्ष निकल गये। मुनिके कथनको हृदयमें धारण करके मैं देश-कालकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ॥ ३॥

महाप्रस्थानमासाद्य स्वर्गते तु निशाकरे।

मां निर्दहति संतापो वितर्कैर्बहुभिर्वृतम्॥ ४॥

‘निशाकर मुनि महाप्रस्थान करके जब स्वर्ग-लोकको चले गये, तभीसे मैं अनेक प्रकारके तर्क-वितर्कोंसे घिर गया। संतापकी आग मुझे रात-दिन जलाती रहती है॥ ४॥

उदितां मरणे बुद्धिं मुनिवाक्यैर्निवर्तये।

बुद्धिर्या तेन मे दत्ता प्राणानां रक्षणे मम॥ ५॥

सा मेऽपनयते दु:खं दीप्तेवाग्निशिखा तम:।

‘मेरे मनमें कई बार प्राण त्यागनेकी इच्छा हुई, किंतु मुनिके वचनोंको याद करके मैं उस संकल्पको टालता आया हूँ। उन्होंने मुझे प्राणोंको रखनेके लिये जो बुद्धि (सम्मति) दी थी, वह मेरे दु:खको उसी प्रकार दूर कर देती है, जैसे जलती हुई अग्निशिखा अन्धकारको॥ ५/

बुध्यता च मया वीर्यं रावणस्य दुरात्मन:॥ ६॥

पुत्र: संतर्जितो वाग्भिर्न त्राता मैथिली कथम्।

‘दुरात्मा रावणमें कितना बल है, इसे मैं जानता हूँ। इसलिये मैंने कठोर वचनोंद्वारा अपने पुत्रको डाँटा था कि तूने मिथिलेशकुमारी सीताकी रक्षा क्यों नहीं की॥ ६/

तस्या विलपितं श्रुत्वा तौ च सीतावियोजितौ॥ ७॥

न मे दशरथस्नेहात् पुत्रेणोत्पादितं प्रियम्।

‘सीताका विलाप सुनकर और उनसे बिछुड़े हुए श्रीराम तथा लक्ष्मणका परिचय पाकर तथा राजा दशरथके प्रति मेरे स्नेहका स्मरण करके भी मेरे पुत्रने जो सीताकी रक्षा नहीं की, अपने इस बर्तावसे उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया—मेरा प्रिय कार्य नहीं होने दिया’॥ ७/

तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य संहतैर्वानरै: सह॥ ८॥

उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम्।

वहाँ एकत्र होकर बैठे हुए वानरोंके साथ सम्पाति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उन वनचारी वानरोंके समक्ष उसी समय उनके दो नये पंख निकल आये॥ ८/

स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदै:॥ ९॥

प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत्।

अपने शरीरको नये निकले हुए लाल रंगके पंखोंसे संयुक्त हुआ देख सम्पातिको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे वानरोंसे इस प्रकार बोले—॥ ९/

निशाकरस्य राजर्षे: प्रसादादमितौजस:॥ १०॥

आदित्यरश्मिनिर्दग्धौ पक्षौ पुनरुपस्थितौ।

‘कपिवरो! अमिततेजस्वी राजर्षि निशाकरके प्रसादसे सूर्य-किरणोंद्वारा दग्ध हुए मेरे दोनों पंख फिर उत्पन्न हो गये॥ १०/

यौवने वर्तमानस्य ममासीद् य: पराक्रम:॥ ११॥

तमेवाद्यावगच्छामि बलं पौरुषमेव च।

‘युवावस्थामें मेरा जैसा पराक्रम और बल था, वैसे ही बल और पुरुषार्थका इस समय मैं अनुभव कर रहा हूँ॥ ११/

सर्वथा क्रियतां यत्न: सीतामधिगमिष्यथ॥ १२॥

पक्षलाभो ममायं व: सिद्धिप्रत्ययकारक:।

‘वानरो! तुम सब प्रकारसे यत्न करो। निश्चय ही तुम्हें सीताका दर्शन प्राप्त होगा। मुझे पंखोंका प्राप्त होना तुमलोगोंकी कार्य-सिद्धिका विश्वास दिलानेवाला है’॥

इत्युक्त्वा तान् हरीन् सर्वान् सम्पाति: पतगोत्तम:॥ १३॥

उत्पपात गिरे: शृङ्गाज्जिज्ञासु: खगमो गतिम्।

उन समस्त वानरोंसे ऐसा कहकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ सम्पाति अपने आकाश-गमनकी शक्तिका परिचय पानेके लिये उस पर्वतशिखरसे उड़ गये॥ १३/

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रतिसंहृष्टमानसा:।

बभूवुर्हरिशार्दूला विक्रमाभ्युदयोन्मुखा:॥ १४॥

उनकी वह बात सुनकर उन श्रेष्ठ वानरोंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे पराक्रमसाध्य अभ्युदयके लिये उद्यत हो गये॥ १४॥

अथ पवनसमानविक्रमा:

प्लवगवरा: प्रतिलब्धपौरुषा:।

अभिजिदभिमुखां दिशं ययु-

र्जनकसुतापरिमार्गणोन्मुखा:॥ १५॥

तदनन्तर वायुके समान पराक्रमी वे श्रेष्ठ वानर अपने भूले हुए पुरुषार्थको फिरसे पा गये और जनकनन्दिनी सीताकी खोजके लिये उत्सुक हो अभिजित् नक्षत्रसे युक्त दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये॥ १५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग:॥ ६३॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

 


चतु:षष्टितम: सर्ग:

समुद्रकी विशालता देखकर विषादमें पड़े हुए वानरोंको आश्वासन दे अङ्गदका उनसे पृथक्-पृथक् समुद्र-लङ्घनके लिये उनकी शक्ति पूछना

आख्याता गृध्रराजेन समुत्प्लुत्य प्लवङ्गमा:।

संगता: प्रीतिसंयुक्ता विनेदु: सिंहविक्रमा:॥ १॥

गृध्रराज सम्पातिके इस प्रकार कहनेपर सिंहके समान पराक्रमी सभी वानर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर मिलकर उछल-उछलकर गर्जने लगे॥ १॥

सम्पातेर्वचनं श्रुत्वा हरयो रावणक्षयम्।

हृष्टा: सागरमाजग्मु: सीतादर्शनकांक्षिण:॥ २॥

सम्पातिकी बातोंसे रावणके निवासस्थान तथा उसके भावी विनाशकी सूचना मिली थी। उन्हें सुनकर हर्षसे भरे हुए वे सभी वानर सीताजीके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये समुद्रके तटपर आये॥ २॥

अभिगम्य तु तं देशं ददृशुर्भीमविक्रमा:।

कृत्स्नं लोकस्य महत: प्रतिबिम्बमवस्थितम्॥ ३॥

उन भयंकर पराक्रमी वानरोंने उस देशमें पहुँचकर समुद्रको देखा, जो इस विराट् विश्वके सम्पूर्ण प्रतिबिम्बकी भाँति स्थित था॥ ३॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य समासाद्योत्तरां दिशम्।

संनिवेशं ततश्चक्रुर्हरिवीरा महाबला:॥ ४॥

दक्षिण समुद्रके उत्तर तटपर जाकर उन महाबली वानर वीरोंने डेरा डाला॥ ४॥

प्रसुप्तमिव चान्यत्र क्रीडन्तमिव चान्यत:।

क्वचित् पर्वतमात्रैश्च जलराशिभिरावृतम्॥ ५॥

वह समुद्र कहीं तो तरङ्गहीन एवं शान्त होनेके कारण सोया हुआ-सा जान पड़ता था। अन्यत्र जहाँ थोड़ी-थोड़ी लहरें उठ रही थीं, वहाँ वह क्रीडा करता-सा प्रतीत होता था और दूसरे स्थलोंमें जहाँ उत्ताल तरङ्गें उठती थीं, वहाँ पर्वतके बराबर जलराशियोंसे आवृत दिखायी देता था॥ ५॥

संकुलं दानवेन्द्रैश्च पातालतलवासिभि:।

रोमहर्षकरं दृष्ट्वा विषेदु: कपिकुञ्जरा:॥ ६॥

वह सारा समुद्र पातालनिवासी दानवराजोंसे व्याप्त था। उस रोमाञ्चकारी महासागरको देखकर वे समस्त श्रेष्ठ वानर बड़े विषादमें पड़ गये॥ ६॥

आकाशमिव दुष्पारं सागरं प्रेक्ष्य वानरा:।

विषेदु: सहिता: सर्वे कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ७॥

आकाशके समान दुर्लङ्‌घ्य समुद्रपर दृष्टिपात करके वे सब वानर ‘अब कैसे करना चाहिये’ ऐसा कहते हुए एक साथ बैठकर चिन्ता करने लगे॥ ७॥

विषण्णां वाहिनीं दृष्ट्वा सागरस्य निरीक्षणात्।

आश्वासयामास हरीन् भयार्तान् हरिसत्तम:॥ ८॥

उस महासागरका दर्शन करके सारी वानर-सेनाको विषादमें डूबी हुई देख कपिश्रेष्ठ अङ्गद उन भयातुर वानरोंको आश्वासन देते हुए बोले—॥ ८॥

न विषादे मन: कार्यं विषादो दोषवत्तर:।

विषादो हन्ति पुरुषं बालं क्रुद्ध इवोरग:॥ ९॥

‘वीरो! तुम्हें अपने मनको विषादमें नहीं डालना चाहिये; क्योंकि विषादमें बहुत बड़ा दोष है। जैसे क्रोधमें भरा हुआ साँप अपने पास आये हुए बालकको काट खाता है, उसी प्रकार विषाद पुरुषका नाश कर डालता है॥ ९॥

यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते।

तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्ध्यति॥ १०॥

‘जो पराक्रमका अवसर आनेपर विषादग्रस्त हो जाता है, उसके तेजका नाश होता है। उस तेजोहीन पुरुषका पुरुषार्थ नहीं सिद्ध होता है’॥ १०॥

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामङ्गदो वानरै: सह।

हरिवृद्धै: समागम्य पुनर्मन्त्रममन्त्रयत्॥ ११॥

उस रात्रिके बीत जानेपर बड़े-बड़े वानरोंके साथ मिलकर अङ्गदने पुन: विचार आरम्भ किया॥ ११॥

सा वानराणां ध्वजिनी परिवार्याङ्गदं बभौ।

वासवं परिवार्येव मरुतां वाहिनी स्थिता॥ १२॥

उस समय अङ्गदको घेरकर बैठी हुई वानरोंकी वह सेना इन्द्रको घेरकर स्थित हुई देवताओंकी विशाल वाहिनीके समान शोभा पाती थी॥ १२॥

कोऽन्यस्तां वानरीं सेनां शक्त: स्तम्भयितुं भवेत्।

अन्यत्र वालितनयादन्यत्र च हनूमत:॥ १३॥

वालिपुत्र अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान्‌जीको छोड़कर दूसरा कौन वीर उस वानरसेनाको सुस्थिर रख सकता था॥ १३॥

ततस्तान् हरिवृद्धांश्च तच्च सैन्यमरिंदम:।

अनुमान्याङ्गद: श्रीमान् वाक्यमर्थवदब्रवीत्॥ १४॥

शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले श्रीमान् अङ्गदने उन बड़े-बूढ़े वानरोंका सम्मान करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही—॥ १४॥

क इदानीं महातेजा लङ्घयिष्यति सागरम्।

क: करिष्यति सुग्रीवं सत्यसंधमरिंदमम्॥ १५॥

‘सज्जनो! तुमलोगोंमें कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्रको लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीवको सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा॥ १५॥

को वीरो योजनशतं लङ्घयेत प्लवङ्गम:।

इमांश्च यूथपान् सर्वान् मोचयेत् को महाभयात्॥ १६॥

‘कौन वीर वानर सौ योजन समुद्रको लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियोंको महान् भयसे मुक्त कर देगा?॥ १६॥

कस्य प्रसादाद् दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च।

इतो निवृत्ता: पश्येम सिद्धार्था: सुखिनो वयम्॥ १७॥

‘किसके प्रसादसे हमलोग सफलमनोरथ एवं सुखी होकर यहाँसे लौटेंगे और घर-द्वार तथा स्त्री-पुत्रोंका मुँह देख सकेंगे॥ १७॥

कस्य प्रसादाद् रामं च लक्ष्मणं च महाबलम्।

अभिगच्छेम संहृष्टा: सुग्रीवं च वनौकसम्॥ १८॥

‘किसके प्रसादसे हमलोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीवके पास चल सकेंगे॥ १८॥

यदि कश्चित् समर्थो व: सागरप्लवने हरि:।

स ददात्विह न: शीघ्रं पुण्यामभयदक्षिणाम्॥ १९॥

‘यदि तुमलोगोंमेंसे कोई वानरवीर समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय दान दे’॥ १९॥

अङ्गदस्य वच: श्रुत्वा न कश्चित् किंचिदब्रवीत्।

स्तिमितेवाभवत् सर्वा सा तत्र हरिवाहिनी॥ २०॥

अङ्गदकी यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला। वह सारी वानर-सेना वहाँ जडवत् स्थिर रही॥ २०॥

पुनरेवाङ्गद: प्राह तान् हरीन् हरिसत्तम:।

सर्वे बलवतां श्रेष्ठा भवन्तो दृढविक्रमा:।

व्यपदेशकुले जाता: पूजिताश्चाप्यभीक्ष्णश:॥ २१॥

तब वानरश्रेष्ठ अङ्गदने पुन: उन सबसे कहा— ‘बलवानोंमें श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हो। तुम्हारा जन्म कलङ्करहित उत्तम कुलमें हुआ है। इसके लिये तुम्हारी बारम्बार प्रशंसा हो चुकी है॥ २१॥

नहि वो गमने भङ्ग: कदाचित् कस्यचिद् भवेत्।

ब्रुवध्वं यस्य या शक्ति: प्लवने प्लवगर्षभा:॥ २२॥

‘श्रेष्ठ वानरो! तुमलोगोंमें कभी किसीकी भी गति कहीं नहीं रुकती। इसलिये समुद्रको लाँघनेमें जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उसे बतावे’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग:॥ ६४॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

 

पञ्चषष्टितम: सर्ग:

बारी-बारीसे वानर-वीरोंके द्वारा अपनी-अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अङ्गदकी बातचीत तथा जाम्बवान्का हनुमान्‌जीको प्रेरित करनेके लिये उनके पास जाना

अथाङ्गदवच: श्रुत्वा ते सर्वे वानरर्षभा:।

स्वं स्वं गतौ समुत्साहमूचुस्तत्र यथाक्रमम्॥ १॥

अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारनेके सम्बन्धमें अपने-अपने उत्साहका—शक्तिका क्रमश: परिचय देने लगे॥ १॥

गजो गवाक्षो गवय: शरभो गन्धमादन:।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव सुषेणो जाम्बवांस्तथा॥ २॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन किया॥ २॥

आबभाषे गजस्तत्र प्लवेयं दशयोजनम्।

गवाक्षो योजनान्याह गमिष्यामीति विंशतिम्॥ ३॥

इनमेंसे गजने कहा—‘मैं दस योजनकी छलाँग मार सकता हूँ।’ गवाक्ष बोले—‘मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा’॥ ३॥

शरभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

त्रिंशतं तु गमिष्यामि योजनानां प्लवङ्गमा:॥ ४॥

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानरने उन कपिवरोंसे कहा—‘वानरो! मैं तीस योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ४॥

ऋषभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

चत्वारिंशद् गमिष्यामि योजनानां न संशय:॥ ५॥

तदनन्तर कपिवर ऋषभने उन वानरोंसे कहा—‘मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’॥

वानरांस्तु महातेजा अब्रवीद् गन्धमादन:।

योजनानां गमिष्यामि पञ्चाशत्तु न संशय:॥ ६॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादनने उन वानरोंसे कहा—‘इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ६॥

मैन्दस्तु वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह।

योजनानां परं षष्टिमहं प्लवितुमुत्सहे॥ ७॥

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरोंसे बोले— ‘मैं साठ योजनतक एक छलाँगमें कूद जानेका उत्साह रखता हूँ’॥ ७॥

ततस्तत्र महातेजा द्विविद: प्रत्यभाषत।

गमिष्यामि न संदेह: सप्ततिं योजनान्यहम्॥ ८॥

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—‘मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’॥ ८॥

सुषेणस्तु महातेजा: सत्त्ववान् कपिसत्तम:।

अशीतिं प्रतिजानेऽहं योजनानां पराक्रमे॥ ९॥

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले—‘मैं एक छलाँगमें असी योजनतक जानेकी प्रतिज्ञा करता हूँ’॥ ९॥

तेषां कथयतां तत्र सर्वांस्ताननुमान्य च।

ततो वृद्धतमस्तेषां जाम्बवान् प्रत्यभाषत॥ १०॥

इस प्रकार कहनेवाले सब वानरोंका सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले—॥ १०॥

पूर्वमस्माकमप्यासीत् कश्चिद् गतिपराक्रम:।

ते वयं वयस: पारमनुप्राप्ता: स्म साम्प्रतम्॥ ११॥

किं तु नैवं गते शक्यमिदं कार्यमुपेक्षितुम्।

यदर्थं कपिराजश्च रामश्च कृतनिश्चयौ॥ १२॥

साम्प्रतं कालमस्माकं या गतिस्तां निबोधत।

नवतिं योजनानां तु गमिष्यामि न संशय:॥ १३॥

‘पहले युवावस्थामें मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारनेकी कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्थाको पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्यके लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती। इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें। मैं एक छलाँगमें नब्बे योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’॥

तांश्च सर्वान् हरिश्रेष्ठाञ्जाम्बवानिदमब्रवीत्।

न खल्वेतावदेवासीद् गमने मे पराक्रम:॥ १४॥

मया वैरोचने यज्ञे प्रभविष्णु: सनातन:।

प्रदक्षिणीकृत: पूर्वं क्रममाणस्त्रिविक्रमम्॥ १५॥

ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंसे पुन: इस प्रकार बोले—‘पूर्वकालमें मेरे अंदर इतनी ही दूरतक चलनेकी शक्ति नहीं थी। पहले राजा बलिके यज्ञमें सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापनेके लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूपकी थोड़े ही समयमें परिक्रमा कर ली थी॥ १४-१५॥

स इदानीमहं वृद्ध: प्लवने मन्दविक्रम:।

यौवने च तदासीन्मे बलमप्रतिमं परम्॥ १६॥

‘इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अत: छलाँग मारनेकी मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्थामें मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है॥ १६॥

सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वत:।

नैतावता च संसिद्धि: कार्यस्यास्य भविष्यति॥ १७॥

‘आजकल तो मुझमें स्वत: चलनेकी इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गतिसे समुद्रलङ्घनरूप इस वर्तमान कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती’॥ १७॥

अथोत्तरमुदारार्थमब्रवीदङ्गदस्तदा ।

अनुमान्य तदा प्राज्ञो जाम्बवन्तं महाकपि:॥ १८॥

तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गदने उस समय जाम्बवान्का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही—॥ १८॥

अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत्।

निवर्तने तु मे शक्ति: स्यान्न वेति न निश्चितम्॥ १९॥

‘मैं इस महासागरके सौ योजनकी विशाल दूरीको लाँघ जाऊँगा, किंतु उधरसे लौटनेमें मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता’॥ १९॥

तमुवाच हरिश्रेष्ठं जाम्बवान् वाक्यकोविद:।

ज्ञायते गमने शक्तिस्तव हर्यृक्षसत्तम॥ २०॥

तब बातचीतकी कलामें चतुर जाम्बवान्ने कपिश्रेष्ठ अङ्गदसे कहा—‘रीछों और वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज! तुम्हारी गमनशक्तिसे हमलोग भलीभाँति परिचित हैं॥ २०॥

कामं शतसहस्रं वा नह्येष विधिरुच्यते।

योजनानां भवान् शक्तो गन्तुं प्रतिनिवर्तितुम्॥ २१॥

‘भले ही, तुम एक लाख योजनतक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अत: तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम लाखों योजन जाने और वहाँसे लौटनेमें समर्थ हो॥ २१॥

नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्य: कथंचन।

भवतायं जन: सर्व: प्रेष्य: प्लवगसत्तम॥ २२॥

‘किंतु तात! वानरशिरोमणे! जो सबको भेजनेवाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य (आज्ञापालक) नहीं हो सकता। ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमेंसे किसीको भेजो॥ २२॥

भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थित:।

स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप॥ २३॥

‘तुम कलत्र (स्त्रीकी भाँति रक्षणीय) हो, (जैसे नारी पतिके हृदयकी स्वामिनी होती है, उसी प्रकार) तुम हमारे स्वामीके पदपर प्रतिष्ठित हो। परंतप! स्वामी सेनाके लिये कलत्र (स्त्री) के समान संरक्षणीय होता है। यही लोककी मान्यता है॥ २३॥

अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम।

तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्य: सदा भवान्॥ २४॥

‘शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्यके मूल हो, अत: सदा कलत्रकी भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है॥ २४॥

मूलमर्थस्य संरक्ष्यमेष कार्यविदां नय:।

मूले हि सति सिध्यन्ति गुणा: सर्वे फलोदया:॥ २५॥

‘कार्यके मूलकी रक्षा करनी चाहिये। यही कार्यके तत्त्वको जाननेवाले विद्वानोंकी नीति है; क्योंकि मूलके रहनेपर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं॥ २५॥

तद् भवानस्य कार्यस्य साधनं सत्यविक्रम।

वुद्धिविक्रमसम्पन्नो हेतुरत्र परंतप॥ २६॥

‘अत: सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्यके साधन तथा बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न हेतु हो॥ २६॥

गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि न: कपिसत्तम।

भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने॥ २७॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो। तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं’॥ २७॥

उक्तवाक्यं महाप्राज्ञं जाम्बवन्तं महाकपि:।

प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं वालिसूनुरथाङ्गद:॥ २८॥

जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गदने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २८॥

यदि नाहं गमिष्यामि नान्यो वानरपुङ्गव:।

पुन: खल्विदमस्माभि: कार्यं प्रायोपवेशनम्॥ २९॥

‘यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जानेको तैयार न होगा, तब फिर हमलोगोंको निश्चितरूपसे मरणान्त उपवास ही करना चाहिये॥ २९॥

नह्यकृत्वा हरिपते: संदेशं तस्य धीमत:।

तत्रापि गत्वा प्राणानां न पश्ये परिरक्षणम्॥ ३०॥

‘बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवके आदेशका पालन किये बिना यदि हमलोग किष्किन्धाको लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणोंकी रक्षाका कोई उपाय नहीं दिखायी देता॥ ३०॥

स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वर:।

अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत्॥ ३१॥

‘वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देनेमें भी समर्थ हैं। उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जानेपर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है॥ ३१॥

तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य न भवत्यन्यथा गति:।

तद् भवानेव दृष्टार्थ: संचिन्तयितुमर्हति॥ ३२॥

‘अत: जिस उपायसे इस सीता दर्शनरूपी कार्यकी सिद्धिमें कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातोंका अनुभव है’॥ ३२॥

सोऽङ्गदेन तदा वीर: प्रत्युक्त: प्लवगर्षभ:।

जाम्बवानुत्तमं वाक्यं प्रोवाचेदं ततोऽङ्गदम्॥ ३३॥

उस समय अङ्गदके ऐसा कहनेपर वीर वानर-शिरोमणि जाम्बवान्ने उनसे यह उत्तम बात कही—॥ ३३॥

तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते।

एष संचोदयाम्येनं य: कार्यं साधयिष्यति॥ ३४॥

‘वीर! तुम्हारे इस कार्यमें कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी। अब मैं ऐसे वीरको प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा’॥ ३४॥

तत: प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठ-

मेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम्।

संचोदयामास हरिप्रवीरो

हरिप्रवीरं हनुमन्तमेव॥ ३५॥

ऐसा कहकर वानरों और भालुओंके वीर यूथपति जाम्बवान्ने वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर हनुमान्‌जीको ही प्रेरित किया, जो एकान्तमें जाकर मौजसे बैठे हुए थे। उन्हें किसी बातकी चिन्ता नहीं थी और वे दूरतककी छलाँग मारनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ थे॥ ३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितम: सर्ग:॥ ६५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥

 


षट्षष्टितम: सर्ग:

जाम्बवान्का हनुमान्‌जीको उनकी उत्पत्तिकथा सुनाकर समुद्रलङ्घनके लिये उत्साहित करना

अनेकशतसाहस्रीं विषण्णां हरिवाहिनीम्।

जाम्बवान् समुदीक्ष्यैवं हनूमन्तमथाब्रवीत्॥ १॥

लाखों वानरोंकी सेनाको इस तरह विषादमें पड़ी देख जाम्बवान्ने हनुमान्‌जीसे कहा—॥ १॥

वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविदां वर।

तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनूमन् किं न जल्पसि॥ २॥

‘वानरजगत्के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हनुमान्! तुम एकान्तमें आकर चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?॥ २॥

हनूमन्हरिराजस्य सुग्रीवस्य समो ह्यसि।

रामलक्ष्मणयोश्चापि तेजसा च बलेन च॥ ३॥

‘हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीवके समान पराक्रमी हो तथा तेज और बलमें श्रीराम और लक्ष्मणके तुल्य हो॥ ३॥

अरिष्टनेमिन: पुत्रो वैनतेयो महाबल:।

गरुत्मानिव विख्यात उत्तम: सर्वपक्षिणाम्॥ ४॥

‘कश्यपजीके महाबली पुत्र और समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो॥ ४॥

बहुशो हि मया दृष्ट: सागरे स महाबल:।

भुजङ्गानुद्धरन् पक्षी महाबाहुर्महाबल:॥ ५॥

‘महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़को मैंने समुद्रमें कई बार देखा है, जो बड़े-बड़े सर्पोंको वहाँसे निकाल लाते हैं॥ ५॥

पक्षयोर्यद् बलं तस्य भुजवीर्यबलं तव।

विक्रमश्चापि वेगश्च न ते तेनापहीयते॥ ६॥

‘उनके दोनों पंखोंमें जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओंमें भी है। इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है॥ ६॥

बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव।

विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न सज्जसे॥ ७॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियोंमें सबसे बढ़कर है। फिर तुम अपने-आपको ही समुद्र लाँघनेके लिये क्यों नहीं तैयार करते?॥ ७॥

अप्सराऽप्सरसां श्रेष्ठा विख्याता पुञ्जिकस्थला।

अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरे:॥ ८॥

विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि।

अभिशापादभूत् तात कपित्वे कामरूपिणी॥ ९॥

दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मन:।

‘(वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है—) पुञ्जिकस्थला नामसे विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओंमें अग्रगण्य है। तात! एक समय शापवश वह कपियोनिमें अवतीर्ण हुई। उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जरकी पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी। इस भूतलपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकोंमें विख्यात थी। उसका नाम अञ्जना था। वह वानरराज केसरीकी पत्नी हुई॥ ८-९॥

मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी॥ १०॥

विचित्रमाल्याभरणा कदाचित् क्षौमधारिणी।

अचरत् पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे॥ ११॥

‘एक दिनकी बात है, रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली अञ्जना मानवी स्त्रीका शरीर धारण करके वर्षाकालके मेघकी भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वत-शिखरपर विचर रही थी। उसके अङ्गोंपर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी। वह फूलोंके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थी॥ १०-११॥

तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्या: पीतं रक्तदशं शुभम्।

स्थिताया: पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपाहरच्छनै:॥ १२॥

‘उस विशाललोचना बालाका सुन्दर वस्त्र तो पीले रंगका था, किंतु उसके किनारेका रंग लाल था। वह पर्वतके शिखरपर खड़ी थी। उसी समय वायुदेवताने उसके उस वस्त्रको धीरेसे हर लिया॥ १२॥

स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ।

स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम्॥ १३॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोल-गोल जाँघों, एक-दूसरेसे लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुखको भी देखा॥ १३॥

तां बलादायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम्।

दृष्ट्वैव शुभसर्वाङ्गीं पवन: काममोहित:॥ १४॥

‘उसके नितम्ब ऊँचे और विस्तृत थे। कटिभाग बहुत ही पतला था। उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे। इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जनाके अङ्गोंका अवलोकन करके पवन देवता कामसे मोहित हो गये॥

स तां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुत:।

मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम्॥ १५॥

‘उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें कामभावका आवेश हो गया। मन अञ्जनामें ही लग गया। उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरीको अपनी दोनों विशाल भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया॥ १५॥

सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत्।

एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति॥ १६॥

‘अञ्जना उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सती नारी थी। अत: उस अवस्थामें पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली—‘कौन मेरे इस पातिव्रत्यका नाश करना चाहता है’?॥ १६॥

अञ्जनाया वच: श्रुत्वा मारुत: प्रत्यभाषत।

न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम्॥ १७॥

अञ्जनाकी बात सुनकर पवनदेवने उत्तर दिया—‘सुश्रोणि! मैं तुम्हारे एकपत्नी-व्रतका नाश नहीं कर रहा हूँ। अत: तुम्हारे मनसे यह भय दूर हो जाना चाहिये॥ १७॥

मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि।

वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति॥ १८॥

‘यशस्विनि! मैंने अव्यक्तरूपसे तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्पके द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है। इससे तुम्हें बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा॥ १८॥

महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रम:।

लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया सम:॥ १९॥

‘वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारनेमें मेरे समान होगा’॥ १९॥

एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे।

गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभ॥ २०॥

‘महाकपे! वायुदेवके ऐसा कहनेपर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं। महाबाहो! वानरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफामें जन्म दिया॥ २०॥

अभ्युत्थितं तत: सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने।

फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम्॥ २१॥

‘बाल्यावस्थामें एक विशाल वनके भीतर एक दिन उदित हुए सूर्यको देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अत: उसे लेनेके लिये तुम सहसा आकाशमें उछल पड़े॥ २१॥

शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे।

तेजसा तस्य निर्धूतो न विषादं गतस्तत:॥ २२॥

‘महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जानेके बाद सूर्यके तेजसे आक्रान्त होनेपर भी तुम्हारे मनमें खेद या चिन्ता नहीं हुई॥ २२॥

त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे।

क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा॥ २३॥

‘कपिप्रवर! अन्तरिक्षमें जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्यके पास पहुँच गये, तब इन्द्रने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेजसे प्रकाशित वज्रका प्रहार किया॥ २३॥

तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत।

ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम्॥ २४॥

‘उस समय उदयगिरिके शिखरपर तुम्हारे हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग वज्रकी चोटसे खण्डित हो गया। तभीसे तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया॥ २४॥

ततस्त्वां निहतं दृष्ट्वा वायुर्गन्धवह: स्वयम्।

त्रैलोक्यं भृशसंक्रुद्धो न ववौ वै प्रभञ्जन:॥ २५॥

‘तुमपर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवताको बड़ा क्रोध हुआ। उन प्रभञ्जनदेवने तीनों लोकोंमें प्रवाहित होना छोड़ दिया॥ २५॥

सम्भ्रान्ताश्च सुरा: सर्वे त्रैलोक्ये क्षुभिते सति।

प्रसादयन्ति संक्रुद्धं मारुतं भुवनेश्वरा:॥ २६॥

‘इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायुके अवरुद्ध हो जानेसे तीनों लोकोंमें खलबली मच गयी थी। उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेवको मनाने लगे॥ २६॥

प्रसादिते च पवने ब्रह्मा तुभ्यं वरं ददौ।

अशस्त्रवध्यतां तात समरे सत्यविक्रम॥ २७॥

‘सत्यपराक्रमी तात! पवनदेवके प्रसन्न होनेपर ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गणमें किसी भी अस्त्र-शस्त्रके द्वारा मारे नहीं जा सकोगे॥ २७॥

वज्रस्य च निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च।

सहस्रनेत्र: प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम्॥ २८॥

स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो।

‘प्रभो! वज्रके प्रहारसे भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया—‘मृत्यु तुम्हारी इच्छाके अधीन होगी—तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं’॥ २८/

स त्वं केसरिण: पुत्र: क्षेत्रजो भीमविक्रम:॥ २९॥

मारुतस्यौरस: पुत्रस्तेजसा चापि तत्सम:।

‘इस प्रकार तुम केसरीके क्षेत्रज पुत्र हो। तुम्हारा पराक्रम शत्रुओंके लिये भयंकर है। तुम वायुदेवके औरस पुत्र हो, इसलिये तेजकी दृष्टिसे भी उन्हींके समान हो॥ २९/

त्वं हि वायुसुतो वत्स प्लवने चापि तत्सम:॥ ३०॥

वयमद्य गतप्राणा भवानस्मासु साम्प्रतम्।

दाक्ष्यविक्रमसम्पन्न: कपिराज इवापर:॥ ३१॥

‘वत्स! तुम पवनके पुत्र हो, अत: छलाँग मारनेमें भी उन्हींके तुल्य हो। हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी। इस समय तुम्हीं हमलोगोंमें दूसरे वानरराजकी भाँति चातुर्य एवं पौरुषसे सम्पन्न हो॥ ३०-३१॥

त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना।

त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम्॥ ३२॥

‘तात! भगवान् वामनने त्रिलोकीको नापनेके लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी॥ ३२॥

तथा चौषधयोऽस्माभि: संचिता देवशासनात्।

निर्मथ्यममृतं याभिस्तदानीं नो महद्बलम्॥ ३३॥

‘समुद्र-मन्थनके समय देवताओंकी आज्ञासे हमने उन ओषधियोंका संचय किया था, जिनके द्वारा अमृतको मथकर निकालना था। उन दिनों हममें महान् बल था॥ ३३॥

स इदानीमहं वृद्ध: परिहीनपराक्रम:।

साम्प्रतं कालमस्माकं भवान् सर्वगुणान्वित:॥ ३४॥

‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा पराक्रम घट गया है। इस समय हमलोगोंमें तुम्हीं सब प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न हो॥ ३४॥

तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि।

त्वद्वीर्यं द्रष्टुकामा हि सर्वा वानरवाहिनी॥ ३५॥

‘अत: पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बलका विस्तार करो। छलाँग मारनेवालोंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो। यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल-पराक्रमको देखना चाहती है॥ ३५॥

उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम्।

परा हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्तव॥ ३६॥

‘वानरश्रेष्ठ हनुमान्! उठो और इस महासागरको लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियोंसे बढ़कर है॥ ३६॥

विषण्णा हरय: सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे।

विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव॥ ३७॥

‘हनुमन्! समस्त वानर चिन्तामें पड़े हैं। तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णुने त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ’॥ ३७॥

तत: कपीनामृषभेण चोदित:

प्रतीतवेग: पवनात्मज: कपि:।

प्रहर्षयंस्तां हरिवीरवाहिनीं

चकार रूपं महदात्मनस्तदा॥ ३८॥

इस प्रकार वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान्को अपने महान् वेगपर विश्वास हो आया। उन्होंने वानर वीरोंकी उस सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट्रूप प्रकट किया॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितम: सर्ग:॥ ६६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥

 


सप्तषष्टितम: सर्ग:

हनुमान्‌जीका समुद्र लाँघनेके लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान्के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारनेके लिये हनुमान्‌जीका महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना

तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम्।

वेगेनापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम्॥ १॥

सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विता:।

विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम्॥ २॥

सौ योजनके समुद्रको लाँघनेके लिये वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जीको सहसा बढ़ते और वेगसे परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्षसे भर गये और महाबली हनुमान्‌जीकी स्तुति करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ १-२॥

प्रहृष्टा विस्मिताश्चापि ते वीक्षन्ते समन्तत:।

त्रिविक्रमं कृतोत्साहं नारायणमिव प्रजा:॥ ३॥

वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजीको समस्त प्रजाने देखा था॥ ३॥

संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महाबल:।

समाविद्ध्य च लाङ्गूलं हर्षाद् बलमुपेयिवान्॥ ४॥

अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान् ने शरीरको और भी बढ़ाना आरम्भ किया। साथ ही हर्षके साथ अपनी पूँछको बारम्बार घुमाकर अपने महान् बलका स्मरण किया॥ ४॥

तस्य संस्तूयमानस्य वृद्धैर्वानरपुङ्गवै:।

तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम्॥ ५॥

बड़े-बूढ़े वानरशिरोमणियोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते और तेजसे परिपूर्ण होते हुए हनुमान्‌जीका रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था॥ ५॥

यथा विजृम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे।

मारुतस्यौरस: पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते॥ ६॥

जैसे पर्वतकी विस्तृत कन्दरामें सिंह अँगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवताके औरस पुत्रने उस समय अपने शरीरको अँगड़ाई ले-लेकर बढ़ाया॥ ६॥

अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमत:।

अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावक:॥ ७॥

जँभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान्‌जीका दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहा था॥ ७॥

हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुह:।

अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत्॥ ८॥

वे वानरोंके बीचसे उठकर खड़े हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उस अवस्थामें हनुमान् जी ने बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ ८॥

आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिल:।

बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचर:॥ ९॥

‘आकाशमें विचरनेवाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं। उनकी शक्तिकी कोई सीमा नहीं है। वे अग्निदेवके सखा हैं और अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वत-शिखरोंको भी तोड़ डालते हैं॥ ९॥

तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मन:।

मारुतस्यौरस: पुत्र: प्लवनेनास्मि तत्सम:॥ १०॥

‘अत्यन्त शीघ्र वेगसे चलनेवाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायुका मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारनेमें उन्हींके समान हूँ॥ १०॥

उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम्।

मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रश:॥ ११॥

‘कई सहस्र योजनोंतक फैले हुए मेरुगिरिकी, जो आकाशके बहुत बड़े भागको ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ ११॥

बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे।

समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीहृदम्॥ १२॥

‘अपनी भुजाओंके वेगसे समुद्रको विक्षुब्ध करके उसके जलसे मैं पर्वत, नदी और जलाशयोंसहित सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर सकता हूँ॥ १२॥

ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थित:।

समुत्थितमहाग्राह: समुद्रो वरुणालय:॥ १३॥

‘वरुणका निवासस्थान यह महासागर मेरी जाँघों और पिंडलियोंके वेगसे विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहनेवाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे॥ १३॥

पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम्।

वैनतेयमहं शक्त: परिगन्तुं सहस्रश:॥ १४॥

‘समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाशमें उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ॥ १४॥

उदयात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्।

अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे॥ १५॥

ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे।

प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभा:॥ १६॥

‘श्रेष्ठ वानरो! उदयाचलसे चलकर अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेवको मैं अस्त होनेसे पहले ही छू सकता हूँ और वहाँसे पृथ्वीतक आकर यहाँ पैर रखे बिना ही पुन: उनके पासतक बड़े भयंकर वेगसे जा सकता हूँ॥ १५-१६॥

उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान्।

सागरान् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्॥ १७॥

पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमान: प्लवङ्गम:।

हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम्॥ १८॥

‘आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदिको लाँघकर आगे बढ़ जानेका उत्साह रखता हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रोंको सोख लूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और कूद कूदकर पर्वतोंको चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूरतककी छलाँगें मारनेवाला वानर हूँ। महान् वेगसे महासागरको फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा॥

लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वश:।

अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा॥ १९॥

‘आज आकाशमें वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षोंके नाना प्रकारके फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे॥ १९॥

भविष्यति हि मे पन्था: स्वाते: पन्था इवाम्बरे।

चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च॥ २०॥

द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानरा:।

‘बहुत-से फूल बिखरे होनेके कारण मेरा मार्ग आकाशमें अनेक नक्षत्रपुञ्जोंसे सुशोभित स्वातिमार्ग (छायापथ) के समान प्रतीत होगा। वानरो! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाशमें सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे॥ २०/

महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमा:॥ २१॥

दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम्।

विधमिष्यामि जीमूतान् कम्पयिष्यामि पर्वतान्।

सागरं शोषयिष्यामि प्लवमान: समाहित:॥ २२॥

‘कपिवरो! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरुके समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्गको ढकता और आकाशको निगलता हुआ-सा आगे बढ़ूँगा, बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालूँगा, पर्वतोंको हिला दूँगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़नेपर समुद्रको भी सुखा दूँगा॥ २१-२२॥

वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा।

ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम्।

न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत्॥ २३॥

‘विनतानन्दन गरुडमें, मुझमें अथवा वायुदेवतामें ही समुद्रको लाँघ जानेकी शक्ति है। पक्षिराज गरुड अथवा महाबली वायुदेवताके सिवा और किसी प्राणीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो यहाँसे छलाँग मारनेपर मेरे साथ जा सके॥ २३॥

निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम्।

सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता॥ २४॥

‘मेघसे उत्पन्न हुई विद्युत्की भाँति मैं पलक मारते-मारते सहसा निराधार आकाशमें उड़ जाऊँगा॥ २४॥

भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम्।

विष्णो: प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव॥ २५॥

‘समुद्रको लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगोंको बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुका हुआ था॥ २५॥

बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा।

अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमा:॥ २६॥

‘वानरो! मैं बुद्धिसे जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मनकी चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारीका दर्शन करूँगा, अत: अब तुमलोग खुशियाँ मनाओ॥ २६॥

मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे।

अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मति:॥ २७॥

‘मैं वेगमें वायुदेवता तथा गरुडके समान हूँ। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजनतक जा सकता हूँ॥ २७॥

वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुव:।

विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये॥ २८॥

लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मति:।

‘वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजीके हाथसे भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ। समूची लङ्काको भी भूमिसे उखाड़कर हाथपर उठाये चल सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है’॥ २८/

तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम्॥ २९॥

प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिता:।

अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्षमें भरकर चकितभावसे उनकी ओर देख रहे थे॥ २९/

तच्चास्य वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम्॥ ३०॥

उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान् प्लवगेश्वर:।

हनुमान्‌जीकी बातें भाई-बन्धुओंके शोकको नष्ट करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर वानर-सेनापति जाम्बवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—॥ ३०/

वीर केसरिण: पुत्र वेगवन् मारुतात्मज॥ ३१॥

ज्ञातीनां विपुल: शोकस्त्वया तात प्रणाशित:।

‘वीर! केसरीके सुपुत्र! वेगशाली पवनकुमार! तात! तुमने अपने बन्धुओंका महान् शोक नष्ट कर दिया॥ ३१/

तव कल्याणरुचय: कपिमुख्या: समागता:॥ ३२॥

मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिता:।

‘यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं। अब ये कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्य—स्वस्तिवाचन आदिका अनुष्ठान करेंगे॥ ३२/

ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च॥ ३३॥

गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम्।

‘ऋषियोंके प्रसाद, वृद्ध वानरोंकी अनुमति तथा गुरुजनोंकी कृपासे तुम इस महासागरके पार हो जाओ॥ ३३/

स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव॥ ३४॥

त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम्।

‘जबतक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तबतक हम तुम्हारी प्रतीक्षामें एक पैरसे खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरोंका जीवन तुम्हारे ही अधीन है’॥ ३४/

ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकस:॥ ३५॥

कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति।

तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने उन वनवासी वानरोंसे कहा—‘जब मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा, उस समय संसारमें कोई भी मेरे वेगको धारण नहीं कर सकेगा॥ ३५/

एतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिन:॥ ३६॥

शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च।

येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम्॥ ३७॥

नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु।

‘शिलाओंके समूहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्र पर्वतके ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओंके समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्र-शिखरोंपर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा॥ ३६-३७/

एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च॥ ३८॥

प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामित: शतम्।

‘यहाँसे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर सकेंगे’॥ ३८/

ततस्तु मारुतप्रख्य: स हरिर्मारुतात्मज:।

आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दन:॥ ३९॥

यों कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमान्‌जी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये॥ ३९॥

वृतं नानाविधै: पुष्पैर्मृगसेवितशाद्वलम्।

लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम्॥ ४०॥

वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँकी हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते थे॥ ४०॥

सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम्।

मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम्॥ ४१॥

महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था॥ ४१॥

महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबल:।

विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रम:॥ ४२॥

बड़े-बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे॥ ४२॥

पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना।

ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विप:॥ ४३॥

महाकाय हनुमान्‌जीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी भाँति चीत्कार-सा करने लगा (वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था)॥ ४३॥

मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोच्चय:।

वित्रस्तमृगमातङ्ग: प्रकम्पितमहाद्रुम:॥ ४४॥

उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये। उससे नये-नये झरने फूट निकले। वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे॥ ४४॥

नानागन्धर्वमिथुनै: पानसंसर्गकर्कशै:।

उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि॥ ४५॥

त्यज्यमानमहासानु: संनिलीनमहोरग:।

शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरि:॥ ४६॥

मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वोंके जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प बिलोंमें छिप गये तथा उस पर्वतके शिखरोंसे बड़ी-बड़ी शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं। इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्थामें पड़ गया॥ ४५-४६॥

नि:श्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनि:सृतै:।

सपताक इवाभाति स तदा धरणीधर:॥ ४७॥

बिलोंसे अपने आधे शरीरको बाहर निकालकर लम्बी साँस खींचते हुए सर्पोंसे उपलक्षित होनेवाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओंसे अलंकृत-सा प्रतीत होता था॥ ४७॥

ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमान: शिलोच्चय:।

सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वग:॥ ४८॥

भयसे घबराये हुए ऋषि-मुनि भी उस पर्वतको छोड़ने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वनमें अपने साथियोंसे बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्तिमें फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी॥ ४८॥

स वेगवान् वेगसमाहितात्मा

हरिप्रवीर: परवीरहन्ता।

मन: समाधाय महानुभावो

जगाम लङ्कां मनसा मनस्वी॥ ४९॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान्‌जीका मन वेगपूर्वक छलाँग मारनेकी योजनामें लगा हुआ था। उन्होंने चित्तको एकाग्र करके मन-ही-मन लङ्काका स्मरण किया॥ ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितम: सर्ग:॥ ६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें
सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥

॥ किष्किन्धाकाण्डं सम्पूर्णम्॥

 

 

 

 

 

 

 

 


Notes

[←1]

      (क) पठ रामायणं व्यास काव्यबीजं      सनातनम्। यत्र रामचरित्रं स्यात् तदहं तत्र शक्तिमान्॥

(बृहद्धर्मपुराण, प्रथमखण्ड ३०। ४७, ५१)

      (ख) रामायणं पाठितं मे प्रसन्नोऽस्मि      कृतस्त्वया। करिष्यामि पुराणानि महाभारतमेव च॥

(बृहद्धर्मपुराण १। ३०। ५५)


[←2]

A curious Ms. is that of ‘Ramayanatatparyadipika’ which is said to have been an exposition of the meaning of the Ramayana’ by Vyasa at the request of Yudhisthira.

(‘Studies in Ramayana’, ‘Riddles of Ramayana’ By K. S. Ramasastri, Book II, P.I.)


[←3]

यह श्लोक इस प्रकार है—

अपि चायं पुरा गीत: श्लोको वाल्मीकिना      भुवि।      न हन्तव्या: स्त्रियश्चेति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम।..........

पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव      तत्॥        (महा० उद्योग० १४३। ६७-६८)

भट्टिकाव्यका १७। २२ श्लोक भी इसीपर आधारित है।


[←4]

‘वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तम:।’


[←5]

आदिकवि वाल्मीकि उस समय कुश, समिधा आदि लेने निकले थे। व्याधके द्वारा मारे गये क्रौञ्चको देखकर उन्हें बड़ा शोक हुआ और वही श्लोकरूपमें परिणत हो गया। ‘ध्वन्यालोक’ कार श्रीआनन्दवर्धनने भी इसीसे मिलते-जुलते शब्दोंमें कहा है—

क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थ: शोक: श्लोकत्वमागत:।’ (ध्वन्यालोक १। ५)

वस्तुत: इन दोनों ही पद्योंका मूल स्वयं आदिकवि (वाल्मी० १। २। ४०) का ही श्लोक है, जो इस प्रकार है—

‘सोऽनुव्याहरणाद् भूय: शोक: श्लोकत्वमागत:।’


[←6]

देखिये—‘दारुणा: सोममभ्येत्य ग्रहा: सर्वे       व्यवस्थिता:।’ (अयोध्या० ४१। ११) पर तिलक तथा शिरोमणि-व्याख्या।


[←7]

‘अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहै:।       आवेदयन्ति दैवज्ञा: सूर्याङ्गारकराहुभि:॥’


[←8]

यहाँ ‘सर्वभूतेभ्य:’ में प्राय: सभी प्राचीन टीकाकारोंने चतुर्थी और पञ्चमी दोनों मानकर इस पदका दो बार अर्थ किया है।


[←9]

इसकी उत्पत्तिकी एक दूसरी रोचक कथा ‘कल्याण’ वर्ष ३४ अंक १२ के पृष्ठ १३८९ पर देखें।


[←10]

स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड १। २४ में इनका आश्रम विदिशा (आजका मेलसा मध्यभारत) तथा भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व ४। १०। ५४ में उत्पलारण्य-उत्पलावर्त (बिठूर, कानपुर) में माना है।


[←11]

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति॥      यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महीतले॥

तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥       (बाल० २। ३५-३६-३७)

 


[←12]

वाल्मीकीय रामायणके पठन-श्रवण एवं अनुष्ठानसे क्या लाभ है, इसे आगेके रामायणमाहात्म्य, युद्धकाण्डके १२८ वें सर्गके १०४ से १२२ श्लोकोंतक तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्डके २५ से ३० अध्यायोंतक देखना चाहिये।

 


[←13]

चैत्रे माघे कार्तिके च सिते पक्षे च      वाचयेत्।      नवाहं सुमहापुण्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नत:॥

पञ्चम्या दिनमारभ्य      रामायणकथामृतम्।      नवाहश्रवणेनैव सर्वपापै: प्रमुच्यते॥

(रामसेवाग्रन्थ)


[←14]

श्रोतृभ्यश्च तथा वक्तुर्व्यासाद् ग्रन्थस्य      चोच्चता।       (रामसेवाग्रन्थ)


[←15]

हृदयादि न्यासकी विधि यह है कि ‘अङ्गुष्ठाभ्यां नम:’ के स्थानपर ‘हृदयाय नम:’ कहकर पाँचों अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श किया जाय। ‘तर्जनीभ्यां नम:’ के स्थानपर ‘शिरसे स्वाहा’ कहकर सिरका अग्रभाग छुआ जाय। ‘मध्यमाभ्यां नम:’ के स्थानपर ‘शिखायै वौषट्’ कहकर शिखाका स्पर्श किया जाय। ‘अनामिकाभ्यां नम:’ के बदले ‘कवचाय हुम्’ कहकर दाहिने हाथसे बायें कंधे तथा बायें हाथसे दाहिने कंधेका स्पर्श करे। ‘कनिष्ठिकाभ्यां नम:’ के बदले ‘नेत्रत्रयाय वौषट्’ कहकर नेत्रोंका स्पर्श करे तथा ‘करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:’ के बदले ‘अस्त्राय फट्’ कहकर तीन बार ताली बजाये।


[←16]

‘बृहद्धर्मपुराणके अनुसार रामायणके पारायणके पहले रामायणकवचका भी पाठ कर लेना चाहिये। वह मङ्गलाचरणके पहले होना चाहिये। कम-से-कम प्रथम दिन इसका पाठ तो कर ही लेना चाहिये। कवच इस प्रकार है—

ॐ नमोऽष्टादशतत्त्वरूपाय रामायणाय महामन्त्रस्वरूपाय। मा निषादेति मूलं शिरोऽवतु। अनुक्रमणिकाबीजं मुखमवतु। ऋष्यशृङ्गोपाख्यानमृषिर्जिह्वामवतु। जानकीलाभोऽनुष्टुप्च्छन्दोऽवतु गलम्। केकय्याज्ञा देवता हृदयमवतु। सीतालक्ष्मणानुगमनश्रीरामहर्षा: प्रमाणं जठरमवतु। भगवद्भक्ति: शक्तिरवतु मे मध्यमम्। शक्तिमान् धर्मो मुनीनां पालनं ममोरू रक्षतु। मारीचवचनं प्रतिपालनमवतु पादौ। सुग्रीवमैत्रमर्थोऽवतु स्तनौ। निर्णयो हनुमच्चेष्टावतु बाहू। कर्ता सम्पातिपक्षोद्गमोऽवतु स्कन्धौ। प्रयोजनं विभीषणराज्यं ग्रीवां ममावतु। रावणवध: स्वरूपमवतु कर्णौ। सीतोद्धारो लक्षणमवतु नासिके। अमोघस्तव संस्तवोऽवतु जीवात्मानम्। नय: काललक्ष्मणसंवादोऽवतु नाभिम्। आचरणीयं श्रीरामादिधर्मं सर्वाङ्गं ममावतु। इति रामायणकवचम्।

(बृहद्धर्मपुराणम्, पूर्वखण्डम् २५ वाँ अध्याय)

 


[←17]

      प्रथमे तु अयोध्याया: षट्सर्गान्ते शुभा      स्थिति:      । तस्यैवाशीतिसर्गान्ते द्वितीये दिवसे स्थिति:॥

      तथा विंशतिसर्गान्ते चारण्यस्य      तृतीयके      । दिने चतुर्थे षट्चत्वारिंशत्सर्गे कथास्थिति:॥

      किष्किन्धाख्यस्य काण्डस्य       पाठविद्भिरुदाहृता      । सुसप्तचत्वारिंशत्के सर्गान्ते सुन्दरेस्थितिम्॥

      पञ्चमे दिवसे कुर्यादथ षष्ठे      तथोच्यते      । युद्धकाण्डस्य पञ्चाशत्सर्गान्ते विमला स्थिति:॥

      एकोनशतसंख्याके सर्गान्ते सप्तमे      दिने      । युद्धस्यैव तु काण्डस्य विश्राम: सम्प्रकीर्तित:॥

      तथा चोत्तरकाण्डस्य      षट्त्रिंशत्सर्गपूरणे      । अष्टमे दिवसे कृत्वा स्थितिं च नवमे दिने॥

      शेषं समाप्य युद्धस्य चान्त्यं सर्गं पुन:      पठेत्      । रामराज्यकथा यस्मिन् सर्ववाञ्छितदायिनी॥

      एवं पाठक्रम: पूर्वैराचार्यैश्च      विनिर्मित:            

(अनुष्ठानप्रकाश)


[←18]

बृहद्धर्मपुराणमें अलग-अलग काण्डोंके पाठके प्रयोजन इस प्रकार बतलाये गये हैं—

अनावृष्टिर्महापीडाग्रहपीडाप्रपीडिता:            । आदिकाण्डं पठेयुर्ये ते मुच्यन्ते ततो भयात्॥

पुत्रजन्मविवाहादौ गुरुदर्शन एव            । पठेच्च शृणुयाच्चैव द्वितीयं काण्डमुत्तमम्॥

वने राजकुले वह्निजलपीडायुतो      नर:      । पठेदारण्यकं काण्डं शृणुयाद् वा स मङ्गली॥

मित्रलाभे तथा नष्टद्रव्यस्य च      गवेषणे      । श्रुत्वा पठित्वा कैष्किन्ध्यं काण्डं तत्तत् फलं लभेत्॥

श्राद्धेषु देवकार्येषु पठेत्      सुन्दरकाण्डकम्      । शत्रोर्जये समुत्साहे जनवादे विगर्हिते॥

लङ्काकाण्डं पठेत् किं वा शृणुयात् स सुखी      भवेत्।       

य: पठेच्छृणुयाद् वापि      काण्डमभ्युदयोत्तरम्      । आनन्दकार्ये यात्रायां स जयी परतोऽत्र च॥

मोक्षार्थी लभते मोक्षं भक्त्यर्थी भक्तिमेव            । ज्ञानार्थी लभते ज्ञानं ब्रह्मतत्त्वोपलम्भकम्॥

(बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्ड, अध्याय २६। ९—१५)


[←19]

रामभद्र महेष्वास रघुवीर      नृपोत्तम।      भो दशास्यान्तकास्माकं रक्षां देहि श्रियं च ते॥

इस मन्त्रके सम्पुटसे सुन्दरकाण्डका पाठ भी किया जा सकता है।

 


[←20]

इस श्लोकमें सम्बोधनसह‌ित सभी व‌‌िभक्त‌ियोंमें ‘राम’ शब्दके रूप आ गये हैं।

 


[←21]

क‌िसी-क‌िसी प्रत‌िमें ‘स्वल्पायुर्बहुपुत्रकाः’ के स्थानमें ‘स्वल्परायोर्बहुप्रजाः’ पाठ है। इसके अनुसार कलियुगमें प्रायः सब लोग थोड़े धन और अध‌िक संतानवाले होंगे, ऐसा अर्थ समझना चाह‌िये।

 


[←22]

यहाँ जिस परम पदसे लौटनेका वर्णन है, वह ब्रह्मलोकसे भिन्न कोई उत्तम लोक था, जहाँ भगवान् मधुसूदनके सांनिध्य तथा श्रीरामके दर्शन-सुखका अनुभव होता था, इसे साक्षात् वैकुण्ठ या साकेत नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वहाँसे पुनरावृत्ति नहीं होती। अनिच्छासे कथा-श्रवण करनेके कारण उन्हें अपुनरावर्ती लोक नहीं मिला था।


[←23]

स्थान शब्दसे यहाँ मन्द्र, मध्यम और ताररूप त्रिविध स्वरोंकी उत्पत्तिका स्थान बताया गया है। हृदयकी ग्रन्थिसे ऊपर और कपोलफलकसे नीचे जो प्राणोंके संचारका स्थान है, उसीको स्थान कहते हैं; उनके तीन भेद हैं—हृदय, कण्ठ और सिर। उसके पुन: तीन-तीन भेद होते हैं—मन्द्र, मध्य और तार; जैसा कि शाण्डिल्यका वचन है—

यदूर्ध्वं हृदयग्रन्थे: कपोलफलकादध:      । प्राणसंचारणस्थानं स्थानमित्यभिधीयते॥

उर: कण्ठ: शिरश्चेति तत्पुनस्त्रिविधं       भवेत्। मन्द्रं मध्यं च तारं च ... ...॥


[←24]

जहाँ स्वर पूर्ण होते हैं, उस स्थानको मूर्छना कहते हैं। जैसा कि कहा गया है—

             यत्रैव स्यु: स्वरा: पूर्णा मूर्छना सेत्युदाहृता।

वैजयन्तीकोशके अनुसार वीणा आदिके वादनको मूर्छना कहते हैं—‘वादने मूर्छना प्रोक्ता।’


[←25]

गान दो प्रकारके होते हैं—मार्ग और देशी। भिन्न-भिन्न देशोंकी प्राकृत भाषामें गाये जानेवाले गानको देशी कहते हैं और समूचे राष्ट्रमें प्रसिद्ध संस्कृत आदि भाषाका आश्रय लेकर गाया हुआ गान मार्गके नामसे प्रसिद्ध है। कुमार कुश और लव संस्कृत भाषाका आश्रय लेकर इसीकी रीतिसे गा रहे थे।


[←26]

गोविन्दराजकी टीकामें अष्टापदका अर्थ शारिफल या द्यूतफलक किया गया है। वह चौकी जिसपर पासा बिछाया या खेला जाय, द्यूतफलक कहलाती है। पुरीके बीचमें राजमहल था। उसके चारों ओर राजबीथियाँ थीं और बीचमें खाली जगहें थीं। यही ‘अष्टापदाकारा’ का भाव है।

 


[←27]

जो दस हजार महारथियोंके साथ अकेला ही युद्ध करनेमें समर्थ हो, वह ‘अतिरथी’ कहलाता है।


[←28]

शान्ता राजा दशरथ एवं कौसल्याकी औरस पुत्री थी। उन्होंने राजा रोमपादको उसे दत्तक पुत्रीके रूपमें दिया था। इस प्रकार वह राजा दशरथकी औरसी और राजा रोमपादकी दत्तक कन्या थी। (श्रीविष्णुपुराण ४। १८। १७-१८)


[←29]

इस विषयमें सूत्रकारका वचन है—सोमं राजानं दृषदि निधाय......दृषद्भिरभिहन्यात् अर्थात् ‘राजा सोम (सोमलता) को पत्थरपर रखकर........पत्थरसे कूँचे।


[←30]

तथा च सूत्रम्—‘चतुर्विंशत्यङ्गुलयोऽरत्नि:’ अर्थात् एक अरत्नि चौबीस अङ्गुलके बराबर होता है।


[←31]

जातिके अनुसार नाम अलग-अलग होते हैं। दशरथके तो कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों क्षत्रिय जातिकी ही थीं।


[←32]

‘प्रजापतिरश्वमेधमसृजत (प्रजापतिने अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया।)’ इस श्रुतिके द्वारा यह सूचित होता है कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस महायज्ञका अनुष्ठान किया था। इसमें दक्षिणारूपसे प्रत्येक दिशाके दानका विधान कल्पसूत्रद्वारा किया गया है। यथा—‘प्रतिदिशं दक्षिणां ददाति प्राची दिग्धोतुर्दक्षिणा ब्रह्मण: प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्गातु:’॥


[←33]

प्रोष्ठपदा कहते हैं—भाद्रपदा नक्षत्रको। उसके दो भेद हैं—पूर्वभाद्रपदा और उत्तरभाद्रपदा। इन दोनोमें दो-दो तारे हैं। यह बात ज्यौत‌िषशास्‍त्रमें प्रस‌िद्ध है। (रा० त‌ि०)

 


[←34]

रामायणत‌िकके न‌िर्माताने मूलके एकादशाह शब्दको सूतकके अन्त‌‌िम दिनका उपलक्षण माना है। उनका कहना है क‌ि यद‌ि ऐसा न माना जाय तो ‘क्षत्र‌ियस्य द्वादशाहं सूतकम्’ (क्षत्र‌ियको बाहर द‌िनोंका सूतक लगता है) इस स्मृत‌िवाक्यसे व‌िरोध ; अतः रामजन्मके बारह द‌िन बीत जानेके बाद तेरहवें द‌िन राजाने नामकरण-संस्कार क‌िया—ऐसा मानना चाह‌िये।

 


[←35]

रामायणशिरोमणि नामक व्याख्याके निर्माताने ‘अमूर्तिरजसम्’ पाठ माना है। महाभारतके अनुसार इनका नाम ‘अमूर्तरयस्’ या ‘अमूर्तरया’ था (वन ९५। १७)। यहाँ इनके द्वारा धर्मारण्य नामक नगर बसानेका उल्लेख है। यह नगर धर्मारण्य नामक तीर्थभूत वनमें था। यह वन गयाके आस-पासका ही प्रदेश है। अमूर्तरयाके पुत्र गयने ही गया नामक नगर बसाया था। अत: धर्मारण्य और गयाकी एकता सिद्ध होती है। महाभारत वनपर्व (८४। ८५) में गयाके ब्रह्मसरोवरको धर्मारण्यसे सुशोभित बताया गया है। (वन० ८२। ४७) धर्मारण्यमें पितृ-पूजनकी महत्ता बतायी गयी है।


[←36]

महाभारत सभापर्व (२१। १—१०) में इन पाँचों पर्वतोंके नाम इस प्रकार वर्णित हैं—

(१) विपुल,

(२) वराह,

(३) वृषभ

(ऋषभ),

(४) ऋषिगिरि (मातङ्ग) तथा

(५) चैत्यक।


[←37]

इस वर्णनसे जान पड़ता है कि उस रात्रिको कृष्णपक्षकी नवमी तिथि थी।


[←38]

आवह, प्रवह, संवह, उद्वह, विवह, परिवह और परावह—ये सात मरुत् हैं। इन्हींको सात वातस्कन्ध कहते हैं।


[←39]

शास्त्रमें व्ययका विधान इस प्रकार देखा जाता है—

कच्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुन:। पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्यय: संशुद्ध्यते तव॥ (महा० सभा० ५। ७१)

नारदजी कहते हैंयुधिष्ठिर! क्या तुम्हारी आयके एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भागसे तुम्हारा सारा खर्च चल जाता है?


[←40]

नीचे लिखी पाँच वस्तुओंके लिये अर्थका विभाजन करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी सुखी होता है। वे वस्तुएँ हैं—धर्म, यश, अर्थ, आत्मा और स्वजन। यथा—

धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च। पञ्चधा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते॥ (श्रीमद्भा० ८। १९। ३७)

 


[←41]

केकयनरेशके साथ भरत-शत्रुघ्न भी आ जाते। इन सबके तथा राजा जनकके रहनेसे श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जाता और वे वनमें नहीं जाने पातेइसी डरसे देवताओंने राजा दशरथको इन सबको नहीं बुलानेकी बुद्धि दे दी।


[←42]

ऐसा माना जाता है कि यहाँ नारायण शब्दसे श्रीरङ्गनाथजीकी वह अर्चा-मूर्ति अभिप्रेत है; जो कि पूर्वजोंके समयसे ही दीर्घकालतक अयोध्यामें उपास्य देवताके रूपमें रही। बादमें श्रीरामजीने वह मूर्ति विभीषणको दे दी थी, जिससे वह वर्तमान श्रीरंगक्षेत्रमें पहुँची। इसकी विस्तृत कथा पद्मपुराणमें है।


[←43]

किसी कल्पमें समुद्रने अपनी माताको दु:ख दिया था, उससे पिप्पलाद नामक ब्रह्मर्षिने उस अधर्मका दण्ड देनेके लिये उसके ऊपर एक कृत्याका प्रयोग किया। इससे समुद्रको नरकवासतुल्य महान् दु:ख भोगना पड़ा था।

 


[←44]

स्त्री होकर यह वनमें जानेका साहस कैसे करती है? इस विचारसे ईर्ष्या होती है।


[←45]

यह मेरी बात नहीं मान रही है, यह सोचकर रोष प्रकट होता है। इन दोनोंका त्याग अपेक्षित है।


[←46]

जैसे किसी जलहीन बीहड़ पथमें लोग अपने पीनेसे बचे हुए पानीको साथ ले चलते हैं, उसी प्रकार मुझे भी आप साथ ले चलें—यह सीताका अनुरोध है।


[←47]

‘प्राप्स्यामि......इस आधे श्लोकका अर्थ यह भी हो सकता है कि आज यहाँ रहकर जिन उत्तमोत्तम अभीष्ट पदार्थोंको मैं पाऊँगा, उन्हें कलसे कौन देगा?


[←48]

इस श्लोकमें आये हुए ‘सुराघटसहस्रेण’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘सुरेषु देवेषु न घटन्ते न सन्तीत्यर्थ:, तेषां सहस्रं तेन सहस्रसंख्याकसुरदुर्लभपदार्थेनेत्यर्थ:।’ ‘मांसभूतौदनेन’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—‘मांसभूतौदनेन मा नास्ति अंसो राजभागो यस्यां सा एव भू: पृथ्वी च उतं वस्त्रं च ओदनं च एतेषां समाहार:, तेन च त्वां यक्ष्ये।’


[←49]

श्लोक ६ से लेकर २६ तक श्रीरामचन्द्रजीने जो बातें कही हैं, वे लक्ष्मणकी परीक्षाके लिये तथा उन्हें अयोध्या लौटानेके लिये कही गयी हैं; वास्तवमें उनकी ऐसी मान्यता नहीं थी। यही बात यहाँ सभी व्याख्याकारोंने स्वीकार की है।


[←50]

रामायणशिरोमणिकार दस कोसका अर्थ तीस कोस करते हैं और ‘दश च दश च दश च’ ऐसी व्युत्पत्ति करके एकशेषके नियमानुसार एक ही दशका प्रयोग होनेपर भी उसे ३० संख्याका बोधक मानते हैं। प्रयागसे चित्रकूटकी दूरी लगभग २८ कोस मानी जाती है, जो उपर्युक्त संख्यासे मिलती-जुलती ही है। आधुनिक मापके अनुसार प्रयागसे चित्रकूट ८० मील है। इस हिसाबसे चालीस कोसकी दूरी हुई। परंतु पहलेका क्रोशमान आधुनिक मानसे कुछ बड़ा रहा होगा, तभी यह अन्तर है।


[←51]

यहाँ ‘ऐणेयं मांसम्’ का अर्थ है—गजकन्द नामक कन्द विशेषका गूदा। इस प्रसंगमें मांसपरक अर्थ नहीं लेना चाहिये; क्योंकि ऐसा अर्थ लेनेपर ‘हित्वा मुनिवदामिषम्’ (२। २०। २९), ‘फलानि मूलानि च भक्षयन् वने’ (२। ३४। ५९) तथा ‘धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशना:’ (२। ५४। १६) इत्यादि रूपसे की हुई श्रीरामकी प्रतिज्ञाओंसे विरोध पड़ेगा। इन वचनोंमें निरामिष रहने और फल-मूल खाकर धर्माचरण करनेकी ही बात कही गयी है। ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’ (श्रीराम दो तरहकी बात नहीं कहते हैं, एक बार जो कह दिया, वह अटल है) इस कथनके अनुसार श्रीरामकी प्रतिज्ञा टलनेवाली नहीं है।


[←52]

मदनपाल-निघण्टुके अनुसार ‘मृग’ का अर्थ गजकन्द है।


[←53]

‘उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम्।’ (मुहूर्तचिन्तामणि)

अर्थात तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र तथा रविवार—ये ‘ध्रुव’ एवं ‘स्थिर’ संज्ञक हैं। इसमें गृहशान्ति या वास्तुशान्ति आदि कार्य अच्छे माने गये हैं।


[←54]

‘छिन्नशोणितम्’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘छिन्नं शोणितं रक्तविकाररूपं रोगजातं येन स: तम्।’ ‘गजकन्द’ रोगविकारका नाशक है’ यह वैद्यकमें प्रसिद्ध है। मदनपाल-निघण्टुके ‘षड्दोषादिकुष्ठहन्ता’ आदि वचनसे भी यह चर्मदोष तथा कुष्ठ आदि रक्तविकारका नाशक सिद्ध होता है।


[←55]

‘समस्ताङ्ग:’ की व्युत्पत्ति यों समझनी चाहिये—‘सम्यग् भवन्ति अस्तानि अङ्गानि येन स:।’


[←56]

मुख्य पटरानी होनेका अहङ्कार।


[←57]

अपने बड़प्पनके घमंडमें आकर दूसरोंके तिरस्कार करनेकी भावना।


[←58]

अयोध्यासे जो पाँच दूत चले थे, वे सीधी राहसे राजगृहमें आये थे; अत: उनके मार्गमें जो-जो स्थान पड़े थे, वे भरतके मार्गमें नहीं पड़े थे। भरतके साथ रथ और चतुरङ्गिणी सेना थी, अत: उसके निर्वाहके अनुकूल मार्गसे चलकर वे अयोध्या पहुँचे थे। इसलिये इनके मार्गमें सर्वथा नये ग्रामों और स्थानोंका उल्लेख मिलता है।


[←59]

यहाँ सभा उपमेय और हृद (जलाशय) उपमान है। जलाशयके जो विशेषण दिये गये हैं, वे सभामें इस प्रकार संगत होते हैं—सभामें तिमि और जलहस्तीके चित्र लगे हैं। स्थिर जलकी जगह उसमें स्थिर तेज है, खम्भोंमें मणियाँ जड़ी गयी हैं, शङ्खके चित्र हैं तथा फर्शमें सोनेका लेप लगा है, जो स्वर्णबालुका-सा प्रतीत होता है।


[←60]

यहाँ मूलमें ‘मत्स्य’ शब्द ‘मत्स्यण्डी’ अर्थात् मिश्रीका वाचक है। ‘मत्स्यण्डी’ इस नामका एक अंश ‘मत्स्य’ है, अत: नामके एक अंशके ग्रहणसे सम्पूर्ण नामका ग्रहण किया गया है।

 


[←61]

यहाँ ‘आवासमादीपयताम्’ का अर्थ कुछ टीकाकारोंने यह किया है कि ‘वे अपने आवासस्थानमें आग लगाने लगे। ‘आवश्यक वस्तुओंको लाद लेनेके बाद जो मामूली झोंपड़े और नगण्य वस्तुएँ शेष रह जाती हैं, उनमें छावनी उखाड़ते समय आग लगा देना—यह सेनाका धर्म बताया गया है। इसके दो रहस्य हैं, किसी शत्रुपक्षीय व्यक्तिके लिये अपना कोई निशान न छोड़ना—यह सैनिक नीति है। दूसरा यह है कि इस तरह आग लगाकर जानेसे विजय-लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है—ऐसा उनका परम्परागत विश्वास है।

 


[←62]

दो-दो घड़ी (दण्ड) का एक मुहूर्त होता है। दिनमें कुल पंद्रह मुहूर्त बीतते हैं। इनमेंसे तीसरे मुहूर्तको ‘मैत्र’ कहते हैं। बृहस्पतिने पंद्रह मुहूर्तोंके नाम इस प्रकार गिनाये हैं—रौद्र, सार्प, मैत्र, पैत्र, वासव, आप्य, वैश्व, ब्राह्म, प्राज, ईश, ऐन्द्र, ऐन्द्राग्न, नैऋर्त, वारुणार्यमण तथा भगी। जैसा कि वचन है—

रौद्र: सार्पस्तथा मैत्र: पैत्रो वासव एव             आप्यो वैश्वस्तथा ब्राह्म: प्राजेशैन्द्रास्तथैव च॥

ऐन्द्राग्नो नैऋर्तश्चैव वारुणार्यमणो      भगी       एतेऽह्नि क्रमशो ज्ञेया मुहूर्ता दश पश्च च॥


[←63]

सर्ग ५४ के श्लोक २८ में मूल ग्रन्थमें दस कोसकी दूरी लिखी है और यहाँ ढाई योजन। दोनों स्थलोंमें दस कोसका ही संकेत है। रामायणशिरोमणि नामक व्याख्यामें दोनों जगह कपि-जलाधिकरणन्यायसे अथवा एकशेषके द्वारा यह दूरी तिगुनी करके दिखायी गयी है। प्रयागसे चित्रकूटकी दूरी लगभग २८ कोसकी मानी जाती है। रामायणशिरोमणिकारकी मान्यताके अनुसार ३० कोसकी दूरीमें और इस दूरीमें अधिक अन्तर नहीं है। मीलका माप पुराने क्रोश-मानकी अपेक्षा छोटा है, इसलिये ८० मीलकी यह दूरी मानी जाती है।

 


[←64]

शत्रुपक्षके मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्त:पुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनका व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक—ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये। मतान्तरसे ये अठारह तीर्थ इस प्रकार हैं—मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्त:पुराध्यक्ष, कारागाराध्यक्ष, धनाध्यक्ष, राजाकी आज्ञासे सेवकोंको काम बतानेवाला, वादी-प्रतिवादीसे मामलेकी पूछताछ करनेवाला, प्राड्विवाक (वकील), धर्मासनाधिकारी (न्यायाधीश), व्यवहार-निर्णेता, सभ्य, सेनाको जीविका-निर्वाहके लिये धन देनेका अधिकारी (सेनानायक) कर्मचारियोंको काम पूरा होनेपर वेतन देनेके लिये राजासे धन लेनेवाला, नगराध्यक्ष, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक, दुष्टोंको दण्ड देनेका अधिकारी तथा जल, पर्वत, वन एवं दुर्गम भूमिकी रक्षा करनेवाला—इनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये।


[←65]

उपर्युक्त अठारह तीर्थोंमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं।


[←66]

कामसे उत्पन्न होनेवाले दस दोषोंको दशवर्ग कहते है। ये राजाके लिये त्याज्य हैं। मनुजीने उनके नाम इस प्रकार गिनाये हैं—आखेट, जुआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रीमें आसक्त होना, मद्यपान, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना।


[←67]

जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग, वृक्षदुर्ग, ईरिणदुर्ग और धन्वदुर्ग—ये पाँच प्रकारके दुर्ग पञ्चवर्ग कहलाते हैं। इनमें आरम्भके तीन तो प्रसिद्ध ही हैं। जहाँ किसी प्रकारकी खेती नहीं होती, ऐसे प्रदेशको ईरिण कहते हैं। बालूसे भरी मरुभूमिको धन्व कहते हैं। गर्मीके दिनोंमें वह शत्रुओंके लिये दुर्गम होती है। इन सब दुर्गोंका यथासमय उपयोग करके राजाको आत्मरक्षा करनी चाहिये।


[←68]

साम, दान, भेद और दण्ड—इन चार प्रकारकी नीतिको चतुर्वर्ग कहते हैं।


[←69]

राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अङ्ग हैं। इन्हींको सप्तवर्ग कहा गया है।


[←70]

चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष अष्टवर्ग माने गये हैं। किसी-किसीके मतमें खेतीकी उन्नति करना, व्यापारको बढ़ाना, दुर्ग बनवाना, पुल निर्माण कराना, जंगलसे हाथी पकड़कर मँगवाना, खानोंपर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओंसे कर लेना और निर्जन प्रदेशको आबाद करना—ये राजाके लिये उपादेय आठ गुण ही अष्टवर्ग हैं।


[←71]

धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साह-शक्ति, प्रभुशक्ति तथा मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं।


[←72]

त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये तीन विद्याएँ हैं। इनमें तीनों वेदोंको त्रयी कहते हैं। कृषि और गोरक्षा आदि वार्ताके अन्तर्गत हैं तथा नीतिशास्त्रका नाम दण्डनीति है।


[←73]

संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छ: गुण हैं। इनमें शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।


[←74]

आग लगना, बाढ़ आना, बीमारी फैलना, अकाल पड़ना और महामारीका प्रकोप होना—ये पाँच दैवी बाधाएँ हैं। राज्यके अधिकारियों, चोरों, शत्रुओं और राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे तथा स्वयं राजाके लोभसे जो भय प्राप्त होता है, उसे मानवी बाधा कहते हैं।


[←75]

शत्रु राजाओंके सेवकोंमेंसे जिनको वेतन न मिला हो, जो अपमानित किये गये हों, जो अपने मालिकके किसी बर्तावसे कुपित हों तथा जिन्हें भय दिखाकर डराया गया हो, ऐसे लोगोंको मनचाही वस्तु देकर फोड़ लेना राजाका कृत्य (नीतिपूर्ण कार्य) माना गया है।


[←76]

बालक, वृद्ध, दीर्घकालका रोगी, जातिच्युत, डरपोक, भीरु मनुष्योंको साथ रखनेवाला, लोभी-लालची लोगोंको आश्रय देनेवाला, मन्त्री, सेनापति आदि प्रकृतियोंको असंतुष्ट रखनेवाला, विषयोंमें आसक्त, चञ्चलचित्त मनुष्योंसे सलाह लेनेवाला, देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला, दैवका मारा हुआ, भाग्यके भरोसे पुरुषार्थ न करनेवाला, दुर्भिक्षसे पीडि़त, सैनिक-कष्टसे युक्त (सेनारहित), स्वदेशमें न रहनेवाला, अधिक शत्रुओंवाला, अकाल (क्रूर ग्रहदशा आदिसे युक्त) और सत्यधर्मसे रहित—ये बीस प्रकारके राजा संधिके योग्य नहीं माने गये हैं। इन्हींको विंशतिवर्गके नामसे कहा गया है।


[←77]

बालक, वृद्ध, दीर्घकालका रोगी, जातिच्युत, डरपोक, भीरु मनुष्योंको साथ रखनेवाला, लोभी-लालची लोगोंको आश्रय देनेवाला, मन्त्री, सेनापति आदि प्रकृतियोंको असंतुष्ट रखनेवाला, विषयोंमें आसक्त, चञ्चलचित्त मनुष्योंसे सलाह लेनेवाला, देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला, दैवका मारा हुआ, भाग्यके भरोसे पुरुषार्थ न करनेवाला, दुर्भिक्षसे पीडि़त, सैनिक-कष्टसे युक्त (सेनारहित), स्वदेशमें न रहनेवाला, अधिक शत्रुओंवाला, अकाल (क्रूर ग्रहदशा आदिसे युक्त) और सत्यधर्मसे रहित—ये बीस प्रकारके राजा संधिके योग्य नहीं माने गये हैं। इन्हींको विंशतिवर्गके नामसे कहा गया है।


[←78]

द्वैधीभाव और समाश्रय—ये इनकी योनिसंधि हैं और यान तथा आसन इनकी योनिविग्रह हैं, अर्थात् प्रथम दो संधिमूलक और अन्तिम दो विग्रहमूलक हैं।


[←79]

कुछ प्रतियोंमें यह सर्ग १०४ वें सर्गके रूपमें वर्णित है। १०० वें सर्गके बादके तीन सर्गोंके बाद इसका उल्लेख हुआ है।


[←80]

यह आश्रम यमुनासे दक्षिण दिशामें चित्रकूटके कुछ निकट था। गङ्गा और यमुनाके बीच प्रयागवाला आश्रम, जहाँ वनमें जाते समय श्रीरामचन्द्रजी तथा भरत आदिने विश्राम किया था, इससे भिन्न जान पड़ता है। तभी इस आश्रमपर भरद्वाजसे मिलनेके बाद भरत आदिके यमुना पार करनेका उल्लेख मिलता है—‘ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्त्वोर्मिमालिनीम्।’ इस द्वितीय आश्रमसे श्रीराम और भरतके समागमका समाचार शीघ्र प्राप्त हो सकता था; इसीलिये भरद्वाजजी भरतके लौटनेके समय यहीं मौजूद थे।


[←81]

ऋषियोंका एक समुदाय जो ब्रह्माजीके नखसे उत्पन्न हुआ है।


[←82]

ब्रह्माजीके बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियोंका समूह।


[←83]

जो भोजनके बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समयके लिये कुछ नहीं बचाते।


[←84]

सूर्य अथवा चन्द्रमाकी किरणोंका पान करके रहनेवाले।


[←85]

कच्चे अन्नको पत्थरसे कूटकर खानेवाले।


[←86]

पत्तोंका आहार करनेवाले।


[←87]

दाँतोंसे ही ऊखलका काम लेनेवाले।


[←88]

कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले।


[←89]

शरीरसे ही शय्याका काम लेनेवाले अर्थात् बिना बिछौनेके ही भुजापर सिर रखकर सोनेवाले।


[←90]

शय्याके साधनोंसे रहित।


[←91]

निरन्तर सत्कर्ममें लगे रहनेके कारण कभी अवकाश न पानेवाले।


[←92]

जल पीकर रहनेवाले।


[←93]

हवा पीकर जीवननिर्वाह करनेवाले।


[←94]

खुले मैदानमें रहनेवाले।


[←95]

वेदीपर सोनेवाले।


[←96]

पर्वतशिखर आदि ऊँचे स्थानोंमें निवास करनेवाले।


[←97]

मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले।


[←98]

सदा भीगे कपड़े पहननेवाले।


[←99]

निरन्तर जप करनेवाले।


[←100]

तपस्या अथवा परमात्मतत्त्वके विचारमें स्थित रहनेवाले।


[←101]

गर्मीके मौसममें ऊपरसे सूर्यका और चारों ओरसे अग्निका ताप सहन करनेवाले।


[←102]

अगं पर्वतं स्तम्भयति इति अगस्त्य:—जो अग अर्थात् पर्वतको स्तम्भित कर दे, उसे अगस्त्य कहते हैं।


[←103]

यद्यपि पुराणग्रन्थोंमें ‘कश्यपाय त्रयोदश’ इत्यादि वचनोंद्वारा कश्यपकी तेरह पत्नियोंका उल्लेख किया गया है, तथापि यहाँ जिस संतानपरम्पराका वर्णन करना है, उसमें इन आठोंका ही उपयोग है, इसलिये यहाँ आठकी ही संख्या दी गयी है।


[←104]

यहाँ लक्ष्मणने उन्हीं विशेषणोंको दुहराया है, जिन्हें शूर्पणखाने सीताके लिये प्रयुक्त किया था। शूर्पणखाकी दृष्टिसे जो अर्थ है, वह ऊपर दे दिया है; परंतु लक्ष्मणकी दृष्टिमें वे विशेषण निन्दापरक नहीं, स्तुतिपरक है, अत: उनकी दृष्टिसे उन विशेषणोंका अर्थ यहाँ दिया जाता है—विरूपा—विशिष्टरूपवाली त्रिभुवनसुन्दरी। असती—जिससे बढ़कर दूसरी कोई सती नहीं है ऐसी। कराला—शरीरकी गठनके अनुसार ऊँचे-नीचे अङ्गोंवाली। निर्णतोदरी—निम्न उदर अथवा क्षीण कटि-प्रदेशवाली। वृद्धा—ज्ञानमें बढ़ी-चढ़ी। अर्थात् तुम्हें छोड़कर उक्त विशेषणोंवाली सीताको ही वे ग्रहण करेंगे।


[←105]

लाल पूँछवाली एक कीड़ी होती है, जो ओला खा लेनेपर मर जाती है। वह उसके लिये विषका काम करता है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध है।


[←106]

यद्यपि बालकाण्डके २०वें सर्गके दूसरे श्लोकमें राजा दशरथने श्रीरामकी अवस्था सोलह वर्षसे कम (पंद्रह वर्षकी) बतायी थी, तथापि यहाँ मारीचने रावणके मनमें भय उत्पन्न करनेके लिये चार वर्ष कम अवस्था बतायी है। जो छोटी अवस्थामें इतने महान् पराक्रमी थे, वे अब बड़े होनेपर न जाने कैसे होंगे? यह लक्ष्य कराना ही यहाँ मारीचको अभीष्ट है।


[←107]

नक्षत्रलोकमें विचरनेवाला मृग (मृगशिरा नक्षत्र)।


[←108]

दूसरा पृथ्वीपर विचरनेवाला काञ्चन मृग।


[←109]

यहाँ अभूतोपमालंकार है। बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं और रोहिणी चन्द्रमाकी पत्नी। बुधने न तो कभी रोहिणीको पकड़ा है और न वे ऐसा कर ही सकते हैं। यहाँ यह दिखाया गया है कि यदि कदाचित् बुध कामवश अपनी माता रोहिणीको पकड़ लें तो वह जैसा घोर पाप होगा, वही पाप रावणने सीताको पकड़नेके कारण किया था।

 


[←110]

माल्यवान् पर्वत दो माने गये हैं, एक तो दण्डकारण्यमें किष्किन्धाके समीप है और दूसरा मेरुपर्वतके निकट बताया गया है। ये दोनों पर्वत परस्पर इतने दूर हैं कि इनमें संघर्षकी कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इसलिये ‘सपक्ष’ (पंखधारी) विशेषण दिया गया है। पाँखवाले पर्वत कदाचित् उड़कर एक-दूसरेके समीप पहुँच सकते हैं।

 


[←111]

त्रिवेणु रथका वह अङ्ग है, जो जूएको धारण करता है। इसका पर्याय है युगन्धर।


[←112]

रामायणतिलक नामक व्याख्याके विद्वान् लेखकने यह बताया है कि यहाँ जो सीताकी मायासे उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्कामें आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्निमें प्रविष्ट हो चुकी थीं। इसीलिये रावण इन्हें ला सका। मायारूपिणी होनेके कारण ही रावणको इनके स्वरूपका ज्ञान न हो सका।


[←113]

ऐसा कहकर रावण देवी सीताको धोखा देना चाहता है। वास्तवमें ऐसे पापपूर्ण कृत्योंका समर्थन धर्मशास्त्रोंमें कहीं नहीं है। कुमारी कन्याका बलपूर्वक अपहरण शास्त्रोंमें राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है। विवाहिता सती साध्वीका अपहरण घोर पाप माना गया है। इसी पापसे सोनेकी लङ्का मिट्टीमें मिल गयी और रावण दल-बल-कुल-परिवारसहित नष्ट हो गया।


[←114]

यह सर्ग प्रसंगके अनुकूल और उत्तम है। कुछ प्रतियोंमें यह सानुवाद प्रकाशित भी है, परंतु इसपर तिलक आदि संस्कृत टीकाएँ नहीं उपलब्ध होती हैं; इसलिये कुछ लोगोंने इसे प्रक्षिप्त माना है। उपयोगी होनेके कारण इसे भी यहाँ सानुवाद प्रकाशित किया जाता है।


[←115]

रामायणके व्याख्याकारोंमेंसे किसीने ककुभका अर्थ मरुवक लिखा है और किसीने अर्जुनविशेष, किंतु कोषोंमें यह कुटजका पर्याय बताया गया है।

 


[←116]

संधि आदिका विवेचन पृष्ठ ५०७ की टिप्पणीमें देखना चाहिये।


[←117]

मन्द-मन्द मलयानिलका चलना, वनके वृक्षोंका नूतन पल्लवों और फूलोंसे सज जाना, कोकिलोंका कूकना, कमलोंका खिल जाना तथा सब ओर मधुर सुगन्धका छा जाना आदि वसन्तके गुण हैं, जो विरहीकी शोकाग्निको उद्दीप्त करते हैं।


[←118]

रामायणशिरोमणिकार इस श्लोकके पूर्वार्धका अर्थ यों लिखते हैं—निश्चय ही इस मोरके निवासभूत वनमें उस राक्षसने मेरी प्रिया सीताका अपहरण नहीं किया; नहीं तो यह भी उसीके शोकमें डूबा रहता।


[←119]

व्याकरणके नियमानुकूल शुद्ध वाणीको संस्कारसम्पन्न (संस्कृत) कहते हैं।


[←120]

शब्दोच्चारणकी शास्त्रीय परिपाटीका नाम क्रम है।


[←121]

बिना रुके धाराप्रवाहरूपसे बोलना अविलम्बित कहलाता है।


[←122]

मनुस्मृतिमें ये दोनों श्लोक किंचित् पाठान्तरके साथ इस प्रकार मिलते हैं—

राजभि: कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि      मानवा:। निर्मला: स्वर्गमायान्ति सन्त: सुकृतिनो यथा॥

शासनाद् वा विमोक्षाद् वा स्तेन: स्तेयाद्      विमुच्यते। अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥

(८। ३१८,३१६)

 


[←123]

यह नदी सह्यपर्वतसे निकलकर किष्किन्धाकी पर्वत-मालाओंके बीचसे बहती हुई कृष्णा नदीमें जा मिली है।


[←124]

ईशानकोणकी ओर नीची तथा नैऋर्त्यकोणकी ओरसे ऊँची होनेसे उसका द्वार नैऋर्त्यकोणकी ओर था—यह प्रतीत होता है, इससे उसमें पूर्वी हवा और उधरसे आनेवाली वर्षाका प्रवेश नहीं था।


[←125]

‘शक्यो ह्यम्बरमासाद्य’ इति पाठो युक्त:।


[←126]

‘शक्या अञ्जलिभि:’ इति स्वच्छ: पाठ:।


[←127]

यहाँ संध्यामें कामुकी नायिकाके व्यवहारका आरोप होनेसे समासोक्ति अलंकार समझना चाहिये।


[←128]

संगीतमें वह स्थान जहाँ गाने-बजानेवालोंका सिर या हाथ आप-से-आप हिल जाता है। यह स्थान तालके अनुसार निश्चित होता है। जैसे तितालेमें दूसरे तालपर और चौतालमें पहले तालपर सम होता है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न तालोंमें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर सम होता है। वाद्योंका आरम्भ और गीतों तथा वाद्योंका अन्त इसी समपर होता है। परंतु गाने-बजानेके बीच-बीचमें भी सम बराबर आता रहता है।


[←129]

यह प्रसंग बालकाण्डके तिरसठवें सर्गमें आया है।


[←130]

आधुनिक गणनाके अनुसार यह संख्या दस खरब तीन लाख निन्यानबे हजार छ: सौ होती है।


[←131]

यहाँ अर्बुद, शंकु, अन्त्य और मध्य आदि संख्या वाचक शब्दोंका आधुनिक गणितके अनुसार मान समझनेके लिये प्राचीन संज्ञाओंका पूर्ण रूपसे उल्लेख किया जाता है और कोष्ठमें उसका आधुनिक मान दिया जा रहा है—एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख)—ये संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं। (नारदपुराणसे)


[←132]

पुलोम दानवकी कन्या शची इन्द्रदेवके प्रति अनुरक्त थीं, परंतु अनुह्लादने उनके पिताको फुसलाकर अपने पक्षमें कर लिया और उसकी अनुमतिसे शचीको हर लिया। जब इन्द्रको इसका पता लगा, तब वे अनुमति देनेवाले पुलोमको और अपहरण करनेवाले अनुह्लादको भी मारकर शचीको अपने घर ले आये। यह पुराणप्रसिद्ध कथा है। (रामायणतिलकसे)


[←133]

यहाँ दक्षिण दिशाका विभाग किष्किन्धासे न करके आर्यावर्तसे किया गया है। पूर्व समुद्रसे पश्चिम समुद्र और हिमालयसे विन्ध्यके भागको आर्यावर्त कहते हैं। सुग्रीवने दक्षिण दिशाके जिन स्थानोंका परिचय दिया है, उनकी सङ्गति आर्यावर्तसे ही दिशाका विभाजन करनेपर लगती है।


[←134]

अन्य पाठके अनुसार यहाँ मत्स्य देश समझना चाहिये।


[←135]

रामायणतिलकके लेखक अयोमुखको मलय-पर्वतका नामान्तर मानते हैं। गोविन्दराज इसे सह्यपर्वतका पर्याय समझते हैं तथा रामायणशिरोमणिकार अयोमुखको इन दोनोंसे भिन्न स्वतन्त्र पर्वत मानते हैं। यहाँ तिलककारके मतका अनुसरण किया गया है।


[←136]

यद्यपि पहले पञ्चवटीसे उत्तर भागमें अगस्त्यके आश्रमका वर्णन आया है तथापि यहाँ मलयपर्वतपर भी उनका आश्रम था, ऐसा मानना चाहिये। जैसे वाल्मीकि मुनिका आश्रम अनेक स्थानोंमें था, उसी तरह इनका भी था अथवा ये उसी नामके कोई दूसरे ऋषि थे।


[←137]

आधुनिक तंजौर ही प्राचीन पाण्ड्यवंशी नरेशोंका नगर है। इस नगरमें भी छानबीन करनेके लिये सुग्रीव वानरोंको आदेश दे रहे हैं।

 


[←138]

यह महर्षि अगस्त्यका तीसरा स्थान है।


[←139]

यह अवन्ती पूर्व दिशाके मार्गमें बतायी गयी अवन्तीसे भिन्न है।


[←140]

जिसमें एक हजार अरे हों, उसे सहस्रार चक्र कहते हैं।


[←141]

यहाँ दुन्दुभि और महिष शब्दसे उसके पुत्र मायावी नामक दानवका ही वर्णन हुआ है—ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि आगे कही जानेवाली सारी बातें उसीके वृत्तान्तसे सम्बन्ध रखती हैं। पिता भैंसेका रूप धारण करता था, यही गुण उसके पुत्र मायावीमें भी था। इसलिये उसको भी महिष या महिषाकृति कहना असङ्गत नहीं है।


[←142]

बुद्धिके आठ गुण ये हैं—सुननेकी इच्छा, सुनना, सुनकर ग्रहण करना, ग्रहण करके धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्यको भलीभाँति समझना तथा तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न होना।


[←143]

साम, दान, भेद और दण्ड—ये जो शत्रुको वशमें करनेके चार उपाय नीति-शास्त्रमें बताये गये हैं, उन्हींको यहाँ चार प्रकारका बल कहा गया है। किन्हीं-किन्हींके मतमें बाहुबल, मनोबल, उपायबल और बन्धुबल—ये चार बल हैं।


[←144]

चौदह गुण यों बताये गये हैं—देश-कालका ज्ञान, दृढ़ता, सब प्रकारके क्लेशोंको सहन करनेकी क्षमता, सभी विषयोंका ज्ञान प्राप्त करना, चतुरता, उत्साह या बल, मन्त्रणाको गुप्त रखना, परस्पर विरोधी बात न कहना, शूरता, अपनी और शत्रुकी शक्तिका ज्ञान, कृतज्ञता, शरणागतवत्सलता, अमर्षशीलता तथा अचञ्चलता (स्थिरता या गम्भीरता)।


[←145]

यहाँ मूलमें साग्रशतम् (सौ वर्षसे अधिक) समय बीतनेकी बात कही गयी है; परंतु साठवें सर्गके नवें श्लोकमें आठ सहस्र वर्ष बीतनेकी चर्चा आयी है। अत: दोनोंकी एकवाक्यताके लिये यहाँ शत शब्दको आठ सहस्र वर्षका उपलक्षण मानना चाहिये।